| [1] TITLE: डर से बचने के लिए मोबाइल फ़ोन ऐप |
| CONTENT: किसी भी तरह के फ़ोबिया से अब खेल-खेल में मुक्ति मिल सकती है और इसमें मदद कर सकते हैं आपके स्मार्टफ़ोन और टैबलेट के ऐप. मनोचिकित्सक डॉक्टर रसेल ग्रीन को मकड़ियों से फ़ोबिया था. फ़ोबिया यानी किसी चीज़ से बेवजह बेहद अधिक डर लगना. रसेल को एक घटना अभी तक याद है जिसके बाद उन्होंने काम पर जाना ही छोड़ दिया था. उन्होंने बताया एक दिन मैंने देखा कि मेरी सहयोगी के सैंडविच बॉक्स में मकड़ी है. जैसे ही मुझे पक्का विश्वास हुआ मैं अस्पताल से भाग खड़ा हुआ. डॉक्टर ग्रीन को मकड़ी से इतना ज़्यादा डर लगता है कि वो उसकी तस्वीर मात्र देखकर डर जाते हैं. लेकिन डॉक्टर ग्रीन ने अपने फ़ोबिया का सामना करने के लिए एक मोबाइल ऐप फ़ोबिया फ़्री विकसित कर लिया है. ये ऐप इसी तरह की समस्या से जूझने वाले अन्य लोगों की मदद के लिए बनाया गया. इस ऐप में एक ऐसी विधि को अपनाया गया है जिसमें फ़ोबिया से पीड़ित व्यक्ति को जिस चीज़ से फ़ोबिया है उससे धीरे-धीरे रूबरू कराया जाता है. इस विधि को सिस्टेमेटिक डीसेंसिटाइजेशन प्रक्रियागत तरीके से कम संवेदनशील बनाना कहते हैं. अगर किसी को मकड़ी से फ़ोबिया है तो मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति पहले मकड़ी के कार्टून वाला एक गेम खेलता है. शुरुआती गेम में ये कार्टून बहुत प्यारे और सुंदर दिखते हैं लेकिन धीरे-धीरे ये और वास्तविक होते जाते हैं. डॉक्टर ग्रीन के सहयोगी मनोचिकित्सक आंद्रेज़ फोंसेका का मानना है कि ख़ुद की मदद थोड़ा मुश्किल काम होता है क्योंकि इसके लिए बहुत प्रेरणा और इच्छा शक्ति की ज़रूरत होती है. अब दोनों मनोचिकित्सक अगोराफ़ोबिया फ्री ऐप पर काम कर रहे हैं जो ऐसे लोगों की मदद करेगा जो किसी ऐसी परिस्थिति से भयभीत होते हैं जिससे छुटकारा पाना बेहद कठिन होता है. अन्य कई प्रोग्रामर अलग-अलग किस्म के फ़ोबिया से निपटने वाले ऐप विकसित कर रहे हैं. कम्प्यूटर प्रोग्रामर साइमन फॉक्स नहीं जानते कि छह वर्ष पहले जब उन्हें पहला दौरा पड़ा था तब क्या हुआ था. नए साल की पार्टी के दौरान बेचैनी के बाद वो एकांत कमरे में चले गए. वो बताते हैं मुझे लगा कि मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं. साइमन बताते हैं 30 मिनट लंबे दौरे में मुझे लगा कि मैं मर रहा हूं. कुछ महीनों तक रोज़ाना ये दौरे आते रहे. इसके बाद वो एक मनोचिकित्सक से मिले जिन्होंने उन्हें सांस का व्यायाम करने की सलाह दी. साइमन अब एक फ्लोवी ऐप बनाने में जुटे हैं जो सिखाता है कि हाइपरवेंटिलेशन अतिवातायनता से कैसे निपटा जाए. वो इस ऐप से यूज़र्स को यह बताने की कोशिश करेंगे कि कैसे छाती और पेट की बड़ी मांसपेशियों के इस्तेमाल से गहरी सांस ली जाए. इस सॉफ्टवेयर का कुछ ही हफ़्तों में क्लीनिकल मूल्यांकन किया जाएगा. हालांकि कुछ विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ये ऐप भले ही परंपरागत तरीक़ों के साथ-साथ प्रभावी सिद्ध हों लेकिन ये नहीं समझा जाना चाहिए कि ये उन तरीकों की जगह ले लेंगे. मनोचिकित्सक एलिज़ाबेथ ग्रे कहती हैं मुझे नहीं लगता है कि बिना समुचित इलाज के यह ठीक हो जाता है. कुछ लोगों का मानना है कि हम में से ज़्यादातर लोगों का मोबाइल फ़ोन से गहरा रिश्ता होता है और इसमें बीमारी से उबरने में मददगार साबित होने की पर्याप्त संभावना है. मनोचिकित्सक फ़िल टोफ़म वेस्टर्न इंग्लैंड विश्वविद्यालय में शोधकर्ता हैं. फिल सेल्फ़ हेल्प फ़ॉर एंक्ज़ाइटी मैनेजमेंट सैम ऐप विकसित करने वाली टीम के मुखिया हैं. वो बताते हैं लोग अपने फ़ोन और टैबलेट्स से काफ़ी जुड़ जाते हैं. जुड़ाव की यह भावना ही पीड़ित को इन परिस्थितियों में अपने फ़ोन पर भरोसे को बढ़ाती है जो शायद अपने परिवार और मित्रों के साथ वो साझा न कर सकते हों. उनका कहना है तनाव और बेचैनी के साथ थोड़ी झिझक भी जुड़ी होती है और यह समस्या को और बढ़ा देती है |
| DATE: 2014-04-30 |
| LABEL: science |
| [2] TITLE: इंटरनेट एक्सप्लोरर से हो सकता है आपका कंप्यूटर हैक |
| CONTENT: माइक्रोसॉफ्ट ने अपने उपभोक्ताओं को चेतावनी दी है कि इंटरनेट एक्सप्लोरर ब्राउज़र के माध्यम से हैकर आपके कंप्यूटर तक पहुँच सकता है. इंटरनेट एक्सप्लोरर में मौजूदा कमी से हैकर को आसानी होती है कि वो एडमिन राइट्स ले लेता है और कंप्यूटर हैक कर सकता है. इंटरनेट एक्सप्लोरर की यह कमी इंटरनेट एक्सप्लोरर के छठे संस्करण से लेकर ग्यारहवें संस्करण तक में मौजूद है. माइक्रोसॉफ्ट ने कहा इस कमी का फायदा उठाने के मकसद से किए जाने वाले सीमित लक्षित हमलों के बारे में पता था. नेट मार्केट शेयर के अनुसार इंटरनेट एक्सप्लोरर संस्करणों की वैश्विक बाजार में पचास फीसदी से ज़्यादा की हिस्सेदारी है. माइक्रोसॉफ्ट का कहना है कि कमी की जाँच की जा रही और इसे दूर करने के लिए उचित क़दम उठाए जाएंगे. कंपनी ने सप्ताहांत में सुरक्षा संबंधी सुझाव जारी करते हुए कहा ये क़दम हमारे मासिक सुरक्षा रिलीज़ अपडेट में शामिल हो सकते हैं या बाहर से सुरक्षा अपडेट मुहैया कराने के रूप में हो सकते हैं यह ग्राहकों के ज़रूरत पर निर्भर करता है. माइक्रोसॉफ्ट ने कहा कि हैकर विशेष तौर पर बनाई गई वेबसाइट की मदद से कमी का फायदा उठाने के फिराक में हैं. हालांकि उन्हें वेबसाइट देखने के लिए उपयोगकर्ताओं को उकसाना होगा ताकि वे उपयोगकर्ता के कंप्यूटर तक पहुँच सके. वे एक लिंक को ईमेल मैसेज बॉक्स और अन्य माध्यमों से भेज कर भी यह कर सकते हैं. हालांकि किसी हैकर के पास वेबसाइट देखने के लिए उपयोगकर्ताओं को बाध्य करने का कोई रास्ता नहीं है. यदि किसी तरह से हैकर इसमें सफल होता है तो वह उपयोगकर्ता के कंप्यूटर पर अपना नियंत्रण कर सकता है. कंपनी ने चेतावनी दी है अगर कोई उपयोगकर्ता प्रशासनिक उपयोगकर्ता अधिकार के साथ लॉग इन हुआ है और किसी हैकर ने इस कमी का फायदा उठा लिया है तो वह प्रभावित कंप्यूटर पर पूरी तरह से नियंत्रण स्थापित कर लेगा. लेकिन फ़र्म ने आगे कहा कि इंटरनेट एक्सप्लोरर विंडोज़ सर्वर 2003 विंडोज़ सर्वर 2008 विंडोज़ सर्वर 2008 आर 2 विंडोज़ सर्वर 2012 और विंडोज़ सर्वर 2012 आर 2 निषिद्ध रूप में काम करता है जो इस जोखिम को कम कर देता है |
| DATE: 2014-04-28 |
| LABEL: science |
| [3] TITLE: दो साल में तिगुनी हुई ई-सिगरेट पीने वालों की संख्या |
| CONTENT: ब्रिटेन में पिछले दो सालों में इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट ई-सिगरेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या बढ़कर तिगुनी हो गई है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था एक्शन ऑन स्मोकिंग एण्ड हेल्थ ऐश के मुताबिक़ यह संख्या क़रीब 21 लाख तक पहुंच गई है. संस्था का कहना है कि धूम्रपान करने वाले या धूम्रपान छोड़े चुके लोगों में से आधे से ज़्यादा ने ई-सिगरेट का कस लिया है. साल 2010 में यह संख्या आठ प्रतिशत थी. ऐश के इस सर्वेक्षण में 12000 से ज़्यादा धूम्रपान करने वाले वयस्कों को शामिल किया गया. एक अन्य अध्ययन में यह बात सामने आई कि ई-सिगरेट पीने वाले अधिकांश लोग धूम्रपान कम करने के लिए इसका सहारा ले रहे थे. ऐश का कहना है कि ई-सिगरेट पीने वाले ऐसे लोगों की संख्या मात्र एक फ़ीसदी है जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया. इस संस्था ने साल 2010 से ई-सिगरेट के इस्तेमाल पर कई सर्वेक्षण किए हैं जिनमें सबसे ताज़ा मार्च में किया गया. ई-सिगरेट इस्तेमाल करने वाले लोगों में से लगभग सात लाख लोग धूम्रपान छोड़ चुके हैं वहीं क़रीब 13 लाख लोग सिगरेट और तंबाकू के साथ इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट का इस्तेमाल कर रहे हैं. नियमित रूप से सिगरेट पीने वाले लोगों में ई-सिगरेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या साल 2010 के 2-70 फ़ीसदी की तुलना में 2014 में 17-70 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है. जब धूम्रपान छोड़ चुके लोगों से ई-सिगरेट इस्तेमाल करने की वज़ह पूछी गई तो 71 फ़ीसदी लोगों का जवाब था कि वे धूम्रपान छोड़ने में इसकी मदद चाहते थे. वहीं धू्म्रपान करने वाले 48 प्रतिशत लोगों का कहना था कि उन्होंने तंबाकू की मात्रा को कम करने के लिए ऐसा किया जबकि 37 फ़ीसदी लोगों की राय थी कि उन्होंने पैसे बचाने के लिए ई-सिगरेट का विकल्प चुना. ऐश के मुख्य कार्यकारी डेबोरा अर्नोट कहती हैं पिछले चार सालों में ई-सिगरेट पीने वालों की संख्या में नाटकीय बढ़ोतरी बताती है कि धूम्रपान करने वालों का झुकाव तेज़ी से इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट की तरफ़ हो रहा है क्योंकि वे धूम्रपान कम करना चाहते हैं या छोड़ना चाहते हैं. द स्मोकिंग टूलकिट स्टडी द्वारा इंग्लैंड में कराए गए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि धूम्रपान छुड़वाने में मददगार अन्य निकोटीन उत्पादों की तुलना में ई-सिगरेट ज़्यादा लोकप्रिय हो रही है. इस अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि इंग्लैंड में पिछले साल सिगरेट छोड़ने वालों की संख्या बढ़ी है और धूम्रपान की दर लगातार गिर रही है. अध्ययन दल के प्रमुख प्रोफ़ेसर रॉबर्ट वेस्ट कहते हैं ई-सिगरेट के बारे में दावा किया जाता है कि इससे फिर से धूम्रपान की ओर लौटने का ख़तरा रहता है लेकिन हमें इस दावे के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं मिला. वे कहते हैं इसके विपरीत ई-सिगरेट धूम्रपान को कम करने में काफ़ी मददगार हो सकती हैं क्योंकि बड़ी संख्या में लोग इनका इस्तेमाल सिगरेट छोड़ने के लिए कर रहे हैं. डेबोरा अर्नोट ने कहा ई-सिगरेट के विज्ञापन को नियंत्रित करना काफ़ी जरूरी है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चे और धूम्रपान न करने वाले इसकी चपेट में न आएं. हमारे शोध में ई-सिगरेट से सिगरेट की लत लगने जैसे कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं. ऐश के सर्वेक्षण के अनुसार ई-सिगरेट पीने वाले अधिकांश लोग ऐसे रिचार्जेबल उत्पाद का इस्तेमाल करते हैं जिसका कार्ट्रिज बदला जा सके. धूम्रपान का समर्थन करने वाले एक समूह फ़ॉरेस्ट के निदेशक साइमन क्लार्क ने कहा कि वे ई-सिगरेट के बढ़ते चलन का स्वागत करते हैं और इस बात को लेकर ख़ुश हैं कि लोगों के पास विकल्प है. लेकिन वह साथ ही कहते हैं कि ई-सिगरेट का इस्तेमाल करने वाले अधिकांश लोग सिगरेट छोड़ने की बजाय केवल इसका प्रयोग कर रहे हैं. उन्होंने कहा धूम्रपान छोड़ने वालों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट नहीं आई है. अधिकांश धूम्रपान करने वालों को अभी भी लगता है कि इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट या ई-सिगरेट काफ़ी शुरुआती दौर में हैं और इनकी तकनीक के सुधार में कुछ साल लगेंगे. |
| DATE: 2014-04-28 |
| LABEL: science |
| [4] TITLE: पेड़ से लटकी ज़िंदगी पर सांस में दिक़्क़त नहीं |
| CONTENT: दक्षिण और मध्य अमरीका के वर्षावन के पेड़ों की शाखाओं पर नीचे की ओर लटके रहने वाली पत्तियां-फल खाने वाली सुस्त स्तनधारी जानवर स्लोथ के बारे में स्वांसी यूनिवर्सिटी की टीम ने एक दिलचस्प जानकारी हासिल की. स्वांसी विश्वविद्यालय की टीम का कहना है कि सुस्त स्लोथ अपनी 90 फ़ीसदी ज़िंदगी नीचे की तरफ़ लटक कर ही गुज़ारने में सक्षम होती हैं लेकिन इसके बावजूद वे सामान्य तरीक़े से सांस लेना जारी रखती हैं. इस शोध में पाया गया है कि इन स्तनधारियों की ख़ूबी यह होती है कि वे अपने आंतरिक अंगों को पंजर से चिपकाए रख सकती हैं. इस चिपकाव की वजह से ही पेट जिगर गुर्दे आंत या मूत्राशय का दबाव झिल्ली पर नहीं बन पाता. कोस्टारिका में कराए गए इस शोध को रॉयल सोसायटी ने प्रकाशित किया. वैज्ञानिकों का कहना है कि इन मायावी और लुप्तप्राय प्राणियों जो दुनिया की सबसे धीमी रफ़्तार में चलने वाली स्तनधारी हैं उनके बारे में अभी काफ़ी कुछ जानना बाक़ी है. फिलहाल उनके प्राकृतिक आहार और रहने की पसंदीदा जगह से जुड़ी बुनियादी जानकारी भी एक रहस्य बनी हुई है. प्राणी विज्ञान की 24 वर्षीय शोधकर्ता रेबेका क्लिफ़ भी उस शोध पत्र के लेखकों में से एक है जिसे कोस्टारिका के स्लोथ सैंक्चुअरी में किया गया था. उनका कहना है बेहद धीमी चयापचय दर और कम ऊर्जा आहार की वजह से स्लोथ ऊर्जा की बचत करने में माहिर हैं. उनके पाचन की दर बेहद धीमी है और उनके शरीर का एक-तिहाई वज़न मूत्र व मल में ही हो सकता है. ऐसी स्तनपायी जो लंबे समय तक उलटी लटकी होती हैं उनके पेट के वज़न का दबाव फेफड़ों पर पड़ता है जिससे ऊर्जा के लिहाज से सांस लेना असंभव तो नहीं लेकिन थोड़ा मुश्किल ज़रूर होगा. स्लोथ ने पंजर के मुक़ाबले अपने अंगों को स्थिर रख कर इस समस्या का हल कर दिया है. जब स्लोथ उल्टे लटके होते हैं तब उनमें आंतरिक स्तर पर कई ऐसे चिपकने वाले अवलंब होते हैं जो पेट और आंत का वज़न सह लेते हैं. हमारा यह अनुमान है कि ये चिपकने वाली चीज़ें एक स्लोथ के ऊर्जा खर्च में 7 से 13 फ़ीसदी तक की कमी कर सकती हैं. स्लोथ के लिए 7 से 13 फ़ीसदी तक की ऊर्जा बचत बेहद अहम है. वे अपने भोजन के ज़रिये पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करती हैं ताकि वे जब ज़रूरी हो तब चल सकें. अगर ये चिपकाव वाला अवलंब न हो तो स्लोथ के लिए हर सांस के साथ अपना अतिरिक्त वज़न उठाना अगर पूरी तरह असंभव नहीं भी हो तब भी मुश्किल होगा. इसी वजह से इन सरल चिपकाऊ अवलंबों की मौजूदगी ज़रूरी है. स्वांसी विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ साइंस के प्रोफेसर और इस शोध पत्र के सह लेखक रोरी विल्सन ने कहा स्लोथ जो भी करते हैं वह सामान्य नहीं होता. वे बेहद असाधारण स्तनधारी हैं जिनके बारे में मैंने जाना हैं हालांकि हम उनके बारे में अब भी कम ही जानते हैं. हमारे लिए यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम इन प्राणियों को वनों की कटाई का शिकार होते देखें और हमें यह ज़रा भी अंदाज़ा न हो कि इनकी मदद कैसे की जाए. |
| DATE: 2014-04-28 |
| LABEL: science |
| [5] TITLE: आंत के बैक्टीरिया में छिपा है मोटापे का कारण |
| CONTENT: मोटापा घटाने वाले बेहतरीन से बेहतरीन तरीक़ों की खोज का कोई अंत नहीं है. अब चीन के शोधकर्ता इस बात पर अध्ययन कर रहे हैं कि आंत में मौजूद बैक्टीरिया का लोगों के मोटापे से क्या संबंध है. उनका मानना है कि आंत में पाए जाने वाले बैक्टीरिया की प्रजाति में बदलाव लाकर लोगों के वज़न कम करने में मददगार साबित हो सकता है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि वज़न कम करने के पारंपरिक तरीक़े का महत्व कभी ख़त्म नहीं होगा. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार 2008 में दुनिया में 20 वर्ष से ज़्यादा उम्र वाले क़रीब 1-4 अरब लोग मोटापे के शिकार थे. यह संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है और 1980 के मुक़ाबले यह दोगुनी हो गई है. चूहों पर किए गए इस शोध से पता चला है कि बैक्टीरिया और मोटापे में संबंध है. शंघाई में वैज्ञानिकों ने मोटापे के शिकार ऐसे 93 लोगों को शोध के लिए चुना जिनका औसत बॉडी मास इंडेक्स बीएमआई 32 था. उन्होंने इन लोगों को एक ख़ास प्रकार के बैक्टीरिया बढ़ाने वाला भोजन दिया जिससे आंत में अन्य क़िस्म के बैक्टीरिया की संख्या कम हो गई. इस दौरान संतुलित ख़ुराक का ध्यान रखा गया. तीस दिन नौ सप्ताह और तेईस सप्ताह के अंतराल पर सहभागियों ने एक प्रश्नावली में पिछले चौबीस घंटों में लिए गए भोजन के बारे में बताया. रात भर के उपवास के बाद सभी सहभागियों का परीक्षण किया गया और उनका वजन मापा गया. इस प्रयोग में नौ सप्ताह तक शामिल रहे लोगों में औसतन पांच किलोग्राम वज़न कम हुआ और 23 सप्ताह इस ख़ुराक पर रहने वालों में 45 प्रतिशत लोगों का औसतन छह किलोग्राम वज़न कम हुआ. इनका औसत बीएमआई कम होकर 29-3 रह गया. ज़्यादा मोटापे के शिकार एक व्यक्ति का वज़न छह महीने में 51 किलोग्राम तक कम हुआ. यह शोध माइक्रोबायोलॉजी इकोलॉजी में प्रकाशित हुआ है. शोध पत्र के अनुसार रक्त नलिकाओं को नुक़सान पहुंचाने वाले और धमनियों को बाधित करने के लिए ज़िम्मेदार C-रीएक्टिव प्रोटीन की भी मात्रा भी कम पाई गई. इस अध्ययन से जुड़े तोंग विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर लिपिंग झाओ का कहना है कि आंत में अत्यधिक विशैला पदार्थ पैदा करने वाले बैक्टीरिया के उच्च स्तर से इंसुलिन स्राव पर असर पड़ता है. इसका मतलब यह हुआ कि एक कटोरा चावल भूख को शांत नहीं कर पाता और खाने की इच्छा बनी रहती है. प्रोफ़ेसर लिपिंग कहते हैं यदि इस तरह के बैक्टीरिया आंत में मौजूद होते हैं तो कैलोरी नियंत्रित खुराक से भी वज़न कम नहीं हो सकता क्योंकि यह उस जीन को निष्क्रिय कर देता है जो कैलोरी जलाने के लिए ज़िम्मेदार होता है. लेकिन डरहम विश्वविद्यालय के डॉक्टर डेविड विनकोव का कहना है कि बैक्टीरिया अपनी प्रकृति में बदलवा करते हैं और इस शोध में इस ओर भी ध्यान देना होगा. इंपीरियल कॉलेज लंदन के प्रोफेसर सर स्टीफेन ब्लूम कहते हैं कि शरीह में कोशिकाओं से 10 गुने ज़्यादा बैक्टीरिया पाए जाते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि शरीर में मौजूद बैक्टीरिया का शरीर पर प्रभाव पड़ता है. उदाहरण के लिए पेचिश के दौरान कई तरह के बैक्टीरिया पेट में पैदा हो जाते हैं और वज़न को कम करते हैं. |
| DATE: 2014-04-26 |
| LABEL: science |
| [6] TITLE: समुद्र के गर्भ से निकलेंगी धातु |
| CONTENT: समुद्र के नीचे गहराई में दुनिया की पहली खान खोदने की योजना साकार रूप लेने के करीब पहुँच गई है. एक कनाडाई खदान कंपनी ने पापुआ न्यू गिनी के साथ समुद्र के तल में खुदाई शुरू करने संबंधी समझौते को अंतिम रूप दिया है. इस विवादास्पद योजना के तहत तांबा के अयस्क सोना और अन्य कीमती धातुओं को 1500 मीटर की गहराई से निकाला जाएगा. हालाँकि पर्यावरण संरक्षण अभियान चलाने वालों का कहना है समुद्र की तल में खुदाई विनाशकारी साबित होगी. यह समुद्री जीवन को नुकसान पहुँचाएगा. नौटीलस मिनरल नाम की कंपनी की 1990 से पापुआ न्यू गिनी क्षेत्र के समुद्र तल के नीचे मौजूद खनिज पर नज़र है लेकिन सरकार के साथ लंबे विवाद के बाद यह योजना ठप पड़ गयी थी. खुदाई अभियान की शर्तों को लेकर दोनों पक्षों में विवाद था. अब पूरे हुए समझौते के तहत पापुआ न्यू गिनी खुदाई अभियान में करीब 7 अरब 27 करोड़ की लागत लगाएगी और खदान में 15 फीसदी की हिस्सेदारी लेगी. नौटीलस मिनरल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइक जॉनस्टन ने बीबीसी न्यूज़ को कहा इसमें बहुत समय लगा है लेकिन हर कोई बहुत ख़ुश है. इस योजना को हमेशा बहुत समर्थन मिलता रहा है और यह बहुत अपील करने वाला है कि इससे महत्वपूर्ण मात्रा में इस क्षेत्र में राजस्व पैदा होगा जिसकी आम तौर पर होने की उम्मीद नहीं होगी. खुदाई का क्षेत्र समुद्र तल के ऊपर जलीय ऊष्मा वाला वह क्षेत्र होगा जहाँ गर्म अम्लीय पानी निकलता है और उसे अपेक्षाकृत अधिक ठंडा और क्षारीय समुद्री जल का सामना करना पड़ता है. इससे उस क्षेत्र में खनिज की अधिक मात्रा निर्माण होता है. इसके परिणामस्वरूप ज़मीन की सतह की तुलना में समुद्र तल सोना और तांबा जैसे खनिज के मामले में ज़्यादा समृद्ध होता है. दशकों से खुदाई की यह योजना इंजीनियरिंग और अधिक लागत की वज़ह से खटाई में पड़ी हुई थी. लेकिन ऐसे वक़्त में जब कीमती धातुओं की मांग की वज़ह से इन धातुओं की वैश्विक कीमत बढ़ी हुई है तेल और गैस की खुदाई के सिलसिले में नई तकनीक का विकास हुआ है. खुदाई के लिए रोबोटिक मशीनों का विकास भी हो चुका है. खुदाई की योजना के तहत समुद्र तल की ऊपरी सतह को तोड़ने की योजना है ताकि धातु अयस्क गारे के रूप में ऊपर आ जाए. चूंकि समुद्र की सतह से धातु अयस्क निकालने की यह पहली कोशिश होगी इसलिए इस पूरे अभियान और इसके नतीजों को लेकर कंपनी गंभीर है. |
| DATE: 2014-04-26 |
| LABEL: science |
| [7] TITLE: ब्रिटेन 'पांच गुना बढ़े' त्वचा कैंसर के मामले |
| CONTENT: आंकड़े बताते हैं कि ब्रिटेन में गंभीर किस्म के त्वचा कैंसर के मामले 1970 के दशक की तुलना में पांच गुना अधिक हो गए है. कैंसर रिसर्च ब्रिटेन के आंकड़ों के मुताबिक़ 13000 से ज़्यादा लोगों में हर साल ख़तरनाक त्वचा कैंसर रोग विकसित होता है. 1970 के दशक के मध्य में प्रत्येक साल 1800 त्वचा कैंसर के मामले सामने आते थे. आंकड़ों में बढ़ोत्तरी के संबंध में इस संस्था का मानना है कि 1960 के दशक के आख़िर में यूरोप में छुट्टियों के पैकेज़ की शुरुआत की वजह से मामले बढ़ने लगे हैं क्योंकि धूप में झुलसने की वज़ह से इस बीमारी की संभावना बढ़ जाती है. कैंसर रिसर्च यूके के मुताबिक़ दूसरा कारण सनबेड यानी धूप कुर्सी का इस्तेमाल है. त्वचा कैंसर से हर साल 2000 से ज़्यादा लोगों की जान चली जाती है. अब यह पांचवां सबसे आम तौर पर होने वाला कैंसर है. ब्रिटेन में हर साल प्रत्येक एक लाख लोगों में से क़रीब 17 लोगों में कैंसर का पता चलता है. जबकि 1970 के दशक के मध्य में यह आंकड़ा प्रत्येक एक लाख लोगों पर केवल तीन का था. त्वचा कैंसर होने की संभावना उन लोगों में अधिकतम होती है जिनकी त्वचा का रंग गेहुंआ हो त्वचा तिल या चकत्तों से भरा हो या धूप में झुलसने या बीमारी की कोई पारिवारिक पृष्ठभूमि हो. बीमारी से बचने के लिए विशेषज्ञों की सलाह है कि ज़्यादातर वक़्त छायादार जगह में बिताया जाए और कम से कम एसपीएफ़-15 सनस्क्रीन का उपयोग करें. कैंसर रिसर्च ब्रिटेन के प्रमुख निक ऑर्मिस्टन स्मिथ का कहना है हम जानते हैं कि पराबैंगनी किरणें और सनबेड का इस्तेमाल त्वचा कैंसर होने की मुख्य वजह है. इसका मतलब है कि कई मामलों में बीमारी को रोका जा सकता है और इसके लिए ज़रूरी है कि चाहे आप देश में हो या विदेश में धूप लेने से संबंधित सही आदतों का ध्यान रखें. हालाँकि 10 में से आठ लोग इस कैंसर से निजात पा लेते हैं जो कि कैंसर ठीक होने के मामले में अधिकतम है. |
| DATE: 2014-04-22 |
| LABEL: science |
| [8] TITLE: इनको को भी मालूम है घर बनाने का हुनर |
| CONTENT: घर बनाने की कला सिर्फ इंसान ही नहीं जानते बल्कि पक्षियों में भी टिकाऊ घर बनाने में दक्षता होती है. वैज्ञानिकों का दावा है कि घोंसला बनाने के लिए बेहतरीन सामग्रियों के चयन का हुनर पक्षी भी सीख सकते हैं. इससे पहले माना जाता था कि घोंसला बनाने के लिए तिनकों के चुनाव की प्रक्रिया पक्षियों के जीन्स से निर्धारित होती है. हर प्रजाति का घोंसला बनाने का तरीका एक खास किस्म का होता है. लेकिन प्रयोगों से पता चला है कि यह इससे कहीं ज़्यादा जटिल प्रक्रिया होती है. रॉयल सोसाइटी जर्नल प्रोसीडिंग में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि एक प्रयोग किया गया जिसमें घोंसला बनाने के लिए एक छोटी चिड़िया को मजबूत तिनके दिए गए. सेंट एंड्र्यूज विश्वविद्यालय से जुड़ी मुख्य शोधकर्ता डॉक्टर इडला बेली ने बताया हमने पाया कि इस चिड़िया ने मजबूत तिनकों को ही पसंद किया. डॉक्टर बेली और उनके सहयोगी चिड़ियों में सीखने की क्षमता का अध्ययन कर रहे थे. उनका उद्देश्य यह जनाना था कि क्या पक्षियों में गुणवत्ता के आधार पर सामग्रियों को चुनने की क्षमता होती है. इसे जानने के लिए पक्षियों के एक समूह को तिनके सरीखे तार दिए जबकि दूसरे समूह को थोड़े मजबूत और ज़्यादा सुडौल तिनके दिए. इसके बाद बारी बारी से दोनों समूह के पक्षियों को दोनों तरह के तिनके चुनने दिया गया. शोधकर्ताओं को तब ताज्ज़ुब हुआ जब कमजोर तिनकों से घोंसला बना चुकी चिड़ियों ने बेहतरीन किस्म के तिनकों को चुनाव करना पसंद किया. डॉक्टर बेली ने बताया पूरी दुनिया में घोंसलों की प्रकृति में बहुत ज़्यादा विविधता है. कुछ तो बहुत आश्चर्यजनक होते हैं जैसे लटकी हुई टोकरी के समान और चूंकि पक्षियों को इंसानों जैसा चतुर नहीं समझा जाता इसलिए धारणा यह है कि घोंसले का एक खाका उनकी जीन में होता है. उन्होंने कहा यह प्रयोग दिखाता है कि उनके निर्णय को सीखने की कला बहुत प्रभावित करती है. |
| DATE: 2014-04-17 |
| LABEL: science |
| [9] TITLE: बहुत हल्के में न लें आंत के कैंसर को |
| CONTENT: कैंसर से बचाव का सबसे सुरक्षित उपाय है इसका शुरुआत में ही पता लगा लेना लेकिन यह जांच से ही संभव है. एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि आंत के कैंसर के मामले में जागरूकता का स्तर अपेक्षाकृत बहुत कम है. इसके बाद कैंसर के ख़िलाफ अभियान चलाने वालों ने आंत के कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाने पर जोर दिया है. आंकड़ों से पता चला है कि इंग्लैंड में इस बीमारी के शिकार लोगों में आधे से कुछ ही ज़्यादा लोग जांच के लिए आगे आए हैं. संस्था बीटिंग बाउल कैंसर ने अधिक से अधिक लोगों को जांच के लिए आगे आने की अपील की है और कहा है कि इंग्लैंड के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग को इसकी जांच को प्राथमिकता देनी चाहिए. आंकड़े बताते हैं कि 60 से 74 वर्ष की उम्र के बीच इस बीमारी के प्रति 58 प्रतिशत लोगों में जागरूरकता है. जबकि स्तन कैंसर और सर्वाइकल कैंसर के मामले में जागरूरकता का प्रतिशत क्रमशः 72 और 79 प्रतिशत है. आंत के कैंसर की जांच का कार्यक्रम बहुत नया है. इसे 2006 में इसे शुरू किया गया था. संसदीय प्रश्नोत्तर के दौरान मिले आंकड़ों में क्षेत्रीय भिन्नता भी देखने को मिली. उदाहरण के लिए डोरसेट में 66 प्रतिशत लोग इस बीमारी को लेकर जागरुक है तो वहीं पश्चिमी लंदन केवल 42 प्रतिशत ही बीमारी के बारे में जानते हैं. बीटिंग बाउल कैंसर के प्रमुख मार्क फ्लैनागन ने कहा हमें इससे बेहतर करना होगा. हमें पता है कि समय रहते जांच कर ली जाए तो लोगों की जान बचाई जा सकती है. चिह्नित आबादी में हर सदस्य की जांच हर दो साल में की जाती है. इस जांच के जरिए उन गांठों का पता लगाने में मदद मिलती है जो कैंसर तो नहीं होता लेकिन आगे चलकर कैंसर के रूप में विकसित हो सकती हैं. इस जांच कार्यक्रम के पहले चार वर्ष में 7000 कैंसर रोगियों की पहचान की गई और 40000 रोगियों की आंत की गांठें निकाली गईं. नेशनल हेल्थ कैंसर स्क्रीनिंग प्रोग्राम के निदेशक प्रोफेसर जूलिएटा पैटनिक के अनुसार जागरूकता बढ़ाना अभी भी प्राथमिकता में है. |
| DATE: 2014-04-17 |
| LABEL: science |
| [10] TITLE: नेत्रहीनों के लिए बनाई गई 'सुंदर' घड़ी |
| CONTENT: द ब्रैडली टाइमपीस एक ऐसी घड़ी है जो दृष्टि बाधितों को समय बताती है. इस सर्वेश्रेष्ठ डिज़ाइन प्रतियोगता के लिए नामांकित किया गया है. क्रिस स्टोकेल-वाकर बता रहे हैं इस घड़ी के निर्माण और नामकरण के पीछे की कहानी. टाइटेनियम की इस घड़ी का डायल गोल है. इस घड़ी में कोई सुई नहीं है न ही कोई अंक हैं. इस घड़ी में दो बॉल-बेयरिंग लगे हैं जिनके सहारे समय जाना जाता है. एक बॉल-बेयरिंग से घंटे का पता चलता है और दूसरे से मिनट से. डिज़ाइनर ह्यूंग्सू साल 2011 में किम मैसाचुएट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी के छात्र थे. एक दिन उनके साथी उनसे समय पूछा. उनके साथी नेत्रहीन थे. उनके पास नेत्रहीनों को समय बताने वाली घड़ी तो थी लेकिन क्लास में पढ़ाई के दौरान बोल कर समय बताने वाली घड़ी का प्रयोग संभव नहीं था. किम कहते हैं मेरे सहपाठी के लिए मैं उनकी कलाई घड़ी था. नेत्रहीनों के लिए कई घड़ियाँ पहले से उपलब्ध हैं. इनमें से ज़्यादातर घड़ियां सामान्य घड़ियों जैसी ही दिखती हैं. इनका ऊपरी कवर हटाकर हाथों से छूकर समय पता करना पड़ता है. ब्रिटेन में नेत्रहीनों और आंशिक दृष्टबाधितों के लिए काम करने वाली संस्था आर एन आई बी की लेज़्ली ड्यूरो ने कहा अगर आप नेत्रहीन हैं और आधी रात को आपकी नींद खुल जाती है तो यदि आपको यह नहीं पता चल पाता कि क्या समय हो रहा है तो आप बहुत असुरक्षित महसूस करते हैं. किम कहते हैं पहले की घड़ियां काम की तो थीं लेकिन वो सुंदर नहीं थीं. नेत्र वाले लोग घड़ियों को केवल समय जानने का साधन ही नहीं बल्कि कई बार फ़ैशन की चीज़ के रूप में भी प्रयोग करते हैं. कई लोगों को लगता है कि नेत्रहीनों के लिए घड़ी केवल समय जानने का साधन है. लेकिन यह एक ग़लत सोच है. पहले से मौजूद घड़ियों के व्यावहारिक आलोचना भी की जाती रही है. किम अपने दोस्त के लिए एक ऐसी घड़ी चाहते थे जो काम की होने के साथ ही देखने में भी सुंदर हो. किम ने कहा मैंने इंजीनियरों की एक टीम बनाई. हमने ब्रैले लिपि के डिस्प्ले वाली घड़ी बनाने की सोची. लेकिन हमने जब ऐसा नमूना बनाया तो लोगों की प्रतिक्रिया उत्साहवर्धक नहीं रही. वो कहते हैं हमें पता चला कि दृष्टि बाधित लोगों में से तक़रीबन 10 प्रतिशत ही ब्रेल लिपि पढ़ पाते हैं. ब्रिटेन और अमरीका में बहुत से लोग ऐसे हैं जो जन्म से नेत्रहीन नहीं हैं बल्कि उनमें ऐसी दिक्कत बाद में हुई. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार नेत्रहीनों की कुल संख्या में 82 फ़ीसदी से ज़्यादा की उम्र 50 साल से अधिक है. ब्रैल लिपि पढ़ने का अभ्यास न होने के कारण ऐसे लोगों की हाथों से स्पर्श करके महसूस करने की क्षमता कम विकसित होती है. किम की टीम ने फिर से नए डिज़ाइन पर काम करना शुरू किया. उन्होंने 25 से ज़्यादा डिज़ाइन बनाए. उनका नेत्रहीनों पर परीक्षण किया. घड़ी को सुंदर और काम का दोनों एक साथ बनाना काफ़ी चुनौतीपूर्ण था. अंततोगत्वा एक डिज़ाइन पर किम की टीम की सहमति बनी. इस घड़ी में चुंबक के सहारे समय जानने के लिए दो बॉल-बेयरिंग का प्रयोग किया गया था. लेकिन इस घड़ी में बॉल-बेयरिंग के प्रयोग को लेकर भी बहस हुई. किम कहते हैं सब चाहते थे कि बॉल-बेयरिंग थोड़ी बड़ी हो ताकी इसे बेहतर तरीके से महसूस किया जा सके. लेकिन डिज़ाइनरों का कहना था कि उनका आकार बढ़ाने पर घड़ी भद्दी लगने लगेगी. फिर हमने बीच का रास्ता चुना. सितंबर 2011 में जब किम ने इस परियोजना पर काम करना शुरू तभी बम निरोधक दस्ते के एक अफ़सर लेफ्टीनेंट ब्रैडली स्नाइडर अफ़ग़ानिस्तान में एक विस्फ़ोटक का शिकार हो गए. उन्हें गंभीर चोट लगी और उनकी देखने की शक्ति छिन गई. अगस्त 2012 में हुए लंदन पैरा ओलंपिक में ब्रैडली ने दो स्वर्ण पदक जीते. लेकिन उनका दैनिक जीवन संघर्ष भरा ही था. ब्रैडली कहते हैं मैं अफ़ग़ानिस्तान में घायल हुआ था. मेरी आंख सीधे अमरीका के एक अस्पताल में खुली. बेहोशी के 60 घंटे मेरे जीवन से गायब हो गए. आंखे खोने के बाद के अनुभव के बारे में ब्रैडली कहते हैं कि इसे बर्दाश्त करना बड़ा ही मुश्किल था. आखिरकार ब्रैडली से किम ने संपर्क किया. हालांकि उन दोनों की पहली मुलाकात एक साझा दोस्त के हवाले से हुई थी. ब्रैडली कहते हैं किम नेत्रहीनों के लिए एक घड़ी बना रहे थे. मैं एक नेत्रहीन था. वे बताते हैं मेरे पास एक आवाज़ करने वाली घड़ी थी. वह बटन दबाने पर बोलकर समय बताती थी. लेकिन अगर मैं ट्रेन वगैरह में होता था तो उसकी आवाज़ नहीं सुन पाता था. वे कहते हैं सबसे बुरी बात तो यह थी कि समय जानने के लिए बटन दबाते ही मुझे अहसास हो जाता था कि मैं एक ऐसा इंसान हूँ जिसे विशेष मदद की ज़रूरत है. वे कहते हैं मुझे यह ख़्याल अच्छा लगा कि मैं वैसी ही चीज़ का प्रयोग करूँ जैसा कि सब करते हैं. मैं जितना हो सके उतना सामान्य महसूस करना चाहता हूँ. इस घड़ी का नाम ब्रैडली के नाम पर रखा गया. क्राउडफंडिंग वेबसाइट किकस्टार्टर पर पिछले साल जुलाई में 65 देशों को 3681 लोगों ने 594602 डॉलर की मदद दी. यह घड़ी इस साल मई से अमरीका ब्रिटेन और यूरोप में मिलने लगेगी. बाद में यह और जगह उपलब्ध होगी. किम बताते हैं कि 1000 लोगों ने इस घड़ी की एडवांस बुकिंग की है लेकिन इनमें से केवल एक से दो प्रतिशत ही नेत्रहीन हैं. ब्रैडली कहते हैं यह घड़ी नेत्रहीनों और नेत्र वालों के बीच की दूरी को कम करती है. लंदन डिज़ाइन म्यूज़ियम के सालाना प्रतियोगिता में इस घड़ी को शामिल किया गया है. इस प्रतियोगिता में शामिल 76 विभिन्न डिज़ाइनों में ब्रैडली घड़ी की डिज़ाइन को काफ़ी सराहना मिल रही है. इस प्रतियोगिता में नामांकन होने मात्र से ही इसे यूरोप के घड़ी विक्रेताओं से प्रस्ताव मिलने लगे हैं. इस ख़ूबसूरत घड़ी को देखकर यह अंदाज लगाना मुश्किल होगा कि यह नेत्रहीनों की घड़ी है. किम कहते हैं लोगों की धारणा है कि नेत्रहीन लोग फ़ैशन में रुचि नहीं रखते. मुझे भी ऐसा ही भ्रम था लेकिन मैं ग़लत था. |
| DATE: 2014-04-16 |
| LABEL: science |
| [11] TITLE: घायल मादा को नर बंदर ने लगाया गले |
| CONTENT: अफ़्रीका के जंगलों में रहने वाले मार्मोसेट प्रजाति के एक बंदर को मृत्यु से जूझ रही अपनी मादा साथी को गले लगाते और देखभाल करते देखा गया. इस घटना के वीडियो में ब्राज़ील के जंगलों में दुर्घटनावश पेड़ से ज़मीन पर गिरी मादा साथी को नर बंदर ढांढस बंधा रहा था. बाद में मादा बंदर का निधन हो गया था. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह का व्यवहार चौंकाने वाला है इसके पहले इस तरह का व्यवहार केवल वनमानुष और इंसानों में देखा गया था. समूह में यह युगल सबसे ज़्यादा समय तक एक-दूसरे के साथ रहा था. वे तीन-साढ़े तीन साल तक एक-दूसरे के लिए समर्पित रहे. अध्ययनकर्ताओं के अनुसार इस प्रजाति के बंदर अपनी मादा साथी की मौत के एक महीने के भीतर नर समूह को छोड़ देते हैं और फिर कभी लौटकर नहीं आते. इस अद्भुत पारस्परिक व्यवहार को शोध जर्नल प्राइमैट में विस्तार से प्रकाशित किया गया है इसमें उनके व्यवहार के वीडियो रिकॉर्डिंग का ब्योरा साझा किया गया है. प्राइमैटोलॉजिस्ट ने इन दो बंदरों को मार्मोसेट समूह के पर्यवेक्षण के दौरान देखा. ये बंदर पूर्वोत्तर ब्राज़ील के अटलांटिक जंगलों के हिस्से में रहते थे. इस अध्ययन दल में शामिल यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिस्टल ब्रिटेन के डॉक्टर ब्रुना बेज़ेरा और फेडरल रूरल यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेरानांबुको के सहयोगी ब्राज़ील में पिछले कई सालों से इस समूह का अध्ययन कर रहे थे. इस समूह में चार वयस्क नर तीन वयस्क मादा तीन किशोर और दो शिशु बंदर शामिल थे. पेड़ से गिरने वाली मादा एफ़ 1-बी इस समूह के सबसे प्रभावशाली मादा थी जो पेड़ से गिरने के बाद ज़मीन पर किसी वस्तु से टकराने के बाद चोटिल हो गई थी. गंभीर रूप से घायल होने के बाद वह दर्द के कारण ज़मीन पर लेट गई थी. शोधकर्ताओं की रिपोर्ट के मुताबिक़ इस दौरान अध्ययन दल ने समूह के प्रभावशाली नर एम 1-बी का हैरान करने वाला व्यवहार देखा. करीब 45 मिनट बाद नर बंदर की नज़र मादा ज़मीन पर लेटी मादा बंदर पर पड़ी. यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिस्टल ब्रिटेन के डॉक्टर ब्रुना बेज़ेरा ने बीबीसी नेचर को बताया नर बंदर शीघ्रता से अपनी मादा साथी के पास पहुंच गया. उस समय वह नर बंदर पेड़ पर दो नन्हे शिशुओं की देखभाल कर रहा था वह उनको पीछे छोड़कर पेड़ से नीचे उतरा और मादा साथी को गले लगा लिया. डॉक्टर ब्रुना बेज़ेरा ने कहा नर बंदर मादा साथी के बगल बैठकर उससे बातचीत की कोशिश करता रहा ऐसा उसने अगले एक घंटे 48 मिनट तक किया. उसकी मृत्यु के बाद नर बंदर ने मादा साथी को गले लगाया और सूंघा. इस दौरान उसने समूह के अन्य बंदरों को दूर रखा जो मादा के पास आने की कोशिश कर रहे थे. |
| DATE: 2014-04-15 |
| LABEL: science |
| [12] TITLE: प्रयोगशाला में बने स्त्री जननांग का प्रत्यारोपण |
| CONTENT: अमरीका में डॉक्टरों ने प्रयोगशाला में स्त्री जननांगों को विकसित कर उसे चार महिलाओं में प्रत्यारोपित किया है. इन चारों महिलाओं के जननांग माँ के गर्भ में पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो पाए थे. यह एक तरह का शारीरिक विकार होता है जिसमें स्त्री जननांग का विकास जन्म से ही अधूरा रहता है. प्रत्येक महिला के लिए सही आकार का स्त्री जननांग विकसित करने के लिए अच्छी तरह से ऊतकों का मिलान करना ज़रूरी था. इसके लिए एक ऊतक के नमूने का इस्तेमाल किया गया. प्रत्यारोपण के बाद सभी महिलाओं में इच्छा कामोत्तेजना गीलापन संभोग सुख संतुष्टि और दर्द रहित संभोग के सामान्य लक्षण देखे गए. इस उपचार में शल्य चिकित्सा की मदद से तैयार किए गए कटोरे की तरह के छेद का इस्तेमाल किया जाता है जो तो आंत की त्वचा से बना था. उत्तरी केरोलिना के वेक फॉरेस्ट बैपटिस्ट मेडिकल सेंटर के डॉक्टरों ने इन चारों महिलाओं के स्त्री जननांग के निर्माण में उत्कृष्ट तकनीक का इस्तेमाल किया. ये चारों महिलाएँ किशोरावस्था की थी. चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत पेड़ू क्षेत्र का स्कैन किया गया और उसका इस्तेमाल प्रत्येक रोगी के लिए 3 डी परत वाली एक ट्यूब डिजाइन करने के लिए किया गया. एक छोटा सा ऊतक कम विकसित स्त्री जननांग से लिया गया और प्रयोगशाला में कोशिकाओं को बड़े पैमाने पर विकसित किया गया. मांसपेशियों की कोशिकाएँ बाहर की तरफ से परत के साथ और अंदर की तरफ से स्त्री जननांग की कोशिकाओं के साथ जुड़ी थीं. स्त्री जननांगों को एक बायोरिएक्टर में बड़े ही सावधानी से उस समय तक विकसित किया गया जब तक वे शल्य चिकित्सा के माध्यम से प्रत्यारोपित करने के लिए लायक नहीं हो गए. सभी महिलाओं में यौन क्रियाएँ अब समान्य है. स्त्री जननांग के विकास में अवरोध प्रजनन अंगों में अन्य असामान्यताएँ पैदा कर सकते हैं. इनमें से दो महिलाओं में स्त्री जननांग गर्भाशय से जुड़ा था. गर्भधारण का कोई मामला नहीं था लेकिन उन महिलाओं में यह सैद्धांतिक रूप से संभव है. वेक फॉरेस्ट बैपटिस्ट मेडिकल सेंटर में निदेशक डॉक्टर एंथोनी एटाला ने बीबीसी समाचार वेबसाइट को बताया वास्तव में हमने पहली बार पूरे अंग को बनाया है यह एक चुनौती थी. उन्होंने कहा कि एक क्रियाशील स्त्री जननांग इन महिलाओं के जीवन के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात है और इससे उनके जीवन में होने वाली तब्दीली देखना पुरस्कृत होने जैसा था. यह पहली दफा है जब प्रत्यारोपण के परिणाम की रिपोर्ट आई है हालांकि पहला प्रत्यारोपण आठ साल पहले हुआ था. |
| DATE: 2014-04-15 |
| LABEL: science |
| [13] TITLE: ट्विटर का सरताज बनने के आसान नुस्ख़े |
| CONTENT: ट्विटर ने इस सप्ताह जो बदलाव किए हैं उसके बाद ये जरूरी हो जाता है कि अगर आप अपने फॉलोअर्स की संख्या बढ़ाना चाहते हैं और उन्हें मोहित रखना चाहते हैं तो आपको इसके ज्यादातर विकल्पों का इस्तेमाल करना होगा. लंदन स्थित कंपनी पीयरइंडेक्स हर सप्ताह लाखों ट्वीट के आंकड़ों पर नज़र रखती हैं और अपने ग्राहकों को सलाह देती है कि लोग क्या पसंद कर रहे हैं और क्या नहीं. कंपनी के एक विशेषज्ञ निक टेलर बुनियादी बातों से शुरुआत करने की सलाह देते हैं. जैसे कि लिखने की शुरुआत करने से पहले अपनी प्रोफाइल पिक्चर के बारे में विचार करना. कोई ऐसी तस्वीर जो आपके बारे में कुछ खात बातें कहती हो. ट्विटर के नए लेआउट के जरिए आप फेसबुक की स्टाइल में बैनर फोटो लगा सकते हैं. इस तस्वीर का इस्तेमाल अपनी पसंद-नापसंद बताने के लिए किया जा सकता है. मिशन इंपासबल जैसी फिल्मों में काम कर चुके डेविड श्नाइडर आज-कल ब्रांडों और कारोबारियों की ट्विटर पर भागीदारी बढ़ाने के लिए अपने हास्य कौशल का इस्तेमाल कर रहे हैं. सलाहकार फर्म दैट लॉट के संस्थापक बताते हैं आपकी बेहतरीन ट्वीट में ये बातें होनी चाहिए. सूचना एक नज़रिया और हास्य. अगर इसमें ये तीनों बातें हैं तो उसे शेयर किया जाएगा. वो बताते हैं कि इसका लहजा ऐसा होना चाहिए कि जैसे किसी दोस्त से बातें की जा रही हों. ट्विटर का एक शिष्टाचार ये है कि आप भी दूसरों को फॉलों और रिट्वीट करें. लेकिन ये बाध्यकारी नहीं है. किसी बड़ी हस्ती के ट्वीट को हजारों लोग फॉलो करने हैं जबकि उस हस्ती को ऐसा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती. टेलर बताते हैं अगर आपको दूसरों के ट्वीट पसंद हैं तभी उन्हें फॉलो करना चाहिए. अगर आप 1000 फॉलोअर की सीमा को पार कर जाते हैं तो इसका मतलब है कि आप सही राह पर हैं लेकिन आपको फॉलोअर की संख्या को एक सीमा से अधिक महत्व नहीं देना चाहिए. ट्वीट का विश्लेषण करने वाले कोरिया एडवांस इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के डॉक्टर मीयांग चा कहते हैं हमने पाया है कि फॉलोअर्स की संख्या प्रभाव को नहीं दर्शाती है. वास्तव कई बार ये बुरा संकेत है. उन्होंने बताया हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि बड़ी संख्या में फॉलोअर्स उसी स्तर के संवाद को नहीं दर्शाते हैं. जैसे रिट्वीट या मेंशंस ये तो कुछ दूसरी ही ख़ासियत हैं जो आपके संदेश पर किसी को एक्शन लेने के लिए प्रेरित करती हैं. |
| DATE: 2014-04-13 |
| LABEL: science |
| [14] TITLE: जिसने इंटरनेट को बनाया सूचनाओं का भंडार |
| CONTENT: हार्ड डिस्क के डेटा स्टोरेज क्षमता बढ़ाने वाली तकनीक विकसित करने के लिए ब्रितानी वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर स्टुवर्ट पार्किन को मिलेनियम टेक्नॉलॉजी पुरस्कार दिया गया है. प्रोफ़ेसर स्टुवर्ट पार्किन ने एक ख़ास तरह का डेटा रीडर विकसित किया जो कमज़ोर और छोटे संकेतों को पकड़ने में भी सक्षम था. इसके चलते हर डिस्क प्लैटर में ज़्यादा सूचनाओं को इकट्ठा करना संभव हो सका. पुरस्कार देने वाली संस्था का कहना है कि इसके कारण फ़ेसबुक गूगल और एमेज़ॉन जैसी अन्य सेवाएं संभव हो सकी हैं. टेक्नॉलॉजी एकेडमी फिनलैंड का कहना है पार्किन स्पिनट्रोनॉमिक्स क्षेत्र के अग्रणी प्रवर्तक हैं जो इलेक्ट्रॉन की गति के कारण उत्पन्न होने वाले चुंबकीय क्षेत्र पर आधारित है. यह नैनोटेक्नॉलॉजी के सबसे सफल क्षेत्रों में से एक है. दस लाख यूरो के इस पुरस्कार के विजेताओं में वेब के आविष्कार टिम बर्नर ली और लाइनेक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के डेवलपर लाइनुस टोरवाल्डस का नाम भी शामिल है. इस पुरस्कार के लिए वैश्विक स्तर पर लोगों की ज़िंदगी को बेहतर बनाने की क्षमता रखने वाले आविष्कारों का चयन किया जाता है. प्रोफ़ेसर पार्किन भौतिक विज्ञान की एक शाखा स्पिन इलेक्ट्रॉनिक्स के विशेषज्ञ हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया स्पिन वॉल्व सेंसिंग डिवाइस के कारण छोटे चुंबकीय क्षेत्रों की पहचान संभव होती है और इसके कारण मैग्नेटिक डिस्क ड्राइव में छोटे चुंबकीय क्षेत्रों का निर्माण संभव होता है. सारी सूचनाएं इन्हीं चुंबकीय क्षेत्रों वाले पतले मैग्नेटिक फ़िल्म में जमा होती हैं. उन्होंने यह काम आईबीएम कंपनी के लिए किया और 1997 में तकनीक का व्यावसायिक उपयोग शुरू हुआ. यह जल्दी ही उद्योग का मानक बन गया इसके कारण डिस्क की सूचना भंडारण की क्षमता को हर साल कुछ सालों के लिए चार गुना तक बढ़ाना संभव हो गया. इसके कारण कंप्यूटर में ज़्यादा सूचनाएं जमा करने के साथ-साथ बड़े डेटा सेंटर स्थापित करना भी संभव हो सका. प्रोफ़ेसर पार्किन बताते हैं आधुनिक विश्व ख़ासतौर पर क्लॉउड के मैग्नेटिक डिस्क ड्राइव में हमारी सूचना इकट्ठा करने की क्षमता से संचालित होता है इससे आप गूगल सर्च कर पाते हैं मनोरंजन के लिए संगीत और फ़िल्में खोज पाते हैं. हालांकि पार्किन अपने काम की विशेषताओं को रेखांकित करते हैं लेकिन इसके विवादास्पद उपयोग की संभावना से इनकार नहीं करते. वह कहते हैं यह एक चिंता का विषय है कि जासूस इंटरनेट पर मौजूद आँकड़ों का दुरुपयोग कर सकते हैं. यह किसी अन्य वैज्ञानिक आविष्कार या विकास की तरह है जिसका उपयोग अच्छे और बुरे दोनों उद्देश्यों के लिए हो सकता है. लेकिन पार्किन के मुताबिक़ मेरी समझ से इससे होने वाले लाभ के सामने नुकसान काफ़ी सीमित हो जाता है. इसके कारण तमाम खोजें संभव हैं और आँकड़ों तक पहुंच के कारण लोगों को मिलने वाला ज्ञान की संभावना निश्चित रूप से किसी भी नकारात्मक प्रभाव से अधिक महत्वपूर्ण है. |
| DATE: 2014-04-13 |
| LABEL: science |
| [15] TITLE: गूगल ग्लास ख़रीदना हो तो..! |
| CONTENT: गूगल ग्लास खरीदने वालों को गूगल ने एक्सप्लोरर्स नाम दिया है. गूगल ने घोषणा की है कि उसका अत्याधुनिक चश्मा गूगल ग्लास 15 अप्रैल को महज एक दिन के लिए बाज़ार में उपलब्ध रहेगा. इसे केवल वही लोग ख़रीद सकेंगे जिनकी उम्र अट्ठारह साल या उससे अधिक होगी. ख़रीदारों को इसे पाने के लिए पहले एक ऑनलाइन फॉर्म भरना होगा जिससे उनकी पात्रता जांची जाएगी. गूगल ग्लास पहले आओ पहले पाओ के आधार पर मिलेगा. इसकी कीमत डेढ़ हज़ार अमरीकी डॉलर यानी लगभग 90 हज़ार रुपए रखी गई है. संभावना जताई जा रही है कि ब्रिटेन में यह चश्मा मई में उपलब्ध हो सकेगा. इसकी ऊँची क़ीमत की वजह से बहुत से लोग इससे क़तरा सकते हैं और उन्हें इसकी कीमत घटने तक का इंतज़ार करना पड़ सकता है. अपने एक कार्यक्रम के तहत गूगल ने 2013 में आठ हज़ार लोगों को इसे बेचा था. गूगल अब इसके परीक्षण के लिए इसे और लोगों को बेचने जा रहा है. ऐसी उम्मीद की जा रही है की कंपनी जल्द ही अब इसे आधिकारिक तौर पर बाज़ार में उतारने की तैयारी में है. एक अनुमान के मुताबिक़ ब्रिटेन के डेवलपर्स को मई या जून में इसे बनाने के अधिकार मिल जाएंगे. अमरीका के बाद ब्रिटेन गूगल ग्लास को बनाने वाला पहला देश होगा. गूगल ग्लास को बनाने वाले दल का कहना है हम इसे प्रयोग करने वालों से मिलने के लिए बहुत उत्सुक हैं. हम इसके बारे में उनके विचार जानने का इंतज़ार नहीं कर पा रहे हैं. स्टफ डॉट टीवी के उपसंपादक स्टीवन ग्रेव्स ने बीबीसी को बताया मुझे लगता है कि इसकी क़ीमत अधिक है लेकिन ज़रूरी नहीं की भविष्य में भी इसकी यही क़ीमत रहे. ट्रस्टेडरिव्यूज़ के संपादक इवान केप्रियस कहते हैं यह वैसा ही है जैसे शुरुआती दौर में मोबाइल आया था. 80 के दशक में यह बहुत ही कम लोगों के पास था वह बहुत बड़ा और महंगा था. तीस साल बाद अब इसे बहुत से लोग प्रयोग करते हैं और अब बाज़ार में उपलब्ध स्मार्टफोन एक कंप्यूटर की तरह ही काम कर सकते हैं. ये चश्मा न सिर्फ अपने पहनने वाले के नज़रिए से तस्वीरें खींचेगा बल्कि स्मार्टफोनकी तरह उन तस्वीरों और वीडियो पर कई तरह के तकनीकी काम भी किए जा सकेंगे. इतना ही नहीं इसका इस्तेमाल ईमेल भेजने और सोशल नेटवर्किंग के लिए भी किया जा सकता है. इसमें मौजूद वॉयस कमांड और रिकॉर्डिंग की सुविधा के ज़रिए इस उपकरण को नियंत्रित किया जा सकेगा. इस यंत्र में स्काइप वीडियो चैट के अलावा मौसम की जानकारी और नक्शों के ज़रिए रास्ता बताने की सुविधा भी होगी. ये सारी जानकारी एक साफ-सुथरे और पारदर्शी चौकोर से बने बॉक्स में हेडगियर के दाहिने हिस्से के उपरी भाग में दिखाई देगा. |
| DATE: 2014-04-13 |
| LABEL: science |
| [16] TITLE: विकीपीडिया के संपादन में महिलाएँ क्यों हैं पीछे |
| CONTENT: ऑनलाइन विश्वकोश विकीपीडिया का संपादन करने वालों में महिलाओं की भागीदारी मात्र नौ प्रतिशत है. शिक्षाविदों का कहना है कि इस संख्या को बढ़ाना ही ऑनलाइन विश्वकोश में सुधार की कुंजी है और इसके लिए अब एक अभियान शुरू किया गया है. स्मिथसोनियन अमेरिकन आर्ट म्यूज़ियम में आर्थिक मंदी के दौर की कलाकार नताली स्मिथ हेनरी के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध है. लेकिन कुछ समय पहले तक हेनरी का कोई अस्तित्व नहीं था कम से कम विकीपीडिया के मुताबिक़. इसके बाद एक अमरीकी विश्वविद्यालय की छात्रा चेल्सी टुफारोलो ने उनके बारे में एक लेख लिखने का निर्णय लिया. दुनिया के सबसे बड़े साझा ज्ञानस्रोत के रूप में विख्यात हो चुके विकीपीडिया पर टुफारोलो का यह पहला लेख था. विकीमीडिया फ़ाउंडेशन के एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ विकीपीडिया में योगदान करने वालों में 91 प्रतिशत पुरुष हैं. म्युज़ियम में मीडिया एवं टेक्नोलॉजी विभाग की उप प्रमुख सारा स्नाइडर का कहना है कि विकीपीडिया दुनिया के ज्ञान के एक बड़े हिस्से को समाहित करना चाहता है. लेकिन उनका कहना है कि इसे दुनिया भर का नहीं बल्कि आधी आबादी का ज्ञान कहना ज़्यादा सटीक होगा. अभी विकीपीडिया पर 44 लाख लेख हैं और दुनिया में सबसे ज्यादा देखी जाने वाली 10 वेबसाइटों में यह लगातार बनी रही है. हालांकि 2011 में हुए विकीमीडिया के एक अध्ययन में पता चला कि इसके औसत लेखक श्वेत पढ़े लिखे कम्प्यूटर ज्ञान से लैस पुरुष हैं जो या तो अमरीका में रहते हैं या यूरोप में. विकी एजुकेशन फाउंडेशन की बोर्ड सदस्य और ऑक्सीडेंटनल कॉलेज के फ़ेलो एड्रियान वेडविट्ज़ कहते हैं कि इस अंतर का मतलब है कि आधी आबादी के ज्ञान का एक बड़ा हिस्सा छूट जा रहा है. जब एड्रियान ने अपनी कक्षा में एक दिन विकीपीडिया के मुख्य पृष्ठ को दिखाया तो उन्होंने पाया कि महिलाओं को यहां या तो उपभोग की वस्तु या अपराध की शिकार के रूप में दिखाया जाता है. उन्होंने यह भी दिखाया कि वीकीपीडिया पर अश्वेत लोगों को अपराधी के रूप में दिखाया गया है. उदाहरण के लिए 1950 के दशक से लेकर अब तक पोर्नोग्राफ़िक अभिनेत्रियों की सूची चर्चित मूल अमरीकी महिलाओं के मुक़ाबले तीन गुनी लंबी थी. यहां तक महिला कवियों और खिलाड़ियों की कुल संख्या से भी यह सूची लंबी है. गलत और उथली सामग्रियों पर अंकुश लगाने के लिए विकीपीडिया ने कुछ मानक तय किए हैं. जैसे एक व्यक्ति तभी चर्चित है जब उसके बारे में ऐसे विश्वस्त स्रोतों में प्रकाशन या प्रसारण हुआ हो जो निष्पक्ष हैं. लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि ये दिशा-निर्देश महिला शख्सियतों को जगह बनाने में एक बाधा की तरह हैं क्योंकि ऐतिहासिक रूप से अपने पुरुष समकक्षों के मुक़ाबले महिलाओं को उतना प्रचार या पहचान नहीं मिली है. टुफारोलो ने जब हेनरी पर लेख लिखा तो कुछ मिनट में ही एक विकीपीडिया संपादक ने इसे मिटाने का सुझाव दे दिया क्योंकि स्मिथसोनियन में उसके कामों के प्रदर्शन के बावजूद उसे हेनरी महत्वपूर्ण नहीं दिखीं. टुफारोलो ने और संदर्भ इकट्ठा किए और सिद्ध किया कि हेनरी क्यों अलग पृष्ठ की हक़दार हैं लेकिन उनका कहना है कि यह अनुभव धमकाने और हतोत्साहित करने वाला था. विकीपीडिया रिवोल्यूशन के लेखक एंड्र्यू लिह का कहना है कि अधिक से अधिक महिलाओं की भागीदारी ही सूचना में पक्षपात और अभाव को ख़त्म कर सकती है ख़ासकर महिलाओं से संबंधित सामग्रियों के मामले में. विकीपीडिया में सालों से योगदान देने वाले लिह अमरीकी विश्वविद्यालय में विकीपीडिया के बारे में पढ़ाते हैं. उनके छात्र सप्ताह में एक बार म्यूज़ियम या सांस्कृतिक संस्थाओं का दौरा करते हैं और विकीपीडिया की सूचनाओं को सुधारते हैं. वो टुफारोलो का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यह एक बड़ा कारण है कि महिलाएं सम्पादन सहयोग नहीं करतीं. हालांकि विकीपीडिया पर विकीवूमन्स कोलाबोरेटिव और टीहाउस जैसे फोरम नए सहयोगियों की मदद करते हैं. स्नाइडर का मानना है कि विकीपीडिया में दिखने वाला लैंगिक भेदभाव असल में व्यापक संस्कृति का हिस्सा है. वो कहती हैं सार्वजनिक रूप से बातचीत में पुरुष ही हावी होते हैं. इसलिए महिलाओं को और प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है. महिलाओं के पास पुरुषों की अपेक्षा समय भी कम होता है. हाल ही में हुए एक अध्ययन में पता चला है कि अमरीकी महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा रोजाना एक घंटा ज़्यादा घरेलू काम करती हैं. कुछ लोगों का कहना है कि विज्ञान तकनीक इंजीनियरिंग और गणित में लैंगिक अंतर काफ़ी है और यह भी एक प्रमुख वजह है. लेकिन जिन क्षेत्रों में महिलाओं का प्रभुत्व है वो विकीपीडिया में इस अंतर को पाटने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं. उदाहरण के लिए पत्रकारिता में 67 प्रतिशत लाइब्रेरी और सूचना विज्ञान में 81 प्रतिशत और म्यूज़ियम अध्ययन में 86 प्रतिशत डिग्री महिलाओं को मिलती है. |
| DATE: 2014-04-12 |
| LABEL: science |
| [17] TITLE: बिजली के झटके ने बनाया पैरों को काम का |
| CONTENT: रीढ़ में बिजली के झटके के बाद सालों से लकवे के शिकार चार मरीज़ पहली बार अपने पैरों को चलाने में सक्षम हुए हैं. अमरीकी चिकित्सकों ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि ये मरीज़ अपने पंजों एड़ी और घुटने को घुमाने में समर्थ हो गए हालांकि वे अकेले चलने में फिर भी असमर्थ थे. ब्रेन नामक जर्नल में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बिजली के झटके ने मेरु रज्जु को मस्तिष्क से मिलने वाले संदेशों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाता है. विशेषज्ञ कहते हैं कि रीढ़ के चोट में यह इलाज का एक तरीक़ा हो सकता है. मेरु रज्जु एक हाई स्पीड रेल लाइन की तरह काम करती है जो इलेक्ट्रिक संदेशों को मस्तिष्क से शरीर के अन्य हिस्से में लाता और ले जाता है. लेकिन इस रास्ते में कोई भी बाधा पैदा होती है तो संदेश नहीं पहुंच पाता है. रीढ़ की चोट वाले लोगों में चोट से नीचे के हिस्से में हचलच और संवेदना ख़त्म हो जाती है. लुईसविले विश्वविद्यालय और कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय की एक टीम चोट के नीचे के हिस्से वाले मेरु रज्जु में विद्युत उद्दीपन से होने वाले इलाज पर शोध में संलग्न रही है. तीन वर्ष पहले टीम ने पाया कि रोब समर्स ट्रेडमिल के सहारे अपने पैरों को चला फिरा पाने में सक्षम हो गए थे. समर्स बेसबॉल खिलाड़ी थे और एक कार दुर्घटना होने के कारण छाती के नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया था. इसके अलावा दो साल से लकवाग्रस्त तीन अन्य मरीज़ों के साथ उसी प्रक्रिया को दोहराया गया तो उनके हिलने-डुलने में उसी तरह सुधार हुआ. वे अपने पैरों को कुछ खास भंगिमाओं में नियंत्रित करने में सक्षम हो गए लेकिन उनमें से एक मरीज़ गति के दबाव को नियंत्रित करने में सक्षम हो गया. इससे स्पष्ट होता है कि लकवे के बाद भी शरीर की हरकत को पुनः प्राप्त किया जा सकता है और समर्स का मामला कोई अपवाद नहीं है. लुईसविले विवि से जुड़ीं शोधार्थी डॉक्टर क्लाउडिया एंजेली ने कहा मांसपेशियों महत्वपूर्ण वृद्धि होती और उनकी गतिविधि में भी बदलाव दिखता है. अभी यह तय नहीं है कि यह उद्दीपन कैसे मदद करता है लेकिन शोधकर्ताओं को लगता है कि कुछ संदेश क्षति को भी पार करने में सक्षम होते हैं. हालांकि वे इतने मज़बूत नहीं होते कि गतिविधि को शुरू कर सकें. इन चार मरीज़ों में से आधे के पैरों में संवेदन था लेकिन वे इन्हें चला फिरा नहीं सकते थे. जबकि अन्य दो के पैरों में कोई संवेदन नहीं था. स्पाइनल रिसर्च संस्था के शोध निदेशक डॉक्टर मार्क बेकन का कहना है कि कुछ हद तक संवेदन रखने वाले लकवाग्रस्त मरीज़ों में विद्युत उद्दीपन से सुधार वाकई आश्चर्यजनक है. उन्होंने कहा कि यह दिखाता है कि इन मरीज़ों में कुछ ऐसी नसें रह जाती हैं जो चोट की जगह को भी पार कर जाती हैं. |
| DATE: 2014-04-12 |
| LABEL: science |
| [18] TITLE: फ़ेसबुक महिलाओं के आत्मविश्वास का दुश्मन? |
| CONTENT: फ़ेसबुक पर महिलाएं अपने यार-दोस्तों की तस्वीरें देखने में ज़्यादा समय बिताती हैं. शोधकर्ताओं ने ऐसी महिलाओं को ख़बरदार किया है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे अपने रंग-रूप और बॉडी इमेज के प्रति उनमें हीन भावना पनपती है. अध्ययन के मुताबिक़ जो महिलाएं सोशल मीडिया पर सेल्फ़ी तथा दूसरे क़िस्म की तस्वीरें ज़्यादा डालती हैं और देखती हैं वे दूसरों से ख़ुद की नकारात्मक तुलना करने लगती हैं. ब्रिटेन और अमरीका के विशेषज्ञों का कहना है कि दोस्तों की तस्वीरें कई बार मशहूर हस्तियों से ज़्यादा प्रभाव डालती हैं क्योंकि वे जानी-पहचानी होती हैं. सोशल मीडिया का बॉडी इमेज पर नकारात्मक असर पड़ सकता है इस बात का पता पहली बार इस अध्ययन से चला है. इससे पहले कोई नहीं जानता था कि सोशल मीडिया आपकी अपनी छवि के प्रति नकारात्मक भावनाएं पैदा करता है. नवयुवतियां सोशल मीडिया पर पुरुषों की तुलना में सबसे ज़्यादा समय बिताती हैं. वे इंटरनेट पर अपनी तरह-तरह की तस्वीरें शेयर करती रहती हैं. बॉडी इमेज पर पड़ने वाले असर के बारे में पता लगाने के लिए ओहियो यूनिवर्सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ आईवा और स्ट्रैथक्लिडे यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कॉलेज में पढ़ने वाली 881 छात्राओं को अपने शोध में शामिल किया. इन छात्राओं से फ़ेसबुक के इस्तेमाल खान-पान कसरत और बॉडी इमेज के बारे में सवाल किए गए. सिएटल की एक कांफ्रेंस में प्रस्तुत किए गए शोधपत्र में फ़ेसबुक और खाने-पीने की अनियमितता के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया. हां इस शोधपत्र में इस बात का उल्लेख ज़रूर था कि सोशल नेटवर्क पर बिताए गए समय और बॉडी इमेज के बीच नकारात्मक संबंध होता है. शोध में पाया गया कि जो महिलाएं फ़ेसबुक पर ज़्यादा समय बिताती हैं वे अपने दोस्तों के फिगर लुक और बॉडी इमेज से अपनी ज़्यादा तुलना करने लगती हैं और फिर अपने रंग-रूप के बारे में नकारात्मक सोच मन में बिठा लेती हैं. ग्लासगो में स्ट्रैथक्लिडे यूनिवर्सिटी की पेत्या इक्लर ने बीबीसी को बताया फ़ेसबुक पर ज़्यादा समय बिताने का संबंध खाने-पीने से जुड़ी अनियमितताओं से नहीं बल्कि खराब बॉडी इमेज से ज़रूर है. उन्होंने आगे कहा सोशल मीडिया पर पर्सनेलिटी और फिगर से जुड़ा प्रभाव परंपरागत मीडिया की तुलना में अधिक ख़तरनाक होता है. ऐसा इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया पर हमसे वैसे लोग जुड़े होते हैं जिन्हें हम जानते हैं. पेत्या इक्लर ने कहा सोशल मीडिया पर मौजूद परिचितों से ख़ुद की तुलना अधिक प्रासंगिक हो उठती है और ज़्यादा चोट करती है. खाने-पीने से जुड़ी गड़बड़ियों के बारे में काम करने वाली चैरिटी संस्था बीट के प्रवक्ता कहती हैं कि बॉडी इमेज हमारी पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है. वह कहती हैं कि वज़न और फिगर की चिंता आजकल आम बात है. दुनिया भर की महिलाओं में आमतौर पर ये चिंता देखी जा सकती है. उन्होंने कहा जब शरीर बढ़ रहा होता है और उसमें बदलाव आ रहे होते हैं तो उसी दौरान हम अपनी पहचान स्थापित करने की कोशिश में लगे होते हैं. ऐसे में किसी मशहूर हस्ती उसके शरीर कपड़े और रंगरूप के प्रति आकर्षण से हमारे ऊपर दबाव बढ़ जाता है. प्रवक्ता ने कहा ऐसे में जब युवा जब अपने लुक और बॉडी इमेज की तुलना उनसे करते हैं तो उन्हें सदमा पहुंचता है. |
| DATE: 2014-04-12 |
| LABEL: science |
| [19] TITLE: प्रॉस्टेट कैंसर परीक्षण बीमारी की गंभीरता को कम आँकता है |
| CONTENT: प्रॉस्टेट ग्रंथि कैंसर टेस्ट जो यह बताता है कि एक ट्यूमर कितना गंभीर है. इसके बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि आधे से अधिक मामलों में यह परीक्षण बीमारी की गंभीरता को वास्तविकता से कम आँकता है. 847 व्यक्तियों पर एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि प्रॉस्टेट ग्रंथि कैंसर परीक्षण के बाद 415 में से जिन 209 लोगों को बताया गया था कि उनका कैंसर धीरे-धीरे बढ़ रहा था उनकी बीमारी काफ़ी आक्रामक तरीक़े से बढ़ी. कुल 415 लोगों में से क़रीब एक तिहाई व्यक्तियों में यह बीमारी लगभग पूरे शरीर में फैल गई. इसलिए वैज्ञानिक कैंसर की प्रकृति निर्धारित करने के लिए बेहतर परीक्षण की ज़रूरत महसूस कर रहे हैं. यह ब्रिटेन के पुरुषों को होने वाला सबसे सामान्य कैंसर है. वहाँ हर साल प्रॉस्टेट ग्रंथि कैंसर के 41700 नए मामले सामने आते हैं और हर साल क़रीब 10800 लोगों की मौत हो जाती है. प्रॉस्टेट मूत्राशय और शिश्न के बीच स्थित एक ग्रंथि है जो मलाशय के ठीक सामने होती है. इस अध्ययन के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने 2007 और 2011 के बीच ऑपरेशन के पहले और बाद में कैंसर की स्थिति का मूल्यांकन किया गया. इस शोध के लेखक और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में यूरोलॉजिकल सर्जन ग्रेग शॉ कहते हैं कि उन व्यक्तियों की संख्या चौंकाने वाली थी जिनका पहली बार सही ढंग से परीक्षण नहीं किया गया. उन्होंने कहा कि यह शोध ब्रिटेन के पुरुषों के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण है क्योंकि बाहरी देशों में होने वाले प्रॉस्टेट कैंसर से हमेशा इसकी तुलना नहीं हो सकती. शुरुआती अवस्था वाले कैंसर की स्थिति में व्यक्ति को ऑपरेशन प्रॉस्टेट ग्रंथि हटानेया सक्रिय निरीक्षण का विकल्प दिया जाता है जहाँ डॉक्टर रोज़ाना ख़ून की जाँच और परीक्षण करते हैं. शॉ कहते हैं कि अगर एक व्यक्ति सक्रिय परीक्षण का विकल्प चुनता है तो उनमें से 30 फ़ीसदी लोगों को आवश्यक रूप से पाँच साल बाद कीमोथेरेपी जैसा विक्लप अपनाना होगा. उन्होंने कहा यह दिखाता है कि यहाँ सुधार की संभावना है. लेकिन उन्होंने कहा कि इस अध्ययन पक्षपात पूर्ण होने की संभावना है क्योंकि कुछ लोगों को कैंसर की स्थिति गंभीर होने का संकेत दिया गया होगा जिसके कारण उन्होंने ऑपरेशन जैसा विकल्प अपनाया होगा. वह कहते हैं कि इसलिए इस अध्ययन को निश्चित तौर पर उन लोगों का प्रतिनिधि अध्ययन नहीं माना जा सकता है जिन्होंने सक्रिय परीक्षण का विकल्प चुना था. शॉ कहते हैं कि बायोप्सी के एक नमूने की जाँच को कैंसर परीक्षण का हिस्सा बनाया जाना चाहिए जो आमतौर होने वाले बायोप्सी से अधिक टिशू सैंपल्स पर ध्यान देता है. बायोप्सी में शरीर से बाहर निकाले गए ऊतकों की जाँच बीमारी की गंभीरता के परीक्षण के लिए किया जाता है. ज़्यादा सैंपल्स का चयन कैंसर की साफ़-साफ़ स्थिति की जानकारी दे सकता है. उन्होंने कहा कि इसके लिए एमआरआई स्कैन को भी बेहतर बनाना चाहिए. प्रॉस्टेट कैंसर यूके के शोध निदेशक डॉक्टर इएन फ़्रेमे कहते हैं प्रॉस्टेट कैंसर की सटीक जाँच इस बीमारी के क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती है. वह बताते हैं अध्ययन के नतीजे इस बात को प्रमुखता से सामने लाते हैं कि वर्तमान के परीक्षण किसी व्यक्ति में कैंसर की पूरी तस्वीर सामने नहीं लाते इसके कारण डॉक्टर और व्यक्तियों को तथ्यों के बिना कठिन फ़ैसला करने की स्थिति में छोड़ देते हैं. वह कहते हैं कि जबतक परीक्षणों में सुधार होता है यह बेहद महत्वपूर्ण है कि लोग अपने डॉक्टरों से कैंसर उपचार के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं की जानकारी हासिल करें. |
| DATE: 2014-04-11 |
| LABEL: science |
| [20] TITLE: 'हार्टब्लीड बग' से सावधान, सभी पासवर्ड बदलें! |
| CONTENT: सॉफ्टवेयर सुरक्षा से जुड़ी एक बड़ी गड़बड़ी सामने आने के बाद कुछ तकनीकी कंपनियों ने लोगों से अपने सभी पासवर्ड बदलने की गुजारिश की है. याहू ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म टंबलर ने लोगों को सलाह दी है कि वे अपने सभी ई-मेल फाईल स्टोरेज और बैंकिंग से जुड़े पासवर्ड बदल दें. सुरक्षा सलाहकारों ने हार्टब्लीड नामक एक सॉफ्टवेयर बग की चेतावनी देते हुए यह आशंका जताई है कि इससे सुरक्षित सूचनाएं दूसरों तक पहुंच सकती हैं. ओपन एसएसएस सिक्योर सॉकेट लेयर डेटा की सुरक्षा से जुड़ा एक ऐसा सिस्टम है जो लाइब्रेरी की तरह काम करता है. यह सिस्टम यूज़र्स के कंप्यूटर और अन्य सेवाओं के बीच संवेदनशील जानकारियों का गुप्त संचार करता है. इसका फ़ायदा यह होता है कि इसको केवल यूज़र्स और इच्छित प्राप्तकर्ता ही समझ सकते हैं. अगर कोई संस्था ओपन एसएसएल का इस्तेमाल करती है तो यूज़र्स को अपने वेब ब्राउज़र पर एक ताले का चिह्न दिखाई देता है. फिनलैंड की सुरक्षा कंपनी गूगल सिक्योरिटी और कोडेनोमिकन ने सोमवार को इस बात का खुलासा किया है कि सॉफ्टवेयर में दो साल से ज़्यादा वक़्त से एक कमी मौजूद थी जिसका इस्तेमाल गुप्त की कुंजी का पता लगाने में किया जा सकता था. इसे हार्टब्लीड बग पुकारा जा रहा है. हार्टब्लीड बग का सामना सेवाएं देने वाली उन कंपनियों को करना पड़ रहा है जिन्होंने अपने यहां ओपन एसएसएल लगा रखा है. गूगल सिक्योरिटी और कोडेनोमिकन का कहना है कि यदि प्रतिद्वंद्वी इन की की कॉपियां बना लेता है तो इससे उस सर्विस यूज़र्स के नाम और पासवर्ड का पता लगाया जा सकता है. यही नहीं इससे यूज़र्स की जानकारियां भी चुराई जा सकती हैं. इस बग का नाम हार्टब्लीड इसलिए रखा गया है क्योंकि इससे सर्वर और उनके ग्राहकों के बीच मेमोरी कंटेंट में रिसाव आ जाता है. बीबीसी की जानकारी के मुताबिक़ गूगल ने इस बग की जानकारी सार्वजनिक करने से पहले कुछ चुने हुए संस्थानों को चेतावनी जारी कर दी थी ताकि वे ओपन एसएसएल का नया वर्ज़न अपडेट कर सकें. साइबर सुरक्षा से जुड़ी कंपनी एनसीसी ग्रुप ने स्थिति गंभीर बताते हुए अपने कई सदस्यों को पासवर्ड बदलने की सलाह दी है. एनसीसी ग्रुप के एसोसिएट डायरेक्टर ओल्ली व्हाइटहाउस ने बीबीसी को बताया जब तक सर्विस प्रोवाइडर अपना सॉफ्टवेयर बदल नहीं लेते अपना पासवर्ड बदलना एक विवेकपूर्ण कदम होगा. कैंब्रिज कंप्यूटर लेबोरेटरी यूनिवर्सिटी के एक शोधकर्ता का कहना है कि यह कहना अतिरेक होगा कि लोग अपने सभी पासवर्ड बदलने के लिए सारे काम स्थगित कर दें. डॉक्टर स्टीवन मर्डोक का कहना है पासवर्ड बदलना बहुत आसान है. हां ऐसा करने के लिए हड़बड़ी मचाने की जरूरत नहीं जब तक कि आपका सर्विस प्रोवाइडर आपको चेतावनी नहीं देता. |
| DATE: 2014-04-10 |
| LABEL: science |
| [21] TITLE: स्टीरॉयड लेने वालों की तादाद छह गुना बढ़ी |
| CONTENT: हाल के दिनों में इंग्लैंड में स्टीरॉयड दवा लेने वालों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई है. धर्मार्थ संस्था सीआरआई इंग्लैंड में 21 सीरिंज एक्सचेंज केंद्र चलाती है. संस्था ने पाया कि 2010 में 290 लोग स्टीरॉयड का इस्तेमाल करते थे जबकि 2013 तक आते आते ऐसे लोगों की संख्या 2161 तक पहुंच गई. यानी स्टीरॉयड लेने वालों की संख्या में 645 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई. इसे देखते हुए स्वास्थ्य निगरानी संस्था एनआईसीई ने इंग्लैंड में सीरिंज एक्सचेंज के लिए नए दिशा निर्देश बनाए हैं. इसमें कहा गया है कि स्टीरॉयड लेने वालों को कवर करने के लिए निडिल एंड सीरिंज प्रोग्राम को व्यायामशालाओं तक कोअपनी जद में लेना चाहिए. छह फुट दो इंच लंबे 64 इंच की छाती वाले डेव क्रासलैंड जिम में कड़ा अभ्यास करते हैं रोजाना करीब 10000 कैलोरी भोजन में लेते हैं और साथ में स्टीरॉयड भी लेते हैं. उनका मानना है कि यदि वो स्टीरॉयड न लें तो उनका वजन कम ही होता. हालांकि वो स्वीकार करते हैं कि यह आपको कड़े और लंबे अभ्यास में मदद करता है और मांसपेशियों को बढ़ाता है लेकिन इसके दुष्प्रभावों में बाल झड़ने से लेकर हृदयाघात और नपुंसकता तक का ख़तरा बना रहता है. डेव कहते हैं स्टीरॉयड लेना ऐसा चलन बन गया है कि 17 से 24 वर्ष के युवा बिना जाने कि इसका क्या असर होगा धड़ल्ले से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं. एनआईसीई से जुड़े प्रोफेसर माइक केली कहते हैं स्टीरॉयड लेने वाले खुद को बहुत स्वस्थ समझते हैं. वे खुद को इसके नशेड़ी के रूप में नहीं देखते. इसलिए हमें ऐसे रास्ते तलाशने की ज़रूरत है जिससे उन्हें सही राह दिखाई जा सके. |
| DATE: 2014-04-10 |
| LABEL: science |
| [22] TITLE: आधे मिनट में फ़ोन होगा फुल चार्ज! |
| CONTENT: इसराइल की एक कंपनी ने 30 सेकेंड से भी कम समय में चार्ज होने वाली मोबाइल बैटरी विकसित करने का दावा किया गया है. इस बैटरी को तेल अवीव में आयोजित एक तकनीक सम्मेलन में प्रदर्शित किया गया. माइक्रोसॉफ्ट के थिंक नेक्सट सम्मेलन में इसराइल की कंपनी स्टार्ट-अप स्टोर डॉट ने जैविक संरचना से बनी इस बैटरी को पेश किया. प्रदर्शन के दौरान इस बैटरी ने एक सैमसंग एस4 स्मार्टफ़ोन की पूरी तरह से ठप पड़ी एक बैटरी को 26 सेकेंड में पूरी तरह से चार्ज कर दिया. बैटरी को फिलहाल एक प्रायोगिक तौर पर पेश किया गया है और संभावना है कि यह तीन साल में व्यावसायिक रूप से उपयोग लायक बन जाएगा. प्रदर्शन के लिए रखी गई बैटरी एक सिगरेट के पैकेट के आकार के पैक में एक स्मार्टफ़ोन से जुड़ी थी. स्टोर डॉट के संस्थापक डॉक्टर डॉर्न मेयर्सडॉर्फ ने बीबीसी को बताया हम एक वर्ष के भीतर स्मार्टफ़ोन में इस्तेमाल होने लायक बैटरी तैयार कर लेंगे और तीन साल में व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल होने वाली बैटरी तैयार हो सकती है. तेल अवीव विश्वविद्यालय में दस साल पहले अल्ज़ाइमर रोग से संबंधित शोध के दौरान पहली बार ऐसे नैनो क्रिस्टलों का पता चला था जो ख़ुद ही आपस में जुड़ने में सक्षम थे. इस बैटरी में इन्हीं नैनों क्रिस्टलों का पता चला था. स्टोर डॉट ने इन नैनो डॉट्स का उल्लेख स्थिर मजबूत गोलों के रूप में किया है जिसका व्यास 2-1 नैनोमीटर है और यह पेप्टाइड अणुओं से बना हैं. डॉक्टर मेयर्सडॉर्फ ने कहा कि इस तकनीक के कई तरह के उपयोग हैं. |
| DATE: 2014-04-09 |
| LABEL: science |
| [23] TITLE: शनि के चांद पर पानी होने की संभावना |
| CONTENT: सौरमंडल के दूसरे सबसे बड़े ग्रह शनि के एक चंद्रमा इन्सेलादस की सतह के नीचे पानी का सागर होने के पर्याप्त सबूत मिले है. इस नए खोज ने ब्रह्मांड में पृथ्वी के बाहर जीवन होने की संभावना को बढ़ा दिया है. जब से अंतरिक्ष में जेट विमानों ने इसके दक्षिणी ध्रुव से बर्फीली चीज़ों को टूट कर गिरते देखा है तब से वैज्ञानिक उत्साहित है. नासा के अंतरिक्ष यान कासिनी की मदद से शोधकर्ता पानी के अत्यंत सूक्षम गुरुत्वाकर्षण संकेत का भी पता लगाएंगें. साइंस पत्रिका ने इसकी विस्तृत रिपोर्ट छापी है. प्रोफ़ेसर लुसियानो लेस ने बीबीसी न्यूज़ से कहा हमने जो मापा है उसके हिसाब से यह उत्तरी अमेरिका के सुपीरियर झील के आकार के एक बड़े जलाशय के अस्तित्व में होने की संभावना है. यह इटली के गार्डा झील से 245 गुना बड़ा हो सकता है. प्रोफ़ेसर लेस और उनकी टीम के निष्कर्षों के मुताबिक़ 500 किमी चौड़ा यह चंद्रमा सूक्षमजीवों के जीवन के अस्तित्व के लिहाज़ से पृथ्वी के बाद सबसे उपयुक्त जगह होगी. कासिनी से मिले आकड़ों के मुताबिक़ इन्सेलादस के बर्फ़ीले सतह के 40 किमी नीचे तरल पदार्थ है. कासिनी ने सबसे पहले 2005 में इस चंद्रमा पर फैले हुए वातावरण का पता लगाया था तब से वहाँ पानी के सागर होने की संभावना को बल मिला है. कासिनी जब पहली बार शनि ग्रह में पहुँचा था तो वहां पर अंधेरा था. उस वक्त शनि में सर्दी का मौसम चल रहा था. इसके वातावरण में खनिज और जल वाष्प होने के संकेत मिले है. कासिनी लवण और कार्बन युक्त जैविक अणुओं का पता भी लगा रहा है. इन्सेलादस के चारों ओर की कक्षा विकेन्द्रीत है. यह गोलाकार नहीं है. इसलिए इस विशाल ग्रह के द्वारा इन्सेलादस के बर्फ को गर्म कर के और पिघला के गुरुत्वाकर्षण को कम और ज़्यादा करने की संभावना रहती है. सौर मंडल में कई कैसे चंद्रमाएँ है जिस पर जीवन होने की मजबूत संभावनाएँ है. शनि का सबसे बड़ा उपग्रह टाइटन बृहस्पति के चन्द्रमाओं यूरोपा गेनीमेड और कैलिस्टो और नेपच्यून के ट्राइटन इस श्रेणी में आते हैं. चट्टान में पानी की मौजूदगी होने की वज़ह से इनमें से इन्सेलादस और यूरोपा पर जीवन होने की अधिक संभावना है. क्योंकि इससे रसायनिक प्रक्रियाओं की संभावना बढ़ जाती है जो जीवन उत्पन्न होने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार करती है. |
| DATE: 2014-04-09 |
| LABEL: science |
| [24] TITLE: विंडोज़ एक्सपीः साइबर हमलों से कैसे बचेगा आपका कंप्यूटर |
| CONTENT: माइक्रोसॉफ्ट कंपनी मंगलवार से विंडोज़ एक्सपी ऑपरेटिंग सिस्टम से अपना सपोर्ट हटाने जा रही है. इसका मतलब है कि इस ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए यूज़र्स को माइक्रोसॉफ्ट की तरफ से अब सुरक्षा और बग से बचने के लिए आधिकारिक अपडेट नहीं मिलेगा. कुछ सरकारों ने सपोर्ट को बनाए रखने के लिए कंपनी के साथ अनुबंध को बढ़ाया है ताकि इस ऑपरेटिंग सिस्टम को इस्तेमाल करने वाले यूज़र्स को सुरक्षा प्रदान की जा सके. सिक्योरिटी कंपनियों का कहना है कि जो भी व्यक्ति इस 13 वर्ष पुराने सॉफ्टवेयर को इस्तेमाल कर रहा है उसके डेवाइस पर वायरस हमले और ऑनलाइन धोखाधड़ी करने वालों का ख़तरा बढ़ जाएगा. आंकड़े बताते हैं कि 20 से 25 प्रतिशत यूज़र्स विंडोज़ एक्सपी का इस्तेमाल करते हैं. हालांकि साल 2001 में विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम लांच होने के बाद इसके तीन बड़े संस्करण पेश किए जा चुके हैं. ब्रितानी सरकार ने सपोर्ट को बनाए रखने के लिए कंपनी के साथ क़रीब 55 लाख पौंड का क़रार किया है. इसी तरह पुर्तगाल सरकार ने एक्सपी आधारित 40000 कम्प्यूटरों पर काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों की मदद के लिए करोड़ों यूरो के क़रार पर दस्तख़त किए. एक सिक्योरिटी फ़र्म कैस्पर्स्की से जुड़े वरिष्ठ विश्लेषणकर्ता डेव एम का कहना है कि जो व्यक्ति विंडोज़ एक्सपी पर काम कर रहा है वो पहले से ही मालवेयर के ख़तरे का सामना कर रहा था. अधिकांश लोग एक्सपी से अभी भी जुड़े हुए हैं और विंडोज़ के नए संस्करणों को नज़रअंदाज़ कर दिया है. डेव के अनुसार हमारे आंकड़े बताते हैं कि हमारे कुल उपभोक्ताओं में 20 प्रतिशत के क़रीब विंडोज़ एक्सपी का इस्तेमाल करते हैं लेकिन वायरस हमले के एक चौथाई विंडोज़ एक्सपी से संबंधित हैं. उन्होंने कहा कि विंडोज़ एक्सपी का अंतिम सिक्योरिटी अपडेट जारी होने के बाद आठ अप्रैल से साइबर हमलों का यह आंकड़ा और भयावह होने वाला है. यह अपडेट उन बग समस्याओं को ठीक करेगा जिन्हें पिछले मार्च में ही पहचाना गया था और जिन्हें बेहद ख़तरनाक माना गया है. डेव कहते हैं आठ अप्रैल के बाद साइबर ख़तरे के लिए कोई भी सिक्योरिटी अपडेट नहीं होगा. सिक्योरिटी सॉफ़्टवेयर की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने वाले समूह एवी-टेस्ट से जुड़े माइक मार्गेंस्टर्न और एंड्रियाजड मार्क्स ने कहा कि साइबर हमले के शिकार होने के मामले में विंडोज़ एक्सपी यूज़र्स शीर्ष पर हैं. उन्होंने कहा मालवेयर बनाने वाले सबसे आसान शिकारों को निशाना बनाते हैं क्योंकि नए विंडोज़ 8-1 संस्करण के मुक़ाबले पुराने संस्करण विंडोज़ एक्सपी ऑपरेटिंग सिस्टम को संक्रमित करना ज़्यादा आसान है. मार्गेंस्टर्न और मार्क्स ने कहा हम समझते हैं कि अगले कुछ महीनों में ही हम विंडोज़ एक्सपी के कम्प्यूटरों पर भारी संख्या में हमले देखेंगे लेकिन साइबर हमलावर विंडोज़ के अन्य संस्करणों का दोहन करने के लिए उन्हें भी निशाना बनाएंगे. दुनिया भर में अधिकांश एटीएम विंडोज़ एक्सपी ऑपरेटिंग सिस्टम पर ही आधारित हैं. साइबर सुरक्षा फ़र्म सिमैंटेक के वरिष्ठ प्रबंधक ओरल कॉक्स ने कहा कि आपराधिक समूहों द्वारा एक्सपी की साइबर हमलों के प्रति उन अतिसंवेदनशील ख़ामियों को इकट्ठा किए जाने की संभावना है जिनके बारे में वे अच्छी तरह जानते हैं. बजाए इसके कि वे मालवेयर के सहारे इसका इस्तेमाल करें जिसे लाखों लोग स्पैम में डाल देते हैं. कॉक्स के अनुसार इन समूहों द्वारा कॉरपोरेट ख़ुफ़ियागीरी और बड़े लक्ष्यों को निशाना बनाए जाने की संभावना है. उन्होंने कहा उन संस्थाओं को ख़ास ध्यान रखने की ज़रूरत होगी जिनके सामने एक्सपी संस्करण से हटने में काफ़ी दिक्कतें हैं. उन्होंने कहा कि किसी कॉरपोरेट लक्ष्य पर साइबर हमले के दोहराए जाने की संभावना ज़्यादा है. कॉक्स के अनुसार एक बार साइबर हमला ऑनलाइन हो जाता है तो यह मालवेयर किट में चला जाता है और फिर यहां से व्यापक पैमाने पर वितरित होता रहता है. अब इसके ख़िलाफ़ कोई सुरक्षा नहीं उपलब्ध होगी. आंकड़ों का प्रबंधन करने वाली फ़र्म एक्सवे के प्रवक्ता मार्क ओ नील के अनुसार एक्सपी जैसे जटिल प्रोग्राम के अलावा बहुत सारे ऐसे सॉफ्टवेयर हैं जो पहले से ही सिक्योरिटी सपोर्ट से बाहर हो चुके हैं क्योंकि इनको बनाने वाली कंपनियां या तो बंद हो गईं या उनका अधिग्रहण हो गया. इसके अलावा कई अन्य सॉफ़्टवेयर पुराने प्रोग्रामिंग लैंग्वेज में बनाए गए जिससे उनका रखरखाव और अपडेट बेहद ख़र्चीला है. नतीजन ज़्यादातर आईटी डिपार्टमेंट इस तरह के पुराने होते सॉफ़्टवेयर प्रोग्रामों को संवेदनशील मानते हैं और यदि सुरक्षा की ज़रूरत पड़ती है तो वे उसके बाहरी कोड को अपडेट करते हैं. ओ नील के अनुसार आप पुराने अप्लीकेशन का बाहरी घेरा बना सकते हैं और यह आपको सुरक्षा मुहैया कराता है. उनका कहना है इस तरह के ख़तरों के लिए कोई सुरक्षा अपडेट नहीं होने की स्थिति में भी कंपनियां बिल्कुल निरीह नहीं बन गई हैं. |
| DATE: 2014-04-08 |
| LABEL: science |
| [25] TITLE: ब्रिटेन: घर पर हो सकेगी एचआईवी जांच |
| CONTENT: पहली बार ब्रिटेन में क़ानून में बदलाव कर लोगों को घर पर एचआईवी की जांच ख़ुद करने की अनुमति दी गई है. जांच की किट बाज़ार से बग़ैर डॉक्टर की पर्ची के ख़रीदी जा सकती है हालांकि ब्रिटेन में अभी तक ऐसी कोई किट मौजूद नहीं हैं. क़ानून में परिवर्तन का मतलब है कि लोग अगर घर पर परीक्षण करें तो अब ये क़ानूनी होगा. पहले लोग इंटरनेट पर ऑर्डर देकर घर पर टेस्ट किट बुलाते थे सैंपल भेजने के बाद उन्हें टेस्ट के नतीजे फ़ोन पर बताए जाते थे. उम्मीद की जा रही है कि इस क़दम से ब्रिटेन के 25000 एचआईवी पॉजिटिव लोगों की मदद हो पाएगी जिनकी अब तक जांच नहीं हो पाई है. ब्रिटेन सरकार के स्वास्थ्य विभाग की प्रवक्ता ने कहा एचआईवी से जुड़े कलंक की वजह से लोग क्लिनिक में टेस्ट करवाने से कतराते हैं. हालांकि अभी यूरोपीय मानकों की कोई किट ब्रिटेन में उपलब्ध नहीं है लेकिन उम्मीद है कि हालात अगले साल तक बदलेंगे. एचआईवी के घर बैठे परीक्षण को पिछले साल सितंबर में ही सरकार ने मंज़ूरी दे दी थी लेकिन यह क़ानून रविवार से ही प्रभाव में आया है. जांच किट के उत्पाद में ब्रिटेन यूरोप में सबसे आगे है लेकिन इसकी शुरुआत 2012 में अमरीका में हुई थी. यह परीक्षण उंगली से ख़ून की एक छोटी सी बूंद निकाल कर और लार के नमूने से किया जा सकता है. टेरेंस हिगिंस ट्रस्ट में चिकित्सा निदेशक डॉक्टर माइकल ब्रैडी ने कहा यह शर्मनाक है कि यह क़ानून ऐसे वक़्त अमल में आया है जब कोई व्यावहारिक परीक्षण उपलब्ध नहीं है. 915 उपयोगकर्ताओं पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 97 लोगों ने इसे दोबारा इस्तेमाल करने की बात कही है. एक सप्ताह में परीक्षण के लिए 3000 ऑर्डर मिले हैं. डॉक्टर ब्रैडी ने कहा कि घर बैठे परीक्षण के प्रति ऐसी राय ब्रिटेन में चैरिटी की एचआईवी संबंधी रोकथाम मुहिम में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनने का संकेत है. |
| DATE: 2014-04-06 |
| LABEL: science |
| [26] TITLE: गंदे दांतों से भी बढ़ता है कैंसर का ख़तरा! |
| CONTENT: समय-समय पर दांत की जांच न कराए जाने से मुंह और गले के कैंसर का ख़तरा बढ़ जाता है एक अध्ययन में ये पता चला है. इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने पाया है कि माउथवॉश का अत्यधिक इस्तेमाल - एक दिन में तीन बार से ज़्यादा - भी कैंसर के ख़तरे को बढ़ा देता है. मुंह और गले के कैंसर के लिए धूम्रपान ज़्यादा शराब पीना और ग़रीबी को मुख्य कारण मानना एक स्थापित धारणा है. यूरोप के नौ देशों में 1962 कैंसर रोगियों पर ये अध्ययन किया गया था. इस अध्ययन को जर्मनी के ब्रेमेन में लीबनीज़ इंस्टीट्यूट फॉर प्रिवेंशन रिसर्च एंड एपिडेमोलॉजी विभाग बिप्स ने किया और इसमें ग्लासगो विश्वविद्यालय के डेंटल स्कूल के शोधकर्ता भी शामिल थे. बिप्स के उप निदेशक प्रोफ़ेसर वॉल्फगैंग ऐरेन ने इस अध्ययन के नतीजों को बहुत ही महत्वपूर्ण बताया है. उन्होंने कहा अभी तक यह पता नहीं था कि दांतों की बिगड़ी सेहत के ये कारक मुंह और गले के कैंसर के ज्ञात कारणों- धूम्रपान शराब पीने और ग़रीबी- से अलग हैं. उन्होंने कहा कि अध्ययन के नतीजे बहुत ही सूक्ष्म हैं और कई अन्य कारकों से जुड़े हुए हैं. मुंह की ख़राब सेहत का संबंध उन सभी लोगों से है जिनके पूरे या कम दांत हैं या जिनके मसूड़ों से रक्तस्राव होता है. ग्लासगो विश्वविद्यालय के डेंटल स्कूल के वरिष्ठ लेक्चरर डॉक्टर डेविड कानवे कहते हैं लोगों को यह नहीं मान लेना चाहिए कि यदि वे नकली दांत का इस्तेमाल करते हैं और उनका कोई भी दांत नहीं बचा है तो उन्हें दंत चिकित्सक के पास जाने की कोई ज़रूरत नहीं है. इसके साथ ही यहां तक कि यदि आप नकली दांत इस्तेमाल करते हैं तब भी आप को नियमित जांच के लिए जाना चाहिए. अध्ययन में दांत की ख़राब हालत वाले लोग उन लोगों को माना गया है जिन्होंने कभी अपने दांतों को साफ़ नहीं किया और ना ही दांतों के डॉक्टर के पास गए. डॉक्टर कोनवे का कहना है कि कितनी बार जांच करानी है ये चिकित्सक द्वारा ख़तरे के आकलन के आधार पर तय किया जाना चाहिए. यदि व्यक्ति कम ख़तरे की श्रेणी में आता है तो भी उसे हर वर्ष या दो वर्ष में दांत की जांच करानी चाहिए. उन्होंने कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जो सबके लिए समान हो. डॉक्टर के पास जाने का अंतराल छह महीने में एक बार हो सकता है लेकिन पांच साल में एक बार नहीं. माउथवॉश के ख़तरेशोधकर्ताओं का मानना है कि माउथवॉश और कैंसर के संबंध पर आगे शोध की ज़रूरत है. अध्ययन में शामिल लोगों द्वारा सालों पहले इस्तेमाल किए जाने वाले माउथवॉश की प्रकृति के बारे में विश्लेषण करने में शोधकर्ता असमर्थ थे. डॉक्टर कोनवे ने कहा मैं माउथवॉश के इस्तेमाल को पूरी तरह से बंद करने की सलाह नहीं दूंगा. वो कहते हैं कुछ ऐसी स्थितियां होती हैं जब दांतों के डॉक्टर माउथवॉश की सलाह देते हैं. हो सकता है कि कुछ खास स्थितियों या दवा की वजह से मरीज में लार कम बनती हो. लेकिन मेरे लिए सामान्य रूप से जो सबसे ज़रूरी है वो है फ़्लोराइड टूथपेस्ट से ब्रश करना और नियमित रूप से दांतों के डॉक्टर को दिखाते रहना. अध्ययन के नतीजों को ओरल ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित किया जा रहा है. |
| DATE: 2014-04-05 |
| LABEL: science |
| [27] TITLE: आने वाला है दो-तरफा यूएसबी केबल का दौर |
| CONTENT: इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बीच डाटा ट्रांसफर करने के लिए एक मानक के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले यूएसबी केबल का एक नया डिजाइन सामने आया है. यूएसबी 3-1 टाइप-सी अपनी तरह का पहला ऐसा यूएसबी केबल होगा जो सीधे-उल्टे दोनों तरफ से कनेक्ट किया जा सकेगा. आमतौर पर यूएसबी केबल को कनेक्ट करते समय अक्सर उसे गलत साइड से लगाए जाने के कारण काफी परेशानी का सामना करना पड़ता था. नए केबल से रोज-रोज की अड़चनों से पीछा छूटेगा. नए यूएसबी केबल की तस्वीरें तकनीकी खबरों की साइट द वर्ज ने जारी की है. इस यूएसबी को लागू करने वाले फोरम ने आशा व्यक्त की है कि नया डिजाइन जुलाई तक आएगा. इसलिए संभव है कि यूएसबी केबल निर्माता की ओर से नया पोर्ट तैयार होने में थोड़ा वक्त लग जाए. मोबाईल फोन और कैमरा चार्ज करने के लिए प्रयोग में आने वाले टाइप-सी मानक का यह नया यूएसबी केबल आकार में मौजूदा माइक्रो-यूएसबी कनेक्टर जितना होगा. पहला यूएसबी केबल साल 1990 के मध्य में जारी किया गया था. तब से अब तक यह डाटा कनेक्शन के लिए कंप्यूटर या दूसरे उपकरणों में केवल एक ओर से ही लगाया जाता रहा है. वर्तमान यूएसबी केबल की अपेक्षा इस नए केबल में कई सुधार नजर आएंगे. जैसे कि नया यूएसबी केबल 100 वाट तक की ऊर्जा का ट्रांसफर कर सकेगा. इसके अलावा यूएसबी 3-1 में 10 गीगाबाइट्स की वर्तमान यूएसबी से दोगुनी गति से डाटा ट्रांसफर होगा. यह एक उम्मीद का भी नाम है कि नए डिजाइन में और सुधार लाए जाएंगे. |
| DATE: 2014-04-05 |
| LABEL: science |
| [28] TITLE: फेफड़े के कैंसर में बचना मुश्किलः अध्ययन |
| CONTENT: एक अध्ययन से पता चला है कि फेफड़े के कैंसर से पीड़ित आधे लोगों की मौत छह महीने के अंदर ही हो जाती है. कैंसर मरीजों के जीवित रहने की दर में बदलाव की निगरानी करने वाली संस्था मैकमिलन कैंसर सपोर्ट का कहना है कि शुरुआती जांच में बीमारी का पता लगाना ही बचने का मुख्य उपाय है. अध्ययन के अनुसार स्तन एवं प्रोस्टेट कैंसर के मामले में पांच वर्ष तक जीवित रहने की दर 80 प्रतिशत होती है जबकि फेफड़े के कैंसर के मामले में यह दर 10 प्रतिशत है. फेफड़े के कैंसर से पीड़ित जो लोग पांच वर्ष तक जीवित रहते हैं उनमें किसी और कैंसर के शिकार होने की संभावना दस गुनी ज़्यादा होती है. संस्था ने 2004 से 2011 के बीच इंग्लैंड के लगभग 85000 कैंसर मरीजों के अनुभवों का अध्ययन किया और रिपोर्ट तैयार की है. शोधकर्ताओं ने उन लोगों के बारे में जानकारी इकट्ठा की जो चारों प्रकार के स्तन प्रोस्टेट फेफड़ा और मस्तिष्क कैंसरों में से किसी एक से शुरुआती जांच में पीड़ित मिले. शोधकर्ताओं ने दिखाया कि स्तन कैंसर से पीड़ित 20 प्रतिश महिला और प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित 25 प्रतिशत पुरुष रोग के पता लगने के बाद कम से कम से कम सात वर्ष तक जीवित रहे. लेकिन फेफड़े के कैंसर या मस्तिष्क कैंसर की तस्वीर कहीं ज्यादा भयावह दिखी. मस्तिष्क कैंसर में तो जीवित रहने की संभावना एक प्रतिशत होती है. रिपोर्ट के अनुसार फेफड़े के कैंसर से पीड़ित पांच में एक रोगी की पुष्टि होने के एक महीने में ही मृत्यु हो जाती है जबकि 73 प्रतिशत रोगी साल भर के अंदर मर जाते हैं. हालांकि कैंसर की अन्य बीमारियों में जीवित रहने की दर इंग्लैंड में पिछले 40 वर्षों में बढ़ी है. मैकमिलन के मुखिया सायरन डेवेन ने कहा कि अध्ययन के नतीजों में भारी उतार चढ़ाव का पता चला है. ब्रिटिश लंग फाउंडेशन के चीफ एक्जीक्यूटिव डॉक्टर पेनी वुड्स ने कहा कि यूरोप और अमरीका के मुक़ाबले फेफड़े के कैंसर में जीवन प्रत्याशा का कम रहने के पीछे देरी से पता लगना एक बड़ा कारण है. उन्होंने कहा कि फेफड़े का कैंसर देश में सबसे बड़ा हत्यारा है और हमें सचेत रहना होगा. फेफड़े के कैंसर के अधिकांश मामले धूम्रपान से संबंधित होते हैं जोकि इस बीमारी का सबसे बड़ा कारक है. हालांकि इसकी दर पुरुषों में कम हो रही है और महिलाओं में इसका ख़तरा बढ़ रहा है क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध और सत्तर के दशक के बाद उनमें धूम्रपान की आदत बढ़ी है. |
| DATE: 2014-04-04 |
| LABEL: science |
| [29] TITLE: आधुनिक शेरों की उत्पत्ति की कहानी |
| CONTENT: आधुनिक शेरों की उत्पत्ति और इतिहास का वैज्ञानिकों ने पता लगा लिया है. जीवित शेरों और म्यूज़ियम में मौजूद नमूनों के जेनेटिक विश्लेषण से पता चला है कि आधुनिक शेरों के सबसे क़रीबी पूर्वज 124000 वर्ष पूर्व तक जीवित थे. आधुनिक शेरों का विकास दो समूहों में हुआ. एक समूह पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में चला गया और दूसरा समूह पश्चिमी अफ्रीका और भारत. दूसरे समूह के शेर अब लुप्तप्राय हैं. इसका मतलब हुआ कि आधुनिक शेरों की आधी जैव विविधता खत्म होने की कग़ार पर पहुंच चुकी है. इस अध्ययन के नतीजों को बीएमसी इवोल्यूशनरी बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित किया गया है. शेरों के इतिहास को खोजना बेहद कठिन कार्य रहा है. हाल का समय इस प्रजाति के लिए काफी मुश्किल भरा रहा है क्योंकि इंसानी गतिविधियों के चलते उनके अस्तित्व पर संकट छा गया है. जीवाश्म रिकॉर्ड में निरंतरता का अभाव और शेरों के बिखरे आवास वाले इलाके इतिहास की कड़ी को जोड़ने में सबसे बड़ी बाधा रहे हैं. इसलिए वैज्ञानिकों के अंतरराष्ट्रीय समूह ने दुनियाभर के म्यूज़ियमों और संग्रह केंद्रों में शेरों की प्राचीन डीएनए को खोजना शुरू किया. इंग्लैंड के डरहम विश्वविद्यालय से जुड़े डॉक्टर रॉस बर्नेट के नेतृत्व में इस टीम ने विभिन्न प्रजातियों की डीएनए का अध्ययन किया. टीम ने विलुप्त हो चुके उत्तरी अफ़्रीका के बारबेरी शेर से लेकर विलुप्त इरानी और मध्य व पश्चिमी अफ़्रीकी शेरों के नमूनों का अध्ययन किया. शोधकर्ताओं ने एशिया और अफ़्रीका के अन्य हिस्सों में जीवित शेरों के डीएनए से प्राचीन डीएनए का मिलान किया और पता लगाने की कोशिश की कि विभिन्न प्रजातियों का विकास कैसे हुआ. अध्ययन में खुलासा हुआ कि इस समय शेरों की जो एकमात्र प्रजाति पैंथेरा लियो मौजूद है वो पहली बार पूर्वी-दक्षिणी अफ़्रीका में दिखी थी. लगभग 124000 वर्ष पूर्व विभिन्न प्रजातियों का विकास शुरू हो गया था. यह वही समय है जब उष्णकटिबंधीय जंगलों का पूरे ध्रुवीय अफ़्रीका में प्रसार हुआ और सहारा क्षेत्र सवाना में बदल गया. महाद्वीप के दक्षिण और पूर्व रहने वाले शेर अलग हो गए और उनका विकास पश्चिमी व उत्तरी हिस्से में रहने वाले शेरों से अलग होना शुरू हुआ. इससे दोनों शेरों के बीच आया अनुवांशिक अंतर आज भी मौजूद है. 51000 वर्ष पूर्व महाद्वीप सूख गया और सहारा का प्रसार हुआ. इससे उत्तर और दक्षिण का इलाका अलग हो गया. इसी समय पश्चिम में रहने वाले शेरों की पहुंच मध्य अफ़्रीका तक हो गई जो वहां रहने के ज्यादा अनुकूल था. तबसे नील समेत अफ़्रीका की बड़ी नदियां इन शेरों को अलग करने में बड़ी बाधा बनी रहीं. प्राचीन डीएन के अध्ययन से यह भी खुलासा हुआ कि आधुनिक शेरों की प्रजाति ने 21000 वर्ष पहले अफ़्रीका से बाहर की यात्रा शुरू की और अंततः भारत पहुंचे. इसके बहुत बाद लगभग 5000 वर्ष पूर्व शेरों का एक और समूह महाद्वीप से बाहर गया और मध्यपूर्व में स्थित ईरान में पहुंचा. ये शेर अब लुप्त हो चुके हैं. भारत के काठियावाड़ में 400 से भी कम एशियाई शेर पी लियो पर्सिका बचे हैं. इस प्रजाति को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर द्वारा लुप्तप्राय घोषित किया जा चुका है. डॉक्टर बर्नेट ने बताया पश्चिमी और मध्य अफ़्रीका के शेर सोमालिया या बोत्सवाना की अपेक्षा शेरों की भारतीय प्रजाति से ज्यादा मिलते जुलते हैं. दोनों के बीच भारी भौगोलिक दूरी के बावजूद इनमें ईरानी शेरों और उत्तरी अफ़्रीका के बारबेरी शेरों से ज्यादा समानता दिखती है. डॉक्टर बर्नेट ने बताया यह जानकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि लुप्त बारबेरी शेरों और उत्तरी अफ़्रीका व भारतीय शेरों के बीच बहुत नज़दीकी रिश्ता है. अपने आकार और गुम इतिहास के चलेत विशाल मांसभक्षी जानवरों में बारबेरी शेर ज्यादा रहस्यमय हैं. कभी उत्तरी अफ़्रीका में बहुतायत में पाए जाने वाले बारबेरी शेर शारीरिक रूप से एशिया और अफ़्रीका में अन्य जगहों पर पाए जाने वाले शेरों से विशिष्ट थे. अभी तक ये निश्चित नहीं है कि कोई बारबेरी शेर ज़िंदा है या नहीं और संरक्षणवादी इस उप-प्रजाति को फिर से जीवित करने की कोशिश में हैं. साक्ष्य बताते हैं कि कुछ शेर मोरक्को के शाही परिवार के संग्रह के हिस्से के रूप में बचे हो सकते हैं. हालांकि पूर्व में हुए शोध और ताज़ा अध्ययन से पता चलता है कि वो असली बारबेरी शेर नहीं थे. यदि ऐसा है और बारबेरी शेर खत्म हो चुके हैं तो नए अध्ययन का नजीजा बताता है कि अनुवांशिक रूप से ज्यादा करीबी रहे भारतीय शेरों को उनके प्राकृतिक आवास में पुनः भेजा जा सकता है. डॉक्टर बर्नेट के अनुसार भविष्य में उत्तरी अफ़्रीका में शेरों को ले जाना एक जटिल प्रक्रिया होगी. ऐसे में उनका प्रजनन एक तरीका हो सकता है. अफ़्रीका के शेरों की लगभग एक तिहाई संख्या पिछले 20 वर्षों में ग़ायब हुई है. शोधकर्ता पश्चिमी और मध्य अफ़्रीका के शेरों को लेकर सबसे ज़्यादा चिंता जताते हैं जो कि लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं. इन दोनों इलाकों में क्रमशः 400 से 800 और 900 शेर बचे हुए हैं. इन प्रजातियों के कुछ शेरों को चिड़ियाघरों में संरक्षित कर रखा गया है. |
| DATE: 2014-04-04 |
| LABEL: science |
| [30] TITLE: अच्छी सेहत के लिए सात बार खाएँ फल-सब्जी |
| CONTENT: दिन में सात या सात से ज़्यादा बार फल और सब्ज़ियां खाना सेहत के लिए ज़्यादा बेहतर है. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं ने 65226 लोगों पर अध्ययन के बाद यह बात कही है. शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसा करने से मौत का ख़तरा 42 कम हो जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन अब तक दिन में पांच बार फल और सब्ज़ी खाने पर ज़ोर देता रहा है. दिन में सात बार फल और सब्जियां खाने से कैंसर और हृदय रोग का ख़तरा कम हो जाता है. हालांकि ब्रिटेन सरकार का कहना है कि दिन भर में पांच बार ही सब्ज़ी और फल खाना पर्याप्त होता है लेकिन हम में से कई लोगों को तो यह भी मुश्किल से मिलता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि मात्र फल और सब्जियां खाने से ही उम्र लंबी नहीं होती बल्कि इसका संबंध हमारी जीवनशैली जैसे धूम्रपान और शराब पीने से भी है. लोगों के भोजन और जीवनशैली पर निगाह रखने के लिए इंग्लैंड में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोधकर्ता नेशनल हेल्थ सर्वे की मदद लेते हैं. यह सर्वे इंग्लैंड के लोगों से सवाल पूछ कर और नर्सों से जानकारियां जुटा कर तैयार किया जाता है. शोधकर्ताओं का मानना है कि दिन भर में सात बार फलों-सब्जियों के सेवन से मौत का ख़तरा 42 कम हो जाता है. सब्जियों से फ़ायदे की बात की जाए तो ताज़ा सब्जियां के साथ सलाद और बाद में फल खाने से फ़ायदा सबसे अधिक होता है. फल खाने की जगह यदि उसका रस या जूस पिया जाए तो कोई फ़ायदा नहीं होता जबकि डिब्बाबंद फल खाने से मौत का ख़तरा बढ़ जाता है. शोधकर्ता बताते हैं कि ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि डिब्बाबंद फल चीनी के घोल में संग्रहित होता है. अग्रणी शोधकर्ता डॉक्टर इनलोला बोडे कहती हैं मतलब साफ़ है कि चाहे आप उम्र के किसी भी पड़ाव पर हों ज्यादा फल और सब्जियों का सेवन लंबी उम्र देता है. वह कहती हैं कि फल-सब्जी की मात्रा का प्रभाव चौंका देने वाला है लेकिन थोड़ा खाना भी कुछ न खाने से काफ़ी बेहतर है. सवाल ये उठता है कि आखिर फल और सब्जियों में ऐसा क्या मौजूद है जो हमारी उम्र बढ़ाता है. शोधकर्ता डॉक्टर इनलोला बोडे बताती हैं कि ये हमें रोगों से लड़ने की ताक़त देते हैं क्योंकि इनमें ऐंटीऑक्सीडेंट मौजूद होता है जो कोशिकाओं को हुई क्षति की भरपाई करता है. इसके अलावा इनमें फ़ाइबर और सूक्ष्म पोषक तत्व होते हैं जो सेहत के लिए अच्छे होते हैं. वे बताती हैं कि सात बार खाने का मतलब एक बार में 80 ग्राम की मात्रा यानी एक मुट्ठी फल या सब्जी का सेवन है. लेकिन कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह शोध अंतिम नहीं कहा जा सकता क्योंकि संभव है कि इसके नतीजों पर जीवनशैली से जुड़े दूसरे कारकों ने भी प्रभाव हो सकता है. ग्लासगो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नवीद सत्तर इस शोध पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि दिन भर में सात बार खाना चुनौतीपूर्ण है. वह कहते हैं ऐसा करने के लिए सरकार की मदद की ज़रूरत पड़ेगी. जैसे कि फल और सब्जियों की क़ीमत में कटौती चीनी बहुल खाद्य पदार्थों पर कर में कमी और समाज के हर तबक़े के लिए उच्च गुणवत्ता वाली चीज़ों को मुहैया करना. इंग्लैंड पब्लिक हेल्थ के डॉक्टर अलीसन टेडस्टोन का कहना है कि ये शोध दिलचस्प है लेकिन फल और सब्जियों की ख़ास मात्रा की सलाह अपरिपक्व मालूम पड़ती है क्योंकि दो-तिहाई लोग तो दिन भर में पांच बार भी फलों और सब्जियों का सेवन नहीं करते. ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन के वरिष्ठ आहार विशेषज्ञ विक्टोरिया टाइलर का कहना है कि लोग अभी दिन भर पांच बार फल-सब्जी सेवन के मौजूदा लक्ष्य तक ही नहीं पहुंच पा रहे हैं. विक्टोरिया कहती हैं जब हम पांच बार खाने के लक्ष्य तक ही नहीं पहुंच पा रहे तो इसे छोड़ एक क़दम और आगे का लक्ष्य निर्धारित करने की मुझे कोई वजह नहीं दिखती. वहीं ऑस्ट्रेलिया की सरकार लोगों को दिन भर में दो बार से अधिक फल और पांच बार से अधिक सब्जियां खाने को प्रेरित कर रही है. |
| DATE: 2014-04-03 |
| LABEL: science |
| [31] TITLE: नज़र न लग जाए, आंखों को स्मार्टफोन की |
| CONTENT: हर तरफ स्मार्टफोन की धूम मची है. लेकिन जिन लोगों को इसकी लत लग चुकी है उनके लिए बुरी ख़बर है. ऑप्टिशियनों चश्मा बनाने वालों के अनुसार स्मार्टफोन के दीवानों को उनके ही फोन की नजर लग रही है. ऑप्टिशियनों ने स्मार्टफोन यूजर्स को यह चेतावनी 2000 लोगों पर किए गए एक अध्ययन के बाद दी है. इस अध्ययन में यह बात सामने आई है कि 25 साल से कम उम्र के युवा अपने फोन का इस्तेमाल एक दिन में 32 बार करते हैं. स्मार्टफोन के अलावा कंप्यूटर टैबलेट्स और फ़्लैट स्क्रीन वाली टीवी का भी ज़रूरत से ज्यादा इस्तेमाल दीर्घकालिक नुक़सान की ओर ले जा सकता है. ऑप्टिशियन ऐंडी हेपवर्थ का कहना है स्मार्टफोन की स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी हमारी आंखों के लिए काफी नुक़सानदेह और आंख के पिछले हिस्से के लिए ख़तरनाक होती है. आंखों के जानकार ऐंडी हेपवर्थ बताते हैं जब आप अपने स्मार्टफोन की ओर देख रहे होते हैं तो उस समय इससे रोशनी की जो किरणें निकलती हैं वह नीली बैंगनी रंग की होती हैं. उन्होंने आगे बताया कि अध्ययन में पता चला है कि इन नीली किरणों से मैक्यूलर डीजेनरेशन का खतरा होता है जिससे आप अंधे भी हो सकते हैं. ऑप्टीशियनों का कहना है कि बायोलॉजिकल क्लॉक को दुरुस्त रखने के लिए भली-भली नीली रोशनी काफी मददगार साबित होती है. मगर साथ ही उनका यह भी कहना है कि अधिक नीली रोशनी के प्रभाव में रहने से नींद में ख़लल पड़ता है और मूड पर भी असर होता है. ऐंडी आगे कहते हैं हालांकि हम अभी आंख की समस्याओं से स्मार्टफोन के सीधे संबंध के बारे में अनजान हैं लेकिन प्रयोगशाला में इस बात के पुख्ता सबूत मिले हैं कि स्मार्टफोन आंखों को काफ़ी नुक़सान पहुंचा सकता है. उन्होंने यह भी बताया स्मार्टफोन को देखते समय हम अपनी पलकें बहुत कम झपकाते हैं और फोन से हमारी दूरी सामान्यतया काफी कम होती है. इससे आंखों पर ज़ोर पड़ता है. निजी ऑप्टिशियनों के समूह की ओर से प्रमाणित स्मार्टफोन से जुड़े इस सर्वेक्षण के अनुसार एक वयस्क स्क्रीन को ताकते हुए दिन का औसतन सात घंटा गुज़ार देता है. आंकड़ों से यह बात निकल कर सामने आ रही है कि 25 साल से कम उम्र वाले 43 फीसदी लोग जब चाहते हुए भी अपना फोन चेक नहीं कर पाते तो वह काफी चिड़चिड़े हो जाते हैं. स्मार्टफोन यूजर अलन चिनरी का कहना है कि वह अपने स्मार्टफोन के बिना नहीं रह पाती और नर्वस हो उठती हैं. इसके अलावा 55 फीसदी लोग स्मार्टफोन के संपर्क में रहने के कारण आंखों में तकलीफ महसूस करते हैं. 18 साल की अलन चिनरी अपना स्मार्टफोन हमेशा साथ रखती हैं. वे कहती हैं मैंने महसूस किया है कि जब से मैं कंप्यूटर और फोन का इस्तेमाल करने लगी हूं मेरी आंखें खराब हो रही हैं. वह आगे कहती हैं मुझे बार-बार सिरदर्द होने लगा है. अमंद संत जो एक ऑप्टिशियन हैं कहते हैं कि स्मार्टफोन के इन नुक़सानदेह असर से बचने के लिए हमें कोई बहुत भारी-भरकम नहीं बल्कि साधारण तरीका चाहिए. संत सलाह देते हैं आप अपनी आंखों की नियमित जांच करवाते रहिए और कंप्यूटर और फोन से बीच-बीच में दूरी बनाते रहिए. |
| DATE: 2014-04-02 |
| LABEL: science |
| [32] TITLE: इतना ख़तरनाक क्यों है इबोला? |
| CONTENT: विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्लयूएचओ का कहना है कि वह पश्चिमी अफ़्रीक़ा में इबोला वायरस के संक्रमण को गंभीरता से ले रहा है. गिनी में इबोला वायरस से संक्रमण के 122 मामले प्रकाश में आए हैं जिनमें कम से कम 80 मरीज़ों की मृत्यु हो चुकी है. इसके अलावा लाइबेरिया में भी चार लोगों की मौत हुई है. लाइबेरिया के स्वास्थ्य मंत्री ने लोगों को इबोला से बचने के लिए शारीरिक संबंध न बनाने की सलाह दी है. इससे पहले हाथ मिलाने और चुंबन की सलाह दी गई थी. डब्ल्यूएचओ के अनुसार इबोला एक क़िस्म की वायरल बीमारी है. इसके लक्षण हैं अचानक बुख़ार आना कमज़ोरी मांसपेशियों में दर्द और गले में ख़राश का होना. ये लक्षण बीमारी की शुरुआत भर होते हैं. इसका अगला चरण है उल्टी होना डायरिया और कुछ मामलों में अंदरूनी और बाहरी रक्तस्राव. मनुष्यों में इसका संक्रमण संक्रमित जानवरों जैसे चिंपैंजी चमगादड़ और हिरण आदि के सीधे सम्पर्क में आने से होता है. एक दूसरे के बीच इसका संक्रमण संक्रमित रक्त द्रव या अंगों के मार्फ़त होता है. यहां तक कि इबोला के शिकार व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी ख़तरे से ख़ाली नहीं होता. शव को छूने से भी इसका संक्रमण हो सकता है. बिना सावधानी के इलाज करने वाले चिकित्सकों को भी इससे संक्रमित होने का भारी ख़तरा रहता है. संक्रमण के चरम तक पहुंचने में दो दिन से लेकर तीन सप्ताह तक का समय लग सकता है और इसकी पहचान और भी मुश्किल है. अभी तक यह बीमारी अफ़्रीक़ा तक ही सीमित है लेकिन एक मामला फ़िलीपींस में भी पाया गया है. इससे संक्रमित व्यक्ति के ठीक हो जाने के सात सप्ताह तक संक्रमण का ख़तरा बना रहता है. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक़ उष्णकटिबंधीय बरसाती जंगलों वाले मध्य और पश्चिम अफ़्रीका के दूर दराज़ गांवों में यह बीमारी फैली. पूर्वी अफ़्रीका की ओर कांगो युगांडा और सूडान में भी इसका प्रसार हो रहा है. पू्र्व की ओर बीमारी का प्रसार असमान्य है क्योंकि यह यह पश्चिम की ओर ही केंद्रित था और अब शहरी इलाक़ों को भी अपनी चपेट में ले रहा है. इस बीमारी की शुरुआत गिनी के दूर दराज़ वाले इलाक़े ज़ेरेकोर में हुई लेकिन अब इसका प्रकोप 20 लाख की आबादी वाली राजधानी कोनाक्राई तक हो गया है. सियरा लियोन में संक्रमण के पांच संदिग्ध मामले चिह्नित किए गए हैं. हालांकि अभी तक इनकी पुष्टि नहीं हो पाई है. जिस तरह से गिनी से सैकड़ों किलोमीटर दूर इस बीमारी का प्रकोप पता चला है उसे देखते हुए स्वयंसेवी संस्था मेडिसिंस सैंस फ्रंटियर्स ने इसे अभूतपूर्व बताया है. डब्ल्यूएचओ द्वारा जारी दिशा निर्देश के अनुसार इबोला से पीड़ित रोगियों के शारीरिक द्रव और उनसे सीधे सम्पर्क से बचना चाहिए. साथ ही साझा तौलिये के इस्तेमाल से बचना चाहिए क्योंकि यह सार्वजनिक स्थलों पर संक्रमित हो सकता है. डब्ल्यूएचओ ने मुताबिक़ इलाज करने वालों को दस्ताने और मास्क पहनने चाहिए और समय-समय पर हाथ धोते रहना चाहिए. चमगादड़ बंदर आदि से दूर रहना चाहिए और जंगली जानवरों का मांस खाने से बचना चाहिए. लाइबेरिया की राजधानी मोनरोविया में मौजूद बीबीसी संवाददाता ने बताया कि वहां सुपरमार्केट और मॉल आदि में कर्मचारी दस्ताने पहनने लगे हैं. सेनेगल ने गिनी से लगती अपनी सीमा को बंद कर दिया है. यहां के गायक यूसुओ एनडूर ने पिछले महीने अपने एक संगीत कार्यक्रम को रद्द कर दिया. उनका कहना था कि एक बंद जगह में हज़ारों लोगों को इकट्ठा करना इस समय ठीक नहीं है. अभी तक इस बीमारी का इलाज नहीं खोजा जा सका है लेकिन कुछ लोगों पर नई दवाओं का प्रयोग किया जा रहा है. |
| DATE: 2014-04-02 |
| LABEL: science |
| [33] TITLE: ड्रोन की मदद से पूरी होगी फ़ेसबुक की योजना |
| CONTENT: दुनिया की दो तिहाई आबादी को जोड़ने की फ़ेसबुक ने महत्वकांक्षी योजना बनाई है. इसके लिए किसी नेटवर्क की भी जरूरत नहीं पड़ेगी. यह ड्रोन लेज़र और सैटेलाइट की मदद से किया जाएगा. इस घोषणा फ़ेसबुक के संस्थापक मार्क ज़ुकेरबर्ग ने सोशल मीडिया पर की थी. यह कदम फ़ेसबुक को गूगल के साथ सीधी प्रतिस्पर्धा की तरफ ले जाएगा. इंटरनेट की दुनिया के ये दोनों दिग्गज अपने दर्शकों का विस्तार करना चाहते हैं विशेष रूप से विकासशील देशों में. फ़ेसबुक की योजना के बारे में विवरण कम उपलब्ध है लेकिन यह एक सौर ऊर्जा से संचालित ड्रोन के साथ ही नज़दीकी-पृथ्वी की कक्षा और भूस्थिर उपग्रहों की मदद से संचालित होंगे. इस तकनीक में अदृश्य इंफ्रारेड लेज़र बीम का भी इस्तेमाल इंटरनेट कनेक्शन की गति को बढ़ाने के लिए किया जा सकता है. पिछले साल फ़ेसबुक और अन्य कंपनियों ने इंटरनेट. ऑर्ग शुरू किया है जो अभी भी कनेक्ट नहीं हो पाए दुनिया की विशाल आबादी को इंटरनेट के इस्तेमाल में मदद करने के लिए है. फिलीपींस और पराग्वे में सोशल नेटवर्क पहले से ही उस क्षेत्र में इंटरनेट का उपयोग कर रहे लोगों की संख्या दोगुना करने के लिए टेलीकॉम आपरेटरों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. ज़ुकेरबर्ग ने अपने पोस्ट में कहा हम इन भागीदारियों को जारी रखेंगे लेकिन पूरी दुनिया को जोड़ने के लिए नई तकनीक की ख़ोज करने की ज़रूरत हैं. इस परियोजना को सफल बनाने के लिए फेसबुक ने एक कनेक्टिविटी लैब की स्थापना की है जिसमें नासा की जेट प्रोपल्सन प्रयोगशाला और उसके एम्स रिसर्च सेंटर से एयरोस्पेस और संचार तकनीक के क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल होंगे. इस परियोजना पर पांच सदस्यीय टीम को काम पर रखा गया है जिन्होंने ब्रिटिश फर्म एसेंटा में सौर ऊर्जा संचालित मानव-रहित विमान को विकसित करने पर काम किया है. इससे पहले इस महीने अफवाहें थीं कि सोशल नेटवर्क ड्रोन निर्माता टाइटन को खरीदना चाहता है लेकिन इस घोषणा में इस बात का कोई जिक्र नहीं था. ओव्यूम विश्लेषक मार्क लिटल सोचते है कि ये योजनाएँ 1-2 अरब दर्शकों तक अपनी पहुंच का विस्तार करने की फ़ेसबुक की महत्वाकांक्षा का हिस्सा है. पिछले साल गूगल ने इसी तरह की योजना की घोषणा की थी जिसमें सौर ऊर्जा से संचालित गुब्बारे की मदद से सुदूर क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुंच बनाने की योजना थी. पिछले जून न्यूजीलैंड में प्रोजेक्ट लून 30 नाम का अधिक दबाव वाला गुब्बारा लाँच किया गया था. |
| DATE: 2014-04-02 |
| LABEL: science |
| [34] TITLE: मच्छरों से कैसे बचें? |
| CONTENT: मच्छरों के डंक और उनसे फैलने वाली बीमारियों से हम दुनिया में कहीं नहीं बच सकते. कैरेबियन द्वीपों पर इन दिनों चिकनगुनिया महामारी का रूप ले रहा है. यह दिन में मच्छरों के काटने से होता है. वहाँ 5900 से अधिक लोग इससे पीड़ित हैं. यह संख्या वहां की आबादी की आधी है. इसके अलावा फ्रेंच गुयाना में भी लोग इससे पीड़ित हैं. हालांकि हम उन्हें ख़त्म करना चाहते हैं. लेकिन मच्छरों को ख़त्म कर देने का हमारे पारिस्थितकीय तंत्र पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा. मच्छरों के लार्वा पानी में पलते हैं और वयस्क मच्छर परागण के महत्वपूर्ण काम को अंजाम देते हैं. वे मस्किटोफिश जैसे जलचरों के लिए पौष्टिक आहार भी होते हैं जो एक दिन में मच्छरों के सैकड़ों लार्वा खा जाती हैं. हालांकि मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों में मलेरिया सबसे आम है लेकिन इसके अलावा भी वह कई तरह की बीमारियां फैलाते हैं. यहाँ हम आपको उन पाँच कम जानी जाने वाली और बेहद ख़तरनाक बीमारियों के बारे में बताएंगे जो मच्छरों से हो सकती हैं. इस साल गर्मियों में फ़ुटबाल का विश्वकप देखने के लिए ब्राज़ील जाने वाले प्रशंसकों को सावधान रहना चाहिए पीत ज्वर से. यह एक वायरस से फैलता है जो हर साल क़रीब दो लाख लोगों को प्रभावित करता है इनमें सबसे अधिक लोग उप-सहारा अफ़्रीका के होते हैं. मच्छरों पर नियंत्रण के बाद पनामा नहर के काम की बहाली में काफी मदद मिली थी जहाँ 10 में से एक व्यक्ति की मौत पीत ज्वर से हो जाती थी. किसी व्यक्ति में इस वायरस का संक्रमण हो जाने के कुछ दिन बाद ही उसे पता चलता है. शुरू में ठीक होने के लक्षण दिखाने के बाद इसके क़रीब 15 फ़ीसदी पीड़ित दूसरे और ख़तरनाक़ चरण में पहुंच जाते हैं जिसमें मृत्युदर 50 फ़ीसदी है. इसके बाद पीड़ित व्यक्ति में पीलिया के लक्षण दिखाई देते हैं और लीवर में खराबी आने के वजह से उसकी त्वचा और आंखों का सफ़ेद हिस्सा पीला पड़ जाता है. ब्राज़ील की यात्रा पर जा रहे हर व्यक्ति को इसके लिए एक टीका लगवाने की सलाह दी जाती है. दुनिया की आधी आबादी को डेंगू होने का ख़तरा है. इसमें व्यक्ति को तेज़ बुखार सिरदर्द आंखों के पीछे दर्द मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द और शरीर पर फुंसियां हो जाती हैं. आज से 40 साल पहले ब्राज़ील में डेंगू की बीमारी नहीं थी. साल 2013 के पहले छह महीनों में वहाँ डेंगू के 16 लाख मामले सामने आए. रियो डि जनेरो में रोज़ इसके छह हज़ार मामले दर्ज किए गए. इससे बचने के लिए न तो कोई टीका बना है और न कोई ख़ास दवा है. इसलिए इसके पीड़ित को आराम अधिक से अधिक पानी और बुख़ार कम करने के लिए पैरासिटामोल की गोलियां दी जाती हैं. गंभीर डेंगू को डेंगू हेमोरैगिक फ़ीवर के नाम से जाना जाता है जो घातक हो सकता है. मलेरिया फैलाने वाले एनाफिलीज़ मच्छर जो रात में काटता है के विपरीत डेंगू फैलाने वाला एडिस मच्छर दिन में सक्रिय रहता है. लीवरपूल स्कूल ऑफ़ ट्रापिकल मेडिसिन के डॉक्टर फ़िलीप मैककॉल डेंगू के विशेषज्ञ हैं. वह बताते हैं सूर्योदय होते ही वह काटना शुरू कर देते हैं जो 10 बजे के बाद से कम होने लगता है क्योंकि गर्मी हो जाती है. वह शाम चार बजे से पांच बजे के बीच एक बार फिर काटना शुरू करते हैं लेकिन रात में सक्रिय नहीं रहते. ब्रितानी डॉक्टर अयान पांजा जब मलेशिया में छुट्टियां मना रहे थे तो वह इससे पीड़ित हो गए. वह कहते हैं अगर ईमानदारी से कहूं तो कुछ दिन तक इस तरह के लक्षण देखकर मुझे लगा कि मैं मरने वाला हूं. लेकिन मुझे क्वालालंपुर के अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ मुझे प्लेटलेट्स चढ़ाए गए. ख़ून का थक्का बनने से रोकने के लिए प्लेटलेट्स जरूरी होते हैं. डेंगू होने पर बोनमैरो में प्लेटलेट्स बनना बंद हो जाता है. इसलिए डेंगू की गंभीर अवस्था में रक्तस्राव एक बड़ी दिक्कत होता है. इसका नाम सुनने में सड़क पर मिलने वाले स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ की तरह लगता है. लेकिन यह एक तकलीफ़देह बीमारी है जिसमें तेज बुख़ार और जोड़ों में दर्द होता है. स्वीडन स्थित यूरोपियन सेंटर फ़ॉर डिज़ीज कंट्रोल के मुख्य वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर जॉन ग्यूसेक कहते हैं यह कमज़ोर कर देता है. इससे पीड़ित लोग काम नहीं कर सकते और उन्हें जोड़ों में दर्द के साथ बिस्तर पर पड़े रहना होता है. चिकनगुनिया का पता पहली बार तंजानिया में 1952 में चला था. इसका नाम किमाकोंडे भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता है विकृत होना. ग्यूसेक कहते हैं चिकनगुनिया के मामलों में जोड़ों का दर्द कई हफ़्तों तक रहता है या इसके संक्रमण की वजह से गठिया भी हो सकता है. वह कहते हैं हालांकि आमतौर पर यह घातक नहीं होता लेकिन यह कमज़ोर और बुजुर्ग लोगों में मौत का कारण बन सकता है. पिछले नवंबर में अमरीका में चिकनगुनिया का पहला मामला कैरेबिया के सेंट मार्टिन द्प पर सामने आया था. यह जगह इसके मूलस्थान अफ़्रीका दक्षिण-पूर्व एशिया और एशियाई उपमहाद्वीपों से काफी दूर है. इस बीमारी से वहाँ चार मौतें हुई थीं. अब इसके उत्तरी अमरीका में भी फैल जाने की आशंका है क्योंकि इसका वायरस ले जाने वाला मच्छर दक्षिणी फ़्लोरिडा और टेक्सान तट पर भी पाया गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ 2005 के बाद से भारत इंडोनेशिया थाईलैंड मालदीव और बर्मा में इसके 19 लाख मामले सामने आए हैं. अभी इसके इलाज के लिए न तो कोई दवा बनी है और न कोई टीका. इससे बचने का सबसे आसान तरीका यह है कि मच्छरों से बचा जाए. अच्छी बात यह है कि एक बार इसका शिकार हो जाने के बाद शरीर में इसकी प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है और अगली बार संक्रमण की आशंका नहीं रहती है. मच्छर से पैदा होने वाले इस वायरस का नाम अमरीका के विस्कॉन्सिन राज्य के ला क्रोसे शहर के नाम पर पड़ा जहां पहली बार 1963 में इसका पता चला था. हालांकि यह काफी दुर्लभ बीमारी है. अमरीका में हर साल इसके केवल 80-100 मामले ही सामने आते हैं ख़ासकर बच्चों में. इससे पीड़ितों को बुख़ार सिरदर्द मितली उल्टी थकान और सुस्ती होती है. इसके बहुत अधिक गंभीर होने पर कब्ज़ बेहोशी या कोमा और लकवे की शिकायत हो सकती है. इसका वर्णन ढाई हज़ार साल से भी पहले हिंदू और फ़ारसी डॉक्टरों ने किया था. इसके परजीवी कृमि वुकेरेरिया वैनक्रोफ़िट को भी मच्छर ही फैलाते हैं. गंभीर हो जाने पर यह लिंफटिक फ़ाइलेरिया या हाथीपांव हो सकता है. इसके लार्वा के कृमि बनने में क़रीब एक साल का समय लगता है. इंसान के लसिका तंत्र में इसका संक्रमण होने पर त्वचा के नीचे के ऊतक मोटे होने लगते हैं ख़ासकर पैर हाथ स्तन और जननांगों के. यह पूरी तरह से इंसान की सुंदरता को प्रभावित करने वाली बीमारी है जो मच्छरों से फैलती है. इसकी पहचान स्कॉटलैंड के पैट्रिक मैनसन ने चीन में अपने माली में की थी जो कि फाइलेरिया से पीड़ित था. इसका शुरुआती स्तर पर इलाज लाभदायक हो सकता है. लेकिन इसके कृमि के वयस्क हो जाने पर उस पर दवाओं का प्रभाव नहीं पड़ता. मच्छरों से होने वाली बीमारियों को कम करने के लिए यह समझना ज़रूरी है कि ये कीट आखिर किस तरह का व्यवहार करते हैं. कीटनाशकों के उपयोग के अलावा इन्हें नियंत्रित करने के लिए जेनेटिकली मॉडिफ़ाइड बांझ मच्छर तैयार किए जा सकते हैं और कीड़े खाने वाले छोटे कीटों का भी उपयोग किया जा सकता है. लीवरपूल स्कूल ऑफ ट्रापिकल मेडिसिन के प्रोफ़ेसर हिलेरी रैनसन मच्छरों से बचने पर काम कर रही हैं. वह कहती हैं मच्छरों के प्रजजन स्थल पर ही उन्हें लक्ष्य बनाना ज्यादा कारगर होगा. |
| DATE: 2014-04-01 |
| LABEL: science |
| [35] TITLE: आसाम चाय की प्याली में तूफ़ान |
| CONTENT: पूरी दुनिया में चाय के मशहूर ब्रांड असम टी पर जलवायु परिवर्तन का ख़तरा मंडराने लगा है. विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान और बारिश में हो रहे बदलाव के साथ सामंजस्य बिठाने में उत्पादन लागत बढ़ रही है. लेकिन उत्पादक बाज़ार में प्रतियोगिता के चलते दाम नहीं बढ़ा सकते. भारत दुनिया का सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है और इसके कुल उत्पादन का आधा हिस्सा असम से आता है. वैज्ञानिक और चाय उत्पादक बताते हैं कि भारत के पूर्वोत्तर राज्य में सामान्य तापमान बढ़ चुका है. यहां सूखे मौसमों का अंतराल लंबा होने लगा है और बारिश के ढर्रे में लगातार बदलाव हो रहा है. उत्तरी असम के डिब्रूगढ़ इलाक़े में चाय की खेती करने वाले मनीष बागड़िया कहते हैं पहले यहां एक समान बारिश होती थी. वे कहते हैं पिछले एक दशक से किसी ख़ास महीने में भारी बारिश हो जाती है जिससे बगीचे की सतह की मिट्टी बह जाती है. सूखे मौसमों के लंबे हो जाने से फ़सलों पर कीट पतंगों का ख़तरा बढ़ रहा है जिसके लिए अधिक से अधिक कीटनाशक इस्तेमाल करना पड़ता है और इससे लागत बढ़ती जा रही है. एक अन्य उत्पादक प्रभात बेजबरुआ बताते हैं कि कीट-पतंगे दशकों से सुसुप्ता अवस्था में थे लेकिन अब सभी प्रकार के कीटों की संख्या बढ़ने लगी है. कुछ उत्पादकों कहना है कि इन कीटों से मुक़ाबला तो किया जा सकता है लेकिन बारिश के ढर्रे में आए बदलाव से निपटना मुश्किल है. असम के चाय बागान बारिश और सूरज की रोशनी के मामले में बहुत ही उपयुक्त स्थान पर हैं पर यह संतुलन अब समाप्त हो रहा है. हाल ही में असम के चाय बगानों पर जलवायु परिवर्तन के असर का अध्ययन करने वाले आईआईटी गुवाहाटी के प्रोफ़ेसर अरूप कुमार शर्मा भी उत्पादकों की बातों से सहमत नज़र आते हैं. प्रोफेसर शर्मा के अनुसार अध्ययन में जो नतीजे सामने आए उससे पता चलता है कि इन इलाक़ों में सूखे मौसम का अंतराल लंबा होगा और मानसून के दौरान भी भारी बारिश की बारंबारता बढ़ेगी. उनके अनुसार शोधकर्ताओं के समूह ने पाया कि मॉनसून में बारिश के समय में बदलाव हुआ है और यह चाय उत्पादन को प्रभावित करेगा. उन्होंने बताया कुछ इलाक़ों में पहले से ही मानसून लेटलतीफ़ होता रहा है और इसका मतलब है कि लोग केवल मार्च में ही चाय की पत्तियां तोड़ सकते हैं जबकि आधी सदी से फ़रवरी में पत्तियां तोड़ी जाती रही हैं. शर्मा के अनुसार अभी बारिश का प्रमुख समय जून या जुलाई है जबकि हमारे आंकड़े बताते हैं कि भविष्य में बारिश का मुख्य महीना सितंबर होगा. हालांकि भारतीय चाय संघ के अनुसार पिछले साल असम ने 62 करोड़ किलो चाय का उत्पादन किया जोकि 2012 के मुकाबले तीन करोड़ किलो ज़्यादा है. टी रिसर्च एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने एक अध्ययन कराया था. इसमें भी तापमान बढ़ने और बारिश के मौसम के छोटे होने की बात सामने आई थी. एसोसिएशन निदेशक आरएम भागवत कहते हैं हमें वॉटर हार्वेस्टिंग और फ़ौव्वारा सिंचाई आदि का सहारा लेना होगा. इससे लागत तो थोड़ी बढ़ेगी लेकिन उत्पादन भी बढ़ेगा. चाय के उत्पादन के क्षेत्र में भारत के मुख्य प्रतिद्वंद्वी केन्या और श्रीलंका हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान में वृद्धि से केन्या को फ़ायदा हो रहा है क्योंकि पिछले दिनों ठंड से यहां चाय उद्योग काफ़ी प्रभावित रहा है जबकि श्रीलंका की स्थिति असम जैसी ही है. कोलंबो टी ट्रेडर एसोसिएशन के अध्यक्ष केरागाला जयंथा कहते हैं आजकल यहां 20 से 30 मिनट अंतराल वाली भारी बारिश बढ़ी है. उनका कहना है कि अभी तक पौधे ऐसी बारिश से अधिक प्रभावित नहीं हुए हैं लेकिन आने वाले 10-15 वर्षों में स्थितियां और मुश्किल हो जाएंगी. असम के चाय उत्पादकों के सामने यह स्थिति पहले ही आ चुकी है. |
| DATE: 2014-03-30 |
| LABEL: science |
| [36] TITLE: अब सिंथेटिक क्रोमोसोम तैयार |
| CONTENT: जैविक इंजीनियरिंग में एक बड़ी छलांग लगाते हुए वैज्ञानिकों ने ख़मीर का पहला सिंथेटिक गुणसूत्र क्रोमोसोम तैयार किया है. इससे पहले अब तक सिंथेटिक डीएनए बैक्टीरिया जैसे सरल जीवों के लिए बनाया गया था. ख़मीर की जीवन रचना ऐसी है जिसकी कोशिकाओं का एक केंद्र होता है जो पौधों और जानवरों से मिलता जुलता है. इसमें 2000 जीन्स होते हैं. इसलिए ख़मीर के पहले 16 गुणसूत्रों को तैयार करना उभरते हुए सिंथेटिक बायोलॉजी विज्ञान की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है. शोध में ख़मीर में मौजूद मूल गुणसूत्रों को सिंथेटिक गुणसूत्रों से बदल दिया गया. वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किया गया गुणसूत्र ख़मीर में सफलतापूर्वक काम करने लगा. इसके बाद वैज्ञानिकों ने ख़मीर के पुनरुत्पादन का भी निरीक्षण किया ताकि इसे व्यवहारिकता की कसौटी पर कसा जा सके. शोध के लिए ख़मीर का प्रयोग बहुत उपयोगी माना जाता है. बेकिंग और मद्यकरण में ख़मीर का बड़े स्तर पर इस्तेमाल होता है और भविष्य में इसके औद्योगिक इस्तेमाल की भी बहुत संभावनाएं हैं. कैलिफ़ोर्निया में एक कंपनी पहले भी सिंथेटिक बायोलॉजी की मदद से ख़मीर की ऐसी किस्म तैयार कर चुकी है जो मलेरिया की दवा का एक तत्व आर्टेमिसिनिन पैदा कर सकती है. ख़मीर में गुणसूत्र-lll का संश्लेषण एक अंतर्राष्ट्रीय टीम द्वारा किया गया. बाद में इसके परिणामों को साइंस जर्नल में प्रकाशित भी किया गया. ख़मीर के गुणसूत्रों का नाम सामान्यतः रोमन अंकों पर रखा जाता है. शोध में वैज्ञानिकों की टीम की अगुवाई करने वाले लैनगोन मेडिकल सेंटर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के डॉक्टर जेफ़ बोएके का कहना है इससे सिंथेटिक बायोलॉजी की सुई सिद्धांत से हक़ीक़त की ओर बढ़ी है. बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि शोध का परिणाम सच में रोमांचक है. उन्होंने कहा जिस हद तक हमने अनुक्रम बदले उसके बाद भी अंत में हमने स्वस्थ और खुश ख़मीर पाया. नए गुणसूत्र को सिन नाम दिया गया है. इसे बनाने में 273871 डीएनए जोड़ों का इस्तेमाल किया गया है जो ख़मीर के शरीर के मूल गुणसूत्र में मौजूद 316667 डीएनए से थोड़ा कम है. डॉक्टर बोएके ने बताया हमने उसके शरीर में 50 हज़ार से अधिक डीएनए कोड को बदल दिया था. इसके बावज़ूद ख़मीर न केवल साहसी निकला बल्कि उसने नए तरह के काम करने भी शुरू कर दिए. नए काम करने की तरक़ीब हमने उसके गुणसूत्र में मशीन की मदद से सिखाया. ख़मीर के अंदर आए नए बदलाव का कारण रसायनिक परिवर्तन है जिससे वैज्ञानिक उसके गुणसूत्रों में हज़ारों तरह की भिन्नता ला सकते हैं जो जेनिटिक कोड को बदलने में मददगार होगा. उम्मीद है कि ख़मीर के सिंथेटिक गुणसूत्रों की मदद से इसका प्रयोग उपयोगी टीकों और जीव ईंधन को बनाने में किया जा सकेगा. आनुवांशिक संशोधन में एक जीव से दूसरे जीव के अंदर जीन को स्थानान्तरित किया जाता है वहीं सिंथेटिक जीव विज्ञान में नए जीन का निर्माण किया जाता है. मगर विज्ञान जगत से बाहर कुछ लोगों का मानना है कि इस शोध से वैज्ञानिक भगवान बनने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही वह इसके दूरगामी दुष्प्रभावों को नजरअंदाज़ कर रहे हैं. ल्योड्स इंश्योरेंस बाज़ार ने 2009 में अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि नई तकनीक के खतरे अप्रत्यत्क्ष होते हैं. |
| DATE: 2014-03-30 |
| LABEL: science |
| [37] TITLE: साइबर हमलों ने पैदा की नौकरियों की गुंजाइश |
| CONTENT: दुनिया में जैसे-जैसे परिष्कृत साइबर-हमले बढ़ रहे हैं वैसे ही बढ़ रही है इन्हें रोकने में सक्षम लोगों की मांग. साइबर-छानबीन के क्षेत्र में अब नित नई नौकरियां आ रही हैं. लेकिन अगली पीढ़ी के साइबर-कॉप्स पुलिसकर्मी बनने के लिए पर्याप्त दक्षता वाले लोग कम हैं. अमरीका के श्रम सांख्यिकी विभाग के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार स्नातक स्तर के सूचना सुरक्षा कर्मचारियों की मांग अगले दशक तक 37 बढ़ जाएगी. यह पूरे कंप्यूटर उद्योग में वृद्धि की अनुमानित दर से दोगुनी है. अमरीकी श्रम विभाग का अनुमान है कि सूचना सुरक्षा विश्लेषक की मांग बहुत ज़्यादा होने वाली है. इस अंतर को पूरा करने के लिए निजी क्षेत्र की फ़र्में और सरकारें विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर काम कर रही हैं. इस कोशिश में आईबीएम का एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट भी शामिल है जिसमें वह 200 विश्वविद्यालयों के साथ साझेदारी करेगी ताकि विशेषज्ञता की कमी को पूरा किया जा सके. अमरीकी विश्वविद्यालयों के अलावा प्रतिभा-विकास प्रोजेक्ट सिंगापुर मलेशिया जर्मनी और पोलैंड के छात्रों को भी शामिल कर रहा है. आईबीएम की साइबर-सुरक्षा नवोत्पाद इनोवेशन विभाग की उपाध्यक्ष मारिसा विवेरॉस कहती हैं कि यह बदलती खतरे की परिस्थिति से निपटने की तैयारी है. वह कहती हैं कि क्लाउड और मोबाइल कंप्यूटिंग में वृद्धि ने ख़तरे को और बढ़ा दिया है. अब पहले के मुकाबले ज़्यादा जटिल हमलों की कोशिशें की जा रही हैं. वह कहती हैं अब सवाल यह नहीं है कि क्या हमला होगा बल्कि यह है कि यह कब होगा. उनके अनुसार एक विभिन्न तरह के कौशल वाला वैश्विक विश्वविद्यालय नेटवर्क एक वैश्विक समस्या का स्वाभाविक समाधान है. साइबर-सुरक्षा में प्रशिक्षित विद्यार्थी एक अनवरत जारी रहने वाली जंग में शामिल होंगे. विवेरॉस कहती हैं कि ऑनलाइन प्रोडक्ट के लॉंच होने से पहले ही उन्हें हैक करने की कोशिश होती है. और तो और भूकंप चक्रवात जैसी आपदाओं के लिए राहत कोषों को भी हैकरों से ख़तरा है. इस प्रोजेक्ट में भाग ले रहे विश्वविद्यालयों में से एक दक्षिण कैरोलीना विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर मार्क हैरिस कहते हैं कि साइबर-सुरक्षा कोर्सों में छात्रों की रुचि काफ़ी बढ़ी है इसलिए भी क्योंकि इसमें नौकरी मिलने की काफ़ी ज़्यादा गुंजाइश रहती है. डॉक्टर हैरिस कहते हैं कि विश्वविद्यालयों के लिए तेजी से हो रहे बदलावों के साथ रफ़्तार बनाए रखना आसान नहीं है. वह कहते हैं इस विषय पर छपने वाली किताबें छपने से पहले ही पुरानी पड़ जाती हैं. आईबीएम की हालिया निगरानी रिपोर्ट के अनुसार साइबर हमलों के मौजूदा स्तर को देखते हुए विश्वविद्यालयों को खुद भी थोड़ी ज़्यादा सुरक्षा बरतनी चाहिए. हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय की वेबसाइट को सीरियन इलेक्ट्रॉनिक आर्मी ने हैक कर लिया था. इसके अनुसार शिक्षा पर ख़तरा रिटेल उपभोक्ता सामान और टेलीकम्युनिकेशन्स के मुकाबले ज़्यदा है. शिक्षा से ज़्यादा ख़तरा सिर्फ़ सरकारों कंप्यूटर सेवाओं वित्तीय संस्थानों और मीडिया फ़र्मों पर है. अगर उन पर हमला होता है तो इससे बहुत ज़्यादा संख्या में लोग प्रभावित होते हैं. पिछले महीने मैरीलैंड विश्वविद्यालय पर एक परिष्कृत साइबर-हमला हुआ था जिसमें 287000 वर्तमान और पुराने विद्यार्थियों के रिकॉर्ड में सेंध मारी गई थी. यह एक समानांतर छाया संसार है जिसमें हल्का सा वैज्ञानिक साहित्य जैसा अनदेखा ख़तरा भी है. इसिलए आईबीएम के पास नवीनतम ख़तरों की निगरानी के लिए अपनी एक्स फ़ोर्स है. एक्स फ़ोर्स की ताज़ा त्रैमासिक रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल ईमेल क्रेडिट कार्ड पासवर्ड जैसे 50 करोड़ निजी रिकॉर्ड्स लीक हो गए थे. सबसे ताज़ा चलन है मालवर्टाइज़िंग जिसमें ऑनलाइन विज्ञापनो को कंप्यूटर पर ख़तरनाक हमलों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके अलावा स्पीयर फ़िशिंग भी है जिसमें ख़ास लोगों या संगठनों से गोपनीय जानकारी हासिल करने के लिए उन्हें निशाना बनाकर फर्जी ईमेल भेजी जाती हैं. रिपोर्ट के अनुसार 20 में से एक हमले में तथाकथित वॉटरिंग होल रणनीति का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें संस्थान के नेटवर्क में सीधे सेंध लगाने के बजाय ऐसी वेबसाइट्स को निशाना बनाया जाता है जिन्हें लोग नियमित रूप से देखते हैं. इसका उद्देश्य यह होता है कि कंप्यूटर को वायरस से दूषित किया जाए और इससे अनजान यूज़र उस वायरस को अपने नेटवर्क में ले आता है. दक्षिण कैरोलिना विश्वविद्यालय के डॉक्टर हैरिस कहते हैं कि साइबर हमलावर इससे भी ज़्यादा जटिल खतरे पैदा कर रहे हैं. वह कहते हैं मैंने देखा है कि कैसे वह परिष्कृत होते जा रहे हैं. वह महीनों एक रणनीति पर काम करते हैं बाहरी वेबसाइटों के ज़रिए कमज़ोर कड़ियां ढूंढते हैं और पिछले दरवाज़े की तलाश करते हैं. आईबीएम की विवेरॉस कहती हैं यह एक दौड़ की तरह है. सिस्टम बेहतर होता है फिर हैकर्स इसे समझते हैं और इसे पकड़ने की कोशिश करते हैं. एक समस्या होने के चलते यह चलता रहेगा. |
| DATE: 2014-03-28 |
| LABEL: science |
| [38] TITLE: अंतरिक्ष से भेजे गए सुपरहिट ट्वीट का राज़ |
| CONTENT: क्रिस हैडफ़ील्ड 20 वर्षों से अंतरिक्ष यात्री हैं लेकिन उनके पिछले अंतरिक्ष मिशन ने उन्हें वो शोहरत दी जो इससे पहले उन्हें कभी नहीं मिली थी. अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र आईएसएस से किए गए उनके ट्वीट ने क़रीब 10 लाख लोगों को आकर्षित किया. और जब उन्होंने अंतरिक्ष की विलक्षणता के बारे में डेवी बोवी के गीत को गिटार के साथ गाया तो यह इंटरनेट पर चर्चा का विषय बन गया. इस गाने के संपादित हिस्से को यू ट्यूब पर जब दो करोड़ लोगों ने देखा तो हैडफ़ील्ड को महसूस हुआ कि कला और विज्ञान अब हमदम बन चुके हैं. हाल ही में वैंकुवर में हुए टेड टेक्नोलॉजी एंटरटेंमेंट एंड डिज़ाइन कांफ्रेंस में हैडफ़ील्ड प्रमुख वक्ताओं में से एक थे. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने जानकारी दी कि धरती की तरह ही आईएसएस पर भी ब्राडबैंड कनेक्शन की गति धीमी है. उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष केंद्र में इंटरनेट हासिल करना बेहद जटिल काम है. पहले आपको एक टेलीफ़ोन लाइन लेनी होती है तब जाकर एक अदद वायरलेस नेटवर्क मिल पाता है. उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष यात्रियों को प्रतिदिन केवल कुछ घंटे ही इंटरनेट की सुविधा मिलती है. वे इसके मार्फत पृथ्वी पर रहे अपने परिजनों की तस्वीरें ज़्यादा साझा करते हैं. उन्होंने बताया कि यह थोड़ा सुस्त है और ज़्यादा भरोसेमंद भी नहीं है. अंतरिक्ष केंद्र पर इंटनेट की सुविधा का पहला उद्देश्य अंतरिक्ष यात्रियों को भावनात्मक संबल प्रदान करना है. हालांकि तक़रीबन छह महीने तक के लिए लगातार अपने परिवार से अलग होने वाले यात्रियों के लिए वीडियो क्रांफ्रेंसिंग की भी सुविधा है. लेकिन संचार क्रांति ने कनेक्टिविटी का ऐसा दरवाजा खोला है जो इससे पहले नहीं देखा गया. हैडफ़ील्ड बताते हैं कि अंतरिक्ष में जाने से पहले से वो ट्वीटर का इस्तेमाल करते रहे हैं और नासा ने केंद्र को और अधिक जीवंत बनाने के लिए बहुत कुछ किया है. वे कहते हैं हमारे पास पहले से बेहतर कनेक्टिविटी है और यह ट्विटर के लिए पर्याप्त है. इसने पूरे आकाश में संचार के लिए पर्याप्त माध्यम उपलब्ध कराया है. अपने तीन अंतरिक्ष मिशन में हैडफ़ील्ड ने पृथ्वी के करीब 2600 बार चक्कर लगाए हैं. वो बताते हैं कि अंतरिक्ष से पृथ्वी बेहद खूबसूरत दिखाई देती है. |
| DATE: 2014-03-28 |
| LABEL: science |
| [39] TITLE: 'सफ़ेद कोट' और ब्लड प्रेशर में है गहरा रिश्ता |
| CONTENT: शोधकर्ताओं का दावा है कि जब डॉक्टर रक्तचाप मापते हैं तो वह ज़्यादा आता है जबकि जब नर्स माप लेती हैं वह ठीक आता है. कुछ मामलों में तो यह माप इतनी अधिक होती है कि मरीज को तुरंत इलाज कराने का परामर्श देना ज़रूरी लगने लगे. एक्जीटर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का मत है कि ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि जब भी मरीज चिकित्सक के पास जाता है उसकी बेचैनी बढ़ जाती है. इसे सफेद कोट का प्रभाव भी कहा जाता है. यह शोधपत्र बीजेजीपी डॉट ओआरजी वेबसाइट पर प्रकाशित किया गया है. शोधकर्ताओं ने क़रीब 1000 मरीजों का अध्ययन किया जिनका रक्तचाप चिकित्सकों और नर्सों द्वारा एक ही समय जांचा गया था. इस शोध के अगुवा डॉक्टर क्रिस्टोफर क्लार्क ने कहा कि अध्ययन के नतीजों से पता चलता है कि रक्तचाप की जांच में चिकित्सक संभवतः सबसे उपयुक्त नहीं साबित होते हैं. उन्होंने कहा चिकित्सकों को रुटीन चेकअप के दौरान मरीजों का रक्तचाप जांचना ही चाहिए लेकिन जहां चिकित्सकीय परामर्श की ज़रूरत हो वहां उन्हें इसे नर्स पर छोड़ देना चाहिए. उन्होंने कहा रीडिंग में जो अंतर हमें मिला वो मरीज को दवाएं देने के लिए पर्याप्त आधार मुहैया कराता है और अनावश्यक इलाज से दुष्प्रभाव का ख़तरा हो सकता है. रक्तचाप दिन में कई बार ऊपर नीचे होता रहता है. जांच में एक बार उच्च रक्तचाप पाए जाने का मतलब यह नहीं कि आप बीमार हैं. चिकित्सक से मिलने पर तनाव और बेचैनी भी आपके रक्तचाप को बढ़ा सकता है. सटीक माप के लिए चिकित्सकों द्वारा मरीजों को टेस्टिंग किट दिए जाने का प्रचलन बढ़ रहा है ताकि वे घर पर भी किसी समय रक्तचाप की जांच कर सकें. हालांकि उच्च रक्तचाप की जांच करना भविष्य में संभावित हृदयाघात जैसी बीमारियों के ख़तरे को कम करने के लिए ज़रूरी होता है. ब्लड प्रेशर यूके से जुड़ीं कैथरीन जेनर का कहना है कि रक्तचाप की जांच घर और क्लीनिक दोनों जगह की जानी चाहिए. |
| DATE: 2014-03-26 |
| LABEL: science |
| [40] TITLE: जितनी सक्रिय मां, उतना बच्चा |
| CONTENT: मां जितनी सक्रिय होगी उसका बच्चा भी शारीरिक रूप से उतना ही सक्रिय होगा. यह तथ्य ब्रिटेन में 500 महिलाओं और उनके चार साल के बच्चों पर किए गए अध्ययन के बाद सामने आया है. इसमें कहा गया है कि बहुत सी मांओं के व्यायाम करने का स्तर प्रस्तावित स्तर से बहुत कम है. कैंब्रिज और साउथंपटन विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं ने शोध के लिए सात दिन तक दिल की गति को मापा. पीडियाट्रिक्स जनरल में छपे इस शोध में कहा गया है कि बच्चों की सेहत सुधारने के लिए बनी नीतियों को मांओं पर केंद्रित होना चाहिए. इस शोधपत्र के अनुसार बच्चे प्राकृतिक रूप से सक्रिय नहीं होते. अभिभावकों की यह महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी होती है कि वे जीवन की शुरुआत में ही बच्चों में व्यायाम करने की आदत विकसित करें. इस शोध के तहत साउथंपटन के 554 चार साल के बच्चों और उनकी मांओं ने एक हफ़्ते तक अपनी छातियों पर एक एक्सेलोमीटर और हार्ट-रेट मॉनीटर पहना. शोध में शामिल प्रतिभागी इसे लगातार पहने रहे-सोते वक़्त और पानी में खेलते वक़्त भी. वर्तमान में लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में इंस्टीट्यूट ऑफ़ चाइल्ड हेल्थकेयर में रिसर्च एसोसिएट कैथरीन हेसकेथ ने शोध का सह-नेतृत्व किया था. वह कहती हैं कि मां और बच्चों से मिले आंकड़े मां और बच्चों की शारीरिक गतिविधियों के बीच सीधा और सकारात्मक संबंध दिखाते हैं. मां जितनी ज़्यादा सक्रिय रहती है उतना ही ज़्यादा बच्चा भी. हालांकि इस शोध से यह जानना संभव नहीं था कि क्या सक्रिय बच्चे अपनी मां को अपने पीछे भागने पर मजबूर कर रहे हैं. यह हो सकता है कि दोनों में से एक की सक्रियता दूसरे को प्रभावित करती हो. वह कहती हैं कि जब भी कोई मां किसी हल्के या भारी काम में लगती है तो उसके बच्चे के उसी स्तर के काम में 10% ज़्यादा जुटने की संभावना रहती है. तो अगर कोई मां रोज़ एक घंटा ज़्यादा सक्रिय रहती है तो उसका बच्चा 10 मिनट ज़्यादा सक्रिय रह सकता है. यह फ़र्क़ बहुत मामूली लग सकता है पर एक महीने या एक साल में यह उल्लेखनीय हो जाता है. मां की सक्रियता पर उसके काम करने या न करने के तथ्य को देखा गया तो यह भी देखा गया कि बच्चे के भाई-बहन हैं या नहीं. शोध के सह-लेखक कैंब्रिज विश्वविद्यालय के सेंटर फ़ॉर डाइट एंड एक्टिविटी रिसर्च के डॉक्टर एस्थेर वान स्लुइज्स थे. वह कहते हैं मां और बच्चे के बीच गतिविधियों के स्तर का संबंध उन मांओं में मज़बूत होता है जिन्होंने 16 साल की उम्र में स्कूल छोड़ दिया है बनिस्बत उनके जिन्होंने 18 साल की उम्र में स्कूल छोड़ा है. शोध में माना गया है कि एक बार मां बनने के बाद महिलाओं की गतिविधियों का स्तर कम हो जाता है और सामान्यतः यह पुराने स्तर पर नहीं आ पाता. सक्रियता की यह कमी अक्सर उनके छोटे बच्चे को प्रभावित करती है. हेस्केथ कहती हैं नए मां-बाप की प्राथमिकता में कई चीज़ें होती हैं और सक्रिय रहना कई बार उनकी सूची में सबसे ऊपर नहीं होता. हालांकि मातृत्व संबंधी गतिविधियों में थोड़ी बढ़ोत्तरी भी मां और बच्चों के लिए फ़ायदेमंद हो सकती है. सिर्फ़ हर रोज़ चलने और घूमने से भी कुछ फ़ायदे मिल सकते हैं. पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड में बच्चों युवाओं और परिवारों की निदेशक डॉक्टर एन हॉस्किन्स कहती हैं संस्थान परिवारों की शारीरिक गतिविधियां बढ़ाने और बच्चों से पूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर बनाने को प्रतिबद्ध है. स्कूल जाने से पहले की शुरुआती उम्र में खेलों में सक्रियता समन्वय स्किल को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. अभिभावकों और शिशुओं के तैरने बगी फ़िट और बच्चों के जिम जैसे मौक़े मांओं को सामाजिक रूप से सक्रिय होने और अपने बच्चे के विकास में मदद करते हैं. उनका चेंजफ़ॉरलाइफ़ अभियान परिवारों को अच्छा खाने ज़्यादा घूमने और लंबी ज़िंदगी के लिए प्रेरित करता है. बच्चों के लिए इसका अर्थ है कि वह एक घंटे तक सक्रिय रहें और वयस्कों के लिए हफ़्ते में ढाई घंटे. |
| DATE: 2014-03-26 |
| LABEL: science |
| [41] TITLE: वायु प्रदूषण से साल भर में 70 लाख मौतें |
| CONTENT: विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकलन के अनुसार साल 2012 में वायु प्रदूषण के कारण करीब 70 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है. संगठन का ये भी कहना है कि वायु प्रदूषण का ह्रदय रोग सांस संबंधी बीमारियों और कैंसर के साथ गहरा नाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ का कहना है विश्व भर में होने वाली आठ मौतों में से एक मौत वायु प्रदूषण के कारण होती है. पर्यावरण से जुड़ा सेहत संबंधी ये दुनिया का अकेला सबसे बड़ा ख़तरा है. डब्ल्यूएचओ ने अपने अध्ययन में पाया कि दक्षिण-पूर्वी एशिया और विश्व स्वास्थ्य संगठन के पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र के इलाक़े में ख़राब आबोहवा से करीब 60 लाख मौतें हुई हैं. इसके अलावा डब्ल्यूएचओ का यह भी कहना है कि इन इलाक़ों में जो कम तथा मध्यम आय वाले देश हैं वहां घर के भीतर होने वाले वायु प्रदूषण से 33 लाख लोग तथा घर के बाहर पाए जाने वायु प्रदूषण से करीब 26 लाख लोगों की मौत हुई है. डब्ल्यूएचओ के सार्वजनिक स्वास्थ्य पर्यावरण और सामाजिक निर्धारक के स्वास्थ्य विभाग के निदेशक डॉक्टर मारिया का कहना है पहले की तुलना में वायु प्रदूषण से सेहत को ख़ासकर ह्रदय रोग और दिल के दौरे के मामले में होने वाला ख़तरा काफ़ी बढ़ गया है. वे कहते हैं ये तथ्य इस बात की ओर संकेत करते हैं कि हम जिस हवा में सांस लेते हैं उसे स्वच्छ रखने की सख़्त ज़रूरत है. डब्ल्यूएचओ का कहना है कि यदि वायु प्रदूषण को कम किया जाए तो लाखों जिंदगियों को बचाया जा सकता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के परिवार महिला बच्चों के सेहत से जुड़े सहायक महानिदेशक डॉक्टर फ्लाविया बस्टेरियो का कहना है बच्चों महिलाओं और बुज़ुर्गों को घर के भीतर पाए जाने वाले वायु प्रदूषण का भारी खामियाजा भुगतना पड़ता है क्योंकि उनका अधिकांश समय घर के भीतर बीतता है. |
| DATE: 2014-03-25 |
| LABEL: science |
| [42] TITLE: इंसानों के लिए वरदान, कुत्तों की बीमारियां? |
| CONTENT: ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर ओसीडी एक मानसिक बीमारी है. यह इंसानों और कुत्तों दोनों में एक जैसे लक्षणों के साथ पाई जाती है. इससे ग्रस्त व्यक्ति एक ही काम बार-बार करता है. पीड़ित व्यक्ति में जहाँ बार-बार हाथ धोने जैसे लक्षण मौजूद होते हैं वहीं कुत्तों में बार-बार अपनी पूंछ का या अपनी परछाईं का पीछा करने जैसे लक्षण देखे गए हैं. कुत्तों में पाया जाने वाला ओसीडी उन सैकड़ों बीमारियों में एक है जो इंसानों में भी उसी रूप में मिलती हैं. इंसानों में पाई जाने वाली कुछ अन्य बीमारियां जो कुत्तों में भी होती हैं वो हैं मिर्गी निद्रारोग रक्तस्राव रोग मांसपेशियों के विकास में विकार रेटिना संबंधी विकार. कुत्तों और इंसानों में एक जैसी बीमारियों का होना इंसानों में वंशानुगत बीमारियों की हमारी समझ बढ़ाने और नए उपचारों के लिए रास्ता साफ़ करने में सहायक हो सकता है. हाल के अध्ययनों में उस जीन की पहचान की गई है जो कुत्तों में इन लक्षणों के ज़िम्मेदार है. उपसाला विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर कर्सटिन लिंडब्लै़ड तोह ने कहा इंसानों की तुलना में कुत्तों में बीमारी के लिए उत्तरदायी जीन को खोजना आसान है. इसका कारण यह है कि मनुष्य सैकड़ों सालों से कुत्तों का प्रजनन कराता आ रहा है. विशिष्ट विशेषताओं वाले पिल्लों के लिए कुत्तों के प्रजनन के कारण बीमारी के लिए उत्तरदायी जीन एक ख़ास तरह की नस्ल में व्यापक रूप से पाई जाती है. इससे साबित होता है कि एक नस्ल के कुत्ते आनुवांशिक रूप से समान होते हैं. प्रोफ़ेसर लिंडब्लै़ड और उनके सहयोगियों ने जीनोम बॉयलॉजी में हाल ही में एक अध्ययन प्रकाशित किया है जिसमें ओसीडी से जुड़ी चार जीन के बारे में बताया गया है. फिलहाल वे इन जीनों के इंसानों पर असर के बारे में अध्ययन कर रहे हैं. यह पहले से मालूम है कि वातावरण का जीन पर प्रभाव पड़ सकता है और इसलिए मानव रोग के लिए उत्तरदायी कोई भी जीन और वातावरण का पारस्परिक प्रभाव कुत्तों को भी प्रभावित कर सकता है. अभी तक जीन संबंधी किसी भी अध्ययन के लिए शोधकर्ता चूहों के इस्तेमाल पर ही भरोसा करते रहे हैं. मगर चूहों पर होने वाले अध्ययनों का दायरा सीमित है. चूहों की तुलना में कुत्ते जैसी जटिल संरचना वाले जानवर इंसानों की वंशानुगत बीमारी समझने में मदद कर सकते हैं. शारीरिक रोगों की जांच के लिए कुत्ते के उपयोग ने पहले से ही हमारी समझ में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. उदाहरण के लिए कुत्तों में ऊंघने की आनुवंशिक आधार की पहचान ने मस्तिष्क में नए अनजान रास्ते को खोज निकाला जबकि अन्य अध्ययनों ने हीमोफ़ीलिया के लिए एक नई जीन थेरेपी का विकास किया. विशेषज्ञों की राय है कि पशु चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली दवाएं मानव चिकित्सा के अध्ययन के लिए हो सकती है. इन दोनों क्षेत्रों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी की पहचान की जा रही है और शोधकर्ताओं द्वारा स्वास्थ्य समस्याओं को हल करने के लिए चिकित्सा और पशु चिकित्सा को साथ लाने की पहल की जा रही है. |
| DATE: 2014-03-25 |
| LABEL: science |
| [43] TITLE: एक तिहाई महिलाओं को स्तन कैंसर का ख़तरा |
| CONTENT: एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि लगभग एक तिहाई महिलाओं को स्तन कैंसर का ख़तरा है और उन्हें तीन साल में एक से अधिक बार ज़रूर अपनी जाँच करानी चाहिए. साल 2009 और 2013 के बीच 53467 महिलाओं पर किए गए अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया है. वैज्ञानिकों ने इनमें से 14593 महिलाओं में स्तन कैंसर का औसत से अधिक जोखिम पाया है. वे उम्मीद करते हैं इस अध्ययन से महिलाओं में जागरूकता आएगी और वे अपनी जीवनशैली में बदलाव लाएंगी जिससे स्तन कैंसर के मामले कम करने में मदद मिलेगी. अध्ययन में कहा गया है कि औसत से अधिक जोखिम का मतलब है कि ऐसे मामलों में अगले दस साल में स्तन कैंसर होने की 3-5 संभावना है. अभी 50 से 70 साल की महिलाओं को तीन साल में एक बार मैमोग्राम की सलाह दी जाती है ताकि शुरूआती चरण में ही कैंसर का पता चल पाए और उपचार के असरदार होने की संभावना बढ़ जाए. प्रमुख शोधकर्ता मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर गैरेथ इवांस ने कहा रोकथाम न केवल महिलाओं को कैंसर की तकलीफ़ से बचाएगा बल्कि उपचार पर होने वाले अधिक ख़र्च से भी बचाएगा. वैज्ञानिकों ने परिवार के इतिहास जीवन शैली के रूप में जोखिम कारकों का आकलन और लार से आनुवंशिक जानकारी एकत्र कर स्तन कैंसर के किसी मरीज़ में विकसित होने की आशंका का आकलन किया. उन्होंने मैमोग्राम और दृश्य आकलन के ज़रिए स्तन ऊतक घनत्व को भी मापा जो स्तन कैंसर होने का किसी मरीज़ में संकेत होता है. जीवन शैली में नियमित व्यायाम वज़न कम करना और शराब का सेवन कम करना जैसे कुछ बदलाव लाकर भी 30 फ़ीसद तक स्तन कैंसर का जोखिम कम किया जा सकता है. प्रोफ़ेसर इवांस ने कहा यह बदलाव महिलाओं की किस्मत को उनके ही हाथों में सौंपेगा. स्तन कैंसर जांच की प्रभावशीलता के संबंध में एक स्वतंत्र समीक्षा 2012 में प्रकाशित हुई थी जिसमें अधिक उपचार की अवधारणा पर काफ़ी बहस हुई है. अधिक उपचार तब होता है जब सही तरीक़े से स्क्रीनिंग के बाद ट्यूमर पाया जाता है लेकिन जो नुक़सानदायक नहीं होता है. इसकी वज़ह से महिलाओं को शल्य चिकित्सा हार्मोन चिकित्सा रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी के रूप में अनावश्यक उपचार से गुजरना पड़ सकता है और अक्सर इसके काफ़ी साइड इफ़ेक्ट होते हैं. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के प्रोफ़ेसर माइकल मारमोट ने कहा इस मामले में इस अध्ययन से मदद मिल सकती है. उन्होंने कहा कि जिन महिलाओं में स्तन कैंसर का ख़तरा ज़्यादा होता है उनमें बीमारी के गंभीर लक्षण दिखने की संभावना होती है तब वैसी हालत में उपचार की प्रासंगिकता ज़्यादा होती है. लेकिन उन्होंने कहा कैंसर के विकास में स्क्रीनिंग के एक या दो साल के अंतराल के महत्व का आकलन ज़रूरी है. |
| DATE: 2014-03-24 |
| LABEL: science |
| [44] TITLE: भटके नहीं, लौट के अजगर घर को आए |
| CONTENT: बर्मा में पाए जाने वाले अजगरों को अपने घर से इतना लगाव होता है कि घर से दूर ले जाकर छोड़ दिए जाने के बावजूद वे वापस आ जाते हैं. ये बात एक शोध में सामने आई है. शोध में पता चला है कि इनमें एक खास तरह का दिशासूचक कम्पास काम करता है जिससे घर से कई किलोमीटर दूर ले जाकर छोड़ दिए जाने के बावजूद वे वापस घर आ जाते हैं. उनकी इस क्षमता से वैज्ञानिक हैरान हैं. फ्लोरिडा में रहने वाले बर्मा के अजगरों को जब उनके ठिकानों से काफी दूर ले जाकर छोड़ा गया तो वे करीब 36 किलोमीटर की दूरी तय करके वापस अपनी जानी पहचानी जगह पर आ गए. इस प्रयोग के बारे में द रॉयल सोसायटी जर्नल बॉयलोजी लेटर्स में छपा है. बर्मा के अजगरों को दुनिया के सबसे लंबे साँपों में से एक माना जाता है. अब तक जो सबसे लंबा अजगर पकड़ा गया है उसकी लंबाई 5 मीटर या 17 फीट से लंबी और वजन 74 किलो था. ये अपने शिकार को शिकंजे में कस लेते हैं और तब तक नहीं छोड़ते जब तक कि उसका दम न घुट जाए. बर्मा का यह विशाल लेकिन शांत प्राणी पक्षियों और हिरण से लेकर मगरमच्छ तक को पूरा निगल जाता है. मूल रूप से दक्षिणपूर्वी एशिया के इलाकों में रहने को अभ्यस्त ये अजगर फ्लोरिडा के एवरग्लेड्स नेशनल पार्क में रखे गए हैं. यहां के नए वातावरण में इन्होंने खुद को बहुत अच्छे से ढाल लिया है. बर्मा के ये अजगर इस नेशनल पार्क में ऐसे रच बस गए हैं कि पार्क के बाकी स्तनपायी जानवरों की संख्या चौंका देने के हद तक घटने लगी है. ये जानने के लिए कि ये आक्रामक परभक्षी कैसे अपने मूल निवास से बाहर निकले और दुनिया में जगह-जगह फैल गए वैज्ञानिकों ने एक शोध करने की ठानी. शोधकर्ताओं ने 12 अजगरों को नेशनल पार्क से पकड़ा और उनमें जीपीएस रेडियोट्रांसमीटर फिट कर दिया. उनमें से आधे अजगरों को वहां छोड़ दिया गया जहां से पकड़ा गया था. लेकिन छह अजगरों को एवरग्लेड्स नेशनल पार्क से 21-36 किलोमीटर की दूरी पर ले जाकर छोड़ दिया गया. हवाई जहाज में बैठकर अजगरों के चलने की दिशा और गति का अध्ययन करने के लिए इनका पीछा किया गया. शोधकर्ता तब हैरान रह गए जब उन्होंने पाया कि ये सारे अजगर पार्क की दिशा में बढ़ रहे थे जहां वे रहते थे. छह में से पांच अजगर बिलकुल सही दिशा में तेजी से बढ़ते हुए पार्क के पांच किलोमीटर के दायरे में पहुंच गए. उत्तरी केरोलिना के डेविड्सन कॉलेज के प्रमुख लेखक शानन पिट्मैन बताते हैं हम सब दंग रह गए. उन्होंने कहा हमें उम्मीद थी कि अजगर जहां छोड़े गए वहीं नया घर बनाएंगे लेकिन वे तो वापस उस दिशा में जाने लगे जहां से उन्हें पकड़ा गया था. यह इस बात का प्रमाण है कि बर्मा के अजगर अपने घर वापस लौटने में सक्षम हैं. इस प्रयोग से यह साबित होता है कि इन साँपों में नक्शे और कम्पास जैसी कोई चीज होती है जिससे उन्हें पता चल जाता है कि किस दिशा में और कितनी दूर जाना है. दिशाओं की इतनी सटीक समझ साँप की किसी और प्रजाति में नहीं दिखाई देती है. पिट्मैन ने बीबीसी को बताया दूसरे साँपों में दिशाओं की ऐसी समझ नहीं होती जितनी अजगर में होती है. हमें अभी इससे संबंधित और शोध करने की जरूरत है. पहले किए गए कुछ शोध में इस बात का पता चला था कि समुद्री क्रेट्स और गेटिस जैसे छोटे साँप घर से थोड़ी दूर छोड़ दिए जाने पर वापस अपनी जगह आ जाते थे लेकिन ज्यादा दूर छोड़े जाने पर वे भटक गए. |
| DATE: 2014-03-24 |
| LABEL: science |
| [45] TITLE: सौर ऊर्जा से फैल रही कंप्यूटर शिक्षा की रोशनी |
| CONTENT: कंप्यूटर चालू करना मुश्किल काम नहीं है बशर्ते आपके पास बिजली उपलब्ध हो. इसी आधारभूत कमी से युगांडा के ज़्यादातर ग्रामीण इलाके जूझ रहे हैं जहां तक न सीधी बिजली पहुंचती है और न ही ऊर्जा का कोई और विश्वसनीय स्रोत है. इसके चलते इन स्कूलों के बच्चे आधुनिक तकनीक के बारे में सीखने से वंचित रह जाते हैं. तो एक ओर जहां शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक पर गंभीर चर्चाएं हो रही हैं और वैश्विक दौड़ में बने रहने की बात हो रही है वहीं उप-सहारा अफ़्रीका में बच्चे इसके प्राथमिक ढांचे के अंदर भी नहीं आ पाते. लेकिन युगांडा के ग्रामीण स्कूलों में चलाई जा रही एक परियोजना सीधे समस्या के समाधान की कोशिश कर रही है. इस परियोजना के तहत विषुवत रेखा पर उपलब्ध प्रचुर मात्रा में सूर्य की रोशनी का इस्तेमाल कर छोटे सौर पैनलों के ज़रिए मोबाइल क्लासरूमों को बिजली उपलब्ध करवाई जा रही है. शिक्षा के लिए काम करने वाली एक धर्मार्थ संस्था मेएनडेलेओ फ़ाउंडेशन इस परियोजना को चला रही है. एक मजबूत जीप धूल भरे टेढ़े-मेढ़े गड्ढों से होती हुई दूरदराज स्थित स्कूलों तक पहुंचती है इसकी छत पर सौर पैनल रगे होते हैं. कच्चे रास्ते से होकर जीप जब स्कूल तक पहुंचती है तो अचानक एक क्लासरूम उभर आता है. इसमें टेंट हैं कुर्सियां और डेस्क हैं और एक क्लास लायक पर्याप्त लैपटॉप हैं. इसे सोलर पैनल से ऊर्जा मिलती है जो विद्यार्थियो को कई घंटे तक पढ़ाने के लिए पर्याप्त होती है. फ़ाउंडेशन के पास दो जीप हैं जो हफ़्ते में बारी-बारी से पांच स्कूलों में जाती हैं और 2000 विद्यार्थियों तक कंप्यूटर पहुंचाती हैं. मध्य युगांडा में मुकोनो के पास युगांडा प्राइमरी स्कूल के केट्यूम चर्च के पास जब यह जीप पहुंचती है तो यह बाहरी दुनिया के दूत सरीखी लगती है. ऐसा नहीं है कि शिक्षक या विद्यार्थियों को तकनीक के बारे में कुछ पता नहीं है लेकिन इस परियोजना के बगैर वह कंप्यूटर को छू नहीं सकते. जैसे ही लैपटॉप को सौर-चालित बैट्रियों से जोड़ा जाता है बच्चे कीबोर्ड पर हाथ चलाने लगते हैं और गेम्स सीखने लगते हैं जैसे कि दुनिया की किसी भी और जगह में होता है. बस फ़र्क यह है कि यह एक खुला हुआ क्लासरूम है और एक गर्म पत्थर पर बैठा हरा गिरगिट उन्हें काम करते हुए देख रहा है. इस परियोजना के एक प्रशिक्षक जॉन वालुसिम्बी कहते हैं कि ग्रामीण युवाओं के लिए भविष्य में नौकरी की गुंजाइश के लिए यह कंप्यूटर शिक्षा ज़रूरी है. वह कहते हैं अगर बच्चों के पास यह कौशल होगा तो वह पीछे नहीं छूटेंगे. हालांकि युगांडा में लैपटॉप टैबलेट कंप्यूटर और इंटरनेट महंगे हैं इसलिए वह कहते हैं कि मोबाइल फ़ोन्स की तरह वह भी सस्ते हो सकते हैं. और जब ऐसा होगा और इन बच्चों ने अगर कंप्यूटर को छुआ तक नहीं होगा तो इन्हें काफ़ी नुक्सान होगा. स्कूल की एक शिक्षक जुडिथ नन्क्या कहते हैं इस समाज में यह हुनर बहुत दुर्लभ है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सस्ती ऊर्जा की पहुंच युगांडा में बहुत कम स्कूलों तक क्यों है. सौर पैनलों को स्थाई रूप से लगाने और दुरुस्त रखना भी कुछ स्कूलों के लिए बहुत महंगा पड़ता है. और जब इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड से कनेक्शन लेने की बात हो तो यह और भी अविश्वसनीय हो जाता है. युगांडा में साल भर सूरज की रोशनी रहती है और बादलों वाले दिन में भी सौर ऊर्जा मिलती है. इसलिए अब तक यही ऐसी चीज़ है जो कि विश्वसनीय है आत्म-निर्भर है और काम करती है. यह एक हरा-भरा शांत इलाका है और विक्टोरिया झील से कुछ ही दूरी पर स्थित है. लेकिन इनमें से बहुत से युवाओं को काम की तलाश में गांव छोड़कर शहरों की तरफ़ जाना होगा. मेएनडेलेओ फ़ाउंडेशन की सह संस्थापक एशिया कामुकामा कहती हैं कि ये बच्चे स्कूल छोड़कर काम करना शुरू कर देते हैं और उन्हें दुनिया भर के लोगों के साथ प्रतियोगिता करनी होगी. कामुकावा पिछले साल अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा पुरस्कारों डब्ल्यूआईएसई वर्ल्ड इनोवेशन समिट फॉर एजुकेशन शिखर सम्मेलन के फ़ाइनल में पहुंची थीं. वह कहती हैं इन मशीनों से पहले से परिचित हुए बिना वह घबराए हुए बोते हैं. उन्हें पता नहीं होता कि शुरू कहां से करना है. हम अगली पीढ़ी को यह सिखा रहे हैं कि कंप्यूटर का इस्तेमाल कैसे करना है. वह कहती हैं कि यह बात सिर्फ़ स्कूलों के बारे में नहीं है. तकनीक और इंटरनेट स्थानीय समुदाय के लिए स्वास्थ्य और शैक्षिक सेवा को बेहतर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. फ़ाउंडेशन किसानों को उनकी स्थानीय भाषा में ऑनलाइन कृषि संबंधी जानकारी उपलब्ध करवाने पर भी काम कर रहा है. उसकी कोशिश सूचना प्रदान करने और कुशलता बढ़ाने की है. इस अभियान को एक गैर-लाभकारी संगठन इलेक्ट्रॉनिक इंफ़ॉर्मेशन फ़ॉर लाइब्रेरीज़ भी सहायता कर रहा है. यह संगठन विकासशील देशों में डिजिटल सूचनाएं उपलब्ध करवाता है. युगांडा के सामने आश्चर्यजनक रफ़्तार से बढ़ती जनसंख्या को हुनरमंद बनाने की बड़ी भारी चुनौती है. साल 1962 में जब देख को आज़ादी मिली जब इसकी जनसंख्या 80 लाख थी. 2012 में यह चार गुने से ज़्यादा बढ़कर 3-40 करोड़ हो गई थी और जनसंख्या वृद्धि की वर्तमान रफ़्तार को देखते हुए लगता है कि यह 2050 में चार गुना बढ़कर 13 करोड़ तक पहुंच जाएगी. इतने सारे बच्चे करेंगे क्या. आज चार में से सिर्फ़ एक को ही सेकेंडरी स्कूल में जगह मिल पाती है. देश की राजधानी कंपाला में पहले ही बड़ी संख्या में कामचलाऊ झोपड़ियों में युवा परिवारों भीड़ जमा हो गई है जो जीविकोपार्जन के लिए संघर्ष कर रहे हैं. देश में अब भी 18 साल से कम उम्र के युवाओं की संख्या वयस्कों से ज़्यादा है. और अगर दस लाख और लोग बिना शिक्षा या हुनर के इस भीड़ में शामिल हो जाते हैं तो यह राजनीतिक स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकते हैं. |
| DATE: 2014-03-23 |
| LABEL: science |
| [46] TITLE: भारत में बन रहा है एशिया का सबसे बड़ा संरक्षित वन क्षेत्र |
| CONTENT: कर्नाटक सरकार द्वारा अलग थलग पड़े संरक्षित वनों को एक दूसरे से जोड़ने की कोशिश एशिया के सबसे बड़े संरक्षित वन क्षेत्र में तब्दील हो सकती है. 2012 में जब कर्नाटक ने क़रीब 2600 वर्ग किलोमीटर में फैले वन क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया तभी से नेशनल पार्कों बाघ संरक्षित क्षेत्रों और अभ्यारण्यों को जोड़ा जा रहा है. यह संरक्षित क्षेत्र भारत के कुल भू-क्षेत्र का पांच प्रतिशत है और ऐसे कड़े क़ानूनों के अंतर्गत आता है जो भूमि के इस्तेमाल को बदलने की प्रक्रिया को मुश्किल बनाते हैं. नेशनल पार्कों और टाइग़र रिज़र्व्स में मानव बस्तियों की इजाज़त नहीं है. कर्नाटक ने पहले ही तीन संरक्षित वन क्षेत्र बनाए हैं जो 10 लाख हेक्टेयर में वेस्टर्न घाट के समानांतर फैले हैं. भारत के पश्चिमी समुद्र तट की ओर स्थित पर्वत शृंखला के पास के क्षेत्र को वेस्टर्न घाट कहा जाता है. यूनेस्को ने इसे वैश्विक विरासत घोषित कर रखा है और यह दुनिया के आठ सबसे महत्वपूर्ण जैव विविधता वाले क्षेत्रों में से एक है. दक्षिणी कर्नाटक में बनरघाटा-नागरहोल क्षेत्र को संरक्षित बनाए जाने के साथ ही 7050 वर्ग किलोमीटर का विशाल भूभाग एकमुश्त संरक्षित वन क्षेत्र बन जाएगा. इस भूभाग में केरल और तमिलनाडु से सटे हुए संरक्षित वन क्षेत्र भी आते हैं. क़रीब 1716 वर्ग किलोमीटर में फैला मध्य कर्नाटक का कुद्रेमुख-आघानाशिनी भूभाग इसमें मिलाया जा चुका है. उत्तर में आंशी-भीमघाद का भूभाग कर्नाटक और गोवा में स्थित 2242 वर्ग किलोमीटर के वन क्षेत्र से जोड़ा जा चुका है. विशेषज्ञ कहते हैं कि वन संरक्षरण के लिए विरल मानव बसाहट एक बड़ा ख़तरा है. सतत् वन क्षेत्र स्थानीय स्तर पर जीवों के लुप्त प्राय होने की संभावना को कम करता है. एक दूसरे से जुड़े हुए वन क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के कारण स्थान बदलने वाले वन्य जीवों को अनुकूलन और उत्तरजीविता का बेहतर मौका देते हैं. हालांकि भारत सरकार वेस्टर्न घाट को बचाने के बारे में विशेषज्ञ समूह के सुझावों से लगातार पीछे हट रही है लेकिन कर्नाटक ने अपने बूते ही इस गुप्त जैविक खजाने को बचाने का उपक्रम किया है. लेकिन यह आसान नहीं है क्योंकि स्थानीय लोगों को लगता है कि वन संरक्षण के क़ानूनों से उनके मूल अधिकार छिन जाएंगे. विस्तारीकरण की इस योजना को शुरू करन वाले वन अधिकारी बीके सिंह बताते हैं कि शुरू से ही यह स्पष्ट कर दिया गया था लोगों के सभी अधिकार यथावत् रहेंगे. कर्नाटक के मुख्य वन संरक्षक विनय लूथरा कहते हैं संरक्षित वन क्षेत्र में उन्हीं इलाकों को शामिल किया गया है जहां स्थानीय निवासियों के अधिकारों का मामला हल कर लिया गया है. हालांकि इन इलाकों में भी हमने अपने फैसलों को लोगों पर नहीं थोपा है. 2011 में इस योजना का खाका बनाने वाली टीम के सदस्य रहे पूर्व वन अधिकारी एमएच स्वामीनाथ कहते हैं इस विस्तारीकरण के दौरान हमने एक भी गांव को विस्थापित नहीं किया. उन्होंने बताया कि इस योजना का मकसद जैव विविधता के धनी वनों और मुख्य वन्य जीव क्षेत्रों को भारी उद्योग खनन और बांधों के निर्माण से सुरक्षा प्रदान करना था. बीके सिंह का कहना है कि विस्तारित संरक्षित इलाकों में मौजूद गांव वन संरक्षण के लिए कोई गंभीर ख़तरा नहीं हैं. इस योजना को कर्नाटक के वन अधिकारियों ने जुलाई 2011 में मंजूर किया था. जनवरी 2012 में भारत सरकार के नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ से भी मंजूरी मिल गई और एक महीने के अंदर विस्तार की पहली योजना बांदीपुर टाइगर रिजर्व पर लागू की गई. वन्य जीव वैज्ञानिक संजय गुब्बी कहते हैं तब से लेकर अब तक तीन नेशनल पार्कों और पांच अभ्यारण्यों में लगभग 1700 वर्ग किलोमीटर का इलाका शामिल किया जा चुका है. इसके अलावा एक नए अभ्यारण्य के रूप में 906 वर्ग किलोमीटर का इलाका भी अधिसूचित किया गया है. वो बताते हैं कि इस विस्तार के अलावा यह इलाका 15 नदियों को भी अपने में समेटे हुए है. बीके सिंह का कहना है कि कुछ निहित स्वार्थों के चलते लोगों को बरगलाए जाने की कोशिश हुई. हालांकि महज दो साल में ही एक बहुत बड़े इलाके को जोड़ा गया लेकिन अभी भी बेंगलुरु और गोवा के बीच कुछ मुख्य कड़ियों को जोड़ा जाना बाकी है. उदाहरण के लिए पुष्पगिरी अभ्यारण्य में भारी संख्या में मौजूद छोटी विद्युत परियोजनाएं एलिफेंट कॉरिडोर के लिए ख़तरा हैं और प्रकृतिक जल प्रवाह को बर्बाद कर कर रही हैं. अप्रैल 2013 में कर्नाटक सरकार ने हाईकोर्ट को सूचित किया था कि वेस्टर्न घाट इलाके में छोटी जल विद्युत परियोजनाओं की इजाजत नहीं दी जाएगी और चल रही दो परियोजनाओं के अनुबंध को रद्द कर दिया था. लेकिन अभी भी बेंगलुरु-गोवा के बीच विशाल वन क्षेत्र को जोड़ना बाकी है जो फिलहाल तो सपना बना हुआ है. यहां दो छोटे संरक्षित वन क्षेत्र हैं. मध्य और उत्तरी कर्नाटक में अघानाशिनी और बेदथी. गुब्बी का कहना है कि मध्य और दक्षिणी कर्नाटक के भूभाग को कर्नाटक तमिलनाडु और केरल में 15000 वर्ग किलोमीटर में फैले संरक्षित वन क्षेत्र से जोड़ा जाना संभव है जोकि अपने आप में और संभवतया एशिया का सबसे बड़ा संरक्षित इलाका होगा. |
| DATE: 2014-03-23 |
| LABEL: science |
| [47] TITLE: कान के मैल से जुड़ी पांच अहम बातें |
| CONTENT: कान का मैल कुछ उन शारीरिक पदार्थों में से एक है जिसकी चर्चा करना अमूमन हम पसंद नहीं करते हैं. शरीर के अन्य स्रावों की तरह हम में से ज़्यादातर अकेले में इससे निपटना पसंद करते हैं. तब भी कई लोगों के लिए यह एक आकर्षण का विषय है. पहले इसका इस्तेमाल एक लिप बाम और ज़ख़्मों पर मरहम के तौर पर किया जाता था लेकिन यह इससे कुछ ज़्यादा कर सकता है. हाल के शोध से पता चलता है कि यह शरीर में प्रदूषक पदार्थ इकट्ठा होने का संकेत देता है और इससे शरीर में कुछ बीमारियों का भी पता लगाया जा सकता है. कान के मैल से जुड़ी पाँच चीजें जो शायद आप ना जानते हो. कान के अंदर की कोशिकाएँ विशेष तरह की होती है. वे एक जगह से दूसरे जगह तक जाती है. लंदन के रॉयल नेशनल अस्पताल में गला नाक और कान के प्रोफेसर शकील सईद के मुताबिक़ आप कान में स्याही की एक बूंद डाल कर देखिए कुछ हफ़्तों के बाद पाएंगे कि कोशिकाओं के साथ ये बाहर आ रही है. यदि ऐसा नहीं होता है तो कान का छेद प्राकृतिक प्रक्रिया से बनी मृत कोशिकाओं से भर जाएगा. इसी तरह से कान का मैल भी आगे बढ़ता है. ऐसा माना जाता है कि खाने-पीने के दौरान जबड़े के हिलने से भी ये मैल बाहर आता है. प्रोफेसर सईद ने पाया है कि उम्र बढ़ने के साथ कभी-कभी यह मैल ज़्यादा काला हो जाता है और जिन लोगों के कान में बाल ज़्यादा होते हैं उनके कान से मैल बाहर नहीं आ पाता है. कान के मैल में मोम होता है लेकिन यह मूल रूप से मृत केराटिनोसाइट्स कोशिकाओं का बना होता है. कान का मैल कई पदार्थों का मिश्रण होता है. करीब 1000 से 2000 के बीच ग्रंथियां एंटी-माइक्रोबियल पेप्टाइड बनाती हैं. बालों की कोशिकाओं के करीब मौजूद वसा की ग्रंथियां मिश्रित एल्कोहल स्कुआलीन नाम का तेल कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड बनाती हैं. महिलाओं और पुरूषों में कान का मैल एक समान मात्रा में बनता है लेकिन एक अध्ययन से पता चला है कि ट्राइग्लिसराइड की मात्रा नंवबर से जुलाई के बीच कम हो जाती है. कान के मैल में लाइसोज़ाइम भी पाया जाता है जो एक एंटी-बैक्टिरियल एंज़ाइम है. अमरीका के फिलाडेल्फिया के मोनेल संस्थान के वैज्ञानिकों के मुताब़िक एशियाई और गैर एशियाई लोगों के कान में अलग-अलग तरह का मैल होता है. क्रोमोज़ोम 16 कान के मैल के गीले या सूखा होने के लिए जिम्मेदार है. जीन एबीसीसी 11 में एक छोटा सा परिवर्तन कान के मैल के सूखा होने और चीनी जापानी और कोरियाई व्यक्तियों के शरीर के कम दुर्गंध युक्त होने से संबंधित है. अमरीकी अध्ययन में पूर्वी एशियाई और गोरे पुरुषों के समूहों में कान के मैल में 12 वाष्पशील कार्बनिक यौगिक पाए गए हैं. कान को साफ़ करने के लिए किसी सिरींज के बदले नन्हा वैक्युम क्लीनर बेहतर है. प्रोफेसर सईद सिरीज से बेहतर वैक्युम क्लीनर को मानते हुए कहते है अगर आप पानी का इस्तेमाल करते हैं तो उसे मैल से आगे जाना होगा और मैल लेकर वापस आना होगा. अगर कोई अंतर नहीं होगा तो ये मैल से आगे नहीं जा सकेगा और इस पर ज़्यादा ताकत भी नहीं लगाई जानी चाहिए. कान के पर्दे को सिरींज करने पर यूं तो नुकसान नहीं पहुंचता लेकिन ऐसा कभी-कभी होता है. कान के मैल में कई अन्य शारीरिक स्राव की तरह कुछ भारी धातुओं के रूप में कुछ विषाक्त पदार्थ हो सकते हैं. लेकिन एक तो यह ऐसी चीज़ देखने के लिए एक अजीब जगह है और दूसरी बात ये कि एक साधारण रक्त परीक्षण से ज़्यादा विश्वसनीय नहीं है. कुछ दुर्लभ चयापचय संबंधी विकार कान के मैल को प्रभावित करने वाले होते हैं. |
| DATE: 2014-03-21 |
| LABEL: science |
| [48] TITLE: ज़िंदगियां बदलने वाला 'बायोनिक मैन' |
| CONTENT: जब नृत्य अध्यापिका एड्रियान हैसल डेविस ने टेड टेक्नोलॉजी एंटरटेनमेंट एंड डिज़ाइन के मंच पर अपना नृत्य पेश किया तो प्रशंसा में लोगों ने खड़े होकर तालियां बजाईं. हैसल की नृत्य प्रतिभा की वजह से नहीं बल्कि उनकी उपस्थिति की वजह से उनको यह सराहना मिली. बोस्टन बम विस्फोट के बाद उन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से किसी मंच पर नृत्य पेश किया. बोस्टन मैराथन के दौरान हुए दर्दनाक हादसे के बाद वो फिर से नृत्य के सपने देखती थीं. उनका सपना सच होना तब शुरू हुआ जब उनकी मुलाक़ात हग हेर से हुई. हेर मैसाच्यूसेट्स इंस्टीच्यूट में टेक्नोलॉजी मीडिया लैब से जुड़े हुए बायोमेकैट्रॉनिक्स शोध समूह के मुखिया हैं. उन्होंने वास्तविक अंगों से भी बेहतरीन कृत्रिम अंग बनाने में अपनी ज़िंदगी के कई वर्ष लगाए हैं. एक समय अमरीका के सबसे सफ़ल पर्वतारोहियों में से एक रहे डॉक्टर हेर साल 1982 में माउंट वॉशिंगटन पर चढ़ाई के समय अपना रास्ता भूल गए और अपने साथी के साथ तीन दिन तक भटकते रहे. हालांकि उन्हें बचा लिया गया लेकिन अत्यधिक ठंड के कारण उन्हें दोनों पैरों से महरूम होना पड़ा जबकि उनके साथी का एक पैर काटना पड़ा. वैंकुवर में टेड कांफ्रेंस के दौरान वो जिस आत्मविश्वास के साथ मंच पर उतरे उससे कोई इस बारे में अंदाज़ा नहीं लगा सकता. वो कहते हैं मुझे कहीं से नहीं लगता कि मेरे शरीर में कोई कमी है. इसे मैं अन्य लोगों और खुद की अक्षमता को खत्म करने की प्रेरणा के रूप में देखता हूं. उन्होंने पर्वतारोहण के लिए एक विशेष अंग को विकसित किया और अपने प्रिय खेल में पहले से भी और मज़बूत व बेहतर वापसी की. धातु लकड़ी और रबर के बाद वो अब बायोनिक अंग बनाने लगे हैं. उनकी प्रयोगशाला ने बायोम्स नाम का एक ऐसा कृत्रिम पैर बनाया है जो शरीर की मांसपेशियों पर भरोसा करने की बजाए असली मांसपेशियों की तरह काम करता है. यह अंग सिंथेटिक त्वचा से जुड़ा होता है जो असली त्वचा की तरह काम करती है. अंग को नियंत्रित करने वाले चिप कृत्रिम अंग में लगे रहते हैं. हैसल डेविस के लिए बनाए गए कृत्रिम अंग के लिए एमआईटी की टीम ने नर्तकों को प्रयोगशाला में आमंत्रित किया ताकि जाना जा सके कि नृत्य के समय मांसपेशियां कैसे काम करती हैं. असल में कृत्रिम अंग बड़ी संख्या में लोगों के जीवन को बदल रहे हैं. नाइजेल ऑकलैंड का हाथ एक औद्योगिक दुर्घटना का शिकार हो गया छह महीने के इलाज और दर्द से निजात पाने के लिए अंततः उन्हें इसे कटवाना पड़ा. जब 2012 में उन्हें टर्मिनेटर आर्म लगाया गया. उस समय बीबायोनिक द्वारा तैयार यह कृत्रिम अंग सबसे आधुनिक था. यह जीवन बदल देने वाला साबित हुआ क्योंकि इससे वे अपने जूते के फीते भी बांध सकते थे. वो कहते हैं जब मैं सड़क से नीचे उतरता हूं तो लोग मेरी आंखों में देखते हैं. एक रोबोटिक हाथ उत्सुकता पैदा करता है लेकिन कोई भी इस पर हंसता नहीं है. पिछले साल अमांडा बॉक्सटेल 3डी प्रिंटर से बने कृत्रिम अंगों एक्सो स्केलेटन पर चलने वाली पहली महिला बनीं. वो इस घड़ी का तब से इंतज़ार कर रही थीं जब साल 1992 में स्कीईंग के दौरान हुई एक दुर्घटना में वो लकवे का शिकार हो गई थीं. एक्सो स्केलेटन बाहरी कंकाल बनाने के लिए उन्होंने एक्सोबायोनिक्स और 3 डी सिस्टम के साथ काम किया. वो इसे दूसरी त्वचा कहती हैं. एक मायने में ये लोग बहुत भाग्यशाली हैं. दुनिया भर में दो करोड़ ऐसे लोग हैं जिनके अंग किसी न किसी कारणवश काटने पड़े लेकिन वे कृत्रिम अंगों से महरूम हैं. डॉक्टर हेर एक प्रस्ताव लेकर अगले हफ़्ते अमरीकी अधिकारियों से मिलने वाले हैं ताकि अमरीका में मरीज़ों को बायोनिक अंग उपलब्ध कराने के लिए उन्हें सहमत किया जा सके. वो कहते हैं हर व्यक्ति को अधिकार मिलना चाहिए कि वो अक्षमता से रहित जीवन जी सके. |
| DATE: 2014-03-21 |
| LABEL: science |
| [49] TITLE: सैचुरेटेड फैट' से जुड़ी सलाह 'स्पष्ट' नहीं |
| CONTENT: आमतौर पर सलाह दी जाती है कि यदि ह्रदय रोगों से दूर रहना है तो सैचुरेटेड फैट वाले भोजन की जगह पॉलीअनसेचुरेटेड फैट का सेवन करें. मगर एक नया शोध बताता है कि इस बात के पुख्ता प्रमाण नहीं है. ब्रिटिश हॉर्ट फाउंडेशन के शोधकर्ताओं ने पाया कि खाने में मक्खन की जगह सनफ्लावर स्प्रेड की अदला-बदली दिल की बीमारियों से जुड़े खतरों को कम नहीं करती. 600000 से ज्यादा प्रतिभागियों के साथ किए गए 72 शोधों के बाद ये नतीजा सामने आया है. ह्रदयरोग विशेषज्ञ हमेशा से कहते आए हैं कि बहुत सारा पनीर पाई और केक खाना सेहत के लिए हानिकारक होता है. विशेषज्ञों का मानना रहा है कि आप बहुत ज्यादा सैचुरेटेड फैट वाला भोजन ले रहे हैं तो सावधान रहिए इससे आपके रक्त में कॉलेस्ट्रोल की मात्रा बढ़ सकती है. यदि ऐसा हुआ तो कोरोनरी ह्रदयरोग का गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा. मक्खन बिस्किट मीट के वसायुक्त टुकड़े सॉसेज बैकन पनीर और क्रीम आदि में जो वसा पाई जाती है उसे संतृप्त वसा यानि सैचुरेटेड फैट कहते हैं. अधिकांश लोग इस तरह की चीजें बहुत ज्यादा मात्रा में खाते हैं. जबकि इसे खाते समय हमें खास ख्याल रखना चाहिए. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि पुरुषों को एक दिन में 30 ग्राम संतृप्त वसा और महिलाओं को एक दिन में 20 ग्राम संतृप्त वसा खाना चाहिए. पिछले कई दिनों से सेहत संबंधी अभियान जोर-शोर से चलाया गया कि कम संतृप्त वसा वाला खाना जैसे कि जैतून का तेल सनफ्लावर ऑयल और दूसरे गैरपशु वसा वाला भोजन अधिक लाभकारी होता है. मगर कैंब्रिज विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की अगुवाई में किए गए और अनल ऑफ इंटरनल मेडिसिन में छपे हुए शोध के मुताबिक इस बात का कोई सबूत नहीं है कि कम संतृप्त वसा वाला भोजन लाभकारी होता है. यह शोध कहता है कि पॉलीअनसेचुरेटेड फैट वाले भोजन के सेवन से भी दिल की बीमारियों से कोई बचाव नहीं होता. शोधकर्ताओं का कहना है कि ट्रांस वसा से भी गंभीर ह्रदयरोग का खतरा हो सकता है. इसलिए प्रसंस्कृत फूड आइटमों कृत्रिम मक्खन आदि में पाई जाने वाली इस तरह की कृत्रिम वसा का सेवन करने से बचना चाहिए. प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर राजीव चौधरी का कहना है आम तौर पर हम संतृप्त वसा वाले भोजन की जगह ढेर सारा कार्बोहाइड्रेट ले लेते हैं जैसे कि व्हाइट ब्रेड व्हाइट राइस पोटैटो आदि या प्रोसेस्सड फूड में रिफाइन चीनी और नमक का सेवन करते हैं. इन दोनों से बचना चाहिए. वे कहते हैं परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट चीनी नमक ये सब वैस्कुलर हेल्थ के लिए गंभीर रूप से खतरनाक है. फाउंडेशन कहता है कि इस खोज से उस हिदायत पर कोई असर नहीं पड़ता जिसमें कहा जाता है कि ज्यादा वसा वाला भोजन सेहत के लिए हानिकारक होता है. एसोसिएड मेडिकल डायरेक्टर प्रोफेसर जेरेमी पियरर्सन कहते हैं यह शोध ये नहीं कहता कि अब आप जितना चाहे उतना वसा वाला खाना खा सकते हो. बहुत ज्यादा वसा खतरनाक है आपके लिए. |
| DATE: 2014-03-19 |
| LABEL: science |
| [50] TITLE: क्या है रोबोट की लिखी पहली ख़बर? |
| CONTENT: अमरीकी अख़बार दि लॉस एंजलिस टाइम्स सोमवार को किसी रोबोट पत्रकार-लेखक की लिखी ख़बर प्रकाशित करने वाला पहला अख़बार बन गया. इस रोबोट ने भूकंप के बारे में ख़बर लिखी. पत्रकार और प्रोग्रामर केन श्वेन्के ने एक ऐसा प्रोग्राम विकसित किया है जो भूकंप आने की स्थिति में तुरंत स्वचालित रूप से एक छोटा लेख लिख देता है. श्वेन्के ने स्लेट पत्रिका से कहा यह ख़बर मात्र तीन मिनट में वेबसाइट पर प्रकाशित हो गई थी. उन्होंने कहा कि रोबो-जर्नलिज़्म दुनियाभर के न्यूज़रूम में बढ़ रहा है और दि एलए टाइम्स इस तकनीक का अगुआ है. दि लास एंजलिस टाइम्स यूएस जियोलॉजिकल सर्वे जैसे भरोसेमंद स्रोत से डाटा लेता है और पहले से बनाए गए लेख के टेम्पलेट में उसे पेश कर देता है. भूकंप से जुड़ी ख़बरों के अलावा यह प्रोग्राम शहर में होने वाली अपराध की ख़बरों को भी तैयार करता है. एक मानवीय संपादक इन ख़बरों में से चुनता है कि कौन सी ख़बर ज़्यादा महत्वपूर्ण है. दूसरे कई मीडिया संस्थानों में भी कम्प्यूटर प्रोग्राम से ख़बर लिखने की कोशिशें की हैं ख़ासकर खेल समाचारों के क्षेत्र में. श्वेन्के कहते हैं कि रोबोट की बनाई ख़बरें असली पत्रकारों की जगह नहीं लेंगी. ये रोबोट केवल उपलब्ध डाटा को जल्दी से जल्दी एकत्रित करने और फिर उसे प्रसारित करने में मदद करेंगे. उन्होंने कहा यह केवल एक सहायक के रूप में काम करेगा. वह कहते हैं यह काफ़ी समय बचाता है. कुछ ख़ास तरह की कहानियों के लिए यह उतनी ही अच्छी तरह से सूचनाएँ जुटाता है जैसे कि दुनिया में कोई और जुटाएगा. उन्होंने कहा मेरी नज़र में यह किसी की नौकरी नहीं लेगा बल्कि यह हर किसी की नौकरी को रुचिकर बनाएगा. |
| DATE: 2014-03-19 |
| LABEL: science |
| [51] TITLE: कुत्ते समझते हैं इंसान की भावनाएं |
| CONTENT: कुत्तों को प्यार करने वाले लोग अक्सर दावा करते रहे हैं कि उनके पालतू कुत्ते उन्हें समझते है. एक अध्ययन के हिसाब से वे सही हो सकते हैं. इस अध्ययन के सिलसिले में हंगरी में जब कुत्तों की एमआरआई स्कैनिंग की गई तो शोधकर्ताओं ने पाया कि कुत्तों का दिमाग किसी आवाज़ पर वैसी ही प्रतिक्रया देता है जैसे आदमी का दिमाग. भावनात्मक आवाज़ों जैसे रोने की आवाज़ हंसने की आवाज़ पर भी कुत्तों की वैसी ही प्रतिक्रिया होती है जैसे आदमी के दिमाग में. इसीलिए शायद मानवीय संवेदनाओं के साथ कुत्तों की तारतम्यता बैठ जाती है. यह शोध करंट बायलॉज़ी जर्नल में छपा है. बुडापेस्ट में हंगरी एकेडमी ऑफ साइंस के विश्वविद्यालय इटोवस लोरान्ड की प्रमुख लेखिका एटिला एंडिक्स ने कहा हम सोचते हैं कि कुत्तों और इंसानों की भावनात्मक प्रक्रिया की व्यवस्था एक ही तरह की है. 11 पालतू कुत्तों को इस अध्ययन में शामिल किया गया. इससे पहले उन्हें कुछ समय तक प्रशिक्षण भी दिया गया. डॉक्टर एंडिक्स ने कहा हमने सकारात्मक रणनीतियों का इस्तेमाल किया बहुत सारी प्रशंसा. तुलनात्मक अध्ययन के लिए 22 मनुष्यों के भी दिमाग़ की स्कैनिंग करके उन्हें समझने की कोशिश की गई. वैज्ञानिकों ने विभिन्न तरह की 200 तरह की आवाज़ों का इस्तेमाल इस अध्ययन में किया. इसमें कार सीटी और वातावरण की आवाज़ों समेत मानवीय आवाज़ों को भी शामिल किया गया था. शोधकर्ताओं ने पाया कि मनुष्यों और कुत्तों दोनों ही मामलों में मानवीय आवाज़ पर दिमाग़ का टेंपोरल पोल भाग सक्रिय हो जाता है. डॉक्टर एंडिक्स ने कहा हम जानते हैं कि मानव दिमाग़ में एक हिस्सा होता है जो मानवीय आवाज़ों पर किसी भी अन्य आवाज़ की तुलना में मज़बूत प्रतिक्रिया देता है. हमने इसी तरह की संरचना कुत्तों के दिमाग़ में भी पाई. हमने जो तथ्य पाया वह है कि इस तरह की संरचना सारे कुत्तों में मौजूद है मगर आश्चर्य यह है कि पहली बार इस संरचना को हमने गैर वानर प्रजाति में देखा. हालांकि कुत्तों की प्रतिक्रिया मानवीय आवाज़ पर थी लेकिन कुत्तों की आवाज़ पर उनकी प्रतिक्रिया ज़्यादा थी. मानवीय आवाज़ों की तुलना में वातावरण की आवाज़ों और शोर के बीच फ़र्क करना उनके लिए मुश्किल था. इस पर प्रतिक्रया देते हुए इंस्टीट्यूट ऑफ कॉग्नीटिव न्यूरोसाइंस लंदन की प्रोफ़ेसर सोफ़ी स्कॉट ने कहा वानर प्रजाति में इस तरह के गुण पाना आश्चर्यजनक नहीं है लेकिन कुत्तों में इसे देखना आश्चर्यजनक है. |
| DATE: 2014-03-18 |
| LABEL: science |
| [52] TITLE: चार अरब साल में सात किलोमीटर सिकुड़ चुका है बुध ग्रह |
| CONTENT: वैज्ञानिकों का कहना है कि चार अरब साल पहले जब बुध ग्रह की सतह सख्त हुई थी तब की तुलना में आज यह ग्रह सात किलोमीटर छोटा हो गया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रह की भीतरी सतह ठंडी होने के कारण सिकुड़ गई है और इस स्तर पर दरारें पड़ रही हैं. वैज्ञानिकों को इस बारे में पहली बार जानकारी तब मिली जब सत्तर के दशक के मध्य में मैरीनर 10 सैटेलाइट ग्रह के पास से गुज़री थी. लेकिन अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी मैसेंजर सैटेलाइट से मिली ताज़ा तस्वीरों के अध्ययन से वैज्ञानिकों को इस ग्रह के सिकुड़ने के बारे में नई जानकारी मिली हैं. वैज्ञानिक जर्नल नेचर जियोसाइंस की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि बुध ग्रह का सिकुड़ना पहले जितनी उम्मीद थी उससे कहीं ज़्यादा है. मैरीनर 10 मिशन साल 1974 और 1975 में बुध के पास से गुजरा था और उसने बुध के 45 प्रतिशत इलाक़े की तस्वीरें ली थीं . उन तस्वीरों से पता चल रहा था कि बुध की सतह पर दरारें हैं. यह दरारें सैकड़ों मील लंबी थी. मैरीनर 10 से ली गई तस्वीरों से अनुमान लगाया गया था कि इस ग्रह की त्रिज्या एक से तीन किलोमीटर कम हुई है . ये नतीजे उन परिणामों के उलट थे जो मॉडलिंग तकनीक से मिले थे. मॉडलिंग तकनीक के अनुसार बुध जैसे ठंडे होने वाले पिण्ड को चार अरब साल में इससे ज़्यादा सिकुड़ना चाहिए था. मैसेंजर ने बुध के 100 प्रतिशत सतह की तस्वीर लेकर वैज्ञानिकों की मुश्किल हल कर दी. मैसेंजर साल 2011 में बुध के पास से गुजरा और उसने 100 सतह की तस्वीरें लीं . इन तस्वीरों की समीक्षा के बाद बात यह बात सामने आई है कि यह ग्रह पहले जितना अनुमान था उसेस ज़्यादा सिकुड़ चुका है. वाशिंगटन के कारनेगी इंस्टीट्यूट के डॉक्टर पॉल बायरन ने बीबीसी को बताया ग्रह में पड़ी कुछ दरारें बहुत बड़ी हैं. ग्रह के दक्षिणी हिस्से में एक लंबी दरार पड़ी है जिसकी लंबाई 1000 किलोमीटर है. बुध का व्यास लगभग 4000 किलोमीटर है. मैसेंजर मिशन के बाद जापान और यूरोप भी बुध पर मिशन भेजने की तैयारी कर रहे हैं. ये मिशन अगले साल भेजे जाएंगे . |
| DATE: 2014-03-17 |
| LABEL: science |
| [53] TITLE: धरती के गर्भ में है महासागरों से ज़्यादा पानी |
| CONTENT: हीरे के अंदर संरक्षित खनिजों ने धरती के गर्भ में दबी चमकदार नीली चट्टानों के बारे में संकेत दिए हैं जिनमें इतना पानी हो सकता है जितना सारे महासागरों में है. मध्य-पश्चिम ब्राज़ील से मिले एक हीरे में ऐसे खनिज मौजूद हैं जो धरती से करीब 600 किलोमीटर अंदर बनते हैं और इनके अंदर पर्याप्त मात्रा में पानी मौजूद है. इस शोध को विज्ञान की पत्रिका नेचर में प्रकाशित किया गया है. इस शोध से यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि पत्थरों से पटे बहुत से ग्रहों की गहराई में पानी हो सकता है. बहुत गहरे ज्वालामुखी पहाड़ के फटने से जो चट्टान या पत्थर धरती की सतह पर आए और इनमें जो हीरे के टुकड़े मिले वो धरती की बड़ी ही दिलचस्प तस्वीर दिखाते हैं. कनाडा के अल्बर्टा विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर ग्राहम पीयरसन के नेतृत्व वाले शोध दल ने एक विस्तृत परियोजना के तहत दस करोड़ साल पुराने किंबरलाइट से निकले और ब्राज़ील के जुइना में मिले एक हीरे का अध्ययन किया. उन्होंने देखा कि इसमें रिंगवूडाइट नाम का एक खनिज है जो धरती के अंदर 410 से 660 किलोमीटर की गहराई में ही बन सकता है. इससे यह भी पता चला कि कुछ हीरे कितनी गहराई में तैयार होते हैं. इससे पहले रिंगवूडाइट सिर्फ़ उल्कापिडों में ही पाया गया था ऐसा पहली बार हुआ है कि धरती में रिंगवूडाइट पाया गया. इससे भी आश्चर्यजनक बात यह है कि इस खनिज का तक़रीबन एक फ़ीसद हिस्सा पानी है. हालांकि यह सुनने में बहुत कम लगता है लेकिन क्योंकि रिंगवूडाइट धरती की गहराई के बहुत बड़े हिस्से में पाया जाता है इसलिए इसका मतलब हुआ कि धरती के अंदर बहुत सारा पानी होगा. कैंब्रिज विश्वविद्यालय की डॉक्टर सैली गिबसन इस शोध में शामिल थीं. वह कहती हैं पानी का इतनी भारी मात्रा में पाया जाना हमारी धरती की सतह पर सबसे पहले पानी मिलने की अवधारणा में बेहद महत्वपूर्ण नई जानकारी है. यह अवलोकन हमारे ग्रह की गहराई में पानी जमा होने का पहला भौतिक सबूत तो है ही इसके साथ ही यह धरती के अंदरूनी हिस्से के सूखे तरल या कई हिस्सों में तरल होने के 25 साल पुराने विवाद पर भी विराम लगाता है. हीरे के इन नमूनों की व्याख्या करते हुए प्रोफ़ेसर पीयरसन कहते हैं ऐसा लगता है कि यह नरक तक जाकर वापस आया है जो इसमें मौजूद है. कोलोराडो विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर जोसेफ़ स्मिथ कई सालों से रिंगवूडाइट का अध्ययन कर रहे हैं और उनकी प्रयोगशाला में ऐसे कई खनिजों का अध्ययन किया गया है. वह कहते हैं मुझे यह अचंभित करने वाली बात लगती है इसका मतलब यह हुआ कि धरती के गर्भ में महासागरों से कई गुना ज़्यादा पानी जमा हो सकता है. इससे हमें यह भी पता चलता है कि हाइड्रोजन धरती का आधारभूत तत्व है और वो बाद में धूमकेतुओं से नहीं आया है. इस खोज के आधार पर कहा जा सकता है कि हाइड्रोजन धरती की अंदरूनी व्यवहार को वैसे ही नियंत्रित करता होगा जैसे कि वह सतह पर करता है. और धरती जैसे पानी वाले ग्रह हमारे सौरमंडल में और भी हो सकते हैं. यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि दूसरे चट्टानी ग्रहों में किस मात्रा में पानी हो जमा हो सकता है. प्रोफ़ेसर स्मिथ की प्रयोगशाला में भी इसी तरह के खनिज के कण है जो माइक्रोस्कोप से देखने पर चमकदार नीले नज़र आते हैं. रिंगवूडाइट के पानी धारण करने की क्षमता की खोज धरती की गहराई में इसकी प्रचुरता और इसके ख़ूबसूरत रंग को देखते हुए धरती को मिला नीले ग्रह का नाम और भी सार्थक हो जाता है. |
| DATE: 2014-03-17 |
| LABEL: science |
| [54] TITLE: गर्मी बढ़ने से बढ़ेंगे मच्छर और मलेरिया |
| CONTENT: जलवायु परिवर्तन के चलते लगातार तापमान बढ़ रहा है और इसी के साथ मलेरिया का खतरा भी बढ़ गया है. शोधकर्ताओं के मुताबिक़ तापमान बढ़ने के कारण मलेरिया के मरीज़ों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है. समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़ यूएस जर्नल साइंस में प्रकाशित एक अध्ययन में इथियोपिया और कोलंबिया के आंकड़ों के आधार पर बताया गया है कि दुनिया भर में मच्छरों से पैदा होने वाली बीमारियों में भारी बढ़ोतरी की आशंका है. एएफ़पी के मुताबिक़ इन बीमारियों के चलते 2012 के दौरान दुनिया भर में करीब सवा छह लाख लोग मारे गए थे. ब्रिटिश और अमरीकी शोधकर्ताओं ने साल 1990 से 2005 के दौरान पश्चिमी कोलंबिया के एंटिओक्लिया क्षेत्र में और 1993 से 2005 के दौरान सेंट्रल इथियोपिया में मलेरिया के मामलों का अध्ययन किया. अध्ययन के दौरान पता चला कि जो साल अधिक गर्म थे उनमें मलेरिया के मामले अधिक मिले जबकि कम गर्म सालों में मलेरिया के मामलों में गिरावट देखने को मिली. मिशिगन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक मर्सिडीज पॉस्कल ने बताया ये एकदम साफतौर से जलवायु परिवर्तन का असर है. उन्होंने बताया तापमान में बढ़ोतरी के साथ ही उष्णकटिबंधीय इलाकों में मलेरिया का जोखिम भी बढ़ जाता है. इससे पहले अमरीकी साइंस कांग्रेस में शोधकर्ताओं ने कीनिया में एक अध्ययन के आधार पर बताया था कि तापमान में आधा डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी से पिछले 30 साल की अवधि में मलेरिया के मामलों में आठ गुना वृद्धि हुई है. ऐसे में ताज़ा अध्ययन से इस बात की पुष्टि हुई है कि तापमान में वृद्धि और मलेरिया बीच संबंध हैं. शोध से संकेत मिलते हैं कि पूर्वी और मध्य अफ़्रीक़ा के पहाड़ी इलाक़ों में बीमारी में काफ़ी इज़ाफ़ा देखा जा सकता है. जो परंपरागत रुप से मच्छरों के पनपने की जगह माने जाते हैं. |
| DATE: 2014-03-17 |
| LABEL: science |
| [55] TITLE: तंदुरुस्ती के लिए सुस्ती से क्यूं न कर लें कुट्टी! |
| CONTENT: ब्रिटेन में हर 100 में से 30 लोग कसरत नहीं करते. ये जानकारी मिंटेल की ओर से आई है. लूसी टाउनसेंड पूछते हैं कि बिना कुछ खर्च किए कोई असुविधा या शर्मिंदगी उठाए यदि लोग फ़िट रहना चाहते हैं तो उन्हें क्या करना चाहिए. कसरत से दूर रहने वाले लोगों के लिए फ़िटनेस गुरु की तरफ से यहां पांच आसान व्यायाम बताए जा रहे हैं जिनकी मदद से वे फ़िट रह सकते हैं. फ़िट रहने के लिए सबसे आसान उपाय है ज़्यादा से ज़्यादा पैदल चलना और एलिवेटर की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल. दिन भर में सीढ़ियों से पांच दफ़ा उतरें और पांच दफ़ा चढ़ें. शारीरिक सक्रियता बढ़ाने के लिए कोई ज़रूरी नहीं कि जिम जाकर घंटों कसरत की जाए. फ़िटनेस गुरु रोज़मेरी कोनली की सलाह है कि यह काम घर में ही आसानी से किया जा सकता है. रोज़मेरी कहती हैं घर की सीढ़ियां चढ़ें और उतरें. इसमें न तो पैसे लगते हैं और न कोई परेशानी है. यह आसान है. इसमें ज्यादा वक़्त भी नहीं लगता और आपकी सांसें भी नहीं फूलती. दूसरी आसान तरक़ीब है एक और आसान व्यायाम. फर्श की ओर चेहरा कीजिए बाहें एल आकार में बांधिए पांव सीधे रखते हुए नितंब और शरीर को एक सीध में लाइए. फिर दंड लगाइए. बूटकैंप पाइलेट्स के प्रबंधक इलियट लेक के अनुसार वैसे तो कुछ लोग दंड लगाना पसंद नहीं करते पर शारीरिक सक्रियता बढ़ाने के लिए यह सबसे बेहतर कसरत मानी गई है. वे बताते हैं यदि इसे हफ़्ते में तीन बार 30 सेकेंड के लिए किया जाए तो इससे काफ़ी लाभ मिलेगा. इस कसरत में पेट पीठ नितंब कूल्हे सहित शरीर के निचले और ऊपरी हिस्से को जोड़ने वाली अंदरूनी मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं. इसके कई फ़ायदों में से निकले हुए पेट का अंदर जाना और शरीर के चलने-फिरने के ढंग में सुधार शामिल है. यही नहीं इससे रीढ़ की हड्डियों की मज़बूती भी बढ़ती है. तीसरा आसान उपाय कुछ अलग हटकर है. कोनली अपने ट्विटर अकाउंट से रोज़ 2000 जीएमटी बजे फ़िटनेस सेशन चलाती हैं. वे कहती हैं ये व्यायाम मुश्किल है. इसमें आपके पसीने भी छूट सकते हैं. इस व्यायाम में शारीरिक सक्रियता बढ़ाने के लिए कार धोना एक अच्छा विकल्प है. साथ ही बागवानी और लॉन की घास काटने में भी अच्छी-खासी ऊर्जा ख़र्च होती है. कोनली कहती हैं कि इन गतिविधियों के कई फ़ायदे हैं. ऐसे हल्के व्यायाम से दिल की धड़कन की गति दुरुस्त रहती है. एनएचएस हर हफ़्ते कम से कम 150 मिनट मध्यम गति के एरोबिक एक्सरसाइज़ करने की सलाह देता है. कसरत करने में आलस करने वालों के लिए चौथी कसरत कुछ दिलचस्प और बेहद आसान है. कोनली की तरक़ीबों में से यह एक और तरक़ीब है. वे कहती हैं इस व्यायाम के लिए पहले अपने सोफ़े के अगले हिस्से पर ठीक से बैठ जाएं. फिर अपना दायां पैर ऊपर उठाएं और हवा में पैर के अंगूठे से ए लिखिए. अब बायां पांव उठाएं और उससे भी वही प्रक्रिया दोहराएं. वे कहती हैं यह कसरत तो टीवी देखते-देखते भी आराम से की जा सकती है. अगर आप फ़िट रहना चाहते हैं और अपना वज़न कम करना चाहते हैं और इसके लिए समय नहीं है तो निराश मत हों. यह पांचवां और अंतिम उपाय अपनाएं. लागबोराह विश्विद्यालय में शारीरिक गतिविधि और सार्वजनिक स्वास्थ्य में वरिष्ठ व्याख्याता डॉक्टर लॉरेन शेरार कहते हैं नियमित समय पर उठना और टहलना फ़ायदेमंद होता है. डॉक्टर लॉरेन शेरार व्यायाम का तरीक़ा बताते हैं. अपने फ़ोन में कुछ निश्चित अंतराल का रिमाइंडर लगाएं. जब-जब अलार्म बजे पांच मिनट के लिए खड़े हों या टहलिए. शेरार इसके लिए आगाह करते हैं कि डॉक्टरों ने भी लंबे समय तक बैठने को हानिकारक बताया है. कहा गया है कि ज़्यादा वक़्त तक बैठने से लंबी उम्र नहीं होती. शेरार कहते हैं प्रत्येक 30 मिनट पर पांच मिनट के लिए खड़े होना सेहतमंद और फ़िट रहने का सबसे अच्छा और आसान व्यायाम है. |
| DATE: 2014-03-17 |
| LABEL: science |
| [56] TITLE: 'ग़ुस्सा आने के बाद के दो घंटे हो सकते हैं ख़तरनाक़' |
| CONTENT: कहीं आप गर्म मिज़ाज के तो नहीं यदि हां तो आपको दिल का दौरा पड़ने का ख़तरा ज़्यादा है. यह जानकारी एक शोध के ज़रिए सामने आई है. शोध में शामिल एक अमरीकी शोधकर्ता का कहना है कि दिल का दौरा आने के पहले अक्सर ये देखा गया है कि इंसान बेहद ग़ुस्से में होता है. इसलिए ग़ुस्सा दिल के दौरे का कारण हो सकता है. उन्होंने पता लगाया है कि ग़ुस्सा आने के बाद के अगले दो घंटे ख़तरनाक होते हैं क्योंकि इस समय दिल का दौरा आने का ख़तरा सबसे ज़्यादा होता है. साथ ही उनका ये भी मानना है कि ग़ुस्से और दिल के दौरे के बीच की कड़ी को समझने और इन जटिलताओं से बचने का रास्ता निकालने की दिशा में अभी काफ़ी काम किया जाना बाक़ी है. शोधकर्ताओं ने यूरोपीय पत्रिका हार्ट को बताया कि जिन लोगों के परिवार में ह्रदय रोग पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है उनमें पहले से ही दिल का दौरा पड़ने के ख़तरे ज़्यादा होते हैं. संबंधित शोध में हज़ारों लोगों पर किए गए नौ अध्ययन शामिल हैं. इस शोध के आंकड़े बताते हैं कि जिस वक़्त व्यक्ति को ग़ुस्सा आता है उसके बाद के दो घंटे दौरा पड़ने के लिहाज से क़रीब पांच गुना ज़्यादा और स्ट्रोक के लिहाज से तीन गुना से ज़्यादा ख़तरनाक होते हैं. हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं का मानना है कि एक बार ग़ुस्से का आना अपेक्षाकृत कम ख़तरनाक होता है. जिन लोगों को महीने में केवल एक बार ग़ुस्सा आता है उन्हें दिल के दौरे का ख़तरा कम होता है और जिन्हें महीने में पांच बार ग़ुस्सा आता है उनमें हार्ट अटैक का ख़तरा ज़्यादा होता है. उनका यह भी कहना है कि यह ख़तरा उन लोगों में और गंभीर होता है जिन्हें बात-बात पर ग़ुस्सा आता हो. डॉक्टर एलिजाबेथ मोसेतोफ्स्की और उनके सहयोगी बताते हैं कि एक दिन में पांच बार ग़ुस्सा आने की स्थिति में प्रति 10000 लोगों में क़रीब 158 बार ज़्यादा दिल का दौरा पड़ सकता है. यह ऐसे लोगों का आंकड़ा है जिनमें प्रति वर्ष कार्डियोवस्कुलर का ख़तरा कम होता है. वहीं जिन लोगों में कार्डियोवस्कुलर का ख़तरा ज़्यादा होता है उनमें प्रति 10000 लोगों में दिल का दौरा क़रीब 657 बार ज़्यादा पड़ सकता है. डॉक्टर मोसेतोफ्स्की ने कहा हालांकि एक बार के ग़ुस्से में गंभीर दिल का दौरा पड़ने के ख़तरे कम होते हैं लेकिन वैसे लोगों में यह ख़तरा बढ़ जाता है जिन्हें बार बार ग़ुस्सा आता है. वैसे यह स्पष्ट नहीं है कि ग़ुस्सा ख़तरनाक कैसे हो सकता है. शोधकर्ताओं ने यह साफ़ किया है कि उनका शोध अनिवार्य रूप से इस बात की ओर संकेत नहीं करता कि ग़ुस्सा दिल की बीमारियों और रक्त संचरण की समस्याओं को जन्म देता है. विशेषज्ञ जानते हैं कि पुराना तनाव और दबाव दिल के रोगों को बढ़ा सकता है ख़ासकर इसलिए क्योंकि इससे रक्त दाब बढ़ जाता है. मगर साथ ही इसलिए भी कि लोग तनाव को ग़लत तरीक़े से दूर करने की कोशिश करते हैं. जैसे कि तनाव कम करने के लिए वे बहुत ज्यादा धूम्रपान और शराब का सहारा लेने लगते हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे छुटकारा पाने के लिए योग जैसे तरीक़े अपनाए जा सकते हैं. ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन की ह्दय रोग से जुड़ी एक नर्स डोरियन मडॉक ने कहा यह स्पष्ट नहीं है कि इसका क्या कारण है. हो सकता है इसके पीछे मनोवैज्ञानिक बदलाव हों जिससे हमें ग़ुस्सा आता है. मगर इसके पीछे छिपी बॉयलॉजी जानने के लिए ज़्यादा शोध की ज़रूरत है. |
| DATE: 2014-03-16 |
| LABEL: science |
| [57] TITLE: संक्रामक रोग जैसी है फ़ेसबुक पर पोस्टिंग |
| CONTENT: एक अध्ययन में पाया गया है कि फ़ेसबुक पर सकारात्मक अपडेट छूत की बीमारी की तरह खुशियां फैलता है. एक अध्ययन के अनुसार इस लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग साइट पर भावनाएं व्यक्त करना संक्रामक है. अध्ययन में अमरीका में फ़ेसबुक के 10 करोड़ से भी ज़्यादा यूज़र्स के एक अरब से ज्यादा स्टेटस अपडेट का विश्लेषण किया गया. इसमें पाया गया कि सकारात्मक पोस्टों ने सकारात्मक जबकि नकारात्मक पोस्टों ने नकारात्मक पोस्टों में गुणात्मक वृद्धि की. लेकिन सकारात्मक पोस्ट ज्यादा प्रभावी या कहें ज्यादा संक्रामक रहीं. सैन डियागो के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता जेम्स फॉवलर ने कहा हमारा अध्ययन बताता है कि लोग अपने जैसे लोगों से न केवल जुड़ते हैं बल्कि वास्तव में वे अपने मित्र की भावनात्मक अभिव्यक्ति को भी प्रभावित करते हैं. उन्होंने कहा हमारे पास इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त आंकड़े हैं कि ऑनलाइन भावनात्मक अभिव्यक्तियां तेजी से फैलती हैं और नकारात्मक की बजाए सकारात्मक अभिव्यक्तियां ज्यादा तेजी से फैलती हैं. इस बात पर ढेर सारे वैज्ञानिक लेख उपलब्ध हैं कि कैसे सम्पर्क में आने पर लोगों में भावनाएं प्रसारित होती हैं न केवल करीबी दोस्तों में बल्कि अजनबियों के बीच भी. हालांकि ऑनलाइन सोशल नेटवर्किंग में भावनात्मक संक्रमण के बारे में अभी बहुत थोड़ी ही जानकारी उपलब्ध है. फॉवलर का कहना है कि फिर भी आज के दौर की आभासी सम्पर्क वाली दुनिया में इस बात को जानना महत्वपूर्ण है कि सोशल मीडिया के मार्फत क्या प्रसारित हो सकता है. शोधकर्ताओं ने जनवरी 2009 से मार्च 2012 के बीच 1180 से भी ज्यादा दिनों तक अमरीका के सबसे घनी आबादी वाले शीर्ष 100 शहरों में फ़ेसबुक पर होने वाले अंग्रेज़ी में स्टेट्स अपडेट का विश्लेषण किया. उन्होंने यूज़र्स के नाम या उनके द्वारा किए गए पोस्ट के शब्दों को नहीं देखा. शोधकर्ताओं ने भावनात्मक सामग्री जांचने के लिए ऑटोमेटड टेक्सट एनॉलिसिस करने वाले एक सॉफ्टवेयर प्रोग्राम का सहारा लिया जिसे लिंग्विस्टिक एन्क्वायरी वर्ल्ड काउंट कहते हैं. शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग किया. बारिश का मौसम जो कि पोस्ट की गति को विश्वनीय रूप से बढ़ा देता है में नकारात्मक पोस्टों की संख्या 1-16 प्रतिशत बढ़ी और नाकारात्मक पोस्टों 1-19 प्रतिशत घटीं. यह सुनिश्चित करने के लिए बारिश दोस्तों को सीधे तौर पर प्रभावित नहीं करती उन्होंने विश्लेषण के दायरे को उन दोस्तों तक सीमित कर दिया जो उन शहरों में ते जहां बारिश नहीं हो रही थी. अध्ययन में पता चला कि बारिश वाले शहर में रहने वाले दोस्तों की भावनात्मक अभिव्यक्ति ने बिना बारिश वाले शहरों में रहने वाले उनके दोस्तों की भावनाओं को प्रभावित किया. हर नकारात्मक पोस्ट पर औसतन 1-29 पोस्ट जबकि हर सकारात्मक पोस्ट पर औसतन 1-75 पोस्ट शेयर किए गए. इस अध्ययन को प्लोस वन जर्नल में प्रकाशित किया गया है. |
| DATE: 2014-03-13 |
| LABEL: science |
| [58] TITLE: 'प्यार के हार्मोन' के साइड इफ़ेक्ट |
| CONTENT: एक नए वैज्ञानिक शोध के अनुसार संभोग प्रसव और स्तनपान के दौरान शरीर में स्रावित होने वाला हार्मोन ऑक्सिटॉसिन भोजन को लेकर पैदा हुई अरुचि यानी एनॉरेक्सिया के इलाज में मददगार साबित हो सकता है. यह नतीजा ब्रिटेन और कोरिया के वैज्ञानिकों के अध्ययनों से सामने आया है. वैज्ञानिकों ने कहा है कि ऑक्सिटॉसिन की ख़ुराक लेने से भोजन और अपनी आत्मछवि के प्रति अरुचि होने की संभावना कम होती है. ऑस्ट्रेलिया में चार हफ़्तों तक हुए एक अध्ययन में पाया गया था कि जिन लोगों को ऑक्सिटॉसिन की ख़ुराक दी गई उनमें अपने वज़न और शरीर के आकार-प्रकार को लेकर चिंता में कमी आई. ऐसा ही एक हालिया शोध का परिणाम साइकोन्यूरोएंडोक्राइनोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुआ है. इस शोध में एनॉरेक्सिया से पीड़ित 31 लोगों और 33 स्वस्थ लोगों को वैज्ञानिकों ने कृत्रिम रूप से ऑक्सिटॉसिन की ख़ुराक दी थी. उसके बाद उन्हें अलग-अलग वजन और आकार-प्रकार के लोगों की तस्वीरें दिखाई गईं. शोध में पता चला कि एनॉरेक्सिया से पीड़ित लोग पहले उन लोगों की तस्वीर पर ज़्यादा ध्यान दे रहे थे जिनका वजन ज़्यादा था और शरीर बेढंगा था. लेकिन ऑक्सिटॉसिन की ख़ुराक लेने के बाद उनकी नकारात्मक तस्वीरों पर ध्यान देने की संभावना कम थी. प्लॉज़ वन जर्नल में प्रकाशित ऐसे ही एक अन्य शोध में इन्हीं लोगों पर किए गए शोध में चेहरे पर आने वाले भावों जैसे ग़ुस्सा घृणा और ख़ुशी पर इन लोगों की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया गया. ब्रिटेन में हर 150 में से एक किशोरी इस तरह की समस्या से परेशान है. इस दिशा में काम करने वाली संस्था बीट ने कहा है कि इस नई जानकारी से एनॉरेक्सिया का इलाज अभी दूर की कौड़ी है. ऑक्सिटॉसिन हार्मोन संभोग प्रसव और स्तनपान के दौरान प्राकृतिक रूप से शरीर में स्रावित होता है. इसके पहले कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि यह हार्मोन कई मनोवैज्ञानिक समस्याओं के इलाज में कारगर होता है. साथ ही इसे ऑटिज़्म से पीड़ित लोगों के उपचार में उपयोगी पाया गया है. इस शोध में कहा गया कि एनॉरेक्सिया का संबंध किसी चीज़ के प्रति अत्यधिक डर से हो सकता है. जानवरों पर किए गए शोध के अनुसार ऑक्सिटॉसिन की ख़ुराक देने से चेहरे पर आने वाले डरावने भाव के प्रति सजगता कम हो जाती है. ऑक्सिटॉसिन उपचार के बाद इन लोगों ने घृणा के भाव वाली तस्वीरों पर ध्यान देना कम कर दिया. इन लोगों के ग़ुस्से के भाव वाले चेहरे पर ध्यान देने की संभावना भी कम हो गई. प्रोफ़ेसर जैनेट ट्रेज़र लंदन के किंग्स कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग में काम करती हैं. ये दोनों अध्ययन उन्हीं की देखरेख में हुए हैं. वह कहती हैं अभी यह शोध अपने शुरुआती चरण में है. इसमें बहुत कम लोगों पर शोध किया गया है. लेकिन उपचार से होने वाले लाभ की संभावना काफ़ी उत्साहजनक है. हमें ज़्यादा बड़े स्तर पर परीक्षण की ज़रूरत है. इस शोध में जैनेट की सहयोगी रहीं प्रोफ़ेसर योउल-री किम दक्षिण कोरिया के इंजे विश्वविद्यालय में काम करती हैं. वह कहती हैं हमारा शोध दिखाता है कि ऑक्सिटॉसिन से एनॉरेक्सिया के मरीज़ों को लाभ पहुँचता है. वह कहती हैं फिलहाल एनॉरेक्सिया का प्रभावी औषधीय उपचार नहीं है. एनॉरेक्सिया से जुड़े मामलों पर काम करने वाली सामाजिक संस्था बीट से जुड़ी लियान्ने थॉर्नडाइक कहती हैं यह बीमारी काफ़ी जटिल है. अभी इस बीमारी के जैविक कारणों के बारे में ज़्यादा नहीं जानते हैं. हमें उम्मीद है कि इस शोध के बाद नए एवं प्रभावी उपचार की शुरुआत होगी. हालांकि अभी तो ये शुरुआत ही है. |
| DATE: 2014-03-13 |
| LABEL: science |
| [59] TITLE: 'मानवाधिकारों की तरह है इंटरनेट की आजादी' |
| CONTENT: कंप्यूटर माउस की एक क्लिक पर दुनिया भर को जोड़ने वाले वर्ल्ड वाइड वेब डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू के 25 साल पूरे होने के मौके पर इसके आविष्कारक ने यूजर्स के अधिकारों को बचाने के लिए एक मैग्ना कार्टा बिल जैसे किसी ऐतिहासिक समझौते की ज़रूरत पर जोर दिया है. सर टिम बर्नर्स-ली ने बीबीसी के कार्यक्रम ब्रेकफास्ट में कहा कि ये मसला मानवाधिकारों की तरह ही महत्वपूर्ण है. वो सरकारी निगरानी कार्यक्रम की भी खुली आलोचना करते रहे हैं. अमरीका की खूफिया सेवा में अधिकारी रहे एडवर्ड स्नोडेन ने अमरीकी सरकार के जासूसी कार्यक्रमों को लेकर कई रहस्य खोले थे. सर टिम ने लोगों ने कहा कि वो निगरानी का विरोध और कार्रवाई करें. उन्होंने बीबीसी को बताया कि इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोग इस समय एक चौराहे पर खड़े हैं. उन्होंने कहा ये हमारे लिए एक बड़ा निर्णय करने का वक्त है. हमारे सामने दो रास्ते हैं हम किस रास्ते पर जाने वाले हैं उन्होंने कहा क्या हम मूल्यों को स्थापित करने जा रहे हैं क्या हम वर्ल्ड वाइड वेब के लिए मैग्ना कार्टा जैसा कुछ बनाने जा रहे हैं और वास्तव में क्या हम कह सकते हैं कि अब ये इतना बहुत महत्वपूर्ण है इस हद तक हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है कि ये मानवाधिकारों जैसा हो गया हैसर टिम ने कहा इंटरनेट को तटस्थ माध्यम होना चाहिए ताकि कोई भी बिना किसी संदेह के उसका इस्तेमाल कर सके. उन्होंने कहा कि इसके यूजर्स को निगरानी के खिलाफ जागरुक होना चाहिए. उन्होंने कहा दुनिया भर के लोगों को लगातार जागरुक रहना चाहिए और ऐसा न हो इसके लिए लगातार कार्रवाई और विरोध करते रहना चाहिए. सर टिम इससे पहले निगरानी को लेकर चेतावनी दे चुके हैं कि इसके चलते वेब की लोकतांत्रिक प्रकृति खतरे में पड़ सकती हैं. उन्होंने एडवर्ड स्नोडेन के पक्ष में आवाज उठाते हुए कहा कि उनका कदम जनता के हित में था. सर टिम ने कहा कि वेब मानवता से जुड़ाव को दर्शाता है और ये अद्भुत होने के साथ ही जोखिम भरा भी हो सकता है. साथ ही उन्होंने जोड़ा मुझे उन लोगों के साथ बहुत अधिक सहानुभूति नहीं है जो कहते हैं कि वेब पर काफी कुछ बेकार की चीजें हैं. उन्होंने कहा अगर वहां काफी कुछ बेकार है अगर वो बेकार है तो उसे न पढ़िए. कुछ और पढ़िए. सर टिम की संस्था वर्ल्ड वाइड वेब फाउंडेशन ने वेब की 25वीं वर्षगांठ के मौके पर वेब वी वांट नाम से एक अभियान की शुरुआत की है. इस अभियान का मकसद इंटरनेट पर मानवाधिकारों की रक्षा करना है. |
| DATE: 2014-03-13 |
| LABEL: science |
| [60] TITLE: इंटरनेट: क्या था, क्या है और क्या होगा अभी |
| CONTENT: 12 मार्च 2014 को डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू यानी वर्ल्ड वाइड वेब को अस्तित्व में आए 25 साल पूरे हो गए हैं. वर्ल्ड वाइड वेब को बनाने का श्रेय सर टिम बर्नर्स ली को जाता है जिन्होंने इस अवधारणा को मूर्त रूप प्रदान किया. वर्ष 1983 में एक सर्वेक्षण के दौरान में उन लोगों से बात की गई थी जिन्होंने कंप्यूटर के ज़रिए किसी को संदेश भेजा था. इनमें से लगभग 50 प्रतिशत लोगों को यह तरीक़ा बहुत उपयोगी नहीं लगा था. इसके बाद से प्यू रिसर्च सेंटर उन आंकड़ों को जुटाता रहा है जो बताते हैं कि गुजरे दशकों में अमरीकी इस तकनीक को किस तरह देखते रहे हैं. आंकड़े बताते हैं कि 1983 में अमरीका में दस प्रतिशत लोगों के पास कंप्यूटर थे. लेकिन संदेश भेजने के लिए ज़्यादातर लोगों को यह तकनीक रास नहीं आई. फिर लोगों को कंप्यूटर के ज़रिए ख़रीदारी का अनुभव हुआ. सर्वेक्षण से पता चला था कि 1983 में कंप्यूटर का इस्तेमाल कर रहे दस में से सात लोग इससे ख़रीदारी करना सुविधाजनक पाते हैं. इस बारे में उन्होंने जो संदेश भेजा था वो यह था ऐसी बहुत सारी चीज़ें ख़रीदना बहुत आसान है जो परिवार के बजट में नहीं हैं. 1995 में प्यू रिसर्च सेंटर ने एक और सर्वेक्षण किया. इसमें पाया गया कि 42 प्रतिशत अमरीकियों ने इंटरनेट शब्द कभी सुना ही नहीं. लेकिन ज़्यादातर लोगों ने माना कि कंप्यूटर के बिना रहना उनके लिए बड़ा मुश्किल है. और फिर जब 2014 के आंकड़े देखे गए तो पता चला कि प्रत्येक दस में से एक व्यक्ति ऑनलाइन नहीं है. प्यू रिसर्च की मानें तो आज वर्ल्ड वाइड वेब ही वह नंबर एक तकनीक है जिसे लोग छोड़ना नहीं चाहते हैं. सर्वेक्षण में शामिल 67 प्रतिशत लोगों का मानना है कि संबंधों को मज़ूबत बनाने के लिए इंटरनेट अच्छा ज़रिया है. यह विचार दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों में एक समान पाया गया है जिनमें स्त्री-पुरुष बच्चे-बूढ़े अमीर-ग़रीब सभी तरह के लोग शामिल हैं. ज़्यादातर लोगों का कहना है कि उन्हें इंफोर्मेशन सुपरहाइवे पर सवारी करना मज़ेदार लगता है. |
| DATE: 2014-03-12 |
| LABEL: science |
| [61] TITLE: व्हेल के सपने और चमगादड़ की नींद |
| CONTENT: एक आम मनुष्य दिन में छह से आठ घंटे सोता है लेकिन क्या आप जानना चाहेंगे अलग अलग जानवर दिन में कितना समय सोने में बिताते हैं. न केवल सोना बल्कि कुछ जानवर सपने भी देखते हैं. मनुष्यों ने जानवरों के दिमाग पर और सोने की प्रवृत्ति पर अब तक कम ही जानकारी जुटाई है. पिछले दिनों कुछ विशेषज्ञों और फिल्ममेकरों ने मिलकर बीबीसी फोर के लिए एक डॉक्यूमेंट्री बनाई जिसका विषय ही जानवरों के सोने से जुड़ा हुआ था और इसमें जो जानकारियां निकल कर आईं वो अचंभित करने वाली थीं. जंगलों में पाए जाने वाले जानवर स्लॉथ के बारे में आम धारणा है कि वो हमेशा सोता रहता है और इसी से शायद अंग्रेज़ी में स्लाथ का अर्थ आलसी से है. लेकिन अब पता चला है कि स्लॉथ दिन में केवल नौ से दस घंटे ही सोते हैं. ऑस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले जानवर कोआला दिन में 14-5 घंटे आंखें बंद रखते हैं जबकि सबसे अधिक सोते हैं चमगादड़. जी हां. चमगादड़ दिन में 20 घंटे सोते हैं. सबसे कम नींद लेने वाले जानवरों में वो जानवर हैं जो चरते हैं. इसमें भी सबसे कम सोने वाले हैं ज़िराफ और हाथी जो केवल तीन या चार घंटे सोते हैं एक दिन में. शेर जैसे बड़े जानवर यूं तो दिखने में आलसी से लगते हैं और आम धारणा के अनुसार वो 20-22 घंटे सोते हैं जबकि ये सही नहीं है. बिल्लियों की तर्ज पर शेर भी छोटी छोटी नींदे लेते हैं. दक्षिण अफ्रीका में हुए शोध में पता चला है कि शेर दिन में केवल 14 घंटे ही सोते हैं. जानवर सोते हैं और कई सोते में सपने भी देखते हैं. व्हेल मछली इन्हीं में से एक है. जानवर जिसमें मनुष्य भी शामिल है उसकी नींद और सपने का पता आंखों की पुतलियों की गति से पता लगाया जा सकता है लेकिन व्हेल या किसी भी पानी में रहने वाले जीव की पुतलियां हमेशा गतिमान रहती हैं क्योंकि उन्हें पानी में रहना होता है. सेंट एंड्रयूज़ यूनिवर्सिटी के डॉक्टर पैट्रिक मिलर के नेतृत्व में एक दल ने व्हेल मछलियों के सोने पर शोध किया जिससे पता चला कि कुछ व्हेल अपना सर पानी से ऊपर रख कर आराम करते हैं और इस दौरान सोते हैं और सपने भी देखते हैं. एक और अवधारणा है कि समुद्री पक्षी अल्बटरॉस अपनी लंबी दूरी की उड़ानों में सो जाते हैं. ये पक्षी समुद्री के ऊपर घंटों उड़ते रह सकते हैं. हाल में किए गए शोध के मुताबिक ये पक्षी अपने पंखों की खास बनावट की वजह से घंटों हवा में रह सकते हैं लेकिन ऐसे में सोना संभव नहीं है. पक्षी विज्ञान के क्षेत्र में काम कर रहे मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के डॉक्टर नील्स रैटनबर्ग कहते हैं आसमान में लंबे समय तक उड़ते रहने में नींद की संभावना कम होती है बनिस्पत पानी के नज़दीक उड़ने में. शायद तभी रात के समय ये पक्षी पानी के नज़दीक घंटो उड़ते रहते हैं. कुछ और शोधों के अनुसार ये पक्षी अपनी उड़ान के दौरान बिल्कुल नहीं सोते है |
| DATE: 2014-03-12 |
| LABEL: science |
| [62] TITLE: अल्ज़ाइमर के इलाज़ की उम्मीद जगी |
| CONTENT: अमरीकी शोधकर्ताओं के मुताबिक़ ब्लड टेस्ट के ज़रिए समय रहते अल्ज़ाइमर बीमारी के बारे में जाना जा सकता है. उन्होंने पाया है कि ख़ून में मौजूद दस वसाओं के स्तर के बारे में जांच करके अगले तीन वर्षों के दौरान अल्ज़ाइमर के जोख़िम को 90 प्रतिशत तक सटीक ढंग से जाना जा सकता है. यह शोध जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुए हैं और अब इन नतीजों का बड़े स्तर पर परीक्षण किया जा रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि इन नतीजों की पुष्टि होनी है लेकिन इस तरह का टेस्ट ही अपने आप में एक क़दम आगे बढ़ना है. अल्ज़ाइमर एक ऐसी बीमारी है जिसमें मरीज़ की याददाश्त कमज़ोर हो जाती है. यह एक लाइलाज बीमारी है. इस समय दुनिया भर में इस बीमारी से करीब 4-4 करोड़ लोग पीड़ित हैं और अनुमान है कि 2050 तक ये आंकड़ा तीन गुना हो जाएगा. यह बीमारी गुपचुप तरीके से दिमाग़ पर असर दिखाती है करीब एक दशक के बाद इसके प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते हैं. इस बीमारी को लाइलाज माना जाता है. डॉक्टरों का मानना है कि चूंकि इस बीमारी के बारे में काफी देर से पता चलता है और इसलिए दवाओं के परीक्षण सफल नहीं हो पाते हैं. इसलिए प्राथमिकता के आधार पर इस बात की कोशिश की जा रही थी कि अल्ज़ाइमर को जोखिम का समय रहते पता कर लिया जाए. वॉशिंगटन डीसी स्थित जॉर्जटाउन यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने 525 लोगों के ख़ून के नमूनों का विश्लेषण किया. इन सभी लोगों की उम्र 70 साल से अधिक थी और यह अध्ययन पांच साल तक चला. उन्होंने इनमें से 53 ऐसे लोगों को चुना जिन्हें अल्ज़ाइमर की शिकायत थी या इसके मामूली लक्षण थे और उनकी तुलना 53 ऐसे लोगों के ख़ून के नमूनों से की गई जो मानसिक रूप से मज़बूत थे. उन्होंने पाया कि दोनों समूहों के बीच दस लिपिड या वसाओं के स्तर में अंतर था. इसके बाद जब शोधकर्ताओं ने दूसरे ख़ून के नमूनों को देखा तो पाया कि इन वसाओं के आधार पर आने वाले सालों में अल्ज़ाइमर के जोखिमों का अंदाजा लगाया जा सकता है. जॉर्जटाउन यूनीवर्सिटी मेडिकल सेंटर में न्यूरोलॉजी के प्रोफ़ेसर हावर्ड फेडरॉफ़ ने बताया मैं मानता हूं कि ऐसे किसी परीक्षण की काफ़ी ज़रूरत है. लेकिन इलाज के लिए इसका इस्तेमाल करने से पहले कई लोगों पर इसका प्रयोग करना होगा. अभी ये एकदम साफ़ नहीं है कि किन वजहों से ख़ून में इन वसाओं में बदलाव आता है लेकिन अल्ज़ाइमर का टेस्ट सफल होने से इस बीमारी के शुरुआती दौर में ही मरीज़ों का इलाज और शोध किए जा सकेंगे. अल्ज़ाइमर रिसर्च यूके के डॉक्टर साइमन रिडले ने इन नतीजों को उत्साहवर्धक बताया और कहा कि ख़ून की जाँच आगे की दिशा में बढ़ाया गया एक क़दम है. |
| DATE: 2014-03-11 |
| LABEL: science |
| [63] TITLE: मलेरिया अब अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में भी ! |
| CONTENT: जैसे-जैसे विश्व का तापमान बढ़ रहा है ऊंचे इलाकों में मलेरिया के फैलने का खतरा बढ़ रहा है. एक अध्ययन में ये बात सामने आई है. शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि गर्म तापमान वाले दिनों में अफ्रीका और दक्षिण अमरीका के ऊंचे इलाकों में रहने वाले लोगों में मच्छरों से होने वाली बीमारियों का खतरा बढ गया है. उनका मानना है कि यदि भविष्य में तापमान और बढ़ा तो इस बात की संभावना है कि कुछ इलाकों में मलेरिया के लाखों और मामले सामने आएंगे. विज्ञान की पत्रिकाओं में छपे इस शोध पर काम करने वाले अमरीका के मिशिगन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पास्कल ने बताया मलेरिया के चपेट में आने वाले मरीजों की संख्या के तेजी से बढ़ने की आशंका है. अधिक ऊंचाई वाले इलाके हमेशा से मलेरिया जैसे घातक रोग से बचने वालों के लिए स्वर्ग माने जाते रहे हैं. मलेरिया परजीवी और मलेरिया जन्म देने वाले मच्छरों को कम तापमान वाले इलाकों में जिंदा रहने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. प्रोफेसर पास्कल कहते हैं अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मलेरिया का खतरा कम पाया गया है. इसीलिए लोग मैदानी इलाकों की बजाय ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बसना पसंद करते रहे हैं. मगर वैज्ञानिकों का कहना है कि अब यह बीमारी उन इलाकों में प्रवेश कर रही है जिन्हें पहले मलेरिया मुक्त माना जाता था. इस जानकारी को पुख्ता करने के लिए वैज्ञानिकों ने कोलंबिया और यूथोपिया की घनी आबादी वाले इलाकों का अध्ययन किया. वहां के साल 1990 से साल 2005 के बीच के तापमान और मलेरिया के आंकड़ों को खंगाला गया. पाया गया कि पहाड़ में गरम दिनों में मलेरिया के ज्यादा मामले पाए गए जबकि ठंडे दिनों में कम. टीम का मानना है कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि तापमान के बढ़ने से मलेरिया के मामले बढ़े. यूथोपिया जहां आधी आबादी 1600 मी और 2400 मी के बीच की ऊंचाई वाले क्षेत्र में रहती है वैज्ञानिकों का मानना है कि मलेरिया के ज्यादा मामले सामने आ सकते हैं. पास्कल कहते हैं ऊंचाई के हिसाब से मलेरिया का आकलन करें तो हमारे अनुमान के अनुसार हर 15 साल पर तापमान में एक डिग्री की बढोतरी से मलेरिया के अतिरिक्त तीन लाख मामले बढ़ जाएंगे. टीम का मानना है कि वे इलाके मलेरिया के लिहाज से ज्यादा खतरनाक हैं जहां पहले कभी मलेरिया का मामला नहीं पाया गया इसलिए नए इलाकों में रोग के फैलने पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. साथ ही ये भी देखा गया है कि कम ऊंचाई वाले इलाकों की तुलना में नए इलाकों में रोग पर काबू करना ज्यादा आसान है क्योंकि यहां मलेरिया का रोग नया-नया फैला होता है. अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन के ताज़ा आकलन के मुताबिक साल 2012 में मलेरिया के 20 करोड़ 70 लाख मामले सामने आए और 627000 मौतें दर्ज की गईं. मरने वालों में अधिकांश अफ्रीका के बच्चे थे. |
| DATE: 2014-03-11 |
| LABEL: science |
| [64] TITLE: अब चार नई गैसें हैं ओजोन के लिए ख़तरा |
| CONTENT: वैज्ञानिकों को ऐसी चार नई मानव-निर्मित गैसों का पता चला है जो ओज़ोन परत को नुक़सान पहुँचा रही हैं. इनमें से दो गैसें ओज़ोन परत को इतनी तेज़ी से नुकसान पहुँचा रही हैं कि वैज्ञानिक इसे लेकर काफ़ी चिंतित हैं. ज़मीन से 15 से 30 किलोमीटर की ऊंचाई पर वायुमंडल में पाई जाने वाली ओज़ोन की परत मनुष्यों और जानवरों को हानिकारक अल्ट्रावायलट यूवी किरणों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. यूवी किरणों से मनुष्यों में कैंसर होता है. जानवरों की प्रजनन क्षमता पर भी इनका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. ओज़ोन परत में बढ़ते छेद के कारण 1980 के दशक के मध्य से क्लोरोफ़्लोरोकार्बन सीएफ़सी गैस के उत्पादन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. सीएफ़सी से मिलती-जुलती इन गैसों की उत्पत्ति का सटीक कारण अभी भी रहस्य है. सबसे पहले ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के वैज्ञानिकों ने 1985 में अंटार्कटिक के ऊपर ओज़ोन परत में एक बड़े छेद की खोज की थी. वैज्ञानिकों को पता चला कि इसके लिए सीएफ़सी गैस ज़िम्मेदार है जिसकी खोज 1920 में हुई थी. इस गैस का प्रयोग रेफ्रिज़रेटर हेयरस्प्रे और डिऑडरेंट बनाने वाले प्रोपेलेंट में अधिकता से होता है. सीएफ़सी पर नियंत्रण पाने के लिए 1987 में दुनिया के देशों में सहमति बनी और इसके उत्पादन को नियंत्रित करने के लिए मांट्रियल संधि अस्तित्व में आई. साल 2010 में सीएफ़सी के उत्पादन पर वैश्विक स्तर पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया. इन चार नई गैसों की मौज़ूदगी का पता लगाया है ईस्ट एंजिलिया विश्वविद्लय के शोधकर्ताओं ने. इनमें से तीन गैसें सीएफ़सी हैं और एक गैस हाइड्रोक्लोरोफ़्लोरोकार्बन एचसीएफ़सी है यह गैस भी ओज़ोन परत को नुक़सान पहुँचा सकती है. इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर जॉनसन लाउबे कहते हैं हमारे शोध से पता चलता है कि ये चार गैसें 1960 तक वायुमंडल में नहीं थीं यानी ये मानवनिर्मित गैसें हैं. वैज्ञानिक ध्रुवीय बर्फ़ से निकाली गई हवा के विश्लेषण से पता लगा सकते हैं कि आज से 100 साल पहले कैसा वायुमंडल कैसा था. शोधकर्ताओं ने इनकी तुलना वर्तमान वायुमंडल में पाई जाने वाली गैसों के नमूने से भी की. इसके लिए तस्मानिया के दूर-दराज़ के इलाक़े से नमूने लाए गए. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वायुमंडल में 74 हज़ार टन ऐसी गैस मौजूद हैं. इनमें से दो गैसें ओज़ोन परत में क्षरण की दर में उल्लेखनीय वृद्धि कर रही हैं. डॉक्टर लाउबे कहते हैं इन चार गैसों की पहचान बहुत चिंताजनक है क्योंकि वो ओज़ोन परत के क्षरण में योगदान देंगी. वो कहते हैं हम यह नहीं जानते कि इन नई गैसों का उत्सर्जन कहाँ से हो रहा है इसकी जाँच की जानी चाहिए. कीटनाशक के निर्माण में उपयोग होने वाला कच्चा माल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अवयवों की धुलाई में काम आने वाले विलायक इसके संभावित स्रोत हो सकते हैं. वो कहते हैं कि ये तीन सीएफ़सी वायुमंडल में बहुत धीरे-धीरे नष्ट होते हैं. इसलिए अगर इनके उत्सर्जन को तत्काल प्रभाव से रोक भी दिया जाए तो भी वो कई दशक तक वायुमंडल में बने रहेंगे. वहीं अन्य वैज्ञानिकों का मानना है कि अभी इन गैसों की मात्रा कम है और इनसे अभी कोई तात्कालिक ख़तरा नहीं है लेकिन इनके स्रोत का पता लगाने की ज़रूरत है. लीड्स विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पाइरस फॉरेस्टर को कहते हैं इस अध्ययन से पता चलता है कि ओज़ोन परत का क्षरण अभी भी पुरानी बात नहीं हुई है. वो कहते हैं जो चार गैसें खोजी गई हैं उनमें से सीएफ़सी-113ए ज़्यादा चिंता पैदा करने वाली प्रतीत हो रही है क्योंकि कहीं से इसका मामूली उत्सर्जन हो रहा है लेकिन यह बढ़ता जा रहा है. हो सकता है कि यह कीटनाशकों के निर्माण से पैदा हो रही हो. हमें इसकी पहचान करनी चाहिए और इसका उत्पादन रोक देना चाहिए. |
| DATE: 2014-03-10 |
| LABEL: science |
| [65] TITLE: एचआईवी-एड्स से मुक़ाबला हुआ और भी आसान |
| CONTENT: डॉक्टरों ने एचआईवी के 12 मरीजों की प्रतिरोधक प्रणाली यानी उनकी बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने के लिए जीन थैरेपी का इस्तेमाल किया है और इसके नतीजे काफी उत्साहजनक हैं. ऐसे में इस बात संभावना बढ़ गई है कि मरीजों को एचआईवी के संक्रमण पर काब़ू पाने के लिए रोज़ाना दवा लेने की ज़रूरत न पड़े. एचआईवी या ह्युमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस से एड्स नाम की बीमारी होती है जो शरीर में रोग से लड़ने की क्षमता को कम या ख़त्म कर देती है. जीन थैरेपी के दौरान मरीज़ की श्वेत रक्त कोशिकाओं को उनके शरीर से निकाल कर उनमें एचआईवी प्रतिरोधक क्षमता विकसित की गई और उन्हें दोबारा शरीर में डाल दिया गया. न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक छोटे अध्ययन में कहा गया है कि यह तकनीक पूरी तरह से सुरक्षित है. अध्ययन में बताया गया है कि कुछ लोग बेहद दुर्लभ म्यूटेशन या कोशिकाओं में होने वाले परिवर्तन वाले होते हैं जो उन्हें एचआईवी से बचाता है. म्यूटेशन के तहत प्रतिरोधक प्रणाली के तहत आने वाले टी-सेल की संरचना में बदलाव आता है और वायरस भीतर दाखि़ल नहीं हो पाते हैं और अपनी संख्या को बढ़ा नहीं पाते हैं. टिमोथी रे ब्राउन ऐसे पहले व्यक्ति हैं जो एचआईवी से मुक़ाबला करने में कामयाब रहे और उनकी सेहत में सुधार हुआ. ल्यूकिमिया ट्रीटमेंट के दौरान उनकी प्रतिरोधक प्रणाली काफ़ी कमज़ोर हो गई थी और फिर म्यूटेशन के ज़रिए किसी दूसरे व्यक्ति की मदद से वो इसे वापस पा सके. अब पेंसिलवेनिया यूनीवर्सिटी में शोधकर्ता बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने के लिए मरीज की प्रतिरोधक क्षमता का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसके तहत ख़ून से लाखों टी-सेल लिए गए और प्रयोगशाला में उनकी संख्या को अरबों तक बढ़ा दिया गया. चिकित्सकों ने टी-सेल के अंदर डीएनए का संपादन किया ताकि उनमें शील्डिंग म्यूटेशन का विकास किया जा सके. इसे सीसीआर5-डेल्टा-32 के नाम से भी जाना जाता है. इसके बाद क़रीब दर अरब कोशिकाओं को दोबारा शरीर में डाला गया हालांकि करीब 20 प्रतिशत कोशिकाएं ही सफलता के साथ संशोधित हो सकीं. इसके बाद जब मरीज को चार सप्ताह तक दवा नहीं दी गई तो ये पाया गया कि शरीर में असंरक्षित टी-सेल की संख्या तो तेजी से घटी लेकिन संशोधित टी-सेल टिकाऊ साबित हुईं और कई महीने बाद तक खून में बनी रहीं. पेंसिलवेनिया यूनीवर्सिटी में क्लीनिकल सेल एंड वैक्सीन प्रोडक्शन फैसिलिटी के निदेशक प्रोफेसल ब्रूस लेविन ने बीबीसी को बताया यह पहली पीढ़ी का संपादन है जिसका प्रयोग अब से पहले कभी भी इंसानों पर नहीं किया गया था. उन्होंने बताया हम इस तकनीक का इस्तेमाल एचआईवी में कर सके हैं और नतीजों से पता चलता है कि ये सुरक्षित और व्यवहारिक है. इससे एचआईवी के इलाज में काफी मदद मिलेगी. |
| DATE: 2014-03-07 |
| LABEL: science |
| [66] TITLE: बच्चों की सेहत को धुएं में न उड़ाएं |
| CONTENT: पैसिव स्मोकिंग यानि परोक्ष धूम्रपान बच्चों की रक्त धमनियों को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचाती है. इसके अलावा इससे उनकी रक्त नलिकाएं असमय ही विकसित हो जाती हैं. ये जानकारी एक शोध के जरिए सामने आई है. वे माता-पिता जो बच्चों की मौजूदगी में सिगरेट पीते हैं उनके बच्चों की रक्त नलिकाओं की दीवारें मोटी होने लगती हैं. इससे भविष्य में उनको दिल का दौरा पड़ने और स्ट्रोक के खतरे बढ़ जाते हैं. ह्रदय से संबंधित यूरोप की पत्रिकाओं में ये जानकारियां छपी हैं. शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया गया कि तीन से 18 साल की आयु के वैसे 2000 से अधिक बच्चों की सेहत को खतरा है जिनके माता-पिता दोनों ही सिगरेट पीते हैं. विशेषज्ञों का ये भी मानना है कि पैसिव स्मोकिंग यानि सेकेंड हैंड स्मोकिंग से हाने वाले खतरे का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है. फिनलैंड और ऑस्ट्रेलिया में किए जाने वाले इस शोध में यह बात सामने आई है कि धुंए से भरे घर में पल-बढ़ रहे् बच्चों की सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता है. हालांकि स्मोकिंग से शरीर को होने वाले नुकसान के अलावा दूसरे नुकसानों को नकारना कठिन है. जिस बच्चे के माता-पिता दोनों धूम्रपान करते हैं जब उनका अल्ट्रासाउंड किया गया तो उसमें ये देखा गया कि बच्चे के गले से सिर तक जाने वाली मुख्य धमनी की दीवारों में कुछ बदलाव आए हैं. जांचकर्ताओं का कहना है कि हालांकि धमनी की दीवारों में आया ये परिवर्तन मामूली है लेकिन 20 साल बाद बच्चे के वयस्क हो जाने पर यही बदलाव महत्वपूर्ण और असरकारक हो जाते हैं. शोध करने वाले तस्मानिया विश्वविद्यालय के डॉक्टर सिएना गल का कहना है हमारा अध्ययन बताता है कि जो बच्चा बचपन में पैसिव स्मोकिंग का शिकार होता है उसकी धमनियों की संरचना को प्रत्यक्ष और अपूरणीय क्षति पहुंचती है. उन्होंने बताया माता-पिता को यहां तक कि जो अभी मां या पिता बनने वाले हैं उन्हें बिना देर किए सिगरेट पीना छोड़ देना चाहिए. इससे न केवल उनकी सेहत पर सकारात्मक असर पड़ेगा बल्कि उनके बच्चों को भी भविष्य में बुरी सेहत का सामना नहीं करना पड़ेगा. इस अध्ययन में सिगरेट पीने वाले बच्चों को शामिल करने के बावजूद शोध के नतीजे नहीं बदलें. हां माता या पिता में से किसी एक के ही सिगरेट पीने की स्थिति में बच्चों की सेहत पर कोई असर नहीं देखा गया. संभवतः ऐसा इसलिए हुआ हो कि इस स्थिति में सिगरेट के धुंए का ज्यादा बड़ा प्रभाव क्षेत्र बन पाया. डॉक्टर गल कहते हैं यदि घर में कोई एक ही व्यस्क सिगरेट पीता हो और वह घर के बाहर जाकर सिगरेट पीता हो तो इससे पैसिव स्मोकिंग का असर कम हो जाता है. लेकिन हमारे पास इसे साबित करने के लिए आंकड़े नहीं हैं इसके बारे में केवल अटकल ही लगाया जा सकता है. स्थितियां चाहे जो हों शोधकर्ताओं का कहना है कि बच्चों को सेकेंड हैंड स्मोकिंग से बचाया जाना चाहिए. ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन में ह्रदय रोग की वरिष्ठ नर्स डोरियन मड्डोक का कहना है पैसिव स्मोकिंग से सेहत को हाने वाला नुकसान जगजाहिर है. मगर ये अध्ययन इससे एक कदम आगे जाकर यह बताता है कि इससे बच्चों की धमनियों को प्रत्यक्ष और अपूरणीय क्षति पहुंचती है जिससे भविष्य में बच्चों के दिल से जुड़े रोगों के पनपने के खतरे बढ़ जाते हैं. वे कहती हैं अगर आप सिगरेट पीते हैं तो बच्चे को इससे होने वाले नुकसान से बचाने का सबसे असरदार उपाय है कि आप सिगरेट पीना तुरंत छोड़ दें. उन्होंने आगे कहा और यदि ये मुमकिन नहीं तो कम से कम घर या कार में सिगरेट बिलकुल ना पिएं. यह बेहतर विकल्प है. वहीं दूसरी ओर स्मोकर्स ग्रुप फॉरेस्ट के प्रमुख साइमन क्लार्क कहते हैं हमें दहशत फैलाने वाली इन अफवाहों से दूर रहना चाहिए. क्योंकि धमनियों को नुकसानदेह भोजन और वायु प्रदूषण सहित कई और कारणों से भी नुकसान पहुंचता है. |
| DATE: 2014-03-07 |
| LABEL: science |
| [67] TITLE: एशिया में मिली चिड़िया की एक नई प्रजाति |
| CONTENT: शोधकर्ताओं ने एशिया में चिड़िया के एक अनोखे समूह यानी परिवार की खोज की है. इसकी ख़ासियत है कि इस समूह की केवल एक ही प्रजाति है. खोज करने वाले वैज्ञानिकों के दल ने पसेरिडा समूह की चिड़ियों के बसेरों के आधार पर उनकी 10 विभिन्न शाखाओं की पहचान की है. इस शोध के विश्लेषण से यह भी सामने आया कि धब्बे वाली यह चिड़िया लंबे पंजों वाली और गाने वाली यूरोपीय चिड़िया रेन-बैब्लर और बैब्लर से काफ़ी अलग है. विशेषज्ञों की राय है कि इस तरह की विशिष्ट चिड़ियों को इलैचुरा के नाम से बुलाना चाहिए. इस खोज को रॉयल सोसायटी के जर्नल बायोलॉजी लेटर्स में प्रकाशित किया गया है. चाइनीज एकेडमी ऑफ़ साइंसेज़ बीजिंग के शोधकर्ताओं के साथ काम करने वाले स्वीडिश यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चर साइंसेज़ उपासला के प्रोफ़ेसर पेर ऑस्ट्राम कहते हैं चिड़िया की यह इकलौती प्रजाति अपने पूर्ववर्ती चिड़ियों के सबसे बड़े समूह की जीवित प्रतिनिधि हैं. दुनियाभर की 10500 चिड़ियों की प्रजातियों का करीब 36 फ़ीसदी हिस्सा इस विशिष्ट प्रजाति का है. इलैचुरा फॉरमोसा को पहले स्पेलॉइरोनिस फॉरमोसस के नाम से जाना जाता था यह छोटी चिड़िया पूर्वी हिमालय से दक्षिण चीन तक के क्षत्रों में पाई जाती है. प्रोफ़ेसर ऑस्ट्राम बताते हैं इस रहस्यमयी चिड़िया को देखना काफ़ी कठिन है आमतौर पर यह उपोष्णकटिबंधीय पहाड़ों के घने जंगलों में छिपकर रहती है. वे कहते हैं प्रजनन के मौसम में नर पक्षी अपनी ख़ास ऊंची आवाज़ वाले गीत गाते हैं जो एशियाई महाद्वीप की किसी अन्य चिड़िया से मेल नहीं खाता है. वे चिड़िया की पहचान के बारे में कहते हैं इसको पहले रेन या रेन बैब्लर या फुदकी एक प्रकार की छोटी चिड़िया से लगभग समानता के कारण अनदेखा किया गया होगा. प्रोफ़ेसर ऑस्ट्राम के अनुसार यह समानता महज संयोगवश है या फिर एक बिंदु पर मिलने वाले उद्विकास की वज़ह से है जिसके कारण एक समान वातावरण में रहने वाली विभिन्न प्रजातियां रूप-रंग में समान होती हैं- कुछ रेन बैब्लर या छोटी चिड़ियां इलैचुरा की करीबी भी हो सकती हैं. जीव वैज्ञानिकों ने अपनी खोज चिड़ियों के डीएनए की आणविक संरचना का विश्लेषण करने के बाद किया. इससे उनको चिड़ियों के उद्विकास का इतिहास भी पता चलता है. हाल के वर्षों में इस विधि का काफ़ी उपयोग किया गया है. इससे कई आश्चर्यजनक जानकारियां सामने आई हैं. प्रोफ़ेसर ऑस्ट्राम कहते हैं आणविक विश्लेषण पक्षियों के बीच रिश्तों की पड़ताल करने के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण हैं. जैसे इससे बाज़ तोते और पैसेरिनिस के बीच रिश्तों की पड़ताल में मदद मिली है. वे कहते हैं भविष्य में इस तरह की और खोजें सामने आ सकती हैं क्योंकि अभी बहुत सी प्रजातियों का विश्लेषण किया जा रहा है. हालांकि मुझे संदेह है कि इलैचुरा जैसी और अधिक विशिष्ट प्रजातियों की पहचान होनी फिर भी बाकी रह जाएगी. |
| DATE: 2014-03-07 |
| LABEL: science |
| [68] TITLE: खाने में करें चीनी कमः डब्लूएचओ |
| CONTENT: विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्लूएचओ की तरफ़ से जारी वाले नए निर्देशों में लोगों को अपने खाने में शुगर की मात्रा को आधा करने की सलाह दी जाएगी. डब्लूएचओ का कहना है कि लोगों को खाने में शुगर की मात्रा कुल कैलोरी के दस फ़ीसदी से कम रखने की सलाह दी जाएगी और इसे भविष्य में पाँच प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. शुगर के सीमित उपभोग की यह सलाह भोजन में शामिल सभी तरह के मीठे के लिए लिए है इसमें शहद सीरप फलों के जूस और फलों को भी शामिल किया गया है. खाने में शुगर की मात्रा कम करने के पक्ष में अभियान चलाए जाने वालों इस पर दुख जताया है कि इस विश्व संस्था को अपनी सलाह बदलने में दस साल का समय लग गया. डब्लूएचओ ने साल 2002 में इस सिफ़ारिश को मंजूरी दी थी कि दैनिक कैलोरी में शुगर की मात्रा दस फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए. डब्लूएचओ के मुताबिक़ सामान्य वज़न वाले वयस्क के लिए दिन में 50 ग्राम शुगर की मात्रा पर्याप्त है. हालांकि कई विशेषज्ञ पूरी दुनिया में मोटापे के बढ़ते मामलों के बीच दस फ़ीसदी शुगर की मात्रा को भी अधिक मानते हैं. डब्लूएचओ की तरफ़ से जारी ताज़ा मसौदे के अनुसार दैनिक ऊर्जा खपत में शुगर का हिस्सा दस फ़ीसदी के कम होना चाहिए. इसमें यह भी कहा गया है कि रोज़ाना शुगर की मात्रा को पाँच फ़ीसदी से कम करने के अतिरिक्त लाभ होंगे. डब्लूएचओ के न्यूट्रिशन डायरेक्टर डॉक्टर फ़्रांसेस्को ब्रांका ने संवाददाता सम्मेलन में कहा दस फ़ीसदी का लक्ष्य ज़ोरदार सुझाव है जबकि पाँच फ़ीसदी का लक्ष्य ताज़ा साक्ष्यों पर आधारित सशर्त सुझाव है. उन्होंने कहा अगर हम हासिल कर सकें तो हमें पाँच फ़ीसदी का लक्ष्य तय करना चाहिए. इस योजना को लोगों की राय जानने के लिए सार्वजनिक किया जाएगा और गर्मियों तक सुझाव आने की संभावना है. ब्रिटेन के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि उसकी वैज्ञानिक सलाहकार समिति देशवासियों के आहार में शुगर की मात्रा की समीक्षा कर रही है. न्यूट्रिशन और डाइट के डायरेक्टर एलिसन टेडस्टोन कहते हैं हमारा सर्वेक्षण दिखाता है कि ब्रिटेन की आबादी को शुगर के उपभोग के स्तर को कम करना चाहिए. वयस्कों में यह 11-6 प्रतिशत और बच्चों में 15-2 प्रतिशत है जो दस फ़ीसदी की सिफ़ारिश से ज़्यादा है. शुगर की मात्रा में कमी के लिए अभियान चलाने वाली संस्था एक्शन फॉर शुगर ने दैनिक कैलोरी में शुगर की मात्रा पाँच प्रतिशत करने की मांग की है. न्यूट्रीशिनिस्ट कैथरीन जेनर ने कहा यह दुखद है कि डब्लूएचओ को अपनी राय बदलने में दस साल का समय लग गया. डब्लूएचओ के सुझाव स्वास्थ्य पर शुगर के प्रभावों के बारे में किए गए वैज्ञानिक परीक्षणों पर आधारित हैं. इसमें शुगर से दांतों को होने वाले नुकसान और मोटापे पर इसका असर शामिल है. मोटापे पर पिछले साल बीएमजे में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़ शुगर का सेवन सीधे तौर पर मोटापे के लिए ज़िम्मेदार नहीं है लेकिन जो लोग इसका ज़्यादा सेवन करते हैं उनके मोटे होने की संभावना अधिक है. ब्रितानी शोधकर्ताओं ने शुगर के सेवन और दांतों की सड़न के बीच रिश्ते की पड़ताल की. उन्होंने पाया कि दैनिक कैलोरी में शुगर का हिस्सा दस फ़ीसदी से कम होने पर दांतों में सड़न के कम मामले सामने आए. न्यूकासल यूनिवर्सिटी में न्यूट्रिशन एंड ओरल हेल्थ के प्रोफ़ेसर पॉउला मोनीहान ने कहा आप जितने कम शुगर का सेवन करते हैं आपके दांतों में सड़न का ख़तरा उतना ही कम होता है. किंग्स कॉलेज लंदन के स्कूल ऑफ़ मेडिसिन के प्रोफ़ेसर टॉम सैंडर्स ने कहते हैं पाँच फ़ीसदी के लक्ष्य को हासिल करने का प्रयास और परीक्षण नहीं हुआ है लेकिन दस प्रतिशत व्यावहारिक है. तो वहीं मेडिकल रिसर्च काउंसिल की एपिडेमीलॉजी यूनिट की डॉक्टर नीता फॉरोही ने पाँच फ़ीसदी लक्ष्य के बारे में कहा यह काफ़ी महत्वाकांक्षी और चुनौतीपूर्ण है. |
| DATE: 2014-03-06 |
| LABEL: science |
| [69] TITLE: 30 हज़ार साल बाद लौटा वायरस |
| CONTENT: वैज्ञानिकों का कहना है कि एक प्राचीन वायरस करीब 30000 सालों तक सुप्तावस्था के बाद फिर से जाग गया है. यह वायरस साइबेरिया की बर्फ़ीली परतों में जमी हुई अवस्था में मिला लेकिन बर्फ़ पिघलने के बाद यह फिर से संक्रामक हो गया है. फ़्रांसीसी वैज्ञानिकों का कहना है कि इस वायरस से इंसानों और जानवरों को कोई ख़तरा नहीं है लेकिन साइबेरिया की सतह हटने के बाद अन्य वायरस भी बाहर आ सकते हैं. यह शोध प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द नेशनल एकैडमी ऑफ़ साइंसेज़ में प्रकाशित हुआ है. फ़्रांस की एक्स-मार्सेली यूनिर्वसिटी में नेशनल सेंटर ऑफ़ साइंटिफिक रिसर्च सीएनआरएस के प्रोफ़ेसर ज्यां-मिशेल क्लॉवेरी कहते हैं हमने पहली बार किसी वायरस को इतने लंबे समय बाद संक्रामक होते हुए देखा है. इस हज़ारों साल पुराने वायरस को जमी हुई सतह से 30 मीटर गहराई में खोजा गया. अन्य वायरसों के मुकाबले यह आकार में काफ़ी बड़ा है और इसे माइक्रोस्कोप की मदद से देखा जा सकता है. इसकी लंबाई 1-50 माइक्रोमीटर है यह अब तक का सबसे बड़ा वायरस है. आख़िरी बार इसने किसी को 30000 साल पहले संक्रमित किया था लेकिन प्रयोगशाला में यह फिर से जीवित हो गया है. इस पर परीक्षणों से पता चलता है कि यह अमीबा के ऊपर हमला करता है जो एक-कोशकीय जीव है. लेकिन इस वायरस का संक्रमण इंसानों और जानवरों में नहीं होता. शोध की सह-लेखक डॉक्टर शैंटल अबेरजल बताती हैं यह वायरस कोशिका में प्रवेश करता है तेज़ी से बढ़ता है और आख़िर में कोशिका को मार देता है. यह अमीबा को मारने में सक्षम है लेकिन इसका संक्रमण इंसानी कोशिका में नहीं होता. हालांकि शोधकर्ताओं का मानना है कि साइबेरिया की बर्फ़ीली सतह में अन्य ख़तरनाक वायरस क़ैद हो सकते हैं. डॉक्टर अब्रेजल कहती हैं बर्फ़ की भीतरी परतों में मौजूद डीएनए की पड़ताल कर के हम इस मुद्दे से निपट रहे हैं. यही यह पता लगाने का सबसे अच्छा तरीका होगा कि वहां क्या ख़तरा है. शोधकर्ताओं का कहना है कि 1970 के बाद से यह क्षेत्र ख़तरे का सामना कर रहा है. साइबेरिया की बर्फ़ की सतह की मोटाई कम हो रही है पर्यावरण में होने वाले परिवर्तन के अनुमान से पता चलता है कि इसमें और कमी आने वाली है. शोधकर्ता कहते हैं कि गहरी परतों से छेड़छाड़ नए वायरसों का ख़तरा पैदा कर सकती है. प्रोफ़ेसर ज्यां-मिशेल क्लॉवेरी कहते हैं भीतरी सतह से छेड़छाड़ करना विनाश को दावत देना होगा किसी तरह के खनन से भीतरी सतह हल्की हो जाएगी यही वह क्षेत्र है जहां से ख़तरा आ रहा है. वह बताते हैं अगर ये सच है कि अमीबा वायरस की तरह ही अन्य वायरस भी जीवित रहते हैं तो चेचक का वायरस अभी धरती से समाप्त नहीं हुआ है यह केवल सतह से ग़ायब हुआ है. उनके मुताबिक़ अधिक गहराई में जाकर हम चेचक के ख़तरे को आधुनिक समय में फिर से इंसानों की बीमारी बना सकते हैं. नॉटिंघम यूनिवर्सिटी के विषाणु विज्ञानी प्रोफ़ेसर जोनॉथन बॉल कहते हैं यह एक बेहद अहम सवाल है. उनके अनुसार इतने लंबे समय बाद किसी वायरस का किसी जीव को संक्रमित करने में सक्षम होना हैरान करता है लेकिन बर्फ़ीली सतह में अन्य वायरस फिर से जीवित होने में कितने समर्थ हैं इसके बारे में केवल अनुमान लगाया जा सकता है. यह काफ़ी हद तक वास्तविक वायरस पर निर्भर है. मुझे संदेह है कि बाकी वायरस भी इतने ताकतवर होंगे जितना यह है. |
| DATE: 2014-03-05 |
| LABEL: science |
| [70] TITLE: क्या अब प्रयोगशाला में उगेंगे कान और नाक? |
| CONTENT: लंदन के ग्रेट अरमंड स्ट्रीट अस्पताल के डॉक्टरों ने इंसान के शरीर के वसा फ़ैट से स्टेम सेल निकालकर उससे चेहरा विकसित करने की योजना बनाई है. डॉक्टरों की एक टीम ने प्रयोगशाला में कार्टिलेज़ यानी नरम हड्डी विकसित कर लिया है. माना जा रहा है कि इसका उपयोग कान और नाक बनाने में किया जा सकता है. नैनोमेडिसिन नाम की विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में डॉक्टरों ने कहा है कि यह तकनीक इलाज के क्षेत्र में क्रांतिकारी क़दम साबित हो सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में अभी और काम करने की ज़रूरत है. डॉक्टर इसके ज़रिए माइक्रोटिया जैसी समस्या का इलाज करना चाहते हैं जिसमें इंसान के कान का बाहरी हिस्सा ठीक से विकसित नहीं हो पाता है. अभी माइक्रोटिया के इलाज के लिए बच्चों की पसलियों से कार्टिलेज लेकर डॉक्टर कोमलता से उससे कान बनाते हैं और उसे बच्चे में प्रत्यारोपित करते हैं. इसके लिए कई तरह के ऑपरेशन की ज़रूरत होती है जो सीने पर घाव के स्थायी निशान छोड़ जाते हैं. वहीं पसलियों से निकाले गए कार्टिलेज की कभी भरपाई भी नहीं हो पाती है. डॉक्टरों की इस टीम ने एक विकल्प पर ध्यान दिया वह यह था कि वसा का एक छोटा सा टुकड़ा बच्चे के शरीर से निकाला जा सकता है. इस टुकड़े से स्टेम सेल निकालकर उसे विकसित किया जा सकता है. कान के आकार के एक ढांचे को स्टेम सेल के घोल में रखा जाएगा. इससे कोशिका ठीक उसी प्रकार का आकार लेगी जैसा ढांचा डाला गया है. इस प्रक्रिया में रसायनों का उपयोग स्टेम सेल को कार्टिलेज सेल में विकसित करने में किया जाएगा. बच्चे के कान को आकार देने के लिए इसे त्वचा के नीचे प्रत्यारोपित किया जा सकता है. शोधककर्ता एक ढांचे में कार्टिलेज विकसित करने में सक्षम हैं. लेकिन इसे किसी मरीज़ में प्रत्यारोपित करने से पहले यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि यह सुरक्षित है या नहीं. इस शोध में शामिल डॉक्टर पैट्रिज़िया फ़ेरेटी ने बीबीसी से कहा यह वास्तव में रोमांचक है कि हमारे पास इस तरह की कोशिकाएं हैं जिनसे ट्यूमर होने की संभावना न हो जिन्हें उसी मरीज़ में डाला जा सकता है ताकि इम्यूनसिस्टम इसमें अड़चन न डाले इसलिए हम वह काम कर सकते हैं जो करना चाहते हैं. इस नई तकनीक से 15 साल के सैमुअल क्लॉम्पस जैसे रोगियों को फ़ायदा मिल सकता है जिनका कान सुधारने के लिए ऑपरेशन करना पड़ा है. उनकी माँ सू ने कहा कि उनका परिवार इस तकनीक का स्वागत करता है. उन्होंने बीबीसी से कहा उन्होंने कार्टिलेज लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती. वो कहती हैं अब सैमुअल को वहां एक घाव है. यह बहुत ही असुविधाजनक स्थिति थी. इस नई तकनीक का प्रयोग नाक जैसे अंगों के लिए ऊतक या टिश्यू तैयार करने के लिए कार्टिलेज बनाने में किया जा सकता है जो कैंसर के ऑपरेशन के दौरान क्षतिग्रस्त हो सकती है. डॉक्टरों ने कहा है कि वो इसी तरह की शुरुआती सामग्री की मदद से हड्डी भी बना सकते हैं. पैट्रिज़िया फ़ेरेटी कहते हैं ज़ाहिर है कि हम इसकी शुरुआत में हैं. अगला क़दम सामग्री के चयन का होगा और इसे विकसित करेंगे. इस अध्ययन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के प्रोफ़ेसर मार्टिन बिरचाल ने कहा अगर आपके पास कुछ है जो वास्तव में पुनरोत्पादक है तो वह परिवर्तनकारी होगा. प्रोफ़ेसर मार्टिन बिरचाल प्रयोगशाला में विकसित की गई श्वासनली के प्रत्यारोपण के लिए हुए ऑपरेशन में शामिल थे. उन्होंने कहा कि वसा पर आधारित इस तकनीक को अपनी अंतिम अवस्था में पहुंचने के लिए और सुरक्षा परीक्षणों की ज़रूरत होगी. |
| DATE: 2014-03-04 |
| LABEL: science |
| [71] TITLE: छेड़छाड़ पर 'आत्महत्या' कर लेगा बोइंग का फ़ोन |
| CONTENT: यात्री विमान बनाने वाली अमरीकी कंपनी बोइंग ने एक ऐसा स्मार्टफ़ोन विकसित किया है जो बेहद गुप्त बातचीत को सुरक्षित रख सकता है. अगर इस फ़ोन के साथ छेड़छाड़ की जाती है तो यह ख़ुद ब ख़ुद किसी भी डेटा को हटा देता है और ख़ुद को बेकार बना देता है. कंपनी का कहना है कि वह उन संस्थानों की मदद करना चाहती है जिन्हें अपना काम पूरा करने के लिए आंकड़ों तक विश्वसनीय पहुंच चाहिए होती है. ब्लैक नाम का यह फ़ोन बेहद-सुरक्षित स्मार्टफ़ोन के बढ़ते बाज़ार का हिस्सा बन गया है. बार्सिलोना में मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस में व्यापारिक गतिविधियों और निजी डेटा को सुरक्षित रखने के मद्देनज़र एक ब्लैकफ़ोन को पेश करने की घोषणा की गई. बोइंग अमरीकी राष्ट्रपति सहित कई अमरीकी अधिकारियों को सुरक्षित संचार मुहैया करवाती है. बोइंग का ब्लैक फ़ोन आम इस्तेमाल के लिए नहीं है और अब तक इसकी क़ीमत या बाज़ार में आने की तारीख़ का भी पता नहीं है. कंपनी का कहना है कि इसे बनाने में 36 महीने लगे. इसके लिए हाल ही में अधिग्रहित मोबाइल टेक्नॉलॉजी कंपनियों की विशेषज्ञता का भी फ़ायदा उठाया गया. बोइंग की वेबसाइट पर कहा गया है कि फ़ोन में दो सिम कार्ड हैं ताकि सरकारी और व्यापारिक नेटवर्क में से किसी एक को चुना जा सके. यह स्मार्टफ़ोन गूगल के एंड्रॉएड ऑपरेटिंग सिस्टम के उस संस्करण का इस्तेमाल करता है जो विशेषकर इसी के लिए बनाया गया है बोइंग ने इसमें अपने सिक्योरिटी ऐप भी डाले हैं. लेकिन ब्लैक दूसरे फ़ोन से सुरक्षा को लेकर जहां आगे निकला है वो है हार्डवेयर में किए गए बदलाव. अमरीका के फ़ेडरल कम्युनिकेशन कमीशन को भेजे गए दस्तावेज़ों में कंपनी ने कहा है बोइंग के ब्लैक फ़ोन में कोई भी ऐसा पुर्ज़ा नहीं है जिसकी मरम्मत की जा सके और इसकी सर्विस करने की या पुर्ज़े को बदलने की कोई भी कोशिश उपकरण को नष्ट कर देगी. कंपनी ने कहा बोइंग ब्लैक को एक सील्ड उपकरण के रूप में तैयार किया गया है. इसे चारों ओर से एपॉक्सी बेहद मजबूत गोंद और पेंचों से बंद किया गया है जिनके सिरे टैंपर-प्रूफ़ कवरिंग से ढके हुए हैं ताकि इसे खोलने की किसी भी कोशिश का पता चल सके. कंपनी ने मुताबिक़ इसके खोल को तोड़कर खोलने की कोई भी कोशिश ऐसी प्रक्रिया को सक्रिय कर देगी जिससे डेटा और सॉफ़्टवेयर ख़ुद-ब-ख़ुद डिलीट हो जाएगा और ये उपकरण चलने योग्य नहीं रह जाएगा. इसके अलावा फ़ोन के हार्डवेयर में बायोमैट्रिक सेंसर सैटेलाइट रिसीवर या सोलर पैनल जोड़े जा सकते हैं. |
| DATE: 2014-03-03 |
| LABEL: science |
| [72] TITLE: 20 साल बाद कितना स्मार्ट होगा आपका फ़ोन? |
| CONTENT: इस सप्ताह गैजेट प्रेमियों पर बार्सिलोना में चल रही मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस का नशा छाया रहा. इस दौरान सभी की निगाह इस बात पर टिकी थी कि इस साल कौन से नए गैजेट बाज़ार में आ रहे हैं. लेकिन बीबीसी के टेक्नॉलॉजी संवाददाता मार्क ग्रेगरी तो 20 साल आगे की सोच रहे थे. क्या आज से कुछ सालों के बाद मोबाइल फ़ोन का वजूद भी बचेगा क्या तब भी लोग आज की तरह ही मोबाइल फ़ोन से बातें कर रहे होंगेउन्होंने मोबाइल उद्योग के कुछ बेहद प्रभावशाली लोगों से इस बारे में राय ली. उन्होंने पूछा कि आज से करीब 20 साल बाद के मोबाइल फ़ोन कैसे होंगेसैमसंग की यूरोप इकाई के उपाध्यक्ष स्टीफ़न टेलर बताते हैं अगर मुझे इसका सही जवाब पता होता तो निश्चित रूप से मैं अरबपति बन जाता. हमारे करीब पांच-छह हजार आरएंडडी विशेषज्ञ इस पर काम कर रहे हैं लेकिन जिस तरह से लोगों की ज़रूरत बदल रही है मुझे लगता है कि बिल्कुल नई चीज़ सामने आएगी. चीन की मोबाइल कंपनी हुआवेई के शाओ यंग भी इस बात से सहमत दिखते हैं. उन्होंने कहा हमें पक्के तौर पर नहीं पता है कि भविष्य में फ़ोन कैसा होगा. हो सकता है कि ये मेरी जेब में हो हो सकता है कि चश्मे में हो या फिर मेरे इयर फ़ोन के साथ हो. शाओ यंग बताते हैं कि इस सवाल को लेकर काफी उत्सुकता है और कई संभावनाएं हैं. सीसीएस इनसाइड के विश्लेषक बेन वुड के मुताबिक 20 साल का समय तो बहुत अधिक है. अगले एक या दो साल में ही फ़ोन की सूरत काफी बदल जाएगी. उन्होंने बताया कि डिज़ाइन के स्तर पर काफी बदलाव आएंगे. हो सकता है कि कुछ लोग बैटरी लाइफ़ की समस्या को हल कर लें. फ़ोन छोटे हो सकते हैं और हो सकता है कि उनकी स्क्रीन फ़्लेक्सिबल हो. हम फ़ोन के साथ अलग तरीके से इंटरैक्ट कर सकते हैं. एआरएम होल्डिंग्स के निदेशक जेम्स ब्रूस कहते हैं कि आने वाले समय में फ़ोन हमसे कहीं अधिक जुड़े हुए होंगे. वो कहते हैं कि फ़ोन हमारे घर और हमारी कार जैसे साधनों के साथ जुड़े होंगे. मोज़िला की अध्यक्ष और संस्थापक मिशेल बेकर कहती हैं आज हमारे पास कई डिवाइस हैं जो स्मार्ट हैं. न सिर्फ फ़ोन या इलेक्ट्रानिक डिवाइस बल्कि यहां तक की जूते भी स्मार्ट हैं. और ये सभी डेटा भेज रहे हैं. ऐसे में फ़ोन को लेकर हमारी अवधारणा ही पूरी तरह बदल जाए तो आश्चर्य नहीं. |
| DATE: 2014-03-02 |
| LABEL: science |
| [73] TITLE: देर से पिता बनने पर बच्चा हो सकता है मानसिक बीमार |
| CONTENT: अमरीका और स्वीडन के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पता लगाया है कि 45 साल की आयु के बाद पिता बनने वालों के बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों का ख़तरा अधिक होता है. इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने स्वीडन में 1973 से 2001 के बीच पैदा हुए 26 लाख लोगों के शिक्षा स्वास्थ्य और पारिवारिक स्थिति से संबंधित आंकड़ों का विश्लेषण किया. अध्ययन में दो तरह के लोगों को शामिल किया गया एक वो जिनके पैदा होते समय उनके पिता की आयु 20 से 26 साल के बीच थी और दूसरे वो जिनके पिता की आयु 45 साल या उससे अधिक थी. इसमें पाया गया कि अधिक आयु में पिता बनने वालों के बच्चों में ऑटिज्म स्किट्सोफ्रीनिया आत्महत्या की प्रवृत्ति और कम आईक्यू जैसी मानसिक बीमारियों के विकसित होने की आशंका अधिक थी. हालांकि अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक़ बड़ी उम्र में पिता बने लोगों के बच्चों में मानसिक बीमारियों के विकसित होने की संभावना एक फ़ीसद से भी कम होती है. अध्ययन के नतीजे अमरीकन मेडिकल एसोसिएशन के जर्नल जेएएमए के ऑनलाइन संस्करण में बुधवार को प्रकाशित हुए. इसके प्रमुख लेखक अमरीका के इंडियाना विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक और मस्तिष्क विभाग के एसोसिएट प्रोफ़ेसर ब्रायन डिओफ़्रोनियो ने एमाचार एजेंसी एएफ़पी से कहा कि इसके नतीज़ों से वह चकित थे. उन्होंने कहा कि पिता बनने के लिए उम्र के साथ विशेष संबंध इसके पहले हुए अध्ययनों की तुलना में बहुत अधिक था. उन्होंने कहा कि अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि पिता बनने की सही आयु क्या है. लेकिन इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं है. ऐसी कोई आयु नहीं है जिसमें पिता बनना सही है और उसके बाद पिता बनना ख़तरनाक. अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि जिन बच्चों के पिता की उम्र 45 साल या उससे अधिक थी उनमें उन बच्चों की तुलना में जिनके पिता की आयु 24 साल तक थी ऑटिज्म की आंशका साढ़े तीन गुना अधिक थी. वहीं ऐसे बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति ढाई गुना अधिक होने की आशंका थी. पिछले चार दशकों में महिलाओं और पुरुषों में अधिक आयु में बच्चे पैदा करने में की प्रवृत्ति देखी जा रही है. अमरीका में बीमारियों की रोकथाम करने वाले केंद्र के आंकड़ों के मुताबिक़ पहली बार माँ बनने की औसत आयु 1970 में 21-5 साल थी जो 2011 में बढ़कर 25-6 साल हो गई. इंडियाना विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के मुताबिक़ पुरुषों में भी पहली बार पिता बनने की औसत आयु तीन साल बढ़ गई है. आनुवांशिकी वैज्ञानिक और ड्यूक विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफ़ेसर सिमोन ग्रिगोरी ने समाचार एजेंसी एपी से कहा कि अपने व्यापक दायरे के कारण यह अध्ययन बहुत प्रभावशाली है. उन्होंने कहा कि अध्ययनकर्ताओं ने इसके लिए अध्ययन में शामिल किए गए लोगों के जन्म से संबंधित दस्तावेज़ों उनके मानसिक इलाज भाई-बहनों के स्वास्थ्य शिक्षा और सामाजिक स्थिति के दस्तावेज़ खंगाले. वह कहते हैं कि यहाँ यह कहने का कोई कारण नहीं है कि अधिक आयु के लोगों को पिता नहीं बनना चाहिए. वो कहते हैं कि इसके लिए अभी और शोध की ज़रूरत है. |
| DATE: 2014-03-01 |
| LABEL: science |
| [74] TITLE: कितना सुरक्षित है आपका मोबाइल बैंकिंग ऐप? |
| CONTENT: आज हम-आप में से बहुत से लोग अपने रुपए-पैसे का प्रबंधन ऑनलाइन करते हैं. आज बैंक खाते के प्रबंधन के लिए कंप्यूटर होना भी ज़रूरी नहीं है. इसे आप अपने स्मार्टफ़ोन के जरिए भी संभाल सकते हैं. ऑनलाइन बैंकिंग के ऐप आपको बिलों के भुगतान पैसा ट्रांसफर करने और अपने ख़ाते पर नज़र रखने की सुविधा देते हैं. ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह सब करना सुरक्षित है यह इस बात पर निर्भर करता है कि ऐप कैसा है. इंटरनेट बैंकिंग की सुविधा उपलब्ध कराने वाली अधिकांश कंपनियां अपने मोबाइल ऐप की सुरक्षा पर काफी खर्च करती हैं. इस तरह के ऐप में ख़तरे को कम करने के लिए कंपनियां इसके जरिए होने वाली पैसे की लेनदेन की सीमा को नियंत्रित रखती हैं. अधिक पैसों की लेन-देन को अधिकृत करने के लिए किसी कोड या कार्ड रीडर की जरूरत होती है. कई बार स्मार्टफ़ोन के जरिए किया गया लेन-देन एक स्टैंडर्ड कंप्यूटर से होने वाले लेन-देन से अधिक सुरक्षित होता है. लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं. इसके लिए सबसे ज़रूरी बात यह है कि आप अपने बैंक का आधिकारिक ऐप ही प्रयोग करें और समय-समय पर उसे अपग्रेड भी करते रहें. आप यह सुनिश्चित कर लें कि आपके बैंक का मोबाइल ऐप की सुरक्षा विधिमान्य है. इसके लिए पहले आपको अपने बैंक की वेबसाइट पर जाकर यह पता लगाना चाहिए कि उन्होंने अपने मोबाइल ऐप की सुरक्षा के लिए क्या किया है. अगर वहाँ आपको इस संबंध में कोई जानकारी नहीं मिलती है तो आप अन्य उपभोक्ताओं से इसकी जानकारी लें जो कि उस मोबाइल ऐप का उपयोग कर रहे हैं. इसका एक अच्छा तरीका यह होगा कि आप अपने बैंक और मोबाइल ऐप के नाम को गूगल जैसे सर्च इंजन पर जाकर खोजें और यह पता लगाएं कि लोगों ने इस ऐप के बारे में क्या राय व्यक्त की है. सामान्य रूप से कहें तो कंप्यूटरों की तुलना में स्मार्टफ़ोन पर ख़तरनाक़ चीजों का हमला बहुत कम होता है. इस तरह यह अधिक सुरक्षित है. कहा जाता है कि अभी साढ़े छह लाख से अधिक एंड्रायड मोबाइल बैंकिंग ऐप मौज़ूद हैं. इनमें से अधिकांश फर्ज़ी हैं जो आधिकारिक होने का दावा करते हैं. फ़ीसिंग या किसी प्रतिष्ठित कंपनी के नाम पर किसी व्यक्ति से उसके ख़ाते से जुड़ी जानकारियां मांगने के अभियान की ही तरह इस तरह के ऐप को विभिन्न ऐप स्टोर पर रख दिया जाता है जहाँ वे इस बात का इंतज़ार करते हैं कि कोई ग्राहक आए और अपने बैंक के खाते से संबंधित जानकारियां उन्हें सौंप दे. इसलिए यह ज़रूरी है कि आप आधिकारिक मोबाइल बैंकिंग ऐप ही अपने स्मार्टफ़ोन में इंस्टाल करें. इसके लिए आप अपने बैंक की वेबसाइट पर जाकर अपने स्मार्टफ़ोन के मुताबिक़ सही और ताज़ा बैंकिंग ऐप को डाउनलोड करने से संबंधित दिशा-निर्देशों को पढ़ें. एक बार जब आप ऐप का उपयोग शुरू कर दें तो आप इस विकल्प की तलाश करें जिससे आपके खाते से होने वाली हर लेन-देन की जानकारी आपको एसएमएस के जरिए मिल सके. अगर आपका बैंक आपको आपके खाते से होने वाले हर लेन-देन की जानकारी एसएमएस देने लगे तो किसी तरह की गड़बड़ी होने पर आपको इसकी सूचना तुरंत मिल जाएगी. आप अपने स्मार्टफ़ोन को पासवर्ड के जरिए सुरक्षित करें ताकि उसका उपयोग केवल आप ही कर पाएं. जब भी आपको ऐप का प्रयोग करना हो तो केवल आप ही कर पाएं. आपको अपने फ़ोन के ऑपरेटिंग सिस्टम ओएस और ऐप को उसके नए संस्करण के साथ हमेशा अपटूडेट रखना चाहिए. इसे आप अपने फ़ोन सेटिंग में जाकर कर सकते हैं. आप एक फ़ोन ट्रैकिंग ऐप भी ले सकते हैं जो फ़ोन खो जाने की स्थिति में उसमें दर्ज आंकड़ों को मिटाने की इजाजत देता है. स्मार्टफ़ोन के ऑपरेटिंग सिस्टम पर निर्भर रहकर एंटीवायरस तकनीक का इस्तेमाल करना अच्छा विचार होगा. उदाहरण के लिए ऐपल के आईओएस में ऐसी व्यवस्था होती है जिससे केवल विश्वसनीय ऐप ही उसमें इंस्टाल हो पाते हैं. ऐसा हो सकता है कि उसमें कुछ वायरस हो. लेकिन ऐपल उसे हैंडसेट से अपने आप हटा देता है. एंड्रायड ऑपरेटिंग सिस्टम को उपयुक्त सुरक्षा नियंत्रण की ज़रूरत होती है और यह सुरक्षा का बेहतर तरीका है. ऐसे वायरस अक्सर ख़ुद को असली ऐप या किसी व्यावसायिक ऐप के मुफ़्त संस्करण के रूप में पेश करते हैं इस पर विश्वास करके लोग उन्हें डाउनलोड कर अपने हैंडसेट में इंस्टाल कर लेते हैं. किसी ऐप स्टोर से एंड्रायड के लिए मुफ़्त में एंटीवायरस लिया जा सकता है. |
| DATE: 2014-02-27 |
| LABEL: science |
| [75] TITLE: आपकी कलाइयों पर है मोबाइल कंपनियों की नज़र |
| CONTENT: नन्हे-मुन्ने मोबाइलों से लेकर बड़े छह इंच की सक्रीन के स्मार्टफ़ोन्स तक मोबाइल कंपनियां लगभग हर आकार और साइज़ की मोबाइलें बना चुकीं हैं. पारंपरिक मोबाइल श्रेणी में गला काट प्रतियोगिता और बाज़ार में उपलब्ध घरेलू कंपनियों के सस्ते विकल्पों की वजह से बड़ी कंपनियां अब कुछ नया करने की कोशिश कर रहीं हैं. और इस काम के लिए उन्हें ज़रूरत है आपकी कलाइयों की. सैमसंग और सोनी जैसी हैंडसेट निर्माता कंपनियां अब आपको पहनाना चाहतीं हैं स्मार्टवॉच और स्मार्टब्रेस्लेट. कंपनियां दावा करतीं हैं कि स्मार्ट ब्रेसलेट आपकी फ़िटनेस का हिसाब रख सकता है आप कितने क़दम चले और कितनी कैलरीज़ घटाईं इसे रिकॉर्ड कर सकता है. वहीं स्मार्टवॉच आपके कॉल और एसएमएस को रिसीव कर सकती है आपको ईमेल पढ़वा सकती है बिल्कुल जेम्स बॉन्ड स्टाइल में. स्पेन के शहर बार्सिलोना में हो रहे मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस में कई कंपनियों ने यही बैंड और घड़ियां सबके सामने नुमाइश के लिए पेश की हैं. उत्पाद तो बन गए लेकिन खरीदेगा कौन अगर आप भी ये सोच रहे हैं तो ग़ौर कीजिए मैनेजमेंट कंस्लटिंग सर्विसेज़ कंपनी एक्सेंचर के सर्वे पर. समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार तेईस देशों में 23 हज़ार उपभोक्ताओं के बीच किए गए सर्वे में एक्सेंचर ने पाया कि 46 फ़ीसदी लोगों की स्मार्टघड़ियों में और 42 फ़ीसदी लोगों की स्मार्टग्लास में रूचि है. ये उत्पाद खासतौर उन ग्राहकों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं जो स्वास्थ्य के प्रति सजग हों और अपनी गतिविधियों का हिसाब रखना चाहते हों. सैमसंग की स्मार्टघड़ी गैलेक्सी गियर को भारत में कोई खास प्रतिक्रिया तो नहीं मिली लेकिन बार्सिलोना में कंपनी ने एक और स्मार्टवॉच लॉन्च कर दी. सैमसंग का दावा है कि गैलेक्सी गियर फ़िट दुनिया की सबसे पहली सुपर एमोलेड टच डिस्प्ले वाली स्मार्टघड़ी है. ये मोबाइल नोटिफिकेशंस आपकी कलाई पर दिखा सकता है कॉल रिसीव या काट सकता है और गाने भी सुना सकता है. वहीं सोनी ने भी स्मार्ट बैंड लॉन्च किया जो सभी तरह के मौसमों और तापमान के लिए बनाया गया है. कंपनी का दावा है कि इस बैंड की बैटरी एक हफ्ते तक रह सकती है. दोनों उत्पाद मार्च में बाज़ार में आ सकते हैं. सोनी के स्मार्टबैंड की क़ीमत दस हज़ार रुपए तक हो सकती है जबकि सैमसंग की गियर फ़िट घड़ी की क़ीमतों पर सिर्फ क्यास ही लगाए जा रहे हैं. लेकिन जो काम ये घड़ियां करती हैं वो सभी काम फ़ोन्स पर हो जाते हैं. ऐसे में अब चुनाव आपको करना है कि आप जेम्स बॉन्ड की घड़ी जैसे किसी गैजेट के लिए अपना बटुआ हल्का करना चाहते हैं या नहीं. |
| DATE: 2014-02-27 |
| LABEL: science |
| [76] TITLE: दिमाग किस तरह फ़ैसले करता है? |
| CONTENT: हम जब कोई भी फ़ैसला लेते हैं किसी नतीजे पर पहुंचते हैं तो उससे पहले हमारे दिमाग में द्वंद्व चल रहा होता है- सहज बोध और तार्किकता के बीच. इस द्वंद्व में जिसकी जीत होती है हमारा नतीजा उसी से प्रभावित होता है. अगर आप ये सोचने लगे हों कि आप तार्किकता से फ़ैसले लेते रहे हैं तो एक मिनट ठहरिए क्योंकि वैज्ञानिक आधार पुष्टि करते हैं कि दिमाग में सहज बोध वाला हिस्सा कहीं ज़्यादा शक्तिशाली होता है. हम लोगों में से ज़्यादातर लोग मानते हैं कि हम तार्किकता से फ़ैसले लेते हैं लेकिन ज़्यादतर मामलों में ऐसा होता नहीं है. प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डेनियल काहनेमन ने इंसानी दिमाग के इसी पहलू को भांपने पर काम शुरू किया जिसने आगे चलकर उन्हें नोबेल पुरस्कार दिलाया. उन्होंने अपने काम में इंसानी ग़लतियों को आधार बनाया. ये अचानक हुई ग़लतियां नहीं हैं बल्कि ऐसी ग़लतियां हैं जो हम सब करते हैं हमेशा और इसका एहसास भी नहीं होता. प्रोफ़ेसर काहनेमन ने येरूशलम की हिब्रू यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रहे एमोस टेवर्स्के के साथ काम किया था जो स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से भी जुड़े रहे. हालांकि एमोस का अब निधन हो चुका है लेकिन इन दोनों ने तर्क के आधार पर यह साबित करने के कोशिश की कि हमारे अंदर सोचने की दो व्यवस्थाएं काम करती हैं. एक दिमाग का वह हिस्सा है जो किसी समस्या की गंभीरता को आंकता है और उसका एक तार्किक हल बताता है. हम लोग अपने दिमाग के इस हिस्से के बारे में जानते हैं. यह समस्या को सुलझाने का विशेषज्ञ है लेकिन यह धीमे काम करता है. इसे काम करने के लिए बड़ी ऊर्जा की ज़रूरत होती है. अब इसे समझने के लिए एक उदाहरण को समझा जा सकता है. टहलते वक़्त आपसे किसी ने कोई जटिल सवाल पूछ लिया तो सबसे पहले आप रुक जाते हैं क्योंकि सजग और चौकस दिमाग एक साथ दो काम कर ही नहीं सकते. लेकिन इसके अलावा दिमाग में एक दूसरा हिस्सा भी होता है. जो अपने आप सहज बोध से काम करता है. यह तेज़ भी होता है और भी ऑटोमेटिक काम करता है. यह शक्तिशाली है लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर नज़र नहीं आता. हालांकि यह इतना शक्तिशाली होता है कि हम जो भी काम करते हैं सोचते हैं या मानते हैं सबमें इसकी अहम भूमिका होती है. इतना सब कुछ होता है लेकिन आपको पता नहीं होता. क्योंकि यह अपने आप ही काम करता है और कई बार तो आपको अपने अंदर ही किसी दूसरे के होने का बोध कराता है. ज़्यादातर समय में हमारा तेज़ और सहज बोध वाला दिमाग हमारे रोजमर्रा के फ़ैसलों में अपनी भूमिका निभाता है. लेकिन मुश्किल तब पैदा होती है जब सहज बोध वाला दिमाग वह फ़ैसले ले लेता है जो हमारी धीमी और तार्किक प्रणाली को लेना चाहिए. यहीं पर ग़लतियां होती हैं. ऐसी ग़लतियों को मनोचिकित्सक कॉजिनिटिव बायस पूर्वाग्रह संबंधी धारणाएँ कहते हैं. यह हमारे हर काम को प्रभावित करता है. इसके चलते ही हम ज़्यादा पैसे ख़र्च करने लगते हैं सोचते हैं कि इससे लोग हमारे बारे में प्रभावित होंगे. यह हमारी सोच विचार और फ़ैसले को प्रभावित करता है और हमें इसके बारे में कुछ भी पता नहीं चलता. इस पर यकीन करना मुश्किल है महज इसलिए क्योंकि हमारा तार्किक दिमाग कोई ना कोई कहानी गढ़ लेता है. हमारी अधिकांश सोच एवं मान्यताएं अपने आप उत्पन्न होती है लेकिन इसके बाद तार्किक दिमाग इसके कारण ढूंढ लेता है. डेनिएल काहनेमन कहते हैं हमारी क्या राय है हम सोचें कि इसके लिए हमारे पास तर्क हैं ऐसी ग़लती हम प्राय करते हैं. हमारी सोच और इच्छा और हमारी उम्मीद हमेशा तर्क पर आधारित नहीं होते. उत्तीर कैरोलिना की ड्यूक यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डॉन एरेली कहते हैं पूर्वाग्रह के चलते हम कई काम करते हैं मसलन ज़्यादा खाते हैं सिगरेट पीते हैं एसएमएस करते हैं गाड़ी चलाते हैं और असुरक्षित सेक्स संबंध बनाते हैं. पूर्वाग्रह के अलावा एक कंफर्मेशन बायस भी होता है यह उन जानकारियों के प्रति होता है जिसके बारे में हम पहले से ही जान रहे होते हैं. इसके चलते ही हम वह अख़बार ख़रीदना पसंद करते हैं जो हमारे विचार से मेल खाता है. एक निगेटिव बायस भी हमारे अंदर होता है जिसके चलते हमें नकारात्मक घटनाएं सकारात्मक घटनाओं के मुक़ाबले पहले याद आती हैं. इन पूर्वाग्रह की मान्यताओं का सबसे ज़्यादा असर हमारे पैसे से जुड़ा होता है. यही वजह है कि प्रोफ़ेसर काहनेमन को नोबेल पुरस्कार मनोविज्ञान में नहीं मिला था क्योंकि मनोविज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार दिया ही नहीं जाता है बल्कि अर्थशास्त्र के लिए दिया गया. क्योंकि उनके सिद्धांतों के चलते अर्थशास्त्र की नई शाखा व्यावहारिक अर्थशास्त्र की शुरुआत हुई. उन्होंने यह भी महसूस किया था कि फ़ायदे और नुक़सान में हम अलग-अलग तरीक़े से रिएक्ट करते हैं. उनके मुताबिक़ नुक़सान में हमारा दुख ज़्यादा होता है फ़ायदे में उतनी प्रसन्नता नहीं होती. परंपरागत अर्थशास्त्र में यह माना जाता है कि हम अपने सारे फ़ैसले तार्किकता के आधार पर लेते हैं. लेकिन हक़ीकत इससे बेहद अलग होती है. व्यावहारिक अर्थशास्त्री अब कोशिशों में जुटे हैं कि एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनाई जाए जो हमारे फ़ैसलों की वास्तविकता पर आधारित हों. |
| DATE: 2014-02-27 |
| LABEL: science |
| [77] TITLE: चंद्रमा की सतह से उल्कापिंड टकराया |
| CONTENT: वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने चांद पर पहली बार ऐसा बदलाव देखा है जिसे अभूतपूर्व कहा जा सकता है. स्पेन के खगोलविदों ने पिछले सितंबर में चांद की सतह से एक उल्कापिंड टकराते हुए देखा था. इस उल्के का वज़न एक टन था. उन्होंने बताया कि इस टकराव से हुए विस्फोट में इतना प्रकाश निकला कि उसे धरती से नंगी आंखों से देखा जा सका. चांद की सतह से उल्कापिंड के टकराने की घटना के बारे में रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी ने जानकारी दी है. दक्षिण-पश्चिम स्पेन के हुलवा विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर जोस मेडिडो का कहना है चंद्रमा की सतह पर आने वाले बदलाव में यह अब तक का सबसे बड़ा और चमकदार है. चांद की सतह से उल्कापिंड के टकराने की इस घटना को मून इम्पैकट डिटेक्शन एंड एनालिसिस सिस्टम मिडास के टेलीस्कोप के ज़रिए रिकार्ड किया गया है. इसे दक्षिणी स्पेन में 11 सितंबर को 20-07 बजे ग्रीनविच मीनटाइम रिकॉर्ड किया गया. प्रोफ़ेसर मेडिडो का कहना है आमतौर पर चंद्रमा पर इस तरह के टकराव से पड़ने वाला प्रभाव थोड़े समय के लिए होता है- मात्र कुछ पलों के लिए. मगर इस बार जो प्रभाव देखा गया वह आठ सेकेंड से ज़्यादा का दर्ज किया गया. इसकी चमक लगभग ध्रुवतारे जितनी थी. शोधकर्ताओं का कहना है कि लगभग 400 किलो वज़न वाले चट्टान के उस गोले की रफ़्तार चांद की सतह से टकराने के पहले 61000 किमी थी. उनका मानना है कि 0-6-1-4 मीटर की चौड़ाई वाले द्रव्यमान का यह घन जब चंद्रमा से टकराया तो इसकी ऊर्जा 15 टन टीएनटी के बराबर दर्ज किया गया. पिछले साल मार्च में नासा के कैमरे ने चांद की सतह पर एक बड़े उल्कापिंड के टकराने से हुए विस्फोट की वीडियो रिकॉर्डिंग की था. यह विस्फोट उससे तीन गुणा ज़्यादा विस्फोटक पाया गया है. टीम का मानना है कि इस टकराव से चांद की सतह पर 40 मीटर चौड़ा गड्ढा बन गया है. पृथ्वी के विपरीत चांद का अपना कोई वायुमंडल नहीं होता जिसकी मदद से वह उल्कापिंडों को अपनी धरातल से टकराने से रोक सके. चांद की सतह पर ऐसे कई टकरावों के निशान देखे जा सकते हैं. शोधकर्ताओं का विश्वास है कि चांद और पृथ्वी दोनों पर जैसा कि पहले अंदाज़ा लगाया गया था अब एक मीटर व्यास वाले ऐसे चट्टानों के चांद की सतह से टकराने से पड़ने वाला प्रभाव उससे ज़्यादा आम बात हो गई है. हालांकि इस आकार के अधिकांश चट्टान जैसे ही पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं आसमान में वे जलते हुए गोले के रूप में दिखाई देते हैं. उल्कापंडों का प्रभाव ज़्यादा हो इसके लिए ज़रूरत है कि उनका आकार ज़्यादा बड़ा हो. उदाहरण के लिए अंदाज़ा लगाया गया है कि 15 फ़रवरी 2013 को रूस के चेल्याबिंस्क पर जो ऐस्ट्रॉयड में विस्फोट हुआ वह क़रीब 19 मीटर चौड़ा था. यह 500000 टन टीएनटी के बराबर ऊर्जा के साथ वायुमंडल से टकराया. इस टकराव से पूरे विश्व में दो बार शॉकवेव महसूस किए गए. इससे बड़े पैमाने पर नुक़सान हुआ और 1000 से ज़्यादा लोग घायल हुए. |
| DATE: 2014-02-25 |
| LABEL: science |
| [78] TITLE: स्पेशल इफ़ेक्ट जिनसे बदल रही है फ़िल्मी दुनिया |
| CONTENT: पिछले पिछले कुछ वर्षों के दौरान टेक्नॉलॉजी ने फ़िल्मों की दुनिया को तेज़ी से बदला है. फ़िल्में भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही हैं. बीबीसी के टेक्नॉलॉजी कार्यक्रम बीबीसी क्लिक ने फिल्मों में स्पेशल इफ़ेक्ट्स के लिए इस्तेमाल हो रही ऐसी ही तीन टेक्नॉलॉजी का जायज़ा लिया. इस साल होने वाले ऑस्कर में अगर आप कुछ ख़ास चीज़ें देखने की उम्मीद कर रहे हैं तो यकीन मानिए विजुअल इफ़ेक्ट कैटगरी में फ़िल्म ग्रैविटी ही जीत दर्ज करेगी. सैंड्रा बुलॉक और जॉर्ज क्लूनी जैसे दमदार सितारों की मौजूदगी के बावजूद इस फिल्म की ख़ासियत लंदन की स्पेशल इफ़ेक्ट्स कंपनी फ्रेमस्टोर का काम है. वीएफ़एक्स सुपरवाइज़र टिम वेबर के मार्गदर्शन में कंपनी ने निर्देशक अलफांसो क्यूएरन के साथ मिलकर भटके हुए दो अंतरिक्ष यात्रियों की कहानी को पर्दे पर उतारा है. वेबर मानते हैं कि सबसे मुश्किल काम अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण या इसकी सापेक्षिक कमी को दिखाना था और यह डिजिटल तकनीक के ज़रिए संभव हो सका. इस फिल्म का 80 फ़ीसदी हिस्सा डिजिटल शॉट से बना है. हर फ्रेम को रूपांतरित करने में करीब 50 घंटे लगे और अगर इस पूरी फ़िल्म को एक कम्प्यूटर से रूपांतरित किया जाता तो इसमें करीब 7000 साल लग जाते. पिछले एक दशक में जहां गतिविधियों की रिकॉर्डिंग का स्तर सुधरा है वहीं इंसानों जैसे दिखने वाले सीजीआई चेहरे कम्प्यूटर जनरेटेड इमेजरी बनाने का सफ़र भी आगे बढ़ा है. इस प्रक्रिया में कलाकारों को दूर रखने की बजाय अभिनय के दौरान उनके चेहरे के हाव-भाव को रिकॉर्ड किया जाता है. इसके बाद ये जानकारी सॉफ्टवेयर में डाली जाती हैं ताकि वास्तविक लगने वाले डिजिटल दृश्य मिल सकें. इस क्षेत्र में सबसे आधुनिक तकनीक है विकॉन कारा. इसके निर्माताओं का दावा है कि चेहरे के हाव-भाव की 3डी तस्वीरें लेने वाला यह दुनिया का पहला सिस्टम है. इसमें एक हल्के हैलमेट में चार एचडी कैमरा लगे होते हैं जो कि भावों को कैद करते हैं और अभिनेता को बिना बाधा अपना काम करने देते हैं. हालांकि बिल्कुल इंसान जैसे दिखने वाले सीजीआई चलचित्रों के हक़ीक़त में बदलने में अभी वक़्त है. लेकिन यह इस स्तर पर पहुंच गया है कि इंसानी भाव-भंगिमाओं को बाद में विज़ुअल इफ़ेक्ट के माध्यम से बदला जा सके हालांकि यह बहुत सूक्ष्म पैमाने पर ही संभव है. विकॉन के फ़िल एल्डरफ़ील्ड के अनुसार आप वास्तविक अभिनय से शुरुआत कर सकते हैं लेकिन आप चाहें तो इसमें थोड़ा बहुत बदलाव कर सकते हैं- आप इसे सुंदर बना सकते हैं या आप कुछ चीजों के प्रभाव को बढ़ा सकते हैं या कम कर सकते हैं. साल 2001 में फ़िल्म फ़ाइनल फैंटेसी द स्पिरिट्स विदिन रिलीज़ हुई. व्यापक पैमाने पर रिलीज़ होने वाली यह पहली फ़िल्म थी जिसमें पूरी तरह मोशन कैप्चर तकनीक का इस्तेमाल किया गया था. ऑडियोमोशन के स्टूडियो ऑक्सफ़र्ड के ठीक बाहर ही स्थित हैं और पिछले कुछ सालों में उन्होंने कई बड़ी फिल्मों और कम्प्यूटर गेम्स पर काम किया है. कंपनी की विशेषज्ञता चलचित्र या अभिनय को कैद करने में है. इसमें अभिनेताओं को ख़ास सूट पहनना पड़ता है जो हाई-रिफ्लेक्शन उच्च परावर्तन वाले बिंदुओं से ढका रहता है. इन बिंदुओं की स्थिति सेट में हर ओर लगे कैमरों से रिकॉर्ड की जाती है और विज़ुअल इफ़ेक्ट्स इंजीनियर अभिनेता की किसी खास गतिविधि की डिजिटल पुनर्रचना करने में सक्षम होते हैं. इस प्रक्रिया ने दूसरी लॉर्ड ऑफ द रिंग फ़िल्म द टू टॉवर्स की रिलीज़ के बाद व्यापक रूप से ख्याति अर्जित की जिसमें गोलम का किरदार निभाने वाले अभिनेता एंडी सरकिस की काफ़ी तारीफ़ हुई. पिछले दशक में तकनीकी विकास तेज़ी से हुआ है. बहुत जटिल क्षणों की बारीकियों को कैमरे में कैद कर पाना संभव हुआ है जबकि ज़्यादा वास्तविक लगने वाले इंसानों जैसे किरदार अब फ़िल्मों और कम्प्यूटर गेम्स में अब आम हो गए हैं. |
| DATE: 2014-02-25 |
| LABEL: science |
| [79] TITLE: अमरीका में फैली पोलियो जैसी बीमारी |
| CONTENT: अमरीकी चिकित्सकों ने पोलियो जैसी एक बीमारी के बारे में चेतावनी दी है जिससे कैलिफोर्निया में 20 से ज्यादा लोग संक्रमित हो गए हैं. अमेरिकन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी की एक बैठक में पता चला है कि कुछ मरीजों में चारों हाथ-पैर लकवा के शिकार हो गए जो इलाज के बाद भी ठीक नहीं हो पाए. अमरीका पोलियो मुक्त देश है लेकिन इससे संबंधित वायरस तंत्रिकातंत्र पर हमला कर सकते हैं जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को लकवा मार जाता है. हालांकि चिकित्सकों का कहना है कि उन्हें पोलियो जैसी महामारी की आशंका नहीं है और इस तरह का संक्रमण दुर्लभतम मामला है. पोलियो एक खतरनाक बीमारी है जिसके बारे में माना जाता है कि बच्चों में इसका संक्रमण होता है. इसका वायरस तंत्रिका तंत्र में तेजी से प्रवेश कर जाता है और 200 में से एक मामले में यह लकवे का कारण बनता है. यह फेफड़े को काम करने से रोक देता है इसलिए कुछ मामलों में जानलेवा साबित हो सकता है. वैश्विक टीकाकरण योजना के अनुसार पोलियो दुनिया के सिर्फ तीन देशों- अफ़गानिस्तान नाइजीरिया और पाकिस्तान में मौजूद है. पिछले 18 महीनों में इस नए संक्रमण के 20 मामले सामने आए हैं जिनमें ज्यादातर बच्चे हैं. पांच मामलों के विस्तृत अध्ययन से पता चला है कि पोलियो वायरस से संबंधित एंटेरोवायरस-68 इस संक्रमण का कारण हो सकता है. इन सभी मामलों में बच्चों का पोलियो टीकाकरण हो चुका था. इस बीमारी का लक्षण है एक पैर का अशक्त हो जाना और दोनों हाथ-पैर में भयंकर कमजोरी का आ जाना. सैनफ्रांसिस्को में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर इमैनुअल वावबैंट ने बीबीसी को बताया नए मामलों में वृद्धि नहीं हो रही है इसलिए हमें नहीं लगता कि महामारी आसन्न है. यह एक अच्छी खबर है. वे कहते हैं लेकिन उन लोगों के लिए यह बुरी खबर है जिनमें इस बीमारी के लक्षण उत्पन्न हो गए हैं जिनका असर मामूली से गंभीर तक हो सकता है. और उनमें बेहतर इलाज से भी सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही है. इस बीमारी से जुड़े मामले 160 किमी के दायरे से हैं. इसलिए शोध टीम को नहीं लगता है कि यह किसी एक वायरस के कारण फैला है या किसी महामारी का उभार है. हालांकि पोलियो की तरह ही बिना गंभीर लक्षण पैदा किए यह वायरस ज्यादा लोगों को संक्रमित कर सकता था. डॉक्टर वावबैंट को लगता है कि एशिया में हुए इसी तरह के मामलों से समझा जा सकता है कि क्यों केवल कैलिफोर्निया ही प्रभावित हुआ पूरा अमरीका नहीं. स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े सहयोगी शोधकर्ता डॉक्टर कीथ वॉन हैरेन कहते हैं कि सामने आए मामले कैलोफोर्निया में पोलियो जैसे लक्षण के उभार की संभावना को उजागर करते हैं. वो कहते हैं मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि इस तरह के लक्षण का उभरना बेहद दुर्लभ है. जब भी बच्चों में लकवे के लक्षण दिखें उन्हें तुरंत चिकित्सक के पास ले जाना चाहिए. नॉटिंघम विश्वविद्यालय में वायरोलॉजी के प्रोफेसर जोनाथन बॉल कहते हैं पोलियोवायरस से मुक्ति के समय से ही एक अन्य वायरस एंटेरोवायरस को लकवे से जोड़ा जाता रहा है लेकिन इनसे केवल हल्की सर्दी जैसे लक्षण पैदा होते हैं और गंभीर किस्म के लक्षण दुर्लभतम मामला है. वे कहते हैं दो बच्चों में एंटेरोवायरस-68 के संक्रमण का पता चला है जो श्वसन संबंधी दिक्कतें पैदा करने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार होता है. उन्होंने बताया एंटेरोवायरस का यह नमूना इन विशेष मामलों या लकवे के अन्य संभावित मामलों के लिए जिम्मेदार है या नहीं लेकिन आशंका विद्यमान है और इस बारे में और अध्ययन की जरूरत है. |
| DATE: 2014-02-25 |
| LABEL: science |
| [80] TITLE: सैमसंग स्मार्टफ़ोन में बायोमेट्रिक सिक्योरिटी |
| CONTENT: स्मार्टफ़ोन बाज़ार की अग्रणी कंपनी सैमसंग ने कहा है कि उसके गैलेक्सी स्मार्टफ़ोन की नई रेंज में बायोमेट्रिक सिक्योरिटी की व्यवस्था होगी. ऐपल के आईफ़ोन-5 की तरह सैमसंग के स्मार्टफ़ोन भी फिंगरप्रिंट स्कैनर से अनलॉक होंगे. सैमसंग का एस-5 स्मार्टफ़ोन अप्रैल में बाज़ार में आएगा. इस फ़ोन में पानी और धूल से बचने की भी व्यवस्था है. दक्षिण कोरिया की कंपनी सैमसंग ने साथ ही दुनिया का सबसे तेज़ ऑटो फ़ोकसिंग कैमरा बनाने का दावा किया है. कंपनी ने रविवार को दो स्मार्टवॉच गियर और गियर-2 नियो को बाज़ार में उतारने के साथ ही फ़िटनेस पर आधारित स्मार्टबैंड गियर फ़िट भी लॉन्च किया है. स्पेन के शहर बार्सिलोना में हुई मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस में सुरक्षा एक बहुत बड़ा मुद्दा था. इससे पहले सोमवार को साइलेंट सर्कल ने ब्लैकफ़ोन लॉन्च किया. इसमें कई स्पेशलाइज्ड सिक्योरिटी ऐप्स हैं जो इनक्रिप्टेड कम्युनिकेशन का इस्तेमाल करते हैं. सैमसंग के सिक्योरिटी फ़ीचर ने मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस में जमकर तालियां बटोरीं. फिंगरप्रिंट स्कैनर मोबाइल को अनलॉक करने के अलावा पावर पेमेंट के लिए भी इस्तेमाल किया जाएगा. इसके लिए सैमसंग ने पेपाल के साथ हाथ मिलाया है. इस स्कैनर को प्राइवेट मोड में भी रखा जा सकता है. इस तरह संवेदनशील सूचनाओं को एक जगह रखा जा सकता है जिन तक केवल स्कैनर के माध्यम से ही पहुँचा बन सकती है. ओवम के मुख्य विश्लेषक एडन जोलर ने कहा उपभोक्ता मौजूदा भुगतान व्यवस्था की सुरक्षा को लेकर पहले से ही चिंतित हैं और संभव है कि वे नई तकनीक को भी संदेह की दृष्टि से देखेंगे. उन्होंने कहा इसका सकारात्मक पहलू यह है कि सैमसंग बेहद लोकप्रिय स्मार्टफ़ोन ब्रांड है जिसकी पहुँच पूरी दुनिया में है. इसी तरह पेपाल भी एक भरोसेमंद पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर है. इस डेवाइस का एक फ़ीचर जो लोगों को बहुत पसंद आया वह है इसका ब्लैक एंड व्हाइट मोड. यह स्क्रीन द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली पावर के इस्तेमाल को सीमित करके बैट्री की लाइफ को बढ़ाता है. यूस्विचड डॉटकॉम के अर्नेस्ट डोकू ने कहा ऐसा लगता है कि सैमसंग ने सभी दूसरी मोबाइल कंपनियों के शानदार फ़ीचर एक सूत्र में पिरो दिए हैं. उन्होंने कहा इसमें ऐपल के आईफ़ोन-5एस की तरह फिंगरप्रिंट आईडी सेंसर और सोनी के एक्सपीरिया जे2 की तरह पानी और धूल से बचाने वाले फ़ीचर हैं तो साथ ही फ़ोटोग्राफी की ऐसी शानदार तकनीक है जो नोकिया को चुनौती दे सके. दुनिया के स्मार्टफ़ोन बाज़ार में इस समय सैमसंग का दबदबा है. स्ट्रैटजी एनालिस्टिक्स के मुताबिक़ साल 2013 में सैमसंग ने 45 करोड़ बीस लाख मोबाइल बेचे जबकि ऐपल इस दौरान 15 करोड़ तीनस लाख डिवाइस ही बेच पाई. लेकिन एस5 से पहले आया सैमसंग का एस4 स्मार्टफ़ोन एस3 की तरह धूम मचाने में नाकाम रहा. कंपनी को साथ ही चीन की उभरती कंपनियों शियोमी जेडटीई और लेनोवो से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. |
| DATE: 2014-02-25 |
| LABEL: science |
| [81] TITLE: सोते वक्त भी तकनीक रखेगी आप पर नज़र |
| CONTENT: अमरीका में इन दिनों ऐसे फ़िटनेस उपकरणों का चलन लगातार बढ़ रहा है जिसका इस्तेमाल आप पहनकर करते हैं. मोटे तौर पर अनुमान है कि देश में ऐसे उपकरणों का कारोबार करीब 3 अरब डॉलर करीब 186 अरब रुपये तक पहुंच चुका है. इन उपकरणों में शामिल है कलाई में बांधने वाला रिस्ट बैंड और स्मार्ट फ़ोन. इसके ज़रिए लोग अपनी शारीरिक कसरत कैलोरी सेवन और हृदय गति के बारे में जानकारी तो हासिल करते ही थे अब नींद के दौरान भी इन उपकरणों के ज़रिए शरीर में हो रहे बदलावों पर नजर रखना संभव हो पाया है. हाल के कुछ शोध अध्ययनों में भी यह बताया है कि इन उपकरणों की मदद से एथलीट के प्रदर्शन में सुधार हो सकता है. इसके बाद तो देश के ज़्यादातर खिलाड़ियों ने इसे अपनाना शुरू कर दिया है. एथलीट ट्रायफम एंडरसन बताते हैं रिस्ट बेंड की मदद से मुझे पता चल जाता है कि रात में मुझे कैसे नींद आई और मुझे किस तरह से शरीर का ख़्याल रखना है. अमरीका के जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी की बॉस्केटबॉल टीम काफी मशहूर है. अगले सीज़न में टीम के बॉस्केटबॉल खिलाड़ियों को वियरेबल तकनीक का इस्तेमाल करना होगा. क्योंकि टीम के कोच इस बहाने खिलाड़ियों के प्रदर्शन को बेहतर करना चाहते हैं. टीम के कोच मैथ्यू जॉनसन कहते हैं रिस्ट बेंड से शरीर की गति का पता चलता है और इससे खिलाड़ियों को ट्रेनिंग देने में मदद मिलती है. हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक इन उपकरणों की एक सीमा होती है और इससे सटीक आंकड़ों को हासिल करना मुश्किल है. स्लीप एक्सपर्ट डॉक्टर विवेक जैन कहते हैं सोने के दौरान हाथ इधर उधर मुड़ता है तो ऐसी स्थिति में आंकड़े तो प्रभावित होते हैं. सटीक आंकड़े के लिए मस्तिष्क की तरंगों का अध्ययन जरूरी होता है. ये उपकरण कितने प्रभावी हैं इसको लेकर संदेह बना हुआ है लेकिन अमरीका के एथलीट इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं. |
| DATE: 2014-02-23 |
| LABEL: science |
| [82] TITLE: हवाई जहाज़ में विंडो की जगह स्क्रीन ! |
| CONTENT: अब तक हवाई जहाज़ में सीटों या केबिनों के साथ विंडो लगाई जाती रही हैं लेकिन आने वाले दिनों में आपको विंडो की जगह पतली स्क्रीन दिखाई पड़ सकती है. इतना ही नहीं इन स्क्रीनों पर वो चित्र भी नजर आएंगे जो हवाई जहाज़ के बाहर लगे कैमरे खींच रहे होंगे. सुपरसोनिक जेट विमान बना रही स्पाइक एयरोस्पेस कंपनी इसे डिज़ाइन कर रही है. कंपनी के मुताबिक़ डिज़ाइन में इस बदलाव से एयरक्रॉफ्ट को बनाना कहीं ज़्यादा आसान हो जाएगा. हालांकि ऐसे विमान को आने में अभी समय लगेगा. एस-512 सुपरसोनिक जेट विमान के साल 2018 से पहले लॉन्च होने की उम्मीद नहीं है. कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर इसके बारे में लिखा है कि हवाई जहाज़ में विंडो लगाने के लिए अतिरिक्त ढांचे की ज़रूरत होती है और इससे विमान का वज़न भी ज़्यादा हो जाता है. स्पाइक एयरोस्पेस के मुताबिक़ माइक्रो कैमरा लगाने और फ्लैट स्क्रीन डिस्प्ले से कई मुश्किलें दूर हो जाएंगी. स्क्रीन पर आने वाली तस्वीरों को यात्री ख़ुद भी बदल सकते हैं. सेंट्रल लंकाशायर यूनिवर्सिटी में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के विशेषज्ञ डॉक्टर डारेन एंसेल के मुताबिक़ बिना विंडो के यात्रियों को हवाई जहाज़ असामान्य लग सकता है. एंसेल कहते हैं विंडो नहीं होने पर कोई प्राकृतिक रोशनी नहीं होगी. लोगों को ऐसा लग सकता है कि वे किसी ट्यूब में यात्रा कर रहे हैं. उनके मुताबिक़ सुरक्षा के लिहाज से यह चुनौतीपूर्ण होगा. एंसेल कहते हैं किसी हादसे के वक़्त आप कैसे देख पाएंगे कि जहाज़ किस तरह लैंड कर रहा है और अगर बाहर के कैमरों ने काम करना बंद कर दिया तब क्या होगा. स्पाइक एयरोस्पेस का मुख्यालय अमरीका के बोस्टन शहर में है और उसके पास एयरक्रॉफ्ट डिज़ाइन और निर्माण के बेहद अनुभवी और दक्ष इंजीनियरों की टीम है. बीते दिसंबर में कंपनी ने अपने एस-512 विमान के निर्माण की घोषणा की थी और दावा किया था कि यह दुनिया का पहला सुपरसोनिक बिज़नेस जेट विमान होगा. इस विमान की अनुमानित लागत 8 करोड़ डॉलर बताई जा रही है. ऐसे विमान में एक साथ 18 यात्री सफ़र कर पाएंगे. कंपनी के दावे के मुताबिक़ इसे न्यूयॉर्क से लंदन तक की दूरी को तय करने में तीन से चार घंटे का वक़्त लगेगा. अभी यह दूरी तय होने में छह से सात घंटों का वक़्त लगता है. ये विमान बोइंग 777-300 विमान से लगभग दोगुनी रफ़्तार से उड़ान भरेगा. ऐसा ही विमान एरियन और गल्फ़स्ट्रीम भी तैयार करने की कोशिशों में जुटी हैं. |
| DATE: 2014-02-21 |
| LABEL: science |
| [83] TITLE: जीपीएस की निगाह से कोई बच नहीं सकता |
| CONTENT: कई लोग सफ़र के दौरान अपनी मंज़िल तक पहुंचने और रास्ते से न भटकने के लिए जीपीएस का इस्तेमाल करते हैं. ड्राइवरों के मार्गदर्शन के लिए तो जीपीएस एक नक्शे की तरह काम करता है. लेकिन ऐसा नहीं है कि जीपीएस केवल नक्शे या किसी जगह को खोजने में ही उपयोगी है बल्कि अब जीपीएस का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में हो रहा है जिसकी वजह से कभी-कभी इसके अप्रत्याशित नतीजे भी देखने को मिलते हैं. मूलतः इसका इस्तेमाल सेना से जुड़े कामों के लिए किया जाता था. अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने यह फ़ैसला लिया था कि जीपीएस की सुविधा आम लोगों के लिए भी उपलब्ध होनी चाहिए और फरवरी 1989 में पहला ब्लॉक 2 सैटेलाइट लॉन्च किया गया. उस सैटेलाइट के लॉन्च होने के 25 साल बाद लोग जीपीएस का इस्तेमाल ऐसे कर रहे हैं जिसकी उस वक़्त बेहद कम लोगों ने कल्पना की थी. जीपीएस का अनुसरण कर आप ग़लत जगह पर भी पहुंच सकते हैं. देश के एक कोने से दूसरे कोने तक का रास्ता तलाशने के लिए आपको एक बड़े नक्शे की ज़रूरत होगी. लेकिन जब अमरीकी सरकार ने गैर-सैन्य उपयोगकर्ताओं के लिए बेहतर सैटेलाइट सिग्नल उपलब्ध कराने की इजाज़त देने के लिए नियमों में बदलाव किया तब कारों में इस्तेमाल करने के लिए जीपीएस उपकरणों की भरमार हो गई. कार में सफ़र के दौरान सुरीली आवाज़ में दाहिनी ओर मुड़ें या 200 गज की दूरी तय कर आप अपनी मंज़िल तक पहुंच जाएंगे सुनना अब बेहद आम बात है. जीपीएस सिग्नल भले ही ज़्यादातर वक़्त सटीक होता है लेकिन फिर भी कई दफ़ा ड्राइवर ख़ुद को बड़ी दुविधा की स्थिति में पाते हैं. साल 2009 में रॉबर्ट जोन्स वेस्ट यॉर्कशायर में जीपीएस की मदद से एक रास्ते की ओर बढ़ रहे थे और उनकी कार एक चट्टान के आख़िरी सिरे पर पहुंच गई. वर्ष 2012 में तीन जापानी पर्यटक ऑस्ट्रेलिया में छुट्टियां मनाने के लिए गए थे और उनकी गाड़ी के जीपीसी सिस्टम ने एक द्वीप तक पहुंचने का रास्ता बताते हुए उन्हें पानी से गुज़रकर जाने का संदेश दिया. इस तरह वे ड्राइविंग करने के बजाए तैरने की स्थिति में आ गए. घरेलू बिल्लियों की गतिविधि पर भी नज़र रखने के लिए जीपीएस है कारगरदुनिया भर के कई शहरों में यह नज़ारा बेहद आम होता है कि कई लोग अपनी नज़रें स्मार्टफोन के नक्शे में गड़ाए हुए रास्ते पर चलते रहते हैं ताकि उन्हें यह अंदाज़ा हो कि वे कहां जा रहे हैं. प्रोफ़ेसर पार्किंसन का कहना है ज़्यादातर लोग अब नक्शा नहीं बल्कि स्मार्टफ़ोन निकालते हैं और फिर वे दिशा ग़लत होने पर जीपीएस की शिकायत भी करते हैं. जीपीएस का इस्तेमाल जानवरों के विभिन्न समूहों के व्यवहार और गतिविधियों को समझने के लिए भी किया जाता रहा है. जीपीएस उपकरणों को जानवरों के शरीर में लगा कर इस सिद्धांत का परीक्षण किया गया कि किसी शिकारी के डर से भेड़ें कैसे झुंड के बीच में जाने की कोशिश करती हैं. इंग्लैंड के नॉर्थम्बरलैंड में गाय के गले में बांधी जाने वाली घंटी के बजाए जीपीएस कॉलर लगा कर यह पता लगाने की कोशिश की गई कि अपने स्थानीय क्षेत्र में मवेशी कैसे चरते हैं. घायल जंगली चूहों पर भी जीपीएस बैकपैक्स की मदद से परीक्षण किया गया ताकि संरक्षण विशेषज्ञ यह अंदाजा लगा सकें कि जब उन्हें जंगल में दोबारा छोड़ा गया तो उन्होंने कैसे अपने अस्तित्व को बनाए रखने की कोशिश की. कुछ पति-पत्नी एक-दूसरे पर जीपीएस ऐप्लीकेशन के ज़रिए निगाह रखते हैं. रॉयल वेटेनरी कॉलेज ने बीबीसी के होराइजन प्रोग्राम की टीम के साथ मिलकर एक जीपीएस टैग के ज़रिए बिल्लियों की गतिविधियों पर नज़र रखी तब घरेलू बिल्लियों की गुप्त ज़िंदगी से जुड़ी बातें सामने आईं. इससे यह नतीजा निकला कि कोई व्यक्ति भले ही यह सोचे कि उनकी बिल्लियां पड़ोसी के गार्डन में शिकार की खोज में होंगी जबकि वे दूसरी बिल्ली के मालिकों के घर में खाने का सामान ढूंढ रही होंगी. जो माता-पिता अपने बच्चों को लेकर चिंतित रहते हैं वे अब जीपीएस उपकरणों का इस्तेमाल कर उन पर नज़र रख सकते हैं. ऐसे जीपीएस टैग्स बैग कपड़े या कलाई वाले बैंड पर लगाए जाते हैं या फिर स्मार्टफ़ोन के जीपीएस ऐप्लिकेशन के ज़रिए भी उनकी गतिविधि पर निगाह रखी जा सकती है. अभिभावक खुले तौर पर या गोपनीय तरीके से भी जीपीएस उपकरणों का इस्तेमाल कर अपने बच्चों की निगरानी कर सकते हैं. गोल्फर भी जीपीएस चिप के ज़रिए यह पता लगा लेते हैं कि उनकी गेंद कहां गईइससे जुड़े कई दिलचस्प वाकये भी सामने आ रहे हैं मसलन एक पति ने कथित तौर पर अपनी पत्नी के मोबाइल फ़ोन में मौजूद जीपीएस फंक्शन का इस्तेमाल कर यह पता लगा लिया कि उनकी पत्नी न्यूयॉर्क में एक अलग जगह पर मौजूद हैं जबकि उन्होंने अपने पति को किसी और जगह पर होने के बारे में बता रखा था. प्रोफेसर पार्किंसन कहते हैं क्या गोपनीयता का गंभीर तरीके से उल्लंघन हो रहा है उन्होंने कहा मुझे पूरा यक़ीन है कि ऐसे कई वाकये होते होंगे जब कोई पति अपनी पत्नी पर नज़र रखने के साथ ही यह जानना चाहते हों कि उनका बच्चा कहां है. मेरी राय में इस तरह की निगरानी में कुछ ग़लत नहीं है. आजकल गोल्फर जीपीएस चिप के ज़रिए गोल्फ की गेंद खोजने में कामयाब हो रहे हैं. कुछ जीपीएस उपकरणों में अब ऑडियो सिस्टम भी होता है जिससे आवाज़ आती है. प्रोफेशनल फुटबॉलर अब जीपीएस का इस्तेमाल अपने खेल में सुधार के लिए कर रहे हैं. मैनचेस्टर सिटी और लीवरपूल जैसी टीमें भी अब जीपीएस मॉनिटर का इस्तेमाल प्रशिक्षण सत्र के दौरान करती हैं ताकि खिलाड़ियों की रफ़्तार उनके द्वारा तय की जाने वाली दूरी और उनके ह्रदय गति का अंदाज़ा लगाया जा सके. अमेरिका के कुछ राज्यों में अपराधियों को पकड़ना पिछले साल से तब आसान हो गया जब पुलिस बल ने जीपीएस गोलियों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. कार में भाग रहे अपराधियों का पीछा करना बेहद जोखिम भरा काम हो सकता है लेकिन अगर एक बटन दबा कर जब जीपीएस गोली दाग़ी जाती है तब वह गोली कार से जुड़ जाती है जिसका अंदाज़ा ड्राइवर को भी नहीं लग पाता. ऐसे में पुलिस उस गाड़ी पर आसानी से निगाह रख सकती है और उसे पकड़ सकती है. भविष्य में जीपीएस के इस्तेमाल करने के नए तरीक़ों को ईज़ाद कर कई तरह के समाधान निकाले जा सकते हैं. |
| DATE: 2014-02-20 |
| LABEL: science |
| [84] TITLE: वैज्ञानिकों ने बनाया 'न सड़ने वाला आलू' |
| CONTENT: ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने ऐसा जेनेटिकली मॉडिफाइड जीएम आलू विकसित किया है जिसमें लेट ब्लाइट फफूंद के कारण होने वाली सड़न नहीं होगी. तीन साल तक किए गए परीक्षण में यह जीएम आलू इस बीमारी के प्रभाव में आने के बावजूद विकसित होने में सफल रहा. फफूंद के कारण होने वाली सड़न से किसान कई पीढ़ियों से परेशान रहे हैं. आलू में फफूंद से होने वाली सड़न के कारण ही आयरलैंड में साल 1840 के दशक में आलू की खेती का सूखा पड़ा था. यह शोध फिलोसॉफिकल ट्रांजेक्शन ऑफ दि रॉयल सोसाइटी ब्रिटेन जर्नल में प्रकाशित हुआ है. फफूंद के कारण सड़न का सबसे आसान शिकार आलू ही होता है. आलू जैसी सब्ज़ियों को सड़ाने वाली यह फंफूद नमी और उमस वाले मौसम में विशेष रूप से पनपती है. यूरोप में आलू के उत्पादन के मौसम में आमतौर पर नमी और उमस पाई जाती है. यह संक्रमण बहुत तेज़ी से फैलता है और इसका असर इतना व्यापक होता है कि ब्रिटेन में पैदा होने वाले कुल आलू में से 60 लाख टन आलू इसकी वजह से सड़ जाता है. इससे बचने के लिए किसानों को लगातार सावधान रहना पड़ता है. इससे बचाव के लिए उन्हें साल में 15 बार तक कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता है. बॉयो-टेक्नॉलॉजी के प्रयोग से फसलों को बचाने की संभावना की जांच के लिए यूरोप-स्तर पर शोध कर रहे जॉन इन्ज़ सेंटर और सेंसबरी प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने साल 2010 से ही जेनेटिक मॉडिफिकेशन की सहायता से ऐसी सड़न रोकने के लिए परीक्षण शुरू कर दिए थे. शोधकर्ताओं ने लाल आलू की एक प्रजाति में दक्षिणी अमरीका के एक जंगली आलू का एक ऐसा जीन डाला जिसकी वजह से इस आलू में फफूंद से होने वाली सड़न के ख़िलाफ़ प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में मदद मिली. शोध से जुड़े हुए वैज्ञानिकों ने बताया कि इस आलू में अतिरिक्त जीन डालना आलू के पौधे की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए ज़रूरी है. इस शोधपत्र के प्रमुख लेखक और सेंसबरी प्रयोगशाला के प्रोफ़ेसर जोनाथन जोंस कहते हैं मुझे लगता है कि इस बीमारी पर रासायनिक रूप से नियंत्रण करना बेहतर विकल्प है. साल 2012 में परीक्षण के तीसरे साल ग़ैर-जीएम आलुओं में अगस्त तक सड़न होने लगी थी जबकि जीएम आलुओं में सड़न नहीं हुई. दूसरी सबसे ख़ास बात है कि इन जीएम आलुओं की पैदावार की दर भी सामान्य आलुओं से लगभग दोगुनी रही. हालांकि वैज्ञानिकों ने इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है कि इस जीएम आलू का स्वाद कैसा है क्योंकि उन्हें जीएम आलू को खाने की मनाही थी. लेकिन वैज्ञानिकों ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि ऐसी कोई वजह है जिससे नए जीन से आलू का स्वाद बदल जाए. फफूंद के कारण होने वाली सड़न बार-बार सिर उठा लेने वाली बीमारी है इसलिए सेंसबरी प्रयोगशाला के वैज्ञानिक ऐसे जीन की तलाश में हैं जो आलू की प्रतिरोधक क्षमता को और ज़्यादा बढ़ा सके. इस तकनीक से आलुओं में फफूंद के कारण सड़न की मात्रा में काफ़ी कमी आ सकेगी. हालांकि इससे यह जीएम आलू थोड़ा महंगा हो जाएगा. प्रोफ़ेसर जोंस कहते हैं फिर भी इससे किसानों को फायदा ही होगा. उन्हें बीज पर ज़्यादा खर्च करना होगा लेकिन सड़न से बचाव पर होने उनके खर्च में काफ़ी कमी आएगी. वैज्ञानिकों का मानना है कि असल चुनौती इस जीएम आलू के उत्पादन की अनुमति प्राप्त करना है. वैज्ञानिकों ने इस जीएम आलू के उत्पादन का लाइसेंस एक अमरीकी कंपनी सिम्पलोट को दिया है. यह कंपनी इस आलू को अमरीका में पैदा करना चाहती है. प्रोफ़ेसर जोंस कहते हैं यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि यूरोप के करदाताओं के पैसे का लाभ यूरोप के लोगों से पहले अमरीकी किसानों को मिलेगा. वे कहते हैं इस तरह के उत्पाद अमरीकी बाज़ार में अगले कुछ सालों में और यूरोप में अगले आठ से 10 सालों में आएँगे. जीएम खाद्य पदार्थों के आलोचकों का कहना है कि चाहे जितना भी बड़ा पर्यावरणीय लाभ हो उन्हें विश्वास है कि ग्राहक इसमें रुचि नहीं दिखाएंगे. इस तरह के खाद्य पदार्थों का विरोध करने वाली संस्था जीएम फ्रीज़ के निदेशक लिज़ ओ-नील कहते हैं क्या सचमुच कोई जीएम आलू पैदा करने बेचने या ख़रीदने जा रहा है क़ानून कहता है कि ऐसे पदार्थों पर जीएम लिखना अनिवार्य है. हमारे अनुभव बताते हैं कि ब्रितानी लोग ऐसी चीज़ें नहीं खरीदना चाहते और ब्रितानी ऐसी चीज़ें नहीं पैदा करेंगे जिसे वह बेच नहीं सके. दूसरे कई शोधकर्ताओं ने इस नए शोध का स्वागत करने के बावजूद इस नए जीएम आलू के ब्रिटेन में उत्पादन को लेकर नकारात्मक प्रतिक्रिया दी है. एबेरीस्टविथ विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर क्रिस पोलाक कहते हैं आलू में होने वाली सड़न एक मुश्किल बीमारी है. दुर्भाग्यवश यूरोप का मौजूदा क़ानून काफ़ी महंगा और धीमा है. इसका मतलब यह है कि ब्रितानी वैज्ञानिकों की उपलब्धि का लाभ पहले दूसरे देशों को मिलेगा. इस परीक्षण के लिए वैज्ञानिकों ने आलू के केवल 600 पौधे उगाए थे. हालांकि तीन साल तक चले परीक्षण में आलुओं को बचाए रखने में 40000 पाउंड तक़रीबन साढ़े 41 लाख रुपये खर्च हुए. |
| DATE: 2014-02-18 |
| LABEL: science |
| [85] TITLE: बिजली लाइनों से कैंसर का अधिक ख़तरा नहीं |
| CONTENT: एक शोध में कहा गया है कि बिजली लाइनों के नज़दीक रहने वालों बच्चों को ल्यूकेमिया का ज़्यादा ख़तरा नहीं होता है. 1962 से 2008 के बीच ब्रिटेन में ल्यूकेमिया से पीड़ित होने वाले 16500 बच्चों के डाटा के विश्लेषण के बाद ये नतीजा निकाला गया है. शोध में पाया गया कि बिजली की लाइनों के नज़दीक रह रहे बच्चों में 1980 के बाद से ल्यूकेमिया का ख़तरा नहीं बढ़ा है. हालाँकि 60 और 70 के दशक में ये ख़तरा ज़्यादा ज़रूर था. शोधकर्ताओं का कहना है कि नतीजे आश्वस्त करने वाले ज़रूर हैं लेकिन ऐतिहासिक नमूनों को समझने के लिए इस दिशा में और काम किया जा रहा है. बच्चों को होने वाले कैंसर में एक तिहाई ल्यूकेमिया ही होता है. ब्रिटेन में हर साल 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में ल्यूकेमिया के 460 नए मामले सामने आते हैं. यूनीवर्सिटी ऑफ़ ऑक्सफ़ोर्ड के चाइल्ड कैंसर रिसर्च सेंटर ने शोध के लिए नेशनल रजिस्ट्री ऑफ़ चाइल्डहुड ट्यूमर्स के डाटा का इस्तेमाल किया. इस शोध में 1962 से 2008 के बीच ब्रिटेन में ल्यूकेमिया का इलाज करवाने वाले 16500 बच्चों के डाटा का विश्लेषण किया गया. उनकी तुलना उन बीस हज़ार बच्चों से की गई जिन्हें कैंसर नहीं हुआ था. डाटा के विश्लेषण से यह नतीजा निकाला गया कि बिजली की लाइनों के नज़दीक रहने वाले बच्चों को ल्यूकेमिया होने का अधिक ख़तरा नहीं होता है. हालाँकि जब डाटा का हिस्सों में विश्लेषण किया गया तो यह नतीजा निकला कि बिजली की लाइनों के नज़दीक रहने वाले बच्चों को 60 और 70 के दशक में ल्यूकेमिया होने का ख़तरा अधिक था. जबकि 1980 के बाद पैदा हुए बच्चों को कैंसर होने का ख़तरा अधिक नहीं था. शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे प्रतीत होता है कि बिजली की लाइनों का ल्यूकेमिया के ख़तरे से सीधा संबंध नहीं है. शोधकर्ता कैथरीन बंच ने बीबीसी से कहा मैं ज़ोर देकर यह कहना चाहती हूं कि यह जानकारी अभिभावकों के लिए निश्चिंत करने वाली है. लेकिन जब तक हम यह नहीं बता पाते कि पहले के दशकों में ये ख़तरा क्यों बढ़ा था तब तक हम कुछ परिस्थितियों में ख़तरा होने की संभावना को नहीं नकार सकते. शोधकर्ताओं का कहना है कि वे यह नहीं जानते हैं कि 60 और 70 के दशक में ये ख़तरा ज़्यादा क्यों था. शोधकर्ता अब इस सवाल का जबाव तलाशने की दिशा में ही काम कर रहे हैं. वे पता लगाएंगे कि क्या लाइनों से निकलने वाले प्रदूषण में बदलाव हुआ है या लाइनों के नज़दीक रहने वाली जनसंख्या में बदलाव हुआ है. |
| DATE: 2014-02-17 |
| LABEL: science |
| [86] TITLE: गणित के सुंदर सूत्र, जैसे कोई संगीत जैसे कोई कविता |
| CONTENT: गणित को सबसे कठिन माना जाता है लेकिन एक ताज़ा शोध में पता चला है कि गणित के सूत्र में मौजूद अंकों और अक्षरों का जटिल सिलसिला मस्तिष्क में आनंद की वैसी ही अनुभूति पैदा करता है जैसी एक शानदार कलाकृति को देखकर या महान संगीतज्ञों का संगीत सुनकर पैदा होती है. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में ब्रेन स्कैनिंग के दौरान कुछ गणितज्ञों को अप्रिय और सुंदर समीकरणों को दिखाया गया. शोधकर्ताओं ने पाया कि कला को सराहने में मस्तिष्क का जो हिस्सा सक्रिय होता है वही हिस्सा सुंदर गणित से उत्प्रेरित होता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि सुंदरता के न्यूरोबायोलाजिकल कारण हो सकते हैं. हालांकि यूलर और पाइथागोरस के गणितीय सूत्रों को शायद ही कभी मोजार्ट शेक्सपियर और वॉन गॉग के समानांतर रखा जाता है. फ्रन्टियर्स इन ह्यूमन न्यूरोसाइंस में प्रकाशित इस अध्ययन में 15 गणितज्ञों को गणित के 60 सूत्र दिए गए थे. शोधकर्ता प्रोफेसर समीर जकी ने बीबीसी को बताया एक समीकरण को देखने में मस्तिष्क का एक बड़ा हिस्सा सक्रिय होता है लेकिन जब कोई सुंदरतम सूत्रों को देखता है तो भावनात्मक मस्तिष्क वैसे ही सक्रिय हो जाता है जैसे किसी सुंदर तस्वीर को देखने या सुकूनदायक गाने को सुनने पर होता है. यह हिस्सा होता है मस्तिष्क के बीच स्थित आर्बिटो फ्रंटल कार्टेक्स. ब्रेन स्कैन से पता चला है कि जो गणितीय सूत्र जितने अधिक सुंदर आंके गए थे वे उतना ही अधिक मस्तिष्क हलचल पैदा करने में सफल रहे. शायद पहली बार देखने वालों के लिए यूलर के गणितीय फार्मूले में इतनी सुंदरता न दिखे लेकिन अध्ययन में पता चला है कि गणितज्ञों का यह सबसे पसंदीदा रहा. इंस्टीट्यूट ऑफ मैथमेटिक्स एंड इट्स अप्लीकेशन से जुड़े प्रोफेसर डेविड पर्सी का भी यही पसंदीदा फार्मूला है. वो बताते हैं यही असली क्लासिक है और आप इससे बेहतर कुछ और नहीं कर सकते. वे कहते हैं यह देखने में जितना ही सामान्य सा है उतना ही अथाह है. इसमें पांच महत्वपूर्ण गणितीय नियतांक हैं- शून्य 1 ई पाई और आई बुनियादी काल्पनिक नंबर. इस सूत्र में गणित के तीन मूल क्रियाएं शामिल हैं योग गुणन और घातांक. वे कहते हैं शुरू में आपको इसकी जटिलता का आभास नहीं होगा. इसका धीरे-धीरे असर होता है. उसी तरह जैसे आप संगीत सुन रहे हों लेकिन जब इसकी संभावना से आप रूबरू होंगे अचानक ही आप हैरत में पड़ जाएंगे. इस अध्ययन में श्रीनिवास रामानुजन के गणितीय सूत्र इनफाइनाइट सिरीज और रीमैन के फंक्शनल इक्वेशन को सबसे अप्रिय सूत्रों में शुमार किया गया है. |
| DATE: 2014-02-16 |
| LABEL: science |
| [87] TITLE: माँ के आहार से तय होता है बच्चों का मोटापा! |
| CONTENT: गर्भावस्था के दौरान ज़्यादा चिकनाई वाला भोजन शिशु के विकसित होते मस्तिष्क में बदलाव ला सकता है और ये बाद में मोटापे की संभावनाओं को बढ़ाता है. यह जानकारी जानवरों पर हुए ताज़ा अध्ययन में सामने आई है. अमरीका के येल स्कूल ऑफ़ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने बताया कि आहार चूहों के मस्तिष्क की संरचना को बदल सकता है. इन शोधकर्ताओं का मानना है कि इससे मोटे माता-पिता के बच्चों के मोटे होने की संभावना ज़्यादा होने की व्याख्या हो सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह शोध महत्वपूर्ण है लेकिन मनुष्यों में होने वाले मस्तिष्क संबंधी परिवर्तनों की अभी पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन मोटापे का असर पूरे परिवार पर हो सकता है और खानपान की साझा आदतें इसका एक महत्वपूर्ण कारण है. हालांकि इस बात के सबूत मौजूद हैं कि गर्भावस्था के दौरान खानपान से भविष्य में बच्चों के वजन पर असर हो सकता है ऐसा डीएनए में होने वाले परिवर्तन से संभव है. इस क्षेत्र में ताज़ा और शुरुआती अध्ययन जर्नल सेल में प्रकाशित हुआ जो दिखाता है कि मस्तिष्क की संरचना भी बदल सकती है. चूहों पर किए गए शोध से पता चला कि ज़्यादा वसा वाले भोजन का सेवन करने वाली चुहिया के बच्चों के हाइपोथैलेमस में परिवर्तन देखा गया हाइपोथैलेमस मस्तिष्क का वह महत्वपूर्ण हिस्सा है जो मेटाबॉलिज़्म को नियंत्रित करता है. सामान्य आहार लेने वाली चुहिया के बच्चों की तुलना में ज़्यादा चिकनाई लेने वाली चुहिया के बच्चों के मोटे होने और टाइप-2 मधुमेह से ग्रस्त होने की संभावना ज़्यादा थी. येल के एक शोधकर्ता प्रोफ़ेसर टॉमस होर्व्थ ने बीबीसी को बताया यह बच्चे के लिए एक संकेत हो सकता है कि वह ज़्यादा वृद्धि कर सकता है क्योंकि पर्यावरण में आहार पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है. उन्होंने कहा हम निश्चित तौर पर मानते हैं कि यह आधारभूत जैविक प्रक्रियाएं हैं जिनका असर इंसानों पर भी होता है. और इनसे पता चल सकता है कि बच्चे आखिर मोटे कैसे होते हैं. प्रोफ़ेसर टॉमस होर्व्थ के मुताबिक़ गर्भावस्था के दौरान संतुलित आहार लेना मोटे माता-पिता के मोटे बच्चे होने के चक्र को तोड़ सकता है. अध्ययन के निष्कर्षों के बारे में साउथैंपटन यूनिवर्सिटी के डॉक्टर ग्राहम बर्ज ने बीबीसी से कहा पिछले बीस साल के शोध दिखाते हैं कि जीवन के शुरुआती दिनों के पोषण का दिल की बीमारियों मोटापे ऑस्टिओपोरोसिस और कुछ कैंसर पर काफ़ी गहरा असर पड़ता है. उन्होंने कहा यह एक दिलचस्प तकनीकी विकास है जो दिखाता है कि न्यूरोलॉजिकल सर्किट में बदलाव हो रहा है इससे पहले कभी ऐसा नहीं दिखा था. उनका कहना है कि यह सिद्धांत आँकड़ों के साथ सटीक बैठता है लेकिन चूहों और इंसानों में चिकनाई को पचाने के तरीके में अंतर है इसलिए मुमकिन है कि यही बात गर्भवती महिला पर न लागू हो. वह माता-पिता को सलाह देते हैं स्वस्थ और संतुलित आहार लीजिए और ध्यान रखिए कि आपके बच्चे का आहार भी संतुलित हो. |
| DATE: 2014-02-15 |
| LABEL: science |
| [88] TITLE: नाज़ियों ने किया था 'मच्छरों पर शोध' |
| CONTENT: जर्मनी के वैज्ञानिकों ने दूसरे विश्व युद्ध में मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों के हथियार के तौर पर इस्तेमाल को लेकर शोध किया था एक शोधकर्ता ने ये दावा किया है. टूइबगेन विश्वविद्यालय के डॉक्टर क्लाउज़ राइनहार्ट ने डखौव के कीट अनुसंधान संस्थान में दस्तावेजों का अध्ययन किया है. डखौव में नाज़ियों का यातना शिविर था. डॉक्टर राइनहार्ट ने पाया कि जीवविज्ञानियों ने इस बात का अध्ययन किया था कि कौन से मच्छर अपने प्राकृतिक आवास से बाहर जीवित रहने में सक्षम होंगे. डॉक्टर राइनहार्ट का मानना है कि ऐसा लगता है कि इन मच्छरों को दुश्मन के इलाके में गिराए जाने की रणनीति रही होगी. नाज़ियों के अर्धसैनिक संगठन शुट्ज़स्टाफ़ेल के नेता हाइनरिख हिमलर ने डखौव के कीट अनुसंधान संस्थान की स्थापना साल 1942 में की थी. माना जाता है कि इस संस्थान का काम कीड़ों से होने वाली बीमारियों पर ध्यान देने का था. डॉक्टर राइनहार्ट ने विज्ञान जर्नल एंडीवर में लिखा है कि उन्हें इस बात के सबूत मिले हैं कि इस यूनिट के शोधकर्ता एक ख़ास किस्म के मच्छर पर शोध कर रहे थे जो कि पानी और खाने के बगैर चार दिन तक रह सके. उनका कहना है कि इसका मतलब ये हुआ कि इस मच्छर को मलेरिया से संक्रमित करने के बाद इसे हवा से गिराया जाता ये लंबे समय तक जीवित रहता और बड़ी तादाद में लोगों को संक्रमित करता. उनका अनुमान है कि वैज्ञानिक मलेरिया के जैविक हथियार के तौर पर संभावित उपयोग की जांच कर रहे थे. अभी ये साफ़ नहीं है कि डखौव के कीट अनुसंधान संस्थान के काम और डखौव के यातना शिविर में डॉक्टर क्लाउज़ शिलिंग ने जो प्रयोग किए उनमें कोई संबंध है या नहीं. डॉक्टर शिलिंग ने मलेरिया को लेकर किए प्रयोगों में बंदियों का इस्तेमाल किया था उन्हें जानबूझकर संक्रमित किया गया था. डॉक्टर शिलिंग को दूसरे विश्वयुद्ध के बाद फांसी की सज़ा दे दी गई थी. |
| DATE: 2014-02-15 |
| LABEL: science |
| [89] TITLE: टोपी पहनिए और दिमाग से तैयार कीजिए धुन |
| CONTENT: शास्त्रीय संगीत की शिक्षा के दौरान मैं ख़ाली पन्ने को घूरती रहती और उम्मीद करती कि कोई शॉर्टकट हो जिससे मैं सोच कर संगीत को पेज पर उतार सकूँ. अब मैं कंप्यूटर पर संगीत तैयार करती हूं और पिक्सल्स के ऊपर पेंसिल घुमाती रहती हूं. लेकिन मैं हमेशी ही सोचती थी कि एक दिन मैं सीधे अपने दिमाग से अपने संगीतमय विचारों को रिकॉर्ड कर पाउंगी. तो प्लीमथ विश्वविद्यालय में एक लैपटॉप को घूरते हुए मैं एक ऐसी तकनीक की जांच करने जा रही हूं जो मेरे संगीत के सपने को हक़ीक़त बनाने का वादा करता है. यह परियोजना प्रोफ़ेसर एडुआर्डो मिरांडा के दिमाग़ की उपज है. वह एक संगीतकार हैं जिनकी जीविका का साधन संगीत न्यूरोटेक्नॉलॉजी है. एक ब्रेन कैप के माध्यम से उनका उपकरण दिमाग में चल रहे विचारों को पढ़ता है और उन्हें संगीत में बदल देता है. उनकी योजना चार लोगों के दिमाग से विचार लेकर उन्हें एक साथ पिरोने की है. इसी के आधार पर उनकी नवीनतम संगीत रचना तैयार होगी - जिसका नाम एक्टिवेटिंग मेमोरी है. इस संगीत रचना को इसी हफ़्ते के अंत में प्लीमथ में होने वाले साल 2014 पेनिसुला आर्ट्स कंटप्रेरी म्यूज़िक फ़ेस्टिवल में पेश किया जाएगा. वह मुझे भी अपनी मशीन का इस्तेमाल करने देने को तैयार हो गए और मैं इसके लिए उत्सुक थी. शोधकर्ता और अभियंता जोएल ईटोन ने मुझे ब्रेन कैप पहनने में मदद की जिसमें से तार और एलेक्ट्रॉड्स निकल रहे थे. उन्होंने मुझे समझाया कि न्यूरोटेक्नॉलॉजी कैसे काम करती है. जोएल ने मुझे बताया कि दिमाग के पीछे लगा मुख्य इलेक्ट्रॉड मेरे विज़ुअल कॉरटेक्स से दिमाग की तरंगों को चुनेगा जबकि अन्य इलेक्ट्रॉड्स पीछे के शोर को कम करने में मदद करेंगे. इस उपकरण के काम करने के लिए उपयोगकर्ता को चार रंग बिरंगे आकारों में से किसी एक पर ध्यान केंद्रित करना होता है. यह सब अलग-अलग गति से टिमटिमाते हैं और हर आकार से विद्युत तरंग पैदा होती है. इस सिग्नल को ब्रेन कैप पकड़ लेता है और कंप्यूटर में भेज देता है. यह उपकरण सही ढंग से तभी काम करता है जब बाक़ी का दिमाग शांत हो. इसलिए लोगों से कहा जाता है कि दिमाग़ को शांत रखें. दिमाग़ के इलेक्ट्रिक सिग्नलों को बढ़ाया जाता है और फिर लैपटॉप में डाला जाता है. जोएल मुझे उत्साहित करते हैं कि मैं आकार को एक ख़ास ढंग से घूरूं - ध्यान केंद्रित और विकेंद्रित करने की तरह. कई बार मुझे स्क्रीन से नज़र हटाकर फिर वापस देखना होता है - ताकि दिमाग़ ताज़ा हो जाए. आप इसे सही ढंग से समझ गए तो चयनित आकार जेन के सामने रखी स्क्रीन पर एक संगीत का टुकड़ा भेज देता है. जेन एक व्यावसायिक सेलोवादक हैं जो उसके बाद मेरे द्वारा भेजे गए संगीत के टुकड़े को बजाती हैं. शुरू-शुरू में तो यह बहुत मुश्किल था - ध्यान केंद्रित करना विकेंद्रित करना और आराम करना. जब यह हो गया तो मैं बहुत उत्साहित नहीं हो सकती थी क्योंकि यह मेरे दिमाग़ को सिग्नल पैदा करने की स्थिति से बाहर कर देता. यह बहुत मुश्किल काम था क्योंकि मुझे यह सारा विचार ही बहुत उत्साहजनक लग रहा था. यकीनन मैं चाहती थी कि यह सिस्टम सीधे मेरे दिमाग से ही संगीत तैयार कर देता लेकिन ऐसा नहीं था. सीधे धुन बनाने के बजाय यह पूर्व-निर्मित धुनों में से ही एक चुनता है. आप कह सकते हैं मैं धुन बनाने के बजाए उसे बजाने वाली थी जहां मेरा दिमाग जेन के सेलो की तरह एक उपकरण बन गया था. लेकिन यह उपकरण इसी काम के लिए तैयार किया गया था. जब मैंने प्रोफ़ेसर मिरांडा से सीधे धुन बनाने की अपनी इच्छा के बारे में बात की तो उनका कहना था कि शुरुआत में यह बहुत अच्छा लग सकता है लेकिन उन्हें लगता है कि कुछ समय बाद यह उकताहट भरा हो जाएगा. वह चार चार लोगों के दिमाग से विचार लेंगी और फिर उन्हें मिलाकर संगीत तैयार करेंगी. उन्हें अपूर्ण समाधान की चुनौतियां पसंद हैं. वह कहते हैं इंसान चीजों में हेर-फेर करना पसंद करते हैं - मैं इसे ख़त्म नहीं करना चाहता मैं संगीतकारों के लिए ज़्यादा परिष्कृत उपकरण बनाना चाहता हूं. जिन लोगों को चलने-फिरने में दिक्क़त होती है उन लोगों को इस उपकरण से काफ़ी फ़ायदे हैं इस शुरुआती स्तर पर भी. कंप्यूटर संगीत शोध के बहुविषयक केंद्र आईसीसीएमआर में लॉक्ड-इन सिंड्रॉम ऐसी समस्या जिसमें मरीज़ होश में रहते हुए भी आंखों के सिवा कोई और अंग नहीं हिला पाता के मरीज़ों के साथ किए गए प्रयोग में उत्सावहवर्धक नतीजे सामने आए हैं. फिर भी मेरी उम्मीद के विपरीत इसके आम-आदमी के इस्तेमाल में आने की बात अभी दूर है. उधर प्रयोगशाला में इस तकनीक पर महारथ हासिल करना बेहद मुश्किल नज़र आ रहा था. इस प्रक्रिया के दौरान मेरे दिमागी तरंगे तब उल्लेखनीय रूप से कम हो गईं जब सेलो बज रहा था. दो घंटे की मुश्किल के बाद मैं ठीक ढंग से तरंगें पैदा करने में कामयाब हो गई. जोएल और एडुआर्डो दोनों ने मुझे बताया कि दो घंटे का समय कम है - अक्सर इसमें कुछ दिन लग जाते हैं. तमाम चुनौतियों और सीमाओं के बावजूद मौजूदा दिमाग-कंप्यूटर-संगीत इंटरफ़ेस से अपने दिमाग के भीतर झांकना मुझे बेहद आदी करने वाला लगा. और मैं यकीनन इस तकनीक के विकास पर नज़र रखूंगी. हालांकि इतना ज़्यादा ध्यान केंद्रित करने से हुई थकान के बावजूद मैं ख़ुशी-ख़ुशी कई घंटे और स्क्रीन को घूर सकती हूं. लेकिन संगीतकारों का खाना तैयार था और उन्हें निकलना था इसलिए मैंने अपनी ब्रेन कैप निकाली और चल दी वापस पुराने ढंग से धुन तैयार करने के लिए. |
| DATE: 2014-02-11 |
| LABEL: science |
| [90] TITLE: कैंसर के मरीज़ों के लिए फ़ायदेमंद विटामिन सी |
| CONTENT: अमरीकी शोधकर्ताओं का दावा है कि विटामिन सी की तगड़ी खुराक कैंसर के इलाज में कीमोथेरेपी के प्रभाव को बढ़ा देती है. वैज्ञानिकों कहना है कि इंजेक्शन से इसकी खुराक दी जाए तो यह गर्भाशय और अन्य कैंसर के इलाज में काफ़ी सुरक्षित प्रभावी और सस्ती विधि साबित हो सकता है. साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन में प्रकाशित लेख में बड़े पैमाने पर सरकारी क्लीनिकल ट्रायल चलाए जाने का सुझाव दिया गया है. चूंकि विटामिन को पेटेंट नहीं कराया जा सकता है इसलिए फार्मा कंपनियों की ओर से क्लीनिकल ट्रायल चलाए जाने की संभावना कम है. कैंसर की बीमारी में विटामिन सी को बहुत पहले से एक वैकल्पिक इलाज के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. केमिस्ट लाइनस पॉउलिंग ने 1970 के दशक में पता किया था कि नसों में विटामिन सी की खुराक चढ़ाया जाना कैंसर के इलाज में काफी प्रभावी होता है. हालांकि मुंह से शरीर में पहुंचने वाले विटामिन सी का क्लीनिकल ट्रायल अपेक्षित परिणाम देने में विफल रहा और इस ओर शोध को बंद कर दिया गया. अब यह ज़ाहिर हो चुका है कि मुंह से विटामिन सी लेने पर शरीर तेजी से विटामिन सी को निकाल देता है. हालांकि कंसास विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक कहते हैं कि इंजेक्शन से दिए जाने पर विटामिन सी शरीर द्वारा तेजी से अवशोषित कर लिया जाता है. इस तरह वह स्वस्थ कोशिकाओं को बिना हानि पहुंचाए कैंसर कोशिकाओं को खत्म कर देता है. शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में चूहे की कैंसर युक्त गर्भाशय कोशिका और एक मरीज की कैंसर युक्त गर्भाशय कोशिका में विटामिन सी को डाला था. उन्होंने पाया कि कैंसर कोशिकाएं विटामिन सी के प्रति संवेदनशील थीं जबकि सामान्य कोशिकाओं को कोई क्षति नहीं पहुंची. चूहों पर किए गए अध्ययन में पता चला है कि मानक कीमोथेरेपी दवाओं के साथ चलाया गया यह इलाज ट्यूमर के विकास को रोकने में कारगर साबित हुआ. हालांकि कीमोथेरेपी के साथ विटामिन सी दिए जाने पर कुछ रोगियों ने साइड इफेक्ट्स की शिकायत की थी. सहायक शोधकर्ता डॉक्टर जेनी ड्रिस्को के अनुसार विटामिन सी के इस्तेमाल का प्रचलन बढ़ रहा है. कैंसर से मुकाबला करने के लिए मरीज सुरक्षित और सस्ते समाधान की ओर देखते हैं. वो कहती हैं कि नसों से दिया जाने वाले विटामिन सी का प्रभाव शुरुआती आंकड़ों और मौलिक शोध पर आधारित है. मुख्य शोधकर्ता क्वी चेन के अनुसार इसमें सबसे बड़ी बाधा है क्लीनिकल ट्रायल के लिए फंड मुहैया कराने के प्रति फार्मा कंपनियों की अनिच्छा क्योंकि प्राकृतिक उत्पादों को पेटेंट नहीं किया जा सकता है. कैंसर रिसर्च यूके से जुड़ीं डॉक्टर कैट आर्नी के अनुसार कैंसर के इलाज में विटामिन सी की उपयोगिता के बारे में शोध का पुराना इतिहास रहा है. कैंसर के किसी भी महत्वपूर्ण इलाज के लिए जरूरी है कि इसका मुल्यांकन बड़े पैमाने पर किए गए क्लीनिकल ट्रायल के आधार पर किया जाए. इसलिए यह जानने से पहले कि विटामिन सी का कैंसर के मरीजों पर क्या असर पड़ता है अध्ययन का जारी रहना जरूरी है. |
| DATE: 2014-02-10 |
| LABEL: science |
| [91] TITLE: दर्द सहने का भी एक 'बटन' होता है |
| CONTENT: पांच में से एक व्यक्ति तेज या स्थायी दर्द से परेशान रहता है. इंसान के शरीर में डिमर स्विच यानि एक आनुवांशिक बटन मौजूद होता है जो दर्द के एहसास को नियंत्रित करता है. ब्रिटेन के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बटन को बदला जा सकता है. लंदन के किंग्स कॉलेज के शोधकर्ताओं ने यह बात अपने नए शोध के आधार पर कही है. ब्रितानी शोधकर्ताओं के अनुसार जिन जुड़वा बच्चों के जीन आपस में सौ फीसदी मिलते हैं उनके दर्द सहने की क्षमता भी अलग अलग होती है. शोध में यह पता चला है कि दर्द सहने की उनकी क्षमता को नई जीवन शैली या दवाइयों से बदला जा सकता है. विज्ञान की पत्रिका नेचर कम्यूनिकेशन में लिखी गई रिपोर्ट के अनुसार इस शोध से नई दर्द निवारक गोलियों का ईजाद होगा या जीवनशैली के नए अंदाज सामने आएंगे. माना गया है कि पांच में एक व्यक्ति तेज या स्थायी दर्द से पीड़ित होता है. प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर जार्डन बेल का कहना है कि दर्द की संवेदनशीलता के लिए जिम्मेदार जीन को नियंत्रित करने की क्षमता के बारे में जानना काफी रोमांचक होगा. इससे स्थायी दर्द से पीड़ित मरीजों के लिए ज्यादा असरकारक इलाज निकालना संभव हो सकता है. अध्ययन में जुड़वां बच्चों को शामिल किया गया था. दर्द की संवेदनशीलता के स्तर को मापने के लिए वैज्ञानिकों ने एक समान दिखने वाले 25 जुड़वा जोड़ों को चुना. उनकी बांह पर गर्म वस्तु रख कर उनके दर्द सहने की सीमा जानने की कोशिश की गई. एक समान जुड़वा के जीन आपस में सौ फीसदी समान होते हैं. यदि उनके दर्द सहने की क्षमता में फर्क है तो ऐसा उनके आस-पास के माहौल के कारण हो सकता है या उनकी जीन को प्रभावित करने वाले कारकों के कारण हो सकता है. शोध में शामिल प्रतिभागियों को कहा गया कि जब गर्मी उनके लिए असहनीय हो जाए तो वे अपने बांह पर बंधी पट्टी का बटन दबा दें. इससे शोधकर्ताओं को प्रतिभागियों के दर्द सहने की सीमा का अंदाजा लगाने में मदद मिली. डीएनए अनुक्रमण की मदद से शोधकर्ताओं ने जुड़वां बच्चों के संपूर्ण आनुवांशिक कोड या जीनोम की जांच की. फिर इसकी तुलना उन 50 लोगों से की गई जो आपस कहीं से समान नहीं थे. शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि जुड़वा बच्चियों में से एक बच्ची के दर्द सहने की क्षमता को प्रभावित करने वाले नौ जीनों में दूसरी बच्ची की तुलना में कुछ रसायनिक बदलाव आ चुके थे. यह जानकारी दर्द की संवेदनशीलता निर्धारित करने वाले जीन के संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण है. दर्दनाशक गोलियों को विकसित करने के पीछे भी यही कारण रहा. जीन को निष्प्रभावी और प्रभावी बनाने वाला यह शोध एपिजेनेटिक रेगुलेशन प्रक्रिया के नाम से जाना जाता है. यह प्रक्रिया नई दवाओं की खोज में काफी सहायक साबित हो रही है. लंदन के किंग्स कॉलेज में जेनेटिक एपिडेमियोलोजी के प्रोफेसर टिम स्पेक्टर का कहना है कि ऐपिजेनेटिक स्विचिंग उस डिमर स्विच की तरह है जिसे जीन खुद को अभिव्यक्त करने के लिए इस्तेमाल करता है. दर्द सहने की क्षमता को जीवनशैली में बदलाव लाकर बढ़ाया जा सकता है. उन्होंने बताया यह एक ऐतिहासिक अध्ययन है. यह अध्ययन हमें बताता है कि लाखों एपिजेनेटिक सिग्नल का पता लगाने के लिए किस तरह एक समान जुड़वा बच्चों को आधुनिकतम तकनीक के जरिए आपस मे जोड़ा जाता है तो उनमें आए परिवर्तन से हमारे जीन में मौजूद नन्हें रसायनिक बटनों का पता चलता है. ये बटन हमें खास बनाते हैं. प्रोफेसर स्पेक्टर ने आगे जोड़ा किसी व्यक्ति की दर्द सहने की सीमा क्या हो सकती है यह हमें ये रसायनिक बदलाव से पता चलता है. ये रसायनिक बदलाव थर्मोस्टैट या डिमर स्विच की तरह काम करते हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया दवा लेने या जीवनशैली में बदलाव करने से हम इन थर्मोस्टैट को अपने अनुसार सेट कर सकते हैं. इससे भविष्य में हमें दर्द का अनुभव पहले से कम होगा. जबकि इस बात की पूरी संभावना है कि एपिजेनेटिक बदलाव इसके उलट हो. |
| DATE: 2014-02-09 |
| LABEL: science |
| [92] TITLE: नकली हाथ, असली काम |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कृत्रिम हाथ बनाया है जो विकलांगों को असली अंग जैसा अहसास देता है. इटली में डेनमार्क के एक व्यक्ति को सर्जरी के बाद ऐसा हाथ लगाया गया है जो उसकी बाजू के ऊपरी हिस्से की नसों से जुड़ा है. डेनिस आबो ने एक दशक पहले आतिशबाज़ी में अपना हाथ गंवा दिया था. उन्होंने इस बायोनिक हाथ को अद्भुत बताया है. प्रयोगशाला में हुए परीक्षण में उन्हें आंख पर पट्टी बांधकर चीजें थमाई गईं और इस हाथ की मदद से वह इन चीजों के आकार और कड़ेपन को जानने में सफल रहे. इस बारे में साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन ने विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है. एक अंतरराष्ट्रीय दल ने इस शोध परियोजना में हिस्सा लिया था जिसमें इटली स्विटरज़रलैंड और जर्मनी के रोबोटिक्स विशेषज्ञ शामिल थे. इकोल पॉलीटेक्नीक फ़ेडेरेल डी लुसाने और स्कूओला सुपीरिओर सेंट अन्ना पीसा के प्रोफ़ेसर सिल्वेस्त्रो मिकेरा ने कहा यह पहली बार हुआ है जब किसी विकलांग को नकली हाथ में संवेदना का अहसास हुआ है. इस बायोनिक हाथ में न केवल एडवांस वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है बल्कि ऐसे इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर लगाए गए हैं जो मस्तिष्क को संदेश भेजते हैं. मिकेरा और उनकी टीम ने इस कृत्रिम हाथ में ऐसे संवेदक लगाए जो किसी चीज को छूने पर उसके बारे में सूचना देते हैं. कम्प्यूटर एल्गोरिदम के इस्तेमाल से वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रिकल संकेतों को एक ऐसी उत्तेजना में बदला जिसे संवेदी तंत्रिकाएं समझ सकें. रोम में ऑपरेशन के दौरान मरीज़ के बाजू के ऊपरी हिस्से की तंत्रिकाओं में चार इलेक्ट्रोड जोड़े गए. ये इलेक्ट्रोड कृत्रिम हाथ की उंगलियों के संवेदकों से जुड़े थे जो छूने और दवाब के फीडबैक को सीधे मस्तिष्क को भेजते हैं. 36 साल के आबो ने एक महीने प्रयोगशाला में बिताए. प्रयोगशाला में पहले तो इस बात की जाँच की गई कि इलेक्ट्रोड काम कर रहे हैं या नहीं. फिर यह देखा गया कि ये बायोनिक हाथ से पूरी तरह जुड़े हैं या नहीं. उन्होंने कहा मज़ेदार बात यह है कि इसके सहारे मैं मुझे बिना देखे ही छूने से चीज़ों का अहसास हो जाता है. मैं अंधेरे में भी इसका इस्तेमाल कर सकता हूं. यह बायोनिक हाथ अभी शुरुआती चरण में है और सुरक्षा कारणों से आबो का एक और ऑपरेशन करना पड़ा ताकि संवेदकों को हटाया जा सके. बायोनिक हाथ को विकसित करने वाली टीम अब इस प्रयास में जुटी है कि इसे छोटा कैसे बनाया जाए ताकि इसे घर में इस्तेमाल किया जा सके. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस हाथ के व्यावसायिक इस्तेमाल में एक दशक तक का समय लग सकता है. उनका कहना है कि इससे भविष्य में कृत्रिम अंगों का रास्ता साफ़ होगा जो वस्तुओं और तापमान का पता बता सकेंगे. बहरहाल आबो को उनका पुराना कृत्रिम हाथ मिल गया है और वह भविष्य में इसे बायोनिक हाथ से बदलने को तैयार हैं. |
| DATE: 2014-02-07 |
| LABEL: science |
| [93] TITLE: 'पर्यावरण में बदलाव से मर रहे हैं पेंगुइन के बच्चे' |
| CONTENT: एक नए शोध के अनुसार पर्यावरण में आए बदलाव के कारण अर्जेंटीना में पेंगुइन के बच्चों की मौत हो रही है. इस शोध के अनुसार तूफ़ान के साथ होने वाली बारिश और तेज़ गर्मी के कारण बड़ी संख्या में पेंगुइन के बच्चों की मौत हो रही है. 27 सालों के दौरान हुए इस शोध में एरिड पुंटा टॉम्बो के प्रायद्वीप में मैज़ीलानिक पेंगुइन की विश्व की सबसे बड़ी कॉलोनी पर पर्यावरणीय बदलाव के असर का अध्यन किया गया है. यह शोध प्लोस वन पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. इस प्रायद्वीप में हर साल दो लाख से अधिक पेंगुइन के जोड़े अपना घरौंदा बनाते हैं. वे वहाँ अपने अंडे देने के लिए सितंबर से फरवरी तक मरुस्थल जैसी परिस्थितियों में रहते हैं. मौसम में हो रहे इस बदलाव का सबसे बुरा असर नवजात पेंगुइनों पर पड़ता है. यह इतने छोटे भी नहीं होते कि इनके अभिभावक इन्हें बैठकर ढँक सकें और इतने बड़े भी नहीं होते कि इनके पंख इन्हें बारिश से बचा सकें. इसके कारण वे ख़ासतौर पर तूफ़ान के साथ होने वाली बारिश में असहाय हो जाते हैं. वे अधिक गर्मी भी नहीं झेल पाते हैं क्योंकि वे बड़े पेंगुइनों की तरह पानी में खुद को ठंडा नहीं रख सकते हैं. इस शोध के अनुसार औसतन हर साल पेंगुइन के लगभग 40 प्रतिशत बच्चे भूख की वजह और सात प्रतिशत पर्यावरण में बदलाव के कारण मर रहे हैं. यह शोध करने वाले वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डी बोएरेस्मा ने कहायह पेंगुइन के बच्चों के जीवन उनके प्रजनन की सफलता के बारे में इतनी लंबी अवधि का पहला शोध है. वह कहते हैं साल 1983 से 2010 के बीच पेंगुइन के प्रजनन की जगह दिसंबर के पहले दो हफ़्तों में आने वाले तूफानों की संख्या बढ़ गई है. इस दौरान पेंगुइन के बच्चों की उम्र 25 दिन से कम होती है. उन्होंने बताया बारिश के कारण पेंगुइन के घोंसलों में पानी भर जाता है और पेंगुइन के बच्चों के लिए यह अनुकूल स्थिति नहीं होती है. |
| DATE: 2014-02-05 |
| LABEL: science |
| [94] TITLE: अब फुटबॉल का खेल घटाएगा मोटापा |
| CONTENT: एक शोध के मुताबिक़ फुटबॉल के खेल में शामिल होना पुरुषों के लिए वज़न कम करने का अच्छा तरीका है. यह शोध स्कॉटलैंड के शोध जर्नल द लैनसेट में प्रकाशित हुआ. इसके लिए मोटापे के शिकार करीब 374 फुटबॉल के प्रशंसकों को 12 सप्ताह के एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए बुलाया गया. यह प्रशिक्षण फुटबॉल के स्थानीय क्लब में हुआ. एक साल के बाद प्रशिक्षण में हिस्सा लेने वाले 374 अत्यधिक मोटे व्यक्तियों के वज़न में पाँच किलोग्राम तक की कमी देखा गई. ग्लैसगो के शोधकर्ता कहते हैं कि इससे पुरुषों के लिए वज़न घटाने की योजना की सफलता साबित होती है. इस शोध में शामिल होने वाले सभी 748 शोधकर्ताओं को संतुलित आहार की सलाह और वज़न कम करने के टिप्स साझा किए गये थे. इनमें से केवल आधे लोगों को फुटबॉल के साप्ताहिक प्रशिक्षण सत्रों में हिस्सा लेने के लिए बुलाया गया था. इस प्रशिक्षण में अब्बेरदीन क्लेटिक डुंडी यूनाइटेड डनफ्रेमलिन एथलेटिक हैमिल्टन एकेडमिकल हर्ट ऑफ़ मिडलोथियन हिबेरनियन इनवर्नेस क्लैडोनियन थिस्ले किल्मरनॉक मदरवेल रैंजर्स सेंट जॉनस्टोन और सेंट मिरेन सहित 13 फुटबॉल कल्बों ने हिस्सा लिया. 12 सप्ताह के प्रशिक्षण में शामिल होने के बाद करीब 40 फ़ीसदी लोगों ने 12 महीनों बाद भी अपने मूल वज़न को पाँच फ़ीसदी तक कम करने में कामयाब रहे. शोध की सह-लेखक और ग्लैसगो यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर केटी हंट कहती हैं वज़न प्रबंधन और डाइटिंग को महिलाओं से जुड़े मुद्दों में ग़लत नज़रिए से देखा जाता है इस कारण से बहुत सारे पुरुष वज़न प्रबंधन के वर्तमान कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बनना चाहते हैं. वो कहती हैं कि अगर अच्छी परिस्थितियाँ बने तो पुरुष भी दुबले होने की इच्छा जता सकते हैं. प्रोफ़ेसर हंट कहती हैं अपने समान अन्य पुरुषों के साथ खेल में शामिल होने फुटबॉल के खेल में साझी रुचि और सेहत से जुड़े समान मुद्दे का समाधान प्रतिभागियों को ख़ुशी देता है. उन्होंने कहा प्रतिभागियों ने खेल के मौके प्रशिक्षण और क्लब के कोच से मिलने वाली सूचनाओं जैसे अवसरों की प्रशंसा की. यह मॉडल भविष्य में सफलता की संभावनाओं से भरपूर है. |
| DATE: 2014-02-04 |
| LABEL: science |
| [95] TITLE: हरियाली का सेहत और ख़ुशी से गहरा रिश्ता |
| CONTENT: एक ताज़ा अध्ययन में यह बात सामने आई है कि शहर के रिहायशी इलाक़ों में हरे-भरे पार्कों और हरियाली की मौजूदगी अच्छे सेहत और ख़ुशी के लिए बेहद सकारात्मक होती है. ब्रितानी शोधकर्ताओं ने पाया कि हरे-भरे वातावारण में रहने का काफ़ी सकारात्मक असर होता है इसके विपरीत वेतन में बढ़ोत्तरी और तरक्की से अल्पकालीन लाभ होते हैं. शोध करने वालों के मुताबिक़ शहरी क्षेत्रों में अच्छी गुणवत्ता वाले पार्कों की मौजूदगी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होती है. शोध के निष्कर्ष जर्नल इन्वायरनमेंट साइंस एण्ड टेक्नॉलजी पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं. ब्रिटेन की एक्सटर यूनिर्वसिटी में यूरोपियन सेंटर फ़ॉर साइंस एण्ड इन्वायरमेंट एण्ड ह्युमन हेल्थ से जुड़े शोध के सह-लेखक डॉक्टर मैथ्यू ह्वाइट कहते हैं शहरों में हरियाली वाली जगहों पर रहने वाले लोगों में अवसाद और चिंता के लक्षण काफ़ी कम देखे गए. मैथ्यू कहते हैं लोगों के ख़ुश होने के अनेकों कारण हो सकते हैं लोग ख़ुद को ख़ुश रखने के लिए ढेर सारी चीज़ें करते हैं जैसे नौकरी में तरक्की का प्रयास वेतन में बढ़ोत्तरी और यहाँ तक कि लोग शादी भी करते हैं. उनके अऩुसार लेकिन इन सारी चीज़ों के साथ परेशानी यही है कि एक साल से छह महीने के भीतर लोग पहले वाली स्थिति की आधारभूत रेखा के समीप पहुंच जाते हैं. यह चीज़ें बहुत ज़्यादा टिकाऊ नहीं हैं और हमें बहुत लंबे समय की प्रसन्नता नहीं देतीं. डॉक्टर ह्वाइट कहते हैं हमने शोध के दौरान पाया कि पाँच लाख यूरो की लॉटरी विजेताओं को ख़ुशी तो मिली. लेकिन छह महीने से साल भर के भीतर वो पहले वाली आधार-रेखा पर वापस पहुंच गए. इस शोध के लिए टीम ने ब्रिटिश हाऊसहोल्ड पैनल सर्वे से मिले आँकड़ों का इस्तेमाल किया. हरा-भरा पार्क सेहत और ख़ुशी के लिए सकारात्मक माना जाता है. डॉक्टर मैथ्यू कहते हैं तीन सालों के बाद भी हरे-भरे इलाक़ों में रहने वालों का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर पाया गया. इसके विपरीत हम ख़ुद को ख़ुश रखने के लिए ढेर सारी चीज़ें तो करते ही हैं. उन्होंने कहा कि शोध को आगे बढ़ाने के लिए हमने वित्तीय सहायता के लिए आवेदन किया है ताकि हम विभिन्न क्षेत्रों में तलाक की दर और संतुष्टि के अंतर का भी पता लगा सकें. उनके मुताबिक़ हमारे पास इस बात से साक्ष्य हैं कि एक ही क्षेत्र में हरियाली वाली जगहों पर रहने वाले लोगों में तनाव का स्तर काफ़ी कम देखा गया. अगर तनाव का स्तर कम होता है तो आप ज़्यादा विवेकपूर्ण फ़ैसले लेते हैं और बेहतर तरीके से अपनी बात कह पाते हैं. मैं यह नहीं कहने जा रहा हूँ कि यह कोई जादुई गोली है जो शादी की सारी समस्याओं को सुलझा देती हक़ीक़त में ऐसा नहीं है लेकिन यह बेहतर फ़ैसला लेने और अंतरंग बातचीत से संतुलन स्थापित करने में मददगार साबित होता है. शहरी क्षेत्रों में हरियाली के सेहत पर पड़ने वाले सकारात्मक असर के साक्ष्यों के कारण नीति बनाने वालों की मामले में दिलचस्पी बढ़ी है. वो कहते हैं लेकिन परेशानी तो यही है कि इस शोध को आर्थिक मदद कौन देगावो सवाल उठाते हैं अगर पर्यावरण से जुड़े अधिकारी कहते हैं कि शोध लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा है तो स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करवाने वाले संस्थान को निश्चित तौर पर मदद नहीं मुहैया करवानी चाहिए. डॉक्टर मैथ्यू कहते हैं शोध में लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है. लेकिन हमें पॉलिसी के स्तर पर तय करना चाहिए कि इसके लिए धन कहाँ से आएगा ताकि लोगों के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले हरी जगहों को बढ़ाया जा सके. |
| DATE: 2014-02-03 |
| LABEL: science |
| [96] TITLE: विटामिन डीः जो न रोगी को फ़ायदा देती है न सेहतमंद को |
| CONTENT: आमतौर पर चिकित्सक हड्डी संबंधी बीमारियों के इलाज में और एहतियात के तौर पर विटामिन डी की गोलियां लेने का परामर्श देते हैं. लेकिन एक शोध में पाया गया है कि सेहतमंद वयस्कों में बीमारी के ख़तरों से विटामिन डी की गोलियों का कोई ख़ास असर नहीं होता. अग्रणी मेडिकल जर्नल लांसेट में प्रकाशित शोध के अनुसार तक़रीबन 100 परीक्षणों में पाया गया है कि इन गोलियों से किसी भी स्वास्थ्य संबंधी ख़तरे में कोई महत्वपूर्ण कमी नहीं हुई. बच्चों महिलाओं और बुज़ुर्गों समेत तमाम ख़तरे वाले समूहों को अभी भी विटामिन डी को पूरक आहार के रूप में लेने की सलाह दी जाती है. न्यूज़ीलैंड के ऑकलैंड विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं की इस टीम ने पहले भी इन परीक्षणों का मेटा-एनालसिस किया था जिससे पता चला था कि बोन मिनिरल डेंसिटी पर विटामिन डी का कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ता. शोधकर्ताओं ने पाया कि हृदय रोग हृदयाघात या सेरेब्रोवैस्कुलर रोग कैंसर और हड्डियों के टूटने के सापेक्षिक खतरे में विटामिन डी का बहुत मामूली 15 प्रतिशत प्रभाव पड़ता है. अस्पताल में भर्ती मरीजों में विटामिन डी कूल्हे संबंधी बीमारियों के ख़तरे को 15 फ़ीसदी से ज़्यादा कम नहीं कर पाता. कैल्शियम के साथ भी इसका प्रयोग एक स्वस्थ व्यक्ति में ख़तरे को कम नहीं कर पाता है. शोध के अनुसार इस बात पर पर्याप्त संदेह बरक़रार है कि कैल्शियम समेत या इसके बिना विटामिन डी का प्रयोग मृत्यु के ख़तरे को कम करता है. शोधकर्ताओं के अनुसार हमारे निष्कर्षों के मुताबिक मांसपेशियों और हृदय संबंधी बीमारियों कैंसर फ्रैक्टर या मृत्यु के ख़तरे को कम करने में विटामिन डी का परामर्श देने को बहुत सही नहीं ठहराया जा सकता है. स्वीडन के उपसाला विश्व विद्यालय में सर्जिकल विभाग से जुड़े कार्ल माइकल्सन के अनुसार अभी भी इस बात पर विवाद है कि विटामिन डी की कमी की स्थिति में इसकी गोलियां लाभप्रद हैं या नहीं. वे कहते हैं आमतौर पर यह धारणा है कि विटामिन डी का प्रमुख स्रोत धूप है और इसकी थोड़ी खुराक लेने से सेहत में सुधार होगा लेकिन यह अभी बहुत स्पष्ट नहीं है कि ऐसा ही होता है. उन्होंने कहा कि जबतक और अधिक सूचना नहीं आ जाती है यह ज़्यादा ठीक होगा कि स्वस्थ लोगों को संभल कर विटामिन डी की गोलियां लेनी चाहिए. हालांकि कुछ न्यूट्रिशन विशेषज्ञों का कहना है कि विटामिन डी की कमी कई रोगों के लिए ज़िम्मेदार है जैसे कि फ्रैक्चर कैंसर हृदय रोग मधुमेह और मृत्यु का ख़तरा आदि. जबकि कुछ विशेषज्ञों का का कहना है कि विटामिन डी की कमी ख़राब सेहत का परिणाम है न कि इसका कारण. रॉयल कॉलेज ऑफ पीडियाट्रिक्स एंड चाइल्ड हेल्थ में न्यूट्रिशन कमेटी के चेयरमैन और पीडियाट्रिक्स के वरिष्ठ प्रवक्ता डॉक्टर कोलिन मीशि ने कहते हैं कि इस अध्ययन ने विटामिन डी सप्लीमेंट्स को बहस में ला दिया है. उनके अनुसार यह दिखाता है कि विटामिन डी की भूमिका तो है लेकिन यह उतनी महत्वपूर्ण नहीं है. चिकित्सकों को हरेक औसत सेहतमंद व्यक्ति के रक्त जांच के लिए हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए. कोलिन के अनुसार इसके बावजूद पुरानी सलाह अभी भी सच है. ज़्यादा मछली खाइए अपनी खुराक और जीवनशैली पर ध्यान दीजिए. बशर्ते कि आपको कोई ख़ास ख़तरा न हो. |
| DATE: 2014-02-02 |
| LABEL: science |
| [97] TITLE: आख़िर क्या है उड़ने वाले सांपों का रहस्य? |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने इस रहस्य को सुलझा लिया है कि आख़िर उड़न सांप हवा में किस तरह अपने शरीर को रोक लेता है. ये असामान्य सरीसृप दक्षिण पूर्वी एशिया के वर्षा वनों में पाया जाता है. ये सांप पेड़ से छलांग लगाकर बेहद ख़ूबसूरत ढंग से हवा में उड़ान भर सकते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस करतब को अंजाम देने के लिए आवश्यक बल प्राप्त करने के लिए ये सांप ज़रूरत के अनुसार अपने शरीर के आकार को बदल सकते हैं. इस खोज को जर्नल ऑफ़ एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजी में प्रकाशित किया गया है. यह अध्ययन अमरीका स्थित वर्जीनिया टेक के प्रोफ़ेसर जैक सोचा ने किया है. वो बताते हैं सामान्य रूप से सांप उड़ने वाला जीव नहीं है. जब आप इसे देखेंगे तो कहेंगे कि ये चीज़ उड़ नहीं सकती है. और इसकी सामान्य क़दकाठी को देखते हुए ये बात शायद एकदम सही भी है. वो आगे बताते हैं जब ये उड़न सांप हवा में प्रवेश करता है जब ये एक शाखा से छलांग लगाता है तो ये बड़े पैमाने पर अपने शरीर को बदल लेता है. उड़ने वाले सांपों की पांच प्रजातियां हैं और ये सभी क्रिसोपेलिया जाति से संबंधित हैं. शोधकर्ताओं का मानना है कि अब वो इस बात की तह तक पहुंच चुके हैं कि ये सांप आख़िर जंगल में कैसे उड़ लेते हैं जबकि ज़मीन पर ऐसा करने के दौरान वो गिर जाते हैं. प्रोफ़ेसर सोचा बताते हैं ये जैसे ही छलांग लगाता है ये सिर से पूंछ की तरफ अपने शरीर को चपटा बनाता जाता है. इस तरह वो अपनी पसलियों को सिर की दिशा में आगे और रीढ़ की दिशा में ऊपर की ओर घुमाता है. वो बताते हैं इस कारण ये काफी चौड़ा हो जाता है. इतना कि इसकी चौड़ाई दोगुनी हो जाती है और इस तरह वो क्रास-सेक्शन करते हुए एक अनूठा आकार हासिल कर लेता है. इसके बाद अध्ययन दल ने शरीर के आकार में बदलाव से उत्पन्न होने वाले वायुगतिकी बल का विश्लेषण किया. शोधकर्ताओं ने इसके लिए सांप के क्रॉस-सेक्शन की प्लास्टिक प्रति तैयार की और उसे बहते पानी के एक टैंक में डाल दिया. प्रोफेसर सोचा बताते हैं पानी इसके ऊपर से बहने लगा और हमने मॉडल पर पड़ने वाले बल को मापा और इसके साथ ही हमने लेज़र और हाई स्पीड कैमरे की मदद से पानी में बहाव के छणों का छायांकन भी किया. उन्होंने बताया कि सांप एक वायुगतिकी ऐरोडायनेमिक बल उत्पन्न कर रहा था. इस बल की तुलना उतरते हुए विमान के पंखों से की जा सकती है. अध्ययन दल का मानना है कि ये सांप हवा में अपने लहरदार नृत्य के साथ शारीरिक बदलाव की मदद से उड़ान भरने में कामयाब रहता है. प्रोफ़ेसर सोचा के मुताबिक़ ये अपने सिर को थोड़ा-थोड़ा करके घुमाता जाता है ये लहर को शरीर में नीचे की तरफ़ ले जाता है और ये हवा में उड़ते किसी जानवर की तरह दिखाई देता है. अध्ययन दल का कहना है कि रोबोट के विकास में इस सांप की बनावट से मदद मिल सकती है ख़ासतौर से एक ऐसी मशीन तैयार करने में जो कहीं चढ़ सकती हो या उड़ सकती हो. |
| DATE: 2014-02-01 |
| LABEL: science |
| [98] TITLE: संगीत से मिल सकता है 'कैंसर मरीजों को लाभ' |
| CONTENT: एक ताज़ा शोध के अनुसार कैंसर का इलाज करा रहे किशोरों और युवाओं को म्यूज़िक थेरेपी से लाभ मिल सकता है. यह शोध कैंसर जर्नल में प्रकाशित हुआ है. 11 से 24 साल के बीच की उम्र वाले किशोरों और नौजवानों के एक समूह ने तीन हफ़्तों में एक म्यूज़िक वीडियो बनाया. अमरीकी शोधकर्ताओं ने इस दौरान इस समूह के अनुभवों का अध्ययन किया. शोधकर्ताओं ने पाया कि इस दौरान मरीज़ों की प्रतिरोध क्षमता में वृद्धि हुई और उनके परिवार एवं दोस्तों के साथ उनका संबंध भी बेहतर हुआ. समूह के सभी मरीज़ हाई-रिस्क स्टेम-सेल ट्रांसप्लांट चिकित्सा करा रहे थे. म्यूज़िक वीडियो बनाने के लिए इन युवाओं को गीत लिखने संगीत रचने और अपनी कहानी बनाने के लिए वीडियो इमेज इकट्ठा करने के लिए कहा गया. एक म्यूज़िक थेरैपिस्ट ने इस समूह की मदद की. थेरैपिस्ट ने समूह के लोगों को महत्वपूर्ण चीज़ों को पहचानने में मदद की. उन्होंने समूह के लोगों को अपने विचारों को सामने रखने में भी सहायता की. इस समूह ने जब वीडियो बना लिया तो उसे प्रीमियरों के ज़रिए अपने मित्रों एवं रिश्तेदारों के साथ साझा किया. इस म्यूज़िक थेरेपी के सेशन के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि जिस समूह ने म्यूज़िक वीडियो बनाया था वह प्रतिरोध क्षमता एवं इलाज का सामना करने के मामले में दूसरे समूह से बेहतर रहा जिसने ऐसी चिकित्सा नहीं ली. इस म्यूज़िक थेरेपी के 100 दिन बाद भी समूह ने शोधकर्ताओं से कहा कि वे अपने परिवार के साथ बेहतर संवाद कर पा रहे हैं और अपने मित्रों से ज़्यादा बेहतर तरीके से जुड़े हुए हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार म्यूज़िक थेरेपी उन कई उपायों में एक है जिनसे किशोरों और वयस्कों को कैंसर के इलाज का सामना करने में मदद मिलती है. इस शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता इंडियाना स्कूल ऑफ़ नर्सिंग के डॉक्टर जॉन हासे कहते हैं बचाव के इन उपायों से किशोरों और वयस्कों को बीमारी के इलाज का सामना करने में मदद मिलती है उनमें आशा का संचार होता है और कैंसर के बावजूद जीवन का एक अर्थ प्राप्त होता है. डॉक्टर हासे कहते हैं किशोर और युवा लोग जिनमें प्रतिरोध क्षमता थी उनमें अपनी बीमारी से ऊपर उठ सकने की क्षमता भी थी. उन्हें अपने कैंसर का सामना करने का भरोसा और कौशल हासिल हुआ. इन लोगों में दूसरों से जुड़ने और मदद करने की इच्छा का भी विकास हुआ. शोधकर्ताओं ने जब इन मरीजों के अभिभावकों से बात की तो उन्हें पता चला कि इस वीडियो से अभिभावकों को भी कैंसर को लेकर अपने बच्चों के अनुभवों के बारे में एक लाभदायक अंतरदृष्टि मिली. इस शोध में काम करने वाले म्यूज़िक थेरैपिस्ट शेरी रॉब समझाती हैं कि संगीत आख़िर क्यों युवाओं को प्रेरित करने में विशेष तौर पर लाभदायक है. वह कहती हैं जब बाकी सब कुछ अनिश्चित हो ऐसे में उनके जाने-पहचाने गाने उनके लिए अर्थवान साबित होते हैं. वे इन गानों से जुड़ाव महसूस करते हैं. कैंसर रिसर्च यूके के अनुसार म्यूज़िक थेरेपी कैंसर से पीड़ित लोगों का तनाव कम हो सकता है और उनके जीवन की गुणवत्ता बढ़ सकती है. इसकी मदद से कैंसर के कुछ लक्षणों और इलाज के चलते होने वाले प्रभावों में भी कमी आ सकती है लेकिन इससे कैंसर या किसी भी तरह की बीमारी का निदान नहीं संभव है. कैंसर से पीड़ित बच्चों पर संगीत के प्रभाव को लेकर इससे पहले हुए कुछ अध्ययनों में पता चला था कि इससे भय और तनाव को कम किया जा सकता है. इससे पारिवारिक संबंधों को भी बेहतर बनाया जा सकता है. |
| DATE: 2014-01-31 |
| LABEL: science |
| [99] TITLE: मच्छर मार कहीं याददाश्त न मार दे |
| CONTENT: अमरीकी शोधकर्ताओं ने सुझाया है कि कीटनाशक दवा डीडीटी डायक्लोरो-डायफ़िनायल-ट्रायक्लोरोएथेन के अधिक सम्पर्क में आने से अल्ज़ाइमर्स होने का ख़तरा बढ़ जाता है. अल्ज़ाइमर्स से पीड़ित व्यक्ति में भ्रमित रहने बिना वजह आवेश में आने मूड में तेज़ी से बदलाव आने और दीर्घकाल में याददाश्त चले जाने जैसे लक्षण देखे जाते हैं. जामा न्यूरोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन में दिखाया गया है कि अल्ज़ाइमर्स के मरीज़ों के शरीर में डीडीटी का स्तर किसी स्वस्थ इंसान की तुलना में चार गुना अधिक पाया गया. कुछ देशों में डीडीटी का इस्तेमाल मलेरिया के लिए ज़िम्मेदार मच्छर को मारने के लिए अभी भी किया जाता है. दूसरा विश्वयुद्ध ख़त्म होने के बाद मलेरिया नियंत्रण के लिए डीडीटी का बड़े पैमाने पर सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया था. अल्ज़ाइमर्स रिसर्च यूके का कहना है कि अल्ज़ाइमर्स और डीडीटी के संबंध की अभी और पड़ताल करने की ज़रूरत है. दूसरा विश्वयुद्ध ख़त्म होने के बाद कुछ ख़ास तरह की फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए भी डीडीटी का बड़े स्तर पर उपयोग किया गया. हालांकि इंसानी स्वास्थ्य और पर्यावरण ख़ासतौर पर शिकारी परिंदों पर इसके दुष्प्रभाव के बारे में सवाल उठाए जाते रहे हैं. अमरीका में डीडीटी के इस्तेमाल पर वर्ष 1972 में प्रतिबंध लगा दिया गया है. कई अन्य देशों में भी ऐसा ही किया गया. लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन मलेरिया की रोकथाम के लिए डीडीटी के इस्तेमाल पर अभी भी ज़ोर देता है. डीडीटी इंसानों के शरीर में भी पाया जाता है जहां यह डीडीई डायक्लोरो-डायफ़िनायल-डायक्लोरो-एथिलीन में तब्दील हो जाता है. रटगर्ज़ और इमोरी यूनिवर्सिटी में शोधकर्ताओं के एक दल ने अल्ज़ाइमर्स से पीड़ित 86 मरीज़ों के रक्त में डीडीई के स्तर की जांच की. उन्होंने पाया कि अल्ज़ाइमर्स के मरीज़ों में डीडीई का स्तर तीन गुना अधिक मिला. लेकिन फिर भी यह मामला अभी एकदम स्पष्ट नहीं है क्योंकि कुछ ऐसे लोगों में भी डीडीई की मात्रा अधिक पाई गई है जो एकदम स्वस्थ हैं. अल्ज़ाइमर्स रिसर्च यूके के शोध प्रमुख डॉक्टर साइमन रिडले कहते हैं डीडीटी की वजह से अल्ज़ाइमर्स का ख़तरा बढ़ता है इसकी पुष्टि के लिए अभी और अधिक शोध किए जाने की ज़रूरत है. |
| DATE: 2014-01-31 |
| LABEL: science |
| [100] TITLE: शहरी जीवन क्यों बन सकता है ख़तरा? |
| CONTENT: जब भी खुद को और अधिक सक्रिय करने की चर्चा चलती है तो हमारा ध्यान सबसे पहले खेलकूद की सुविधाओं को बढ़ाने और लोगों को जिम जाने के लिए उत्साहित करने पर जाता है. मगर सवाल ये है कि क्या हम अपने मोहल्ले में ही कुछ ऐसी तरकीब नहीं निकाल सकते जिससे सेहतमंद जीवन के लिए सक्रियता बढ़ाने के लिए कहीं जाने की ज़रूरत न पड़ेजवाब है हां ऐसा हो सकता है. द रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स आरआईबीए ऐसा ही सोचता है. घर के आस-पास ही सक्रियता बढ़ाने के ठिकानों का निर्माण कितना कारगर होगा इसका पता लगाने के लिए इस संस्था ने इंग्लैंड के नौ बड़े शहरों- बर्मिंघम ब्रिस्टल लीड्स लीवरपुल लंदन मैनचेस्टर न्यूकासल नॉटिंघम और शेफील्ड में संभावनाओं की तलाश की. संबंधित शोधकर्ताओं ने इन शहरों में घनी आबादी और हरे भरे इलाकों की तलाश की. बर्मिंघम न्यूकासल और लंदन के कुछ उन इलाकों को चिन्हित किया गया जहां के निवासी सबसे कम सक्रिय थे. यहां अधिक सक्रिय इलाकों के मुकाबले आबादी दोगुनी घनी और हरियाली 20 फ़ीसदी कम थी. कम सक्रिय लोगों के इन इलाकों में रहने वाले करीब 60 फ़ीसदी लोग सेहतमंद बनने के लिए सुझाई गई गतिविधियों में शामिल नहीं होते थे. रीबा आरआईबीए की ओर से किए गए सर्वेक्षण के अनुसार महत्वपूर्ण बात ये है कि यहां की आबादी का तीन-चौथाई हिस्सा महसूस करता है कि मोहल्ले की आबादी घनी होने के कारण गलियां बेहद संकरी हैं जिससे अधिक पैदल चलने का मौका नहीं मिल पाता. यहां के लोग चाहते हैं कि उनके मोहल्ले को इस तरह विकसित किया जाए कि पैदल चलने की जगह ज़्यादा हो और हरियाली अधिक हो ताकि घर से निकलने पर ताज़ा हवा मिल सके. लोगों ने सुरक्षित पगडंडियों और हरियाली को दो महत्वपूर्ण कारक माना. रीबा ने सर्वेक्षण के नतीजों को लोगों के बीच रखा ताकि सरकारी समितियां इस ओर ध्यान दें. राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना एनएचएस की ओर से पिछले साल किए गए बदलाव के तहत अब सार्वजनिक सेहत का जिम्मा स्थानीय प्रशासन के हाथों में है. रीबा के अध्यक्ष स्टीफन होड्डर का कहना है कि वे चाहते थे कि स्थानीय समिति सार्वजनिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करे क्योंकि यह योजना प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है. वे आगे कहते हैं यह ज़रूरी है कि योजनाकार और विकास करने वाले आगे आएं और सेहतमंद शहर बनाने की मुहिम की अगुवाई करें. मगर जैसा कि हमेशा से होता आया है- समितियों को हाल के वर्षों में मिलने वाले धन में काफी कटौती हुई है इसलिए इस योजना को भी धन की कमी की समस्या से जूझना पड़ रहा है. रीबा ने अपनी रिपोर्ट में एक अच्छा उदाहरण पेश किया है. यह है लंदन के भीतरी इलाके में बसे ब्राउनफील्ड इलाक़े का पुनर्विकास. यहां सार्वजनिक और निजी स्रोतों ने व्यापक निवेश किया. यह 70 लाख पाउंड की भारी भरकम रक़म थी. इस परियोजना के तहत घरों के बीच पैदल चलने के लिए हरी घास और पेड़ों की कतारों से सजी पगडंडियां विकसित की गईं. जबकि खेलकूद का मैदान थोड़ा हटकर बनाया गया. इसी तरह एक और परियोजना बनाई गई जिसके तहत उत्तरी नॉटिंघमशायर स्थित हूथवेट के खनन इलाके में बेकार पड़ी जमीन पर हराभरा खेलने का मैदान और पानी का एक फव्वारा बनाया गया. कभी सुनसान रहा ये इलाक़ा अनुकूल मौसम में अब बच्चों से भरा रहता है. यहां ध्यान देने वाली बात है कि यह परियोजना इसलिए सफल हुई क्योंकि इस इलाक़े को विकसित करने के लिए लॉट्री के जरिए 20 लाख पाउंड रकम उपलब्ध करवाई गई. |
| DATE: 2014-01-30 |
| LABEL: science |
| [101] TITLE: कितनी महफ़ूज़ है इंटरनेट की दुनिया |
| CONTENT: आठ महीने पहले एडवर्ड स्नोडेन ने यूएस नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी से जुड़ी कुछ गोपनीय जानकारी सार्वजनिक की थी जिसके बाद से ही तकनीक और ख़ासतौर पर इंटरनेट की दुनिया में कई तरह की चिंताएं सामने आई हैं. जगज़ाहिर हुई इस जानकारी से पता चला कि अमरीकी जासूस और उनके ब्रितानी सहयोगी आम और ख़ास तमाम लोगों के बारे में हर तरह का ब्यौरा जुटाने के लिए इसी इंटरनेट का इस्तेमाल करते रहे हैं. इतना ही नहीं अमरीकी जासूसों ने सोशल मीडिया के ज़रिए भी लोगों के बारे में वह जानकारी जुटाई जो लोग आमतौर पर किसी से साझा नहीं करना चाहेंगे. यानी इंटरनेट के ढाँचे में एक तरह से सेंध लग चुकी है. जैसे बिग-बैंग सिद्धांत के अनुरूप ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है उसी तरह तकनीक के मामले में इंटरनेट की दुनिया भी बहुत फैल चुकी है. इस फैली हुई दुनिया को राउटर्स केबल्स डेटा सेंटर और तमाम दूसरे हार्डवेयर की ज़रूरत थी जो साल 1994 से वर्ष 2013 के दरम्यान कई गुना बढ़ चुके हैं. इंटरनेट की दुनिया में उन कंपनियों और संगठनों की बड़ी अहम भूमिका है जो उच्च क्षमता वाले फ़ाइबर ऑप्टिक केबल्स के ज़रिए दुनिया भर में एक जगह से दूसरी जगह तक डेटा पहुंचाने का काम करते हैं. इस मामले में गूगल और अमेज़न जैसी कंपनियां अव्वल स्थान पर हैं. इंटरनेट पर हम जो कुछ भी करते हैं वह सारी जानकारी गूगल या अमेज़न जैसी किसी कंपनी के पास दर्ज होती है. मसलन लंदन में रहने वाला कोई विद्यार्थी ब्राज़ील में रहने वाले अपने किसी मित्र को ई-मेल भेजता है तो उस ई-मेल में छिपी जानकारी पूरे नेटवर्क से होकर गुजरती है और इसी प्रक्रिया में वह जानकारी संबंधित कंपनी के पास भी हमेशा के लिए महफ़ूज हो जाती है. इसी प्रक्रिया में यह जानकारी सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंच जाती है. नवम्बर 2013 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने ख़बर दी थी कि यूएस नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी ने लेवल-3 केबल्स के ज़रिए गूगल और याहू तक में सेंध लगाई होगी. एक बयान में कंपनी ने बीबीसी को बताया था हम जिस भी मुल्क में काम करते हैं वहां के क़ानून से बंधे होते हैं. कई मामलों में क़ानून हमें किसी भी तरह की जानकारी साझा करने से मना करता है और इस बारे में चर्चा करना हमारे लिए अपराध है. स्नोडेन ने जो दस्तावेज़ सार्वजनिक किए थे उन्हें बीते साल जून में ब्रितानी अख़बार गार्डियन ने छापा था. इससे संकेत मिलता है कि अमरीका और ब्रिटेन के पास उच्च तकनीक वाले जासूसी कार्यक्रम हैं जो इंटरनेट के माध्यम से आने-जाने वाली हर जानकारी को पकड़ सकते हैं. इसमें समुद्र के नीचे बिछी वो केबल्स भी शामिल हैं जिनके ज़रिए आपके-हमारे मोबाइल फ़ोन में दर्ज हर ब्यौरा एक जगह से दूसरी जगह पहुंचता है. सार्वजनिक हो चुके गोपनीय दस्तावेज़ बताते हैं कि अमरीकी साझेदार ब्रिटेन का जीसीएचक्यू हर दिन 60 करोड़ संदेशों की निगरानी करता था. इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन से जुड़ी इस जानकारी को खंगालने के इरादे से तीस दिन तक कथित रूप से सहेजकर भी रखा जाता था. हालांकि जीसीएचक्यू ने ऐसी किसी हरकत से इंकार किया है. यूएस नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी ने इस तरह कितनी जानकारी जुटाई इसका सटीक अनुमान लगाना कठिन है. वहीं इस हरकत की वैधानिकता पर भी राय बंटी हुई है. कुछ लोगों का मानना है कि चरमपंथी तंत्र को तहस-नहस करने के लिए इस तरह की जानकारी काफ़ी अहम साबित हो सकती है. वहीं कुछ यह भी कहते हैं कि इससे आम लोगों की आज़ादी ख़तरे में पड़ जाती है. वैसे स्नोडेन ने जो कार्य किया है उससे सरकारी स्तर पर और बड़े स्तर के संगठनों में इंटरनेट के इस्तेमाल के तौर-तरीकों में बदलाव आ सकता है. पत्रकार ग्लेन ग्रीनवाल्ड के लिए स्नोडेन के दस्तावेज़ों का विश्लेषण करने वाले सुरक्षा विशेषज्ञ ब्रूस श्नायर कहते हैं डेटा पावर यानी प्रभाव है और डेटा ही मनी यानी पैसा है. ब्रूस श्नायर ने बीबीसी से कहा निगरानी से कहीं बड़ा सवाल यह है कि इस डेटा पर किसका नियंत्रण है. सूचना युग में यह प्रमुख सवाल है. लेकिन तकनीक के जानकारों का कहना है कि इससे ऑनलाइन काम करना बहुत मुश्किल हो जाएगा और साथ ही दुनियाभर में लोगों से जुड़ना भी कठिन हो जाएगा. |
| DATE: 2014-01-29 |
| LABEL: science |
| [102] TITLE: डीज़ल छोड़ ग्रीन एनर्जी से चलेंगे मोबाइल टावर? |
| CONTENT: भारत में करीब 90 करोड़ मोबाइल यूज़र हैं और सेलुलर नेटवर्क की एक पूरी कड़ी लगातार सक्रिय रहती है ताकि लोग जब चाहें तब कॉल कर पाएं. लेकिन संचार क्षेत्र के जानकारों के अनुसार भारत में तकरीबन 56 करोड़ सक्रिय मोबाइल यूज़र हैं. मोबाइल नेटवर्क के सबसे अहम हिस्से मोबाइल टावर को 24 घंटे - 365 दिन चालू रखने में काफ़ी ऊर्जा चाहिए होती है. शहरी इलाकों में लगे टावरों को आम तौर पर सार्वजनिक ग्रिड से ही बिजली मिल जाती है. लेकिन भारत में ज़्यादातर जगहों पर बिजली की सुचारू व्यवस्था नहीं होने की वजह से 60 प्रतिशत से मोबाइल टावर डीज़ल जेनरेटरों के भरोसे चलते हैं. हर टावर को लगभग उतनी ही बिजली चाहिए होती है जितनी आम तौर पर किसी शहरी घर में खर्च होती है. देशभर में चार लाख से अधिक मोबाइल टावर हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है. शायद यही कारण है कि इन टावरों को अब साफ-सुथरी ऊर्जा से चलाए जाने की मांग की जा रही है. भारत में हर साल अकेले टेलिकॉम उद्योग दो अरब लीटर डीज़ल खर्च कर देता है. देश के टेलिकॉम विभाग ने भी मोबाइल सेवा देने वाली कंपनियों को निर्देश जारी कर कहा है कि वे डीज़ल की खपत कम करे और ऊर्जा के नए स्रोत खोजें. ग्रामीण इलाकों में 50 फ़ीसदी और शहरी इलाकों में 20 फ़ीसदी की कार्बन उत्सर्जन में कटौती के भी निर्देश दिए गए हैं. कंपनियों के पास जो रास्ता बचा है वो है हाईब्रिड ऊर्जा यानी ग्रिड और दोबारा प्रयोग किए जाने वाली ऊर्जा के मिश्रण कर टावरों को संचालित करें. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये आसान नहीं होगा. मैनेजमेंट कंसल्टेंसी कंपनी एटी कर्नी से जुड़े मोहित राणा कहते हैं “सोलर ऊर्जा सबसे अच्छी है लेकिन इसका उत्पादन खासतौर पर शुरुआती खर्च बहुत ज़्यादा है. हालांकि डीज़ल खपत कम करने के उपायों पर उद्योग लगातार काम कर रहा है. एटी कर्नी के एक अनुमान के अनुसार टेलिकॉम उद्योग के कुल कार्बन उत्सर्जन का आधा डीज़ल उपयोग की ही वजह से होता है. भारती इंफ्राटेल उन कंपनियों में से एक हैं जो इस लक्ष्य को पाने के लिए कोशिश कर रही है. इस कंपनी से 33 हज़ार से ज़्यादा मोबाइल टावर है जिनमें से नौ हज़ार से ज़्यादा ग्रिड की स्थाई बिजली से दूर हैं. ऐसे में डीज़ल ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है जो महंगा भी है. भारती इंफ्राटेल के देवेंद्र सिंह रावत बताते हैं “ईंधन हमारे ख़र्च का एक अहम हिस्सा है. प्रत्येक टावर पर हर दिन पांच से 40 हज़ार तक का ईधन खर्च होता है. एक हजार टावरों से अधिक पर कंपनी ऊर्जा के दूसरे स्रोतों का प्रयोग शुरू कर चुकी है. लेकिन ये काम टेलिकॉम कंपनिया अकेले नहीं कर सकती हैं. बिजली उत्पादन के नए तौर तरीकों ने उद्योगपतियों और नया सोचने वालों के लिए एक मौका उपलब्ध किया है. ऐसे लोग जो तकनीक को दो तरह से देखते हैं- इससे पैसा बनाया जा सकता है और जंगलों-वातावरण को बचाया जा सकता है. ओएमसी पावर एक ऐसी ही कंपनी है जो कि ग्रामीण इलाक़ों में टेलीकॉम कंपनियों के लिए छोटे छोटे पावर प्लांट बना रही है. इन छोटे पावर प्लांटों में सूरज हवा और बायोगैस जैसे स्त्रोतों का उपयोग कर के दूर-दराज़ के इलाकों में साफ ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सकेगी. ओएमसी पावर के अनिल राज कहते हैं कि आने वाले वर्षों में भारत में ऊर्जा खपत में एक बड़ा बदलाव आने वाला है. वो कहते हैं इस समय अवधारणा ये है कि बड़े-बड़े ऊर्जा संयंत्र होंगे लेकिन उनकी ट्रांसमिशन की प्रणाली अप्रभावी होगी. असल में इस समय हो ये रहा है कि जहां पावर संयंत्र हैं वहां से वो जगहें बहुत दूर हैं जहां बिजली को जाना है. इसके लिए ट्रांसमिशन लाइनें बिछानी होती हैं. ये बात अब बदल रही है. हम कोशिश कर रहे हैं कि छोटे छोटे जगहों पर ही संयंत्र बनाए जाएं जिससे वहां की ज़रुरतें पूरी हों. हालांकि अभी भी इसमें सबसे बड़ी चुनौती स्वच्छ ऊर्जा की है और वो भी स्वच्छ ऊर्जा के लिए पैसे मिलने की. कंपनियों को उम्मीद है कि फोन लाइनें उपलब्ध कराने वाले टावर उनके उपभोक्ताओं में होंगे और जो अतिरिक्त ऊर्जा बजेगी वो आस पास के रिहाइशी इलाक़ों में बांटी जा सकेगी. राज का कहना है कि वो जितनी ऊर्जा का उत्पादन करेंगे वो टेलीकॉम कंपनियों और स्थानीय समुदाय के बीच साझा की जाएगी. स्थानीय समुदाय को छोटे छोटे बैटरी पैक दिए जा सकेंगे जिससे वो अपने घरों में बत्तिया जला पाएंगे और इलेक्ट्रानिक चीज़ों को चार्ज भी कर सकेंगे. ओएमसी पावर को उम्मीद है कि अलग अलग तरह की तकनीकों का इस्तेमाल कर के कीमतों को कम रखा जा सकेगा और इस प्रक्रिया में कुछ भी बेकार नहीं जाएगा. भारतीय टेलीकॉम बाज़ार में कीमतें तय करना सबसे कठिन काम रहा है. पिछले कुछ समय में टेलीकॉम कंपनियों का फायदा कम हुआ है और उन्हें कड़ी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ रहा है. इस बाज़ार को बढ़ाने के लिए आने वाले दिनों में भारत में तीन लाख से अधिक मोबाइल टावर स्थापित किए जाने हैं. अगर इन टावरों को बिजली उपलब्ध कराने के लिए कोई स्वच्छ ऊर्जा का कोई खाका नहीं तैयार होता है तो कई लोगों को डर है कि पहले से ही खस्ताहाल टेलीकॉम बाज़ार की स्थिति बद से बदतर होती चली जाएगी. |
| DATE: 2014-01-26 |
| LABEL: science |
| [103] TITLE: बिजली संचय करने वाली नई बैटरी |
| CONTENT: अमरीकी शोधकर्ताओं ने पवन और सौर ऊर्जा स्रोतों से पैदा बिजली को संचय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया है. हार्डवार्ड विश्वविद्यालय की एक टीम ने कम कीमत में बड़े पैमाने पर एक बिजली ग्रिड के भीतर ऊर्जा संचय करने में सक्षम बैटरी तकनीक की खोज की है. यह तकनीक बड़ा परिवर्तन ला सकती है. यह पवन और सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा को अधिक किफ़ायती और विश्वसनीय बना सकता है. बैटरी का यह डिज़ाइन सस्ते में ऊर्जा की बड़ी मात्रा का भंडारण करने के लिए अनुकूल हैं इससे पहले रसायनिक आधार पर लाए गए बैटरी की लागत ज्यादा है और उसका रखरखाव एक मुश्किल काम है. पहले की सारी बैटरियों में धातुओं का इस्तेमाल होता है. वैनाडियम व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल होने वाली सबसे उन्नत बैटरी तकनीक है लेकिन इसकी लागत अपेक्षाकृत अधिक है. अन्य बैटरियों में प्लैटिनम जैसे कीमती धातु उत्प्रेरक के रूप में इस्तेमाल होते हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि नई बैटरी वैनाडियम बैटरी की तरह ही काम करता है लेकिन इस में कीमती धातु उत्प्रेरक का उपयोग नहीं होता है. इसकी बजाय इसमें प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला किफायती रसायन क्विनोन का उपयोग होता है. ये पानी में घुलनशील कार्बन आधारित यौगिक हैं जो पौधों और जानवरों में ऊर्जा संचय का काम करता हैं. मैसाचुसेट्स में हार्डवार्ड स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग और एपलॉयड साइंस के माइकल अजीज बताते है कि ये पदार्थ सस्ते होते हैं और हरी सब्जियां साथ ही कच्चे तेल में पाए जाते हैं ऊर्जा के अक्षय स्रोतों पवन या सौर से उत्पन्न बिजली को संचय करने में मुख्य बाधा इन स्रोतों की अनियमित तौर पर उपलब्ध होने की प्रकृति है. प्रोफेसर अजीज ने नेचर पॉडकास्ट को बताया तब आप क्या करेंगें जब सूरज नहीं निकलेगा और हवा नहीं बहेगी सस्ते और सुरक्षित तरीके से विद्युत ऊर्जा को भारी मात्रा में स्टोर करने की दिशा में यह एक समस्या हैं. यदि इसे हम सुलझा ले तो इस दिशा में यह एक बड़ा कदम होगा. अधिकतर बैटरियों की तरह ही यह बैटरी भी रासायनिक तरल पदार्थ में ही विद्युत ऊर्जा का संचय करता है बजाय कारों और मोबाइल उपकरणों में पाए जाने वाली उन बैटरी की तरह जिसमें ठोस इलेक्ट्रोड के भीतर विद्युत ऊर्जा का संचय होता है. प्रोफेसर अजीज ने बताया कि इस मामले यह एक ईंधन सेल की तरह ही है. इसमे हाइड्रोजन गैस के रूप में भंडारित रहता है और बिजली के रूप में परिवर्तित करने के रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलना होगा है आप बिजली बनाने के लिए इसे ईंधन सेल के माध्यम से चला सकते हैं. यह बैटरी इस मामले में अलग है कि इसे चलाने के लिए आप को इसे आगे और पीछे की ओर चलाने की जरूरत पड़ेगी. जब आप रासायनिक ऊर्जा के रूप में विद्युत ऊर्जा का संचय करेंगे तो इसे पीछे की ओर चलाना होगा और वापस रासायनिक ऊर्जा से बिजली पैदा करने के लिए इसे आगे की ओर चलाना होगा. उन्होंने आगे कहा कि बैटरी में ऊर्जा की मात्रा का संग्रह टैंक के आकार और रसायन की मात्रा पर निर्भर होगा. नवीनतम अध्ययन में शामिल नहीं हुए एक वैज्ञानिक ने कहा नई बैटरी अगर दीर्घकालिक क्षमता और ऊर्जा दक्षता वाला और व्यावहारिक रूप से उपयोगी होता है और इसे वास्तव में सस्ते में तैयार किया जा सकता है तो यह तकनीक ऊर्जा भंडारण के लिए उपर्युक्त साबित होंगे. |
| DATE: 2014-01-26 |
| LABEL: science |
| [104] TITLE: बैंगनी टमाटर खाएंगे क्या? |
| CONTENT: आनुवांशिक रूप से संशोधित बैंगनी टमाटरों के बाज़ार तक पहुँचने की संभावना और प्रबल हो गई है. उम्मीद है कि ये गहरा रंग इन टमाटरों को ब्लूबेरी की तरह स्वास्थ्य के लिए लाभकारी गुण देगा. ब्रिटेन में विकसित किए गए इन बैंगनी टमाटरों का कनाडा में व्यापक स्तर पर उत्पादन किया जा रहा है. बैंगनी टमाटरों के 1200 लीटर जूस की पहली खेप बाज़ार में पहुँचने के लिए तैयार है. जानवरों पर हुए परीक्षणों से पता चला है कि ये टमाटर कैंसर की रोकथाम में मददगार हो सकते हैं क्योंकि इनमें एंथोसाइनिन नाम का एंटी-ऑक्सीडेंट होता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ये नए टमाटर टोमैटो कैचअप से लेकर पिज़्जा तक में पोषण तत्व बढ़ा सकते हैं. ये टमाटर ब्रिटेन के नॉरिज में स्थित जॉन इनस सेंटर में विकसित किए गए हैं. जॉन इनस सेंटर की प्रोफ़ेसर कैथी मार्टिन को उम्मीद है कि बड़ी मात्रा में जूस की पहली खेप उपलब्ध होने से शोधकर्ताओं को इसमें काफी मदद मिलेगी. कैथी कहती हैं इन बैंगनी टमाटरों में वही तत्व होंगे जो ब्लूबेरी और क्रेनबेरी को स्वास्थ्य के लिए लाभदायक बनाते हैं लेकिन आप इसे उसे भोजन में शामिल कर सकते हैं जिसे आम लोग वास्तव में प्रचुर मात्रा में खाते हैं और जो किफ़ायती भी हैं. आनुवंशिक रूप से संशोधित ये टमाटर आनुवांशिक संशोधन जेनेटिकली मॉडिफ़ाइड वाले उन पौधों में शामिल हैं जिन्हें ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए बनाया गया है. टमाटरों का बैंगनी रंग स्नैपड्रैगन पौधे से निकाले गए एक जीन को टमाटर के पौधे में स्थानांतरित करने का नतीज़ा है. आनुवांशिक संशोधन के कारण टमाटर के पौधों में एंथोसाएनिन अपने आप विकसित होने लगता है. हालांकि इन टमाटरों का विकास ब्रिटेन में हुआ है लेकिन आनुवांशिक रूप से संशोधन पर यूरोपीय संघ के प्रतिबंध के कारण प्रोफ़ेसर मार्टिन को इस तकनीक के विकास के लिए विदेश जाना पड़ा. जल्द ही बैंगनी टमाटरों का 1200 लीटर जूस नॉरिज लाया जाएगा. बीज पहले से निकाल लिए जाने से इसमें आनुवांशिक संशोधित पदार्थ नहीं होगा और किसी संक्रमण का ख़तरा भी नहीं होगा. मार्टिन का कहना है कि उनका उद्देश्य इस जूस का विभिन्न तरह के परीक्षणों में इस्तेमाल करना है. इन परीक्षणों में एंथोसायनिन के मनुष्यों के स्वास्थ्य पर होने वाले सकारात्मक प्रभाव का पता लगाने वाले परीक्षण भी शामिल हैं. इससे पहले चूहों पर हुए शोध में पता चला था कि यह कैंसर के फैलाव को धीमा कर देता है. सवाल यह है कि क्या इसके बाद आनुवांशिक रूप से संशोधित खाद्य पदार्थों के बारे में लोगों की राय बदेलगी. यूरोपीय संघ में साल 2010 में हुए एक सर्वेक्षण में लगभग तीन चौथाई लोगों ने ही आनुवांशिक रूप से संशोधित खाद्य पदार्थों का विरोध किया था. वर्ष 1998 के बाद से यूरोपीय संघ में किसी भी संशोधित फ़सल को अनुमति नहीं मिली है. प्रोफ़ेसर मार्टिन को उम्मीद है कि बैंगनी टमाटरों के जूस को दो सालों के भीतर उत्तरी अमरीका में बिक्री के लिए अनुमति मिलने की अच्छी संभावना है. प्रोफ़ेसर मार्टिन और अन्य ब्रितानी शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि आनुवांशिक संशोधन के बारे में लोगों की राय सकारात्मक होगी. कार्डिफ़ यूनिवर्सिटी में पर्यावरण मनोवैज्ञानिक प्रोफ़ैसर निक पिजन ने आनुवांशिक संशोधन और अन्य तकनीकों पर जनमत संग्रह और समूह केंद्रित सर्वेक्षण किए हैं. वे मानते हैं कि लंबे समय से चला आ रहा अविश्वास गंभीर चिंता का विषय है. वे कहते हैं सिर्फ़ फ़ायदों को ही रेखांकित करने का असर ज़रूर होगा लेकिन यह सिर्फ़ कहानी का एक पक्ष है जो कि काफ़ी जटिल है. वे कहते हैं लोगों को अब भी चिंता रहेगी कि यह ऐसी तकनीक है जो प्राकृतिक व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करती है. इसके बड़ी कंपनियों के हाथ में जाने की भी चिंता लोगों को रहेगी. आखिरकार यह आपके और आपके बच्चों के भोजन का हिस्सा बनेगा. और यह समूचे ब्रिटेन के परिवारों के लिए चिंता की बड़ी वजह होगी. |
| DATE: 2014-01-25 |
| LABEL: science |
| [105] TITLE: कुत्ते में मिला 11 हज़ार साल पुराना कैंसर |
| CONTENT: ब्रिटेन के वैज्ञानिकों के अनुसार दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात जीवित कैंसर 11 हज़ार साल पुराना है. विलक्षण प्रकार का यह संक्रामक कैंसर कुत्तों में पाया जाता है. यह कैंसर सबसे पहले एक कुत्ते में विकसित हुआ और तब से प्रजनन के माध्यम से वर्तमान पीढ़ियों तक जीवित है. कैंब्रिज के निकट स्थित वेलकम ट्रस्ट सैंगर इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों की टीम ने इस कैंसर के डीएनए को डीकोड किया है. इस शोध में उस कुत्ते के जेनेटिक आइडेंटीकिट का पता चला है जिसमें सबसे पहले य़ह कैंसर विकसित हुआ था. शोधकर्ताओं के अनुसार यह कुत्ता मध्यम आकार का था और उसके बाल छोटे और गाढ़े भूरे या काले रंग के थे. इस शोध परियोजना में प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर एलीज़ाबेथ मर्चिसन के अनुसार हमें नहीं पता कि इस ख़ास कुत्ते में संक्रामक कैंसर का विकास क्यों हुआ. वे आगे कहती हैं लेकिन समय में पीछे जाना और इस कुत्ते की पहचान खोजना काफ़ी मजेदार था जिसका जीनोम अभी कैंसर की उस कोशिका में अभी भी जीवित है जिसे उसने जन्म दिया है. कुत्ते में पाया जाने वाला यह कैंसर दुर्लभ प्रकार का है. यह कैंसर यौन संसर्ग से फ़ैलने वाले अब तक दो ज्ञात कैंसरों में से एक है. दोनों प्रकारों के कैंसर जानवरों में पाए जाते हैं. इसे श्वान-संक्रामक कैंसर कहते हैं और इसके कारण जननांगो में ट्यूमर बन जाता है. इस कैंसर के जीनोम को डीकोड करके शोधकर्ताओं ने इसके म्यूटेशन के प्रकार की जांच की. यह म्यूटेशन एक आण्विक घड़ी की तरह काम करता है. शोधकर्ताओं को इसकी उत्पत्ति का समय ज्ञात करने में सफलता मिली और उन्होंने पाया कि यह 11 हज़ार साल पुराना है. आश्चर्य की बात यह है कि यह कैंसर लाखों जेनेटिक परिवर्तनों के बाद भी बचा रहा. डॉक्टर मर्चिसन कहती हैं जिस कुत्ते में यह कैंसर पैदा हुआ उस कुत्ते की मृत्यु के साथ कैंसर ख़त्म नहीं हुआ. यह दूसरे कुत्तों में फैल गया. यह सबसे पुराना और सबसे अधिक पाया जाने वाला कैंसर है जिसके वंशानुक्रम के बारे में हम जानते हैं. शोधपत्रिका साइंस में प्रकाशित इस शोध में बताया गया है कि लंबे समय तक यह कैंसर कुत्तों के एक समूह में ही मौजूद रहा है. उसके बाद पिछले 500 साल में यह पूरी दुनिया में फैला. यह संभवतः उन कुत्तों के साथ दुनिया के दूसरे हिस्सों में गया जिन्हें खोजी सैलानी यात्राओं में अपने साथ लेकर जाते थे. मात्र दो संक्रामक कैंसरों में दूसरा कैंसर फेशियल कैंसर तस्मानियम डेविल नामक जानवर में पाया जाता है और यह काटने से फैलता है. सैंगर इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रोफ़ेसर सर माइक स्ट्राटसन कहते हैं कुत्तों के संक्रामक कैंसर के जीनोम से हमें उस प्रक्रिया को समझने में मदद मिलेगी जिसकी वजह से ये कैंसर संक्रामक हो गया. ज़्यादातर कैंसर शरीर की किसी एक कोशिका में म्यूटेशन के कारण उत्पन्न होते हैं और इसी कारण यह नियंत्रण से बाहर हो जाता है. कैंसर कोशिकाएँ मेटास्टेसिस नामक प्रक्रिया के तहत शरीर के एक हिस्से से दूसरे हिस्सों में फैलती हैं लेकिन यह बहुत ही विलक्षण स्थितियों में ही कैंसर उससे पीड़ित प्राणी के शरीर से दूसरे में संक्रमित होता है. |
| DATE: 2014-01-25 |
| LABEL: science |
| [106] TITLE: जब फ़्रिज ने भेजा फर्ज़ी ईमेल |
| CONTENT: क्या कोई फ़्रिज अवांछनीय यानी फर्ज़ी ईमेल या स्पैम मेल भेज सकता है एक ऐसे ही फ़्रिज का पता चला है जिससे इंटरनेट पर हमले के बाद निकले स्पैम मेल ने कई स्मार्ट गैजेट को प्रभावित किया. यह फ़्रिज उन एक लाख से ज़्यादा उपकरणों में से एक था जिन्हें स्पैम अभियान का हिस्सा बनाया गया था. सिक्योरिटी कंपनी प्रूफ़ प्वाइंट ने इस हमले का पता लगाया जिसने कई कंप्यूटरों घरों के राउटरों मीडिया पीसी और स्मार्ट टीवी सेटों को अपनी चपेट में ले लिया था. माना जाता है कि यह हमला इन उपकरणों की कमज़ोर सुरक्षा में सेंध लगाने का पहला वाकया था जिन्हें इंटरनेट से जुड़ा माना जाता है. प्रूफ़ प्वाइंट के मुताबिक़ स्पैम हमले 23 दिसंबर 2013 से इस साल 6 जनवरी के बीच हुए. उनके अनुसार कुल मिलाकर क़रीब साढ़े सात लाख मैसेज जंक मेल के रूप में भेजे गए. और ये सभी ईमेल इन्हीं असुरक्षित गैजेट के ज़रिए भेजे गए. प्रूफ़ प्वाइंट ने जिन मैसेजों की पड़ताल की उनमें से 25 फ़ीसदी लैपटॉप डेस्कटॉप या स्मार्टफ़ोनों से नहीं भेजे गए थे. इसके बजाय मैलवेयर यानी मशीनों को भ्रष्ट करने वाला सॉफ़्टवेयर रसोई के उपकरणों घरेलू मीडिया सिस्टम को भेदने में कामयाब रहा जिन पर या तो डीवीडी कॉपी की जाती हैं या वो टीवी जो इंटरनेट से जुड़े हैं. इनमें से कई गैजेटों में कंप्यूटर प्रॉसेसर लगे होते हैं जो खुद संवाद को लाने ले जाने के अलावा दूसरे कार्यकलापों के लिए खुद इंटरनेट सर्वर की भूमिका निभाते हैं. प्रूफ़ प्वाइंट के जनरल मैनेजर डेविड नाइट के मुताबिक़ हमले में शामिल इंटरनेट पतों की पड़ताल में प्रूफ़ प्वाइंट कंपनी को कुछ स्मार्ट गैजेट का पता चला. उन्होंने बीबीसी को बताया ये परिणाम ख़ुद अपनी कहानी बता रहे थे क्योंकि कई इंटरनेट पतों से उनकी पहचान हो गई. इनमें से कई में जाने-पहचाने फ़ाइल के ढांचे और सामग्री शामिल थी. नाइट ने अनुमान लगाया है कि जिस मैलवेयर ने स्पैम भेजने में भूमिका निभाई वह ख़ुद कई गैजेट में इंस्टॉल हो गया क्योंकि कई गैजेट ग़लत ढंग से बने थे या उनमें डिफ़ॉल्ट पासवर्ड्स का इस्तेमाल किया गया जिनकी वजह से वे असुरक्षित बन गए थे. उन्होंने बताया कि इंटरनेट पर कई हमले भविष्य में आम बात हो जाएगी क्योंकि घरों में ऐसे गैजेटों का इस्तेमाल और बढ़ेगा और उन्हें इंटरनेट के ज़रिए संचालित किया जाएगा. |
| DATE: 2014-01-23 |
| LABEL: science |
| [107] TITLE: आखिर नींद का क्या है माजरा |
| CONTENT: सुबह-सवेरे अपनी नींद खोलना या फिर देर रात तक जगे रहने की आख़िर क्या वजह है विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की प्रवृति के लिए जीन ज़िम्मेदार है. हममें से कुछ लोग हर सुबह बड़े उत्साह से बिस्तर से बाहर निकलकर अपने दिन की शुरुआत करना चाहते हैं वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उठने के लिए अलार्म घड़ी का सहारा लेते हैं जिसमें एक स्नूज़ बटन हो ताकि उन्हें उठने और काम पर जाने में देरी न हो. हममें से कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो बात करने के लिए देर तक जगे रह सकते हैं जबकि कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो लाइट बंद कर कुछ सुनते हुए सोना चाहते हैं. ऐसे ही लोगों में से कुछ लोग तड़के चहचहाने वाली चिड़िया या फिर उल्लू की श्रेणी में शामिल हो सकते हैं. कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के न्यूरोजेनेटिसिस्ट डॉक्टर लुइस प्टाचेक का कहना है कि वास्तव में हमारी यह प्रवृति हमारे जीन से निर्धारित होती है. वह कहते हैं हमें यह बात पसंद हो या न हो लेकिन हमारे माता-पिता हमें समय से बिस्तर पर जाने की ताक़ीद देते ही रहे हैं. वैज्ञानिक एक व्यक्ति के जीन और दिन के किसी खास वक्त में उसकी सक्रियता को समझने की अहमियत को महसूस कर रहे हैं. मिशिगन में फ़ार्माकोलॉजी के एक प्रोफ़ेसर रिक न्यूबिग कहते हैं यूरोप में मैं जिनसे संवाद करता हूं उन्होंने देखा होगा कि उन्हें सुबह-सुबह मेरा मेल मिलता है. वह कहते हैं सुबह उठने की आदत से ही मैं पक्षियों को देख पाता हूं जो मेरा शगल है. दूसरे लोगों के मुकाबले सुबह उठना और चिड़ियों को देखना अब मेरे लिए आसान है. यह आदत उनके परिवार में भी है. वह कहते हैं मेरी मां हमेशा सुबह 4 बजे हम सबको जगा देती थीं और मेरी बेटी सुबह उठकर काम करती है. डॉक्टर लूइस प्टाचेक तड़के उठने वाले रिक और उनके जैसे परिवारों का अध्ययन कर रहे हैं जो एडवांस स्लीप फेज़ सिंड्रोम से ग्रस्त हैं. वह उस शोध क्षेत्र में तब उतरे जब उनके सहयोगी डॉक्टर क्रिस जोन्स 69 वर्ष के एक व्यक्ति से मिले जो जल्दी नींद खुल जाने की वजह से परेशान थे. प्टाचेक और जोंस ने उनका ख़्याल रखा. लूइस प्टाचेक का कहना है हमने यह पाया कि यह एक आनुवंशिक लक्षण है और पता चला कि गुणसूत्र 2 के पास परिवर्तित जीन मौजूद है. वैसे उन्हें यह पहले से अंदाज़ा था कि फल पर लगने वाली मक्खियां और चूहे में समान जीन के उत्परिवर्तित होने से उनमें जैविक प्रक्रिया की रफ्तार तेज़ हो जाती है. उत्परिवर्तित जीन से अलग तरह का प्रोटीन तैयार होता है जिससे शारीरिक घड़ी की लय प्रभावित होती है. उन्होंने दिन में देर तक सोने और रात में जागने वाले परिवारों का अध्ययन भी किया जिन्हें डिलेड स्लीप फेज़ सिंड्रोम था. उनका मानना था कि ऐसा एक ही जीन में अलग उत्परिवर्तन के कारण था. हम सब में आंतरिक जैविक प्रक्रिया वाली घड़ियां होती हैं. यह मास्टर घड़ी हज़ारों तंत्रिका कोशिकाओं से बनी होती है और यह दिमाग के हाइपोथैलेमस हिस्से में मौजूद होता है. हाइपोथैलेमस सभी तरह के शारीरिक कार्यों मसलन हार्मोन निकालने के साथ ही शरीर के तापमान और पानी की मात्रा को नियमित करता है. यह आंतरिक घड़ी हर रोज़ रोशनी के आधार पर दोबारा सेट होती है. आपको यह लग सकता है एक दिन में अगर 24 घंटे ही होते हैं तो सभी के शरीर की घड़ियां एक जैसी ही चलनी चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं होता इसी वजह से किसी को जल्दी नींद आती है तो कोई देर तक जगा रहता है. यूनिवर्सिटी ऑफ़ सरी के स्लीप रिसर्च सेंटर के प्रमुख प्रोफ़ेसर दर्क-जान दिज्क का कहना है अगर आपकी घड़ी तेज़ है तो आप सब कुछ जल्दी करेंगे और अगर आपकी घड़ी धीमी है तो आप देर से कोई काम करेंगे हमारी घड़ियां जीवन भर निर्धारित नहीं रहती हैं. जिनके भी छोटे बच्चे होते हैं उन्हें यह अंदाज़ा है कि बच्चे सुबह जल्दी उठते हैं जैसे कि किसी बुजुर्ग व्यक्ति में भी यही प्रवृति रहती है. हालांकि हमारे शरीर की आंतरिक घड़ी की चाहे जो भी रफ़्तार हो लेकिन हमें अपने समाज की बनाई हुई 9 से 5 बजे की रुटीन से तालमेल बिठाना पड़ता है. आम तौर पर किशोरों के लिए सुबह उठना मुश्किल है. लुडविग मैक्सिमिलियंस विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर टिल रोनेनबर्ग ने इस आयु वर्ग के नींद के रुझान पर नज़र डाली है. उनका कहना है किशोरों का हर काम देर से करना बेहद मशहूर है. बचपन से किशोर होने के चरण में जाते-जाते 19 साल की महिला और 21 साल के पुरुष में यह देरी चरम पर पहुंच जाती है. यह शोध आश्चर्यजनक होने के साथ ही स्पष्ट भी था. हमारे डेटाबेस में दो लाख से ज़्यादा प्रतिभागी हैं. हम दुनिया के एक नींद वाले नक्शे को तैयार करने की उम्मीद कर रहे हैं. अमेरिका में ब्राउन विश्वविद्यालय में मनोरोग विज्ञान की एक प्रोफ़ेसर मैरी कार्सकाडॉन स्कूल देर से खोले जाने के लिए अभियान चला रही हैं. वह कहती हैं स्कूल ग्रेड हमेशा अच्छा नहीं होता लेकिन मुझे लगता है कि किसी की नींद का कम होना एक बड़ी समस्या है और इसका ताल्लुक अवसाद उदासी और बच्चों में प्रेरणा की कमी से जुड़ा है. जब स्कूल देर से खुलते हैं जो बच्चों के मिजाज़ में सुधार होता है. लेकिन दुनिया में बेहद कम स्कूल ही देर से खुलते हैं. हालांकि कई लोग सुबह 9 बजे से 5 बजे तक काम करने को तरजीह देते हैं भले ही वे थक जाते हों. प्रोफ़ेसर रोनेनबर्ग काम वाले हफ़्ते में नींद की कमी को मापने के लिए एक दिलचस्प तरीके का जिक्र करते हैं जिस दौरान हम बिस्तर पर से उठने के लिए अलार्म घड़ी पर निर्भर होते हैं. उनका कहना है कि आमतौर पर लोग हफ़्ते के दौरान जल्दी सोते हैं जबकि छुट्टी के दिनों में देर से सोते हैं. उनका कहना है हमें अपने काम करने के समय में बदलाव करना चाहिए. लेकिन अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो हमें रोशनी के लिए रणनीति तय करनी चाहिए. हमें काम पर जाते वक्त किसी कवर किए गए वाहन के बजाए मोटर साइकिल पर जाने की कोशिश करनी चाहिए. सूरज के डूबने पर हमें वैसी चीजों का इस्तेमाल करना चाहिए जिसमें नीली रोशनी न हो मसलन कंप्यूटर स्क्रीन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण. |
| DATE: 2014-01-21 |
| LABEL: science |
| [108] TITLE: बज गया 'ब्रह्मांड का सबसे अहम अलार्म' |
| CONTENT: वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के अंतरिक्षयान रोसेटा का अलार्म बज चुका है. इस अलार्म के बजने के साथ ही रोसेटा के नींद से जगने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. रोसेटा की अंतरिक्षयात्रा एक दशक पहले शुरू हुई थी. लेकिन बीते दो साल से ये अंतरिक्षयान नींद में था क्योंकि इसे एक धूमकेतु पर उतरने के अपने अभियान के अंतिम चरण के लिए ऊर्जा बचानी थी. इतनी लंबी नींद से जगने में इसे कई घंटे लग सकते हैं क्योंकि अहम उपकरणों को शुरू होने में वक़्त लगेगा. रोसेटा को इसी साल अगस्त में धूमकेतु 67 पी चर्यूमोफ़-गेरासिमेंको से मिलना है. कुछ महीने तक इस चार किलोमीटर लंबे धूमकेतु के अध्ययन के बाद रोसेटा इस धूमकेतु पर एक छोटा सा रोबोट उतारेगा ताकि इससे नमूने इकट्ठा किए जा सकें और कुछ तस्वीरें ली जा सकें. यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के जर्मनी के डर्मस्टेट स्थित ऑपरेशंस सेंटर के वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि उन्हें रोसेटा से कुछ ही घंटों में कोई संदेश मिलेगा. रोसेटा को जून 2011 में अस्थायी रूप से निष्क्रिय किया गया था क्योंकि सौर तंत्र में इसका रास्ता इसे सूरज से इतना दूर ले जाने वाला था कि इसके सोलर पैनल बहुत कम सौर ऊर्जा पैदा कर पाते. साल 2004 में इसे लॉन्च किया गया था और इसने धूमकेतु तक पहुंचने के लिए थोड़ा घुमाव वाला रास्ता चुना है. एक बार वैज्ञानिक रोसेटा की सेहत की पड़ताल कर लें तो वो इसे धूमकेतु 67 पी तक पहुंचाने के लिए इसके थ्रस्टर्स को शुरू करेंगे. अभी रोसेटा की धूमकेतु 67 पी से दूरी क़रीब 90 लाख किलोमीटर है सितंबर के मध्य तक इस दूरी को सिर्फ़ 10 किलोमीटर तक लाया जाएगा. 11 नवंबर को धूमकेतु 67 पी पर तीन टांगों वाला रोबोट फ़िली उतारा जाएगा. वैज्ञानिक चाहते हैं कि रोसेटा धूमकेतु 67 पी का तब पीछा करे जब वह सूरज की ओर बढ़ रहा हो ताकि इस धूमकेतु पर होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया जा सके. फ़िली धूमकेतु की सतह पर होने वाले परिवर्तनों की जानकारी देगा. माना जाता है कि धूमकेतुओं पर ऐसे खनिज हैं जो 4-6 अरब साल पहले सौर तंत्र बनने से लेकर अब तक वैसे ही हैं. ऐसे में रोसेटा से मिलने वाले आंकड़े शोधकर्ताओं को ये समझने में मदद करेंगे कि समय के साथ अंतरिक्ष का वातावरण कैसे बदला है. |
| DATE: 2014-01-20 |
| LABEL: science |
| [109] TITLE: कभी दवा थी मदिरा, लेकिन अब बन गई है मर्ज़ |
| CONTENT: सैकड़ों साल से ब्रिटिश औषधि विज्ञान के इतिहास में दवा की गोलियों शर्बतों या रोग निदान करने वाली जड़ी-बूटियों में अल्कोहल का स्थान काफ़ी ख़ास रहा है. कभी प्लेग के निपटने के लिए जिन की एक बूंद लेने की सलाह दी जाती थी तो कभी शरीर की सफ़ाई के लिए वाइन से गरारे करने और चिरायता के घूंट के ज़रिए पेट में मौजूद कीड़े मारने की सलाह दी जाती थी. हालांकि अब यह सब बदल चुका है. जैसे-जैसे अल्कोहल के समाज और लोगों पर नुक़सान के बारे में हमारी समझ बढ़ी इसकी जगह नुस्खों की पुर्ज़ियों ने ले ली यहां तक कि इससे दूर रहने और इसके सावधानीपूर्वक इस्तेमाल करने की सलाह दी जाने लगी. लंदन में रॉयल कॉलेज ऑफ़ फ़िज़ीशियंस की एक प्रदर्शनी में इसके इस्तेमाल और अतीत में मेडिकल साइंस से जुड़े लोगों द्वारा घातक दुरुपयोग की बानगी पेश की गई है जो इस पर और ज़्यादा नियंत्रण की मांग करती है. प्रदर्शनी में रखी चमड़े की जिल्द वाली कई किताबों में एक 13वीं सदी के ब्रितानी दार्शनिक और लेखक रॉजर बेकन की किताब का अंग्रेजी अनुवाद भी है. बेकर कीमियागिरी और मेडिसिन पर लिखा करते थे. 1683 ईस्वी में छपे इस अनुवाद के मुताबिक़ बेकन का सुझाव था कि वाइन पेट को ठीक रखती है शरीर में गर्मी बनाए रखती है पाचन में मददगार है शरीर को प्रदूषित होने से बचाती है और खून में मिलने तक भोजन को पचाती है. मगर वह अत्यधिक मात्रा में एथेनॉल के इस्तेमाल के ख़तरे से भी वाकिफ़ थे अगर आप इसे ज़्यादा गटकते हैं तो यह बहुत नुक़सानदेह साबित होगा यह इंसान की समझदारी पर असर डालेगा दिमाग़ को प्रभावित करेगा. अंगों में थिरकन और आंखों में धुंधलापन लाएगा. 16वीं और 18वीं सदी की हस्तलिखित घरेलू पाकशास्त्र की किताबों में आमतौर पर पकाए जाने वाले भोजन की विधियों के साथ-साथ ही वाइन से बनी चीज़ों का भी ज़िक्र आता है. 17वीं सदी के एक समझदार गृहस्थ की सलाह थी प्लेग से निपटने के लिए बेहतरीन पेय. इसमें ब्राह्मी तेजपात और दो पाइंट वाइन शामिल थी. वाइन की यह मात्रा इस समय ब्रिटेन में रोज़ाना जितनी वाइन लिए जा सकने की सलाह दी जाती है उस मात्रा से बहुत ज़्यादा है. प्रदर्शनी की क्यूरेटर कैरॉलिन फ़िशर कहती हैं वाइन को इतिहास में एक ताक़तवर टॉनिक की जगह दी गई थी पर दारू को दूसरी नज़र से देखा जाता था. अपने ढंग के रोग उपचार का ज़रिया माने जाने के अलावा इन्होंने दूसरे ऐसे पेय पदार्थों के संरक्षक की भूमिका निभाई जिन्हें वैसे बोतलबंद करके बेचना मुमकिन नहीं था. मिसाल के लिए नागदौन जैसी जड़ीबूटी से निकाले जाने वाले चिरायता को पेट के कीड़े और आंतों के कीड़े मारने के लिए कई साल तक इस्तेमाल किया जाता रहा. मगर अल्कोहल रिसर्च यूके के डॉक्टर जेम्स निकॉल्स के मुताबिक़ 18वीं सदी तक जिन जैसी शराब को लोगों में बढ़ते नशे ग़रीबी और अपराध के लिए ज़िम्मेदार माना जाने लगा था. साल 1725 में रॉयल कॉलेज ऑफ़ फ़िज़ीशियंस ने अपनी पहली याचिका में दारू के बढ़ते इस्तेमाल के घातक असर पर चिंता जताई थी. वाइन और बीयर के मुक़ाबले डिस्टिलेशन के तरीक़ों पर जैसे-जैसे क़ानून की पकड़ शिथिल हुई पूरे इंग्लैंड में जिन को लेकर दीवानगी बढ़ने लगी. इसका मतलब यह भी था कि शराब ज़्यादा बड़ी जनसंख्या को उपलब्ध होने लगी. लंदन स्कूल ऑफ़ हायजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन की डॉक्टर वर्जीनिया बैरिज के मुताबिक़ 19वीं सदी तक अल्कोहल एक बड़ी समस्या की तरह देखा जाने लगा था. जैसे-जैसे ब्रिटेन का औद्योगीकरण और नगरीकरण बढ़ा उसे ज़्यादा दक्ष और समय के पाबंद कामगारों की ज़रूरत होने लगी और परहेज़ एक गुण मान लिया गया. ख़ुद पर संयम की मांग करने वाले आंदोलन शुरू होने लगे- कुछ ने शुरू में कुछ ख़ास पेय पदार्थों पर ही पाबंदी की सलाह दी मगर समय के साथ उन्होंने इन पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग शुरू कर दी. 19वीं सदी के मध्य तक फ़िजीशियन ख़ुद ही इन परहेज़ आंदोलनों में शामिल होने लगे. साल 1871 में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में छपे ब्रिटिश मेडिकल टैंपरेंस सोसायटी के एक बयान में कहा गयाकहते हैं कि अल्कोहल के इस्तेमाल के बेमानी सुझावों ने कई मामलों में असंतुलित आदतों को बढ़ावा दिया है. जहां तक कुछ ख़ास बीमारियों के मामले में अल्कोहल का इस्तेमाल सीमित करने की बात है हमारा मानना है कि किसी भी मेडिकल प्रैक्टिशनर को गंभीरता से विचार किए बगैर इसके इस्तेमाल की इजाज़त नहीं देनी चाहिए. विज्ञान की तरक्की के साथ जैसे-जैसे नए पदार्थों का पता लगा वैसे-वैसे अल्कोहल को लेकर सोसायटी और मेडिकल समुदाय के विचार बदलने लगे जिसकी एक वजह प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत में कार्यकुशलता पर ज़ोर देना भी था. प्रदर्शनी में सबसे आधुनिक चीज़ एटकिंसन इन्फ़ेंट्स प्रिज़र्वेटिव की एक बोतल है जिसे वर्ष 1919-1941 के बीच जिन बच्चों के दांत निकल रहे हों उनके उपचार के लिए इस्तेमाल किया जाता था. इसकी पैकेजिंग इस तरह की गई थी कि यह माता-पिता को आश्वस्त करती थी कि वे इसे पूरे यक़ीन के साथ दे सकते थे क्योंकि इसमें कोई नशीली चीज़ नहीं थी. हालांकि इसमें अल्कोहल की मात्रा 50 फ़ीसदी होती थी. रॉयल फ़ार्मास्यूटिकल सोसायटी म्यूज़ियम के संरक्षक जॉन बैट्स कहते हैं यह शायद ताज्जुब लगे मगर तब तक अल्कोहल के प्रभाव का पता चल चुका था. वर्ष1941 में ग्रेट ब्रिटेन में बने एक क़ानून के बाद फ़ार्मास्यूटिकल उत्पादकों के लिए अपनी दवाओं में शामिल सामग्री की सूची दर्ज करना अनिवार्य कर दिया गया. पिछले कुछ साल से रॉयल कॉलेज ऑफ़ फ़िज़ीशियंस अल्कोहल के कारण सेहत ख़राब होने के बारे में जागरूकता फैलाने का काम कर रहा है. कॉलेज इस सिलसिले में कई क़दम उठा रहा है जिसमें ब्रिटेन में अल्कोहल की प्रति यूनिट खपत पर 50 पेंस और मार्केटिंग और एडवर्टाइज़िंग पर कड़े प्रतिबंध लगाना शामिल है ख़ासकर जब बच्चे इसके असर में आ रहे हैं. कॉलेज का कहना है अल्कोहल कम से कम 40 गंभीर मेडिकल स्थितियों के लिए ज़िम्मेदार है जिनमें लिवर की बीमारी और कैंसर शामिल हैं और ब्रिटेन में मौत की यह बड़ी वजह भी है जिसे रोका जा सकता है. |
| DATE: 2014-01-20 |
| LABEL: science |
| [110] TITLE: स्वीडनः नौ महिलाओं का गर्भाशय प्रतिरोपण |
| CONTENT: स्वीडन में एक आधुनिक चिकित्सकीय परीक्षण में नौ महिलाओं ने गर्भाशय का प्रतिरोपण कराया है. इन महिलाओं में उनकी जीवित रिश्तेदारों के गर्भ प्रतिरोपित किए गए हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ़ गोथेनबर्ग के डॉक्टर मैट्स ब्रैनस्ट्रॉम प्रजनन क्षमता विकसित करने वाले इस परीक्षण का नेतृत्व कर रहे हैं. उन्होंने उम्मीद जताई है कि इस तकनीक की मदद से कई महिलाएं माँ बन सकेंगी. यह इस दिशा में पहला बड़ा प्रयोग माना जा रहा है. मैट्स ब्रैनस्ट्रॉम के मुताबिक अकेले ब्रिटेन में कम से कम 15000 महिलाओं को इस तकनीक का लाभ मिलेगा. इस तकनीक से उन महिलाओं को मदद मिलेगी जिनका जन्म गर्भाशय के बिना हुआ हो या फिर जिनके गर्भ में भ्रूण का विकसित होना संभव नहीं है. ब्रैनस्ट्रॉम ने प्रशिक्षण के लिए 10 महिलाओं का चयन किया था. चिकित्सकीय वजहों के चलते इनमें से एक महिला पर प्रयोग नहीं हो पाया लेकिन बाक़ी नौ महिलाओं में नया गर्भाशय लगाया गया. ये वैसी महिलाएं हैं जिनका जन्म गर्भाशय के बिना हुआ था या फिर कैंसर की वजह से उनके गर्भाशय को हटाना पड़ा था. इनमें से ज्यादातर महिलाओं की उम्र 30 साल के आसपास है. ब्रिटेन और दुनिया के दूसरे देशों में भी ऐसे प्रयोग किए जाने की दिशा में काम चल रहा है लेकिन स्वीडन में हुआ प्रयोग सबसे अत्याधुनिक है. हालांकि इससे पहले तुर्की और सऊदी अरब में गर्भाशय को प्रतिरोपित किए जाने की कोशिशें हो चुकी है. लेकिन दोनों देशों में की गई कोशिशों में बच्चे का जन्म संभव नहीं हो पाया था. डॉक्टर मैट्स ब्रैनस्ट्रॉम ने समाचार एजेंसी एपी को बताया यह नई तरह की सर्जरी है. इसके बारे में जानने के लिए कोई संदर्भ उपलब्ध नहीं है. ब्रैनस्ट्रॉम और उनके सहयोगी जल्द ही इससे संबंधित वैज्ञानिक रिपोर्ट जारी करने वाले हैं. हालांकि इस ऑपरेशन के तहत गर्भाशय को महिलाओं की फ़ैलोपियन ट्यूब से नहीं जोड़ा गया है इसका मतलब यह है कि ये महिलाएं प्राकृतिक रूप से गर्भवती नहीं हो सकती लेकिन आईवीएफ़ तकनीक कृत्रिम गर्भाधान की मदद से वे गर्भवती हो सकती हैं. |
| DATE: 2014-01-19 |
| LABEL: science |
| [111] TITLE: गूगल लेंस: अब आंसू देंगे डायबिटीज़ का पता |
| CONTENT: डायबिटीज़ का पता लगाने के लिए अब रोज़ शरीर में सुई चुभोने जैसी दर्दनाक प्रक्रिया से छुटकारा मिल सकता है. गूगल ऐसा लेंस बना रही है जो आंसू में मौजूद डायबिटीज़ के स्तर को मापेगा. इसका नाम है गूगल स्मार्ट कॉन्टेक्ट लेंस. स्मार्ट कॉंन्टेक्ट लेंस अपनी दो परतों के बीच लगी नन्ही वायरलेस चिप और छोटे ग्लूकोज़ सेंसर की मदद से आंसुओं में मौजूद ग्लूकोज़ की मात्रा का पता लगाएगा. शरीर में ग्लूकोज़ की मात्रा से ही पता चलता है कि डायबिटीज़ का क्या स्तर है. गूगल इस लेंस में एक ऐसी एलईडी लाइट लगाने पर भी काम कर रहा है जो ग्लूकोज़ की सीमा से ज़्यादा होते ही जल उठेगी. मगर कंपनी का यह भी मानना है कि रोज़मर्रा के इस्तेमाल के लिए इस तकनीक के तैयार होने के पहले काफ़ी कुछ किया जाना बाकी है. गूगल ने अपने ब्लॉग में लिखा है यह तकनीक आने में अभी देर है. मगर हमने इससे जुड़े अधिकतर शोध पूरे कर लिए हैं. हमें विश्वास है कि एक दिन यह तकनीक डायबिटीज़ से जूझ रहे लोगों के लिए राहत लेकर आएगी. दुनिया भर की कई कंपनियां पहने जाने वाले वियरेबल तकनीकी उत्पाद बाज़ार में अपने पांव जमाना चाहती हैं. आने वाले सालों में उन्हें इस बाज़ार में काफ़ी संभावनाएं नज़र आती हैं. अलग-अलग अनुमानों के आधार पर कहा जा सकता है कि वियरेबल तकनीक के क्षेत्र में अगले पांच साल में 10 अरब डॉलर से 50 अरब डॉलर तक की बढ़ोतरी की संभावना है. इस क्षेत्र की कई कंपनियां आजकल विशेष रूप से सेहत से जुड़ी तकनीक पर काम कर रही हैं. गूगल को उम्मीद है कि निकट भविष्य में स्मार्ट कॉन्टेक्ट लेंस के उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ने वाली है. इसलिए वह ज़ोर-शोर से इसे बनाने में जुटी है. अंतरराष्ट्रीय डायबिटीज़ फ़ेडरेशन के मुताबिक़ साल 2035 तक पूरी दुनिया में 10 में से एक इंसान को डायबिटीज़ होने की आशंका है. ऐसे मरीज़ों को ग्लूकोज़ स्तर पर लगातार नज़र रखनी पड़ती है. ग्लूकोज़ की मात्रा में अचानक कमी या बढ़ोतरी सेहत के लिए गंभीर ख़तरे पैदा करती है. इसलिए नियमित जांच ज़रूरी है. गूगल के मुताबिक़ अभी वह ग्लूकोज़ पर हर सेकेंड नज़र रखने वाले इन लेंसों के नमूनों की जांच कर रही है. परामर्श कंपनी फ्रॉस्ट एंड सुलिवन के प्रबंधक मनोज़ मेनन ने बीबीसी को बताया रोगनिरोधक स्वास्थ्य कंपनियों में हो रहा यह विकास उत्साहजनक है. उम्मीद है कि इस क्षेत्र में कई और नए अनुसंधान होंगे जिनसे वियरेबल उत्पादों के ज़रिए सेहत से जुड़ी गतिविधियों पर नज़र रखी जा सकेगी. गूगल ने स्मार्ट कॉन्टेक्ट लेंस बनाने के लिए अमरीकी फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन एफ़डीए की मदद ली है. इसके अलावा वह ऐसे कई और साझेदार भी तलाश रही है जिन्हें ऐसे उत्पाद तैयार करने में विशेषज्ञता हासिल हो. गूगल के अलावा ऐसी कई कंपनी हैं जो वियरेबल प्रोडक्ट के ज़रिए इसे पहनने वाले की सेहत पर नज़र रखती हैं. इस महीने की शुरुआत में लास वेगास में हुए एक कंज़्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स शो के दौरान सेंसिबल बेबी गैजेट लॉन्च किया गया. यह उत्पाद शिशु की नाइट ड्रेस में लगाया जाता है. फिर इससे शिशु के शरीर के तापमान और उसकी स्थिति रिकॉर्ड की जाती है. किसी भी तरह का खतरा भांपते ही सेंसिबल बेबी स्मार्टफ़ोन ऐप को संकेत भेजता है जिसके बाद उसका अलार्म बजने लगता है. इसी तरह ऐसी कई स्मार्टवॉच भी लॉन्च की गई हैं जो दिल की धड़कनों और तापमान पर नज़र रखती हैं. पिछले साल जापानी कंपनी सोनी एक स्मार्टविग लेकर आई थी. सोनी का दावा है कि यह विग अपने सेंसर के ज़रिए शरीर के तापमान स्पंदन और रक्त दाब पर एक साथ नज़र रखता है. |
| DATE: 2014-01-18 |
| LABEL: science |
| [112] TITLE: ऑनलाइन हो रहे हैं रोबोट |
| CONTENT: सीखना और साझा करना इंसानी प्रवृति मानी जाती है मगर अब रोबोट भी इससे पीछे नहीं रहेंगे. पहली बार रोबोट के लिए एक ऐसा वर्ल्ड वाइड वेब तैयार किया जा रहा है जहां वे इंसानों की तरह ही एक दूसरे से सीखेंगे और जानकारियां साझा करेंगे. इस वेब का नाम होगा रोबोअर्थ. रोबोअर्थ को विकसित करने वाले वैज्ञानिक इस प्रणाली को इंडोवेन यूनिवर्सिटी में तैयार किए गए एक बनावटी अस्पताल में साकार करने की योजना बना रहे हैं. अस्पताल में मरीज़ को पेय पदार्थ देने सहित अन्य कई कामों के लिए चार रोबोट इस प्रणाली का इस्तेमाल करेंगे. रोबोट के लिए ऐसी प्रणाली विकसित करने वाली योजना में यूरोपीय संघ ने पैसे लगाए हैं. यह योजना पिछले चार साल से चल रही है. योजना का लक्ष्य रोबोट को इस लायक बनाना है ताकि वो अपनी जानकारियों को डाटाबेस से साझा कर सके. यही सूचनाएं सभी मशीनों के साथ एक ख़ास मस्तिष्क के जरिए साझा की जाएंगी. रोबोअर्थ प्रणाली का विकास इंडोवेन सहित पांच यूरोपीय विश्वविद्यालयों ने मिलकर किया है. रोबोअर्थ प्रोजेक्ट की अगुआई करने वाले रेने वान दे मोलेनग्राफ्ट का कहना है मूल रूप से रोबोअर्थ रोबोट के लिए तैयार किया गया एक वर्ल्ड वाइड वेब है. विशाल नेटवर्क और लंबे चौड़े आंकड़ों का गोदाम इसकी ख़ासियत है. यहां रोबोट अपनी जानकारियां एक दूसरे से बाटेंगे और एक दूसरे से सीखेंगे भी. बीबीसी से बात करते हुए वे कहते हैं कि इस विशेष प्रणाली का परीक्षण सार्वजनिक रूप से किया जाएगा. परीक्षण के लिए चार रोबोट चुने गए हैं. ये रोबोट मरीज़ की मदद के लिए मिलजुल कर काम करेंगे. उदाहरण के लिए एक रोबोट कमरे का नक्शा वेबसाइट पर अपलोड करेगा ताकि मरीज़ से मिलने वालों को यहां पहुंचने में कोई परेशानी ना हो और मरीज़ को पेय पदार्थ भी जल्दी और आसानी से मिल जाए. वे बताते हैं मगर समस्या ये है कि एक रोबोट को प्रायः एक ही काम के लिए तैयार किया जाता है. रोज इतने तरह के बदलाव आकार ले रहे हैं कि रोबोट से योजनाबद्ध तरीके से काम करवा पाना मुश्किल साबित होता है. रोबोअर्थ प्रणाली का उद्देश्य कई रोबोट के लिए एक ऐसा मस्तिष्क तैयार करना है जो संयुक्त रूप से कई काम करता हो. उन्होंने आगे कहा दवाइयों के किसी डिब्बे को खोलने जैसे काम को रोबोअर्थ पर साझा किया जाएगा ताकि दूसरे वैसे रोबोट भी ऐसा कर सकें जिन्हें दवाई के उस ख़ास डिब्बे को खोलना नहीं सिखाया गया. घास काटने के लिए भी इस्तेमाल किया जाने वाला रोबोट. विशेषज्ञों का अंदाजा है कि अगर आपको अपने घरेलू कामों में सहायता लेने के लिए इस तरह के रोबोट चाहिए तो 10 साल इंतजार करना होगा. हालांकि घरों में पहले से रोबोट वैक्यूम क्लीनर घास काटने और खिड़कियां साफ़ करने वाले रोबोट उपलब्ध हैं. शारीरिक रूप से कमज़ोर और अधिक उम्र के लोगों की सहायता करने वाले रोबोट विकसित किए जा रहे हैं. अपनी समझ विकसित कर लेने वाले रोबोट के ख़तरे के बारे में किताब लिखने वाले लेखक जेम्स बराट मानते हैं कि ऐसे रोबोट की सहायता लेने में सावधानी बरतने की भी ज़रूरत है. |
| DATE: 2014-01-16 |
| LABEL: science |
| [113] TITLE: मोबाइल अब आपकी कार भी पार्क कर सकता है! |
| CONTENT: जब फ़ोन स्मार्ट हो चुके हैं तो एक्सेसरीज़ क्यों पीछे छूटें क्या आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि आने वाले समय में मोबाइल गैजेट क्या-क्या कर पाएंगे शायद नहीं. इस साल के कंज़्यूमर इलेक्टॉनिक शो में ऐसे ही कुछ स्मार्ट गैजेट प्रस्तुत किए गए है. इनमें से कोई स्पाई-ड्रोन है तो कोई स्मार्ट चूल्हा. आइए जानते हैं इनमें से कुछ के बारे में. भीड़ में गाड़ी चलाने के अलावा इसे पार्क करना दूसरा सबसे कठिन काम है. इस काम को आसान बनाने के लिए एक नया गैजेट इजाद किया गया है. वैलियो एक ऐसा गैजेट है जो आपकी गाड़ी को स्मार्टफ़ोन पर आपके निर्देशों के अनुसार पार्क कर देता है. आपको बस स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन पर रास्ता खींचना है बस. आपकी गाड़ी बिना ड्राइवर के अपने आप आपके खींचे रास्ते पर चलकर पार्क हो जाएगी. इसके लिए आपके गाड़ी में किट और 12 सेंसर लगाए जाएंगे. ये दुनिया का सबसे पहला इंटरनेट युक्त टूथब्रश है. इसमें ऐसा सेंसर लगा हुआ है जिससे ये पता चलता है कि ब्रश के दौरान यूज़र के दांतों से कितनी गंदगी साफ़ हुई. ये सारी जानकारी रिकॉर्ड होती है ताकी रोज़ाना एक ही तरह से दांतों की सफ़ाई हो सके. पूरा रिकोर्ड आपके स्मार्टफ़ोन के एक ऐप में स्टोर होता रहता है. आईपैड और अन्य टैब्लेट्स की बढ़ती मांग को ध्यान में रखते हुए इस साल कई टैब्लेट एक्सेसरीज़ लॉन्च किए गए. ट्रियू-ग्रिप ने एक एंड्रॉएड और ऐपल टैब्लेट्स के लिए ऐसा एक गैजेट बनाया है जो कीबोर्ड और माउस का काम करता है. सड़कों पर भीड़ और शहरों के फैलाव से बढ़ती दूरी के चलते अपहले के मुक़ाबले अब लोग गाड़ियों में ज्यादा समय बिता रहे हैं. ऐसे में इन-कार एंटरटेनमेंट यानी गाड़ी के भीतर की मीडिया डिवाइसेज़ की मांग बढ़ी है. हर्मन में ऐसा ही एक कार कंसोल बनाया है जिसके ज़रिए आप अपने कार डैशबोर्ड में ही लाइव रेडियो स्ट्रीमिंग और इंटरनेट से जुड़े कई फ़ीचर प्राप्त कर पाएंगे. स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने वालों के लिए रनफ़ोन हेडबैंड काफ़ी कारगर साबित हो सकता है. रन फ़ोन एक ऐसा हेडबैंड है जिसे माथे पर पसीना रोकने के लिए लगाया जा सकता है लेकिन इसकी ख़ास बात ये है कि इसमें एक हेडफ़ोन भी लगा है जिसके ज़रिए आप गाना सुन सकते हैं. आपके फ़ोन और टीवी को स्मार्ट बनाने के बाद सभी बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां आपके घर को स्मार्ट बनाने पर जुट गईं हैं. इसी क्रम में ऐसे डिवाइसेज़ लॉन्च किए जा रहे हैं जो किसी स्मार्ट घर का हिस्सा बन पाएं. डिस्कवरी आईक्यू ने भी ऐसा ही एक स्मार्ट किचेन चूल्हा बनाया है जिसको सात इंच का एक एंड्रॉएड टैब्लेट नियंत्रित करता है. इस चूल्हे में ही इस टैब्लेट का डिसप्ले लगा हुआ है जिसमें बस कमांड देते जाइए और काम हो जाएंगा माचिस और लाइटर खोजने के झंझट से भी छुटकारा. एंड्रॉएड 4 ऑपरेटिंग सिस्टम से चलने वाला ये स्मार्ट चूल्हा किसी बड़े स्मार्ट होम सिस्टम का भाग बन सकता है. युद्ध से लेकर किराने का सामाना आपके घर पहुंचाने तक ड्रोन विमानों के विभिन्न प्रयोगों की बात अकसर सुनने में मिलती है. ऐसे में हमारे बीच आया है एक ऐसा ड्रोन जो आपके इशारों पर काम करता है. चीन की कंपनी फैंटम 2 विज़न एरियन सिस्टम एक ड्रोन है जिसमें 14 मेगापिक्सेल का कैमरा लगा हुआ है. ये ड्रोन चलता है स्मार्टफ़ोन से जिसके ज़रिए आप चाहे तो लाइव फ़ुटेज देख सकते हैं चाहे तो वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं. श्विन साइकलनैव साइकिल सवारी के शौक़ीनों के लिए है जो साइकिल पर नई जगहों की सार करने का शौक़ रखते हों. स्मार्टफ़ोन से जुड़ा ये गैजेट साइकिल सवार को आगे का रास्ता बताता है. |
| DATE: 2014-01-15 |
| LABEL: science |
| [114] TITLE: खाने की पांच चीजें जिनमें छिपी है भरपूर चीनी |
| CONTENT: मधुमेह रोगियों की बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए खाने में चीनी कम करने की सलाह दी जाती है. लेकिन खाने की कई चीज़ें ऐसी हैं जिनमें चीनी की मात्रा आश्चर्यजनक रूप से बहुत ज़्यादा होती है. एक प्रचार अभियान एक्शन ऑन शुगर खाने और सॉफ़्ट ड्रिंक्स में चीनी की मात्रा कम करने के लिए शुरू किया गया है. इसका उद्देश्य लोगों को छुपी हुई चीनी के बारे में जागरुक करना और निर्माताओं को इन पदार्थों में चीनी की मात्रा घटाने को तैयार करना है. जिन खाद्य पदार्थों में चीनी की मात्रा बेहद ज़्यादा है उनमें से पांच ये हैं. फ़ैट फ़्री का मतलब शुगर फ़्री नहीं होता ख़ासतौर पर जब डिब्बा बंद दही की बात की जाए. अक्सर वसा को निकालने के बाद स्वाद और रंगत बनाए रखने के लिए इसमें बड़ी मात्रा में चीनी डाली जाती है. एक्शन ऑन शुगर के अनुसार करीब 150 ग्राम दही जिसमें वसा 0 हो उसमें 20 ग्राम तक चीनी हो सकती है. इसका मतलब हुआ पांच चम्मच चीनी. डाइटीशियन डॉक्टर सारा शेनकर कहती हैं दिक्कत यह है कि लोग लो फैट कम वसा वाला खाना तो चाहते हैं लेकिन चाहते हैं कि यह फ़ैट वाले भोजन की तरह स्वादिष्ट हो. उनके अनुसार इसलिए जब वसा को निकाल दिया जाता है तो उसमें कुछ और जैसे की चीनी मिला दी जाती है. अगर लोग सेहतमंद भोजन चाहते हैं तो उन्हें यह स्वीकार करना होगा किस यह स्वाद और रंगत में थोड़ा अलग हो सकता है. टमाटरों से बनने वाले पास्ता सॉस से सेहत को होने वाले फ़ायदों को लेकर कई बातें कही जाती हैं लेकिन दुकान से ख़रीदी गई सॉस में चीनी भरी हो सकती है. चीनी अक्सर इसलिए मिलाई जाती है ताकि सॉस में अम्ल का स्वाद कम लगे. 150 ग्राम सॉस में करीब 13 ग्राम चीनी हो सकती है. यानी करीब तीन चम्मच. कोलेस्ल एक किस्म का सलाद में ज़्यादातर बारीक कटी हुईं या कसी हुईं सब्ज़ियां होती हैं लेकिन इसमें चीनी मिलाकर भी तैयार किया जाता है. इसके लिए ख़ासतौर पर मेयोनिस सॉस को ज़िम्मेदार माना जाना चाहिए. दुकान से खरीदी गई एक कड़छी करीब 50 ग्राम कोलेस्ल में चार ग्राम तक चीनी हो सकती है. कुछ कड़छी कोलेस्ल का मतलब कई चम्मच चीनी. डॉक्टर शेनकर कहती हैं सॉसों में अक्सर चीनी काफ़ी ज़्यादा होती है. पानी तो ठीक है नहीं क्या यह इस पर निर्भर करता है किस तरह का पानी परिष्कृत पानी में विटामिन मिलाए जाते हैं और इसके साथ ही चीनी भी. एक्शन ऑन शुगर के अनुसार कुछ ब्रांड के 500 मिलीलीटर पानी में 15 ग्राम तक चीनी होती है. यह करीब चार चम्मच चीनी के बराबर है. इसके बाद बहुत से लोगों के रोज़ के भोजन में शामिल पाव या ब्रेड. हालांकि चीनी की मात्रा अलग-अलग होती है लेकिन प्रोसेस्ड ब्रेड की एक स्लाइस में यह तीन ग्राम तक हो सकती है. अगर एक महिला नाश्ते में एक टोस्ट और दिन के खाने में एक सैंडविच लेती है तो उसने महिलाओं के लिए स्वीकार्य चीनी की एक चौथाई मात्रा ले ली है. डॉक्टर शेनकर के अनुसार अक्सर नमकीन का मतलब यह नहीं होता कि चीनी कम है. |
| DATE: 2014-01-15 |
| LABEL: science |
| [115] TITLE: जीन डोपिंगः खेलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती? |
| CONTENT: खेलों से जुड़ी शायद यह सबसे बड़ी चुनौती है. विशेषज्ञ इसके प्रति इतने संजीदा हैं कि पिछले दस साल से भी अधिक समय से इसका हल निकालने की कोशिश की जा रही है. लेकिन अब तक इस चुनौती का हल निकालने का कोई ठोस तरीका सामने नहीं आ पाया है. ये चुनौती है जीन डोपिंग. जीन डोपिंग का मक़सद सीधा और सरल है. इसकी मदद से इंसान की आनुवांशिक बुनावट में इस तरह से फ़ेरबदल किया जाता है कि शरीर की मांसपेशियां पहले से अधिक मज़बूत और गतिशील हो उठती हैं. उदाहरण के लिए जीन चिकित्सक प्रयोगशाला में तैयार ख़ास कृत्रिम जीन को मरीज के जीनोम जीन का समूह से जोड़ते हैं. फिर इस जीन को प्रभावहीन वायरस की मदद से मरीज के अस्थि-मज्जा में पहुंचाया जाता है. ऐसा करने से शरीर की मांसपेशियों को तैयार करने वाले हार्मोन उत्तेजित हो जाते हैं लाल रक्त कणों का बनना बढ़ जाता है. मरीज की कोशिकाओं में पहुंचकर यह नया जीन दवा की तरह काम करता है. दूसरी ओर इससे एथलीटों को अपने प्रदर्शन के दौरान अधिक से अधिक ऑक्सीजन मिलती है और वे थकते नहीं हैं. मांसपेशियों की ताक़त और गति बढ़ाने का यह तरीक़ा काफ़ी विशिष्ट और दुर्लभ है. जीन डोपिंग का इस्तेमाल कमज़ोर मांसपेशियों सहित व्यापक स्तर पर रोगों का समाधान निकालने के लिए किए जा रहे अनुसंधानों में हो रहा है. इससे सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह तरीक़ा एथलीटों के लिए कितना फ़ायदेमंद है. फ़्रांस के नैंट्स स्थित स्वास्थ्य और चिकित्सा अनुसंधान से जुड़े फ्रेंच नेशनल इंस्टीट्यूट में जीन डोपिंग को विकसित करने में जुटे डॉक्टर फ़िलिप मौलियर ने जब कुछ साल पहले इससे जुड़ा शोध-पत्र प्रकाशित किया तो उसका अच्छा स्वागत नहीं हुआ. मौलियर ने अपने प्रयोग से साबित कर दिया कि एक ख़ास जीन एरिथ्रोपोएटिन को कृत्रिम रूप से तैयार करना और फिर उसे शरीर में डालना संभव है. एरिथ्रोपोएटिन हार्मोन या ईपीओ- जो लाल रक्त कोशिकाओं की उत्पत्ति को नियंत्रित करता है खिलाड़ियों के लिए ग़ैर-क़ानूनी डोप का ज़रिया बना. यही वह जादुई दवा थी जिसका प्रयोग लांस आर्मस्ट्रांग ने टूअर डी फ्रांस की साइकिल दौड़ में किया था. फ़िलिप मौलियर के दस्तावेज़ प्रकाशित होने के तुरंत बाद नैंट्स स्थित उनकी प्रयोगशाला में कई लोग मिलने पहुंचे. वे पेशेवर साइकिलिस्ट थे और टूअर डी फ्रांस प्रतियोगिता के प्रतिभागी रह चुके थे. फ़िलिप मौलियर बताते हैं वे लोग बड़े उत्साहित थे. उनका मानना था कि भले ही जीन डोपिंग पर अभी अनुसंधान चल रहा है लेकिन साइकिलिस्टों के लिए यह उपलब्ध हो जाए तो इसका प्रयोग किया जा सकता है. मैं इस बात से बेहद हैरान-परेशान हो उठा. एक निष्क्रिय वायरस का इस्तेमाल करते हुए जीनोम में स्थायी बदलाव करके कोशिकाओं का आनुवांशिक इलाज एक जटिल प्रक्रिया है. फ़िलिप मौलियर कहते हैं कि इसका ऐसा कोई शॉर्ट-कट नहीं है जिससे अस्थाई लाभ लिया जा सके. जब ये पूर्व साइकिलिस्ट डॉक्टर मौलियर से मिले थे उसके कुछ साल बाद ईपीओ जीन के बारे में सारी जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध हो गई थी और कोई भी उसे पा सकता था. डॉक्टर मौलियर कहते हैं फ़ौरी लाभ वाले इन तरीक़ों को पकड़ पाना जाँचकर्ताओं के लिए काफ़ी मुश्किल होता है. लेकिन वर्ल्ड एंटी-डोपिंग एजेंसी वाडा इस बारे में क्या कर रही है साल 2003 में वाडा ने जीन डोपिंग को प्रतिबंधित कर दिया था. एजेंसी का मानना है कि यह तरीक़ा अनुचित होने के साथ ही खिलाड़ियों के लिए घातक भी हो सकता है. शरीर में ईपीओ-जीन की अतिरिक्त इकाई उत्पन्न होने से ढेरों लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण हो सकता है जिससे खून के ज़्यादा ही गाढ़ा होने का ख़तरा रहता है. जीन-डोपिंग की जाँच का तरीक़ा है या नहीं यह पूछने पर वाडा के विज्ञान निदेशक ओलिवियर रॉबिन ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया. उन्होंने कहा पिछले 10 साल से ज़्यादा समय से हम जीन डोपिंग का पता लगाने वाली तकनीक विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं और हमें यक़ीन है कि हमने जीन डोपिंग का पता लगाने का तरीक़ा खोज लिया है. मगर इससे जुड़े कुछ गंभीर सवाल भी हैं. भले जीन डोपिंग का पता लगाने का कोई क़ानूनी या जैविक तरीका मिल जाए लेकिन सवाल है कि यदि जीन थैरेपी का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर होने लगे या इसका इस्तेमाल रोज़मर्रा की बात बन जाए क्या होगा अगर हम दवा की साधारण दुकानों से मांसपेशियों में होने वाली कमजोरी को रोकने वाली जेनेटिक दवाई ख़रीदने में सक्षम हो जाएं क्या एथलीटों को करियर को लंबा खींचने या खेल के दौरान लगी चोट से ज़ल्दी उबरने में इसका इस्तेमाल करने से रोका जा सकता हैप्रोफ़ेसर ली स्वीने पिछले दो दशक से जीन थैरेपी के क्षेत्र में कार्य करने वाले प्रमुख अनुसंधानकर्ताओं में एक हैं. पेंसिलवेनिया विश्विद्यालय से जुड़े डॉक्टर स्वीने वाडा के जीन डोपिंग के बारे में विशेषज्ञ सलाहकारों की टीम का हिस्सा भी हैं. डॉक्टर मौलियर की तरह ही डॉक्टर स्वीने ने भी इस विषय पर शोध पत्र प्रकाशित करवाया था और खेल से जुड़े लोगों ने उनसे संपर्क किया था. 1990 के दशक में किया गया स्वीने का शोध आईजीएफ़-1 जीन को चूहों में प्रत्यारोपित करने से संबंधित था. स्वीने कहते हैं हमसे कई खिलाड़ियों और यहाँ तक कि प्रशिक्षकों तक ने संपर्क किया था. वो ये नहीं समझ रहे थे कि इस प्रयोग का अभी शुरुआती चरण है और मनष्यों के प्रयोग के लिए अभी यह तैयार नहीं है. लेकिन इस तकनीक के प्रयोग को लेकर डॉक्टर स्वीने के विचार वाडा के रूढ़िवादी मानकों से अलग हैं. स्वीने कहते हैं मुझे लगता है कि किसी व्यक्ति को ऐसी किसी तकनीक का इस्तेमाल करने से रोक देना अनैतिक होगा जो उसकी मांसपेशियों को वर्तमान और भविष्य में भी अधिक मज़बूत बनाए. जब तक सुरक्षा से जुड़ा कोई ख़तरा न हो मुझे नहीं लगता कि किसी को केवल इसलिए सज़ा मिलनी चाहिए कि वह एथलीट है. हालाँकि मैं वाडा की टीम में हूँ लेकिन इस मसले पर मेरे विचार उससे थोड़े अलग हैं. ऐसा लगता है कि जीन डोपिंग की प्रकृति ऐसी है कि इसके सही या ग़लत इस्तेमाल के बीच विभाजन रेखा खींचना कठिन और नैतिक रूप से असहज कर देने वाला होगा. इसके लिए खेल अधिकारियों एथलीटों और प्रशंसकों को खेल की एक नई परिभाषा पर एकमत होना होगा. |
| DATE: 2014-01-14 |
| LABEL: science |
| [116] TITLE: पत्थर मार मार कर प्यार! |
| CONTENT: मादा बंदरों के व्यवहार पर फ़िल्माए गए वीडियो से पता चला है कि वह अपने संभावित साथियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उन पर पत्थर फेंकती हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक़ मादा बंदरों का यह एक बहुत ही गंभीर व्यवहार है क्योंकि अपनी साथी पर हक़ जताने का यह उनके लिए एकमात्र अवसर होता है. फ़िल्म निर्माताओं ने ब्राज़ील के सेरा डा केपिवारा राष्ट्रीय उद्यान में गुच्छेदार बालों वाले बंदरों की एक उप-प्रजाति दाढ़ी वाले बंदरों का फ़ु्टेज तैयार किया. उसी से यह जानकारी मिली है. शुष्क सवाना बंदरों की इस प्रजाति को उत्तर पूर्वी ब्राज़ील में कैटींगा के रूप में जाना जाता है. इन बंदरों का प्रचलित नाम गुच्छेदार बंदर उनके ख़ास तरह के बालों की बनावट की वजह से पड़ा. लेकिन इसका वैज्ञानिक नाम सैपेजियस लिबिडिनस है जो इन बंदरों के भावुक होने का संकेत देता है. पिछले दो साल से डरहम ब्रिटेन और ब्राज़ील के साओ पाओलो विश्वविद्यालय से बंदरों के सामाजिक संबंधों पर पीएचडी करने वाली कैमिला कोएल्हो ने बंदरों के यौन जीवन के रहस्यों को उजागर करने में फ़िल्म निर्माताओं की मदद की. ग़ैर इंसानी प्रजातियों में बंदर ही एक ऐसी प्रजाति है जो अपनी बुद्धिमता के लिए जाना जाता है. वर्षों से बंदरों का व्यवहार वैज्ञानिकों के लिए कौतूहल का विषय रहा है और हाल के अध्ययन ने इनके पत्थर फेंकने की क्षमता की ओर ध्यान आकर्षित कराया है. अन्य बंदरों के विपरीत इस प्रजाति के मादा बंदर प्रजनन काल दिखाने के लिए किसी भी तरह के शारीरिक संकेत का इस्तेमाल नहीं करते हैं. चमकीले रंग फूले हुए जननांगों या तेज़ महक या तरल पदार्थ के उत्सर्जन के विपरीत इस प्रजाति के मादा बंदर पत्थर फेंकने के अपने व्यवहार से प्रजनन की इच्छा दिखाते हैं. पत्थर फेंकने का इनका यह व्यवहार आक्रामकता के बजाए तारीफ़ का संकेत देता है. कैमिला कोएल्हो ने बताया अन्य प्रजातियों की तरह ही दाढ़ी वाले बंदरों की इस प्रजाति के नर बंदर मादा बंदरों के अपने चरम पर पहुँचने का इंतजार करते हैं. जीव-विज्ञानी कैमिला कोएल्हो बताती है कि वह इस बात पर अध्ययन कर रही हैं कि विभिन्न प्रजातियों में व्यक्तिगत व्यवहार व्यापक तौर पर परंपरा कैसे बन जाता है. |
| DATE: 2014-01-14 |
| LABEL: science |
| [117] TITLE: क्या रोबोट हमारी नौकरियां छीन लेंगे? |
| CONTENT: अगर आपको डर लगता है कि रोबोटों का वक़्त आने वाला है तो डरने की ज़रूरत नहीं. वो पहले से ही हमारे बीच मौजूद हैं. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रतिनिधि पहले ही हमारी ज़िंदगी के हर पहलू में शामिल हैं- वह हमारे इनबॉक्स को स्पैम मुक्त रखते हैं वह इंटरनेट के प्रयोग में मदद करते हैं वह हमारे हवाई जहाज़ चलाते हैं और अगर गूगल को सफ़लता मिली तो जल्द ही वे हमारे लिए हमारी गाड़ियां भी चलाएंगे. सिलिकॉन वैली के सिंगुलैरिटी विश्वविद्यालय में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के प्रमुख नील जैकबस्टीन ने बीबीसी से कहा आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बसी हुई है. वे कहते हैं इसका इस्तेमाल दवाइयों कानून डिज़ाइन बनाने में और पूरी तरह स्वचालित उद्योग में होता है. और हर दिन अल्गोरिद्म पहले से ज़्यादा चतुर होती जा रही है. इसका मतलब यह है कि आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी चाहत- ऐसी मशीन की खोज जो इंसानों जितनी ही बुद्धिमान हो- पूरा होने के बेहद करीब हो सकती है. जैकबस्टीन का अनुमान है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस 2020 के दशक के मध्य तक इंसानी बुद्धिमत्ता से आगे निकल जाएगी. लेकिन इससे सवाल उठता है- मशीनी बुद्धि के प्रभाव वाला समाज कैसा होगा और हमारी इसमें भूमिका क्या होगीवैसे शुरुआत में हमें थोड़ा ठहर कर देखना होगा. दुनिया की सबसे बड़ी कॉन्ट्रैक्ट इलेक्ट्रॉनिक निर्माता चीनी कंपनी हॉन हाए ने ऐलान किया है कि वह एक रोबॉट बनाने वाली फ़ैक्ट्री बनाएगी और अगले तीन साल में पाँच लाख कर्मचारियों की जगह रोबोट ले लेंगे. लेकिन नौकरी नहीं रहने का मतलब होगा पगार का न मिलना और ऐसे समाज के लिए यह बहुत बड़ी बात होगी जो अपना जीवन चलाने के लिए पगार पर निर्भर रहने का आदी है. जैकबस्टीन कहते हैं आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से उल्लेखनीय रूप से बेरोज़गारी बढ़ेगी लेकिन यह ग़रीबी के बराबर नहीं होगी. जैकबस्टीन भी मानते हैं आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और तेज़ी से विकसित हो रही दूसरी तकनीकों से भारी मात्रा में संपत्ति पैदा होगी. हमें उसके बंटवारे को लेकर अपने सामाजिक ताने-बाने को बदलने को तैयार होना होगा. वह उम्मीद ज़ाहिर करते हैं कि इंसान और मशीन पूरी तरह शांति से एक दूसरे के साथ मिलकर काम करेंगे. वह कहते हैं किसी भी समस्या के समाधान का सबसे अच्छा तरीका होगा कि उसे एक इंसान और एक कंप्यूटर एक साथ मिलकर हल करें. लेखक और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माता जेम्स बैरेट आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बारे में बिल्कुल अलग राय रखते हैं. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के घातक हमले के बारे में वह इतने चिंतित हैं कि उन्होंने इस पर एक किताब लिख डाली है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव का मतलब है मनुष्य के प्रभुत्व का ख़त्म हो जाना. बैरेट ने बीबीसी से कहा विकसित आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एक दोनों तरह से इस्तेमाल होने वाली तकनीक है अणु के विखंडन की तरह. यह शहरों को प्रकाश भी दे सकती है और उन्हें भस्म भी कर सकती है. विकसित रूप में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस अणु के विखंडन से भी ज़्यादा ख़तरनाक और विस्फ़ोटक हो जाएगी. अभी से ही स्वायत्त ड्रोन और लड़ाई में काम आने वाले रोबोट्स के रूप में इसका हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. वह कहते हैं किसी भी अन्य विज्ञान से ज़्यादा यह हमें अपने अंदर झांकने को कहती है- वे चीज़ें क्या हैं जिन्हें हम बुद्धिमत्ता अंतरआत्मा भावनाएं कहते हैं लेकिन अपने अंदर झांककर हम अतार्किक हिंसा तकनीकी लापरवाही के प्रति अपने झुकाव को बेहतर ढंग से देख पाते हैं. अगर पेंटागन के शोध विभाग डार्पा की दिसंबर में आयोजित प्रतियोगिता के आधार पर देखें तो रोबोटिक क्रांति अभी काफ़ी दूर है. ऑनलाइन पोस्ट किए गए वीडियो से दिखता है कि रोबोट इंसानों से बहुत धीमे हैं अक्सर अपने पैरों पर संतुलन बनाए रखने में नाकाम रहे और कुछ तो किसी भी चुनौती को पूरा नहीं कर पाए. यकीनन रोबोटों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर एक तरह की अतिउत्सुकता है. गूगल ने हाल ही में आठ रोबोटिक कंपनियों को ख़रीदा है तो फ़ेसबुक की अपनी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस प्रयोगशाला है. कयास इस बात को लेकर लग रहे हैं कि गूगल अपने अधिग्रहणों से क्या करना चाहता है. बैरेट को लगता है कि गूगल रोबोट बहुत शानदार हो सकते हैं. वह कहते हैं इंसान के स्तर की बुद्धिमत्ता तक पहुंचने का एक रास्ता है. एक उच्च स्तर का निजी सहायक जो सिर्फ़ एक स्मार्टफ़ोन नहीं होगा- बल्कि इसका एक इंसान जैसा शरीर भी होगा. इंसान के जैसा क्यों ताकि यह आपकी गाड़ी चला सके आपके उपकरणों का इस्तेमाल कर सके बच्चे को खिला सके और ज़रूरत पड़े तो आपके बॉडीगार्ड का भी काम करे. अगर रोबोट्स का उभरना अपरिहार्य है- हालांकि इसमें कुछ साल की देरी है- तो फिर यह भी तार्किक है कि इंसान अंततः फ़ैसले लेने की प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे मतलब यह कि कृत्रिम बुद्धिमान उपकरण ही दूसरे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को नियंत्रित करेंगे. जैकबस्टीन कहते हैं कि हमारे लैपटॉप और कंप्यूटर में यही हो रहा है. वह कहते हैं एंटी वायरस सॉफ़्टवेयर दरअसल एक आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस तकनीक है जो दूसरे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जिन्हें हम वायरस और वॉर्म्स कहते हैं उन्हें ढूंढने के लिए इस्तेमाल की जाती है. वे कहते हैं हमें रोबोट्स को नियंत्रण में रखने के लिए उसी तरह की कई परत वाली प्रणाली तैयार करनी होगी जैसी कि इंसानों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में है. हम ख़तरों पर नज़र रखना और ऐसी प्रणाली तैयार करना चाहते हैं जो ग़लत व्यवहार को रोके. जैकबस्टीन रोबोटों के कब्ज़ा करने को लेकर आशान्वित हैं लेकिन वह यह भी जानते हैं बहुत से इसे एक बुरे सपने की तरह देखते हैं. वह कहते हैं कुछ लोग पूछते हैं आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की संभावनाओं को जानने के बाद भी आप रात को सो कैसे सकते हैं लेकिन मैं रातों को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की वजह से नहीं इंसानी मूर्खताओं की वजह से जगा रहता हूं. उनके हिसाब से इंसान रोबोटों के साथ तभी मुकाबले में बना रहेगा जब वह उनकी तरह हो जाए. वह कहते हैं हमारे दिमाग में करीब 50000 साल से कोई महत्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है और अगर लैपटॉप या स्मार्टफ़ोन में पांच साल में कोई अपग्रेड नहीं होता तो आपको उनके बारे में चिंता होने लगती है. हमारे पास अब भी सिरी और गूगल नाउ जैसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता है और वह हमारे स्मार्टफ़ोन के ज़रिए लगातार वेब से कनेक्ट रहती है तो यह कल्पना करना बहुत बड़ी बात नहीं होगी कि भविष्य में हमारी खोपड़ी में भी सिलिकॉन लगाए जाएंगे. और यही अकेला तरीका है रोबोटों से मुकाबला करने का. |
| DATE: 2014-01-14 |
| LABEL: science |
| [118] TITLE: 'वो गले लगाना चाहता है लेकिन देख नहीं सकता' |
| CONTENT: ब्रिटेन के मिडलैंड्स की निवासी निकोला ओट्स को हमेशा लगता था कि उनके बेटे थॉमस का बेढंगापन सामान्य है. लेकिन जैसे-जैसे वो बड़ा हुआ समस्या बढ़ती गई. वो फर्श पर पड़ी किसी भी चीज़ पर लड़खड़ा जाता था और स्कूल में भी वो पिछड़ने लगा. धीरे-धीरे थॉमस को एक और आदत पड़ गई जब वो किसी चीज़ की ओर देखता तो सिर दाईं ओर घुमा देता और उसकी ठोड़ी नीचे की ओर होती. निकोला कहती हैं ये बहुत ही अजीब था. वो ज़्यादातर समय सामान्य दिखता लेकिन जब वो किसी चीज़ पर आंखें टिकाता तो उस पर नज़रें ऊंची कर के देखता था. वो कहती हैं चलते हुए वो दीवारों कुर्सियों और लोगों से टकरा जाता था. वो बताती हैं कि ये आंखों को घूमने से रोकने का थॉमस का अपना तरीका था आंखों की एक ऐसी समस्या निस्टेगमस का लक्षण जिसका इलाज नहीं हो सकता. इसे अस्थिर दृष्टि कहा जाता है क्योंकि इसमें आंखों पर नियंत्रण नहीं होता निस्टेगमस में देखने में भी कई दिक्कतें होती हैं. साउथैम्पटन विश्वविद्यालय में ऑप्थैल्मिक जेनेटिक्स के वरिष्ठ लेक्चरर जैए सेल्फ़ कहते हैं ये बहुत दिक्कत करने वाला हो सकता है इससे किसी की पूरी ज़िंदगी प्रभावित हो सकती है उनके कामकाज परिवारों और आने वाली पीढ़ियों पर भी असर पड़ता है. वो कहते हैं कि निस्टेगमस दुनिया को झिलमिल रोशनी में देखने जैसा है बच्चे चलती-फ़िरती चीज़ें देखने में दिक्कत महसूस करते हैं और चेहरे पहचानने में उन्हें दिक्कत होती है. निस्टेगमस नेटवर्क यूके नाम की एक संस्था के जॉन सैंडर्स कहते हैं कि कुछ लोग जिन्हें निस्टेगमस होता है वो गाड़ी चला सकते हैं और ज़्यादातर को रोज़मर्रा की ज़िंदगी पढ़ाई और रोज़गार में कुछ दिक्कतें होती हैं. समस्या ये भी है कि जो लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं उनकी दिक्कतों को आंखों के सामान्य टेस्ट नहीं पकड़ पाते और ना ही नज़र की उनकी दिक्कतों की जांच हो पाती है. उदाहरण के लिए थॉमस अब आठ साल का है लेकिन वो ऑप्टीशियन का चार्ट पढ़ सकता है इसलिए उसे न तो कमज़ोर नज़रों वाले लोगों की श्रेणी में रखा गया है न आंशिक दृष्टिदोष वाले लोगों की श्रेणी में. इसके बावजूद उसे देखने में मदद चाहिेए जैसे कि रोशनी या मैग्नीफ़ाइंग ब्लॉक की ताकि वो पढ़ सके. उसे घर में चलने के लिए भी सहारे की ज़रूरत होती है. घर पर वो नीले लेंस वाले चश्मे पहनता है ताकि आंखों की रक्षा हो सके. शाम सात बजे तक वो देखने की कोशिश करते हुए बुरी तरह से थक चुका होता है. निकोला कहती हैं उसे बहुत मुश्किल होती है. वो ये नहीं पता कर पाता कि वस्तुएं कितनी दूरी पर हैं. वो जब मुझे गले लगाता है तब भी उसे मेरे पैरों पर खड़ा होना पड़ता है ताकि पता लगा सके कि मैं कहां हूं. जैए सेल्फ़ ने निस्टेगमस के कारणों का पता लगाने के लिए सैकड़ों जीन का विश्लेषण शुरू कर दिया है. उनका लक्ष्य एक सामान्य जेनेटिक टेस्ट के विकास का है ताकि निस्टेगमस से प्रभावित बच्चों का जल्द पता लग सके. वो ये भी चाहते हैं कि इलाज में असली ज़िंदगी के पैमानों का इस्तेमाल कर सकें - न कि आंखों के टेस्ट - ताकि प्रभावित लोगों की आंखों की समस्या का पता लग सके. ऐसा हुआ तो बच्चों को उनके मुताबिक इलाज मिल सकेगा. हालांकि सेल्फ़ कहते हैं कि ये इलाज न भी मिले तो भी कुछ ऐसे सामान्य कदम हैं जिनसे स्कूली बच्चों को मदद मिल सकती है. इनमें विशेष टीचर की मदद लेना और बच्चों को क्लास में उस जगह बिठाना शामिल है जहां उनकी नज़रों को दिक्कत न हो. थॉमस जब आठ महीने का था तब एक रिश्तेदार ने उसकी आंखों की दिक्कत पकड़ी थी लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टर ने उसका इलाज पांच साल की उम्र में शुरू किया था. एक साल पहले थॉमस की आंखों का एक ऑपरेशन हुआ है और इस साल के अंत में भी एक ऑपरेशन होगा. निकोला को कुछ सुधार दिखता है लेकिन थॉमस अब भी चलते हुए ये देखने के लिए अपने सिर को मोड़ता है कि वो कहां जा रहा है. निकोला कहती हैं मुझे नहीं पता कि उसकी नज़र कैसी है लेकिन उसके लिए ये सब सामान्य है. लेकिन मैंने तय किया है कि मैं और सवाल पूछूंगी और उसकी मदद करूंगी. वो क्यों संघर्ष कर |
| DATE: 2014-01-13 |
| LABEL: science |
| [119] TITLE: क्यों आ जाती है काम के बीच झपकी? |
| CONTENT: कोई काम करते-करते हमें कभी-कभी अनचाहे ही झपकी आ जाती है. ब्रिटेन के तकरीबन आधे पुरुष ड्राइवरों ने गाड़ी चलाते वक्त झपकी लेने की बात मानी है. आखिर ये झपकी है क्या चीज़ और ये आती क्यों है सड़क सुरक्षा से जुड़ी संस्था ब्रेक का मानना है कि झपकी लेने की ये आदत बेहद ख़तरनाक है. ब्रेक ने करीब एक हज़ार ड्राइवरों से बात की. उनमें से 45 फीसदी पुरुष ड्राइवरों ने माना कि गाड़ी चलाते वक्त वे झपकी लेते हैं. जबकि 22 फीसदी महिला ड्राइवरों ने झपकी लेने की बात मानी. अब सवाल ये है कि आखिर इसका क्या मतलब है हम पाँच से 10 सेकेंड की नींद को झपकी कहते हैं. इसमें इंसान का दिमाग बिना चाहे ही सो जाता है. झपकी आने की सबसे ज़्यादा संभावना तब होती है जब आप कोई एकरसता वाला काम कर रहे हों. झपकी लेने के बाद व्यक्ति एक झटके के साथ उठता है. लफ़बोरो यूनिवर्सिटी के स्लीप रिसर्च सेंटर के निदेशक प्रो. जिम हार्न कहते हैं ऐसी स्थिति में आपकी पलकें भारी होनी शुरू हो जाती हैं और आप यथार्थ से संपर्क खो देते हैं. वे आगे बताते हैं आप कुछ लम्हों के लिए नींद के आगोश में चले जाते हैं और फिर अचानक झटके से उठते हैं. दिलचस्प बात ये है कि कुछ पलों की इस नींद को इंसान का दिमाग़ याद नहीं रखता. झटके के साथ उठने से ही लोगों को इस बात का एहसास होता है कि उन्हें झपकी आ गई थी. ड्राइवरों को होने वाली थकान का 10 सालों तक अध्ययन करने वाले प्रोफ़ेसर हार्ने बताते हैं दिमाग को वही नींद याद रहती है जो एक या दो मिनट से ज़्यादा की होती है. कुछ पलों की झपकी न तो याद रहती है और न ही इसके बाद हमें ये ध्यान रहता है कि हम कहीं जा रहे हैं या कहीं से आ रहे हैं. हैरानी की बात नहीं है कि झपकी आने का प्रमुख कारण थकान होती है और अगर इस पर काबू नहीं किया जाए तो ये बार-बार आती है और आख़िकार आप एक अच्छी नींद ले लेते हैं. गाड़ी चलाते हुए या किसी मीटिंग में होने की ख़तरनाक या ग़लत परिस्थिति में झटका लगने से ऐसी झपकी दोबारा नहीं आती क्योंकि झटके से और ये आभास होने से कि आप किस हालत में है शरीर में एड्रेनलीन का स्तर बढ़ जाता है. ड्राइवरों के साथ ऐसा होने की ज़्यादा संभावना होती है क्योंकि गाड़ी चलाना एकरसता वाला काम प्रतीत हो सकता है. दोपहर के बाद गाड़ी चलाते वक्त झपकी आ सकती है क्योंकि उस समय शरीर में ऊर्जा का स्तर कम होता है. इसी तरह रात को भी झपकी आ सकती है क्योंकि रात का वक़्त आमतौर पर सोने का होता है. युवा ड्राइवरों में भी झपकी लेने का ख़तरा ज़्यादा होता है क्योंकि उन्हें आमतौर पर नींद की ज़्यादा ज़रूरत होती है. इसलिए वो नींद न आने की समस्या से ज़्यादा परेशान होते हैं. प्रोफ़ेसर हार्ने बताते हैं कि परिवहन विभाग के अनुसार सुनसान मुख्य सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं में से 20 प्रतिशत का संबंध नींद से होता है. वे कहते हैं नींद अचानक नहीं आती. ऐसा नहीं होता कि आप पूरी तरह चौकन्ने होकर गाड़ी चला रहे हों और अचानक से झपकी आ जाए. आपको कितनी तेज़ नींद आ रही है इसका एहसास करने के लिए आपके पास काफ़ी वक़्त होता है. प्रोफ़ेसर हार्ने सलाह देते हैं कि जब आपको नींद महसूस हो रही हो तो पहले आप गाड़ी को किसी सुरक्षित जगह रोकें फिर 150 मिलीग्राम कैफीन वाले किसी पेय पदार्थ का सेवन करें. इसका असर होने में करीब 20 मिनट लगते हैं. इसलिए आगे का सफ़र शुरू करने से पहले आराम से 15 मिनट की एक झपकी लें फिर अगले पांच मिनट खुद को तरोताजा करें. |
| DATE: 2014-01-12 |
| LABEL: science |
| [120] TITLE: क्या खत्म हो रही हैं मधुमख्खियां? |
| CONTENT: मधुमख्खियों की कमी का असर परागण और पैदावार पर होता है. एक शोध में ये सामने आया है कि यूरोप के काफ़ी हिस्से में फ़सलों के परागण के लिए मधुमख्खियों की संख्या कम पड़ गई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि जैव ईंधन वाली फसलों में भारी पैमाने पर इजाफा होने कारण परागण की जरूरत अत्यधिक बढ़ गई है. सबसे ज्यादा कमी ब्रिटेन में है जहां जरूरत की महज एक चौथाई मधुमख्खियां ही मौजूद हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि इस कमी को भौंरे और मख्खियों की अन्य जंगली प्रजातियां पूरा कर रही हैं. इस अध्ययन को प्लोस वन जर्नल में प्रकाशित किया गया है. हाल के दिनों में ब्रिटेन और अन्य जगहों पर मधुमख्खियों की संख्या घट रही है और इसकी वजह कीटनाशकों का इस्तेमाल और बीमारियों को माना जा रहा है. हालांकि पूरे यूरोप में 41 देशों में 2005 से 2010 के बीच मधुमख्खियों के छत्तों की संख्या में सात प्रतिशत की कुल वृद्धि दर्ज की गई है. लेकिन इसी समयावधि में तिलहन सूरजमुखी और सोयाबीन जैसी जैव ईंधन की फसलों का क्षेत्रफल एक तिहाई बढ़ गया. यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग से जुड़े और इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले डॉक्टर टॉम ब्रीज का कहना है बहुत सारे देशों में तिलहन की फ़सलों में भारी इजाफा हुआ है. ग्रीस में 2005 में कुछ ही हेक्टेयर में तिलहन की पैदावार की जाती थी लेकिन तबसे लेकर इसके क्षेत्रफल में कई गुना इजाफा हुआ है क्योंकि जैव ईंधन फ़सलों पर सब्सिडी मिलती है. उनका कहना है कि पूरे यूरोप में छत्तों की संख्या में करीब एक करोड़ 34 लाख की कमी आई है. यानी सात अरब मधुमख्खियों की कमी आई है. सबसे ज्यादा कमी वाले देशों में ब्रिटेन सबसे अव्वल है. ब्रिटेन से 300 गुना छोटा मोलदोवा ही केवल ऐसा देश है जहां मधुमख्खियों की सबसे ज्यादा कमी है. शोधकर्ताओं का मानना है कि परागण में सहायक प्रजातियों पर निर्भरता पैदावार को प्रभावित कर सकती है और ब्रिटेन में फ़सलों पर खतरा पैदा हो सकता है. शोध पत्र के सह लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के प्रोफेसर साइमन पॉट्स के अनुसार यदि हम कोई उपाय नहीं करते हैं तो आने वाले समय में यह समस्या भयावह हो जाएगी. परागण में सहायक जंगली प्रजातियां को सुरक्षा की जरूरत है. ये गांव के कम चर्चित नायक हैं जो मनुष्यों की खाद्य शृंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम मुफ्त में करते हैं. वरना ब्रिटिश किसानों को 180 अरब रुपये अतिरिक्त खर्च करना पड़ता. शोधकर्ताओं का कहना है कि यूरोपीय संघ के स्तर पर मख्खियों की रक्षा करने के लिए कुछ क़दम उठाए गए हैं जैसे नियोनिकोटिनॉयड कीटनाशकों पर शुल्क स्थगित करना लेकिन कई यूरोपीय देश समस्या पर गंभीरता से विचार नहीं कर रहे हैं. यूरोपीय संघ के अक्षय ऊर्जा के लिए जारी दिशा निर्देशों के अनुसार 2020 तक परिवहन ईंधन का 10 प्रतिशत हिस्सा अक्षय ऊर्जा से हासिल करना अनिवार्य है. हालांकि अभी इस पर बातचीत जारी है. अंतिम लक्ष्य जो भी हो इस दिशा निर्देश का प्रभाव यह हुआ कि इससे तिलहन फ़सलों के क्षेत्रफल में वृद्धि हुई. प्रोफेसर पॉट्स के अनुसारपूरे यूरोप में कृषि और पर्यावरण के बीच काफी दूरी बढ़ रही है. एक तरफ किसानों को तिलहन वाली फ़सलों का उत्पादन करने के लिए हम बढ़ावा दे रहे हैं दूसरी तरफ इस बात पर कोई विचार नहीं हो रहा है कि परागण के लिए कीट पतंगों की सुरक्षा कैसे की जाएगी. पूरे यूरोप में एक व्यवस्थित रणनीति बनाए जाने की आवश्यकता है. |
| DATE: 2014-01-09 |
| LABEL: science |
| [121] TITLE: कैंसर ख़त्म करने वाली 'स्टिकी बॉल' |
| CONTENT: कैंसर को ख़त्म करने वाली स्टिकी बॉल्स ख़ून में ट्यूमर की कोशिकाएं नष्ट कर सकती हैं और इस तरह कैंसर को फैलने से रोक सकती हैं. ट्यूमर की सबसे ख़तरनाक अवस्था वह होती है जब वह पूरे शरीर में फैलना शुरू करता है. अमरीका के कॉर्नेल विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों ने ऐसे नैनो पार्टिकल यानी अति सूक्ष्म अणु बनाए हैं जो रक्त प्रवाह में बने रहते हैं और बाहर से आने वाली कैंसर की कोशिकाओं के संपर्क में आने पर उन्हें नष्ट कर देते हैं. इस शोध की शुरुआती जांच में कहा गया कि इसके प्रभाव नाटकीय हैं लेकिन अभी बहुत सारा काम किए जाने की ज़रूरत है. कैंसर का पता चलने के बाद ज़िंदा रहने की संभावना में सबसे महत्वपूर्ण यह तथ्य होता है कि कहीं ट्यूमर मेटास्टेटिक कैंसर में तो नहीं बदल गया है. मुख्य शोधकर्ता प्रोफ़ेसर माइकल किंग कहते हैं कैंसर से होने वाली क़रीब 90 फ़ीसद मौतें मेटास्टेसिस की वजह से होती हैं. कॉर्नेल विश्वविद्यालय के शोध दल ने इस समस्या से निजात पाने के लिए एक नया तरीका आज़माया. उन्होंने कैंसर ख़त्म करने वाला ट्रेल नाम का प्रोटीन जिसे पहले ही कैंसर प्रयोगों में इस्तेमाल किया जा चुका है- और अन्य चिपकने वाले प्रोटीनों को एक सूक्ष्म गोले या नैनोपार्टिकल से चिपकाया. जब इन गोलों को ख़ून में डाला गया तो वे सफ़ेद रक्त कोशिकाओं से चिपक गए. प्रयोगों से पता चला कि उछलते-कूदते रक्त में सफ़ेद रक्त कोशिकाएं उन ट्यूमर कोशिकाओं से टकरातीं थीं जो मुख्य ट्यूमर से टूटकर फैलने की कोशिश कर रहे हैं. नेशनल अकेडमी ऑफ़ साइंस की कार्यवाही में शामिल रिपोर्ट में बताया गया है कि ट्रेल प्रोटीन के संपर्क में आने से ट्यूमर कोशिकाएं ख़त्म हो गईं. प्रोफ़ेसर किंग ने बीबीसी को बताया ये आँकड़े नाटकीय प्रभाव प्रदर्शित कर रहे है. यह कैंसर कोशिकाओं की संख्या में मामूली बदलाव नहीं है. दरअसल इंसान और चूहे के रक्त में ये परिणाम सचमुच असाधारण हैं. दो घंटे के रक्त प्रवाह के बाद ट्यूमर कोशिकाएं विघटित हो गईं. प्रोफ़ेसर किंग का मानना है कि नैनोपार्टिकल्स को सर्जरी या रेडियोथेरेपी से पहले इस्तेमाल किया जा सकता है जिससे मुख्य ट्यूमर से ट्यूमर कोशिकाओं को निकाला जा सकता है. इसे बहुत आक्रामक ट्यूमर वाले मरीज़ों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है ताकि ट्यूमर का फैलाव रोका जा सके. हालांकि इंसानों पर जांच से पहले चूहों और बड़े जानवरों पर काफ़ी अधिक सुरक्षा जांच की ज़रूरत पड़ेगी. अभी तक के सबूतों से लगता है कि इस पद्धति का प्रतिरोधी तंत्र पर कोई शुरुआती असर नहीं है और यह रक्त कोशिकाओं या रक्त धमनियों की परत को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाता. मगर प्रोफ़ेसर किंग चेतावनी देते हैं अभी बहुत काम किया जाना बाक़ी है. मरीज़ को इसका लाभ मिलने से पहले कई महत्वपूर्ण खोजें होनी बाक़ी हैं. |
| DATE: 2014-01-08 |
| LABEL: science |
| [122] TITLE: क्या अब लद गए बैंक लुटरों के दिन? |
| CONTENT: लंदन में बैंक लूट की घटनाओं में 33 फ़ीसदी की कमी आई है ब्रिटेन के विभिन्न बैंक की शाखाओं में पिछले एक दशक में बैंक लूट की घटनाओं में 90 फ़ीसदी तक की कमी आई है. यह आँकड़े ब्रिटेन के बैंक संगठन की तरफ़ से जारी किए गए हैं. ब्रिटिश बैंकर्स एसोसिएशन बीबीए के मुताबिक़ साल 2011 में विभिन्न बैंकों में लूट की 66 घटनाएं हुई थीं. जबकि 1992 में बैंक लूट के 847 मामले हुए थे. इस गिरावट का श्रेय नई तकनीक को दिया जाता है जिसके कारण परंपरागत लुटेरों के लिए बैंक में डकैती बेहद मुश्किल हो गई है. बीबीए के प्रमुख एंथनी ब्राउन कहते हैं टेलीविजन में दिखाए जाने वाले नाटकीय सशस्त्र डकैती जैसे हादसों को रोकने के लिए बैंक कड़े क़दम उठा रहे हैं. उन्होंने कहा किसी डकैती वाली परिस्थिति में फंसना बैंक स्टाफ़ और ग्राहकों के लिए डरावना अनुभव होता है जो दशकों तक उनकी ज़िंदगी को झकझोरता रहता है. ब्राउन कहते हैं यह देखना काफ़ी अच्छा है कि हाल के वर्षों में इस तरह के अपराधों में तेज़ी से कमी आई है. बैंक लूटने की योजना बनाने वालों को बेहतर सीसीटीवी प्रोटेक्टिव स्क्रीन सेकेंडों में सामने ले आते हैं. यहाँ तक कि ख़ास किस्म की धुंध का इस्तेमाल लुटेरों को तितर-बितर करने के लिए किया जाता है. उनका कहना है सभी बैंक और पोस्ट ऑफ़िस आपस में सहयोग जारी रखने के साथ-साथ पुलिस के साथ मिलकर बैंक डकैती की घटनाओं को बीत जमाने की बात बना देंगे. इसी तरह की प्रवृत्ति अमरीका में भी देखी जा रही है जहाँ एफ़बीआई के आँकड़ों के मुताबिक़ 2012 में पूरे देश में बैंक लूट की तीन हज़ार आठ सौ सत्तर घटनाएं हुईं जो पिछले एक दशक में सबसे कम हैं. अपराधियों को रोकने और बैंक कर्मियों को सुरक्षित बनाने के लिए बैंकों ने सुरक्षा तकनीक में निवेश बढ़ाया है. इसके तहत आपातकालीन बटन दबाने पर ऑटोमेटिक तरीके से बंद होने वाले बैरियर और लुटेरों को भटकाने के लिए ख़ास तरह की धुंध की तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. बैंक में लूट की स्थितियों में डीएनए स्प्रे का भी उपयोग किया जाता है इससे लुटेरों की त्वचा पर लगे निशान से उनकी पहचान आसान हो जाती है कि वे घटना स्थल पर मौजूद थे. इसे आसानी से धोया नहीं जा सकता है. इस तरह के उपायों के साथ-साथ बैंक इस बात का भी विशेष ध्यान रखते हैं कि पहले के वर्षों की तुलना में कम नकदी अपने पास रखी जाए. बैंक तकनीकी सुरक्षा में निवेश करके बैंक लूट की घटनाओं का मुकाबला कर रहे हैं. हालांकि बैंक लूट की घटनाओं में कमी आ रही है लेकिन बैंकों और उनके ग्राहकों का डर बना हुआ है. बीबीसी के बिज़नेस संवाददाता ने बताया कि मेट्रोपोलिटन पुलिस के आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक़ लंदन में बैंक लूट की घटनाओं में 33 फ़ीसदी की कमी आई है यह कमी पिछले एक दशक में हुई है. लेकिन चोरों की नज़र बैंकों में पैसे पहुंचाने वाली गाड़ियों पर है. सबसे ख़ास बात वित्तीय लेन-देन से जुड़े साइबर अपराधों के बढ़ते मामले हैं. नई पीढ़ी के लुटेरे या हैकर व्यक्तिगत जानकारियों की जासूसी कर रहे हैं और उसे बाज़ार में बेच रहे हैं. एक ताज़ा शोध के अनुसार किसी व्यक्ति से जुड़ी सारी जानकारी की ऑनलाइन काला बाज़ारी हो रही है जहाँ 30 डॉलर का भुगतान करके उसके खातों से जुड़ी सारी जानकारी जुटाई जा सकती है. |
| DATE: 2014-01-07 |
| LABEL: science |
| [123] TITLE: क्या इस साल और ज़्यादा स्मार्ट होंगी वॉच? |
| CONTENT: जैसे ही मैं प्लास्टिक के कवर वाली पेबल स्मार्टवॉच को उसके ईको-फ़्रेंडली पैकेज से बाहर निकालता हूं मेरे फ़ोन का पेबल एप कहता है भविष्य में आपका स्वागत है. सचमुच मैं कहता हूं. मुझे आपके बारे में तो नहीं पता लेकिन मैंने हमेशा अपनी स्मार्टवॉच के रूप में एक उच्च तकनीक वाली चमकदार रंगीन पतली बहुत निखरे हुए डिज़ाइन वाली घड़ी की कल्पना की थी. यकीनन वह 1-2 इंच 3 सेमी की भारी प्लास्टिक की कोटिंग वाली टचस्क्रीन रहित और 256 तरह के ग्रे रंगों वाली वाली घड़ी बिल्कुल नहीं है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पेबल की यह स्मार्टवॉच अपने प्रतिद्वंद्वियों के सामने एकदम फ़ीकी है. दरअसल पेबल ने कम ऊर्जा खाने वाला डिसप्ले इसलिए बनाया है ताकि इसकी बैटरी बिना चार्ज किए एक या दो दिन चल सके- दरअसल यह करीब पूरे हफ़्ते तक चल सकती है. यह एक ही चीज़ पर केंद्रित है- आपके स्मार्टफ़ोन पर आए नोटिफ़िकेशन को बताने पर जबकि फ़ोन आपकी पैंट की जेब में रह सकता है. इसकी कीमत है 200 डॉलर करीब 12400 रुपए. अब बात इसके प्रतियोगियों की. 300 डॉलर करीब 18633 रुपए की सैमसंग स्मार्टवॉच गीयर यकीनन ज़्यादा आकर्षक है ज़्यादा प्रभावित करती है. लेकिन हर चीज़ के लिए फ़ोन पर निर्भर रहने की इसकी ज़रूरत दिक्कत पैदा करती है. यह आपको बताएगी कि एक ईमेल आई है- लेकिन मेल को पढ़ने के लिए आपको इससे जुड़ने में समक्ष हैंडसेट तीन में से एक का इस्तेमाल करना होगा. हालांकि आप गीयर के दो मेगापिक्सल से कम के कैमरे से सीधे फ़ोटो खींच सकते हैं वीडियो बना सकते हैं और सीधे कलाईघड़ी से ही फ़ोन कॉल कर सकते हैं. हालांकि यह इतना अटपटा लगता है कि आप ये काम नियमित रूप से नहीं करना चाहेंगे. और इस सबके लिए आपको बार-बार बैटरी चार्ज करनी पड़ती है. पहले जाने वाले उपकरणों- ख़ासतौर पर स्मार्टवॉच- के साथ दिक्कत यह है कि अभी तक यह तकनीक इतनी विकसित नहीं हुई है कि उम्मीदों पर खरी उतर सके. स्क्रीन रेज़्योल्यूशन भले ही बेहतर हो गए हों प्रोसेसर ज़्यादा सक्षम हो गए हों सेंसर सूक्ष्म हो गए हों लेकिन अब भी तकनीकी चुनौती सारी चीज़ों को घड़ी की स्क्रीन पर समेटना है और इसके साथ ही यह भी कि बैटरी बैकअप ठीक हो यानी कि यह पर्याप्त समय तक चलती रहे. तकनीकी की दुनिया हमें अगली बड़ी चीज़ बेचने को बेताब है- और यह हमारी कलाई आंखों और शरीर के अन्य हिस्सों पर नज़र रखे हुए है. अर्धविकसित उत्पाद जल्दबाज़ी में बाज़ार में उतार दिए जाते हैं और मार्केटिंग करने वाले हमें बताने लगते हैं कि यह जिंदगी को कैसे बेहतर बना सकता है- ऐसे जैसे हमने कभी सोचा ही नहीं था. एम्यूनिशन ग्रुप के डिज़ाइन लैब के संस्थापक रॉबर्ट ब्रनेर कहते हैं जब तक लोग इन उपकरणों को सहजता से पहनने न लगें या पहनने को तत्पर न हों तब तक इनका वक्त नहीं आने वाला. वो कहते हैं ब्लूटूथ हेडसेट को लिमोज़िन ड्राइवरों और सेल्स पर्सन से जोड़ कर देखा जाता है- और यही इसकी सीमा है. अगर हाथ की कोई हरकत अटपटी लगती है स्मार्टवॉच से फ़ोटो खींचना या बात करना तो चश्मा न पहनने वालों को अपनी आंख पर एक उपकरण लगाने को कहना और भी अटपटा लगेगा. ख़ासतौर पर तब जबकि इसका कोई बहुत महत्वपूर्ण उपयोग न हो. मैं सोचता हूं कि क्या बारकोड की स्कैनिंग और न्यूज़ अलर्ट भी इसी श्रेणी में आते हैं. नाइक का फ़्यूलबैंड जॉबोन अप फिटबिट फ़ोर्स और अन्य कलाई पर पहने जाने वाले उपकरण एक मामले में आगे हैं- व्यायाम नींद और दूसरे स्वास्थ्य पैमानों पर महत्वपूर्ण इस्तेमाल करने योग्य आंकड़े उपलब्ध करवाना. फ़िटबिट के सह-संस्थापक जेम्स पार्क्स कहते हैं कि कंपनी की सफ़लता की वजह यह है कि यह सिर्फ़ एक ज़रूरत पर केंद्रित है. स्मार्टवॉचों की दिक्कत यह है कि यह ढूंढना पड़ता है कि वह किस काम में बेहतर हैं. जब आप सब कुछ करने की कोशिश करते हैं तो आप कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाते. इस साल इन उपकरणों की तकनीक में सुधार की ज़रूरत है- जैसे कि बैटरी लाइफ़ बढ़नी चाहिए और डिसप्ले कम ऊर्जा खपत वाले हों. कुछ चीज़ें अब भी तकनीकी रूप से दूर ही हैं जैसे कि वायरलेस चार्जिंग. यह विचार एक स्मार्टवॉच - एजेंट - में शुरू से ही शामिल है. चार्जिंग को आसान बनाने के लिए यह एक बेहतर विचार है. लेकिन चार्जिंग सरफ़ेस को अपने आस-पास ज़्यादा जगहों में शामिल करना होगा. फ़्लेक्सिबल ओएलईडी डिस्पले बहुत महंगे हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन उपकरणों को आकर्षक - सुंदर और सचमुच में उपयोगी होना पड़ेगा ताकि हम अपनी कलाईघड़ी को बदल दें या फिर अचानक चश्मा पहनना शुरू कर दें. |
| DATE: 2014-01-06 |
| LABEL: science |
| [124] TITLE: बीस वर्ष की मेहनत, क्रायोजेनिक में सफलता |
| CONTENT: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो ने रविवार को जियोसिनक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण वाहन यानी जीएसएलवी डी-5 का सफल प्रक्षेपण किया जो इस लिहाज़ से अहम था कि इसमें भारत का अपना क्रायोजेनिक इंजन लगा हुआ था. ये वही इंजन है जिसे भारत को विकसित करने में बीस वर्ष का समय लगा जिसकी तकनीक को भारत अपने पड़ोसी देश रूस से हासिल करना चाहता था. लेकिन अमरीका के दबाव में रूस ने भारत को ये तकनीक नहीं दी थी. बीस वर्ष बाद ही सही भारत ने क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक में महारथ हासिल कर ली है. इस तकनीक का महत्व इस तथ्य में निहित है कि दो हज़ार किलो वज़नी उपग्रहों को प्रक्षेपित करने के लिए क्रायोजेनिक इंजन की सख़्त ज़रूरत पड़ती है. इसकी वजह ये है कि इसी इंजन से वो ताक़त मिलती है जिसके बूते किसी उपग्रह को 36000 किलोमीटर दूर स्थित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया जाता है. इस सफल प्रक्षेपण के साथ ही ये कहा जा सकता है कि भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में अब हर तरह की उपलब्धि हासिल कर ली है. भारत का छोटा रॉकेट पीएसएलवी पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल यानी ध्रुवीय प्रक्षेपण यान बहुत क़ामयाब है. भारत अपने उपग्रह ख़ुद बना रहा है. क्रायोजनिक इंजन भारत के संचार उपग्रहों को भी प्रक्षेपित करेगा. भारत जब अपना चंद्रयान-2 मिशन आरंभ करेगा उसके लिए भी जीएसएलवी की ज़रूरत होगी. अमरीका ये कहकर इस तकनीक को भारत से दूर रखने की कोशिश करता रहा कि वो इसका इस्तेमाल अपने सैन्य ताक़त बढ़ाने में कर सकता है. लेकिन भारत ने अपना अंतर-महाद्वीय प्रक्षेपास्त्र अग्नि-5 क्रायोजेनिक इंजन से पहले विकसित करके दिखाया जिसकी मारक क्षमता पांच हज़ार किलोमीटर से अधिक है. भारत ने अग्नि-5 के दो सफल प्रक्षेपण किए और ख़ास बात ये है कि ये प्रक्षेपास्त्र ठोस रॉकेट ईंधन से चलता है. भारत ने उसे क्रायोजनिक इंजन से नहीं चलाया है. भारत शुरू से ही ये कहता रहा था कि वो क्रायोजेनिक तकनीक का इस्तेमाल अपनी असैन्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिए करेगा और उसने ऐसा करके भी दिखाया. भारत ने इसे अपने असैन्य अंतरिक्ष कार्यक्रम तक सीमित रखा. भारतीय रक्षा एवं अनुसंधान संगठन डीआरडीओ के प्रमुख पहले भी ये कहते रहे हैं कि भारत क्रायोजेनिक इंजन से अपने प्रक्षेपास्त्रों को नहीं चलाएगा. |
| DATE: 2014-01-05 |
| LABEL: science |
| [125] TITLE: अंटार्कटिका की बर्फ़ में बेशक़ीमती हीरे |
| CONTENT: वैज्ञानिकों को अंटार्कटिका के बर्फ़ीले पहाड़ों में हीरा मौजूद होने के पर्याप्त सबूत मिले हैं. शोधकर्ताओं ने इस बर्फ़ीले क्षेत्र में एक ख़ास क़िस्म की चट्टान की पहचान की है जिसमें हीरे मिलने की संभावना होती है. हालांकि अंटार्कटिक क्षेत्र में व्यावसायिक उद्देश्य के लिए किसी भी क़िस्म के खनिज का दोहन प्रतिबंधित है. यह शोध नेचर कम्यूनिकेशन नाम के जर्नल में छपा है. हीरा पृथ्वी की सतह से क़रीब 150 किलोमीटर की गहराई में अत्यधिक गर्मी और दबाव से शुद्ध कार्बन से बनता है. ज्वालामुखी विस्फोट पृथ्वी की सतह पर हीरों को ले आते हैं जो सामान्यतः एक दूसरी नीली चट्टान किंबरलाइट में जमा हुआ होता है. किंबरलाइट की मौजूदगी ने अफ्रीका साइबेरिया और ऑस्ट्रेलिया सहित दुनिया के कई हिस्सों में हीरे पाए जाने के संकेत दिए हैं. शोधकर्ताओं को अंटार्कटिका में पहली बार किंबरलाइट की उपस्थिति का प्रमाण मिला है. शोधकर्ताओं के दल को उत्तरी प्रिंस चार्ल्स पहाड़ों में माउंट मेरेडिथ की ढलानों पर इसके तीन नमूने मिले. ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के एक सर्वेक्षण भूविज्ञानी डॉक्टर टील रिले ने कहा शोध में ग्रुप वन किंबरलाइट के मिलने की बात कही गई है जो काफ़ी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस प्रकार के किंबरलाइट में हीरे पाए जाने की संभावना काफ़ी अधिक होती है. वो कहते हैं हालांकि ग्रुप वन किंबरलाइट में केवल 10 ही आर्थिक रूप से उपयोग के लायक होते हैं इसलिए यह अब भी अंटार्कटिका में किसी भी हीरा खनन गतिविधि से संबंधित नवीनतम खोज को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा कदम है. अगर हीरे इस दुर्गम क्षेत्र में बहुतायत में हों तो भी उनकी निकासी के लिए कुछ महत्वपूर्ण कानूनी बाधाएं अब भी हैं. साल 1991 की अंटार्कटिक संधि में पर्यावरण संरक्षण पर जारी प्रोटोकॉल में स्पष्ट रूप से वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए छोड़कर खनिज संसाधनों से संबंधित किसी भी खनन गतिविधि पर रोक लगाई गई है. हालांकि साल 2041 में इसकी समीक्षा होनी है और उस समय इन प्रावधानों में बदलाव किया जा सकता है. अंटार्कटिक अनुसंधान पर वैज्ञानिक समिति के डॉक्टर केविन ह्यूज ने कहा साल 2041 के बाद अंटार्कटिक में खनिजों के उत्खनन पर संधि में शामिल देशों के विचार क्या होंगे पता नहीं. हो सकता है कि तब तक ऐसी तकनीक आ जाए कि अंटार्कटिक में खनन आर्थिक रूप से फ़ायदेमंद हो जाए. वो कहते हैं इसके अलावा एक मुद्दा यह भी है कि प्रोटोकॉल से बाहर रहने वाले राष्ट्रों पर इससे संबंधित प्रावधान लागू नहीं होते हैं. इसमें खनन पर प्रतिबंध संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं. |
| DATE: 2014-01-04 |
| LABEL: science |
| [126] TITLE: सूरज की कोख में झांकने की कोशिश |
| CONTENT: ब्रिटेन में मौसम विभाग जल्दी ही अंतरिक्ष के मौसम के बारे में दैनिक पूर्वानुमान जारी करने वाला है. चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाली इस सेवा का उद्देश्य संचार उद्योगों और सरकारी विभागों की मदद करना है ताकि उन्हें सौर मंडल में उठने वाले उन तूफानों का पूर्वानुमान हो सके जो उपग्रहों रेडियो संचार और विद्युत ग्रिडों को प्रभावित कर सकते हैं. इस बारे में पहला पूर्वानुमान अगले वसंत तक आने की संभावना है. उद्योग विभाग अगले तीन सालों के दौरान इस योजना के लिए 46 लाख पाउंड देगा. मौसम विभाग अमरीकी राष्ट्रीय सामुद्रिक एवं पर्यावरणीय विभाग के साथ मिलकर अंतरिक्ष मौसम का पूर्वानुमान लगाने के बेहतर साधनों को विकसित करने की कोशिश करेगा. इस योजना में ब्रितानी भूगर्भ विज्ञान बाथ विश्वविद्यालय और आरएएल स्पेस सहयोगी हैं. अंतरिक्ष का मौसम सूरज से निकलने वाले आवेशित कणों से संचालित होता है. सौर तूफ़ान इस हद तक शक्तिशाली होते हैं कि वे उपग्रह के संवेदनशील भागों को नुकसान पहुंचा सकते हैं और इनका प्रवाह इस कदर मजबूत होता है कि धरती के पावर ग्रिडों पर गहरा प्रभाव छोड़ सकते हैं. सौर चक्रवातों के कारण साल 1989 में कनाडा के क्यूबेक में एक बड़े हिस्से में बत्ती गुल हो गई थी. सौर उत्सर्जन जब सबसे तेज़ गति से होता है तब सूर्य की सक्रियता प्रत्येक 11 साल पर अपने चरम पर होती है. अभी यह अपने अधिकतम सौर वाले चरण में है. मौसम विभाग में अंतरिक्ष मौसम विभाग के प्रमुख मार्क गिब्स ने बताया अंतरिक्ष मौसम के बारे में अभी हमारी जानकारी सीमित है मगर इसके बारे में हमारी समझ तेज़ी से बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि इस योजना का उद्देश्य अंतरिक्ष के मौसम का पूर्वानुमान लगाने के लिए बेहतर मॉडल का विकास को बढ़ावा देना और अंतरिक्ष मौसम से जुड़ी जानकारियों का प्रभावपूर्ण इस्तेमाल करने के लिए पूर्वानुमान व्यवस्था को बेहतर बनाना है. गिब्स ने आगे बताया मौसम विभाग पिछले दो सालों से अंतरिक्ष मौसम के पूर्वानुमान की क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहा है. इस निवेश से यह कोशिश कामयाब होगी. उन्होंने कहा इसकी सफलता के बाद विभाग अंतरिक्ष के मौसम के बारे में सटीक पूर्वानुमान और चेतावनी जारी कर सकेगा ताकि जिन तकनीक आधारित सेवाओं पर हम पूरी तरह निर्भर करते हैं उस पर असर कम से कम हो. राष्ट्रीय ग्रिड के लिए जोखिम का पता लगाने वाले एंड्रयू रिचर्ड ने कहा यह सेवा इसलिए अहम है क्योंकि इससे राष्ट्रीय ग्रिड के ट्रांसमिशन नेटवर्क को निर्बाध और सुरक्षित बनाने में मदद मिलेगी. |
| DATE: 2014-01-04 |
| LABEL: science |
| [127] TITLE: आधुनिक जीवन छीन रहा है सुनने की ताक़त? |
| CONTENT: क्या आधुनिक जीवन हमारी सुनने की ताक़त छीन रहा है इसका जवाब तलाशने के लिए ब्रिटेन के शोधकर्ता एक व्यापक अध्ययन शुरू करने जा रहे हैं. अपने अध्ययन के दौरान वे लोगों से उनके सुनने की क्षमता की ऑनलाइन जांच करने के लिए कहेंगे. एक आंकलन के अनुसार ब्रिटेन में छह में से एक वयस्क में सुनने की क्षमता कम पाई गई है. मगर यह पता नहीं चला है कि इसके पीछे पर्यावरण से जुड़े कौन से कारक जैसे कि एम्प्लीफाइड म्यूज़िक सुनना जिम्मेदार हैं मेडिकल रिसर्च काउंसिल चाहती है कि इस सवाल का जवाब देने के लिए युवा और बुज़ुर्ग आगे आएं. संबंधित वेबसाइट पर जाने पर वॉलंटियर से सवाल किए जाएंगे. ये सवाल उनकी सुनने की आदतों से जुड़े होंगे. इनकी मदद से शोरगुल के बीच आवाज़ सुनने की हर वॉलंटियर की क्षमता का पता लगाया जाएगा. कहा जाता है कि इंसान अगर ज़्यादा समय तक ऊंचा संगीत सुने तो बहरा भी हो सकता है. वैज्ञानिक यह देखना चाहते हैं कि प्रतिभागियों के सुनने की पुरानी आदत और सुनने की मौजूदा ताक़त के बीच क्या कोई संबंध है. अगर हां तो यह संबंध कैसा है पिछले 100 सालों में इलेक्ट्रॉनिक एम्प्लीफ़िकेशन में काफ़ी बदलाव आए हैं. इसने हमारे सुनने के तरीकों पर भी काफ़ी असर डाला है. पोर्टेबल एमपी-3 प्लेयर ने परिवार में ज़माने से चलाए जा रहे पियानो और ग्रामोफ़ोन की जगह ले ली है. डिस्को और क्लब में अब लोग बेहद तेज़ संगीत सुनने के आदी होते जा रहे हैं. विशेषज्ञों को पता है कि संगीत का ऊंचा सुर सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है. आजकल लोग संगीत सुनने के लिए इयरफोन का नियमित इस्तेमाल करने लगे हैं. इयरफोन पर संगीत तो धीमा होता है मगर लगातार सुनने की आदत चिंताजनक है. हियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉक्टर माइकल अकेरोड इस प्रोजेक्ट के मुख्य संचालक हैं. उन्होंने बताया संगीत और सुनने की क्षमता से जुड़ा अध्ययन ज्यादातर उन संगीतकारों पर केंद्रित रहा जो रोज़ ऊंचा संगीत सुनने को मजबूर होते हैं. मगर ऊंचे संगीत का आम लोगों पर क्या असर होता है इसके बारे में अभी ज़्यादा पता नहीं है. इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या दोनों के बीच कोई संबंध है बहरे या कम सुनने वालों के लिए काम करने वालों की संस्था एक्शन ऑन हियरिंग लॉस के पॉल ब्रेक्केल ने कहा सुनने की क्षमता में हुए नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती. आम धारणा के विपरीत कम सुनाई देना केवल बूढ़ों के लिए ही चिंता का विषय नहीं है. एक ताजा आंकलन के अनुसार 10 करोड़ लोगों में किसी न किसी रूप में कम सुनने की बीमारी पाई गई है. साल 2031 तक यह आंकड़ा 14-5 करोड़ तक पहुंचने की आशंका है. |
| DATE: 2014-01-04 |
| LABEL: science |
| [128] TITLE: 'रोबोट चाचा! आधा किलो चीनी दे दो' |
| CONTENT: ये सच है कि इंटलिजेंट रोबोट्स हमें सबसे पहले शायद किराने की दुकानों में भुगतान की क़तारों के पास नजर आएं. किराना दुकानों में काम करने के लिए तैयार किए जा रहे पीआर-2 रोबोट्स फैक्ट्रियों में काम करने वाले रोबोट से अधिक होशियार हैं. फैक्ट्रियों में काम करने वाले रोबोट को बस एक ही काम को बार-बार दोहराने के लिए तैयार किया गया है. अमरीका के कोर्नेल विश्वविद्यालय में पीआर-2 पर काम कर रहे असिस्टेंट प्रोफेसर आशुतोष सक्सेना का कहना है कि इन रोबोट्स को अभी भी कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता है. रोबोट्स के लिए आज भी सबसे बड़ी चुनौती है परिवेश और परिस्थितियों को समझ पाना और अगर किसी वजह से उनमें थोड़ी तबदीली हो गई हो तो भी उसके मुताबिक़ काम को अंजाम दे पाने की क्षमता रखना. इन रोबोट्स को बैक्सटर नाम दिया गया है और ये ख़ुद से सोच पाएंगे. लेकिन घबराए नहीं बैक्सटर में वैसी आपराधिक प्रवृत्ति नहीं पैदा होगी कि वो किसी का कत्ल कर दें लेकिन अगर ऐसा हुआ भी तो ये महज़ एक दुर्घटना का नतीजा होगी. कोर्नेल विश्वविद्यालय के छात्र इनमें कॉमन सेंस या व्यावहारिक बुद्दि की क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि किसी धारदार चीज़ को हाथ में लेते वक्त उनमें इससे पैदा होने वाले ख़तरे का एहसास हो सके. बैक्सटर में इस तरह का एहसास पैदा करने की कोशिश भी की जा रही है कि वो ये जान सके कि आसानी से टूट सकने वाले सामानों को किस तरह संभालना है. अगर कोई रोबोट स्थिति को समझने में चूक करता है तो साथ मौजूद ह्यूमन हैंडलर उसके हाथ की दिशा ठीक कर देता है. ऐसा करना तब तक जारी रहता है जब तक रोबोट में कुछ खास किस्म के काम कर सकने की समझ विकसित नहीं हो जाती है. कोर्नेल विश्वविद्यालय में शोध कर रहे छात्र आशीष जैन कहते हैं ये चीज़ों में फर्क करना सीख जाता है. जैसे अगर वो एक स्क्रू ड्राइवर को मूव कर रहा है तो वो सीख ले कि उसे इसके साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता. अगर वो अंडे के डब्बों को एक जगह से दूसरी जगह उठाकर रख रहा है तो उसे ये समझना होगा कि ये आसानी से टूट सकता है और उसे रखते वक्त हाथ को मेज की सतह के बहुत क़रीब ले जाना होगा. लेकिन रोबोट में अगल अलग चीज़ों को देखकर उनकी पहचान करने की क्षमता विकसित करना आसान काम नहीं है. उसे ये सब कुछ सेंसर और कैमरों की मदद से करना सीखना है. इस काम में उसे तब बहुत आसानी होती है जब किसी जगह मौजूद सामान अलग-अलग रंग के हों. मशीनों में इस तरह की क्षमता तो दशकों से मौजूद रही है कि वो पहले से तय की गई चीज़ों को हैंडल कर पाएं. लेकिन उनमें अभी भी मेज पर पड़ी अलग-अलग तरह की वस्तुओं में फर्क करने की समक्ष विकसित होने में समय लगेगा. कोर्नेल विश्वविद्यालय के एक अन्य छात्र ईयान लेन्ज़ कहते हैं हमने थ्रीडी कैमरों का इस्तेमाल किया है लेकिन अभी भी इतने सूक्ष्म कैमरे नहीं तैयार हो पाए हैं कि हम उन्हें रोबोट्स के हाथों पर फिट कर पाएं. सोनार की सुविधा भी है लेकिन वो इस तरह के काम में बहुत सफल नहीं हो पाता है. रोबोट्स को विकसित करने वाले पिछले कुछ समय से उनमें पूर्वानिमान की क्षमता पैदा करने की कोशिश की जा रही है. मनुष्य अपनी जिंदगी का बहुत सारा काम हर क्षण इसके सहारे करते हैं लेकिन मशीन में इस सामर्थ्य को विकसित करने के लिए हज़ारों कोड्स डालने पड़ते हैं. हेमा कपुल्ला बताती हैं कि मनुष्यों के वीडियो को लगातार देखने के बाद इन रोबोट्स में इस बात की 75 फ़ीसद समझ विकसित हो गई है कि आनेवाले तीन सेकंड के भीतर क्या होने जा रहा है लेकिन अगर समय तीन सेकंड से ज्यादा का होता है तो फिर इनकी सफलता का प्रतिशत कम हो जाता है. उन्होंने बताया कि इंसानों के कामकाज दिखाने वाली ढेर सारी सामग्री इक्ठ्टा करते हैं और कोशिश करते हैं कि ये उससे सीखे. अगर एक व्यक्ति एक प्याली उठा रहा है तो इसका इस्तेमाल वो कुछ पीने के लिए करेगा या किसी और जगह रखेगा. तो क्या ऐसा वक्त आएगा जब रोबोट्स दुनियां पर कब्जा कर लेंगे और इंसानों का वजूद ख़त्म हो जाएगा. अगर ऐसा हो सकता है तो भी ये कम से कम हमारे जीवनकाल में तो नहीं होने जा रहा है. प्रोफेसर आशुतोष सक्सेना का मानना है कि ये हो सकता है कि वो किसी खास काम में इंसानों के साथ-साथ रहकर उनकी मदद करें. जैसे किसी सुपर मार्केट की आलमारियों में सामान रखने का काम. उन्होंने बताया आने वाले दिनों में ये होगा कि इंसान और रोबोट्स मिलकर काम करेंगे जिससे काम में तेज़ी आएगी. हो सकता है कि ये सब आनेवाले कुछ दिनों में संभव हो जाए क्योंकि रोबोट पर रिसर्च करने और उन्हें विकसित करने की कीमतों में गिरावट आ रही है. जैसे पीआरटू को तैयार करने में तीन लाख डॉलर का ख़र्च आया. जैसे जैसे इस खर्च में कमी आती जाएगी अधिक से अधिक प्रयोगशालाओं इनपर काम करना शुरू कर देंगी. |
| DATE: 2014-01-03 |
| LABEL: science |
| [129] TITLE: विकासशील देशों में चौगुनी है मोटापे की रफ़्तार |
| CONTENT: विकासशील देशों में मोटापे में बढ़ोत्तरी को आय के साथ जो़ड़कर देखा जा रहा है. विकासशील में मोटापे के शिकार प्रौढ़ लोगों की संख्या 1980 के मुक़ाबले लगभग चार गुना बढ़कर क़रीब एक अरब हो गई है. ब्रिटेन के विशेषज्ञों की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है. ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ओडीआई के अनुसार दुनिया में हर तीसरा व्यक्ति मोटापे का शिकार है. संस्थान ने सरकारों से इक पर काबू पाने का आग्रह किया है. ब्रिटेन में 64 फ़ीसदी प्रौढ़ लोगों का वज़न सामान्य से ज़्यादा है या वे मोटापे से ग्रस्त हैं. रिपोर्ट के मुताबिक़ इससे दिल की बीमारियों और मधुमेह का ख़तरा बढ़ सकता है. वैश्विक स्तर पर मोटापे से ग्रस्त प्रौढ़ों की संख्या 1980 से 2008 के बीच 23 फ़ीसदी से बढ़कर 34 प्रतिशत हो गई. इनका बॉडी मास इंडेक्स बीएमआई 25 से अधिक था. इसमें सबसे ज़्यादा बढ़ोत्तरी विकासशील देशों ख़ासकर मिस्र और मेक्सिको में देखी गई जहां लोगों की आय बढ़ रही है. ओडीआई की फ़्यूचर डाइट्स रिपोर्ट के अनुसार में आहार में होने वाला बदलाव मोटापे की वज़ह बन रहा है. लोग दालों और अनाज के उपभोग की बजाए वसा शुगर तेल और पशु उत्पादों को खाने में ज़्यादा तरज़ीह दे रहे हैं. 1980 में 25 करोड़ लोगों का बॉडी मास इंडेक्स 25 के ऊपर था जिनको ज़्यादा वज़न वाले या मोटे लोगों की श्रेणी में रखा जा सकता था. वर्तमान में यह संख्या 90 करोड़ 40 लाख के क़रीब पहुंच गई है. उच्च आय वाले देशों में यह संख्या 55 करोड़ 70 लाख के आसपास है. इस दौरान दुनिया की जनसंख्या लगभग दोगुनी हो गई है. लेकिन विकासशील देशों में करोड़ों लोग कुपोषण का शिकार हैं. विशेष तौर पर बच्चों का कुपोषण बहुत बड़ी समस्या है. पिछले साल पॉपुलेशन हेल्थ मैट्रिक्स के प्रकाशित आँकड़ों का इस्तेमाल करते हुए शोधकर्ताओं ने पूरी दुनिया में क्षेत्रीय आधार पर और हर देश में बढ़ते वज़न और मोटापे में होने वाले बदलावों को देखा. मोटे लोगों की संख्या में सबसे ज़्यादा बढ़ोत्तरी दक्षिण पूर्व एशिया में हुई जहां यह संख्या सात फ़ीसदी से बढ़कर 22 फ़ीसदी हो गई है. |
| DATE: 2014-01-03 |
| LABEL: science |
| [130] TITLE: अब संभव होगा गठिया रोग का उपचार |
| CONTENT: एक नए शोध से भविष्य में गठिया जैसे रोगों का सफल इलाज संभव हो सकता है. अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने डीएनए में 40 से अधिक क्षेत्रों की पहचान की है जो गठिया जैसे रोगों के ख़तरे को बढ़ाता है. यह शोध अब तक का सबसे बड़ा आनुवांशिक अध्ययन है. शोधकर्ताओं को यक़ीन है कि डीएनए के पहचाने गए क्षेत्रों से नई दवाओं के विकास में मदद मिलेगी और एक दिन गठिया का इलाज संभव हो सकेगा. इस अध्ययन के निष्कर्षों को जर्नल नेचर में प्रकाशित किया गया है. शोधकर्ताओं को टीम ने आर्थराइटिस के रोगियों के डीएनए की तुलना उन लोगों के डीएनए के साथ की जिनको यह बीमारी नहीं थी. इस प्रक्रिया के दौरान 42 ऐसे कमज़ोर क्षेत्रों की पहचान हुई जिनका संबंध आर्थराइटिस या गठिया की बीमारी के साथ पाया गया. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इन क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए दवाएं बनाई जा सकती है जिससे गठिया रोग का कारण बनने वाले दोषों को दूर किया जा सकता है. इस अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता और हारवर्ड मेडिकल स्कूल में प्रोफ़ेसर राबर्ट प्लेंज ने पाया कि पहचाने गए क्षेत्रों में से एक कमज़ोरी पैदा करता है जिसका उपचार वर्तमान में उपलब्ध एक दवा से संभव है. जिसका विकास आनुवांशिक कमी को दूर करने के बजाय भूल और सुधार की विधि से किया गया गया. वो कहते हैं यह खोज नए दवाओं के विकास का रास्ता दिखाती है. उन्होंने कहा इस आनुवांशिक खोज से भविष्य में गठिया जैसी जटिल रोगों के लिए नई दवाइयां खोजने और उपचार करने के अवसर पैदा होंगे. यहाँ तक कि उसे पूरी तरह ठीक भी किया जा सकेगा. लेकिन कुछ लोगों का तर्क है कि जटिल रोगों के लिए आनुंवांशिक रूप से कमज़ोर क्षेत्रों की पहचान करना सिंगल न्युक्लियोटाइड पॉलीमारफिज़्म एसएनपी वाले रोगों के लिए उपयोगी नहीं है. उनका मानना है कि इस संबंध में हमारे पास बहुत थोड़े या लगभग नहीं के बराबर साक्ष्य हैं कि दवाओं के माध्यम से एसएनपीज़ को सुसुप्त करके रोग के लक्षणों में कमी लाई जा सकती है. लेकिन डॉक्टर प्लेंग का कहते हैं कि उन्होंने पहले से मौजूद एक ऐसी दवा खोजी है जो जो विशेष एसएनपी से उत्पन्न होने गठिया रोग का उपचार करती है. इससे आनुवांशिकी के माध्यम से रोगों का उपचार करने की वैधता को पुष्ट होती है. उनके मुताबिक़ यह भविष्य की असीम संभावनाओं का रास्ता खोलती है. इस पद्धति का उपयोग गठिया जैसे जटिल रोगों के अलावा डायबिटीज अल्ज़ाइमर और दिल की बीमारियों के लिए दवाएं खोजने में हो सकता है. अध्ययन में देखा गया कि गठिया रोग के मरीजों के एसएनपी विभिन्न प्रकार के रक्त कैंसर में भी पाए जाते हैं. मैनचेस्टर में सेंटर फ़ॉर जेनेटिक्स के निदेशक प्रोफ़ेसर जेने वार्थिंगटन के मुताबिक़ यह अध्ययन बताता है कि कैंसर के उपचार में कारगर दवाएं गठिया जैसे रोगों के उपचार में भी प्रभावी हो सकती हैं इनके नैदानिक परीक्षण में भी तेज़ी लानी चाहिए. उन्होंने बीबीसी को बताया कैंसर के क्षेत्र में इलाज के लिए थेरेपी पहले ही विकसित हो चुकी है जो दवाओं के इस्तेमाल के नए अवसर खोल सकती हैं. यह सीधे तौर पर गठिया के रोगियों का उपचार करने के लिए थेरेपी विकसित करने में मददगार हो सकता है. |
| DATE: 2014-01-03 |
| LABEL: science |
| [131] TITLE: डिमेंशिया में 'मददगार' है विटामिन ई |
| CONTENT: वैज्ञानिकों के अनुसार विटामिन ई की नियमित खुराक लेने से डिमेंशिया से प्रभावित लोगों को फ़ायदा हो सकता है. दि जर्नल ऑफ अमरीकन मेडिकल एसोसिएशन जेएएमएए में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि अल्ज़ाइमर्स से प्रभावित लोगों को विटामिन ई की अधिक मात्रा देने पर उनकी हालत में गिरावट की दर उन लोगों से कम थी जिन्हें इसकी एक नकली गोली दी गई. अमरीकी शोधकर्ताओं के अनुसार जिन्हें विटामिन ई की गोली दी गई वे लोग लंबे वक़्त तक रोज़मर्रा का कामकाज करने में सक्षम थे और उन्हें मदद की कम ज़रूरत पड़ती थी. अल्ज़ाइमर्स सोसायटी का कहना है कि विटामिन ई की खुराक बहुत ज़्यादा थी और ये सुरक्षित नहीं है. इस अध्ययन में अल्ज़ाइमर्स डिसीज़ आम तौर पर होने वाला डिमेंशिया से प्रभावित 613 लोगों को या तो विटामिन ई की खुराक रोज़ाना दी गई या एक नकली गोली दी गई. इन लोगों के रोज़मर्रा के कामकाज करने की क्षमता को औसतन दो साल तक आंका गया. अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों को विटामिन ई दिया गया था उनके काम करने की क्षमता में उन लोगों के मुकाबले धीरे-धीरे गिरावट आई जिन्हें नकली गोली दी गई थी. विटामिन ई लेने वालों की क्षमता में गिरावट सालाना 19 कम हो गई. जिन लोगों को विटामिन ई जिसे अल्फ़ा टोकोफेरॉल भी कहा जाता है दिया गया उन्हें दूसरों से मदद की ज़रूरत भी कम पड़ी. मिनियापोलिस हेल्थ केयर सिस्टम के डॉक्टर मॉरिस डिस्केन की अगुवाई वाली टीम का कहना है इस शोध से पता चलता है कि अल्फ़ा टोकोफेरॉल अल्ज़ाइमर्स डिसीज़ में फ़ायदेमंद है इससे क्षमता में गिरावट कम होती है और मदद के लिए मौजूद लोगों पर बोझ भी कम होता है. इस अध्ययन पर अल्ज़ाइमर्स सोसायटी के डॉक्टर डग ब्राउन का कहना है कि ऐसा इलाज अहम है जिससे डिमेंशिया से प्रभावित लोग रोज़मर्रा के काम कर सकें. हालांकि वो ये भी कहते हैं कि ये देखने के लिए और शोध की ज़रूरत है कि क्या विटामिन ई वाकई डिमेंशिया के इलाज में लाभकारी है और क्या इतनी ज़्यादा खुराक रोज़ाना लेना ठीक होगा. वो कहते हैं ये बहुत अहम है कि लोग इस तरह के पूरक आहार के बारे में विचार करने से पहले डॉक्टर से सलाह लें. उनका कहना है इस अध्ययन में शामिल लोगों को विटामिन ई की जो खुराक दी गई वो उस खुराक से बहुत ज़्यादा है जिसकी सलाह दी जाती है इतनी ऊंची खुराक कुछ लोगों के लिए नुकसानदेह हो सकती है. अल्ज़ाइमर्स रिसर्च के डॉक्टर एरिक कैरन का कहना है कि अध्ययन से ये पता चलता है कि विटामिन ई से रोज़मर्रा के काम करने की क्षमता में थोड़ी कम गिरावट आती है लेकिन याददाश्त और सोचने समझने पर असर नहीं पड़ता. हालांकि वो कहते हैं कि डिमेंशिया के इलाज के लिए विटामिन ई लेने की सलाह देना जल्दबाज़ी होगी. वो कहते हैं जब तक कि इस अध्ययन से मिले निष्कर्ष दोहराए नहीं जाते हम लोगों को विटामिन ई सप्लीमेंट की ऊंची खुराक लेने की सलाह नहीं देंगे. |
| DATE: 2014-01-02 |
| LABEL: science |
| [132] TITLE: क्यों ख़तरनाक है सिर की चोट? |
| CONTENT: माइकल शूमाकर स्कीइंग करते हुए ज़ख़्मी होने के बाद अभी गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हैं. विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि सिर पर लगी मामूली सी चोट के भी गंभीर परिणाम हो सकते हैं. सिर को लगने वाला कोई भी धक्का ख़तरनाक हो सकता है लेकिन शुक्र इस बात का है कि ज़्यादातर धक्के ऐसे नहीं होते. दिमाग़ बहुत नाज़ुक अंग है जो बहुत असुरक्षित होता है. हालांकि ये खोपड़ी के अंदर होता है तेज़ी से आगे पीछे या घूमने से दिमाग़ को नुकसान पहुंच सकता है. इस तरह के बहुत मामूली ज़ख़्म से भी ऐसी चोट हो सकती है जो बहुत बड़ी हो सकती है. हो सकता है कि शुरुआत में कोई बड़ा नुकसान न हो- कम से कम बाहरी तौर पर. वास्तव में जो लोग गंभीर टक्कर के शिकार होते हैं वे पहली नज़र में ठीकठाक नज़र आ सकते हैं लेकिन लक्षण सामने आने में 48 घंटे लग सकते हैं. जिस किसी को भी सिर पर आघात लगे उसे तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए भले ही चोट कम दिखाई दे. आघात की जो ताकत होती है उसकी वजह से दिमाग़ ऐंठ सकता है या तंत्रिकाओं और ऊतकों को नुकसान पहुंच सकता है. खोपड़ी में जो तीखे अंदरूनी उभार होते हैं उनसे दिमाग़ के अंदर की खून लाने ले जाने वाली वाहिनियां फट सकती हैं और रक्तस्राव हो सकता है. जैसा कि शरीर के चोट खाए किसी भी अंग के साथ होता है दिमाग़ में भी सूजन आ सकती है. जब कहीं निकलने की जगह नहीं मिलेगी तो दबाव बढ़ सकता है और दिमाग़ दब सकता है. ये आपात स्थिति है. दिमाग़ की चोट को लेकर जानकारी उपलब्ध कराने वाली चैरिटी संस्था हेडवे के ल्यूक ग्रिग्स कहते हैं सिर की चोट को लेकर कोई तयशुदा नियम नहीं हैं. एक सीधी सादी चोट भी घातक हो सकती है जैसा हमने नताशा रिचर्डसन के मामले में देखा था. हॉलीवुड अभिनेता लायम नीसन की पत्नी नताशा रिचर्डसन की मौत एक स्कीइंग हादसे में सिर पर लगी चोट की वजह से हुई थी. शुरुआत में तो चोट के कोई निशान नहीं दिखे लेकिन बाद में उनकी हालत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल ले जाया गया. ग्रिग्स कहते हैं गंभीर चोटों में हमने देखा है कि लक्षण सामने आने में वक़्त लग सकता है. सूजन तुरंत नहीं होती और नुकसान दिखने में समय लग सकता है. इसलिए ये ज़रूरी है कि डॉक्टर की सलाह ली जाए भले ही कोई लक्षण न हो. डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे लोग जिनके सिर में चोट लगे उन्हें कम से कम दो दिन तक निगरानी में रखा जाना चाहिए. किसी तरह का उनींदापन बेहोशी संतुलन की समस्या उल्टी या तेज़ सिरदर्द एक तरह की चेतावनी है जिसे नज़रंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. स्कीइंग की चोटों के इलाज के विशेषज्ञ डॉक्टर माइक लैंगरन का कहना है कि ज़्यादातर स्की रिज़ॉर्ट में डॉक्टर होते हैं जो इस तरह की चोटों से निपट सकते हैं. वह कहते हैं इस तरह के हादसे स्की करने वालों में कभी-कभार ही होते हैं हालांकि उन्हें मीडिया में काफ़ी जगह मिलती है. जैसा किसी भी तरह की मनोरंजन गतिविधि में होता है बर्फ़ के खेलों के दौरान भी ख़तरों को पूरी तरह से खत्म करना असंभव है. उनका कहना है कि स्कीइंग करने वालों को हेलमेट पहनना चाहिए ताकि चोट न लगे या नुकसान कम से कम हो. |
| DATE: 2014-01-01 |
| LABEL: science |
| [133] TITLE: खुल जाएंगे दिमाग़ के रहस्य |
| CONTENT: सदियों से इंसानी दिमाग़ एक रहस्य रहा है. हालांकि पिछले कुछ दशकों में वैज्ञानिक इसके कुछ रहस्यों से पर्दा उठाने में सफल रहे हैं. हाल के कुछ सालों में नई तकनीक और शक्तिशाली कंप्यूटरों की मदद से कुछ प्रमुख खोजें हो सकी हैं. हालांकि इंसान के दिमाग़ के बारे में अभी भी बहुत कुछ समझना बाक़ी है. यहाँ हम आपको उन पांच महत्पूर्ण विषयों के बारे में बता रहे हैं जिनके पता लगने पर इंसानी दिमाग़ के अनसुलझे रहस्यों का राज़ जाना जा सकता है. जब हम सोचते हैं चलते हैं बोलते हैं सपने देखते हैं और जब हम प्रेम करते हैं तो यह सब दिमाग़ के ग्रे मैटर में होते हैं. लेकिन हमारे दिमाग़ में केवल ग्रे मैटर ही नहीं है बल्कि व्हाइट मैटर की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है. डिमेंशिया नाम की बीमारी के बारे में जब शोध किया जाता है तो दिमाग़ में मौजूद ग्रे मैटर के भीतर बीटा एमिलॉइड और टाउ प्रोटीन के एक दूसरे के साथ होने वाले रिएक्शन पर ग़ौर किया जाता है. लेकिन एक ब्रितानी वैज्ञानिक डॉक्टर एटीकस हैंसवर्थ का कहना है कि दिमाग़ के व्हाइट मैटर और इसमें होने वाली ख़ून की सप्लाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. व्हाइट मैटर तंत्रिका कोशिका के आख़िरी छोर एक्जॉन के आसपास चर्बी के कारण बनता है. एक्जॉन तंत्रिका कोशिकाओं को एक दूसरे से जोड़ते हैं. यही तंत्रिका तंत्र को आपस में तालमेल बिठाने में मदद करते हैं. डॉक्टर एटीकस हैंसवर्थ इसके बारे में अधिक जानकारी का पता लगाने के लिए ऑक्सफ़ोर्ड और शीफ़ील्ड में दान दिए गए मस्तिष्क के बैंक का प्रयोग कर रहे हैं. वह कहते हैं कुछ मामलों में हमारे पास सीटी स्कैन और एमआरआई मौजूद हैं. इनसे हमें यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि क्या बीमारी की वजह व्हाइट मैटर था और अगर था तो इसकी क्या वजह हो सकती है अगर डिमेंशिया की वजह ख़ून ले जाने वाली नाड़ियों में रिसाव है तो यह नई चिकित्सा प्रणालियों के लिए नया रास्ता मुहैया करा सकती है. कई सालों तक सतर्कता बढ़ाने के लिए कैफ़ीन का प्रयोग होता था. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के तंत्रिका तंत्र पर काम करने वाली वैज्ञानिक बारबरा सहाकियान ऐसी दवाओं का पता लगा रही हैं जो हमें और बुद्धिमान बना सकती हैं. वह इस बात का अध्ययन कर रही हैं कि इन दवाओं का प्रयोग कर सर्जनों और पायलेटों का प्रदर्शन कैसे सुधारा जा सकता है और क्या इनसे आम इंसान की काम करने की क्षमता में भी बढ़ोतरी की जा सकती है लेकिन वह चेतावनी देती हैं कि इन दवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल करने का बुरा असर भी हो सकता है. एक समाज के तौर पर हमें इस बारे में चर्चा करने की आवश्यकता है. उनका कहना है कि मस्तिष्क में डोपामाइन और नॉरएड्रीनलीन जैसे रसायनों के बनने को प्रभावित करने वाली दवाओं से सामने आई वैज्ञानिक और नैतिक चुनौतियों पर बहस की आवश्यकता है. इस बहस में किसी परीक्षा से पहले परीक्षा देने वाले का टेस्ट होना भी शामिल है जिसमें पता लगाया जाएगा कि कहीं उसने इन दवाओं का प्रयोग तो नहीं किया है. डॉक्टर सहाकियान कहती हैं मैं विद्यार्थियों से इन दवाओं के बारे में अक्सर बात करती हूँ और बहुत से विद्यार्थी पढ़ने और परीक्षा देने के लिए यह दवाएं खाते हैं. साथ ही उन्होंने कहा मगर बहुत से विद्यार्थी इससे नाराज़ होते हैं. उन्हें लगता है कि दवाएं लेने वाले विद्यार्थी बेईमानी कर रहे हैं. किसी वाद्ययंत्र को बजाने के लिए या किसी बम को निष्क्रिय करने जैसे काम के लिए बहुत अच्छी कुशलता चाहिए होती है. शोध यह बताते हैं कि हमारा अवचेतन दिमाग़ हमें सबसे बेहतर प्रदर्शन करने में मदद कर सकता है. बार-बार संगीत की एक ही धुन बजाने से उसके सबसे मुश्किल हिस्से को भी बेहतरीन ढंग से बजाया जा सकता है. लंदन के रॉयल कॉलेज ऑफ म्यूज़िक के सेंटर फॉर परफॉर्मेस साइंस में काम करने वाली सेलिएस्ट तानिया लिस्बोआ कहती हैं इससे संगीत की धुन का सबसे मुश्किल हिस्सा हमारे दिमाग़ के चेतन हिस्से से अवचेतन हिस्से में भी चला जाता है. वह कहती हैं कई घंटे तक रियाज़ करने के बाद एक पारंगत संगीतज्ञ के दिमाग़ के पिछले हिस्से सेरेब्रम में इसकी जानकारी चली जाती है. ससेक्स विश्विद्यालय के तंत्रिका वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर अनिल सेठ कहते हैं सेरेब्रम में दिमाग़ के बाक़ी हिस्से की तुलना में ज़्यादा ब्रेन सेल होती हैं. सपनों को लेकर हमारा आकर्षण तक़रीबन पांच हज़ार साल पुराना है. प्राचीन मेसोपिटामिया की सभ्यता के दौरान मान्यता थी कि सपने में हम जिस जगह को देखते हैं वहाँ हमारी आत्मा सोते हुए शरीर से निकलकर विचरण करती है. बोस्टन के बेथ इस्राइल डिएकोनेस मेडिकल सेंटर फ़ॉर स्लीप एंड कॉग्निशन के प्रोफ़ेसर रॉबर्ट स्टिकगोल्ड का मानना है कि याददाश्त से संबंधित कार्य को आगे बढ़ाने में सपनों की अहम भूमिका होती है. वह जापान की स्कैनिंग रिसर्च के मुरीद हैं. इसमें वैज्ञानिक किसी एमआरआई स्कैन की तरह सपनों को पढ़ सकते हैं. लेकिन उनका कहना है कि शोर-शराबे वाले महंगे स्कैनर में किसी व्यक्ति को सुलाना मुश्किल है. तो भविष्य में क्या प्रोफ़ेसर रॉबर्ट स्टिकगोल्ड कहते हैं मैं ऐसे अध्ययन होते देखना चाहूँगा जहाँ सपनों के बनने के नियम पता लगाए जा सकें और यह पता लगाया जाए कि नींद के दौरान याददाश्त कैसे काम करती है अगर ऐसा होता है तो यह भी पता लगा सकते हैं कि केवल अच्छे सपने कैसे देखें और बुरे सपनों से कैसे बचेंबहुत तेज़ दर्द से निपटना चिकित्सा विज्ञान के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. सर्जक अब इस सिद्धांत का परीक्षण कर रहे हैं कि डीप ब्रेन स्टिमुलेशन से दर्द से राहत दिलाई जा सकती है. डीप ब्रेन स्टिमुलेशन मस्तिष्क के ऑपरेशन की वह तकनीक है जिसमें दिमाग़ के भीतर गहरे में अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए दिमाग़ में इलेक्ट्रोड्स डाले जाते हैं. इससे पहले इस तकनीक का प्रयोग पर्किंसन और अवसाद जैसी बीमारियां ठीक करने में किया गया है. अब इसका प्रयोग ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर और असहनीय दर्द को ठीक करने में भी किया जा रहा है. ऑक्सफ़ोर्ड के जॉन रेडक्लिफ अस्पताल के प्रोफ़ेसर टीपू अज़ीज़ इस तकनीक की शुरुआत करने वालों में से एक हैं. इस तकनीक के प्रयोग से वह अपने मरीज़ों का दर्द भी काफ़ी हद तक दूर कर रहे हैं. वह कहते हैं दिमाग़ में इलेक्ट्रोड डालकर याददाश्त सुधारी जा सकती है या फिर आप सैनिकों पर इसका प्रयोग कर उन्हें ख़तरे से बेख़बर भी बना सकते हैं. |
| DATE: 2013-12-28 |
| LABEL: science |
| [134] TITLE: स्पेसवॉक कर स्पेस स्टेशन की मरम्मत की |
| CONTENT: अमरीकी अंतरिक्ष यात्रियों रिक मैस्ट्राकिओ और माइक हॉपकिन्स ने क्रिसमस की पूर्व संध्या पर साढ़े सात घंटें तक स्पेसवॉक किया. यह अपने तरह का अनोखा स्पेसवॉक था. अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अनुसार अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में शीतलन प्रणाली पंप की मरम्मत करने के दौरान यह स्पेसवॉक की गई है. जब अंतरिक्ष यात्री अपने स्पेसक्राफ्ट से बाहर निकल कर खुले अंतरिक्ष में चहल-क़दमी करते हैं तो इसे स्पेसवॉक कहते हैं. सबसे पहला स्पेसवॉक 18 मार्च 1965 को सोवियत संघ के वायुसेना पायलट एलेक्सी लियोनोव ने किया था. तब से अब तक 200 से ज्यादा बार अंतरिक्ष यात्री स्पेसवॉक कर चुके हैं. भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स भी अपनी अंतरिक्ष यात्रा के दौरान सात बार स्पेसवॉक कर चुकी है. एक महिला के तौर पर अंतरिक्ष में स्पेसवॉक करते हुए उन्होंने सबसे लंबा वक़्त गुज़ारा है. दोनों अमरीकी अंतरिक्ष यात्रियों ने शीतलन प्रणाली के अंदर ख़राब हुए अमोनिया पंप को बदलने के दौरान साढ़े सात घंटें तक स्पेसवॉक किया. शीतलन प्रणाली का पंप दो हफ़्ते पहले टूट गया था. इस वजह से सभी ग़ैर ज़रूरी उपकरण बंद हो गए थे और कई वैज्ञानिक प्रयोग भी रुक गए थे. नासा का अब कहना है कि सभी समस्याएं दूर कर ली गई हैं और इसे हफ़्ते के अंत तक चालू कर लिया जाएगा. नियंत्रण कक्ष से मिशन से जुड़े अंतरिक्ष यात्रियों को यह संदेश प्रसारित किया गया कि इस सफलता के साथ इस बार का क्रिसमस शानदार है. इसके जवाब में हॉपकिंस ने कहा सभी को क्रिसमस की बधाइयां. इस पूरी प्रक्रिया में दो हफ़्ते लगे लेकिन आख़िरकर हमने इसे ठीक कर लिया. फ़्रिज़ के आकार के इस पंप को बदलने की इन दोनों अंतरिक्ष यात्रियों की तीन दिनों में की गई यह दूसरी कोशिश थी. नासा ने कहा कि स्टेशन का छह सदस्यीय चालक दल इस दौरान कभी भी ख़तरे में नहीं था. अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में यह केवल दूसरा मौक़ा था जब क्रिसमस की पूर्व संध्या पर अंतरिक्ष में कोई मिशन पूरा किया गया. क्रिसमस की पूर्व संध्या पर पिछला अंतरिक्ष मिशन एक हबल स्पेस टेलीस्कोप की मरम्मत के दौरान 24 दिसंबर 1999 में किया गया था. मंगलवार की मरम्मत मिशन 1968 में चंद्रमा की परिक्रमा के दौरान अपोलो 8 के चालक दल के द्वारा ली गई प्रतिष्ठित फ़ोटोग्राफ़ अर्थराइज़ की 45 वीं सालगिरह के मौक़े पर हुई. |
| DATE: 2013-12-28 |
| LABEL: science |
| [135] TITLE: 'गधे कर रहे हैं' इंसानों का इलाज |
| CONTENT: उत्तरी आयरलैंड के एंट्रीम काउंटी के नर्सिंग होम में आने वाले लोगों का इलाज एक असमान्य चिकित्सा पद्धति से किया जा रहा है. इस पद्धित में गधों का इस्तेमाल लोगों को खुश करने और उनके अंदर सकारात्मक सोच को प्रोत्साहित करने के लिए किया जा रहा है. यह इलाज का एक नया तरीका है. गधे को इस उद्देश्य से अब तक जिन स्थानों पर ले जाया गया उनमें से एक है बैलीक्लेयर में क्लियर व्यू नर्सिंग होम. लेकिन दोपहर के भोजन के बाद नर्सिंग होम के अंदर गधा लाने से मुसीबत हो सकती है. ऐसी ही किसी मुसीबत वाली स्थित से सामना करने के लिए एक बड़ी बाल्टी गधे के पीछे की ओर लगानी पड़ती है और यह बाल्टी गधे के हर कदम के साथ उसके साथ ही होती है. लेकिन शायद ही कभी बाल्टी की जरूरत पड़ती है. स्थानीय निवासी विवियन हैना ने कहा गधे को अंदर आने की अनुमति है यह देखना अद्भुत और सुंदर है यह बड़े आश्चर्य की बात है. हैना कहती हैं स्थानीय लोगों में बहुत सारे लोग जब छोटे थे तब घोड़े और गधे उनके पालतू जानवर थे इसलिए गधों के आस-पास होने से उनकी पुरानी अच्छी यादें ताजा हो जाती है. वे कहती हैं यह निश्चित रूप से उन्हें बहुत उत्साहीत करने वाला है. गधों के चले जाने के बाद भी यह उनके लिए बड़ी चर्चा का विषय है. नर्सिंग होम की बैठक में गधे की दुलकी चाल देख कर उनके चेहरे पर मुस्कान छा जाती है. ये गधे जानवरों के एक अभयारण्य टेम्पल पैट्रिक से लाए जाते हैं. यह अभयारण्य अभी घायल या छोड़ दिए गए 17 जानवरों की देखभाल कर रहा है . लेकिन यह सवाल भी उठ रहा है कि नर्सिंग होम के लिए दिन के वक्त गधों को भेजना उचित है इस पर अभयारण्य प्रबंधक टीना सीमींगटन ने कहा गधों को नर्सिंग होम जाना पसंद है अगर उन्हें पसंद नहीं होता तो हम कभी भी उन्हें नहीं भेजते उनकी पसंद हमारे लिए महत्वपूर्ण है. वे कहती हैं गधों को सामाजिक होना पसंद है. उन्हें लोगों के बीच रहना पसंद है वे भी बहुत शांत स्वभाव के होते हैं . यह अभयारण्य उन स्वयंसेवकों की मदद से चलाया जा रहा है जो उत्तरी आयरलैंड में काम करने वाले एक संगठन के साथ जुड़े हैं. |
| DATE: 2013-12-27 |
| LABEL: science |
| [136] TITLE: इंटरनेट न होता तो बीमारी का पता कभी न चलता |
| CONTENT: एमी गार्टन ह्यूज़ 22 साल की हैं लेकिन उनके शरीर का आकार एक 8 साल के बच्चे जितना है. उन्हें कोकाएने सिंड्रोम है. यह एक दुर्लभ आनुवांशिक विकार है जिससे शरीर विकृत होने लगता है और आयु कम होती है. इस बीमारी से एमी का संतुलन बिगड़ गया है. उनकी आवाज़ ख़राब हो गई है और उनमें मनोभ्रंश डिमेंशिया के लक्षण हैं. इसके बावजूद वह व्यस्त रहती हैं. वह संगीत सुनती हैं तैराकी करती हैं बॉउलिंग करती हैं और अपने जैसे शौक वाले दोस्तों से मिलती हैं. मेर्सेसाइड में रहने वाली एमी की मां जेन ह्यूज़ ने अपनी बेटी की बीमारी का पता लगाने के लिए सालों का वक़्त लगाया. लेकिन डॉक्टर इससे हैरान थे और लाइब्रेरी की किताबों से कोई जवाब नहीं मिल रहा था. लेकिन ऑनलाइन सर्च से उन्हें एमी जैसे ही ख़ास तरह की धंसी हुई आंखों और परी-सरीखे चेहरों वाले कई बच्चों की तस्वीरें मिलीं. जेन कहती हैं जब इंटरनेट पर मुझे कोकाएने सिंड्रोम के बारे में पता चला तो वहां उसकी तरह दिखने वाले कई बच्चों की तस्वीरें भी दिखीं. जेन मज़ाक करते हुए कहती हैं कि अभी हाल ही में उन्होंने कट और पेस्ट करना सीखा है लेकिन उन्हें इंटरनेट काफ़ी काम का लगा है. उनके परिवार की वेबसाइट एमी एंड फ़्रेंड्स दुनिया भर में कोकाएने से ग्रस्त 1500 और बच्चों की भी मदद करती है. जेन कहती हैं अगर इंटरनेट नहीं होता तो मैं अब भी यही पता लगाने की कोशिश कर रही होती कि एमी को हुआ क्या है. वे कहती हैं यह एक जुनून की तरह था मैं चैन से बैठ या सो नहीं पाती थी. मैं अपने दूसरे बच्चों को भी ठीक से नहीं देख पाती थी. इंटरनेट नहीं होता तो मैं न जाने क्या करती. लेकिन सभी के लिए वेब फ़ोरम और ऑनलाइन लक्षणों की पहचान इतनी फ़ायदेमंद नहीं होती. बल्कि कुछ के लिए तो यह आग से खेलने सरीखा है. लंदन में इंपीरियल कॉलेज हेल्थकेयर के संचालित एक मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में सामुदायिक मनोचिकित्सक कम्यूनिटी साइकैट्रिस्ट ऐसे लोगों का इलाज करते हैं जिन्हें साइबरकॉन्ड्रिया है. यह ऐसी व्यग्रता है जो इंटरनेट से और बढ़ती है. प्रोफेसर पीटर टायरर कहते हैं साइबरकॉन्ड्रिया लोगों में गंभीर बीमारी का डर पैदा करता है. यह लगातार बढ़ रहा है. इसकी आशंका वाले पांच में से चार लोग इंटरनेट पर घंटों समय बिताते हैं. इस संबंध में उनका शोध दि लांसेट में प्रकाशित हुआ है. हालांकि अच्छी ख़बर यह है कि सामान्य थेरेपी से इसका इलाज किया जा सकता है. प्रोफ़ेसर टायरर कहते हैं सबसे पहले हम उन्हें कहते हैं कि वह इंटरनेट पर ब्राउज़िंग करना बंद कर दें. हम उन्हें डायरी रखने को कहते हैं जिसमें साफ़ दिखता है कि जब वह इंटरनेट पर बैठे उनकी व्यग्रता बढ़ गई. वे कहते हैं दिक्कत यह है कि इंटरनेट पर वह सब जानकारी है जो आप चाहते हैं- लेकिन इन जानकारियों के साथ कोई निर्णय नहीं जुड़ा होता. तकनीक से कई पुरानी बीमारियों के नए समाधान ज़रूर पेश करती है. डॉक्टर क्रिश्चियन जेसेन डॉक्टर जनरल प्रैक्टिशनर टीवी प्रजेंटर और ट्विटर पर अति-सक्रिय रहने वाले हैं. उनका अनुमान है कि उनके 30000 ट्वीट में से करीब दो तिहाई लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं का जवाब होते हैं. सबसे ताज़ा उदाहरण एक ऐसे व्यक्ति का है जो अपने कान साफ़ करवाने के लिए अपॉएंटमेंट लेने के लिए परेशान था. डॉक्टर जेसेन कहते हैं मैंने उन्हें सलाह दी कि वह ऑलिव ऑयल कान में डालें. ऑलिव ऑयल एंटी बैक्टीरियल एंटीसेप्टिक होता है और मुलायम भी करता है. हो सकता है कि इसके बाद उन्हें कान साफ़ करवाने की ज़रूरत ही न पड़े. वह कहते हैं जब मैंने ऐसा ट्वीट से स्वास्थ्य समस्या समाधान करना शुरू किया तो डॉक्टर मुझसे इसके लिए नफ़रत करने लगे. उन्होंने कहा कि मुझे ऐसे लोगों से बात नहीं करनी चाहिए जिन्हें मैंने पहले कभी न देखा हो और स्वास्थ्य संबंधी सवालों के जवाब नहीं देने चाहिए. वह लोगों को संतुलित जानकारियों के लिए पेशेंट को यूके और एनएचएल चॉयसेस देखने की सलाह देते हैं- लेकिन यह चेतावनी देना नहीं भूलते कि यह असली निदान के लिए कभी डॉक्टर का विकल्प नहीं हो सकता. एक अन्य प्रतिष्ठित वेबसाइट हेल्थटॉकऑनलाइन मरीज़ों की अनुभवों पर केंद्रित है. यह वेबसाइट गंभीर शोध पर आधारित है और इसका संचालन अकादमिक विद्वान करते हैं. इस वेबसाइट की कहानियों के सत्रहवें संस्करण में ने खुलकर बताया कि वो अवसाद-निरोधक दवाएं ले रहे हैं. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर सू ज़ीब्लैंड ने 15 साल यह निरीक्षण किया है कि मरीज़ इंटरनेट का इस्तेमाल कैसे करते हैं. इनमें कैंसर के मरीज़ भी शामिल हैं. वह कहती हैं जिन मरीज़ों का इंटरव्यू लिया गया उनमें से एक स्थानीय लाइब्रेरी में गया और इंटरनेट पर स्थानीय सपोर्ट ग्रुप के बारे में सूचना ढूंढी. उसे स्वयंसेवी सामाजिक वेबसाइट पर जो पहली चीज़ मिली वह यह थी कि ख़ास किस्म के कैंसर में पांच साल तक ही जीने की संभावना होती है. वह डर गया और कंप्यूटर बंद करके लाइब्रेरी से भाग गया. जो जानकारी उसे मिली वह बिल्कुल सही थी- लेकिन संभवतः इसे पहले पेज पर नहीं होना चाहिए था. ऐसा लग रहा था कि यह कोई साइनपोस्ट हो. प्रोफ़ेसर ज़ीब्लैंड शुरुआती वक्त में इंटरनेट को एक ख़तरे के रूप में देखती थीं. वह कहती हैं कि अब डॉक्टर मरीज़ों को सलाह देते हुए नियमित रूप से इसे एक स्रोत के रूप में देखते हैं. यह अब स्वास्थ्य चर्चाओं का एक नियमित हिस्सा बन गया है. |
| DATE: 2013-12-27 |
| LABEL: science |
| [137] TITLE: मेवा-बादाम का सेवन, 'एलर्जी दूर भगाए' |
| CONTENT: एक अध्ययन के मुताबिक उन बच्चों को नट मेवा-बादाम आदि खाने में कोई एलर्जी नहीं होती है जिनकी माँएं गर्भावस्था के दौरान बादाम खाती रही हों. द जर्नल ऑफ अमरीकन मेडिकल एसोसिएशन जेएएमए पेडियाट्रिक्स में यह अध्ययन प्रकाशित हुआ है. करीब 8000 बच्चे और उनकी माँ का विश्लेषण करने के बाद अमरीकी शोधकर्ता इस नतीजे तक पहुंचे हैं. इनके मुताबिक गर्भावस्था के दौरान कुछ खान-पान की चीजों के इस्तेमाल से बच्चे भी उन चीजों के प्रति सहज रूप से सहिष्णुता हो जाते हैं. हालांकि यह नतीजा उन अध्ययनों से मेल नहीं खाता है जिसमें बताया गया है कि बादाम के सेवन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है. इस अध्ययन के लेखक डॉक्टर लिंडसे फ्रेज़ियर बोस्टन स्थित डाना फेबर चिल्ड्रन कैंसर केंद्र से जुड़े हैं. उनके मुताबिक अगर गर्भावस्था के दौरान कोई मां बादाम आदि का सेवन करती है तो उनके बच्चों में उनसे एलर्जी की आशंका एक तिहाई कम हो जाती है. सूखे मेवे की प्रजाति में अखरोट बादाम पिश्ता काजू पीकान पहाड़ी बादाम और मूंगफली आते हैं. शोधकर्ताओं ने इसके आधार पर यह भी उम्मीद जताई है कि सूखे मेवे और बादाम के सेवन से एलर्जी को दूर किया जा सकता है. हालांकि एलर्जी को दूर भगाने में अन्य दूसरे कारक भी अहम होंगे. गायज़ एंड सेंट थॉमस एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के चिल्ड्रन एलर्जीस्ट कंसलटेंट डॉक्टर एडम फॉक्स ने कहा अभी तक इस अध्ययन को लेकर एकसमान राय नहीं मिल रही है. इसलिए मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय प्रावधानों के मुताबिक गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को ना तो नट बादाम आदि खाने से परहेज करना चाहिए और ना ही इसका ख़ूब इस्तेमाल करना चाहिए. |
| DATE: 2013-12-26 |
| LABEL: science |
| [138] TITLE: इन खतरों से कैसे बचेगा आपका मोबाइल? |
| CONTENT: रात को सोने से पहले गूगल कीप पर अगले दिन का डे प्लान ई-वॉलेट से मोबाइल रिचार्ज यू-ट्यूब पर नई पिक्चर का ट्रेलर देखना दोस्तों के व्हाट्स ऐप मैसेजेस का जवाब और रही-सही कसर पूरी करने के लिए फ़ेसबुक एक स्मार्टफ़ोन यूज़र का दिन बहुत व्यस्तता के साथ बीतता है. लेकिन जैसे-जैसे आपकी स्मार्टफ़ोन से दोस्ती बढ़ती जाती है वैसे-वैसे ही ये आपका राज़दार होता चला जाता है. फ़ेसबुक पासवर्ड से लेकर गैलरी में मौजूद पारिवारिक तस्वीरें और वीडियो बैंकिंग जानकारी फ़ोनबुक के नंबर समेत सभी संवेदनशील जानकारी आपके फ़ोन पर सुरक्षित रहे उसके लिए भी ऐहतियात बरतना ज़रूरी है. एक अच्छा एंटीवायरस पैक आपको कई तरह के वायरस और डाटा चोरी करने वाले मालवेयर से बचा सकता है. लेकिन अगर फ़ोन चोरी हो जाए या खो जाए तो फ़ोन के जाने के अफ़सोस से ज़्यादा ख़तरा उसमें स्टोर जानकारी के किसी ग़लत आदमी के हाथों पड़ने से हो सकता है. ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए गूगल ने खुद ही एंड्रॉएड फ़ोन्स के लिए एक सर्विस एंड्रॉएड डिवाइस मैनेजर लॉन्च कर दी. इस ऐप के ज़रिए आप अपने खोए हुए एंड्रॉएड फ़ोन का पता लगा सकते हैं और बुरी से बुरी स्थिति में फोन की गोपनीय जानकारियों को डिलीट कर सकते हैं ताकि वो किसी ग़लत हाथ में न चला जाए. घर में कही भी फ़ोन रखकर भूल जाने वाले भुलक्कड़ों के लिए भी इस ऐप में एक खास फ़ीचर है. आपको बस अपने कंप्यूटर तक जाना है और वहां गूगल पर लॉग-इन करके रिंग बटन दबाना है. सब ठीक रहा तो इतने में आपका फ़ोन बज उठेगा. ऐसे फ़ीचर आई-फ़ोन में पहले ही उपलब्ध हैं लेकिन एंड्रॉएड में अब तक इसकी कमी खलती थी. कुछ एंटीवायरस ऐप जैसे मैकअफ़े और क्विक हील भी फ़ोन फ़ाइंडर और रिमोट डाटा इरेज़र जैसी सुविधाएं प्रदान करते हैं लेकिन सभी फ़ीचरों से युक्त ऐसे ज़्यादातर ऐप पेड होते हैं. स्मार्टफ़ोन एक तरफ जहां बहुत से काम चुटकियों में कर देता है जैसे कि ट्रेन और फिल्मों की टिकट बुक करना पैसा ट्रांसफ़र करना वहीं ये आपको अनचाहे कॉल और मैसेज से भी बचा सकता है. आइए नज़र डालते हैं ऐसे ही कुछ मोबाइल टूल्स पर. आपको कॉल या मैसेज जिन नंबरों से आ रहे हैं उन्हें ये ऐप अपने 30 करोड़ नंबरों के डेटाबेस से मैच करता है और उनके बारे में जो भी जानकारियां हैं उसे वो आपके फ़ोन स्क्रीन पर उपलब्ध कराता है. इस तरह से आप किसी भी नए नंबर से कॉल करने वाले का नाम जान सकते हैं और अगर किसी व्यक्ति का कॉल नहीं लेना चाहते हैं तो बस ब्लॉक बटन दबा दें. बाक़ी काम ऐप कर लेता है. कई बार लोग किसी बैंक रेस्त्रां रिटेल स्टोर का फीडबैक फॉर्म या डिजिटल फॉर्म भरते समय ठीक से नहीं पढ़ते और मोबाइल पर सूचना पाने का ऑप्शन टिक कर देते हैं. ऐसे में डीएनडी यानी डू नॉट डिस्टर्ब स्थिति में भी कुछ मार्केटिंग कॉलर्स को छूट मिल जाती है और आप चाहे-अनचाहे मार्केंटिंग कॉल्स को न्यौता दे देते हैं. इस तरह के कॉलर से भी निपटने के लिए फ़ोन वॉरियर में एक स्पैम फ़िल्टर ऑप्शन मौजूद है जो अपने रिसर्च के आधार पर कोई कॉल आते ही बता देता है कि कॉल स्पैमर का है या साधारण है. ये ऐप काफ़ी समय से बाज़ार में है और बीते कुछ हफ्तों में इसमें कई नए प्रयोग भी किए गए हैं. ट्रू कॉलर अपने तमाम यूज़र के फ़ोनबुक से ली गई जानकारी के आधार पर बता सकता है कि जिस अनजान नंबर से यूज़र को कॉल आ रही है वो किसका है. इस ऐप पर लोग अपना प्रोफ़ाइल भी बना सकते हैं और तस्वीर भी लगा सकते हैं. ट्रू कॉलर फ़ोन पर इंस्टॉल होने के साथ ही फ़ेसबुक लिंक्ड-इन और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया टूल्स से भी जुड़ जाता है. ऐसे में अगर फ़ोन करने वाले का नंबर आपके मोबाइल पर सेव नहीं है लेकिन उस व्यक्ति से आप फ़ेसबुक पर जुड़े हैं तो उनका नाम विवरण और उनकी बड़ी तस्वीर आपके फ़ोन की स्क्रीन पर छा जाएगी. ये ऐप काफ़ी सरल साधारण लेकिन प्रभावशाली है. इसमें यूज़र को किसी नंबर को ब्लॉक या अनब्लॉक का ऑप्शन मिलता है. नंबर ब्लॉक करने के लिए उसे ऐप में सीधे दर्ज भी किया जा सकता है और फ़ोनबुक से चुना भी जा सकता है. स्मार्टफ़ोन जैसे-जैसे हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा होते जा रहे हैं वैसे-वैसे इनकी सुरक्षा भी ज़रूरी होती जा रही है क्योंकि अगर ये ग़लत हाथों में पड़ जाए तो जानकारी का दुरुपयोग हो सकता है. |
| DATE: 2013-12-23 |
| LABEL: science |
| [139] TITLE: नकली वोदका से ज़रा बचके रहें, वरना. |
| CONTENT: क्रिससम या नए साल के लिए ख़रीददारी करने के चक्कर में कई लोग नकली शराब खरीदने से भी नहीं हिचकते हैं लेकिन इसका सेहत पर बहुत ख़राब असर पड़ सकता है. जानकारों का कहना है कि इसमें क्लोरोफ़ॉर्म जैसे कई रासायनिक हो सकते हैं जो न सिर्फ़ आंखों के लिए नुक़सानदेह है बल्कि कई बार इनके चलते जान तक जा सकती है. ब्रिटेन के कुछ हिस्सों में पिछले एक साल दौरान ज़ब्त की जाने वाली नकली वोदका की मात्रा दोगुनी हो गई है. कई नाइट क्लबों में नकली वोदका आसानी से मिल जाती है. ब्रिटेन की शेफ़ील्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले एलेक्स कोहनर्ट कहते हैं मेरे कई दोस्त हैं जिन्हें नकली वोदका की वजह से न सिर्फ़ कुछ समय के लिए देखने में समस्या हुई बल्कि उन्हें पेट दर्द भी हुआ. एलेक्स भी मानते हैं कि उन्होंने कई बार ऐसी नकली वोदका ख़रीदी है. शेफ़ील्ड में व्यापारिक मानक विभाग के कर्मचारी इस समस्या को लेकर बहुत गंभीर हैं. इस साल अप्रैल से लेकर अब तक उन्होंने 2300 नकली शराब की बोतलें बरामद की हैं जिनमें से ज़्यादातर वोदका की थी. ये मात्रा पिछले साल के मुक़ाबले दोगुनी है. ब्रिटेन के व्यापारिक मानक विभाग ट्रेडिंग स्टैंडर्ड से इयान एशमोर कहते हैं नकली शराब आम तौर पर अपराधी तत्व तैयार करते हैं. उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं है कि इसे पीने वालों का क्या हाल होगा. तो इसमें कुछ भी शामिल हो सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि किसी भी तरह की वो नकली शराब खतरनाक है जिसमें मैथेनोल मिला हो. ड्रिंकएवेयर नाम के संगठन में सलाहकार डॉक्टर सारा जारविस का कहना है कि नकली शराब से तंत्रिका तंत्र को नुकसान हो सकता है जो बाद में चलकर पारकिंसन जैसी बीमारी की वजह बन सकती है. उन्होंने कहा आप की नज़र भी जा सकती है. हो सकता है कि आप सामान्य व्यक्ति की तरह न चल पाएं. आप अपनी जान से भी हाथ धो सकते हैं. कई बार नकली शराब को पहचानना भी मुश्किल होता है क्योंकि बनाने वाले उसे असली दिखाने में कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ते हैं. लेकिन कई बार क़ीमत के ज़रिए नकली चीज़ को पहचाना जा सकता है. ट्रेडिंग स्टैंडर्ड के केन वेब का कहना है अगर वोदका की कोई बोलत साढ़े नौ पाउंड से कम कीमत पर मिल रही होगी तो मुझे शक होगा. जानकार नकली शराब से बचने के लिए कुछ बातों पर अमल करने की सलाह देते हैं. इनमें सबसे पहले है कि शराब किसी प्रतिष्ठित जगह से ही ख़रीदें अगर वो कुछ ज़्यादा ही सस्ती मिल रही है तो सावधान हो जाए. इसके अलावा उसके लेबल को ध्यान से देखें और अगर उसमें किसी तरह अजीब गंध महसूस करें तो उसे न पीने में ही भलाई है. |
| DATE: 2013-12-23 |
| LABEL: science |
| [140] TITLE: आईवीएफ हो सकता है दोगुना फ़ायदेमंद |
| CONTENT: शोधकर्ता दावा कर रहे हैं कि यदि निषेचित अंडों के अनुवंशिक कोड की टोह ली जाए तो आईवीएफ की सफलता की दर को दोगुना किया जा सकता है. पेकिंग यूनिवर्सिटी और हावर्ड यूनिवर्सिटी की टीम के मुताबिक यदि क्सेहतमंद भ्रूण का पता लगाने के लिए नई स्क्रीनिंग विधि का इस्तेमाल किया जाए तो आईवीएफ को 60 फीसदी ज़्यादा सफल बनाया जा सकता है. इस टीम का कहना है कि चीन में इस प्रक्रिया का परीक्षण किया गया है और इसके नतीजों ने ज्यादा उम्र की महिलाओं के लिए नई संभावनाएं जगाई हैं. ब्रिटेन के प्रजनन विशेषज्ञ ने कहा है कि सेल पत्रिका में छपे इस शोध को समझने में ख़ास एहतियात बरतनी होगी. आईवीएफ तकनीक के जरिए अण्डाणु और शुक्राण को प्रयोगशाला में एक परखनली के भीतर मिलाया जाता है. इसके बाद बने भ्रूण को मां के गर्भ में आरोपित कर दिया जाता है. आईवीएफ की सफलता को अधिकतम करने के लिए प्रजनन से जुड़े क्लीनिक कई तरह की स्क्रीनिंग प्रक्रिया को अपनाते हैं. ये क्लीनिक इन प्रक्रियाओं की मदद से भ्रूण आरोपित करने का सबसे सुरक्षित तरीका तलाशते हैं. बढ़ रहे भ्रूण से कोशिकाओं को हटाने का तरीका अक्सर इन तरीकों में से एक होता है. ऐसे में यह भी संभव है कि इसमें सभी आनुवंशिक समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जा सकता है. यह नया तरीका अंडाणु दान करने वाले किसी वालंटियर से लिए गए 70 निषेचित अंडों पर किए गए अध्ययन पर आधारित है. यह नया तरीका ध्रुवीय निकाय के नाम से जाना जाने वाले कोशिका मे बचे खुचे टुकड़ों को नए नए विकसित हो रहे भ्रूण से हटाने और उनकी संपूर्ण आनुवंशिकी कोड का विश्लेषण करने पर आधारित रहा. पेकिंग यूनिवर्सिटी के मुख्य शोधकर्ता जीई क्वीओ ने कहाः सैद्धांतिक रुप से देखा जाए तो अगर यह तरीका सफल हुआ तो हम टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक की सफलता को 30 फीसदी से बढ़ाकर 60 फीसदी या इससे भी ज़्यादा कर सकते हैं. शोधकर्ताओं में से एक हावर्ड यूनिवर्सिटी के जिआओलिंग सन्नी जेई कहते हैं कि कई बार मां के डीएनए में किसी आनुवंशिकी गड़बड़ी होने के कारण आईवीएफ़ सफल नहीं होता या गर्भपात हो जाता है. कई बार बच्चे में भी आनुवंशिक समस्या पनप जाती है. लेकिन इस नई तकनीक के ज़रिए बढ़ रहे भ्रूण में मां द्वारा दान किए गए डीएनए में आनुवंशिक असमान्यताओं के होने की जांच की जाती है. उन्होंने कहा यह तरीका उन महिलाओं क लिए बेहद कारगर साबित होने वाला है जिनपर आईवीएफ़ तकनीक लगातार असफल होती है. यह तरीका ख़ासकर अधिक उम्र की महिलाओं में भ्रूण उपचार को अधिक सफल बना सकता है. उन्होंने बीबीसी को बताया हमारे पास इन सिद्धांत के प्रमाण हैं. इसका चिकित्सीय परीक्षण पहले ही शुरू किया जा चुका है. इसने आईवीएफ़ की लगातार विफलता से जूझ रही महिलाओं के लिए आशा बन कर आया है. दुनिया भर में ऐसे 15 फीसदी जोड़े ऐसे हैं जो संतान पैदा करने में शारीरिक रूप से सक्षम नहीं हैं. इसमें से कई जोड़ों ने बच्चा पाने के लिए आईवीएफ़ का सहारा लिया है. |
| DATE: 2013-12-22 |
| LABEL: science |
| [141] TITLE: रोबोट रोकेंगे परमाणु संयंत्रों में रिसाव! |
| CONTENT: एक दृश्य की कल्पना कीजिए परमाणु रिएक्टर में अलार्म बज रहे हैं इसमें रिसाव हो रहा है और ज़हरीला पदार्थ बाहर निकल रहा है. ऐसी स्थिति में किसी भी इंसान का बचना नामुमकिन है. लेकिन तभी रोबोट बचाव दल वहां पहुंच जाता है और काम शुरू कर देता है. जल्द ही स्थिति नियंत्रण में आ जाती है. यह किसी हॉलीवुड की फ़िल्म का दृश्य नहीं है- अगर पेंटागन की कोशिशें सफल हुईं तो जल्द ही रोबोट दल ऐसी मानव-जनित दुर्घटनाओं पर काबू पा सकेंगे. अमरीकी रक्षा विभाग ने इस तकनीक को प्रोत्साहन देने के लिए सौ में से 17 दलों और उनकी मशीनों को चुना. यह सभी दल मियामी के नज़दीक होने वाले परीक्षण- डार्पा रोबोटिक चैलेंज डीआरसी- में प्रतियोगिता करेंगे. एक साल बाद इसका फ़ाइनल होगा जिसमें 20 लाख डॉलर 1-24 अरब रुपये इनाम के विजेता का ऐलान होगा. वर्जीनिया टेक्स रोबोटिक्स और मैकेनिज़्म लैबोरेट्री इस प्रतियोगिता में इंसान जैसा पूरे कद का रोबोट- थॉर- को लेकर आई है. इसके निदेशक प्रोफ़ेसर डेनिस हॉंग कहते हैं यह इंसानियत को बचाने वाला प्रोजेक्ट है. इस तरह की बड़ी प्रतियोगिताएं विज्ञान फ़ंतासियों को हकीकत बनाने में मदद करती हैं. फ़ुकुशिमा प्लांट जैसी दुर्घटनाएं फिर होंगी और अगर हम ऐसी तैयारी नहीं करते हैं तो हम लाचार शिकार होंगे. जापान में भी 2011 की परमाणु प्लांट दुर्घटना के बाद रोबोट्स भेजे गए थे लेकिन उन्होंने सिर्फ़ वीडियो और अन्य डाटा ट्रांस्फ़र किया. वह मरम्मत का काम नहीं कर सकते थे. इसके विपरीत डीआरसी परीक्षण में ज़्यादा की उम्मीद की जा रही है. इसमें रोबोट्स को आठ काम करने होंगे. उन्हें खंभों के साथ-साथ गाड़ी चलाकर जाना होगा. एक ऐसे इलाके से निकलना होगा जिसमें ढलान सीढ़ी और ढीले कुंदे पड़े होंगे. आठ फ़ीट ऊंची सीढ़ी पर चढ़ना होगा. रास्ता रोक रहे मलबे को हटाना होगा. लीवर लगे हुए दरवाज़े को खींचकर खोलना होगा. एक बिना तार वाले ड्रिल से दीवार को तिकोना काटना होगा. तीन एयर वॉल्वस को बंद करना होगा जिनमें हर एक अलग आकार के पहिए या लीवर से बंद होगा. एक पाइप को खोलना होगा और फिर इसके नॉज़ल को दीवार से लगे एक कनेक्टर से कसना होगा. आयोजक मानते हैं कि इस दौरान रोबोट्स को कुछ खरोच और धक्के लग सकते हैं. डीआरसी के मैनेजर गिल प्रैट कहते हैं अभी रोबोट्स करीब-करीब एक साल के बच्चे जितने ही कुशल और चलने योग्य हैं. इसलिए आपको रोबोट बहुत धीरे चलते हुए लगेंगे. आप यह भी देखेंगे कि रोबोट्स अभी उस स्तर पर खुद ही काम करने में सक्षम नहीं हैं जितना हम चाहते हैं लेकिन एक इंसान उन्हें ऑपरेट करेगा तो इससे बहुत फ़र्क पड़ेगा. अमरीकी दलों के अलावा दक्षिण कोरिया हॉंग-कॉंग चीन जर्मनी और जापान के इंजीनियर भी इस प्रतियोगिता में शामिल हैं. ज़्यादातर अपनी खुद की मशीन लेकर आए हैं लेकिन बाकी बॉस्टन डायनेमिक्स जिसे हाल ही में गूगल ने ख़रीदा है के दो पैर वाले रोबोट- एटलस- की कॉपियों को प्रोग्राम कर रहे हैं. एटलस पर ही काम कर रही मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी एमआईटी की टीम के प्रोफ़ेसर सेथ टेलर इस प्रतियोगिता को खेल बदलने वाला बताते हैं. वह कहते हैं आपको यहां काम वास्तविक स्थितियों में करने होंगे- मतलब बाहर खुले में. बिना यह जाने कि आगे किस तरह की ज़रूरत पड़ेगी वह भी बहुत ख़राब नेटवर्क लिंक के साथ. ऐसे बहुत से मौके आएंगे जब इंसान और रोबोट्स के बीच किसी क़िस्म का कोई संपर्क नहीं होगा. इसे काम को अंजाम देने के लिए खुद ही चीज़ें करनी होंगी. लेकिन अमरीकी सेना के इन तकनीकी दलो के साथ काम करने को लेकर सभी रज़ामंद नहीं हैं. रोबोट आर्म्स कंट्रोल पर अंतर्राष्ट्रीय समिति के सह-संस्थापक प्रोफ़ेसर नोएल शार्की पूछते हैं जब रक्षा बजट इतने दबाव में है तब अचानक डार्पा लाखों डॉलर बचाव रोबोट के विकास पर क्यों ख़र्च कर रहा है ऐसा लगता है कि यह परिष्कृत रोबोट हथियारों को विकसित करने का दीर्घकालिक कार्यक्रम है. प्रोफ़ेसेर हॉंग मानलते हैं कि इस प्रतियोगिता से टर्मिनेटर जैसे एक हॉलीवुड फ़िल्म हत्यारे रोबोट्स के विकास को रफ़्तार मिल सकती है लेकिन इस बात पर ज़ोर देते हैं कि कार्यक्रम का घोषित लक्ष्य ज़िंदगियों को बचाना है- तबाह करना नहीं. हालांकि वह मानते हैं कि रोबोट्स के बचाव कार्य शुरू होने में उतने में अभी वक्त है. वह कहते हैं एक वास्तविक परमाणु संयत्र में रेडिएशन सभी इलेट्रॉनिक उपकरणों को बर्बाद कर देगा. रेडिएशन से सुरक्षा एक बड़ी दिक्कत है और इसके लिए सालों तक शोध और विकास कार्य करना होगा. |
| DATE: 2013-12-22 |
| LABEL: science |
| [142] TITLE: विकासशील देशों की जीवनशैली से बढ़े कैंसर मरीज़ |
| CONTENT: विश्व स्वास्थ संगठन डब्ल्यूएचओ का कहना है कि विकासशील देशों में जीवनशैली में हुए बदलाव के कारण पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ी है. धूम्रपान मोटापे के साथ-साथ लोगों की औसत आयु बढ़ने के कारण इस बीमारी से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ रही है. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक दुनिया में साल 2012 में कैंसर से पीड़ित 1-4 करोड़ लोगों का इलाज़ किया गया. साल 2008 में कैंसर से पीड़ित लोगों की संख्या 1-27 करोड़ थी. उस वक्त इस बीमारी के कारण 76 लाख लोगों की मौत हुई थी जबकि साल 2012 में इस बीमारी से 82 लाख लोग मारे गए. दुनिया में फेफड़े के कैंसर से सबसे अधिक लोग पीड़ित हैं. इसका मुख्य कारण धूम्रपान है. दुनिया में इस कैंसर से करीब 18 लाख लोग पीड़ित हैं जो कैंसर मरीज़ों की कुल संख्या के 13 फ़ीसदी हैं. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक स्तन कैंसर के मामलों में भी तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यह दुनिया की 140 देशों की महिलाओं में होने वाला सबसे कॉमन कैंसर है. डब्ल्यूएचओ की कैंसर से जुड़ी रिसर्च एजेंसी के डॉक्टर डेविड फ़ॉरमैन ने कहा कि अल्प विकसित देशों में मौत का एक बड़ा कारण स्तन कैंसर है. उनका कहना है कि एक तरफ जीवनशैली में बदलाव के कारण बीमारी से पीड़ितों की संख्या बढ़ रही है वहीं इन महिलाओं तक आधुनिक इलाज़ की तकनीक के नहीं पहुंचने के कारण मौत पर काबू नहीं पाया जा रहा है. डब्ल्यूएचओ ने कहा कि विकासशील देशों में स्तन कैंसर के पहचान और निदान को बढ़ावा देने की तुरंत जरूरत है. संगठन ने साल 2025 तक इस बीमारी से पीड़ित लोगों की संख्या 1-9 करोड़ तक पहुंचने की आशंका जताई है. |
| DATE: 2013-12-22 |
| LABEL: science |
| [143] TITLE: दिल को बीमार करने वाला ख़तरनाक जीन |
| CONTENT: तनाव के लिए ज़िम्मेदार एक जीन को हृदयघात या दिल की बीमारी में मौत का ख़तरा बढ़ाने वाला क़रार दिया गया है. हृदय के जिन मरीजों में जीन संबंधी ऐसे बदलाव होते हैं उनमें दिल के दौरे का खतरा 38 फ़ीसदी बढ़ जाता है. ब्रिटिश हार्ट फ़ाउंडेशन का कहना है कि इस अध्ययन से सीधे तौर पर तनाव के कारण हृदय संबंधी बीमारियों का ख़तरा बढ़ने का प्रमाण और पुख़्ता होता है. ड्यूक यूनीवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ मेडिसिन की एक टीम ने मानव जीनोम के उस डीएनए का अध्ययन किया जो तनाव से जुड़ा होता है. उन्होंने पाया कि जीन में परिवर्तन होने पर दिल के मरीज़ों में दौरा पड़ने या मौत का ख़तरा 38 फ़ीसदी बढ़ जाता है. इस तथ्य पर पहुंचने के लिए वैज्ञानिकों ने सात साल तक अध्ययन किया. उनके नतीजों के आधार पर कहा जा सकता है कि तनाव से दूरी बनाकर तकनीक और ड्रग थेरेपी के ज़रिए दिल के दौरे से होने वाली मौतों को कम किया जा सकता है. ड्यूक यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ मेडिसिन से जुड़े निदेशक डॉक्टर रेडफ़ोर्ट विलियम्स ने कहा कि यह अध्ययन जेनेटिक विभिन्नता के आधार पर वैसे लोगों की पहचान करने की दिशा में पहला कदम है जिनमें दिल संबंधी बीमारी का ख़तरा रहता है. डॉक्टर विलियम्स ने बीबीसी को बताया कि हमने जिनोटाइप के आधार पर ऐसे लोगों की पहचान करने की दिशा में एक कदम बढ़ाया है जिनमें हृदय संबंधी बीमारियां हो सकती हैं. उन्होंने कहा कि इससे दिल की बीमारी के लिए अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग दवाएं दी जा सकेंगी. शोधकर्ताओं ने कहा कि जीन में होने वाले बदलावों की पहचान करने से शुरुआत में ही दिल की बीमारी के जोखिम वाले लोगों का इलाज शुरू किया जा सकता है. अध्ययन में शामिल किए गए 6000 दिल के मरीज़ों में से 10 फ़ीसदी पुरुषों और तीन फ़ीसदी महिलाओं में भावनात्मक तनाव से ग़लत तरीक़े से निपटने के कारण जीन में बदलाव देखा गया. इस अध्ययन पर टिप्पणी करते हुए ब्रिटिश हार्ट फ़ाउंडेशन के असोसिएट मेडिकल डायरेक्टर प्रोफ़ेसर जेरेमी पीयरसन ने कहा कि इससे तनाव के कारण दिल संबंधी बीमारियों के ख़तरे बढ़ने के प्रमाण और प्रभावी हुए हैं. |
| DATE: 2013-12-21 |
| LABEL: science |
| [144] TITLE: आखिरकार आ ही गई हवा से चलने वाली कार |
| CONTENT: पूरी कार में पांच लाख लेगो ब्रिक इस्तेमाल किए गए हैं. लेगो ब्लॉक से बनी और हवा से चलने वाली इस कार की अधिकतम रफ़्तार 20 किमी प्रति घंटा है. रोमानियाई तकनीशियन और ऑस्ट्रेलियाई उद्यमी ने इस कार को बनाने के लिए 500000 लेगो ब्लॉक का इस्तेमाल किया. सामूहिक योगदान वाली इस परियोजना की शुरुआत एक ट्वीट से हुई जिसमें लोगों से इसमें सहयोग करने की अपील की गई थी. इसकी ख़ासियत यह है कि पहिए छोड़कर सब लेगो ब्रिक से बना हुआ है. हवा से चलने वाले चार इंजन और 256 पिस्टन कार को शक्ति प्रदान करते हैं. इस कार के सह निर्माता स्टीव समारटिनो ने बीबीसी को बताया कि वो न तो कभी कार प्रेमी रहे हैं और न ही लेगो ब्रिक में दिलचस्पी रही है. उन्होंने बताया मेरी दिलचस्पी का क्षेत्र तकनीक रहा है. मैं यह दिखाना चाहता था कि सामूहिक योगदान और प्रतिभावान युवा लोगों से क्या कुछ संभव हो सकता है. इस उत्साही रोमानियाई युवा से मेरी भेंट इंटरनेट पर हुई और वहीं से यह विचार आया लेकिन मैं जानता था कि इसका खर्च अकेले वहन करना मुश्किल है. देर रात उन्होंने ट्वीट किया जिसका मजमून था कोई है जो 500 से 1000 डॉलर लागत के एक प्रोजेक्ट में निवेश कर सकता है जो बेहद अद्भुत और दुनिया का पहला प्रोजेक्ट होगा. कम से कम 20 सहयोगी चाहिए. 40 ऑस्ट्रेलियाई नकद देने के लिए आगे आए और इस तरह ऑसम माइक्रो प्रोजेक्ट का जन्म हुआ. समार्टिनों ने बताया कि इसमें कुल 18 महीने लगे और बहुत ज्यादा धन लगा. कार का निर्माण रोमानिया में उनके और व्यावसायिक हिस्सेदार राउल ओएदा द्वारा किया गया. इसे बाद में ऑस्ट्रेलिया लाया गया जहां इसके कई हिस्से बदले गए. उन्होंने बीबीसी को बताया मेलबर्न के उपनगरीय इलाके में हमने इस कार पर सवारी की. इसका इंजन काफी नाज़ुक है और राहगीरों के लिए काफ़ी शोर भरा है. फ़िलहाल इस परियोजना के विस्तार की कोई योजना नहीं है. उन्होंने कहा चार सप्ताह तक मैंने लेगो ब्रिक के साथ पूरा समय बिताया है. यहां तक कि मेरी अंगुलियों के पोर अभी भी दर्द कर रहे हैं. मैं इसी वक्त दूसरी कार नहीं बनाने जा रहा. हालांकि यह कार बहुत आरामदेह नहीं दिखती इसीलिए मैं इसे दूर तक चलाकर ले जाना नहीं चाहता. लेगो ब्रिक से भारी शोर पैदा होता है और इसमें सुधार की जरूरत है. |
| DATE: 2013-12-21 |
| LABEL: science |
| [145] TITLE: सितारों की टोह लेने गया 'गेया' |
| CONTENT: यूरोप ने अपने इतिहास के अपने सबसे महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष मिशनों में से एक गेया का प्रक्षेपण कर दिया है. 74 करोड़ यूरो 62 करोड़ पाउंड की इस ऑब्जर्वेटरी यानी वेधशाला ने फ्रेंच गुयाना के सिनामरी परिसर से गुरुवार को छह बजकर 12 मिनट पर उड़ान भरी. गेया एक अरब से भी ज़्यादा सितारों की सटीक स्थिति और दूरी का पता लगाएगा. इससे हमें अपनी आकाशगंगा मिल्की वे के निर्माण की वास्तविक तस्वीर मिल पाएगी. गेया पर लगे उपकरण से हजारों अनदेखे ग्रहों और एस्ट्रॉयड से हमारा परिचय कराएंगे. यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ईएसए उपग्रह को सोयूज रॉकेट के ज़रिए अंतरिक्ष में भेजा गया. इसे अपने गंतव्य तक पहुंचने में एक महीने का समय लगेगा. गेया को बनाने का काम 20 साल से भी अधिक समय से चल रहा है. यह उपग्रह आकाशीय पिंडों की स्थिति और गति को मापने का काम करेगा. इसके लिए इसमें दो टेलीस्कोप लगाए गए हैं. ये टेलीस्कोप एक अरब पिक्सेल की क्षमता वाले उस विशाल कैमरे पर रोशनी डालेंगे जो उपकरणों से जुड़ा होगा. गेया इस अति स्थिर और अति सूक्ष्मग्राही ऑप्टिकल उपकरणों का इस्तेमाल करते हुए सितारों की स्थिति का सही सही पता लगाएगा. पांच साल तक अपने लक्ष्य की निरंतर निगरानी करने के दौरान गेया जिन-जिन तारों को देखेगा उन सबकी पूरी प्रोफाइल बनाएगा. तारों की दूरी का पता लगाने के साथ ही साथ यह उपग्रह आकाश में उनके चलने-फिरने और घूमने का भी अध्ययन करेगा. तारों के भौतिक गुणों के बारे में विस्तृत जानकारी को भी सूचीबद्ध किया जाएगा. इन जानकारियों में तारों की चमक तापमान रचना उम्र और दूरी सहित सटीक निर्देशांक से जुड़ी जानकारियां भी शामिल होंगी. धरती की ओर या धरती से आसमान की ओर क़रीब 15 करोड़ तारों की गति क्या हो सकती है गेया इसका भी पता लगाएगा. गेया द्वारा जुटाई गई इन जानकारियों से वैज्ञानिकों को तीन आयामी मार्कर का इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी और इसके ज़रिए वे आकाशगंगा के विकास का सुराग लगा सकते हैं. गेया हर उस चीज को खोज निकालेगा जो इसमें लगे कैमरा डिटेक्टर के दायरे से गुजरेगा. इसलिए यह संभव है कि गेया अनचिन्हे और अनदेखे रह गए असंख्य आकाशीय पिंडों को देखे. धूमकेतु एस्ट्रॉयड सौरमंडल के बाहर के ग्रह मृत तारे और यहां तक कि वैसे हल्के गर्म तारे भी जो अपने जीवन में कभी नहीं चमके इन सबके बारे में गेया के ज़रिए जानकारी हासिल की जा सकेगी. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर जेर्री गिलमोर का कहना है ऐसा पहली बार होगा कि हम आकाशगंगा के बारे में जान सकेंगे कि उसमें क्या चीजें मौजूद हैं और वे कहां कहां हैं. यह सचमुच एक परिवर्तनकारी अभियान है. गेया में एक ऐसा सनशील्ड लगा है जो अपने ऑप्टिक्स को तापमान में आने वाले किसी भी छोटे मोटे बदलाव से बचाता है. यह सनशील्ड आकलन कार्य में आने वाली किसी परेशानी से भी बचाएगा. ऐसी संभावना है कि दशक के अंत तक गेया के पास संग्रहित आंकड़ें एक पेटाबाइट 10 लाख गीगाबाइट तक पहुंच जाएंगे. ये आंकड़े सूचनाओं से लैस करीब 200000 डीवीडी के बराबर हो सकते हैं. ये आंकड़ें इतने विशाल हैं कि पेशेवर खगोलविद दशकों तक इन पर माथापच्ची करने में व्यस्त रहेंगे. गेया बड़े पैमाने पर किए गए औद्योगिक प्रयासों का परिणाम है. फ्रांस के टुलूज़ में एस्ट्रियम सैटेलाइट्स के नेतृत्व में 50 कंपनियों ने इसे बनाने में मेहनत की है. इस कंसोर्शियम में यूरोप की 47 और उत्तरी अमरीका की तीन कंपनियां शामिल हैं. |
| DATE: 2013-12-20 |
| LABEL: science |
| [146] TITLE: डीएनए से रहस्यमय मानव प्रजाति की खोज |
| CONTENT: साइबेरिया की एक गुफा में मिले आदि मानव के अवशेषों के डीएनए परीक्षण से एक रहस्यमय मानव प्रजाति का पता चला है. शोधकर्ताओं की एक टीम का अनुमान है कि ये प्रजाति होमो इरेक्टस हो सकती है जो दस लाख साल या उससे पहले यूरोप और एशिया में रहती थी. इस बीच शोधकर्ताओं ने कहा है कि उन्हें निएंडरथल प्रजाति का अब तक का सबसे संपूर्ण डीएनए सीक्वेंस या डीएनए ऋंखला मिली है. इन अध्ययनों के बारे में नेचर पत्रिका में छपा है. साइबेरिया की डेनिसोवा गुफा से मिली जानकारी ने उन मानव समूहों के बारे में हमारी समझ और बढ़ा दी है जो आधुनिक मानव या होमो सेपियंस के विकास से पहले यूरेशिया में रह रहे थे. निएंडरथल प्रजाति के बारे में पहले से ही काफ़ी पता था लेकिन इस गुफा में मिली एक उंगली की हड्डी और दांत के डीएनए परीक्षण से 40 हज़ार साल पहले रहने वाली उस प्रजाति के बारे में सबूत मिले हैं जो निएंडरथल और आधुनिक मानव से बिलकुल अलग थी. ये शोध जब साल 2010 में छपा था तब इस खोज को करने वाली टीम ने इस मानव प्रजाति का नाम साइबेरियाई गुफा के नाम पर डेनिसोवंस रखा था. निएंडरथल प्रजाति के पैर की उंगली की हड्डी इसी गुफा में साल 2010 में मिली थी. यह हड्डी 10 से 20 हज़ार साल पुरानी समझी जाने वाली मिट्टी की एक गहरी परत में दबी थी. इस गुफा में आधुनिक मानव की जो चीज़ें मिली हैं उनसे पता चलता है कि अलग-अलग समय पर कम से कम तीन विभिन्न प्रजातियां इस गुफा में रही थीं. जर्मनी के लीपज़िग स्थित मैक्स प्लैंक इंस्टिट्यूट फॉर इवोल्यूशनरी एंथ्रोपॉलॉजी के प्रोफ़ेसर स्वांते पैबो और उनके साथियों द्वारा विकसित तकनीकों की मदद एक छोटी हड्डी से बेहतरीन जीनोम सीक्वेंस निकाला गया और ये सीक्वेंस निएंडरथल प्रजाति और मानवों के बारे में कुछ बेहद दिलचस्प जानकारी देता है. मिसाल के लिए इससे पता चला है कि निएंडरथल प्रजाति की महिला का जन्म एक ही परिवार में आपसी-संबंधों का नतीजा था और वो एक ही मां लेकिन अलग-अलग पिता से जन्मे भाई-बहनों की संतान हो सकती है. लेकिन इसके अलावा भी कुछ और संभावनाएं हो सकती थीं. जैसे निएंडरथल महिला के मां-बाप चाचा-बुआ या बुआ-भतीजा दादा-दादी-पोती-पोता भी हो सकते हैं. विभिन्न मानव समूहों- निएंडरथल डेनिसोवंस और आधुनिक मानवों के आनुवांशिक क्रम की तुलना से उनके विकासपरक रिश्तों के बारे में और जानकारी मिली. नतीजे दिखाते हैं कि निएंडरथल प्रजाति और डेनिसोवन प्रजाति में बहुत नज़दीकी रिश्ते थे और उनका एक ही पूर्वज था जो लगभग चार लाख साल पहले आधुनिक मानव के पूर्वजों से अलग हो गया था. जीनोम आंकड़ों से पता चलता है कि निएंडरथल प्रजाति और डेनिसोवन प्रजाति लगभग तीन लाख साल पहले अलग हो गई थी. लेकिन इस शोध में एक आश्चर्यजनक नतीजा भी सामने आया. वो ये था कि डेनिसोवन प्रजाति ने उस वक्त यूरेशिया में रहने वाली एक चौथी रहस्यमयी मानव प्रजाति के साथ भी संबंध बनाए जिससे संताने हुईं. ये समूह बाक़ी मानव समूहों से दस लाख साल से ज़्यादा पहले अलग हो गया था और यही समूह होमो इरेक्टस नाम के आदि मानव का पूर्वज हो सकता है जो जीवाश्मों से मिले सबूतों के मुताबिक़ उस वक्त यूरोप और एशिया में रह रहे थे. हालांकि डेनिसोवन और निएंडरथल प्रजातियां अंतत ख़त्म हो गईं लेकिन कभी-कभी आधुनिक मानव प्रजाति के साथ संबंध बनाने के चलते वे अपनी थोड़ी बहुत आनुवांशिक विरासत पीछे छोड़ गए. शोध टीम के आकलन के मुताबिक़ आधुनिक ग़ैर-अफ़्रीकियों के 1-5 से 2-1 प्रतिशत जीनोम में निएंडरथल प्रजाति के चिन्ह मिलते हैं. इसी तरह ऑस्ट्रेलिया न्यू गिनी और प्रशांत महासागर के कुछ द्वीपों के मूल निवासियों और कुछ एशियाई और मूल अमरीकी प्रजातियों में डेनिसोवन प्रजाति के चिन्ह मिलते हैं. बर्केले स्थित कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय में इंटिग्रेटिव बायोलॉजी के प्रोफ़ेसर मॉन्टगॉमरी स्लाटकिन कहते हैं ये अध्ययन दिखाता है कि उस दौर का मानव इतिहास वाकई बहुत जटिल था. अध्ययन का हिस्सा रहे प्रोफ़ेसर स्लाटकिन के सहयोगी फ़रनांडो रासिमो ने कम से कम 87 जीन की पहचान की है जो कि निएंडरथल और डेनिसोवन प्रजातियों में पाई गई उसी तरह की जीन से काफ़ी हद तक अलग हैं. प्रोफ़ेसर पैबो के मुताबिक़ ये जीन उन आनुवांशिक लक्षणों की सूची है जो आधुनिक मानव को बाक़ी सभी ज़िंदा या लुप्त जीवों से अलग करती हैं. उनका कहना है मैं मानता हूं कि आनुवांशिक क्रम में कुछ ऐसी बातें छिपी हैं जिनकी वजह से पिछले एक लाख वर्षों में मानव आबादी और मानव संस्कृति और तकनीक का इतना ज़्यादा विकास संभव हो पाया. |
| DATE: 2013-12-20 |
| LABEL: science |
| [147] TITLE: एस्टेरायड्स ने भेजी मंगल पर ज़िंदगी की सौगात |
| CONTENT: माना जाता है कि एस्टेरायड्स के चलते धरती पर डायनासोर ख़त्म हो गए लेकिन क्या आप मानेंगे इन्हीं एस्टेरायड ने मंगल और जूपिटर के चंद्रमा पर ज़िंदगी की सौगात भेजी. अमरीकी शोधकर्ता यही मानते हैं. वो गणना करते हैं कि पिछले 3-5 अरब वर्षों में धरती से अंतरिक्ष की ओर गईं बड़ी चट्टानें जीवन को शरण देने में सक्षम थीं. एस्ट्रोबॉयोलॉजी में वो लिखते हैं कि इसके लिए चिक्सुलब का उदाहरण ही काफी है जिसके चलते बड़े पैमाने पर धरती का चट्टानी मलबा यूरोपा जा पहुंचा. शोधकर्ता कहते हैं कि ज़िंदगी की संभावनाओं को संजोए रखने वाली बहुत सी चट्टानों ने मंगल को बनाया हो सकता है जिन पर कभी जीवन रहा हो. पेन स्टेट यूनिवर्सिटी की मुख्य लेखक राचेल वार्थ कहती हैं हमने पाया कि ये चट्टानें जीवन का वाहक रही होंगी जो पृथ्वी और मंगल से एक दूसरे के ग्रहों और सोलर सिस्टम और जूपिटर तक पहुंची होंगी. उन्होंने आगे कहा टाइटन या जूपिटर के चंद्रमा पर जीवन की तलाश कर रहे अभियान में देखना होगा कि वो मिल रहे जैविक पदार्थ क्या स्वतंत्र हैं या उनका जुड़ाव पृथ्वी के परिवार वृक्ष से रहा है. पैंसपर्मिया यानि वो विचार जिसमें माना गया है कि जीवाणु धूमकेतुओं और उल्का पिंडों के टकराने से उत्पन्न मलबे के जरिए अंतरिक्ष में सैर करते रहते हैं. ये बात लंबे समय से खगोलविदों को आकर्षित करती रही है. नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पहले अनुमान लगाया कि बड़े बदलावों में पृथ्वी से अंतरिक्ष की ओर गईं चट्टानें तीन मीटर से कहीं ज्यादा बड़ी रही होंगी. उनका अनुमान था कि दस मिलियन वर्षों से हो रही इन यात्राओं में शामिल कम से कम तीन मीटर की चट्टानें सूर्य के विकिरण से जीवाणुओं की रक्षा करने में सक्षम रही होंगी. उसके बाद उन्होंने इन यात्राओं के भाग्य को तय किया होगा. इनमें कई चट्टानें आमतौर पर पृथ्वी की कक्षाओं में पहुंची होंगी तो कुछ नीचे गिर गई होंगी. कुछ या तो सूर्य की ओर खींच ली गई होंगी या पूरी तरह से सोलर सिस्टम से बाहर निकल गई होंगी. वार्थ कहती हैं कम लेकिन महत्वपूर्ण संख्या ने एलियन जगत के लिए रास्ता भी बनाया होगा हो सकता है कि इससे वहां ज़िंदगी का स्वागत हुआ हो. इन सबका मतलब तो है. जूपिटर के उपग्रह यूरोपा पर कम से कम छह ऐसी चट्टानें देखी गई हैं जो बर्फ के कणों और समुद्र के द्रव से लिपटी हुई थीं. यहां ये भी अनुमान लगाया जा सकता है कि जीवाणु यूरोपा के समुद्र तक भी पहुंचे हों. पृथ्वी के मलबे और चट्टानों के मंगल तक पहुंचने को अब आमतौर पर स्वीकार किया जा रहा है. शोधकर्ताओं के अनुसार करीब 360000 चट्टानें लाल ग्रह तक की यात्रा कर चुकी होंगी. सबसे प्रसिद्ध प्रभाव मैक्सिको में 66 मिलियन साल पहले हुए चिक्सुलब को ही माना जाता है जब एक छोटे शहर जितना बड़ा एस्टेरायड पृथ्वी से टकराया. इसके प्रभाव के चलते बड़े पैमाने पर डायनासोर का ख़ात्मा हुआ. ज्वालामुखी सरीखे विस्फोट हुए. बड़े पैमाने पर जंगलों में आग लगी. धुएं और धूल ने पृथ्वी को आगोश में ले लिया. शोधकर्ताओं का मानना है कि चिक्सुलब प्रभाव से करीब 70 बिलियन किलो चट्टानें अंतरिक्ष में गईं इसमें 20 हजार किलो यूरोपा तक पहुंची. ये संभावना ज़्यादा है कि ये विशालकाय चट्टानें अपने साथ जीवन को भी वहां ले गईं. लेकिन क्या इन महाकाव्य सरीखी यात्राओं में वास्तव में जीवधारी बचे होंगेवार्थ कहती हैं मैं हैरान हूं कि इसके बावजूद मंगल पर जीवन क्यों नहीं मिला. वो कहती हैं कि ये हमारे अध्ययन से परे है. लेकिन ये मानना तार्किक होगा कि कुछ हद तक पृथ्वी के जीवाणु वहां पहुंचे होंगे. ये देखा जा चुका है कि अत्यधिक छोटे जीवाणु अंतरिक्ष के मुश्किल माहौल का सामना कर सकते हैं. और बैक्टीरिया के बीजाणु तो लाखों सालों के बाद भी सुप्त अवस्था में बचे रह सकते हैं. पृथ्वी की जद में अगर रहने लायक कोई जगह है तो वो यूरोपा मंगल और टाइटन हैं-बेशक इन तीनों पर ही पानी की मौजूदगी संभव है लेकिन वो यहां पहुंचने वालों को नजर नहीं आई है. यूरोपा का समुद्र बर्फ़ीले कणों से ढका है जिसकी सतह मोटी और अभेद्य भी हो सकती है. वार्थ कहती हैं कि हो सकता है कि वहां कभी द्रव रूपी पानी रहा हो लेकिन बाद में ये बर्फ के रूप में जम गया. वह कहती हैं ये भी माना जाता है कि यूरोपा नाम का ये चंद्रमा अतीत में हाल में कुछ समय पहले तक कुछ गर्म भी रहा हो. मंगल पर पिछले साढ़े तीन बिलियन बरसों में बहते हुए पानी को नहीं देखा गया-जो पृथ्वी के लोगों के लिए भविष्य में जिंदगी की सबसे बड़ी उम्मीद भी माना जा रहा है. लेकिन क्या ऐसा भी हो सकता है कि जीवन की यात्रा मंगल से पृथ्वी की ओर आई होशुरुआती मंगल का वातावरण पहले गरम और गीला प्रतीत होता है-जो जीवन के विकास की मुख्य स्थिति होती है. वार्थ कहती हैं यदि मंगल के वातावरण में कभी जीवाणु रहे हों और तो संभव है कि वो भी उल्कापिंडों की दोनों ग्रहों के बीच भारी आवाजाही के ज़रिए पृथ्वी तक पहुंचे हों. हमारे ग्रहीय प्रक्रिया की शुरुआत के समय अरबों उल्काएं मंगल से पृथ्वी की ओर आकर गिरी होंगी. यहां तक कि ये भी संभव है कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति मंगल से हुई हो. प्रुड यूनिवर्सिटी के खगोलजैवकीय के प्रोफ़ेसर जे मेलोश कहते हैं कि हालांकि वार्थ की टीम पेंसपर्मिया के बारे में गणना करने वाली कोई पहली टीम नहीं है. उनकी दस लाख सालों की यात्रा अब तक की सबसे बड़ी है. वह कहते हैं ये अध्ययन मज़बूती से इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि बड़े प्रभावों के जरिए कभी धरती और मंगल की सतह से बड़े पैमानों पर पदार्थों के निकलकर अंतरिक्ष के ज़रिए पृथ्वी और मंगल पर पहुंचने की बड़ी घटनाएं हुई हैं. और इनसे उत्पन्न मलबे ने आराम से एक ग्रह से दूसरे ग्रह का रास्ता पा लिया. हांलाकि वह ये भी कहते हैं चिक्सुलुब प्रभाव कोई बहुत बेहतर दावा नहीं है क्योंकि ये समुद्र में 50 मीटर से 500 मीटर नीचे हुआ. बेशक इससे समुद्र की तलहटी पर रहने वाले जीव-जंतु निकलकर अंतरिक्ष में पहुंचे हों लेकिन इससे शायद ही ठोस चट्टानें अंतरिक्ष की ओर गई हों. |
| DATE: 2013-12-20 |
| LABEL: science |
| [148] TITLE: तकनीक करेगी शरणार्थियों की दिक्कतें कम |
| CONTENT: शरणार्थी और बेघर लोग संभवतः दुनिया के सबसे कमज़ोर लोग होते हैं. इन्हें कई साल तक एक कुटिया में बेहद मुश्किल परिस्थितियों- तेज़ गर्मी बाढ़ संचार के साधनों के बिना या बहुत कम साधनों से साथ रहना पड़ता है. एक शरणार्थी को औसतन 12 साल रिफ़्यूजी कैंप में गुज़ारने पड़ते हैं लेकिन वर्तमान में उपलब्ध टैंटों की ज़िंदगी सिर्फ़ छह महीने के करीब होती है. हालांकि तकनीक इन परिस्थितियों को सुधार सकती है. इथियोपिया के डोलो अदो कैंप में सोमालिया के परिवार नई झोपड़ियों के प्रारूप को परख रहे हैं. यह सीधे खड़े हैं और सौर ऊर्जा से चलते हैं. सौर ऊर्जा पैनलों की तीन साल की ज़िंदगी की गारंटी है और स्टील फ़्रेम की उम्र 10 साल है. इन झोपड़ियों को संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थियों के लिए उच्चायुक्त यूएनएचसीआर और आईकिया फ़ाउंडेशन से संयुक्त प्रोजेक्ट के तहत बनाया गया है. दुनिया भर के 4-50 करोड़ शरणार्थियों और देश के अंदर विस्थापित लोगों की मुश्किलें कम करने के लिए यूएनएचसीआर नए तरीकों की खोज का मार्ग प्रशस्त कर रहा है. इसने नई खोजों और तकनीक के लिए समर्पित एक विभाग बनाया है. जिसे यूएनएचसीआर इनोवेशन कहते हैं. इसके प्रमुख ओलिवियर डेलारू उत्साहपूर्वक बताते हैं कि उनकी ज़िम्मेदारी शरणार्थियों को कई तरह से सक्षम बनाना है जिसमें अच्छी शिक्षा तक उनकी पहुंच बनाना और आजीविका के वास्तविक मौके दिलाना शामिल है. अपने गठन के सिर्फ़ 18 महीने में यूएनएचसीआर इनोवेशन ने कई नई योजनाएं शुरू करने के लिए महत्वपूर्ण साझेदारियां करनी शुरू की हैं और विस्थापित लोगों की ज़िंदगी सुधारने के लिए तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया है. आईकिया फ़ाउंडेशन के साथ गठबंधन के अलावा इसने विश्वव्यापी कुरियर सर्विस यूपीएस के साथ हाथ मिलाया है ताकि गैर खाद्य पदार्थों और सेवाओं की आपूर्ति का एक तंत्र विकसित किया जा सके. डेलारू बताते हैं हम एक मोबाइल उपकरण के ज़रिये सेवाओं को ट्रैक कर रहे हैं ताकि अगर हम किसी शरणार्थी के पास किसी सेवा की आपूर्ति करें तो इस तंत्र को पता रहे कि दरअसल क्या हुआ है. लाइवकनेक्ट नाम की इस सुविधा को फ़िलहाल इथियोपिया में जांचा जा रहा है और अंततः इससे यूएनएचसीआर को उन सभी गैर-खाद्य पदार्थों को ट्रैक कर पाने में सफलता मिलेगी जिसकी इसके या किसी सहयोगी द्वारा आपूर्ति की गई है. अपने परिवार और दोस्तों से बिछुड़ना शरणार्थियों की एक और बड़ी दिक़्क़त होती है. डेनमार्क के दो भाई डेविड और क्रिस्टोफ़र मिक्केलसेन ने 2008 में शरणार्थियों के लिए एक परिवार को खोजने वाला मंच रिफ़्यूजीज़ यूनाइटेड बनाया. इसकी प्रेरणा उन्हें एक युवा अफ़गान शरणार्थी से मुलाकात के बाद मिली जो अपने परिवार को ढूंढ रहा था. वर्ष 2010 में यह सिस्टम एक मुफ़्त मोबाइल सेवा के माध्यम से उपलब्ध हो गया. लोग इसमें सबसे सस्ते फ़ोन के ज़रिए भी एसएमएस से जानकारियां देकर इसमें रजिस्टर कर सकते हैं और उस जानकारी से मिलान कर सकते हैं जो उन्हें ढूंढने वाले लोगों ने दी है. डेविड मिक्केलसेन कहते हैं पूर्वी अफ़्रीका में हमारा सबसे बड़ा सहयोगी केन्याई रेड क्रॉस है जो हमारे तरीकों का इस्तेमाल करने से पहले साल भर में 700 मामले सुलझाता था. अब अक्सर हम एक दिन में 700 मामले सुलझा लेते हैं और वह भी कम लागत पर. रिफ़्यूजी यूनाइटेड के मंच का इस्तेमाल अब यूएसएसडी के माध्यम से भी किया जा सकता है. यह एक तरह का टेक्स्ट मैसेज का सिस्टम होता है जो एक टोल फ़्री नंबर के माध्यम से काम करता है- जिसमें कई भाषाओं के ऑपरेटर होते हैं. इसके अलावा यह ऑनलाइन भी होता है. कीनिया में इसके रजिस्टर यूज़र्स की संख्या हाल ही में 250000 पहुंच गई है. ये लोग केन्या भर से हैं जहां अनुमानतः 500000 विस्थापित लोग हैं. दक्षिण अफ़्रीका स्थित प्रेकेल्ट फ़ाउंडेशन ऐसी मोबाइल तकनीक विकसित करने पर समर्पित है जो समाज के वंचित लोगों के लिए काम कर रही गैर सरकारी संस्थाओं को मदद करे. प्रेकेल्ट ने एक मोबाइल मैसेजिंग मंच वुमि तैयार किया है जो संगठनों को बड़े पैमाने पर मैसेजिंग की एप्लिकेशंस विकसित करने में मदद करता है. प्रेकेल्ट फ़ाउंडेशन के मुख्य इंजीनियर सिमोन दि हान कहते हैं मुझे लगता है कि भविष्य में हमारे पास ऐसा ढांचा होगा जिससे हम सूचना तक पहले के मुकाबले कई गुना तेज रफ़्तार से पहुंच स्थापित कर सकते हैं. लेकिन ओलिवीयर डेलारू कहते हैं नई तकनीकों का आयात करना अपने आप में कोई हल नहीं है. बल्कि यह अपनी तरह से दिक्कतों को सुलझाने की कोशिश कर रहे समाज के साथ काम करने और कोशिशों को बढ़ाने का ज़रिया है. |
| DATE: 2013-12-20 |
| LABEL: science |
| [149] TITLE: किसने खोला मिट्टी के टीलों का राज़? |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने पृथ्वी अजीबो-गरीब संरचनाओं में से एक मीमा माउंड्स यानी मिट्टी के टीलों के रहस्य पर से पर्दा उठाने का दावा किया है. ये भौगोलिक संरचनाएं छोटी गोलकार टीले जैसी होती हैं जो एक विशाल भूभाग में फैली हैं. लेकिन वर्षों से वैज्ञानिक इनके रहस्य को समझने के लिए माथापच्ची कर रहे हैं. अब एक नए शोध में दावा किया गया है कि बिल खोदने वाले बहुत छोटे जीव इसके वास्तुकार हैं. शोध के नतीजों को सैन फ्रांसिस्को में अमरीकन जियोफिजिकल यूनियन फॉल मीटिंग में पेश किया जाएगा. मीमा माउंड्स का आकार सात फ़ीट तक ऊंचा और व्यास 160 फ़ीट तक होता है. ये पूरी दुनिया भर में पाए जाते हैं लेकिन ये उत्तरी अमरीका में बहुतायत में हैं. कुछ इलाक़ों में तो ये लाखों की संख्या में पाए जाते हैं और कई किलोमीटर तक के फैले रहते हैं. शोधकर्ताओं की टीम का नेतृत्व करने वाले और सैन जोस स्टेट यूनिवर्सिटी से जुड़े डॉक्टर मैनी गैबेट ने बीबीसी से कहा मीमा माउंड्स का रहस्य आज तक कोई नहीं जान पाया कि ये आख़िर बनते कैसे हैं उन्होंने कहा पिछली कई सदियों से लोग सोचते आए हैं कि ये स्थानीय अमरीकियों की कब्रें हो सकती हैं या फिर भूकंप या ग्लेशियर के कारण इन संरचनाओं का निर्माण हुआ है. यहां तक कि कुछ लोग इन्हें किसी दूसरे ग्रह की संरचनाएं तक मानते रहे हैं. हालांकि डॉक्टर गैबेट कहते हैं कि वो इस बात को लेकर निश्चित हैं कि इन रहस्यमयी टीलों को बिल बनाने वाले जीवों ने ही बनाया है. एक कम्प्यूटर प्रोग्राम की सहायता से शोधकर्ताओं ने दिखाया कि कैसे ये जीव सतह के नीचे खुदाई के दौरान मिट्टी को ऊपर फेंकते हैं. उन्होंने पाया कि जल जमाव वाले इलाकों में नमी से बचने के लिए ये जीव मिट्टी को ऊपर की ओर ठेलते हैं. सैकड़ों सालों को दौरान इन जीवों की कई पीढ़ियों की मशक्कत से ये टीले और विशाल होते गए. लेकिन ये विशेष नस्ल के जीव केवल अमरीका में ही पाए जाते हैं जबकि इस तरह के टीले अंटार्कटिका को छोड़कर पूरी दुनिया में पाए जाते हैं. गैबेट का कहना है कि छंछूदर जैसे भूमिगत स्तनपायी जीव इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं. |
| DATE: 2013-12-19 |
| LABEL: science |
| [150] TITLE: अब आंख मारिए और लीजिए गूगल ग्लास से फ़ोटो |
| CONTENT: गूगल ने अपने चश्मे में एक नई सुविधा शुरू की है. इसके जरिए इसे पहनने वाले आंख मारते हुए या पलक झपकाते हुए तवीरें ले सकते हैं. गूगल ने कहा कि यह सुविधा किसी भी कैमरे के बटन और आवाज से काम करने वाले उपकरणों से भी तेज़ी से काम करता है. यह उस समय भी काम करता है जब इसका डिसप्ले बंद होता है. गूगल ग्लास का इस तकनीक से गूगल ग्लास के एक्सई-12 मॉडल को लैस किया है. इसके साथ ही इसमें स्क्रीन को लॉक करने और इसके ज़रिए यू ट्यूब पर वीडियो शेयर करने की भी सुविधा दी गई है. तकनीकी की दुनिया की इस दिग्गज कंपनी की नज़र पहनने लायक गैजट बनाने के बाज़ार पर है इस क्षेत्र को विकास का प्रमुख क्षेत्र माना जा रहा है. गूगल ने कहा है कि उसके चश्मे में पलक झपका कर फ़ोटो खींचने की सुविधा के कई और उपयोग भी हैं. कंपनी ने ब्लॉगस्पॉट पर कहा है आप कल्पना करिए कि आप टैक्सी के पीछे बैठकर कहीं जा रहे हैं और आपकी नज़र मीटर की ओर देखकर बिल का भुगतान करने के लिए केवल अपनी पलक भर झपकाते हैं. इसमें कहा गया है आप किसी जूते की दुकान पर जूते की एक जोड़ी देखकर पलक झपकाते हैं और आपकी नाप के जूते आपके घर भेज दिए जाते हैं. आप खानपान की किसी किताब पर नज़र डालते हैं और निर्देश आपके सामने होते हैं यह पूरी तरह से हैंड्स फ्री है न कोई हड़बड़ी न कोई गड़बड़ी. विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले सालों में पहने जाने लायक तकनीक का बज़ार बहुत तेज़ी से बढ़ेगा. हालांकि विश्लेषकों की इस बाज़ार के आकार को लेकर अलग-अलग राय है. जूनिपर रिसर्च के मुताबिक़ 2018 तक पहने जाने वाली तकनीक की सालाना बिक्री 19 अरब डॉलर का होगी जो कि अभी एक अरब 40 करोड़ डॉलर का है. वहीं बैंक क्रेडिट सुइस के विश्लेषकों के मुताबिक़ 2018 तक इस तरह की तकनीकी का बाज़ार 50 अरब डॉलर का होगा. और सतर्क अनुमान लगाते हुए रिसर्च करने वाली संस्था गार्टनर ने 2016 तक क़रीब 10 अरब डॉलर के पहने जाने वाली तकनीक की बिक्री होने का अनुमान लगाया है. गूगल ने गूगल ग्लास को तेज़ी से बढ़ते पहने जाने वाली तकनीक के बाज़ार के अधिक से अधिक हिस्से पर कब्ज़ा जमाने के उद्देश्य से बाज़ार मे उतारा है. इस साल अक्तूबर में नाइकी ने दूसरी पीढ़ी के कलाई के पट्टे को जारी किया था जो शारीरिक गतिविधियों पर नज़र रखने में उपभोक्ता की मदद करता है. वहीं सैमसंग ने सितंबर में ग्लैक्सी गियर के नाम से एक कलाई घड़ी को बाज़ार में उतारा था इससे केवल आवाज़ के ज़रिए फ़ोन करने की सुविधा और कई तरह के ऐपलिकेशन दिए हुए हैं. सितंबर में ही जापान में टेलीफ़ोन की सेवा उपलब्ध कराने वाली कंपनी एनटीटी डोकोमो ने एक ऐसा चश्मा प्रदर्शित किया था किसी तरह का लिखित पाठ दिखाने पर उसका अनुवाद कर सकता है. इस साल के शुरू में एक अमरीकी कंपनी हीपसाइलोन ने कहा था कि वह एक ऐसा मोजा विकसित कर रही है जो पहनने वाले को दौड़ते या चलते समय संतुलन बनाने में मदद करेगा. वहीं एक चीनी कंपनी शांदा ने एक ऐसी अंगूठी बनाई है जो उसे पहनने वाले के स्मार्टफ़ोन को अनलॉक कर सकती है और उसके फ़ोन से डॉटा को कहीं और भेज सकती है. |
| DATE: 2013-12-18 |
| LABEL: science |
| [151] TITLE: चीन का चांद की छाती पर कदम |
| CONTENT: चीन का रोवर मिशन जेड रैबिट रोबोट चांद की सतह पर पहुंच गया है. दिसंबर के पहले सप्ताह में लान्च किए गए इस मिशन में रोबोटिक रोवर चांद के ज्वालामुखी के पठार वाले क्षेत्र में उतरा है जिसे साइनस इरिडियम कहा जाता है. इससे पहले शनिवार को रोवर से लैस लैंडिंग माड्यूल को सतह पर उतारने के लिए फायर किया गया. चांद के उत्तरी गोलार्ध में चीन का यह कदम उसके महात्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रम की अहम सफलता है. लैंडिंग माड्यूल एक साल तक जबकि रोबोटिक रोवर करीब तीन महीने तक काम करेगा. चांग ई-3 मिशन ज़ीचांग सेटेलाइट लॉन्च सेंटर से विकसित लॉन्ग मार्च 3बी रॉकेट के ज़रिए चीन के दक्षिणी इलाक़े ज़ीचांग से करीब 12 दिन पहले छोड़ा गया था. लैंडिंग के बाद जेड रोवर अलग हो गया जोकि तीन महीने तक सतह का परीक्षण करेगा. आधिकारिक न्यूज एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार भारतीय समयानुसार 6 बजकर 30 मिनट पर छोड़े गया यान करीब 11 मिनट बाद साइनस इरिडियम बे ऑफ़ रेनबोज़ की सतह पर पहुंचा. यूसीएल के मलार्ड स्पेस साइंस लेबोरेटरी से जुड़े प्रोफेसर एंड्र्यू कोट्स ने बीबीसी न्यूज़ को बताया मैंने कुछ साल पहले शंघाई में रोवर का प्रोटोटाइप देखा था. यह एक अद्भुत तकनीकी उपलब्धि है जो चांद तक पहुंची है. चांग ई-3 तीसरा और 40 वर्षों में पहला मानव रहित रोवर मिशन है जो चांद की सतह तक पहुंचा है. इससे पहले 840 किलोग्राम का सोवियत यान लुनोखोद-2 अंतरिक्ष यान चांद पर पहुंचा था जिसे गर्म रखने के लिए प्लूटोनियम का इस्तेमाल हुआ था. हालांकि छह पहियों वाला यह चीनी रोबोटिक रोवर पहले से कहीं अधिक अत्याधुनिक मशीनों से लैस है. इसमें सतह को भेदने वाला रडार है जो मिट्टी और चट्टानों के बारे में जानकारियां इकट्ठा करेगा. 120 किलोग्राम वजन वाला जेड रैबिट रोबोट 30 डिग्री कोण वाली ढलान पर चलने में सक्षम है और इसकी रफ्तार 200 मीटर प्रति घंटे है. इसका नाम एक ऑन लाइन सर्वेक्षण में 34 लाख लोगों के सुझाव पर रखा गया है. यह रोवर चांद के ज्वालामुखी के पठार वाले इलाके का अन्वेषण करेगा. चीन के प्राचीन मिथकीय चरित्र एक चूहे के नाम पर इसका नामकरण किया गया है जो चांद की देवी चांग का पालतू था. रोवर और लैंडिंग माड्यूल सौर्य ऊर्जा द्वारा चालित है. हालांकि कुछ स्रोत स्वीकार करते हैं कि यान को गर्म रखने के लिए इसमें प्लूटोनियम-238 वाले रेडियो आइसोटोप्स हीटिंग यूनिट्स भी लगे हुए हैं. मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक रविवार को किसी एक बिंदु पर लैंडर और रेवर एक दूसरे की तस्वीर भी लेंगे. चीनी अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के अनुसार मिशन को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि इससे नई तकनीक का परीक्षण वैज्ञानिक आंकड़े इकट्ठा करना और विशेषज्ञता हासिल करने जैसे उद्देश्यों को हासिल किया जा सके. इसका एक अहम उद्देश्य चांद पर खनिज पदार्थों की खोज करना है जिसका भविष्य में खनन किया जा सके. शिन्हुआ ने चीन की चंद्र मिशन से जुड़े इंजीनियर सुन हूज़ियान के हवाले से बताया कि यह मिशन अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण अन्वेषण के लिए मानवीय प्रयासों का एक अहम हिस्सा है. इस मिशन के बाद चीन के सतह के नमूनों को 2017 तक पृथ्वी तक लाने की चीन की योजना है. नमूनों के परीक्षण के बाद आगे के रोबोटिक मिशन के बारे में निर्णय होगा जोकि 2020 दशक में एक मानव चंद्र यान के रूप में अस्तित्व में आ सकता है. वाशिंगटन में दक्षिणपंथी थिंक टैंक हेरिटेज फाउंडेशन से जुड़े एक शोधकर्ता देन चेंग ने कहा चीन का यह मिशन उसकी व्यापक राष्ट्रीय शक्ति की अवधारणा के अनुरूप है. इसे राज्य की सर्वांगीण क्षमता के रूप में भी समझा सकता है. हालांकि उनका कहना है कि चीन खुद को किसी के साथ अंतरिक्ष दौड़ के रूप में नहीं देखता है. 1950 और 1980 के दशक में जिस तरह अमरीका और सोवियत अंतरिक्ष दौड़ में एक दूसरे को पछाड़ने के लिए लगभग हर महीने कोई न कोई लांचिंग करते थे वैसी प्रतिद्वंद्विता चीन के साथ नहीं दिखाई देती. इसकी अपेक्षा चीन ने बहुत व्यवस्थित और धैर्य के साथ उन क्षेत्रों में काम किया जो अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए जरूरी हैं. लांचर और पृथ्वी की कक्षा में मानव अभियान से लेकर मानव रहित अंतरग्रहीय यान तक चरणबद्ध रूप से विकसित किया और उसने इसमें भारी मात्रा में धन निवेश किया. चेंग के अनुसार चीन कहता है हमने वह किया है जिसे दुनिया की दो शक्तियां ही कर पाईं- अमरीका और सोवियत संघ. |
| DATE: 2013-12-15 |
| LABEL: science |
| [152] TITLE: अब स्तन कैंसर का सस्ता और कारगर इलाज! |
| CONTENT: एक नए ऐतिहासिक अध्ययन में कहा गया है कि जिन महिलाओं को स्तन कैंसर की आशंका अधिक होती है उनमें एक दवा इस आशंका आधे से कम कर सकती है. लांसेट में छपे इस अध्ययन में 4000 महिलाएं शामिल हुईं. इसमें पाया गया कि एनस्ट्रोज़ोल नाम की दवा स्तन कैंसर की मौजूदा दवाओं से ज्यादा कारगर सस्ती और कम साइड इफेक्ट वाली है. एनस्ट्रोज़ोल स्तन कैंसर को बढ़ावा देने वाले एस्ट्रोजन हार्मोन को बनने से रोकती है. इस दवा का पता लगने के बाद अब डॉक्टर और स्तन कैंसर के लिए अभियान चलाने वाले कार्यकर्ता स्वस्थ महिलाओं को यह दवा देने की वकालत कर रहे हैं. कुछ देशों में स्तन कैंसर से बचाने के लिए पहले से ही टेमोक्सिफ़ेन और रेलोक्सिफ़ेन दवाओं का इस्तेमाल हो रहा है. एनस्ट्रोज़ोल जैसी दवाएं एस्ट्रोजन हार्मोन को बनने से ही रोक देती हैं और पहले ही स्तन कैंसर के इलाज के लिए इस्तेमाल भी की जा रही हैं. लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी के अध्ययन में उन महिलाओं को शामिल किया गया है जिनमें उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर स्तन कैंसर होने का खतरा ज्यादा पाया गया. पांच साल तक इनकी निगरानी की गई. अध्ययन में ये बात सामने आई कि स्तन कैंसर की आशंका वाली जिन 2000 महिलाओं को कोई इलाज नहीं मुहैया करवाया गया उनमें से 85 में स्तन कैंसर पाया गया. मगर इसी संख्या में महिलाओं को एनस्ट्रोज़ोल दवा दी गई तो 40 महिलाओं को कैंसर का पता चला. और कमाल की बात यह कि इस दवा का कोई साइड इफ़ैक्ट नहीं पाया गया. इस अध्ययन के अगुआ प्रोफेसर जैक कुज़ीक़ ने बीबीसी को बताया ये एक रोमांचक पल है. स्तन कैंसर महिलाओं में सबसे आम कैंसर है और इससे छुटकारा पाने का अब हमारे पास कारगर तरीका उपलब्ध है. उन्होंने कहा यह दवा टेमोक्सिफ़ेन जैसी दवाओं से अधिक कारगर है और सबसे ज़रूरी बात ये कि इसका साइड इफ़ैक्ट अपेक्षाकृत कम है. लंदन के कैंसर रिसर्च इंस्टीच्यूट के प्रोफेसर मॉंटसेरत ग्रेसिया भी इस अध्ययन से बेहद उत्साहित हैं. उन्होंने स्तन कैंसर पर दुनिया का सबसे बड़ा अध्ययन किया है. उन्होंने बीबीसी को कहा इससे बेहद ज़रूरी और महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है. लेकिन प्रोफेसर ग्रेसिया कहती हैं अब सवाल ये है कि क्या ये दवा स्तन कैंसर से होने वाली मौतों को रोकने में कामयाब हो पाएंगी. इसका पता लगाने के लिए और अध्ययन का जरूरत है. 80 फीसदी स्तन कैंसर का कारण एस्ट्रोजन है. देखा जाए तो स्तन कैंसर का इलाज यदि टेमोक्सिफ़ेन की मदद से होता है तो खर्च 157 पाउण्ड और यदि एनस्ट्रोज़ोल से की जाए तो खर्चा 137 पाउण्ड तक आने का अनुमान है. हालांकि एनस्ट्रोज़ोल अंडाशय को एस्ट्रोजन पैदा करने से रोक नहीं सकता. इसलिए यह दवा केवल रजोनिवृत्ति के बाद ही कारगर साबित होगी. जबकि टेमोक्सिफ़ेन दोनों अवस्था में काम करती है. साल 2013 में इंग्लैंड और वेल्स में नेशनल इंस्टीच्यूड फ़ॉर हेल्थ एण्ड केयर एक्सिलेंस ने कहा था कि स्तन कैंसर की आशंका वाली 35 साल से अधिक आयु की महिलाओं को टेमोक्सिफ़ेन या रेलोक्सिफ़ेन दवाइयां दी जानी चाहिए. इसका असर करीब 5 लाख महिलाओं पर पड़ा. ब्रिटेन कैंसर अनुसंधान ने अनुमान लगाया है कि उनमें से 240000 को एस्ट्रोजोल देना ज्यादा उचित रहेगा. ब्रिटेन कैंसर अनुसंधान से जुड़ी क्लिनिकल रिसर्च की निदेशक केट लॉ का कहना है इस उल्लेखनीय अध्ययन से पता चलता है कि एस्ट्रोजोल उन महिलाओं के लिए बहुत मूल्यवान है जिनमें स्तन कैंसर होने की आशंका अत्यधिक होती है. लेकिन इसके बाद हमें ज्यादा सटीक परीक्षणों की जरूरत है जो ये पता लगाएगें कि किस महिला को एस्ट्रोजोल से ज़्यादा फ़ायदा पहुंचेगा और किसे साइड इफ़ैक्ट कम होगा. |
| DATE: 2013-12-15 |
| LABEL: science |
| [153] TITLE: अब हाईटेक सेंसर रोकेंगे मोटापा |
| CONTENT: हाईटेक सेंसर्स की रेंज अब न केवल खाने को मापेगी बल्कि मोटापा से होने वाले ख़तरों से बचाव का काम करेगी. यूरोपीय यूनियन से वित्तीय सहायता प्राप्त इस प्रोजेक्ट का नाम डब्ड स्प्लेनडिड है. ये सेंसर्स युवाओं को स्वास्थ्यप्रद जीवनशैली के बारे में बताने के साथ ही उन्हें स्वास्थयवर्धक भोजन और कसरत के लिए जागरुक करेंगे. इसका प्रोजेक्ट का उद्देश्य तकनीकी के इस्तेमाल से हेल्थकेयर में बचाव के तरीकों को तैयार करना है. मोटापे के कारण हर साल दुनिया में करीब 28 लाख वयस्कों की मौत हो जाती है. प्रोजेक्ट के सह-संयोजक प्रोफेसर एनासतासिस डेलोपोलस कहते हैं विचार ये है कि मोटापे से बचाव और खाने की गड़बड़ियों को लेकर जांच की कोशिश की जाए. डेलोपोलस ग्रीस के थेसालोनिकी में एरिस्टोल यूनिवर्सिटी के इलैक्ट्रिकल और कंप्यूटर इंजीनियरिंग विभाग में काम करते हैं. इस सिस्टम का परीक्षण स्वीडन और नीदरलैंड के बच्चों पर किया गया है. सेंसर भोजन करने की गति को मापने के साथ ही यह भी देखेगा कि भोजन किस तरह चबाया जा रहा है. प्रोफेसर डेलोपोलस के अनुसार भोजन करने में लिया गया समय भी मोटापे के जोखिम पहलुओं में एक है. इसका मापन एक मेंडोमीटर के जरिए होगा जिसे स्वीडन की फर्म एबी मांडो ने बनाया है जो खाने की गड़बड़ियों की जांच से संबंधित क्लीनिक सेट तैयार करता है. सेंसर को एक पैमाने के साथ बनाया गया है जो एक पोर्टेबल कंप्यूटर या स्मार्टफोन से जुड़ा होगा. खाने की प्लेट इस पैमाने पर रखी जाएगी ये प्लेट में कम होते खाने को रिकॉर्ड करेगा खाने की गति तेज होने पर ये तुरंत चेतावनी देगा. स्विस फर्म सीएसईएम दो अन्य सेंसर्स भी विकसित कर रहr है जिसका इस्तेमाल इस प्रोजेक्ट में किया जाएगा. एक्टीस्माइल नाम का सेंसर्स पहना जाने वाला सेंसर होगा पर्याप्त कसरत करने के बाद यह शाबासी देते हुए मुस्कान का सिंबल बनाकर दिखाएगा. साथ ही एक ध्वनि सेंसर भी डिजाइन किया जा रहा है जो पहने जाने वाले माइक्रोफोन के रूप में होगा ये भोजन चबाने के तरीके को रिकॉर्ड करेगा. इस्तेमाल करने वाले इसमें अपने डाटा डाल सकते हैं मसलन खाने के बाद कैसा महसूस कर रहे हैं. रोज की गतिविधि दर्ज करने के लिए लॉगबुक भी साथ होगी. सभी तरह के डाटा परिष्कृत होंगे. इनसे खाने में गड़बड़ी और मोटापे के जोखिम का मूल्यांकन होगा. बाद के ट्रायल स्टेज में युवाओं के खाने के जोखिम और व्यायाम में बदलाव की मदद के लिए सेंसर का इस्तेमाल होगा. प्रोफेसर डेलोपोलस कहते हैं हमारा लक्ष्य खाने के तरीकों को सुधारना और संबंधित व्यक्तिगत व्यवहार को बेहतर करना है. वह कहते हैं एक मेडिकल एक्सपर्ट लक्ष्य तय करेगा मसलन खाना धीमे खाएं या ज्यादा शारीरिक गतिविधियों करें. सेंसर ये भी देखेगा कि कोई शख्स कितना सफल हो रहा है. एक हेल्थकेयर एजुकेशन प्रोग्राम फ्यूचरमेड में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और पेशे से डॉक्टर डेनियल क्राफ्ट का मानना है कि इस सेंसर को हेल्थकेयर के साथ एकीकृत किया जाएगा. वह साथ ही ये भी कहते हैं स्केल के साथ हेल्थकेयर को जोड़ देने पर रोगियों को अपने हेल्थकेयर डाटा को समझने में मदद मिलेगी जो उनके लिए फायदेमंद होगा. |
| DATE: 2013-12-13 |
| LABEL: science |
| [154] TITLE: जानवरों में सबसे ज्यादा भावुक कौन? |
| CONTENT: जब कोई हाथी मर जाता है तो क्या उसके परिवार के दूसरे हाथी दुखी होते हैं एक बिल्ली अपनी सगी बहन को खोने पर क्या उसी तरह शोक करती है जिस तरह इंसान शोक करता है विलियम एंड मेरी कॉलेज में मानव विज्ञान की एक प्रोफेसर बारबरा जे किंग ने अपनी नई किताब हाउ एनीमल्स ग्रीव में ऐसे ही कुछ सवालों की पड़ताल की है. बारबरा कहती हैं दु्ख व्यक्त करने वाले जानवरों में हाथी सबसे ज्यादा भावुक प्रजाति है. वे बताती हैं एक शोधकर्ता ने हाथी के एक शव को रेत में छोड़ दिया और पाया कि हाथियों के पाँच अलग-अलग परिवार उस हाथी के शव के पास आये और उन्होंने अलग-अलग तरीके से अपनी भावनायें व्यक्त की. किसी ने हाथी के शव के चारों ओर घूमकर तो किसी ने मरे हुए हाथी की हड्डियां अपनी सूंड़ पर उठाकर दु्ख व्यक्त किया. प्रोफेसर किंग ने अपनी किताब में अध्ययन के सहारे व्याख्या की है कि जंगलों में रहने वाले बंदरों से लेकर पालतू खरगोशों तक अपने साथियों को खोने के बाद शोक व्यक्त करने का कौन सा तरीका अपनाते हैं. बारबरा के मुताबिक उन्होंने दो ऐसी बिल्लियों का भी अध्ययन किया जो बहनें थी और एक के मर जाने पर दूसरे ने लम्बे समय तक उसके शव को नहीं छोड़ा. हालांकि वह यह नहीं मानती कि जानवर भी इंसानों की तरह ही शोक व्यक्त करते हैं. लेकिन उनके अनुसार कुछ प्रजातियों में दुख की बहुत ही वास्तविक भावनाऐं होती हैं और कुछ दुख प्रकट भी करते हैं. प्रोफेसर बारबरा के साथ बीबीसी संवाददाता ने जानवरों में इन भावनाओं को और विस्तार से जानने के लिए वर्जीनिया प्राणी उद्यान का दौरा भी किया. |
| DATE: 2013-12-12 |
| LABEL: science |
| [155] TITLE: अठखेलियां करते पृथ्वी और चंद्रमा |
| CONTENT: अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने एक अद्भुत फ़िल्म जारी की है जिसमें पृथ्वी और चंद्रमा एक साथ अंतरिक्ष में घूम रहे हैं. इस फ़िल्म में पृथ्वी और उसके उपग्रह चंद्रमा को एक साथ दिखाया गया है. इसे बृहस्पति की ओर जा रहे उपग्रह जूनो ने उस समय खींचा जब वो अक्टूबर में पृथ्वी के करीब से गुजर रहा था. इस फ़िल्म में पृथ्वी को अपनी धुरी पर घूमते हुए देखा गया जबकि चंद्रमा उसके पीछे से गुजर रहा था. जूनो के मुख्य वैज्ञानिक स्कॉट बॉल्टन ने बताया कि इस चित्र के जरिए लोग ब्रह्मांड में अपनी स्थिति के बारे में अनुमान लगा सकेंगे. जूनोकी फ़िल्मों में पृथ्वी और चंद्रमा की गति संबंधी कई दूसरे दृश्य भी लिए गए हैं. बॉल्टन ने बीबीसी न्यूज़ को बताया मनुष्य पृथ्वी और चंद्रमा को गति की अवस्था खगोलीय नृत्य करते हुए देख सकते हैं. उन्होंने बताया आपको याद होगा कि कुछ साल पहले कार्ल सगन ने एक तस्वीर ली थी जिसे उन्होंने पाले ब्लू डॉट नाम दिया और उन्होंने बेहद महत्वपूर्ण बात कही कि हम जो कुछ भी जानते हैं वो इस छोटे से बिंदु में है. और मैं सोचता हूं कि हमारी फ़िल्म ने भी वही काम किया है लेकिन महज एक तस्वीर की बजाए एक फ़िल्म के जरिए. बॉल्टन सैन फ्रांसिस्को में अमरीकन जियोफिजिक्स यूनियन एजीयू की बैठक को संबोधित कर रहे थे. यह पृथ्वी और ग्रहों के अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों का सबसे बड़ा राजनीतिक सम्मेलन है. यह फ़िल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है. इस फ़िल्म के साथ सुनाई देने वाले संगीत की रचना जाने-माने फ़िल्म संगीतकार वेंजेलिस ने की है. जूनो का प्रक्षेपण पांच अगस्त 2011 को फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से किया गया था. इस उपग्रह के प्रक्षेपण के लिए जिस वक्र रास्ते को चुना गया था उसके तहत इस अंतरिक्षयान को इस साल नौ अक्टूबर के आसपास दोबारा पृथ्वी के करीब से लौटना था. इस मिशन से जुड़े वैज्ञानिकों को लगा कि पृथ्वी से गुजरने के दौरान तस्वीर उतारने का एक बेहतरीन मौका मिल सकता है. उन्होंने इस दौरान कई तस्वीरें लेने के लिए जूनो में एक कैमरा प्रणाली की प्रोग्रामिंग की. यह उस उपग्रह के मुख्य कैमरा प्रणाली का हिस्सा नहीं थी लेकिन इसे तारों की तस्वीरें लेने के लिए लगाया गया था. अभियान दल से जुड़े लोग बताते हैं कि इसका रेज़लूशन काफी कम है और काफी कम डाटा ही ऐसा होता है जिसके जरिए फ़िल्म बनाई जा सकती है. यह तस्वीर थोड़ी स्वप्निल लगती है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि हम उससे पूरी तरह से परिचित हैं. दृश्य में बाईं तरफ से तस्वीर पृथ्वी और चंद्रमा का प्रवेश होता है और इस समय जूनो उनसे करीब दस लाख किलोमीटर दूर है. यह दूरी पृथ्वी और चंद्रमी के बीच की दूरी का तीन गुना है. जब चंद्रमा धीमे-धीमे दाईं ओर बढ़ता है उसके साथ ही पृथ्वी जूनो के नज़दीक आती जाती है और इतना नज़दीक कि जूनो को अपना बचाव करने के लिए अचानक रास्ता बदलना पड़ता है. इस अभियान से जुड़े कोपेनहेगन स्थित डेनिश टेक्निकल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक जॉन जॉरगेंनसन बताते हैं इस तरह के निम्न प्रकाशीय कैमरे की एक खासियत यह है कि हम इसे इस तरह समायोजित कर सकते हैं ताकि किसी बेहद चमकीली वस्तु की भी तस्वीरें ली जा सके. बृहस्पति पर पहुंचने पर जूनो अपने सौर मंडल के सबसे बड़े ग्रह की उत्पत्ति और उसके विकास के बारे में अध्ययन करेगा. इस मिशन से सौर मंडल के बारे में हमारी जानकारी और पुख्ता हो सकेगी. |
| DATE: 2013-12-11 |
| LABEL: science |
| [156] TITLE: सही रास्ते पर लौटा इसरो का मंगलयान |
| CONTENT: भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने अपने महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष अभियान मंगलयान को सही पथ पर बनाए रखने के लिए उसकी गति की दिशा में सुधार किया है. इसरो ने एक बयान में कहा है यान के पहले पथ सुधार कवायद टीसीएम को सुबह छह बजकर 30 मिनट पर पूरा कर लिया गया. इसके लिए 22 न्यूटन थ्रस्टर्स को 40-5 सेकेंड तक दागा गया. अंतरिक्ष यान इस समय पृथ्वी से करीब 29 लाख किलोमीटर की दूरी पर है. यह कवायद अंतरिक्ष यान को लाल ग्रह की ओर सही दिशा में बनाए रखने के लिए की गई है. इसरो ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है कि मार्स ऑर्बिटर मिशन एमओएम के प्रचालक अंतरिक्ष यान की गति को माप रहे हैं और आवश्यक संशोधनों के जरिए उसे सही रास्ते पर बनाए रखने का काम कर रहे हैं. इसरो ने आगे कहा है इस आधार पर फाइरिंग की अवधि और डेल्टा-वी की गणना की गई ताकि विचलन को सही किया जा सके. पथ सुधार कवायद के दौरान एमओएम के ऐक्सेलरोमीटर ने डेल्टा-वी के हासिल होने की सूचना दी. इसरो ने कहा कि इस कवायद को यान के कंप्यूटर ने ही पूरा किया और इस दौरान अंतरिक्ष यान तक संकेतों के जाने और वापस लौटने में कुल 20 सेकेंड का समय लगा. इस मिशन के जरिए इस लाल ग्रह की कक्षा तक पहुंचने की भारत की क्षमताएं साबित होंगी. करीब 450 करोड़ रुपये की लागत वाला यह यान मंगल के वायुमंडल में मीथेन गैस का पता लगाने के साथ ही कई अन्य प्रयोग भी करेगा. इससे पहले एक दिसंबर को यह यान मंगल ग्रह की 68 करोड़ किमी लंबी यात्रा पर निकला था. इसे 24 सितंबर 2014 को अपने निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचना है. 1350 किग्रा वज़नी मंगलयान के पांच नवंबर को प्रक्षेपित किया गया था और उसके बाद कई बार इंजन चलाकर उसकी कक्षा को बढ़ाया गया था. मंगलयान की कक्षा को बढ़ाने के दौरान चौथे दौर में कुछ दिक़्क़त आई थी क्योंकि तरल ईंधन थ्रस्टर में समस्या के कारण यान को अपेक्षित गति नहीं मिल पाई थी. हालांकि इस समस्या को दूर कर लिया गया. |
| DATE: 2013-12-11 |
| LABEL: science |
| [157] TITLE: अलग-अलग ग्रहों से आए हैं पुरुष और महिलाएं? |
| CONTENT: अमरीकी शोधकर्ताओं के अनुसार महिलाओं और पुरुषों के मस्तिष्क की बुनावट बुनियादी रूप से अलग है. अंग्रेज़ी में एक कहावत है कि मैन आर फ़्रॉम मार्स वीमेन आर फ़्रॉम वीनस यानी पुरुष मंगल ग्रह से और महिलाएं शुक्र से आई हैं. लेकिन इन दोनों के मस्तिष्क पर हुए एक अध्ययन का मानना है कि एक मायने में यह सही हो सकता है. एक ताज़ा अध्ययन में पाया गया है कि पुरुषों और महिलाओं के मस्तिष्क की बुनावट इस क़दर भिन्न है कि लगता है कि दोनों ही अलग-अलग ग्रह की प्रजातियां हैं. पुरुषों के मस्तिष्क की बुनावट आगे से पीछे की ओर होती है और दोनों हिस्सों को जोड़ने के लिए कुछ ही तंतु होते हैं जबकि महिलाओं के मस्तिष्क में तंतु बाएं से दाहिने और दाहिने से बाएं तिरछे एकदूसरे से जुड़े रहते हैं. पुरुषों के मस्तिष्क में जहां तंत्रिका तंतु अपेक्षाकृत ज़्यादा होते हैं वहीं महिलाओं में न्यूरॉन कोशिकाएं रखने वाला ग्रे मैटर का हिस्सा ज़्यादा होता है. पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय से जुड़े अमरीकी वैज्ञानिकों के अनुसार मस्तिष्क संरचना की बुनावट में इस भिन्नता से पुरुषों और महिलाओं के अलग-अलग व्यवहार एवं कौशल को समझा जा सकता है. इस शोध की अगुवाई करने वाली डॉक्टर रागिनी वर्मा का कहना है कि पुरुषों के मस्तिष्क की बुनावट धारणा और कार्य में सामंजस्य बैठाने के लिए बेहतर है. पुरुषों के मस्तिष्क का हेमीस्फियर बाहर से जबकि महिलाओं में यह अंदर से ज्यादा जुड़ा होता है. जबकि महिलाओं का मस्तिष्क विचार प्रक्रिया विश्लेषण और अंतर-दृष्टि के लिहाज से दिल और दिमाग को एकीकृत उपयोग के लिए ज़्यादा उपयुक्त है. पहले हुए शोध में बताया गया था कि पुरुषों में महिलाओं की अपेक्षा चालक और स्थानिक क्षमता ज्यादा होती है. उदाहरण के लिए एक शल्य चिकित्सक को हाथों से बारीक सर्जरी करने के लिए बेहतर चालक क्षमता की ज़रूरत होती है. त्रिआयामी वस्तुओं की पहचान के लिए जिम्मेदार स्थानिक क्षमता नक्शों को पढ़ने और कार पार्किंग में मदद करती है. इस शोध में दूसरी तरफ महिलाओं में बेहतर याददाश्त और सामाजिक सूचनाओं को व्यवस्थित करने की बेहतर दक्षता दिखाई गई थी. महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा ज़्यादा दक्षता से दिमाग पढ़ सकती हैं. साथ ही वे बारीक मनोवैज्ञानिक छल के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होती हैं. नए शोध के बारे में प्रोसीडिंग ऑफ दि नेशनल एकेडमी जर्नल में प्रकाशित हुआ है. यह शोध आठ से 22 वर्ष उम्र के क़रीब 1000 बच्चों और युवाओं के ब्रेन स्कैन के अध्ययन पर आधारित है. वैज्ञानिकों ने एक विशेष प्रकार की एमआरआई मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग की मदद से मस्तिष्क के अंदर न्यूरॉन्स की संरचनागत बुनावट की जांच की. इस नई तकनीक का नाम डीटीआई डिफ्यूजिंग टेंसर इमेजिंग है. इस तकनीक ने मस्तिष्क के ह्वाइट मैटर की मैपिंग करने को संभव बनाया. ह्वाइट मैटर में केबल वायरिंग की तरह तंत्रिका तंतु होते हैं जिनमें त्रिआयामी संदेश होकर गुजरते हैं. अध्ययन से पता चला कि मनुष्य के मस्तिष्क की संरचनागत बुनावट में बुनियादी लैंगिक भेद है. शोधकर्ताओं के अनुसार व्यवहार की जांच में प्रभावी लैंगिक भेद देखने को मिला. एकाग्रता शब्द एवं चेहरे याद रखना और सामाजिक बंधनों को याद रखने के मामले में महिलाओं ने पुरुषों को काफ़ी पीछे छोड़ दिया. पुरुष स्थानिक क्षमताओं मसलन सामंजस्यपूर्ण कार्रवाइयों के मामले में बेहतर दिखे. वैज्ञानिकों ने 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में जो लैंगिक भेद चिन्हित किए थे वो 14 से 17 वर्ष की उम्र में ज़्यादा प्रभावी हो गए. मस्तिष्क के एक ख़ास हिस्से जिसे सेरीबेलम कहते हैं में उल्टी वायरिंग दिखी. पुरुषों में इस हिस्से में ज़्यादा कनेक्टिविटी दिखी जबकि महिलाओं इस हेमिस्फियर के अंदर ज़्यादा कनेक्टिविटी दिखी. |
| DATE: 2013-12-10 |
| LABEL: science |
| [158] TITLE: आप जानते हैं, कहाँ है धरती पर सबसे ठंडी जगह? |
| CONTENT: एक उपग्रह ने धरती पर सबसे ठंडी जगह का पता लगा लिया है वहां का तापमान शून्य से 93-2 डिग्री सेल्सियस नीचे यानी करीब माइनस 135-8 फ़ेहरनहाइट है. शायद आपका अंदाज़ा बिल्कुल सही है ये जगह अंटार्कटिका के ठीक बीच में है. ये तापमान 10 अगस्त 2010 को रहा था. शोधकर्ताओं का कहना है कि ये आँकड़ा शुरुआती है संभावना है कि जब वे अंतरिक्ष में मौजूद थर्मल सेंसर की मदद से आंकड़ों को और खंगालेंगे तो शायद इससे भी कम तापमान के बारे में पता चले. इससे पहले अंटार्कटिका में सबसे कम तापमान 89-2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था. ये तापमान रूस के वोस्तोक बेस में 21 जुलाई 1983 को दर्ज हुआ था. यहां ये बताना ज़रूरी है कि 1983 का आंकड़ा सतह से कुछ मीटर की ऊंचाई पर मौजूद हवा का था जबकि उपग्रह से मिला आंकड़ा बर्फ़ की सतह का है. लेकिन ये बिल्कुल तय माना जा रहा है कि इसी जगह का हवा का तापमान भी 1983 में दर्ज तापमान से कम ही होगा. अमरीका के कोलोरैडो के नेशनल स्नो एंड आइस डेटा सेंटर के टेड स्कैमबोस कहते हैं इतने कम तापमान की कल्पना करना ही मुश्किल है. उनके अनुसार मैं इसे इस तरह देखता हूं कि ये तापमान पानी के जमने से उतना ही कम है जितना उबलता हुआ पानी जमते हुए पानी से ज़्यादा होता है. नया तापमान अलास्का या साइबेरिया के तापमान से 50 डिग्री कम है और ग्रीनलैंड की चोटियों से 30 डिग्री कम है. उन्होंने बीबीसी से कहा इसकी तुलना अगर उत्तर अमरीका के कुछ स्थानों की मौजूदा शीत लहर से की जाए तो वो बेहद ज़्यादा लगेगी. डॉक्टर स्कैमबोस ने ये बात सैन फ़्रांसिस्को में अमरीकी जियोफ़िज़िकल यूनियन की बैठक में कही. डॉक्टर स्कैमबोस और उनके साथी पिछले 30 साल से उपग्रहों से मिले आंकड़ों का निरीक्षण कर रहे हैं. उनका कहना है कि अंटार्कटिका में सबसे ज़्यादा ठंड अंधेरे वाले ठंड के महीनों में ऊंचाइयों पर पड़ती है. जहां बेहद सूखी हुई और साफ़ हवा गर्मी को तेज़ी से अंतरिक्ष में चले जाने देती है. ये साफ़ है कि कई बेहद ठंडी जगहें अंटार्कटिका के बेहद अंदर पहाड़ों की चोटियों पर मोतियों की तरह निकली हुई होती हैं. डॉक्टर स्कैमबोस कहते हैं सतह पर ठंडी हुई हवा नीचे बहती है क्योंकि ये घनी होती है और वो इन बेहद छिछली जगहों में चली जाती है. वह कहते हैं अगर आप इनमें से किसी जगह पर खड़े हों तो आपको शायद ही लगे कि आप किसी निचली जगह पर हैं. साल 2010 में जो तापमान दर्ज हुआ था वो इन्हीं दो बिंदुओं के बीच था. इस अध्ययन में इस्तेमाल किया जा रहा एक उपकरण थर्मल इंफ़्रारेड सेंसर है जो हाल ही में लॉन्च किए गए उपग्रह लैंडसैट-8 पर है. इस सेंसर का रेज़ोल्यूशन बहुत ज़्यादा है लेकिन इसके नए होने की वजह वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे मिले आंकड़ों को समझने में वक़्त लगेगा. डॉक्टर स्कैमबोस कहते हैं मैं गिनीज़ को सलाह दूंगा कि वो इस आंकड़े को वर्ल्ड रिकॉर्ड बुक में डालने की जल्दी न करें क्योंकि आने वाले कुछ सालों में आंकड़ों में बदलाव होगा. लेकिन मैं ये कह सकता हूं कि दुनिया में सबसे ठंडी जगहें कौन सी हैं और क्यों हैं. अगर तुलना की जाए तो दुनिया में सबसे ज़्यादा तापमान साल 2005 में दक्षिण पूर्वी ईरान के दश्त-ए-लत रेगिस्तान में दर्ज हुआ था. ये तापमान 70-7 डिग्री सेल्सियस था और इसे भी एक उपग्रह ने ही दर्ज किया था. वहीं सूरज और उसकी परिक्रमा करने वाले ग्रहों में सबसे कम तापमान किसी ऐसे ग्रह या अंतरिक्ष पिंड पर होगा जिसका कोई वातावरण न हो और जो कहीं अंधकार में चक्कर लगा रहा हो. धरती के चंद्रमा पर माइनस 238 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज हो चुका है. |
| DATE: 2013-12-10 |
| LABEL: science |
| [159] TITLE: गोली खाइए, और शुक्राणुओं को 'नजरबंद' कीजिए |
| CONTENT: वो वक्त नजदीक आ रहा है जब पुरुष अपनी महिला साथी के गर्भ ठहर जाने की आशंका से परे सेक्स जीवन का भरपूर आनंद उठा पाएंगे. इस बात की संभावना इसलिए जताई जा रही है क्योंकि आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा तरीका खोज लिया है जिससे सेक्स संबंध पर असर डाले बगैर वीर्य स्खलन को कुछ देर के लिए स्थगित किया जा सकेगा. जानवरों के साथ किए गए परीक्षण में पाया गया कि सेक्स के दौरान बन रहे शुक्राणुओं का भंडारण किया जा सकता है. इस शोध के परिणाम राष्ट्रीय विज्ञान एकेडमी की पत्र-पत्रिकाओं में छपें. पुरुष गर्भनिरोधक गोलियों की तलाश में जुटे वैज्ञानिकों के बीच काफी दिनों से निष्क्रिय शुक्राणुओं की भूमिका पर विचार विमर्श हो रहे हैं. मोनाश विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं में से एक डॉक्टर सबातिनो वेंचुरा बताते हैं शुक्राणुओं को निष्क्रिय करने के लिए जिन दवाइयों का इस्तेमाल किया गया उनके साइड इफेक्ट्स काफी ख़तरनाक पाए गए. इस बात की भी आशंका रही कि ये दवाइयां पुरुषों की प्रजनन क्षमता और सेक्स की इच्छा पर भी बुरा प्रभाव डाल सकती हैं. यही नहीं ये शुक्राणुओं के उत्पादन में स्थायी बदलाव ला सकते हैं. मगर मोनाश की टीम इस मसले पर अलग ढंग से सोचती है. आमतौर पर स्खलन से ठीक पहले शुक्राणु वीर्यकोष से शुक्रवाहिकाओं की मदद से बाहर निकलते हैं. टीम ने कुछ चूहों अपने प्रयोग किए. उन्होंने इन चूहों की अनुवांशिक बुनावट को कुछ इस तरह बदला कि वे शुक्रवाहिकाओं से शुक्राणु निकालने में असमर्थ हो गए. डॉक्टर वेनचुरा ने बीबीसी को बतायाः शुक्राणुओं को एक जगह इकट्ठा किया गया ताकि जब चूहे स्खलित हों तब वहां कोई शुक्राणु उत्सर्जित करने के लिए उपलब्ध ना हो. इस तरह गर्भ ठहरने की नौबत नहीं आई. उन्होंने आगे बताया इस तरीके के उलट शुक्राणुओं को वापस वीर्यकोष में लाया जा सकता है. यह काम हम दवाओं के ज़रिए कर सकते हैं. इसके लिए हमें संभवतः दो दवाओं की ज़रूरत है. अब तक शोध समूहों ने चूहों की प्रजनन क्षमता को बाधित करने के लिए उनके डीएनए में बदलाव कर वैसे दो प्रोटीनों के बनने पर रोक लगाई जिसकी ज़रूरत शुक्राणुओं की आवाजाही के लिए ज़रूरी होती है. शोधकर्ताओं को अब उन दो दवाओं की ज़रूरत है जो इसी तरह का प्रभाव डालें. उनका विश्वास है कि इसमें से पहली दवा तो पहले से ही बनी हुई है जिसका इस्तेमाल दशकों से लोग प्रोस्टेट के आकार को प्रभावित करने के लिए करते आ रहे हैं. हालांकि इन शोधकर्ताओं को दूसरी दवा की तलाश करने में काफी मशक्कत करनी होगी. शायद इसमें दशक लग जाएं. इन सब में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला प्रोटीन रक्त वाहिकाओं को नियंत्रित करने में भी अहम माना जाता है. इसके कारण रक्तचाप और दिल की धड़कन भी प्रभावित होती है. जबकि वर्तमान प्रयोग में इस्तेमाल किए गए चूहों के रक्तचाप में रत्ती भर का ही बदलाव पाया गया. इस बात की भी संभावना जताई जा रही है कि स्खलित वीर्य की मात्रा पर भी असर पड़ सकता है. शेफील्ड विश्वविद्यालय के एंड्रोलॉजी विभाग में वरिष्ठ व्याख्याता डॉक्टर अलान पेसी ने बीबीसी को बतायाः यह काफी अच्छा शोध है. इसमें पुरुषों की लगभग जैविक नसबंदी हो जाती है. यह दवा शुक्राण्ओं को बाहर निकलने से रोक देती है. वे कहते हैं ये अच्छा विचार है. अब देखना ये है इसका लोगों पर क्या असर होता है. |
| DATE: 2013-12-08 |
| LABEL: science |
| [160] TITLE: कैसे आहिस्ता-आहिस्ता जान लेता है पारा? |
| CONTENT: पारा आवर्त सारणी के सबसे गैर भरोसेमंद तत्वों में से एक है. ये नाजुक है बेपनाह खूबसूरत है लेकिन जानलेवा भी है. बीते जमाने में ये माना जाता था कि पारा ही वो पहला पदार्थ था जिसे अन्य धातुएँ बनीं. लेकिन अब इसे लेकर नापसंदगी का आलम कुछ इस कदर बना है कि पारे के इस्तेमाल को रोकने एक अंतरराष्ट्रीय संधी अस्तित्व में आ गई. ये समझना आसान है कि पारे को लेकर ऐसी दीवानगी क्यों हैं. ये इकलौती ऐसी धातु है जो कमरे के सामान्य तापक्रम पर तरल अवस्था में मिल जाती है. और यह उन गिनी चुनी चीजों में शुमार है जो सबसे ज्यादा ललचाने वाली धातु सोना के साथ प्रतिक्रिया करता है. इस प्रक्रिया को देखना भी कम हैरतअंगेज नहीं है. युनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन में केमेस्ट्री के प्रोफेसर एंड्रीय सेला सोने की एक कमजोर सी पत्ती को पारे की एक झिलमिलाती हुई बूंद के ऊपर रखा. मेरी आँखों के सामने ही सोना आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होने लगा. नष्ट होने से पहले सोने की पत्ती किसी चादर की तरह पारे के उस सुनहरे से धब्बे के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई. सेला कहते हैं अब पारे से उसकी गंदगी साफ कर लीजिए. आप देखेंगे कि शुद्ध सोने के अवशेष रह गए हैं. यह सोने और पारे का अजीब सा रिश्ता है जो रसायनों के जानकारों को हमेशा से आकर्षित करता रहा है. सेला बताते हैं पारा इन्सानों पर लंबे समय में असर करने वाला जहरीला धातु है. अन्य जीवों पर भी ये जहरीला है. इसलिए पर्यावरण में पारे की मौजूदगी एक गंभीर मुद्दा है. पर्यावरण में हरेक साल आने वाली पारे की आधी मात्रा ज्वालामुखी फटने से और अन्य भूगर्भीय प्रक्रियाओं से आती है. इसको लेकर हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं. लेकिन बची हुई आधी मात्रा के लिए इन्सान जिम्मेदार हैं. नवपाषाण काल से पारे के लाल सिंदूरी अयस्क का इस्तेमाल रंगने के काम में लाया जा रहा है. बीते दौर के कलाकारों ने पारे का इस्तेमाल तस्वीरें बनाने के लिए किया. इसे तुर्की में स्थित गुफाओं की दीवारों पर बने विशाल जंगली जानवरों की तस्वीरों में देखा जा सकता है. ये जानवर अब लुप्त हो चुके हैं. रोम के लोग पारे का इस्तेमाल खूबसूरती निखारने में किया करते थे. चीनी लोग इसका उपयोग रंग-रोगन के काम में करते थे जबकि मध्यकाल में पारे को मोम के साथ मिलाकर जरूरी कागजात पर मुहर लगाने के काम में इस्तेमाल करते थे. सदियों तक पारे के उपयोग दवाई में भी किया गया. यहाँ तक कि हाल तक पारा ऐंटीसेप्टिक अवसादरोधक दवाईयों में भी प्रयोग में लाया जाता रहा है. बुखार होने की सूरत में शरीर का तापमान नापने के लिए भी पारे वाले थर्मामीटर की जरूरत पड़ती रही है. दाँतों की भराई में भी पारा अछूता नहीं रह पायाय. पारे की कुछ मात्रा जो दवाओं और दाँतों की भराई के दौरान शरीर में रह जाती है वह भी कुछ समुदायों में शव की अंत्येष्टि के बाद धुएँ में घुल जाता है. ये सिलसिला फ्लूरेसेंट बल्ब में पारे की मौजूदगी तक चलता रहता है और इसी लिए पारे के साथ सावधानी से निपटने की जरूरत है. दाँतों की भराई और नष्ट किए गए फ्लूरेसेंट बल्ब इन्सानों की ओर से पर्यावरण में छोड़े गए पारे की दो हजार टन की मात्रा का एक हिस्सा ही है. पर्यावरण में मौजूद पारे की एक चौथाई मात्रा बिजली बनाने वाले कारखानों से आती है. कोयले का काला धुआँ उगलने वाले बिजली संयंत्र वातावरण में जो धुआँ छोड़ते हैं उनमें पारे का अंश पाया गया है. इतना ही सोने के लिए लोगों की दीवानगी ने कोयला आधारित बिजली कारखानों से छोड़े जाने वाले पारे से भी ज्यादा मात्रा में उत्सर्जन किया है. यह पारे की कुल मात्रा का एक तिहाई से भी ज्यादा है. दुनिया भर में लाखों लोग जो सोने के खनन के काम में लगे हुए हैं वे पारे का इस्तेमाल कर इस शुद्ध धातु का उसके अयस्क से अलग करते हैं और समस्या तब पैदा होती है जब पारे से शुद्ध धातु को अलग करने की कवायद शुरू की जाती है. बचे हुए पारे का निपटारा करना एक बहुत बड़ी चुनौती होती है. ये पानी में मिलने पर बेहद ही खतरनाक पदार्थ में बदल जाता है जिसे हम मिथाइल मरकरी कहते हैं. इसे शैवाल और खारे पानी में पैदा होने वाली वनस्पतियाँ सहज से रूप से ग्रहण कर लेता है. इसे बड़े जानवर खाते हैं और फिर उसके बाद उससे भी बड़े जानवर और उसे सबसे आखिर में मनुष्य खा लेते हैं. इस प्रक्रिया में इस जहरीले रसायन का हमारी जिंदगी पर असर बढ़ा है और अजन्मे बच्चों और बच्चों के विकसित होते दिमाग पर गंभीर खतरे की आशंका व्यक्त की जा रही है. पर्यावरण मामलों की जानकार डॉक्टर केट स्पेंसर कहती हैं हमारी सबसे बड़ी चिंता आहार श्रृंखला के एक छोर पर स्थित मछली को लेकर है खासकर स्वोर्डफिश और प्रिडेटर फिश जैसी प्रजातियों से जुड़ी है. लेकिन दुनिया की सभी सरकारें इस विचार से बहुत ज्यादा इत्तेफाक नहीं रखती हैं. पर्यावरण पर पारे के प्रभावों को लेकर चिंताजनक स्थिति से निपटने के लिए अभी तक 93 देशों ने मिनामाटा संधि पर दस्तखत किए हैं. यह संधि पारे के प्रदूषण को रोकने की बात करती है और अमरीका ने भी इस पर दस्तखत किए हैं. सोने के खनन में पारे के इस्तेमाल को कम करने के अभियान से जुड़े क्रिस डेविस कहते हैं सबसे अच्छी खबर ये है कि दुनिया पारे की आदत को कम करने के लिए साथ काम करने पर सहमत है. |
| DATE: 2013-12-07 |
| LABEL: science |
| [161] TITLE: मेकैनिक की खोज लाएगी प्रसव तकनीक में क्रांति |
| CONTENT: आमतौर पर वर्षों तक मेडिकल साइंस की मोटी-मोटी किताबों को पढ़ने के बाद कोई वैज्ञानिक स्वास्थय से जुड़ी किसी मामूली समस्या का समाधान ढूंढ़ पाता है लेकिन जब कुछ ऐसा की करनामा विज्ञान से दूर-दूर तक का नाता नहीं रखने वाला कोई इंसान कर दे तो सहज भरोसा करना असंभव लगता है. अर्जेंटीना के कार मेकैनिक जॉर्ज ओडोन ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है. पांच बच्चों के पिता ओडोन का प्रसव की दुनिया से कुछ लेना-देना नहीं है. लेकिन उन्होंने एक ऐसे उपकरण की खोज़ की है जो दुनिया में माँ बनने वाली तमाम महिलाओं के लिए वरदान साबित हो सकता है. इस बारे में ओडोन कहते हैं ऐसे विचार स्वाभाविक तरीके से आते हैं- उदाहरण के लिए जिस जगह पर मैं काम करता हूँ वहाँ अगर कोई समस्या है तो सोते समय भी वह मेरे दिमाग में चलती रहेगी और आधी रात को मैं अचानक जाग जाऊंगा और मुझे कोई समाधान सूझ जाएगा. वैसे तो ओडोन भले ही एक मेकैनिक हैं लेकिन उनका व्यावहारिक ज्ञान दुनिया के किसी महान वैज्ञानिक से कम नहीं. साल 2005 तक उनके नाम मेकैनिक्स स्टैबलाइजेशन बार्स कार सस्पेंशन्स और अन्य क्षेत्रों से जुड़े आठ आविष्कारों के पेटेंट थे. दरअसल गैरेज में ओडोन के एक स्टाफ ने एक यू-ट्यूब वीडियो दिखाया जिसमें एक खाली बोतल से कॉर्क को निकालते हुए दिखाया गया था. इस काम को बेहद आसान तरीके से किया गया था. बोतल को झुकाते हुए उसमें प्लास्टिक के एक बैग को डाला गया और उसे फुलाया गया. इससे बोतल के अंदर बैलून कॉर्क के चारों तरफ टाइट हो गया और उसे आसानी से बाहर खींच लिया गया. इसके बाद ओडोन ने अपने एक दोस्त कार्लोस मोडेना को घर बुलाया और उसके साथ बोतल से कॉर्क निकालने की शर्त लगाई. मोडेना ने कहा कि कॉर्क को बाहर निकालने के लिए बोतल को तोड़ना ज़रूरी है. इसके बाद ओडोन ने अपने ट्रिक से कॉर्क को बोतल से निकाल दिया. लेकिन उस रात ओडोन अपनी पत्नी के साथ सोए हुए थे तभी उनके दिमाग की बत्ती जली और उन्होंने सोचा कि इस तकनीक का इस्तेमाल शिशु को जन्म देने वाली महिलाओं पर आजमाया जाए तो क्या होगा. तड़के चार बजे उन्होंने पत्नी को जगाने की कोशिश की और उनको इस आइडिया के बारे में बताया. इस पर पत्नी ने कहा कि बहुत अच्छा विचार है लेकिन अभी सो जाओ. इस बारे में ओडोन कई दिनों तक सोचते रहे लेकिन उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं था. अंततः उन्होंने अपने दोस्त मोडेना के जरिए उनके पारिवारिक प्रसव विशेषज्ञ डॉक्टर से मिलने की योजना बना ली. डॉक्टर ने इस आइडिया में न केवल रुचि दिखाई बल्कि उससे काफी प्रभावित भी हुए. इससे उत्साहित ओडोन ने एक पेटेंट रजिस्टर करवाया और वह एक प्रोटोटाइप उपकरण बनाने में जुट गए. जब एक बार एक मॉडल उपकरण तैयार हो गया तो ओडोन ने ब्यूनर्स आयर्स में सेंटर फॉर मेडिकल एजुकेशन एंड क्लिनिकल रिसर्च में डॉक्टर जेवियर शवार्त्जमैन से संपर्क किया. शवार्त्जमैन को भी ये विचार काफी रोचक लगे और वह ओडोन के साथ मिलकर उपकरण का विकास करने पर सहमत हो गए. साल 2008 में इस परियोजना पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की नज़र पड़ी. ब्यूनर्स आयर्स के दौरे पर आए इसके मुख्य संयोजक डॉक्टर मारियो मेरिआल्डी के साथ इस बारे में केवल 10 मिनट की मीटिंग तय हुई लेकिन मेरिआल्डी इससे इतना प्रभावित हुए कि यह मीटिंग दो घंटे तक खींच गई. मेरिआल्डी ने कहा इससे उनकी उत्सुकता बढ़ गई लेकिन साथ ही एक संशय भी था कि सालों नहीं सदियों से इस क्षेत्र में कोई खोज़ नहीं हुई है. आमतौर पर दुनिया में हर 10 में से एक बच्चे के जन्म के लिए बर्थिंग इंस्ट्रूमेंट फोर्सेप्स या वेंटॉज का इस्तेमाल किया जाता है. इसके लिए शिशु के सिर पर उसे गर्भ से खींचकर बाहर निकालने वाले कैप का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें शिशु के सिर में चोट आने का खतरा रहता है. फॉर्सेप्स का विकास 16वीं शताब्दी में हुआ था. समय के अनुसार बदलावों के साथ इसका 1950 तक इस्तेमाल किया जाता रहा. उस वक्त इसके विकल्प के रूप में माल्मस्ट्रॉम एक्सट्रैटर का आविष्कार किया गया. ओडोन के उपकरण में बोतल तकनीक का अनुकरण किया गया है. इसमें शिशु के सिर को घेरने के लिए एक डबल लेयर वाले प्लास्टिक को इंसर्ट किया जाता है. इसके बाद बैग में थोड़ी हवा भरी जाती है. इस तरह फूला हुआ बैग शिशु को सिर को ठोढ़ी तक कवर कर लेता है. इससे नाक ढक जाने के बावजूद शिशु को सांस लेने में दिक्कत नहीं होती क्योंकि गर्भ में वे नाक से सांस नहीं लेते. इसके बाद शिशु को बिना किसी नुकसान या रक्तस्राव के खींचा जा सकता है. साल 2008 में ओडोन उपकरण को और परीक्षण के लिए लावा स्थित डेस मोइने यूनिवर्सिटी ले गए. यहां पर डब्ल्यूएचओ के विशेषज्ञों ने इसका विस्तृत परीक्षण किया. यह ओडोन के लिए मील का पत्थर साबित हुआ. उन्होंने कहा कि उन्हें भरोसा नहीं हो रहा है कि ये वैज्ञानिक मुझे उपकरण का परीक्षण कर रहे हैं. यह एक विशेष क्षण है. आने वाले समय में विकासशील देशों में इस सस्ते और आसान उपकरण से उन लाखों माँओं को राहत मिल सकती हैं जो प्रसव के दौरान पीड़ा के दौर से गुजरती हैं. दुनिया में हर साल 56 लाख शिशु जन्म लेने के तुरंत बाद मर जाते हैं. इतना ही नहीं हर साल प्रसव पीड़ा के दौरान 2-6 लाख माँएं भी अपना जीवन खो देती है. इनमें से 99 फीसदी मौतें विकासशील देशों में होती हैं. ऐसे में ओडोम का उपकरण इस दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है. |
| DATE: 2013-12-05 |
| LABEL: science |
| [162] TITLE: 2050 तक तिगुने हो जाएँगे डिमेंशिया के मामले |
| CONTENT: एक नए अध्ययन के मुताबिक 2050 तक दुनिया में डिमेंशिया या मानसिक विक्षिप्तता की बीमारी से जूझ रहे लोगों की संख्या तीन गुनी हो जाने की आशंका है. अल्ज़ाइमर्स डिज़ीज इंटरनेशनल का कहना है कि वर्तमान में इस बीमारी से 4-4 करोड़ लोग पीड़ित हैं लेकिन 2050 तक इनकी संख्या 13-5 करोड़ हो जाएगी. लंदन में अगले सप्ताह होने वाले जी-8 डिमेंशिया समिट से पहले ये आंकड़े जारी किए गए हैं. अल्ज़ाइमर्स डिज़ीज़ इंटरनेशनल को आशंका है कि जिस तरह ग़रीब और मध्य आय वाले देशों में लोगों की औसत आयु बढ़ रही है उससे इस तरह के मामले और बढ़ेंगे. संगठन के अनुसार ये मामले ख़ासतौर पर दक्षिण पूर्व एशिया और अफ़्रीका में सामने आ सकते हैं. फ़िलहाल मानसिक विक्षिप्तता के 38 फ़ीसदी मरीज़ धनी देशों में हैं लेकिन 2050 तक यह संतुलन पूरी तरह से बदल जाएगा. उस वक्त तक दुनिया के 71 फ़ीसदी मरीज़ गरीब और मध्यम आय वाले देशों के होंगे. रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकतर सरकारें डिमेंशिया की इस महामारी से निपटने के लिए उदासीन हैं. अल्जाइमर डिज़ीज इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक मार्क वोर्टमन ने कहा यह एक वैश्विक महामारी है और यह बिगड़ती जा रही है. यदि हम भविष्य को देखें तो वृद्ध लोगों की आबादी में तेजी से वृद्धि होने वाली है. इंग्लैंड की अल्ज़ाइमर्स सोसायटी के मुख्य कार्यकारी जेरेमी ह्यूज़ ने कहा कि डिमेंशिया तेजी से एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है. यह आज की पीढ़ी के लिए सामाजिक देखभाल से जुड़ी एक बड़ी चुनौती है. |
| DATE: 2013-12-05 |
| LABEL: science |
| [163] TITLE: सेल्फ़ ड्राइविंग कार, ग्लास के बाद अब गूगल रोबोट |
| CONTENT: मेका के एम-वन रोबोट्स की तकनीक गूगल ने अधिगृहीत की है. गूगल ने पिछले छह महीने में सात रोबोट बनाने वाली कंपनियों का अधिग्रहण किया है और नए उत्पाद विकसित करने के लिए कर्मचारियों की भर्ती भी शुरू कर दी है. गूगल के एक प्रवक्ता ने बताया है कि एंड्रॉएड ऑपरेटिंग सिस्टम निर्माण के प्रमुख रह चुके एंडी रुबिन गूगल के नए प्रयास का नेतृत्व कर रहे हैं. हालांकि गूगल ने अभी तक ये नहीं बताया है कि वो किस तरह के रोबोट विकसित करेगा. न्यूयार्क टाइम्स अख़बार की एक रिपोर्ट के अनुसार गूगल फ़िलहाल जिन रोबोट्स पर काम कर रहा है उन्हें वो अभी बेचना नहीं चाहता. अख़बार का कहना है कि गूगल सेल्फ़-ड्राइविंग कार में इस्तेमाल होने वाले रोबोट्स पर काम कर रहा है ताकि सामानों की होम डिलीवरी में मदद मिल सके. न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक़ हाल ही में गूगल ने सैन फ्रांसिस्को और सैन जोस में गूगल शॉपिंग एक्सप्रेस के नाम से किराने का सामान घर पहुंचाने वाली सेवा शुरू की है. यह भविष्य में अमेज़न की प्राइम एअर प्रोजेक्टस को चुनौती दे सकता है जो ड्रोन के माध्यम से उपभोक्ताओं को सामान पहुंचाने की संभावनाओं पर विचार कर रही है. हालांकि गूगल खुद अपनी परियोजना के बारे में जब तक नहीं बताता तब तक इस परियोजना की सटीक जानकारी मिलना मुश्किल है. एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के रोबोटिक लैब विभाग के निदेशक प्रोफ़ेसर सेतु विजयकुमार कहते हैं यह साफ़ है कि पर्सनल रोबोट और इससे जुड़ी अन्य तकनीकों के बाज़ार में उतरने के दिन बहुत करीब हैं. उन्होंने कहा अब तक रोबोट बनाने संबंधी तकनीक की दिशा में गति और सेंसिंग सिस्टम में काफ़ी तरक्की हुई है. अब मुख्यधारा की गूगल जैसी कंपनियां चुनौती के लिए तैयार हैं. इससे ताक़तवर सॉफ्टवेयर के एकीकरण मानकीकरण और माड्युलर डिज़ाइन बनाने में तेज़ी आएगी. अनुसंधान के क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी का रोबोटिक प्रोजेक्ट पॉलो ऑल्टो कैलीफ़ोर्निया में है और इसका एक कार्यालय जापान में भी होगा. जापान भी रोबोटिक्स के क्षेत्र में काफ़ी आगे है. न्यूयार्क टाइम्स से बात करते हुए गूगल रोबोट्स का नेतृत्व कर रहे एंडी रुबिन कहते हैं इसे अमल में लाने के लिए गूगल की दस साल की योजना है. उन्होंने कहा मुझे लगता है कि रोबोटिक्स में काफ़ी संभावनाएं हैं. वो कहते हैं हम हार्डवेयर बना रहे हैं सॉफ़्टवेयर बना रहे हैं. हम ऐसे सिस्टम बना रहे हैं ताकि एक टीम इस पूरी प्रक्रिया को क्रमबद्ध तरीके से समझ सके. गूगल की अधिगृहीत की गई कंपनियां इन क्षेत्रों में प्रयास करने वाली हैं. जिन कंपनियों का गूगल ने अधिग्रहण किया है वो हैं ऑटोफ़स अमरीका के सैन फ्रांसिस्को में स्थित ये कंपनी रोबोट्स के माध्यम से विज्ञापन बनाने की योजना पर काम कर रही है. गूगल के कुछ विज्ञापन कैंपेन के लिए इसने काम भी किया है. बॉट एण्ड डॉली यह ऑटोफ़स की सहायक कंपनी है जिसे सटीक गति वाले रोबोट्स और फ़िल्म निर्माण में विशेषज्ञता हासिल है. होलोम्नी कैलीफ़ोर्निया की कंपनी को ढलवां मॉड्यूल्स बनाने में महारथ हासिल है जो गाड़ी को किसी भी दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ा सकते है. इंडस्ट्रियल परसेप्शन पॉलो ऑल्टो के मुख्यालय में स्थित कंपनी का मुख्य व्यवसाय थ्री-डी विजन गाइडेड रोबोटिक तकनीक विकसित करने पर केंद्रित है ताकि ट्रकों पर सामान की लदाई और उतारने के काम को स्व-चालित बनाया जा सके. मेका रोबोटिक्स मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलजी से टूटकर बनी कंपनी रोबोट के विभिन्न हिस्सों का निर्माण करती है जो मानवीय जरूरत के अनुकूल और सुरक्षित हों. रेडवुड रोबोटिक्स सैन फ्रांसिस्को स्थित यह कंपनी अगली पीढ़ी के रोबोट्स की भुजाएँ बनाने के काम में लगी है जिसका उत्पादन वितरण और स्वास्थ्य जैसे सेवा क्षेत्र में उपयोग हो सके. साफ्ट टोक्यो यूनिवर्सिंटी से निकली यह कंपनी मनुष्य के शक्ल वाले रोबोट्स के विकास और संचालन के क्षेत्र में काम करती है. |
| DATE: 2013-12-05 |
| LABEL: science |
| [164] TITLE: हर हाल में नुक़सानदेह है मोटापा |
| CONTENT: आमतौर पर माना जाता है कि अगर शरीर में ब्लड प्रेशर यानी रक्तचाप शुगर का स्तर और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा संतुलित है तो ज़्यादा वज़न को लेकर परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. लेकिन एक नए शोध में इस सोच को एक मिथक करार देते हुए कहा गया है कि सब कुछ ठीक रहने के बावजूद अधिक वज़न ख़तरनाक हो सकता है. इस शोध में साठ हज़ार से अधिक लोगों के दिल की सेहत और उनके वज़न पर बराबर नज़र रखी गई. एनल्स ऑफ इंटर्नल मेडिसीन में प्रकाशित इस शोध में इस विषय पर हुए 1000 से अधिक अध्ययनों को भी शामिल किया गया है. टोरंटो के माउंट सिनाई हॉस्पिटल के शोधकर्ताओं ने पाया कि वज़न का बढ़ना ठीक नहीं है. उन्होंने कहा कि अधिक वज़न वाले जो लोग जांच में स्वस्थ पाए जाते हैं वे ख़तरे के क़रीब होते हैं और समय बीतने के साथ यह ख़तरा बढ़ता जाता है. प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर रवि रत्नाकरन ने बीबीसी से कहा कि इस अध्ययन के नतीज़े हेल्दी ओबेसिटी यानी मोटापे के बावजूद सेहतमंद रहने की धारणा को लेकर संदेह पैदा करते हैं. उन्होंने कहा इस शोध से पता चलता है कि स्वस्थ दिखने वाले मोटे लोग और मोटापे की बीमारी से परेशान लोग इन दोनों को हृदय संबंधी बीमारियों का ख़तरा बना रहता है. ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन का कहना है कि मोटोपा हृदय संबंधी बीमारियों का एक बड़ा कारण है और शोधकर्ताओं ने पाया है स्वस्थ मोटापे जैसी कोई चीज नहीं होती. वरिष्ठ नर्स डोईरीन मैडॉक का कहना है कि रक्त चाप कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर का स्तर ठीक रहने के बावजूद आपके दिल को खतरा हो सकता है. उनका कहना है कि बेहतर होगा कि हम सेहत को होने वाले ख़तरे के बारे में सोचने की बजाय जीवन शैली को बेहतर करने के बारे में सोचें. उन्होंने कहा कि वज़न पर ऩजर रखने के साथ सिगरेट छोड़ने नियमित कसरत करने और रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को ठीक रखने से हृदय संबंधी बीमारी के खतरे को कम किया जा सकता है. |
| DATE: 2013-12-04 |
| LABEL: science |
| [165] TITLE: दिल के लिए ख़तरा हैं एनर्जी ड्रिंक? |
| CONTENT: शोधकर्ताओं का मानना है कि कैफीन युक्त एनर्जी ड्रिंक से दिल की धड़कन पर असर पड़ता है. जर्मनी के बॉन विश्वविद्यालय की एक टीम ने ऐसे 17 लोगों पर शोध किया और उनके दिलों की धड़कन मापी जिन्हें एक घंटे पहले एनर्जी ड्रिंक पिलाया गया था. अध्ययन में पता चला कि एनर्जी ड्रिंक पीने के बाद इन लोगों के ह्रदय का संकुचन पहले से ज़्यादा तेज़ हो गया था. शोधकर्ताओं की टीम ने उत्तरी अमरीका की रेडियोलॉजिकल सोसायटी की वार्षिक बैठक में बताया कि कुछ बीमारियों से परेशान बच्चों और लोगों को एनर्जी ड्रिंक से बचना चाहिए. शोधकर्ता डॉक्टर योनास डॉर्नर ने कहा अभी तक हमें पूरी तरह से इस बात का पता नहीं चला है कि इन एनर्जी ड्रिंक का ह्रदय के काम करने पर ठीक-ठीक क्या असर पड़ता है. उन्होंने कहा कोला और कैफीन युक्त दूसरे पेय पदार्थों की अपेक्षा इन एनर्जी ड्रिंक में कैफीन की मात्रा तीन गुना तक ज़्यादा होती है. डॉक्टर डॉर्नर ने कहा ज़्यादा मात्रा में कैफीन सेवन करने से बहुत से साइड-इफ़ेक्ट होते हैं जैसे दिल की धड़कन बढ़ना घबराहट और उच्च रक्तचाप. कई बार गंभीर मामलों में यह अचानक हुई मौत के लिए भी ज़िम्मेदार होती है. शोधकर्ताओं ने शोध में हिस्सा लेने वाले लोगों को सौ मिलीलीटर में 32 मिली ग्राम कैफीन वाला एक ड्रिंक और सौ मिलीलीटर में 400 मिली ग्राम टौरीन वाला एक दूसरा ड्रिंक पीने को दिया. शोधकर्ताओं ने पाया कि ड्रिंक के पीने के एक घंटे बाद दिल का बायां वेंट्रिकल जो पूरे शरीर में खून भेजता है पहले से ज़्यादा तेज़ी से संकुचित हो रहा था. डॉक्टर डॉर्नर ने आगे बताया हमें पता चला कि एनर्जी ड्रिंक पीने से ह्रदय सबंधी संकुचन पर तेज़ असर होता हैं. हमें अभी तक यह पता नहीं चला है कि इस संकुचन के बढ़ने से व्यक्ति की रोज़मर्रा की गतिविधियों और एथलेटिक प्रदर्शन पर कितना असर पड़ता है. ह्रदय संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों पर होने वाले असर का भी अभी तक पता नहीं चला है. बहरहाल शोध करने वाली टीम ने सलाह दी है कि अनियमित ह्रदय गति वाले बच्चों और लोगों को इन पेय पदार्थों से बचना चाहिए. ब्रिटिश सॉफ्ट ड्रिंक्स एसोसिएशन पहले ही यह कह चुका है कि ये एनर्जी ड्रिंक बच्चों के लिए नहीं हैं. |
| DATE: 2013-12-03 |
| LABEL: science |
| [166] TITLE: पासवर्ड बचाने के आसान तरीके |
| CONTENT: जहां तक पासवर्ड की बात है तो इंटरनेट पर सबसे लोकप्रिय रंग नीला है. अब अगर आप सोच रहे हैं कि ऐसा क्यों है तो इसका जवाब यह है कि अधिकांश लोकप्रिय वेबसाइट और सेवाएं जैसे फ़ेसबुक ट्विटर और गूगल अपने लोगो में नीले रंग का इस्तेमाल करती हैं. यही वजह है कि जब लोग इन वेबसाइट में साइन करते हैं तो उनके दिमाग में सबसे पहले यही रंग आता है. वे अपना पासवर्ड बनाने के लिए नीले रंग यानी ब्लू से बने शब्दों या मुहावरों का इस्तेमाल करते हैं. इंसानों की पासवर्ड चुनने की विचित्र आदतों में यह एक है. इस तरह की कई दूसरी आदतें हैं. उदाहरण के लिए शोधों से पता चला है कि लाल बाल वाली महिलाएं सर्वश्रेष्ठ पासवर्ड चुनने में माहिर होती हैं जबकि बेतरतीब दाढ़ी और बालों वाले पुरुष सबसे ख़राब पासवर्ड बनाते हैं. इन शोधों से यह बात भी सामने आई है कि महिलाएं लंबे पासवर्ड पसंद करती हैं जबकि पुरुषों को विविधता वाले पासवर्ड पसंद हैं. सुरक्षा शोधकर्ता पर थोर्शेम का कहना है कि वेबसाइटों और ऑनलाइन सेवाओं से चुराए गए कई पासवर्डों के कारण ये तथ्य सामने आए हैं. एडॉब लिंक्डइन और गेम वेबसाइट रॉकयू से कई बार लॉगइन और पासवर्ड चोरी हुए हैं. इनके अलावा भी कई दूसरी कंपनियों की सिक्योरिटी में कई बार सेंध लगाकर लॉगइन और पासवर्ड उड़ाए गए हैं. इन आंकड़ों से जो पहली बात निकलकर सामने आई है वह ये है कि लोग अच्छे पासवर्ड चुनने में उतने अच्छे नहीं हैं. थोर्शेम ने कहा आपको यह याद रखना होगा कि हम सब इंसान हैं और हम सभी गलती करते हैं. उनका कहना है कि अच्छे पासवर्ड का मतलब एक मुहावरा या अक्षरों का संगम होगा जिनका उस पासवर्ड चुनने वाले व्यक्ति से बहुत कम या कोई संबंध नहीं होना चाहिए. थोर्शेम कहते हैं कि अक्सर लोग ऐसे शब्द या संख्याएं चुनते हैं जिनका उनसे प्रत्यक्ष तौर पर संबंध होता है. वे जन्मतिथि शादी की सालगिरह भाई बहनों बच्चों या पालतू जानवरों के नाम का इस्तेमाल करते हैं. वे अपनी मकान संख्या सड़क के नाम या पसंदीदा पॉप स्टार को चुनते हैं. यह पूर्वाग्रह तब साफ नज़र आता है जब लोगों को जब चार अंकों का पासवर्ड चुनने को कहा जाता है. आकलन से पता चलता है कि दस हज़ार उपलब्ध नंबरों में से बहुत सीमित सेट चुनते हैं. कुछ मामलों में तो 80 प्रतिशत पसंद 100 अलग अलग नंबरों तक सिमट जाते हैं. इसी आधार पर अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोगों को पासवर्ड तोड़ने की युक्ति मिली है. कई सुरक्षा शोधकर्ता पासवर्ड को सुरक्षित बनाने के लिए कंपनियों को सलाह दे रहे हैं कि लोगों को ज़्यादा सुरक्षित मुहावरे चुनने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. सुरक्षा शोधकर्ता ब्रूस मार्शल कहते हैं कि ख़ुराफाती लोग पासवर्ड तोड़ने की कोशिश करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि लोग कितने सुस्त होते हैं. कुछ अध्ययनों के मुताबिक़ 70 फ़ीसदी मामलों में ईमेल अकाउंट से जुड़े पासवर्ड का एक या अधिक दूसरी ऑनलाइन सेवाओं में इस्तेमाल हो सकता है. अधिकांश साइबर चोर पासवर्डों की सूची हासिल करने के लिए छोटी साइटों को निशाना बनाते हैं और फिर अन्य साइटों पर इनका इस्तेमाल करते हैं. अब अगर आप मज़बूत पासवर्ड चुनना चाहते हैं तो सामान्य अक्षरों या संख्याओं का संयोजन मत चुनिए. ऐसे शब्द चुनिए जो सतही तौर पर आपसे जुड़े हों और इस बात को भी सुनिश्चित कीजिए कि जिस पासवर्ड को आप ऑनलाइन बैंकिंग के लिए इस्तेमाल करते हैं उसे दूसरी जगह इस्तेमाल न करें. |
| DATE: 2013-12-02 |
| LABEL: science |
| [167] TITLE: डीएनए में कैद हो कर आती हैं 'यादें' |
| CONTENT: जानवरों पर किए गए शोधों से पता चला है कि यादें वंशानुगत रूप से एक पीढ़ी से दूसरी में जाती हैं और इनसे आने वाली पीढ़ियों का व्यवहार प्रभावित हो सकता है. प्रयोगों से साबित हुआ है कि दहला देने वाली किसी घटना से शुक्राणु में डीएनए प्रभावित हो सकता है और इससे आने वाली पीढ़ियों के दिमाग और व्यवहार में बदलाव हो सकता है. नेचर न्यूरोसाइंस के शोध के मुताबिक़ किसी ख़ास गंध से दूर रहने के लिए प्रशिक्षित किए चूहों का यह गुण उनकी तीसरी पीढ़ी में भी देखा गया. विशेषज्ञों का कहना है कि इस शोध के परिणाम फ़ोबिया और बेचैनी से संबंधित अनुसंधान के लिए अहम है. चूहों को चेरी ब्लॉसम के समान गंध से दूर रहने के लिए प्रशिक्षित किया गया था. अमरीका के एमोरी यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेडिसिन के शोधकर्ताओं की टीम ने फिर इस बात पर ग़ौर किया कि शुक्राणु के भीतर क्या हो रहा है. उन्होंने पाया कि चूहे के शुक्राणु में चेरी ब्लॉसम की गंध के लिए ज़िम्मेदार डीएनए का एक हिस्सा ज़्यादा संवेदनशील हो गया है. चूहे के बच्चे और उनके बच्चे चेरी ब्लॉसम की गंध को लेकर ज़्यादा संवेदनशील थे और इस गंध से बचने की कोशिश में रहते थे. ऐसा तब था जबकि उन्होंने अपने जीवन में कभी भी इस गंध का अनुभव नहीं लिया था. साथ ही उनके दिमागी ढाँचे में भी बदलाव देखा गया. रिपोर्ट कहती है एक पीढ़ी का अनुभव आने वाली पीढ़ियों की तंत्रिका तंत्र के ढाँचे और कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है. इस शोध के परिणाम इस बात का प्रमाण हैं कि एक पीढ़ी का अनुभव वंशानुगत रूप से दूसरी पीढ़ी में आता है. यानी माहौल से किसी की आनुवांशिकी प्रभावित हो सकती है जो आगामी पीढ़ियों में भी जा सकती है. शोधकर्ताओं में से एक डॉक्टर ब्रायन डियास ने बीबीसी से कहा यह एक प्रक्रिया हो सकती है जिससे वंशजों में पूर्वजों के लक्षण दिखते हैं. उन्होंने कहा इसमें रत्तीभर भी संदेह नहीं है कि शुक्राणु और अंडाणु में जो कुछ होता है उसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के प्रोफ़ेसर मार्कस पेम्ब्रे का कहना है कि इस शोध के परिणाम फ़ोबिया उत्कंठा और अवसाद में अनुसंधान के लिए काफ़ी अहम है और इससे साबित होता है कि एक पीढ़ी की यादें दूसरी पीढ़ी में जा सकती हैं. उन्होंने कहा जनस्वास्थ्य से जुड़े शोधकर्ताओं को मानव के संबंध में इसे गंभीरता से लेने के समय आ गया है. इसे समझे बिना हम दिमागी बीमारियों मोटापे मधुमेह और पाचन में गड़बड़ी जैसी बीमारियों के बढ़ने के कारण को समझ नहीं पाएंगे. |
| DATE: 2013-12-02 |
| LABEL: science |
| [168] TITLE: एक महिला, जिसने बेवजह दांत गंवाए |
| CONTENT: दातों का गिरना एक बात है लेकिन ग़लत चिकित्सकीय जांच के कारण गिरना बिल्कुल अलग बात है. ऐन ईस्टमैन के साथ यही हुआ. उन्हें एक ऐसी दुर्लभ बीमारी से जूझना पड़ा जिसमें दात दर्द जैसी कष्टदायक पीड़ा होती है लेकिन वास्तव में वह दर्द चेहरे की नसों से जुड़ा होता है. इस बीमारी के चलते नसों का दर्द जान के लिए गंभीर ख़तरा तक बन जाता है. आमतौर पर यह दर्द चेहरे के दाएं हिस्से में जबड़े के निचले भाग में होता है. ईस्टमैन बताती हैं मैं वहां खड़ी थी और चिल्लाए जा रही थी. दर्द अकल्पनीय था. मेरे पति ने कहा शांत रहो पड़ोसी पुलिस को बुला लेंगे. उस घटना को याद करके वह आज ज़रूर मुस्कुरा देती हैं लेकिन जब उन्हें पहली बार चेहरे पर इस दर्द का अहसास हुआ था तो वह एकदम बेहोश हो गईं थी. प्रोफ़ेसर जोआना जैकरज्वेस्का ने ईस्टमैन को बताया कि यह एक जैसी कहानी है. एक डरा हुआ रोगी जो महीनों या वर्षों से ग़लत चिकित्सकीय जांच का शिकार होता है यहां भयंकर दर्द के साथ मौजूद होता है. लंदन स्थित अपने ईस्टमैन डेंटल हॉस्पिटल के क्लीनिक में वह रोगियों को देखती हैं और इस रोग के बारे में शोध करती हैं जिसके बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है. ऐन 71 साल की हैं जबकि ट्राईजेमिनल न्यूरॉल्जिया आमतौर पर 50 या 60 की उम्र में ही होता है. हालांकि बहुत कम उम्र में किशोरों और बच्चों में भी यह बीमारी हो सकती है. चेहरे के दोनों ओर पाई जाने वाली ट्राईजेमिनल नाम की नस ही चेहरे में संवेदनाओं के लिए जिम्मेदार होती है. यह समझा जाता है कि जैसे-जैसे उम्र ढलती जाती है धमनियां इन्हें आसपास का रक्त पहुंचाती हैं. प्रोफ़ेसर जैक का कहना है कि जब इस नस पर दबाव पड़ता है तो इसके चारों ओर एक किस्म का खोल बन जाता है. फलस्वरूप हल्के स्पर्श और दर्द जैसी संवेदनाओं की वाहक नसों में आर-पार संप्रेषण होने लगता है. ऐन ने बताया कि उनकी डॉक्टर ने एक्स-रे देखकर बताया कि एक दांत के ऊपरी हिस्से के अलावा और कोई समस्या नहीं है और इसे तभी हटाया जाएगा जब इसके नीचे कुछ गड़बड़ हो. काफ़ी दिन बीतने के बाद भी उनका दर्द नहीं गया तो ऐन को डॉक्टर ने ताक़तवर सूक्ष्मदर्शी रखने वाले एक अन्य डॉक्टर के पास जाने को कहा जिसने जांच के बाद पाया कि नसों में दिक्कत है और दांत निकालने की ज़रूरत है. ऐन ने बताया मैंने दांत निकलवा दिया फिर भी दर्द नहीं गया. दर्द वहीं हो रहा था जहां पहले हो रहा था. इसे समझने के लिए मैं इंटरनेट पर गई जिसने मुझे ट्राईजेमिनल न्यूरॉल्जिया से परिचित कराया. दर्द का एक दौर उन्होंने झेला और दूसरा दांत भी निकलवाना पड़ा. कुछ दिन बाद ऐन के डेंटिस्ट ने फोन कर उन्हें ईस्ट डेंटल हॉस्पीटल के विशेषज्ञ से मिलने को कहा. वहां डॉक्टर ने जांच करते ही इसे खास रोग का शुरुआती लक्षण बताया. इसके बाद ऐन को कार्बामाजेपाइन नामक दवा दी गई. चूंकि इस दवा के कुछ गंभीर साइड इफेक्ट हैं इसलिए मरीजों को धीरे-धीरे इसकी खुराक बढ़ाने की सलाह दी जाती है. जब दर्द नियंत्रित हो जाए तो आप इसका इस स्तर पर दवा लेना जारी रख सकते हैं. जब आपको लगे कि दर्द अचानक बंद हो गया है तब भी कुछ दर्द बना रहता है ख़ासकर कुछ चबाते समय. इसलिए खाने को चम्मच से मुंह में एक ओर रखें. असल में चबाने की क्रिया से दर्द बढ़ता है. दर्द उभरने के और भी कारक हो सकते हैं जैसा ठंडा या गरम खाना या पेय पदार्थ. कुछ लोगों को दांत दर्द का सीज़नल दौरा पड़ता है जैसे कीथ आयरलैंड को जाड़ों में दांत का दर्द उभरता है. कीथ को कान के ठीक पास जबड़े में दर्द उभरा लेकिन न्यूरोटिन गैबेपेंटीन दवा से यह नियंत्रित हुआ हालांकि पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ. प्रोफ़ेसर जैक के अनुसार शल्य चिकित्सा का विकल्प एक गंभीर मसला है. यदि एक विशेषज्ञ न्यूरोसर्जन से शल्य चिकित्सा कराई जाए तो दर्द से बिल्कुल छुटकारा पाया जा सकता है. हालांकि वह कहते हैं कि दस साल बाद अगर शल्य चिकित्सा हो तो सफलता का प्रतिशत 70 प्रतिशत होता है. इसमें भी यदि प्रभावित सही नस का पता चल जाए तो उपचार और आसान हो जाता है. |
| DATE: 2013-11-30 |
| LABEL: science |
| [169] TITLE: शादी का भविष्य जानना हो तो कराएं 'लव टेस्ट' |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने एक नए लव टेस्ट का इजाद किया है जो उनके मुताबिक़ संबंधों में सफलता के लिए नवदंपति को बेहतर गाइड कर सकता है. शोध में कहा गया है कि साथी की तस्वीर के बारे में एक अवचेतन प्रतिक्रिया शादी के परिणाम जानने में उपयोगी साबित हो सकती है. जिन लोगों के मन में नकारात्मक बातें चलती हैं कुछ साल बाद उनके संबंधों में दरार की संभावना बढ़ जाती है. यह अध्ययन जर्नल साइंस में प्रकाशित हुआ है. मुख्य शोधकर्ता फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जेम्स मैकनल्टी ने कहा कि इस नई जांच से नवदंपति की एक-दूसरे की प्रति सोच के बारे में सही अनुमान लगाया जा सकता है. प्रोफेसर जेम्स ने कहा कि मन की ये बातें शादी के दौरान आप ख़ुश रहेंगे या नहीं इस बारे में अनुमान लगाने में काफ़ी अहम साबित होती हैं. उनकी टीम ने शादी के तुरंत बाद ऐसे 135 जोड़ों का साक्षात्कार किया. शोधकर्ताओं ने उनसे पूछा कि वे अपनी क्शादी का मूल्यांकन सकारात्मक नकारात्मक अच्छा बुरा संतुष्ट और असंतुष्ट किस तरह से करते हैं. इसके बाद उन्होंने पहेलीनुमा लव टेस्ट का इस्तेमाल करते हुए एक-दूसरे के प्रति उनके दिल की बातों का माप किया. इसमें एक पार्टनर को दूसरे की एक तस्वीर एक सेकंड के तीसरे हिस्से तक के लिए दिखाई जाती है. इसके बाद उनको जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी शानदार आश्चर्यजनक डरावना और भयानक में कोई एक जवाब देना होता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि जिस तरीक़े से और जिस आवाज़ में वे जवाब देते हैं उससे उनकी सही भावनाओं के बारे में पता चलता है. यह टेस्ट संबंध बनने के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित है. सिद्धांत के मुताबिक़ शादी के बंधन में बंधे लोगों में पार्टनर की तस्वीर क्षण भर के लिए देखने के बाद सकारात्मक या नकारात्मक विचार आता है. |
| DATE: 2013-11-30 |
| LABEL: science |
| [170] TITLE: दुनिया का सबसे प्राचीन 'सार्वजनिक शौचालय' |
| CONTENT: अर्जेंटीना में एक विशाल सामूहिक शौचालय का पता चला है जो उस ज़माने का है जब डायनासोर इस धरती पर नज़र आने लगे थे. वैज्ञानिकों का कहना है कि खुदाई के दौरान एक-दूसरे में गुंथे मल के हज़ारों जीवाश्म मिले हैं जो गैंडे जैसे किसी जानवर के हैं. चौबीस करोड़ साल पुरानी इस जगह को दुनिया का सबसे प्राचीन सार्वजनिक शौचालय कहा जा रहा है जो इस बात का पहला सुबूत है कि प्राचीन जीव शौच के लिए किसी एक ही जगह का इस्तेमाल करते थे. अध्ययन में कहा गया है कि आहार बीमारी और वनस्पति को आधार बनाकर किए गए मल के विश्लेषण से पता चला है कि इसका संबंध प्रागैतिहासिक काल से है. हिरण हाथी और घोड़े उन आधुनिक जीवों में शामिल हैं जो अपने इलाक़े की पहचान और परजीवियों को रोकने के लिए आमतौर पर किसी एक ही जगह पर अपना मल विसर्जित करते हैं. लेकिन अर्जेंटीना में मिले इस विशाल सामूहिक शौचालय ने 22 करोड़ वर्ष पुराने एक अन्य सबसे पुराने शौचालय का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. अर्जेंटीना के ला रियोजा प्रांत में मिले मल के ये जीवाश्म आकार में 40 सेंटीमीटर चौड़े और वज़न में कई किलोग्राम भारी हैं जो भूरे और गहरे भूरे रंग के हैं. इस खुदाई से जुड़े डॉक्टर लुकास फ़ाइरोली कहते हैं अपराधी कौन है इसमें संदेह नहीं. इतने बड़े आकार का मल केवल एक प्रजाति देती है जिसकी हड्डियां यहां पूरे इलाक़े में बिखरी मिली हैं. करीब आठ मीटर लंबे किसी ऐसे जीव के मौजूद होने की संभावना जताई गई है. उनका इशारा शिकारी जानवर डायनोडोन्टोसोरस की ओर है जो आठ फीट लंबा जीव है जिसकी तुलना आधुनिक गैंडे से की जा सकती है. डायनोडोन्टोसोरस बड़े और स्तनधानी रेंगने वाले जीवों की तरह भी थे जो समय के उस युग में थे जब डायनासोर पहली बार आकार ले रहे थे. डॉक्टर लुकास फाइरोली का कहना है कि शौचालय साझा करने की प्रवृत्ति से संकेत मिलता है कि ये स्वभाव से मिलनसार और झुंड में रहते थे. वे कहते हैं परजीवियों को दूर करने के लिए ऐसा करना ज़रूरी था. जैसा कि कहते भी हैं कि आप वहां शौच नहीं कर सकते जहां आप भोजन करते हैं. इसका दूसरा पहलू बताते हुए वे कहते हैं ये शिकारियों के लिए भी एक चेतावनी थी कि देखो हम एक बड़े झुंड में हैं. शोधकर्ताओं ने विभिन्न आकार के लीद के बारे में जानकारी इकट्ठा की है. यहां शिकारियों से आशय मगरमच्छ जैसे उन जीवों से है जिनके पैने दांत थे जो आकार में आठ मीटर तक लम्बे हो सकते थे. यहां प्रति वर्ग मीटर में 94 मल-पिंड मिले हैं जो 900 वर्ग मीटर तक के इलाक़े में फैले हैं. प्रागैतिहासिक काल के किसी जीव का मल मिलना कोई नई बात नहीं है लेकिन इतना पुराना और इतने बड़े पैमाने पर एक ही जगह पर मल मिलना बड़ी बात है. डॉक्टर लुकास फ़ाइरोली कहते हैं कि ज्वालामुखी से निकली राख ने इस मल को परत में ढककर सुरक्षित रखने में मदद की. इन मल पिंडों को किसी टाइम कैप्सूल की तरह बताते हुए शोधकर्ता मार्टिन कहते हैं जब हमने इसकी बाहरी सतह तोड़ी तो इसमें से उस ज़माने के परजीवियों पौधौं और कवक की महक निकली. मल का हर टुकड़ा तब के इको-सिस्टम का उदाहरण है. वे ये भी कहते हैं कि इस खोज से उस पर्यावरण की झलक पाई जा सकती है जिसने डायनासोर को जन्म दिया था. |
| DATE: 2013-11-30 |
| LABEL: science |
| [171] TITLE: तकनीक 'आसान करेगी विकलांगों की ज़िंदगी' |
| CONTENT: तकनीक शारीरिक और मानसिक विकलांगों की कई तरह से सहायता करती है और पिछले दस सालों से यह डेस्कटॉप कंप्यूटर से मोबाइल उपकरणों की ओर शिफ़्ट भी हो रही है. आज स्मार्टफ़ोन मिनी कंप्यूटर की तरह हैं जिनमें विकलांग लोगों के लिए कई तरह के फ़ीचर भी होते हैं- यह बोल सकते हैं सुनने के उपकरणों के साथ जुड़ सकते हैं और इस्तेमाल करने के दूसरे शानदार फ़ीचर भी होते हैं. चैरिटी एबिलिटी नेट के रॉबिन क्रिस्टोफ़र्सन नेत्रहीन हैं और विकलांगता तकनीक समर्थक हैं. उन्हें यकीन है कि आने वाले गूगल ग्लास जैसे स्मार्ट चश्मे- हैंड्स फ़्री कान में लगे हुए आंख और मुंह के नज़दीक और मोबाइल फ़ोन की ताकत वाले- विकलांग लोगों के लिए असली काम की चीज़ हैं. क्रिस्टोफ़र्सन कहते हैं मेरे फ़ोन पर टॉकिंग गॉगल्स नाम का एक ऐप है जो सही वक्त में चीज़ों को पहचान सकता है. वह उस वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं जब स्मार्ट चश्मे के रूप में यह काम उनके लिए लगातार हो सकेगा. बीबीसी के इस महीने के आउच टॉक शो में शामिल क्रिस्टोफ़र्सन ने उन चीज़ों को गिनाया जिनमें यह उपकरण कई तरह के विकलांग लोगों की मदद कर सकते हैं. चश्मे में फ़ेशियल रिकग्निशन चेहरा पहचानने वाला सॉफ़्टवेयर सामने खड़े आदमी की भावनाओं को पढ़कर ख़ुश दुखी या नाराज़ जैसी चीज़ें बता सकता है. यह उन लोगों के लिए लाभप्रद हो सकता है जो दूसरों के चेहरों के भाव नहीं समझ पाते हैं- जैसे कि एस्परगेर्स सिंड्रोम में होता है. बहरे लोगों को उसी वक्त उपसंवाद मिल सकते हैं ताकि वह देख सकें कि लोग उनसे क्या कह रहे हैं- ठीक वैसा ही जैसा टीवी में होता है. मोबाइल फ़ोन और चश्मे बहुउत्पादित तकनीक हैं और इनके उन उपकरणों के मुकाबले ज़्यादा इस्तेमाल किए जाने की उम्मीद है जो ख़ासतौर पर विकलांगों के लिए बनाया जाता है. हर अक्सर सुनते हैं कि लकवाग्रस्त लोग अपने दिमाग से कंप्यूटर को नियंत्रित करते हैं. यह सिर्फ़ ईमेल करने और वर्ड प्रोसेसिंग तक ही सीमित नहीं रहेगा यह आगे बढ़कर कृत्रिम अंगों को नियंत्रित करने तक जा सकता है. क्रिस्टोफ़र्सन इसे तकनीक को परिपक्व होना कहते हैं लेकिन आप यूं ही जाकर इसे मास्क की तरह पहन नहीं सकते. वह कहते हैं इस वक्त सबसे सफल इंटरफ़ेस अंदर घुसने वाला है. आप एक सर्जरी करवाकर इसे अपने दिमाग में लगवा लेते हो. यह बहुत सटीक तकनीक है. आप वीडियो इंटरनेट पर देख सकते हो और जिन लोगों ने रोबोटिक हाथ लगवा रखा है वह उससे कॉफ़ी भी पी सकते हैं. वह कहते हैं कि इस तकनीक को ज़मीन पर आने में अभी कुछ महीने या कुछ साल की देरी है. एबिलिटी नेट ब्रेनएबल नाम की एक यूरोपीय परियोजना के साथ मिलकर इस क्षेत्र में काम कर रहा है. उनका ध्यान एक अन्य तकनीक पर भी है जो ज़्यादातर विकलांग लोगों की सूची में काफ़ी ऊपर है- चालकविहीन कार. क्रिस्टोफ़र्सन को लगता है कि यह बस कुछ साल दूर हैं और सामान्य कार के मुकाबले इनकी क़ीमत 5 लाख रुपये से 10 लाख रुपए तक अधिक हो सकती है. लेकिन विकलांग समुदाय की एक चिंता यह है कि अगर यह तकनीक विकसित हो भी जाती है तो कानून बनाने वाले या आम लोग विकलांगो को यह कारें चलाने नहीं देंगे. लेकिन क्रिस्टोफ़र्सन को लगता है कि कंप्यूटर-चालित कारों को स्वीकार करने में वक्त तो लगेगा लेकिन इनके प्रति विश्वास जम ही जाएगा. क्रिस्टोफ़र्सन कहते हैं वेंचर कैपिटिलिस्ट- गूगल वेंचर्स- ने 16-29 अरब रुपये से ज़्यादा 25000 खुद चलने वाली टैक्सी ख़रीदने में निवेश किए हैं. इन टैक्सियों को अंतरराष्ट्रीय टैक्सी कंपनी युबेर इस्तेमाल कर रही है विशेषकर इसलिए ताकि उन्हें टैक्सी ड्राइवरों को पैसे न देने पड़ें. तो हो सकता है कि भविष्य में हमें ऐसी गाड़ी में जाना पड़े जो कंप्यूटर से चलती हो या ऐसी कार जिसे एक विकलांग व्यक्ति चला रहा हो जो कंप्यूटर पर नियंत्रण करने में असमर्थ हो. क्या इनमें कोई फ़र्क है और आप इनमें से किसे चुनेंग |
| DATE: 2013-11-30 |
| LABEL: science |
| [172] TITLE: भारतीय वैदिक गणित और अध्यात्म |
| CONTENT: क्या भारत में गणित का संबंध जीवन मृत्यु और निर्वाण के दर्शन से रहा है बीबीसी के विज्ञान कार्यक्रम के लिए इसी विषय की पड़ताल कर रहे हैं गणित से जुड़े विषयों पर लिखने वाले लेखक एलेक्स बेलौस. भारत के गणितज्ञों को संख्याओं की शुरुआत करने का श्रेय जाता है. सदियों पहले भारत ने दुनिया को संख्याओं का चमत्कारिक तोहफा दिया था. शून्य का आविष्कार भी भारत में ही हुआ जिसके आधार पर गणित की सारी बड़ी गणनाएँ होती हैं. भारत में हिंदू बुद्ध और जैन धर्म में संख्याओं और निर्वाण के आपसी संबंध की अलग-अलग व्याख्या की गई है. लेकिन क्या वाकई गणित की संख्याओं और निर्वाण का आपस में कोई संबंध है भारत के प्रतिष्ठित गणितज्ञ और आईआईटी मुंबई के प्रोफेसर एसजी दानी गणित और निर्वाण के संबंध में कहते हैं आमतौर पर बातचीत के दौरान भी हम संख्याओं का प्रयोग करते हैं. 10 से 17 तक की संख्याओं को परार्ध कहा गया है और इसका अर्थ होता है स्वर्ग यानी मुक्ति का आधा मार्ग तय होना. प्रोफेसर दानी कहते हैं बौद्ध धर्म में तो एक के बाद 53 शून्य लगाकर जिन्हें लक्षण कहा गया है चिंतन ध्यान लगाया जाता है. यह एक बहुत बड़ी संख्या है जबकि इसकी तुलना में जैन धर्म में अनंत संख्याओं को अध्यात्म से जोड़ा गया है. हम कह सकते हैं कि ये एक प्रकार से संतुष्टि हासिल करने का एक तरीका है इसका कोई प्रायोगिक कारण नहीं है. मैनचेस्टर विश्वविद्यालय में गणित के इतिहासकार जॉर्ज गैवगीज जोसेफ के मुताबिक भारत द्वारा दी गई गणित की पद्धति अद्भुत है. जैसे यदि हम 111 लिखते हैं तो इसमें पहला एक इकाई को दर्शाता है जबकि दूसरे एक का मतलब दहाई से और तीसरे एक का मतलब सैकड़े से है. अर्थात् भारतीय गणित पद्धति में किसी एक संख्या के स्थान से ही उसकी स्थानिक मान का निर्धारण होता है. भारतीय गणित पद्धति से हम बड़ी से बड़ी संख्या को बहुत आसानी से और कम से कम संख्या के प्रयोग से व्यक्त कर सकते हैं. जबकि ग्रीक या रोमन पद्धति इतनी विकसित नहीं है. संख्याओं के बारे में अपनी उत्सुकता के चलते मैं मध्य प्रदेश के ग्वालियर भी गया. यहाँ के एक प्राचीन मन्दिर की एक दीवार पर 270 लिखा है यह एक हस्तलिखित अभिलेख है. माना जाता है कि इसका अर्थ हस्तास्त है जिसका मतलब भूमि माप से है. इस अभिलेख का अर्थ जानने के लिए कई विद्वानों और इतिहासकारों ने पहले भी कई शोध किए हैं. ऐसा माना जाता है कि बाकी दुनिया को जब शून्य का पता भी नहीं था तब भारत में 75वीं ईसवी में शून्य का चलन बहुत ही आम था. लगभग डेढ़ हज़ार साल पहले गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने शून्य के प्रयोग से जुड़ी एक किताब लिखी. जिसमें उन्होंने शून्य के प्रयोग के बारे में विस्तार से बताते हुए इसके आधारभूत सिद्धांतों की जानकारी भी दी. शून्य के आविष्कार पर आईआईटी मुंबई में संस्कृत के प्रोफेसर कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम कहते हैं यदि आप शून्य के भाव को देखें तो आप देखेंगे कि शून्य का अपना एक महत्व है. बौद्ध धर्म में इसके महत्व का वर्णन किया गया है जो कि बहुत प्रसिद्ध भी है. शून्य को ही बाद में जीरो कहा गया. वो कहते हैं प्राचीन भारतीय शास्त्रों और इतिहास के श्लोकों में गणित के तथ्य छिपे हुए हैं. ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय में गणित की प्रोफेसर रेणु जैन कहती हैं जीरो कुछ भी प्रदर्शित नहीं करता है. लेकिन भारत में इसकी उत्पत्ति शून्य की अवधारणा से हुई. यह एक तरह की मुक्ति को दिखाता है. जब व्यक्ति अपने चरम पर होता है तो वह निर्वाण चाहता है. जब उसकी सारी इच्छाएँ पूरी हो चुकी होती हैं. शून्य कुछ भी नहीं है और सब कुछ है. हम कह सकते हैं कि कुछ भी न होना ही सब कुछ है. शून्य के लिए वृत्त या गोले का प्रयोग करने के पीछे भी दार्शनिक कारण हो सकते हैं. पुरी के वर्तमान शंकराचार्य संख्याओं और अध्यात्म के संबंध पर कहते हैं वेदांतों में जिसे ब्रह्म और परमात्मा कहा गया है वह शून्य परमात्मा का प्रतीक है. अनंत का नाम ही शून्य है. गणित के अभ्यास से निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है. गणितज्ञों और धार्मिक गुरुओं दोनों का ही मानना है कि गणित की संख्याओं और निर्वाण यानी मुक्ति के बीच संबंध है. |
| DATE: 2013-11-29 |
| LABEL: science |
| [173] TITLE: एक अभियान, जिससे बदल गया नीदरलैंड्स |
| CONTENT: सड़कें लोगों को आपस में जोड़ती हैं ये लोगों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए सुगम रास्ता उपलब्ध कराती हैं. लेकिन दुर्भाग्यवश हर वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में हज़ारों लोग मारे जाते हैं. लेकिन नीदरलैंड्स्स में 1970 के दशक में हुए एक सड़क सुरक्षा अभियान ने वहाँ के बुनियादी ढाँचे में क्रांतिकारी बदलाव किए. 1971 में नीदरलैंड्स्स में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में मोटर वाहनों से रिकॉर्ड लगभग 3300 लोगों की मौत हुई. जिनमें 500 बच्चे भी शामिल थे. बीबीसी की विटनेस सेवा में अपना अनुभवों को साझा किया 1970 के दशक में रोड सेफ्टी अभियान में अहम योगदान देने वाली एक समाजसेवी वैन पुटन ने. वैन पुटन कहती हैं 1970 के दशक में नीदरलैंड्स्स में सड़क दुर्घटना बहुत बड़ी संख्या में होती थीं और इनमें मरने वाले बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा थी. मैं भी अपने एक साल के बेटे को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित थी. पुटन बताती हैं एक दिन मैंने सड़क पर एक 8-9 साल की बच्ची को हाथ में छाता लिए सड़क पर करते देखा. सामने से आ रही एक कार की टक्कर से एक बूढ़ी महिला को बचाने की कोशिश में उस बच्ची ने अपनी जान गँवा दी. एक छोटी बच्ची की इस कोशिश को देखकर मुझे सड़क दुर्घटनाओं के लिए लोगों को जागरुक करने का विचार मन में आया. उस समय के नीदरलैंड्स्स के राष्ट्रीय अखबार के प्रतिष्ठित पत्रकार विक लैंगन हॉफ के बेटे की स्कूल जाते समय सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. इसके बाद उन्होंने सड़क दुर्घटनाओं पर आर्टिकल की एक शृंखला लिखी. अपना पहला आर्टिकल उन्होंने स्टॉप द किंडरमूर हेडलाइन से लिखा. जिससे नीदरलैंड्स्स में काफी उथल-पुथल पैदा की. इस आर्टिकल में उन्होंने लोगों से अपने बच्चों को सड़क दुर्घटनाओं से बचाने के लिए बस से स्कूल भेजने की अपील की. उन्होंने लोगों से अपने बच्चों को सड़क पर मरने से बचाने के लिए सड़क सुरक्षा अभियान में शामिल होने को कहा. पुटन ने बीबीसी को बताया इसके बाद पूरे नीदरलैंड्स्स में सड़क दुर्घटनाओं के प्रति लोगों को जागरुक करने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाया गया. देश के पश्चिमी भाग एम्सटर्डम हेग समेत कई शहरों में सड़क सुरक्षा अभियान को लोगों का भरपूर समर्थन मिला. पूरे देश में बैनरों नारों के साथ बच्चों की सुरक्षा को लेकर प्रदर्शन होने लगे. लोगों ने सरकार से वहाँ की सड़कों की डिजाइन में बुनियादी बदलाव करने की अपील की. लोगों ने सरकार से सड़कों पर साइकिल और बाइक के लिए अलग लेन बनाने की भी मांग की. पुटन कहती हैं पूरे नीदरलैंड्स में लोगों में भारी गुस्सा था. हम आफिस और दुकानों में जाकर लोगों से पैसे देने की अपील की ताकि हम इस अभियान को चला सकें. इस अभियान के दौरान लोगों ने अपनी डाइनिंग टेबल सड़कों पर निकाल ली और वहीं खाना खाया ताकि बच्चों के लिए मौत का सबब बनी सड़क दुर्घटनाओं को रोकने का ये अनूठा विरोध उस समय पूरे नीदरलैंड्स में जोर-शोर से जताया गया. नीदरलैंड्स में उस समय लगभग तीस लाख मोटरवाहन सड़कों पर थे औऱ सड़कों पर रविवार के दिन भी यातायात जाम लगा होता था. वहाँ की सड़कों पर कार के अलावा किसी और वाहन के लिए जगह ही नहीं होती थी. लोगों में नीदरलैंड्स की सड़कों और गलियों के बुनियादी ढांचे को लेकर खासा गुस्सा था. वैन पुटन कहती है नीदरलैंड्स के एक मंत्री के बेटे की भी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. हमने बैनरों औऱ स्लोगन लिखकर अपील की उन्हें हमारे साथ हमारे अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए क्योंकि उनका अपना बेटा भी इन सड़क हादसों का शिकार हुआ है. इन रोड सेफ्टी अभियान में कई रोड डिजाइनर भी शामिल थे. लोगों ने सरकार से सड़क के बुनियादी ढांचों को बदलने और उन्हें सीधे न बनाकर कई मोड़ देकर बनाने की मांग की. ताकि मोटर वाहनों की गति पर नियंत्रित किया जा सके औऱ सड़क हादसों के आंकड़ों को कम किया जा सके. नीदरलैंड्स में उस समय इस अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं ने बच्चों को बचाने के लिए एक गाना भी तैयार किया जिससे लोगों को सड़क हादसों के प्रति जागरुक किया जा सके. इसके बाद नीदरलैंड्स में सड़कों औऱ गलियों के बुनियादी ढांचों में बदलाव कर उन्हें लोगों की सहूलियत के हिसाब से सुरक्षात्मक बनाया गया. यहाँ तक कि उनके रंग टेक्सचर और डिजाइन भी पूरी तरह से बदल गए. नीदरलैंड्स में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाले आंकड़ो में तेजी से कमी आई और आज विश्व भर में सड़क दुर्घटना में होने वाली मौत का आंकड़ा नीदरलैंड्स में सबसे कम है. नीदरलैंड्स आज विश्व के सबसे साइकिल फ्रेंडली देशों में शामिल है. 2012 में भारत में कुल 440042 सड़क दुर्घटनाएं हुईं जिनमें 139091 लोगों ने अपनी जान गवां दी. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक मरने वालों में 11571 पैदल यात्री थे. आईआरएफ के आंकड़ों की मानें तो ये आंकड़ा पिछले 10 सालों में लगभग दोगुना हो गया है. अंतरराष्ट्रीय सड़क महासंघ के अनुसार भारत में सड़क दुर्घटनाओं से सरकार को हर साल एक लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है. अंतरराष्ट्रीय सड़क महासंघ आईआरएफ एक गैरलाभकारी संस्था है जो सड़क व्यवस्था संबंधी मामलों की देख-रेख करती है. योजना आयोग की ओर से साल 2001-2003 में कराए गए एक शोध में पता चला था कि वर्ष 1999-2000 में हुई सड़क दुर्घटनाओं में 55 हज़ार करोड़ रूपए का नुक़सान हुआ था. भारत में यातायात नियमों के लिए चलने वाले अभियान सड़क सुरक्षा सप्ताह और सम्मेलनों तक ही सिमट कर रह जाते हैं. सड़क सुरक्षा पर एक सम्मेलन के दौरान दिल्ली के संयु्क्त पुलिस आयुक्त यातायात सत्येंद्र गर्ग ने माना था कि साल 1988 के मोटर गाड़ी कानून के तहत जुर्माने के प्रावधान काफी अप्रभावशाली है. अराईव सेफ़ नाम की एक गैरसरकारी संस्था का भी कहना है कि यातायात नियमों की अनदेखी पर मामूली जुर्माना लगाना उसे बढ़ावा देने जैसा है. आइएनएस के अनुसार इसी गैरसरकारी संस्था के सदस्य हरमन सिंह सिद्धू ने कहा संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2011-2012 को सड़क सुरक्षा के लिए कदम उठाने का साल घोषित किया था इसके बावजूद भारत में इसपर कोई ध्यान नहीं दिया गया. ये इस मुद्दे पर हमारी गंभीरता को दर्शाता है. हरमन सिंह सिद्धू का कहना है कि पूरी दुनिया में होने वाले सड़क हादसों के मामलों का भारत 10 फीसदी हिस्सेदार है. ये हाल तब है जब दुनियाभर के कुल गाड़ियों का सिर्फ एक फीसदी हिस्सा भारत में है. सिद्धू के अनुसार वियतनाम कंबोडिया और युगांडा जैसे देशों ने भी वैश्विक हेल्मेट टीका अभियान को अपनाया है लेकिन भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण भारत अब तक इससे दूर है. |
| DATE: 2013-11-29 |
| LABEL: science |
| [174] TITLE: फ़्रिज बताएगा क्या पकाओ और 3डी प्रिंटर छापेगा पकवान |
| CONTENT: भविष्य का किचन आपके मित्र जैसा होगा. वह खाना पकाने ख़रीदारी करने और अधिकतम साफ़-सफ़ाई के साथ ज़रूरी ख़ुराक लेने में मदद करेगा. इस तरह की कई अन्य तकनीक हमारे पास पहले ही हैं. मसलन वाई-फ़ाई वाले टैबलेट जैसी स्क्रीन से लैस स्मार्ट फ़्रिज में बारकोड स्कैनिंग की सुविधा आपको रखे हुए खाने से लेकर उसके एक्सपायरी डेट तक के बारे में जानकारी देता है. यहां तक कि ये उपलब्ध खाद्य पदार्थों के आधार पर रेसिपी भी बताते हैं और इसकी जानकारी आपके स्मार्टफ़ोन पर भेज देते हैं. किचन के ज्यादातर उपकरण अब पूरी तरह डिजिटल में रूपांतरित हो चुके हैं. सब्ज़ी काटने के बोर्ड से लेकर बहुपयोगी ओवन तक. और जिस तेज़ी से इंटरनेट का प्रसार हो रहा है वह दिन दूर नहीं जब ये सारे उपकरण एक दूसरे से वायरलेस के रूप में जुड़ जाएंगे. सियोभान एंड्र्यूज़ ने एक ऐसा टच स्क्रीन चॉपिंग ब्लॉक बनाया है जो टुकड़ों के आकार के आधार पर आपको बता देता है कि खाने वालों की तय संख्या के लिए पर्याप्त है. इसे गेटइटडाउनऑनपेपर प्रतियोगिता में पुरस्कार भी मिल चुका है. इसका विकास शार्प लेबोरेटरीज़ ऑफ़ यूरोप एंड ह्यूमन इनवेंट द्वारा प्रायोजित था. टफेंड ग्लास से बना यह चॉप सिंक आपकी ऑनलाइन ख़रीदारी लिस्ट में से रेसिपी सुझा सकता है और सुपर मार्केट को ऑर्डर भी भेज सकता है. 2013 के इलेक्ट्रोलक्स डिज़ाइन लैब प्रतियोगिता में न्यूट्रिमा फ़ूड एनॉलिसिस मैट का प्रोटोटाइप अंतिम विजेताओं में शामिल रहा. इसे फ़िनलैंड की जेन पालोवूरी ने बनाया है. यह मैट खाद्य पदार्थ का भार इसमें मौजूद विषैले प्रदूषण के साथ ही इसके पोषण तत्व के बारे में भी बताता है. इसे उर्ध्वार्धर या क्षैतिज किसी भी तरह से रखा जा सकता है. ये किचन गैजेट भविष्य में स्मार्ट फ़्रिज जैसे उपकरणों से सीधे सूचनाएं साझा करने लगेंगे. खाने की गति और रुझान को ग्राफिक डिस्प्ले के रूप में दर्ज करता है यह हैपी फॉर्क. फ़ैब्रिक बाउटेंस हापी फॉर्क मॉनिटर लेकर आया है जो यह बताता है कि कोई कितनी तेज़ी से खाता है ताकि ख़ुराक नियंत्रित करने में सहूलियत हो. मोटापा कम करने में यह गैजेट काफ़ी मददगार साबित हो सकता है. इस उपकरण से खाने के रुझान का आंकड़ा कम्प्यूटर में फ़ीड हो सकता है और इसे ग्राफ़िक के रूप में देखा जा सकता है. इलेक्ट्रोलक्स के वाइस प्रेसीडेंट हेनरिक ओटो ने बीबीसी को बताया कि अभी भी बहुत सारी तकनीक मौजूद है जो उपभोक्ताओं की दिनचर्या में शामिल नहीं है जैसे कि इंडक्शन कुकर. यह बिजली के इस्तेलाम से एक ऐसा चुंबकीय क्षेत्र पैदा करता है जो फेरोमैग्नेटिक पैन को गर्म कर देता है. यह परम्परागत गैस या हीटर क्वायल से ज्यादा किफ़ायती है. ओटो के अनुसार इंडक्शन कुकर बेहद सटीक तापमान पर खाना पकाता है. ऐसे बर्तन भी अब आ गए हैं जिसका संवेदनशील हिस्सा ही गर्म होगा. लेकिन ओटो यह महसूस करते हैं कि इसका इस्तेमाल का चलन अभी व्यापक नहीं हो पाया है. वह सवालिया लहजे में कहते हैं क्या हो यदि आपका पूरा किचन इंडक्शन तकनीकी से लैस हो या क्या हो यदि यह अन्य उपकरणों को भी चार्ज करने का काम करेउदाहरण के लिए आपके लीविंग रूम में कॉफ़ी टेबल इंडक्शन कुक टॉप हो जो कॉफ़ी बनाने के साथ रातभर आपका लैपटाप चार्ज कर सकता है. बर्सिलोना स्टार्टअप नेचुरल मशीन एक ऐसा 3डी प्रिंटर का प्रोटोटाइप है जो मनचाहा डिश बना सकता है. इसे फूडिनी ने विकसित किया है. इससे चॉकलेट कुकीज़ आदि इंस्टेंट खाद्य पदार्थ बनाया जा सकता है. तकनीकी रूप से यह प्रिंटिंग नहीं है. एक पाइप के मार्फ़त इससे कई तरह की खाने की चीज़ें बनाई जा सकती हैं. इसमें छह अलग-अलग तत्वों के लिए हौज़ पाइप लगे होते हैं. इससे डिज़ाइन किए गए डिश का निर्माण होता है. अंतरिक्षयात्रियों को भोजन मुहैया कराने के लिए नासा भी इस तरह के प्रोटोटाइप का परीक्षण कर रहा है. |
| DATE: 2013-11-28 |
| LABEL: science |
| [175] TITLE: ढलती उम्र में भी कसरत फ़ायदेमंद |
| CONTENT: शोधकर्ताओं का दावा है कि 60 की उम्र में भी व्यायाम शुरू करना ख़राब सेहत और डिमेंशिया से आपको बचाए रख सकता है. ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में प्रकाशित अध्ययन में 3500 ऐसे स्वस्थ लोगों का सर्वेक्षण शामिल है जो या तो रिटायर हो चुके हैं या होने वाले हैं. इनमें जिन लोगों ने व्यायाम शुरू किया वे अपनी उम्र के दूसरे लोगों की अपेक्षा आठ वर्ष अधिक स्वस्थ बने रहते हैं. व्यायाम दिल का रोग दिल का दौरा मधुमेह अल्ज़ाइमर और अवसाद जैसे रोगों का ख़तरा कम करता है. जिन लोगों ने 60 साल की उम्र में व्यायाम शुरू किया उन्हें आम तौर पर रोज़ाना के काम जैसे कपड़े धोने आदि में कम परेशानी का सामना करना पड़ा. आठ साल तक निगरानी के बाद पता चला कि सर्वे में शामिल सहभागियों में 20 प्रतिशत लोगों को कोई बड़ी मानसिक या शारीरिक बीमारी नहीं थी. इस समूह में ज़्यादातर ऐसे लोग थे जो हमेशा से व्यायाम करते रहे थे. इनके अलावा वे लोग थे जिन्होंने इसकी शुरुआत की थी. इसमें ऐसे लोग भी थे जिन्होंने कभी व्यायाम नहीं किया था. शोधकर्ताओं का मानना है कि ताउम्र व्यायाम करना एक आदर्श स्थिति है पर यदि आप देर से भी शुरू करते हैं तो भी यह स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद है. शोध का नेतृत्व करने वाले और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन से जुड़े डॉक्टर मार्क हैमर ने कहा उम्र ढलने पर भी लगातार चलने-फिरने का संदेश वाकई उपयोगी है. उन्होंने कहा अगर आप सक्रिय नहीं रहते तो आपको स्वास्थ्यगत समस्याएं आ सकती हैं. अध्ययन के अनुसार सप्ताह में एक बार कड़ी या सामान्य मेहनत करने वाले बुजुर्ग निष्क्रिय रहने वाले दूसरे हमउम्र लोगों की अपेक्षा तीन से चार गुना ज़्यादा स्वस्थ रहते हैं. डॉक्टर हैमर कहते हैं कि शारीरिक व्यायाम का मतलब जिम जाना या दौड़ना नहीं है. क्यारियां बनाना या चलना-फिरना भी मदद करता है. स्वास्थ्य विभाग के अनुसार 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों समेत सभी वयस्कों को सप्ताह में ढाई घंटे तक शारीरिक मेहनत करनी चाहिए. ब्रिटिश हार्ट फ़ाउंडेशन से जुड़े डोरियन मैडॉक कहते हैं सबसे बढ़िया तरीक़ा है ख़ुद को सक्रिय बनाए रखने की आदत डाल लेने का. जैसा हम जानते हैं इससे हृदयाघात समेत कई बीमारियों का ख़तरा कम हो जाता है. उन्होंने कहा यहां तक कि अपने स्टॉप से पहले ही बस से उतरकर 10 मिनट तक पैदल चलना या दोपहर के भोजन के बाद टहलना भी फ़ायदेमंद है. |
| DATE: 2013-11-27 |
| LABEL: science |
| [176] TITLE: आधुनिक जीवन में 'सेक्स के लिए नहीं है वक्त' |
| CONTENT: शोधकर्ताओं की माने तो पैसों की चिंता और सोशल मीडिया के कारण ब्रिटेन के लोग पहले से कम सेक्स कर रहे हैं. करीब 15000 ब्रितानी लोगों पर किए गए इस शोध के अनुसार 16-44 आयु वर्ग के ब्रितानी हर महीने पांच बार से कम बार शारीरिक संबंध बनाते हैं. जबकि पिछले दो सर्वेक्षणों के नतीजों के मुताबिक लोग एक महीने में छह बार से ज़्यादा सेक्स किया करते थे. नैशनल सर्वे ऑफ़ सेक्शुअल ऐटीट्यूड्स ऐंड लाइफ़स्टाइल्स ने वर्ष 1990-91 और वर्ष 1999-2001 में ऐसे ही दो सर्वेक्षण कराए थे. अध्ययन करने वालों का कहना है कि आधुनिक जीवन शैली का असर लोगों की शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा पर हो रहा है. यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लंदन की डॉक्टर कैथ मर्सर का कहना है लोग अपने काम को लेकर चिंतित हैं पैसे को लेकर परेशान हैं वे सेक्स करने के मूड में नहीं हैं. मर्सर कहती हैं लोगों के पास स्मार्टफ़ोन और टैबलेट हैं और वो उन्हे बेडरूम में भी ले जाते हैं ट्विटर फ़ेसबुक करते हैं और ईमेल का जवाब देते हैं. मर्सर ये भी बताती हैं कि सर्वेक्षण के मुताबिक़ 16 से 44 के आयुवर्ग में लोग संभवत सेक्स की जगह ऑनलाइन पॉर्न देख रहे हैं. सर्वेक्षण के अनुसार साल 2010 से 2012 के बीच पुरुषों ने 4-9 बार और महिलाओं ने 4-8 बार सेक्स किया. हर 10 साल पर कराए जाने वाले इस सर्वेक्षण के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों में सेक्स की प्रवृत्ति बढ़ी है. पिछले सर्वेक्षण में यह 29 फ़ीसदी था जो बढ़कर 31 प्रतिशत हो गया है. सर्वेक्षण में वरिष्ठ नागरिकों से भी उनकी ज़िंदगी में सेक्स की स्थिति पर बात की गई जिससे पता चला कि 65 से 74 साल के नागरिकों में से 42 फ़ीसदी महिलाओं और 60 फ़ीसदी पुरूषों ने सेक्स किया था. हालांकि वे सबसे कम शारीरिक संबंध बनाने वालों में हैं जिनमें पुरूषों ने महीने में केवल 2-3 बार और महिलाओं ने 1-4 बार सेक्स किया. |
| DATE: 2013-11-26 |
| LABEL: science |
| [177] TITLE: चीनः एक बच्चा नीति के साइड इफ़ेक्ट |
| CONTENT: एक ऐसे संसार में बड़ा होना जहां न भाई हो और न बहन तो कैसा होगा क्या भाई-बहन वाक़ई ज़िदगी में इतने महत्वपूर्ण हैं शोधकर्ता इस पर सालों से विचार कर रहे हैं. इसका जवाब जानने के लिए चीन का उदाहरण सबसे उपयुक्त है क्योंकि यहाँ तीन दशक से एक संतान नीति लागू है. इस नीति के लागू होने से पहले चीनी परिवार में औसतन चार बच्चे हुआ करते थे. वर्ष 1979 में एक संतान नीति लागू होने के बाद यहां ज़िंदगी पूरी तरह से बदल गई. लगभग एक पीढ़ी के बाद दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले इस देश में पिछले हफ़्ते इस नीति में ढील देने का निर्णय लिया गया. चीन के अपेक्षाकृत पिछड़े प्रांत गांशू से लौटे आर्ट फ़ोटोग्राफर फ़ान शी सैन बताते हैं क़स्बे की सड़कों पर चटख लाल रंग के बैनर लगे हुए हैं. ये बताते हैं कि लोगों को बच्चे कम से कम और सूअर ज़्यादा से ज़्यादा पैदा करने चाहिए. फ़ान ख़ुद भी एक ही संतान के पिता हैं. उन्होंने ऐसे इकलौते बच्चों की तस्वीरें लीं जो भाई-बहन की जगह टेडी बीयर के साथ बड़े हो रहे थे. उन्होंने बताया कि अधिकतर लोगों को इसका अहसास नहीं कि उनकी एक विशेष पहचान है. लोग अब इस नीति पर सवाल उठाना भी बंद कर चुके हैं. साल 1979 में जब यह नीति लागू हुई थी तब उन लोगों को भारी परेशानी हुई जो परंपरागत रूप से बड़े परिवारों में रहने के आदी थे. मगर इन परिस्थितियों में बड़ी हुई संतानें इससे अनभिज्ञ थीं. मैसाच्युसेट्स में एमहर्स्ट कॉलेज की समाजशास्त्री वानेसा फ़ॉग ने 1997 से ही 2273 चीनी बच्चों के एक समूह पर नज़र रखी. इन बच्चों को वो सिंगलटंस कहती हैं. उन्होंने इस समूह के 600 से 1300 बच्चों का हर साल साक्षात्कार लिया और यह जानना चाहा कि बग़ैर भाई-बहन के उनकी ज़िंदगी कैसी कट रही है इन बच्चों के लिए चचेरे और आनुवंशिक भाई-बहन में अंतर समझना मुश्किल रहा क्योंकि ये बच्चे आनुवंशिक भाई-बहन के बिना ही बड़े हुए हैं. यहां तक कि इस समूह के किशोरवय बच्चों को भी समझाना पड़ता है कि उनका कोई आनुवंशिक भाई या बहन नहीं है. फ़ॉग बताती हैं वे कहते हैं हां मेरे कई भाई-बहन हैं. और मैं कहती हूं वह कैसे क्योंकि बहुत सारे लोगों के भाई-बहन ही नहीं हैं और उनका जवाब होता है ओह मैं अपनी चाची के बच्चों के बारे में बात कर रहा हूं. इसके अलावा ये बच्चे एक और अनुभव से गुजरते हैं. फ़ॉग बताती हैं हर परिवार के पास शिक्षा और उपभोग के लिए अचानक आमदनी की एक बड़ी राशि आ गई है क्योंकि जो संसाधन कई बच्चों को पालने में खर्च होते थे अब वह एक बच्चे पर होते हैं. नतीजतन चीन की ये अकेली संतानें अपनी पिछली पीढ़ी से ज़्यादा शिक्षित हैं. इससे चीन की शिक्षा भी रातों-रात महंगी हो गई है. पहले अभिभावक आमतौर पर अपने बच्चों में से किसी एक को ही स्कूल में पढ़ाने पर ध्यान देते थे. अब एक ही बच्चे पर माता-पिता दोनों का ध्यान रहता है. बीजिंग में पली-बढ़ीं 32 वर्षीय जे यांग कहती हैं मेरे ड्राइवर पिता और अकाउंटेंट मां ने अपना पूरा वक़्त मुझे दिया. इससे मेरी ज़िंदगी की राह ही बदल गई. उन्होंने स्वीकार किया कि अगर उनके और भाई-बहन होते तो माता-पिता इतना ध्यान न देते. उनके पिता की पीढ़ी के चीनी अभिभावक अपने बच्चों की ज़िंदगी की दिशा तय करना पंसद करते हैं. जे यांग एक फ़ार्मास्यूटिकल कम्पनी में सेल्स एक्जिक्यूटिव हैं. विपणन का काम आमतौर पर चीनी मध्यवर्ग का पसंदीदा पेशा है. वह कहती हैं अगर उम्मीदों पर खरा उतरने का दबाव न होता तो मैं कोई और पेशा चुनती. अगर मौक़ा मिले तो वह टूरिज़्म इंडस्ट्री में जाना चाहती हैं या फिर बीज़िंग छोड़ना चाहती हैं. हालांकि वह इकलौती संतान होने को सकारात्मक भी मानती हैं. वह कहती हैं इकलौती होने के कारण मुझे ज़्यादा प्यार मिला. मैं अपने अभिभावकों को किसी और से साझा नहीं करना चाहती. यह डर था कि अकेली संतान नीति का कुछ दुष्प्रभाव हो सकता है. लेकिन चीनी शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययनों समेत कई दूसरे अध्ययनों में पाया गया है कि ऐसे बच्चों के व्यक्तित्व में विकृति नहीं है. इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि ये बच्चे अन्य से किसी भी मायने में अलग हैं. लेकिन कुछ अध्ययनों में कहा गया है कि चीन के ये सिंगलटंस अलग हैं. इस साल ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं ने बीज़िंग में एक अध्ययन करके उसका परिणाम जारी किया है. इसमें गेम्स और सर्वे द्वारा व्यवहारगत लक्षणों को आंकने की कोशिश की गई है. मेलबर्न विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री निस्वा एर्केल बताते हैं हमने पाया कि यह नीति लागू होने के बाद पैदा हुए बच्चे कम भरोसेमंद ख़तरे से विमुख रहने वाले और कम प्रतिस्पर्धी होते हैं. इस सर्वे में हमने पाया कि ऐसे बच्चे ज़्यादा निराशावादी और कम आत्मबल वाले होते हैं. 1970 और 1980 में पैदा हुए बच्चों को परवरिश के लिए ज़्यादा बड़े परिवार मिले जबकि हाल में पैदा हुए बच्चों को बहुत छोटा परिवार मिला. फ़ॉग कहती हैं चीन बहुत बदल गया है संबंध उतने क़रीबी नहीं रहे जितने पहले थे. पहले पलायन नहीं होता था लेकिन अब देश के अंदर और बाहर दोनों तरह का पलायन तेज़ हो गया है. जे यांग की एक ही बेटी है. हालांकि जे को दूसरे बच्चे की इजाज़त मिल गई है. हालांकि वह तब तक दूसरे बच्चे की योजना नहीं बनाना चाहतीं जब तक कि उसके ख़र्च आदि के बारे में सुनिश्चित न हो जाए. चीन में कई जगह एक संतान नीति अब भी लागू है लेकिन वह दिन दूर नहीं जब यह इतिहास की बात हो जाएगी. फिर भी इस बात पर बहस चलती रहेगी कि इस नीति से सिंगलटन को नुक़सान हुआ या फ़ायदा. |
| DATE: 2013-11-26 |
| LABEL: science |
| [178] TITLE: धुंध से परेशान, ऐप करेगा राह आसान |
| CONTENT: बीजिंग में हताशा पैदा करने वाली सबसे बड़ी परेशानी यहां का घना कुहरा और धुंध है. घर में भी हमारी दिनचर्या प्रदूषण नियमों के अनुरूप होती है कि बच्चे कब बाहर खेल सकते हैं या कब बाहर निकलना ज़्यादा सुरक्षित होगा. शहर के प्रमुख स्थानों पर लगे मॉनीटर पर प्रदूषण के स्तर पीएम 2-5 पार्टिकिल्स की जानकारी हर घंटे अपडेट होती रहती है. अमरीकी दूतावास के एयर क्वालिटी इंडेक्स के अनुसार हवा की गुणवत्ता का स्तर 50 से नीचे होता है तो इसे सेहत के लिए न्यूनतम ख़तरा माना जाता है. यदि पीएम 2-5 का स्तर 100 से नीचे होता है तो मेरी बेटी जितनी देर चाहे बाहर खेलने-कूदने के लिए स्वतंत्र है. यदि यह रीडिंग 100 से 200 के बीच हो तो वह दिन में केवल दो बार बाहर जा सकती है वह भी 15-15 मिनट के लिए. जब प्रदूषण का स्तर 200 के ऊपर पहुंच जाता है तो खेल का मैदान सपना बन जाता है. भारी धुंध के दिन यदि मेरी बच्ची सुरक्षा घेरे के बाहर जाना चाहे तो उसे केवल अंदर ही खेलकूद वाले क्षेत्र में जाने की इजाज़त है जो स्वाभाविक तौर पर पड़ोसी का घर होता है. लेकिन जब प्रदूषण का स्तर अधिकतम होता है तो ऐसे अभिभावक आसानी से मिल जाएंगे जो अपने बच्चे का ध्यान बाँटने की कोशिश कर रहे होते हैं. यह स्वीकार करने में हर्ज़ नहीं कि ये नियम-क़ायदे अनिवार्य हैं और ये मेरी बच्ची को प्रदूषण के दुष्प्रभाव से पूरी तरह बचा पाने में अक्षम हैं. जब हम अपने बच्ची को घर में ही सीमित रखने के लिए मजबूर होते हैं तो इस अपराधबोध से भी ये मुक्त नहीं करा पाते. एक नया ऐप बानशायर्न बीजिंग वासियों को प्रदूषण की पूर्व जानकारी देता है. लेकिन एक मोबाइल ऐप से इस समस्या से निजात पाने की उम्मीद बढ़ी है. धुंध का पूर्वानुमान करने वाला यह निःशुल्क मोबाइल ऐप बताता है कि चीन की राजधानी की आबोहवा कब स्वच्छ होगी. बानशायर्नडॉटकॉम का निर्माण करने वाले डस्टिन गर्जेसिक ने इस ऐप को बनाया है. पेशे से वह जियोफिज़िसिस्ट भूभौतिक-विज्ञानी हैं और शहर के मौसम के मिजाज का विश्लेषण कर उन्होंने पहली बार इस तरह का ऐप बनाया है. वह कहते हैं यह बहुत साफ़ है कि यदि आप बीज़िंग में हैं और उस समय उत्तरी हवाओं का जोर है तो ज़्यादा संभावना है कि प्रदूषण का स्तर बहुत कम हो. हालांकि अभी तक केवल कुछ लोग ही इस ऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं ख़ासकर साइकिल से चलने वाले वे लोग जो समूह में बाहर जाने की योजना बनाते हैं. डस्टिन ने इस शहर को तोहफ़ा तो दिया है लेकिन वह ख़ुद अपने ढाई साल के बेटे को स्वच्छ आबोहवा मुहैया कराने के लिए कुछ दिन के लिए सैन फ्रांसिस्को चले गए थे. डस्टिन बताते हैं कि पिछले सालों के आंकड़े को देखने और पिछले साल भारी धुंध का सामना करने के बाद हमने निर्णय लिया कि बेटे के लिए हमें बाहर जाना होगा. पिछले साल जनवरी में वायु प्रदूषण का स्तर 800 के ऊपर चला गया था. डस्टिन की परेशानी समझी जा सकती है. लेकिन अब हमारे पास ऐप है जो यह पूर्वानुमान करने में हमारी मदद करेगा कि बीज़िंग का आकाश कब साफ़ रहेगा. यदि मैं और मेरी बेटी अगले दिन शाम पांच बजे बाहर जाने की योजना बनाएं तो बानशायर्न इस बात का वादा करता है कि हमें स्वच्छ वायु मिलेगी. |
| DATE: 2013-11-26 |
| LABEL: science |
| [179] TITLE: बच्चों से तेज़ रफ़्तार उनके मम्मी-पापा |
| CONTENT: ज़्यादातर बच्चे जवानी के दिनों में अपने माता-पिता जितना तेज नहीं दौड़ पाते हैं. ग्लोबल फ़िटनेस के एक ताज़ा शोध में पता लगा है कि बच्चों में तंदुरुस्ती का स्तर गिर रहा है. इस रिपोर्ट को अमरीकी हार्ट एसोसिएशन की सालाना बैठक में पेश किया जाएगा. शोधकर्ताओं ने 46 साल के आंकड़े जुटाए. इस शोध में 28 देशों के ढाई करोड़ से अधिक लोगों को शामिल किया गया. शोधकर्ताओं ने बताया कि आज बच्चे 30 साल पहले अपने माता-पिता के मुक़ाबले एक मील की दूरी 90 सेकेंड की देरी से तय करते हैं. दुनिया भर में ह्रदयवाहिनी की क्षमता के आधार पर पता लगाया जाता है कि एक निश्चित समय में बच्चे कितनी दूर तक दौड़ सकेंगे. नतीजों से पता चला है कि यह क्षमता हर दशक में करीब पांच प्रतिशत की दर से घटती गई है. यह गिरावट नौ से 17 साल की उम्र तक के सभी लड़कों-लड़कियों में देखी गई. इसकी वजह मोटापा बताया गया है और कुछ देशों में इसकी स्थिति काफ़ी ख़राब है. इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर ग्राट टॉमकिंसन ने बताया वास्तव में क़रीब 30 प्रतिशत से 60 प्रतिशत तक गिरावट सीधे पेट की चर्बी से जुड़ी है. टॉमकिंसन यूनीवर्सिटी ऑफ साउथ आस्ट्रेलिया के स्कूल ऑफ हेल्थ साइंसेज़ से जुड़े हुए हैं. यह समस्या मुख्य रूप से पश्चिमी देशों में है लेकिन दक्षिण कोरिया चीन और हान्गकॉन्ग जैसे कुछ एशियाई देशों में भी ऐसा देखा गया है. डॉक्टर टॉमकिंसन ने कहा कि बच्चों को अधिक शारीरिक परिश्रम और व्यायाम करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है. अगर ऐसा नहीं किया गया तो सार्वजनिक स्वास्थ्य पर इसके नकारात्मक नतीजे देखने को मिलेंगे. डॉक्टर टॉमकिंसन का कहना है अगर कोई युवा व्यक्ति आमतौर पर अस्वस्थ्य रहता है तो इसकी आशंका रहती है कि आगे चलकर वो ह्रदयरोग का शिकार हो जाए. स्वस्थ रहने के लिए बच्चों और युवाओं को दिन में कम से कम एक घंटे दौड़ने या साइकिल चलाने जैसी शारीरिक गतिविधि ज़रूर करनी चाहिए. |
| DATE: 2013-11-25 |
| LABEL: science |
| [180] TITLE: बादाम खाइए, लंबी उम्र पाइए |
| CONTENT: एक ताज़ा शोध के मुताबिक़ नियमित रूप से बादाम खाने वाले लोग लंबी उम्र जीते हैं. न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन में प्रकाशित शोध के अनुसार उन लोगों को सबसे ज़्यादा फ़ायदा होता है जो रोज़ाना चबाकर-चबाकर बादाम खाते हैं. हालांकि ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन का कहना है कि बादाम और लंबी उम्र के बीच के रिश्ते को साबित करने के लिए अभी और ज़्यादा शोध की ज़रूरत होगी. अमरीकी टीम ने इस शोध में एक लाख 20 हज़ार लोगों पर 30 साल तक नज़र रखी गई. रोज़ाना एक मुट्ठी बादाम का सेवन करने वालों की मृत्युदर में 20 फ़ीसदी तक कमी देखी गई. डाना-फैबर कैंसर इंस्टीट्यूट और ब्रीगम एंड वीमंस हॉस्पिटल के मुख्य शोधकर्ता डॉक्टर. चार्ल्स फक्स ने कहा बादाम खाने से हृद्य रोगों से होने वाली मौतों में 28 प्रतिशत की कमी देखी गई है. इसके अतिरिक्त कैंसर से होने वाली मौतों में 11 प्रतिशत तक की कमी देखी गई. बादाम के सेवन को स्वस्थ जीवनशैली से जोड़कर देखा गया. इसमें धूम्रपान और मोटापे की कम संभावना के साथ-साथ अधिक व्यायाम करने की संभावना को भी शामिल किया गया. हालांकि शोधकर्ताओं ने साथ ही कहा कि संभव है कि यह प्रक्रिया नियमित रूप से बादाम का सेवन करने वालों और बाक़ी लोगों के बीच फर्क़ को सामने न लाए. लेकिन उन्होंने कहा कि इससे शोध के निष्कर्षों में बदलाव की संभावना बेहद कम है. वो बताते हैं कि बादाम का सेवन कोलेस्ट्रॉल और सूजन को कम करता है. ब्रिटिश हृद्य संस्थान में वरिष्ठ आहार विशेषज्ञ विक्टोरिया टेलर कहती हैं यह अध्ययन नियमित रूप से बादाम के सेवन और हृद्य रोगों से संभावित मौतों के बीच कमी में एक संबंध स्थापित करता है. उन्होंने कहा यह एक रोचक संबंध है लेकिन हमें और शोध करने की ज़रूरत है ताकि हम साफ़ कर सकें कि बादाम का सेवन हृद्य रोगों से बचाता है या फिर इसके पीछे जीवनशैली का कोई और पहलू भी है. उनके अनुसारबादाम में संतृप्त वसा प्रोटीन और विभिन्न तरह के विटामिन और खनिज होते हैं जो इसे चॉकलेट केक और बिस्किट की तरह खाने योग्य बनाते हैं. |
| DATE: 2013-11-22 |
| LABEL: science |
| [181] TITLE: स्मार्ट टीवी आपकी 'जासूसी' तो नहीं कर रहा? |
| CONTENT: इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने वाली कंपनी एलजी पर इंग्लैंड के एक आईटी कंसल्टेंट ने जासूसी करने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि प्राइवेसी सेटिंग को एक्टिवेट करने के बावजूद एलजी के स्मार्ट टीवी लोगों की टीवी देखने की आदत के बारे में कंपनी को विस्तृत जानकारी भेजते हैं. एलजी इन आरोपों की जांच कर रही है. हल के आईटी कंसल्टेंट जैसन हंटले ने एक ब्लॉग में लिखा है कि आप कौन से चैनल देख रहे हैं इसकी जानकारी स्मार्ट टीवी एलजी को भेजता है. उनकी जांच में यह भी सामने आया कि स्मार्ट टीवी उससे जुड़े अन्य उपकरणों की जानकारी भी कंपनी को देता है. इसका मतलब यह हो सकता है कि एलजी ने नियमों का उल्लंघन किया है. इस बारे में ब्रिटेन के सूचना आयुक्त कार्यालय ने कहा है कि वो मामले को देख रहे हैं. एक प्रवक्ता ने कहा हमें हाल ही में जानकारी मिली है कि गोपनीयता का उल्लंघन किया गया इसमें एलजी का स्मार्ट टीवी भी शामिल हो सकता है. उन्होंने कहा कि मामले की जांच की जा रही है और इसके बाद क्या कार्रवाई की जाएगी इस बारे में फ़ैसला किया जाएगा. जैसन हंटले ने जब दक्षिण कोरियाई कंपनी एलजी से संपर्क किया तो उनसे कहा गया कि एलजी के टीवी का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने कंपनी की शर्तों और नियमों को स्वीकार किया है और अगर इसके बाद भी उनकी कोई शिकायत है तो उन्हें उस दुकानदार से संपर्क करना चाहिए जिससे उन्होंने टीवी खरीदा था. लेकिन जब बीबीसी ने एलजी से संपर्क किया तो उसने इस तरह के संकेत दिए कि वो शिकायत पर ध्यान दे रही है. कंपनी के एक प्रवक्ता ने कहा एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए उपभोक्ता की गोपनीयता शीर्ष प्राथमिकता है और इसलिए हम मामले को बेहद गंभीरता से ले रहे हैं. एलजी स्मार्ट टीवी पर यूजर्स के देखने के बारे में कुछ सूचनाएं बिना सहमति के शेयर की जा रही है हम इसकी जांच कर रहे हैं. उन्होंने कहा एलजी अलग-अलग बाज़ारों के लिए विभिन्न फीचर वाले स्मार्ट टीवी पेश करती है ऐसे में हम आपसे धैर्य और समझदारी की अपेक्षा करते हैं. हम मामले की जांच कर रहे हैं. हंटले ने कहा कि उनको इस बारे में अक्टूबर में पता चला. इसके बाद उन्होंने यह जानने की कोशिश की उनके परिवार के अनुरूप विज्ञापन टीवी के यूजर इंटरफेस पर कैसे दिख रहा है. इसके बाद टीवी के मेनू सिस्टम में जाने पर उनको पता चला कि उसमें पहले से ही कलेक्शन ऑफ वाचिंग इंफो विकल्प को ऑन किया गया है. इस विकल्प को ऑफ करने के बाद भी उन्होंने पाया कि हर चैनल के बारे में विस्तृत जानकारी एलजी के कंप्यूटर सर्वर्स को भेजी जा रही है लेकिन इस बार ऐसे संकेत दिए गए कि यूजर ने इसको नहीं चुना है. इसके बाद उन्होंने टीवी में यूएसबी पोर्ट के ज़रिए उससे एक एक्सटर्नल ड्राइव को जोड़ा. उन्होंने सोचा कि टीवी केवल यह दिखाएगा कि आप एक एक्सटर्नल ड्राइव से सामग्री देख रहे हैं. लेकिन इसमें हर मीडिया फाइल का नाम बच्चों के नाम से सेव की गई फ़ोटो फाइल आदि एलजी को भेजे जा रहे हैं. हंटले का कहना है कि हो सकता है कि एलजी ने कभी भी इन डेटा की जांच नहीं की हो लेकिन तब भी यह सुरक्षा की दृष्टि से काफी अहम है. एलजी के प्रवक्ता ने कहा है कि कंपनी जल्द ही इस बारे में टिप्पणी करेगी. |
| DATE: 2013-11-21 |
| LABEL: science |
| [182] TITLE: चीन का सुपरकंप्यूटर है दुनिया में सबसे तेज़ |
| CONTENT: चीन के सुपरकंप्यूटर तियानहे-2 ने दुनिया के सबसे तेज़ कंप्यूटर सिस्टम का अपना ख़िताब बरकरार रखा है. लिनपैक नामक मानक टेस्ट के अनुसार तियानहे-2 33-86 पेटाफ़्लॉप प्रति सेकेंड यानी 338630 खरब प्रति सेकेंड की दर से गणना कर सकता है. तियानहे-2 पहली बार इस वर्ष जून में दुनिया का सबसे तेज़ कंप्यूटर सिस्टम बना था. जून में आई सूची में मात्र एक बदलाव हुआ है. स्विट्ज़रलैंड के कंप्यूटर पिज़ डेंट ने इस सूची में छठा स्थान प्राप्त किया है. पिज़ डेंट 6-27 पेटाफ़्लॉप प्रति सेकेंड की दर से गणना कर सकता है. जर्मनी के मैनहिम विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर के नेतृत्व में साल में दो बार दुनिया के 500 सबसे तेज़ कंप्यूटरों की सूची बनाई जाती है. इस सूची में दूसरे स्थान पर अमरीका का सुपरकंप्यूटर टाइटन है लेकिन तियानहे-2 के अंक टाइटन को मिले अंक से करीब दोगुने हैं. टाइटन अमरीकी ऊर्जा विभाग का सुपरकंप्यूटर है और टेनिसी राज्य के ओक रिज़ नेशनल लेब्रोटरी में रखा हुआ है. सूची बनाने के लिए एक ख़ास तरह के एकरेखीय समीकरण को हल करके कंप्यूटर की गति मापी जाती है. इस परीक्षण में गणना की गति के अलावा डाटा ट्रांसफर जैसे मानकों का आकलन नहीं किया जाता. जबकि इनसे व्यावहारिक उपयोग के दौरान कंप्यूटर के प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ सकता है. इस सूची में पहले दस स्थानों पर रहे कंप्यूटरों में से पाँच कंप्यूटरों के निर्माता आईबीएम ने बीबीसी से हुई बातचीत में कहा कि अब इस सूची को तैयार करने की विधि को अब बदलने की ज़रूरत है और कंपनी इसी सप्ताह कोलाराडो के डेनेवर में होने वाले एक सम्मेलन में इस मुद्दे पर ज़ोर देगी. आईबीएम के ज्यूरिच रिसर्च लैब के कंप्यूटेशनल साइंस विभाग के प्रमुख डॉक्टर अलेसेंद्रो कुरिओनी ने बीबीसी से कहा किसी ख़ास समस्या को हल करने के आधार पर कंप्यूटर की क्षमता और उचच्-क्षमता के कंप्यूटरों के विकास की स्थिति मापने की विधि के अनुसार टॉप 500 की सूची बनाना पिछले दशकों तक उपयोगी तरीका था लेकिन अब हमें ज़्यादा व्यवहारिक तरीका अपनाने की जरूरत है जिससे व्यवहारिक उपयोग के दौरान इन सुपरकंप्यूटर के सबसे महत्वपूर्ण कार्य के आधार पर उनके प्रदर्शन का पता चले. एरिक स्ट्रोहमाएर कहते हैं लाइनपैक जैसे साधारण मानक के सहारे आज के जटिल कंप्यूटर सिस्टम में किसी अप्लीकेशन के वास्तविक प्रदर्शन के बारे में नहीं पता चल सकता. चीनी भाषा में तियानहे-2 का अर्थ होता है मिल्की वे-2. इसे चीन की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेकनॉलजी ने विकसित किया है. यह चीन के दक्षिण-पूर्वी प्रांत गुआनडॉंग में रखा है. इसमें इंटेल के बनाए कई तरह के मिश्रित प्रोसेसर का प्रयोग किया गया है. इसमें विश्वविद्यालय द्वारा डिज़ाइन किए गए ख़ास तरह के सीपीयू सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट का भी प्रयोग किया गया है. हालाँकि सरे विश्वविद्यालय के कंप्यूटर विभाग के प्रोफ़ेसर एलेन वुडवर्ड का कहना है कि अभी यह नहीं कहा जा सकता कि चीन का सुपरकंप्यूटर व्यवहारिक उपयोग में अमरीकी कंप्यूटर से बेहतर है या नहीं. |
| DATE: 2013-11-20 |
| LABEL: science |
| [183] TITLE: ज़िंदगी की 'सेकेंड इनिंग' में रोबोट आएंगे काम |
| CONTENT: दुनिया में उम्रदराज़ लोगों की तादाद बढ़ रही है आम तौर पर नौजवानों के पास उनके लिए वक़्त नहीं है. वैज्ञानिक कहते हैं कि भविष्य में रोबोट इन लोगों की देखभाल मदद और उनके साथ गप्पें मारने की ज़िम्मेदारी संभाल सकते हैं. ब्रिटेन में आज पुरुष की औसत उम्र 89 वर्ष और महिला की औसत उम्र 92 साल है. एक अनुमान के मुताबिक़ दुनिया भर में सन 2050 तक 65 साल से अधिक उम्र के डेढ़ अरब लोग होंगे. जापान में दुनिया की सबसे अधिक वृद्ध आबादी रहती है. वहां के प्रधानमंत्री शिंजो एबे ने 2013 के बजट में घरेलू देखभाल करने में सक्षम रोबोट के विकास के लिए 2-39 अरब येन रखे हैं. टोयोटा कंपनी ऐसी डिवाइस बना रही है जो वृद्धों के आने-जाने में मददगार है. इसी तरह टोली क्रॉप ने वायरलेस सेंसर वाली चटाई तैयार की है जो वृद्ध लोगों के चलने-फिरने के दौरान उन पर निगाह रख सकता है और उन्हें फ़ीडबैक दे सकता है. 24 अंगुलियों वाले एक विशेष रोबोट का विकास किया गया है जो बाल धो सकता है और सिर की मालिश कर सकता है. पैनासोनिक ने जापान के हेयर सैलून में ऐसे रोबोट का इस्तेमाल किया है. वृद्ध लोगों की देखभाल के लिए रोबोट के इस्तेमाल से जुड़े परीक्षण सिंगापुर से लेकर साल्फोर्ड तक सभी जगह किए जा रहे हैं. बर्मिंघम विश्वविद्यालय की रोबोटिक्स परियोजना स्ट्रैडस को यूरोपीय संघ से 80 लाख यूरो की मदद मिली है. स्ट्रैडस रोबोट का परीक्षण इस साल मई में आस्ट्रियन सेवा प्रदाता के साथ किया जाएगा. शुरुआत में सामान्य काम करने की इसकी कुशलता परखी जाएगी. डॉक्टर निक हॉ बताते हैं हम अपने स्टाफ़ के समय को काफ़ी हद तक बचाना चाहते हैं. वह कहते हैं घरेलू सेवा कार्यों में लगे कर्मचारियों के साथ सबसे बड़ी शिकायत यह है कि वो पर्याप्त समय नहीं देते. उनका कहना है हम सामान उठाने और दूसरे सहायक कार्यों पर काम कर रहे हैं. अगर रोबोट दवाओं की ट्रे ला दे जबकि घर के निवासी आपस में बातें करते रहें तो इससे मेलजोल बढ़ेगा. इस परियोजना को उम्मीद है कि रोबोट अधिक सक्रिय और बेहतर देखभाल करने की भूमिका निभा सकते हैं. सेवा कंपनियों और आठ यूरोपीय विश्वविद्यालयों की संयुक्त परियोजना मोबीसर्व प्रोजेक्ट के तहत शोध कार्य हाल में खत्म हुए हैं. इसका मक़सद ऐसा रोबोट तैयार करना है जो दोस्त और साथी हो. ये वृद्ध लोगों को स्वास्थ्य देखभाल से लेकर उन्हें खानपान तक की सलाह दे सकता है. शोधकर्ता एंटोनियो एस्पिंग्रेडेरियो के मुताबिक़ साल्फोर्ड परियोजना के तहत ऐसे रोबोट तैयार किए जा रहे हैं जो लोगों की दिन में 24 घंटे देखभाल कर सकते हैं. केयरबोट पी37 एस65 को बाक़ी चीज़ों के अलावा स्पीच थेरेपी के लिए प्रोग्राम किया जा सकता है और पागलपन के शिकार लोगों का उपचार कर सकते हैं. एस्पिंग्रेडेरियो और उनकी टीम फिलहाल रोबोट के ज़रिए सेवा और इंसानों के ज़रिए की जाने वाली सेवा के बीच तुलनात्मक फ़ायदे और नुक़सान का आकलन कर रही है. उनका मानना है कि मानवीय बातचीत के साथ ही रोबोट सार्थक संवाद के लिहाज़ से पूरक की भूमिका अदा कर सकते हैं. तकनीकी विकास के साथ ही साइंस फ़िक्शन हक़ीकत के क़रीब पहुंच रही है. हाल में आई एक फिल्म रोबोट एंड फ्रैंक में एक वृद्ध व्यक्ति वृद्धाश्रम में जाने के बजाए एक रोबोट खरीदता है. इसके उदाहरण मौजूद हैं कि वृद्धावस्था में रोबोट का साथ लोकप्रिय हो रहा है. जापान के वृद्ध लोगों के बीच सबसे लोकप्रिय रोबोट पारो है. देखने में प्यारा सा यह रोबोट भारी सामान भी उठा सकता है. जापान में एक केयर होम के निवासी काजुओ नाशिमुरा बताते हैं कि मैं इसे इसलिए पसंद करता हूं क्योंकि यह मानवीय भावनाओं को समझता है. लेकिन सिर्फ रोबोट की मदद से इंसानों का अकेलापन दूर नहीं किया जा सकता. एज़ यूके का कहना है कि करीब आधे वृद्ध लोग टेलीविज़न देखना पसंद करते हैं और केयर होम में आने वाले स्वयंसेवकों के साथ बातें करना पसंद करते हैं. एज़ यूके की चैरिटी डायरेक्टर कैरोलिन इब्राहीम कहती हैं कि लोगों की मदद के लिए तकनीकी के इस्तेमाल में कुछ ग़लत नहीं है. उन्होंने कहा हालांकि यह सुनिश्चित करना हमेशा महत्वपूर्ण होगा कि तकनीकी का इस्तेमाल वहीं किया जाए जहां उससे वास्तव में फ़ायदा मिल रहा हो और इसे मानना होगा कि मानवीय स्पर्श का कोई विकल्प नहीं है. |
| DATE: 2013-11-19 |
| LABEL: science |
| [184] TITLE: 'बहती नाक के लिए नहीं है एंटीबायोटिक' |
| CONTENT: डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि नाक बहने और हरे बलगम के इलाज के लिए एंटीबायोटिक नहीं है. उनका कहना है कि ऐसे संक्रमण के इलाज के लिए दवा की ज़रूरत एक प्रचलित मिथक है जिसका कोई आधार नहीं है. पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड और रॉयल कॉलेज ऑफ जनरल प्रैक्टिशनर्स के मुताबिक़ वायरस के कारण अक्सर ये लक्षण दिखते हैं और एंटीबायोटिक के इस्तेमाल से जीवाणुओं की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड ने कहा कि उसने अपने शोध में पाया कि 40 फ़ीसदी लोग मानते हैं कि एंटीबायोटिक से उनकी खांसी अगर बलगम हरा हो जबकि कुछ ही लोग मानते हैं कि उनकी बलगम की समस्या दूर हो जाएगी. पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड की डॉक्टर क्लिओडना मैकनल्टी ने कहा यह एक मिथक है कि हरे बलगम और नाक बहने की परेशानी से जूझ रहे लोगों को ठीक होने के लिए एंटीबायोटिक लेने की ज़रूरत है. उन्होंने कहा कि अधिकांश संक्रमण जिनमें बलगम निकलता है या नाक बहती है वो वायरस के कारण होते हैं. यह अपने आप ठीक हो जाते हैं. हालांकि आप कुछ सप्ताह तक कमज़ोरी महसूस कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि एंटीबायोटिक के प्रति जीवाणुओं के प्रतिरोध की समस्या बढ़ती जा रही है. हर किसी को सामान्य संक्रमण में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल से बचना चाहिए. एंटीबायोटिक दवाएं इंसान के शरीर में मौजूद अरबों जीवाणुओं को प्रभावित करती हैं और इनसे जीवाणुओं की प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हो सकती है. रॉयल कॉलेज ऑफ जनरल प्रैक्टिशनर्स की अध्यक्ष डॉक्टर मौरीन बेकर ने कहा एंटीबायोटिक का अत्यधिक सेवन एक गंभीर जन स्वास्थ्य समस्या है. उनका मानना है कि संक्रमण को ख़त्म करने के लिए इस्तेमाल किए गए एंटीबायोटिक को संक्रमण अपने अनुरूप बना लेता है और इस तरह इलाज बेअसर हो जाता है. ऐसे में एंटीबायोटिक का इस्तेमाल सोच-समझकर करना बहुत ज़रूरी है. बलगम का हरा रंग उस प्रोटीन की वजह से होता है जो रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाती है. |
| DATE: 2013-11-19 |
| LABEL: science |
| [185] TITLE: कंगारू जैसी ममता बनाती है बच्चे को स्वस्थ |
| CONTENT: ब्रिटेन के एक शोधकर्ता का कहना है कि जन्म के बाद बच्चों को कंगारू की तरह शरीर से चिपका कर रखने से समय पूर्व जन्म लेने वाली संतानों की मृत्यु दर और विकलांगता दर में वैश्विक स्तर पर कमी लाई जा सकती है. लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिनएएसएचटीएम से जुड़ी प्रोफ़ेसर जॉय लॉन कहती हैं कि कंगारू केयर जैसा मामूली उपाय इस बचाव का मूलमंत्र है. कंगारू अपने बच्चे को अपने पेट में बनी थैली में रखता है. पूरी दुनिया में करीब डेढ़ करोड़ बच्चों का जन्म समय से पहले ही हो जाता है और बच्चों को होने वाली 10 प्रतिशत बीमारियों के लिए समयपूर्व प्रसव ही जिम्मेदार है. समयपूर्व जन्म लेने वाले बच्चों में करीब दस लाख बच्चों की अकाल मृत्यु हो जाती है. जो बच्चे जीवित रहते हैं उनमें से तीन प्रतिशत बच्चे औसत या गंभीर विकलांगता के शिकार होते हैं और करीब 4-4 प्रतिशत बच्चे मामूली विकलांगता से पीड़ित होते हैं. प्रोफ़ेसर लॉन कहती हैं लोगों की सोच है कि समय पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों को सघन चिकित्सा की ज़रूरत होती है. लेकिन निर्धारित समय से छह सप्ताह या उससे भी अधिक समय पहले जन्म लेने वाले 85 प्रतिशत बच्चों को स्तनपान में मदद करने आवश्यकता होती है. इन बच्चों को नियंत्रित तापमान में रखने की ज़रूरत होती है क्योंकि इन्हें संक्रमण होने का ख़तरा भी ज़्यादा होता है. प्रोफ़ेसर लॉन के अनुसार 32 सप्ताह से पहले तक बच्चों के फेफड़े अपरिपक्व होते हैं और उन्हें साँस लेने में मदद की ज़रूरत होती है. प्रोफ़ेसर बताती हैं अगर साँस की समस्या न हो तो कंगारू केयर सचमुच लाभदायक है. इससे स्तनपान को बढ़ावा मिलतe है और संक्रमण भी कम होता है. संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिन बान की मून ने शुक्रवार को वर्ल्ड प्रिमैच्योर डे के आगमन से पहले कहा समय पूर्व जन्म लेने वाले एक तिहाई बच्चों की स्वास्थ्य जटिलताओं के कारण मृत्यु हो जाती है. इन बच्चों को मामूली खर्चे से बचाया जा सकता है. इसके लिए कोई सघन चिकित्सा की भी ज़रूरत नहीं होती. इसी सप्ताह पीडियाट्रिक रिसर्च जर्नल में प्रकाशित होने वाले शोध के अनुसार लड़कों के समयपूर्व जन्म लेने की संभावना 14 प्रतिशत ज़्यादा होती है और जो लड़के समयपूर्व जन्म लेते हैं उनमें लड़कियों की तुलना में विकलांगता या मृत्यु दर भी अधिक होती है. लर्निंग डिसॉर्डर और सेरिब्रल पॉल्सी जैसी बीमारियाँ समयपूर्व जन्म लेने से होने वाली आम बीमारियाँ हैं. प्रोफ़ेसर लॉन कहती हैं लड़कों में संक्रमण पीलिया प्रसव संबंधी जटिलताएँ जन्मजात बीमारियों का ख़तरा ज़्यादा होता है लेकिन लड़कों को सबसे ज़्यादा ख़तरा समयपूर्व प्रसव से होता है. प्रोफ़ेसर लॉन के अनुसार एक ही समय पर समयपूर्व प्रसव वाले एक लड़की और एक लड़के में मृत्यु और विकलांगता का ख़तरा लड़के में ज़्यादा होता है. लॉन कहती हैं गर्भ में भी लड़कियाँ लड़कों से पहले परिपक्व होती हैं जिसके कारण वो बेहतर स्थिति में होती हैं और उनके फेफड़े और दूसरे अंग ज़्यादा विकसित होते हैं. |
| DATE: 2013-11-17 |
| LABEL: science |
| [186] TITLE: ''कुत्तों का जन्म यूरोप में होने के संकेत'' |
| CONTENT: आदिम और आधुनिक कुत्तों और भेड़ियों के डीएन पर किए गए शोध में पता चला है कि यूरोप में ही पहली बार कुत्तों को पालतू बनाया गया था. इसमें कोई शक नहीं है इंसान के सबसे गहरा दोस्त का जन्म भेड़ियों से हुआ हो लेकिन वैज्ञानिक इनके जन्म के स्थान और समय को लेकर लंबे समय से बहस करते रहे हैं. आदिम और आधुनिक भेड़ियों और कुत्तों के आनुवांशिकों के सैंपलों को आधार बनाकर किए गए इस नए शोध में वैज्ञानिकों ने पाया गया है कि कुत्तों का जन्म 18000 साल पहले यूरोप में हुआ था. ओल्फ़ थालमन और उनके सहयोगियों ने इस शोध को किया जो विज्ञान पत्रिका में छपा है. इससे पहले डीएनए को लेकर जो शोध किए गए थे उसमें पता चलता है कि हर प्रकार की कद काठी के आधुनिक कुत्तों के जन्म का नाता 15000 साल पहले से जोड़कर देखा जा सकता है जब भेड़ियों ने मध्यपूर्व या पूर्व एशिया में ख़ुद को मनुष्यों के समुदाय से जोड़ लिया था. लेकिन इन दावों के साथ दिक्कत ये थी कि जीवाश्म वैज्ञानिकों को कुत्ते जैसे दिखने वाले जानवरों के जो अवशेष मिले वो 30000 साल से ज्यादा पुराने हैं. फ़िनलैंड यूनिवर्सिटी में डॉक्टर और उनकी टीम ने इन विरोधाभासी डीएनए सबूतों का दोबारा अध्ययन किया. वैज्ञानिकों की इस टीम ने आदिम ज़माने के कई प्रकार के जानवरों जिसमें कुत्ते और भेड़िए शामिल थे पर शोध किया. इस शोध में पता चला कि जो आधुनिक कुत्ते थे वे प्राचीन यूरोपीय कुत्तों या भेड़िओं से गहरे तौर पर संबंधित थे. इनका न ही यूरोप के बाहर रहने वाले भेड़ियों से कोई नाता था न यूरोप में रहने वाले आधुनिक भेड़ियों से और क्योंकि जिन कुत्तों का अवशेष लेकर शोध किया गया था वो 18000 साल पुराने थे और उससे ये पता चला कि इन कुत्तों को और भी पहले समय से पालतू बना कर रखा गया था. अगर ये सही है तो इसका मतलब ये हुआ कि कुत्ते भेड़ियों की आबादी से उस समय अलग हो गए जब मनुष्य का समुदाय बना और वे एक जगह रहकर कृषि और शिकार करने लगे. इस बात की भी संभावना है कि इन भेड़ियों ने शिकारियों का पीछा किया हो शायद पहले कुछ दूरी से और वे जिन जानवरों का शिकार करते थे और उन जानवरों का इस्तेमाल होने के बाद जो ढ़ाचा बचता था ये भेड़िए उससे गुज़र बसर करते थे. लेकिन जैसे- जैसे इंसान इनसे कम डरने लगे वे भेड़िए उनके समुदाय में शामिल हो गए. डॉक्टर थलमन कहते हैं आप देख सकते है मनुष्यों के नजदीक रहने के बाद कैसे भेड़ियों को फ़ायदा हुआ क्योंकि उन्हें शिकार किए जानवरों के ढ़ाचे मिले लेकिन इससे मनुष्यों को भी फ़ायदा हुआ होगा. उन्होंने बीबीसी को बताया आपको ये याद करना होगा कि 18000-32000 साल पहले यूरोप में भेड़ियों से भी बड़े जानवर जैसे भालू और लकड़बग्घा होते थे और ऐसे में भेड़ियों का इन इंसानों के पास रहना इन बड़े जानवरों को लेकर एक चेतावनी का संकेत भी दे सकता था. ये एक विश्वसनीय बात लगती है कि कुत्तों को पालतू बनाने का जन्म यहीं से हुआ होगा. हालांकि ये शोध नया है लेकिन ये इस विषय पर आख़िरी शब्द नहीं हो सकता. |
| DATE: 2013-11-17 |
| LABEL: science |
| [187] TITLE: मंगल कैसे बना अमंगल |
| CONTENT: मंगल को हम एक धूल भरे और प्रकटतः एक मृत गृह के रूप में जानते हैं. लेकिन अब ऐसे सबूत मिल रहे हैं कि यह हमेशा ऐसा नहीं था. अधिकतर ग्रह विज्ञानियों के अनुसार ऐसे सबूत है कि कभी यह लाल ग्रह रहने योग्य था. एक ऐसी दुनिया जिसमें भारी वायुमंडल था और इसकी सतह पर पानी बहा करता था. लेकिन माना जाता है कि करीब चार अरब वर्ष वहले मंगल का चुंबकीय क्षेत्र खत्म हो गया. संभवतः एक भारी ऐस्टेरॉयड क्षुद्रग्रह की टक्कर से ऐसा हुआ. यह चुंबकीय क्षेत्र सूर्य की हानिकारक सौर हवाओं से ग्रह की रक्षा करता था. लेकिन इसके बिना मंगल का वायुमंडल धीरे-धीरे साफ़ हो गया. सैद्धांतिक रूप से तो यही कहा जाता है. धरती पर हमारा चुंबकीय क्षेत्र सौर हवाओं को पृथ्वी के दूर रखता है और हमारे वायुमंडल की रक्षा करता है. नासा का मावेन अंतरिक्षयान मंगल के चक्कर लगाएगा और इस सिद्धांत के समर्थन में सबूत जुटाएगा. ख़ासतौर पर यह उस दर की जांच करेगा जिससे मंगल का अब बेहद कमज़ोर वायुमंडल अंतरिक्ष में विलीन हो रहा है. एक बार इस दर का पता चल जाए तो इससे वैज्ञानिक यह हिसाब लगा सकेंगे कि कितने समय पहले यह होना शुरू हुआ था और मंगल के वायुमंडल को पहले जैसा फिर से बना सकेंगे. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की मुलार्ड स्पेस साइंस लैबोरेट्री के प्रोफ़ेसर एंड्र्यू कोएट्स के अनुसार मावेन निश्चित रूप से एक टाइम मशीन है. उन्होंने बीबीसी को बताया वायुमंडल ख़त्म होने की दर को नापना इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे ही मंगल को समय में वापस जाते देखा जा सकेगा. यह अभियान आसान लगता है लेकिन है नहीं. मंगल के पुराने वायुमंडल को फिर से बनाने के लिए वैज्ञानिकों को इसके संभावित दबाव और संयोजन का हिसाब लगाना होगा. उनकी योजना है कि वह इसका पता विभिन्न घटकों जैसे कि कार्बन डाइ ऑक्साइड पानी और नाइट्रोजन के रिसने की तात्कालिक मात्रा को मापकर लगाएंगे. वायुमंडल के रिसना अलग-अलग समय पर अलग हो सकता है जो कि सूर्य की स्वाभाविक क्रियाओं पर निर्भर करता है. इससे पहले के अभियानों में भी माप लिए गए थे और फ़िलहाल अनुमान यह है कि करीब 10 टन गैस हर रोज़ रिस रही है. लेकिन इसमें अनिश्चितताएं बड़ी मात्रा में हैं. मावेन इस मामले में अनोखा है कि यह इस विशेष ज़रूरत के लिए ही तैयार किया गया है और इसलिए इसके पास वे सभी उपकरण हैं जो सटीक वायुमंडल रिसाव को मापने के लिए ज़रूरी हैं. प्रोफ़ेसर कोएट्स कहते हैं पिछले अभियानों से हम मोटे तौर पर जानते हैं कि कितनी मात्रा में पदार्थ रिस रहा है- लेकिन इसमें अंतर बहुत ज़्यादा है. उन्होंने कहा उनमें 10 या 100 का अंतर हो सकता है. यह इस पर निर्भर करता है कि आप किस अभियान के आंकड़ों का इस्तेमाल कर रहे हैं. सभी उपकरणों को मावेन पर रखने का मतलब यह है कि हम कहीं अधिक सटीकता से यह काम कर पाएंगे. मंगल पर स्थानीय रूप से कुछ चुंबकीय क्षेत्र हैं जिन्हें ग्रह के संपूर्ण क्षेत्र के अवशेष माना जाता है. इसका परिणाम यह है कि जब सूर्य की किरणें ग्रह पर क़हर बरपाती हैं तो इसमें कमज़ोर ऊषाकाल नज़र आते हैं. इसके सबूत सबसे पहले यूरोपियन स्पेस एजेंसी के मार्स एक्सप्रेस मिशन को 2005 में मिले थे. उम्मीद की जा रही है कि मावेन इन ऊषाकालों की पहली तस्वीरें लेने में कामयाब रहेगा. |
| DATE: 2013-11-15 |
| LABEL: science |
| [188] TITLE: 'ख़त्म हो जाएंगे बहुत से समुद्री जीव' |
| CONTENT: दुनिया भर के समुद्रों में ऐसिड का स्तर अभूतपूर्व गति से बढ़ता जा रहा है और संभव है कि यह पिछले 30 करोड़ सालों में सबसे ज़्यादा हो. वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसिड का स्तर बढ़ने की यह प्रक्रिया साल 2100 में 170 फ़ीसदी तक बढ़ सकती है. उनका मानना है कि इन परिस्थितियों में 30 प्रतिशत समुद्री प्रजातियों का अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा. शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं इसके लिए मनुष्यों द्वारा कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है. पोलैंड में अगले हफ़्ते वैश्विक पर्यावरण के मसले पर होने वाली बैठक में इस अध्ययन को पेश किया जाएगा. इस मुद्दे पर दुनिया के 500 से ज़्यादा जाने माने विशेषज्ञ साल 2012 में कैलिफ़ोर्निया में जुटे थे. इंटरनेशनल बायोस्फ़ेयर-जियोस्फ़ेयर कार्यक्रम की अगुआई में हुए अध्ययन की रिपोर्ट अब प्रकाशित कर दी गई है. इसमें कहा गया है कि ऐसिड स्तर बढ़ाने में इंसानी गतिविधियों का हाथ है जो हर दिन दो करोड़ 40 लाख टन कार्बन डाई ऑक्साइड समुद्र में घोल रहे हैं. इतनी भारी मात्रा में कार्बन घुलने से समुद्र के पानी का रासायनिक स्वरूप बदल गया है. औद्योगिक क्रांति की शुरूआत से लेकर अब तक पानी 26 फ़ीसदी ज़्यादा ऐसिडिक हो गया है. फ्रांस की राष्ट्रीय शोध एजेंसी सीएनआरसी के प्रोफ़ेसर ज्यां पियरे गटूसो कहते हैं मेरे साथियों ने भूगर्भीय रिकॉर्ड में कभी इतनी तेज़ी से बदलाव होते नहीं देखा है. वैज्ञानिकों को सबसे ज़्यादा चिंता है प्रवाल भित्तियों समेत समुद्री प्रजातियों पर पड़ने वाले असर की. समुद्र की गहराई में किए गए अध्ययन से पता चलता है कि जहां पानी में ऐसिड का स्तर कार्बन डाई ऑक्साइड की वजह से ज़्यादा है वहां समुद्रिक जैव विविधता का 30 फ़ीसदी हिस्सा इस शताब्दी के अंत तक ख़त्म हो जाएगा. शोधकर्ता मानते हैं कि ये आंकड़े भविष्य की तस्वीर दिखाते हैं. प्रोफ़ेसर गटूसो कहते हैं साल 2100 में जिस तरह ऐसिड का स्तर बढ़ने की संभावना है उसमें कोई भी मोलस्क ज़िंदा नहीं रह सकता. यह निश्चित रूप से बेहद चौंकाने वाला है. उन्होंने कहा ये तस्वीर पूरी तरह से सही नहीं है. इन जगहों पर केवल सामुद्रिक ऐसिड बढ़ रहा है लेकिन ये इस शताब्दी में बढ़ रहे तापमान को नहीं दिखाती. अगर आप दोनों को मिला दें तो स्थिति बहुत नाटकीय हो जाएगी. ऐसिड का सबसे ज़्यादा असर आर्कटिक और अंटार्कटिक में देखा जा रहा है. इन समुद्रों में कार्बन कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा और गैस का बढ़ता स्तर उन्हें बाक़ी दुनिया के मुक़ाबले बहुत तेज़ी से ऐसिड युक्त बना रहा है. यह स्थिति समुद्री जीवों के लिए बेहद नुकसानदायक है. शोधकर्ताओं का मानना है कि 2020 तक आर्कटिक का दस प्रतिशत हिस्सा उन प्रजातियों के लिए असह्य हो जाएगा जिनका कवच कैल्शियम कार्बोनेट से बनता है. सामुद्रिक संरक्षण ज़ोन बनाने से कुछ समय के लिए मदद मिल सकती है लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि लंबी अवधि में केवल उत्सर्जन में कमी ही ऐसिड स्तर में बढ़ोत्तरी की समस्या से राहत दे सकती है. |
| DATE: 2013-11-15 |
| LABEL: science |
| [189] TITLE: डायबिटीज़ः चीन को चुनौती देता भारत |
| CONTENT: एशिया में डायबिटीज़ महामारी का रूप लेता जा रहा है. सबसे परेशानी की बात ये है कि इसकी ज़द में ज़्यादातर गरीब लोग आ रहे हैं. आमतौर पर कहा जाता है कि डायबिटीज़ अमीरों का रोग है. मगर नए शोधकर्ताओं की मानें तो अब वैसे लोगों में डायबिटीज़ का ख़तरा बढ़ रहा है जो खाने की कमी और खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं. बदलती जीवनशैली तेज शहरीकरण और प्रसंस्कृत भोजन प्रोसेस्ड फूड ने टाइप-2 डायबिटीज़ का ख़तरा बढ़ा दिया है. अंतरराष्ट्रीय डायबिटीज़ फ़ेडरेशन आईडीएफ़ के नए आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर में डायबिटीज़ से प्रभावित लोगों की संख्या बढ़कर अब 3-82 अरब हो गई है. इनमें से आधे मरीज़ तो एशिया में ही मौजूद हैं. बाक़ी मरीज़ पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र से आते हैं जहां लगभग 90-95 फ़ीसदी मामले टाइप-2 के सामने आ रहे हैं. चीन डायबिटीज़ मरीज़ों के मामले में एशिया में सबसे आगे है. चीन की आबादी का 10 फीसद यानी नौ करोड़ 80 लाख लोग डायबिटीज़ से पीड़ित हैं. हॉंगकॉंग में चीनी विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर जूलियाना चेन के अनुसार चीन में डायबिटीज़ के इतने ज़्यादा मामले इसलिए हैं क्योंकि चीन के तेज़ आधुनिकीकरण से पर्यावरण आनुवंशिकी जीवनशैली और पर्यावरणीय कारकों पर बुरा असर पड़ रहा है. और अंततः इससे लोगों की सेहत बिगड़ रही है. वह कहती हैं डायबिटीज़ विरोधाभासों से भरा रोग बन कर सामने आ रहा है. उन्होंने कहा वैसे तो डायबिटीज़ बढ़ती उम्र की बीमारी है मगर आंकड़े बता रहे हैं कि अब युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोग इसका ज़्यादा शिकार होने लगा है. यह मोटे लोगों में ज़्यादा पाया जाता है मगर दुबले लोगों में इसके परिणाम बेहद ख़तरनाक हो सकते हैं. प्रोफ़ेसर चेन कहती हैं मूक आबादी के लिए डायबिटीज़ खामोश क़ातिल साबित हो रहा है. मूक आबादी यानी ऐसे लोग जो आमतौर पर अपनी गरीबी गलत जानकारी और समस्याओं के कारण डायबिटीज़ का इलाज तब तक नहीं करते जब तक कि ये बीमारी पूरी तरह विकसित नहीं हो जाती. डायबिटीज़ होने के बाद खराब गुर्दे ह्रदय रोग और अंधापन जैसी आम जटिलताएं सामने आने लगती हैं. प्रोफ़ेसर चेन का मानना है कि बहुत तेज़ी से विकास करने के कारण चीन की ही तरह भारत को भी इससे बहुत ख़तरा है. एक अनुमान के अनुसार छह करोड़ 51 लाख डायबिटीज़ मरीज़ों के साथ भारत भी चीन के काफी क़रीब आ चुका है. 25 साल की कनमणि पांडियन को जनवरी में पहला बच्चा होने वाला था. दो महीने पहले ही पता चला कि कनमणि को जेस्टेशनल डायबिटीज़ है. इसके बारे में उसने पहले कभी नहीं सुना था. कनमणि भाग्यशाली थी कि चेन्नई में गर्भवती महिलाओं की स्क्रीनिंग की सुविधा मौजूद है. अगर उनकी जांच नहीं की गई होती तो इसके बाद उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता जैसे भ्रूण से संबंधित बीमारी या बच्चे का ज़रूरत से ज़्यादा वज़न या ख़तरनाक प्रसव का सामना करना पड़ता. साल 2013 में दो करोड़ 10 लाख बच्चों का जन्म डायबिटीज़ से प्रभावित हुआ. भारत में स्थिति जटिल है. चेन्नई के डायबिटीज़ विशेषज्ञ डॉक्टर आरएम अंजना कहती हैं जेस्टेशनल डायबिटीज़ को अक्सर गंभीर नहीं माना जाता. लोगों को यह एक बार की बात या छोटी परेशानी लगती है. हालांकि ये परेशानियां बच्चे के जन्म के बाद समाप्त हो जाती हैं मगर गर्भाधान के बाद के पांच सालों में 70 से 80 फीसदी महिलाओं में टाइप-2 डायबिटीज़ विकसित हो जाती है. इसके अलावा शिशु में भी आगे डायबिटीज़ होने का ख़तरा बढ़ जाता है. अगर पश्चिमी प्रशांत के इलाक़ों की बात करें तो वहां यह बीमारी अप्रत्याशित तरीके से इंसानों को और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही है. फिजी में सर्जन हर 12 घंटे पर डायबिटीज़ से जुड़ा औसतन एक ऑपरेशन कर रहे हैं. फिजी के डायबिटीज़ ट्रस्ट के सहसंस्थापक डॉक्टर वाहिद ख़ान कहते हैं पहले तो लोग पैरों में हुए संक्रमण के लिए पारपंरिक दवाइयों या जड़ी बूटियों का सहारा लेते हैं. फिर जब इससे बात नहीं बनती तब वे क्लीनिक आते हैं. तब तक मामला इतना बिगड़ चुका होता है कि उस हिस्से को काट कर हटाना पड़ता है. डॉक्टर ख़ान ने यह भी बताया कि आमतौर पर लोग ये नहीं चाहते कि कोई उनके रोग के बारे में जाने. उनका कहना है कि फिजी में सामान्यतः ये प्रचलन है कि जिन्हें डायबिटीज़ होता है उन्हें नौकरी मिलने की संभावना कम हो जाती है. फिजी में इस बीमारी का ये हाल है कि 30 साल का हर तीसरा व्यक्ति डायबिटीज़ से प्रभावित है. एशिया के चलन का अनुसरण करते हुए फिजी की पर्यटन चीनी उद्योग सोना तांबा और मछली निर्यात से उभर रही अर्थव्यवस्था ने मध्यम वर्ग में बढोत्तरी की है. डॉक्टर ख़ान का कहना है पहले लोग अपनी फ़सल ख़ुद उगाते थे मछलियां पकड़ते थे कहीं जाना होता था तो पैदल ही जाते थे. अब लोग आलसी हो गए हैं. फास्ट फूड और मिठाई उद्योग ने भी जीवनशैली को खराब किया है. |
| DATE: 2013-11-14 |
| LABEL: science |
| [190] TITLE: जहां आवाज़ ही पहचान है. |
| CONTENT: बड़े व्यवसायों को ज़रूरत है आपकी आवाज़ की लेकिन अपनी सेवाओं की गुणवत्ता जानने के लिए नहीं बल्कि धोखेबाज़ों से निपटने के लिए. वॉयस बायोमीट्रिक्स यानी आवाज़ के नमूनों की रिकार्डिंग और विश्लेषण ताकि पहचान सुनिश्चित की जा सके. ये धोखेबाज़ों के ख़िलाफ़ लड़ाई में नया तकनीकी हथियार है. नेशनल फ्रॉड अथॉरिटी एनएफ़ए के अनुसार इस तरह की धोखाधड़ी से ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को हर साल 52 अरब पाउंड की चपत लगती है. एनएफ़ए का कहना है कि अकेले ब्रिटिश वित्तीय सेवाओं से ही पांच अरब पाउंड उड़ा लिए जाते हैं. हालांकि आंकड़े दो गुने या तीन गुने ज़्यादा भी हो सकते हैं क्योंकि धोखाधड़ी के बहुत से मामले रिपोर्ट ही नहीं किए जाते. डिजिटल युग ने धोखा करने की संभावनाओं को और ज़्यादा बढ़ा दिया है. ख़ासकर तब जब ऐसा करने वालों के पास निजी सूचनाएं चुराने के बहुत से रास्ते मौजूद हैं. पहचान चुराने और खाता हैक कर लेने की समस्या दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है. आवाज़ के नमूने इस्तेमाल करने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि इसकी नकल करना या चुराना बेहद मुश्किल है. वैलिडसॉफ़्ट कंपनी के मार्केटिंग विभाग के विश्व प्रमुख ईमानुएल फ़िल्सज्यां रीटेल बैंकों को सुरक्षा और यूरोपीय सरकारों को सरहद पार होने वाली धोखाधड़ी से निपटने के तरीक़ों पर सलाह देते हैं. वह कहते हैं कि बायोमीट्रिक्स के लिहाज से आवाज़ एक गतिशील नमूना है. यह अंगुलियों के चिन्हों की तरह स्थिर नहीं है इसलिए इसकी डिजिटल नकल उतारना बेहद मुश्किल है. आवाज़ के डिजिटल नमूनों में 100 से ज़्यादा पहचाने जा सकने वाले तत्व होते हैं. वॉयस बायोमीट्रिक्स कंपनियों का मानना है कि जटिल गणितीय प्रणालियों और अत्याधुनिक मशीनों के ज़रिए 97 फ़ीसदी मामलों में लोगों की बिल्कुल सही पहचान की जा सकती है. यहां तक कि दो जुड़वा बच्चों में भी जिनका डीएनए समान है उन्हें उनकी आवाज़ के नमूने से अलग-अलग पहचाना जा सकता है. यह तकनीक को ज़्यादा भरोसेमंद बनाता है ताकि इसे कोर्ट में सुबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके. आवाज़ बहुत अहम है क्योंकि इंटरनेट बैंकिंग और ख़रीदारी की शुरूआत होने के बावजूद कंपनियों से संपर्क के लिए कॉल सेंटर ही मुख्य ज़रिया है. पहचान क़ायम करने के परंपरागत तरीक़े जैसे पिन कोड पासवर्ड या याद पर आधारित सवाल दोषपूर्ण साबित हुए हैं क्योंकि हममें दोष हो सकता है- हम भूल जाते हैं. यही वजह है कि हम बेहद साधारण पिन कोड या पासवर्ड रखते हैं जो हमें याद रहते हैं और दूसरे के लिए अनुमान लगाना आसान होता है. धोखाधड़ी की जांच करने वालों ने पाया है कि पिन चोरी के मामलों में तकरीबन 10 फ़ीसदी में कोड 1-2-3-4 जैसा बेहद सामान्य रखा गया था. एक तकनीकी कंपनी सेस्टेक के मुख्य कार्यकारी प्रोफ़ेसर लेवेन्ट आर्सलन कहते हैं आप अपनी आवाज़ नहीं भूल सकते. आपकी आवाज़ का इस्तेमाल ज़्यादा आसान है. आवाज़ की पहचान में ज़रा सी भी गड़बड़ी होने पर उपभोक्ता की आवाज़ का लाइव टेस्ट शुरू हो जाएगा. इसके साथ धोखाधड़ी करना लगभग असंभव है ख़ासकर जब वे एक रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल कर रहे हों. बार्कले की वित्तीय शाखा बार्कले वेल्थ का दावा है कि आवाज़ से जुड़े बायोमीट्रिक्स लागू करने के बाद से कंपनी को काफ़ी फ़ायदा हुआ है. इस तकनीक का इस्तेमाल करने से पहले उसके एजेंट्स को मिलने वाली 25 फ़ीसदी धोखे वाली फ़ोन कॉल्स के लिए मुमकिन था कि वे बैंक की सुरक्षा प्रणाली को चकमा दे सकें. अब बैंक का कहना है कि ऐसी फ़ोन कॉल्स की तादात शून्य पर आ गई है. स्लोवाकिया के टाट्रा बैंक ने भी वॉयस बायोमीट्रिक प्रणाली का प्रयोग शुरू किया है जिससे कॉल सेंटर के एजेंट्स से बात करते समय उपभोक्ताओं की आवाज़ की पहचान की जाएगी. बैंक के रिकॉर्ड में मौजूद आवाज़ के नमूने से पहचान स्थापित करने में महज़ 10 से 15 सेकेंड का वक्त काफ़ी होता है लेकिन इसमें कुछ पेचीदगियां हैं. उपभोक्ताओं को इस प्रणाली के तहत सूचीबद्ध करना मुश्किल है क्योंकि आवाज़ की रिकॉर्डिंग करने के लिए निजता से जुड़े क़ानूनों और क्षेत्राधिकारों में विभिन्नता है. इसके अलावा सिर्फ़ आवाज़ के बायोमीट्रिक्स से काम नहीं चलता. संचार आंकड़ों के विश्लेषण जैसी दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल भी करना पड़ता है. |
| DATE: 2013-11-13 |
| LABEL: science |
| [191] TITLE: धरती पर गिरी 'अंतरिक्ष की फ़रारी' |
| CONTENT: यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ईएसए का जीओसीई उपग्रह पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने साथ ही जलकर नष्ट हो गया है. शुरुआती अनुमानों के मुताबिक़ इससे निकला हुआ मलबा पूर्वी एशिया से लेकर पश्चिमी प्रशांत और अंटार्कटिका में कहीं गिरा होगा. आर्कषक दिखने की वजह से जीओसीई ग्रेविटी फील्ड एंड स्टेडी स्टेट ओशन सर्कुलेशन एक्सप्लोरर को फ़रारी ऑफ़ स्पेस नाम दिया गया था. पिछले 25 साल में पहली बार ऐसा हुआ है कि यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के किसी अंतरिक्ष अभियान ने पृथ्वी के वातावरण में अनियंत्रित होकर दोबारा प्रवेश किया है. जीओसीई को साल 2009 में प्रक्षेपित किया गया था. गुरुत्वाकर्षण का अध्ययन करने के लिए भेजे गए इस उपग्रह का ईंधन समाप्त हो गया था जिसके बाद इसे नष्ट करने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं रह गया था. यह उपग्रह बेहद निचली कक्षा में 224 किलोमीटर की ऊंचाई पर पृथ्वी के चक्कर लगा रहा था. यह किसी भी वैज्ञानिक उपग्रह के लिए सबसे कम ऊंचाई है. ऐसे उपग्रह को काम करने के लिए इलेक्ट्रिक इंजन की ज़रूरत होती है लेकिन पिछले महीने इसका ईंधन खत्म हो गया था. जीओसीई को आख़िरी बार रविवार को अंतरराष्ट्रीय समयानुसार 22 बजकर 42 मिनट पर देखा गया. उस समय वह अंटार्कटिका के ऊपर 121 किमी की ऊंचाई पर था. इस उपग्रह में इतना ईंधन था जो उसे न्यूजीलैंड के पूर्व में स्थित दक्षिणी सागर में ले गया. इस विशाल क्षेत्र में कोई इंसानी आबाादी नहीं है. अंतरिक्ष में मौजूद कूड़े पर अध्ययन करने वाली संस्था इंटर एजेंसी स्पेस डेब्री कॉऑर्डिनेशन कमेटी ने 2013 में अपने स्पेशल स्टडी प्रोजेक्ट के लिए जीओसीई को चुना था. इसका मतलब है कि जीओसीई के पृथ्वी पर लौटने की घटना के लिए दुनिया भर में बड़ी संख्या में निगरानी केंद्रों को सक्रिय कर दिया गया था. आने वाले दिनों में इस बात की विस्तृत जानकारी मिल सकती है कि जीओसीई का मलबा पृथ्वी पर वास्तव में कहां गिरा था. आंकड़ों से पता चलता है कि अंतरिक्ष में मौजूद अभियानों के मलबे का कम से कम एक टुकड़ा हर रोज़ पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है. इसी तरह औसतन हर हफ़्ते कोई पुराना उपग्रह या रॉकेट पूरा का पूरा धरती पर लौट रहा है. इससे पहले पृथ्वी के वातावरण में अनियंत्रित प्रवेश करने वाला ईएसए का आखिरी मिशन इसी-2 था जो साल 1987 में लौटा था. हालांकि एजेंसी नियमित रूप से उपग्रहों को नियंत्रण के साथ पृथ्वी पर वापस लाती रहती है. |
| DATE: 2013-11-11 |
| LABEL: science |
| [192] TITLE: स्विच बदलते हैं चेहरे की बनावट |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने अलग-अलग लोगों के चेहरों में अंतर पाए जाने के कारणों को समझने में आरंभिक सफलता प्राप्त कर ली है. चूहों पर हुए अध्ययन में वैज्ञानिकों को डीएनए में मौजूद हज़ारों ऐसे छोटे-छोटे हिस्सों का पता चला है जो चेहरे की बनावट के विकास में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. इस शोध में यह भी पता चला कि आनुवांशिक सामग्री में परिवर्तन चेहरे की बनावट में बहुत बारीक़ अंतर ला सकते हैं. शोधपत्रिका साइंस में छपे इस शोध से चेहरे में आने वाली जन्मजात विकृतियों का कारण समझने में भी मदद मिल सकती है. शोधकर्ताओं ने कहा कि यह प्रयोग जानवरों पर किया गया है लेकिन पूरी संभावना है कि मनुष्य के चेहरे का विकास भी इसी तरह होता है. कैलीफोर्निया स्थित लॉरेंस बर्कले नेशनल लैबोरेटरी के ज्वाइंट जीनोम इंस्टीट्यूट के प्रोफ़ेसर एक्सेल वाइसेल ने बीबीसी से कहा हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि चेहरे की बनावट के निर्माण के निर्देश मनुष्यों के डीएनए में कैसे मौजूद होते हैं. इन डीएनए में ही कहीं न कहीं हमारे चेहरे की बनावट का राज़ छिपा है. शोधकर्ताओं की इस अंतरराष्ट्रीय टीम को चूहे के जीनोम में 4000 ऐसे इनहैंसर्स मिले जिनकी चेहरे की बनावट में भूमिका प्रतीत होती है. डीएनए पर बने ये छोटे इनहैंसर्स स्विच की तरह काम करते हैं. ये जीन को ऑन और ऑफ करते हैं. वैज्ञानिकों ने इनमें से 200 का अध्ययन किया. वैज्ञानिकों देखा कि एक विकसित होते हुए चूहे में ये कैसे और क्या काम करते हैं. प्रोफेसर वाइसेल कहते हैं चूहे के भ्रूण में हम भलीभांति देख सकते हैं कि जब चेहरे का विकास हो रहा होता है तब इसे नियंत्रित करने वाला स्विच कब ऑन होता है. वैज्ञानिकों ने तीन जेनेटिक स्विच निकाल देने से चूहों के चेहरे की बनावट पर पड़ने वाले असर का भी अध्ययन किया. प्रोफ़ेसर वाइसेल कहते हैं ये चूहे काफी सामान्य दिखते हैं लेकिन मनुष्यों के लिए चूहों के चेहरे में फ़र्क पहचानना भी मुश्किल है. प्रोफ़ेसर वाइसेल कहते हैं जिन चूहों के जीन में परिवर्तन किया गया उनके चेहरे से उन चूहों के चेहरों से तुलना करने पर जिनके जीन में परिवर्तन नहीं किया गया हमें पता चला कि चेहरे में आने वाला अंतर बहुत मामूली है. हालाँकि कुछ चूहों की खोपड़ी लंबी या ठिगनी हो गई थी. वहीं कुछ चौड़ी या पतली हो गई थीं. प्रोफ़ेसर वाइसेल के मुताबिक़ इससे हमें पता चलता है कि इन ख़ास स्विचों की खोपड़ी के विकास में भूमिका है और ये खोपड़ी की बनावट को प्रभावित करते हैं. इस शोध से यह समझने में भी सहायता मिल सकती है कि कुछ बच्चों के चेहरों में जन्मजात विकृति क्यों और कैसे आ जाती है. प्रोफ़ेसर वाइसेल कहते हैं हमने अभी चेहरे की बनावट के कारण समझने शुरू ही किए हैं. इससे पता चला है कि यह एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है. हालाँकि प्रोफ़ेसर वाइसेल नहीं मानते कि भविष्य में किसी के चेहरे-मोहरे का अनुमान लगाने या माँ-बाप की आनुवंशिक सामग्री में बदलाव लाकर बच्चे का चेहरा बदलने के लिए डीएनए का प्रयोग हो सकता है. |
| DATE: 2013-11-11 |
| LABEL: science |
| [193] TITLE: दिमाग़ी बीमारी से बचाता है दो भाषाओं का ज्ञान |
| CONTENT: आँध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद के निज़ाम अस्पताल में हुए एक अध्ययन के अनुसार दो भाषाएँ बोलने वाले लोगों पर भूलने की बीमारी का असर उनके बनिस्बत देर से होता है जो सिर्फ़ एक भाषा बोलते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबरा ब्रिटेन और हैदराबाद के निज़ाम इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ के वैज्ञानिकों ने दिमाग़ी बीमारी या डिमेंशिया से परेशान 600 से ज़्यादा लोगों का अध्ययन करके यह नतीजा निकाला है. इस अध्ययन में शामिल डॉक्टर सुवर्णा अल्लादि ने बीबीसी हिंदी सेवा को बताया कि दो भाषा बोलने वाले निरक्षर आदमी को भी यह फ़ायदा मिलता है और इसका शिक्षा से कोई संबंध नहीं है. यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबरा के टॉमस बाक के साथ सुवर्णा और उनके सहयोगियों ने जब रोगियों का अध्ययन किया तो पाया कि उनमें से दो भाषाएँ बोलने वालों को डिमेंशिया की बीमारी चार से पाँच साल बाद असर करती हैं जबकि एक भाषी लोगों पर अपेक्षाकृत कम उम्र में ही इसका प्रभाव नज़र आने लगता है. यह द्विभाषी लोगों पर डेमेंशिया का असर समझाने वाला सबसे बड़ा अध्ययन है. इसमें रोगियों की शिक्षा लिंग व्यवसाय देश और निवास स्थान जैसी बातों पर भी ग़ौर किया गया. निज़ाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस हैदराबाद में न्यूरोसाइंटिस्ट डॉक्टर सुवर्णा अल्लादि कहती हैं पहला अध्ययन कनाडा के टोरंटो शहर में हुआ जहां ढेर सारे द्विभाषी लोग रहते हैं. जो आसपास के देशों से वहां आए हैं और अपनी मातृभाषा के अलावा फ्रेंच या अंग्रेज़ी बोलते हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि द्विभाषी लोग एक भाषा से दूसरी भाषा में सोचने और बोलने का काम आसानी से कर पाते हैं और इससे उनके दिमाग़ की ख़ासी कसरत हो जाती है जो उन्हें भूलने की बीमारी से लंबे समय तक बचाकर रखती है. दिमाग की यह ट्रेनिंग किसी कृत्रिम ट्रेनिंग प्रोग्राम की तुलना में ज़्यादा असरदार होती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके बावजूद द्विभाषी तकनीकों पर अध्ययन इसलिए जटिल है क्योंकि अक्सर द्विभाषी लोगों की जातीय और सांस्कृतिक पहचान अलग होती है. हैदराबाद जैसी जगहों पर आमतौर पर लोग एक से ज़्यादा भाषाएँ बोलते हैं. वे अपनी मातृभाषा के साथ-साथ दूसरी भाषा का भी इस्तेमाल करते हैं. एडिनबरा यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ फिलॉसॉफ़ी साइकॉल्जी एंड लेंग्वेज साइसेंज़ के टॉमस बाक कहते हैं जिस तरह तैराकी से पूरे शरीर की ट्रेनिंग होती है उसी तरह दो भाषाएं बोलना दिमाग की पूरी तरह ट्रेनिंग करा देता है. उनका कहना है कि अध्ययनों से पता चलता है कि डिमेंशिया पर द्विभाषिता का असर मौजूदा प्रचलित दवाओं की तुलना में ज़्यादा बेहतर होता है. यह अध्ययन अमरीकन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी की मेडिकल पत्रिका न्यूरॉलॉजी में प्रकाशित हुआ. |
| DATE: 2013-11-08 |
| LABEL: science |
| [194] TITLE: एस्टरॉयड से धरती को बढ़ रहा है ख़तरा |
| CONTENT: वैज्ञानिकों का कहना है कि एस्टरॉयड या अंतरिक्ष से गिरने वाली चट्टानों के धरती से टकराने का ख़तरा उससे कहीं ज़्यादा है जितना कि पहले सोचा गया था. विज्ञान पत्रिका नेचर में छपे अध्ययन के मुताबिक़ रूस के चलयाबिंस्क में इस साल गिरे एस्टरॉयड से बड़े और अधिक ख़तरनाक चट्टान धरती की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहे हैं. चलयाबिंस्क में फ़रवरी में गिरी चट्टान के विस्फोट से उतनी ऊर्जा पैदा हुई थी जितनी एक परमाणु हथियार से हो सकती है. इस चट्टान के चलयाबिंस्क शहर के साढ़े अट्ठारह मील ऊपर फटकर कई टुकड़े हो गए थे. 67700 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से अंतरिक्ष से धरती की तरफ़ आई ये चट्टान 62 फीट की थी और इसके विस्फोट से हज़ारों खिड़कियां और दरवाज़े नष्ट हो गए थे. चट्टान का काफ़ी बड़ा हिस्सा टकराने से पहले ही विस्फोट में गलकर गैस में तब्दील हो गया था. बाद में इसका सबसे बड़ा हिस्सा एक झील से मिला था जिसका वज़न 650 किलो था. इस विस्फोट में 1600 लोग ज़ख्मी हुए थे जबकि इसकी तेज़ रोशनी की वजह से 70 लोगों के आँखों की रोशनी कुछ समय के लिए चली गई थी. वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले दिनों में इसी तरह के और अधिक एस्टरॉयड्स के धरती से टकराने की संभावना बढ़ गई है. उनका कहना है कि इस तरह की ज़्यादातर घटनाओं की ख़बर सामने नहीं आ पाती क्योंकि ये विस्फोट या तो समुद्र या बहुत दूर दराज़ इलाक़ों में होते हैं. पिछले बीस साल के आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद शोधकर्ताओं ने पाया है कि इस दौरान 20 मीटर के आकार वाले 60 एस्टरॉयड धरती से टकराए हैं. इनका अध्ययन अमरीका के सेंसर्स और उन इंफ्रासाउंड सेंसर्स की मदद से हुआ जो पृथ्वी के कई तरफ स्थापित किए गए हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए चेतावनी देने वाले सिस्टम की व्यवस्था की जानी चाहिए जो यह सुनिश्चित कर सके कि ये एस्टरॉयड कब और कहां गिरने वाले हैं. शोध टीम के प्रमुख वैज्ञानिक प्रोफेसर पीटर ब्राउन ने कहा हमें उस तरह के सिस्टम को विकसित करना होगा जो लगातार आकाश पर नज़र बनाए रखे इस तरह की चीज़ों पर नजर रखे इससे पहले की वो धरती से टकराएं ये उस तरह का काम है जो करने की ज़रूरत है. उनका कहना था जहां तक चलयाबिंस्क का सवाल है तो चंद दिनों से लेकर कुछ हफ्तों पहले मिली चेतावनी बहुत कीमती हो सकती थी अगर किसी और कारण से नहीं तो कम से कम लोगों को ये कह पाने के लिए कि वो खिड़कियों से बाहर न झांके या उस वक्त उसके क़रीब न जाएँ जब ये विस्फोट हुआ. प्रोफेसर पीटर ब्राउन कनाडा के वेस्टर्न विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक हैं. चलयाबिंस्क के पहले धरती से सबसे बड़ा एस्टरॉयड 1908 में तुंगुसका में टकराया था. जब ये फटा था तो साइबेरिया के जंगल का दो हज़ार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पूरी तरह से बर्बाद हो गया था. समाचार एजेंसी प्रेस एसोसिएशन कहना है कि वो अंतरिक्ष का उस तरह का चट्टान था जिसे कोन्ड्राइट के नाम से जाना जाता है. समाचार एजेंसी के मुताबिक़ इस तरह के चट्टान भविष्य में विनाश की बहुत बड़ी वजह हो सकते हैं. |
| DATE: 2013-11-07 |
| LABEL: science |
| [195] TITLE: 'सैचुरेटेड फैट' के सेवन से नहीं होता हृदय रोग |
| CONTENT: ब्रिटेन के एक हृदयरोग विशेषज्ञ ने सैचुरेटेड फैट को लेकर आमतौर पर दी जाने वाली सलाह से अलग राय दी है. डॉक्टर असीम मल्होत्रा का कहना है कि इससे जुड़े जोख़िम को बढ़ाचढ़ा कर पेश किया गया है जबकि चीनी का सेवन करने जैसे दूसरे कारकों को नजरअंदाज़ किया गया है. उन्होंने ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित अपने लेख में कहा है अब समय आ गया है कि हम हृदय रोग को लेकर सैचुरेटेड फैट की भूमिका के बारे मे मिथक को खत्म करें. दूसरी ओर ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन ने कहा है कि दवाओं या दूसरे तरीकों से कोलेस्ट्रॉल की मात्रा में कमी करके हृदय रोगों का जोख़िम कम होता है. खानपान और रोगों के बीच संबंधों को लेकर हुए अध्ययन के आधार पर इस बात की सलाह दी जाती है कि स्वस्थ जीवन के लिए सैचुरेटेड फैट की कितनी मात्रा लेनी चाहिए. ब्रिटेन में लाखों लोगों को कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम करने के लिए स्टैटिन लेने की सलाह दी जाती है. लंदन स्थित क्रायडन यूनीवर्सिटी हॉस्पिटल में कार्डियोलॉजी रजिस्ट्रार डॉक्टर मल्होत्रा ने बताया कि हृदय रोगों के जोख़िमों को रोकने के लिए करीब चार दशक से सैचुरेटेड फैट को कम करने की सलाह दी जाती रही है. उन्होंने कहा कि सैचुरेटेड फैट को दोषी ठहरा दिया गया है लेकिन वैज्ञानिक प्रमाणों से इसका हृदय रोगों के साथ पूरी तरह संबंध स्थापित नहीं होता है. उन्होंने कहा कि खाद्य उद्योग ने सैचुरेटेड फैट को कम करके उसकी जगह चीनी के इस्तेमाल को बढ़ाया है जबकि चीनी खुद हृदय रोगों के लिए ज़िम्मेदार है. डॉक्टर मल्होत्रा ने लिखा है कि स्टैटिन की जगह जैतून का तेल बादाम तैलीय मछली फलों और सब्जियों के साथ रेड वाइन की थोड़ी मात्रा जैसे मेडिटेरेनियन खानपान को अपनाकर हृदय रोगों की आशंका की काफी हद तक कम किया जा सकता है. हालांकि ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन के प्रोफेसर पीटर वेइसबर्ग ने कहा है कि खानपान और बीमारियों के बीच संबंधों को लेकर होने पर अध्ययनों के दौरान अक्सर विरोधाभासी नतीजे समाने आते हैं. उन्होंने कहा कि दवाओं के परीक्षण के विपरीत एक नियंत्रित और बेतरतीब अध्ययन करना मुश्किल होता है. उन्होंने बताया हालांकि अत्यधिक कोलेस्ट्राल स्तर वाले लोगों को हार्ट अटैक की आशंका अधिक होता है और यह भी साफ़ है कि कोलेस्ट्राल को कम करने का मतलब है जोख़िम को कम करना. उन्होंने बताया कि कोलेस्ट्राल का स्तर कई बातों के प्रभावित होता है. इसमें खानपान कसरत और दवाओं का इस्तेमाल शामिल है. उन्होंने कहा कि इस बात के भी स्पष्ट सबूत हैं कि स्टैटिन से लोगों को फ़ायदा मिला है. |
| DATE: 2013-11-06 |
| LABEL: science |
| [196] TITLE: अमरीका बना रहा है सबसे तेज़ जासूस विमान |
| CONTENT: अमरीका की रक्षा तकनीक निर्माता कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने सुपरसॉनिक ब्लैकबर्ड एसआर-71 जासूसी करने वाले विमान के अगले संस्करण पर काम करना शुरू कर दिया है. अब तक अनामित एसआर-72 में ऐसा इंजन होगा जिसमें टर्बाइन और रामजेट दोनों होंगे और इनकी मदद से यह मैक 6- करीब 5800 किमी प्रतिघंटा की गति हासिल कर पाएगा. अपने पूर्ववर्ती की तरह एसआर-72 को भी बेहद ऊंचाई से निगरानी रखने के लिए डिजाइन किया गया है लेकिन संभवतः इसे हथियारों से लैस भी किया जा सकेगा. लॉकहीड का कहना है कि यह विमान 2030 तक काम करने लगेगा. एसआर-72 को लॉकहीड मार्टिन के कैलिफ़ोर्निया स्थित स्कंक वर्क्स आर एंड डी सेंटर में डिज़ाइन किया जा रहा है. मूल ब्लैकबर्ड को भी यहीं बनाया गया था. ब्लैडबर्ड ने 1964 में पहली उड़ान भरी थी और 1998 तक वह अमरीकी वायुसेना के लिए जासूसी और निगरानी करने वाला मुख्य विमान बना रहा. यह 24000 मीटर 80000 फ़ीट की ऊंचाई पर उड़ सकता था और मैक 3 की गति हासिल कर सकता था. एक ब्लॉग पोस्ट में लॉकहीड मार्टिन ने कहा कि एसआर-72 भी इतनी ही ऊंचाई पर उड़ेगा लेकिन इसकी गति कहीं ज़्यादा होगी. मैक 6 की गति के साथ यह विमान 5500 किमी की न्यूयॉर्क से लंदन की दूरी एक घंटे से भी कम वक्त में तय कर लेगा. जासूसी करने वाले उपग्रह दुश्मनों के इलाके की तस्वीरें तो ले सकते हैं लेकिन उन्हें तस्वीरें भेजने के लिए नए ऑर्बिट में जाना होता है जिसे उनकी उपयोगिता सीमित हो जाती है. लॉकहीड के अनुसार इसके विपरीत एसआर-72 इतना तेज़ होगा कि विरोधियों को प्रतिक्रिया देने या छुपने का मौका ही नहीं मिलेगा. एसआर-72 के लिए लॉकहीड मार्टिन फ़ाल्कन एचटीवी-2 हाइपरसॉनिक टेक्नोलॉजी व्हीकल पर किए गए काम को इस्तेमाल कर रही है. यह भविष्य की तकनीकों के लिए एक तरह के टेस्टबेड जिस पर प्रयोग किए जा सकें है. इससे हाइपरसॉनिक उड़ानों को सुरक्षित बनाने और इतनी तेज़ रफ़्तार से उड़ने पर पैदा होने वाली स्थितियों से सामंजस्य बैठाने में मदद मिलती है. उदाहरण के लिए एक बार एचटीवी-2 की एक परीक्षण उड़ान में विमान 20 मैक तक की गति पर पहुंच गया और उड़ान का तापमान 1927 सेल्सियत 3500 फ़ारेनहीट तक पहुंच गया था. मैक 6 की गति तक पहुंचने के लिए एसआर-72 का इंजन मैक 3 की गति हासिल करने तक किसी सामान्य जेट टर्बाइन की तरह काम करेगा और उसके बाद आगे बढ़ने के लिए यह एक रैमजेट की तरह चलेगा. लॉकहीड मार्टिन के हाइपरसॉनिक कार्यक्रम प्रबंधक ब्रैड लीलैंड ने ब्लॉगपोस्ट में लिखा आने वाले कई दशकों में उड्डन क्षेत्र में रफ़्तार का विकास होगा. यह तकनीक खेल की सूरत बदल देगी जैसे कि आज स्टेल्थ राडार से बचने में सक्षम विमान जंग के मैदान को बदल रहे हैं. |
| DATE: 2013-11-06 |
| LABEL: science |
| [197] TITLE: क्या थोरियम भविष्य का ईंधन हो सकता है? |
| CONTENT: संयुक्त राष्ट्र के हथियार निरीक्षक हैंस ब्लिक्स ने परमाणु वैज्ञानिकों से थोरियम को नए ईंधन के तौर पर विकसित करने के लिए कहा है. ब्लिक्स के मुताबिक़ रेडियोधर्मी पदार्थ थोरियम परमाणु भट्टियों में यूरेनियम की तुलना में कहीं ज़्यादा सुरक्षित है. उन्होंने कहा परमाणु हथियार बनाने के लिए थोरियम का इस्तेमाल भी एक ज़्यादा मुश्किल काम है. उनकी टिप्पणी थोरियम में लोगों की दिलचस्पी में और अधिक इज़ाफ़ा कर सकती है. हालांकि आलोचकों ने इस बात को लेकर आगाह किया है कि नई परमाणु भट्टियों को विकसित करना जनता के पैसे की बरबादी का काम हो सकता है. स्वीडन के विदेश मंत्रालय के मुखिया की ज़िम्मेदारी संभाल चुके ब्लिक्स ने बीबीसी से कहा मैं एक वकील हूँ न कि एक वैज्ञानिक लेकिन मेरे विचार से हमें थोरियम के इस्तेमाल को लेकर कोशिश करनी चाहिए. मुझे एहसास है कि इसमें कई बाधाएँ हैं लेकिन इससे बहुत फ़ायदा होगा. उन्होंने कहा मुझे बताया गया है कि परमाणु भट्टियों में थोरियम अधिक सुरक्षित है और इसके ज़रिए बम बनाना भी तक़रीबन नामुमकिन है. ये वो महत्वपूर्ण वजहें हैं जिनकी वजह से दुनिया भविष्य के ईंधन की आपूर्ति की ओर देख रही है. ब्लिक्स का कहना है कि दुनिया को थोरियम के विकास को लेकर कोशिश करनी चाहिए. ब्रिटेन के परमाणु प्रतिष्ठान से जुड़े कुछ लोगों ने भी ब्लिक्स के विचार को लेकर उत्साह दिखाया है. ब्रिटेन के नेशनल न्यूक्लियर लैबोरेटरी के वैज्ञानिक इस बात को लेकर उत्साहित हैं कि सरकार भारतीय थोरियम पर आधारित रिएक्टर पर शोध और नार्वे में इसके परीक्षण कार्यक्रम के लिए उनकी मदद करेगी. नार्वे में किया जाने वाली परीक्षण बॉन्ड की स्टाइल के तर्ज़ पर बने एक भूमिगत बंकर में किया जाना है. कहा जाता है कि थोरियम की खोज भी 1828 में नार्वे में ही हुई थी और इसका नाम बिजली के देवता के नाम पर रखा गया था. थोरियम पर परीक्षण करने वाली निजी कंपनी थोर एनर्जी को उम्मीद है कि मौजूदा परमाणु भट्टियों में उसे यूरेनियम के साथ साथ थोरियम के इस्तेमाल का भी लाइसेंस दिया जाएगा. ये भट्टियाँ पानी से ठंडी की जाने वाली तकनीक पर आधारित हैं. ब्रिटेन की सरकार का कहना है कि परमाणु भट्टियों के लिए ईंधन के विकल्पों में इज़ाफ़ा करने की ज़रूरत है और थोरियम के बारे में माना जाता है कि यह यूरेनियम की तुलना में तीन गुणा अधिक उपलब्ध है. फ़िलहाल इसका उत्पादन ज़मीन की खुदाई से प्राप्त होने वाले दुर्लभ पदार्थों के साथ ही होता है. द थोर की परियोजना में इस बात की कोशिश की जा रही है कि मौजूदा परमाणु भट्टियों में यूरेनियम या प्लूटोनियम के साथ ही थोरियम का इस्तेमाल किया जा सके. नार्वे में थोरियम पर भूमिगत परीक्षण किए जा रहे हैं. थोर एनर्जी के मुख्य कार्यकारी ओयस्टिन एस्फजेल ने बीबीसी से कहा दुनिया भर में थोरियम प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और यह पूरी पृथ्वी पर लगभग हर जगह उपलब्ध है. किसी परमाणु भट्टी में सक्रिय होने के दौरान इसकी कुछ रासायनिक और भौतिक विशेषताएँ होती हैं जो इसे यूरेनियम से बेहतर बना देती है. इस दिशा में चीन भी अपनी दूसरी पीढ़ी के परमाणु रिएक्टर के साथ एक क्रांतिकारी क़दम उठाने जा रहा है. इसके समर्थकों का कहना है कि इन परमाणु भट्टियों में थोरियम का इस्तेमाल किया जा सकेगा और ये यूरेनियम से अधिक सुरक्षित होंगी. जब कोई परमाणु रिएक्टर ज्यादा गर्म हो जाता है और ईंधन की छड़ें श्रृंखलाबद्ध में विस्फोटों का सिलसिला जारी नहीं रख पाती हैं और संकट जारी कहता है. यही फुकुशिमा में हुआ था. लेकिन अगर किसी थोरियम रिएक्टर में कुछ होता है तो तकनीशियन आसानी से उत्प्रेरक को बंद कर सकेंगे और इसकी प्रतिक्रिया ख़ुद ब ख़ुद रुक जाएगी. कर्न यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर कार्लो रूबिया कहती हैं थोरियम बिना किसी मानवीय दख़ल के बंद हो जाएगा. आपको बस एक स्विच ऑफ़ करना होगा. |
| DATE: 2013-11-05 |
| LABEL: science |
| [198] TITLE: क्या आप मंगल को अच्छे से जानते हैं? |
| CONTENT: मंगल के बारे में आपने अक्सर पढ़ा होगा. मंगल पर जीवन की मौजूदगी से भी आगे बहुत सी बातें हैं जो जानना दिलचस्प हो सकता है. पढ़िए ऐसी ही कुछ दिलचस्प बातें जो शायद आप न जानते हों. मंगल को लाल ग्रह कहते हैं क्योंकि मंगल की मिट्टी के लौह खनिज में ज़ंग लगने की वजह से वातावरण और मिट्टी लाल दिखती है. मंगल के दो चंद्रमा हैं. इनके नाम फ़ोबोस और डेमोस हैं. फ़ोबोस डेमोस से थोड़ा बड़ा है. फ़ोबोस मंगल की सतह से सिर्फ़ 6 हज़ार किलोमीटर ऊपर परिक्रमा करता है. फ़ोबोस धीरे-धीरे मंगल की ओर झुक रहा है हर सौ साल में ये मंगल की ओर 1-8 मीटर झुक जाता है. अनुमान है कि 5 करोड़ साल में फ़ोबोस या तो मंगल से टकरा जाएगा या फिर टूट जाएगा और मंगल के चारों ओर एक रिंग बना लेगा. फ़ोबोस पर गुरुत्वाकर्षण धरती के गुरुत्वाकर्षण का एक हज़ारवां हिस्सा है. इसे कुछ यूं समझा जाए कि धरती पर अगर किसी व्यक्ति का वज़न 68 किलोग्राम है तो उसका वज़न फ़ोबोस पर सिर्फ़ 68 ग्राम होगा. अगर ये माना जाए कि सूरज एक दरवाज़े जितना बड़ा है तो धरती एक सिक्के की तरह होगी और मंगल एक एस्पिरीन टैबलेट की तरह होगा. मंगल का एक दिन 24 घंटे से थोड़े ज़्यादा का होता है. मंगल सूरज की एक परिक्रमा धरती के 687 दिन में करता है. यानी मंगल का एक साल धरती के 23 महीने के बराबर होगा. मंगल और धरती करीब दो साल में एक दूसरे के सबसे करीब होते हैं दोनों के बीच की दूरी तब सिर्फ़ 5 करोड़ 60 लाख किलोमीटर होती है. मंगल पर पानी बर्फ़ के रूप में ध्रुवों पर मिलता है और ये कल्पना की जाती है कि नमकीन पानी भी है जो मंगल के दूसरे इलाकों में बहता है. वैज्ञानिक मानते हैं कि मंगल पर करीब साढ़े तीन अरब साल पहले भयंकर बाढ़ आई थी. हालांकि ये कोई नहीं जानता कि ये पानी कहां से आया था कितने समय तक रहा और कहां चला गया. मंगल पर तापमान बहुत ज़्यादा भी हो सकता है और बहुत कम भी. मंगल एक रेगिस्तान की तरह है इसलिए अगर कोई मंगल पर जाना चाहे तो उसे बहुत ज़्यादा पानी लेकर जाना होगा. मंगल पर ज्वालामुखी बहुत बड़े हैं बहुत पुराने हैं और समझा जाता है कि निष्क्रिय हैं. मंगल पर जो खाई है वो धरती की सबसे बड़ी खाई से भी बहुत बड़ी है. मंगल का गुरुत्वाकर्षण धरती के गुरुत्वाकर्षण का एक तिहाई है. इसका मतलब ये है कि मंगल पर कोई चट्टान अगर गिरे तो वो धरती के मुकाबले बहुत धीमी रफ़्तार से गिरेगी. किसी व्यक्ति का वज़न अगर धरती पर 100 पौंड हो तो कम गुरुत्वाकर्षण की वजह से मंगल पर उसका वज़न सिर्फ़ 37 पौंड होगा. मंगल की सतह पर धूल भरे तूफ़ान उठते रहते हैं कभी-कभी ये तूफ़ान पूरे मंगल को ढक लेते हैं. मंगल पर वातावरण का दबाव धरती की तुलना में बेहद कम है इसलिए वहां जीवन बहुत मुश्किल है. |
| DATE: 2013-11-04 |
| LABEL: science |
| [199] TITLE: सच होने जा रहा है उड़ने वाली कार का सपना |
| CONTENT: हेनरी फ़ोर्ड ने 1940 में कहा था मेरे शब्दों को याद रखिए हवाई जहाज़ और मोटरकार का मिलाजुला रूप आने वाला है. आप हंस सकते हैं लेकिन ऐसा होगा. इसके ठीक नौ वर्ष बाद मॉल्टन टेलर ने अपनी एयरकार का डिज़ाइन तैयार कर और उसे उड़ाकर फ़ोर्ड की काल्पनिक अवधारणा की व्यावहारिकता को साबित किया. लेकिन अब तक केवल तीन मॉडल बनाए गए हैं और एक ऐसे व्यावहारिक वाहन का सपना अधूरा ही रहा जो सड़क पर फ़र्राटा भरने के साथ हवा में भी उड़ सके. आज तकनीकी विकास के चलते ऐसे हवाई जहाज़ बनाए जा सकते हैं जो पास आती किसी वस्तु का अनुभव कर अपना बचाव कर सकते हैं. इसके साथ ही कंप्यूटर आधारित डिज़ाइन और मेटेरियल साइंस के विकास के कारण सुरक्षा अधिकारी फ़्लाइंग कार को पूरी तरह से मंज़ूरी देने पर विचार कर रहे हैं. अमरीकी प्रायोगिक वायुयान संघ के प्रवक्ता डिक नैपिंस्की ने बताया हालांकि राइट ब्रदर्स और हेनरी फ़ोर्ड ने हवाई जहाज़ और कार को एक करने का सपना देखा था लेकिन इंजीनियरिंग नियामक और सांस्कृतिक अड़चनें हमेशा से बाधक बनी रहीं. उन्होंने कहा अब हम वास्तव में इस सपने के सच होने के नज़दीक हैं. उदाहरण के लिए इस साल जुलाई में बोस्टन स्थित कंपनी टेराफ़्यूगिया ने प्रायोगिक वायुयान संघ के एयरवेंचर कार्यक्रम में सड़क पर चलने वाले हवाई जहाज को प्रदर्शित किया. टेराफ़्यूगिया के कारोबार विकास के उपाध्यक्ष रिचर्ड गर्श ने कहा कि हमें एफ़एए अमरीकी फ़ेडरल एविएशन अथॉरिटी से प्रायोगिक उड़ान योग्यता प्रमाणपत्र मिला है जिसका अर्थ है कि हमें अभी आबादी वाले इलाकों से दूर रहना होगा. उन्होंने कहा कि पूर्ण प्रमाणपत्र हासिल करने की दिशा में काम तय योजना के मुताबिक चल रहा है. गर्श कहते हैं कि हम यह नहीं कह रहे हैं कि ये पारिवारिक कार की जगह ले लेगा और आपको हमेशा किसी एयरपोर्ट से ही उड़ान भरनी होगी लेकिन इसके जरिए आप एयरपोर्ट तक ड्राइव करते हुए जा सकते हैं. कंपनी को उम्मीद है कि वह दो साल के भीतर इसकी बिक्री शुरू कर देगी हालांकि ये इस बात पर निर्भर करेगा कि सुरक्षा प्रमाणपत्र मिलने में कितना समय लगता है. इस विमान की कीमत करीब 2-80 लाख डॉलर होगी. गर्श ने बताया कि कंपनी को पहले ही 100 से अधिक आर्डर मिल चुके हैं. एफ़एए के प्रवक्ता लेस डोर ने बीबीसी को बताया कि अगर किसी फ़्लाइंग कार को अमरीका की सड़कों पर फ़र्राटा भरना है तो उस वाहन को अमरीकी परिवहन विभाग के एक कार के लिए तय मानकों के साथ ही एक वायुयान के लिए तय मानकों पर भी खरा उतरना होगा. उन्होंने बताया टेराफ़्यूगिया अमरीका की एक मात्र वायुयान परियोजना है जिसे एफ़एए और एनएचटीएसए राष्ट्रीय राजमार्ग यातायात सुरक्षा प्राधिकरण दोनों से प्रमाणपत्र हासिल करना होगा. भविष्य को देखते हुए टेराफ़्यूगिया की कॉन्सेप्ट कार द टीएफ-एक्स को उर्ध्वाधर उड़ान भरने में सक्षम बनाया जा रहा है. इंजन के ख़राब होने की दशा में इसमें एक पूर्ण पैराशूट प्रणाली और अगर पायलट अक्षम हो जाए तो इसमें ऑटो-लैंडिंग की सुविधा भी उपलब्ध होगी. लेकिन गर्श का अनुमान है कि टीएफ़-एक्स के सपने को हकीकत बनने में करीब आठ से 10 साल का समय लगेगा. अमरीका के एक अन्य संस्थान इंडीजेनस पीपुल्स टेक्नालॉजी एंड एडूकेशन सेंटर आई-टेक ने मैवेरिक एलएसए का विकास किया है. यह एक छोटी गाड़ी है जो रियर प्रोपेलर और पैराशूट की मदद से उड़ान भर सकती है. इसका विकास बियॉन्ड रोड्स ने दुर्गम इलाकों में पहुंचने के लिए किया है. स्लोवाकियाई फर्म एयरोमोबाइल के सह-संस्थापक और मुख्य डिज़ाइनर स्टीफ़ेन क्लेन ने बचपन में एक फ़्रांसीसी फिल्म फैंटोमास से डिचेन देखी थी. इसके बाद ही उन्हें उड़ने वाली कार का विचार आया. वह एकेडेमी ऑफ़ फ़ाइन आर्ट्स एंड डिज़ाइन में ऑडी फॉक्स वैगन और बीएमडब्ल्यू की शोध परियोजनाओं के प्रमुख हैं और पिछले 20 वर्षों से अपने सपने को सच करने में जुटे हुए हैं. एयरोमोबाइल की प्रवक्ता तातियाना वेबेरोवा ने स्वीकार किया हमने प्रमाणपत्र हासिल करने की राह में खड़ी समस्याओं को दूर करने की कोशिश शुरू ही की है. अभी हमें लंबा सफर तय करना है. उन्होंने बताया कि प्रोटोटाइप के 2014 तक तैयार होने का अनुमान है और कंपनी अमेरिका में नियामक मंज़ूरियों के लिए प्रयास करेगी. तो क्या अब हमारी मोटर कारें हवा में उड़ने के लिए तैयार हैं ईएए के नैपिन्सकी कहते हैं कि लोग अभी भी उड़ने से डरते हैं. इसे लेकर रहस्य बना हुआ है. यह भी एक पहलू है. |
| DATE: 2013-11-01 |
| LABEL: science |
| [200] TITLE: दिमाग़ से कैसे जुड़ा है कुत्तों का दुम हिलाना |
| CONTENT: कुत्ते हमेशा अपनी पूंछ हिलाते रहते हैं. क्या उनकी पूंछ हिलाने की ये हलचल उनके दिमाग़ से जुड़ी होती है जानिए कुत्तों की इन हलचलों पर हुए एक शोध के बारे में. कुत्तों की पूंछ में होने वाली हलचल उनके दिमाग़ से कैसे जुड़ी होती है वैज्ञानिकों ने इस पर प्रकाश डाला है. पहले के शोध में यह जानकारी सामने आई थी कि ख़ुश कुत्ते अपनी पूंछ दांई तरफ़ ज्यादा हिलाते हैं और जब कुत्ते परेशान होते हैं तो वे बांई तरफ पूंछ हिलाते हैं. लेकिन अब वैज्ञानिकों का कहना है कि साथी कुत्ते पूंछ हिलाने के इस फ़र्क़ को पहचान कर प्रतिक्रिया कर सकते हैं. यह शोध जीवविज्ञान की एक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. ट्रेंटो के विश्वविद्यालय से एक न्यूरोसाइंटिस्ट प्रोफ़ेसर जॉर्जियो वैलोर्टिगारा ने कहायह माना जाता है कि इंसानों में मस्तिष्क का दांया और बांया हिस्सा उत्तेजित करने में अलग-अलग भूमिका निभाता है जिससे सकारात्मक और नकारात्मक भावनायें उपजती हैं. इस शोध में हमने दूसरी प्रजातियों में भी यही जानने की कोशिश की. उन्होंने आगे कहा कि इंसानों की तरह ही कुत्तों में भी मस्तिष्क का बांया हिस्सा दांई तरफ़ होने वाली हलचल और विपरीत हावभाव के लिए ज़िम्मेदार थे और दोनों गोलार्द्ध भावनाओं को व्यक्त करने में अलग-अलग भूमिकायें निभाते हैं. यह पता लगाने के लिए कि कुत्ते दूसरे कुत्तों की तिरछी पूंछ को हिलाते वक्त क्या प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हैं इसके लिए शोधकर्ताओं ने जानवरों की निगरानी की और दूसरे कुत्तों की फ़िल्में भी देखीं. शोधकर्ताओं ने इन पालतू कुत्तों की दिल की धड़कन मापी और उनके व्यवहार का विश्लेषण भी किया. प्रोफ़ेसर वैलोर्टिगारा ने कहा हमने कुत्तों को कुत्तों की फ़िल्में दिखायीं किसी भी उलझाने वाले मुद्दे से छुटकारा पाने के लिए एक रूपरेखा की ज़रूरत पड़ी और हम पूंछ की हलचल और इसके बांई या दांई तरफ़ ज्यादा रहने के बारे में जान सके. जब कुत्तों ने एक अन्य भावशून्य कुत्ते को दांई तरफ़ हिलाते देखा तो वे पूरी तरह निश्चिंत खड़े रहे. लेकिन जैसे ही कुत्तों ने बांई तरफ़ पूंछ हिला रहे कुत्ते को देखा तो उनकी हृदय गति बढ़ गई और वे चिंतित हो गए. प्रोफ़ेसर के मुताबिक़ उन्हें नहीं लगता है कि कुत्ते अपनी पूंछ की इन हलचलों के ज़रिए आपस में कोई बातचीत कर रहे थे. इसकी जगह उन्हें लगता है कि कुत्तों ने इन अनुभवों से यह सीखा है कि उन्हें कौन सी हलचल करना चाहिए और क्या नहीं. शेधकर्ताओं का कहना है कि ये परिणाम कुत्तों के मालिकों चिकित्सकों और प्रशिक्षकों को उनकी भावनाओं के बारे में ज्यादा अच्छी तरह से समझने में मदद करेंगे. कुत्तों की पूंछ की हलचलों को लेकर किया गया यह पहला शोध नहीं था इससे पहले लिंकन विश्वविद्यालय के शोधकर्ता भी पिछले साल ऐसा ही एक शोध कर चुके हैं. कुत्तों के व्यवहार विशेषज्ञ जॉन ब्रेडशॉ के मुताबिक़ विभिन्न अध्ययनों में कुत्तों को पूरी तरह से व्याख्या नहीं की गई. उन्होंने एक अध्ययन के बारे में बताया जिसमें कुत्ते किस प्रकार कुत्तों को समझते हैं इसका अध्ययन किया गया था. उन्होंने कहा इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि स्तनधारियों में मस्तिष्क के दोनों हिस्सों का उपयोग अलग-अलग उद्देश्यों के लिए किया जाता है और अभी भी बहुत सी जानकारी आना बाक़ी है. कुत्ते कोई अपवाद नहीं हैं. उनके मुताबिक़ कुत्तों के व्यवहार को आसानी से रिकॉर्ड किया जा सकता है और शायद बहुत जल्द यह भी पता चल जाएगा कि कुत्ते इपनी पूंछ एक तरफ से दूसरी तरफ़ क्यों हिलाते हैं. |
| DATE: 2013-11-01 |
| LABEL: science |
| [201] TITLE: चॉकलेट कंपनियों का वादा, ऊंट के मुंह में ज़ीरा |
| CONTENT: चॉकलेट आदि खाद्य पदार्थ बनाने वाली शीर्ष कंपनियां भले ही फ़ैट वसा मुक्त उत्पाद का वादा कर रही हों लेकिन उनकी इस प्रतिबद्धता पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों को भरोसा नहीं है. दुनिया की शीर्ष खाद्य पदार्थ निर्माता कंपनियों द्वारा वसा मुक्त उत्पाद बनाने के वादे को जाने-माने स्वास्थ्य विशेषज्ञ संदेह की दृष्टि से देखते हैं. उनके अनुसार अपने उत्पादों से वसा को कम करने का वादा करने वाली शीर्ष कंपनियां अपने उद्देश्य में नाकाम रही हैं. असल में यह वादा उद्योग और सरकार के बीच एक स्वैच्छिक प्रतिबद्धता का हिस्सा भर है. लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य संकाय के प्रोफ़ेसर जॉन एस्टन का कहना है कि इस वादे की विश्वसनीयता संदेह के घेर में है. इनमें मॉरिसन सबवे और नेस्ले जैसी कंपनियां भी शामिल हैं जो किटकैट के निर्माण में तब्दीली करने जा रही हैं. औसत व्यक्ति को प्रतिदिन 30 ग्राम से अधिक वसा नहीं लेनी चाहिए जबकि औसत महिलाओं के लिए यह मात्रा 20 ग्राम प्रतिदिन है. लेकिन अधिकांश लोग निर्धारित मात्रा से 20 प्रतिशत ज्यादा वसा लेते हैं. सेनबरी का इस्तेलाम करने वाले 2000 लोगों पर किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि इनमें 84 प्रतिशत यही नहीं जानते थे कि संतृप्त वसा की कितनी मात्रा बेहतर स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है. स्वास्थ्य विभाग के अनुसार ख़ुराक़ में वसा की मात्रा को 15 प्रतिशत तक कम कर हृदयाघात और हृदयरोगों से होने वाली बाल मृत्यु में 2600 मामलों को रोका जा सकता है. इसमें कहा गया है कि लगभग आधे खाद्य निर्माता और खुदरा उद्योग अपने उत्पादों में संतृप्त वसा को कम करने के लिए एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर चुके हैं. इन्हीं कंपनियों में से एक मॉरिसन ने कहा है कि वह अपने उत्पादों के अवयवों को सहमति के अनुसार सुधारेगा जबकि सबवे अपने किड्स पैक में वसा कम करने के लिए इसे बिस्कुट जैसे अन्य स्वास्थ्यवर्द्धक उत्पादों से स्थानांतरित करेगा. सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री जेन एलिसन ने कहा समहमति पत्र पर इतनी कंपनियों का हस्ताक्षर वाक़ई उत्साहजनक है. रेस्पांसबिलिटी फूड नेटवर्क की चेयरमैन प्रोफ़ेसर सुसान जेब कहती हैं कि कंपनियों द्वारा किए गए वादे वसा कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम हैं. लेकिन ये वादे कभी पूरे भी होंगे इस बात को लेकर आलोचक निश्चिंत नहीं हैं. हालांकि वे यह भी कहते हैं जिस पैमाने पर मोटापे का संकट है उसकी तुलना में यह कोशिश ऊंट के मुंह में ज़ीरा जैसी है. इस समस्या को हल करने के लिए स्वेच्छा से किए गए स्वनियमन के नज़रिए के प्रति हम निश्चिंत नहीं हो सकते. उनके अनुसार यह कोशिश अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है और यह कंपनियों को अपना दामन साफ़ करने की कोशिश के तौर पर देखा जाने लगा है. नेशनल ओबेसिटी फ़ोरम के टैम फ्राई के अनुसार मंत्रियों को एक व्यस्थित क़ानून के बारे में विचार करना चाहिए. उन्होंने कहा कि स्वनियम की यह कोशिश बहुत कामयाब नहीं हो पाएगी जबतक कि सरकार सभी कंपनियों पर शिकंजा नहीं लगाती और उन सभी को हस्ताक्षर करने पर मजबूर नहीं करती. इस सहमति पत्र की घोषणा एक विशेषज्ञ के उस बयान के दूसरे दिन आई जिसमें वसा के ख़तरे को बढ़ाचढ़ा कर प्रचारित किए जाने की बात कही गई थी. एक ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में डॉक्टर असीम मल्होत्रा ने लिखा है कि वसा पर बहुत ज्यादा ध्यान केंद्रित किए जाने से चीनी और नमक जैसे अन्य कारक नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं. हालांकि ब्रिटिश हर्ट फ़ाउंडेशन की वरिष्ठ डाइटीशियन विक्टोरिया टेलर का कहना है कि वसा में कटौती करना कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम बनाए रखने का एक आसान तरीक़ा है. आपको अपने कोलेस्ट्रॉल स्तर पर ध्यान रखने की ज़रूरत है क्योंकि सभी जानते हैं कि इसका उच्च स्तर हृदय रोग का ख़तरा बढ़ा देता है. |
| DATE: 2013-10-27 |
| LABEL: science |
| [202] TITLE: बड़े पंजों वाले जीवाश्म में था मकड़ी की तरह दिमाग |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने एक बेहद पुराने जीवाश्म से अब तक के सबसे संरक्षित तंत्रिका तंत्र की खोज़ की है. ईसा पूर्व करीब 52 करोड़ साल पहले के इस बड़े पंजों वाली मकड़ी के जीवाश्म से स्पष्ट तौर पर मस्तिष्क और तंत्रिका कॉर्ड के होने के साक्ष्य मिले हैं जो उस जीव के धड़ में सक्रिय थे. इस नमूने से अब यह स्पष्ट होता है कि मकड़ी और बिच्छू के पूर्वज एक-दूसरे से जुड़े हुए थे लेकिन क़रीब 50 करोड़ साल पहले ये अलग-अलग हो गए. अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने इस अध्ययन को नेचर पत्रिका में प्रकाशित किया है. यह विलुप्त हो चुके ऐसे जीवों के जीवाश्म हैं जो आपस में जुड़े हुए थे. लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के ग्रेग एजकॉम्बे का कहना है कि जीवों के मुख्य प्रजातियों में ऐसे ही तंत्रिका तंत्र के होने की संभावना है जिससे जीवाश्म वैज्ञानिकों को यह पता लगाने में सहायता मिल सकती है कि ये कैसे जुड़े हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा तंत्रिका तंत्र हमारे पास मौजूद एक सबसे विश्वसनीय टूल किट है. हम यह पता करने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या यह जीवों के जीवाश्म से नेचुरल टिशू को संरक्षित करने का सबूत है. उन्होंने कहा हम जिन जीवाश्मों के साथ काम कर रहे हैं वे कार्बन काल के दौरान के बेहतरीन शारीरिक संरक्षण हैं. इसने हमें दिमाग यांत्रिकी कॉर्ड और नेचुरल टिशू के बारे में सूचनाएं दी हैं जो आंखों में जाती हैं. इस जीवाश्म को हाल ही में दक्षिणी चीन से बरामद किया गया और यह अलालकोमेनेयस का हिस्सा है. अलालकोमेनेयस आपस में जुड़े हुए जीवों की एक प्रजाति होती है. इस समूह के जीवों में दर्जनों उपअंग होते हैं जिनके सहारे वे तैरते या रेंगते हैं. इसकी उत्पत्ति के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए इसका सीटी स्कैन कर दूसरे ऐसे जीवों के साथ तुलना की गई. इसके बाद टीम ने इस जीव की बनावट को समझने के लिए 3डी सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया. डॉक्टर एजकॉम्बे ने कहा कि ऐसे जीवों के बारे में जानने के उत्सुक उनके जैसे लोग यह समझना चाहते हैं कि ये आज के इस प्रजाति के जीवों से कितना अलग थे. उन्होंने कहा तंत्रिका तंत्र तक पहुंचने के बाद हमने आज के जीवों के इस्तेमाल होने वाली सूचनाओं के आधार पर ही प्राचीन जीवाश्मों में रिश्तों का अध्ययन किया. इस अध्ययन की सह लेखक और नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के ही जियाओया मा ने कहा ईसा पूर्व 52 करोड़ साल पहले के जीवाश्म में एक पूर्ण केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के बारे में सफलतापूर्वक अध्ययन के लिए नई तकनीक का इस्तेमाल करना काफी शानदार रहा. उन्होंने कहा कि इस जीवाश्म के हाई रिज्योलुशन वाली बनाई गई तस्वीर के आधार पर टीम ने इस जीव के सिर वाले क्षेत्र में तंत्रिकीय बनावट देखी. वैज्ञानिकों ने इस जीव में मस्तिष्क से जुड़े कई और हिस्से भी दिखे. |
| DATE: 2013-10-25 |
| LABEL: science |
| [203] TITLE: पांच में से एक ही बच्चे को प्रकृति से लगाव |
| CONTENT: पर्यावरण संस्था आरएसपीबी के अनुसार बड़ों के गलत नजरिए के चलते बच्चों में प्रकृति से दूरी बढ़ रही है. एक अध्ययन में पता चला है कि बच्चों की एक बहुत बड़ी संख्या प्रकृति से दूर होती जा रही है. पर्यावरण संरक्षण संस्था आरएसपीबी के एक अध्ययन के अनुसार 8 से 12 वर्ष तक की उम्र के केवल 21 प्रतिशत ब्रितानी बच्चे ही प्रकृति से जुड़ाव रखते हैं. अध्ययन में यह भी पाया गया कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियां प्रकृति के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं. संस्था के अनुसार बड़ों में प्रकृति के खतरनाक होने की धारणा से बच्चों की रुचि प्रभावित होती है. हाल के वर्षों में इस तरह के बहुत से शोध हुए हैं जिसमें इस बात को रेखांकित किया गया है कि प्रकृति के प्रति जुड़ाव और उसका अहसास बच्चों के बीच कम होता जा रहा है. कुछ लोगों का तर्क है कि इससे बच्चों का स्वास्थ्य शिक्षा और व्यवहार प्रभावित होता है. ब्रिटेन के नेशनल ट्रस्ट ने 2012 में एक रिपोर्ट प्रकाशित कर इसे नेचर डेफिसिट डिसॉर्डर का नाम दिया था. हालांकि इसे बीमारी नहीं माना गया. आरएसपीबी का दावा है कि बच्चों का बाहरी दुनिया से लगाव या उससे दूरी को आंकने के लिए उसने पहली बार एक पैमाना बनाया है. संस्था ने 16 बिंदुओं की एक प्रश्नावली तैयार की और उसे पूरे ब्रिटेन में 1200 बच्चों से भरने को कहा गया. नतीजे में पता चला कि 21 प्रतिशत बच्चे ही उस पैमाने पर खरे उतरे जबकि 27 प्रतिशत लड़कियां इस पैमाने पर खरी उतरीं और उनके समकक्ष 16 प्रतिशत लड़के ही इस पैमाने पर खरे उतरे. अध्ययन में पता चला है कि वेल्स के 13 प्रतिशत बच्चे ही प्रकृति को लेकर संवेदनशील दिखे जबकि उत्तरी आयरलैंड और स्कॉटलैंड में यह प्रतिशत दोगुना था. इसी तरह लंदन के बच्चों ने देश के बाक़ी हिस्से की अपेक्षा ज़्यादा स्कोर किया. कुल मिलाकर ग्रामीण बच्चों की अपेक्षा शहरी बच्चों में प्रकृति के प्रति ज्यादा लगाव दिखा. आरएसपीबी का मानना है कि बच्चों में प्रकृति के प्रति जुड़ाव न केवल उनके स्वास्थ्य के लिए अच्छा है बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मददगार साबित होगा. यदि हम बच्चों की ऐसी पीढ़ी विकसित कर सकें जिनका पर्यावरण से गहरा जुड़ाव हो और वे खुद को उसका हिस्सा मानें तो प्रकृति को बचाने लायक भविष्य में हमारे पास ताकत पैदा हो जाएगी. |
| DATE: 2013-10-24 |
| LABEL: science |
| [204] TITLE: किशोरों का शैक्षणिक प्रदर्शन बेहतर बनाता कसरत |
| CONTENT: शोध के मुताबिक जो बच्चे कसरत करते हैं वे पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करते हैं. एक नए अध्ययन के मुताबिक कसरत से किशोरों का शैक्षणिक प्रदर्शन बेहतर होता है. करीब पांच हज़ार बच्चों पर किए गए इस अध्ययन में अंग्रेजी गणित और विज्ञान विषय की परीक्षा और कसरत के बीच में संबंध पाया गया. अध्ययन के मुताबिक 17 मिनट तक कसरत करने पर लड़कों और 12 मिनट तक कसरत करने पर लड़कियों के प्रदर्शन में सुधार देखा गया. स्ट्रैथक्लाइड और डूंडी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि कसरत के कारण विज्ञान विषय में लड़कियों का प्रदर्शन विशेषकर बेहतर हुआ. अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक इस अध्ययन से लिंग भेद के कारण कसरत का दिमाग पर अलग-अलग असर पड़ने का भी पता चलता है. जिन बच्चों ने नियमित कसरत की उन्होंने न केवल 11 साल की उम्र में बल्कि 13 और 16 साल की उम्र में भी परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन किया. किशोरों को हर रोज़ एक घंटे तक शारीरिक गतिविधि करने का सुझाव दिया जाता है लेकिन अधिकतर किशोर इससे काफी कम कसरत करते हैं. शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि अगर किशोर हर रोज 60 मिनट तक कसरत करते तो उनका प्रदर्शन कितना बेहतर होता. उन्होंने दावा किया कि 15 मिनट तक कसरत करने के कारण किशोरों का प्रदर्शन एक चौथाई ग्रेड बेहतर हुआ. ऐसे में यह संभव है कि अगर किशोर हर रोज़ एक घंटे तक कसरत करते तो उनके प्रदर्शन में पूरे एक ग्रेड का सुधार होता. अध्ययन करने वाले दल में शामिल डूंडी यूनिवर्सिटी के डॉक्टर जोइस बोथ ने कहा शारीरिक गतिविधियां स्वस्थ रहने के साथ-साथ अन्य चीज़ों के लिए भी ज़रूरी हैं. माता-पिता नीति निर्माताओं और शिक्षा से जुड़े लोगों के लिए ये नतीज़े काफी मायने रखते हैं. ब्रिटेन के जर्नल स्पोर्ट्स मेडिसीन में छपे इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कहा है कि इस बारे में आगे होने वाले अध्ययन के नतीज़ों से सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा नीति पर असर पड़ सकता है. |
| DATE: 2013-10-24 |
| LABEL: science |
| [205] TITLE: सोने का भंडार खोजने का 'आसान तरीका' |
| CONTENT: उन्नाव का डौंडिया खेड़ा गाँव आजकल सोने के रहस्यमय भंडार के लिए देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है. डौंडिया खेड़ा की मिट्टी में सोना दबा है या नहीं ये तो भविष्य में ही तय होगा लेकिन वैज्ञानिकों ने साबित कर दिया है कि कुछ पेड़ों की पत्तियों में सोना पाया जाता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि पत्तियों पर सोने के कणों की मौजूदगी का मतलब है कि पेड़ के नीचे धरती में सोने का भंडार हो सकता है. ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं का कहना है कि यूकेलिप्टस की पत्तियों में मौजूद कणों से पता चलता है कि कई मीटर नीचे सोने का भंडार जमा है. उनका मानना है कि मुश्किल स्थानों में सोने की तलाश के लिए ताज़ा शोध के नतीजों से काफ़ी फ़ायदा होगा. इस शोध को जनरल नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित किया गया है. ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रमंडल वैज्ञानिक और औद्योगिक शोध संगठन सीएसआईआरओ के भू-रासायनिक डॉक्टर मेल लिंटर्न ने बताया हमने ऑस्ट्रेलिया में और दुनिया में दूसरे कई स्थानों में भंडार पाया है. उन्होंने कहा कि अब हम अधिक मुश्किल भंडारों की तलाश कर रहे हैं जो नदियों की तलछट और रेत के टीलों में कई मीटर नीचे दबे हुए हैं. लिंटर्न ने बताया कि ऐसा करने के लिए इन पेड़ों के ज़रिए एक तरीका मिल रहा है. इन यूकेलिप्टस पेड़ों के आस-पास की मिट्टी में सोने के कण पाए गए हैं लेकिन शोधकर्ताओं ने साबित किया है कि पेड़ इन तत्वों को ग्रहण कर रहे हैं. ऑस्ट्रेलियाई सिक्रोटॉन का इस्तेमाल करते हुए एक बड़ी मशीन के जरिए यह जांच की गई. मशीन ने इसके लिए एक्स-रे का इस्तेमाल किया. जांच में पाया गया कि कुछ पेड़ों की पत्तियों टहनियों और छालों में सोने की मौजूदगी थी. हालांकि इस दुर्लभ धातु की मात्रा बेहद कम थी. डॉक्टर लिंटर्न ने बताया हमने एक गणना की और पाया कि एक अंगूठी बनाने के लिए ज़रूरी सोना पाने के लिए हमें किसी स्वर्ण भंडार के ऊपर 500 पेड़ उगाने होंगे. हालांकि कणों की मौजूदगी से 30 मीटर से अधिक गहराई पर दफन एक बड़े भंडार के बारे में पता चलता है. डॉक्टर लिंटर्न का कहना है हमारा मानना है कि पेड़ हाइड्रोलिक पंप की तरह बर्ताव कर रहे हैं. वो जीवन के लिए जड़ों से पानी ले रहे हैं और ऐसा करने के दौरान वो अपने नाड़ी तंत्र के जरिए कम मात्रा में घुलनशील सोने के कण ग्रहण करते हैं जो पत्तियों तक पहुंच जाता है. फिलहाल यह धातु पृथ्वी की सतह से ऊपर निकली चट्टानों में पाई जाती है जहां अयस्क सतह पर दिखाई देते हैं या फिर सघन खोज के तहत ड्रिलिंग के जरिए इसे खोजा जाता है. लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि पेड़-पौधों के विश्लेषण से सोने के अज्ञात भंडारों को खोजने का बेहतर तरीका पाया जा सकता है. डॉक्टर लिंटर्न के मुताबिक़ इस तरीके से स्वर्ण भंडारों की खोज में आने वाली लागत में कमी आएगी और साथ ही पर्यावरण को क्षति भी कम होगी. शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तकनीक का इस्तेमाल दुनिया के दूसरे हिस्सों में लोहा तांबा और लेड जैसी धातुओं की खोज के लिए किया जा सकता है. |
| DATE: 2013-10-23 |
| LABEL: science |
| [206] TITLE: किसमें भरोसा करें, विज्ञान या भगवान? |
| CONTENT: लॉर्ड केल्विन 19वीं सदी के महान वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं. वो एक धर्मनिष्ठ ईसाई थे जिन्होंने अपने धर्म और विज्ञान में सामंजस्य बिठाने का तरीका ढूंढा लेकिन इसके लिए उन्हें डार्विन सहित अपने ज़माने के वैज्ञानिकों से संघर्ष करना पड़ा. उस वक़्त के इस संघर्ष की गूंज मौजूदा दौर में विज्ञान और धर्म की बहस में भी सुनाई देती हैं. केल्विन पैमाने के अलावा यांत्रिक यानी मैकनिकल ऊर्जा और गणित के क्षेत्र में उनका शोध यूरोप और अमरीका को जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाली ट्रांस अटलांटिक केबल को बिछाने में अहम साबित हुआ है. वो ब्रिटेन के पहले वैज्ञानिक थे जिन्हें हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में जगह मिली. उनका हमेशा ये विश्वास रहा कि उनकी आस्था से उन्हें बल मिला है और उनके वैज्ञानिक शोध को प्रेरणा मिली है. केल्विन का मानना था कि विज्ञान का पूरा सम्मान होना चाहिए. उनका कहना था वैज्ञानिक मानते हैं कि विज्ञान ने सृष्टि को बनाने वाले में आस्था जताने से बचते हुए भी प्रकृति के सभी तथ्यों की व्याख्या करने का तरीका ढूंढ लिया है. मेरा मानना है कि ये धारणा निराधार है. मैंने जितना शोध किया मुझे लगता गया कि विज्ञान में नास्तिकता की जगह नहीं है. अगर आप मज़बूती से सोचते हैं तो विज्ञान आपको भगवान में भरोसा रखने के लिए मजबूर करेगा. केल्विन बाइबल पढ़ते थे और रोज़ाना चर्च जाते थे. बेलफ़ास्ट के क्वींस विश्वविद्यालय के डॉक्टर एंड्र्यू होम्स बताते हैं अपने सभी कामों में केल्विन की कोशिश रही कि वो अपनी आस्था राजनीति और व्यावसायिक हितों को मिला सकेंकेल्विन के कुछ सिद्धांत ग़लत साबित हुए इनमें पृथ्वी की आयु की ऊपरी सीमा तय करना भी शामिल था. केल्विन ने अंदाज़ा लगाया था कि ये सीमा कुछ करोड़ साल होगी. डॉक्टर होम्स कहते हैं कुछ लोग केल्विन को ख़ारिज कर सकते हैं क्योंकि धरती के ठंडे होने को लेकर उनका काम ग़लत साबित हुआ था और उन्होंने विद्युत चुंबकत्व यानी इलेक्ट्रोमैग्नेटिज़्म पर मैक्सवेल के काम को गंभीरता से नहीं लिया था. लेकिन उन्हें 19वीं सदी प्रमुख भौतिकशास्त्रियों में गिना जाता है. पृथ्वी की उम्र कम बताने की वजह से भूगर्भशास्त्री और डार्विनवादी संतुष्ट नहीं थे लेकिन ईश्वरवादियों को ये उम्र बहुत ज़्यादा लगती थी इस वजह से केल्विन धर्म और विज्ञान के बीच फंस कर रह गए. केल्विन ने डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत का ये कहते हुए विरोध किया कि डार्विन ने प्रकृति की रचना में ईश्वर की मौजूदगी के सबूतों को नज़रंदाज़ किया है और उन्होंने ये भी मानने से इनकार कर दिया कि मृत पदार्थों के परमाणु कभी मिलकर जीवन बना सकते हैं. आज के दो प्रमुख वैज्ञानिकों मशहूर भौतिकशास्त्री स्टीफ़न हॉकिंग और रिचर्ड डॉकिंस ने धर्म का जमकर विरोध किया है. तो क्या ये माना जाए कि आज के वैज्ञानिक केल्विन की तरह ही आस्था रखते हैं या आस्था और विज्ञान आज बहुत दूर हो गए हैं. अमरीका के टेक्सस की राइस यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर एलीन एक्लंड ने साल 2005 में अमरीका के आला विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों में सर्वे किया उन्होंने पाया कि 48 लोगों की धार्मिक आस्था थी और 75 लोग मानते थे कि धर्म से महत्वपूर्ण सच का पता चलता है. वो कहती हैं ये कहना ग़लत होगा कि आज उन वैज्ञानिकों की संख्या ज़्यादा है जो ईसाई हैं. लेकिन निश्चित रूप से ऐसे वैज्ञानिक हैं जो अपने वैज्ञानिक काम को अपनी आस्था से जुड़ा हुआ मानते हैं. अमरीकी आनुवांशिक वैज्ञानिक फ़्रांसिस कॉलिंस ने कहा था हमारे समय की एक बड़ी त्रासदी ये धारणा है कि विज्ञान और धर्म में संघर्ष होना ही चाहिए. तो क्या वाकई में विज्ञान और धर्म प्राकृतिक रूप से एक दूसरे के खिलाफ़ हैं स्टीफ़न हॉकिंग ने अपनी किताब द ग्रैंड डिज़ाइन में लिखा है स्वाभाविक रचना ही वो वजह है कि कुछ न होने की जगह कुछ है ये ब्रह्मांड क्यों है हम क्यों हैं. ये ज़रूरी नहीं है कि हचलच पैदा करने और ब्रह्मांड को चलाने के लिए भगवान को बुलाया जाए. ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर जॉन लेनक्स ने साल 2010 में लिखे एक लेख में हॉकिंग के तर्कों का विरोध किया. लेनक्स ने कहा हॉकिंग के तर्कों के पीछे जो वजह है वो इस विचार में है कि विज्ञान और धर्म में एक संघर्ष है लेकिन मैं इस अनबन को नहीं मानता. कुछ साल पहले वैज्ञानिक जोसेफ़ नीडहैम ने चीन में तकनीकी विकास को लेकर अध्ययन किया. वो ये जानना चाहते थे कि आखिर क्यों शुरुआती खोजों के बावजूद चीन विज्ञान की प्रगति में यूरोप से पिछड़ गया. वो अनिच्छापूर्वक इस नतीजे पर पहुंचे कि यूरोप में विज्ञान एक तार्किक रचनात्मक ताकत जिसे भगवान कहते हैं में भरोसे की वजह से आगे बढ़ा जिससे सभी वैज्ञानिक नियम समझने लायक बन गए. |
| DATE: 2013-10-23 |
| LABEL: science |
| [207] TITLE: ब्रिटेन में दिल का अनोखा ऑपरेशन |
| CONTENT: ब्रिटेन के डॉक्टरों ने पहली बार एक ऐसे दिल का ऑपरेशन किया है जो धड़क तो रहा था लेकिन उसकी गति ही बहुत कम थी. इस मरीज़ का दिल शरीर के हिस्सों को ख़ून की आपूर्ति करने के लिए संघर्ष कर रहा था. ऐसे में उस पर थोड़े से भी दबाव से उसकी मौत हो सकती थी. इसके लिए डॉक्टरों ने दिल की सिलाई करने की एक तकनीक का प्रयोग कर क्षतिग्रस्त ऊतकों को हटाया. इस दौरान डॉक्टरों ने दिल के आकार को कम भी किया जिससे वह ख़ून की आपूर्ति आसानी से कर सके. यह ऑपरेशन लंदन के किंग्स कॉलेज अस्पताल में किया गया. हृदय को रक्त लाने वाली धमनियों में रुकावट आ जाना हृदय गति के रुक जाने का एक सामान्य कारण है. इससे हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ जाता है. इससे हृदय की पेशी मर जाती है और वहाँ ऐसे क्षतिग्रस्त ऊतक आ जाते हैं जो कि धड़क नहीं सकते. समय के साथ-साथ ये क्षतिग्रस्त ऊतक दिल के हिस्सों में फैल जाते हैं इससे दिल के अंदर सूखे ऊतकों के चलते जगह ज़्यादा हो जाती है. इस वजह से क्हृदय को हर धड़कन के साथ अधिक ख़ून की आपूर्ति करनी पड़ती है. इस सबका प्रभाव यह होता है कि दिल कमज़ोर हो जाता है उसके काम करने की क्षमता कम हो जाती है. ऐसे में आदमी सीढ़ियाँ चढ़ने में हांफने लगता है. इस ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों ने एक तार का उपयोग किया. तार के जरिए पेशियों को कसा गया और हृदय के दीवारों की मरम्मत की गई. इस तरह डॉक्टरों ने क्षतिग्रस्त ऊतकों को हटा दिया. उन्होंने हृदय के एक कक्ष का आकार भी चौथाई घटा दिया. जिस मरीज़ का यह ऑपरेशन किया गया वो हैं दक्षिण-पूर्व लंदन निवासी 58 साल के सेवकेट गूचर. ऑपरेशन के बाद उनके दिल के कामकाज में महत्वपूर्ण सुधार हो रहा है. किंग्स कॉलेज अस्पताल के हृदय रोग विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर ओल्फ़ वेंडलर ने बीबीसी से कहा ब्रिटेन में इस तकनीक का उपयोग हमने पहली बार किया है इसके किसी के हृदय को रोकने या उसे हार्ट लंग मशीन में रखने की ज़रूरत भी नहीं होती है. उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया कम दर्दनाक और कम आक्रामक है. ब्रिटिश हार्ट फ़ाउंडेशन के एसोसिएट मेडिकल डायरेक्टर प्रोफ़ेसर जर्मी पियर्सन ने कहा इस परीक्षण के नतीजे बताएंगे कि यह प्रायोगिक प्रक्रिया सुरक्षित है की नहीं. |
| DATE: 2013-10-21 |
| LABEL: science |
| [208] TITLE: कुछ किलो बोटॉक्स दुनिया के हर इंसान को मार सकता है. |
| CONTENT: आज की तारीख़ में हमारी कई तरह की तकलीफ़ों दर्दों से छुटकारा दिलाने के लिए कई तरह की दवाइयां उपलब्ध हैं- जो ज़िंदगी को आसान बनाती हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इनमें से कई दवाइयां बेहद ख़तरनाक ज़हरों से बनाई गई हैं. माइकल मोज़ली बता रहे हैं इन ख़तरनाक ज़हरों और उनसे बनी दवाओं के बारे में. बोटॉक्स- अपने चेहरे पर जिसके इंजेक्शन लगाने के लिए बहुत से लोग भारी मात्रा में पैसा ख़र्च करते हैं वो दरअसल बॉटुलिनम टॉक्सिन है. यह आज तक मिला सबसे ज़हरीला पदार्थ है. इसके कुछ चम्मच ब्रिटेन में मौजूद हर व्यक्ति को मारने के लिए काफ़ी हैं. सिर्फ़ कुछ किलो से धरती पर इंसान की समूची आबादी को खत्म कर सकता है. बॉटुलिनम टॉक्सिन इतना ख़तरनाक है कि इसे अब भी सैन्य नियंत्रण में ही बनाया जाता है. 100 ट्रिलियन पौंड 9938 ट्रिलियन रुपये प्रति किलो के साथ ये आज तक बना सबसे महंगा उत्पाद भी है. लेकिन फिर भी बोटॉक्स की मांग कम नहीं है. ज़हर के एलडी50 पैमाने जिसमें पदार्थ की वो मात्रा देखी जाती है जिससे किसी की मौत हो सकती है बोटोक्स 0-000001 मिलीग्राम/किलोग्राम. इसका मतलब ये हुआ कि 70 किलो के आदमी को मारने के लिए आपको सिर्फ़ 0-00007 की ज़रूरत पड़ेगी. इसे यूं भी कहा जा सकता है कि 70 किलो के आदमी को मारने के लिए हवा की एक क्यूबिक मिलीमीटर से भी कम की ज़रूरत पड़ेगी. इसकी ख्याति मुख्यतः चेहरे की झुर्रियां हटाने की वजह से है. ये झुर्रियां पैदा करने वाली धमनियों को मार देता है जिससे ये रुक जाती हैं. इसके लिए भी एक बहुत छोटी एक ग्राम की करोड़वीं मात्रा को सेलाइन में घोलकर इस्तेमाल किया जाता है. विज्ञान के नाम पर मैंने भी कई साल पहले बोटोक्स का इस्तेमाल किया था. इसने झुर्रियां तो मिटा दीं लेकिन इसके साथ ही मेरे चेहरे पर भाव भी अजीब आने लगे थे. नई धमनियां आने के बाद ही ये ठीक हुए. बॉटुलिनम टॉक्सिन का इस्तेमाल कई तरह की स्वास्थ्य दिक्कतों को दूर करने के लिए किया जाता है. इनमें आंखों का भेंगापन माइग्रेन अत्यधिक पसीना और मूत्राशय की तकलीफ़ भी शामिल है. दरअसल यह 20 विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों को दूर करने में काम आता है और इसके अन्य उपयोगों की तलाश अब भी जारी है. ऐसा ही एक दूसरा एक बिलियन डॉलर 61 अरब रुपये से ज़्यादा का उच्चरक्तदाब निरोधक दवा है कैप्टोप्रिल. इसे सांप के ज़हर पर किए गए अध्ययनों के बाद विकसित किया गया है. एक्सेनेटाइड जिसे बाएट्टा कहा जाता है टाइप-2 डाइबिटीज़ का प्रभावी इलाज है. इसे दक्षिण-पश्चिमी अमरीका और मैक्सिको में रहने वाले विशाल ज़हरीली छिपकली जिला मॉनस्टर की लार से तैयार किया जाता है. लेकिन आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान पर ज़हरों का असर सिर्फ़ इलाज प्रदान करने के अधिक है. एक ज़हर ने तो आधुनिक दवा उद्योग को नई शक्ल दी. विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में बीमा एक उभरता हुआ उद्योग था. लेकिन आसानी से हासिल होने वाले पैसे की वजह से बहुत सी हत्याएं हो रही थीं जिनमें से ज़्यादातर ज़हर के कारण थीं. सबसे मशहूर मामला एक महिला मैरी एन कॉटन का था जिस पर 1973 में कई हत्याओं के लिए मुकदमा चलाया गया था. उसने चार बार शादी की थी और उसके तीन पति जिनका बड़ा भारी बीमा था मर गए थे. एक बच गया शायद इसलिए क्योंकि उसने बीमा करवाने से इनकार कर दिया था. मैरी ने उसे छोड़ दिया. उसके सभी 10 बच्चे पेट संबंधी बीमारी की वजह से मर गए. सबकी मौत बेहद दुखद थी लेकिन मैरी के सौभाग्य से सभी का बीमा हो रखा था. उसकी मां उसकी भाभी उसका प्रेमी सबकी मौत हो गई. और हर मामले में उसे फ़ायदा हुआ. साल 1872 तक मैरी के 16 नज़दीकी दोस्त या पारिवारिक सदस्य मारे गए थे. लेकिन एक बच गया था- सात साल का सौतेला बेटा चार्ल्स. उसने एक स्थानीय दरिद्रालय को उसे देने की कोशिश की लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया. चार्ल्स भी जल्द ही मर गया. दरिद्रालय के प्रबंधक को थोड़ा शक हो गया और उसने पुलिस को सूचना दे दी. उन्होंने जल्द ही तय किया कि मैरी ने ज़रूर बच्चे को ज़हर दिया होगा और उन्हें लगा कि उसने- आर्सेनिक- देकर बच्चे को मारा है. आर्सेनिक एक खनिज है और एक ज़हर के रूप में यह आद्वितीय है. यह स्वादरहित होता है गर्म पानी में घुल जाता है और एक आउंस 28. 34 ग्राम के सौवें हिस्से से भी कम से जान ले लेता है. 19वीं शताब्दी में इसे चूहों के ज़हर के रूप में बेचा जाता था. यह सस्ता था और आसानी से उपलब्ध था. उस वक्त फोरेंसिक विज्ञान भी अपनी शैशवावस्था में था फिर भी आर्सेनिक के लिए अच्छा टेस्ट मौजूद था. वह इसलिए कि तब आर्सेनिक के ज़हर के इस्तेमाल की बहुत ज़्यादा मामले आ रहे थे. लड़के के पेट से लिए गए नमूनों की जांच की गई और पता चला कि उसकी मृत्यु आर्सेनिक की घातक मात्रा से हुई है. मैरी को उसकी हत्या का दोषी पाया गया और उसे डरहम जेल में फांसी दे दी गई. हालांकि उसकी मां तीन पतियों दो दोस्तों और दस बच्चों की मौत के मामले में उस पर कभी मुकदमा नहीं चलाया जा सका. इसके बाद ही ब्रिटेन में आर्सनिक कानून बना और फिर 1868 में फ़ार्मेसी कानून लागू हुआ. इसमें कहा गया कि सिर्फ़ योग्यता प्राप्त दवा विक्रेता ही ज़हर बेच सकते हैं. तो इस तरह आधुनिक विधि सम्मत दवा उद्योग ऐसे ज़हरो के चलते ही अस्तित्व में आया. और कभी हत्यारों का दोस्त रहा आर्सेनिक अब नई भूमिका में है कैंसर-विरोधी पदार्थ के रूप में. |
| DATE: 2013-10-20 |
| LABEL: science |
| [209] TITLE: अब 'इलेक्ट्रॉनिक रक्त' से चलेगा कंप्यूटर |
| CONTENT: आईटी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी आईबीएम ने एक ऐसे नए कंप्यूटर का नमूना पेश किया है जो मनुष्य के मस्तिष्क की संरचना से प्रेरित है. इस कंप्यूटर की ख़ास बात यह है कि यह इलेक्ट्रॉनिक रक्त से संचालित होगा. आईबीएम का कहना है कि कंपनी ने प्रकृति से प्रेरणा लेते हुए इंसान के दिमाग़ जैसा ही कंप्यूटर बनाने की कोशिश की है जो तरल पदार्थ से ऊर्जा पाकर संचालित होता है. मनुष्य के दिमाग़ में बिल्कुल छोटी-सी जगह में असाधारण गणना की ताक़त होती है और इसमें केवल 20 वॉट की ऊर्जा का इस्तेमाल होता है. आईबीएम की कोशिश है कि उसके नए कंप्यूटर में भी ऐसी ही क्षमता हो. इस कंप्यूटर के नए रिडॉक्स फ्लो तंत्र यह एक रासायनिक प्रतिक्रिया है जिसमें एक बार ऑक्सीकरण हुआ तो इसकी उल्टी प्रतिक्रिया में इसमें कमी आती है के जरिए कंप्यूटर में इलेक्ट्रोलाइट रक्त का प्रवाह होता है और जिससे इस कंप्यूटर को बिजली मिलती है. यह इलेक्ट्रोलाइट रक्त दरअसल ऐसा द्रव है जिससे बिजली का प्रवाह होता है. तकनीकी क्षेत्र की इस दिग्गज कंपनी की ज्यूरिख प्रयोगशाला में इस हफ़्ते डॉक्टर पैट्रिक रुश और डॉक्टर ब्रूनो मिशेल ने इस कंप्यूटर के एक छोटे मॉडल को पेश किया. उनके मुताबिक़ एक पेटाफ्लॉप कंप्यूटर जो आज एक फुटबॉल के मैदान को भर सकता है वह वर्ष 2060 तक किसी डेस्कटॉप में फिट होने लायक बन जाएगा. मिशेल कहते हैं हम एक शुगरक्यूब के अंदर एक सुपर कंप्यूटर फिट करना चाहते हैं. ऐसा करने के लिए हमें इलेक्ट्रॉनिक्स में एक बदलाव की जरूरत है साथ ही हमें अपने दिमाग से प्रेरित होने की भी जरूरत है. मानव मस्तिष्क किसी कंप्यूटर के मुकाबले 10000 गुना ज़्यादा जटिल और सक्षम है. उनका कहना है यह संभव भी है क्योंकि दिमाग एक ही समय में गर्मी और ऊर्जा के प्रवाह के लिए अत्यंत सूक्ष्म नलिकाओं के जाल और रक्त वाहिकाओं का उपयोग करता है. आईबीएम का इंसान की दिमागी क्षमता वाला कंप्यूटर अब तक वॉटसन ही रहा है जिसने अमेरिका के मशहूर टीवी क्विज शो जियोपार्डी के दो चैंपियनों को हरा दिया था. इस जीत को ज्ञान आधारित कंप्यूटिंग के क्षेत्र में एक मील के पत्थर के रूप में देखा गया था जिसमें मशीन ने मनुष्य को पीछे छोड़ दिया था. हालांकि मिशेल कहते हैं कि यह प्रतियोगिता अनुचित थी. केन जेनिंग्स और ब्रैड रटर का दिमाग केवल 20 वॉट ऊर्जा पर ही चल रहा था जबकि वॉटसन के लिए 85000 वॉट की जरूरत थी. आईबीएम का मानना है कि अगली पीढ़ी के कंप्यूटर चिप के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत ऊर्जा दक्षता ही होगा. मूर की विधि के जरिए आधी सदी में मौजूदा 2डी सिलिकॉन चिप की ताकत दोगुनी हो गई है और वे एक ऐसी भौतिक सीमा के पास पहुंच रहे हैं जहां वे ज़्यादा गर्म हुए बिना सिकुड़ नहीं सकते. मिशेल का कहना है कंप्यूटर उद्योग 30 अरब डॉलर ऊर्जा का इस्तेमाल करता है जिसे बाहर निकाल दिया जाता है. हम 30 अरब डॉलर तक की गर्म हवा तैयार कर रहे हैं . एक कंप्यूटर का 99 फीसदी हिस्सा केवल शीतक और ऊर्जा देने में लगा होता है और केवल 1 फीसदी हिस्से से ही जानकारी वाली प्रक्रिया संचालित होती है. इसके बाद हम सोचते हैं कि हमने एक अच्छे कंप्यूटर का निर्माण किया है वहीं मनुष्य का मस्तिष्क कार्यात्मक प्रदर्शन के लिए इसकी 40 फीसदी मात्रा का इस्तेमाल करता है जबकि ऊर्जा और शीतक के लिए केवल 10 फीसदी मात्रा का इस्तेमाल किया जाता है. मिशेल का मानना है कि जैविक सिद्धांतों का इस्तेमाल कर इलेक्ट्रॉनिक तंत्र को डिजाइन कर तैयार हुआ नया बायोनिक कंप्यूटर प्रकृति के ही एक नियम एलोमेट्रिक स्केलिंग से प्रेरित है जिसमें एक जानवर की पाचन शक्ति उसके अपने शरीर के आकार के साथ बढ़ जाती है. मिसाल के तौर पर 10 लाख चूहों से भी ज्यादा एक हाथी का वजन होता है. लेकिन यह 30 गुना कम ऊर्जा की खपत है और यहा ऐसा काम करने में सक्षम है जो 10 लाख चूहे भी मिलकर पूरा नहीं कर सकते हैं. मिशेल का कहना है कि यही सिद्धांत कंप्यूटिंग के लिए भी सच है जिसमें तीन खास मूल डिजाइन हैं. पहला 3डी आर्किटेक्चर है जिसमें चिप ऊंचे हैं और मेमोरी स्टोर की इकाई प्रोसेसर से ही जुड़ी हुई है. कंप्यूटर मस्तिष्क की तरह काम करे इसके लिए आईबीएम को तीसरे विकासवादी क़दम को हासिल करना होगा मसलन तरल ऊर्जा और शीतक वाली प्रक्रिया एक साथ संचालित हो सके. यह कुछ ऐसा ही है कि रक्त एक ओर चीनी देता है और दूसरी ओर गर्मी लेता है. ठीक इसी तरह आईबीएम भी एक ऐसे तरल पदार्थ की खोज में जुटा है जो एक साथ कई काम निबटा सके. प्रयोगशाला के परीक्षण तंत्र में वैनेडियम का प्रदर्शन सबसे अच्छा है जो रिडॉक्स फ्लो यूनिट की किस्म की तरह ही है और यह एक साधारण बैटरी की तरह का होता है. सबसे पहले इस तरल पदार्थ इलेक्ट्रोलाइट को चार्ज किया जाता है फिर इसे कंप्यूटर में डाला जाता है जहां यह अपनी ऊर्जा चिप में प्रवाहित कर देता है. आईबीएम पहली ऐसी कंपनी है जो अपने चिप को इस इलेक्ट्रॉनिक रक्त के लिए दांव पर लगा रही है और इसे भविष्य के कंप्यूटर के खुराक के तौर पर देख रही है ताकि आने वाले दशकों में यह जेटास्केल कंप्यूटिंग के लक्ष्य को भी हासिल कर ले. मिशेल का कहना है कि जेटास्केल कंप्यूटर के लिए दुनिया में उत्पादित बिजली के मुकाबले ज्यादा बिजली की जरूरत पड़ेगी. |
| DATE: 2013-10-20 |
| LABEL: science |
| [210] TITLE: किशोरों में 'सेक्सटिंग' का बढ़ता चलन |
| CONTENT: ब्रिटेन में किशोरों में सेक्सटिंग यानी मोबाइल टेक्स्ट के ज़रिए यौन सामग्री भेजने की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ रही है और देश की सरकार इसे लेकर चिंतित है. किशोरों के बीच किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक 10 में से छह किशोरों ने कहा कि उनसे कभी न कभी सेक्स संबंधी तस्वीरें या वीडियो की मांग की गई. ये सर्वे एनएसपीससी और चाइल्डलाइन संस्था ने की है जिसके मुताबिक चालीस प्रतिशत किशोरों का कहना है कि उन्होंने कभी न कभी सेक्स संबंधी तस्वीर और वीडियो खुद बनाई थी जबकि लगभग एक तिहाई किशोरों ने कहा कि उन्होंने किसी न किसी को ऐसी सामग्री मोबाइल टेक्स्ट के जरिए भेजी थी. संस्था के मुखिया पीटर वैनलैस ने बीबीसी से कहा सेक्सटिंगशब्दों के जरिये सेक्स संबंधी सामग्री भेजना का चलन बहुत आम देखने को मिला है. इन परिणामों से पता चलता है कि किशोरों में इसकी प्रवृत्ति बढ़ रही है. इस सर्वे के दौरान ब्रिटेन के लगभग 450 किशोरों से बात की गई. सर्वे में शामिल 58 प्रतिशत किशोरों का कहना था कि कि उन्होंने ऐसी तस्वीर या वीडियो टेक्स्ट के ज़रिए अपनी गर्लफ्रेंड या ब्वॉयफ्रेंड को भेजी. लगभग एक तिहाई लोगों ने कहा कि उन्होंने अपनी तस्वीरें और वीडियो उन लोगों के साथ साझा की जिन्हें वे इंटरनेट के ज़रिए जानते थे लेकिन कभी मिले नहीं थे जबकि 15 फ़ीसदी का कहना था कि उन्होंने ये सामग्री अनजान लोगों के साथ साझा की. 20 प्रतिशत ऐसे किशोर जिन्होंने ऐसी तस्वीरें किसी को भेजी थी उनका कहना था कि उनकी तस्वीर अन्य लोगों के साथ साझा की गई जबकि 28 प्रतिशत का कहना था कि उन्हें नहीं पता कि उनकी तस्वीर को आगे किसी और के साथ साझा किया गया या नहीं. सर्वे में शामिल 53 प्रतिशत किशोरों को कभी न कभी सेक्स संबंधी तस्वीर और वीडियो प्राप्त हुए जबकि एक तिहाई को ऐसी सामग्री उन लोगों ने भेजी जिन्हें वे जानते तक नहीं थे. ब्रिटेन के कानून में 16 वर्ष की उम्र में सेक्स करना वैध है लेकिन 18 साल से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति की तस्वीर लेना या साझा करना गम्भीर दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आता है. देश के मुख्य पुलिस अधिकारियों के संघ ने बीबीसी को बताया कि सेक्सटिंग करने वाले बच्चों पर मुकद्दमा चलाना संभव नहीं दिखता. राष्ट्रीय बाल शोषण अपराध एजेंसी और ऑनलाइन सुरक्षा केंद्र के आंकड़ों के मुताबिक 2012 में 12 से 15 साल की उम्र के 62 प्रतिशत बच्चों के पास माबाइल फोन थे और 2013 के अंत तक ये संख्या और बढ़ने की संभावना है. विशेषज्ञों का मानना है कि समार्टफोन और तकनीक के विकास ने सेक्स संबंधी ऐसी सामग्री को तेज़ी से बढ़ावा देने में मदद की है. यहाँ तक की अब सस्ते फोन में भी कैमरे होते हैं जिनसे बच्चे आसानी से अपनी तस्वीर ले सकते हैं और उन्हें जहाँ चाहें वहाँ भेज सकते हैं. अधिकतर फोन अब इंटरनेट से जुड़े हैं और सेक्सट को तुरन्त आसानी से सेशल नेटवर्किंग साइट्स पर पोस्ट किया जा सकता है जहाँ लाखों लोग आसानी से उन्हें देख सकते हैं. ऑनलाइन सुरक्षा केंद्र बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए काम करने वाली एजेंसी है और इसका कहना है कि वो तस्वीरों को गलत हाथों में पड़ने को लेकर चिंतित है. इस एजेंसी के शिक्षा विभाग के मुखिया जोनाथन बैगले कहते हैं हमें पता चल रहा है कि उत्पीड़क गलत फायदा उठा रहे हैं और बच्चों को यह कह कर ब्लैकमेल कर रहे हैं कि यदि उन्होंने और तस्वीरें नहीं भेजीं तो वो पहले की तस्वीरों को उनके परिवार या देस्तों को भेज देंगे. ब्रिटेन की सरकार युवाओं को सेक्स संबंधी सामग्री उत्पन्न करने और इसके संभावित खतरों के बारे में और शिक्षित करने की योजना पर काम कर रही है. अधिकारियों का कहना है कि 2014 से ब्रिटेन में नए आईटी पाठ्यक्रम के तहत पाँच साल से ही बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रहना सिखाया जाएगा. फिलहाल स्कूलों में सेक्स और यौन संबंधों को लेकर ठोस दिशा-निर्देश जारी हैं. लेकिन सुधारकों के अनुसार सेक्सटिंग के खतरों से निबटने के लिए दिशा-निर्देशों को व्यक्तिगत सामाजिक और स्वास्थ्य शिक्षा पाठ में शामिल किया जाना चाहिए. इंग्लैंड में बच्चों की उपायुक्त सुई बर्कोविट्ज का कहना है सेक्सटिंग महज़ आईटी से जुड़ा मुद्दा नहीं है यह संबंधों का मुद्दा है. हर स्कूल को संबंधों और सेक्स शिक्षा पर व्यापक कार्क्रम चलाने चाहिए जिसमें सेक्सटिंग मोबाइल तकनीक के प्रयोग के साथ-साथ संबंधों और सेक्स शिक्षा के दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए. |
| DATE: 2013-10-20 |
| LABEL: science |
| [211] TITLE: वैज्ञानिकों ने सुलझाई येती मानवों की गुत्थी |
| CONTENT: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ब्रायन स्काइज़ का कहना है कि येती के बाल ध्रुवीय भालुओं जैसे हैं. एक ब्रिटिश वैज्ञानिक शोध में पता चला है कि हिमालय के मिथकीय हिम मानव येति भूरे भालुओं की ही एक उप-प्रजाति के हो सकते हैं. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ब्रायन स्काइज़ द्वारा किए गए बालों के डीएनए परीक्षणों से पता चला है कि ये ध्रुवीय भालुओं से काफी कुछ मिलते-जुलते हैं. उन्होंने इन नमूनों के परीक्षण के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया है. ब्रायन स्काइज़ कहते हैं कि इस मिथक का सबसे संभावित स्पष्टीकरण है कि येती ध्रुवीय भालू और भूरे भालू का संकर हो सकते हैं. प्रोफेसर स्काइज़ ने बीबीसी को बताया कि येती के मिथक के पीछे हो सकता है कि वास्तव में कोई जीव हो. उन्होंने कहा मैं समझता हूं कि वह भालू जिसे किसी ने भी जीवित नहीं देखा है हो सकता है कि अभी भी वहां मौजूद हो. स्काइज़ ने अज्ञात पशुओं के जिन दो नमूनों का डीएनए परीक्षण कियाउनमें से एक लद्दाख से और दूसरा भूटान से हासिल किया गया था. इससे हासिल जानकारियों की अब तक प्राप्त अन्य जीवों के डीएनए अनुक्रमों से तुलना की गई. ब्रायन स्काइज़ ने अनुसंधान में पाया कि नॉर्वे के एक प्राचीन ध्रुवीय भालू के जबड़े की हड्डी से यह सौ प्रतिशत मेल खाता है. यह ध्रुवीय भालू पृथ्वी पर 40000 से 120000 वर्ष के बीच पाया जाता था. यह वही समयांतराल है जब ध्रुवीय भालू और भूरे भालू के बीच विभेदीकरण की प्रक्रिया जारी थी. लद्दाख का नमूना 40 वर्ष पहले एक शिकारी द्वारा मारे एक गए जीव के संरक्षित अवशेषों से हासिल किया गया था. जबकि दूसरा नमूना जो एक बाल है 10 वर्ष पूर्व एक फिल्मकार द्वारा बांस के एक जंगल से हासिल किया गया था. स्काइज़ ने कहा कि उनका मतलब यह कतई नहीं है कि प्राचीन ध्रुवीय भालू हिमालय में मौजूद हैं लेकिन इसकी संभावना है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भूरे भालुओं की उप-प्रजातियां हो सकती हैं. 2008 में अमरीकी वैज्ञानिकों ने बालों के नमूनों का परीक्षण किया था. इनके बारे में कुछ का दावा था कि ये येती के थे. वैज्ञानिकों ने नतीजा निकाला था कि वास्तव में पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय से पाए हुए ये बाल हिमालयी बकरी की एक प्रजाति के थे जिसे हिमालयी गोराल के नाम से जाना जाता है. |
| DATE: 2013-10-19 |
| LABEL: science |
| [212] TITLE: टहलने से कम होता है स्तन कैंसर का ख़तरा |
| CONTENT: एक नए अध्ययन के अनुसार रजोनिवृत्ति के पश्चात प्रतिदिन एक घंटा टहलने से महिलाओं में स्तन कैंसर की आशंका में काफी कमी आती है. इस शोध के दौरान करीब 73000 महिलाओं का 17 साल तक निरीक्षण किया गया है. इस अध्ययन के अनुसार हर हफ्ते सात घंटे टहलने वाली महिलाओं को स्तन कैंसर होने की कम संभावना होती है. दि अमेरिकन कैंसर सोसाइटी की टीम ने कहा है कि टहलने के कैंसर की संभावना के बीच के इस संबंध का पहली बार पता चला है. ब्रितानी विशेषज्ञों के अनुसार अब यह ज़्यादा साफ हो गया है कि जीवन शैली के कारण कैंसर का ख़तरा बढ़ सकता है. रैंबलर्स नामक एक समाज सेवी संगठन द्वारा कराए गए अध्ययन में पता चला था कि क़रीब एक चौथाई वयस्क एक हफ्ते में एक घंटे से ज़्यादा पैदल नहीं चलते जबकि टहलने से कैंसर की बीमारी में कमी आती है. इस शोध के अनुसार कैंसर एपीडिमियॉलोजी बॉयोमार्कर्स एंड प्रिवेंशन में प्रकाशित कुल 97785 महिलाओं में से 73615 महिलाओं का अध्ययन किया गया. इन महिलाओं की उम्र 50 से 74 साल के बीच थी. इन सभी महिलाओं को दि अमेरिकन कैंसर सोसाइटी ने 1992 और 1993 के दौरान नियुक्त किया था ताकि इस समूह में कैंसर की घटनाओं का अध्ययन किया जा सके. इन महिलाओं से उनकी जीवन शैली से जुड़े सवाल पूछे गए थे. इन महिलाओं से पूछा गया कि वे अपने दैनिक जीवन में कितनी देर टहलती या तैरती हैं कितनी देर व्यायाम करती हैं कितनी देर टीवी देखती हैं और कितनी देर पढ़ती हैं. इन महिलाओं ने 1997 से 2009 के बीच हर दो साल बाद समान सवालों के जवाब दिए. इन महिलाओं में से 47 प्रतिशत ने कहा कि वे टहलने के अलावा कोई और व्यायाम नहीं करतीं. जो महिलाएं हफ्ते में सात घंटे टहलती थीं उनमें प्रति हफ्ते तीन घंटे या उससे कम देर तक टहलने वाली महिलाओं की तुलना में कैंसर होने की संभावना 14 प्रतिशत कम थी. एटलांटा जॉर्जिया स्थित दि अमेरिकन कैंसर सोसाइटी की डॉक्टर एल्फा पटेल इस शोध से जुड़ी हुई थीं. पटेल कहती हैं चूंकि 60 प्रतिशत से ज़्यादा औरतें रोज़ टहलती हैं इसलिए जो महिलाएं रजोनिवृत्ति प्राप्त कर चुकी हैं उन्हें स्वास्थ्य की दृष्टि से टहलने की प्रेरणा देना एक समझदारी भरा कदम होगा. पटेल का मानना है हमें खुशी है कि किसी और व्यायाम के बिना केवल टहलने से इन महिलाओं में कैंसर होने की आशंका में कमी आ गई. पटेल ने स्पष्ट किया कि जितना अधिक शारीरिक व्यायाम किया जाएगा कैंसर की संभावना उतनी ही कम होगी. ब्रेस्ट कैंसर कैंपन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डेलिथ मॉर्गन ने कहा यह अध्ययन यह बात इस बात की पुष्टि करता है कि हमारी जीवन शैली का कैंसर होने के ख़तरे से संबंध हैं. अगर हम अपने दैनिक जीवन में मामूली परिवर्तन लाते हैं तो इससे काफी फर्क पड़ सकता है. मॉर्गन कहती हैं हम जानते हैं कि स्तन कैंसर रोकने का सबसे अच्छा तरीका है कि इसे होने ही न दिया जाए. हमारे सामने असली चुनौती यह है कि हम इस अध्ययन को अमल में कैसे लाते हैं. हमें जीवन शैली से जुड़ी उन दूसरी चीजों के बारे में भी पता करना है जिनसे स्तन कैंसर का ख़तरा कम होता है. |
| DATE: 2013-10-19 |
| LABEL: science |
| [213] TITLE: साइंस फ़िक्शन में कितना विज्ञान, कितनी फंतासी ? |
| CONTENT: हाल ही में रिलीज़ हुई हॉलीवुड फ़िल्म ग्रेविटी ने इस बहस को जन्म दे दिया है कि कोई साइंस फिक्शन यानी विज्ञान कथा कितनी सही हो सकती है. पीटर रे एलीसन पूछ रहे हैं कि क्या फ़िल्म निर्माताओं को मूल वैज्ञानिक सिद्धांतों को नहीं छोड़ना चाहिए या दर्शकों को उनसे सिर्फ़ जादू की उम्मीद रखनी चाहिए. विज्ञान और विज्ञान कथा के बीच हमेशा धुंधला रिश्ता रहा है. ग्रेविटी की कहानी दो अंतरिक्ष यात्रियों के बारे में है जो अपने अंतरिक्ष यान के नष्ट होने के बाद अंतरिक्ष में भटक गए हैं. अमरीका में इस फ़िल्म की रिलीज़ के बाद से कई आलोचकों ने फ़िल्म की पुख़्ता वैज्ञानिक तथ्यों के लिए प्रशंसा की है. मगर जाने-माने तारा भौतिकविद् और न्यूयॉर्क के अमेरिकन म्यूज़ियम ऑफ़ नेचुरल हिस्ट्री में हेडन प्लेनेटेरियम के निदेशक डॉक्टर नील दिग्रास टायसन को ग्रेविटी में दिखाए गए अंतरिक्ष की सत्यता को लेकर कई शिकायतें हैं. ट्विटर पर कई पोस्टों के ज़रिए टायसन ने इन ग़लतियों का ज़िक्र किया है. हालांकि बाद में उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि उन्होंने फ़िल्म का पूरा आनंद लिया. उनका कहना है कि समुद्र की सतह से साढ़े तीन सौ मील ऊपर कक्षा में स्थापित हबल स्पेस टेलिस्कोप ढाई सौ मील पर चक्कर काट रहे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन और एक चीनी स्पेस स्टेशन कभी एक साथ नहीं दिखाई दे सकते. इसके अलावा ज़्यादातर उपग्रह पश्चिम से पूर्व की तरफ़ पृथ्वी का चक्कर लगाते हैं जबकि फ़िल्म में उपग्रह का कचरा पूर्व से पश्चिम में जाता दिखाया गया है. टायसन ने यह भी कहा कि अगर सैंड्रा बुलक ज़ीरो ग्रेविटी में हैं तो उनके बाल मुक्त रूप से क्यों नहीं फैले हुए दिखाए गए. असल में यह भौतिकी की ग़लती नहीं है बल्कि यह सिनेमाई तकनीकी की सीमाएं उजागर करता है कि वह ज़ीरो ग्रेविटी में अभिनेताओं को प्रदर्शित नहीं कर पाई. और वह भी फ़िल्म के दौरान उन्हें अंतरिक्ष में भेजे बगैर. विज्ञान कथा में हमेशा से वैज्ञानिक सत्यता का आग्रह रहा है ख़ासकर पूरी तरह से विज्ञान कथा साहित्यिक श्रेणी में. मगर विज्ञान कथाएँ ख़ासकर फ़िल्मों में अक्सर अलंकारिक दृष्टिकोण अपना लेती है जहां ज़्यादातर यथार्थवाद फ़िल्मी दृश्यों की ख़ूबसूरती की भेंट चढ़ जाता है. फ़िल्म आर्मागेडॉन को उसकी ढेरों वैज्ञानिक ग़लतियों के लिए जाना जाता है. इसमें अंतरिक्ष यानों से अलग होते एक-दूसरे से टकराने को तैयार रॉकेट बूस्टर और ईंधन की टंकियां और धरती की तरह गुरुत्वाकर्षण के तहत खिंचते एस्टेरॉयड दिखाए गए हैं. कहा जाता है कि नासा ने आर्मागेडॉन को अपने ट्रेनिंग प्रोग्राम के तहत टेस्ट के बतौर इस्तेमाल किया है और उम्मीदवारों से फ़िल्म में मौजूद तमाम वैज्ञानिक असंभव बातों को पहचानने तक को कहा है. डैनी बॉयल की फ़िल्म सनशाइन में भौतिक विज्ञानी प्रो. ब्रायन कॉक्स के बतौर वैज्ञानिक सलाहकार जुड़े होने के बावजूद कलात्मक गड़बड़ियां दिखीं. सूर्य के आसपास संचार का एक डेड ज़ोन है जिसे इस दुनिया के नियमों से समझाना मुश्किल है. उलटे दावों के बावजूद फ़िल्म रेड प्लेनेट ऐसे वैज्ञानिक विरोधाभासों से भरी है. इनमें आधुनिक उपकरणों से लेकर 30 साल पुरानी रूसी तकनीकी में तालमेल बैठाने से लेकर 30 साल पहले मंगल पर भेजी गई काई खाने वाले नेमेटोड्स तक शामिल हैं. नेमेटोड्स असल में कृमि होने चाहिए थे लेकिन वे भौंरों की शक्ल में दिखाए गए. इसके अलावा इस बारे में भी फ़िल्म कुछ नहीं बताती कि वे मंगल से बाहर से आई काई को कैसे खाने लगे और पहले क्या खाते थे. पूरी फ़िल्म में विज्ञान इतना सृजनात्मक दिखाया गया है कि नासा ने इस फ़िल्म का वैज्ञानिक सलाहकार बनने से ही इनकार कर दिया. मगर वैज्ञानिक छूट लेने के मामले में ढेरों अंतरिक्ष आधारित नाटक शायद सबसे आगे हैं. टेलीस्पाज़ियो वेगा ड्यूशलैंड नाम की कंपनी में स्पेसक्राफ़्ट इंजीनियर एड ट्रॉलोप कहते हैं ख़राब विज्ञान का सबसे मशहूर उदाहरण जिसे दुनियाभर में विज्ञानकथाओं में प्रयोग किया जाता रहा है वह है ध्वनि. चूंकि अंतरिक्ष में निर्वात यानी वेक्यूम है तो वहां कोई आवाज़ नहीं होती इसका मतलब है कि इतने बड़े धमाके और इंजनों की आवाज़ वहां नहीं होनी चाहिए. सिनेमा में जब किसी स्पेसक्राफ़्ट में धमाका होता है तो इसका कारण होता है कि यह दर्शक को उसके सामने दिख रहा है. मगर वैज्ञानिकों को और कई बातें कबूलने में गुरेज़ है. ट्रॉलोप कहते हैं अंतरिक्ष में अपने इंजनों को चालू रखने के कई कारण होते हैं लेकिन उनकी गति बनाए रखना इसका कारण नहीं है. अगर आप अपने इंजन बंद कर देते हैं तो भी आप रुकते नहीं हैं. कुछ लोग दूसरों से बेहतर कर दिखाते हैं. वह बताते हैं मैं इस ग़लती के आधार पर किसी फ़िल्म किताब शृंखला का नाम नहीं लूंगा क्योंकि यह बेहद सामान्य बात है लेकिन मैं इस बारे में पुराने टीवी शो बेबीलोन 5 की प्रशंसा करूंगा कि उन्होंने अंतरिक्ष यात्रा में जड़ता को किस ख़ूबसूरती के साथ पेश किया है. 2001 अ स्पेस ओडिसी में स्पेसक्राफ़्ट के शांत दृश्य उसेक बाद के अंतरिक्ष यात्रा के कई उदाहरणों के मुक़ाबले असलियत के काफ़ी क़रीब हैं. विज्ञान कथा लेखक चार्ल्स स्ट्रॉस कहते हैं वैज्ञानिक सत्यता का क्लासिक उदाहरण लैरी निवेन के उपन्यास रिंगवर्ल्ड का पहला संस्करण है जिसे 1971 में ह्यूगो और नेबुला अवॉर्ड मिले थे. लेखक ने अनजाने ही ऐसे कई दृश्यों का ज़िक्र किया था जिनमें बताया गया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर ग़लत दिशा में चक्कर काटती है. निवेन ने अपने दूसरे संस्करण में इस ग़लती को सुधार लिया था. डंकन जोंस की फ़िल्म मून की प्रशंसा इस बात के लिए की गई थी कि उसमें चांद पर हीलियम-3 गैस की खुदाई को काफ़ी सच्चाई के साथ दर्शाया गया था. हीलियम-3 पृथ्वी पर पाई जाने वाली दुर्लभ गैस है लेकिन चांद पर वह आराम से मिल जाती है और किसी इंसान की देखरेख में स्वचालित तरीक़े से उसे निकालना संभव है. मगर इस खनन के अर्थशास्त्र का फ़िल्म में कोई ज़िक्र नहीं था. कॉन्टेक्ट में एलिएन सिग्नल असल में इसका उदाहरण है जो सेती सर्च फ़ॉर एक्स्ट्रा टैरेस्ट्रियल इंटेलीजेंस अंतरिक्ष में खोज रही है. इस पर किसी को कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए क्योंकि कॉन्टेक्ट को खगोलशास्त्री कार्ल सैगान ने ख़ुद लिखा था. संदेश भेजने में गणित का इस्तेमाल का मतलब समझ आता है और यही नहीं सिग्नल भेजने और हासिल करने में लगने वाली देरी को भी सही ढंग से दर्शाया गया है. विज्ञान कथा से सिर्फ यही उम्मीद नहीं की जाती कि वह विज्ञान को सही ढंग से पेश करेगा बल्कि उससे भविष्य में होने वाले विकास की व्याख्या करने की भी उम्मीद की जाती है. |
| DATE: 2013-10-18 |
| LABEL: science |
| [214] TITLE: कैंसर पीड़ित महिला दे रही है पीड़ितों को ब्यूटी टिप्स |
| CONTENT: स्तन कैंसर से पीड़ित एक 23 साल की महिला अपने ब्लॉग पर सुंदर बनने रहने के नुस्ख़े दे रही है. इस महिला के 150000 फ़ॉलोवर हैं. इंग्लैंड की एक काउटी डेवॉन में रहने वाली लॉरा केनॉन नाम की ये महिला अपने ब्लॉग लॉरा लुइस एंड हर नौटी डिज़ीज़ पर अपने इलाज और लोगों को आर्कषक कैसे दिखे उसे लेकर सलाह दे रही है. लॉरा कीमोथेरेपी करवा चुकी हैं और दो बार मासटेकटॉमी से भी गुज़र चुकी हैं. उनका कहना है कि वे उन युवा महिलाओं की मदद करना चाहती हैं जो बीमारी से जूझ रही हैं ताकि गंभीर बीमारी होने के बावजूद उसे रोचक कैसा बनाए जाए. पिछले साल 22 नवंबर को जैसे ही लॉरा को पता चला कि वे स्तन कैंसर से पीड़ित हैं इस भावी लेखक ने अपना ब्लॉग लिखना शुरु कर दिया. अपने इस ब्लॉग में उन्होंने अपनी फोटो भी लगाई हैं जिसमें वे बताने की कोशिश कर रही है कैसे कीमोथेरेपी के बाद बाल झड़ने के बावजूद वो कैसे स्टाइल में अपने बाल कटवा रही हैं. उनका कहना है मैंने अपने बालों को अलग स्टाइल दिया है मैं उस दिन को दुखी हो कर याद नहीं करना चाह रही थी. मैं ख़ुद को देखकर मुस्कराना चाहती थी. अब लॉरा के बाल और भौंहे उगने लगी हैं और वो अब मेकअप के बारे में ब्लॉग कर रही हैं. वे कहती हैं मुझे अच्छा लग रहा है कि मैं आईलाइनर और मसकारा लगा सकती हूं. जब मेरे बाल उड़ गए थे तो मैं ये सब करना काफ़ी मिस करती थी. इसके अलावा उन्होंने अपनी अन्य पोस्ट पर इस बीमारी के दुष्प्रभावों के बारे में लिखा है. उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा है जब मुझे पता चला कि मुझे स्तन कैंसर हैं मैंने गूगल पर जाकर इस बारे में और जानकारी हासिल करने की कोशिश की लेकिन मुझे युवा कैंसर मरीज़ो के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाई इसलिए मैंने इस बारे में लिखने के बारे में सोचा. वे लिखती हैं ऐसा समय भी आता था कि मैं काफ़ी दुखी होती लेकिन मैं अपना नज़रिया सकारात्मक रखती थी. जीव विज्ञान में स्नातक और ऑनलाइन पर शॉपिंग पसंद करने वाली लॉरा लिखती है कि ब्लॉग पर लिखना उनके लिए काफ़ी मददगार साबित हुआ. लॉरा के 150000 फ़ॉलोवर हैं और उन्हें पुरी दुनिया से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है. अब वे अपने ब्लॉग में अगले पांच हफ्तों में होने वाली रेडियोथेरेपी के बारे में लिखेगी. |
| DATE: 2013-10-17 |
| LABEL: science |
| [215] TITLE: दो घंटे में बीमारी की पुष्टि करेगा ये ब्लड टेस्ट |
| CONTENT: शोधकर्ताओं का कहना है कि अस्पताल में सेप्सिस या रक्त विषाक्तता की तेज़ी से जांच करने वाले परीक्षण से हज़ारों जाने बच सकती हैं. लंदन के किंग्स कॉलेज में शुरुआती अध्ययन इस ओर इशारा करते हैं कि एक सरल ब्लड टेस्ट या ख़ून की जांच से दो घंटे में सेप्सिस का पता चल सकता है. मौजूदा तरीकों से सेप्सिस की पुष्टि होने में दो दिन तक लग जाते हैं. इसकी वजह से जान बचाने के लिए ज़रूरी एंटीबायोटिक दवाईयों से इलाज शुरु करने में देर हो जाती है. शरीर के इम्मयून सिस्टम या प्रतिरक्षा तंत्र के संक्रमण के प्रति अनावश्यक प्रतिक्रिया से सेप्सिस होता है. इससे ब्रिटेन में हर साल 37000 मौतें होती हैं. प्लोस वन नाम की पत्रिका में छपे अध्ययन में ख़ून के नमूनों में सेप्सिस का तेज़ी से पता करने के लिए शोधकर्ताओं ने एक बायोमार्कर की पहचान की है. ये बायोमार्कर सेप्सिस से जुड़े न्यक्लियोटाइड्स का पता लगाता है. लंदन के एक अस्पताल में एक छोटे शोध और स्वीडन में एक बड़े शोध में ये बात सामने आई है कि रक्त विषाक्तता का पता दो घंटे के अंदर ही चल सकता है. इस तरीके से सेप्सिस की पुष्टि के नतीजे 86 प्रतिशत तक सही पाए गए. अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफ़ेसर ग्राहम लॉर्ड ने बीबीसी न्यूज़ को बताया अगर हमारे शुरुआती परीक्षणों के नतीजे जारी रहते हैं तो इसका हज़ारों ज़िंदगियां बचाने और एंटीबायोटिक दवाइयों के अनावश्यक इस्तेमाल को घटाने में अहम असर पड़ेगा. प्रोफ़ेसर लॉर्ड ने आगे कहा अगर हम भविष्य में होने वाले परीक्षणों में जांच के इस तरीके के महत्व को साबित कर पाएं तो हम इसे नेशनल हेल्थ सर्विस एनएचएस में जल्दी इस्तेमाल कर पाएंगे. प्रोफ़ेसर लॉर्ड ने ये भी कहा कि अभी और शोध की ज़रूरत है लेकिन अगर ये सफल होता है तो सेप्सिस की जांच का ये तरीका एनएचएस के पास अगले दो साल में आ जाएगा. ब्रिटेन के सेप्सिस ट्रस्ट के चेयरमैन डॉक्टर रॉन डैनियल्स ने कहा है कि इस शोध से सेप्सिस की जल्दी पहचान का रास्ता तैयार हो गया है. डॉक्टर डैनियल्स ने कहा अगर हमारे पास सेप्सिस की जांच का कोई सरल और भरोसेमंद तरीका होता तो इससे इलाज में बहुत मदद मिलती. लेकिन ये टेस्ट करने से पहले हमें मरीज़ में सेप्सिस होने का संदेह होना ज़रूरी है. इस साल सितंबर में देश की स्वास्थ्य सेवा ओम्बुड्ज़मन ने सेप्सिस के इलाज में बहुत कमियां बताई थीं और कहा था कि मरीज़ों की जान बचाने के लिए और ज़्यादा किए जाने की ज़रूरत है. |
| DATE: 2013-10-17 |
| LABEL: science |
| [216] TITLE: सेहत के लिए खड़े रहना अच्छा |
| CONTENT: अनुमान लगाइए कि आप दिन भर में कितने घंटे बैठे-बैठे गुजारते हैं हाल में किए गए एक सर्वे में पता चला है कि हम कंप्यूटर पर काम करते हुए या टीवी देखते हुए करीब 12 घंटे बैठे हुए बिता देते हैं. यदि इसमें सोने के घंटों को भी मिला लें तो हम 19 घंटे निष्क्रिय बिता देते हैं. कुछ अध्ययनों के अनुसार ज्यादा घंटे बैठने वाले लोग ज्यादा सक्रिय लोगों से दो साल कम जीते हैं. बल्कि यदि आपको रोज कसरत की भी आदत हो तो भी इससे खास फर्क नहीं पड़ता. आखिर बैठना इतना नुकसानदेह क्यों है चलिए इसे समझने की कोशिश करते हैं. हमारा शरीर शर्करा से एक खास तरीके से निपटता है. ज्यादा बैठना शरीर के उसी खास तरीके पर अपना असर डालता है. जब हम कुछ खाते हैं हमारा शरीर उसे ग्लूकोज में बदलता है और फिर यह रक्त के जरिए दूसरी कोशिकाओं में प्रवाहित हो जाता है. ग्लूकोज शरीर को जरूरी ऊर्जा देने के लिए अनिवार्य है. मगर यदि शरीर में इसका ऊंचा स्तर लगातार बना रहे तो हमारे लिए डायबिटीज और दिल के रोग जैसी बीमारियों का खतरा पैदा हो जाता है. शरीर में मौजूद पेन्क्रियाज ग्लूकोज के आदर्श स्तर को बनाए रखने के लिए आवश्यक हारमोन इंसूलिन पैदा करता है. हम शारीरिक रूप से जितना सक्रिय होते हैं पेन्क्रियाज यह प्रक्रिया उतनी कुशलापूर्वक संपन्न करता है. हमने ये जानने की कोशिश की है कि इससे क्या फर्क पड़ता है जब दफ्तर में दिन भर बैठ कर काम करने वाले लोगों का एक समूह दिन के कुछ घंटे खड़े होकर बिताता है. हालांकि काम करते वक्त खड़ा रहना कुछ अजीब सा दृश्य उत्पन्न करता है. विंस्टन चर्चिल अर्नेस्ट हेमिंग्वे और बेंजामिन फ्रेंकलिन जैसे विश्वप्रसिद्ध लेखक खड़े-खड़े लिखा करते थे. यूनिवर्सिटी ऑफ चेस्टर के डॉक्टर जॉन बक्ले और उनकी टीम ने ऐसे 10 लोगों पर प्रयोग किया जो एस्टेट एजेंट थे. उन्होंने इन लोगों को एक हफ्ते तक रोज कम से कम तीन घंटे खड़े होकर काम करने को कहा. इस प्रयोग में शामिल प्रतिभागियों की मिली जुली प्रतिक्रिया आई. एक ने कहा पता नहीं काम पूरा कैसे होगा. मगर मैं कोशिश जारी रखूंगा. दूसरे ने कहा मुझे लगता है इससे मेरे पैरों को नुकसान होगा. मुझे अच्छे जूते पहनने होंगे. किसी ने कहाओह मेरी पीठ तो एक प्रतिभागी घबराता हुआ बोला मुझे नहीं लगता कि मैं ज्यादा देर तक ये कर पाऊंगा. खड़े होना हमारे लिए ज्यादा सेहतमंद होता है इसे साल 1950 के एक अध्ययन से भी समझा जा सकता है. ये अध्ययन एक बस ड्राइवर जो लगातार बैठा रहता है और बस कंडक्टर जो खड़ा रहता है पर किया गया था. इस अध्ययन के नतीजे लांसेट पत्रिका में छपे. इसमें बताया गया था कि बस ड्राइवर को दिल की बीमारियों का बस कंडक्टर से लगभग दोगुना खतरा था. तभी से ज्यादा देर तक बैठे रहने की स्थिति को रक्त ग्लूकोज नियंत्रण की समस्या से जोड़ कर देखा जाने लगा. ये जानने के बाद कि खड़े होना अच्छा है हमने ये जानने की कोशिश की कि क्या लोग इसे अमल में लाने के प्रति भी गंभीर हैं. फिर हमने ब्रिटेन में पहली बार वालंटियरों पर प्रयोग किया. ये वालंटियर अपनी बात पर कायम रहे. एक महिला जिन्हें गठिया था उन्होंने कोशिश की और पाया कि इससे उन्हें फायदा हुआ. चेस्टर शोधकर्ताओं ने पाया कि एक व्यक्ति के रक्त में शर्करा की बढ़ी मात्रा घट कर सामान्य हो गई जब वह अन्य दिनों की दिनचर्या के उलट खाना खाने के बाद खड़े रहे. इसके अलावा यह भी पाया गया कि जब वे खड़े होते थे तो कैलोरी ज्यादा खर्च हुई. इसे हार्टरेट मॉनीटर से मापा गया. जॉन बकले समझाते हैं अगर हम दिल की धड़कनों को देखें तो पाएंगे कि खड़े रहने के दौरान यह काफी ज्यादा हैं- हमारा दिल प्रति मिनट औसतन 10 बार ज्यादा धड़का करीब 0-7 कैलोरी प्रति मिनट का फर्क आया. यदि आप पांच दिनों तक दिन में तीन घंटे भी खड़े होते हैं तो अंदाजन 750 कैलोरी खर्च होती है. एक साल में देखा जाए तो आप 30000 अतिरिक्त कैलोरी करीब 81बिलियन वसा से छुटकारा पाते हैं. डॉक्टर बकले कहते हैं इसे यदि आप किसी शारीरिक क्रिया के रूप में समझना चाहें तो साल भर काम पर तीन से चार घंटे खड़े रहना एक साल में 10 मैराथन दौड़ने के बराबर होगा. वैसे हम काम करते हुए ज्यादा देर तक खड़े तो नहीं रह सकते मगर शोधकर्ताओं की सलाह है कि फिर भी थोड़ा बदलाव जैसे फोन पर बातें करते वक्त ईमेल करते हुए सहयोगी से चर्चा करते हुए भी हम खड़े रहें तो इससे हमारी सेहत पर काफी फर्क पड़ेगा. और हां मैंने ये लेख खड़े होकर लिखा है. |
| DATE: 2013-10-17 |
| LABEL: science |
| [217] TITLE: क्या सबके लिए ज़रूरी है नींद? |
| CONTENT: यह तो हम जानते हैं कि नींद हमारे लिए कितनी ज़रूरी है. सामान्यतः एक इंसान अपनी ज़िंदगी का एक तिहाई सोने में बिता देता है. हालांकि हम अभी तक यह नहीं जानते कि हमें नींद की ज़रूरत क्यों होती है- हालांकि हमें इतना तो पता है कि यह ज़रूरी है और इसके बिना फ़ैसले लेने याद रखने बोलने जैसी मानसिक शक्तियां क्षीण होने लगती हैं. अगर हम औसतन पांच से 11 घंटे की नींद नहीं ले पाते तो हमें यह काम करने में दिक्कत होने लगती है. लेकिन सवाल यह है कि क्या सभी जीवों को नींद की ज़रूरत पड़ती है नींद की परिभाषा भी काफ़ी अस्पष्ट है- इसे दिमाग की निश्चलता की स्थिति कहा जाता है जिसे तुरंत पलटा जा सकता है इसके साथ ही इसमें उकसाने पर बेहद धीमी प्रतिक्रिया होती है. नींद की व्याख्या मुश्किल होने और पक्षियों स्तनपाइयों के अलावा शोध के अभाव में वैज्ञानिक सरीसृपों मछलियों और अकृष्ठवंशियों के लिए नींद शब्द का इस्तेमाल करने से बचते हैं और इसके बजाय आराम का इस्तेमाल करते हैं. हालांकि मक्खियों ज़ेब्राफ़िश और सूत्रकृमि पर किए गए शोधों में नींद और अनिद्रा के दौरान जीन में फ़र्क दिखा है ठीक वैसा ही जैसा कि स्तनपाइयों में पाया जाता है जब कि वह सो रहे होते हैं. इससे यह कहा जा सकता है कि वह भी सोते हैं या नींद लेते हैं. लेकिन नींद का मामला इससे ज़्यादा जटिल है. व्हेल और डॉल्फ़िन जैसे कुछ जानवर यूनिहेमिस्फ़ेरिक नींद लेते हैं. इसका मतलब यह हुआ कि उनके दिमाग़ का आधा हिस्सा सो सकता है जबकि दूसरा आधा हिस्सा चौकन्ना रहता है. इससे वह सतह पर आकर सांस लेने में सक्षम हो पाती हैं. इसका मतलब यह है कि हमें अभी नींद के बारे में बहुत कुछ पता नहीं है- ख़ासतौर पर दूसरे जीवों के बारे में. लेकिन यह तो तय है कि नींद बहुत ज़रूरी है और एक शोध के अनुसार अगर आप पर्याप्त नहीं सोते हैं तो आपकी ज़िंदगी के साल काफ़ी कम हो सकते हैं. तो छक कर सोएं और स्वस्थ सक्रिय लंबी ज़िंदगी जीएं. |
| DATE: 2013-10-16 |
| LABEL: science |
| [218] TITLE: विटामिन डी सप्लिमेंट लेना कितना ज़रूरी? |
| CONTENT: स्वस्थ वयस्कों को विटामिन डी सप्लिमेंट लेने की ज़रूरत नहीं है. एक शोध से ये पता चला है. इस शोध के मुताबिक विटामिन डी सप्लिमेंट का हड्डियों के घनत्व बोन डेंसिटी पर खास अच्छा असर नहीं होता बोन डेंसिटी से ही ओस्टियोपोरोसिस का पता चलता है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें कुछ और कारण भी हो सकते हैं और लोगों को विटामिन डी सप्लिमेंट लेना बंद नहीं करना चाहिए. न्यूज़ीलैंड के ऑकलैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 23 अध्ययनों का विश्लेषण किया जिनमें 4000 स्वस्थ लोग शामिल थे. अभी ब्रिटेन सरकार बच्चों और 65 साल से ज़्यादा उम्र वाले लोगों को रोज़ाना विटामिन डी सप्लिमेंट लेने की सलाह देती है. न्यूज़ीलैंड के शोधकर्ताओं की इस टीम ने जुलाई 2012 तक स्वस्थ वयस्कों में बोन मिनरल डेंसिटी पर विटामिन डी के असर का पता लगाने वाले सभी बेतरतीब परीक्षणों का विश्लेषण किया. इस अध्ययन में जो लोग शामिल थे उन्होंने औसतन दो साल तक सप्लिमेंट लिए थे. बोन मिनरल डेंसिटी से किसी हड्डी की मज़बूती का पता चलता है. इससे शरीर में मौजूद बोन मिनरल की मात्रा भी पता चलती है. इसे अक्सर ओस्टियोपोरोसिस के जोखिम से जोड़कर देखा जाता है बोन मिनरल डेंसिटी कम होने पर हड्डियों के फ्रैक्चर की संभावना बढ़ जाती है. ये परीक्षण अमरीका ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया नीदरलैंड्स फ़िनलैंड और नॉर्वे समेत कई देशों में हुए थे. हालांकि परीक्षणों के नतीजों में विटामिन डी सप्लिमेंट लेने वाले लोगों को किसी खास फ़ायदे का पता नहीं चला लेकिन कूल्हे के जोड़ के पास बोन डेंसिटी में कम लेकिन अहम बढ़ोतरी का पता चला. हालांकि शोधकर्ताओं का मानना है कि इस असर का चिकित्सकीय महत्व होने की संभावना नहीं है. इस अध्ययन में शामिल ऑकलैंड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर इयान रीड का कहना है कि इस शोध से पता चलता है कि स्वस्थ वयस्कों को विटामिन डी सप्लिमेंट लेने की ज़रूरत नहीं है. प्रोफ़ेसर रीड कहते हैं हमारे आंकड़ों से लगता है कि विटामिन डी की कमी की संभावना वाले लोगों को ही कम खुराक दिए जाने से अहम संसाधन मिल सकते हैं जिनका कहीं और बेहतर इस्तेमाल हो सकता है. ब्रिटेन का स्वास्थ्य विभाग अभी सलाह देता है कि गर्भवती और दूध पिलाने वाली महिलाओं और 65 साल से ज़्यादा उम्र वाले लोगों को रोज़ाना 10 माइक्रोग्राम विटामिन डी सप्लिमेंट लेना चाहिए जबकि छह महीने से पांच साल की उम्र तक के बच्चों को 7 से 8-5 माइक्रोग्राम की विटामिन ड्रॉप दी जानी चाहिए. सरे विश्वविद्यालय में पोषण विज्ञान विभाग में शोधकर्ता डॉक्टर लॉरा त्रिपकोविक का कहना है कि ये शोध अहम है लेकिन बहुत निश्चित नहीं है. वो कहती हैं उन्हें बोन डेंसिटी पर विटामिन डी के असर को लेकर कोई सबूत न मिलने से मुझे हैरानी नहीं हुई क्योंकि ओस्टियोपोरोसिस में जीन आहार और वातावरण जैसे कई कारक शामिल हैं. डॉक्टर त्रिपकोविक का मानना है कि विटामिन डी सप्लिमेंट लेने का कोई मतलब नहीं है अगर लोग नियमित रूप से कैल्शियम युक्त एक अच्छा और संतुलित भोजन न लें और कसरत न करें. हमें ज़्यादातर विटामिन डी त्वचा पर सूरज की रोशनी पड़ने से मिल जाता है लेकिन विटामिन डी मछली अंडों और जई जैसे अनाज में भी मिलता है. हालांकि सप्लिमेंट के रूप में ज़्यादा विटामिन डी लेना भी नुकसानदेह हो सकता है क्योंकि कैल्शियम जमा हो जाता है और गुर्दों को नुकसान पहुंचा सकता है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि रोज़ाना 25 माइक्रोग्राम से ज़्यादा कैल्शियम नहीं लिया जाना चाहिए. |
| DATE: 2013-10-16 |
| LABEL: science |
| [219] TITLE: पॉपकॉर्न खाओ, विज्ञापन भूल जाओ ! |
| CONTENT: जर्मनी के कलोन विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन के मुताबिक़ सिनेमा देखते वक्त जब दर्शक पॉपकॉर्न का लुत्फ़ उठाते हैं तब विज्ञापनों का असर कम होता है. शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि दर्शक किसी नए नाम की नकल उतारकर ब्रांड का नाम याद करते हैं लेकिन यह आंतरिक प्रक्रिया चबाने की प्रक्रिया से प्रभावित होती है. इससे विज्ञापन बेअसर साबित होते हैं. यह शोध जर्नल ऑफ़ कंज़्यूमर सायकॉलजी में छपा है. यह नया अध्ययन पुराने नतीजों से भिन्न है जिनमें कहा गया था कि च्यूइंग गम चबाने से याददाश्त बढ़ सकती है. इस बात के कुछ प्रमाण हैं कि च्यूइंग गम चबाने से दिमाग़ में रक्त प्रवाह बेहतर होता है जिससे लंबी अवधि में आप ज़्यादा चौकस बन सकते हैं. हालांकि पिछले साल कार्डिफ़ विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में यह कहा गया था कि च्यूइंग गम चबाने से एक निर्धारित क्रम में चीज़ें याद रखना बाधित हो जाता है. पॉपकॉर्न और याददाश्त के बीच संबंध को जानने के लिए कलोन विश्वविद्यालय ने 96 लोगों को फ़िल्म देखने के लिए आमंत्रित किया. इससे पहले विज्ञापनों की श्रृंखला चलाई गई. समूह में आधे लोगों को पूरी फ़िल्म के दौरान पॉपकॉर्न दिए गए जबकि बाक़ियों को शुगर क्यूब दिए गए. इन्हें उपलब्ध उत्पादों के वास्तविक विज्ञापन दिखाए गए जिनसे जर्मन लोग अंजान थे. एक हफ़्ते बाद इन लोगों को प्रयोगशाला में बुलाया गया और कुछ उत्पादों के बारे में बताने के लिए कहा गया. इनमें वे उत्पाद भी शामिल थे जिनके विज्ञापन दिखाए गए थे. शुगर क्यूब खाने वाले लोगों ने उत्पादों के बारे में अपनी प्राथमिकताएं बताईं जबकि पॉपकॉर्न खाने वाले समूह ने ऐसा नहीं किया. एक दूसरे अध्ययन के दौरान भी समान परिस्थितियों में 188 लोगों को विज्ञापन दिखाए गए और चैरिटी संस्थाओं को दान करने के लिए पैसे दिए गए. फिर से शुगर क्यूब वाले समूह ने उन चैरिटी संस्थाओं को दान दिया जिन्हें सिनेमा के दौरान विज्ञापनों में दिखाया गया लेकिन पॉपकॉर्न खाने वाले समूह ने ऐसा नहीं किया. एक शोधकर्ता साशा टोपोलिंस्की कहती हैं पॉपकॉर्न खाने की गतिविधि ने प्रतिभागियों को विज्ञापन के व्यापक असर से मुक्त कर दिया था. अध्ययन के मुताबिक़ लोगों में किसी ब्रांड का नाम स्थापित करने के लिए उसे बार बार दोहराने की ज़रूरत पड़ती है. शोधकर्ताओं ने लिखा है कि ख़ासकर नए ब्रांड की स्थापना के लिए ज़रूरी है कि उसे दोहराया जाए. याद कीजिए कि शुरूआत में किस तरह याहू गूगल या विकीपीडिया ने आपको परेशान किया था लेकिन अब वो आपकी याददाश्त में छप चुके हैं. टोपोलिंस्की तो यहां तक कहती हैं कि विज्ञापनकर्ता शायद पॉपकॉर्न का बहिष्कार करने लगें. |
| DATE: 2013-10-15 |
| LABEL: science |
| [220] TITLE: पीठ का दर्दः घुमाव वाले जूतों से फ़र्क नहीं पड़ता |
| CONTENT: कर्व यानी घुमाव वाले अस्थिर तले के जूते पीठ के दर्द को कम करने में पारपंरिक जूतों ट्रेनर्स के मुकाबले बेहतर नही हैं. लंदन के किंग जॉर्ज कॉलेज की ओर से किए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है. इससे पहले हुए शोध में कहा गया था कि इन जूतों से खड़े होने के ढंग पर सकारात्मक असर पड़ता है और यह पीठ और जोड़ों के दर्द को रोकने में सहायक होते हैं. स्वास्थ्य के क्षेत्र से जुड़े पेशेवर इन जूतों की सिफ़ारिश करते रहे हैं. शोध में यह भी कहा गया है कि सामान्य ट्रेनर्स जूते चलने या खड़े होने से होने वाले पीठ के दर्द में लाभदायक हो सकते हैं. फ़िज़ियोथेरेपिस्ट डॉक्टर शियान मैकरे ने अपनी पीएचडी के दौरान ही इस शोध का नेतृत्व किया. अस्थिर घुमाव के तले वाले जूतों को अक्सर यह कहकर बेचा जाता है कि वो मांसपेशियों की सक्रियता बढ़ाने में सहायक होते हैं उनसे पीठ के निचले हिस्से के दर्द को कम करने और संतुलन खड़े होने के ढंग को बेहतर बनाने में मदद मिलती है. डॉक्टर मैकरे कहती हैं कि उनके मरीज़ हमेशा पूछते थे कि क्या उनके रॉकर सोल वाले जूते ठीक हैं इसलिए उन्होंने फ़ैसला किया कि वो ये पता लगाएंगी कि क्या उनसे पीठ के दर्द और अन्य परेशानी में सहायता मिल सकती है. स्पाइन जनरल में छपे इस शोधपत्र के अनुसार पीठ के निचले हिस्से में दर्द की गंभीर दिक्कत से जूझ रहे 115 लोगों को एक दिन में चलते वक्त या खड़े होते समय में कम से कम दो घंटे रॉकर सोल वाले जूते या ट्रेनर जूते पहनने को कहा गया. उन लोगों को लगभग एक महीने तक हफ़्ते में एक बार व्यायाम और शैक्षिक कार्यक्रम में भी हिस्सा लेना होता था और इस दौरान अपने जूते पहनने होते थे. छह हफ़्ते छह महीने और फिर एक साल बाद एक विकलांगता प्रश्नोत्तरी के आधार पर इन प्रतियोगियों की जांच की गई. शोध के अंत में शोधकर्ताओं ने पाया कि ट्रेनर जूते पहनने वाले लोगों की दिक्कत में रॉकर सोल वाले ग्रुप के मुकाबले काफ़ी कमी आई है. छह महीने बाद ट्रेनर ग्रुप के लोगों ने पीठ की लोच में 53 प्रतिशत तक सुधार बताया जबकि रॉकर सोल वाले ग्रुप में यह सिर्फ़ 31 प्रतिशत ही था. शोध के शुरू में जिन 59 लोगों ने कहा था कि खड़े रहने और चलने से उनकी पीठ का दर्द बढ़ गया है उनमें से ट्रेनर जूतों वाले ग्रुप को एक साल बाद दिक्कत में भारी कमी दिखी बनिस्बत रॉकर सोल ग्रुप के. डॉक्टर मैकरे कहती हैं ّइस बेतरतीब क्लिनिकल ट्रायल के निष्कर्षों के आधार पर पीठ के निचले हिस्से के गंभीर मरीज़ों को डॉक्टर विश्वास के साथ सलाह दे सकेंगे कि वो कठोर तले वाले जूते पहनें या ट्रेनर पहनें उनकी तकलीफ़ और दिक्कत में फ़र्क समान रूप से पड़ेगा. हालांकि अगर मरीज़ को चलने या खड़े होने में पीठ के निचले हिस्से में दर्द होता है तो बेहतर यही होगा कि वो रॉकर सोल वाले जूतों के बजाय ट्रेनर जूते पहनें. अस्थिर तले वाले जूते बनाने वाली कंपनी मसाई बेयरफ़ूट टेक्नोलॉजी एमबीटी के प्रवक्ता नोएल मे कहते हैं बहुत से अन्य शोधों में बताया गया है कि घुमाव वाले जूते जोड़ों पर दबाव को कम करते हैं और खड़े होने की मुद्रा पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ते हैं. वह कहते हैं मेरे मन में प्रश्नावलियों पर आधारित इस जैसे शोधों को लेकर काफ़ी सम्मान है लेकिन हम सभी जानते हैं कि ठीक होने की प्रश्नावलियों पर कई चीज़ों का प्रभाव पड़ता है- जैसे कि शोध करने वाले व्यक्ति का नज़रिया अर्थव्यवस्था और तो और मौसम भी. |
| DATE: 2013-10-15 |
| LABEL: science |
| [221] TITLE: मिल गया दुनिया का सबसे कठोर पदार्थ! |
| CONTENT: शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि कार्बाइन नाम का एक पदार्थ अब तक का सबसे कठोर ज्ञात पदार्थ हो सकता है. उनका कहना है कि यह हीरे और ग्रेफीन से भी कठोर है. शोधकर्ताओं की इस टीम का कहना है कि कार्बाइन के कुछ असाधारण गुण हो सकते हैं अगर इसे बड़ी मात्रा में बनाया जा सके. कुछ विशेषज्ञ इसे बड़ी मात्रा में बनाए जाने की संभावना पर सवाल उठा रहे हैं. इस शोध को एसीएस नैनो नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है. कार्बाइन असल में कार्बन परमाणुओं की एक श्रृंखला है जो एक दूसरे से दो या तीन रासायनिक बांडों के मार्फत जुड़े होते हैं. ह्यूस्टन के राइस विश्वविद्यालय के बोरिस याकोब्सन ने अपने शोधपत्र में दिखाया है कि खिंचाव के मामले में कार्बाइन की क्षमता सभी ज्ञात पदार्थों में सबसे ज़्यादा है. ग्रेफीन में समानांतर कार्बन परमाणुओं की श्रृंखला होती है और इसे दुनिया का सबसे मजबूत पदार्थ यानी सुपर मटीरियल माना जाता है. लेकिन कार्बाइन इससे भी दो गुना मजबूत है. वैज्ञानिक पहले इसकी गणना कर चुके हैं कि ग्रेफीन की एक पतली चादर को तोड़ने के लिए एक पेंसिल की नोक पर हाथी के बराबर ज़ोर लगाना पड़ेगा. उन्होंने गणना की है कि कार्बाइन में ग्रेफीन और कार्बन ट्यूब की अपेक्षा दोगुना और हीरे की अपेक्षा तीन गुना कठोरता होती है. शोधकर्ताओं का मानना है कि कार्बाइन को चुंबकीय सुपरकंडक्टर में बदला जा सकता है. इससे पहले कुछ वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में कार्बाइन बनाने में सफलता हासिल की थी लेकिन इसकी प्रकृति बहुत ही अस्थिर थी. राइस विश्वविद्यालय से ही जुड़े वसीली आर्तयूखोव ने कहा हमारा मकसद इन सभी चीज़ों को एक साथ लाकर एक पदार्थ के रूप में कार्बाइन की पूरी तस्वीर स्पष्ट करना था. उन्होंने कहा कि तनाव की स्थिति में कार्बाइन स्थिर रहता है. |
| DATE: 2013-10-14 |
| LABEL: science |
| [222] TITLE: सर्जरी जहाँ मरीज़ सब देख रहा है पर होश में नहीं. |
| CONTENT: जनरल एनेस्थीसिया बहुत से ऑपरेशनों का एक समान्य भाग है. लेकिन अगर आँखें बंद होने के बाद भी आप होश में रहें तो क्या होआप एक ऑपरेशन थिएटर में हैं. एनेस्थीसिया शुरू हो चुका है और बेहोश होने की उलटी गिनती शुरू हो गई है. बहुत से लोगों को इसके बाद जो अगली बात याद रहती है वह होती है एक गहरी नींद से जागना. लेकिन कुछ मामले ऐसे भी होते हैं जिनमें पूरी तरह से बेहोशी कभी आती ही नहीं. सर्जरी के दौरान होश में आ जाना और फिर कुछ भी करने में नाकाम रहना किसी भी मरीज़ का सबसे बुरा डर होगा. लेकिन ब्रिटेन के प्रमुख एनेस्थीस्टों के अनुसार सिर्फ ऐसा ही नहीं होता कि आदमी या तो होश में हो या बेहोश. इसके बीच में भी एक अवस्था होती है. ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय अस्पताल में परामर्श एनेस्थीस्ट प्रोफ़ेसर जयदीप पंडित मानते हैं कि इनके अलावा चेतना की एक अन्य तीसरी अवस्था भी होती है जो सोने और जागने के बीच की होती है. हो सकता है कि मरीज़ सामान्य एनेस्थीसिया के दौरान इसी अवस्था में चला जाए. वो कहते हैं मैं इसे डाइसेनेस्थीसिया कहता हूं एक ऐसी जागृति जिसमें मरीज़ को सर्जरी के बारे में पता तो होता है लेकिन वो न तो होश में होता है और न ही बेहोश. हालांकि दुनिया भर में इसका इस्तेमाल होता है लेकिन फिर भी कोई नहीं जानता कि जनरल एनेस्थीसिया शरीर पर काम कैसे करता है. एनेस्थीसिया एक जटिल काम है जिसमें सालों के प्रशिक्षण और कौन सी दवा कितनी दी जानी है इसको ठीक से समझने की ज़रूरत पड़ती है. फिर भी अनुमानतः 15000 में से एक सर्जरी में मरीज़ ऐसी दशा को अनुभव करते हैं जिसमें उन्हें सर्जरी के विभिन्न आयाम होश में आने के बाद याद रहते हैं. इनमें से एक तिहाई को दर्द भी महसूस होता है. दरअसल यह सवाल कि कौन होश में है और कौन नहीं दिमाग को चकरा देने की हद तक जटिल है. लेकिन प्रोफ़ेसर पंडित उस चीज़ की पड़ताल कर रहे हैं जो इससे आगे की है. अर्थात् उस धुंधली अवस्था की जो होश और बेहोशी के बीच की है. वह इसे आइसोलेटेड फोरआर्म टेक्निक नाम की पद्धति के ज़रिए दिखा पाते हैं. इसमें अगर मरीज़ सर्जरी के दौरान होश में आ जाए तो वो अपना हाथ हिलाकर सर्जन को एलर्ट कर सकता है. प्रोफ़ेसर पंडित ने इस तकनीक का इस्तेमाल कर इंसान की जागरुकता के चमत्कारिक पहलू दर्शाए हैं. कई बार किए गए परीक्षणों में बेहोश लग रहे मरीजों ने निर्देश दिए जाने पर प्रयोगकर्ता की उंगली को अपनी सक्रिय बांह से दबा दिया. लेकिन उनमें से किसी ने भी खुद ही अपनी बांह हिलाकर यह नहीं बताया कि वो होश में हैं या सर्जरी के दौरान उन्हें दर्द हो रहा है. प्रोफ़ेसर पंडित कहते हैं देखा जाए तो ये मरीज़ बेहोश हैं. लेकिन स्पष्टतः वह एक ऐसी अवस्था में हैं जहां वह मौखिक निर्देश जैसी चीज़ों पर प्रतिक्रिया कर सकते हैं लेकिन सर्जरी जैसी चीज़ पर नहीं. शायद इसलिए कि इससे उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती. प्रोफ़ेसर पंडित के अनुसार इससे पता चलता है कि चेतना का तीसरा स्तर भी होता है. लेकिन इस अवधारणा का विश्लेषण करना काफ़ी मुश्किल है. सामान्यतः जब डॉक्टर एनेस्थीसिया के बारे में मरीज़ को समझाते हैं तो वह इसकी तुलना सो जाने से करते हैं. लेकिन हॉवर्ड मेडिकल स्कूल में एनेस्थीसिया के प्रोफ़ेसर डॉक्टर एमोरी ब्राउन इसे तकनीकी रूप से ग़लत बताते हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया हमें सुरक्षित तरीके से आपकी सर्जरी करने के लिए एक प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी जो यकीनन काफ़ी आक्रामक और सदमे वाली होगी इससे आप एक ऐसी अवस्था में पहुंच जाएंगे जो कोमा होगी और जिसे हम ख़त्म कर सकते हैं. हालांकि जब दिमाग होश से बेहोशी की ओर जाता है तो उसमें क्या हो रहा होता है यह अभी तक साफ़ नहीं है. साल 2011 में मैन्चेस्टर विश्वविद्यालय में एक शोध दल पहली बार यह देख पाया था कि एनेस्थीसिया के दौरान इंसानी दिमाग पर क्या असर होता है. दिमाग की तस्वीर उतारने की एक नई तकनीक का इस्तेमाल कर शोधार्थियों ने दिमाग की थ्री डी तस्वीर बनाई. इससे पहले सामान्य ब्रेन स्कैन की 2डी तस्वीर ही बन पाती थी. वह यह देख पाए कि जैसे-जैसे मरीज़ बेहोश होता है उसके दिमाग में क्या विद्युतीय हरकतें होती हैं. मज़ेदार बात यह है कि जैसे ही मरीज़ बेहोश हुआ उसकी दिमागी हलचलें बढ़ कईं. इससे लगता है कि एनेस्थीसिया के प्रभाव में बंद होने की बजाय दिमाग और तेजी से काम करता है ताकि होश में आ सके. लेकिन वैज्ञानिक अब भी यह नहीं समझ पाए हैं कि जब बेहोशी आती है तो दिमाग पर क्या असर पड़ता है. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन हॉस्पिटल्स में एनेस्थीसिया सलाहकार डॉक्टर केविन फोंग कहते हैं हम इस वक्त भी यह नहीं बता सकते कि इंसानी चेतना क्या है इसलिए ऐसी तकनीक ढूंढना जो इसकी अनुपस्थिति की निगरानी करे मुश्किल है. |
| DATE: 2013-10-11 |
| LABEL: science |
| [223] TITLE: दिमाग के रहस्य खोलने के लिए सबसे बड़ा दांव |
| CONTENT: इंसानी दिमाग़ को समझने के लिए दस साल तक चलने वाली एक अरब पाउंड करीब 99 अरब रुपये लागत की परियोजना पर काम शुरू हो गया है. दुनिया के 135 संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिक इस परियोजना में भाग ले रहे हैं जिसका नाम है दि ह्यूमन ब्रेन प्रोजेक्ट एचबीपी. इनमें से ज़्यादातर वैज्ञानिक यूरोपीय हैं. इसका उद्देश्य एक ऐसी तकनीक विकसित करना है जिससे दिमाग की कंप्यूटर से नकल तैयार की जा सके. यह हर साल प्रकाशित हज़ारों न्यूरोसाइंस के शोधपत्रों से दिमाग पर शोध के आंकड़ों का डाटाबेस भी तैयार करेगा. ईपीएल स्विट्ज़रलैंड में एचबीपी के निदेशक प्रोफ़ेसर हेनरी मार्कराम कहते हैं ह्यूमन ब्रेन प्रोजेक्ट पूरी तरह नई कंप्यूटर साइंस टेक्नोलॉजी बनाने की कोशिश है ताकि हम सालों से दिमाग के बारे में जुटाई जा रही सारी जानकारियों को एकत्र कर सकें. प्रोफ़ेसर मार्कराम कहते हैं हमें अब यह समझने लगना चाहिए कि इंसान का दिमाग इतना ख़ास क्यों होता है ज्ञान और व्यवहार के पीछे का मूल ढांचा क्या है दिमागी बीमारियों का निदान कैसे किया जाए और दिमागी गणना के आधार पर नई तकनीकों का विकास कैसे किया जाए. इस परियोजना को यूरोपीय संघ भी आर्थिक सहायता दे रहा है. परियोजना से जुड़े वैज्ञानिक मानते हैं कि वर्तमान कंप्यूटर तकनीक दिमाग की जटिल क्रियाओं की नकल करने में सक्षम नहीं है. लेकिन एक दशक के अंदर ही सुपरकंप्यूटर्स इतने ताकतवर हो जाने चाहिए कि इंसानी दिमाग की पहली नकल का प्रारूप तैयार हो सके. दूसरी दिक्कत आंकड़ों की वह बड़ी मात्रा है जो इस प्रक्रिया से निकलेगी. इसका मतलब यह है कि गणना की मैमोरी को भारी मात्रा में बढ़ाना पड़ेगा. एबीपी को ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट के न्यूरोसाइंस समकक्ष की तरह देखना चाहिए. ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट में भी हमारे पूरे जेनेटिक कोड को तैयार करने के लिए दुनिया भर के हज़ारों वैज्ञानिक शामिल थे. इसमें एक दशक से ज़्यादा का समय और सैकड़ों अरब रुपये खर्च हुए. उस प्रोजेक्ट में हर कोशिका में पाए जाने वाली तीन अरब मूल जोड़ों का नक्शा बनाया गया था जिससे हमारा पूरा जेनेटिक कोड तैयार होता है. लेकिन ह्यूमन ब्रेन प्रोजेक्ट पूरे इंसानी दिमाग़ का नक्शा नहीं बनाएगा. क्योंकि यह बहुत ज़्यादा जटिल है. दिमाग में करीब 100 अरब न्यूरॉन या तंत्रिका कोशिका होती हैं और करीब 100 ट्रिलियन सूत्रयुग्मक संपर्क होते हैं. इसके बजाय यह परियोजना कई तरह की कंप्यूटर नकल तैयार करने पर केंद्रित है. मानचेस्टर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एक ऐसा मॉडल बना रहे हैं जो दिमागी क्रिया के एक फ़ीसदी की नकल करेगा. दि स्पिननेकर प्रोजेक्ट के मुखिया स्टीप फ़रबेर हैं जो कंप्यूटर उद्यग का एक जाना-माना नाम है. उन्होंने बीबीसी के माइक्रोकंप्यूटर के डिज़ाइन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. वह कहते हैं मैंने अपना समय पारंपरिक कंप्यूटर बनाने में लगाया है और मैंने उनके प्रदर्शन को असाधारण ढंग से बेहतर होते देखा है. लेकिन फिर भी उन्हें बहुत सी ऐसी चीज़ें करने में मुश्किल होती है जो इंसान स्वाभाविक रूप से कर लेते हैं. नवजात शिशु भी अपनी मां को पहचान लेते हैं लेकिन किसी ख़ास व्यक्ति को पहचानने वाला कंप्यूटर बनाना संभव तो है- पर बहुत मुश्किल भी है. वैज्ञानिकों को लगता है कि इन रहस्यों को सुलझाने से सूचना तकनीक में बड़े फ़ायदे मिल सकते हैं. ऐसी मशीन के ईजाद से जिसे न्यूरोमॉरफ़िक कंप्यूटर कहा जाता है- ऐसी मशीन जो दिमाग की तरह सीखती है. प्रोफ़ेसर मार्कराम कहते हैं इस जानकारी से हम ऐसी कंप्यूटर चिप्स बनाने में सक्षम हो सकते हैं जिनमें ऐसी ख़ास विशेषताएं हों जो इंसानी दिमाग की नकल कर सकें- जैसे कि भीड़ का विश्लेषण करने की क्षमता बड़े और जटिल आंकड़ों के बीच फ़ैसला करने की क्षमता. इन डिजिटल दिमागों से शोधकर्ताओं को स्वस्थ और बीमार दिमाग के कंप्यूटर मॉडलों की तुलना का भी मौका मिलेगा. परियोजना का एक मुख्य उद्देश्य दिमागी बीमारियों की एक बेहतर वैज्ञानिक समझ विकसित करना भी है. इससे तंत्रिका संबंधी गड़बड़ी का एक एकीकृत नक्शा बनाकर यह देखा जा सकेगा कि उनका आपस में क्या संबंध है. एचबीपी दल को यकीन है कि इससे दिमागी बीमारियों के ज़्यादा वस्तुनिष्ठ तरीके से निदान और इलाज में मदद मिलेगी. एचबीपी की भआरी लागत की यह कहकर आलोचना की जा रही है कि इसकी भारी-भरकम लागत की वजह से दूसरे न्यूरोसाइंस शोध कार्यक्रमों के लिए पैसे की कमी हो जाएगी. परियोजना की बड़ी महत्वाकांक्षा ने भी कुछ संदेह पैदा कर दिए हैं कि क्या सचमुच एक दशक में यह दिमाग को समझने की क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है. लेकिन प्रोफ़ेसर स्टीप फ़रबर को यकीन है कि इसके लिए यह सही समय है. वह कहते हैं कई तरह के अविश्वासों की पर्याप्त वजह है. लेकिन अगर हम लक्ष्य को पूरी तरह हासिल नहीं भी कर पाते हैं तो भी हम इतनी प्रगति तो कर ही लेंगे कि मेडिसिन कंप्यूटिंग और समाज के लिए फ़ायदेमंद होगी. |
| DATE: 2013-10-11 |
| LABEL: science |
| [224] TITLE: एक्सीडेंट से अपने आप बचाएगी कार |
| CONTENT: जल्द ही आपके पास एक ऐसी कार होगी जो कि सामने किसी अवरोध के आने पर ख़ुद-ब-ख़ुद कार को दूसरी दिशा में मोड़ देगी. जर्मनी में एक ऐसी कार का परीक्षण किया गया है जो सामने किसी अवरोध के आने से पहले ही कार की स्टीयरिंग को नियंत्रित कर लेती है और किसी भी तरह की टक्कर होने से बचा लेती है. कार निर्माता कंपनी फ़ोर्ड का कहना है कि कार में लगाया गया ये नया सिस्टम पहले तो ड्राइवर को सचेत करता है लेकिन यदि ड्राइवर का फिर भी इस पर ध्यान नहीं जाता तो सिस्टम ख़ुद स्टीयरिंग पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेता है. एक विशेषज्ञ का कहना है कि ये सिस्टम चालकविहीन कार के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम है. इस सिस्टम में तीन रडार कई अल्ट्रासोनिक सेंसर और एक कैमरा लगा है जिसकी मदद से ये 200 मीटर तक के किसी अवरोध की पहचान कर लेता है और ड्राइवर को सतर्क कर देता है. इसके अलावा सामने लगी एक स्क्रीन पर चेतावनी चिह्न भी बना है जो कि अवरोध की स्थिति में चमकने लगता है. इसके बाद यदि ज़रूरत पड़ती है तो ये सिस्टम कार में ब्रेक भी लगा देता है या फिर ख़ीली जगह की ओर कार को मोड़ देता है और किसी भी दुर्घटना से कार और उसमें बैठे लोगों को बचा लेता है. फ़ोर्ड की यूरोपियन डिवीज़न के उपाध्यक्ष बार्ड समारडिक कहते हैं गाड़ी के सामने कोई पैदल यात्री आ रहा हो या फिर कोई अवरोध आ जाए तो पहले तो कार में लगा अलार्मिंग सिस्टम ख़तरे की चेतावनी देता है और उसके बाद स्टीयरिंग को अपने नियंत्रण में ले लेता है. कंपनी ने इस सिस्टम का प्रदर्शन इसी हफ़्ते बेल्जियम में किया. फ़ोर्ड कंपनी ने पिछले साल ही एक ऐसा सिस्टम बनाया था जो गाड़ी की लेन यानी जिस पटरी पर चल रही है उसके बारे में चेतावनी जारी करता था. लेकिन ये सिस्टम सिर्फ़ चेतावनी देता था उसे नियंत्रित नहीं करता. फ़ोर्ड कंपनी की गाड़ियों में अभी भी एक ऐसा सिस्टम है जो कि सामने किसी स्थाई अवरोध के होने पर कार में ख़ुद-ब-ख़ुद ब्रेक लगा देता है. लेकिन ये सिस्टम सिर्फ़ स्थाई अवरोधों की स्थिति में काम करता है या फिर बहुत कम गति से आ रहे किसी अवरोध के सामने. लेकिन कंपनी का कहना है कि नया सिस्टम उस अवरोध के बारे में भी सतर्क कर देता है जो साठ किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से सामने आ रहे हों. इस सिस्टम के निर्माण में बीएमडब्ल्यू फ़िएट वोल्वो और फ़ोक्सवैगन जैसी कुछ अन्य कंपनियाँ भी शामिल हैं. हालांकि इस बारे में कुछ सवाल भी उठ रहे हैं कि गाड़ी चलते समय मशीन ड्राइवर के हाथ से नियंत्रण अपने हाथ में ले लेगी. लेकिन इस बारे में फ़ोर्ड का कहना है कि बहुत कम ऐसे लोग होते हैं जो अचानक सामने किसी अवरोध के आ जाने पर इससे बच पाते हैं. कंपनी ने ये आँकड़े जर्मनी के सरकारी विभाग से जुटाए हैं. हालांकि फ़ोर्ड कंपनी का कहना है कि इस सिस्टम को कार का हिस्सा बनाने के लिए अभी कई और परीक्षणों की ज़रूरत है. |
| DATE: 2013-10-10 |
| LABEL: science |
| [225] TITLE: कम उम्र में माँ बनना बच्चे को पड़ सकता है भारी |
| CONTENT: ब्रिटेन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार तीस साल से कम उम्र में महिलाओं के माँ बनने से जन्म लेने वाले बच्चों की मृत्यु की आशंका अधिक होती है. ब्रिटेन में बच्चों की मृत्यु पर प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले 20 साल में बच्चों की मृत्यु के आँकड़ों में 50 प्रतिशत की कमी आई है. बच्चों की कम उम्र में मौत का प्रमुख कारण युवा महिलाओं का माँ बनना है. हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी उम्र की महिलाओं को सहयोग की जरूरत है. इसे केवल किशोरावस्था की माताओं तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए. यह शोध यूसीएल के इंस्टीट्यूट ऑफ़ चाइल्ड हेल्थ ने किया है. इस शोध के लिए जनवरी 1980 से लेकर दिसंबर 2010 तक के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया. बच्चों को लगने वाली चोट जन्म के समय बच्चे के वजन और माता की उम्र को शोध में खतरे का मूल्यांकन करने के लिए अध्ययन बिंदु बनाया गया. इसमें इंग्लैंड स्कॉटलैंड और वेल्स में 30 से कम उम्र की माताओं और 30 से 34 उम्र की माताओं के नौ साल तक के बच्चों की मृत्यु के आँकड़ों में 11 प्रतिशत का अंतर देखा गया. नौ साल तक की उम्र तक के बच्चों की होने वाली कुल मौतों में बीस साल से कम उम्र की माताओं के बच्चों की मृत्यु दर 3-80 प्रतिशत थी. इस अध्ययन में विभिन्न आयु वर्ग में समान भार वाले बच्चों का भी तुलनात्मक अध्ययन किया गया. रिपोर्ट के अनुसार एक महीने से लेकर नौ महीने तक के शिशुओं के मृत्यु में भारी अंतर देखा गया. इस आयु वर्ग में 22 प्रतिशत मौतों के कारणों की व्याख्या नहीं की गई है जो माताओं द्वारा शराब के सेवन धूम्रपान और एकाकीपन की परिस्थितियों से जुड़े हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान नीति किशोरावस्था में पहली बार माँ बनने वाली महिलाओं पर ध्यान देती है. यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि तीस साल से कम उम्र की महिलाएं ब्रिटेन में पैदा होने वाले कुल बच्चों के 52 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करती हैं. यूसीएल इंस्टीट्यूट ऑफ़ चाइल्ड हेल्थ के प्रमुख शोधकर्ता और क्लीनिकल एपिडिमॉलजी के प्रोफ़ेसर रथ गिलबर्ट कहते हैं कि शोध से मिले निष्कर्ष काफ़ी महत्वपूर्ण हैं. उनके अनुसार किशोरावस्था में माँ बनना महिलाओं के लिए सामाजिक रूप से हानिकारक है क्योंकि उच्च अध्ययन और करियर पर ध्यान देने वाली महिलाएं आमतौर पर गर्भधारण को 30 साल की उम्र तक रोक देती हैं. प्रोफ़ेसर रथ गिलबर्ट के अनुसार इस विषमता को ठीक करने के लिए वैश्विक नीतियों की आवश्यकता है. पॉलिसी एण्ड चाइल्ड केयर ट्रस्ट में नीति और शोध विभाग के प्रमुख जिल रूटर सरकारी सहायता को बढ़ाने की बात कहते हैं. जिल बताते हैं बाल मृत्यु के पीछे सामाजिक नुकसान और माताओं की उम्र जैसे कारण प्रमुख हैं. सरकार ने किशोरवस्था की माताओं के बच्चों की नाजुक स्थिति को पहचानते हुए पेरेंटिग के साथ-साथ अतिरिक्त सेवाएं प्रदान की हैं. उनके अनुसार इंग्लैंड में फैमिली और नर्स की सहभागिता काफ़ी गहन और सुव्यवस्थित है. पहली बार बीस साल से कम उम्र में माँ बनने वाली महिलाओं की देखभाल के लिए घरों पर नर्स की सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं. जिल कहते हैं विशेष तौर पर प्रशिक्षित नर्स गर्भधारण के शुरूआती महीनों से लेकर बच्चों के दो साल के होने तक नियमित रूप से देखभाल के लिए घर पर जाती हैं लेकिन यह सेवा बड़ी उम्र में माँ बनने वाली महिलाओं को उपलब्ध नहीं है. हम चाहते हैं कि उनको भी नर्सों की सुविधा के दायरे में लाया जाए. हेल्थकेयर क्वालिटी इम्प्रूवमेंट पार्टनरशिप के अध्ययन को रॉयल कॉलेज ऑफ़ पीडीऐट्रिक्स एण्ड चाइल्ड हेल्थ ने प्रकाशित किया है जिससे अन्य महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं. पहला तथ्य यह है कि चोट लगना बचपन में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है लेकिन इसमें कमी आ रही है. वर्ष 1980 और 2010 के बीच चोट के कारण एक साल से चार साल तक की उम्र तक बच्चों में से 31 प्रतिशत की मृत्यु हुई. इन बच्चों की माताओं की उम्र 15 से 18 साल थी. ब्रिटेन के अन्य हिस्सों के मुकाबले इंग्लैंड में बाल मृत्यु दर की कमी में निरंतरता रही है विशेषकर बड़े बच्चों की मृत्यु दर और कम रही है. रॉयल कॉलेज के प्रेसीडेंट डॉक्टर हिलेरी कॉस कहते हैं कि चोट के कारण बच्चों की मौत चिंता की बात है. डॉक्टर हिलेरी कहते हैं चोट बच्चों की मौत का सबसे बड़ा कारण है लेकिन इसमें कमी आ रही है. इसलिए इस संबंध में सार्वजनिक नीति बनाने की आवश्यकता है. इस अध्ययन से पता चला है कि ब्रिटेन में मरने वाले 70 प्रतिशत बच्चे कैंसर श्वास नली में संक्रमण सिस्टिक फाइब्रोसिस या मिरगी जैसी गंभीर बीमारियों की चपेट में थे. यह आवश्यक रूप से बच्चों की मौत का प्रमुख कारण नहीं था लेकिन उनकी मौत के कारकों में से एक है. प्रोफ़ेसर गिलबर्ट कहते है कि कुल बच्चों की मौत के आँकड़ों में कमी आ रही है लेकिन गंभीर बीमारी और विकलांगता के साथ जन्म लेने वाले बच्चे पूरी स्थिति को गंभीर बना रहे हैं. इसके मायने हैं कि बच्चों की उचित सक्रिय देखभाल की आवश्यकता है. गिलबर्ट के अनुसार गंभीर बीमारी वाले कुछ बच्चों को जिनकी मौत की आशंका है उनको उच्च गुणवत्ता की चिकित्सकीय सुविधा मुहैया करवाने के साथ-साथ उनके परिवार को सहायता की जरूरत है. वो कहते हैं बाकी बच्चों की समय पूर्व मौत को रोका जा सकता था. गंभीर बीमारी वाले बच्चों की परिवार द्वारा घर पर देखभाल की जाती है उनको प्राथमिक और सामुदायिक देखभाल की सेवाओं के साथ-साथ अस्पताल की सुविधा मिलती है. हमें घर के साथ-साथ अस्पतालों में बच्चों की दीर्घकालीन देखभाल की सुविधा उपलब्ध कराने की जरूरत पर ध्यान देना होगा. |
| DATE: 2013-10-10 |
| LABEL: science |
| [226] TITLE: सेक्स जो सच में ले लेता है जान |
| CONTENT: एक नए अध्ययन से पता चलता है कि मार्सुपियल्स ख़ास स्तनपायी प्रजाति इस तीव्रता से सहवास करते हैं कि उसके चलते उनकी मौत तक हो जाती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे नर जीव ज्यादा से ज्यादा मादाओं के साथ सहवास करते हैं और उनके ये सहवास सत्र कई बार 14 घंटों तक लगातार चलते हैं. ये अध्ययन पीएनएएस जर्नल में प्रकाशित हुआ है. ताज़ा अध्ययन में ऑस्ट्रेलिया दक्षिणी अमरीका और पापुआ न्यू गिनी में छोटी और कीड़े खाने वाली 52 मार्सुपियल्स प्रजातियों के जीवों के यौन व्यवहार का अध्ययन किया गया. इसमें पता चला कि एंटेचाइनस फैसकोगेल डेसीकालुटा जैसी जीवों में नर को पिता बनने की क़ीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ सकती है. जान के लिए जोखिम बनने वाली ये प्रवृत्ति उन क्षेत्रों में ख़ास तौर से पाई जाती है जहां वर्ष की एक विशेष अवधि में अत्यधिक खाना होता है. ऐसे में इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि मादाएं सहवास के समय को छोटा रखें ताकि जब वो बच्चे को जन्म दें तो खाने के लिए भरपूर खाना हो. मादाएं इस दौरान बहुत से नरों के साथ सहवास करती हैं. ये अध्ययन क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी की डॉक्टर डायना फ़िशर के नेतृत्व में हुआ है. वो कहती हैं जो मादाएं ज्यादा नरों के साथ सहवास करती हैं वो अच्छी गुणवत्ता वाले शुक्राणुओं को ही धारण करती हैं. अध्ययन के मुताबिक़ इस दौरान नर ज्यादा से ज्यादा मादाओं के साथ सहवास करते हैं. और ये ज्यादा से ज्यादा अवधि के लिए भी होता है. इसके उन्हें आपस में लड़कर अपनी ताक़त भी साबित करनी होती है. उनमें इसके लिए ऊर्जा टेस्टोरोन समेत कई हार्मोनों के बदलाव के कारण आती है. डॉक्टर फ़िशर कहती हैं कि इन रसायनों के कारण उनमें तनाव का स्तर भी बहुत बढ़ जाता है जिससे निपटने में वे सफल नहीं हो पाते हैं. ये जीव इंसानों की तरह अपने तनाव से निपटने में सक्षम नहीं होते हैं. |
| DATE: 2013-10-09 |
| LABEL: science |
| [227] TITLE: 'गॉड पार्टिकल' की खोज करने वालों को नोबेल |
| CONTENT: बेल्जियम के भौतिक विज्ञानी फ़्रांस्वा इंगलर्ट और ब्रिटेन के पीटर हिग्स को 2013 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है. रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ़ साइंसेस ने पुरस्कार का ऐलान करते हुए कहा दोनों वैज्ञानिकों ने परमाणु से छोटे कणों के द्रव्यमान को समझाने की प्रक्रिया की सैद्धांतिक खोज की है. एकेडमी के अनुसार बीते साल जेनेवा में एक प्रयोगशाला में हिग्स पार्टिकल की खोज से इन वैज्ञानिकों के सिद्धांतों की पुष्टि हुई है. इस कण को हिग्स बोसॉन भी कहा जाता है. रॉयल स्वीडिश एकैडमी ऑफ साइंसेस के स्थायी सचिव स्टैफन नॉरमार्क ने कहा “इस साल का पुरस्कार एक बहुत छोटी चीज़ के बारे में है जो बहुत बड़ा असर डालती है. प्रोफ़ेसर हिग्स मीडिया से दूर रहने के लिए जाने जाते हैं और जब नोबल पुरस्कार का ऐलान हुआ उसके ठीक बाद भी उनसे इंटरव्यू के लिए संपर्क नहीं किया जा सका. एडिनबरा विश्वविद्यालय में उनके साथ काम करने वाले ऐलन वॉकर ने ब्रितानी मीडिया को कहा वह मीडिया से बचने के लिए बगैर फ़ोन लिए छुट्टी पर गए हुए हैं. उनकी तबीयत भी ठीक नहीं है. एडिनबरा विश्वविद्यालय ने हिग्स का एक बयान जारी किया. हिग्स एडिनबरा विश्वविद्यालय में सैद्धांतिक भौतिकी के अवकाश प्राप्त मानद प्रोफ़ेसर हैं. उनके बयान में कहा गया है मैं ये पुरस्कार पाकर बेहद ख़ुश हूं और रॉयल स्वीडिश एकैडमी को धन्यवाद देता हूं. उन सभी लोगों को भी बधाई जिन्होंने इस नए कण की खोज में योगदान दिया और मेरे परिवार दोस्तों और साथी कर्मचारियों को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद. फ्रांस्वा इंगलर्ट ने कहा कि वो “बहुत खुश हैं. उन्होंने कहा “पहले लगा कि मुझे ये पुरस्कार नहीं मिला है क्योंकि मैं पुरस्कार का ऐलान नहीं देख पाया. इंगलर्ट और हिग्स उन कई भौतिकविज्ञानियों में शामिल हैं जिन्होंने 1960 में ब्रह्मांड में मूलभूत पदार्थ की सरंचना को लेकर एक प्रक्रिया का सुझाव दिया था. इस प्रक्रिया में एक कण- हिग्स बोसोन- होने का अनुमान लगाया गया था. जेनेवा के परमाणु अनुसंधान संगठन सर्न के वैज्ञानिक 2012 में इस कण को खोज पाए. यूरोपियन पार्टिकल फिज़िक्स लैबोरेट्री ने जुलाई में इसका ऐलान किया था. हिग्स बोसॉन को गॉड पार्टिकल भी कहा जाता है. इस कण की खोज के लिए हज़ारों वैज्ञानिकों को लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर में प्रोटॉनों की टक्कर से मिले काफ़ी लंबे-चौड़े आंकड़ों को खंगालना पड़ा. लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर की लागत 10 अरब डॉलर यानी करीब 62 हज़ार करोड़ रुपए है और ये स्विटज़रलैंड और फ्रांस की सीमा पर 27 किलोमीटर में फ़ैला हुआ है. लेकिन 10 खरब में से एक टक्कर से ही एक हिग्स-बोसॉन मिल पाता है. सर्न को ये तय करने में भी कुछ समय लगा कि ये खोजा गया कण हिग्स-बोसॉन ही है और उसी तरह का कोई दूसरा कण नहीं है. |
| DATE: 2013-10-08 |
| LABEL: science |
| [228] TITLE: सूरज की गर्मी सी, मुट्ठी में क़ैद |
| CONTENT: अमरीका में शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में अपने आप लगातार जारी रहने वाली नाभिकीय संलयन या फ़्यूज़न की प्रक्रिया में खपत से ज़्यादा ऊर्जा हासिल कर एक अभूतपूर्व सफलता हासिल की है. फ़्यूज़न वो प्रक्रिया है जिसमें दो अलग- अलग परमाणु जुड़ कर एक अणु का निर्माण करते हैं जबकि नाभिकीय विखंडन या फ़ीज़न में इसके विपरीत परमाणु टूट जाते हैं. लेकिन इन दोनों ही प्रकिया में समानता इसके परिणाम पर हैं जिसमें भरपूर ऊर्जा निकलती हैं. ब्रह्मांड में ऊर्जा का सबसे बड़ा और असीमित स्रोत सूर्य है. सूर्य पर अनवरत फ़्यूज़न प्रकिया चलती रहती है इससे निकलने वाली ऊर्जा से ही पृथ्वी को रोशनी और गर्मी मिलती है. नेशनल इग्निशन फैसिलिटी एनआईएफ़ के वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में फ़्यूज़न को बढ़ाने वाली प्रक्रिया का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है. कैलिफ़ोर्निया में लिवरमोर में स्थित एनआईएफ़ के शोधकर्ताओं ने फ़्यूज़न की प्रक्रियाओं को परखने के लिए दुनिया की सबसे शक्तिशाली लेज़र किरणों का इस्तेमाल किया. 192 किरणों को कंप्रेस संघनित कर हाइड्रोजन ईंधन से भरे छोटे कक्ष में भर दिया इसके बाद पाया गया कि फ़्यूज़न की प्रक्रिया होने लगी. सितंबर के आख़िरी दिनों में किए गए इस परीक्षण के दौरान जितनी ऊर्जा निकली वो इस प्रक्रिया में इस्तेमाल की गई ऊर्जा से कहीं ज़्यादा थी. इस तरह फ़्यूज़न की प्रक्रिया से वैज्ञानिकों ने पहली बार कम खपत करके ज़्यादा ऊर्जा हासिल की है. हालांकि प्रयोगशाला के स्तर पर ये एक छोटी से ही सफलता है लेकिन इसके मायने बड़े हैं क्योंकि इससे भविष्य की ऊर्जा का रास्ता खुलता है. हाल के सालों में किए गए नाभिकीय प्रयोगों की श्रृंखला में ये सबसे सार्थक क़दम है. शोघकर्ता इस तथ्य को प्रमाणित करने में सफल रहे और इसके आगे का रास्ता अपने आप जारी रहने वाली फ़्यूज़न प्रक्रिया की ओर जाता है. 2009 में एनआईएफ़ ने घोषणा की थी कि उनका मक़सद 30 सितंबर 2012 तक फ़्यूज़न से ज़्यादा ऊर्जा हासिल करना है. लेकिन जब तारीख़ क़रीब आई तो वैज्ञानिकों ने जो सोचा था नतीजा उसके उलट था. तकनीकी ख़ामी के चलते प्रयोग में पाया गया कि फ़्यूज़न से हासिल ऊर्जा प्रयोग में इस्तेमाल की गई ऊर्जा से कम थी. परीक्षण से पहले वैज्ञानिकों ने गणितीय आधार पर ज़्यादा ऊर्जा मिलने का दावा किया था. इस समय परंपरागत तरीक़े से परमाणु ऊर्जा नाभिकीय विखंडन से हासिल की जाती है पर एनआईएफ़ संलयित ऊर्जा की वकालत करता रहा है. इस सफलता के बाद शोधकर्ताओं को आगे के लिए उम्मीद की किरण नज़र आने लगी है. |
| DATE: 2013-10-08 |
| LABEL: science |
| [229] TITLE: क्या हो जब बीबी बच्चे पहचान में ना आएं |
| CONTENT: कल्पना कीजिए कि आप अपनी मां अपनी पत्नी/पति और अपने बच्चे को नहीं पहचान पा रहे हैं. आप उन्हें देख रहे हैं लेकिन आपका दिमाग़ उनके बारे में जानकारी नहीं दे रहा है- आप यह नहीं समझ पा रहे हैं कि वह मुस्कुरा रहे हैं या नहीं आप यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उनकी भावनाएं क्या हैं दिमाग पर चोट लगने के बाद डेविड ब्रोम्ली के साथ यही हुआ. चोट लगने के बाद वह प्रोसोपैग्नोसिया के शिकार हो गए. इस बीमारी के शिकार लोग आंखें नाक मुंह को अलग-अलग देख सकते हैं लेकिन किसी के चेहरे को मुकम्मल रूप से नहीं देख पाते न ही चेहरे के भाव या मुद्राएं पहचान पाते हैं. डेविड कहते हैं मैं घर आने पर अपनी बीवी को पहचान सकता हूँ लेकिन अगर वो सड़क पर वो मेरे बगल से गुजरे और मुझे पता न हो कि वो वहाँ आने वाली है तो मैं उसे पहचान नहीं पाऊँगा. इंग्लैंड के एसेक्स के निवासी डेविड की आंख में जन्म से ही दिक्कत थी लेकिन उन्हें इसका पता नहीं था. उनकी रक्तवाहिनियां आर्टरीज़ और शिराएं जुड़ी हुई थीं. इससे अंततः आंख में रोशनी कम हो गई और दिमाग में क्षति हुई जिससे प्रोसोपेग्नोसिया हो गया. इसका सबसे मुश्किल पहलू यह है कि लोगों को तुरंत पता नहीं चलता कि उनके साथ कोई गड़बड़ हो गई है. प्रोसोपेग्नोसिया के दो प्रकार हैं. पहला है विकासशील- जिसमें लोग चेहरा पहचानने की योग्यताओं को विकसित करने में असफल रहते हैं. दूसरा प्रकार है उपार्जित- यह दिमाग़ में किसी तरह की चोट लगने के बाद होता है और यह बहुत दुर्लभ है. यूनिवर्सिटी ऑफ़ ईस्ट लंदन में कग्निटिव न्यूरोसाइकोलॉजी विशेषज्ञ डॉक्टर अशोक जनसारी कहते हैं उपार्जित प्रोसोपेग्नोसिया बहुत दुर्लभ होता है क्योंकि इसके लिए बहुत खास जगह पर चोट लगने की ज़रूरत होती है. डेविड कहते हैं मुझे समझ नहीं आता कि क्या ज़्यादा ख़राब बात है आजीवन किसी को न पहचान न पाना या फिर मेरी तरह अचानक 56 साल की उम्र में किसी को भी न पहचान पाना. डेविड कहते हैं कि इस बीमारी की सबसे बड़ी मुश्किल तो समाज में इसकी वजह से होने वाली शर्मिंदगी है. वह बताते हैं हम क्यूबा में छुट्टियां मना रहे थे. मैं डेनमार्क के एक आदमी से बात कर रहा था कि तभी एक औरत आई और बोली ब्यूनोस डाएस यानी कि हेलो. इस पर मैंने कहा हेलो आपसे मिलकर ख़ुशी हुई. मैं समझ रहा था कि वह उसकी बीवी है लेकिन वह दरअसल मेरी बीवी थी और मैं उसे पहचान ही नहीं पाया था. लंदन की सैंड्रा को 14 साल पहले इंसेफ़ेलाइटिस- मस्तिष्क कोप- हो गया था जिसकी वजह से वो प्रोसोपैग्नोसिया की शिकार हो गईं. हालांकि उनका प्रोसोपेग्नोसिया हल्का है- वह उन्हीं लोगों को पहचान पाती हैं जिन्हें उन्होंने बीमार होने से पहले देखा था. वह कहती हैं प्रोसोपेग्नोसिया के साथ जीना बहुत शर्मिंदगी भरा होता है. वह अपनी इस बीमारी को छुपाती हैं क्योंकि वह नहीं चाहतीं कि कोई उन्हें विकलांग समझे. सैंड्री के शिक्षिका हैं और जहां वह काम करती हैं कोई नहीं जानता कि वह प्रोसोपेग्नोसिया की शिकार हैं. वह बताती हैं अगर मैं किसी को रोज़ देखती हूं तो मैं उसे पहचान जाती हूं. लेकिन अगर कोई बच्चा रास्ते में मुझे हेलो कहता है तो मैं ये तो समझ जाऊंगी कि ये स्कूल का कोई छात्र है लेकिन वो कौन है- ये पता नहीं चलेगा. वह कहती हैं मैं बच्चों को कुछ नहीं कहती. शायद इसकी वजह ये है कि मैं नहीं चाहती कि वो सोचें कि मैं अपना काम नहीं कर सकती क्योंकि यह सच नहीं है. मैं शर्मिंदा नहीं होना चाहती और न ही ये चाहती हूं कि लोग समझें कि मेरे साथ कोई गड़बड़ है. डॉक्टर जनसारी डेविड और सैंड्रा की भावनाओं और डर को समझते हैं. वह ऐसे मामलों से वाकिफ़ हैं जिनमें इस दिक्कत की वजह से लोगों की नौकरियां चली गई हैं- जिनमें एक शिक्षिका भी शामिल थी जिन्हें अपने विद्यार्थियों को पहचानने में दिक्कत होती थी. प्रोसोपेग्नोसिया को विकलांगता की श्रेणी में नहीं रखा गया है. हालाँकि डॉक्टर जनसारी का मानना है कि कुछ मामलों में ऐसा किया जाना चाहिए. |
| DATE: 2013-10-07 |
| LABEL: science |
| [230] TITLE: भविष्य की दुनिया क्या कनेक्टेड होगी? |
| CONTENT: भविष्य की पीढ़ियां जिस दुनिया में रहेंगी वे हर लिहाज़ से ज़्यादा कनेक्टेड जुड़ी हुई होंगी. लेखक टेड विलियम्स पूछते हैं कि क्या ये एक जुड़ी हुई दुनिया यानी कनेक्टेड वर्ल्ड कैसे हमारे समाज और हमें बदल देगी. तर्कशील व्यक्ति दुनिया के हिसाब से खुद को ढाल लेता है जबकि अविवेकी व्यक्ति दुनिया को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश करता है. इसलिए जितनी भी तरक्की है वह अविवेकी मनुष्य पर निर्भर है. जॉर्ज बर्नार्ड शॉतकनीक के हर बड़े क़दम ने मानव समाज को व्यापक रूप में बदला है. इसलिए ही हम जानते हैं कि वे बड़े तकनीकी बदलाव थे. भले ही हम उन्हें तब महसूस नहीं कर पाते हैं जब वे घटित हो रहे होते हैं. जेबीएस हेल्डेन के ब्रह्मांड के बारे में दिए गए प्रसिद्ध वक्तव्य में कहा जाए तो भविष्य आपकी कल्पना से अलग नहीं होगा बल्कि जितनी आप कल्पना कर सकते हैं उससे बहुत अलग होगा. हम सामाजिक प्राणी हैं लेकिन भिन्न होने के ख़तरे तब से कम हुए हैं जब से व्यक्तिवाद हमारे समाज और स्वयं हम में बड़ी ताक़त बनता चला गया है. नवीन तकनीक एक बड़ा कारण है. दो शक्तिशाली बल अब तेज़ी से समाज और व्यक्ति के बीच के समीकरण बदल रहे हैं. व्यक्तिवाद का केंद्रीकरण और एक बंटे हुए समाज से अस्थिर और समस्तरीय समाज के प्रति निष्ठा का हस्तांतरण. अपने शानदार उपन्यास केट्स क्रेडल में कर्न वोनॉट ने एक ऐसे धर्म की खोज की जो मानवीय रिश्तों को कारासेज़ या फ़िर ग्रेनफॉलूंस में परिभाषित करता है. कारासेज़ का मतलब है लोगों के बीच में सच्चा संपर्क जो स्वतः स्थापित होता है और ग्रेनफॉलूंस ऐसे रिश्ते हैं जो अधिकतर असत्य होते हैं यानि जन्म रंग स्थान आदि के आधार पर बनते हैं. बहुत से धर्म और राष्ट्र जैसे कि सच्चे समस्तरीय सामाजिक समूह साझा विचारों के रूप में शुरु हुए लेकिन जैसे-जैसे ये संस्थाएं बढ़ी और बदली लोगों के बीच की सहमतियाँ धूमिल होती चली गईं. अमरीका में उदार ईसाई कट्टर ईसाइयों के मुकाबले उदार नास्तिकों से ज़्यादा मिलते-जुलते हैं. तो फ़िर अमरीकी ईसाई कौन हैं लेकिन ब्लूग्रास का एक प्रशंसक हमेसा ब्लूग्रास का ही संगीत पसंद करेगा भले ही वो टैनेसी में रहता है या ट्यूनीसिया में. जो विचार आधिकारिक सीमाओं में क़ैद नहीं होते वे ही अपने अनुयायियों की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं. जबकि राष्ट्र और धर्म बहुत ही कम लचीले होते हैं. लेकिन यदि हम अपनी निष्ठाओं को अधिक व्यक्तिकत रुचियों जैसे कि पर्यावरण की राजनीति बंदूकों पर मालिकाना हक़ पुराने फर्नीचर को ख़रीदना या फिर अंतरराष्ट्रीय मामलों पर नज़र रखना आदि की ओर करेंगे तो हम देशीय या अन्य सीमाओं में नया राजनीतिक गठबंधन बना लेंगे. तकनीक की दुनिया में हो रहे तीव्र बदलाव हमें सिर्फ़ जानकारियाँ साझा करने से और भी बहुत कुछ ज़्यादा करने का मौका देते हैं. ज़ल्द ही हम लोगों के विचार सोच और उनकी आवाज़ को सुन पाएंगे. बिना बोले संवाद की तकनीक वर्चुल टच में होने वाले सुधारों की मदद में से हम चीजों की छु्अन का अहसास भी साझा कर पाएंगे. अगर आपकी पर्वतारोहण में रुचि है तो इस तकनीक के ज़रिए माउंट एवरेस्ट पर चढ़ रहे किसी शेरपा के बूट में आप अपना पाँवों को महसूस कर पाएंगे और जान पाएंगे कि उसे कैसा लग रहा है. आप स्काई डाइवर के साथ छलाँग लगा सकेंगे और अमेजन नदी के किनारे बसे लोगों से ऐसे बात कर पाएँगे जैसे आप वहीं हो. यही नहीं किसी सड़क पर हो रहे विरोध प्रदर्शन में आप हज़ारों किलोमीटर दूर होते हुए भी शामिल हो पाएंगे. लेकिन नज़रिए में बदलाव सिर्फ़ यहीं नहीं रुकेगा. तकनीक की दुनिया में हो रहे बदलाव हमारी स्वयं की भौतिकी में भी बदलावों के संकेत दे रहे हैं. स्मार्टफ़ोन सिर्फ़ एक तकनीकी पड़ाव हैं हालाँकि वे इस सदी में ताज़ा रहेंगे और दुनिया के कम विकसित इलाक़ों में उनके कई अप्रत्याशित इस्तेमाल भी होंगे लेकिन विकसित देशों में इक्कीसवीं सदी के मध्य तक पहुँचते-पहुँचते हम अपने कंप्यूटर डिवाइस को अपने साथ रखने के कई व्यक्तिगत तरीकों की ओर जाने लगेंगे. भले ही हम तब तक सीधे स्थापित होने वाले साइबरपंक हासिल न कर पाएं स्मार्ट गॉगल या शरीर में फिट होने वाले बेहद छोटे आकार के इनपुट-आउटपुट डिवाइस फोन का स्थान ले लेंगे. लेकिन सिर्फ़ इतना ही नहीं न सिर्फ़ आपका पूरा सहकर्मी समूह आपगे दिमाग़ में होगा बल्कि आपको अपनी सेहत के प्रति भी अतिचिंतित नहीं होना पड़ेगा. हृद्यगति अंगों की सक्रियता ब्लड शुगर यहाँ तक की दिमाग़ी हालत की भी जानकारी आपको पल-पल मिलती रहेगी. हीट सिग्नेचर शरीर या गति से निकलने वाली गर्मी से हमें पता चल जाएगा कि क्या हम किसी तेज़ रफ़्तार से आती कार के रास्ते में तो नहीं है या आगे कोई लुटेरा हमारा इंतज़ार तो नहीं कर रहा है. किराने की दुकान से ख़रीदारी करते वक़्त हम हर सामान को स्कैन कर उसके बारे में अतिरिक्त जानकारी और बाकी लोगों की राय तुरंत हासिल कर सकेंगे. अगर आपको किसी ख़ास पदार्थ से एलर्जी है या फ़िर आपके भोजन की कुछ ख़ास ज़रूरतें हैं तो किसी भी पदार्थ को चखने से पहले ही आपको उसके बारे में समस्त जानकारी मिल सकेगी और आप तय कर सकेंगे कि आपको यह सामान ख़रीदना है या नहीं. महत्वपूर्ण जानकारियों को किसी भी वक्त हासिल करने की इस क्षमता के रास्ते में क़ानून और राजनीति भी आएंगे. यदि ऐसी सेवाएं उपलब्ध होंगी तो ज़्यादातर लोग इन्हें हासिल करना चाहेंगे भले ही वे इनकी क़ीमत चुकाने में सक्षम हो या न हों. ख़ासकर उन सेवाओं की माँग बढ़ेगी जो जीवन को बढ़ाने में मदद करेंगी. इन जानकारियों को सभी लोगों को उपलब्ध करवाने का दवाब ऐसा ही होगा जैसा किसी अन्य स्वास्थ्य संबंधी सेवा पर होता है. सिर्फ़ अमीर लोगों के पास ही हृद्यघात के वक़्त जान बचाने वाले शरीर में फिट गए मॉनिटर या फिब्रिलेटर क्यों होंजब आपके तमाम मित्र आपके दिमाग़ के भीतर या फिर हर समय आपसे जुड़े हुए हो और आप व्लादिवोस्क में बैठे किसी व्यक्ति से उस खेल के बारे में चर्चा कर रहे हो जिसे आप दोनों खेल रहे हैं या फिर आप अपने जैसी सोच रखने वाले दमिश्क में बैठे किसी व्यक्ति से बात कर रहे हों तो निश्चित रूप से आपके इस बारे में विचार बदलेंगे कि हम क्या हैं और वे क्या हैं. राजनीतिक एवं अन्य विभाजन खत्म नहीं होंगे लेकिन वे हमें अलग लगने लगेंगें. क्या अधिक निजी स्वतंत्रता और निजी निवेश की इस दुनिया का कोई स्याह पहलू भी है जाहिर तौर पर हैं. जैसे-जैसे हम लगातार अपडेट होती जानकारियों से घिरे हुए स्वयं के निर्मित विश्व में अधिक समय बिताएँगे और अपने और अपने जैसी सोच रखने वाले लोगों के बारे में बेहद सूक्ष्म जानकारियाँ रखेंगे हम एक अलग किस्म के मानव समाज में परिवर्तित होते जाएंगे. कुछ लोगों का कहना है कि डरने के लिए सिर्फ अधिकाधिक अत्यधिक आत्म भागीदारी ही नहीं बल्कि अन्य कारण भी हैं. सामाजिक आलोचकों को लगता है कि हम इंटरनेट युग से पहले भी एक जैसी सोच वाले लोगों के समूहों की ओर अग्रसर हो रहे थे. साइबर जगत में ध्रवीकरण पर हुए ताज़ा शोध बताते हैं कि जन संपर्क के इस दौर में हालात और भी बदतर हुए हैं यानि व्यक्तिगत की तुलना में एक जैसी सोच वाले समूहों में हम ज़्यादा कट्टर हो जाते हैं. व्यक्तिगत होने के मुकाबले जब हम समूह में होते हैं तब अलग दृष्टिकोण के प्रति तिरस्कार की भावना भी रखते हैं. आने वाली सदी में हमारी चुनौती इन अपनी सोच के दायरे में सीमित रहने से खुद को रोकने की भी होगी. हमें सिर्फ़ अपने बारे में ही नहीं बल्कि दूसरे लोगों के बारे में भी सोचना होगा. वास्तव में जब पुराने तरीके विलुप्त हो जाएंगे तब हम मनुष्यों को पड़ोसी होने के नए तरीके खोजने होंगे. |
| DATE: 2013-10-06 |
| LABEL: science |
| [231] TITLE: दवा से होगा 'सच से सामना'? |
| CONTENT: हमारे समाज की एक बड़ी चुनौती है ये पता करना कि कब लोग सच बोल रहे हैं और कब नहीं. हम ख़ुद भी झूठ बोलते रहते हैं और अकसर हमें पता ही नहीं चलता कि कब लोग हमसे जानबूझ कर झूठ बोल रहे हैं. वैसे झूठ बोलने वालों को पहचानने के लिए कई मिथक मशहूर हैं. जैसे झूठ बोलने वाले आपकी तरफ़ सीधे नहीं देखते झूठ बोलते वक्त वे अपनी नाक को छूते हैं या फिर उनके पांव हिलते हैं. एक के बाद एक किए गए अध्ययनों में पता चला है कि झूठ बोलने वालों को पहचानने का काम पुलिसकर्मियों जैसे पेशेवर भी बाकी लोगों से ज़्यादा बेहतर तरीके से नहीं कर सकते. इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं है कि सालों से वैज्ञानिक ट्रुथ ड्रग्स यानी सच उगलवाने वाली दवाएं या रसायन विकसित करने पर काम कर रहे हैं. ऐसे ही सबसे पुराने और मशहूर रसायनों में से एक ट्रुथ ड्रग सोडियम थियोपेंटाल है. हालांकि ये दवा 1930 के दशक में पहली बार विकसित की गई थी लेकिन आज भी कई देशों की सेना और पुलिस इसका कई स्थितियों में इस्तेमाल करती हैं. एक तरफ़ मुझे इस रसायन के बारे में कौतूहल था लेकिन दूसरी तरफ़ मुझे इससे जुड़े दावे को लेकर संशय भी थे. हालांकि सोडियम थियोपेंटाल को एक एनेस्थेटिक या सुन्न करने वाली दवा के तौर पर विकसित किया गया था लेकिन ऐसा माना जाता है कि इस ड्रग के प्रभाव में लोग न चाहने पर भी सच बोलते हैं. दरअसल सोडियम थियोपेंटाल बार्बिट्यूरेट्स नाम के दवा समूह में शामिल है. 1950 और 60 के दशक में बार्बिट्यूरेट्स का इस्तेमाल अच्छी नींद के लिए होता था. ये दवा मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के बीच संदेश जाने की दर को धीमा कर देती हैं. आपकी सोचने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है जब तक कि आप पूरी तरह सो नहीं जाते. थियोपेंटाल से ये प्रक्रिया काफ़ी तेज़ हो जाती है. हालांकि थियोपेंटाल को मूलत एनेस्थेटिक के तौर पर विकसित किया गया था लेकिन जल्द ही ये देखा गया कि जब मरीज़ चेतना और बेहोशी के बीच की अवस्था में होते हैं तब वे ज़्यादा और खुलकर बोलने लगे. लेकिन इस ड्रग का असर ख़त्म होने के बाद मरीज़ों को ये याद नहीं रहा कि उस दौरान उन्होंने क्या कहा. एक सोच ये भी है कि ये रसायन भी शराब की तरह असर करता है. शराब एक एनेस्थेटिक है जिससे मस्तिष्क के सोचने की प्रक्रिया से जुड़े सेरेब्रल कॉर्टेक्स जैसे हिस्सों पर प्रभाव पड़ता है. इससे हमारे सोचने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है हम ठीक से सोच नहीं पाते और माना जाता है कि झू़ठ बोलना और मुश्किल हो जाता है. इस वजह से ये माना गया कि पूछताछ के लिए सोडियम थियोपेंटाल ट्रुथ ड्रग की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन क्या ये वाकई में असरदार है मैं दवाइयों के इतिहास के बारे में एक श्रृंखला बना रहा हूं और इसलिए मैंने इस रसायन को ख़ुद पर इस्तेमाल करने के बारे का फैसला किया. मैंने डॉक्टर ऑस्टिन लीच की निगरानी में सोडियम थियोपेंटाल की कम खुराक लेने का फैसला किया. मैंने तय किया कि इस प्रयोग के दौरान मैं विज्ञान पत्रकार की अपनी असली पहचान की जगह ख़ुद को माइकल मोसली मशहूर हृदय विशेषज्ञ बताऊंगा. प्रयोग की शुरुआत में मुझे सोडियम थियोपेंटाल की कम खुराक दी गई. मैं एकदम ही हलका और बहका हुआ महसूस करने लगा. लेकिन क्या इससे मैं सच बोलने लगूंगामुझे पक्का नहीं पता कि मैंने कितना सफलतापूर्वक झूठ बोला लेकिन मैंने पाया कि दवा के प्रभाव में भी मैं झूठ बोल सकता था. जब डॉक्टर ऑस्टिन लीच ने मुझसे पूछा कि मैं क्या काम करता हूं तो मैंने हंसते हुए ज़ोर से चिल्लाकर जवाब दिया कि मैं एक मशहूर हृद्य विशेषज्ञ हूं. उन्होंने मुझसे पूछा क्या आप मुझे अपने आखिरी ऑपरेशन के बारे में बताएंगेमैं जवाब दिया वो एक बायपास सर्जरी थी. मरीज़ बच गया. मैंने बहुत अच्छा काम किया. हालांकि मैंने पूरे विश्वास के साथ जवाब नहीं दिया था लेकिन फिर भी मैं अपनी मनगढ़ंत कहानी पर कायम रहने में क़ामयाब रहा. लेकिन दवा की खुराक बढ़ने पर क्या होगामुझे थोड़ा सा डर लगा कि शायद उस वक्त मैं कुछ ऐसा बोल दूं जिसे मैं किसी को बताना नहीं चाहता हूं लेकिन मुझे अपने झूठ बोलने की योग्यता पर भरोसा था इसलिए मैंने डॉक्टर लीच से कहा कि वे खुराक बढ़ा दें. इस बार मुझे थोड़ी सी ज़्यादा खुराक़ दी गई और अब मैं पहले से ज़्यादा होश में और खुद पर काबू महसूस कर रहा था. इसलिए दवा दिए जाने के बाद जो हुआ वो पूरी तरह चौंकाने वाला था. डॉक्टर लीच ने फिर से मेरा नाम और पेशा पूछा. इस बार मेरे जवाब में कोई हिचकिचाहट नहीं थी. मैंने कहा मैं एक टीवी प्रोड्यूसर हूं कार्यकारी प्रोड्यूसर हूं प्रस्तोता हूं. कई बार इन तीनों का मिश्रण भी. उन्होंने आगे पूछा तो आपने कभी कार्डिएक सर्जरी नहीं की है मैंने तुरंत जवाब दिया कभी नहीं कभी नहीं. मुझे अब भी ठीक-ठीक पता नहीं है कि क्या हुआ लेकिन मुझे लगता है कि इस बार मैंने सच इसलिए बोला क्योंकि मेरे दिमाग़ में झूठ बोलने की बात ही नहीं आई. तो क्या वाकई सोडियम थियोपेंटाल काम करता है इस दवा को इस्तेमाल कर और विशेषज्ञों से इस बारे में बात करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि इस रसायन के प्रभाव में निश्चित तौर पर लोग ज़्यादा सच बोलने लगते हैं. लेकिन जब आप पर दवा का असर होता है तब इस बात का भी गंभीर ख़तरा होता है कि आप सच बोलने की जगह वही कहेंगे जो आपका प्रश्नकर्ता सुनना चाहता है. सच ये है कि अब तक हमारे पास एक असरदार और भरोसेमंद ट्रुथ ड्रग नहीं है. और अगर ऐसी कोई दवा है तो कोई उसके बारे में बता नहीं रहा. |
| DATE: 2013-10-05 |
| LABEL: science |
| [232] TITLE: पेट्रोल और डीज़ल दोनों से चलेंगे वाहन? |
| CONTENT: पेट्रोल वाली कार में अगर ग़लती से भी डीज़ल पड़ जाए तो इसके लिए आपको भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है. डीज़ल वाली कार में पेट्रोल डालने के नतीजे भी काफी नुकसानदायक हो सकते हैं. लेकिन पाइप के टुकड़ों तारों और अलग-अलग तरह के कल-पुर्ज़ों के बीच बैठे स्टीव सिएटी यही ग़लती बार-बार दोहरा रहे हैं. ज़्यादातर ड्राइवरों के लिए जो महंगी भूल होती है वही सिएटी के लिए डीज़ल की दक्षता और पेट्रोल की तुलनात्मक सफ़ाई को साथ लाने का एक मौका है. शिकागो में अमरीकी ऊर्जा विभाग की ऐरगॉन नेशनल लैबोरेट्री में इंजीनियर इंजन की दक्षता बढ़ाने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं. कभी वाहनों में तो कभी खास तौर पर परीक्षण के लिए बने कमरों में. सिएटी कहते हैं “घर पर ऐसा करने की कोशिश न करें निश्चित रूप से एक डीज़ल इंजन में पेट्रोल डालना स्वाभाविक नहीं है लेकिन जब इसे नियंत्रित तौर पर किया जाए तो न सिर्फ़ ऐसा संभव है बल्कि अच्छा ख़ासा माइलेज भी हासिल किया जा सकता है. प्रदूषण भी बहुत कम होता है. पेट्रोल हो या डीज़ल इंजन दोनों ही में पिस्टन को चलाने के लिए एक सिलेंडर में ईंधन नियंत्रित रूप से जलता है. सिलेंडर से पिस्टन एक धुरी वाले डंडे से जुड़े होते हैं जो घूमता है और जिससे गियरबॉक्स के ज़रिए पहिये चलते हैं. हालांकि दोनों ही इंजन जिस तरह से ईँधन को जलाना शुरू करते हैं वो बहुत अलग होता है. पेट्रोल इंजन में स्पार्क प्लग होते हैं जिससे ईंधन और हवा का मिश्रण जलता है वहीं डीज़ल इंजन में स्पार्क प्लग नहीं होते. ईँधन को जब इंजन में दबी हुई गर्म हवा में डाला जाता है तो वो जलने लगता है. डीज़ल इंजन से ज़्यादा माइलेज मिलता है. इसकी कुछ वजह तो ये है कि पेट्रोल इंजन में ऊर्जा का स्तर एक थ्रॉटल से तय होता है जो अंदर आने वाली हवा को नियंत्रित करता है. कम हवा का मतलब होगा सिलेंडर में ईंधन को जलाने के लिए कम हवा. लेकिन इसका मतलब ये होगा कि इंजन को हवा अंदर लेने के लिए ज़्यादा काम करना होगा और इससे माइलेज गिरता है. ये सब ठीक है लेकिन डीज़ल इंजन की अपनी सीमाएं हैं. डीज़ल इंजन से कालिख और नाइट्रोज़न ऑक्साइड बहुत पैदा होती है. समस्या असल में ये है कि डीज़ल बहुत आसानी से जलता है. ये वैसे ही जलने लगता है जैसे इसे सिलेंडर की गर्म हवा में डाला जाता है यानी ये हवा में ठीक ढंग से मिल भी नहीं पाता. इसका रसायन जटिल है लेकिन नतीजा ये होता है कि एक अक्षम प्रक्रिया होती है जिसमें कालिख निकलती है और सूक्ष्म कण निकलते हैं एक टिमटिमाती हुई मोमबत्ती की तरह. सिएटी का मानना है कि इंजन का माइलेज कायम रखना और प्रदूषण का स्तर गिराना संभव है. वो कहते हैं “मैं डीज़ल मिलाने से काफ़ी पहले पेट्रोल मिला सकता हूं जिससे डीज़ल अच्छे से हवा में मिल सकेगा और कालिख कम पैदा होगी. सिएटी के मुताबिक ऐरगॉन नेशनल लैबोरेट्री में हुए परीक्षणों से पता चला है कि एक डीज़ल इंजन में पेट्रोल मिलाने से नाइट्रोजन ऑक्साइड की मात्रा 90 फ़ीसदी तक कम हो सकती है और कालिख आधी हो सकती है. अब उनका ध्यान कालिख का स्तर और कम करने पर है. सिएटी प्रदूषण घटाने के लिए एक और रणनीति ला सकते हैं क्योंकि ऐसे सिलेंडर में गैसों के पास अच्छे से मिश्रित होने के लिए ज़्यादा समय है. एक्ज़ॉस्ट गैस रिसर्कुलेशन या ईजीआर तकनीक के ज़रिए इंजन से निकले धुएं को फिर से सिलेंडर में डाला जाता है. इससे ऑक्सीजन का स्तर घटता है और इस तरह नाइट्रोजन ऑक्साइड का स्तर भी गिरता है. लेकिन प्रदूषण में इस कमी का मतलब है कि माइलेज में कमी. सिएटी कहते हैं “मैं ऑक्सीजन में वो गैस मिला सकता हूं जो इंजन से निकल चुकी है और इस तरह ऑक्सीजन का घनत्व कम हो जाएगा. क्योंकि मैं इसे पहले मिला रहा हूं और इसमें डीज़ल की तरह की न मिल पाने की समस्या भी नहीं है. वो कहते हैं मैं ईजीआर को बगैर दिक्कत के चला सकता हूं और नाइट्रोजन ऑक्साइड का स्तर भी बहुत कम कर सकता हूं. मैं एक ऐसा ईँधन इस्तेमाल कर रहा हूं जो अपने आप नहीं जलता और इससे प्रदूषित होने वाले कणों का स्तर भी गिरेगा. अभी ये परीक्षण सिर्फ़ प्रयोगशाला तक सीमित हैं. सिएटी कहते हैं “अगर मैं ऐसा किसी वाहन में करना चाहूं तो ये बहुत मुश्किल होगा क्योंकि तब मेरे पास उस तरह से नियंत्रण की क्षमता नहीं होगी जैसी अभी है. लेकिन इसे बदलने के लिए एरगॉन नेशनल लैबोरेट्री बड़ी वाहन निर्माता कंपनियों और तेल कंपनियों के साथ मिलकर काम कर रही है. 19वीं सदी से कारों को चला रहे इस तरह के इंजनों में शायद अभी और जान बाकी है. |
| DATE: 2013-10-03 |
| LABEL: science |
| [233] TITLE: कैंसर की रोकथाम करेगी ब्लड प्रेशर की दवा |
| CONTENT: आमतौर पर ब्लड प्रेशर के लिए इस्तेमाल होने वाली एक दवा कैंसर से लड़ने में मददगार साबित हो सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि लोसार्टन नाम की यह दवा ठोस ट्यूमर की रक्त वाहिकाओं को खोलकर कैंसर के रोगियों को फायदा पहुंचाती है. उन्होंने पाया कि कैंसर की परंपरागत दवाओं के साथ ही लोसार्टन के इस्तेमाल से मरीजों की उम्र बढ़ सकती है. नेचर कम्युनिकेशंस की रिपोर्ट के मुताबिक चूहों पर सफल परीक्षण करने के बाद अब डॉक्टरों की योजना अग्नाशय के कैंसर के रोगियों को लोसार्टन देने की है. अग्नाशय के कैंसर का इलाज काफ़ी मुश्किल है और इस बीमारी के केवल पांच प्रतिशत मरीज़ ही बीमारी होने के बाद पांच साल तक जिंदा रह पाते हैं. इसकी खास वजह यह है कि इस बीमारी के दस रोगियों में केवल एक के ट्यूमर का ही ऑपरेशन संभव हो पाता है. अमरीका में मेसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल के जांचकर्ता फ़िलहाल ऐसे स्वयंसेवी मरीजों की भर्ती कर रहे हैं जिनके अग्नाशय के कैंसर का ऑपरेशन संभव नहीं है. इन मरीजों पर लोसार्टन और कीमोथेरपी के संयोजन वाली नई दवा का परीक्षण किया जाएगा. हालांकि इस इलाज से वो पूरी तरह ठीक नहीं हो पाएंगे लेकिन शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इस दवा से उनके जीवन के कुछ महीने या साल और बढ़ जाएंगे. एक दशक से अधिक समय से लोसार्टन का इस्तेमाल ब्लड प्रेशर की सुरक्षित दवा के रूप में किया जाता है. इस दवा से रक्त वाहिकाओं को आराम मिलता है जिससे वो अधिक रक्त का संचार कर पाती हैं और दबाव कम हो जाता है. मेसाचुसेट्स के दल ने पाया कि दवा से स्तन और अग्नाशय कैंसर से पीड़ित चूहों को फायदा मिला. इसके इस्तेमाल से ट्यूमर में और उसके आसपास रक्त के प्रवाह में सुधार देखा गया. इस स्थिति में लक्ष्य तक अधिक मात्रा में कीमोथेरपी की दवाएँ पहुंचाई जा सकती हैं. सिर्फ प्रचलित कीमोथेरपी इलाज के बजाए चूहों को यह इलाज दिया गया और वो लंबे समय तक जिंदा रहे. कैंसर रिसर्च यूके की एम्मा स्मिथ ने बताया चूहों पर किया गया यह रोचक अध्ययन इस बात पर रोशनी डालता है कि हाईपरटेंशन की दवाएं आखिर क्यों कीमोथेरपी के असर को बढ़ा सकती हैं. लेकिन अभी तक हम यह नहीं जानते हैं कि वो ठीक उसी तरह इंसानों पर भी काम करेंगी. |
| DATE: 2013-10-03 |
| LABEL: science |
| [234] TITLE: तनाव से भूलने वाली बीमारी का ख़तरा |
| CONTENT: महिलाओं में मध्य वय जीवन के तनाव के चलते भूलने की बीमारी होने का ख़तरा बढ़ रहा है. यह आशंका एक नए शोध में जताई गई है. यह शोध स्वीडेन की 800 महिलाओं पर किया गया है जो या तो तलाक़ के बाद रह रही हैं या फिर अपने साथी की मौत के बाद वियोग में हैं. इन महिलाओं में एक दशक के बाद अल्ज़ाइमर से पीड़ित होने की आशंका जताई गई है. बीएमजे ओपन की रिपोर्ट के मुताबिक़ ज़्यादा तनाव झेलने वाली महिलाओं में भूलने की बीमारी बढ़ने की आशंका बढ़ती जाती है. शोधकर्ताओं के मुताबिक़ तनाव से जुड़े हार्मोन की वजह से दिमाग़ पर विपरीत असर पड़ता है. तनाव से जुड़े हार्मोन मानव शरीर पर कई बदलाव डालते हैं और इससे ब्लड प्रेशर और ब्लड सुगर बढ़ने लगता है. डॉक्टर लीना जॉनसन और उनके दल के चिकित्सकों का मानना है कि किसी हादसे से गुज़रने के बाद तनाव का स्तर बढ़ता है. हालांकि इन शोधकर्ताओं के मुताबिक़ अभी इस पहलू पर काफ़ी ज़्यादा काम किए जाने की ज़रूरत है. इसके अलावा इस पहलू पर भी काम किए जाने की ज़रूरत है कि क्या तनाव और किसी चीज़ के भूल जाने का ये संबंध पुरुषों के लिए भी एकसमान है. इस अध्ययन में महिलाओं पर कई तरह के प्रयोग किए गए. क़रीब 35 साल से 45 साल की उम्र वाली इन महिलाओं को कई परीक्षणों से गुज़रना पड़ा और अगले चार दशक के दौरान नियमित समय अंतराल पर इन पर कई प्रयोग अभी और किए जाएंगे. इस अध्ययन के शुरुआत में प्रत्येक चार में से एक महिला ने बताया कि उन्होंने जीवन में कम से कम एक तनाव का दौर मसलन वैध्वय और बेरोज़गारी झेला है. प्रत्येक चार में से एक महिला ने बताया कि वे दो बार तनाव के दौर से गुज़री हैं जबकि पांच में से एक महिला ने बताया कि वे तीन बार तनावपूर्ण दौर से गुज़र चुकी हैं. बाक़ी महिलाओं ने कहा कि अबतक उन्हें तनाव का सामना नहीं करना पड़ा है. अध्ययन के दौरान इनमें से 425 महिलाओं की मौत हो गई जबकि 153 महिलाओं को भूलने की बीमारी हो गई. शोधकर्ताओं ने इन महिलाओं के जीवन में तनाव के पहलू का अध्ययन करने के दौरान पाया कि भूलने की बीमारी का तनाव से संबंध है. डॉक्टर जॉनसन ने बताया कि आने वाले दिनों के अध्ययन में यह आंकने की कोशिश होगी कि क्या तनाव सम्भालने के प्रबंधन और व्यवहारगत थेरेपी से भूलने वाली बीमारी का इलाज संभव होगादूसरी ओर ग्रेट ब्रिटेन के अल्ज़ाइमर रिसर्च सेंटर के डॉक्टर सिमॉन रेडली ने कहा कि इस अध्ययन से यह पता नहीं चल पा रहा है कि तनाव का भूलने वाली बीमारी से सीधा संबंध है. रेडली ने कहा भूलने वाली बीमारी कई वजहों से होती है. इसका उम्र जेनेटिक्स और पर्यावरण से संबंध है. मौजूदा सबूतों से यह स्पष्ट है कि भूलने वाली बीमारी को कम करने के लिए संतुलित भोजन करना चाहिए नियमित अभ्यास करना चाहिए और ध्रूमपान से बचना चाहिए. |
| DATE: 2013-10-02 |
| LABEL: science |
| [235] TITLE: मिथ्या यादें क्यों समेटता है दिमाग़? |
| CONTENT: मानवीय याददाश्त ख़ुद को दुनिया के अनुरूप ढालने के लिए निरंतर बदलती रहती है. अब एक आर्ट प्रोजेक्ट के ज़रिए यह जानने की कोशिश की जा रही है कि हमारी याददाश्त में क्या दोष हो सकते हैं. हममें से हर किसी के दिमाग़ में मिथ्या यादें बनती हैं और आर्टिस्ट एलेस्डेयर होपवुड उनका संकलन कर रहे हैं. पिछले एक साल से वो लोगों से अपनी मिथ्या यादों के बारे में बताने को कहते हैं और फिर उन्हें कला का रूप देते हैं. इस बारे में लोगों के अनुभव अलग-अलग तरह के हैं. किसी ने कहा कि उसने बचपन में चूहा खा लिया था तो कोई कह रहा है कि वह बचपन में उड़ सकता था. एक आदमी को यह ग़लतफ़हमी थी कि उसकी गर्लफ़्रेड की बहन की मौत दांतों के डॉक्टर से इलाज कराते समय हुई थी. उसका विश्वास इतना पक्का था कि वह दांतों के डॉक्टर के पास जाने के अपने सभी कार्यकर्मों को गुप्त रखता था. यह कोई दुर्लभ मामला नहीं है. न्यूरो वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारी कई दैनिक यादें ग़लत ढंग से बुनी हुई हैं क्योंकि दुनिया के बारे में हमारा दृष्टिकोण निरंतर बदलता रहता है. मामूली संकेतों से यादों को ग़लत दिशा में मोड़ा जा सकता है. एलिज़ाबेथ लॉफ्टस ने 1994 में एक प्रयोग किया था जिसमें वह एक चौथाई भागीदारों को इस बात के लिए मनाने में कामयाब रहीं कि बचपन में वे एक शॉपिंग सेंटर में खो गए थे. साल 2002 में किए गए ऐसे ही एक अन्य प्रयोग में पाया गया कि आधे भागीदारों ने छद्म तस्वीरों को देखकर इस बात को मान लिया कि बचपन में उन्होंने गर्म हवा के ग़ुब्बारे की सैर की थी. यह प्रयोग ब्रिटेन के वॉरविक विश्वविद्यालय की किम्बर्ली वेड ने किया था. होपवुड ने मौजूदा प्रोजेक्ट के लिए उन्हें गर्म हवा के ग़ुब्बारे की वास्तविक उड़ान में हिस्सा लेने के लिए कहा. इसी यात्रा के वीडियो और तस्वीरों को प्रदर्शनी में दिखाया गया है. किम्बर्ली ने कहा कि वह इसके लिए बेहद उत्साहित थीं. उन्होंने कहा मैं एक दशक से भी अधिक समय से लोगों की याददाश्त का अध्ययन कर रही हूं. मेरे लिए यह अविश्वसनीय लगता है कि हमारी कल्पना हमें ऐसा कुछ सोचने पर मजबूर कर सकती हैं जो हमने कभी किया ही नहीं. अधिकांश मामलों में मिथ्या यादें दैनिक परिस्थितियों से जुड़ी होती हैं जिसकी कोई वास्तविक परिणति नहीं होती है. लेकिन कभी कभार इस मिथ्या याददाश्त के गंभीर परिणाम हो सकते हैं. उदाहरण के लिए अदालत में गवाही किसी के लिए सज़ा का कारण बन सकती है. अपराध विज्ञान तकनीक ने ऐसे कई मामलों में फ़ैसलों को पलटा है. अमरीका में द इनोसेंस प्रोजेक्ट में उन लोगों की जानकारी दी गई है जो ग़लत पहचान का शिकार हुए लेकिन बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया. इसके मुताबिक़ अमरीका में 311 सज़ायाफ़्ता लोगों को डीएनए सबूतों की जांच के बाद निर्दोष क़रार दिया गया जिनमें से 18 को मौत की सज़ा मिली थी. लंदन के गोल्डस्मिथ विश्वविद्यालय के क्रिस्टोफ़र फ्रेंच ने कहा कि इस बारे में अब भी जागरुकता का अभाव है कि ख़ासकर क़ानूनी मामलों में मानवीय याददाश्त कितनी अविश्वसनीय हो सकती है. प्रोफ़ेसर फ्रेंच भी होपवुड की परियोजना से जुड़े हैं. उन्होंने कहा कि इससे मानवीय याददाश्त की अविश्वसनीयता के बारे में जागरुकता फैलाने में मदद मिलेगी. होपवुड ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि लोग पूरी तरह से कल्पनीय घटना पर विश्वास कर सकते हैं. उन्होंने कहा दिलचस्प बात है कि लोग उन घटनाओं पर विश्वास करने लगते हैं जो उनके साथ कभी घटित ही नहीं हुई. यहां मुझे एक ख़ूबसूरत विरोधाभास दिखता है और ज़ाहिर है कि एक कलाकार होने के नाते इसमें मेरी दिलचस्पी है. एक अन्य शोधकर्ता के मुताबिक़ मानवीय मस्तिष्क की ग़लतियां कभी कभार उपयोगी भी हो सकती हैं. ब्रिटेन के एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में न्यूरोसाइंटिस्ट सर्जियो डेला साला इसे एक उदाहरण देकर समझाते हैं. कल्पना कीजिए कि आप एक जंगल में हैं और आप देखते हैं कि घास हिल रही है. इससे आप यह सोचकर वहां से भाग जाएंगे कि वहां बाघ छिपा हो सकता है. उन्होंने कहा कि एक कम्प्यूटर की नज़र से देखें तो 99 प्रतिशत संभावना यह है कि घास हवा के कारण हिल रही थी. लेकिन हम कम्प्यूटर की तरह सोचें तो बाघ हमें खा जाएगा. प्रोफ़ेसर डेला साला ने कहा बाघ से हमें बचाने के लिए दिमाग़ 99 ग़लतियां करने को तैयार है. ऐसा इसलिए क्योंकि दिमाग़ कम्प्यूटर नहीं है. यह बेतुके अनुमानों पर काम करता है. इसमें ग़लतियां करने की प्रवृत्ति होती है और यह जल्दबाज़ी में रहता है. उन्होंने कहा कि मिथ्या याददाश्त स्वस्थ मस्तिष्क की निशानी है. उन्होंने कहा वे याददाश्त प्रणाली के सहउत्पाद हैं जो अच्छी तरह काम करती है. इससे आप तेज़ी से अनुमान लगा सकते हैं. |
| DATE: 2013-10-01 |
| LABEL: science |
| [236] TITLE: ग्लोबल वॉर्मिंग की मार झेलता हिमालय |
| CONTENT: पर्यावरण पर एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में 1950 से लेकर अब तक 95 फ़ीसदी ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए इंसान ही ज़िम्मेदार है. स्टॉकहोम में पेश की गई इस रिपोर्ट में ख़बरदार किया गया है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से दुनिया के तापमान में और वृद्धि होगी. ये रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संघ की समीति ने तैयार की है. ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से दुनिया भर में ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं और ज़ाहिर है इस तरह का ख़तरा हिमालय के क्षेत्र में मौजूद ग्लैशियरों पर भी है. भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश में कम से कम अस्सी करोड़ लोग पानी के लिए इन्हीं ग्लेशियरों पर निर्भर करते हैं. हिमालय के दिलकश पहाड़ अब बढ़ते हुए प्रदूषण की क़ीमत चुका रहे हैं. प्रदूषण से वातावरण में गर्मी बढ़ी है और अब इसका असर साफ़ तौर पर नज़र आने लगा है. बाताल ग्लेशियर तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम है लेकिन वातावरण में बढ़ती हुई गर्मी का असर अगर ग्लेशियरों पर क़रीब से देखना हो तो कोई दूसरा तरीक़ा भी नहीं. सामने की पहाड़ी पर मौजूद बाताल ग्लेशियर अब तेज़ी से पिघल रहा है. सुनील डार इस ग्लेशियर में होने वाली तब्दीली का अध्ययन कर रहे हैं. डार ने कुछ इस तरह की जानकारियां हासिल की हैं जो किसी सैटेलाइट से नहीं देखी जा सकती हैं. वो कहते हैं “ये ग्लेशियर पिघल रहा है. यहां की चट्टानों को देख कर साफ पता चलता है कि पहले ग्लेशियर की बर्फ यहां तक फैली हुई थी. लेकिन अब ये पिघल गई है. मौसम में बदलाव से बर्फबारी बढ़ी है और इसके कारण कुछ क्षेत्रों में ग्लेशियरों में भी बढ़ोतरी हुई है. लेकिन ज़्यादातर इलाक़ों में ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से ग्लेशियर पिघल रहे हैं. बाताल ग्लेशियर भी इसी बदलती हुई वैश्विक तस्वीर का हिस्सा है. ये फ़िक्र की बात है क्योंकि इन्हीं ग्लेशियरों से बहुत सारे लोगों की पानी की ज़रूरतें पूरी होती हैं – खेती के लिए और ज़िन्दगी के लिए भी. हिमाचल के एक गांव में ये महिला कहती हैं “अगर हिमालय नहीं होगा तो हमारी सेब से चलने वाली ये जो रोजी रोटी है वो भी खत्म हो जाएगी. पास ही हिमाचल प्रदेश का मनाली शहर है. यहां के सेब पूरे भारत में मशहूर हैं. यहां के पानी की ज़रूरत भी ग्लैशियर्स से ही पूरी होती है. लेकिन अगर पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाने वाले गैसों के कारण गर्मी इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो ये ग्लेशियर कितने दिन बचे रहेंगे. पहले संयुक्त राष्ट्र की समीति का ख़्याल था कि ये अगले कुछ दशकों में समाप्त हो जाएंगे. लेकिन संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि ख़तरा अभी भी बना हुआ है और इनपर स्थानीय स्तर का प्रदूषण भी अहम रोल अदा कर रहा है. अमरीकी एजेंसी नासा के मुताबिक़ हिमालय पर धुंए के बादल जो अकसर दिखाई देते हैं वो स्थानीय प्रदूषण का ही नतीजा है. वाहनों से निकले वाला धुंए जंगल की आग और लकड़ी के चूल्हे से निकलने वाला धूंए जैसे प्रदूषण से भी ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार तेज़ हो रही है. भारत में 15 करोड़ से अधिक लोग इसी तरह के चूल्हों का इस्तेमाल करते हैं जिनमें ज्यादातर ग़रीब लोग शामिल हैं. क़रीब के एक घर में टिन के बने हुए चूल्हे का प्रयोग हो रहा है इसमें धुंआ 80 फ़ीसदी कम है लकड़ी भी दूसरे चूल्हें की तुलना में 50 प्रतिशत कम खर्च होती है. लेकिन इस बेहतर तकनीक वाले चूल्हे की क़ीमत ढ़ाई हज़ार रुपए हैं. ग्लेशियरों को बचाने की राह में ये एक छोटा सा क़दम है. मंजिल दूर है क्योंकि असल ख़तरा ग्रीन हाउस गैसों से है जो अब भी बढ़ रही हैं. |
| DATE: 2013-10-01 |
| LABEL: science |
| [237] TITLE: दोपहर की नींद से बढ़ती है बच्चों की याददाश्त |
| CONTENT: अमरीका में हुए एक अध्ययन के मुताबिक़ दोपहर में खाना खाने के बाद क़रीब एक घंटे की नींद लेने से बच्चों की याददाश्त बढ़ती है. शोधकर्ताओं ने पाया कि नींद लेने वाले तीन से पांच साल के बच्चों ने बेहतर तरीक़े से अपने पाठ याद किए. यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाच्युसेट्स के शोधकर्ताओं ने 40 बच्चों पर अध्ययन किया और अपनी रिपोर्ट नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ को भेजी. शोधकर्ताओं का कहना है कि अध्ययन में पाया गया कि दिमाग़ को मज़बूत बनाने और सीखने के लिए दोपहर की नींद बेहद अहम है. शोधकर्ताओं ने पाया कि खाना खाने के बाद आराम करने वाले बच्चों ने अपने टास्क को उन बच्चों की तुलना में बेहतर तरीके़ से पूरा किया जिन्होंने दोपहर में नींद नहीं ली थी. नींद लेने के बाद इन बच्चों ने न सोने वाले बच्चों की तुलना में 10 फीसदी अधिक बातें याद रखीं. इसी तरह शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में आए 14 अन्य बच्चों की क़रीब से निगरानी की. शोधकर्ताओं ने पाया कि नींद के दौरान दिमाग़ चलता रहता है. शोधकर्ताओं के मुताबिक दोपहर में सोने वाले बच्चों के दिमाग़ के सीखने और नई सूचना एकीकृत करने वाले हिस्से की गतिविधियां बढ़ जाती हैं. सीखने की प्रक्रिया की जांच करने वाली रेबेका स्पेंसर ने कहा निश्चित तौर पर प्री-स्कूल के बच्चों के लिए दोपहर की नींद की अहमियत के बारे में हमारा पहला शोध है. हमारे अध्ययन से पता चलता है कि छोटे बच्चे प्री-स्कूल में जो चीज़ें सीखते हैं उन्हें बेहतर तरीक़े से याद रखने में दोपहर की नींद मदद करती है. उन्होंने कहा कि छोटे बच्चों को दोपहर की नींद के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. रॉयल कॉलेज ऑफ पीडिएट्रिक्स एंड चाइल्ड हेल्थ के डॉक्टर रॉबर्ट स्कॉट जप ने कहा यह बात सालों से पता है कि झपकी से वयस्क लोगों की याददाश्त बेहतर होती है. मिसाल के लिए नाइट शिफ़्ट में काम करने वाले डॉक्टर. मगर अभी तक किसी ने यह चीज़ बच्चों में नहीं देखी थी. यह महत्वपूर्ण है क्योंकि नर्सरी स्कूल बच्चों की दोपहर की नींद को लेकर एकमत नहीं हैं. उन्होंने कहा एक बच्चे के दिमाग़ को बेहतर बनाने के लिए उसे हर रोज़ 10-13 घंटे की नींद की ज़रूरत होती है ताकि वह अपना दिमाग़ रिचार्ज कर सकें और अगले दिन की चुनौतियों से निपटने के लिए ख़ुद को तैयार कर सकें. |
| DATE: 2013-09-30 |
| LABEL: science |
| [238] TITLE: 'ग्लोबल वार्मिंग के लिए इंसान ज़िम्मेदार, वैज्ञानिकों को 95 फ़ीसदी यक़ीन' |
| CONTENT: एक ऐतिहासिक रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने दावा किया कि साल 1950 के बाद से वैश्विक तापमान में होने वाली वृद्धि के लिए मनुष्य सबसे प्रभावशाली कारण है. इस बारे में उन्हें 95 फीसदी यकीन हैं. संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन पर गठित दल की रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के मौजूद साक्ष्यों का ब्यौरा दिया गया है. रिपोर्ट में साफ़ किया गया है कि जमीन हवा और समुद्र में ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव स्पष्ट हैं. इसके अनुसार पिछले पंद्रह सालों में तापमान में वृद्धि पर में आया विराम इतना छोटा है कि इससे दीर्घकालिक असर पर बात नहीं की जा सकती. संयुक्त राष्ट्र पैनल ने चेतावनी दी है कि ग्रीन हाउस गैसों के निरंतर उत्सर्जन से वैश्विक तापमान में वृद्धि होगी जो मौसम प्रणाली के हर पहलू को बदल देगी. इन बदलावों को रोकने के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में निरंतर और पर्याप्त कमी लाने की जरूरत होगी. स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में दो सप्ताह के गहन विमर्श के बाद अंततः ग्लोबल वॉर्मिंग के विज्ञान के सार बिंदुओं को नीति निर्माताओं के लिए जारी किया गया. आईपीसीसी की तीन श्रृंखला वाली पहली रिपोर्ट को धरती के बढ़ते तापमान की वजहों को समझने के लिए सबसे विस्तृत और अहम दस्तावेज़ माना जा रहा है. छत्तीस पन्नों की यह विशद रिपोर्ट अगले 12 महीने में आएगी. रिपोर्ट बहुत साफ़गोई से कहती है कि 1950 से मौसम प्रणाली में देखे गए बहुत से बदलाव सहस्राब्दी के दशकों में अनोखे हैं. पिछले तीन दशक में से हर-एक में धरती का तापमान लगातार बढ़ा है. वर्ष 1850 के बाद से यह पहली बार हुआ है और संभवतः 1400 साल के इतिहास में यह सबसे गर्म है. रिपोर्ट तैयार करने वाले आईपीसीसी कार्यदल के संयुक्त-अध्यक्ष क़िन दाहे ने कहा इस विज्ञान के हमारे मूल्यांकन से पता चला है कि वायुमण्डल और समुद्र का तापमान बढ़ गया है हिमपात और बर्फ़ की मात्रा में कमी आ रही है समुद्र की सतह ऊंची हुई है और ग्रीन हाउस गैसों की सघनता में बढ़ोत्तरी हो रही है. कार्यदल के एक अन्य संयुक्त-अध्यक्ष प्रोफ़ेसर थॉमस स्टॉकर ने कहा कि जलवायुस परिवर्तन ने पारिस्थितिकी तंत्र और मनुष्य के दो प्रमुख स्रोतों ज़मीन और पानी के लिए चुनौती खड़ी कर दी है. संक्षेप में कहा जाए तो इससे हमारे ग्रह हमारे घर पर ख़तरा पैदा हो गया है. |
| DATE: 2013-09-30 |
| LABEL: science |
| [239] TITLE: डायटिंग नहीं, नींद घटाएगी मोटापा |
| CONTENT: मोटापा कम करने के लिए दुनिया भर के लोग डायटिंग और कसरत पर ध्यान देते हैं लेकिन वे रात की नींद पर ध्यान नहीं देते. जानकारों के मुताबिक़ रात में अच्छी नींद लेना काफ़ी ज़रूरी है. ब्रिटेन में मोटापा एक समस्या है और यहां लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए तमाम अभियान चल रहे हैं. कोशिश हो रही है कि लोग अपना भोजन नियंत्रित करें और जमकर वर्कआउट करें. मगर हाल में आई रिपोर्ट से पता चलता है कि इन तमाम कोशिशों का मोटापा कम करने पर कोई खास असर नहीं पड़ रहा है. कई अध्ययनों से पता चलता है कि बच्चों और वयस्कों दोनों में कम नींद और अधिक वज़न या मोटापे का गहरा संबंध है. यह केवल महज़ संयोग नहीं कि पिछले 40 साल में एक तरफ हमारी नींद की अवधि घटी है तो दूसरी तरफ मोटापे की समस्या बढ़ती गई है. फंक्शनल मैगनेटिक रेज़ोनैंस इमेजिंग एफएमआरआई के इस्तेमाल से पता चला है कि ख़राब नींद के कारण जटिल समस्याओं का समाधान करने वाले दिमाग़ के हिस्से पर असर पड़ता है और लोग अस्वस्थ भोजन की ओर आकर्षित होते हैं. ख़राब नींद के कारण भूख महसूस कराने वाले हार्मोन के स्तर में भी बदलाव होता है. इससे लेप्टिन यह पेट भरने और खाने की मात्रा को नियंत्रित करता है के स्तर में कमी और ग्रेलिन भूख चर्बी और मोटापे को बढ़ावा देते हैं का स्तर बढ़ जाता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इस कारण भूख में 24 फीसदी खाने की इच्छा में 23 फीसदी और मोटे होने की इच्छा में 33 फीसदी की वृद्धि हो जाती है. ऐसे में कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन करने से इंसान को लगता है कि उन्होंने ज़रूरी भोजन कर लिया है. इस तरह से इंसान को ज़्यादा खाना खाने के लिए प्रोत्साहन मिलता है. कम नींद के कारण भी इंसान खाना खाने के बाद हर समय कुछ खाने की मांग करता है. इस तरह वह ज्यादा जंक फूड खाने लगता है और इस तरह वह पर्याप्त मात्रा में सब्जियां नहीं खा पाता. हालांकि सीधी बात यह है कि जब आप कम सोते हैं तो आपकी इच्छा जंक फूड खाने की होती है लेकिन जब आपने भरपूर नींद ली है तो आपकी इच्छा सेब या केक खाने की होगी और इसका सीधा असर आपकी सेहत पर पड़ेगा. |
| DATE: 2013-09-29 |
| LABEL: science |
| [240] TITLE: इंटरनेट पर क्या है भाषाओं का भविष्य? |
| CONTENT: क्या इंटरनेट कभी भी अँगरेज़ी के अलावा किसी दूसरी भाषा के लिए उतना ही सहज हो पाएगा बीबीसी की विशेष शृंखला डिजिटल इंडियंस शृंखला के अंतिम गूगल हैंगआउट में जो चर्चा हुई उसका एक पहलू ये भी था. गूगल के लिए सर्च का मतलब हर भाषा में सर्च है. मगर इसमें भारतीय भाषाएँ ख़ास तौर पर चुनौती पेश करती हैं क्योंकि उन भाषाओं में अभी कुल सामग्री बहुत कम है. इसलिए सबसे पहले ज़रूरी है कि उस भाषा में इंटरनेट पर सामग्री उपलब्ध कराई जाए. मगर हाँ हमने अनुवाद के मामले में काफ़ी प्रगति की है और जैसे-जैसे हम उसमें बेहतर होते जाएँगे वैसे-वैसे ये अन्य भाषाओं के लिए भी बेहतर होगा. किसी भी भाषा में भारत में ही सबसे कम सामग्री लिखित में उपलब्ध है जबकि अगर आप ये देखेंगे कि वो भाषा बोलने वाले कितने हैं तो पाएँगे कि वह संख्या काफ़ी बड़ी है. वैसे हमारा काम सिर्फ़ अनुवाद ही नहीं है. हमारे पास हिंदी सर्च की सुविधा उपलब्ध है और आप जो खोजना चाहते हैं उसे हिंदी में कैसे खोजें उसके भी कई विकल्प हैं. मगर हिंदी में या दूसरी भाषाओं में इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री काफ़ी कम है. इसलिए ज़्यादा सूचनाएँ मिलती नहीं हैं. मनोरमा ग्रुप में हमने अपनी भाषा में 1997 में काम शुरू किया और उस समय हमारे पास एक फ़ॉन्ट भी नहीं था जो वेब पर ठीक ढंग से काम कर पाता. हमारे पास तो यूनिकोड वाला फ़ॉन्ट अब आया है और वो भी इतना अच्छा नहीं है. उसके अक्षर ठीक ढंग से नहीं दिखते और सर्च भी अच्छा नहीं है. कुल मिलाकर समस्याएँ काफ़ी हैं. इसलिए भाषा को लेकर एक बड़ी चुनौती है और इस पर बड़ी-बड़ी टेक्नॉलॉजी कंपनियाँ अभी तक काम नहीं कर रही हैं. फिर वो चाहे सर्च का मसला हो या एक अच्छा यूनिकोड वाला फ़ॉन्ट हो या फिर मोबाइल और टैबलेट पर सामग्री कैसी दिखेगी ये मसला हो. हर चीज़ एक मुश्किल खड़ी करती है. हमने लगभग 10 साल पहले शादी से जुड़ी अपनी वेबसाइट जीवनसाथी शुरू की. हमने दो साल तक वो वेबसाइट चलाने के बाद महसूस किया कि वहाँ ज़्यादा लोग आ ही नहीं रहे थे. फिर हमने सोचा कि शायद भारत में होने के लिए ज़रूरी है कि अँगरेज़ी में साइट बनाई जाए. तब हमने वो कोशिश दो साल बाद बंद कर दी. शायद अब समय आ गया है कि एक बार फिर कोशिश की जाए शायद वो काफ़ी शुरुआती समय था. इसलिए हम एक बार फिर कोशिश करेंगे भारतीय भाषाओं को लेकर और देखेंगे कि क्या होता है. मगर जब तक समुचित सामग्री नहीं मिलती है और स्थानीय भाषाओं में ऐप नहीं बनते हैं आपको नेट पर ऐसे लोग नहीं मिलेंगे जो सिर्फ़ भारतीय भाषाओं में ही काम कर रहे हों. फ़िलहाल तो उनमें से अधिकतर अँगरेज़ी भाषी ही होंगे. मुझे लगता है कि भारत में भाषाओं के क्षेत्र में बढ़त के काफ़ी अवसर हैं. भले ही आम तौर पर ये माना जाता हो कि भारत में अख़बारों का बाज़ार बढ़ रहा है मगर असली बढ़त दरअसल भाषाई क्षेत्रों में होगी. मुझे नहीं लगता कि असल समस्या पिछली सामग्री को इंटरनेट पर डालने की है ताकि ऐप बनाने वालों को उस भाषा में काफ़ी सामग्री मिल जाए. दरअसल भाषा के क्षेत्र में आगे कितना काम होगा ये उस पर निर्भर होगा. भारत में ऐसे किसी भी मीडिया बिज़नेस के बारे में सोचना मुश्किल होगा जो हिंदी गुजराती या किसी दक्षिण भारतीय भाषा में काम न कर रहा हो. हमने तो 20 भाषाओं में वीडियो बनाए हैं जिनमें से कई तो स्थानीय आदिवासियों की भाषाओं में हैं. ख़ास बात ये है कि भले ही हमारे वीडियो की संख्या अभी कम हो उन्हीं 2600 वीडियो को लगभग 10 लाख बार देखा जा चुका है. वे काफ़ी अलग हैं स्थानीय भाषा में वीडियो हैं जिनमें खेती के कई तरीक़ों के बारे में बताया गया है. |
| DATE: 2013-09-28 |
| LABEL: science |
| [241] TITLE: आकार बदलने से बदला चॉकलेट का स्वाद? |
| CONTENT: चॉकलेट पसंद करने वालों का कहना है कि जबसे डेयरी मिल्क के आकार में बदलाव आया है तबसे इसका स्वाद भी बदल गया है. जबकि चॉकलेट निर्माता कंपनी कैडबरी का कहना है कि ऐसा नहीं है इसकी रेसिपी में कोई अंतर नहीं है. क्या वाकई चॉकलेट के आकार में बदलाव ने इसका स्वाद भी बदल डाला हैकंपनी के पिछले साल चॉकलेट का आकार बदलने के बाद से कई प्रतिक्रियाएं सामने आ रही है. कंपनी ने चॉकलेट का आकार बदल कर टेढ़ा कर दिया है. यही नहीं ये मसला बहस का मुद्दा बन गया है. यहां तक कि इंटरनेट पर कुछ चॉकलेट प्रेमियों का कहना है कि चॉकलेट का स्वाद अपेक्षाकृत तैलीय और सिल्की हो गया है. जबकि कैडबरी का ऐसी किसी संभावना से इनकार करते हुए कहना है कि रेसिपी में कोई बदलाव नहीं किया गया है केवल आकार में ही अंतर है. कंपनी के प्रवक्ता टोनी बिल्सबोर्ग का कहना है यह बदलाव निसंदेह चॉकलेट के मुंह में ही घुल जाने के बेहतर अनुभव में सहायक है और उपभोक्ताओं से काफी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं. दूसरी ओर वैज्ञानिकों चॉकलेट निर्माताओं और रसोइयों का कहना है कि निश्चित रूप से आकार यह तय करता है कि चॉकलेट आपके मुंह में कितनी तेजी से घुलती है. यह जीभ और नाक पर महसूस किए जा सकने वाले विभिन्न प्रकार के खाद्य कणों की क्रम और गति को तय करते हैं. चूंकि डेयरी मिल्क ने इसके आकार में बदलाव किया है तो यह मुंह में अलग तरह से घुलेगी. इससे चॉकलेट के स्वाद में अंतर होना स्वाभाविक है. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ द सेंसेस के सह-निदेशक और संस्थापक प्रोफेसर बैरी सी स्मिथ के अनुसार जिस गति से चॉकलेट कठोर से नरम अवस्था में तोड़ी जाती है उससे इसका स्वाद तय होता है. नए आकार का मतलब हो सकता है कि चॉकलेट तेज़ी से घुले क्योंकि यह मुंह में तेज़ी से पिघलती है. इससे चॉकलेट के स्वाद में बदलाव होगा. दूसरी ओर नेस्ले के वैज्ञानिकों ने हाल ही अपने एक अध्ययन में पाया कि चॉकलेट के आकार का इसकी बनावट और स्वाद पर असर पड़ता है. जहां तक चॉकलेट के मुंह में पिघलने और नरम महसूस होने का सवाल है गोल आकार की चॉकलेट श्रेष्ठ मानी जाती हैं. ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी में फूड साइंस और मॉलीक्यूलर गैस्ट्रोनोमी के विशेषज्ञ प्रोफेसर पीटर बरहम ने कहा कि अगर एक चॉकलेट का आकार फैला हुआ होता है तो इसके कण तेज़ी से महसूस किए जा सकते हैं. उनका कहना है स्वाद के बारे में यह नज़रिया है कि इस पर कई चीज़ों का असर होता है. इसमें से आकार भी एक है. |
| DATE: 2013-09-26 |
| LABEL: science |
| [242] TITLE: असमय जन्मे बच्चों का इलाज 'शुगर जेल' से |
| CONTENT: वैज्ञानिकों का कहना है कि गाढ़े तरल रूप में शक्कर का प्रयोग समय से पहले जन्मे बच्चों को मानसिक विकारों से बचा सकता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर असमय जन्मे नवजात बच्चों के गाल के अंदरूनी हिस्से पर जेल रूप में शक्कर मली जाए तो यह उनमें मस्तिष्क संबंधी विकारों की रोकथाम का असरदार और सस्ता साधन साबित हो सकता है. ख़ून में शुगर का ख़तरनाक स्तर तक कम होना समय पूर्व जन्मे हर 10 में से 1 बच्चे को प्रभावित करता है. इसका इलाज ना होने पर ये बच्चे को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है. न्यूज़ीलैंड के शोधकर्ताओं ने इस जेल थेरेपी का इस्तेमाल 242 बच्चों पर किया और इसके नतीजे के आधार पर कहा जा रहा है कि यह सबसे पहले अपनाया जाने वाला उपाय होना चाहिए. शोधकर्ताओं का अध्ययन द लैंसेट में प्रकाशित हुआ है. ऑकलैंड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेन हार्डिंग और उनकी टीम का कहना है कि डेक्सट्रॉस जेल से किया जाने वाला इलाज काफ़ी सस्ता पड़ता है तकरीबन 1 पाउंड प्रतिदिन. साथ ही ड्रिप से दिए जाने वाले ग्लूकोज़ के बजाय इसका इस्तेमाल आसान है. वर्तमान में जो इलाज किया जाता है उसमें अतिरिक्त ख़ुराक औऱ शुगर स्तर का पता लगाने के लिए ख़ून की बार बार जांच करना शामिल है. हालांकि हाइपोग्लाइकेमिया से जूझ रहे बच्चों को सघन चिकित्सा में रखा जाता है और उन्हें नसों के ज़रिए ग्लूकोज़ दिया जाता है क्योंकि उनका शुगर स्तर लगातार कम बना रहता है. ये अध्ययन इस बात का मूल्यांकन करता है कि क्या हाइपोग्लाइकेमिया से निपटने के लिए डेक्सट्रॉस जेल का इस्तेमाल ज़्यादा असरदार साबित हो सकता है. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के महिला स्वास्थ्य संस्थान के नील मार्लो का कहना है कि डेक्सट्रॉस जेल का इस्तेमाल बंद हो चुका है लेकिन इन खोजों से पता चलता है कि इसे इलाज के लिए दोबारा इस्तेमाल किया जाना चाहिए. इस बात के काफ़ी बेहतर सुबूत हैं कि ये बेहद क़ीमती है. समय पूर्व जन्मे बच्चों के हितार्थ काम करने वाली संस्था ब्लिस के मुख्य कार्यकारी ऐंडी कोल कहते हैं कि यह नया शोध काफ़ी दिलचस्प है. हम हमेशा ऐसी हर चीज़ का स्वागत करने के लिए तैयार रहते हैं जो असमय जन्मे या बीमार बच्चों से संबंध रखती है. यह एक सस्ता इलाज है और आईसीयू में जाने वाले बच्चों की संख्या कम कर सकता है जो पहले से ही बहुत ज़्यादा इलाज कर रहे हैं. हालांकि शोध के शुरूआती नतीजे कम शुगर स्तर के साथ जन्मे बच्चों के लिए फ़ायदेमंद साबित हुए हैं लेकिन ये साफ़ है कि इस इलाज को हक़ीक़त में अपनाने के लिए अभी और शोध करना होगा. |
| DATE: 2013-09-26 |
| LABEL: science |
| [243] TITLE: गहरी नींद में होगा डर से सामना |
| CONTENT: अमरीकी शोधकर्ताओं का कहना है कि नींद में कुछ ख़ास गंध का इस्तेमाल करके किसी व्यक्ति के डर को दूर किया जा सकता है. इसके लिए लोगों को गंध और डर से संबंधित दो छवियों से जुड़ाव स्थापित करने के लिए प्रशिक्षित किया गया. नींद के दौरान उन्हें एक छवि से संबंधित गंध सुंघाई गई और जब वो उठे तो वो उस गंध से संबंधित छवि से कम भयभीत थे. ब्रिटेन के एक विशेषज्ञ ने इस अध्ययन की प्रशंसा करते हुए कहा है कि इससे डर का इलाज करने में मदद मिलेगी और शायद यह पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर पीटीएसडी में भी लाभप्रद हो. पीटीएसडी में यौन दुर्व्यवहार गंभीर चोट और हत्या की धमकी जैसी घटनाएं शामिल हैं. आमतौर पर ऐसे लोगों का इलाज जागते हुए किया जाता है. इस दौरान विशेषज्ञों की निगरानी में उनसे उनके डर का सामना कराया जाता है. यह अध्ययन बताता है कि ये इलाज गहरी नींद में भी किया जा सकता है. इस अवस्था में भावनात्मक स्मृति को बदलने के बारे में चिंतन किया जाता है. शोधकर्ताओं ने 15 स्वस्थ लोगों को दो अलग-अलग चेहरों की तस्वीरें दिखाईं. उसी समय उन्हें हल्का इलेक्ट्रिक शॉक दिया गया. साथ ही उन्हें नींबू पुदीना लौंग या चंदन जैसी कोई खास गंध सुँघाई गई. इसके बाद उन्हें एक शयन प्रयोगशाला में ले जाया गया. जब वो गहरी नींद में आ गए तो उन्हें दिखाए गए एक चेहरे से संबंधित गंध सुँघाई गई. इसके बाद जब वो जागे तो उन्हें बिना किसी गंध या झटके के दोनों चेहरे दिखाए गए. उन्होंने उस चेहरे से कम डर महसूस किया जिससे संबंधित गंध उन्हें सोने के दौरान सुँघाई गई थी. लोग आम तौर पर पांच मिनट से 40 मिनट तक गहरी नींद लेते हैं और इस प्रयोग का असर उन लोगों में अधिक देखा गया जिन्होंने अधिक समय तक गहरी नींद ली. इस अध्ययन की अगुवाई कर रही शिकागो स्थित नार्थवेस्टर्न यूनीवर्सिटी फ़ीनबर्ग स्कूल ऑफ़ मेडिसिन की कैथरीना हॉनर ने कहा यह एक अद्भुत खोज है. हमने पाया कि डर में थोड़ी लेकिन महत्वपूर्ण कमी हुई. उन्होंने कहा बड़ी बात ये है कि अगर पहले से मौजूद डर पर इसका इस्तेमाल किया जाए तो शायद नींद के दौरान डर का इलाज बेहतर ढंग से किया जा सकेगा. |
| DATE: 2013-09-25 |
| LABEL: science |
| [244] TITLE: दुनिया में एचआईवी संक्रमण के मामलों में 'भारी कमी' |
| CONTENT: संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक एचआईवी संक्रमण और एड्स से जुड़ी मौतों में नाटकीय रुप से कमी आई है. यूनएड्स संस्था के अनुसार साल 2005 में 23 लाख मौतों की तुलना में पिछले साल इस कारण से होने वाली मौतों की संख्या 16 लाख रह गई थी. साथ ही पिछले साल तक एचआईवी संक्रमण के नए मामले 23 लाख रह गए जो साल 2001 की कुल संख्या का एक तिहाई था. बच्चों में इन मामलों में और भी भारी कमी रही. साल 2001 में नए संक्रमण के पांच लाख से ज़्यादा मामले थे. लेकिन साल 2012 तक ये संख्या आधी रह गई थी ढाई लाख से कुछ ज़्यादा. संयुक्त राष्ट्र के जांचकर्ताओं के मुताबिक बच्चों में मृत्यु दर और संक्रमण दर में कमी की वजह एंटीरेट्रोवायरल दवाइयों तक बेहतर पहुंच थी जिनसे एचआईवी वायरस को दबाने में मदद मिलती है. इलाज के बिना एचआईवी संक्रमित लोगों को एड्स हो जाता है जिससे साधारण संक्रमण भी घातक हो जाते हैं. रिपोर्ट कहती है कि साल 2012 के अंत तक दक्षिण अफ़्रीका युगांडा और भारत समेत कई निम्न और मध्य आय वाले देशों में लगभग एक करोड़ लोगों को एंटीरेट्रोवायरल इलाज का फ़ायदा मिल रहा था. इस इलाज की बेहतर पहुंच की वजह समुदायों को सस्ती और आसानी से दवाओं का मिलना और ज़्यादा लोगों का मदद के लिए आगे आना बताया गया है. यूएनएड्स के मुताबिक साल 2015 तक एड्स महामारी को रोकने और उलटने के उसके मिलेनियम डेवलपमेंट लक्ष्यों की तरफ़ दुनिया धीरे-धीरे बढ़ रही है. लेकिन संस्था का कहना है साल 2015 तक एचआईवी का इलाज एक करोड़ 50 लाख लोगों तक पहुंचाने के उसके लक्ष्य से ज़्यादा लोगों को इलाज की सुविधा मिल सकती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अपनी दिशानिर्देश को बदल दिया है जिसके तहत और भी लोग इलाज के लिए योग्य होंगे. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में ये बात भी सामने आई है कि जिन लोगों में संक्रमण का सबसे ज़्यादा ख़तरा है उन्हें एचआईवी सेवाएं मुहैया करवाने का काम धीमी गति से हो रहा है. साथ ही रिपोर्ट में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ़ यौन हिंसा से निपटने के लिए और काम करने की ज़रूरत की बात कही गई है. महिलाएं और बच्चियां उस वर्ग में आती हैं जिन्हें संक्रमण होने का ख़तरा ज़्यादा होता है. डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स संस्था की स्वास्थ्य नीति के सलाहकार बेव कॉलिंस का कहना है लाखों लोगों ख़ासकर विकासशील देशों में लोगों को सस्ते दामों पर एचआईवी का इलाज मुहैया करवाने की दिशा में काफ़ी प्रगति हुई है. लेकिन ये आराम से बैठने का समय नहीं है. हमें इलाज के लिए बेहतर योजनाओं सस्ते और बिल्कुल सही परीक्षण और सेवाओं को जारी रखना होगा. |
| DATE: 2013-09-25 |
| LABEL: science |
| [245] TITLE: मोबाइल ऐप सुधार रहा है मौत के आंकड़े |
| CONTENT: इंसानी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण क्षण जन्म और मृत्यु हैं. लेकिन दुनिया भर में होने वाली मौतों में से दो तिहाई का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता. कई देशों में नागरिकों का रिकॉर्ड रखने वाला प्रणाली की पहुंच इतनी कम है कि बहुत सी मौतों का पता ही नहीं चलता. यह पता न चलने पर कि कौन मर गया है और उसकी मृत्यु किस वजह से हुई किसी भी देश की सेहत के बारे में कोई तस्वीर बनाना असंभव हो जाता है. लेकिन क्या इस समस्या का हल एक मोबाइल ऐप हो सकता है विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल ऐप के रूप में नई तकनीक इस परिदृश्य पर ख़ासा असर छोड़ सकती है. मौखिक शव-परीक्षा वर्बल ऑटोप्सी नाम के नए मोबाइल ऐप के साथ कार्यकर्ता मरने वाले के घर जाकर उसकी मृत्यु की परिस्थितियों के बारे में जानकारी लेते हैं. ऐसी जगहों से जहां अब तक पहुंचना भी आसान नहीं रहा था डिजिटल तरीके से सूचनाएं जुटाए जाने से दुनिया भर मौतों के बारे में हमारी समझ बेहतर हो सकती है. मलावी में स्वास्थ्य केंद्र के बाहर होने वाली किसी भी मृत्यु का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में एक शोधकर्ता डॉक्टर कैरिना किंग मलावा के एक ज़िले शिंजी में मोबाइल फ़ोन से शव-परीक्षा के क्रियान्वयन पर नज़र रख रही हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया हमें लोग आश्चर्यजनक रूप से सहज लगे. मुझे लगता है कि जब हम उनका साक्षात्कार लेते हैं तो उन्हें मोबाइल फ़ोन ख़ासे रुचिककर लगते हैं. मौखिक शव-परीक्षा करीब 20 साल से इस्तेमाल की जा रही है लेकिन परंपरागत रूप से जानकारी कागज पर तैयार प्रश्नावली में ही दर्ज की जाती है. अक्सर काफ़ी लंबे इन प्रश्नावलियों के जवाबों को विश्लेषण बाद में दो डॉक्टर अध्ययन करते हैं और मौत की वजह जानने की कोशिश करते हैं. हालांकि यह काफ़ी लंबा काम है और इसका मतलब यह होता है कि बहुत से प्रश्नावलियां बिना पढ़े ही धूल खाती रहती हैं. डॉक्टर किंग कहते हैं मोबाइल फ़ोन बहुत बेहतर रहे हैं क्योंकि इसका मतलब यह है कि हमें बहुत से फ़ॉर्म नहीं भरने पड़ते हैं. आंकड़ों तक हमारी पहुंच बहुत तेजी से होती है और हम जल्द ही उनका विश्लेषण कर मौत के कारणों की वजह पता कर सकते हैं. मिवा नाम के इस फ़ोन सॉफ़्टवेयर में बहुत से सवालों की श्रृंखला होती है जिससे प्रशिक्षित कार्यकर्ता परिवार से जानकारी हासिल करने के लिए इस्तेमाल करता है. हर सवाल के एक बहुत से संभावित जवाब होते हैं और सॉफ़्टवेयर जवाब के आधार पर बुद्धिमत्ता से अगले सवाल को टाल देता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे बहुत जल्दी ही मौत की संभावित वजह जानने के लिए तैयार किया गया है. इसके परिणाम फ़ोन में जमा हो जाते हैं और इन्हें केंद्रीय डाटावेस में टेक्स्ट मैसेज या इंटरनेट से अपलोड कर भेजा जा सकता है. सिटी यूनिवर्सिटी लंदन के डॉक्टर जोन बर्ड सॉफ़्टवेयर तैयार करने वाली टीम में शामिल थे. वह कहते हैं कि मोबाइल फ़ोन डाटा एकत्र करने के लिए ख़ासी सहूलियत देते हं. उन्होंने बीबीसी को बताया मोबाइल फ़ोन संभवतः दुनिया में सबसे प्रचलित तकनीक है. यह सस्ते हैं मज़बूत हैं और हर कोई जानता है कि इन्हें इस्तेमाल कैसे करना है. मलावी में मोबाइल फ़ोन से शव-परीक्षा को अभी बच्चों की मृत्यु की वजह जानने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. स्थानीय चिशेवा भाषा में इस प्रोजेक्ट का नाम है माई म्वाना यानि कि मां और बच्चा. इसमें उन बच्चों पर ध्यान केंद्रित है जिनकी मृत्यु उनके पांचवें जन्मदिन से पहले हो गई है. विश्व बैंक के 2012 के आंकड़ों के अनुसार मलावी में पांच साल से कम के बच्चों की मृत्युदर हर 1000 में 71 है. इसके मुकाबले ब्रिटेन में यह दर प्रति 1000 में पांच ही है. लज़ारो साइप्रियानो शिंजी ज़िले के ज़ांग्वा गांव में अपनी बीवी माग्दालेना और अपने नवजात बच्चे के साथ रहते हैं. उनके दो बच्चों की मृत्यु हो चुकी है. उनके दूसरे बच्चे की मृत्यु करीब एक साल पहले तेज़ बुखार के चलते अस्पताल के कई चक्कर लगाने के बाद भी हो गई थी. मौखिक शव-परीक्षा के लिए उसी से बात की जाएगी. शहरी क्षेत्र के बाहर सबसे बड़ी दिक्कत यही पता लगाने की है कि कोई मौत हुई कब थी. इसलिए क्षेत्र में काम कर रहे कार्यकर्ता माई म्वाना दल को यह बताने की ज़िम्मेदारी लेते हैं कि इलाके में किसकी मृत्यु हुई है. इसी तरह से लज़ाज़ो के परिवार का पता चला था. अब उनके पास यह बताने का मौका है कि उनके बेटे एनडी की मौत कैसे हुई थी और इस जानकारी को रिकॉर्ड किया जाएगा. प्रभावित परिवार का साक्षात्कार लेना एक बेहद संवेदनशील और कौशल वाला काम है. क्षेत्र में काम करने वाले कार्यकर्ता निकोलस म्बवाना कहते हैं कि मोबाइल फ़ोन ने इसे काफ़ी आसान बना दिया है. वह कहते हैं हम घर में जाते हैं और मृत्यु की वजह पूछते हैं- दरअसल हुआ क्या था. इसके अलसावा हम जीपीएस लोकेशन को भी रिकॉर्ड करते हैं ताकि भविष्य मे उस घर को ढूंढा जा सके. डॉक्टर किंग के अनुसार यह प्रणाली इस परिजोना की सफ़लता का आधार है. वह कहते हैं जीपीएस से हमें ज़िले के हर घर की स्थिति पता चल जाती है. इसलिए हम बाकायदा एक नक्शा बना सकते हैं कि कहां लोग किस वजह से मर रहे हैं. इसका मतलब यह हुआ कि हम विशेष कारणों के लिए विशेष कार्यक्रम बना सकते हैं. मोबाइल फ़ोन शव-परीक्षा इस समय सीमित स्तर पर इस्तेमाल की जा रहबी है लेकिन दीर्घकाल में इस तकनीक को वृहद स्तर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. डॉक्टर बर्ड कहती हैं इस प्रणाली की खास बात यह है कि मानकीकृत है और इसका किसी भी भाषा में अनुवाद किया जा सकता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ इस कोशिश का समर्थन कर रहा है और ब्रिटेन से स्वीडन तक कई संस्थाओं के साथ इस तकनीक क और विकसित करने पर काम कर रहा है. इसके आंकड़ों को अभी कई डाटाबेस में एकत्र किया जा रहा है जहां से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर काम करने वाले लोग इसे हासिल कर सकते हैं. अभी यह संभव है कि सरकारी आंकड़ों से लाखों मौतों का पता न चले लेकिन मोबाइल पर रिकॉर्ड की गई मौखिक शव-परीक्षा इस समस्या को हल करने की दिशी में छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम हैं. |
| DATE: 2013-09-24 |
| LABEL: science |
| [246] TITLE: त्वचा रोगों की दवा से डायबिटीज़ का इलाज? |
| CONTENT: अमरीका में हुए एक शोध में पाया गया है कि त्वचा रोगों के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली एक दवा का इस्तेमाल टाइप-वन डायबिटीज़ या मधुमेह के इलाज में किया जा सकता है. एक छोटे से परीक्षण में पता चला कि अलफेसेप्ट नाम की ये दवा शरीर में इंसुलिन पैदा करती है जो कि टाइप-वन डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए बहुत ज़रूरी होता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि ये दवा अन्य इलाजों से बेहतर साबित हो सकती है क्योंकि ये प्रतिरक्षा तंत्र की रक्षा करती है. लेकिन इसके लिए अभी और अधिक शोध करने की ज़रूरत है. इस शोध के नतीजे द लैंसेट डायबिटीज़ एंड एंडोक्रायनोलॉजी नाम की विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं. बाज़ार में एमिवाइव के नाम से बिकने वाली अलफेसेप्ट का इस्तेमाल अमरीका में साल 2011 से पहले तक त्वचा रोगों के इलाज में किया जाता था. लेकिन साल 2011 में इस दवा को उसके निर्माताओं ने बाज़ार से वापस ले लिया. इस दवा को यूरोपीय बाज़ारों के लिए कभी मंज़ूरी नहीं मिली. सोरायसिस टाइप-वन डायबिटीज़ की तरह की एक बीमारी है ये तब होती है जह प्रतिरक्षा तंत्र स्वस्थ त्वचा कोशिकाओं पर हमला करता है. चिकित्सकीय परीक्षण में पता चला कि सोरायसिस की दवा एक ख़ास तरह की टी कोशिकाओं पर हमला करती है ये टाइप-वन डायबिटीज़ में इंसुलिन का निर्माण करने वाली कोशिकाओं पर भी हमला करती है. इस शोध को अमरीका के इंडियानापोलिस के इंडियाना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किया. उन्होंने ये देखना तय किया कि क्या इसका प्रभाव उस व्यक्ति पर भी पड़ता है जिसका हाल ही में टाइप-वन डायबिटीज़ का इलाज हुआ है. परीक्षण में 33 मरीजों को लगातार 12 हफ्तों तक अलफेसेप्ट की सुई लगाई गई 12 हफ़्ते बाद फिर यही प्रक्रिया अपनाई गई. वहीं 16 अन्य मरीज़ों को इसी तरह से नकली सुई लगाई गई. प्रयोग में शोधकर्ताओं ने पाया कि किस तरह खाना खाने के दो घंटे बाद पैंक्रियाज़ से इंसुलिन के उत्पादन में किसी तरह का अंतर नज़र नहीं आया. लेकिन दो समूहों में खाने के चार घंटे बाद उन्हें महत्वपूर्ण अंतर दिखा. इस दौरान पता चला कि जिस समूह ने दवा ली थी वह इंसुलिन की रक्षा करने में सक्षम है जबकि प्रायोगिक दवा लेने वालों के इंसुलिन के स्तर में गिरावट देखी गई. एक साल बाद उसी समूह के इंसुलिन के प्रयोग में कोई महत्वपूर्ण बढ़ोतरी नहीं दर्ज की गई. लेकिन प्रायोगिक दवा लेने वालों में ऐसा देखा गया. पहले समूह के खून में कुछ समय के लिए शुगर का स्तर कम यानी हाइपोग्लाइसीमिया का लक्षण देखा गया. टाइप-वन डायबिटीज़ वालों में हाइपोग्लाइसीमिया एक आम बात है. अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता और इंडियाना विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर रिग्बी कहते हैं कि इस परीक्षण के पहले 12 महीने काफी उत्साहजनक थे. उन्होंने कहा कि परीक्षण से पता चलता है कि इलाज के 12 महीने बाद भी अलफेसेप्ट पैंक्रियाज कोशिकाओं के कामकाज की रक्षा कर सकता है. उन्होंने कहा कि परीक्षण के शुरुआती नतीजों का मतलब है कि भविष्य में इस दवा का उपयोग टाइप-वन डायबिटीज़ को स्थिर करता है और उसे बढ़ने से रोकता है. लेकिन इसका इलाज नहीं किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि यह परीक्षण आगे भी जारी रहेगा और 18 और 24 महीने बाद फिर माप लिए जाएंगे. येल विश्वविद्यालय के डॉक्टर केवान हेराल्ड कहते हैं इस छोटी सफलता को रेखांकित करना महत्वपूर्ण है. लेकिन जब इसे कैंसर और संक्रामक रोगों के साथ मिलाया जाएगा तो इन छोटी उपलब्धियों का और अधिक महत्व होगा. टाइप-वन डायबिटीज के लिए काम करने वाले जेडीआरएफ़ के मुख्य कार्यकारी कैरेन एडिंग्टन ने कहा कि शोध के नतीजे आशाजनक है. उन्होंने कहा अध्ययन के नतीजे भविष्य में होने वाले शोध के लिए महत्वपूर्ण हैं. इस तरह के छोटे क़दम भविष्य नें टाइप-वन डायबिटीज़ से मुक्त दुनिया की ओर ले जाएंगे. ये एक चुनौतीपूर्ण और जटिल स्थिति है. लेकिन एक दिन टाइप-वन डायबिटीज का इलाज संभव होगा. ये केवल समय पैसे और अच्छे शोधों की बात है. |
| DATE: 2013-09-24 |
| LABEL: science |
| [247] TITLE: अब बिल्लियों से नहीं डरेंगे चूहे |
| CONTENT: वैसे तो चूहे और बिल्ली के बारे में तमाम तरह की कहावतें प्रचलित हैं लेकिन वैज्ञानिकों की मानें तो भविष्य में ये कहावतें बदल सकती हैं. दरअसल शोधकर्ताओं ने एक ऐसे सूक्ष्म परजीवी की पहचान की है जिससे चूहों के संक्रमित होने पर उनमें बिल्लियों को लेकर व्याप्त भय खत्म हो जाएगा. वैज्ञानिकों ने इस एकल सेल वाले परजीवी को टॉक्सोप्लाज़्मा गोंडी नाम दिया है. शोधकर्ताओं ने प्लॉस वन नामक पत्रिका में छपी शोध रिपोर्ट में कहा है कि इस परजीवी के कारण चूहों के दिमाग़ में स्थायी बदलाव आ सकता है. बर्केले स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के वेंडी इनग्राम और उनके साथियों ने बॉबकैट यूरीन के प्रति चूहे की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया. पश्चिमी देशों में चूहे भगाने के लिए जंगली बिल्ली के पेशाब जिसे बॉबकैट यूरीन कहा जाता है का छिड़काव किया जाता है. शोधकर्ताओं ने पाया कि परजीवी के कारण चूहे बेधड़क उन जगहों में घुस गए जहां बॉबकैट यूरीन का छिड़काव किया गया था. साथ ही जिन चूहों पर इस परजीवी का कोई असर नहीं था वे उस जगह नहीं गए जहां बॉबकैट यूरीन का छिड़काव किया गया था. इस पर इनग्राम ने कहा यह बेहद अहम है कि जब परजीवी के संक्रमण से चूहे के शरीर को पूरी तरह या आंशिक तौर से मुक्त किया गया तो भी उनका व्यवहार नहीं बदला. उन्होंने कहा कि इसका सीधा मतलब यह है कि एक बार इस परजीवी से संक्रमित होने के बाद चूहे के दिमाग़ में स्थायी बदलाव आ जाता है. चूहों और गिलहरी जैसे कुतरने वाले जानवरों में यह संक्रमण आमतौर पर बिल्लियों के मल के संपर्क में आने से होता है. इसके बाद यह परजीवी ख़ुद शरीर के हर अंग विशेषकर दिमाग़ पर असर डालने लगता है. यह संक्रमण इंसानों में भी फैल सकता है. हाल के एक अनुमान के मुताबिक ब्रिटेन में हर साल तीन लाख 50 हज़ार लोग टॉक्सोप्लाज़्मोसिस के संपर्क में आए. इस कारण गर्भावस्था के दौरान परेशानी के अलावा कमज़ोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है. यह परजीवी इंसान का व्यवहार बदल सकता है और वह शिज़ोफ्रेनिया जैसी बीमारी से ग्रसित हो सकता है. |
| DATE: 2013-09-23 |
| LABEL: science |
| [248] TITLE: गूगल ने लोगो और सर्च पेज को बदला |
| CONTENT: गूगल ने अपने होम पेज को नए सिरे से डिज़ाइन करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. नए फीचर्स में गूगल के पुराने लोगो की जगह एक नए मेन्यू बार ने ले ली है जो दाहिनी तरफ दिखाई देता है. याहू के लोगो और माइक्रोसॉफ्ट के बिंग सर्च टूल में भी इसी महीने बदलाव किए गए हैं. गूगल के एक प्रवक्ता ने कहा कि इस तरह के बदलाव धीरे-धीरे गूगल के सभी प्रोडक्ट्स में किए जाएंगे. उनकी एक ब्लॉग पोस्ट में कहा गया कि संस्था अपने यूज़र्स के लिए तकनीक के इस्तेमाल को सरल और व्यवस्थित बनाने के लिए यह बदलाव कर रही है. गूगल के लोगो में 2010 के बाद होने वाला यह पहला बदलाव है. हालांकि अभी सभी यूज़र्स इस नए डिज़ाइन को देख नहीं पाएंगे. तकनीकी कंसल्टेंसी फर्म फोरेस्टर के विश्लेषक सारा रॉटमन के मुताबिक़ यह यूज़र्स के लिए तकनीकी अपडेट्स का मौसम है. वह कहते हैं आप चाहे कोई उत्पाद बेच रहे हों या फिर लोगों को तकनीक मुफ़्त उपलब्ध करा रहे हों- क्रिसमस के शॉपिंग सीज़न से पहले हर कोई नए रूप में दिखना चाहता है. वो कहते हैं कि गूगल के बदलाव वास्तव में अच्छे हैं क्योंकि ये सॉफ़्टवेयर कंपनियां मुख्य तौर पर यूज़र्स के भरोसे पर टिकी होती हैं. वे ऐसा कुछ नहीं करना चाहती हैं जिससे उनके उपभोक्ता उनसे दूर हो जाएं. एक अन्य विश्लेषक के मुताबिक़ लिंक्स की संख्या कम करना लोगों को गूगल के सोशल नेटवर्क गूगल प्लस के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करेगी. गूगल के अन्य प्रोडक्ट्स जैसे गूगल ड्राइव स्टोरेज यू ट्यूब वीडियो या एंड्रॉएड ऐप प्ले स्टोर के कारण गूगल के होम पेज पर बने आइकॉन को क्लिक करके लोग गूगल की अन्य सेवाओं का उपयोग कर सकेंगे. |
| DATE: 2013-09-20 |
| LABEL: science |
| [249] TITLE: क्या आप भी गाने सुनने के लिए उठाते हैं मोबाइल? |
| CONTENT: इंटरनेट की दुनिया में भारत तीसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है वो भी तब जब देश के केवल दस फ़ीसदी लोगों तक इंटरनेट पहुंचा है. जब देश की एक बड़ी आबादी डिजिटल बन रही है तो लाज़मी है कि इसका असर देश के सबसे प्रमुख उद्योगों में से एक फ़िल्म और म्यूज़िक पर भी पड़ेगा. रिसर्च कंपनी कॉम्सकोर के ताज़ा आंकड़ों पर नज़र डालेंगे तो पता चल जाएगा कि डिजिटल इंटरटेनमेंट यानी इंटरनेट या मोबाइल के ज़रिए वीडियो और ऑडियो देखने-सुनने का तौर-तरीक़ा कितना बदल चुका है. कॉमस्कोर के आंकड़े कहते हैं कि बीते एक साल में क़ेरीब पांच करोड़ चालीस लाख वीडियो ऑनलाइन यानी इंटरनेट पर देखे गए. भारत में ऑनलाइन वीडियो बाज़ार के 55 फ़ीसदी हिस्से पर यू-ट्यूब का क़ब्ज़ा है जबकि फ़ेसबुक याहू और डेली मोशन जैसी वेबसाइटों का हिस्सा बाक़ी के मार्केट शेयर में अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के तौर पर सबसे ज्यादा है. कॉमस्कोर के अनुसार ऑनलाइन वीडियो के भारत में दस सबसे बड़ी प्रदाताओं में सिर्फ़ एक भारतीय कंपनी है टाइम्स ग्रुप. भारत में इंटरनेट पर आने वाले लोगों की औसत उम्र भी बाक़ी ब्रिक्स ब्रज़ील रूस भारत चीन दक्षिण अफ्रीका देशों से कम है लिहाज़ा इंटरनेट पर उनके आकर्षण का भी एक बड़ा केंद्र बॉलीवुड है. ऑनलाइन वीडियो-म्यूज़िक उद्योग के जानकार अभिषेक गुरेजा बताते हैं यूज़र अपनी दिनचर्या में व्यस्त है. सुबह गाड़ी से बस से या जिस भी तरीक़े से ऑफ़िस जाता है उसके पास यहीं ख़ाली समय है जिसे वो मोबाइल पर बिता सके उसके पास और ज्यादा वक़्त नहीं है. तो ऐसे समय के लिए मोबाइल पर चल पाने वाला छोटा कंटेंट दिया जाए जो उसे भरपूर इस्तेमाल किया जाएगा. बीते एक वर्ष में इंटरनेट पर आने वालों में से 74 फ़ीसदी यूज़र्स कभी न कभी इंटरटेनमेंट वेबसाइटों पर गए हैं. तो अगर ये कहा जाए कि इंटरनेट ने ऑडियो-वीडियो देखे जाने का तरीक़ा बदल दिया है तो ये ग़लत नहीं होगा. नए फ़िल्मों के एमपी3 गाने हों या हाई डेफ़िनेशन वीडियो सभी इंटरनेट पर मुफ़्त में उपलब्ध है. गाना डॉट कॉम सावन डॉट कॉम और इन डॉट कॉम जैसी वेबसाइटों पर फ़िल्मी संगीत मुफ़्त में ऑनलाइन सुना जा सकता है. ऑनलाइन वीडियो की बात करें तो यूट्यूब किसी अलाउद्दीन के चिराग़ से कम नहीं है. चाहे जिस भी विषय या फ़िल्म से संबंधित वीडियो ढूंढ रहे हों यूट्यूब में उससे संबंधित कोई ना कोई वीडियो ज़रूर मिल जाएगा. पिछले साल भर में इंटरनेट पर ऑनलाइन वीडियो देखने वालों की संख्या में 27 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है. इंटरनेट यूज़र्स बढ़ने के साथ ही गानों की पायरेसी के उद्योग ने भी अपनी जड़ें मज़बूत की है. कॉमस्कोर के अनुसार ज़्यादातर जगहों पर प्रतिबंधित वेबसाइट सॉन्ग्स डॉट पीके का भारत में इंटरनेट ऑडियो-वीडियो बाज़ार में क़रीब दस फ़ीसदी का हिस्सा है. मुफ़्त में संगीत की उपलब्धता के बीच इसे वैध तरीक़े से ऑनलाइन बेचे जाने की भी कोशिशें की गईं हालांकि इनमें से कई अब बंद हो चुकी हैं. ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट फ़्लिपकार्ट ने एमपी3 संगीत बेचने की एक सेवा फ्लाइट शुरू की जिसे कुछ ही महीने पहले बंद कर दिया गया. लेकिन ऐपल की सेवा आईट्यून्स इस दौड़ में अभी तक बनी हुई है और तटस्थ दिख रही है. अगर समूचे म्यूज़िक उद्योग की बात करें तो रिसर्च एजेंसी केपीएमजी के अनुसार अकेले भारत में ये उद्योग क़रीब साढ़े दस अरब रूपए का है. गेमिंग उद्योग इससे भी ज़्यादा 15. 3 अरब रूपयों का है जबकि एनिमेशन और ग्राफिक्स उद्योग का 35. 3 अरब रूपयों का बाज़ार है. ज़ाहिर है कि अगर इंटरनेट की मूलभूत सेवा और कंप्यूटर डिवाइसेस का प्रसार भारत में सुनियोजित तरह से हुआ तो इन क्षेत्रों में भारत एक बड़ी शक्ति बनकर उभर सकता है. इसके संकेत भी अभी से दिख रहे हैं. रिसर्च कंपनी कॉम्सकोर के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार भारत में इंटरनेट का दायरा पिछले साल के मुक़ाबले 31 फ़ीसदी बढ़ा है. सिर्फ़ ऑनलाइन ही नहीं मोबाइल पर भी डिजिटल मनोरंजन के लिए नए उत्पाद बनाए जा रहे हैं. हाल ही में मोबाइल कंपनी एयरटेल ने ग्राहकों को एक रूपए में वीडियो देखने का ऑप्शन दिया है. थोड़ी महंगी लेकिन ऐसी ही सेवा लगभग बाक़ी सभी मोबाइल कंपनियां भी दे रही हैं. रिसर्च कंपनी आईएएमएआई-आईएमआरबी की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में वैल्यू ऐडेड सर्विसेस का बाज़ार साल 2013 में क़रीब साढ़े चार अरब डॉलर यानी लगभग 29 हज़ार करोड़ का आंकड़ा छू लेगा. वैल्यू ऐडेड सर्विसेस में कॉलर ट्यून शिक्षा वीडियो म्यूज़िक और वॉलपेपर डाउनलोड जैसी सेवाएं शामिल है. इस क्षेत्र में ख़ासा दख़ल रखने वाली कंपनी हंगामा डिजिटल के प्रमुख नीरज रॉय मानते हैं कि मोबाइल और स्मार्टफ़ोन यूज़र्स सिर्फ़ कॉल या एसएमएस ही नहीं बल्कि मनोरंजन और जानकारी के लिए भी इसका उपयोग करते हैं. वो बताते हैं सारे डिवाइसे चाहे टैबलेट हो या स्मार्टफ़ोन इनमें मोबाइल इंटरनेट की क़ाबिलीयत होती है. इससे आप गाने सुन सकते हैं वीडियो देख सकते हैं फिल्म देख सकते हैं गेम्स एप्लिकेशन देख सकते हैं. पूरी दुनिया में ये क़रीब 60-65 अरब डॉलर का उद्योग है. भारत के शहरी इलाकों में स्मार्टफ़ोन की बिक्री में तेज़ी से इज़ाफ़ा हो रहा है. स्मार्टफ़ोन्स के आने से डिजिटल एंटरटेनमेंट क्षेत्र को भारी फ़ायदा हुआ है. नीरज रॉय बताते हैं स्मार्ट डिवाइसेस काफ़ी आसान हो गए हैं. दो साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुज़ुर्ग तक आज कल सभी बड़ी आसानी से उसे इस्तेमाल करते है. आसान फ़ीचर आने से ये स्मार्टफ़ोन बहुपयोगी हो गए हैं. स्मार्ट डिवाइसेस जितने ज्यादा लोगों के पास होंगे डिजिटल मनोरंजन का क्षेत्र उतना ही फलेगा-फूलेगा. चुनने का अधिकार यूज़र्स के पास होगा कि वो क्या देखना-सुनना चाहता है और क्या नहीं. |
| DATE: 2013-09-20 |
| LABEL: science |
| [250] TITLE: मंगल पर जीवन के सिद्धांत को धक्का |
| CONTENT: क्युरीओसिटी रोवर के गैस नहीं खोज पाने से मंगल पर जीवन की कल्पना के सिद्धांत को धक्का लगा है. मंगल पर मीथेन गैस का पता लगाने में क्यूरियोसिटी रोवर की विफलता से उस सिद्धांत को धक्का लगा है जिसके अनुसार इस लाल ग्रह पर किसी तरह के जीवन की कल्पना की जा रही थी. मंगल मिशन के वैज्ञानिकों के मुताबिक़ दूरबीनों और उपग्रहों ने मंगल पर कम लेकिन महत्वपूर्ण मात्रा में मीथेन गैस देखी लेकिन छह पहियों वाले रोबेट क्यूरियोसिटी रोवर को वहां पर ऐसा कुछ नहीं मिला है. धरती के वायुमंडल में मौजूद कुल मीथेन गैस का 95 फ़ीसदी का उत्पादन सूक्ष्म जीव करते हैं. मंगल पर सूक्ष्म जीवों की मौजूदगी के संकेतों से वहां पर जीवन होने के अनुमान का सिद्धांत भी अधर में लटक गया है. क्यूरियोसिटीज ट्यूनएबल लेज़र स्पेक्ट्रोमीटर टीएलएस के मुख्य जांचकर्ता डॉक्टर क्रिस वेब्स्टर ने कहा पूर्व के परिणामों के आधार पर हम वहां जाने और प्रति अरब 10 पार्ट्स पीपीबीवी या इससे अधिक हासिल करने की आशा कर रहे थे. दरअसल जब आप किसी चीज़ को खोजने जाते हैं और आपको वह नहीं मिलती है तो निराशा होती ही है. नासा के इस रोवर की रिपोर्ट साइंस मैगज़ीन के एक ऑनलाइन पेपर में प्रकाशित की गई है. अगस्त 2012 में मंगल पर उतरने के बाद से क्यूरियोसिटी रोवर इस लाल ग्रह की हवाओं में मौजूद तत्वों की स्कैनिंग कर रहा है. इन परीक्षणों से टीएलएस की संवेदनशीलता की सीमा में किसी भी तरह से मीथेन गैस की उपस्थिति का पता लगाना संभव नहीं है. इसका मतलब यह हुआ कि यदि वहां यह गैस है तो वह 1-3 पीपीबीवी से अधिक नहीं है जो कुल 10 हज़ार टन गैस के बराबर है. यह मात्रा पूर्व के अनुमानों की तुलना में छह गुना कम है. 1-3 पीपीबीवी की मात्रा बहुत कम है और इसने पूर्व के परिणामों पर सवाल खड़ा किया है. सच्चाई यह है कि क्यूरियोसिटी ज़मीनी स्तर पर काम कर रहा है और एक जगह से मिले इसके परिणाम ज्यादा अहमियत रखने वाले नहीं होने चाहिए क्योंकि मंगल के वायुमंडल में छह महीने के दौरान काफ़ी कुछ बदल जाता है. मंगल पर मीथेन की मौजूदगी के कई कारण हो सकते हैं. निश्चित तौर पर केवल सूक्ष्मजीवों की गतिविधियां ही नहीं होंगी. यह क्षुद्र ग्रहों द्वारा आया हो सकता है या फिर भूगर्भीय प्रक्रियाओं से पैदा हुआ हो सकता है. लेकिन इसका जीवन से संबंध है. धरती के वायुमंडल में अरबों टन मीथेन गैस है जो जानवरों के पाचन तंत्र में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवों से पैदा होता है. ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि मंगल की धरती के भीतर मीथेन पैदा करने वाले कुछ सूक्ष्म जीव मौजूद हो सकते हैं. बसंत के मौसम में इनकी उपस्थिति को इस सिद्धांत का आधार बनाया गया था. इसमें कहा गया था मौसम के अनुसार तापमान बढ़ने से मंगल की सतह पर मौजूद बर्फ़ पिघलेगी और इससे दबे हुए मीथेन गैस वायुमंडल में मिल जाएंगे. लेकिन डॉक्टर वेब्स्टर का मानना है कि क्यूरियोसिटी को ठीक-ठाक मात्रा में मीथेन का पता लगाने में मिली विफलता इस स्थिति को ख़ारिज करता है. उन्होंने बीबीसी से कहा यह निष्कर्ष सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों की संभावना को ख़ारिज नहीं कर रहा है लेकिन इसने उस संभावना को कम कर दिया है जिसमें कहा गया था कि मीथेन सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के कारण है. इस टीम के सदस्य प्रोफ़ेसर सुशील अत्रेया का कहना है मंगल पर अब भी अन्य तरह के सूक्ष्म जीव हो सकते हैं. इससे वहां पर मीथेन पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों का पता लगाना और कठिन हो गया है. इस बारे में कैथोलिक यूनिवर्सिटी ऑफ़ अमरीका से जुड़े डॉक्टर जेरोनिमो विलैनुएवा ने धरती से दूरबीन के ज़रिए मंगल के वायुमंडल का अध्ययन किया है. वह किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले और अधिक सटीक मापदंड अपनाने की ज़रूरत बताते हैं. |
| DATE: 2013-09-20 |
| LABEL: science |
| [251] TITLE: परमाणु संयंत्र नहीं बढ़ाता कैंसर खतरा: रिपोर्ट |
| CONTENT: परमाणु संयंत्र बच्चों में ल्यूकीमिया के खतरे को बढ़ाता है या नहीं इस बात पर लंबे समय से विवाद रहा है. इस बारे में शोधकर्ताओं की अलग-अलग धारणाएं रही हैं. लेकिन एक ताजा अध्ययन में दावा किया गया है कि दोनों के बीच कोई संबंध नहीं है. ताजा अध्ययन में कहा गया है कि विशेषज्ञों ने 1962 से 2007 के बीच पांच वर्ष से कम उम्र के 10000 कैंसर पीड़ित बच्चों के आंकड़ों और उनकी रिहाइश के बारे में अध्ययन किया था. ये आंकड़े ब्रिटेन के नेशनल रजिस्ट्री ऑफ चाइल्डहुड ट्यूमर्स से लिए गए हैं जो 1962 से कैंसर पीड़ित बच्चों की सूचनाएं इकट्ठी करता रहा है. इस अध्ययन को चाइल्डहुड कैंसर रिसर्च ग्रुप ने कराया है और कैंसर अध्ययन के एक ब्रिटिश जर्नल में प्रकाशित किया गया है. कैंसर रिसर्च यूके ने कहा है कि अध्ययन के नतीजे चिंताजनक हो सकते हैं लेकिन निगरानी को जारी रखना होगा. यह पहला मौका नहीं है जब किसी ब्रितानी अध्ययन में कैंसर और परमाणु संयंत्र के बीच किसी संबंध को नकारा गया हो लेकिन ऐसे पिछले अध्ययनों के तरीकों को चुनौती मिल चुकी है. ब्रिटेन में ल्यूकीमिया कैंसर की 12वीं सबसे आम बीमारी है लेकिन बच्चे जिन बीमारियों से पीड़ित हैं उनमें एक तिहाई मामले कैंसर के हैं. 2010 में यहां 15 वर्ष तक की उम्र वाले 500 बच्चों में कैंसर पाया गया था. परमाणु संयंत्र और बच्चों में कैंसर के बीच संबंध का मामला 1980 के दशक में तब विवादों में आ गया जब एक टीवी रिपोर्ट में कहा गया कि सेलाफील्ड परमाणु संयंत्र के पास रहने वाले बच्चों में कैंसर के मामले अत्यधिक पाए गए. तब से ब्रिटेन और बाकी यूरोप के अध्ययन विवादों में घिरते रहे हैं. परमाणु ऊर्जा विरोधी कुछ समूह पिछले अध्ययनों में इस्तेमाल हुए तरीकों की काफी आलोचना कर चुके हैं. वे उस जर्मन अध्ययन का हवाला देते हैं जिसका नतीजा ये था कि संयंत्र और कैंसर के बीच संबंध हो सकता है. ताजा अध्ययन के बारे में कहा जा रहा है कि इसका तरीका जर्मन अध्ययन के ही समान है जिसमें रिहाइश के साथ पीड़ित बच्चों की स्थिति के आंकड़ों का विश्लेषण होता है. चाइल्डहुड कैंसर रिसर्च ग्रुप से जुड़े डॉक्टर जॉन बीथेल का कहना है हमने जन्म से जुड़े हर आंकड़े का अध्ययन किया है. हमें संयंत्र एवं कैंसर के बीच कोई कड़ी नहीं मिली. |
| DATE: 2013-09-18 |
| LABEL: science |
| [252] TITLE: फिर से जवान होना मुमकिन है? |
| CONTENT: क्या हम फिर से जवान हो सकते हैं एक छोटे से शुरुआती अध्ययन से संकेत मिले हैं कि ऐसा हो सकता है. ना तो ये त्वचा की क्रीम से जुड़ा है ना वैज्ञानिकों को ऐसा कोई फॉर्मूला मिला है और ना ही ये हमेशा जवान रहने के बारे में है. बल्कि इस शोध में जीवनशैली में बदलाव की सलाह दी गई है - जैसे तनाव घटाना खान-पान में सुधार और हल्की-फुल्की कसरत - जिनसे टेलोमीयर की लंबाई बढ़ती है टेलोमीयर यानी क्रोमोसोम या गुणसूत्रों के सिरे जो हमारे बूढ़े होने को नियंत्रित करते हैं. ये जीवनशैली किसी संन्यासी की नहीं है - लेकिन इस तुलना को याद रखिएगा बाद के लिए जब हम 1970 के दशक के टीवी सीरियल कंगफू की बात करेंगे. पहले टेलोमीयर की बात करते हैं. टेलोमीयर डीएनए का विस्तार है जो हमारे जेनेटिक कोड की रक्षा करते हैं. इनकी तुलना अकसर जूते के फीतों के सिरे से होती है क्योंकि ये क्रोमोसोम को झड़ने और बिखरने से रोकते हैं और जेनेटिक कोड को स्थिर रखते हैं. लेकिन जब भी कोई कोशिका विभाजित होती है तो टेलोमीयर छोटा हो जाता है उस बिंदु तक जब तक कि बूढ़ी हो रही कोशिका और विभाजित न हो सके और निष्क्रिय हो जाए या बूढ़ी होकर मर जाए. छोटे टेलोमीयर का संबंध उम्र से जुड़ी कई बीमारियों से होता है जिनमें कैंसर दिल के रोग और डिमेंशिया शामिल हैं. कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने उन 10 पुरुषों पर नज़र रखी जो प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे थे और उनसे कहा कि वो पौधों से मिली चीज़ों पर आधारित खाना खाएं कसरत करें और ध्यान और योग की मदद से तनाव पर नियंत्रण रखें. इन लोगों के टेलोमीयर की लंबाई शुरुआत में ली गई और फिर पांच साल बाद ली गई. इसकी तुलना उन 25 लोगों से की गई जिन्हें जीवनशैली बदलने को नहीं कहा गया था. खास जीवनशैली का पालन न करने वाले 25 लोगों के टेलोमीयर तीन फीसदी छोटे हो चुके थे लेकिन जिन लोगों ने अच्छी जीवनशैली का पालन किया उनके टेलोमीयर की लंबाई 10 बढ़ गई. शोधकर्ताओं का कहना है कि ये जानने के लिए अभी और शोध की ज़रूरत है कि ये नतीजे अहम हैं या नहीं. इसके अलावा टेलोमीयर की लंबाई में आए बदलाव से सेहत पर सकारात्मक असर नहीं दिखा - कुछ पुरुषों के टेलोमीयर लंबे हो सकते हैं लेकिन वो ज़्यादा वक्त तक जी पाएंगे या नहीं ये अलग बात है. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में बायोकेमिस्ट्री की प्रवक्ता डॉक्टर लैन कॉक्स कहती हैं यहां दो चीज़ें ध्यान में रखनी होंगी पहली तनाव की वजह से टेलोमीयर के छोटे होने का संबंध खराब सेहत से है. दूसरी बात इसके विपरीत ऐसे चूहे जिनमें कैंसर की संभावना हो उनमें टेलोमीयर की लंबाई में बढ़ोतरी ज़्यादा आक्रामक कैंसर की ओर आगे ले जाती है. इस नए अध्ययन में टेलोमीयर की लंबाई में कम बढ़ोतरी का ज़्यादा संबंध कैंसर के जोखिम की जगह सेहत में सुधार से लगता है हालांकि ये तय होना अभी बाकी है. आनुवांशिकी को भूल जाइए जीवनशैली में ऐसे बदलाव जो सेहत के लिए अच्छे हो सकते हैं उन पर नज़र रखना आसान है. इसमें किसी को शक नहीं होगा कि नियमित व्यायाम से कई फ़ायदे हैं - कैंसर का जोखिम कम होने से डायबिटीज़ की आशंका कम होना दिल की समस्याएं घटना. इस अध्ययन में जिन पुरुषों ने जीवनशैली में बदलाव किया वो हफ़्ते में छह दिन कम से कम 30 मिनट पैदल चलते थे. इसके अलावा वो ज़्यादातर शाकाहारी भोजन लेते थे कम चिकनाई वाला खाना खाते थे योग करते थे और उन्हें ज़्यादा सामाजिक आसरा मिला. ऐसा जीवन कौन लोग जीते हैं मुझे कंगफू की याद आती है. हर एपिसोड में डेविड कैराडीन का किरदार दूसरा गाल आगे कर देता था जब तक कि ज़बरदस्त मार्शल आर्ट्स न दिखाए. ये किरदार मौत को लगातार बहुत मामूली अंतर से मात देता था. लेकिन इससे मुझे भी कंगफू करने की इच्छा होती थी. कम से कम पांच मिनट. स्वस्थ जीवनशैली भी ज़्यादातर लोगों के लिए कुछ-कुछ वैसी ही है - सैद्धांतिक रूप से शानदार विचार - लेकिन अमल में लाना बहुत मुश्किल. कभी कभार की बीमारी या हादसों को अलग कर के देखें तो हम सब जानते हैं कि ज़्यादा जीने के लिए हमें किस चीज़ की जरूरत है लेकिन बेहद कम लोगों में एक शाओलीन संन्यासी की तरह जीने का दृढ़ विचार होता है कम चिकनाई वाला भोजन करना कम तनाव लेना नियमित व्यायाम तो दूर की बात है. जैसा कि उस टीवी सीरियल में अंधे कंगफू शिक्षक मास्टर पो अपने शिष्य कैन को नाकाम रहने पर कहते थे तुम तैयार नहीं हो मेरे टिड्डे और न ही हम में से ज़्यादातर लोग तैयार हैं जो मार्शल आर्ट कर सकें या लंबे और स्वस्थ जीवन के लिए अनुशासित रह सकें. |
| DATE: 2013-09-18 |
| LABEL: science |
| [253] TITLE: ई-सिगरेट पियो- धूम्रपान की आदत छोड़ो! |
| CONTENT: धूम्रपान छोड़ने की ख्वाहिश रखने वालों के लिए इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट यानी ई सिगरेट मददगार साबित हो सकती है. ई सिगरेट धूम्रपान छोड़ने में निकोटीन पैच जितनी ही प्रभावी हो सकती हैं. हाल ही में हुए शोधों के अनुसार तेजी से लोकप्रिय हो रहा यह उपकरण निकोटीन वाली भाप पैदा करता है. यूरोपीय श्वसन संस्था में प्रस्तुत शोध के अनुसार ई सिगरेट का इस्तेमाल करने वाले उतने ही लोगों ने धूम्रपान छोड़ा है जितना पैचेस इस्तेमाल करने वालों ने. हालांकि सुरक्षा को लेकर लंबे समय तक आंकड़ों की ज़रूरत बताई गई है. हालांकि इस शोध में पर्याप्त संख्या में लोगों को शामिल नहीं किया गया ताकि यह साबित किया जा सके कि यह विश्वसनीय रूप से बेहतर उपाय है. छह महीने के दौरान ई सिगरेट पीने वाले 57 प्रतिशत लोगों ने सिगरेट की संख्या आधी कर दी वहीं पैच का इस्तेमाल करने वालों में ये तादाद 41 प्रतिशत रही. ऑकलैंड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर क्रिस बुलेन कहते हैं हालांकि शोध के परिणाम छह महीने बाद धूम्रपान त्यागने में ई सिगरेट और पैच में कोई स्पष्ट अंतर नहीं दिखते हैं. लेकिन यकीनन यह लगता है कि धूम्रपान में कटौती करवाने में ई सिगरेट ज़्यादा प्रभावी है. मज़ेदार बात यह भी है कि शोध में हिस्सा लेने वाले लोगों में पैच के मुकाबले ई सिगरेट को लेकर ज़्यादा उत्सुकता थी. कई देशों में इनकी बढ़ती लोकप्रियता और साथ ही साथ नियम बनाने को लेकर अनिश्चितता के चलते बड़े और लंबे समय के प्रयोग किए जाने ज़रूरी हैं ताकि इस उपकरण की धूम्रपान निरोधी क्षमताओं को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया जा सके. हालांकि दुनिया भर में ई सिगरेट की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए इसके नियमन की कोशिशें भी तेज हो रही हैं. यूरोपीय संघ और ब्रिटेन दोनों दवाइयों की तरह ही ई सिगरेट के नियमन के उपायों पर काम कर रहे हैं. उत्पादकों में भी इसे लेकर मतभेद हैं. कुछ कहते हैं कि यह धूम्रपान को सामान्य बनाता है और तो दूसरे कहते हैं कि इससे लोगों को धूम्रपान छोड़ने में मदद मिल सकती है. लंदन के क्वीन मैरी विश्वविद्यालय में तंबाकू निर्भरता शोध इकाई के प्रोफ़ेसर पीटर हाएक ने इस शोध को राह दिखाने वाला कहा है. महत्वपूर्ण बात इससे दिक्कत कम पैदा होती है और ई सिगरेट निकोटीन पैच जितनी ही प्रभावी हैं. कई धूम्रपान करने वालों को ई-सिगरेट पैच के मुकाबले ज़्यादा पसंद आती है. कई देशों में यह आसानी से उपलब्ध भी है क्योंकि इस पर निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी पर लागू होने वाले प्रतिबंध लागू नहीं होते. न ही इस पर पेशेवर स्वास्थ्य कर्मियों पर होने वाला खर्च होता है. इन फ़ायदों से लगता है कि ई सिगरेट धूम्रपान निरोध को बढ़ाने की क्षमता रखता है और इसे छोड़ने का खर्च कम कर सकता है. हालांकि इस पर लंबे समय तक शोध किए जाने की ज़रूरत है ताकि इस उपकरण के प्रभाव का अध्ययन किया जा सके. ई सिगरेट न सिर्फ़ निकोटीन का स्वाद देती है बल्कि यह धूम्रपान करने का अहसास भी देती है. इससे अनुमान लगाए जा रहे हैं कि यह उपकरण लोगों की धूम्रपान की आदत छुड़वाने में ज़्यादा कारगर साबित हो सकता है. न्यूज़ीलैंड के ऑकलैंड विश्वविद्यालय की एक टीम ने निकोटीन पैच और ई सिगरेट की तुलना करते हुए 657 लोगों पर पहला क्लीनिकल प्रयोग किया. लान्सेंट पत्रिका में प्रकाशित परिणामों के अनुसार ई सिगरेट का इस्तेमाल करने वाले 7-3 लोगों ने छह महीने बाद इसे छोड़ दिया जबकि धूम्रपान को अलविदा कहने के लिए पैच का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 5-8 रही. |
| DATE: 2013-09-16 |
| LABEL: science |
| [254] TITLE: यूरोपीय देशों को किससे है ख़तरा |
| CONTENT: विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोपीय शहरों और क़स्बों को अनजान प्रजातियों के प्रकोप का ख़तरा है. माना जा रहा है कि तेज़ी से बढ़े संपर्क साधनों के चलते नगरीय इलाक़ों को इन घुसपैठिया प्रजातियों से गहरा जोख़िम पैदा हो गया है. इन प्रजातियों में पौधे और जानवर शामिल हैं. ये मूल रूप से उस स्थान पर पैदा नहीं हुए जहां फैल कर मूल वन्य संसाधनों और जीव-जंतुओं के स्थान पर क़ब्ज़ा जमा लेते हैं. उम्मीद की जा रही है कि अगले हफ़्ते यूरोपियन यूनियन ईयू इन प्रजातियों से महाद्वीप को बचाने के उपाय ढूंढने की कोशिश करेगा. यूरोप में प्रकृति बचाने के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय संघ यानी आईय़ूसीएन में कार्यक्रम अधिकारी शैंटेल वैन हैम का कहना है ये ग़ैर-देशी प्रजातियां धरती की जैव-विविधता के लिए बहुत बड़ा ख़तरा हैं. ये ख़तरा बढ़ता ही जाएगा अगर इनके बसाव को रोकने के लिए क़दम ना उठाए गए. समस्या ये है कि ये ग़ैर-देशी प्रजातियां मूल संसाधनों और प्रजातियों से जगह ले लेती हैं. शहरी क्षेत्रों को इनसे और ज़्यादा ख़तरा है. उदाहरण के लिए ये व्यापार के ज़रिए एक जगह से दूसरी जगह पहुंचती हैं या फिर आकस्मिक ढंग से हवाई अड्डों और पत्तनों पर. इस समस्या से निपटने के लिए आईय़ूसीएन स्विट्ज़रलैंड के ग्लैंड में एक कांफ्रेस का आयोजन कर रहा है जिसमें स्थानीय अधिकारीनीति निर्माताग़ैर सरकारी संगठन और वैज्ञानिक शिरक़त कर रहे हैं. शैंटेल वैन हैम ने बीबीसी न्यूज़ से कहा नगरपालिकाएं या स्थानीय प्रशासन इन प्रजातियों को जमने से रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है लेकिन इसके लिए उन्हें ज़रूरी सहयोग चाहिए होगा. इस कांफ्रेस के ज़रिए हम विशेषज्ञों को एक मंच पर ला रहे हैं. इसमें ना सिर्फ़ वैज्ञानिक हैं बल्कि विभिन्न सरकार स्तर और ग़ैर सरकारी संगठन भी शामिल हैं ताकि सूचनाओं के आदान-प्रदान और सहयोग को बढ़ाकर इन प्रजातियों से निपटा जा सके. आईयूसीएन की एक रिपोर्ट बताती है किस तरह यूरोपियन यूनियन के देश इन प्रजातियों से निपटने की कोशिशें कर रहे हैं. इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि किस तरह एक उत्तर अमरीकी स्तनपायी जीव रकून जर्मनी की राजधानी बर्लिन में फैलता जा रहा है. इसी तरह जापानी नॉटवीड यूरोप और उत्तरी अमरीका में ख़तरनाक तरीक़े से फैलता जा रहा एक पौधा है. उम्मीद है कि यूरोपीय आयोग अपनी जैव विविधता रणनीति के तहत पूरे यूरोपीय क्षेत्र में इन प्रजातियों से निपटने की अपनी योजना प्रकाशित करने वाला है. शैंटेल वैन हैम का कहना है क़ानूनी ढांचा तैयार करने के लिए प्रस्ताव तो है लेकिन इसके लिए ईयू की सहमति चाहिए होगी. हमें आशा है कि यूरोपीय आयोग विभिन्न यूरोपीय देशों के अनुभवों और उनके अपनाए तरीक़ों की जानकारी को साझा करने के हक़ में है. |
| DATE: 2013-09-16 |
| LABEL: science |
| [255] TITLE: ये है 'सबसे बदसूरत' प्राणी |
| CONTENT: तुनकमिज़ाज दिखने वाली ब्लॉबफिश को बदसूरत जानवरों के संरक्षण के लिए काम करने वाले संगठन अग्ली एनिमल प्रिज़र्वेशन सोसायटी का आधिकारिक शुभंकर चुना गया है. इससे ब्लॉबफिश अनाधिकारिक रूप से दुनिया की सबसे बदसूरत जीव बन गई है. इस संगठन के इस अभियान का मक़सद उन जानवरों की ओर ध्यान खींचना था जो उतने सुंदर नहीं हैं और विलुप्त होने की ओर हैं. ब्लॉबफिश के नाम का एलान न्यूकैसल में ब्रिटिश साइंस फेस्टिवल में किया गया. प्रोबोसिस बंदर सूअर की तरह नाक रखने वाले कछुए टिटिकाका स्क्रोटम फ्रॉग और गुप्तांगों की जूँ जैसे जीवों को पछाड़कर ब्लॉबफिश सबसे बदसूरत जीव चुनी गई है. अग्ली एनिमल प्रिज़र्वेशन सोसायटी के अध्यक्ष और जीव विज्ञानी सिमोन वाट ने कहा कि इस अभियान से इन विलुप्त होने का ख़तरा झेल रहे जीवों की ओर ध्यान जाएगा. सिमोन वाट ने कहा जीवों के संरक्षण के प्रति हमारा नज़रिया अहंवादी है. हम सिर्फ़ ऐसे जानवरों की रक्षा करते हैं जिनके प्यारे होने की वजह से हम उनसे जुड़ पाते हैं जैसे पांडा. मुझे पांडा से कोई दिक्कत नहीं है लेकिन उनके अपने समर्थक हैं. इन प्रजातियों को मदद की ज़रूरत है. सिमोन वाट का कहना है कि ब्लॉबफिश के सबसे बदसूरत जानवर चुने जाने से जीव संरक्षण के प्रति नज़रिए को एक मज़ाकिया पक्ष भी मिलेगा. वाट कहते हैं ये बेहद निराश कर देने वाले विज्ञान में से एक हैं देखें तो ये पता लगाना है कि आज किसकी मौत हुईइस अभियान के लिए सिमोन वाट ने कई हास्य कलाकारों के साथ मिलकर काम किया जिनमें से हर एक ने यूट्यूब पर इस अभियान के हर जीव के लिए एक संदेश तैयार किया. फिर अग्ली एनिमल प्रिज़र्वेशन सोसायटी ने लोगों से अपने पसंदीदा बदसूरत जानवर के लिए वोट करने को कहा. ब्लॉबफिश को करीब 10 हज़ार वोट से जीत मिली. ब्लॉबफिश दक्षिण पूर्वी ऑस्ट्रेलिया और तस्मानिया के तट के पास 600 से 1200 मीटर की गहराई पर पाई जाती है जहां वातावरण का दबाव समुद्र तल से कई दर्जन गुना ज़्यादा होता है. इसका जिलेटिन जैसा शरीर पानी से थोड़ा ही गाढ़ा होता है ये अपना जीवन गहराइयों में हिचकोले खाते हुए बिता देती है. ये झींगा और केकड़े खाती है और इस वजह से इसे मछली पकड़ने वाली नावों से खतरा होता है. हालांकि इसे खाया नहीं जा सकता लेकिन ये जालों में फंस जाती है. टिटिकाका स्क्रोटम मेंढक की त्वचा पर पड़ी झुर्रियां इसे झीलों में सांस लेने में मदद करती हैं. इस सूची में शामिल दूसरे जीवों के आवास को भी इसी तरह का खतरा है और सिमोन वाट को उम्मीद है कि इस अभियान से इस तथ्य पर ध्यान जाएगा कि संरक्षण में जीवों के आवास पर ध्यान देने की ज़रूरत है न कि विशिष्ट प्रजातियों पर. |
| DATE: 2013-09-15 |
| LABEL: science |
| [256] TITLE: 'अब मच्छर काट नहीं पाएंगे' |
| CONTENT: मानव त्वचा में प्राकृतिक रूप से मिलने वाला एक रसायन ही मच्छरों को दूर रखने का विकल्प साबित हो सकता है ये कहना है शोधकर्ताओं का. शोधकर्ताओं का मानना है कि इस रसायन को लगाने से इंसान कीड़ों के लिए अदृश्य हो जाता है. अमरीकन केमकिल सोसायटी की बैठक में शोधकर्ताओं ने ऐसे पदार्थों के बारे में जानकारी दी जिनसे मच्छरों की अपने शिकार को सूंघने की क्षमता रुक जाती है. जब इन रसायनों को लगाकर एक हाथ को मच्छरों से भरी जगह में रखा गया तो मच्छरों ने उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया. शोधकर्ताओं की इस टीम का कहना है कि उनके शोध से घातक बीमारियों का फैलाव रोकने में मदद मिल सकती है. मच्छर बीमारी फैलाने वाले सबसे ख़तरनाक प्राणियों में से एक हैं और वे मलेरिया डेंगू जैसी बीमारियां फैलाते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक मलेरिया से साल 2010 में 6 लाख 60 हज़ार लोगों की मौत हुई थी. यह शोध पेश करने वाले अमरीकी कृषि विभाग के अलरिच बर्नियर ने कहा कि उनकी टीम डीट नाम के मच्छर रोधी रसायन का विकल्प ढूंढ़ रही है. कई लोग इस रसायन को लगाना पसंद नहीं करते. इसी साल कुछ वैज्ञानिकों ने कहा कि डीट अपना असर खो रहा है. डॉक्टर बर्नियर कहते हैं मच्छरों के काटने से बचने के लिए मच्छर दूर भगाने वाले रसायन प्रमुख आधार रहे हैं लेकिन हम मच्छरों की सूंघने की क्षमता को कमज़ोर करने वाले रसायनों का इस्तेमाल कर एक दूसरा रास्ता ढूंढ रहे हैं. ये बात लंबे समय से मालूम है कि मच्छरों को कुछ लोग दूसरे लोगों की तुलना में ज़्यादा लुभाते हैं लेकिन वैज्ञानिकों की एक टीम ने ऐसे रसायनों के समूह को निर्धारित किया है जिसका स्राव प्राकृतिक रूप से होता है और जो मच्छरों को इंसानों की गंध का पता नहीं चलने देते. डॉक्टर बर्नियर ने बताया कि त्वचा पर सैकड़ों रसायन होते हैं जो किसी व्यक्ति में पाई जानेवाली गंध बनाते हैं. ये पता करने के लिए कि मच्छरों को कौन-सी गंध आकर्षित करती है उनकी टीम ने पिंजरे के एक ओर कई पदार्थों का छिड़काव किया. जिन रसायनों ने मच्छरों को आकर्षित नहीं किया उन पर वैज्ञानिकों ने और काम किया और जब इन रसायनों का छिड़काव इंसानों के हाथ पर किया गया तो मच्छरों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और न काटने की कोशिश की. मेथिलपिपरज़ीन सहित ये रसायन मच्छरों की सूंघने की क्षमता पूरी तरह से रोक सकते थे. डॉक्टर बर्नियर का कहना है कि ये रसायन कई तरह के लोशन और प्रसाधन सामग्रियों में इस्तेमाल किए जा सकते हैं. डॉक्टर बर्नियर कहते हैं अगर आप मच्छरों से भरे एक पिंजरे में हाथ डालें जिसमें हमने कुछ रसायनों का छिड़काव किया है तो सभी मच्छर पीछे की दीवार पर बैठे रहते हैं और उन्हें हाथ वहां होने का अंदाज़ा नहीं रहता. हम इसे इनोस्मिया या हाइपोस्मिया कहते हैं यानी गंध सूंघने की अक्षमता या गंध सूंघने में परेशानी होना. लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के जेम्स लोगन ने कहा कि वाकई ये पता करना काफ़ी रोमांचक था कि कौन से रसायन मच्छरों को दूर भगाते हैं. जेम्स लोगन कहते हैं हालांकि बाज़ार में पहले ही मच्छर दूर भगाने वाले अच्छे रसायन हैं लेकिन अब भी नए सक्रिय घटकों के लिए जगह है. चुनौती ये है कि पहले से मौजूद मच्छर दूर भगाने वाले रसायनों की गुणवत्ता कैसे बढ़ाई जाए. हालांकि उनका कहना है कि किसी नए उत्पाद के बाज़ार में आने में कई साल लग सकते हैं. |
| DATE: 2013-09-14 |
| LABEL: science |
| [257] TITLE: गर्भाशय कैंसर: क्या कॉफ़ी से हो सकता है बचाव |
| CONTENT: ब्रिटेन में हुए एक शोध के मुताबिक़ महिलाओं में होने वाले गर्भाशय कैंसर की रोकथाम में कसरतखान-पान औऱ कॉफ़ी की अहम भूमिका हो सकती है. उपलब्ध आंकड़ों का अध्ययन बताता है कि ब्रिटेन में क़ैसर के कुल मामलों में से आधे लगभग 3700 मामले कम किए जा सकते हैं बशर्ते कि वज़न कम रखा जाए और रोज़मर्रा की जिंदगी में सक्रियता. इंपीरियल कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं का कहना है कि महिलाएं अगर रोज़ आधा घंटा कसरत करें और अपने वज़न पर ध्यान दें तो गर्भाशय कैंसर का जोखिम कम किया जा सकता है. द वर्ल्ड कैंसर रिसर्च फंड की रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि कॉफ़ी भी इस ख़तरे को कम कर सकती है. हालांकि विशेषज्ञ कहते हैं कि अभी इस बात के पर्याप्त सुबूत नहीं हैं कि यह कहा जा सके कि कॉफ़ी पीने ये ख़तरा कम हो सकता है. गर्भाशय कैंसर ब्रिटेन की महिलाओं में होने वाला कैंसर में चौथा सबसे आम कैंसर है. इस संबंध में 2007 से किए जा रहे पहले वैश्विक विश्लेषण के लिए लंदन इंपीरियल कॉलेज के शोधकर्ताओं ने गर्भाशय कैंसर औऱ खान-पानशारीरिक गतिविधियों और वज़न से उसके संबंध से जुड़ी वैज्ञानिक खोजों को इकट्ठा कर उनकी समीक्षा की. इस अध्ययन से ये पता चला है कि अगर महिलाएं रोज़ाना 38 मिनट तक कसरत करें और वज़न नियंत्रित रखें तो कैंसर के 3700 मामलों को रोका जा सकता है. ब्रिटेन में केवल 56 फ़ीसदी महिलाएं ही रोज़ाना 30 मिनट कसरत करती हैं जबकि 39 प्रतिशत का वज़न सही है. इस शोध की लेखिका और इंपीरियल कॉलेज की डॉक्टर टेरेसा नोराट ने बीबीसी को बताया कि अगर आप शारीरिक तौर पर सक्रिय हैं और वज़न ज़्यादा नहीं है तो आप गर्भाशय कैंसर का ख़तरा कम कर सकते हैं औऱ अपनी सेहत भी सुधार सकते हैं. द वर्ल्ड कैंसर रिसर्च फ़ंड की कार्यकारी निदेशक कैरेन सैडलर कहती हैं कि कॉफ़ी से संबंधित नतीजे काफ़ी दिलचस्प हैं. ये कॉफ़ी और कैंसर के जोखिम के बीच संबंध की ओर इशारा करता है लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है. हमें कैंसर के दूसरे प्रकारों और सेहत पर इसके संभावित असर को देखना होगा. अब हम उसी दिशा में आगे शोध कर रहे हैं. |
| DATE: 2013-09-13 |
| LABEL: science |
| [258] TITLE: अमरीका से लौटकर किसानों की ज़िंदग़ी सँवारने की कोशिश |
| CONTENT: ज़मीन से ज़्यादा से ज़्यादा उपज कैसे हासिल की जाए- इस बारे में काफ़ी काम कर चुके रिकिन गाँधी ने जवानी का लंबा समय तारों को ताकते हुए गुज़ारा था. अमरीका में न्यूजर्सी के एक उपनगर में पले-बढ़े रिकिन के पिता एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे और माँ बैंक में थीं. जवान होते गाँधी फ़िलाडेल्फ़िया इंक्वायरर अख़बार और अंतरिक्ष के अन्य साहित्य में से अंतरिक्ष यात्रियों से जुड़े लेख काट-काटकर सहेज लेते थे. स्कूल की पढ़ाई ख़त्म होते ही रिकिन ने अपने सपनों को साकार करने की कोशिश भी की. उन्होंने पायलट की नौकरी के लिए अप्लाई भी किया जिससे आगे चलकर उन्हें अंतरिक्ष यान पर जाने का मौक़ा मिल सके. मगर उनकी राह का रोड़ा बन गई उनकी आँख की एक छोटी सी दिक़्क़त जिसके लिए उन्हें लेज़र सर्जरी की ज़रूरत थी. इसके बाद वह ओरेकल के साथ एक सॉफ़्टवेयर प्रोजेक्ट पर कुछ साल काम करते रहे और अंतरिक्ष में अपने भविष्य के बारे में सोचते रहे. गाँधी अब 31 साल के हो चुके हैं. वह कहते हैं मैं सोचता था कि जब अंतरिक्ष यात्री धरती पर वापस लौटते हैं तो उन्हें कैसा लगता होगा मैंने उनकी जीवनियाँ फिर से पढ़ीं और पाया कि उनमें से कुछ दुनिया को ऊपर से देखकर सोचते थे कि दुनिया में इतने युद्ध क्यों होते हैं इतनी ग़रीबी क्यों है वापसी के बाद कुछ स्कूलों में टीचर बन गए या फिर असल दुनिया से जुड़ने के लिए किसान हो गए. रिकिन गाँधी अंतरिक्ष यात्री तो नहीं बने मगर कुछ अंतरिक्ष यात्रियों की तरह किसानों के साथ काम ज़रूर करने लगे. इसके लिए वह अपने माँ-बाप की सरज़मीं पर लौटे. अब वह भारत में गाँवों के किसानों की ज़िंदग़ी बेहतर करने की कोशिश में लगे हैं. गाँधी एक स्वतंत्र ग़ैर सरकारी संगठन डिजिटल ग्रीन्स चलाते हैं जहाँ उनके साथ 65 लोगों की टीम काम कर रही है. ये टीम जो कर रही है वो काफ़ी साधारण है किसानों को इस बात के लिए प्रशिक्षित किया जाए कि वे अपने छोटे-छोटे वीडियो रिकॉर्ड कर सकें जिसमें अपनी मुश्किलें रिकॉर्ड करें और उसके उपाय भी साझा करें. वह किसानों को बैटरी से चलने वाले 10-12 हज़ार रुपए के छोटे प्रोजेक्टर भी उपलब्ध कराते हैं जिससे किसानों के छोटे-छोटे समूह बिना बिजली वाले गाँवों में भी वीडियो देख सकें. सीधे-सीधे कहिए तो ये छोटा सा इनोवेशन काफ़ी सफल रहा है. गाँधी के मुताबिक़ शुरू होने के पाँच वर्षों के भीतर ही लगभग 150000 किसान सात राज्यों के 2000 से ज़्यादा गाँवों में 20 अलग-अलग भाषाओं में 2600 ऐसे वीडियो देख चुके हैं. यानी उन जगहों पर डिजिटल ग्रीन्स मौजूद है. जिन लोगों ने ये वीडियो देखे हैं और उनसे सीखकर उन्हें अपनाया है उनमें से आधे से ज़्यादा महिलाएँ हैं. अपने दिल्ली ऑफ़िस में लोगों से भरे एक कॉन्फ़्रेंस रूप में गाँधी ने बताया ये वीडियो किसानों ने किसानों के लिए ही बनाए हैं. ये कई चीज़ों को दिखाते हुए वीडियो हैं उनमें इंटरव्यू होते हैं और अक़सर उसमें स्थानीय संगीत भी होता है. ये किसानों को ही हीरो के तौर पर मुख्य भूमिका में दिखाते हैं वही इसके प्रोड्यूसर होते हैं इसके प्रदर्शक होते हैं और इस नए औज़ार से उनका सशक्तिकरण भी होता है. इससे भी ज़्यादा बड़ी बात ये है कि वे लोग खेती-किसानी की टेक्नॉलॉजी को बेहतर बनाने में मदद कर रहे हैं. ये वीडियो आठ से 10 मिनट लंबे होते हैं और उसमें ऐसे सवालों के जवाब देने की कोशिश होती है जो किसानों के दिमाग़ को घेरे हों जैसे- आप फ़सल का चुनाव कैसे करें अपनी ज़मीन को कैसे तैयार करें आप पौधे कैसे उगाएँ बेहतर उपज के लिए उसमें से घास-फूस कैसे अलग करें गाँधी बताते हैं कि सबसे ज़्यादा लोकप्रिय वीडियो वे होते हैं जिनमें किसान बिना आर्थिक ख़तरे वाली कुछ बातें सीख पाते हैं. पानी में उगने वाला एक फ़र्न है अज़ोला उसे उगाने का वीडियो काफ़ी लोकप्रिय है क्योंकि अज़ोला को जब गाय के चारे में मिलाया जाता है तो उससे गाय का दूध बढ़ जाता है. इसी तरह कीड़ों के इस्तेमाल से बनने वाली खाद का वीडियो भी किसान काफ़ी देखते हैं. साथ ही कैसे धान की खेती हो और ऑर्गेनिक खेती के वीडियो भी लोकप्रिय हैं. गाँधी बताते हैं कि इससे कितना फ़ायदा हो रहा है ये समझने के लिए भी वे काफ़ी सघन रूप से काम करते हैं. उनके मुताबिक़ पिछले दो महीनों में जिन लोगों ने वीडियो देखे हैं उनमें से 40 फ़ीसदी लोगों ने उस वीडियो में दिखाए गए तरीक़ों में कम से कम एक तो अपनाया ही है. जब आपका ध्यान इस तथ्य की ओर जाता है कि भारत के लगभग 60000 गाँवों में रहने वाले भारतीयों में से आधे खेती कर रहे हैं और खेती अब भी भारत के सकल घरेलू उत्पाद में से 14 प्रतिशत का योगदान करता है तब आपको गाँधी के प्रोजेक्ट की असली क्षमता का अंदाज़ा होता है. गाँधी सबसे पहले भारत अपने एक दोस्त के साथ जठरोपा उगाने आए थे जिससे बायोडीज़ल बनता मगर वो प्रोजेक्ट विफल हो गया. इसके बाद उन्हें माइक्रोसॉफ़्ट रीसर्च ने नौकरी दी और फिर उन्होंने गाँवों में समय गुज़ारकर ये समझने की कोशिश की कि गाँवों में लोग प्रौद्योगिकी को कितने सहज रूप से स्वीकार करते हैं. इसी बीच वह कोलंबिया विश्वविद्यालय से सतत विकास के क्षेत्र में डॉक्टरेट भी करने गए मगर वहाँ चीज़ें प्रायोगिक न होकर सैद्धांतिक थीं इसलिए छोड़ दिया. वह बताते हैं फिर मैंने सोचा कि अब ज़मीन से जुड़ी असली चीज़ों पर काम किया जाए. इसलिए उनके अनुसार जब वह खेती से जुड़े वीडियो बनाने भारत के एक गाँव पहुँचे तो न तो किसी उम्मीद के साथ वहाँ गए थे न ही पूर्वाग्रह के. गाँधी कहते हैं मेरे लिए ये सब नया है. मुझे जिस बात ने भ्रम में डाला वो ये थी कि एक ही जगह पर किसान थे जो काफ़ी अच्छा कमा लेते थे जबकि पड़ोस का ही किसान परेशान था. रिकिन गाँधी मानते हैं कि विकासशील दुनिया में डिजिटल इनोवेशन को ग़रीबों तक पहुँचना होगा जिससे उनकी ज़िंदग़ी में कुछ सार्थक बदलाव हो सकें. उनके अनुसार पश्चिमी देशों में हम बहुत सी बातों को आम मान लेते हैं. फिर वो चाहे मज़बूत सरकारी तंत्र हो वित्तीय व्यवस्था हो बुनियादी ढाँचा हो या पूँजी. आपको भारत में हमेशा वो नहीं मिलेगा. इसलिए ज़रूरी है कि आप मौजूदा संगठनों सरकारों ग़ैर सरकारी संगठनों निजी क्षेत्रों और स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ मिलकर काम करें और टेक्नॉलॉजी को लोगों तक पहुँचाएँ. डिजिटल ग्रीन्स के ज़रिए वह यही करना चाह रहे हैं. उनकी इस कोशिश को बिल और मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन से आर्थिक मदद भी मिली है और भारत सरकार भी सहायता दे रही है. ख़ाली समय में साइंस फ़िक्शन पढ़ना पसंद करने वाले रिकिन बताते हैं कि वह ख़ुद बदलाव होते देख रहे हैं इसलिए सौभाग्यशाली हैं. और अब तो उन्हें अंतरिक्ष यात्री न बन पाने का अफ़सोस भी नहीं है. वह कहते हैं अब तो अंतरिक्ष कार्यक्रम उस तरह प्रभावी भी नहीं है और फिर हल्के से मुस्कुरा देते हैं. |
| DATE: 2013-09-12 |
| LABEL: science |
| [259] TITLE: मौसम में बदलाव से खत्म हुए मैमथ? |
| CONTENT: हजारों साल पहले धरती पर रहने वाले मैमथ का विनाश मौसम के बदलावों की वजह से हुआ न कि इंसानों की वजह से शोध में मिले नए सबूत यही बताते हैं. एक डीएनए विश्लेषण से पता लगा है कि धरती पर मौसम में बदलाव की वजह से मैमथ का अंत कहीं पहले हो गया था. डीएनए विश्लेषण से पता चलता है कि यूरोप में मैमथ बड़ी तादाद में थे जिनका अंत करीब 30 हज़ार साल पहले हुआ. इस शोध के नतीजों को प्रॉसीडिंग्स ऑफ़ रॉयल सोसायटी बी में प्रकाशित किया गया है. पहले कई शोधकर्ताओं का मानना था कि दमदार मैमथ न केवल बहुतायत में थे बल्कि अपने समय में वो धरती पर खासे फले-फूले. लेकिन इस बारे में शोध कर रहे स्वीडिश म्यूज़ियम ऑफ नैचुरल हिस्ट्री के वैज्ञानिक डॉक्टर लव डेलन के अध्ययन ने पुरानी मान्यता को बदला है. डॉक्टर डेलन कहते हैं जो तस्वीर उभर रही है उसके अनुसार मैमथ गतिशील प्रजाति थी जो स्थानीय उन्मूलन विस्तार और अप्रवास से गुज़री. ये जानना वाकई रोमांचकारी है कि तब इतना कुछ हो रहा था. डॉक्टर डेलन ने लंदन में दूसरे शोधकर्ताओं के साथ करीब 300 मैमथ के डीएन नमूनों का विश्लेषण किया. वैज्ञानिक नमूनों के ज़रिए ये जानने की कोशिश कर रहे हैं कि किसी खास समय पर कितने मैमथ रहते थे और वो कैसे एक से दूसरे स्थान पर गये. उन्होंने पाया कि 1 लाख 20 हजार साल पहले मैमथ तब विलुप्त होने के करीब पहुंच गए थे जब धरती कुछ वक्त के लिए गरम हो उठी. इसके बाद उनकी संख्या लाखों से घटकर कुछ दस हज़ार के आसपास आ गई लेकिन धरती पर एक और हिम युग आने से संख्या फिर बढ़ी. शोधकर्ताओं ने ये भी पाया कि असल में इनके विलुप्त होने की शुरुआत 20 हज़ार साल पहले शुरू हुई तब हिम युग चरम पर था न कि 14 हज़ार साल पहले जबकि धरती दोबारा गर्म होना शुरू हुई जैसा पहले सोचा जाता था. उनका ये भी मानना है कि ठंड इतनी ज़्यादा थी कि मैमथ जो घास खाते थे वो कम हो गई. लिहाज़ा वो खत्म होने लगे. उनकी संख्या में गिरावट और बढ़ी जब हिम युग खत्म हुआ. शायद इसलिए क्योंकि दक्षिण और उत्तर के टुंड्रा में घास की जगह जंगलों ने ले ली. मैमथ कैसे खत्म हुए ये विज्ञान में हमेशा से बहस का विषय रहा है. कुछ का तर्क है कि मनुष्यों के शिकार ने उन्हें खत्म किया जबकि कुछ मानते हैं मुख्य वजह मौसम में बदलाव था. मौसम बदलाव के कारण विलुप्त होने के तर्क की आलोचना में कहा जाता है कि क्योंकि धरती मैमथ के विलुप्त होने से पहले ही गरम हो चुकी थी इसलिए उनके लुप्त होने की ये वजह नहीं हो सकती. नए नतीजे दिखाते हैं कि मैमथ वाकई हिम युगों के बीच में लुप्त हो गए जिससे इस तर्क को बल मिलता है कि वो मौसम बदलने की वजह से लुप्त हुए. साल 2010 में डरहम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने कम्प्यूटर पर उस वक्त का जो माहौल बनाकर दिखाया था ये नतीजे उसे मज़बूती देते हैं. एनएचएम के प्रोफेसर एड्रियन लिस्टर का कहना है इंसानों समेत दूसरे जानवर हिम युग के बाद ज़्यादा सक्रिय हुए और इसलिए दूसरे जीवों से संघर्ष और शिकार भी उनके लुप्त होने की वजह हो सकती है हालांकि ये मुख्य वजह नहीं है. उनका कहना है करीब 20 हज़ार से 50 हज़ार साल पहले हिम युग के दौरान मैमथ की महत्वपूर्ण गतिविधि हुई - उदाहरण के लिए पूर्व से आए मैमथ ने यूरोप के मैमथ की जगह ले ली. प्रोफेसर लिस्टर आगे कहते हैं लेकिन 20 हज़ार सालों के बाद उनकी आबादी इतने नाटकीय तरीके से खत्म होने लगी कि उनका विलुप्त होना शुरू हुआ पहले ये दस हजार साल पहले मुख्यभूमि से ख़त्म हुए और फिर कुछ बाहरी आर्कटिक द्वीपों से. इससे तो यही लगता है कि मौसम में बदलाव के कारण ऐसा हुआ होगा मनुष्य़ों की इस बारे में भूमिका के बारे में अभी पता चलना बाकी है. |
| DATE: 2013-09-12 |
| LABEL: science |
| [260] TITLE: किस्से-कहानियों से बढ़ता है गणित का ज्ञान |
| CONTENT: अगर आपको गणित से डर लगता है तो ज़रा एक मिनट सोचकर बताइए कि खाली वक़्त में आप क्या करना पसंद करते हैं दरअसल एक ताज़ा शोध से पता चला है कि जो लोग अपनी खुशी के लिए कुछ न कुछ पढ़ते रहते हैं उनकी गणित और अंग्रेजी उन बच्चों के मुक़ाबले ज़्यादा अच्छी होती है जो फुर्सत में मुश्किल से ही कुछ पढ़ते हैं. इस शोध के तहत लंदन विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन ने 6000 बच्चों की पढ़ने संबंधी आदतों का परीक्षण किया. इस अध्ययन में पता चला कि बच्चे के विकास के लिए माता-पिता की शिक्षा की अपेक्षा स्वाध्याय की उसकी आदत अधिक महत्वपूर्ण है. शोधकर्ताओं ने पाया कि शब्दावलियों के व्यापक ज्ञान से बच्चों को पाठ्यक्रम की विषयवस्तु को समझने में मदद मिलती है. उन्होंने जिन बच्चों का अध्ययन किया वे सभी एक ही सप्ताह में पैदा हुए थे. अध्ययन में पाया गया कि जो बच्चे दस वर्ष की उम्र में अक्सर पढ़ते थे और 16 वर्ष की उम्र में सप्ताह में एक से अधिक बार कोई किताब या समाचार पत्र पढ़ते थे उनका प्रदर्शन उन बच्चों के मुक़ाबले बेहतर था जो कम पढ़ते थे. शोध में पाया गया कि उनका शब्दों का ज्ञान 14-4 प्रतिशत बेहतर था और दूसरे बच्चों के मुक़ाबले गणित 9-9 प्रतिशत बेहतर और स्पेलिंग 8. 6 प्रतिशत बेहतर थी. अध्ययन में कहा गया कि शौकिया पढ़ने की आदत का असर माता-पिता की शिक्षा से भी अधिक था. अध्ययन की लेखिका डॉक्टर एलिस सुलिवन ने कहा यह आश्चर्यजनक है कि बच्चों में शौकिया पढ़ने की आदत से उनका गणित का ज्ञान बढ़ता है. उन्होंने कहा पढ़ने की आदत के कारण बच्चों में नई सूचनाओं को ग्रहण करने और उन्हें समझने की क्षमता बढ़ जाती है. उन्होंने कहा कि अगर किसी बच्चे का सीमित शब्द ज्ञान होगा तो उसे समझने में दिक्कत हो आएगी ही. |
| DATE: 2013-09-12 |
| LABEL: science |
| [261] TITLE: क्या दिमाग़ पर क़ब्ज़ा संभव है? |
| CONTENT: इंसान के दिमाग़ पर नियंत्रण करना अब वैज्ञानिकों की कोरी कल्पना या तंत्र-मंत्र की किताबों तक ही सीमित नहीं रहने वाला. वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में किए गए एक शोध में इंटरनेट के माध्यम से एक वैज्ञानिक ने दूसरे वैज्ञानिक के दिमाग़ को नियंत्रित करके दिखाया है. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पता चल सकता है कि भविष्य में इंसानों के बीच संवाद कैसे होगा. लेकिन कुछ कहते हैं कि अभी इस सबके बारे में कहना बहुत जल्दबाज़ी होगी. वॉशिंगटन विश्वविद्यालय कैंपस में एक कंप्यूटर स्क्रीन के पास बैठे वैज्ञानिक राजेश राव अपने साथी वैज्ञानिक एंड्री स्टोको को संदेश देते हैं कि वह गोला दाग़ें. कैंपस के दूसरे छोर पर एक कीबोर्ड के सामने बैठे स्टोको न चाहते हुए भी कीबोर्ड का स्पेसबार दबा देते हैं. रावकी स्क्रीन पर गोला उड़कर रॉकेट को लगता हुआ दिखाई देता है. ख़ास बात यह है कि स्टोको को संदेश देने के लिए राव ने न ज़ुबान हिलाई न ही शरीर का कोई और अंग. उन्होंने स्टोको को संदेश अपने दिमाग़ से भेजा. यह घटना एक इंसान के किसी दूसरे इंसान के दिमाग़ पर नियंत्रण करने का पहला प्रमाण है. हालांकि शोधकर्ता इसे थोड़ा कम आकर्षक नाम इंसान से इंसान का दिमाग़ी अंतरसंबंध दे रहे हैं. लेकिन आम आदमी को यह हैरी पॉटर के खलनायक वोल्डेमोर्ट का दिमाग़ पर नियंत्रण करने वाला सम्मोहन शाप जैसा लग सकता है. हालांकि स्टोको इस प्रयोग को मज़ाक़ में मशहूर टीवी सीरीज़ स्टार ट्रेक में स्पोक द्वारा दिमाग़ से बातें साझा करने जैसा बताते हैं. बहरहाल वह कहते हैं इस मामले में इंटरनेट का इस्तेमाल किया गया था. जैसे वह कंप्यूटरों को जोड़ता है उसने दिमाग़ों को जोड़ा था. राव कहते हैं कि एक सोची गई बात को किसी दूसरे के दिमाग़ का पढ़ना और लागू होते हुए देखना सचमुच बहुत उत्साहजनक और अद्भुत था वह कहते हैं अगले चरण में दोनों दिमाग़ों के बीच और दोतरफ़ा संवाद करना होगा. लेकिन दिमाग़ के तकनीक को नियंत्रित करने की और भी कई उदाहरण हैं. जैसे कि सैमसंग दिमाग़ से चलने वाले एक टैबलेट पर प्रयोग कर रहा है. टेक्नोलॉजी फ़र्म इंट्राक्सॉन एक मस्तिष्क संवेदी हेडबैंड की मार्केटिंग कर रही है जिससे आप अपने दिमाग़ से चीज़ों को नियंत्रित कर सकते हो. यह उपकरण पहले ही शारीरिक रूप से अक्षम लोगों द्वारा बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा रहा है. साफ़ है कि इस प्रयोग में इस्तेमाल की गई दिमाग़ के आदेश लेने और देने की तकनीक पहले से ही मौजूद है. इलेक्ट्रोनसैफलोग्राफ़ी वह तकनीक है जिसे राव के दिमाग़ से संदेश भेजने के लिए इस्तेमाल किया गया. इसे सामान्यतः मेडिकल पेशे में खोपड़ी से दिमाग़ की हरकतें रिकॉर्ड करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. ट्रांसक्रेनियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन वह तकनीक है जिससे स्टोको की उंगली ने हरकत की. इस तकनीक का इस्तेमाल किसी हरकत के लिए दिमाग़ को उत्तेजित करने के लिए किया जाता है. लेकिन इन दोनों का एक साथ इस्तेमाल कर एक आदमी से दूसरे के आदेश का पालन करवाना- यह नया है. हालांकि शोधकर्ता यह बताना नहीं भूलते कि यह प्रयोग सिद्धांत के लिहाज़ से बहुत शुरुआती चरण में है. लेकिन रोबोटिक्स में पीएचडी करने वाले और रोबोकैलिप्स के लेखक डेविड विल्सन कहते हैं कि यह प्रयोग सिद्धांत के सबूत के रूप में बहुत महत्वपूर्ण है. वह कहते हैं इसने एक बहस शुरू कर दी है कि भविष्य में दिमाग़ से दिमाग़ का संवाद कैसे समाज को प्रभावित करेगा. हालांकि वह यह भी कहते हैं हालांकि यह प्रयोग इतने छोटे दायरे में किया गया है कि इसका व्यावहारिक रूप से कोई विशेष अर्थ नहीं है लेकिन यह हमें सोचने पर मजबूर तो करता ही है लेकिन सभी प्रभावित नहीं हैं. फ़्यूचरोलॉजिस्ट भविष्य की अध्ययनकर्ता डॉक्टर इयान पीयरसन विज्ञान और अभियांत्रिकी के क्षेत्र से हैं. वह कहती हैं एक साधारण सा विचार की पहचान करने वाला तंत्र बहुत मामूली चीज़ है. अगर वह एक व्यक्ति के विचार को लेकर सीधे दूसरे व्यक्ति में पैदा करवा सकते तो मैं प्रभावित हो जाती. हालांकि सामान्यतः इस क्षेत्र में होने वाला विकास इंसानों के बीच संवाद और सहयोग के असर को लेकर आमतौर पर सहमति है. स्टोको कहते हैं कि संभव है कि एक दिन पायलट के अक्षम हो पाने की स्थिति में ज़मीन बैठा आदमी किसी यात्री के माध्यम से हवाई जहाज़ को ज़मीन पर उतरवाने में कामयाब हो जाए. हालांकि दिमाग़ पर नियंत्रण का पूरा सिद्धांत ही अक्सर इसके दुरुपयोग की आशंकाओं से घिरा रहता है. लेकिन रोबोट नियंत्रित भविष्य के बारे में किताब लिखने वाले विल्सन कहते हैं इस प्रयोग के असर को लेकर आशांवित हैं. वह कहते हैं मुझे इसमें कोई भी ख़तरा नहीं दिखाई देता. यह तो दो अलग भाषा बोलने वाले लोगों को एक बेहतर दल बनाने में सहायता कर सकता है- जिससे समस्याएं जल्दी सुलझ सकेंगी. वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर चंतल प्रत ने भी इस प्रयोग के संचालन में मदद की थी. वह विल्सन की बात से सहमत हैं. चंतल कहती हैं ऐसी कतई संभावना नहीं है कि जिस तकनीक का हम इस्तेमाल कर रहे हैं उसे किसी ऐसे किसी व्यक्ति पर लागू नहीं किया जा सकता जो इसे चाहता न हो या जिसे इसकी जानकारी न हो. डॉक्टर पीयरसन कहती हैं जब दिमाग तक हमारी पूरी तरह सीधी पहुंच हो जाएगी और आप किसी को रोबोट की तरह इस्तेमाल कर सकेंगे तब दिक्क़त हो सकती है. चाहे यह ग़ुलामी हो या सरकारी नियंत्रण- कौन जानता है. आप इस बारे में जिनती चाहें कहानियां लिख सकते हैं. |
| DATE: 2013-09-12 |
| LABEL: science |
| [262] TITLE: बच्चों की परवरिश और अंडकोष में कैसा संबंध? |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने बच्चों की परवरिश में दिलचस्पी और पिता के अंडकोष के आकार के बीच संबंधों का पता लगाया है. अमरीका के इमोरी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कहा है कि जिन लोगों के अंडकोष छोटे होते हैं उनके अपने बच्चों की नैपी बदलने उन्हें खाना खिलाने और समय पर नहलाने के काम में शामिल होने की संभावना रहती है. हालांकि ये अध्ययन केवल अटलांटा के पुरुषों पर किया गया है इसलिए सामाजिक और जीव विज्ञान के नज़रिए से इसके व्यापक परिपेक्ष्य की पड़ताल अभी बाक़ी है. मस्तिष्क के स्कैन में अंडकोष के आकार और अपने बच्चे के चित्र को निहारने में संबंध का पता चला है. लेकिन सांस्कृतिक उम्मीद जैसे कारकों का भी इसमें योगदान होता है. जानवरों में अंडकोष के आकार और उनके स्वच्छंद संभोग के स्तर में भी एक मज़बूत संबंध पाया गया बड़े अंडकोष वाले जानवर अधिक साथियों के साथ संभोग में लगे रहते हैं. शोधकर्ता संभोग में लगने वाले समय और प्रयास या बच्चों की परवरिश में लगाए गए समय के बीच संबंधों के एक विकासवादी सिद्धांत की एक जांच-पड़ताल कर रहे थे. यह शोध नेशनल अकादमी ऑफ़ साइंस के जर्नल में प्रकाशित हुआ है. इसमें 70 पुरुषों को शामिल किया गया जिनके एक से दो साल के बच्चे थे. वैज्ञानिकों ने इन पुरुषों के अंडकोष के आकार और उनके पिता बनने के बीच के संबंधों की पड़ताल की. इस अध्ययन में अटलांटा के एमोरी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की एक टीम ने इन पुरुषों के दिमाग़ का उस समय स्कैन किया जब वे बच्चे के चित्र देख रहे थे. इसमें पता चला कि छोटे अंडकोष वाले लोगों के दिमाग़ में बड़े आकार के अंडकोष वाले लोगों की तुलना में दिमाग़ में अधिक प्रतिक्रिया हुई. इस एमआरआई में छोटे और बड़े अंडकोष वाले लोगों के समूह की मात्रा में तीन गुना अंतर पाया गया. पुरुषों और माँओं से लिए गए इंटरव्यू के आधार पर पता चला कि छोटे अंडकोष वाले पिता के भी बच्चों के परवरिश में सक्रिय होने की अधिक संभावना थी. शोधकर्ताओं में से एक डॉक्टर जेम्स रिलिंग ने बीबीसी से कहा इससे हमें पता चला कि कुछ लोग प्राकृतिक रूप से ही दूसरों की तुलना में अधिक ध्यान रखने वाले होते हैं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि वह दूसरे पुरुषों को छोड़ देता है. यह दूसरे पुरुषों के लिए अधिक प्रयास की ज़रूरत हो सकती है. इनमें से किसी भी कड़ी की वास्तविक प्रकृति बहुत साफ़ नहीं है. शोधकर्ताओं का मानना है कि अंडकोष शायद टेस्टोस्टेरोन नामक हार्मोन की वजह से व्यवहार को प्रभावित करता है. लेकिन यह साफ़ नहीं है कि बच्चा पैदा करने की प्रक्रिया पिता पर प्रभाव डाल सके. डॉक्टर रिलिंग कहते हैं हम जानते हैं कि पुरुष जब पिता के रूप में सक्रिय होते हैं तो टेस्टोस्टेरोन का स्तर नीचे चला जाता है. इस विषय में और साफ़ निष्कर्षों के लिए और अधिक अध्ययन की ज़रूरत है जैसे पिता बनने से पहले और बाद के अंडकोष का आकार का विश्लेषण. |
| DATE: 2013-09-10 |
| LABEL: science |
| [263] TITLE: चीन में पांव पसार रहा है नए लक्षणों वाला 'फ़्लू' |
| CONTENT: चीन में एक नए तरह का फ़्लू अपने पाँव पसार रहा है. वैज्ञानिकों के अनुसार नाक में संक्रमण होने से यह लोगों में तेज़ी से फैल रहा है. इस फ़्लू के फेफड़ों में गहरी पैठ बनाने से लोगों को निमोनिया भी हो रहा है. अमरीकी जर्नल ऑफ़ पैथॉलॉज़ी के लेखकों ने बताया कि इस तरह की दोहरी बीमारी इससे पहले किसी बर्ड फ़्लू में नहीं पाई गई थी. एवियन इन्फ्लूएंजा के फैलने की शुरुआत से अब तक 135 लोग इसके शिकार हो चुके हैं और लगभग 44 लोगों की मौत हो चुकी है. पोल्ट्री बाज़ारों पर प्रतिबंध लगाए जाने से इस फ़्लू का संक्रमण काफ़ी हद तक कम हुआ है. नीदरलैंड के इरास्मस विश्वविद्यालय के मेडिकल सेंटर के एक अध्ययन में इस वायरस से संक्रमित होने वाले शरीर के हिस्सों का अध्ययन किया गया. जुकाम श्वसन तंत्र जैसे नाक और गले के संक्रमण और छींक आने से इस फ़्लू के वायरस के बहुत से संक्रमण हवा में फैल जाते हैं. जबकि दूसरे कई संक्रमण जैसे बर्ड फ़्लू निचले श्वसन तंत्र पर आघात कर ख़तरनाक निमोनिया का कारण बनता था. एक शोधकर्ता प्रोफेसर थिज़्स कुइकेन ने बीबीसी को बताया इस तरह का वायरस पहले नहीं देखा गया है. अध्ययन में ये संकेत मिले हैं कि यह वायरस आसानी से लोगों में संचारित हो निमोनिया का कारण बनता है. वहीं दूसरी ओर सउदी अरब में एक दूसरा फ़्लू तेजी से फैल रहा है. मेर्स-कोरोना नामक एक अलग संक्रमण अब तक 114 लोगों में फैल चुका है और 54 लोगों की जान ले चुका है. मैड्रिड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इस फ़्लू के टीका बनाने की दिशा में पहला कदम उठाया है. शोध अध्ययन जर्नल एम बायो में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक शोधकर्ता बड़ी सावधानी से इस फ़्लू की निगरानी कर रहे हैं और इसकी रोकथाम के लिए दवाओं को विकसित करने की ओर बढ़ रहे हैं. |
| DATE: 2013-09-10 |
| LABEL: science |
| [264] TITLE: घड़ी जो कार और सेहत पर रखे नज़र |
| CONTENT: कार बनाने वाली कंपनी निसान ने एक ऐसी स्मार्टवॉच बाज़ार में उतारी है जो कार के साथ-साथ चालक की सेहत पर भी नज़र रखती है. परंपरागत स्मार्टवॉच की तरह दिखने वाली निसान निस्मो चालक के दिल की धड़कन तापमान और शरीर से जुड़ी दूसरी गतिविधियों पर निगरानी रखने में सक्षम है. साथ ही यह स्मार्टवॉच कार की औसत रफ़्तार और ईंधन खपत पर नज़र रखने में भी चालक की मदद करती है. विशेषज्ञों का कहना है कि ये कार में कनेक्टिविटी बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम हो सकता है. व्हट कार के मुख्य संपादक चेस हैलेट ने कहा कार निर्माताओं का ज़ोर अब कनेक्टिविटी बढ़ाने पर है. कार में इंटरनेट आ रहा है और कंज़्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स घड़ी पर लगाए जा सकने वाले कनेक्शनों की बारी है. निसान ने इस मामले में बाजी मारी है और दोनों को एकसाथ मिला लिया है. निस्मो वॉच को कार में मौज़ूद कम्प्यूटर सिस्टम से जोड़ा जा सकता है ताकि कार के टेलीमेटिक्स और परफॉर्मेंस डेटा पर नज़र रखी जा सके. साथ ही निस्मो का इस्तेमाल करने वाले इस गैजेट के ज़रिए निसान से संदेश हासिल कर सकते हैं. निसान निस्मो को 22 सितंबर तक चलने वाले फ्रैंकफर्ट मोटर शो की शुरुआत से पहले लॉन्च किया गया. यूरोप में निसान के मार्केटिंग कम्यूनिकेशंस जनरल मैनेजर गैरेथ डंसमोर ने कहा पहनी जाने वाली तकनीक का प्रचलन तेज़ी से बढ़ रहा है और हम इसका इस्तेमाल कर लाभ उठाना चाहते हैं. हाल के दिनों में कई कंपनियों ने अपनी स्मार्टवॉच बाज़ार में उतारी हैं. सैमसंग ने गैलेक्सी गीयर और सोनी ने स्मार्टवॉच 2 को लॉन्च किया है. चेस हैलेट कहते हैं कि कंज़्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स फर्मों की तुलना में कार कनेक्टेड घड़ियां ज़्यादा फायदेमंद हो सकती हैं. उन्होंने कहा कल्पना कीजिए कि किसी सर्द दिन आप कार में बैठने से पहले ही उसे गर्म कर पाएं या बारिश की संभावना के कारण कार की छत बंद कर सकें. गैरेथ डंसमोर के मुताबिक़ निसान लीफ इलेक्ट्रिक कार में पहले ही चालक को मोबाइल फ़ोन के ज़रिए कनेक्ट होने की सुविधा मौजूद है और कंपनी की अगली पीढ़ी की घड़ियों में यह सुविधा उपलब्ध रहेगी. कंपनी की योजना आने वाले दिनों में ऐसी घड़ियां बनाने की है जो चालक की थकान उसके ध्यान के स्तर भावनाओं और हाइड्रेशन स्तर का पता लगा सकेंगी. निस्मो तीन रंगों में मिल सकती है और इसकी बैटरी एक हफ़्ते तक चल सकती है. इसे स्क्रीन पर लगे दो बटनों से नियंत्रित किया जा सकता है. |
| DATE: 2013-09-10 |
| LABEL: science |
| [265] TITLE: महासागर की लहरों के नीचे दुनिया का सबसे बड़ा ज्वालामुखी? |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने दुनिया का सबसे बड़ा ज्वालामुखी ढूंढ निकालने का दावा किया है लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि यह ज्वालामुखी प्रशांत महासागर की लहरों के नीचे है. नेचर जियोसाइंस जर्नल में शोधकर्ताओं ने लिखा है कि तीन लाख दस हज़ार वर्ग किलोमीटर के तमु मस्सीफ़ को मंगल ग्रह के ओलिंपस मॉन्स ज्वालामुखी के बराबर माना जा सकता है. ओलिंपस मॉन्स ज्वालामुखी पूरे सौरमंडल में सबसे बड़ा माना जाता है. ये भी साफ़ है कि तमु मस्सीफ़ ज्वालामुखी पृथ्वी के अब तक के सबसे बड़े ज्वालामुखी हवाई के मौना लोआ ज्वालामुखी से बड़ा है. तमु मस्सीफ़ समुद्र के दो किलोमीटर नीचे है. यह ज्वालामुखी जापान के 1600 किलोमीटर पूर्व में पानी के अंदर शेट्स्की राइज़ नाम के पठार पर है. माना जाता है कि यह ज्वालामुखी साढ़े चौदह करोड़ साल पहले तब बना जब ज्वालामुखी के केंद्र से लावा बहा और ढाल की तरह की एक आकृति बनी. शोधकर्ताओं को इस बारे में संदेह है कि इसकी चोटी कभी समुद्र की लहरों से ऊपर उठी होगी. उनका कहना है कि इसके दोबारा फूटने की कोई संभावना नहीं है. समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़ हॉस्टन यूनिवर्सिटी के विलियम सेगर का कहना है कि तमु मस्सीफ ज्वालामुखी कुछ लाख साल में बना होगा और यह तभी से विलुप्त है. विलियम सेगर कहते हैं एक दिलचस्प बात यह है कि क्रिटेशियस युग यानी 14 करोड़ से साढ़े छह करोड़ साल पहले समुद्र में कई पठार थे जो फूट पड़े लेकिन वो तब से नहीं दिखाई दिए. वैज्ञानिक जानना चाहेंगे कि क्योंप्रोफ़ेसर सेगर ने इन संरचनाओं का दो दशक पहले अध्ययन शुरू किया लेकिन यह साफ़ नहीं था कि मस्सीफ़ एक ही ज्वालामुखी था या कई ज्वालामुखी थे. ऐसी संरचना पृथ्वी पर कई जगहों पर होती है. मंगल ग्रह के ओलिंपस मॉन्स की छिछली जड़ें हैं जबकि तमु मस्सीफ की जड़ें पृथ्वी की पपड़ी में 30 किलोमीटर तक जाती हैं. उन्होंने सोचा कि दूसरे बड़े ज्वालामुखी भी समुद्र के पठारों में छिपे होंगे. डॉक्टर सेगर कहते हैं हमारे पास उनके भीतर झांकने या उनकी संरचना समझने के लिए आंकड़े नहीं हैं लेकिन मुझे ताज्जुब नहीं होगा अगर तमु जैसे और ज्वालामुखी भी मौजूद हों. इस ज्वालामुखी को तमु नाम टेक्सास ए एंड एम यूनिवर्सिटी के नाम पर मिला है जहां प्रोफ़ेसर सेगर हॉस्टन यूनिवर्सिटी आने से पहले पढ़ाते थे. |
| DATE: 2013-09-09 |
| LABEL: science |
| [266] TITLE: क्या है यूरोप में दस में से एक मौत का कारण? |
| CONTENT: यूरोपीय रेस्परेटरी सोसाइटी ने हाल ही में जारी अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि यूरोप में होने वाली मौतों के 10 मामलों में से एक फेफड़े की बीमारी की वजह से होती है और धूम्रपान इसका एक बड़ा कारण है. रिपोर्ट के अनुसार अतीत में धूम्रपान की ऊंची दर के कारण आने वाले 20 सालों में फेफड़े का कैंसर और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज सीओपीडी से होने वाली मौतों में इजाफा होगा. लेकिन एक ब्रिटिश लंग चैरिटी संस्था ने कहा है कि ब्रिटेन में होने वाली चार मौतों में से एक का कारण फेफड़े की बीमारी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी तक इसकी रोकथाम इलाज और शोध को लेकर खर्च पर कोई तवज्जो नहीं दी गई है. यूरोपीयन लंग ह्वाइट बुक नामक प्रकाशन में दर्शाए गए आंकड़े फेफड़े की बीमारियों के ढर्रे का विश्लेषण करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूरोपीयन सेंटर फॉर डिसीज प्रीवेंशन एण्ड कन्ट्रोल के ताजातरीन आंकड़ों के आधार पर तैयार किए गए हैं. रिपोर्ट के अनुसार यह पाया गया है कि अटलांटिक से लेकर मध्य एशिया तक फैले डब्ल्यूएचओ यूरोपीयन रीजन में फेफड़े की आम तौर पर सबसे घातक चार बीमारियाँ न्यूमोनिया सीओपीडी कैंसर और टीबी वहाँ होने वाले मौत के मामलों की मुख्य वजह है. ह्वाइट बुक के अनुसार यूरोपीय संघ के 28 देशों में ये बीमारियां आठ में से एक मौत के लिए ही जिम्मेदार हैं. केवल बेल्जियम एक लाख आबादी पर 117 मौत के मामले डेनमार्क हंगरी और आयरलैण्ड ही फेफड़े की बीमारियों से होने वाली मृत्यु के मामलों में ब्रिटेन से आगे है. ब्रिटेन में यह दर एक लाख आबादी पर 112 है. फिनलैंड और स्वीडन में सबसे कम मृत्युदर क्रमशः एक लाख पर 53-7 और 55-7 है. लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि फेफड़े की बीमारी से होने वाली कुल मौतों का अनुपात ब्रिटेन और आयरलैंड में सबसे अधिक है. यह एक ऐसा आंकड़ा है जो ब्रिटिश लंग फाउण्डेशन के अनुसार चार में से एक है. ह्वाइट बुक के आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि श्वसन संबंधी बीमारियों से होने वाली कुल सामाजिक आर्थिक क्षति का कारण धूम्रपान है. रिपोर्ट में धूम्रपान को यूरोप में सबसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य समस्या करार दिया गया है और कहा गया है कि फेफड़े के कैंसर सीओपीडी हृदय रोग जैसी बीमारियों से होने वाली मृत्यु की मुख्य वजह धूम्रपान है जिसकी रोकथाम की जा सकती है. हालांकि 1970 के बाद से डेनमार्क और ब्रिटेन जैसे उच्च मृत्यु दर वाले देशों में धू्म्रपान की दर काफी गिरी है लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि लम्बे समय की ये आदतें कैंसर और सीओपीडी जैसी बीमारियों की दर के ऊंचा बने रहने का कारण हैं. इसका मतलब है कि फेफड़े के संक्रमण में कमी आने के अनुमान के बावजूद फेफड़े की बीमारियों से होने वाली मौतों के अनुपात में आगामी 20 वर्षों तक स्थिरत बनी रहने की संभावना है. साल 2000 से ही राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा एनएचएस उन लोगों को मुफ्त सलाह और दवाएं उपलब्ध कराता रहा है जो धूम्रपान छोड़ना चाहते हैं. पूरे यूरोप के अस्पतालों से इकट्ठे आंकड़ों के विश्लेषण का हवाला देते हुए ह्वाइट बुक में कहा गया है कि आंकड़ों में अधिक विषमता पाई गई है कि मृत्यु दर के ढर्रे से यह मेल नहीं खाता. यूरोपीय रेस्परटॉरी सोसाइटी के अध्यक्ष प्रोफेसर फ्रांसिस्को ब्लासी कहते हैं यदि जीवन प्रत्याशा व्यक्तियों के जीवन की गुणवत्ता और समाज पर आर्थिक बोझ को यूरोप एवं दुनिया भर में कम करना है तो फेफड़ों की बीमारी के रोकथाम और इलाज में सुधारना लाना होगा. ब्रिटिश लंग फाउण्डेशन के प्रोफेसर रिचर्ड हबार्ड कहते हैं कि रिपोर्ट ब्रिटेन में साँस से सबंधित बीमारियों के बोझ की पूरी तस्वीर नहीं दिखाती है. प्रोफेसर हबार्ड के अनुसार कैंसर और सीओपीडी जैसी बीमारियां हर साल हजारों लोगों की जान ले लेती हैं लेकिन इनके अलावा फेफड़े की 40 से अधिक बीमारियां हैं. इनमें से आइपीएफ और मीसोथेलियोमा जैसी कुछ बीमारियों में मृत्युदर दशकों से लगातार बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि ब्रिटेन में फेफड़े के कैंसर से होने वाली मृत्यु दर के उच्च होने का एक यह भी कारण है कि रोगी चिकित्सक के पास बहुत बाद में पहुंचते हैं. प्रोफेसर हबार्ड ने कहा कि फेफड़े की बीमारियों के इलाज और रोकथाम को लेकर एनएचएस की तरफ से जरूरी ध्यान नहीं दिया गया और शोधकर्ताओं को पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं कराया गया. |
| DATE: 2013-09-09 |
| LABEL: science |
| [267] TITLE: कुत्तों की छुट्टी! अब चूहे सूंघेंगे अपराध |
| CONTENT: नीदरलैंड में पुलिस अब अपराध के मामले सुलझाने के लिए चूहों की सहायता लेगी. गोलियों के अवशेषों को सूंघकर सुराग ढूंढने वाले इन पांच भूरे चूहों के नाम मशहूर जासूसों- अगाथा क्रिस्टी के पोइरट और अमरीकी प्राइवेट जासूस मैग्नम पर रखे गए हैं. यह चूहे रॉटरडम के एक ट्रेनिंग सेंटर में अपने हुनर का प्रदर्शन कर रहे हैं. इन चूहों को शुरुआत में गोलीबारी के बाद उन लोगों की पहचान में लगाया जाएगा जिन्होंने बंदूक का इस्तेमाल किया है. चूहों के प्रशिक्षक मॉनिक़ हैमर्सलेग कहती हैं कि चूहे कुत्तों के मुकाबले बेहतर हैं. उनका कहना है कुत्तों को ज़्यादा प्रशिक्षण की ज़रूरत होती है. कुत्ते को प्रशिक्षित करने में ज़्यादा समय लगता है क्योंकि मौके पर उसे ज़्यादा आज्ञाकारी बनाना पड़ता है. वह कहती हैं लेकिन चूहों के साथ ऐसा नहीं है. आप बस उन्हें गंध सुंघा दीजिए. फिर उसे आज्ञाकारी होने की ज़रूरत नहीं है. आप एक चूहे को 10 दिन में भी प्रशिक्षित कर सकते हैं. अगर एक चूहा दो या तीन साल तक जिंदा रह जाता है तो वह काफ़ी काम कर चुका होता है. पुलिसकर्मी मार्क वीब्स चूहे की क्षमताओं को आश्चर्यजनक बताते हैं. वह कहते हैं कई जांचों में चूहों को बहुत विश्वसनीय पाया गया है. वह 95 फ़ीसदी तक सही परिणाम देते हैं. यह कमाल है. वीब्स कहते हैं लेकिन आपको यह समझना होगा कि चूहे जिस चीज़ की ओर इशारा करते हैं वह महत्वपूर्ण जानकारी होती है वह सबूत नहीं है. लेकिन वह जानकारी हमें मदद कर सकती है. |
| DATE: 2013-09-08 |
| LABEL: science |
| [268] TITLE: सौर ऊर्जा के सहारे समुद्र में 585 दिन |
| CONTENT: बिना ईंधन या नाविकों के सौ टन के धातु के साथ आप दुनिया का चक्कर कैसे लगा सकते हैं स्विस निवेशकों और जर्मन इंजीनियरों के एक ग्रुप के लिए इसका जवाब बहुत सीधा है- सूर्य. न्यूज़ीलैंड से कुछ डिज़ाइन की विशेषज्ञता हासिल की गई और बन गई एमएस टुरेनर प्लेनेट सोलर. यह दुनिया की सबसे बड़ी सौर ऊर्जा से चलने वाली नाव है. प्लेनेट सोलर के राशेल ब्रदर्स दि प्यूक्रीडन कहते हैं विचार यह था कि सौर ऊर्जा की असीमित क्षमताओं को दिखाने के लिए दुनिया का चक्कर लगाया जाए. करीब 60000 किलोमीटर चलकर उनके दल ने इसे दुनिया को दिखा भी दिया. टुरेनर को ताक़त 500 वर्गमीटर के सौर पैनलों से मिलती है जिनसे 60वॉट के बिजली के दो इंजन चलते हैं. यह बारी-बारी से स्टैंडर्ड प्रोपेलर को चलाते हैं जिनसे 14 नॉट्स 26 किमी/प्रति घंटा की अधिकतम स्पीड मिल सकती है. अपनी समुद्री यात्रा में टुरेनर सिर्फ़ पांच नॉट्स की औसत गति ही हासिल कर सकी क्योंकि उसके पांच सदस्सीय चालक दल ने भूमध्य रेखा के नज़दीक से यात्रा करने का रूट बनाया था ताकि सूर्य की अधिकतम रौशनी हासिल की जा सके. इसलिए वह 45 दिन के रिकॉर्ड के विपरीत समुद्र में 585 दिन तक रहे. इस नाव में 8 टन की दो लीथियम आयन बैट्री हैं. सूरज न निकलने की स्थिति इनसे नाव को तीन दिन तक चलाया जा सकता है. हालांकि सबसे महत्वपूर्ण संख्या सबसे छोटी है. टुरेनर ईंधन का इस्तेमाल एकदम नहीं करता और कार्बन डाइऑक्साइड भी करीब-करीब बिल्कुल नहीं छोड़ता. हालांकि इसके कप्तान गेरार्ड डि अबोविले कहते हैं टुरेनर को चलाना थोड़ा ख़ास है. आपको होने वाली चीज़ों का बहुत ध्यान रखना पड़ता है. लगातार मौसम पर नज़र रखनी होती है और सूरज के मुताबिक़ अपनी गति रखनी पड़ती है. आपको हमेशा पहले से ही चीज़ें सोचकर रखनी होती हैं. यह बहुत अलग है नावों से ज़्यादा मज़ेदार है. उनकी ताज़ा समुद्री यात्रा भले ही सौर ऊर्जा नाव के लिए पहली थी लेकिन रिकॉर्ड तोड़ना डी अबोविले के लिए नई बात नहीं है. 1980 में अकेले नाव खेकर अटलांटिक पार करने वाले वह पहले व्यक्ति बने थे. 1991 में उन्होंने यही कारनामा प्रशांत महासागर में कर दिखाया. वह कहते हैं जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ रही है मेरी निजी ऊर्जा कम होती जा रही है. इसलिए ऐसे में सूर्य जैसा एक साथी होना काफ़ी अच्छा है. टुरेनर की दुनिया की यात्रा खत्म होने के बाद अब इसके दूसरे अभियान शुरू हो गए हैं. मैसर्स ब्रदर्स डि प्यूक्रेडन कहते हैं कि एक बार सौर ऊर्जा की क्षमता दिखा देने के बाद नाव को अब कोई और लक्ष्य चाहिए था. इसलिए प्लेनट सोलर ने जेनेवा विश्वविद्यालय के साथ गल्फ़ स्ट्रीम पर शोध के एक अभियान के लिए एक समझौता किया है. इसके तहत यह देखा जाएगा गल्फ़ स्ट्रीम के अंदर कैसे बदलाव हो रहे हैं और ये विश्व के तापमान को कैसे प्रभावित कर रहे हैं. विश्वविद्यालय में जलवायु परिवर्तन दल प्रमुख प्रोफ़ेसर मार्टिन बेनिस्टन कहते हैं कि इस नाव ने विज्ञान को आम जनता से संवाद कायम करने में भी सहायता की है. टुरेनर द्वारा पैदा की गई रुचि कमाल की रही है. हमें जनता और मीडिया की इतनी दिलचस्पी का पता नहीं था. इस दल ने अब प्लेनेट सोलर के साथ एक पांच-वर्षीय अनुबंध किया है और यह फिर से अटलांटिक से रियो तक जाने की योजना बना रहा है ताकि वहां सहारा की धूल के सागर पर पड़ने वाले असर का अध्ययन किया जा सके. दुनिया के कार्बन डाउऑक्साइड उत्सर्जन का 2-7 शिपिंग क्षेत्र करता है. इसके मुकाबले हवाई यात्रा 2 ही उत्सर्जन करती है. अंतरराष्ट्रीय जलयात्रा संगठन के अनुसार पानी के जहाज़ों से होने वाला प्रदूषण 2050 तक दुगना हो जाएगा. |
| DATE: 2013-09-08 |
| LABEL: science |
| [269] TITLE: क्या खब्बू लोग जल्दी मरते हैं? |
| CONTENT: कहा जाता है कि दाएं हाथ का इस्तेमाल करने वाले लोग बाएं हाथ का इस्तेमाल करने वालों से नौ साल ज़्यादा जीते हैं. बाएं हाथ का इस्तेमाल करने वाले यानी खब्बू माता-पिता की बेटी होने और खब्बू भाई की बहन होने के नाते मेरे लिए यह चिंता में डालने वाला ख़्याल है. मगर क्या इसमें सच है भी1980 के दशक के आख़िर और 1990 के दशक की शुरुआत में अमरीकी मनोवैज्ञानिकों डाएन हैल्पर्न और स्टेनले कॉरेन ने अपने दो लेखों के ज़रिए इसकी पड़ताल की. दोनों लेख काफ़ी जाने माने वैज्ञानिक जर्नल्स नेचर और न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन में छपे थे. मगर खब्बू लोगों की अकाल मृत्यु की क्या संभावित व्याख्या हो सकती है क्या इसकी वजह यह है कि उनके हाथ-पैर कुदरत के रवैये के विपरीत काम करते हैं दक्षिण इंग्लैंड के हैंपशायर की क्लेयर एलेन कहती हैं चाकू बेहद भौंडी चीज़ हैं. ये सीधे हाथ वालों के हिसाब से बनाए गए हैं. अगर आप उसे बाएं हाथ से इस्तेमाल में लाते हैं तो वो हमेशा तिरछा काटते हैं जबकि सीधे हाथ से काम करने वाले के लिए ये सीधा काटते हैं. मुझे पता है कि मेरी मां बाएं हाथ वाली सिलाई कैंचियों के बिना अक्सर परेशान हो जाया करती थीं. मगर ऐसी चीज़ें किसी इंसान की उम्र क़रीब एक दशक तक कम करने के लिए ज़िम्मेदार नहीं हो सकतीं. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर और राइट हैंड लैफ़्ट हैंड के लेखक क्रिस मैकमैनस कहते हैं यह बिल्कुल सच नहीं है. अगर यह सच होता तो यह किसी इंसान की उम्र तय करने का सबसे बड़ा पैमाना होता. यह बिल्कुल ऐसा होता जैसे आप एक दिन में 120 सिगरेट पी रहे हैं और दूसरे कई ख़तरनाक काम भी एक साथ कर रहे हैं. यह बिल्कुल अविश्वसनीय है कि किसी महमारी की जांच करने वाले वैज्ञानिक को कभी इसका पता ही न चला होता. अगर यह इतना अविश्वसनीय है तो इतने स्थापित शैक्षणिक जर्नल्स में ये लेख क्यों छापे गए और यह मिथक अब तक जारी क्यों है क्रिस मैकमैनस के मुताबिक इसकी वजह है कि शोधकर्ताओं ने बेहद सूक्ष्म ग़लती की थी. शोधकार्य दक्षिणी केलीफ़ोर्निया में हुआ था जहां हर मृत शख़्स की सूची मौजूद है. हैल्पर्न और कॉरेन ने उन लोगों की सूची ली जिनकी हाल ही में मौत हुई थी और उनके परिवारों से संपर्क किया. उनसे पूछा गया कि उनके रिश्तेदार दाएं या बाएं हाथ से काम करते थे. क़रीब दो हज़ार मामलों में उन्होंने पाया कि बाएं हाथ से काम लेने वालों यानी खब्बुओं की मौत के वक़्त औसत उम्र दाएं हाथ से काम लेने वालों के मुक़ाबले क़रीब नौ साल कम थी. इस आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि खब्बू जल्दी मौत का शिकार बने. पहली नज़र में यह बात काफ़ी समझदारी की लगती है. तो फिर शोधकर्ताओं ने ग़लती कहां कीक्रिस मैकमैनस कहते हैं उनकी ग़लती यह थी कि उन्होंने सिर्फ़ मृतकों के आंकड़ों की बात की. अहम बात यह है कि आज खब्बू लोगों की संख्या पहले के मुक़ाबले ज़्यादा है इसलिए जब यह शोध छपा था तो खब्बू लोग औसतन दाएं हाथ वालों के मुक़ाबले छोटे थे. बाएं हाथ से काम करने वालों की क़ुदरती दर 10-11 फ़ीसदी है मगर विक्टोरियन युग में इसे कृत्रिम तौर पर कम कर दिया गया था. क्रिस मैकमैनस कहते हैं आप 1800 से 1900 के बीच इसे गिरता हुआ पाते हैं. इस काल में खब्बुओं को आगे बढ़ने से रोका तो गया ही उनके लिए ज़िंदगी काफ़ी मुश्किल भरी थी और वो जल्द ही विशिष्ट हो गए. मैकमैनस बताते हैं फैक्ट्रियों में वो उन मशीनों पर काम करते थे जो सीधे हाथ वालों के लिए बनाई गई थीं और बाएं हाथ से काम लेने वालों को यह अजीब लगता था. इसके बाद अनिवार्य स्कूलिंग शुरू हुई. उन्हें कक्षाओं में बैठने तो दिया गया पर उन्हें सीधे हाथ से स्याही वाले पैन से लिखने को कहा जाता था और वो उसे गड़बड़ कर देते थे. नतीजा यह हुआ कि खब्बू लोगों को कलंकित किया जाने लगा और उन्हें मूर्ख समझा जाने लगा. इसलिए केलीफ़ोर्नियाई सूचियों में दर्ज मृतकों में से कई खब्बू बेशक पैदा हुए हों मगर उन्होंने अपना ज़्यादातर जीवन दाएं हाथ के लोगों की तरह काम करने और दिखने की कोशिश में बिताया था. जब शोधकर्ता उनके परिवारों के पास पहुंचे तो उन्होंने भी उनके बारे में ऐसे ही ख़्याल जताए थे. इसके चलते शोधकर्ताओं के नतीजे गड़बड़ हो गए. इसकी वजह समझने के लिए थोड़ी देर के लिए आप मान लें कि 40 साल पूर्व यानी 1973 से पहले कोई खब्बू पैदा नहीं हुआ. अब अगर हम 2013 का मृत्यु रिकॉर्ड देखें और जानने की कोशिश करें कि इनमें से कौन इंसान खब्बू था तो हमें पता चलेगा कि इनमें से सभी क़रीब 40 साल की उम्र में या उससे पहले मर गए. यह दाएं हाथ वालों की मौत के समय उम्र से काफ़ी कम होगा. असल में ऐसी स्थिति कभी वास्तव में सामने नहीं आई है - लेकिन 20वीं सदी में ख़ुद को खब्बू कहने वालों लोगों की तादाद अचानक तेज़ी से बढ़ी है. इसलिए यह मानना कि खब्बू यानी बाएं हाथ का प्रयोग करने वाले दाएं वालों के मुक़ाबले नौ साल पहले मर जाते हैं एक मिथक है. ऐसे में कम घातक चोटों के बारे में क्या कहेंगे क्या हमें क्लेयर एलन जैसे लोगों के बारे में चिंतित होना चाहिए जो अपनी रसोई में उन चाकुओं से जूझते हैं जिन्हें सीधे हाथ वालों के हिसाब से बनाया गया हैक्रिस मैकमैनस कहते हैं कुछ सुबूत मौजूद हैं कि बाएं हाथ से काम करने वाले अपेक्षाकृत छोटी दुर्घटनाओं के ज़्यादा शिकार होते हैं. मगर यह पर्याप्त नहीं है और मुझे संदेह है कि इसका मृत्युदर पर कोई बहुत बड़ा असर होता होगा. |
| DATE: 2013-09-08 |
| LABEL: science |
| [270] TITLE: नासा का एक और चंद्र अभियान |
| CONTENT: अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने चांद पर एक अंतरिक्ष मिशन भेज दिया है. बिना इंसान वाले इस अंतरिक्ष अभियान को लाडी एलएडीईई का नाम दिया गया है. इस अंतरिक्ष यान को शनिवार को अमरीका के उत्तरी तट पर स्थित वैलप रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र से भेजा गया. 28 करोड़ अमरीकी डॉलर की लागत वाले इस अभियान का मक़सद चंद्रमा के आसपास के वातावरण का बारीकी से अध्ययन करना है. इसके साथ ही ये चंद्रमा पर फैले धूल और ग़ुबार के व्यवहार के बारे में जानकारी हासिल करेगा. इसके अलावा लाडी चांद पर लेज़र संचार प्रणाली की जांच भी करेगा. इसे नासा अपने भविष्य के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल करना चाहता है. लेज़र प्रणाली के ज़रिए आंकड़े पारंपरिक रेडियो संचार की तुलना में बहुत तेज़ी से भेजे जा सकते हैं. इंजीनियर उम्मीद कर रहे हैं कि लाडी में मौजूद टेस्ट टर्मिनल 600 मेगाबाइट्स प्रति सेकेंड की दर से डाटा डाउनलोड गति हासिल कर पाएंगे. यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ईसीए भी लाडी के संचार कार्यक्रम में दिलचस्पी रखती है क्योंकि इस क्षेत्र को लेकर उसकी भी महत्वाकांक्षा है. फ़िलहाल यूरोप और अमरीका एक दूसरे की खोजों से हासिल होने वाली जानकारियों को डाउनलोड करते हैं और भविष्य में नई तकनीक का इस्तेमाल करने के लिए इसी तरह करते रहने के लिए सहयोग बनाए रखना होगा. अभियान में शामिल वैज्ञानिकों में से एक सारा नोबल का कहना है कि यह मिशन बहुत से उन लोगों को आश्चर्यचकित कर देगा जो यह समझते हैं कि चंद्रमा पर कोई वातावरण या फिर पर्यावरण नहीं है. उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि वहाँ वातावरण निश्चित तौर पर है लेकिन काफ़ी सूक्ष्म है . उन्होंने कहा “यह काफ़ी सूक्ष्म है. अणुओं की संख्या कम होने के चलते अणु ना तो टकराते हैं और ना ही उनका संलयन हो पाता है वैज्ञानिक इसे समझने में इसलिए रुचि रखते हैं कि यह स्थिति सौर प्रणाली के अधिकांश भागों में पाई जाती है. लाडी का वज़न 383 किलोग्राम है और ऊंचाई 4-2 मीटर है जबकि यह 8-1 मीटर चौड़ा है. नासा के विज्ञान प्रमुख जॉन ग्रन्सफ़ील्ड का कहना है कि इस बात में कोई शक़ नहीं है कि ऑपटिकल संचार ही भविष्य है. ग्रन्सफ़ील्ड कहते हैं कि मंगल ग्रह मिशन 2020 को लेकर ये विचार विमर्श चल ही रहा है कि क्या मंगल की सतह पर उतरने वाले रोवर में लेज़र संचार का उपयोग हो सकता है. मेरे ख़्याल से इस बारे में कोई सवाल ही नहीं है कि अगर सौर मंडल में मंगल पर मानवयुक्त यान भेजते हैं और हाई डेफ़िनेशन वाले 3-डी वीडियो चाहते हैं तो वहां से सूचनाएं भेजने के लिए लेज़र संचार का ही उपयोग करना होगा. |
| DATE: 2013-09-07 |
| LABEL: science |
| [271] TITLE: जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही हैं फ़सलों की बीमारियां |
| CONTENT: एक ताजा अध्ययन के मुताबिक़ जलवायु परिवर्तन के कारण फ़सलों को होने वाली बीमारियों और उन्हें नुक़सान पहुंचाने वाले कीड़े-मकौड़े तेज़ी से दुनियाभर में फैल रहे हैं. एक्सेक्टर और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोध से पता चला है कि फ़सलों में लगने वाले कीड़े प्रति साल तीन किलोमीटर की रफ्तार से बढ़ रहे हैं. शोध टीम का कहना है कि ये कीड़े उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव की और बढ़ रहे हैं और उन जगहों पर जमा हो रहे हैं जो उनके लिए कभी ठंढा हुआ करता था. शोध के ये नतीजे नेचर क्लाइमेट चेंज नामक पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं. शोध के मुताबिक़ वर्तमान में बीमारियों के कारण दुनिया की 10 से 16 फ़ीसदी फ़सल बर्बाद हो जाती है. शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि वैश्विक स्तर पर तापमान में वृद्धि के कारण ये समस्या और गंभीर हो सकती है. यूनिवर्सिटी ऑफ़ एक्सेक्टर के मुख्य शोधकर्ता डॉक्टर डैन बीबर का कहना है अगले कुछ दशकों में वैश्विक खाद्यान सुरक्षा के रूप में हम एक अहम चुनौती का सामना करने जा रहे हैं. इस समस्या को जानने के लिए शोधकर्ताओं ने पिछले 50 सालों में दुनियाभर में पता किए गए फ़सलों में लगने वाले 612 कीड़ों-मकौड़ों से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया. इनमें गेहूं में लगने वाले फफुंद अमरीका में चीड़ के पेड़ों में लगने वाले कीड़ों के साथ अन्य जीवणुओं और विषाणुओं का अध्ययन शामिल था. फफुंद अफ्रीका मध्य पूर्व और एशिया में गेहूं में लगने वाले एक प्रमुख कीड़ें हैं. शोधकर्ताओं ने पाया कि कीड़े-मकौड़ों के फैलने की गति अलग-अलग है. कुछ उड़ने वाले कीड़े हर साल 20 किलोमीटर की रफ्तार से बढ़ रहे हैं वैसे 1960 से ये कीड़े औसतन तीन किलोमीटर प्रति साल की रफ्तार से फैल रहे हैं. डॉक्टर बीबर का कहना है हम इन कीड़ों को भूमध्य रेखा से ध्रुव की और बढ़ते हुए देख रहे हैं. शोधकर्ताओं का मानना है कि एक देश से दूसरे देश तक कीड़े-मकौड़ों के पहुंचने के लिए मुख्य रूप से अनाज का वैश्विक कारोबार जिम्मेदार है. हालांकि ये कीड़े किसी नए क्षेत्र में तभी टिक पाते हैं जब वहां की जलवायु उनके लिए अनुकूल हो. डॉक्टर बीबर कहते हैं सबसे आसान परिकल्पना यह है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसा हो रहा है. उनका कहना है कि इसका एक उदाहरण कोलोराडो आलू में लगने वाले कीड़े हैं. गर्मी के कारण ये उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरोप के रास्ते फिनलैंड और नार्वे में पहुंच गए जहां उनके लिए अनुकूल जलवायु है. शोधकर्ताओं का कहना है कि कीड़े-मकौड़ों की गतिविधियों पर बेहतर सूचना का गंभीरता के मूल्यांकन कर समस्या की गंभीरता का पता लगाया जा सकता है. डॉक्टर बीबर का कहना है हमें अपनी सीमाओं को भी सुरक्षित बनाने की जरूरत है हमें ऐसे पौधे लगाने होंगे जिससे कि कृषि क्षेत्र में ये कीड़े न जा पाएं. |
| DATE: 2013-09-06 |
| LABEL: science |
| [272] TITLE: यह कार है या रॉकेट? |
| CONTENT: एक ब्रितानी टीम ऐसी कार बनाने में जुटी है जो एक हज़ार मील प्रति घंटा यानी क़रीब 1610 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से दौड़ेगी. रॉकेट और यूरोफ़ाइटर जैट इंजन से चलने वाली यह कार ज़मीन पर दौड़ने वाला सबसे तेज़ वाहन होगा. 2015-16 में यह कार दक्षिण अफ्रीका के नॉर्थन केप के हेक्सकीन पैन ट्रैक पर दौड़ेगी. पढ़िए बीबीसी के लिए लिखी विंग कमांडर एंडी ग्रीन की डायरी जिनके नाम जमीन पर सबसे तेज रफ्तार कार को दौड़ाने का रिकॉर्ड है. गुडवुड फेस्टिवल ऑफ स्पीड के दौरान गुज़ारे शानदार सप्ताहांत के बाद मैं अभी भी मुस्करा रहा हूँ. ब्लडहाउंड का बड़ा मार्की खेमा उत्साही मेहमानों से भरा था. वे ब्लडहाउंड कार की रफ़्तार उसके ईजे-200 जेट इंजन और सीधे फैक्ट्री से आए एल्मुनियम डिफ्यूज़र को लेकर उत्सुक थे और हमारी टीम से सवाल कर रहे थे. हमारी टीम में प्रेस की भी गहरी दिलचस्पी थी. एक समय तो दो टीमें कवरेज को लेकर आपस में लड़ रही थीं. मुझे डर है कि जब हमारी कार दौड़ेगी तब क्या होगा. रफ़्तार की दुनिया की महान कारों का एक साथ होना और उनकी तुलना करना भी काफ़ी दिलचस्प था. सबसे पुरानी कार थी मैल्कम कैंपबेल की ओरिजनल कार- ब्लूबर्ड 350 एचपी सनबीम. यह अंतिम ट्रैक रेसिंग कार थी जिसके नाम सबसे तेज़ दौड़ने वाली कार का खिताब रहा. इसके बाद रिकॉर्ड बनाने वाली तमाम कारें इसी उद्देश्य से बनाई गईं थीं. 1000 एचपी सनबीम भी वहाँ थी जो हमें विज्ञापन की ताक़त का अहसास करा रही थी. यह कार प्रथम विश्व युद्ध के युग के दो सनबीम मेटाबेले इंजनों पर चलती थी. हर इंजन 435 एचपी ऊर्जा पैदा करता था यानी दोनों इंजन मिलाकर एक हज़ार एचपी से कम ऊर्जा बनाते थे लेकिन जब आप अपनी कार पर बड़े अक्षरों में 1000 एचपी लिखते हैं तो आपको यह जानकर हैरानी होती है कि कितनी तादाद में लोग आप पर यक़ीन कर लेते हैं. हालाँकि वे इसकी रफ़्तार के बारे में सच बोल रहे थे क्योंकि सनबीम ही पहली ऐसी कार थी जिसने 200 मील प्रति घंटा की रफ़्तार का रिकॉर्ड अपने नाम किया था. आज यह चौंकाने वाली बात न लगे पर 1927 में जब हैनरी सेग्रेव ने खुली कॉकपिट में बैठकर फ्लोरिडा के डेटोना बीच पर यह कार दौड़ाई थी तो उनकी आँखों से पानी बह रहा था. हालाँकि 1000 एचपी सनबीम ज़्यादा दिन तक रिकॉर्ड अपने नाम नहीं रख सकी और कैंपबेल और अमरीकी ड्राइवर रे कीच ने ज़ल्द ही उनका रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिया. सीग्रेव ने बेहद ख़ूबसूरत कार गोल्डन एरो से इसका जबाव दिया. यह इतिहास में सबसे कुशल वर्ल्ड लैंडस्पीड रिकॉर्डधारी कार भी थी. मार्च 1931 में इसने 231 मील प्रति घंटा की रफ़्तार का रिकॉर्ड अपने नाम किया. कैंपबेल तो जैसे बर्बाद ही हो गए. उन्होंने अफ्रीका के नॉर्थन कैप में ट्रैक तैयार करने में ही छह महीने लगाए थे और उनकी कार सिर्फ 215 मील प्रतिघंटा की रफ़्तार तक ही पहुँच पाई थी. कैंपबेल भले ही मौके पर चूके हों पर मैं गर्व से कह रहा हूँ कि ब्लडहाउंड एसएससी 2015 में इसी ट्रैक पर दौड़ना शुरू करेगी. कैंपबेल ने ब्लूबर्ड के अंतिम संस्करण को 1935 में 300 मील प्रतिघंटा की रफ़्तार से दौड़ाकर अपना करियर पूरा किया था. गुडवुड फेस्टिवल में यह कार भी रखी गई थी. कैंपबेल तब ब्रितानी सरकार से एक क्लासीफाइड इंजन लेने में कामयाब रहे थे. यह हैरत की बात नहीं कि हमारी टीम भी एक सरकारी प्रोटोटाइप इंजना यानी टाइफून विमान का इंजन इजे-200 पाने में सफल रही है. 1970 में ब्लूफ्लेम ने लैंड स्पीड रिकॉर्ड बनाते हुए 622 मील प्रति घंटा की रफ़्तार दर्ज की थी. इस कार में रॉकेट पॉवर का इस्तेमाल हुआ था. ब्लडहाउंड हज़ार मील प्रतिघंटा की रफ़्तार तक पहुँचने के लिए इजे-200 जेट इंजन के साथ एक बड़ा हाइब्रिड रॉकेट इंजन भी इस्तेमाल करेगी. ब्लूफ्लेम में भी उसी ऑक्सीडाइज़र का इस्तेमाल हुआ था जिसका इस्तेमाल अब ब्लडहाउंड में हो रहा है. कंसेनट्रेटेड हॉइड्रोज़न परॉक्साइड को हाई टेस्ट परॉक्साइड भी कहा जाता है. दोनों कारों में बड़ा फर्क है इनके ईंधन में. ब्लूफ्लेम में तरल प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल हुआ था जबकि ब्लडहाउंड में ठोस रबर ईंधन का इस्तेमाल होगा. रॉकेट के साथ सबसे बड़ी समस्या है- भारी तादाद में ईंधन का इस्तेमाल. ब्लूफ्लेम इतनी भारी थी कि समापन रेखा तक पहुँचने से पहले ही इसका ईंधन खत्म हो जाता था. टीम ब्लूफ्लेम को फोर्ड वी8 से धकेलती थी ताकि इसे गतिमान रखा जा सके. मुझे नहीं लगता कि यह उपाय मौजूदा एफआईए नियमों के तहत वैध होगा. अब गाड़ी को स्वतः संचालित होना ज़रूरी है. ब्लडहाउंड ने बेहतर उपाय खोज लिया है. हमारे पास इजे-200 जेट इंजन है जो हमें 300 मील प्रतिघंटा तक ले जाएगा यब बेहतर शुरुआत होगी. इसके बाद रॉकेट शुरू किया जाएगा. जेट और रॉकेट को एक साथ इस्तेमाल करके हम दोनों क्षेत्रों की सबसे बेहतर तकनीक एक साथ ला रहे हैं. इस महीने हम ब्लडहाउंड के इंजन की क्षमता को लेकर रॉल्स रॉयस से चर्चा कर रहे हैं. कार में इंजन लगाने से पहले हम हर पुर्ज़े का परीक्षण करेंगे. यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. इजे-200 का गियरबॉक्स टेस्ट रिंग पर स्थापित किया जा चुका है. चैसिस साइड रेल को भी उनकी जगह स्थापित किया जा चुका है और अब टीम ऊपरी चेसिस पर काम कर रही है जहाँ इजे-200 इंजन लगाया जाएगा. जल्द ही जैट इंजन भी कार में लगा दिया जाएगा. ब्रितानी सांसद और विज्ञान मंत्री डैविड विलेट्स इस प्रोजेक्ट की काफी मदद कर रहे हैं. उन्होंने ही चेसिस का पहला नट लगाया. ब्लडहाउड एजुकेशन प्रोग्राम के लिए उन्होंने दस लाख पाउंड की सरकारी मदद की घोषणा भी की. |
| DATE: 2013-09-04 |
| LABEL: science |
| [273] TITLE: लाखों वायरस को 'आश्रय' देते हैं स्तनपायी |
| CONTENT: एक ताज़ा शोध से पता चला है कि स्तनपायी जानवरों में तीन लाख बीस हजा़र से ज़्यादा वायरस हो सकते हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि इनसे विषाणुजनित रोगों विशेष रूप से मनुष्यों में फैलने वाले वायरस की खोज से भविष्य की महामारियों को रोकने में मदद मिलेगी. शोधकर्ता टीम का अनुमान है कि इसमें छह अरब डॉलर की लागत आएगी लेकिन यह लागत बड़ी महामारियों से निपटने की लागत का एक हिस्सा मात्र है. यह शोध एमबायो जर्नल में प्रकाशित हुआ है. कोलंबिया विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर इनफेक्शन एंड इम्यूनिटी के निदेशक प्रोफ़ेसर इयन लिपकिन कहते हैं हम वास्तव में स्तनपायी जानवरों से संबंधित सभी विषाणुओं की पूरी विविधता को परिभाषित करने की बात कह रहे हैं. हमारा मकसद अधिक जानकारी जुटाना है ताकि हम उन सिद्धांतों को समझ सकें जो विषाणुओं के कारण पैदा होने वाले ख़तरों का आधार बनते हैं. इंसानों में संक्रमित करने वाले 70 फीसदी वायरस जैसे एचआईवी एबोला और द न्यू मिडिल ईस्ट रेसपिकेटरी सिन्ड्रोम मर्स वन्य जीवों में उत्पन्न होते हैं. लेकिन अभी तक वैज्ञानिकों के लिए समस्या के विस्तार का मूल्यांकन काफी कठिन बना हुआ है. शोधकर्ताओं ने जाँच के लिए अमरीका और बांग्लादेश में चमगादड़ की एक प्रजाति गादुर फ्लाइंग फॉक्स का अध्ययन किया. चमगादड़ों से लिए गए एक हज़ार आठ सौ सत्तानवे सैम्पलों का अध्ययन कर शोधकर्ता अनुमान लगाने में सफल रहे कि वे कितने अन्य रोगाणुओं को ले जाने में वे सक्षम हो सकते हैं. उन्हें शोध में साठ विभिन्न प्रकार के वायरस मिले जिनमें से अधिकांश को पहले कभी नहीं देखा गया था. शोधकर्ताओं ने स्तनपायी जानवरों पर इन आँकड़ों के अध्ययन के बाद निष्कर्ष निकाला कि ऐसे करीब तीन लाख बीस हज़ार वायरस हो सकते हैं जिनका अभी तक नहीं लगाया गया है. उन्होंने आगे कहा कि इन सभी विषाणुओं की पहचान भविष्य के लिए ख़तरा बनने वाली उन बीमारियों का पता लगाने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है जो मानव स्वास्थ्य के लिए ख़तरा बन सकते हैं. प्रोफ़ेसर लिपकिन ने कहा निश्चित तौर पर हम धरती पर मौजूद सारे जानवरों का सर्वेक्षण नहीं कर सकते लेकिन हम अधिक ख़तरे वाले विषाणुओं के संभावित जानवरों के बेहतर मापन की कोशिश कर सकते हैं. वे कहते हैं हम अपने पूर्व अनुभवों का इस्तेमाल करते हुए उन क्षेत्रों की ओर देखते हैं जहां नए संक्रमण के ख़तरे की ज़्यादा संभावना है अथवा जिससे मानव स्वास्थ्य को अधिक नुकसान हो सकता है. उन्होंने कहा कि इस शोध में दस साल लगेंगे और लागत अरबों डॉलर होगी. इसी तरह के एक प्रोजेक्ट प्रीडिक्ट के तहत विश्व के उन हिस्सों में 240 नए विषाणुओं की खोज की गई है जहां इंसान और जानवर आसपास रहते हैं. नॉटिंघम विश्विद्यालय के प्रोफ़ेसर जोनाथन बॉल शोध के बारे में कहते हैं शोधकर्ताओं ने चमगादड़ों पर ध्यान इसलिए केंद्रित किया है क्योंकि वे लोगों के बीच फैलने वाले कई सारे विषाणुओं के प्रसार के मौलिक स्रोत रहे हैं. वे शोध के बारे में कहते हैं लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि चमगादड़ों की जीवनशैली विषाणुओं के काफी अनुकूल है वे बड़े समुदाय में रहते हैं वे सारी दुनिया में फैले हुए हैं और वे लंबी दूरी उड़ान भरते हैं. वे आगे बताते हैं अन्य स्तनपायी जीव भी इसी तरह के वायरसों के संवाहक होते हैं अथवा नहीं यह सवाल पूछना भी काफी महत्वपूर्ण है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि शोधकर्ता इस सवाल की भी पड़ताल कर रहे हैं. उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा क्या इस तरह के विस्तृत अध्ययन से हमें भविष्य के वायरस संक्रमण को रोकने और भविष्यवाणी करने में मदद मिलेगीउन्होंने आगे कहा संभावित विषाणुओं की संख्या काफी बड़ी है केवल चमगादड़ की ही अलग-अलग हज़ार प्रजातियां हैं और इन सभी चमगादड़ों और अन्य जानवरों से विषाणुओं के संभावित ख़तरे की जाँच काफी चुनौतीपूर्ण होगी. |
| DATE: 2013-09-04 |
| LABEL: science |
| [274] TITLE: कभी देखा है मुंह से सुनने वाला मेंढ़क |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने इस गुत्थी को सुलझा लिया है कि दुनिया का सबसे छोटा मेंढ़क कैसे सुनता है. गार्डिनर नाम के इस मेंढ़क के कान नहीं होते हैं और इस कारण अब तक इसे बहरा माना जाता था. नई खोज में पता चला है कि यह मेंढ़क अपने मुंह की मदद से सुनता है. प्रोसीडिंगज़ ऑफ दि नेशनल एकैडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि यह मेंढ़क ध्वनि संकेतों को मस्तिष्क तक भेजने के लिए अपने मुंह का इस्तेमाल करता है. इस खोज के साथ ही इस रहस्य से भी पर्दा उठ गया है कि बिना कान वाले मेंढ़क तेज़ आवाज में टर्र-टर्र कैसे कर लेते हैं. ये नन्हे मेंढ़क सेशेल्स के जंगलों में रहते हैं. इनमें कान जैसी कोई संरचना नहीं होती है. इसका मतलब है कि उनमें कान का पर्दा भी नहीं पाया जाता है. शोधकर्ता इस आधार पर मानते थे कि यह मेंढ़क किसी भी तरह से ध्वनि तरंगों को तंत्रिका कोशिकाओं के माध्यम से मस्तिष्क तक नहीं पहुंचा सकता है. लेकिन ताजा शोध से पता चला है कि इस विशेष प्रजाति के मेंढ़क ने इन पूर्व धारणाओं को नकार दिया है. वैज्ञानिकों ने एक मेंढ़क की आवाज को रिकॉर्ड किया और उस आवाज़ को दूसरे मेंढ़क के करीब बजाया किया ताकि उनके व्यवहार का निरीक्षण किया जा सके. नेचर प्रोटेक्शन ट्रस्ट ऑफ सेशेल्स के सदस्य और शोध दल के सदस्य जस्टिन जेरलॉक ने बताया कि मेंढ़क की आवाज़ जंगल की विशेष आवाज़ों में शामिल है. उन्होंने बीबीसी को बताया यह काफी तेज टरटराहट थी. इस आवाज़ को प्रसारित करने के अनुभव से पता चला कि मेंढ़क इन टरटराहटों को सुन पा रहा था. डॉक्टर जेरलॉक ने कहा यदि आप आवाज़ को प्रसारित करेंगे तो उनकी प्रतिक्रिया देखने को मिलेगी. उन्होंने बताया या तो वो अपनी जगह बदलेंगे- वो यह जानने की कोशिश करेंगे कि आवाज कहां से आ रही है या वो प्रतिक्रिया स्वरूप टर्र-टर्र करेंगे. फ्रांस के नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च के रेनॉड बॉयटल ने बताया यह काफी मजेदार था. यहां तक कि मेंढ़क लाउड स्पीकर पर हमला भी कर सकते थे. बॉयटल इस अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता थे. इसके बाद यह जानने की बारी थी कि वो कैसे सुन पा रहे हैं. इसका पता लगाने के लिए दल ने अत्यधिक संवेदनशील एक्स-रे चित्रण तकनीक का इस्तेमाल किया. इसके लिए ग्रेनोबल में स्थित यूरोपियन सिंगक्राट्रान रिसर्च फेसिलिटी की मदद ली गई. दल ने पाया कि मेंढ़क की तेज आवाज की फ्रीक्वेंसी के अनुरूप ही मेंढ़क के मुंह की गुहिका उसे प्रतिध्वनित कर रही थी. ठीक गिटार की तरह जो आवाज़ को विस्तारित करता है. गार्डिनर मेंढ़क के मुंह की गुहिका और आंतरिक कर्ण के बीच ऊतकों की बेहद पतली परत होती है. ऐसे में ध्वनि तरंगे अधिक कुशलता के साथ मेंढ़क के मस्तिष्क तक पहुंचने में कामयाब होती हैं. डॉक्टर बॉयटल ने कहा कि मुंह की गुहिका के जरिए ध्वनि तरंगों को संप्रेषित करने की इस खासियत के अध्ययन से इंसानों में कई तरह के बहरेपन का इलाज किया जा सकेगा. |
| DATE: 2013-09-03 |
| LABEL: science |
| [275] TITLE: अब थकान से मिल सकती है मुक्ति |
| CONTENT: लंबी हवाई यात्रा से होने वाली थकान और अनिद्रा जिसे जेट लैग कहा जाता है को नियंत्रित करने वाले कारकों का पता लगाने में वैज्ञानिकों को महत्वपूर्ण सफलता हाथ लगी है. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया है कि हवाई यात्रा के दौरान शरीर की जैविक घड़ी को व्यवस्थित होने में एक आण्विक ब्रेक बाधा पहुंचाता है. यह ब्रेक एक प्रकार का प्रोटीन है. सेल नामक जर्नल में प्रकाशित इस प्रयोग के बारे में कहा गया है कि चूहों में जब इस जैविक ब्रेक को नियंत्रित किया गया तो उनमें अनुकूलन की क्षमता तेजी से बढ़ी. जैविक घड़ी हमें दिन और रात के अनुसार अनुकूलन में मदद करती है. इस घड़ी के लिए प्रकाश एक रिसेट बटन की तरह होता है. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि यह खोज जेट लैग और मानसिक बीमारियों के इलाज में मददगार साबित होगी. शोधकर्ता जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्यों अनुकूलन में इतना लंबा समय लगता है. वे मस्तिष्क की मास्टर घड़ी के बारे में जानने की कोशिश कर रहे हैं जो पूरे शरीर के अनुकूलन के लिए जिम्मेदार है. शोधकर्ता डीएनए के उस समूह का अध्ययन कर रहे हैं जिनका व्यवहार प्रकाश के उद्दीपन में बदल जाता है. उन्होंने पाया कि प्रकाश के दौरान बड़ी संख्या में जीन्स सक्रिय हो जाते हैं लेकिन तत्काल ही एसआईके-1 नामक प्रोटीन इनकी सक्रियता को रोक देता है. प्रकाश के प्रभाव को रोक कर यह एक किस्म के ब्रेक का काम करता है. जब चूहों में एसआईके-1 को नियंत्रित कर जैविक घड़ी को 6 घण्टे का अंतराल दिया गया और उन्हें इंग्लैण्ड से भारत की दूरी के बराबर हवाई यात्रा पर ले जाया गया तो उनमें अपनी जैविक घड़ी के साथ अनुकूलन में कम समय लगा. प्रोफेसर रसल फोस्टर का कहना है कि एसआईके-1 का स्तर 50 से 60 प्रतिशत कम किया गया था जो पर्याप्त प्रभाव पैदा करने के लिए काफी है. उनके अनुसार चूहे दिन भर में ही अपनी जैविक घड़ी को छह घंटे तक समायोजित कर लिए. जबकि सामान्य चूहों को इसे समायोजित करने में छह दिन लगे. शोधकर्ताओं का कहना है कि जैविक घड़ी की नियमितता से जुड़ी सिजोफ्रेनिया समेत अनेक मानसिक बीमारियों के इलाज में यह प्रयोग मददगार साबित होगा. |
| DATE: 2013-09-03 |
| LABEL: science |
| [276] TITLE: फलों का जूस नहीं, फल खाएं डायबिटीज़ में |
| CONTENT: अगर टाइप-2 डायबिटीज़ का जोखिम कम करना चाहते हैं तो जमकर फल खाएं. खासकर ब्लूबेरी सेब और अंगूर. ब्रिटिश मेडिकल पत्रिका डायबिटीज़ यूके के अध्ययन में यह सुझाव दिया गया है. ब्लूबेरी डायबिटीज़ जोखिम को 26 फीसदी तक कम कर देता है जबकि अन्य फलों में किसी का भी तीन बार से ज़्यादा का सेवन जोख़िम को दो फीसदी तक कम करता है हालांकि फलों के जूस ऐसा नहीं करते. इस शोध के तहत अमरीका के एक लाख 87 हजार से ज्यादा लोगों का खानपान देखा गया. ब्रिटेन अमरीका और सिंगापुर के शोधकर्ताओं ने इसके लिए अमरीका में नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों के उस अध्ययन के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जिसमें उऩ्होंने फलों की खपत और टाइप-2 डायबिटीज़़ के जोखिम के बीच रिश्तों की पड़ताल की थी. इसमें हिस्सा लेने वाले साढ़े छह फीसदी लोगों यानी कुल 187382 में से 12198 में टाइप-2 डायबिटीज़ विकसित होती देखी गई. अध्ययन में लोगों से हर चार साल पर उनके खानपान पर सवाल पूछे गए कि वो किसी फल को औसतन कितनी बार खाते हैं. अध्ययन में जिन फलों को शामिल किया गया उनमें अंगूर या किशमिश आड़ू आलूबुखारा या खुबानी सूखे बेर केला खरबूजा सेब या नाशपाती संतरे मौसमी स्ट्रॉ़बेरीज़ और ब्लूबेरीज़ शामिल थे. शोधकर्ताओं ने जब आंकड़ों का विश्लेषण किया तो पाया कि हफ़्ते में अगर तीन बार ब्लूबेरी अंगूर और किशमिश सेब और नाशपाती का सेवन किया जाए तो खासतौर पर टाइप-2 डायबिटीज़ का जोखिम कम हो जाता है. शोधकर्ताओं के मुताबिक़ ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इनमें एंथोसाइनिंस का स्तर काफी ज़्यादा होता है. जब इसे चूहे को दिया गया तो उनमें ग्लूकोज़ बढ़ा पाया गया. इन फलों में नैसर्गिक तौर पर पॉलीफेनोल्स भी होते हैं जिनका असर काफ़ी फ़ायदेमंद होता है. अध्ययन में उन्होंने लिखाफलों में बड़ी संख्या में फाइबर एंटीऑक्सीडेंट्स और दूसरे न्यूट्रीटेंस के अलावा पॉलीकेमिकल्स जैसे अलग-अलग तत्व होते हैं जो एक साथ मिलकर जोखिम पर असर डालते हैं. शोधकर्ताओं ने पाया कि फलों का जूस लेने से टाइप-2 डायबिटीज़ का खतरा बढ़ जाता है. लिहाज़ा आंकलन ये रहा कि हफ़्ते में लिए जाने वाले फलों के जूस की जगह सभी तरह के फल लिए जाएं तो स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहेगा. मसलन फलों के जूस की जगह ब्लूबेरी के सेवन से टाइप-2 डाइबिटीज 33 फीसदी कम होती है जबकि अंगूर और किशमिश खाने से 19 फीसदी सेब और नाशपाती से 13 फीसदी और सभी तरह के फलों में किसी को साथ लेने से सात फीसदी जोखिम कम दिखा. फलों के जूस की जगह संतरों आड़ू आलूबुखारा और खुबानी लेने से भी यही प्रभाव देखा गया. विशेषज्ञ कहते हैं कि टाइप-2 डायबिटीज के विकसित होने के जोखिम को कम करने के लिए संतुलित खुराक सबसे बेहतर है. इसमें कई तरह के फल औऱ सब्जियां हों और जहां तक संभव हो इंसान शारीरिक तौर पर सक्रिय भी रहे. |
| DATE: 2013-09-02 |
| LABEL: science |
| [277] TITLE: आसमान में कितने तारे. |
| CONTENT: सितारों से आगे जहां और भी हैं. अब इसी जहान को समझने के लिए इंसान एक बड़ा कदम उठाने को तैयार है. ब्रह्मांड के रहस्यों की अनदेखी अलसुलझी गुत्थी सुलझाने की दिशा में एक बड़ा कदम है जिया टेलीस्कोप. जिया न सिर्फ़ सितारों की गिनती करेगा बल्कि उनके बारे में आकंड़े भी एकत्रित करेगा. इससे सितारों के उद्गम आकाशगंगा की आयु उसके जन्म जैसे जटिल सवालों के जवाब मिल सकेंगे. कैंब्रिज विश्वविद्यालय के गेरी गिलमोर के अनुसार 1990 में शुरू हुए इस अंतरिक्ष अभियान का लक्ष्य लाखों सितारों वाली आकाशगंगा के मध्य और उससे आगे तक का मानचित्र बनाना है. वैज्ञानिकों के बीच इसे लेकर बहुत बहस हुईं कि क्या यह संभव है. अगर हां तो इससे हमारे ब्रह्मांड के बारे में बहुमूल्य जानकारी का ख़ज़ाना हाथ लग सकता है. यह असंभव लगने वाली मशीन तैयार कर अंतरिक्ष में भेजी जा रही है. शुक्रवार को यूरोपीय स्पेस एजेंसी के जिया टेलीस्कोप को फ्रेंच गुएना ले जाया गया जहां मध्य नवंबर में उसके लॉंच की तैयारियां की जाएंगी. यह उपग्रह आकाश का सबसे वृहद नक्शा खींचेगा. जो आने वाले कई दशकों तक खगोल जगत को दिशा दिखाता रहेगा. जिया अरबों सितारों पर बारीक नज़र रखेगी और हर एक का विस्तृत ब्यौरा तैयार करेगी. इसमें ख़ासतौर पर दूरी समेत सटीक कोऑर्डिनेट्स चमक तापमान सरंचना उम्र को शामिल किया जाएगा. टेलीस्कोप इन करीब डेढ़ अरब सितारों की आकाश में गति तो नापेगा ही वह यह भी देखेगा कि वो किस दिशा में जा रहे हैं-हमारी तरफ़ या हमसे दूर. प्रोफ़ेसर गिलमोर कहते हैं कि इसकी यही ख़ासियत उन्हें पागल कर देती है. क्योंकि त्रिआयामी तस्वीरों से आकाशगंगा के उद्भव के चिह्नों का पता चल सकता है. आकाशगंगा के भविष्य और भूत में झांका जा सकता है. वह कहते हैं यह एक समयातीत फ़िल्म होगी और हम इसे देखेंगे. हम इसके अवशेष कूड़े की नदी और इसके शुरुआती टुकड़े देखेंगे जो आज आकाशगंगा बन गए हैं. हम इस प्रक्रिया को को एकदम शुरुआत जब पहली बार यह चीज़ हुई थी वहां ले जा सकते हैं. हम आकाशगंगा के पूरे इतिहास को अपनी आंखों के आगे खुलते हुए देखेंगे. लेकिन यही काफ़ी नहीं है. जिया अपनी दृष्टि में चमकने वाली हर चीज़ का रिकॉर्ड रखेगी. यह हज़ारों-लाखों क्षुद्रग्रहों एस्टेरॉयड धूमकेतुओं नए ग्रहों नाकाम सितारों परिवर्तनशील सितारों सितारों में धमाकों परिवर्तनीय तारा समूहों कई तो अरबों प्रकाश वर्ष दूर होंगी की सूची बनाएगी. यह एक के बाद एक खोजें करती जाएगी- दरअसल यह इतनी ज़्यादा होंगी कि खगोलशास्त्रियों को हर नई सूचना को समझने में बरसों लग जाएंगे. लेकिन यह सब करने के लिए कमाल की इंजीनियरिंग की ज़रूरत पड़ती है. जिया को एक साथ बहुत सी चीज़ों पर नज़र रखनी होगी इसके अलावा सेटेलाइट आंकड़े एकत्र करने के लिए अपनी धुरी पर घूमेगी लेकिन इसका आधार चट्टान की तरह मजबूत होना चाहिए ताकि माप सही रहे. अभियान के प्रोजेक्ट मैनेजर गिसेपे सर्री कहते हैं कि इस अति-क्षमता के लिए बहुत सी चीज़ों की ज़रूरत होती है लेकिन उनमें से कुछ का उल्लेख करना ठीक होगा. वह कहते हैं जिया से हम 20 परिमाण तक नीचे देख सकते हैं. इसका मतलब यह हुआ इंसानी आंखों की क्षमता से 400000 गुना ज़्यादा हल्की चीज़ को देखा जा सकता है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक सितारा न सिर्फ़ इसलिए कमज़ोर हो सकता है क्योंकि वह छोटा है बल्कि इसलिए भी क्योंकि वह बहुत दूर है. दूर तक देखने की क्षमता हमें बहुत से सितारों-करीब एक अरब को देखने की क्षमता देती है. यह इतनी हल्की चीज़ को इसलिए देख सका है क्योंकि इसमें बहुत बड़ा और अत्याधुनिक फ़ोकल प्लेन लगा हुआ है. यह सीसीडी हैं- ठीक वैसी ही जैसी आपके मोबाइल फ़ोन कैमरे में होती हैं. लेकिन यह चिप एक सेमी गुणा एक सेमी की होती है. जिया में लगाई गई चिपों से फोकल प्लेम आधे मीटर तक का बन जाता है. जिया का 106 सीससीडी करीब एक अरब पिक्सल वाली अद्भुत तस्वीरें लेता है. जिया के दोनों टेलीस्कोप एक मजबूत सिलिकॉन कार्बाइड में फ़िट हैं. सर्री कहते हैं चाहे वातावरण में कितने ही परिवर्तन हों यह नहीं हिलेगा. यह पूरी तरह टिकाऊ है. जिया में घूमने वाला कोई उपकरण नहीं है. पृथ्वी से संपर्क करने वाला एंटीना भी इलेक्ट्रॉनिकली काम करता है यांत्रिकीय ढंग से नहीं. 90 के दशक में जब खगोलविज्ञानी इस अभियान की तैयारी कर रहे थे तब उन्होंने सितारों की उस संख्या का अनुमान लगाया जिससे आकाशगंगा के अध्ययन का आधार मिल सके क्योंकि आकाशगंगा में अरबों-शायद 100 अरब सितारे हो सकते हैं. फिर उन्होंने यह हिसाब लगाया कि जिया के मापन में किस स्तर की सटीकता चाहिए होगी. यह उपग्रह स्टेलर पैरेलैक्स विधि का इस्तेमाल करता है. इसमें सूर्य के चारों ओर पृथ्वी के कक्ष की विपरीत दिशा से देखकर किसी सितारे की आकाश में गति को नापा जाता है. चूंकि हम सूर्य-पृथ्वी की दूरी को अच्छी तरह जानते हैं. इसलिए संभव है कि हम सितारे के पिछले छह महीने में आसमान में बनाए गए कोण को समझ सकें. यह त्रिकोणमिती का एक मामूली अंश है लेकिन ये बहुत छोटे कोण हैं. वस्तुतः एक आर्कसेकेंड कोण को नापने का पैमाना- एक डिग्री का साठवां हिस्सा के कुछ टुकड़े भर. अतिरिक्त टिकाऊ होने का मतलब है कि इसके निष्कर्ष शानदार सटीकता वाले होंगे- सबसे नज़दीकी सितारे के लिए सात माइक्रो-आर्कसेकेंड तक. यह एंगल चांद पर खड़े अंतरिक्षायात्री के सूट के बटन को देखने जैसा ही होगा. ईएसए की निदेशक अलवारो गिमन्ज़ कहती हैं जिया एक खगोलविज्ञानी का सपना है. जिया ऐसी मशीन है जो सितारों के बारे में हमारे सभी सवालों का जवाब देने के लिए बनाई गई है. |
| DATE: 2013-09-01 |
| LABEL: science |
| [278] TITLE: 'नए तत्व' से बदलेगी ज़िंदगी? |
| CONTENT: एक नए तत्व के लिए शोधकर्ताओं को और सबूत मिले हैं. हालांकि रसायन और भौतिकशास्त्र की आधिकारिक संस्था ने इस नए तत्व की पुष्टि नहीं की है. वैज्ञानिकों ने पहले से अपुष्ट इस नए तत्व के वजूद के पक्ष में नए सबूत पेश किए हैं. इस तत्व की परमाणु संख्या 115 मानी जा रही है. ये तत्व बेहद रेडियोएक्टिव है और एक सेकेंड से भी कम समय तक टिकने के बाद हल्के परमाणुओं में बदल जाता है. रूस के वैज्ञानिकों ने साल 2004 में इस बेहद भारी तत्व की खोज की थी. रसायन और भौतिकशास्त्र की आधिकारिक संस्था ने इसकी पुष्टि नहीं की है. इस तत्व के लिए फिज़िकल रिव्यू लेटर्स नाम के जर्नल में सबूत पेश किए गए हैं. स्वीडन के परमाणु भौतिकी के प्रोफेसर डर्क रुडोल्फ कहते हैं “ये एक बहुत सफल प्रयोग था और इस क्षेत्र में बीते कुछ सालों में ये सबसे अहम प्रयोग है. प्रोफेसर रुडोल्फ का कहना है कि इस तत्व की खोज के बाद इसकी प्रोटॉन संख्या की स्वतंत्र पुष्टि होनी है. प्रोफेसर रुडोल्फ ने कहा “ये खोज मानक प्रमाणों के परे है. शोधकर्ताओं ने एक संभावित नए तत्व का नया आइसोटोप यानी समस्थानिक बनाया जो अल्फा डिके नाम की एक रेडियोएक्टिव प्रक्रिया से दूसरे कणों में बदल गया. शोधकर्ताओं के मुताबिक उन्होंने कुछ ऐसे आंकड़ों को भी छुआ जिनसे एक बहुत भारी परमाणु नाभिक की संरचना और गुणों के बारे में गहरी जानकारी मिलती है. इन शोधकर्ताओं ने अमरीसियम तत्व की एक पतली फिल्म पर कैल्शियम के आयनों की बौछार की जिससे उन्हें नए तत्व के अल्फा डिके के संबंध में प्रकाश के कणों फोटॉनों को मापने में मदद मिली. फोटॉनों की कुछ ऊर्जा एक्सरे विकिरण से संभावित ऊर्जा से मिलती है. जो नए तत्व की फिंगरप्रिंट के तौर पर काम करती है. ये प्रयोग जर्मनी में जीएसआई प्रयोगशाला में हुआ जहां वैज्ञानिक पहले छह नए तत्व खोज चुके हैं. संभावित नए तत्व की इंटरनेशनल यूनियंस ऑफ प्योर एंड अप्लाइड फिज़िक्स एंड केमिस्ट्री के सदस्यों की एक कमेटी समीक्षा करेगी. ये कमेटी ये तय करेगी कि नए तत्व को मान्यता देने से पहले कुछ और प्रयोगों की सिफारिश की जाए या नहीं. |
| DATE: 2013-08-31 |
| LABEL: science |
| [279] TITLE: 'फेस मशीन' पढ़ लेगी चेहरे की ख़ुशी और ग़म |
| CONTENT: आपका चेहरा आपके बारे में क्या कह रहा है किसी के लिए ये बताना शायद मुश्किल हो लेकिन एक नई तकनीक के बारे में दावा किया जा रहा है कि वो चेहरा देखकर पहचान लेगी कि आप ख़ुश हैं उदास हैं या बोर हो रहे हैं. इससे ऑनलाइन विज्ञापन कंपनियों को पता चल सकेगा कि आप उनके विज्ञापन पेज को देखकर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं लेकिन कंपनी इसके लिए पहले आपकी अनुमति लेती है. इसके बाद बायोमेट्रिक ट्रैकिंग के लिए विशेष वेबकैम से आपके चेहरे के भावों को रिकार्ड करती है. इस तकनीक का इस्तेमाल अभी बड़े बजट के विज्ञापनों को लांच करने से पहले लोगों के रुझान को जानने के लिए किया जाता है. बीबीसी ने इस तकनीक का विकास करने वाले रीयलआइज़ के साथ मिलकर अपने रेडियो-4 के श्रोताओं पर प्रोग्राम यू एंड योर्स की रिलीज से पहले अनौपचारिक प्रयोग किए. इस प्रयोग में रेडियो-4 के 150 श्रोताओं की भावनाओं का पता लगाया गया जिसमें रेडियो प्रोग्राम की बेहतरीन धुनों को सुनने के दौरान हंसने और मुंह बनाने की उनकी छोटी-छोटी भावनाओं को दर्ज किया गया. प्रोग्राम सुनने वालों को द आर्चर्स और सेलिंग बाय की लोकप्रिय धुनों के साथ-साथ गॉड सेव द क्वीन की धुन भी सुनाई गई ताकि पता लगे कि श्रोता कैसे उनकी तुलना करते हैं. रियलआइज़ के प्रबंध निदेशक मिखाइल जैट्मा ने बीबीसी को बताया कि “यह कंप्यूटर प्रोग्राम देखने में सक्षम है कि लोगों की भौंहें मुंह और आंखें कैसे गति करती है वैश्विक स्तर पर छह भावनाएं होती हैं जो सबके लिए समान होती है. इनके ऊपर भौगोलिक क्षेत्र और उम्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. मिखाइल जैट्मा कहते हैं कि “हमने कंप्यूटरों को लोगों के चेहरे पर आने वाली भावनाओं को पढ़ने में सक्षम बनाने के लिए प्रशिक्षित किया है. हम उम्मीद करते हैं कि यह तकनीक भविष्य में विज्ञापनों को उपयुक्त कम खीझ और दबाव वाला बनाने में सहायक होगी. लोगों के चेहरे के भावों से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक द आर्चर्स और सेलिंग बाय के लिए प्रारंभ में ख़ुशी की दर ज़्यादा थी जब लोगों ने धुनों को पहचानना शुरु किया. इस प्रयोग में ख़ुशी के अतिरिक्त उलझन गुस्से आश्चर्य और अरुचि की भावनाओं का भी मूल्यांकन किया गया. |
| DATE: 2013-08-31 |
| LABEL: science |
| [280] TITLE: 'स्काइप' ने मिटा दी दुनिया की दूरी |
| CONTENT: दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने में बैठे अपनों को देखने की हसरत पूरा कराने वाली ऑन लाइन वीडियो चैट सर्विस स्काइप 10 साल की हो गई है. दुनिया के लाखों लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी वॉयस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल वीओआईपी और वीडियो चैट सेवा को हम आज हल्के में लेते हैं लेकिन 10 साल पहले शुरू हुई इस सेवा का जब कुछ लोगों ने पहली बार इस्तेमाल किया तो वे खुद पर भरोसा ही नहीं कर पा रहे थे. आज स्काइप की तरह कई कंपनियां ऐसी सेवा दे रही हैं. गूगल हैंगआउट्स एपल की फेसटाइम ब्लैकबेरी की बीबीएम टैंगो और वीबर कुछ ऐसी ही लोकप्रिय सेवाएं हैं. पहली बार स्काइप का इस्तेमाल करने वाले एक दंपति लू यंग और हामिद सिरहान की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. लंदन में रहने वाले इस दंपति के परिवार में जब किलकारी गूंजी तो वे बहुत खुश हुए. लेकिन लू यंग को पता था कि वह चीन में रहने वाले अपने माता-पिता के साथ इस खुशी को नहीं बांट सकती. ऐसे में स्काइप उनके लिए इस मुराद को पूरा कराने का ज़रिया बना. उन्होंने स्काइप के ज़रिए वीडियो कॉल कर अपने माता-पिता को उनकी पोती से मिलवाया . यंग कहती हैं हम हर शाम को उनसे बात करते हैं और उनके लिए पोती को बढ़ते हुए देखने का यही एक मात्र जरिया है. वे लंदन आने का खर्च नहीं उठा सकते और हम भी बीजिंग नहीं जा सकते. आज यंग अन्य लोगों से संपर्क स्थापित करने में भी इस सेवा का इस्तेमाल करती हैं. दरअसल इस तकनीक ने यंग जैसी किसी मध्यवर्गीय महिला का ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम लोगों की जिंदगी को बदल दी है. अमरीका के सिएटल के बाल अस्पताल के डॉक्टर मनीष बत्रा स्काइप के ज़रिए युगांडा के डॉक्टरों को विशेष जानकारियां देते हैं. उनका कहना है कि ईमेल या फोन की तुलना में वीडियो के जरिए जटिल प्रक्रियाओं को समझाना आसान हो जाता है. साल 2011 में दिग्गज सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने 8-5 अरब डॉलर में स्काइप को खरीद लिया था. लेकिन संभवतः लोगों को यह नहीं पता होगा कि माइक्रोसॉफ्ट के कॉरपोरेट मामलों के उपाध्यक्ष स्काइप मार्क जिलेट का इस सेवा के बारे में अनुभव कम दिलचस्प नहीं है. इस बारे में जिलेट ने बीबीसी से कहा करीब एक साल पहले मैंने कुछ तस्वीरें देखीं जिसमें लोगों ने अपने पूरे परिवार को इकट्ठा करने के लिए अपने लैपटॉप को एक प्रोजेक्टर से जोड़ रखा था. उन्होंने कहा उत्तर कोरिया और चीन में एक ऐसा परिवार था जो कभी भी एक-दूसरे से नहीं मिला था. लेकिन वीडियो चैट ने दुनिया की इस भौगोलिक दूरी को पाटने का काम किया. इन तमाम अच्छाइयों के बीच इस तकनीक का इस्तेमाल कुछ गलत उद्देश्यों के लिए भी किया जाने लगा है. पिछले दिनों ऑस्ट्रेलियाई सेना के एक जवान को स्काइप के जरिए कुछ अनैतिक गतिविधियों को दिखाते हुए पकड़ा गया. लेकिन इन सबके बावजूद स्काइप लोगों की ज़िंदगी के लिए अहम बना हुआ है. |
| DATE: 2013-08-31 |
| LABEL: science |
| [281] TITLE: 'ड्राइविंग करते हुए बात करने से ख़तरा नहीं' |
| CONTENT: अमरीका में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या और गाड़ी चलाते वक्त फ़ोन पर बात करने के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है. यह कहना है कारनेगी मेलन विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स एलएसई के शोधकर्ताओं का जिन्होंने अमरीका के आठ शहरों में 80 लाख से ज़्यादा कार दुर्घटनाओं का विश्लेषण किया. शोधकर्ताओं ने स्थानीय समय के मुताबिक रात नौ बजे के बाद वाले आंकड़ों का तीन साल तक अध्ययन किया. हालांकि उनका कहना है कि शोध में ड्राइविंग करते हुए मैसेज करने या इंटरनेट का इस्तेमाल करने को शामिल नहीं किया गया है. शोध के लिए 2002-005 के समय का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि इस दौरान अमरीका में बहुत से मोबाइल फ़ोन ऑपरेटर नौ बजे के बाद मुफ्त कॉल्स दे रहे थे. कारनेगी विश्विवद्यालय के प्रोफ़ेसर सौरभ भार्गव और एलएसई के डॉक्टर विक्रम पठानिया के मुताबिक रात नौ बजे के बाद फ़ोन कॉल्स में तो भारी वृद्धि दर्ज की गई लेकिन इस दौरान सड़क दुर्घटनाओं में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई. डॉक्टर पठानिया ने बीबीसी को बताया कि वह इन परिणामों से बहुत आश्चर्यचकित हुए. उन्होंने कहा शुरुआत में तो हमें लगा कि यह संख्या गड़बड़ है. हमने सारी चीज़ों को एक बार फिर से जांचा- लेकिन कहीं कुछ नहीं हो रहा था. हमने देखा कि मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल में भारी उछाल था लेकिन इसका कार दुर्घटना पर कोई असर नहीं था. डॉक्टर पठानिया कहते हैं कि अमरीकी आर्थिक पत्र में शोध के नतीजे बहुत सी आपत्तियों के साथ छापे गए. हमने सिर्फ़ बातचीत को देखा था मैसेज करने या इंटरनेट के इस्तेमाल को नहीं. यह भी हो सकता है कि उस समय नौ बजे ट्रैफ़िक ऐसा हो कि फ़ोन का आराम से किया गया इस्तेमाल कोई खतरा न पैदा करता हो. वह कहते हैं अब आगे के शोध को स्मार्टफ़ोन पर केंद्रित होना चाहिए और अलग-अलग वर्ग के आधार पर फ़ोन के पूरे इस्तेमाल का अध्ययन किया जाना चाहिए. युवा पुरुषों और नए ड्राइवरों का अध्ययन नई तस्वीर सामने ला सकता है. लापरवाही से गाड़ी चलाने वालों को ध्यान भटकाने के लिए कोई न कोई चीज़ मिल ही जाती है. ब्रिटेन में साल 2003 में गाड़ी चलाते वक्त फ़ोन के इस्तेमाल पर आधिकारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया था. हाइवे नियमावली के अनुसार हैंड्स-फ़्री पर बात की जा सकती है लेकिन अगर पुलिस को लगता है कि आप का ध्यान भटक रहा था तो आप पर जुर्माना लगाया जा सकता है. भारत में भी गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है. मोटर व्हीकल एक्ट1988 के अनुसार मोबाइल पर बात करते हुए पहली बार पकड़े जाने पर एक हज़ार रुपये तक का जुर्माना और छह महीने की जेल हो सकती है. तीन साल के अंदर यही ग़लती दोबारा करने पर दो साल तक की सज़ा और दो हज़ार रुपये तक का जुर्माना लग सकता है. |
| DATE: 2013-08-30 |
| LABEL: science |
| [282] TITLE: प्रयोगशाला में विकसित हुआ इंसानी दिमाग़ |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में छोटे आकार का मानव मस्तिष्क विकसित किया है. मटर के बराबर का ये अंग ठीक उतना बड़ा है जितना नौ हफ़्ते के भ्रूण में पाया जाता है. लेकिन इसमें सोचने की क्षमता नहीं है. समझा जाता है कि ये तंत्रिका से जुड़ी बीमारियों के इलाज में मददगार साबित होगा. वैज्ञानिकों ने कुछ असामान्य बीमारियों की जानकारी हासिल करने के लिए इस मस्तिष्क की मदद ली है. इस शोध के बारे में विज्ञान पत्रिका नेचर में लेख छपा है. तंत्रिका विज्ञान से जुड़े वैज्ञानिकों ने नई खोज को चौंका देनेवाला और दिलचस्प बताया है. मानव मस्तिष्क शरीर में पाए जाने वाले सभी अंगों में सबसे अधिक जटिल माना जाता है. ऑस्ट्रियन अकादमी ऑफ़ साइंसेस के वैज्ञानिक अब मानव मस्तिष्क के शुरूआती आकार को विकसित करने में कामयाब हो गए हैं. वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग के लिए या तो मूल भ्रूणीय कोशिकाओं या वयस्क चर्म कोशिकाओं को चुना. इनकी मदद से भ्रूण के उस हिस्से को तैयार किया गया जहां दिमाग़ और रीढ़ की हड्डी का हिस्सा विकसित होता है. इन कोशिकाओं को जेल की छोटी बूंदों में रखा गया और फिर इन्हें घूमने वाले बायोरिएक्टर में डाला गया ताकि उन्हें पोषण और ऑक्सीजन हासिल होती रहे. ये कोशिकाएं विकसित होकर ख़ुद को दिमाग़ के अलग-अलग हिस्सों में बांटने में कामयाब रही हैं. इसमें दिमाग़ का बाहरी आवरण आंख के पीछे का पर्दा और बहुत कुछ मामलों में हिप्पोकैम्पस जैसे हिस्से मौजूद पाए गए हैं. हिप्पोकैम्पस वयस्कों में याददाश्त से संबंधित हैं. ये मस्तिष्क पिछले साल भर से जीवित हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि मस्तिष्क के विकास से दवाओं के रिसर्च में भी मदद मिलेगी. अब इन दवाओं का परीक्षण चूहों और दूसरे जानवरों के बदले इन्हीं पर हो सकेगा. इससे पहले शोधकर्ता मस्तिष्क की कोशिकाओं का विकास कर पाए थे लेकिन ये पहली बार है जब वो इंसानी दिमाग़ को विकसित करने के इतने क़रीब पहुंचे हैं. |
| DATE: 2013-08-30 |
| LABEL: science |
| [283] TITLE: हैकरों के निशाने पर सबसे ज़्यादा एंड्रॉयड फ़ोन |
| CONTENT: अमरीकी अफसरों के मुताबिक एंड्रॉयड आपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल करने वाले मोबाइल फोनों को हैकरों ने सबसे ज़्यादा निशाना बनाया है. साल 2012 के आंकड़ों के मुताबिक हैकिंग के कुल मामलों में से 79 फ़ीसदी मामलों में उपभोक्ता गूगल के एंड्रॉयड आपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल कर रहे थे. सार्वजनिक सूचनाओं की वेबसाइट पब्लिक इंटेलिजेंस ने अमरीकी सुरक्षा विभाग और फ़ेडरल ब्यूरो ऑफ़ इंवेस्टीगेशन एफ़बीआई के मेमो को प्रकाशित किया है. इसके मुताबिक नोकिया का सिम्बियन सिस्टम हैकरों के निशाने पर दूसरे स्थान पर रहा है. जबिक एपल के आईओएस वाले फोन पर 0-7 फ़ीसदी हैकिंग के हमले हुए. एंड्रॉयड दुनिया भर में सबसे लोकप्रिय मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम है और एफ़बीआई के मेमो के मुताबिक बाज़ार में सबसे ज़्यादा हिस्सेदारी और ओपन सोर्स आर्किटेक्चर के चलते इस सिस्टम को ज़्यादा निशाना बनाया गया है. एंड्रॉयड पर ज़्यादातर हमले फेक मैसेज़ के ज़रिए हुए हैं. मेमो के मुताबिक गूगल के प्ले मार्केट प्लेस और रूट किट्स की फेक साइट भी बन गई हैं जिनके ज़रिए हैकर फोन का इस्तेमाल करने वालों के की वर्ड और पासवर्ड को आसानी से तोड़ देते हैं. इस मेमो में ये भी कहा गया है कि एंड्रॉयड का इस्तेमाल करने वाले लोगों में 44 फ़ीसदी लोग अभी भी ऑपरेटिंग सिस्टम का पुराना वर्ज़न इस्तेमाल करते हैं. खासकर 2-3-3 वाला वर्जन जबकि बाज़ार में आधुनिक वर्जन 2-3-7 तक उपलब्ध हो चुके हैं. पुराने सिस्टम में तकनीकी खामियां मौजूद थीं जिसे बाद में दूर कर लिया गया. इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि फ़ेडरल स्टेट और स्थानीय अधिकारियों के बीच मोबाइल फ़ोन के बढ़ते इस्तेमाल के चलते यह जरूरी है कि सब आधुनिक मोबाइल का इस्तेमाल करें. एपल ने कहा है कि 60 करोड़ लोग आईफोन और आईपैड का इस्तेमाल करते हैं जिसमें 93 फ़ीसदी उपभोक्ताओं के पास सबसे आधुनिक आईओएस 6 वर्ज़न मौजूद है. इसका अगला आधुनिक वर्ज़न अगले महीने बाज़ार में आ सकता है. ये पहला मौका नहीं है जब गूगल के लोकप्रिय फ़ोन सॉफ्टवेयर पर सवाल उठाए गए हैं. |
| DATE: 2013-08-30 |
| LABEL: science |
| [284] TITLE: मच्छर पनपने की जगह रोकना ज़रूरी |
| CONTENT: एक नए अध्ययन के अनुसार अफ्रीका और एशिया में मलेरिया के मामलों को रोकने के लिए मच्छर पनपने की संभावित जगहों की रोकथाम की जानी चाहिए. शोधकर्ताओं का कहना है कि दिनों-दिन मच्छरों पर कीटनाशकों का असर कम होने की वजह से मलोरिया जैसी बिमारी की रोकथाम के लिए नए उपाय किए जाने की जरूरत है. इन उपायों में पानी को एक जगह पर इकट्ठा होने से रोकने की ज़रूरत है जहां मच्छरों के लार्वा पनपते हैं. वर्ष 2010 में छह लाख लोगों की मलेरिया से मौत हो गई थी इनमें अधिकांश अफ्रीका के बच्चे शामिल हैं. जबकि पिछले एक दशक में मलेरिया से होने वाली मौतों की संख्या में एक चौथाई कमी आई है. बीबीसी के विश्व स्वास्थ्य संवाददाता ट्यूलिप मजूमदार की रिपोर्ट के अनुसार इसकी वजह दूरदराज़ इलाकों में मच्छरदानी का इस्तेमाल और घरों में कीटनाशकों का छिड़काव है. लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसीन के शोधकर्ताओं की नई रिपोर्ट में कहा है कि जैसे-जैसे इन कीटाणुओं पर रसायनों का असर कम होता जा रहा है उसे देखते हुए प्रशासन को लार्वल सोर्स मैंनेजमेंट का इस्तेमाल करना चाहिए. इन उपायों के तहत पानी इकट्ठा होने वाले खेतों गढ्ढों जैसी जगहों को पहले ही भर देना चाहिए ताकि मच्छरों के लार्वा पनपने से पहले ही मर जाएं. लेकिन रिपोर्ट की लेखिका लूसी टस्टिंग मानती है कि इस तरह के उपाय की अपनी सीमाएं हैं. कई जगहों पर काफी मशक्कत करने की ज़रूरत पड़ती है जहां काफी लागत आती है. जबकि दूसरे मामलों में एक छोटे गांव के बीच स्थित तालाब को भर कर थोड़े ही प्रयास से मच्छरों की तादाद घटाई जा सकती है. दूसरी ओर विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि यह शोध इस तरह के उपाय के समर्थन में पर्याप्त नहीं है और इसका ग्रामीण क्षेत्रों में इस्तेमाल की सिफारिश नहीं की जा सकती है जहां मच्छरों के पनपने की जगहों का पता लगाना मुश्किल होता है. संगठन का कहना है कि लार्वल सोर्स मैंनेजमेंट का इस्तेमाल केवल कीटनाशक छिड़काव और मच्छरदानियों के साथ ही किया जा सकता है. |
| DATE: 2013-08-29 |
| LABEL: science |
| [285] TITLE: तांबे के ज़्यादा सेवन से अल्ज़ाइमर का ख़तरा? |
| CONTENT: लंबे समय तक भोजन में तांबे का अधिक सेवन अल्ज़ाइमर बीमारी की वज़ह बन सकता है. यह कहना है अमरीकी वैज्ञानिकों का जिन्होनें चूहों पर अपने प्रयोग के बाद ताज़ा शोध अध्ययन में यह जानकारी दी. नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस ने कहा कि तांबे की अधिक मात्रा के कारण मस्तिष्क को उस प्रोटीन को कम करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है जिसे मनोभ्रंश डिमेंशिया का प्रमुख कारण माना जाता है. शोध के निष्कर्ष पर वैज्ञानिकों के बीच बहस जारी है क्योंकि कुछ अन्य शोधों का कहना है कि तांबा वास्तव में मस्तिष्क की सुरक्षा करता है. हमारे रोज़मर्रा के आहार का तांबा प्रमुख हिस्सा है. इसे स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक माना जाता है. तांबे के पाइप से आने वाला टोटी का पानी लाल मांस शेल फिश और सब्ज़ियां भोजन में तांबे के प्रमुख स्त्रोत हैं. तांबे के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए न्यूयॉर्क की रॉशेस्टर यूनिर्वसिटी में वैज्ञानिकों ने चूहों पर शोध किया. इस टीम ने पाया कि तांबा दिमाग़ के रक्षा करने वाले तंत्र में हस्तक्षेप करता है. जिन चूहों को पानी में घोलकर ज़्यादा तांबा दिया गया. उनके दिमाग़ की रक्त वाहिनियों में तांबे की मात्रा बढ़ गई और उनके दिमाग़ की सक्रियता प्रभावित हुई. वैज्ञानिकों का कहना है कि दिमाग़ की झिल्ली के काम करने के तरीके पर असर पड़ा. इसके साथ-साथ चूहों के दिमाग़ का बीटा एम्लॉयड के उस प्रोटीन से छुटकारा पाना कठिन हो गया जो मनोभ्रंश डिमेंशिया का प्रमुख कारण है. अल्ज़ाइमर की एक विशेषता इसमें धीरे-धीरे मर रहे दिमाग़ में एम्लॉयड की परत का बनना है. प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर राशिद डीन का कहना है यह स्पष्ट है कि तांबे का मिलाजुला असर मस्तिष्क की उस व्यवस्था पर पड़ता है जिसके तहत एम्लॉयड बीटा को दिमाग़ से बाहर निकाला जाता है. सब्ज़ियां भी भोजन के रास्ते शरीर को मिलने वाले तांबे की मात्रा की प्रमुख स्त्रोत हैं. डॉक्टर राशिद ने बीबीसी को बताया कि तांबे के कारण ही दिमाग़ में मनोभ्रंश डिमेंशिया पैदा करने वाले प्रोटीन का अधिक उत्पादन शुरू हो जाता है. इससे दोहरी बाधा उत्पन्न होती है. एक तरफ अम्लॉयड प्रोटीन का उत्पादन बढ़ जाता है और दूसरी तरफ इस प्रोटीन की मस्तिष्क से सफ़ाई की गति भी धीमी पड़ जाती है. डॉक्टर राशिद डीन कहते हैं तांबा शरीर के लिए काफी महत्वपूर्ण खनिज है और आप नहीं चाहते कि शरीर में इसकी कमी हो. कई पोषक खाद्य पदार्थों में तांबे की मात्रा पाई जाती है. हालांकि इसका सप्लीमेंट लेना शरीर की ज़रूरत से ज़्यादा हो सकता है. लेकिन ताज़ा शोध में मिले-जुले सबूतों की मौजूदगी का संकेत मिलता है. कील यूनिवर्सिटी में बायो-इनआर्गेनिक केमेस्ट्री के प्रोफ़ेसर क्रिस एक्सले कहते हैं कि तांबे की अल्ज़ाइमर में भूमिका को लेकर कोई वास्तविक सहमति नहीं बन पाई है. इंसानी दिमाग़ पर अपने शोध में उन्हें उल्टे ही सबूत मिले. क्रिस एक्सले कहते हैं हमें ताज़ा शोध में पता चला कि तांबे की कम मात्रा से उम्र बढ़ती है और अल्ज़ाइमर होती है. उन्होंने पाया कि अगर मस्तिष्क में तांबे की मात्रा कम है तो मस्तिष्क के ऊतकों में एम्लॉयड का ज़्यादा उत्पादन होता है. क्रिस एक्सले कहते हैं अभी हम उम्मीद करेंगे कि तांबे से सुरक्षा मिलती है और उम्र बढ़ने से रोकने में ये मददगार है न कि ये उम्र बढ़ाता है लेकिन हम नहीं जानते. ब्रिटेन के अल्ज़ाइमर रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉक्टर एरिक कैरन कहते हैं इस शोध से संकेत मिलते हैं कि किस तरह तांबा चूहों में अल्ज़ाइमर के लक्षण पैदा कर सकता है लेकिन ये नतीजे दूसरे अध्ययनों में भी दिखने चाहिए. डॉक्टर एरिक कैरन का कहना है अभी ये जानना जल्दबाज़ी होगी कि कैसे तांबे की सामान्य मात्रा अल्ज़ाइमर को बढ़ावा देती है. एल्ज़ाइमर सोसायटी के डॉक्टर डाउग ब्राउन कहते हैं तांबा शरीर के लिए अहम खनिज है लोगों को इस शोध को सावधानी के साथ लेना चाहिए और अपने ख़ाने से तांबे को हटाना नहीं चाहिए. |
| DATE: 2013-08-29 |
| LABEL: science |
| [286] TITLE: पृथ्वी से पहले मंगल पर गूंजी थी किलकारी? |
| CONTENT: एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सम्मेलन में शोधकर्ताओं ने संभावना जताई है कि पृथ्वी के पहले ही मंगल ग्रह पर जीवन की शुरुआत हो गई थी. एक नए शोध से इस विचार को बल मिला है कि अरबों साल पहले लाल ग्रह का वातावरण जीवन शुरु करने के लिए पृथ्वी की तुलना में ज़्यादा अनु्कूल था. यह प्रमाण इस बात पर आधारित है कि जीवन की शुरुआत के लिए बने पहले अणु कैसे विकसित हुए होंगे. इस वैचारिक धारणा के बारे में प्रोफेसर स्टीवन बेनर ने इटली के फ्लोरेंस में हुए गोल्डश्मिट सम्मेलन में जानकारी दी. वैज्ञानिक लंबे समय से इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश में लगे हैं कि जीवन की संभावना के लिए ज़रूरी तीन अवयव आरएनए डीएनए और प्रोटीन कैसे एक साथ आए होंगे. जिन अणुओं से आनुवंशिक पदार्थ का निर्माण हुआ वे तीन अरब साल पहले पृथ्वी पर मौज़ूद कार्बनिक रसायनों से बहुत ज़्यादा जटिल थे. उस समय पृथ्वी पर मौजूद रसायनों में ऊष्मा या प्रकाश प्रवाहित करने पर आरएनए नहीं बनता बल्कि उससे तारकोल बनता. आरएनए को सांचे में ढालने के लिए परमाणुओं को खनिजों की क्रिस्टलीय सतह से गुजारना पड़ता है. अमरीका के गैंसविले स्थित वेस्टहीमर इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर बेनर के मुताबिक़ पृथ्वी पर ऐसे खनिज पहले ही समुद्र में मिल चुके होंगे लेकिन मंगल पर इनकी भरमार रही होगी. वह कहते हैं कि इससे यह साबित हो सकता है कि जीवन की शुरुआत पहले मंगल पर हुई थी और उल्कापिंड के माध्यम से यह पृथ्वी पर आया था. जीवन की शुरुआत मंगल पर होने और उसके बाद में पृथ्वी पर आने का विचार नया नहीं है. लेकिन प्रोफेसर बेनर के विचारों ने इसमें नया मोड़ ला दिया है. प्रोफेसर बेनर ने सम्मेलन में ऐसे निष्कर्ष पेश किए जिनसे साबित होता है कि बोरोन और मॉलीब्डेनम जैसे तत्वों की मौज़ूदगी वाले खनिज परमाणुओं को मिलाकर जीवन की उत्पत्ति वाले अणुओं में बदलने में मदद मिली होगी. उन्होंने कहा कि बोरोन खनिज कार्बोहाइड्रेट छल्लों को जीवन की उत्पत्ति से पहले के रसायन बनाने में मदद करते हैं और मॉलीब्डेनम फिर इस मध्यवर्ती अणु से राइबोज़ बनाता है जिससे अंततः आरएनए का निर्माण होता है. इससे ये सवाल पैदा होते हैं कि जीवन पर पृथ्वी की शुरुआत कैसे हुई माना जाता है कि शुरुआत में पृथ्वी का वातावरण बोरोन और मॉलीब्डेनम खनिजों के निर्माण के लिए अनुकूल नहीं था. साथ ही यह भी माना जाता है कि जीवनोत्पत्ति से पहले के रसायन यानी प्री बायोटिक सूप से आरएनए बनाने के लिए ज़रूरी बोरोन खनिज शुरुआत में पृथ्वी पर पर्याप्त मात्रा पर उपलब्ध नहीं थे. इसके अलावा मॉलीब्डेनम खनिज भी उचित रासायनिक स्वरूप में मौजूद नहीं थे. प्रोफेसर बेनर ने कहा जब मॉलीब्डेनम का ऑक्सीकरण होता है तभी वह शुरुआती जीवन को प्रभावित कर सकता है. जब जीवन की शुरुआत हुई थी तब हो सकता है कि पृथ्वी पर मॉलीब्डेनम इस स्वरूप में उपलब्ध न रहा हो. तीन अरब साल पहले पृथ्वी की सतह पर बहुत कम ऑक्सीजन थी जबकि मंगल पर पर्याप्त मात्रा में थी. उन्होंने कहा यह एक और प्रमाण है जिससे साबित होता है कि पृथ्वी पर जीवन मंगल से उल्कापिंड़ो के माध्यम से आया था. माना जाता है कि मंगल में शुरुआत में वातावरण शुष्क था और यह जीवन की उत्पत्ति के लिए अनुकूल था. प्रोफेसर बेनर ने बीबीसी न्यूज़ से कहा यह बात साफ है कि पृथ्वी की सतह पर बोरोन बहुत कम था लेकिन मंगल पृथ्वी की तुलना में शुष्क था और वहां पर्याप्त ऑक्सीजन थी. पृथ्वी का वातावरण जीवन की उत्पत्ति के लिए अनुकूल नहीं था जबकि मंगल पर इसके लिए सभी परिस्थितियां थीं. उन्होंने कहा इस बात के प्रमाण मिल रहे हैं कि हम सभी वास्तव में मंगल के निवासी हैं. जीवन की शुरुआत मंगल पर हुई और यह एक शैल के ज़रिए पृथ्वी पर आया. प्रोफेसर बेनर ने कहा यह सौभाग्य की बात है कि हम पृथ्वी पर विकसित हुए क्योंकि जीवन के विकास और निरंतरता के लिए दोनों ग्रहों में से पृथ्वी पर परिस्थितियां बेहतर हैं. अगर हमारे कल्पनीय पूर्वज मंगल पर ही बने रहते तो शायद हमारे पास कहने के लिए यह कहानी नहीं होती. |
| DATE: 2013-08-29 |
| LABEL: science |
| [287] TITLE: ब्रोकली खाओ, जोड़ों के दर्द से छुटकारा पाओ |
| CONTENT: ब्रिटेन के शोधकर्ताओं का मानना है कि खूब सारी ब्रोकली खाने से गठिया की बीमारी ठीक हो सकती है. यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया के एक दल ने प्रयोगशाला में मिली सफलता के बाद अब इसका इंसानों पर परीक्षण शुरू किया है. इससे पहले कोशिकाओं और चूहों पर किए गए प्रयोगों से पता चला कि ब्रोकली से हड्डियों को नुकसान पहुंचाने वाले एक प्रमुख विनाशकारी एंजाइम को ब्लॉक करने में मदद मिलती है. ऐसे ही गुण ब्रसेल्स स्प्राउट्स और गोभी में भी पाए गए हैं. शोधकर्ताओं ने 20 रोगियों से प्रतिदिन ब्रोकली की खुराक लेने के लिए कहा है. आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली ब्रोकली और सिसली की एक जंगली प्रजाति के संकरण से तैयार सुपर ब्रोकली में पोषक तत्वों की बहुतायत होती है. प्रयोग के दौरान मरीजों को इसी सुपर ब्रोकली को खाने के लिए दिया जाएगा. हमारा शरीर इसके ग्लूकोराफेनिन घटक को लेता है और उसे सल्फोराफेन में बदल देता है. सल्फोराफेन जोड़ों की रक्षा में काफी मददगार है. इस प्रयोग में मदद करने वाले स्वयंसेवक दो सप्ताह तक इस खास प्रजाति की ब्रोकली को खाएंगे और उसके बाद चिकित्सक उनके रोगग्रस्त घुटनों की सर्जरी करेंगे. डॉक्टर रोज़ डेविडसन और उनकी टीम ब्रोकली के असर के बारे में पता करने के लिए हटाई गई टिश्यू की जांच करेगी. उन्होंने बताया हम मरीज़ों से दो सप्ताह तक प्रतिदिन 100 ग्राम ब्रोकली खाने के लिए कह रहे हैं. यह एक सामान्य लेकिन ठीक-ठाक मात्रा है और यह इतनी मात्रा है कि लोग इसे प्रतिदिन खुशी-खुशी खा सकते हैं. किसी बड़े बदलाव के लिए दो सप्ताह का समय बहुत अधिक नहीं है लेकिन डॉक्टर रोज़ डेविडसन को उम्मीद है कि यह अवधि इस बारे में थोड़े प्रमाण जुटाने के लिए पर्याप्त है कि सुपर ब्रोकली इंसानों के लिए फायदेमंद हो सकती है. उन्होंने बताया मुझे उम्मीद नहीं है कि यह गठिया को एकदम ठीक कर देगी लेकिन यह इसकी रोकथाम का एक तरीका बन सकती है. उनकी टीम इस बात का प्रमाण तलाश रही है कि सल्फोराफेन जोड़ों में वहां तक पहुंच जाता है जहां उसकी आवश्यकता होती है और उससे कोशिकीय स्तर पर सकारात्मक बदलाव होते हैं. इस शोध के दौरान घुटने को बदलने के लिए आए ऐसे 20 मरीज़ों को तुलनात्मक समूह में रखा जाएगा जिन्होंने ब्रोकली का सेवन नहीं किया. |
| DATE: 2013-08-29 |
| LABEL: science |
| [288] TITLE: विदेशी चींटियाँ बन सकती हैं बड़ी समस्या |
| CONTENT: तेज़ी से फैलने वाली चीटियों की समस्या उम्मीद से अधिक बड़ी हो सकती है. स्पेनिश वैज्ञानिकों की एक टीम ने पाया है कि उम्मीद से ज़्यादा कीड़ों को अनजाने में ही दुनियाभर में भेजा जा रहा है. शोधकर्ताओं ने आगाह किया है कि इनमें से बहुत सी प्रजातियों ने अपने नए प्राकृतिक आवासों में कॉलोनियाँ बसा ली हैं ये पर्यावरण बुनियादी ढांचे और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हैं. इस शोध के नतीजे रॉयल सोसाइटी बायोलॉजी लेटर्स नाम की विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं. इसकी प्रमुख लेखक और स्पेन के ज़ेरोना विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाली वेरोनिका मिराविते कहती हैं छोटे आकार के कारण अधिकांश चींटियां अनचाहे ही जहाज़ या हवाई जहाज़ के जरिए कंटेनर या अन्य तरह के बॉक्स में रखी मिट्टी लकड़ी सजावटी पौधों और फल के साथ भेज दी जाती हैं. शोधकर्ताओं की टीम ने नीदरलैंड अमरीका और न्यूजीलैंड में बहुत सी विदेशी चींटियों को देखा. उन्होंने पाया कि छिपकर यात्रा करने वाले चींटियों की संख्या पहले बताई गई संख्या से बहुत अधिक है. वैज्ञानिकों ने पाया की व्यापार के रास्तों के जरिए विदेशी चींटियों की 786 प्रजातियां दुनिया भर में पहुंच गई हैं. माना जा रहा है कि इनमें से छह सौ से अधिक प्रजातियों ने अपनी कॉलोनी बसा ली है. डॉक्टर मिराविते कहती हैं आ रही चीटियों की संख्या बहुत अधिक है. इस तरह प्रवेश कर गईं 85 फ़ीसदी प्रजातियां सफलतापूर्वक स्थापित हो गई हैं. इससे पता चलता है कि इस तरह की बहुत सी प्रजातियां हमारे आसपास रह रही है. लेकिन उनका अभी तक पता नहीं चला है. एक नए क्षेत्र में घुसने वाले सभी जीव खतरा नहीं होते हैं लेकिन कुछ कहर बरपा सकते हैं. छिपकर यात्रा करने वाली चींटियाँ खतरनाक विदेशी अपराधियों में से हैं. यूरोप में अर्जेंटीना की आक्रामक चींटियों ने बहुत बड़ी-बड़ी कालोनियाँ बना ली हैं. वे स्थानीय चींटियों की आबादी से होड़ से बाहर हैं. वहीं अमरीका में दक्षिण अमरीका की रसबेरी चींटियाँ पहुँच गई हैं. बिजली के उपकरणों में झुंड में रहने की वजह से ये समस्या खड़ी कर रही हैं. इनके काटने से होने वाले दर्द की वजह से भी इनके फैलने को पसंद नहीं किया जाता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इन कीड़ों को फैलने से रोकने के लिए और उपाय करने की जरूरत है. डॉक्टर मिराविते कहती हैं एक बार अगर विदेशी चींटियों ने नया इलाका बना लिया तो उनका उन्मूलन बहुत मुश्किल हो जाता है. वो कहती हैं विदेशी प्रजातियों की रोकथाम की कई विधियाँ हैं जैसे सीमा पर ही ख़तरे का मूल्यांकन करना ब्लैक लिस्ट करना और समय-समय पर जांच करना ख़ासतौर पर उन व्यापारिक रास्तों पर नज़र रखना जिनमें इस तरह के घुसपैठ की आशंका अधिक हो. |
| DATE: 2013-08-28 |
| LABEL: science |
| [289] TITLE: गर्भावस्था के दौरान चाय या कॉफ़ी कितनी हो? |
| CONTENT: एक गर्भवती महिला को अपने अजन्मे शिशु के बेहतर विकास के लिए तमाम तरह के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है. कुछ डॉक्टर ऐसी महिलाओं को कॉफ़ी नहीं पीने तो कुछ एक-दो कप से काम चलाने की सलाह देते हैं. इसी तरह कुछ डॉक्टर गर्भवती महिलाओं को कम चीज़ें खाने और अल्कोहल न लेने की हिदायत देते हैं. लेकिन सही स्थिति क्या है इसको लेकर डॉक्टर एकमत नहीं हैं. गर्भावस्था के दौरान ऐसी ही दुविधाओं से गुज़रने वाली शिकागो विश्वविद्यालय की अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर एमिली ऑस्टर ने ख़ुद ही इन तथ्यों को परखने की कोशिश की. इस बारे में ऑस्टर कहती हैं कि गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में उन्हें कॉफ़ी की ज़बरदस्त तलब महसूस होती थी लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें केवल एक कप कॉफ़ी पीने की इजाज़त दी थी. इसके बाद उन्होंने इंटरनेट पर इस बारे में खोज की. वह सर्च रिजल्ट देखकर आश्चर्यचकित हो गईं. इस बारे में न तो किताबों की और न ही विशेषज्ञों की राय एक जैसी थी. कुछ लेखकों का कहना था कि गर्भवती महिलाओं को कॉफ़ी बिल्कुल नहीं पीनी चाहिए जबकि कुछ का कहना था कि वे दिनभर में दो से तीन कप कॉफ़ी ही पी सकती हैं. उन्होंने जब इस बारे में किताबें पलटीं तो उसमें छह कप कॉफ़ी पी सकने की बात कही गई थी. दुविधा की स्थिति को देखते हुए सांख्यिकी की जानकार ऑस्टर ने सही संख्या के बारे में पता लगाने की ठान ली. इसके लिए उन्होंने ख़ुद ही मेडिकल की किताबें पढ़ीं. अध्ययन के बाद उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि दिन में दो कप कॉफ़ी पीना अच्छा है. ऐसे में दो से चार कप कॉफ़ी पीने की आदतीन ऑस्टर को दो कप कॉफ़ी में दिन काटने में परेशानी हो रही थी लेकिन बाद में वह रोज़ तीन कप कॉफ़ी के साथ सहज हो गईं. उनका कहना है कि दिन में छह से आठ कप कॉफ़ी पीने पर परेशानी हो सकती है. दो साल की बच्ची की मां ऑस्टर ने अपने इन अनुभवों पर एक किताब लिखी है. एक्सपेक्टिंग बेटर नामक इस पुस्तक में वह गर्भवती महिलाओं को तथ्यों के आधार पर ख़ुद के लिए बेहतर फ़ैसला लेने की सलाह देती हैं. ऑस्टर का कहना है कि मुद्दा कैफ़ीन के सेवन और गर्भवती महिलाओं में उलटी की प्रवृति से जुड़ा है. आमतौर पर गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में अधिकतर महिलाएं बीमार रहती हैं. इसीलिए जो महिलाएं ज्यादा बीमार रहतीं हैं उन्हें कम कॉफ़ी पीनी चाहिए. ऑस्टर के मुताबिक़ कॉफ़ी ही नहीं बल्कि कई ऐसी चीज़ें हैं जिनके सेवन को लेकर गर्भवती महिलाओं पर घोषित या अघोषित पाबंदी लगी है. उदाहरण के लिए अल्कोहल को लेते हैं. इंग्लैंड की नेशनल हेल्थ सर्विस एनएचएस सुझाव देती है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अल्कोहल का सेवन नहीं करना चाहिए. लेकिन ऑस्टर इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि गर्भावस्था के पहले तीन महीनों के दौरान सप्ताह में तीन ग्लास और बाद के महीनों में हर सप्ताह तीन से चार बार वाइन लेने में कोई हर्ज नहीं है. ऑस्टर का कहना है कि इस बारे में उपलब्ध आंकड़ों से यह स्पष्ट था कि गर्भावस्था के दौरान अल्कोहल का अत्याधिक सेवन ख़तरनाक हो सकता है. वैसे जानकार इससे सहमत नहीं हैं. इकोनॉमिक इंटेलिजेंस यूनिट में स्वास्थ्य विभाग के निदेशक और हेल्थकेयर कंसल्टेंसी बाजियन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉक्टर विवेक मुथु का कहना है कि मामूली अल्कोहल के सेवन से गर्भ में पल रहे शिशु का विकास प्रभावित हो सकता है. इसी तरह खाने की कई ऐसी चीज़ें हैं जिनके सेवन से गर्भवती महिलाओं को रोका गया है. बिना पाश्चुरीकृत दूध और चीज़ के सेवन से भी गर्भवतियों को रोका गया है. अमरीकी सेंटर फॉर डिजीज़ कंट्रोल के 15 साल के आंकड़ों की समीक्षा करने के बाद ऑस्टर ने पाया कि 20 फ़ीसदी बीमारियों के लिए बिना पाश्चुरिकृत दूध को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है. ऑस्टर का मानना है कि कई ऐसी चीज़ें हैं जिसे डॉक्टर गर्भवती महिलाओं पर थोप देते हैं और उनके पास इस बारे में विस्तार से बताने के लिए समय नहीं होता. ऐसे में गर्भवती महिलाओं को इन सारी चीज़ों के बारे में विस्तार से पढ़ना चाहिए और उसके बाद डॉक्टर से सवाल करना चाहिए कि उसकी कोई भी सलाह उनके लिए किस तरह उपयोगी है. |
| DATE: 2013-08-28 |
| LABEL: science |
| [290] TITLE: शुरू में ही लग सकता है अंडाशय कैंसर का पता |
| CONTENT: अमरीका में हुए एक शोध के मुताबिक़ अंडाशय कैंसर की जांच के एक नए तरीक़े की खोज से बिल्कुल शुरुआत में ही इस बीमारी के बारे में पता चल सकता है. आमतौर पर अंडाशय कैंसर के मरीज़ों में शुरुआत में गांठों का पता लगाना मुश्किल होता है. इस कारण जब तक गांठों के बारे में पता चलता है तब तक काफ़ी देर हो चुकी होती है. कैंसर नामक जर्नल में प्रकाशित इस रिपोर्ट के मुताबिक़ जांच के इस नए तरीक़े को 4051 महिलाओं पर आज़माया गया. नतीजों के मुताबिक़ इससे इलाज की ज़रूरत वाली महिलाओं की पहचान की जा सकती है. हालांकि जांच के इस तरीक़े के बारे में एक विस्तृत अध्ययन ब्रिटेन में किया जा रहा है जिसकी रिपोर्ट 2015 में आएगी. अंडाशय कैंसर का शुरुआत में पता चल जाने से 90 फ़ीसदी मरीज़ों के ठीक हो जाने की संभावना रहती है जबकि इस बीमारी की जानकारी बाद में लगने पर 30 फ़ीसदी मरीज़ों के ही ठीक होने की संभावना रहती है. अन्य तरह के कैंसर से अलग अंडाशय कैंसर में पेड़ू और पेट दर्द या सूजन जैसे लक्षण इस बीमारी को दबा देते हैं और गांठ के बारे में पता नहीं चल पाता. वैज्ञानिकों को यह बात पहले से पता है कि अंडाशय कैंसर के मरीज़ों के रक्त में सीए125 नामक प्रोटीन का स्तर अधिक होता है. शोधकर्ताओं ने रक्त की जांच के उस तरीक़े का परीक्षण किया हैं जिससे कि सीए125 प्रोटीन के स्तर के आधार पर कैंसर से पीड़ित हो सकने वाले मरीज़ों की पहचान की जा सके. इस आधार पर सीधे सर्जरी कराने की बजाय लो रिस्क वाले मरीज़ों की साल में एक बार और मीडियम रिस्क वाले मरीज़ों की तीन महीने पर जांच करवाने के अलावा हाई रिस्क वाले मरीज़ों में गांठ के बारे में पता लगाने के लिए अल्ट्रासाउंड करवाया गया. अमरीका के टेक्सस विश्वविद्यालय में किए गए इस अध्ययन में महिलाओं पर औसतन 11 वर्षों तक नज़र रखी गई. इस जांच में शामिल की गईं महिलाओं में से 10 की अल्ट्रासाउंड स्कैन के आधार पर सर्जरी की गई. रक्त की जांच के आधार पर शुरू में ही इन महिलाओं के कैंसर से पीड़ित होने के बारे में पता लगा लिया गया था. शोधकर्ता डॉक्टर करेन लु ने बीबीसी से कहा हमारे अध्ययन से निश्चित तौर पर इलाज के तरीक़े में बदलाव नहीं होगा लेकिन इससे हमें विस्तृत जानकारी मिलती है. डॉक्टर लु का कहना है कि 50 हज़ार महिलाओं पर ब्रिटेन में किए जा रहे अध्ययन से निश्चित परिणाम मिल सकेगा. उन्होंने कहा दो अहम सवाल हैं- क्या हम एकदम शुरू में कैंसर का पता लगा सकते हैं और क्या हम इससे होने वाली मौतों को कम कर सकते हैं. ओवैरियन कैंसर एक्शन रिसर्च की डॉक्टर सारा ब्लैगडेन का कहना है ब्रिटेन में जारी शोध की तुलना में यह अध्ययन छोटा है लेकिन इससे पता चलता है कि अंडाशय की प्रभावी जांच की जा सकती है. टार्गेट ओवैरियन कैंसर के मुख्य कार्यकारी एनवेन जोंस का कहना है इसमें कोई शक नहीं कि इस अध्ययन के नतीजे बेहद सकारात्मक हैं और हमें इनसे उम्मीद रखनी चाहिए. |
| DATE: 2013-08-27 |
| LABEL: science |
| [291] TITLE: नई तकनीक बचाएगी आर्सेनिक के ज़हर से |
| CONTENT: चीन में करीब दो करोड़ लोगों के आर्सेनिक युक्त पानी से प्रभावित होने की आशंका है. एक शोध में वैज्ञानिकों ने चीन के भूविज्ञान संबंधी जानकारी से उन क्षेत्रों का अनुमान लगाया है जहां यह विषाक्तता सबसे अधिक हो सकती है. इस शोध के परिणाम साइंस जनरल में प्रकाशित हुए हैं. आर्सेनिक प्राकृतिक रूप से धरती की तह में पाया जाता है. लेकिन अगर यह भूमिगत जल में घुल जाता है तो लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने वाले पानी से सेहत को गंभीर खतरे हो सकते हैं. इससे त्वचा फेफड़ों मूत्राशय और गुर्दे का कैंसर हो सकता है. अब तक बड़े देशों में आर्सेनिक प्रदूषण के स्तर का अनुमान लगाना मुश्किल था. चीन में एक करोड़ से ज्यादा पीने के पानी के कुएं हैं. यह जांच करने के लिए उनके पानी में विषैले तत्व नहीं उन सबकी जांच करनी होगी. इस प्रक्रिया में बरसों लग सकते हैं. इसके प्रक्रिया के बजाय स्विट्ज़रलैंड और चीन के शोधकर्ताओं ने देश के भूगर्भीय नक्शे को देखा. स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एक्वेटिक साइंस एंड टेक्नोलॉजी- ईएडब्ल्यूएजी जल विज्ञान और तकनीक का स्विस संघीय संस्थान की डॉक्टर एनेट जॉन्सन इस शोधपत्र की सह लेखक हैं. वह कहती हैं पिछले कुछ सालों में भौगोलिक स्थितियों की जानकारी- इलेक्ट्रॉनिक नक्शे- बहुतायत में उपलब्ध हो गए हैं. आपके पास जलवायु के आंकड़े हैं भूमि के इस्तेमाल और नदियों से दूरी या ऊंचाई के बारे में जानकारी है. इस जानकारी का इस्तेमाल करके और चीन में मौजूद चट्टानों के प्रकार ख़ासकर उनकी आयु को देखकर शोधकर्ता उन क्षेत्रों के सटीक अनुमान लगाने में कामयाब हो गए जहां विषैले तत्वों के पाए जाने की सबसे ज़्यादा आशंका है. इसके निष्कर्षों के अनुसार चीन में 1-96 करोड़ लोगों के पीने का पानी खतरनाक स्तर का हो सकता है. इनमें से कुछ लोग ऐसे क्षेत्रों में भी रह रहे हैं जिन्हें पहले खतरे से बाहर माना जाता था. डॉक्टर जॉन्सन ने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के कार्यक्रम साइंस इन एक्शन को बताया नदी घाटी और सिंचाई कृषि वाले कुछ ऐसे इलाके हैं जिनके बारे में पहले से जानकारी थी- जैसे कि भीतरी मंगोलिया में हुहॉट नदी घाटी. लेकिन अब सिचुआन प्रांत में और पूर्वी तट के पास कुछ नए क्षेत्रों का भी पता चला है. शोधकर्ताओं का कहना है कि यह निष्कर्ष गहन जांच में चीनी अधिकारियों के लिए सहायक हो सकते हैं. डॉक्टर जॉन्सन कहती हैं यह बहुत ज़रूरी है कि ज़्यादा प्रभावित इलाकों की जांच सबसे पहले की जाए. वहां प्रदूषित कुएं प्रदूषण रहित कुओं से ज़्यादा संख्या में मिलने की आशंका है. अन्य क्षेत्रों में आपको आर्सेनिक की खोज करनी होगी वह भी ज़्यादा ज़ोर लगाकर नहीं. वह कहती हैं कि जो कुएं प्रदूषित मिलते हैं उनका शोधन किया जा सकता है या फिर उन्हें बंद करना होगा. शोधकर्ताओं का मानना है कि अनुमान की इस विधि को दुनिया में कहीं और भी इस्तेमाल किया जा सकता है. भूमिगत पानी में आर्सेनिक का प्रदूषण मध्य यूरोप दक्षिणी अमेरिका अमरीका-एशिया के कुछ भागों में भी मिला है. भारत के सात राज्य- पश्चिम बंगाल बिहार उत्तर प्रदेश झारखंड छत्तीसगढ़ असम और मणिपुर आर्सेनिक के प्रदूषण से ग्रस्त हैं. लेकिन सबसे ज़्यादा प्रभावित देश है बांग्लादेश जहां आर्सेनिक प्रदूषण को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल बताया है. अनुमान है कि 3-5 से 7-7 करोड़ लोगों के प्रदूषित पानी के पीने का ख़तरा है. |
| DATE: 2013-08-27 |
| LABEL: science |
| [292] TITLE: कोकीन से बदल जाता है दिमाग का नक्शा |
| CONTENT: अमरीकी वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया है कि कोकीन लेने के कुछ देर बाद ही मस्तिष्क की सरंचना में परिवर्तन होने लगता है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि चूहों पर किया गया यह प्रयोग मनुष्यों में कोकीन की लत को समझने में कारगर होगा. शोधपत्र नेचर न्यूरोसाइंस में प्रकाशित इस शोध के परिणामों के अनुसार इस ड्रग को लेते ही दिमाग की संरचना बदलने लगी. मस्तिष्क में होने वाले इन परिवर्तन से सीखने और याद करने की क्षमता पर असर पड़ता है. यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया यूसी बर्कले और यूसी सैन फ्रैंसिस्को के शोध दल ने अपने परीक्षण में देखा कि मस्तिष्क की डेडंट्रिक स्पाइन नामक कोशिका में कोकीन लेने के बाद सूजन आ गई. इन कोशिकाओं में आए इस परिवर्तन से स्मृति के निर्माण का पुरजोर इशारा मिलता है. विशेषज्ञों ने इसे दिमाग का लर्निंग एडिक्शन नाम दिया है. जिन चूहों के दिमाग में अधिक परिवर्तन हुआ उनमें कोकीन प्राप्त करने की चाह भी बढ़ गई. वैज्ञानिकों को इस परीक्षण में यह भी पता चला कि इस लत में ड्रग्स लेने के स्थान या माहौल की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. प्रयोग के दौरान चूहों को दो तरह के चैंबर में जाने की व्यवस्था की गई. दोनों चैंबरों की महक और जमीनी बनावट भिन्न थी. जब चूहों ने अपनी पसंद का चैंबर चुन लिया तो उन्हें दूसरे नापसंद चैंबर में ले जाकर कोकीन दी गई. पहली खुराक देने के दो घंटो बाद ही इन चूहों के दिमाग में हुए परिवर्तन को देखा जा सकता था. इस शोध से जुड़ी रही यूसी बर्कले की प्रोफेसर लिंडा विलब्रेख्त बताती हैं हमें जो छवियां मिली हैं उनसे साफ़ पता चलता है कि कोकीन से नए स्पाइन बनने लगे और चूहों के अंदर जितने अधिक स्पाइन बने वो कोकीन के प्रति उतना ज्यादा आसक्त होते गए. लिंडा बताती हैं कि कोकीन से दिमाग में होने वाले परिवर्तन से मनुष्य में इसके प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है. हम जान सकते हैं कि यह मनुष्य के निर्णय लेने की क्षमता को किस तरह प्रभावित करता है. किंग्स कॉलेज लंदन के मनोचिकित्सा विभाग से जुड़े डॉक्टर जेरोम ब्रीन ने बीबीसी से कहाइस अध्ययन से ठोस रूप से पता चला है कि मस्तिष्क को किस तरह से कोकीन की लत लगती है. हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि इस शोध के परिणाम कोकीन की लत का इलाज ढूंढने में कितने उपयोगी होंगे. |
| DATE: 2013-08-26 |
| LABEL: science |
| [293] TITLE: इंटरनेट पर ‘तीसरे बड़े’ यूजर्स भारत के |
| CONTENT: इंटरनेट और डिजिटल जगत की जानकारियां जुटाने वाली संस्था कॉमस्कोर की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार अमरीका और चीन के बाद इंटरनेट पर सबसे ज्यादा यूज़र्स भारत के है. रिपोर्ट के अनुसार जापान को पछाड़ते हुए तीसरे पायदान पर पहुंचे भारत के इंटरनेट यूज़र्स की औसतन उम्र बाकी विकासशील देशों के मुकाबले काफ़ी कम है. कॉमस्कोर की वार्षिक रिपोर्ट 2013 इंडिया डिजिटल फ़्यूचर इन फोकस के अनुसार भारत में घरों और दफ्तरों से करीब सात करोड़ 39 लाख यूज़र्स इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं. भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण ने मार्च 2013 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत में करीब साढ़े 16 करोड़ इंटरनेट यूज़र्स है और हर आठ में से सात यूज़र मोबाइल के ज़रिए इंटरनेट का प्रयोग करते हैं. कॉमस्कोर की रिपोर्ट में मोबाइल और टैबलेट यूज़र्स की संख्या कुल संख्या का सिर्फ़ 14 फ़ीसदी बताया गया है. रिपोर्ट में कहा गया कि भारत की 75 फ़ीसदी इंटरनेट आबादी की उम्र 35 साल से कम है जो ब्रिक्स समूह के अन्य देशों ब्रज़ील रूस भारत चीन दक्षिण अफ़्रीका देशों की औसत आयु से काफ़ी कम है. भारत में 35 साल से कम उम्र के पुरुष यूज़र्स और 35 से 44 साल की आयु की महिला यूजर्स को इंटरनेट का सबसे बड़ा प्रयोगकर्ता बताया गया है. कॉमस्कोर के अनुसार भारतीय इंटरनेट पर जो वक्त बिताते हैं उसका एक चौथाई समय सोशल मीडिया पर चला जाता है जबकि लगभग इतना ही वक्त 23 फ़ीसदी ई-मेल्स पर बिताया जाता है. रिपोर्ट में बताया गया कि पिछले एक साल में ब्लॉगिंग के शौकीनों में 48 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है जिसके बाद ब्लॉगिंग वेबसाइटों पर आने वाले लोगों की कुल संख्या करीब तीन करोड़ 60 लाख हो गई है. इसमें से 26 प्रतिशत लोग ब्लॉगिंग साइटों पर स्मार्टफ़ोन और टैबलेट के ज़रिए आते हैं. ऑनलाइन वीडियो के क्षेत्र में भारत एक तेज़ी से उभरता हुआ देश माना जाता है. कॉमस्कोर की रिपोर्ट के अनुसार बीते एक साल में करीब पांच करोड़ 40 लाख लोगों ने ऑनलाइन वीडियो देखा जो पहले के मुकाबले 27 प्रतिशत अधिक है. |
| DATE: 2013-08-26 |
| LABEL: science |
| [294] TITLE: 'मकड़ी के धागों की तरह' बुने जा सकेंगे अंग |
| CONTENT: ब्रिटेन में शोधकर्ताओं ने शरीर के अंग मकड़ी के जाले की तरह बनाने का एक तरीका दिखाया है. लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज की एक टीम ने नए टिश्यू बनाने के लिए पॉलीमर के साथ मिली हुई कोशिकाओं का निरंतर प्रवाह इस्तेमाल किया. शोधकर्ताओं का मानना है कि ट्रांसप्लांट के लिए अंग बनाने में दूसरी तकनीकों के मुकाबले इस तकनीक से ज़्यादा बेहतर नतीजे मिल सकते हैं. इन शोधकर्ताओं ने इस तकनीक का परीक्षण चूहों में खून लाने-ले जाने वाली नसें बनाने में किया. अभी प्रयोगशालाओं में अंग बनाने के लिए कई विधियों का इस्तेमाल हो रहा है. कुछ विधियों में एक कृत्रिम ढांचे से शुरुआत होती है जिसमें मरीज़ की ख़ुद की कोशिकाओं को डाल दिया जाता है और फिर इसे कलम की तरह लगा दिया जाता है. कुछ मरीज़ों में इस तकनीक का इस्तेमाल कर ब्लैडर बनाए गए हैं. एक अन्य तकनीक में किसी शव से किसी अंग को लिया जाता है जैसा अंग प्रत्यर्पण में होता है फिर एक डिटर्जेंट का इस्तेमाल कर पुरानी कोशिकाओं को हटा दिया जाता है और प्रोटीन का एक ढांचा बचा रह जाता है. इस ढांचे में उस मरीज़ की कोशिकाएं लगाई जाती हैं जिसे अंगों की ज़रूरत है. इस तकनीक का इस्तेमाल कर सांस की नलियां बनाई गई हैं. लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के शोधकर्ता अंग बनाने के लिए इलेक्ट्रोस्पिनिंग तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं. इन शोधकर्ताओं का मानना है कि पहले ही कोशिकाएं बन जाने से एक कृत्रिम ढांचे में कोशिकाएं डालने की चुनौतियों से पार पाना आसान होगा. इस विधि में शुरुआत कोशिकाओं और पॉलीमर का एक शोरबा बनाने से होती है. फिर 10 हज़ार वोल्ट की एक इलेक्ट्रिक सुई का इस्तेमाल कर तंतु बनाया जाता है. डॉक्टर सुवान जयसिंघे ने कहा जैसे एक मकड़ी अपना जाला बुनती है वैसे ही हम पॉलीमर और कोशिकाओं का इस्तेमाल कर एक निरंतर जाला बुनने में सक्षम हैं. जयसिंघे बताते हैं हम एक गद्दे जितना मोटा जाला बुन सकते हैं और इसमें कोशिकाएं डाल सकते हैं. इलेक्ट्रोस्पिनिंग तकनीक का इस्तेमाल कर के एक घूमते हुए सिलेंडर पर तंतुओं को आपस में बुन दिया गया और नसें तैयार हो गई. ये घूमता हुआ सिलेंडर जीवित कोशिकाओं को पोषण देने के लिए एक द्रव्य में डूबा हुआ था. स्मॉल नाम के शोधपत्र में प्रकाशित ताज़ा अध्ययन में दिखाया गया है कि चूहों की तीन परतों वाली नसें बनाई जा सकती हैं. डॉक्टर जयसिंघे ने कहा अभी कोई भी तकनीक अंग बनाने में सक्षम नहीं है हम एक ख़राब अंग की मरहम पट्टी की प्रक्रिया ला रहे हैं न कि उसे बदलने की. आइडिया ये है कि ह्रदय की कोशिकाओं का एक पैच दिल के दौरे के बाद काम सुधार सकता है. हालांकि ये इलेक्ट्रोस्पिनिंग के लिए शुरुआती दिन हैं. इसकी तुलना में मरीज़ों में अंग बनाने की दूसरी विधियां पहले ही इस्तेमाल हो रही हैं. डॉक्टर जयसिंघे कहते हैं कुछ कामयाबी मिली है जो अच्छी बात है लेकिन मुझे नहीं लगता कि ये उतना आसान है जैसा लोग कहते हैं और न ही ये आसान होने वाला है. |
| DATE: 2013-08-25 |
| LABEL: science |
| [295] TITLE: क्या लुप्त हो चुके जीव कभी वापस लौट पाएंगे? |
| CONTENT: लुप्त हो रहे जीवों को हमारी दुनिया में वापस लौटाने की दिशा में कुछ वैज्ञानिक गंभीरता से विचार कर रहे हैं. लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह मुमकिन है और अगर हाँ तो इसका क्या इस्तेमाल होगा. माइकल क्रिक्टन के उपन्यास पर आधारित फिल्म दि जुरासिक पार्क लुप्तप्राय प्रजातियों को पुनर्जीवित करने के लिए तकनीक के इस्तेमाल के मुद्दे को सँभल कर छूती हुई लगती है. स्टीवन स्पीलबर्ग के निर्देशन में 20 साल पहले बनी इस फिल्म में एक सनकी अरबपति की कहानी कही गई थी जो क्लोनिंग के जरिए बनाए गए डायनासोर की रिहाइश वाला एक थीम पार्क रचता है. कहने की जरूरत नहीं है कि कहीं कुछ गड़बड़ी हो जाती है और इस विचार को जन्म देने वाले लोग अपने जीवन के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई देने लगते हैं. लेकिन इस कहानी को जन्म देने वाले बुनियादी विचार पर कुछ वैज्ञानिक लुप्त हो चुके जीवों को फिर से गढ़ने की संभावनाओं पर संजीदगी से सोच रहे हैं. इतना नहीं बल्कि उन जीवों के प्राकृतिक आवास को भी नए सिरे से बनाने पर विचार किया जा रहा है. साइबेरियाई क्षेत्र के पूर्वोत्तर कोने पर स्थित प्लेस्टोसिन पार्क इसी का एक उदाहरण है. यहाँ लुप्त हो चुके जीवों के लिए अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र को गढ़ने के सपने को आकार देने की कोशिश की जा रही है. यहाँ घास का बड़ा मैदान है जिसमें बड़े आकार के शाकाहारी जीव रह सकते हैं जैसे बारहसिंगा बाइसन जीव और लुप्त हो चुके बड़े रोएँ वाले विशालकाय हाथी. बारहसिंगा और बाइसन की लुप्त हो चुकी प्रजातियों को पहले से ही दोबारा गढ़ा जा चुका है लेकिन बड़े रोएँ वाले भीमकाय हाथियों ने चुनौती खड़ी कर रखी है. इन भीमकाय हाथियों की बर्फ में जमी हुई कोशिकाएँ इनके डीएनए के जरिए नया क्लोन बनाना. ये ऐसे विचार हैं जो लंबे समय से विज्ञान फंतासियों का हिस्सा रहे हैं लेकिन क्या इन्हें वास्तव में हकीकत की शक्ल दी जा सकती है. लंदन के नैचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम से जुड़े जीवाश्म वैज्ञानिक प्रोफेसर एड्रियन लिस्टर ऐसा नहीं मानते. वह कहते हैं क्योंकि इन जानवरों के अवशेष हजारों साल पहले नष्ट हो चुके हैं. डीएनए की पूरी संरचना जाने बगैर भीमकाय हाथी या मैमथ का क्लोन तैयार कर पाने की संभावना न के बराबर ही है. हालांकि डीएनए के अवशेष फिर भी कारगर हो सकते हैं. एक योजना यह भी है कि मैमथ के जीनोम और उसके टूटे हुए तंतुओं को इकट्ठा करके कुछ कोशिश की जा सकती है. ये चीजें उनके अवशेषों के अलग अलग नमूनों से इकट्ठा की गई हैं. इसके बाद मैमथ के जीनोम की तुलना उसके सबसे करीबी जीवित जानवर यानी एशियाई हाथी से उसकी तुलना करके किसी तार्किक नतीजे पर पहुँचा जा सकता है. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इस तुलनात्मक अध्ययन से यह पता लगाया जा सकेगा कि एक मैमथ आखिर किस तरह से मैमथ बना होगा. इसके बाद वैज्ञानिक एशियाई हाथी के डीएनए का इस्तेमाल मैमथ के डीएनए की जानकारियों में छूट रही कमियों को भरने में करेंगे. यह तकनीक लगभग वैसी होगी जैसी कि जुरासिक पार्क फिल्म में दिखाई गई थी. यही तरीका क्लोन तकनीक से बनाए गए डॉली नाम के भेड़ में अपनाया गया था. मुमकिन है कि इसके बाद विशालकाय मैमथ दोबारा से रचा जा सके. हालांकि प्रोफेसर लिस्टर कहते हैं कि अभी इसमें कई अगर और मगर हैं. हालांकि जुरासिक पार्क फिल्म की तरह कोई भी डायनोसोरों को वापस लाने की दिशा में गंभीरतापूर्वक विचार नहीं कर रहा है लेकिन लुप्त हो चुके जीवों को वापस लौटने से हमारे पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है. |
| DATE: 2013-08-23 |
| LABEL: science |
| [296] TITLE: क्या आप स्मार्ट सिटी में रहना चाहेंगे? |
| CONTENT: अपनी कल्पनाओं के स्मार्ट शहर में रहने के बारे में आपका क्या ख्याल है एक ऐसा शहर जो आपकी ज़रूरतों को अपने आप पूरा करे. आबू धाबी में मसदर से लेकर दक्षिण कोरिया के सोंगदो तक दुनियाभर में ऐसे शहरों के निर्माण पहले ही शुरू हो चुका है. हो सकता है कि आप जिस शहर में रह रहे हैं वो भी पूरी तरह स्मार्ट शहर में बदलने की तैयारी में हो. भविष्य के शहर में बिजली के ग्रिड से लेकर सीवर पाइप सड़कें कारें और इमारतें हर चीज़ एक एक नेटवर्क से जुड़ी होगी. इमारत अपने आप बिजली बंद करेगी स्वचालित कारें खुद अपने लिए पार्किंग ढूंढेंगी और यहां तक कि कूड़ादान भी स्मार्ट होगा. लेकिन सवाल यह है कि हम इस स्मार्ट भविष्य में कैसे पहुंच सकते हैं शहर में हर इमारत बिजली के खंभे और पाइप पर लगे सेंसरों पर कौन निगरानी रखेगा और कौन उन्हें नियंत्रित करेगा. आईबीएम सीमन्स माइक्रोसॉफ्ट इंटेल और सिस्को जैसी तकनीकी कंपनियां शहर में जल के रिसाव से लेकर वायु प्रदूषण और ट्रैफिक जाम तक हर समस्या को सुलझाने के लिए सॉफ्टवेयर बेच रहे हैं. सिंगापुर स्टॉकहोम और कैलिफोर्निया में आईबीएम यातायात के आंकड़े जुटा रही है और जाम लगने के बारे में एक घंटे पहले ही भविष्यवाणी कर रही है. रियो में कंपनी ने नासा की तरह एक कंट्रोल रूम बना रखा है जहाँ स्क्रीनें पूरे शहर में लगे संवेदकों और कैमरों से आंकड़े जुटाती हैं. आईबीएम के पास कुल मिलाकर दुनियाभर में 2500 स्मार्ट शहरों की परियोजनाएं हैं. कंपनी का कहना है कि वो स्मार्ट शहर की अपनी परियोजनाओं में लोगों को साथ लेकर चलती है. डबलिन में कंपनी ने सिटी काउंसिल के साथ मिलकर पार्कया ऐप्स तैयार किया है जो लोगों को शहर में पार्किंग की जगह ढूंढने में मदद करता है. अमरीकी शहर डुबुक में कंपनी स्मार्ट वाटर मीटर बना रही है और कम्युनिटी पोर्टल के माध्यम से लोगों को डेटा उपलब्ध करा रही है ताकि वे पानी की अपनी खपत को देख सकें. आईबीएम रिसर्च की निदेशक डॉक्टर लीसा एमिनी कहती हैं हमें एक शहर विकसित करने की ज़रूरत है जो लोगों की आवश्यकताओं के अनुरूप हों. पहले यह संभव नहीं था क्योंकि तब ज्यादा सूचना उपलब्ध नहीं थीं. चीन दर्जनों ऐसे नए शहर बसा रहा है जिसमें रियो की तरह कंट्रोल रूम स्थापित किए जा रहे हैं. इंस्टीट्यूट ऑफ फ्यूचर के निदेशक और स्मार्ट सिटीजः बिग डेटा सिविक हैकर्स एंड द क्वेस्ट फॉर ए न्यू यूटोपिया के लेखक एंथनी टाउनसेंड इस पर चिंता जताते हैं. उन्होंने कहा रियो में कंट्रोल रूम की स्थापना एक प्रगतिवादी मेयर ने की थी लेकिन कमान किसी बुरे आदमी के हाथ में आ जाए तो क्या होगा. क्या हम ऐसी क्षमताएं विकसित कर रहे हैं जिनका दुरूपयोग हो सकता है स्मार्ट शहर की कहानी में एक और अध्याय है और इसे ऐप्स डीआईवाई सेंसर स्मार्टफोन तथा वेब इस्तेमाल करने वाले लोग लिख रहे है. डोंट फ्लश मी एक छोटा डीआईवाई सेंसर और ऐप है जो अकेले दम पर न्यूयॉर्क की पानी से जुड़ी समस्याओं को सुलझा रहा है. इसी तरह सेंसर नेटवर्क एग लोगों को शहर की समस्याओं के प्रति सचेत कर रहा है. शोधों के मुताबिक हर साल 20 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण के कारण होती है और शहरों में बढ़ती भीड़भाड़ के कारण इस समस्या के और बदतर होने की संभावना है. एग लोगों को सस्ते सेंसर बेचकर वायु की गुणवत्ता के बारे में आंकड़े जुटा रहा है. लोग इन सेंसरों को अपने घरों के बाहर लगाकर हवा में मौजूद ग्रीन हाउस गैसों नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड के स्तर का पता लगा सकते हैं. इन आंकड़ों को इंटरनेट पर भेजा जाता है जहां इन्हें एक नक्शे से जोड़कर दुनियाभर में प्रदूषण के स्तर को दिखाया जाता है. लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में सेंटर फॉर एडवांस स्पेशिएल एनालिसिस के निदेशक हडसन स्मिथ का कहना है कि शहरों की स्थिति सुधारने में लोगों की भागीदारी बेहद अहम है. उनकी टीम में लंदन को स्मार्ट बनाने के लिए एक सिटी डैशबोर्ड विकसित किया है. रियो के कंट्रोल रूम की तरह डैशबोर्ड प्रदूषण मौसम और नदी के जल स्तर से संबधित आंकड़ों को समाहित करता है. साथ ही यह ट्विटर और शहर की खुशहाली पर भी नजर रखता है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि शहरों को स्मार्ट बनने की ज़रूरत है. अनुमान के मुताबिक साल 2050 तक दुनिया की 75 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास करेगी जिससे यातायात व्यवस्था आपातकालीन सेवाओं और अन्य व्यवस्थाओं पर ज़बर्दस्त दबाव होगा. सच्चाई यह है कि दुनियाभर में इस समय जो स्मार्ट शहर बन रहे हैं वो बहुत छोटे हैं. हडसन स्मिथ ने कहा कि इन शहरों के बारे में काफी चर्चा हो रही है लेकिन उनके पास ऐसी कोई तकनीक नहीं है जिससे वास्तव में लोगों की जिंदगी में बदलाव आ रहा है. लेकिन उन्होंने साथ ही उम्मीद जताई कि अगले पांच सालों में चीजें स्मार्ट हो जाएंगी. तब शहर का डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर ट्रेनों और सड़कों की तरह अहम हो जाएगा. रिसर्च फर्म फैब्रिका के मुख्य कार्यकारी डैन हिल का कहना है कि इस डेटा का नियंत्रण किसी बड़ी कंपनी के हाथ में रहेगा या लोगों के हाथों में यह अभी स्पष्ट नहीं है लेकिन इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि शहरों को मूलरूप से किस उद्देश्य से विकसित किया गया था. उन्होंने कहा हम सुगमता के लिए शहर नहीं बनाते हैं हम संस्कृति व्यापार और समुदाय के लिए शहर बनाते हैं और ये सभी चीजें सुगम नहीं हैं. डैन हिल ने कहा कि शहरों कि बेहतर बनाने के चक्कर में उनकी सबसे बड़ी धरोधर को खो सकते हैं. उन्होंने कहा स्मार्ट लोग स्मार्ट शहर बनाते हैं. |
| DATE: 2013-08-23 |
| LABEL: science |
| [297] TITLE: प्रोटीन जो ठीक कर सकता है 'स्लीपिंग सिकनेस' |
| CONTENT: स्लीपिंग सिकनेस की बीमारी मक्खियों के काटने से होती है और इससे दिमाग सूज जाता है. इसके मरीजों को अक्सर बुखार सिर दर्द ठीक से नींद न आने जैसी शिकायतें होती हैं. वक्त पर इलाज न मिले तो यह जानलेवा भी साबित हो सकती है. लेकिन वैज्ञानिकों ने अब स्लीपिंग सिकनेस के इलाज की दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ाए हैं. मनुष्य के शरीर में संक्रमण से लड़ने के लिए प्रतिरोधक प्रणाली एक तरह का प्रोटीन पैदा करती है. शरीर में मौजूद ट्राइपानोसोमा परजीवी की गैम्बीयन नस्ल इस प्रोटीन को नुकसान पहुँचाती है. बेल्जियन के अनुसंधानकर्ताओं ने आनुवांशिकीय फेरबदल करके अब एक ऐसा प्रोटीन तैयार किया है जिसके बारे में शुरुआती परीक्षणों से पता चला है कि उससे ट्राइपानोसोमा परजीवियों के कई प्रकारों को खत्म किया जा सकता है. इसमें गैम्बियन नस्ल का ट्राइपानोसोमा परजीवी भी है. यह अध्ययन जर्नल नेचर में प्रकाशित हुआ है. पश्चिमी और मध्य अफ्रीका में पाई जाने वाली स्लीपिंग सिकनेस की बीमारी के 97 फीसदी मामले गैम्बीयन नस्ल के ट्राइपानोसोमा परजीवियों के वजह से होते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़ों के मुताबिक साल 2012 में स्लीपिंग सिकनेस के 7197 मामले प्रकाश में आए थे. मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अपोलवन प्रोटीन का उत्पादन करती है जो इन परजीवियों पर हमला करने की कोशिश करती है. बेल्जियम के ब्रक्सेलेस यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं ने अपने अध्ययन में इस बात की ओर इशारा किया है कि गैम्बियन अपोलवन प्रोटीन के खिलाफ तीन हिस्सों वाली प्रतिरक्षा प्रणाली विकसित कर लेता है. अपोलवन प्रोटीन को सामान्यतया ट्राइपानोसोमा परजीवी ग्रहण कर लेते हैं. दरअसल अपोलवन इन परजीवियों को यह भरोसा दिलाने में कामयाब हो जाता है कि वह उनके लिए फायदेमंद है. इसके बाद यह प्रोटीन आँत की झिल्लियों की दीवारों पर बैठ जाता है जहाँ वह इन परजीवियों को खत्म कर देता है. अध्ययन दल की अगुवाई करने वाले प्रोफेसर एतियन पेज कहते हैं गैम्बियन की प्रतिरक्षा प्रणाली के पहले चरण में वह एक प्रोटीन पैदा करता है जो अपोलवन प्रोटीन के विरुद्ध झिल्लियों की दीवारों को सख्त कर लेता है. प्रोफेसर पेज के मुताबिक यह एक बाधा की तरह ही है. दूसरे चरण में ट्राइपानोसोमा परजीवी के लिए प्रोटीन अवशोषित करना मुश्किल कर दिया जाता है. और आखिरकार अगर प्रोटीन इन सभी बाधाओं को पार करने में कामयाब हो जाता है तो गैम्बियन परजीवी के किसी अन्य स्वरूप के बनिस्बत कहीं तेजी से अपोलवन प्रोटीन को पचा लेने में सक्षम होते हैं ताकि झिल्लियाँ उसे न ग्रहण कर सकें. प्रोफेसर पेज कहते हैं सबसे अहम यह है कि अपोलवन प्रोटीन अभी भी वहीं मौजूद है. इसे अवशोषित नहीं किया गया है. इसका इस्तेमाल अभी भी उस परजीवी को खत्म करने में कया जा सकता है. इस प्रक्रिया में प्रोफेसर पेज और उनकी टीम को अपोलवन प्रोटीन की आनुवांशिकीय संरचना में फेरबदल करके इसके नए स्वरूप को विकसित करने का रास्ता मिला. यह न केवल गैम्बियन को खत्म करता है बल्कि ट्राइपानोसोम परजीवियों को खत्म करता है. हालांकि प्रोफेसर पेज यह साफ करते हैं कि अनुसंधान अभी शुरुआती चरण में हैं. वह कहते हैं कहने की जरूरत नहीं है कि यह उम्मीदें जगाने वाली खोज है. |
| DATE: 2013-08-23 |
| LABEL: science |
| [298] TITLE: अमरीका में मिला नया स्तनपाई जीव |
| CONTENT: अमरीका के वैज्ञानिकों को कोलम्बिया और इक्वाडोर के घने जंगलों में एक नया स्तनपाई जीव मिला है. इसका नाम ओलिंगुइटो रखा गया है. पिछले 35 सालों में पहली बार माँसाहारी जीव की कोई प्रजाति अमरीकी महाद्वीप में मिली है. वैज्ञानिकों का कहना है कि 21 वीं शताब्दी में स्तनपाई जीवों की कोई नई प्रजाति मिलना एक दुर्लभ घटना है. इस स्तनपाई को पहचानने में एक दशक से ज़्यादा समय लग गया. इसका श्रेय स्मिथसोनिअन इंस्टिट्यूट को जाता है. यह खोज जीवविज्ञानी क्रिस्टोफ़र हेल्गन ने की है. हेल्गन के शिकागो के एक संग्राहलय के भंडारगृह में कुछ जीवों की खाल और हड्डियाँ देखने से यह खोज शुरू हुई. उन्होंने बीबीसी न्यूज़ को बताया मैं कुछ ढूँढ रहा था और अचानक मैं ठिठक गया. उसकी खाल गहरे लाल रंग की थी और जब मैंने उसकी खोपड़ी देखीतो मैं उसकी शारीरिक रचना पहचान नहीं पाया. मैंने जितने भी इससे मिलते-जुलते जीव देखे थे यह उनसे अलग था. तभी मुझे लगा कि यह विज्ञान के लिए एक नई प्रजाति हो सकती है. डॉक्टर हेल्गन वाशिंगटन डीसी में नेशनल म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में स्तनपाई जीवों के निरीक्षक हैं. इस संग्राहलय में स्तनपाई जीवों का दुनिया का सबसे बड़ा संकलन है. जगह बचाने के लिए छ लाख से ज़्यादा स्पेसीमन चपटे करके ट्रे में रखे गए हैं. उनकी हड्डियों को साफ करके उनकी खाल के साथ एक बक्से में रखे गए हैं. इनमें से कई एक सदी से ज़्यादा पुराने हैं. पहले उनपर ग़लत चिप्पियाँ लग जाती थी और उनकी सही से पहचान नहीं हो पाती थी. लेकिन आज कल की आधुनिक तकनीक ने वैज्ञानिकों को सबसे पुराने स्पेसीमन में से भी डीएनए निकालने की सहूलियत दी है. ओलिंगुइटो के डीएनए के नमूने पांच एनी ज्ञात प्रजातियों से मिलाने के बाद डॉक्टर हेल्गन यह सुनिश्चित कर पाए कि यह एक नई खोज है. 35 सेंटीमीटर लंबा ओलिंगुइटो जिस जीव परिवार में शामिल किया गया है उसमें रैकून्स भी आते हैं. डॉक्टर हेल्गन कहते हैं मैं बता नहीं सकता मैं कितना रोमांचित हूँ. वह पहले भी दूसरी जीव प्रजातियों को ढूँढने के लिए जीव संग्रह का प्रयोग कर चुके हैं. उन्होंने विश्व का सबसे बड़ा चमकादड़ और सबसे छोटे बैंडिकूट को भी ढूँढा था. लेकिन डॉक्टर हेल्गन कहते हैं ओलिंगुइटो मेरी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धी है. इससे पहले अमरीका में ढूँढा गया आखिरी स्तनपाई कोलंबियन वेसेल था. माँसाहारी होते हुए भी ओलिंगुइटो ज़्यादातर फल ही खाता है. यह रात को बाहर निकलता है और किसी पर निर्भर नहीं रहता. ओलिंगुइटो एक बार में एक बच्चे को ही जन्म देता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि 1967 से 1976 तक अमरीका के कई चिड़ियाघरों में ओलिंगुइटो की प्रदर्शनी की गई थी. इसे रखने वाले इसे ओलिंगा समझ रहे थे. यह जीव भी ओलिंगुइटो से मिलता जुलता है. वह यह नहीं समझ पा रहे थे कि इसके बच्चे क्यों नहीं हो सके. इसे कई चिड़ियाघरों में भेज गया. लेकिन बिना पहचान मिले ही इसकी मृत्यु हो गई. सोसाइटी फॉर नेचुरल हिस्ट्री कलेक्शन के अध्यक्ष क्रिस नोरिस कहते हैं आज के समय यह संग्राहलयों में काम करने वालों के लिए एक सीख है कि अगर आप वहां सही से रखरखाव नहीं करेंगे तो वह भविष्य के लिए नहीं बचेंगे. वैज्ञानिक अभी तक पृथ्वी के जीवों का बहुत थोड़ा ही सूचीबद्ध कर पाए हैं. कीट-पतंगों बैक्टीरिया आआआउर वायरस की ख़ोज नियमित तौर पर होती रहती है लेकिन नया स्तनपाई जीव मिलना दुर्लभ है. डॉक्टर हेल्गन कहते हैं यह हमें याद दिलाता है कि अभी तक दुनिया को पूरी तरह जाना नहीं गया है और खोज का दौर ख़त्म नहीं हुआ है. ओलिंगुइटो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है और क्या बचा है |
| DATE: 2013-08-23 |
| LABEL: science |
| [299] TITLE: अब बच्चे भी बना सकेंगे लिंक्ड-इन पर प्रोफ़ाइल |
| CONTENT: पेशेवर लोगों की सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट लिंक्ड-इन ने सदस्यता की उम्र सीमा 18 से घटाकर 13 वर्ष कर दी है. यानी अब बच्चे भी लिंक्ड-इन पर प्रोफ़ाइल बना सकते हैं. हालाँकि बच्चों के प्रोफ़ाइल डिफॉल्ट सेटिंग पर चलेंगे जिसमें उनकी निजी जानकारियाँ कम ही साझा की जाएंगी जबकि सुरक्षा संबंधी लिंक प्रमुखता से होंगे. बच्चों द्वारा वेबसाइट के संबंध में की गई मदद की अपीलों का निपटारा भी अलग से ही किया जाएगा. वेबसाइट का यह फ़ैसला उच्च शिक्षा संस्थानों को पेज बनाने का विकल्प देने के एक दिन बाद आया है. ऑक्सफ़ोर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट के डॉक्टर बर्नी होगान का कहना है कि इससे बच्चों को अपने पेशेवर और व्यक्तिगत प्रोफ़ाइल अलग-अलग रखने का विकल्प मिलेगा. वे फ़ेसबुक पर अपने परिवार और दोस्तों के साथ शेयर किए गए प्रोफ़ाइल से अलग लिंक्ड-इन पर एक पेशेवर प्रोफ़ाइल बना सकेंगे. उन्होंने कहा मैं व्यक्तिगत तौर पर नियोक्ताओं द्वारा उम्मीदवारों को नौकरी देते वक्त उनके फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल को देखने का विरोध करता हूँ. इससे ग़ैर इरादतन भेदभाव का ख़तरा बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है. हालाँकि वे ये भी मानते हैं कि बच्चे फ़र्ज़ी प्रोफ़ाइल या गेम खेलने के लिए प्रोफ़ाइल बनाकर लिंक्ड-इन कम्युनिटी के लिए बाधा भी बन सकते हैं. लिंक्ड-इन पर 22 करोड़ से अधिक प्रोफ़ाइल हैं. वे कहते हैं आप एक फ़र्ज़ी प्रोफाइल के ज़रिए नौकरी नहीं पा सकते. न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन और फ़्रेंच बिज़नेस स्कूल इनसीड ने लिंक्ड-इन पर अपने पेज बना भी लिये है. लिंक्ड-इन के यूनिवर्सिटी विभाग की प्रमुख क्रिस्टीना एलन ने एक ब्लॉग पोस्ट में कहा कि यूनिवर्सिटी पेज कॉलेज चुनने का फ़ैसला लेने में छात्रों के लिए बहुत मददगार साबित होंगे. |
| DATE: 2013-08-22 |
| LABEL: science |
| [300] TITLE: 'ठोस बारिश' से मिलेगी सूखे से निज़ात? |
| CONTENT: पानी की कमी पूरी दुनिया की समस्या है और सूखे इलाकों में तो ये और गंभीर है. लेकिन क्या सॉलिड रेन इस समस्या से निज़ात दिला सकता है और क्या इसका इस्तेमाल कर कई गुना ज़्यादा फसल हासिल की जा सकती है. संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि हम जो पानी इस्तेमाल करते हैं उसमें एक बड़ा हिस्सा सिंचाई का होता है. कुछ शोधकर्ता इस पहलू पर काम कर रहे हैं कि क्या खेती में पानी लंबे समय तक इस्तेमाल हो सकता है. सॉलिड रेन असल में एक पाउडर है जो बहुत ज़्यादा मात्रा में पानी सोख सकता है और फिर इसे पूरे साल थोड़ा-थोड़ा कर के छोड़ता रहता है ताकि पौधे सूखे में भी ज़िंदा रह सकें. ख़ास बात ये कि सिर्फ 10 ग्राम पाउडर एक लीटर पानी सोख सकता है. इस पाउडर में इस्तेमाल होने वाला पदार्थ एक तरह का शोषक पॉलीमर होता है जिसे मूल रूप से अमेरिका के कृषि विभाग ने तैयार किया है. इस तकनीक का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल यूं तो बच्चों की नैपी में होता है लेकिन मेक्सिको के एक इंजीनियर सर्गियो जीसस रिको वेलासो ने इस तकनीक का एक अलग पेटेंट वाला संस्करण तैयार किया. वेलासो ने एक कंपनी बनाई जो सॉलिड रेन बेचती है. ये कंपनी बीते 10 साल से मेक्सिको में ये उत्पाद बेच रही है. कंपनी का कहना है कि मेक्सिको की सरकार ने सॉलिड रेन का परीक्षण किया और पाया कि इसे मिट्टी में मिलाने पर 300 फीसदी ज़्यादा फसल हासिल की जा सकती है. सॉलिड रेन कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट एडविन गोन्जालेज़ के मुताबिक पानी की कमी की वजह से लोगों की इस उत्पाद में दिलचस्पी बढ़ी है. गोंजालेज़ ने बीबीसी से कहा ये पाउडर पानी को जकड़ लेता है हमारा उत्पाद ज़मीन में 8 से 10 साल तक बना रहता है शुद्ध पानी इस्तेमाल करने पर ये और लंबे समय तक टिकता है. सॉलिड रेन कंपनी का कहना है कि एक हेक्टेयर ज़मीन में 50 किलोग्राम पाउडर का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. हालांकि ये पाउडर सस्ता नहीं है 50 किलोग्राम पाउडर की कीमत 1500 डॉलर यानी करीब 92 हज़ार रुपये है. सॉलिड रेन का दावा है कि ये पाउडर प्राकृतिक है और कई साल तक इस्तेमाल किए जाने पर भी मिट्टी को ख़राब नहीं करेगा. गोंजालेज़ कहते हैं हमारा उत्पाद ज़हरीला नहीं है विघटित होने के बाद ये पौधे का हिस्सा बन जाता है. हालांकि सभी इससे सहमत नहीं हैं कि सॉलिड रेन सूखे की समस्या का महत्वपूर्ण हल है. वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी की डॉक्टर लिंडा चाकर स्कॉट कहती हैं ऐसे उत्पाद नए नहीं हैं और ऐसे वैज्ञानिक प्रमाण भी नहीं हैं जिनसे ये लगे कि ये पानी कई साल तक रोक सकते हैं या मिट्टी में 10 साल तक रह सकते हैं. जैसे ही जेल सूखने लगते हैं ये वातावरण का पानी भी सोखने लगते हैं. इसका मतलब ये हुआ कि ये सीधे पौधों की जड़ों से पानी लेने लगेंगे. उनका मानना है कि लकड़ी का बुरादा भी उतना ही प्रभावकारी है और सस्ता भी है. भले ही विज्ञान सॉलिड रेन जैसे पाउडर से होने वाले फ़ायदे के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त न हो सॉलिड रेन के वाइस प्रेसिडेंट एडविन गोंजालेज़ कहते हैं ऑस्ट्रेलिया और भारत के सूखे इलाकों से हमसे इस पाउडर के बारे में पूछा जा रहा है. |
| DATE: 2013-08-21 |
| LABEL: science |
| [301] TITLE: 'प्रतिरोधक तंत्र' से ही होगा कैंसर का इलाज |
| CONTENT: अमरीकी शोधकर्ताओं ने कैंसर से लड़ने के लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली में बदलाव करने का तरीका खोज लिया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली बेहद संवेदनशील होने के साथ संतुलित होती है जो शरीर में घुसपैठ करने वाले विषाणुओं और रोगाणुओं से लड़ती है लेकिन वह शरीर के अपने उत्तकों यानी टिशूज़ से नहीं लड़ती. फिलाडेल्फिया के बाल अस्पताल के शोधकर्ताओं को जानवरों पर किए गए अध्ययन से पता चला है कि प्रतिरोधक प्रणाली के संतुलन में बदलाव करने से कैंसर का एक नया इलाज ढूंढ़ा जा सकता है. शोध का यह नतीजा नेचर मेडिसिन पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. वैज्ञानिकों के मुताबिक जब रोग प्रतिरोधक प्रणाली शरीर के ही उत्तकों पर असर करने लगती है तो कई गंभीर बीमारियां जैसे टाइप 1 डायबिटीज हो जाती है. दरअसल ट्रेग सेल्स कैंसर और ऑटोइम्यून डिजीज में शोध का एक नया और चर्चित क्षेत्र है. ऑटोइम्यून डिजीज का संबंध उन बीमारियों से है जो रोग प्रतिरोधक प्रणाली से ही शरीर के अंदर के ऊतकों के नष्ट होने के कारण होती हैं. यह रोग प्रतिरोधक प्रणाली का हिस्सा है. प्रतिरोधी प्रणाली सामान्य तौर पर शरीर को बाहरी हमलों से बचाती है. शोधकर्ताओं ने प्रतिरोधी प्रणाली को प्रभावी तरीके से नियंत्रित कर ट्रेग फंक्शन को तितर-बितर करने की कोशिश की. इस अध्ययन के हिस्सा रहे शोधकर्ता डॉक्टर वायने हैंकॉक ने कहा हमें ट्रेग फंक्शन को इस तरह से तितर-बितर करने की जरूरत थी जिससे कि वह ऑटोइम्यून रिएक्शन किए बिना एंटी ट्यूमर एक्टीविटी करे. शोधकर्ताओं ने दो स्थितियों में शोध किए. पहली स्थिति में उन्होंने उन चूहों पर शोध किया जिनमें ट्रेग के लिए ज़रूरी रसायन नहीं था जबकि दूसरी स्थिति में उन्होंने एक ऐसी दवा का इस्तेमाल किया जो एक सामान्य चूहे में सामान प्रभाव डालता था. इन दोनों शोध में प्रतिरोधी प्रणाली में बदलाव के कारण फेफड़े के कैंसर में वृद्धि को रोकने में सफलता मिली. डॉक्टर हैंकॉक ने कहा इससे सही मायने में एक ऐसे नए क्षेत्र कैंसर इम्यूनोथेरेपी की ओर बढ़ा जा सकता है जिसमें काफी संभावनाए हैं. हालांकि कैंसर के मरीजों के इलाज में इस प्रणाली के इस्तेमाल में अभी काफी समय लगेगा. |
| DATE: 2013-08-20 |
| LABEL: science |
| [302] TITLE: क्या फ़ेसबुक आपके मन का चैन छीन रहा है? |
| CONTENT: नियमित रूप से फ़ेसबुक से जुड़ा रहना आपका सुख-चैन छीन सकता है. अमरीका के मिशिगन विश्वविद्यालय के एक शोध से ये पता चला है. मिशिगन विश्वविद्यालय के एक शोध के अनुसार युवा जितना ज़्यादा फ़ेसबुक ब्राउज़ करते हैं सुखी होने का एहसास और जीवन से संतुष्टि कम होती जाती है. इस शोध में प्रतिभागियों पर दो हफ़्ते तक नज़र रखी गई. यह शोध पहले के उन अध्ययन को ही पुष्ट करता है जिनके मुताबिक फ़ेसबुक का नकारात्मक मनोवैज्ञानिक असर पड़ सकता है. फ़ेसबुक के करीब एक अरब सदस्य हैं और इनमें से आधे रोज़ाना इसका इस्तेमाल करते हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि सतही तौर पर तो फ़ेसबुक से सामाजिक जुड़ाव की बुनियादी ज़रूरत पूरी होती दिखती है लेकिन इस शोध से पता चलता है कि सुखी होने का एहसास बढ़ाने के बजाय फ़ेसबुक का इस्तेमाल इसे कम कर सकता है. ब्रिटिश साइकोलॉजिकल सोसाइटी के सदस्य इंटरनेट मनोवैज्ञानिक ग्राहम जोन्स कहते हैं यह कुछ अन्य शोधों की पुष्टि करता है- ऐसे शोध जिनके अनुसार फ़ेसबुक का नकारात्मक असर होता है. ग्राहम जोन्स मिशिगन विश्वविद्यालय के शोधदल में शामिल नहीं थे. हालांकि वह यह भी कहते हैं कि कई शोध यह भी दिखाते हैं कि फ़ेसबुक का प्रयोगकर्ताओं पर सकारात्मक असर पड़ा है. सर्वेक्षण में प्रतिभागियों से पूछा गया था कि उन्हें कैसा महसूस हुआ वह कितने चिंतित थे उस समय वह कितना अकेला महसूस कर रहे थे और पिछले सर्वेक्षण से अब तक उन्होंने फ़ेसबुक को कितना इस्तेमाल किया है. उन्हें हर रोज़ दस बजे से आधी रात के बीच सर्वेक्षण से जुड़े लिंक के पांच टेक्स्ट मैसेज अनियमित ढंग से मिले. शोधकर्ता यह भी जानना चाहते थे कि प्रतिभागी शोध के सवालों के बीच लोगों से कितना सीधा संपर्क करते हैं चाहे आमने-सामने हो या फ़ोन पर. हालांकि शोधकर्ता कहते हैं कि इससे ये पता नहीं चला कि लोगों को जैसा महसूस हुआ उसके बाद उन्होंने फ़ेसबुक का ज़्यादा इस्तेमाल किया या कम. शोधकर्ताओं के अनुसार प्रतिभागियों ने जितना वेबसाइट का इस्तेमाल किया उतना ही उनका संतुष्टि का स्तर कम होता गया. यह तरीका लोगों से सीधे संपर्क करने के विपरीत लगता है जिसका ख़ुशी पर कोई असर नहीं होता. हालांकि शोधकर्ताओं को ये ज़रूर पता चला कि लोगों ने फ़ेसबुक पर तब ज़्यादा वक्त बिताया जब वे अकेला महसूस कर रहे थे - इसकी वजह ये नहीं थी कि वे उस ख़ास वक्त में अकेले थे. रिपोर्ट के अनुसार अकेले काम करने की वजह से क्या ख़ुशी के अहसास में कमी आती है हमें संदेह है कि ऐसा होता है क्योंकि लोगो को अकेले किए जाने वाले कामों में मज़ा आता है जैसे कि- पढ़ना या व्यायाम करनाकई हालिया शोध इस विचार का समर्थन करते हैं कि वस्तुनिष्ठ सामाजिक एकाकीपन के बजाय सामाजिक रूप से अकेलेपन की भावना लोगों की ख़ुशी को जांचने का बेहतर आधार है. सामान्य रूप में इसे फोमो यानी फ़ीयर ऑफ़ मिसिंग आउट छूट जाने का डर कहते हैं. कंप्यूटर पर बैठकर अपने दोस्तों परिजनों को मस्ती करते हुए देखते रहने का यह एक दुष्प्रभाव है. शोध के अनुसार करीब-करीब सभी प्रतिभागियों ने कहा कि वह फ़ेसबुक का इस्तेमाल दोस्तों से संपर्क में रहने के लिए करते हैं. सिर्फ़ 23 ने कहा कि वह सोशल नेटवर्किंग साइट का इस्तेमाल नए लोगों से मिलने के लिए करते हैं. तीन चौथाई से ज़्यादा लोगों ने कहा कि वह वेबसाइट पर अपने ग्रुप में अच्छी चीज़ें साझा करना पसंद करते हैं. सिर्फ़ 36 लोगों ने कहा कि वह ख़राब चीज़ें भी फ़ेसबुक पर साझा करते हैं. ग्राहम जोन्स चेतावनी देते हैं कि शोध के निष्कर्ष उन लोगों के लिए सही होंगे जो फ़ेसबुक पर बहुत ज़्यादा समय बिताते हैं. उनके मुताबिक इस शोध में सीधे सामाजिक संपर्क के साथ पूरा तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया गया है. वह यह भी कहते हैं कि क्योंकि फ़ेसबुक एक बहुत नई चीज़ है इसलिए समाज अभी इसका इस्तेमाल करना सीख ही रहा है. |
| DATE: 2013-08-18 |
| LABEL: science |
| [303] TITLE: वे डॉक्टर जिन्होंने दुनिया की जान बचाई |
| CONTENT: दस साल पहले दुनिया भर में सार्स नाम की एक रहस्यमय बीमारी का डर फैला हुआ था. इसके विषाणुओं से सैकड़ों लोग मारे गए थे और हज़ारों अन्य संक्रमित हो गए थे. लेकिन इसका असर और घातक हो सकता था अगर कुछ डॉक्टर और नर्स ख़तरे की परवाह किए बिना दुनिया को इससे आगाह नहीं करते. वियतनाम के हनोई के एक फ्रांसीसी अस्पताल में फ़रवरी 2003 में एक चीनी-अमरीकी जॉनी चेन दाख़िल हुए. ऐसा लग रहा था कि उन्हें गंभीर फ़्लू है. डॉक्टर ऑलिविर कैटिन तब उसी अस्पताल में थे. वह बताते हैं कि कुछ ही दिन में चेन की देखभाल करने वाले स्टाफ़ समेत अस्पताल में 40 लोग बीमार पड़ गए. इनमें से सात की मौत हो गई. जल्द ही एक्सरे रिपोर्ट्स से यह साफ़ हो गया कि सभी बीमारों की स्थिति चेन जैसी ही थी. चेन की देखरेख करने वाले सभी कर्मचारी इस बीमारी से मारे गए थे इसलिए डॉक्टरों नर्सों और अस्पताल के बाकी स्टाफ़ में दहशत फैल गई. डॉक्टर और नर्स अपनी जान बचाकर भागने लगे. हनोई के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हाईजीन एंड एपिडेमियोलॉजी में वायरोलॉजी विषाणुओं का अध्ययन की प्रमुख डॉक्टर ली थी क्वैन मी उन लोगों में से थीं जो बीमारों के इलाज के लिए रुके रहे. विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ में संक्रमणकारी बीमारियों के विशेषज्ञ डॉक्टर कार्लो उर्बानी को भी एक अफ़सर की तरह ऑफ़िस में बैठना गवारा नहीं हुआ. एक डॉक्टर होने के नाते उन्हें बीमारों की मदद करनी ही थी. उर्बानी ने ख़ुद के लिए ख़तरा उठाते हुए मरीज़ों से नमूने लेकर उनका विश्लेषण किया. वही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने दुनिया को सार्स नाम की इस बीमारी के ख़तरे के बारे में बताया. फ़्रांसीसी अस्पताल में कई हफ़्ते तक अनथक काम करने के बाद उन्हें आराम करने की ज़रूरत पड़ी और तभी उन्हें पता चला कि वह भी सार्स के शिकार हो गए हैं. उनके सबसे बड़े बेटे टोमासो उर्बानी उस समय 15 साल के थे. वह कहते हैं मैं जानता था कि उनकी बीमारी बढ़ती जा रही है. लेकिन मेरा दिल कहता था कि वह ठीक हो जाएंगे क्योंकि वह मेरे पिता हैं. लेकिन सार्स का शिकार होने के दो हफ़्ते बाद ही डॉक्टर उर्बानी की मृत्यु हो गई. दस साल बाद टोमासो कहते हैं कि उन्हें अपने पिता पर गर्व है. हालांकि जॉनी चेन हनोई में बीमार पड़े थे और सार्स की कहानी यहीं शुरू हुई थी लेकिन यह सिर्फ़ शुरुआत थी. एक अंतरराष्ट्रीय व्यापारी चेन वियतनाम आने से पहले हॉन्ग कॉन्ग में रुके थे. जल्द ही वहां सार्स का विस्फोट हो गया. हॉन्ग कॉन्ग में प्रिंस ऑफ़ वेल्स मेडिकल फैकल्टी के प्रोफ़ेसर जोसफ़ सुंग कहते हैं एक ही कमरे में मेरे दो दर्जन सहयोगी बैठे हुए थे. सभी को तेज़ बुख़ार था और वह कांप रहे थे. कई खांस भी रहे थे. यह उस भयानक रात की शुरुआत थी. सुंग ने अपनी टीम को दो दलों में बांट दिया था. एक जो अन्य मरीज़ों की देखरेख करता था और दूसरा जिसे वह गंदा दल कहते थे. वह उन मरीज़ों की देखरेख करता था जिसमें उन्हें ख़ुद संक्रमण का ख़तरा रहता था. मदद के लिए लोग ख़ुद आगे आते रहे. सुंग कहते हैं हमें लगातार लोगों की ज़रूरत थी. राहत की बात यह थी कि मेडिकल डिपार्टमेंट सर्जन ऑर्थोपेडिक सर्जन गाइनाकॉलोजिस्ट और तो और ऑप्थालमोलोजिस्ट भी मदद के लिए आते रहे. लेकिन पूर्वी एशिया से आधी दुनिया दूर टोरंटो में जब सार्स का हमला हुआ तो वे पूरी तरह से अचंभित रह गए. स्कारबोरो ग्रेस अस्पताल में एक अकेले मरीज़ ने सभी कर्मचारियों को संक्रमित कर दिया. कई लोगों को टोरंटो के बाहरी इलाक़े में स्थिति टीबी अस्पताल में भर्ती करवाया गया. हनोई और हॉन्ग कॉन्ग में अस्पतालों में दो तरह के लोग थे. एक तो वह जो जान बचाकर भाग गए और दूसरे वह जो दिन में काम पर आए और हफ़्तों तक घर नहीं गए. टोरंटो के वेस्ट पार्क हेल्थकेयर सेंटर में श्वास संबंधी बीमारियों की विशेषज्ञ डॉक्टर मॉनिका एवेन्डानो ने अपने बच्चों को एक चिट्ठी लिखी मुझे संक्रमण हो सकता है और इससे मेरी मौत हो सकती है. मैं इसलिए रुकी क्योंकि मैं एक डॉक्टर हूं और बीमारों की देखरेख करना मेरा काम है. टोरंटो में सार्स के सामने आने के शुरुआती वक़्त में एक मरीज़ से संक्रमित होने वाले लोगों में पैरामेडिकल स्टाफ़ के ब्रूस इंग्लैंड भी थे. दस साल बाद भी उन्हें सांस लेने में दिक्क़त और कमज़ोरी महसूस होती है. 2003 की गर्मियों तक इंसान से इंसान में फैलने वाले इस चक्र को तोड़ा जा चुका था. लेकिन जो हॉन्ग कॉन्ग वियतनाम और टोरंटो में हुआ वह आसानी से लंदन न्यूयॉर्क या किसी भी ऐसी जगह हो सकता था जहां जहाज़ से पहुंचा जा सकता है. |
| DATE: 2013-08-18 |
| LABEL: science |
| [304] TITLE: कैंसर के कारणों की खोज में अहम कामयाबी |
| CONTENT: वैज्ञानिकों का कहना है कि कैंसर पर चल रहे शोध में कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं जो इस बीमारी के कारणों का पता लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं. वैज्ञानिकों ने ट्यूमर के ज़्यादातर मामलों में होने वाली 21 आनुवांशिक तब्दीलियों का पता लगाया है. अनुवांशिक कोड में अचानक हुआ बदलाव आम तौर पर होने वाले 30 प्रकार के कैंसर के लगभग 97 फ़ीसदी मामलों में ज़िम्मेदार कारक होता है. इन तब्दीलियों की वजह पता लगा लिए जाने से कैंसर के नए इलाज ढूंढे जा सकेंगे. सिगरेट पीना इन कारणों में से एक है लेकिन ऐसे अन्य तमाम कारण हो सकते हैं जिनका पता नहीं है. कैंसर रिसर्च यूके का कहना है कि ये एक महत्वपूर्ण अध्ययन है. कैंसर जिनोम के अध्ययन के इस बड़े प्रयास में शोधकर्ताओं की अंतरराष्ट्रीय टीम कैंसर को जन्म देने वाले बदलावों को समझने की कोशिश कर रही थी. अल्ट्रा वायलेट रेडियेशन और धूम्रपान डीएनए में बदलाव पैदा करते हैं जो कैंसर का जोखिम बढ़ाता है. ब्रिटेन के वेलकम ट्रस्ट सैंगर इंस्टीट्यूट की अगुआई में हो रहे इस शोध के बारे में संस्थान के निदेशक सर माइक स्ट्रैटन कहते हैं मैं बहुत उत्साहित हूं. कैंसर जिनोम के भीतर ही वो निशान वो चिन्ह छिपे हैं जो हमें बता सकते हैं कि किस वजह से कैंसर हुआ है. कैंसर संबंधी शोध के लिए ये बहुत ही अहम उपलब्धि है. ये हमें उन क्षेत्रों तक ले जा रहा है जिनके अस्तित्व के बारे में हमें पहले से पता नहीं था. मुझे लगता है ये एक बड़ा मील का पत्थर है. जब भी शरीर में वायरस का हमला होता है तो कोशिकाएं एन्ज़ाइम को सक्रिय कर देती हैं जो वायरस से तब तक निपटते हैं जब तक वो निष्क्रिय ना हो जाएं. प्रोफ़ेसर स्ट्रैटन का कहना है हमें लगता है कि जब शरीर के अंदर ये हो रहा होता है तब नुक़सान दोनों तरफ़ होता है. कोशिकाएं ख़ुद अपने में भी तब्दीली लाती हैं और इस प्रक्रिया में वो इतनी बदल जाती हैं कि एक कैंसर कोशिका बनने की पूरी आशंका होती है. ये एक दोधारी तलवार की तरह है. इस जानकारी से शोध की दिशा में आगे बढ़ने की संभावनाएं पैदा हुई हैं. कैंसर रिसर्च यूके में मुख्य वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर निक जोन्स का कहना है हमें पता है कि धूम्रपान और अल्ट्रा वायलट किरणें डीएनए में ख़राबी पैदा कर सकती हैं जो कैंसर की वजह बन सकता है. लेकिन कैंसर के बहुत सारे रूप हैं जिनके बारे में ये नहीं पता है कि ये किस वजह से होते हैं. इस अध्ययन में अनुवांशिक ढांचे को जिस तरह समझा गया है वह कैंसर के विकास की प्रक्रिया को समझने में अहम है. कैंसर के कारणों को समझने से ही उनके निदान की दिशा में आगे बढ़ना मुमकिन हो पाएगा. |
| DATE: 2013-08-18 |
| LABEL: science |
| [305] TITLE: गर्भवती अगर मोटी तो बच्चा बन सकता है दिल का रोगी |
| CONTENT: एक अध्ययन से पता चला है कि ज़्यादा वज़न वाली और मोटी माओं से पैदा होने वाले बच्चों के दिल की बीमारी से जल्दी मौत होने की संभावना ज़्यादा होती है. स्कॉटलैंड में हुए शोध से पता चला है कि गर्भावस्था के दौरान जो महिलाएं मोटी होती हैं उनके बच्चों की 55 साल से कम उम्र में मृत्यु की संभावना 35 फ़ीसदी ज़्यादा होती है. हालांकि अभी इस शोध से ये पता नहीं चला है कि इन नतीजों के लिए जेनेटिक्स गर्भाशय पर पड़ने वाले प्रभाव और बाद की जीवन शैली कितनी ज़िम्मेदार है. लेकिन ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित इस शोध के लेखकों का कहना है कि उनके निष्कर्ष जनस्वास्थ्य के लिए चिंता विषय हो सकते हैं. ब्रिटेन में प्रसव से पूर्व हर पांच में से एक महिला ज़रूरत से ज़्यादा मोटी हो जाती है. इस शोध में 28540 वैसी महिलाओं पर अध्ययन किया गया जिनका गर्भधारण के बाद पहली बार परीक्षण किया गया. ऐसी महिलाओं के 37709 बच्चों का भी विश्लेषण किया गया जिनकी उम्र 34 से 61 साल के बीच है. मोटी महिलाओं के बच्चों को दिल की बीमारी होने की संभावना ज़्यादा रहती है. इस अध्ययन में हर पांच में से एक महिला को ज़्यादा वज़न का माना गया जिनका बॉडी मास इंडेक्स बीएमआई 25 से 29. 9 के बीच था जबकि चार फीसदी महिलाएं 30 से ज़्यादा बीएमआई के साथ और ज़्यादा मोटी पाई गईं. इस शोध के निष्कर्षों तक पहुंचने में दिल की बीमारी या किसी अन्य कारण से हुई समय पूर्व 6551 मौतों को शामिल किया गया. शोध में पाया गया कि गर्भावस्था के दौरान जिन महिलाओं का वज़न सामान्य था उनके मुकाबले ज़्यादा वज़न वाली माओं के बच्चों की समयपूर्व मृत्यु की संभावना 35 फ़ीसदी ज्यादा पाई गई. इस अध्ययन में प्रसव के समय माता की आयु बच्चे का वज़न और सामाजिक स्थिति को भी शामिल किया गया था. इस शोध का नेतृत्व करनेवाली एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर रेबेका रेनॉल्ड्स ने कहा कि शोध के नतीजे ये इस ओर इशारा करते हैं कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को वज़न पर नियंत्रण रखना चाहिए सोच समझकर खाना चाहिए और सक्रिय जीवन बिताना चाहिए. हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि गर्भावस्था के दौरान ज़्यादा वज़न और बच्चों की जल्दी मृत्यु के बीच पूरी तरह किसी निर्णायक निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए अभी और शोध की ज़रूरत है. पहले के शोधों से ये पता चला है कि गर्भावस्था के दौरान ज़्यादा वज़न का बच्चे के भूख की प्रकृति और उसकी काया से संबंध होता है. शोधकर्ता मोटी महिलाओं को वज़न कम करने की सलाह देते हैं. कैंब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सर स्टीफ़ेन ओरहिली ने चेतावनी देते हुए कहा है कि मां के मोटापे का असर परिवार पर होता है. मोटे लोगों को दिल की बीमारी की संभावना ज़्यादा होती है इसलिए इस शोध में शामिल लोग उन लोगों के मुकाबले ज्यादा मोटे थे जिनकी माएं दुबली-पतली थीं. रॉयल कॉलेज ऑफ़ मिडवाइव्स का कहना है कि महिलाओं को सामान्य वज़न में गर्भधारण करना चाहिए. लेकिन कॉलेज के डायरेक्टर लुई सिल्वरटोन का कहना है कि हर प्रीग्नेंसी योजनाबद्ध नहीं होती और मिडवाइव्स यानी प्रसव में मदद करनेवाली महिलाएं पूरी कोशिश करती हैं कि गर्भवती महिलाएं वज़न न बढ़ाएं और प्रसव के बाद सही तरीके से वज़न कम करें. इस शोध को थोड़ी आर्थिक सहायता देनेवाली संस्था ब्रिटिश हार्ट फ़ाउंटेशन में सीनियर कार्डियक नर्स डोइरेन मैड्डॉक का कहना है ये अध्ययन सभी लोगों को सतर्क करता है लेकिन खासतौर से इसका महत्व गर्भवती महिलाओं के लिए है जिन्हें अच्छा भोजन लेना चाहिए और सक्रिय रहना चाहिए. |
| DATE: 2013-08-17 |
| LABEL: science |
| [306] TITLE: टचस्क्रीन: गंदी नहीं होगी, बीमार नहीं करेगी |
| CONTENT: टचस्क्रीन फ़ोन और टैबलेट अब हर वर्ग और हर श्रेणी में लोकप्रिय हो गए हैं. लेकिन एक दिक्कत सभी तरह की टचस्क्रीन के साथ आती है और वह है स्क्रीन पर पड़ने वाले निशान. यह निशान न सिर्फ़ स्क्रीन को गंदा करते हैं बल्कि यह कई तरह के इंफ़ेक्शन भी फैला सकते हैं. इसलिए दुनिया भर में वैज्ञानिक ऐसी तकनीकों पर काम कर रहे हैं जिससे टचस्क्रीन साफ़ और सुरक्षित बन सके. जैसे कि खुद ही जीवाणुओं को मार सकने में सक्षम कोटिंग. इलेक्ट्रॉनिक वैज्ञानिक स्टीव ब्लॉक डाऊ कॉर्निंग कंपनी में काम करते हैं. ये कंपनी टच स्क्रीन पर लगाने वाली परत बनाती है. स्टीव ब्लॉक कहते हैं ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जो हमारी स्क्रीन को गंदा कर सकती हैं. पहले तो वह तेल होता है जो हाथ से निकलता है फिर लोशन सौंदर्य प्रसाधन होते हैं और पसीना भी लगता है जो फ़ोन को कान से सटाने पर लग जाता है. एरिज़ोना विश्वविद्यालय में माइक्रोबायोलॉजिस्ट प्रोफ़ेसर चार्ल्स गेर्बा कहते हैं कि अगर फ़ोन सिर्फ़ आप ही इस्तेमाल करते हैं तो चिंता की कोई बात नहीं. उन्होंने बीबीसी से कहा टचस्क्रीन पर बहुत से जीवाणु होते हैं. लेकिन अगर बहुत से लोग इसे इस्तेमाल नहीं करते तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि ये आपके जीवाणु हैं. लेकिन दिक्कत तब होती है जब इन टचस्क्रीन को सार्वजनिक स्थानों पर रखा जाता है. जैसे कि ऐसे सुपरमार्केट में जहां खुद का सामान चुनते हैं डॉक्टर के वेटिंग रूम में या ऐसे परिवारों में जहां गैजेट को कई लोग इस्तेमाल करते हैं. प्रोफ़ेसर गेर्बा और उनके सहयोगियों के एक अध्ययन में देखा गया कि कई लोगों के इस्तेमाल करने पर संक्रमण कितना ख़तरनाक हो सकता है. वह कहते हैं एक ही सेलफ़ोन इस्तेमाल करने वाले किशोरों में हमें एमआरएसए संक्रमण मिला है. अमरीका में खुद सामान चुनने वाली दुकानों पर रखी टचस्क्रीन पर भी आपको एमआरएसए मिलता है. एक लघु अध्ययन में डॉक्टर गेर्बा ने पाया कि संक्रमण से बचने के लिए टचस्क्रीन को साफ़ रखकर जीवाणुओं को ख़त्म कर देना चाहिए. सोडियम हाइपोक्लोराइट ब्लीच स्क्रीन को साफ़ करने का बेहतर उपाय है. हालांकि नियमित रूप से ब्लीच करना महंगे और चमकदार टचस्क्रीन उपकरण के हक में नहीं होगा. ब्लॉक कहते हैं कि स्क्रीन बनाने वाले लगातार पदार्थ और परत को बेहतर बना रहे हैं ताकि उपकरण को साफ़ करना आसान हो जाए. इसमें लगने वाले शीशे और उस पर लगने वाली परत को सबसे सूक्ष्म स्तर पर बनाया जा रहा है. ब्लॉक कहते हैं इन्हें ख़ास तौर पर तैयार कणों से बनाया जा रहा है जो इसी तरह के प्रयोग के लिए बनाए गए हैं. अब सामान्यतः टचस्क्रीन पर लगने वाली सिलिकॉन परत निशानों और पदार्थों को काफ़ी हद तक दूर रखती है. इसके साथ ही ये ज़्यादा मजबूत हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि स्क्रीन सालों-साल सही रहे. इसके अलावा सामान बनाने वाली जापानी कंपनी टोरे ने एक ऐसी परत बनाई है जो तेल और उंगलियों पर लगे अन्य पदार्थों को 50 फ़ीसदी तक हटा देती है. एक बार लगाए जाने के बाद यह परत लाखों सूक्ष्म धारियों के रूप में सूख जाती है. जिससे यह गंदगी को छुपा लेती है और स्क्रीन चमकदार बनी रहती है. ज़्यादातर टचस्क्रीन उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले गोरिल्ला ग्लास के चौथे संस्करण में एक जीवाणु विरोधी परत लगी होगी जो जीवाणुओं को खुद ही ख़त्म कर देगी. इसका अगले कुछ सालों में इस्तेमाल शुरू होगा. हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ इंजीनियरिंग और एप्लाएड साइंसेस के वैज्ञानिकों ने भी इस दिशा में काम किया है. उन्होंने एक मांसाहारी पौधे की तकनीक को अपनी स्क्रीन की परत बनाने में इस्तेमाल किया. उन्होंने देखा कि पिचर पौधे की सतह बहुत चिकनी होती है क्योंकि इसमें सूक्ष्म गांठें होती हैं जिनमें पानी रुक जाता है. ऐसे कीड़े जो आसानी से सतह पर चल सकते हैं उन्हें इसमें टिकने में मुश्किल होती है क्योंकि यह बेहद चिकना होता है. इस सतह की नकल कर और चिकनाई की एक बेहद पतली परत लगाकर उन्होंने एक ऐसी सतह तैयार की है जो शरीर में मिलने वाले पदार्थों के ठीक विपरीत है. अभी इस पर शोध जारी है लेकिन यह साफ़ है कि इस स्क्रीन को गंदा करना मुश्किल होगा और इस्तेमाल करना आसान. |
| DATE: 2013-08-17 |
| LABEL: science |
| [307] TITLE: एक मोबाइल ऐप जो करेगा मोतियाबिंद की जाँच! |
| CONTENT: मरियम वाईथारा की आँखों में मोतियाबिंद उतर आया था और उन्हें दिखाई देना लगभग बंद हो गया था. मरियम कीनिया में एक दूरदराज़ के एक गरीब गाँव में रहती हैं. गाँव के आस पास के इलाके में एक ही डॉक्टर है और डॉक्टर को दिखाने के लिए भी बहुत दूर जाना पड़ता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि पूरी दुनिया में 28 करोड़ 50 लाख लोगों को दिखता नहीं है या फिर उनकी नज़र कमजोर है. कई बार आँखों की परेशानी का कारण बहुत मामूली और इलाज बेहद आसान होता है. एक चश्मा पहनने से या मोतियाबिंद के ऑपरेशन से नज़र ठीक हो सकती है. ऐसा माना जाता है कि आँखों की तकलीफ के हर पाँच में से चार मामले ठीक किए जा सकते हैं. दुनिया के ग़रीब माने जाने वाले हिस्सों में मौजूद क़स्बों या गांवों में आँखों के डॉक्टर मिल ही जाते हैं. हालांकि लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के डॉक्टर एंड्रू बस्तावरस कहते हैं कि मरीज़ों को ही खोजना एक समस्या है. उन्होंने कहा जिन मरीज़ों को इलाज की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है वे कभी अस्पताल पहुँच ही पाते. क्योंकि वो हाशिए रह रहे होते हैं. उनकी आमदनी भी इतनी नहीं होती कि वह अस्पताल जाने के लिए परिवहन का कोई इंतजाम कर सकें. इसलिए हमने उन तक पहुँचने का रास्ता खोज निकालने की ज़रूरत पड़ी. डॉक्टर बस्तावरस का कहना है कि उन्होंने एक रास्ता खोज निकाला है. वह उपाय है एक मोबाइल जिसका इस्तेमाल साधारण से प्रशिक्षण से किया जा सकता है. वो पीक पोर्टेबल आई एग्ज़ामिनेशन किट नाम के एक स्मार्टफ़ोन ऐप का कीनिया के 5000 लोगों पर परिक्षण कर रहे हैं. इस स्मार्टपोन ऐप तकनीक में मोतियाबिंद की जांच के लिए मोबाइल फ़ोन का कैमरा प्रयोग में लाया जाता है. मोबाइल की स्क्रीन पर बड़े से छोटे होते अक्षरों के सहारे आँखों के देखने की क्षमता की साधारण जाँच की जाती है. मोबाइल की फ़्लैश लाइट की मदद से आँखों के पीछे के रेटिना वाले हिस्से की जाँच की जाती है. इसके बाद मरीज़ के बारे में जानकारी मोबाइल में दर्ज हो जाती है और जीपीएस के माध्यम से उसकी मौजूदगी की वास्तविक जगह का पता भी लग जाता है. ये जानकारियाँ ईमेल से डॉक्टरों को भेजी जा सकते हैं. यह मोबाइल फ़ोन आँखों की जांच के लिए आने वाले भारी-भरकम और महँगे उपकरणों की तुलना में बेहद सस्ता है. फ़ोन की कीमत 300 पाउंड या लगभग 28 हज़ार रुपए हैं जबकि बड़े उपकरणों की कीमत एक लाख पाउंड या तकरीबन 95 लाख रूपए होती है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह फ़ोन वही नतीजे देता है जो परिणाम बड़े उपकरणों से मिलता है कीनिया के नाकुरू में इस फ़ोन से ली गई जांच की तस्वीरों को लंदन के मूरफ़ील्ड आई हॉस्पिटल में भेजा गया. इन तस्वीरों की तुलना उन तस्वीरों से की गई जो एक पारंपरिक जांच उपकरण सी ली गईं थीं. इस पारंपरिक उपकरण को एक वैन में रख कर इस क्षेत्र में ले जाया गया था. अभी तक दोनों तरह की तस्वीरों की तुलना का शोध पूरा नहीं हो पाया है लेकिन शोधकर्ता टीम का कहना है कि शुरूआती नतीजे अच्छे आए हैं. लगभग 1000 लोगों को अभी तक किसी न किसी तरह का उपचार मिल गया है. डॉक्टर बस्तावरस कहते हैं हम इस मोबाइल के साथ अपने तकनीशियन घर-घर भेज सकते हैं मरीजों के घर पर ही जांच कर के उनकी परेशानी का पता लगाया जा सकता है. इस योजना को शुरूआती चरण में ही बेहद सराहना मिल रही है. अंधापन रोकने वाली अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी के पीटर ऑकलैंड कहते हैं मुझे लगता है कि पीक टूल से आँखों के इलाज में बड़ा बदलाव आने की संभावना है. |
| DATE: 2013-08-16 |
| LABEL: science |
| [308] TITLE: बिजली गिरने के बाद कैसी हो जाती है ज़िंदगी? |
| CONTENT: गर्मियों में चलने वाली आंधियों में अक्सर कहीं न कहीं बिजली गिरती है. हर साल कुछ लोग बिजली गिरने से मर जाते हैं लेकिन कुछ लोग बच जाते हैं. बिजली गिरना असल में स्थैतिक ऊर्जा का निकलना होता है जब धरती और बादलों के बीच विद्युत चार्ज बिगड़ जाता है. सरल शब्दों में कहें तो ये आसमान में बहुत बड़ा इलेक्ट्रिक स्पार्क है. एक बार की आसमानी बिजली एक अरब वोल्ट तक हो सकती है. इससे किसी के दिल की धड़कन रुक सकती है या उनके अंदरूनी अंग जल सकते हैं. रॉयल सोसायटी फॉर द प्रिवेंशन ऑफ़ एक्सीडेंट्स के मुताबिक़ ब्रिटेन में हर साल आसमानी बिजली गिरने से कम से कम तीन लोग मर जाते हैं. अमरीका में ऐसी मौतों की संख्या में गिरावट आई है लेकिन अब भी 30 लोगों की मौत हो जाती है. ब्रिटेन में हर साल ऐसे लोगों की संख्या 60 तक होती है जो बिजली गिरने के बावजूद बच जाते हैं लेकिन ऐसा माना जाता है कि इनमें से तीन चौथाई लोग स्थायी रूप से विकलांग हो जाते हैं. इन्हीं लोगों में से एक हैं एरिक ब्रोकलबैंक ब्रोकलबैंक 68 साल के हैं. उन पर नौ जून 2009 को बिजली गिरी थी. उन्होंने धातु की बनी एक मांस भुनने की छड़ पानी में से निकाली ही थी और उन पर बिजली गिर गई. ब्रोकलबैंक का कहना है कि बिजली उस छड़ पर गिरी और वो छड़ उनके हाथ में पिघल गई. जिन लोगों पर बिजली गिरती है उनके शरीर पर लाइटनिंग ट्री या लाइटनिंग फ्लावर नाम की एक आकृति बन जाती है जो ख़ून ले जाने वाली छोटी-छोटी वाहिनियों के फूटने से बनती है. ब्रोकलबैंक की कलाई पर सबसे पहले बिजली गिरी थी फिर ये उनके बाएं और दाएं पैर से निकल गई. उनके दाएं पैर में तीन छेद हुए और बाएं पैर में दो छेद हुए. उनकी क़िस्मत अच्छी थी कि वो ऐसे लोगों से घिरे हुए थे जो मदद करना जानते थे. बिजली गिरने के चार साल बाद भी ब्रोकलबैंक शारीरिक और मानसिक दुख झेल रहे हैं. उनका दम फूलता है और कभी-कभी व्हील चेयर का भी सहारा लेना पड़ता है. ज़्यादातर लोग खुले मैदान या पेड़ों के नज़दीक़ होने के ख़तरे समझते हैं लेकिन आंधी के पहले या बाद में भी ख़तरा हो सकता है. |
| DATE: 2013-08-16 |
| LABEL: science |
| [309] TITLE: क्या स्लिमिंग क्लब कम करते हैं मोटापा? |
| CONTENT: चर्च या फिर किसी सामुदायिक केंद्र में लोग हर सप्ताह अपना वज़न तौलने के लिए इकट्ठा होते हैं अपना मनचाहा वज़न हासिल करने की उम्मीद में लेकिन क्या स्लिमिंग क्लब वाकई असरदार हैं ब्रिटेन में पिछले साल दो करोड़ 70 लाख लोग डाइटिंग पर थे. लाखों लोग स्लिमिंग क्लबों से जुड़े और उन्होंने हर हफ़्ते इस उम्मीद में वजन तौला कि इस बार उनका साइज़ कम हो गया होगा या वो अपनी पसंदीदा जींस पहन पाएंगे. लिवी आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए स्लिमिंग क्लब जाती हैं. वे कहती हैं लोग सोचते हैं कि यदि वे छरहरे होंगे तो वे ज्यादा खुश होंगें. मैं भी ऐसा ही सोचती हूँ. जैकी तो पिछले बीस साल से स्लिमिंग क्लब से जुडी़ हैं और इस दौरान उनका वज़न घटा भी है और बढ़ा भी है. वे कहती हैं मैं वज़न घटाती हूँ और फिर बढ़ा लेती हूँ. लेकिन जब मैंने शुरू किया था तबसे अब मैं 19 किलो हल्की हूँ. मेरी खाने की आदतें भावनाओं से जुड़ी हैं. जब मैं खुश होती हूँ दुखी होती हूँ या तनाव में होती हूँ तो बहुत खाती हूँ. जोआन जब स्लिमिंग क्लब के साथ जुड़ी थीं तब वे अपने मौजूदा वज़न से दो गुना भारी थीं. वे कहती हैं एक शनिवार को मैं शॉपिंग करने गई थी. मैं बस से उतर ही रही थी कि मैं अपनी ट्रॉली समेत गिर गई. उस वक्त मेरा वज़न 149 किलो था. मैं न उठ सकती थी न हिल सकती थी. चार लोगों ने मिलकर मुझे ऊपर उठाया. यह सब बहुत ही शर्मनाक था. वे अब 72 किलो की हैं फिर भी स्लिमिंग क्लब से जुड़ी हैं ताकि अपने वज़न को बरकरार रख सकें. न्यूयॉर्क की एक गृहणी जीन निडैच ने 1961 में न्यूयॉर्क सिटी हेल्थ बोर्ड की सलाह से वज़न कम किया था. उन्हें लगा कि बाजार में समूहों के लिए कोई वज़न घटाओ कार्यक्रम नहीं है. जीन ने पड़ोसी गृहणियों की साथ अपना अनुभव साझा करना शुरू किया. उन्होंने अपने भाषणों का लाइसेंस कराया समूह के अन्य सदस्यों को प्रशिक्षित किया और इस तरह वेट वॉचर्स की शुरुआत हुई. कंपनी 1967 में ब्रिटेन पहुँची और अब प्रोपाइंट्स प्लान के नाम से जानी जाती है. तमाम तरह के भोजन के साथ प्रोपाइंट मूल्य अंक जोड़ दिए जाते हैं और सदस्यों को हर दिन निश्चित अंक खर्च करने की ही इज़ाजत होती है. एक अन्य प्रमुख कंपनी है स्लिमिंग वर्ल्ड जहाँ भोजन तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है. फ्री फूड हेल्थी एक्स्ट्रा और सिंस या ट्रीट. सदस्यों को पाँच प्रतिशत से अधिक चर्बी वाले खाने के सेवन की मनाही होती है. रोज़मैरी कोनले डाइट और फिटनेस क्लब में व्यायाम और वज़न घटाने पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है. स्लिमिंग क्लब वज़न घटाने के इच्छुक लोगों को सेहतमंद भोजन लेने में मदद करते हैं और उन्हें ऐसा करने के लिए नैतिक समर्थन भी देते हैं. दूसरे लोगों को अपने उद्देश्य हासिल करता हुआ देखकर लोग प्रेरित भी होते हैं. ब्रिटेन में मोटापे की समस्या लगातार बढ़ रही है. सरकार के मुताबिक 2050 तक देश के 60 प्रतिशत पुरुष 50 प्रतिशत महिलाएं और 25 प्रतिशत बच्चे मोटापे का शिकार होंगे. लेकिन क्या स्लिमिंग क्लब ब्रिटेन की इस समस्या का समाधान हैं2007 के बाद से एनएचएस राष्ट्रीय सेहत योजना मोटापे के शिकार लोगों को व्यावसायिक क्लबों में जाने और वज़न कम करने की सलाह दे रही है. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इससे फ़ायदा हो रहा है. बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एनएचएस और व्यावसायिक वज़न घटाने वाले क्लबों वैट वॉचर्स रोज़मैरी कोनले और स्लिमिंग वर्ल्ड की तुलना की. शोध में शामिल 740 लोगों में से आधे एनएचएस में भेजे गए और आधे स्लिमिंग क्लबों में. 12 हफ़्तों में सबसे ज्यादा एक व्यक्ति का साढ़े चार किलो वज़न कम हुआ. ये व्यक्ति वैट वॉचर्स क्लब में गया था जबकि सबसे कम 1-4 किलो वज़न घटाने वाला व्यक्ति सामान्य प्रेक्टीशनर जीपी के पास गया था. ब्रिटिश जर्नल ऑफ न्यूट्रीशन में प्रकाशित वेट वॉचर्स के 2007 में किए गए एक शोध में उनके कार्यक्रम की सफलता को पाँच साल तक आँका गया. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में सेंटर ऑफर एविडेंस बेस्ट मेडिसिन के निदेशक डॉक्टर कार्ल हेनेगेन ने इस शोध के नतीज़ों का विश्लेषण किया. उन्होंने कहा इससे पता चलता है कि दो साल बाद 20 प्रतिशत लोग ही अपने लक्षित वज़न को बरकरार रख पाए. पाँच साल बाद यह संख्या मात्र 16 प्रतिशत ही रह गई. हेनेगेन कहते हैं शोध में वे सबसे अच्छे लोगों को चुनते हैं जो आजीवन सदस्य होते हैं. वास्तव में वे भी संघर्ष कर रहे होते हैं. ज़्यादातर लोग वज़न कम करने के अपने उद्देश्य को हासिल नहीं कर पाते हैं. उन्हें इस पेशे में 40 साल हो गए हैं. अब कब लोग जागेंगे और कहेंगे कि यह समस्या का हल नहीं है. 1968 से 1993 के बीच वेट वॉचर्स की वित्तीय निदेशक रहीं रिचर्ड सांबर कहती हैं कि जो लोग वज़न कम करने का अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर पाते वे बार-बार क्लब आते हैं. यह व्यवसाय कामयाब इसलिए हैं कि 84 प्रतिशत लोग दोबारा वापस आते हैं. कंपनी का व्यापार यहीं से आता है और कामयाबी का राज यही है. वे कहती हैं नाकामयाबी से कोई व्यापार ज्यादा दिन तक नहीं चल सकता. हम 50 साल से बाजार में है क्योंकि लोग बार-बार हमारी सेवाएं लेने आते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ मिनोसोटा की मनोवैज्ञानिक प्रोफैसर ट्रैसी मान ने लोगों की खाने की आदतों पर व्यापक शोध किया है. वे कहती हैं कि अब वज़न कम करने की सनक से निपटने का वक्त आ गया है. वे कहती हैं अगर हम लोगों को वज़न के बजाए सेहत के बारे में ध्यान देना सिखा दे तो हालात अच्छे होते जाएंगे. |
| DATE: 2013-08-15 |
| LABEL: science |
| [310] TITLE: क्या आसान होगा रात में काम करना? |
| CONTENT: अमरीकी वैज्ञानिकों का कहना है कि रात की शिफ़्ट में काम करने वाले कर्मचारी लाल रोशनी में काम करने में बेहतर महसूस करेंगे. जनरल ऑफ़ न्यूरोसाइंस में छपे शोधपत्र के अनुसार नीली और सफ़ेद रोशनी में रखे गए हैमस्टर चूहे जैसा जानवर उदास हो गए थे जबकि अंधेरे और लाल रोशनी में रखे गए हैमस्टर ख़ुश थे. वैज्ञानिकों का कहना है कि शोध के परिणाम रात को काम करने का बेहतर माहौल बनाने में मददगार हो सकते हैं. अमरीका के शोधकर्ताओं ने आँखों में रोशनी के लिए संवेदनशील कोशिकाओं पर विभिन्न तरह के रंगों के प्रभाव को समझने की कोशिश की है. यह कोशिकाएं सीधे दिमाग को संकेत के रूप में संदेश भेजती हैं जिससे दिमाग रोज़मर्रा की चीज़ों के लिए प्रतिक्रियाएं दे पाता है. यह शोध चूहे जैसे दिखने वाले जीव हैमस्टर पर किया किया गया. इसमें पता चला कि रात को सफ़ेद या नीली रोशनी में रखने पर हैमस्टर का दिमाग कम काम कर रहा था. उनमे अवसाद के लक्षण भी दिखे. अंधेरे में या लाल रोशनी में रखे गए हैमस्टर खुश दिखे. वैज्ञानिकों का दावा है कि यह सिद्धांत मनुष्यों पर भी लागू होता है. उनका मानना है कि रात्रि पारी में काम करने वालों के लिए दफ्तर में लाल रोशनी होनी चाहिए. रात को काम करते हुए कंप्यूटर या टीवी की स्क्रीन पर भी नीली रोशनी से बचना चाहिए. |
| DATE: 2013-08-15 |
| LABEL: science |
| [311] TITLE: क्या ट्यूमर बना सकता है सेक्स अपराधी? |
| CONTENT: हम सभी को लगता है कि अपने कार्यकलापों पर हमारा नियंत्रण है मगर दिमाग़ में एक ट्यूमर या चोट हमारे व्यक्तित्व को पूरी तरह बदल सकती है. तो इससे स्वतंत्र इच्छा के बारे में क्या पता चलता है. अगर आप किसी जिम में जाकर क्रिस्प के पैकेट के साथ टेलिविज़न के आगे बैठें तो आप क्या करेंगे वर्ज़िश करेंगे या फिर क्रिस्प खाएंगेहम सभी के मन में ऐसे सवाल उठते हैं. हमें तय करना होता है कि हमें वर्ज़िश के लिए जिम जाना है मगर असल में हम स्वादिष्ट नमकीन स्नैक खाने के लिए मचल रहे होते हैं. इसके बाद अक्सर हमारे अंदर ख़ुद से नफ़रत के भाव पैदा होते हैं. न्यूरोसाइंटिस्ट और साइकोलॉजिस्ट इंसान की चाहत और उसकी प्रेरणा को समझने के लिए काफ़ी मेहनत कर रहे हैं. कमज़ोरी या इच्छा-जब हम असल में नहीं खाना चाहते तब क्रिस्प खाना ऐसा ही एक वाकया है. दूसरी चीज़ है लत चाहे वह जुए की हो सेक्स की हो या सिगरेट-शराब की. हमारी भूख को उजागर करने वाली मानसिक घटनाओं के बारे में वैज्ञानिकों ने काफ़ी कुछ जान लिया है. हमारे फ़ैसले करने की क्षमता में अवचेतन मन की मान्यता भी बढ़ रही है. हमें शायद इसकी जानकारी न हो कि हमारे आसपास कोई ख़ुशबू या आवाज़ का हम पर असर होता है. कुछ न्यूरोसाइंटिस्ट का यहां तक दावा है कि दिमाग़ के काम करने के ढंग का अध्ययन करके वो छह से सात सेकेंड पहले आपके उन फ़ैसलों के बारे में बता सकते हैं जो आप लेने वाले हैं. इन सभी चीज़ों से दार्शनिकों के लिए सवाल खड़े हो गए हैं. पहला तो यह कि इंसान की फ़ैसले करने की क्षमता की जानकारी से स्वतंत्र इच्छा का क्या होगा क्या वैज्ञानिक प्रगति स्वतंत्र इच्छा को लेकर हमारी समझ को कमज़ोर बनाएगी क्या इसका नतीजा यह होगा कि स्वतंत्र इच्छा एक भ्रम है40 साल के एक स्कूल टीचर में अचानक देखने में आया कि वह बच्चों के साथ अनियंत्रित यौन उत्पीड़क व्यवहार करने लगे थे. डॉक्टरों को जांच में पता चला कि उनके दिमाग़ के दायें हिस्से में अंडे के आकार का एक ट्यूमर विकसित हो गया था. दिमाग़ के इस हिस्से यानी ऑर्बीफ्रंटल कॉर्टेक्स का काम है निर्णय लेना अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना और सामाजिक व्यवहार से संबंधित है. डॉक्टरों ने जैसे ही ट्यूमर को निकाला स्कूल टीचर का यौन व्यवहार पूरी तरह थम गया. यह मरीज़ इस समस्या से पहले अच्छा व्यवहार करता था. ज़्यादातर बाल यौन उत्पीड़कों की समस्याएं उनके बचपन से जुड़ी होती हैं. कभी शादीशुदा एक अधेड़ शख़्स में अचानक चाईल्ड पोर्नोग्राफ़ी बच्चों से जुड़ा अश्लील साहित्य और वैश्यावृत्ति के प्रति झुकाव पैदा हो गया. अब तक इस आदमी में सेक्स को लेकर कोई ऐसी प्रवृत्ति नहीं देखी गई थी. जब हालात खराब हुए तो उनकी पत्नी चिंतित हो गईं. जब इस शख़्स ने अपनी बेटी की तरफ़ क़दम बढ़ाए तो पत्नी ने पुलिस को सूचित कर दिया. थेरेपी देने के बावजूद उनके पति के व्यवहार में सुधार नहीं हुआ. वास्तव में उन्होंने थेरेपी सेंटर में आने वाली महिलाओं का ही उत्पीड़न शुरू कर दिया. लगा कि अब उन्हें जेल जाना ही पड़ेगा. मगर जब उन्हें अदालत जाना था उससे पहले ही उन्हें सिरदर्द शुरू हो गया. उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां जांच में पता चला कि उनके दिमाग़ में बड़ा ट्यूमर है. जैसे ही यह ट्यूमर निकाला गया उनका व्यवहार सामान्य हो गया. इस कहानी में फिर मोड़ आया. कुछ महीने बाद उनका पुराना व्यवहार फिर शुरू हो गया. जांच में पता चला कि ट्यूमर पूरी तरह से नहीं निकाला जा सका था. दूसरे ऑपरेशन के बाद फिर उनका व्यवहार सामान्य होने में मदद मिली. इस मामले में बहुत से लोगों को लगेगा कि शायद सेक्स को लेकर यह शख्स अपने व्यवहार में आज़ाद नहीं थे. असल में वह थे और इसके लिए ज़िम्मेदार था ट्यूमर. तो आखिर क्यों एक शारीरिक गड़बड़ी यानी ट्यूमर दूसरे से अलग होता है. हो सकता है कि भविष्य में न्यूरोसाइंटिस्ट को अदालतों में जाना पड़े और अपराध की वजह समझानी पड़ें. मिसाल के लिए इस शख़्स को दुकान से चोरी के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. इसकी वजह इसके शरीर में डोपामाइन की मात्रा का ज़्यादा होना है. इस बात के सुबूत हैं कि पर्किंसंस के इलाज के लिए दी जाने वाली दवा डोपामाइन के इस्तेमाल से भावनाओं पर काबू पाने सेक्स या जुए की समस्याएं सामने आती हैं. अमरीकी रेलवेकर्मी फिनिआस गेज ने न्यूरोसाइंस के अध्ययन को 1848 में पूरी तरह बदल दिया जब काम करते हुए उनके सिर में एक लोहे की रॉड घुस गई. यह रॉड उनकी खोपड़ी के ऊपरी हिस्से से बाहर निकल गई. इसके बाद दूसरों पर निर्भर गेज भरोसेमंद नहीं रह गए. काम करने में भी वह अक्षम हो गए. यह पहला सुबूत था कि दिमाग़ को होने वाले नुकसान का असर व्यवहार और व्यक्तित्व पर पड़ता है. तब से तक़रीबन हर प्रमुख दार्शनिक ने स्वतंत्र इच्छा पर चल रहे विवाद को लेकर कुछ न कुछ कहा ही है. चाहे वह कांट हों या शॉपेनहावर या फिर नीत्शे या सार्त्र. मुख्य रूप से इस मामले में दो तरह के खेमे बने हुए हैं. इनके अलावा 18वीं सदी के स्कॉट डेविड ह्यूम की तरह दार्शनिक हैं जो मानते हैं कि स्वतंत्र इच्छा नियतिवाद से जुड़ा है और इस बात से जुड़ा है कि हमारे सभी कार्यों का कोई न कोई कारण होता है. ह्यूम के अलावा दूसरे दार्शनिक भी हैं जो मानते हैं कि ऐसा नहीं है. बहस-मुबाहिसों के अलावा स्वतंत्र इच्छा से आरोप और प्रशंसा के सवाल भी जुड़े हैं. अगर हमारे कार्य मुक्त नहीं हैं तो उनके लिए हमें कैसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है या हमारी प्रशंसा की जा सकती है. एसेक्स यूनिवर्सिटी के दार्शनिक प्रो. वायेन मार्टिन कहते हैं स्वतंत्र इच्छा के विचार पर संदेह करने वालों का दावा है कि यह तत्वमीमांसा का समर्थन है ताकि हम लोगों को सज़ा देने की अपनी आदत का समर्थन कर सकें. इच्छा की कमज़ोरी इस बहस में कहां फिट होती है. अमरीकी दार्शनिक हैरी फ्रैंकफ़र्ट ने आज़ादी के बारे में 1970 के दशक में एक बेहद असरदार लेख लिखा. उन्होंने इसमें कहा कि हमारी सैकड़ों तमन्नाएं होती हैं. मीठा या नमकीन खाने की इच्छा या फिर वज़न कम करने की इच्छा. ये हमारी पहले दर्जे की इच्छाएं हैं. मगर ऊंचे दर्जे की इच्छाएं भी होती हैं. मार्टिन के मुताबिक़ मेरी ऊंचे दर्जे की तमन्नाएं असल में यह तय करती हैं कि पहले दर्जे की कौन सी इच्छाओं को मैं कार्यरूप में बदलना चाहता हूं. और फ्रैंकफ़र्ट स्वतंत्र इच्छा को पहले दर्जे की इच्छाओं पर नियंत्रण की तरह देखते हैं. दूसरे शब्दों में मैं तभी स्वतंत्र इच्छा यानी फ्री विल का स्वामी होऊंगा जब मेरा अपनी पहले दर्जे की इच्छाओं पर अनुशासन हो. अगर मेरी ऊंचे दर्जे की इच्छा वज़न कम करने की है और मुझे जिम जाना है तो क्या मैं इसे रोकने वाली चीज़ों पर काबू पा सकता हूं. तो अब वो नमकीन क्रिस्प कहां है |
| DATE: 2013-08-15 |
| LABEL: science |
| [312] TITLE: याद्दाश्त सुधारनी है, तो रोज़ पियो कोको |
| CONTENT: रोज़ कोको पीने से बुजुर्गों का दिमाग स्वस्थ रह सकता है. यह अनुमान एक शोध के हैं जिसमें ऐसे 60 बुजुर्गों को शामिल किया गया था जिन्हें यह दिक्कत शुरू हो रही थी. इसमें कहा गया कि एक दिन में कोको के दो कप दिमाग में रक्त प्रवाह बेहतर करते हैं. जनरल न्यूरोलॉजी के अनुसार शोध में पाया गया कि जिन लोगों के दिमाग में रक्त प्रवाह बेहतर हुआ है उन्होंने शोध के अंत में स्मृति परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन किया. विशेषज्ञों का कहना है कि निष्कर्ष देने से पहले और अनुसंधान करने की ज़रूरत है. ऐसा नहीं है कि कोको को पहली बार नाड़ी संबंधी स्वास्थ्य से जोड़ा गया है. शोधकर्ताओं को यकीन है कि इसकी कुछ वजह इसका फ्लेवेनॉल से भरपूर होना है जिसका स्मृति पर महत्पूर्ण असर माना जाता है. इस ताज़ा शोध में 73 साल की औसत आयु वाले 60 लोगों को रोज़ दो कप कोको पीने के लिए दिया गया. इन्हें दो समूहों में विभाजित कर एक समूह को भरपूर फ्लेवेनॉल और दूसरे को कम फ़्लेवेनॉल वाला कोको पीने को दिया गया. इन्हें किसी और तरह से चॉकलेट का सेवन नहीं करना था. शोध की शुरुआत में किए गए अल्ट्रासाउंड से पता चला कि उनमें से 17 के दिमाग में रक्त प्रवाह कमज़ोर था. भरपूर या कम फ्लेवेनॉल वाला कोको पीने वाले समूहों में कोई फ़र्क नहीं था. शोध की शुरुआत में कमज़ोर रक्त प्रवाह वाले प्रतिभागियों में से 88 के रक्तप्रवाह में सुधार देखा गया. इसके मुकाबले सामान्य रक्त प्रवाह वाले प्रतिभागियों पर असर 37 ही था. 24 प्रतिभागियों के एमआरआई स्कैन से पता चला कि कमज़ोर रक्त प्रवाह वाले लोगों को छोटे से दिमागी नुकसान होने की आशंका भी ज़्यादा थी. हॉर्वर्ड मेडिकल स्कूल में न्यूरोलॉजिस्ट और शोध लेखक डॉक्टर फ़ारज़ानेह सोरोन्ड कहते हैं हम दिमाग में रक्त के प्रवाह और उसके सोचने की क्षमता पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में सीख रहे हैं. वह कहते हैं दिमाग के अलग-अलग हिस्सों को अपना काम करने के लिए ज़्यादा ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है. उन्हें ज़्यादा रक्त प्रवाह की भी ज़रूरत पड़ती है. इस संबंध को न्यूरोवस्कुलर कपलिंग कहा जाता है. यह अल्ज़ाइमर्स जैसी बीमारियों के इलाज में में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि भरपूर या कम फ्लेवेनॉल वाले कोको में फ़र्क इसलिए कम पड़ा होगा क्योंकि पेय का दूसरा घटक असर कर रहा होगा या फिर छोटी मात्रा की ही ज़रूरत होगी. अल्ज़ाइमर्स शोध ब्रिटेन में शोध प्रमुख डॉक्टर सिमॉन रिडले कहते हैं कि यह एक छोटा शोध था लेकिन इसने काफ़ी तथ्य जुटाए हैं. वह कहते हैं कोको पर आधारित इलाज काफ़ी लोकप्रिय हो सकता है लेकिन इसके असर के बारे में कोई भी निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी हो सकती है. इसके साथ ही वह कहते हैं नाड़ियों की कमज़ोरी मनोभ्रंश का एक पहचाना हुआ ख़तरा है और इसे समझकर हम नाड़ी की दिक्कत और कमज़ोर होती मानसिक स्थिति के बीच संबंध के बारे में ज़्यादा जान सकते हैं इससे हमें नए इलाज और बचाव की खोज में मदद मिलेगी. |
| DATE: 2013-08-14 |
| LABEL: science |
| [313] TITLE: 'दिमाग दौड़ रहा होता है मौत के पल में' |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने एक नए अध्ययन में पाया है कि मौत की कगार पर दिमागी हरकत चरम पर हो सकती है और उसमें बिजली की तरंगें सामान्य अवस्था की तुलना में अधिक होती हैं. इसके लिए वैज्ञानिकों ने मरते हुए चूहों पर किए गए एक अध्ययन में पाया कि मौत के वक्त उनके दिमाग की हरकत चरम सीमा पर थी. अमरीकी शोधकर्ताओं का कहना है कि इस आधार पर इंसानों की बेहोशी की हालत को समझा जा सकता है. ये नया शोध प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल ऐकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित हुआ है. इस अध्ययन की मुख्य शोधकर्ता मिशिगन विश्वविद्यालय की डॉक्टर जिमो ब्रॉजिगिन का कहना है बहुत से लोग सोचते हैं कि क्लिनिकल डेथ यानी मेडिकल आधार पर मृत मान लिए गए लोगों का मस्तिष्क निष्क्रिय हो जाता है या फिर उसकी गतिविधियाँ जागृत अवस्था से कम होती हैं लेकिन हम ये दिखा सकते हैं कि ऐसा कतई नहीं है. उन्होंने कहा अगर कुछ है भी तो वो ये है कि मस्तिष्क जागृत अवस्था की तुलना में मरने की प्रक्रिया के दौरान ज़्यादा सक्रिय है. मौत को करीब से देखने का दावा करने वाले कई लोग बताते हैं कि उन्होंने आँखों में तेज़ सफ़ेद रोशनी देखी और शरीर की हरकत को ख़त्म होते महसूस किया. हालांकि इंसानों पर न सिर्फ़ इस तरह का अध्ययन बल्कि इसे समझ पाना भी बेहद चुनौतीपूर्ण है. मौत के अनुभव को परखने और ज़्यादा जानकारी हासिल करने के लिए मिशिगन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने उन नौ चूहों पर नज़र रखी जो मर रहे थे. वैज्ञानिकों ने चूहों के दिल की धड़कन बंद होने के बाद 30 सेकेंड की अवधि में मस्तिष्क की उच्च आवृत्ति की तरंगों में बढ़ोत्तरी को मापा. इस अध्ययन में पाया गया कि चूहों में जागृत अवस्था की तुलना में दिल का दौरा पड़ने के बाद की अवस्था में बिजली की तरंगों की गति का स्तर कहीं ज़्यादा था. डॉक्टर जिमो ब्रॉजिगिन कहती हैं कि संभव है कि इसी तरह की चीज़ इंसान के मस्तिष्क के साथ भी हो और मानव मस्तिष्क की बढ़ी हुई गतिविधियां और चेतना का ऊंचा स्तर मौत के करीब पहुंचे लोगों में सपने को जन्म दे सकता है. उन्होंने कहा कि दिमाग में न्यूरॉन्स मौत होते समय अति सक्रिय हो सकते हैं. डॉक्टर ब्रॉजिगिन कहती हैं ये विश्लेषण मौत को समझने का आधार बन सकता है. हो सकता है कि जो लोग चमकदार रोशनी देखते हैं उसकी वजह शायद मस्तिष्क का अति सक्रिय हो जाना हो. हमारे पास इस तरह के साक्ष्य हैं जो संकेत देते हैं कि ऐसा हो सकता है क्योंकि हमने पाया है कि गामा तरंगों में बढ़ोत्तरी मस्तिष्क के उस हिस्से में हो रही है जो कि आँख में देखने के लिए चित्र बनाता है. हालाँकि शोधकर्ता कहती हैं कि नतीजों की पुष्टि करने के लिए उन लोगों पर अध्ययन करना होगा जिन्हें क्लिनिकल डेथ का अनुभव हो और बाद में वे फिर से ठीक हो गए हों. |
| DATE: 2013-08-13 |
| LABEL: science |
| [314] TITLE: मंगल पर बसने लिए एक लाख आवेदन |
| CONTENT: मंगल ग्रह पर जाने के लिए एक लाख से अधिक लोगों ने आवेदन किया है. साल 2022 में प्रस्तावित मंगल ग्रह की इस परियोजना का उद्देश्य वहाँ कॉलोनी बसाना है. यह यात्रा केवल वहाँ जाने के लिए है वापस आने के लिए नहीं. हालांकि यह सवाल अब भी अनुत्तरित है कि मंगल पर जीवन संभव कैसे होगा इसके बाद भी लोग मार्स वन प्रोजेक्ट पर दस्तखत कर रहे हैं. लोगों को इस यात्रा पर ले जाएगी मार्स वन नाम की एक कंपनी. कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सीईओ और सह संस्थापक बास लैंसड्राप कहते हैं ऐसे लोगों की संख्या भी अधिक है जो अब भी अपने प्रोफ़ाइल पर काम कर रहे हैं. या तो उन्होंने आवेदन शुल्क का भुगतान न करने का फैसला किया है या अभी भी अपना वीडियो बना रहे हैं या प्रश्नावली को भर रहे हैं या अपने रेज्यूमे पर काम कर रहे हैं. इसलिए आप जिन लोगों को ऑनलाइन देख रहे हैं वे केवल वे लोग हैं जिन्होंने अपना काम पूरा कर लिया है और जिन्होंने अपना प्रोफ़ाइल सार्वजनिक कर दिया है. हालांकि लैंसड्राप ने यह नहीं बताया कि कितने लोगों ने फीस का भुगतान किया है कितने लोगो ने अपना प्रोफ़ाइल बनाया है और कितने लोगों ने अपनी निजता बनाए रखी है. मंगल ग्रह पर जाने के लिए उम्र 18 साल या उससे अधिक होनी चाहिए. लेकिन इसकी फीस आवेदक की राष्ट्रीयता पर निर्भर करती है जैसे अमरीकी नागरिकों के लिए आवेदन शुल्क 38 डॉलर है. कंपनी का कहना है कि आवेदन के लिए फ़ीस देशों की प्रति व्यक्ति आय के आधार पर तय की गई है. लैंसड्राप ने कहाहम चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग इसके बारे में सोचें और कम से कम लोग इसे वहन करें. वो बताते हैं जहाँ तक पहले दल की बात है तो इस पर छह अरब डॉलर का खर्च आएगा. उन्होंने कहा कि इस परियोजना का वित्तपोषण प्रायोजकों ने किया है. मीडिया को अंतरिक्ष यात्रियों के प्रृथ्वी पर प्रशिक्षण से लेकर उनकी तैनाती और मंगल पर कॉलोनी बसाने आदि के प्रसारण के अधिकार के लिए भुगतान करना होगा. मार्स वन ने कहा है कि इस साल वह आवेदकों में अलग-अलग महाद्वीपों के 40 सदस्सीय अंतरिक्ष यात्रियों को चुनेगा. इनमें से दो महिला और दो पुरुष 2022 में मंगल पर जाने के लिए तैयार है. ये लोग 2023 में मंगल पर क़दम रखेंगे. चार लोगों को एक दूसरा समूह दो साल बाद जाएगा. मंगल पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों को आठ साल का प्रशिक्षण लेने की जरूरत होगी. इस दौरान वे घर की मरम्मत करना सीमित जगह में सब्जियाँ उगाना दाँत दर्द मांसपेशियों के दर्द और हड्डियों के टूटने का इलाज करना सीखेंगे. लैंसड्राप ने कहा कि प्रोजेक्ट के तहत हर उतरने वाला मंगल पर 5511 पौंड का भार उठाने में सक्षम होगा. अंतरिक्ष यात्रा के ख़तरों के बावजदू मार्स वन के संस्थापक को इस परियोजना की व्यवहार्यता को लेकर आश्वस्त है. हालांकि अंतरिक्ष यात्रा के कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि मंगल के लिए मानव मिशन के बहुत अधिक ख़तरे हैं क्योंकि इतनी अधिक दूरी की यात्रा इंसान ने अभी तक नहीं की है. |
| DATE: 2013-08-12 |
| LABEL: science |
| [315] TITLE: इंसान के बाद डॉल्फिन की याददाश्त 'सबसे लंबी' |
| CONTENT: वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्यों के बाद सबसे लंबी याद्दाश्त डॉल्फिन मछली की होती है. अभी तक माना जाता था कि मनुष्यों के बाद हाथी की याद्दाश्त सबसे लंबी होती है. अमरीका के शोधकर्ताओं का कहना है कि एक दूसरे से अलग होने के 20 साल बाद भी डॉल्फिन अपने पूर्व साथियों की सीटी जैसी आवाज़ पहचान लेती हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह लंबी याद्दाश्त डॉल्फिनों के जटिल सामाजिक ताने -बाने का परिणाम है. यह शोध प्रेसीडिंग्स ऑफ रॉयल सोसाइटी बी में प्रकाशित हुआ है. 56 पालतू बॉटल नोज़ डॉल्फिनों पर किए गए शोध से यह जानकारी मिली है. इन्हें अमरीका और बरमूडा के छह अलग- अलग चिड़ियाघरों और एक्वेरियम में प्रजनन के लिए लाया गया था. दशकों पुराने आंकड़ों से पता चलता है कि कौन सी डॉल्फिन साथ रहती थीं. शोधकर्ताओं ने पानी में रखे लाउडस्पीकरों पर डॉल्फिनों के पुराने साथियों की विशेष सीटियां बजाईं और उनकी प्रतिक्रिया देखी. शोध करने वाले शिकागो विश्वविद्यालय के डॉक्टर जैसन ब्रक ने बताया जब उनकी जानी पहचानी आवाज़ बजाई गई तो डॉल्फिनें लंबे समय तक लाउडस्पीकरों के आस पास मंडराती रहीं और अनजानी आवाज़ों को उन्होंने नज़रंदाज़ कर दिया. जैसन ब्रक कहते हैं जीव व्यवहार में इतनी लंबी याद्दाश्त पहले कभी नहीं देखी गई. डॉक्टर ब्रक ने ऐली और बैली नाम की दो डॉल्फिनों का उदाहरण देते हुए अपनी बात स्पष्ट की. इन दोनों को कभी फ्लोरिडा में एक साथ रखा गया था. बैली अब बरमूडा में रहती है. जब ऐली की रिकॉर्डिंग बजाई गई तब बैली ने तुरंत प्रतिक्रिया दी जबकि दोनों को एक दूसरे के संपर्क में आए 20 साल छह महीने से ज्यादा हो चुका था. शोधकर्ताओं का विश्वास है कि डॉल्फिनों के सामजिक तंत्र का जटिल ढांचा इस लंबी याद्दाश्त का कारण है. डॉल्फिनें अपने जीवन में कई बार एक समूह छोड़ कर दूसरे समूह में शामिल हो सकती हैं. डॉक्टर ब्रक कहते हैं अपने साथी की आवाज़ पहचानना उनके लिए ज़रूरी हो जाता है. कई मील दूर से अपने पूर्व साथी की आवाज़ सुनकर डॉल्फिन यह निर्धारित करती है कि उसे पुराने समूह में लौटना है या नहीं. शोधकर्ताओं के अनुसार डॉल्फिनों की यह विशेषता उन्हें मनुष्यों चिम्पांजी और हाथियों की दुनियादारी की समझ के करीब ला खड़ा करती है. हाथी भी 20 साल से ज़्यादा समय तक याद रख सकते हैं. लेकिन अपने परिवार के बाहर की चीज़ों को वो कितना याद रखते हैं इस बारे में बहुत थोड़ी जानकारी प्राप्त है. डॉल्फिनों पर किया गया यह शोध बताता है कि वह परिवार के साथ-साथ अजनबियों को भी याद रख सकने में सक्षम हैं. हाल ही में हुआ शोध बताता है कि हर डॉल्फिन की अपनी ख़ास आवाज़ सीटी होती है. यह उसी प्रकार से काम करती है जैसे कि मनुष्यों के लिए उनका नाम. |
| DATE: 2013-08-12 |
| LABEL: science |
| [316] TITLE: दवा जो पेट के अंदर से डॉक्टर को संदेश भेजती है |
| CONTENT: अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि वो ये भूल जाते हैं कि दवा कब लेनी है. कभी-कभी यह दिक्कत तब बड़ी हो जाती है जब घर में कोई बुज़ुर्ग हों और गंभीर बीमारी से पीड़ित हों और जिनके लिए दवा में चूक घातक हो सकती है. अमरीका में कैलिफोर्निया की प्रोटियस डिजिटल हेल्थ कंपनी ऐसी दवाओं का परीक्षण कर रही है जो पेट में पहुंचते ही डॉक्टर को सारी जानकारी भेज देती है. इनके लिए ख़ास ऐप को तैयार किया गया है. इसका इस्तेमाल किसी स्मार्टफोन कंप्यूटर या टैबलेट के ज़रिए किया जा सकता है. डॉक्टर या परिवार के सदस्य को ये पता चल जाता है कि मरीज़ ने दवा निगल ली है. ये सारा काम करता है एक छोटा सा सेंसर जो दवा की गोली के अंदर होता है. प्रोटियस के चीफ एक्ज़िक्यूटिव एंड्र्यू थॉमसन का कहना है हमने दो ऐसी धातुएं लीं जो भोजन का हिस्सा होती हैं. इन्हें रेत के एक नन्हे से कण पर रखा जाता है और दवा से इस तरह जोड़ा जाता है कि आप जब ये दवा लें तो आप एक आलू की तरह काम करें. यहां आयनिक घोल पेट के एसिड होते हैं. इससे इतनी बिजली पैदा होती है जो सेंसर के लिए काफी होती है. सेंसर एक ऐसे पैच के संपर्क में रहता है जिसे मरीज़ ने पहना होता है. ये सेंसर मरीज़ की गति नींद और दूसरे अहम संकेतों पर भी नज़र रखता है. यही पैच सारी जानकारी ऐप को भेजता है. थॉमसन का कहना है जब आप हमारी डिजिटल दवा लेंगे तो वो कहेगी कि हैलो मैं यहां हूं. मैं नोवार्टिस हूं. मैं डायोवैन हूं. 1-2 एमजी मैं 76 नंबर प्लांट से हूं. मेरा बैच नंबर 12 है और मैं दूसरी गोली हूं. यह ऐप दवा के असर पर भी नज़र रखती है. यह बताती है कि दवा की सही मात्रा ली गई या नहीं या यह काम कर भी रही है या नहीं. ब्रिटेन में लॉयड फार्मेसी इस तकनीक का परीक्षण कर रही है. मरीज़ों को सेंसर वाली एक गोली के साथ लेबल लगी एक ट्रे मिलती है जिसमें सभी डोज़ होती हैं. थॉमसन का कहना है कि अगर हायपर टेंशन से परेशान कोई मरीज़ दवा नहीं लेता तो कुछ वक़्त बाद इसका मतलब होता है दिल का दौरा. इसका लाखों डॉलर का खर्च स्वास्थ्य तंत्र को उठाना पड़ेगा जबकि दवा का हर महीने का ख़र्च सिर्फ 30 पेंस है. यानी सही ढंग से दवा लेने में मदद करने का मतलब होगा लाखों पौंड की बचत. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ 50 लोग दवा ठीक तरीक़े से नहीं लेते. इसके अलावा 50 से ज़्यादा दवाएं या तो डॉक्टर ग़लत ढंग से देने की सलाह देते हैं या उन्हें कैमिस्ट ग़लत ढंग से बेचते हैं या उनका ग़लत ढंग से सेवन किया जाता है. न सिर्फ मरीज़ों के लिए इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं बल्कि स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने वालों के लिए भी इसका मतलब करोड़ों का ख़र्च होता है. |
| DATE: 2013-08-12 |
| LABEL: science |
| [317] TITLE: क्या आप स्वार्थी हैं? |
| CONTENT: धरती पर जीवन के विकास की प्रक्रिया ने कभी भी स्वार्थी लोगों की मदद नहीं की. एक नए शोध में यह बात कही गई है. इससे पहले तक यह कहा जाता था कि खुद को आगे रखना बेहतर लगता है लेकिन नया शोध पुराने सिद्धांत को चुनौती देता है. अब यह कहा गया है कि साथ मिलकर काम करना बेहतर रहता है. फैसले लेने के तौर तरीकों से जुड़े अध्ययन में यह मॉडल दिखाया भी गया है. नेचर कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित इस शोध में अध्ययन करने वाली टीम ने कहा है कि केवल स्वार्थी स्वभाव को ज़्यादा तवज्जो देने की वजह से हमारे अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो जाएगा. अर्थशास्त्र की गेम थिओरी का विकास साथ मिलकर काम करने की भावना या विवाद की सूरत में पैदा होने वाली परिस्थितियों से जु़ड़ा हुआ है. इससे शोध कर रही टीम ने फैसले लेने की जटिल प्रक्रिया पर गौर किया और किसी परिस्थिति विशेष में किसी व्यक्ति के बर्ताव को समझने की कोशिश की. अमरीका में मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी की एक टीम ने कैदियों की दुविधा को समझने की कोशिश की. अलग-अलग जेल में बंद दो संदिग्धों से पूछताछ की गई और उनसे कहा गया कि एक दूसरे को इसके बारे में बताने का फैसला उन्हें करना ही होगा. इसके साथ ही उन्हें यह पेशकश भी की गई कि अगर वे अन्य कै़दी को इस पूछताछ के बारे में बताते हैं तो दूसरों को छह महीने जेल में रहना होगा. अगर वे दोनों ही एक दूसरे को यह बताने का फैसला करते हैं तो उन्हें तीन महीने जेल में बिताने होंगे लेकिन अगर वे चुप रहने का निर्णय करते हैं तो उन्हें केवल एक महीने की जेल होगी. एक दूसरे को बताने का फैसला मुख़ालफ़त करने जैसा था और खामोश रहने का फैसला सहयोग करने का था. जाने-माने गणितज्ञ जॉन नैश ने यह दिखलाया कि इस बात का पूरा ख्याल रखा गया था कि कै़दियों की दुविधा के इस खेल में सहयोग की भावना न हो. जॉन नैश कहते हैं जिन दो कै़दियों से पूछताछ की गई थी उन्हें एक दूसरे से बातचीत करने की इजाज़त नहीं दी गई. अगर ऐसा होता तो वे एक दूसरे से समझौता करके महीने भर में रिहा हो गए होते लेकिन एक दूसरे से बातचीत न करने की सूरत में उनका झुकाव अन्य को छोड़ने की तरफ होता. मतलबी होना आपको थोड़े वक्त के लिए फायदा पहुँचा सकता है लेकिन निश्चित रूप से इसका फायदा लंबे समय के लिए नहीं होगा. साल 2012 में हुए एक अध्ययन में यह पाया गया था कि स्वार्थी लोग साथ मिलकर काम करने वाले लोगों के बनिस्बत अधिक तरक्की करते हैं. इससे दुनिया स्वार्थी लोगों से भर जाएगी. नए नतीजे पुराने शोध को चुनौती देते हुए लगते हैं. इसे मतलबी और स्वार्थी तौर तरीके का नाम दिया गया था और इसके नतीजे इस बात पर निर्भर करते थे कि भागीदार अपने प्रतिद्वंदियों के पिछलों फैसलों को ध्यान में रखते हुए उसके अनुसार अपनी रणनीति बनाते हैं. शोध से जुड़े डॉक्टर अदामी कहते हैं यह महत्वपूर्ण है कि विरोधी का फैसला समझ लेना हमेशा ही फायदे में नहीं होता क्योंकि यह मुमकिन है कि आपका विरोधी भी आपके बारे में ऐसे तरीके अपना सकता है. टीम इस ठीक नतीजे पर पहुँची है कि अलग रहकर काम करने का फायदा हमेशा ही तात्कालिक होता है. |
| DATE: 2013-08-10 |
| LABEL: science |
| [318] TITLE: खान जिसमें छिपा है ‘एलियन’ रहस्य |
| CONTENT: दूसरे ग्रहों पर जीवन की तलाश विज्ञान के लिए बेहद चुनौती भरा काम रहा है. मगर अब इंग्लैंड के उत्तरपूर्व में मौजूद एक खान से इसकी कुंजी हासिल हो सकती है. शोधकर्ताओं को यक़ीन है कि बेहद गहराई में रह रहे छोटे छोटे जीवों का अध्ययन करके वो धरती से परे जीवन की संभावनाओं का पता लगाने में कामयाब हो सकते हैं. इस खान तक पहुंचने के लिए एक पिंजरे में बंद होकर धरती के भीतर क़रीब एक किलोमीटर अंदर सफ़र करने में बस कुछ मिनट लगते हैं. जैसे ही हम टॉर्च लगी हैट पहने और आपातकालीन श्वास उपकरणों के साथ पिंजरे से बाहर निकलते हैं तो सामना होता है तेज़ गर्मी से. यह गर्मी खान के कुछ हिस्सों में 35 डिग्री तक पहुंच सकती है. क्लीवलैंड पोटाश लिमिटेड की देखरेख में चल रही यह बोल्बी खान यूरोप की कुछ सबसे गहरी खानों में से एक है और यह उत्तरी यॉर्कशायर और क्लीवलैंड से रेडकार बॉर्डर तक फैली है. खानकर्मी अपनी शिफ़्ट करने के लिए कई सुरंगों के ज़रिए यहां पहुंचते हैं. 1970 के दशक से इसकी ज़मीन से पोटाश और नमक निकाला जाता रहा है मगर इस खान की चट्टानों में कुछ और भी छिपा है. हालांकि यूं तो धूल भरा रास्ता बिल्कुल खाली दिखता है लेकिन इसमें बेहद महीन जीव छिपे हैं. एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में यूके सेंटर फॉर एस्ट्रोबायोलॉजी के प्रोफ़ेसर चार्ल्स कॉकेल कहते हैं हमें यहां जीवन के लिहाज़ से काफ़ी मुश्किल परिस्थितियां देखने को मिली हैं. यहां काफ़ी नमक है अंधेरा है और इसका मतलब है कि ऊर्जा पाने के लिए सूरज की रोशनी भी नहीं. यहां बहुत कम पानी मिलेगा. ऐसे में इतनी गहराई के भीतर जीवन की मौजूदगी काफ़ी मुश्किल है और हमारी रुचि यह जानने में है कि यहां जीवन कैसे बच सकता है और कैसे आगे बढ़ सकता है. इस खान में आंखों से दिखाई न देने वाले बेहद सूक्ष्म जीव एक्स्ट्रीमोफ़ाइल्स मिलते हैं. प्रोफ़ेसर कॉकेल और उनकी टीम इनके नमूने लेने आई है ताकि इनके बारे में और जानकारी हासिल कर सके. उनका कहना है कि इनके बारे में अध्ययन से हमें पता चलेगा कि क्या हमारे ब्रह्मांड में कहीं ऐसे हालात में जीवन मौजूद है. अगर आप मंगल ग्रह को देखें तो आप उसकी सतह पर नमक पाएंगे यानी सोडियम क्लोराइड. अगर आप ब्रहस्पति के चंद्रमा यूरोपा को देखें तो वहां आप बर्फ़ीली सतह के नीचे एक नमक का महासागर पाएंगे. पूरे ब्रह्मांड में नमक हर जगह मौजूद है. अगर आप यह जानना चाहते हैं कि दूसरे ग्रहों के वातावरण में जीवन कैसे पैदा हुआ और कैसे बढ़ता है तो आपको सबसे पहले वहां के बेहद नमकीन पर्यावरण को समझना होगा. अपनी टॉर्च के सहारे रोशनी करते हुए हम खान में बनी एक प्रयोगशाला में पहुंचते हैं. यह दूसरी खानों के मुक़ाबले पूरी तरह अलग है. हम एक बेहद रौशन कमरे में पहुंचते हैं जहां कई वैज्ञानिक उपकरण रखे हुए हैं. इस लैब को सालों से चलाया जा रहा है और यह असल में साइंस एंड टैक्नोलॉजी फ़ैसिलिटीज़ काउंसिल और खनन कंपनी की साझेदारी का नतीजा है. बॉल्बी अंडरग्राउंड लैबोरेट्री के डायरेक्टर डॉक्टर शान पालिंग कहते हैं किसी खान में इस तरह की प्रयोगशाला होना अजूबा ही है. यह खानकर्मियों के लिए भी अजूबे से कम नहीं. उन्हें यक़ीन नहीं होता कि हमने यहां प्रयोगशाला बना रखी है. हाल तक यहां चलने वाले शोध कार्य का केंद्र बिंदु डार्क मैटर की तलाश रहा है. डार्क मैटर यानी वो कण जिनसे ब्रह्मांड का चौथाई हिस्सा बना है. हालांकि अब यह टीम अपने शोध के दायरे को बढ़ा रही है. डॉक्टर पालिंग के मुताबिक़ जिस वजह से हम यहां आए हैं उसकी वजह यहां का बेहद शांत वातावरण है. यहां प्राकृतिक विकिरण का बिल्कुल ख़तरा नहीं जो धरती की सतह पर मिलता है. डॉक्टर पालिंग कहते हैं मगर बहुत से ऐसे प्रोजेक्ट हैं जो आप इस वातावरण में कर सकते हैं. हमारा एक प्रोजेक्ट वातावरण पर शोध के संबंध में है. कुछ रेडियो डेटिंग और कार्बन कैप्चर पर भी काम चल रहा है और अब एस्ट्रोबायोलॉजी प्रयोगशाला शुरू की गई है. वह बताते हैं इसमें कोई विरोधाभास नहीं आप अक्सर ऐसे सवालों से दो-चार होते हैं कि ब्रह्मंड किस चीज़ से बना है और क्या दूसरे ग्रहों पर जीवन है या वहां जीवन किस तरह का है. अभी तक हम इसका ज़मीन के भीतर अध्ययन कर रहे हैं पर यही असल में हो रहा है. इस तरह के वातावरण में ही ऐसा शोध कर पाना मुमकिन है. अभी शोध शुरुआती दौर में है पर जेनेटिक जांच से पता चला है कि इस खान में कुछ जीवों की अजीबोग़रीब प्रजातियां मौजूद हैं. उम्मीद की जा रही है कि एक दिन हम यहां काफ़ी विकसित जीवन का पता लगा पाएंगे. इस बात की संभावना ज़्यादा है कि इस खान में मौजूद सामान्य से जीव ही शायद एलियन प्रजातियां साबित हों. प्रोफ़ेसर चार्ल्स कॉकेल कहते हैं विज्ञान के सामने सबसे रोचक प्रश्न यही है कि क्या ब्रह्मांड में कहीं जीवन मौजूद है. इसलिए बॉल्बी में चल रही इसी जीवन की तलाश कोई आशावाद नहीं है. इसके पीछे वैज्ञानिक आधार है कि क्या ब्रह्मांड में धरती से परे कहीं जीवन है और अगर है तो क्या वह पृथ्वी जैसा है. अगर ऐसा नहीं तो ऐसा क्यों है. |
| DATE: 2013-08-10 |
| LABEL: science |
| [319] TITLE: सड़क जो करती है रिचार्ज |
| CONTENT: दक्षिण कोरिया में एक ऐसी सड़क बनाई गई है जो अपने ऊपर गुजरने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों को रिचार्ज कर सकती है. इसे विकसित करने वालों का दावा है कि 12 किलोमीटर लंबी ये सड़क दुनिया में अपनी तरह की पहली परियोजना है. इसके लिए सड़क पर वाहनों को रिचार्ज के लिए रुकने की ज़रूरत नहीं है. देश में अभी दो सार्वजनिक बसें इस तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं और साल 2015 तक इसमें दस और बसों को शामिल करने की योजना है. इसे विकसित करने वाली कोरिया एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की टीम के प्रमुख दोंग हो चो ने कहा ओएलईवी ऑनलाइन इलेक्ट्रिक व्हीकल के लिए हमारी परियोजना सफल रही है. ये ओएलईवी के लिए मील का पत्थर साबित होगी. लेकिन यातायात विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक के लिए बसों और सड़कों पर उपकरण लगाना महंगा सौदा साबित हो सकता है क्योंकि ये ज़्यादा व्यावहारिक नहीं है. कार्डिफ विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर ऑटोमोटिव इंडस्ट्री रिसर्च के डॉक्टर पॉल नियूवेनहुइस ने कहा निश्चित रूप से इस तकनीक में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली के लिए काफी संभावनाएं हैं लेकिन निजी इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए इससे संबंधित उपकरण लगाना बहुत खर्चीला होगा. इस परियोजना को दक्षिण कोरिया के दक्षिणी शहर गूमी में स्थापित किया गया है. शहर के ट्रेन स्टेशन से इन डोंग डिस्ट्रिक्ट को जोड़ने वाली सड़क पर ये तकनीक लगाई गई है. इसमें बस के निचले हिस्से पर एक उपकरण लगाया गया है जो शेप्ड मैग्नेटिक फील्ड इस रीजोनेंस तकनीक का इस्तेमाल करके चार्ज हो जाता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि विद्युत चुम्बकीय क्षेज्ञ के स्वास्थ्य को कोई खतरा नहीं है. सड़क के नीचे बिछी बिजली की तारों को विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो उपकरण के अंदर लगी एक कुंडली में जमा होता है और फिर इसे बिजली में बदला जाता है. इसे चार्ज होने वाले उपकरण को सतह से 17 सेमी ऊपर रखा जा सकता है. पावर स्ट्रिप को सड़क के पांच से लेकर 15 प्रतिशत हिस्से में ही स्थापित किया जाएगा और इसके लिए पूरी सड़क खोदने की कोई ज़रूरत नहीं है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इलेक्ट्रिक वाहनों को यात्रा शुरू करने से पहले ऊर्जा संग्रहीत करने की ज़रूरत नहीं है. इसकी बैटरी भी सामान्य बैटरी से तीन गुना छोटी हो सकती हैं. इससे वाहन का वज़न कम होता है और बिजली के उत्पादन के समय कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन घटता है. ओएलईवी चलते वाहनों को रिचार्ज करने की पहली परियोजना है लेकिन दुनिया में वाहनों को रिचार्ज करने की दूसरी कई परियोजनाएं चल रही हैं. इटली के टोरिनो और नीदरलैंड के यूट्रेच्ट में भी कुछ बस स्टॉप पर बेतार चार्जिंग उपकरण लगाए गए हैं जहां चालक कुछ देर वाहन को रोककर उसे चार्ज कर सकता है. अमरीका की ऊटाह स्टेट यूनिवर्सिटी भी एक कैम्पस बस के प्रोटोटाइप पर काम कर रही है जो 90 प्रतिशत से अधिक पावर ट्रांसमिशन इफिशंसी हासिल कर सकती है. इस तकनीक को कारों में भी इस्तेमाल करने पर भी विचार चल रहा है. लंदन में कम्प्यूटर चिप बनाने वाली कंपनी क्वालकॉम इस दिशा में काम कर रही है. विशेषज्ञ अश्विन चोटई का कहना है कि दक्षिण कोरिया की महत्वाकांक्षी योजना को आम उपयोग में लाने के लिए अभी सालों लगेंगे. उन्होंने कहा मुझे लगता है कि देशभर में ऐसी सड़कों का जाल बिछने में अभी दशकों लगेंगे. अभी तो यह केवल सजावटी तकनीक लग रही है जिसका व्यवसायीकरण हो सकता है. |
| DATE: 2013-08-10 |
| LABEL: science |
| [320] TITLE: '30 साल बाद कहीं नहीं रहेगा ऊर्जा संकट' |
| CONTENT: दक्षिणी फ़्रांस में आण्विक संलयन के जरिए बड़े पैमाने पर ऊर्जा तैयार करने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक प्रयोग आईटीईआर अपनी शुरुआत के अहम चरण में पहुंच चुका है. दरअसल आण्विक संलयन वह प्रक्रिया है जिसमें दो परमाणु तेज़ गति से आपस में टकरा कर एक दूसरे से जुड़कर बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पन्न करते हैं. दक्षिण फ़्रांस के केडेरेक में शुरू होने वाली इस परियोजना में के प्रयोगधर्मी रिएक्टर में करीब दस लाख अवयव जोड़े जाएंगे. इसमें पहला अवयव लगाया जा चुका है. यह परियोजना बेहद खर्चीली है इसके चलते इसके शुरू होने में लगातार देरी हो रही है. अभी इसकी शुरुआत ही हुई है और यह निर्धारित समय से दो साल देरी से हो पाया है. परमाणु रिएक्टर के अवयवों को लाने ले जाने के लिए अभी इसके भवन के निर्माण कार्य में भी तब्दीली की जा रही है. इस परियोजना के डिप्टी डायरेक्टर डेविड कैंपबेल ने बीबीसी न्यूज़ को बताया हम किसी चीज़ को छुपा नहीं रहे हैं इसमें हो रही देरी अविश्वसनीय रूप से निराश करने वाला है. हालांकि कैंपबेल दावा कर रहे हैं कि ये परियोजना अब रफ़्तार पकड़ चुकी है. उन्होंने बताया हम अब हरसंभव कोशिश कर रहे हैं ताकि काम जल्द से जल्द शुरू हो सके. ये परियोजना अपने आप में काफी प्रभावी है और हम जल्द से जल्द परमाणु संलयन से प्राप्त होने वाली ऊर्जा को देख पाएंगे. पहले तो इस परियोजना के डिजाइन में मुश्किलें आ रहीं थीं. इसके अलावा यह अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रोजेक्ट है और कई देश इसमें शामिल हैं तो सबके बीच संयोजन होने में भी वक्त लगा. लेकिन अब सबकुछ पटरी पर आ चुका है. 1950 में नाभिकीय संलयन ने वह सपना दिया जिसके जरिए असीमित ऊर्जा उत्पन्न करने की संभवना ने जन्म लिया. सूर्य की रोशनी की वजह भी नाभिकीय संलयन से मिलने वाली ऊर्जा ही है. इतना ही नहीं नाभिकीय संलयन से प्राप्त होने वाली ऊर्जा किफायती तो है ही साथ में इसमें बेहद कम रेडियोएक्टिव कचरा उत्पन्न होता है और ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन भी नहीं होता. लेकिन इसको लेकर चुनौतियां भी कम नहीं होतीं. इस प्रक्रिया से प्राप्त होने वाली असीम ऊर्जा को संभालना भी चुनौतीपूर्ण काम है. यह इतना चुनौतीपूर्ण काम है जब भी नाभिकीय संलयन से प्राप्त होने वाली ऊर्जा की बात होती है तो हमेशा यही कहा जाता है कि इसे हासिल करने में अभी भी 30 साल का वक्त लगेगा. लेकिन अब आईटीईआर इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हो रहा है. इसका डिजाइन ऑक्सफोर्डशायर के कूलहम के यूरोपीय पायलट प्रोजेक्ट जेट के तर्ज पर तैयार किया गया है. इसमें बेहद गर्म गैसों को नियंत्रित करने वाला प्लाज़्मा शामिल है. क्योंकि नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया में तापमान 20 करोड़ डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. इसी तापमान पर ड्यूटेरियम और ट्राइटियम के परमाणु आपस में संलियत करके ऊर्जा उत्पन्न करते हैं. यह पूरी प्रक्रिया एक बड़े मैग्नेटिक फ़ील्ड में होगी जो एक रिंग के आकार का होगा. बहुत ज्यादा उष्मा को एकत्रित करने का एकमात्र यही जरिया हो सकता है. ऑक्सफोर्डशायर के जेट प्लांट में नाभिकीय संलयन छोटे पैमाने पर होता है जिसके चलते वहां ऊर्जा उत्पन्न करने में कहीं ज़्यादा ऊर्जा खर्च करनी होती है. लेकिन आईटीईआर में बड़े पैमाने पर नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया होगी. मौजूदा आकलन के मुताबिक इसमें खर्च होने वाली ऊर्जा के मुक़ाबले 10 गुना ज़्यादा ऊर्जा प्राप्त होगी. इस प्रयोग में दुनिया भर के कई देश शामिल हैं. यूरोपियन यूनियन के अलावा चीन भारत जापान रूस दक्षिण कोरिया और संयुक्त राज्य अमरीका इस महत्वपूर्ण परियोजना में भागीदार हैं. ये भागीदारी आर्थिक हिस्सेदारी के तौर पर नहीं है. हर देश अपने हिसाब से इस प्रयोग से जुड़े हैं. मसलन यूरोपियन यूनियन ने इस प्रयोग के लिए इमारत और आधारभूत ढांचे के निर्माण को फंड किया है. इसकी कुल लागत कितनी होगी ये अभी उपलब्ध नहीं हो पाया है. लेकिन माना जा रहा है कि इसमें करीब 13 अरब डॉलर का खर्चा होगा. |
| DATE: 2013-08-09 |
| LABEL: science |
| [321] TITLE: मलेरिया के टीके ने जगाई उम्मीद |
| CONTENT: अमरीका में किए गए एक शोध में मलेरिया को रोकने के लिए बनाए गए एक टीके ने उम्मीद जगाई है. शोधकर्ताओं ने पाया कि इस टीके को ज़्यादा मात्रा में दिए जाने से मलेरिया से पीड़ित 15 रोगियों में से 12 का बचाव सुनिश्चित किया जा सका. इस अनोखे तरीके में पीड़ित के शरीर में मलेरिया पैदा करने वाले परजीवी को सीधे डाला गया ताकि उसके भीतर प्रतिरक्षा पैदा की जा सके. इस शोध की जानकारी साइंस पत्रिका में छपी है. अमरीका के मेरीलैंड में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ हेल्थ के वैक्सीन रिसर्च सेंटर के डॉक्टर रॉबर्ड सेडर ने कहा हम शोध के नतीजों से बहुत उत्साहित हैं लेकिन ये ज़रूरी है कि हम इस तरीके को दोहराएँ और ज़्यादा लोगों पर इसकी परीक्षा करें. ये तथ्य तो कई दशकों से पता है कि विकिरण या रेडियेशन दिए गए मच्छरों के काटने से मलेरिया से बचा जा सकता है. लेकिन अध्ययन दिखाते हैं कि इस तरह के मच्छर लंबे समय तक 1000 से ज़्यादा बार आपको काटें तभी शरीर में मलेरिया के खिलाफ़ प्रतिरक्षा पैदा हो सकती है. इसलिए मलेरिया से बचाव का ये एक अव्यावहारिक तरीका है. इसकी जगह अमरीका की एक बायोटेक कंपनी सनेरिया ने प्रयोगशाला में पैदा हुए मच्छरों को विकिरण देकर उनमें से मलेरिया पैदा करने वाले परजीवी प्लास्मोडियम फैल्सीपैरम को निकाला. इन जीवित लेकिन कमज़ोर परजीवियों को फिर सीधे मरीज़ के खून में डाला गया. पहले फ़ेस के क्लीनिकल परीक्षणों में शोधकर्ताओं ने 57 लोगों को चुना जिन्हें कभी मलेरिया नहीं हुआ था. इनमें से सिर्फ़ 40 लोगों को टीके की विभिन्न मात्रा दी गई लेकिन पूरे समूह को मलेरिया फ़ैलाने वाले मच्छरों के साथ रखा गया. शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों को टीका नहीं दिया गया या फिर जिन्हें कम मात्रा में टीका दिया गया उनमें से लगभग सभी को मलेरिया हो गया. लेकिन 15 लोगों के जिस गुट को टीके की ज़्यादा मात्रा दी गई उनमें से से सिर्फ़ तीन लोगों को मलेरिया हुआ. डॉक्टर रॉबर्ट से़डर कहते हैं पुराने शोध के आधार पर हमें पता था कि टीके में दी जाने वाली मात्रा बेहद ज़रूरी है क्योंकि मलेरिया से बचने के लिए मच्छरों का 1000 बार काटना ज़रूरी है. इस शोध से ये बात साबित होती है. उनका कहना था अगला महत्वपूर्ण सवाल ये है कि क्या ये टीका लंबे समय तक कारगर रहेगा और क्या ये टीका मलेरिया के और प्रकारों से मनुष्य को बचा सकता है डॉक्टर सेडर के मुताबिक इस टीके को सीधे रक्तप्रवाह में डालना होता है जो थोड़ा मुश्किल होता है. इस शोध पर टिप्पणी करते हुए पाथ मलेरिया वैक्सीन इनिशियेटिव के डॉक्टर ऐशले बर्केट कहते हैं ये परीक्षणों की शुरुआत है जिसमें बहुत कम संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया है लेकिन ये सही है कि हम नतीजों से बहुत उत्साहित हैं. मलेरिया के करीब 20 टीकों का परीक्षण चल रहा है. इनमें सबसे आगे है ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन कंपनी द्वारा किया जा रहा परीक्षण जिसमें अफ्रीका के 15000 बच्चे शामिल हैं और अभी तीसरे दौर का परीक्षण जारी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2010 में दुनिया भर में मलेरिया के 22 करोड़ मामले सामने आए थे और करीब 6 लाख 60 हज़ार लोग मारे गए थे. |
| DATE: 2013-08-09 |
| LABEL: science |
| [322] TITLE: क्या कोई है, जो आपको ऑनलाइन परेशान कर रहा है? |
| CONTENT: क्या ऑनलाइन दुर्व्यवहार अब्यूज़ की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए सचमुच कुछ किया जा सकता है ऐसी घटनाओं से कई बार निजी ज़िदगी बुरी तरह से प्रभावित हो जाती है और कुछ हादसों में लोगों को अपनी जान भी गवाँनी पड़ती है. महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली कैरोलीन-क्रीयाडो-पेरेस ट्विटर पर दुर्व्यवहार की सूचना देने के इंतजाम को पूरी तरह से अपर्याप्त बताती हैं. ज़्यादातर लोगों की तरह उनका भी कहना है कि हर ट्वीट के साथ ही अब्यूज़ बटन को शामिल करना चाहिए ताकि अपमानजनक बयान को आसानी से चिन्हित किया जा सके. ट्विटर ने कहा है कि वह अपने पूरे सिस्टम में इस सुझाव पर अमल करेगा जबकि कुछ ऐप्स में ऐसा पहले ही किया जा चुका है. लेकिन हर पोस्ट के आगे रिपोर्ट अब्यूज़ बटन लगा देने से काम खत्म नहीं हो जाता है. मीडिया मनोवैज्ञानिक आर्थर कासिडी कहती हैं कि निश्चित रूप से अब्यूज़ बटन तो एक शुरुआत है. उन्होंने बताया लेकिन इतने से ही समस्या का समाधान नहीं होने जा रहा है. कार्रवाई की रफ्तार काफी धीमी है. यह पर्याप्त नहीं है. फेसबुक के मॉडरेटर हजारों की संख्या में हैं और दुनिया भर में फैले हुए हैं. ऐसे में एक उपाए मशीनों की मदद लेना हो सकता है. ऐसी मशीनों को बनाया जा सकता है जो संभावित आपत्तिजनक संदेशों की पहचान करें और उन्हें भेजने से रोकने का काम करें. यह मशीन कैसे काम करेगी पहले से तय प्रतिबंधित शब्दों की सूची के आधार पर और इस सूची को लगातार अपडेट किया जाना चाहिए. इसमें हालांकि एक दिक्कत है. एक मशीन के लिए बातचीत के संदर्भ को समझना काफी मुश्किल है. ऐसे में स्वचालित नियंत्रण गलत साबित हो सकता है. इंटरनेट पर कई लोग अपनी वास्तविक पहचान को छिपाकर फर्जी नामों से संदेश भेजते हैं. अपनी पहचान छिपाकर कई लोग सोचते हैं कि वो सजा से बच जाएंगे हालांकि पुलिस और तकनीकी फर्म ऐसे किसी व्यक्ति की पहचान करने में सक्षम हैं. फेसबुक इस बात पर काफी ध्यान देता है कि लोग अपने वास्तविक नाम का इस्तेमाल करें. जबकि ट्विटर निजता के तर्क के आधार पर ऐसा करने की अनुमति देता है. चीन में प्रमुख सोशल नेटवर्किंग साइट पर खाता खोलने के लिए राष्ट्रीय पंजीकरण नंबर का ब्यौरा देना अनिवार्य है. हालांकि कई बार वास्तविक पहचान को उजागर करना भी समस्या का कारण बन जाता है. बीते दिनों इंटरनेट पर आपत्तिजनक ट्वीट के मामले में कई गिरफ्तारियाँ हुई हैं. इस तरह पुलिस ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि आप ऑनलाइन जो करते हैं उसका आपके वास्तविक जीवन के साथ गहरा संबंध है. ब्रिटेन में सार्वजनिक अभियोजन निदेशक केर स्टारमर ने बीते साल अक्टूबर में कहा था कि अगर इस बात को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश न हों कि पुलिस कब हस्तक्षेप कर सकती है तो ऑनलाइन अभिव्यक्ति की आजादी पर इसका विपरीत असर पड़ सकता है. आस्क डॉट एफएम और फेसबुक जैसी कई बड़ी कंपनियां मॉडरेटर नियुक्त करती हैं जबकि बीबीसी सहित कई वेबसाइट ऐसी हैं जो मॉडरेटिंग की जिम्मेदारी बाहर की किसी विशेषज्ञ कंपनी को देती हैं. तरीका चाहे जो भी हो लेकिन अधिक से अधिक मॉडरेटर का होना अच्छा है. जो एन्नी कहती हैं कि बच्चों को ध्यान में रख कर बनाई गई साइट की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है. वर्ष 2010 में ट्विटर पर प्रतिदिन पांच करोड़ संदेश भेजे जा रहे थे लेकिन कंपनी इतने अधिक खातों को करीब 300 कर्मचारियों के जरिए संभाल रही थी. अभिभावकों के साथ तकनीकी विषयों पर चर्चा करने वाली बेव साइट की संचालिका होली सेडन कहती हैं कि यह मसला हमारी संस्कृति में आ रहे बदलावों से जुड़ा है. उन्होंने बताया कि अगर आप एक वेब साइट को बंद करेंगे तो दूसरी आ जाएगी. हम एक ऐसी स्थिति में आ गए हैं जहाँ हम कंपनियों को दोष दे रहे हैं लेकिन असल समस्या तकनीकी नहीं है- यह लोगों का बर्ताव है जिसे बदलने की ज़रूरत है. ऑनलाइन बर्ताव कैसे करें इस बारे में लोगों को सिखाने की ज़रूरत है. |
| DATE: 2013-08-08 |
| LABEL: science |
| [323] TITLE: मधुमक्खियों पर यूँ रखी जाएगी नजर |
| CONTENT: सैकड़ों प्रकार की मधुमक्खियों के बारे में हम जानते हैं जो न केवल ग्रामीण जीवन में विशेष स्थान रखती हैं बल्कि हमारे दैनिक आहार का एक तिहाई हिस्सा इन्हीं के परागणों पर निर्भर है. पिछले पच्चीस साल में इंग्लैंड में मधुमक्खियों की संख्या आधे से भी कम हो गई है. मधुमक्खियों की जनसंख्या के मामले में यही हाल दूसरे देशों का भी है और इस बात को लेकर वैज्ञानिक बहुत चिंतित हैं. एक मधुमक्खी एक दिन में हज़ारों फूलों पर जाती है और कई किलोमीटर का सफर तय करती है. ऐसे में वैज्ञानिकों के लिए मधुमक्खियों की कम होती संख्या का अध्ययन करने में सबसे बड़ी बाधा थी स्वभाव से चपल मधुमक्खियों पर लगातार नजर रखना. लेकिन अब नेचुरल रिसोर्स इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने इस समस्या का हल ढूँढ़ लिया है. वैज्ञानिक मधुमक्खियों पर नजर रखने के लिए हार्मोनिक रडार तकनीक का प्रयोग कर रहे हैं. इस रडार के ट्रांसमीटर से निकली तरंगों को मधुमक्खी के शरीर के पिछले भाग पर चिपका एंटीना ग्रहण करता है. एंटीना में लगा डायोड इस सिग्नल को एक ऐसे वेवलेंथ तरंगदैर्ध्य में बदल देता है जिस पर आसानी से नजर रखी जा सकती है. एक एंटीना का बदला गया सिग्नल बिल्कुल अनूठा होता है. पर्यावरण में मौजूद अन्य किसी स्रोत से इस तरह की तरंगें नहीं निकलतीं. इसलिए वैज्ञानिक आसानी से जान जाते हैं कि जिस स्रोत से यह तरंग निकल रही है वो कोई मधुमक्खी है. इस तकनीक का संचालन सरकार से मदद प्राप्त हर्टफोर्डशायर स्थित एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर रॉथैमस्टेड रिसर्च के वैज्ञानिक करेंगे. मधुमक्खियों के अध्ययन की विभिन्न परियोजनाओं में इस तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है. प्रत्येक एंटीना को मधुमक्थी के शरीर पर हाथ से चिपकाया जाएगा. परीक्षण के लिए चुनी गई मक्खियों के शरीर पर प्लास्टिक की एक छोटी सी डिस्क चिपकाई गई हैं. हर डिस्क पर पहचान संख्या अंकित रहेगी. इसके बाद इस डिस्क पर एक एंटीना चिपका जाता है. यह डिस्क और एंटीना मधुमक्खी के शरीर पर इस तरह चिपकाया जाता है कि यह अपने आप नहीं छूट सकता. मधुमक्खियों को पकड़ने के लिए उनके छत्ते से एक लम्बी ट्यूब जोड़ी जाएगी. इस ट्यूब में मधुमक्खी के प्रवेश करते ही उसके सिरे पर लगे दरवाजे बंद हो जाते हैं. मधुमक्खी के शरीर से एंटीना निकालने के लिए भी इसी तकनीक का प्रयोग किया जाता है. मधुमक्खी के शरीर पर लगे एंटीना से आने वाने सिग्नल से रडार स्क्रीन पर एक ब्लिप होती है. इस ब्लिप से पता चल जाता है कि मधुमक्खी कितनी दूर है और यह किस दिशा में जा रही है. इन ब्लिप की मदद एक कम्प्यूटर प्रोग्राम मधुमक्खी की उड़ान का रास्ता तैयार करता है. इस एंटीने की लम्बाई मधुमक्खी की लम्बाई के बराबर ही होती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि एंटीने की लम्बाई कोई समस्या नहीं है क्योंकि मधुमक्खियों लाखों साल से भारी वजन उठाने की अभ्यस्त हैं. मधमक्खियां अपने शरीर से दोगुने वजन के पराग को ले जा सकती हैं. रॉथैमस्टेड रिसर्च संस्थान के डॉक्टर जैसन चैपमैन कहते हैं इस एंटीने का वजन मधुमक्खी के शरीर के वजन से दस गुना कम होता है. उनके लिए इस एंटीने को ढोना बहुत आसान है. उन्हें वजन लेकर उड़ने की आदत होती है इसलिए इससे उनके उड़ान के रास्ते पर भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा. पहले-पहल इस तकनीक का विकास अफ्रीकी मक्खियों के अध्ययन के लिए किया गया था. इन अफ्रीकी मक्खियों के काटने से नींद की बीमारी हो जाती थी. इस तकनीक मे एक ही कमी है. इसमें एक समय में एक ही मक्खी पर नजर रखी जा सकती है. अलग-अलग मक्खियों को उड़ान रास्ते के बीच भ्रम हो सकता है. इसी कारण इस शोध में बहुत समय लग जाता है. डॉक्टर चैपमैन कहते हैं हमने भविष्य में हार्मोनिक रडार के नए विकसित संस्करण के प्रगोग की दीर्घकालीन योजना बनाई है. उसके बाद हम कई मधुमक्खियों पर एक साथ नजर रख सकेंगे. |
| DATE: 2013-08-07 |
| LABEL: science |
| [324] TITLE: 'स्मार्टफ़ोन शौचालय' के साइड इफ़ेक्ट्स |
| CONTENT: स्मार्टफ़ोन ऐप से चलने वाला एक लक्ज़री शौचालय सुर्खियों में है लेकिन सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि ये टॉयलेट हमले का शिकार हो सकता है. इस शौचालय की कीमत 5686 डॉलर बताई जा रही है यानी करीब साढ़े तीन लाख रुपए. इसमें ऑटोमैटिक फ़्लशिंग की सुविधा है संगीत है और अपने आप सुगंध निकलती है. ये टॉयलट जापान की एक कंपनी लिक्सिल ने बनाया है और इसे माई साटिस नाम के एंड्रायड ऐप के ज़रिए नियंत्रित किया जाता है. ऐप पर लोग अपने पेट से जुड़ी गतिविधियों का रिकॉर्ड भी रख सकते हैं. लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि हार्डवेयर की एक कमी के चलते माई साटिस ऐप वाले किसी भी फोन से आप शौचालय को संचालित कर सकते हैं. ट्रस्टवेव्स स्पाइडरलैब्स की रिपोर्ट के मुताबिक ये लक्ज़री शौचालय ऐप के ज़रिए निर्देश लेने के लिए ब्लूटूथ का इस्तेमाल करता है. हर मॉडल का पिन ऐसा है कि इसे दोबारा सेट नहीं किया जा सकता. कोई भी फोन जिसमें माई साटिस ऐप है उसके ज़रिए शौचालय को चलाया जा सकता है. कोई भी हमलावर चाहे तो वो माई साटिस ऐप डाउनलोड कर सकता है और इसके ज़रिए बार-बार शौचालय को फ़्लश करवा सकता है. हमलावर चाहें तो वो अचानक शौचालय की सीट के ढक्कन को बंद कर सकते हैं या खोल सकते हैं. सुरक्षा विशेषज्ञ ग्राम क्लूले कहते हैं कि चूँकि ब्लूटूथ की रेंज कम होती है इसलिए किसी भी तरह के हमले के लिए हमलावर को शौचालय के आस-पास रहना होगा. उन्होंने बीबीसी को बताया कोई भी मसखरा व्यक्ति चाहे तो इस ऐप के ज़रिए शौचालय इस्तेमाल करने वाले को ये अहसास दिला सकता है कि शायद उसके टॉयलट में भूत घुस गया है. शौचालय अपने आप बंद हो जाएगा गर्म हवा अपने आप निकलने लगेगी. पता नहीं साइबर अपराधी इसका क्या इस्तेमाल करना चाहेंगे. उनका कहना है कि कोई भी उपकरण बनाते समय कंपनियों को सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए. |
| DATE: 2013-08-07 |
| LABEL: science |
| [325] TITLE: इंसानों से बर्ड फ्लू फैलने का पहला मामला |
| CONTENT: चीन में इंसानों से इंसानों को बर्ड फ़्लू होने का पहला मामला सामने आया है. इससे पहले इंसानों के एक दूसरे के संपर्क में आने से एच7एन9 वायरस के संक्रमण के साक्ष्य नहीं मिले थे. केवल पक्षियों के साथ सीधे संपर्क से बर्ड फ़्लू संक्रमण का ख़तरा होता था. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के अनुसार एक 32 वर्षीय महिला बर्ड फ़्लू से प्रभावित अपने पिता की देखभाल के दौरान बर्ड फ़्लू से संक्रमित हो गई थी. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसका यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि वायरस ने मनुष्यों के बीच आसानी से फैलने की क्षमता विकसित कर ली है. पूर्वी चीन में 30 जून तक एच7एन9 संक्रमण के 133 मामले सामने आए हैं. इससे 43 लोगों की मौत हो चुकी है. इसमें से अधिकांश लोग बीमार होने के दो दिन और एक सप्ताह पहले मुर्गीपालन फार्म के साथ सीधे संपर्क में आए थे. शोधकर्ताओं ने पाया कि 32 वर्षीय महिला मार्च महीने में अपने पिता की अस्पताल में देखभाल करने के दौरान बर्ड फ़्लू से संक्रमित हो गई थी. उसके पिता बीमार होने के एक सप्ताह पहले मुर्गी बाज़ार गए थे. लेकिन महिला ने कभी भी मुर्गी फार्म नहीं देखा था. लेकिन अपने पिता के साथ संपर्क के 6 दिन बाद वह बीमार पड़ गई. पिता और बेटी दोनों की मौत सघन चिकित्सा कक्ष में सभी अंगों के काम करना बंद करने की वज़ह से हुई. दोनों मरीजों पर किए गए परीक्षण से एक समान बर्ड फ़्लू वायरस के संक्रमण की पुष्टि हुई है. इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि लड़की की मौत पिता से प्राप्त वायरस संक्रमण के कारण हुई थी. इसके अलावा महिला के संक्रमण का कोई अन्य स्त्रोत सामने नहीं आया. सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि बर्ड फ़्लू से प्रभावित मरीजों के सीधे संपर्क में आने वाले लोगों पर किए गए एच7एन1 के परीक्षणों का परिणाम नकारात्मक आया है. इससे वायरस के सीमित संक्रमण की क्षमता का पता चलता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इस बात के कोई साक्ष्य नहीं हैं कि वायरस ने इंसानों से इंसानों के बीच फैलने की क्षमता विकसित कर ली है. लड़की की पिता से प्राप्त संक्रमण से होने वाली मौत संभावित संक्रमण का पहला मामला है. शोधकर्ताओं का कहना है कि खोज से वायरस के महामारी का रुप लेने की संभावनाओं का पता चलता है. लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एण्ड ट्रॉपिकल मेडिसिन के डॉक्टर जेम्स रज का कहना है कि इंसानों के बीच वायरस का संक्रमण हैरान करने वाली बात नहीं है. इसके पहले बर्ड फ़्लू वायरस एच5एन1 में भी इंसानों के एक दूसरे के संपर्क में आने से फैलने के मामले पहले भी आ चुके हैं. डॉक्टर रज कहते हैं कि चिंता की बात तब होगी अगर हम इंसानों के बीच इसके फैलने की लंबी कड़ी देखने लगेंगे. वे कहते हैं कि अगर बर्ड फ़्लू वायरस से संक्रमित हर व्यक्ति से औसतन दो व्यक्ति संक्रमित होते हैं तो इसे महामारी की प्रारंभिक अवस्था की चेतावनी माना जा सकता है. बीएमजे में प्रकाशित एक संपादकीय के डॉक्टर रज सह लेखक हैं. इसके अनुसार यह अध्ययन एच7एन1 के महामारी बनने का संकेत नहीं करता. लेकिन ये सचेत जरूर करता है कि हमें इस बारे में हमेशा सतर्क रहना चाहिये. |
| DATE: 2013-08-07 |
| LABEL: science |
| [326] TITLE: आख़िर कैसा स्वाद है लैब में तैयार हुए बर्गर का? |
| CONTENT: प्रयोगशाला में बना पहला बर्गर दुनिया के सामने पेश किया जा चुका है. प्रयोगशाला में तैयार किए गए इस बर्गर को अब दो विशेषज्ञों ने चखा है. सबसे पहले तो एक टीवी चैनल पर प्रसारित होने वाले फ़ूड शो में इसे पकाया गया. शो की प्रस्तोता नीना हुसैन ने बहुत से सवाल भी पूछे. शो में शेफ़ रिचर्ड मैकगोवान को पैटी को फ़्राई करने का काम सौंपा गया था. उसे फ़्राई करते हुए उन्होंने बर्गर के शानदार रंग और ज़ायकेदार खश्बू पर टिप्पणी की. लेकिन पत्रकारों ने कहा कि बर्गर की खुश्बू उनके नाक तक नहीं पहुँच रही है. उन्होंने कहायह वास्तव में किसी और बर्गर को पकाने जैसा ही है जैसा कि मेरा पहले का अनुभव रहा है. एक अच्छी और ज़ायकेदार खुश्बू. लेकिन इस स्टेज पर बहुत तेज़ है. बर्गर को विकसित करने वाली टीम का कहना है कि यह गाय से लिए गए स्टेम सेल से तैयार किया गया संवर्धित मांस है और इस तरह हम लोगों को टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से मांस खिला सकते हैं. लेकिन अब इसे पहली बार चख लिया गया है. ऐसे में यह मानना ग़लत नहीं होगा कि बर्गर की स्थानीय दुकान से चिप्स के साथ इसका आर्डर दे सकते हैं. मास्ट्रिच विश्वविद्यालय के मार्क पोस्ट और इस पैटी को बनाने वाले ने पहले कहा था कि अगर यह वास्तविक चीज़ की तरह दिखा लगा और स्वाद हुआ तो यह सफलता होगी. यह ज़रूर कहा जाना चाहिए कि संवर्धित मांस सही बर्गर की तरह दिखने लगा. लेकिन एक पारंपरिक बर्गर की तुलना में इसका रंग ब्राउन होने में अधिक समय लगा. इसके ब्राउन होने के लिए कुछ हद तक फ़्राइंग पैन में डाले गए मक्खन को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. फ़्यूचर फूड स्टूडियो के खाद्य विशेषज्ञ हैनी रूट्जलर इसके एक टुकड़े को चखा जबकि प्रोफ़ेसर पास्ट सवालों के जवाब दे रही थीं. उन्होंने पहले इसे सूंघा और फिर कांटे को उसमें धंसाया जैसे उसकी कठोरता को परख रही हों. कुछ देऱ चबाने के बाद उन्होंने कहा कि वह इसके मुलायम होने की उम्मीद कर रही थीं. बाद में उन्होंने इसके कुरकुरेपन पर टिप्पणी की. उन्होंने यह मेरे लिए मांस है. यह वास्तव में कुछ खाने वाला है. मुझे लगता है कि यह पूरी तरह समान दिखता है. वो कहती हैं लगता है कि इसका बाहरी हिस्सा मक्खन की तरह है. इसके अंदर मांस के तीव्र स्वाद जैसा कुछ नहीं है. यह मांस है सोयाबीन के नकली मांस जैसा नहीं. इस बर्गर को चखने वाले दूसरे व्यक्ति थे खानपान पर लिखने वाले जोश स्नोवाल्ड. उन्होंने कहायह पूरी तरह अलग है. मसाले और वसा की कमी की वजह से इसका स्वाद पारंपरिक हैमबर्गर की तरह है. लेकिन उनके लिए इसे टोमैटो कैचअप प्याज़ और सूअर के गोश्त के बिना खाना थोड़ा मुश्किल है. इसमें मिलाया गए ब्रेड के चूरे. अंडे के पाउडर और मसाले ने निश्चित रूप से इसके स्वाद को बढ़ाने में मदद की होगी. चुकंदर और केसर के जरिए इसे रंग प्रदान किया गया था क्योंकि स्टेम सेल की वजह से इसका रंग अप्रिय नजर आता है. बर्गर अभी आधा ही खाया गया था कि पत्रकारों ने इसका टुकड़ा मांगना शुरू कर दिया. लेकिन जो बचा हुआ था वह उनमें बांटने के लिए काफी नहीं था. इसलिए प्रोफ़ेसर पास्ट ने उनसे कहा कि वे अपने बच्चों के लिए कुछ बचाकर रखना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि वे बर्गर को चखने वाले दोनों लोगों की टिप्पणियों से खुश हैं और उनकी टीम वसा की कमी पर काम कर रही है. इसे शाकाहारी लोग खा सकते हैं या नहीं यह तो अभी बहस का मुद्दा है. लेकिन प्रोफ़ेसर पास्ट ने कहा कि उनकी टीम ने इसे गाय का मांस खाने वालों के लिए बनाया है. |
| DATE: 2013-08-07 |
| LABEL: science |
| [327] TITLE: ख़तरे में क्यों हैं हिम तेंदुए? |
| CONTENT: दुनिया भर में कश्मीरी ऊन की बढ़ती मांग ने बर्फीले तेंदुओं को ख़तरे में डाल दिया है. वजह है कश्मीरी बकरियों का बर्फीले तेंदुओं के प्राकृतिक आवास और उनके शिकारों की जगह लेना. कश्मीरी ऊन की बढ़ती मांग की वजह से मध्य एशिया में बीते 20 साल में कश्मीरी बकरियों की तादाद तीन गुना हो गई है. कंजर्वेशन बायोलॉजी नाम के साइंस जर्नल में छपे पेपर के मुताबिक इससे उन जानवरों के लिए भी जोखिम बढ़ा है जो पहले ही ख़तरे में हैं. असल में कश्मीरी बकरियां अपने ख़ाने के लिए दूसरे शाकाहारियों जैसे हिरण तिब्बती चिरु और हिमालयी भराल से होड़ करती हैं. दूसरे शाकाहारियों की तादाद में गिरावट की वजह से हिमालयी तेंदुए कश्मीरी बकरियों का शिकार करने पर मजबूर हुए हैं. कश्मीरी बकरियों के चरवाहे अपनी बकरियों को बचाने के लिए बर्फीले तेंदुओं का शिकार कर रहे हैं. इस शोध के लेखक चारुदत्त मिश्रा का कहना है कि कश्मीरी ऊन मध्य एशिया में स्थानीय समुदायों के लिए जीविका का बड़ा स्रोत है. चारुदत्त मिश्रा का मानना है कि चरवाहे अपनी रोज़ी-रोटी के लिए ये सब कर रहे हैं लेकिन कम अवधि का ये आर्थिक लाभ स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुंचा रहा है. चारुदत्त मिश्रा का कहना है कि कश्मीरी ऊन का उत्पादन नई बात नहीं है लेकिन बीते 20 सालों में इसकी मांग जबरदस्त तरीके से बढ़ी है. चारुदत्त मिश्रा का कहना है कि कश्मीरी ऊन से बने कपड़ों को लेकर जागरुकता लाने और स्थानीय समुदायों और अंतर्राष्ट्रीय खरीदारों को साथ लाने की ज़रूरत है ताकि जंगली और पालतू जानवर साथ आ सकें. |
| DATE: 2013-08-06 |
| LABEL: science |
| [328] TITLE: दुनिया में पहली बार लैब में बना बर्गर |
| CONTENT: लैब में बनाया गया दुनिया का पहला बर्गर पेश कर दिया गया है. लंदन में सोमवार को एक संवाददाता सम्मेलन में इस बर्गर को दुनिया के सामने न केवल रखा गया बल्कि खाकर भी दिखाया गया. इसके लिए वैज्ञानिकों ने नीदरलैंड के एक संस्थान में गाय की कोशिकाओं को मांसपेशियों में बदल दिया. इसी को मिलाकर खाने की ये चीज़ तैयार की गई है. अध्ययन से जु़ड़े लोगों का कहना है कि मांस की बढ़ती हुई माँग की ज़रूरत को पूरा करने के लिए यह लंबे समय तक कारगर होने वाला तरीका हो सकता है. हालांकि आलोचक कहते हैं कि मांस का कम सेवन करना खाने की चीजों की संभावित कमी से निपटने का बेहतर तरीका हो सकता है. इस योजना को गुप्त रूप से समर्थन करने वालों में गूगल के सहसंस्थापक सर्जेई ब्रिन शामिल हैं. ये बर्गर शेफ़ रिचर्ड मैकगोवान ने तैयार किया और फ़ूड क्रिटिक हानी रुइटज़लर और जोश श्कोनवर्लड ने इसे चखकर देखा. चखने के बाद हानी रुइटज़लर ने कहा मैं थोड़ी मुलायम पर्त की उम्मीद कर रही थी. ये मांस जैसा है लेकिन उतना रसीला नहीं है. नमक और काली मिर्च की कमी महसूस कर रही हूँ. वहीं जोश श्कोनवर्लड का कहना था मुँह में जाकर ये मांस जैसा लगता है. लेकिन उसमें जो चर्बी होती है वो नहीं है. बीबीसी न्यूज़ को बर्गर बनाने वाली प्रयोगशाला में जाने की विशेष इजाज़त दी गई. इसी प्रयोगशाला में 215000 पाउंड या दो करोड़ से भी ज़्यादा की परियोजना लागत से कृत्रिम मांस तैयार किया गया है. बर्गर परियोजना पर काम करने वाले मासट्रिक्ट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मार्क पोस्ट कहते हैं हम ये इसलिए कर रहे हैं क्योंकि पालतू जानवरों को पालना पर्यावरण के लिए अच्छा नहीं है. यह दुनिया की ज़रूरत भी पूरी नहीं करने जा रहा है और यह जानवरों के लिए भी अच्छा नहीं है. लेकिन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में फूड पॉलिसी रिसर्च नेटवर्क की प्रमुख प्रोफेसर तारा गार्नेट कहती हैं कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल लोगों को तकनीकी रास्तों के अलावा भी दूसरे विकल्पों की ओर देखना चाहिए. प्रोफेसर तारा गार्नेट कहती हैं हम ऐसे हालात का सामना कर रहे हैं जहाँ एक तरफ 1-4 अरब लोग अधिक वज़न और मोटापे से जूझ रहे हैं और वहीं दूसरी तरफ दुनिया भर में एक अरब लोग भूखे सोने जाते हैं. यह बहुत अजीब और अस्वीकार्य है. समस्या का समाधान यह नहीं है कि खाने की चीज़ो का ज्यादा उत्पादन किया जाए. इसके बजाय आपूर्ति के तौर तरीके को बदले जाने की ज़रूरत है. इसके अलावा खाने पीने की चीजें खरीदने की लोगों की क्षमता भी अहम है. इसलिए सवाल केवल खाने पीने की चीजों की अधिक ज़रूरत का ही नहीं है बल्कि ज़रूरतमंद लोगों को बेहतर गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थ मिलने का भी है. वैज्ञानिकों ने लैब में जो मांस बनाया है वह शुरुआत में सफेद रंग का होता है. प्रोफेसर पोस्ट के साथ काम कर रहे हेलेन ब्रीउड ने लैब में बनाए गए मांस को मायोग्लोबिन के ज़रिए लाल रंग का बनाने की कोशिश की है. हेलेन ब्रीउड कहती हैं अगर यह दिखने और खाने में सामान्य मांस के जैसा नहीं हुआ और यह है भी नहीं तो इसे एक बेहतर विकल्प के तौर पर नहीं अपानाया जा रहा है. हालांकि अभी इस परियोजना पर काम जारी है. सोमवार को दुनिया के सामने पेश किए गए बर्गर को चुकंदर के रस के जरिए लाल रंग का बनाया गया था. लैब में बर्गर बनाने वाली टीम ने इसके जायके में इजाफे के लिए इसमें ब्रेड का टुकड़ा भुनी हुई शक्कर और केसर भी मिलाया है. |
| DATE: 2013-08-05 |
| LABEL: science |
| [329] TITLE: ऐप जो बताती है स्तनपान के लिए आरामदेह जगह |
| CONTENT: हाल ही में माँ बनी महिलाएँ अब बच्चे को स्तनपान कराने के लिए सुविधाजनक जगह खोजने में स्मार्टफोन का सहारा ले सकती हैं. दरअसल टाइनसाइड ने एक ऐसा मोबाइल ऐप विकसित किया है जो नई माताओं के लिए स्तनपान कराने के लिहाज से आरामदेह जगहों की रेटिंग करता है. न्यूकैसल युनिवर्सिटी का यह फीड फाइंडर ऐप लोगों को अपने मिजाज़ के मुताबिक स्तनपान कराने के ख्याल से कैफे रेस्त्रां और दुकानों की रेटिंग करने का अवसर देता है. स्मार्टफोन पर इसका इस्तेमाल एक हाथ से किया जा सकता है. मोबाइल ऐप बनाने का मक्सद स्तनपान को जहाँ तक मुमकिन हो सके आसान और आरामदेह बनाना है. शुरुआत में इस ऐप को डिजाइन करते वक्त 30 माताओं की मदद ली गई थी. इन माताओं ने सार्वजनिक जगहों पर स्तनपान कराने से जुड़े अनुभवों को लेकर अपने विचार रखे जिनके आधार पर यह ऐप विकसित किया गया. ट्रिपएडवाइजर-स्टाइल ऐप माताओं से उनकी रेटिंग पाँच मुद्दों पर देने को कहता है. ये हैं आराम स्वच्छता बच्चे के लिए सुविधा और वो जगह उनकी जेब के अनुसार किस हद तक है. डॉक्टर मैडलिन बलाम ने अपनी टीम के साथ मिलकर यह ऐप विकसित किया है. न्यूकैसल युनिवर्सिटी में कम्प्यूटर विज्ञानी के तौर पर काम कर रही डॉक्टर बलाम स्वास्थ्य शिक्षा जैसे क्षेत्रों की जानकार मानी जाती हैं. इससे पहले वह एक ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रही थीं जिसमें पहली बार स्तनपान कराने जा रही नई माताओं को दूध पिलाने का तरीका सिखाया जा रहा था. उन्होंने कहा मैं जितनी माताओं से मिली हूँ उन्होंने मुझे बताया कि आखिर क्यों वे स्तनपान का आनंद नहीं ले पाती हैं. उन्हें लगता है कि ये जगह बहुत कटी हुई सी है. वह कहती हैं पहली बार माँ बनी महिलाएँ सार्वजनिक तौर पर स्तनपान कराने में असहज महसूस करती हैं. उन्हें यह तक नहीं पता होता है कि वे कहाँ जाएँ और कौन सी जगह स्तनपान कराने के लिहाज से अधिक सुविधाजनक होगी. कुछ महिलाओं ने तो यहाँ तक कहा कि माँ बनने के बाद पहले कुछ महीनों तक वे शायद ही कभी घर से बाहर निकलीं क्यों कि बच्चा बार बार दूध माँगता है. डॉक्टर मैडलिन बलाम के अनुसार इस मोबाइल ऐप का मक्सद उन माताओं की चिंताओं को कुछ हद तक कम करना था ताकि वे बच्चे के आने से पहले की तरह जिंदगी जी सकें. |
| DATE: 2013-08-05 |
| LABEL: science |
| [330] TITLE: वैज्ञानिकों ने की विलक्षण एंटीबायोटिक की खोज |
| CONTENT: अमरीकी वैज्ञानिकों ने कैलिफोर्निया के समुद्र तट की तलहटी में मिले माइक्रोऑर्गैज्म अति सूक्ष्मजीव से एक नया विलक्षण एंटीबायोटिक यौगिक प्राप्त किया है. विशेषज्ञों के अनुसार अब तक अज्ञात रहा यह एंटीबायोटिक विलक्षण है और मानव स्वास्थ्य को गंभीर ख़तरा पहुँचाने वाली दवाइयों के प्रतिरोधक के रूप में काम कर सकता है. अमरीकी वैज्ञानिकों के अनुसार एंथ्रासिमाइसीन नामक यह नया यौगिक एमआरएसए और एंथ्रैक्स जैसी बीमारियों के इलाज में कारगर हो सकता है. एमआरएसए एक बैक्टीरिया जीवाणु है जो संक्रमण वाली कई प्रकार की बीमारियों के लिए ज़िम्मेदार होता है. इस खोज का विस्तृत विवरण जर्मन शोधपत्र एंगेवैंड्ट केमी में प्रकाशित हुआ है. यह यौगिक जिस स्ट्रेप्टोमाइसेस बैक्टीरिया से निकाला गया है उसे क्रिस्टोफर कॉफ़मैन ने प्रशांत महासागर की तलहटी से प्राप्त किया था. इस यौगिक की विशिष्ट रासायनिक संरचना नई तरह की एंटीबायोटिक दवाइयों के विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं. यूएस सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के निदेशक थॉमस फ्रीडेन ने हाल ही में एंटीबायोटिक का असर कम करने वाले बैक्टीरिया के बढ़ते ख़तरे से आगाह किया था. इंग्लैंड के मुख्य चिकित्सा अधिकारी सैली डेवीस ने इस तरह के बैक्टीरिया की तुलना टाइमबम से करते हुए कहा था कि इस बैक्टीरिया से राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा है. इनफेक्शस डिज़ीज़ सोसाइटी ऑफ अमरीका ने चिंता जताते हुए कहा है कि एंटीबायोटिक के प्रभाव को कम करने वाले बैक्टीरिया की रोकथाम पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है. ऐसी स्थिति में यह नई खोज एक बड़ी खुशख़बरी है. इस शोधपत्र का प्रकाशन करने वाले कियांग ह्वा जैंग और उनके साथियों ने एंथ्रासिमाइसीन की संरचना का विवरण देते हुए कहा है कि इसकी संरचना पहले से ज्ञात किसी भी प्राकृतिक एंटीबॉयोटिक की संरचना से पूरी तरह भिन्न है. शोधकर्ताओं की इस टीम के अगुआ विलियम फेनीकल ने कहा इस शोध का असली महत्व यह है कि एंथ्रासिमाइसीन की रासायनिक संरचना बिल्कुल ही नई और विशिष्ट है. नए रासायनिक यौगिक की खोज एक विलक्षण परिघटना होती है. इस खोज से इस बात की पुष्टि हुई है कि समुद्र में पाए जाने वाले बैक्टीरिया आनुवंशिक और रासायनिक रूप से विशिष्ट होते हैं. इस खोज से इस बात को बल मिला है कि समुद्र में अभी भी ऐसे बहुत से पदार्थ और यौगिक हैं जिनका व्यापक उपयोग हो सकता है. |
| DATE: 2013-08-05 |
| LABEL: science |
| [331] TITLE: अंतरिक्ष में अकेलेपन का साथी बनेगा बोलने वाला रोबोट |
| CONTENT: जापान ने दुनिया का पहला बोलने वाला रॉकेट अंतरिक्ष में भेजा है. इस रॉकेट को अंतरिक्षयात्री कोचि वकाटा के साथी के रूप में अंतरिक्ष में भेजा गया है. वकाटा का अंतरिक्ष अभियान नवंबर से शुरू होगा. किरोबो नाम के इस रोबोट को अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन आईएसएस में काम कर रहे अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सामान लेकर जा रहे एक अनाम रॉकेट से अंतरिक्ष भेजा गया. 13 इंच के किरोबो ने जापान के तानेगाशिमा द्वीप से उड़ान भरी. वह 9 अगस्त को आईएसएस पहुंच जाएगा. किरोबो एक शोध का हिस्सा है जिसके तहत यह देखा जाना है कि लंबे समय तक अकेले रहने वाले लोगों को मशीनें किस तरह से भावनात्मक सहारा दे सकती हैं. एच-2बी रॉकेट के लॉंच का जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेन्सी जाक्सा द्वारा सीधा प्रसारण किया गया. यह अनाम रॉकेट आईएसएस पर काम कर रहे छह स्थाई कर्मचारियों के लिए पीने का पानी खाना कपड़े और काम के उपकरण लेकर गया है. किरोबो नाम उम्मीद और रोबोट के लिए जापानी शब्दों से बनाया गया है. इस छोटे से मानवरूपी रोबोट का वज़न करीब एक किलो है और यह कई तरह की शारीरिक हरकतें कर सकता है. इसके डिज़ाइन की प्रेरणा मशहूर एनिमेटेड कैरेक्टर एस्ट्रो बॉय से ली गई है. किरोबो को जापानी में बात करने के लिए तैयार किया गया है. वह वटाका के साथ होने वाली अपनी बातचीत का रिकॉर्ड भी रखेगा. वटाका इस साल आईएसएस के कमांडर का पदभार संभालेंगे. इसके अलावा किरोबो कंट्रोल रूम से मिलने वाले संदेश भी अंतरिक्षयात्री को देगा. इस रोबोट को बनाने वाले टोमोटाका टाकाहाशी के अनुसार किरोबो वटाका के चेहरे को याद रखेगा ताकि जब वह अंतरिक्ष में मिलें तो वह उन्हें पहचान सके. वह कहते हैं मैं उम्मीद करता हूं कि यह रोबोट एक आदमी और मशीन के बीच मध्यस्थ का काम करेगा. या फिर एक आदमी और इंटरनेट के बीच और कभी-कभी आदमियों के बीच भी. टाकाहाशी कहते हैं कि सबसे मुश्किल काम रोबोट को अंतरिक्ष में काम करने योग्य बनाना था. नौ महीने से ज़्यादा समय तक किरोबो की विश्वसनीयता को परखने के लिए उस पर दर्जनों परीक्षण किए गए. किरोबो का एक जुड़वा रोबोट मिराटा धरती पर है. वह अपने जोड़ीदार में अंतरिक्ष में होने वाली किसी भी इलेक्ट्रॉनिक गड़बड़ी पर नज़र रखेगा. पिछले महीने अभियान के दौरान मिराटा ने कहा था मेरे लिए यह एक छोटा कदम है लेकिन रोबोटों के लिए यह एक बड़ी छलांग है. यह रोबोट टाकाहाशी कार निर्माता टोयोटा और विज्ञापन कंपनी डेन्ट्सू का एक संयुक्त उद्यम है. |
| DATE: 2013-08-04 |
| LABEL: science |
| [332] TITLE: किडनी की रक्षा करेगा अल्ट्रासाउंड |
| CONTENT: अक्सर ऐसा देखा जाता है कि कुछ मामलों में गंभीर किस्म की सर्जरी के बाद किडनी की तकलीफ की संभावना रहती है. अब अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि किडनी खराब होने के ऐसे मामलों की रोकथाम में अल्ट्रासाउंड तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकेगा. जर्नल ऑफ दि अमरीकन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी में प्रकाशित इस शोध के मुताबिक यह प्रयोग चूहे पर किया गया था. लेकिन अनुसंधान से जुड़े लोगों ने कहा है कि किडनी की तकलीफों का इलाज साधारण और पहले से तयशुदा होने की वजह से मानव अध्ययनों में तेजी से बदलाव हो सकता है. जानकारों के मुताबिक यह अध्ययन इलाज के नए तरीकों पर रोशनी डाल सकता है. एक्यूट किडनी इंज्यूरी किडनी की तकलीफ की उस अवस्था को कहते हैं जब वह अचानक काम करना बंद कर दे. इस समस्या का सामना किसी भी ऐसे बीमार आदमी को करना पड़ सकता है जो न्यूमोनिया या डायरिया से संक्रमित हो या जिसे दिल का दौरा पड़ा हो. दिल के ऑपरेशन जैसी किसी गंभीर सर्जरी के बाद एक्यूट किडनी इंज्यूरी की तकलीफ हो सकती है. इसकी वजह यह है कि ऑपरेशन के दौरान किडनी को मिलने वाला सामान्य रक्त प्रवाह रुक जाता है. एक बार इस तकलीफ के हो जाने पर इलाज के कुछ ही विकल्प उपलब्ध है. युनिवर्सिटी ऑफ वर्जिनिया की एक टीम ने एक चूहे की अल्ट्रासाउंड मशीन से सामान्य जाँच की. जाँच से 24 घंटे पहले उसके किडनी में खून की आपूर्ति रोक दी गई थी और उसे अनस्थीसिया बेहोश करने वाली मे़डिकल प्रक्रिया दिया जा चुका था. उन्होंने पाया कि रक्त की आपूर्ति बहाल कर दिए जाने के बाद भी चूहे का किडनी स्वस्थ अवस्था में था. लेकिन जब यह तरीका एक अन्य चूहे पर अपनाया गया और उसका अल्ट्रासाउंड ठीक से नहीं किया गया तो शोध कर रही टीम ने देखा कि उसके किडनी को होने वाले रक्त प्रवाह को रोकने से उसकी किडनी को बड़ा नुकसान हुआ. शोध से जुड़े लोगों का कहना है कि अल्ट्रासाउंड जाँच से शरीर में कुछ ऐसे बदलाव होते हैं जिनसे किडनी का बचाव होता है. अध्ययन का नेतृत्व करने वाले डॉक्टर मार्क ओकुसा कहते हैं हमने ऐसी अल्ट्रासाउंड तकनीक इस्तेमाल की थी जिनसे नुकसान कम होता हो. इससे मिले नतीजों से हमें पता चला है कि यह एक्यूट किडनी इंज्यूरी की रोकथाम में आसान प्रभावशाली विषहीन और कारगर तरीका है. उन्होंने कहा जहाँ तक हमें पता है कोशिकाओं और उत्तकों के बचाव के मामले में ऐसी कोई बात पहले कभी सामने नहीं आई है. डॉक्टर मार्क ओकुसा कहते हैं हमें संदेह है कि जिस वजह से एक्यूट किडनी इंज्यूरी की समस्या होती है वही कारण फेफड़े दिल और जिगर से जुड़ी तकलीफों के पीछे भी हो सकते हैं. यह तरीका शरीर के अन्य अंगों से जुड़ी तकलीफों से बचाव में भी कारगर हो सकता है. यह दिलचस्प हैं. |
| DATE: 2013-08-04 |
| LABEL: science |
| [333] TITLE: साबुन-पानी से बढ़ेगी बच्चों के विकास की गति |
| CONTENT: साफ़ पानी और साबुन न सिर्फ़ स्वच्छता को बढ़ाते हैं बल्कि यह बच्चों के विकास में भी तेजी ला सकते हैं. दुनिया भर से एकत्र किए गए आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि बेहतर सफ़ाई वाले घरों में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की ऊंचाई 0-5 सेंटीमीटर तक बढ़ी है. ये अध्ययन बांग्लादेश इथियोपिया नाइजीरिया चिली ग्वाटेमाला पाकिस्तान नेपाल दक्षिण अफ्रीका केन्या और कंबोडिया में किए गए. विश्व भर में 26-50 करोड़ बच्चे विकास की कमी से जूझ रहे हैं जिनका स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर पड़ता है. लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन एलएसएचटीएम और इंटरनेशनल चैरिटी वाटरएड की देखरेख में करीब 10000 बच्चों पर किए गए 14 शोधों से हासिल तथ्यों का विश्लेषण किया गया जिसे कोक्रेन रिव्यू कहा जा रहा है. एलएसएचटीएम में आम लोगों के स्वास्थ्य व आहार विज्ञानी डॉक्टर एलन डेन्गोर कहते हैं कि साफ़ पानी सफ़ाई व्यवस्था और स्वच्छता प्रदान कर डायरिया जैसी बीमारियों से होने वाली मौतों को टाला जा सकता है. वह कहते हैं कि पहली बार विश्लेषकों ने यह कहा है कि इन सुविधाओं का बच्चों के विकास पर थोड़ा लेकिन महत्वपूर्ण पड़ता है. उन्होंने बीबीसी से कहा इन सभी प्रमाणों को साथ लाने से पहली बार यह लग रहा है कि इन सुविधाओं से बच्चों का विकास बेहतर हो सकता है और यह बहुत महत्वपूर्ण बात है. वह कहते हैं गंदा पानी पीने से बच्चे को डायरिया हो जाता है जिसका विकास पर दुष्प्रभाव पड़ता है. क्योंकि बचपन में बार बार बीमार पड़ना आपके विकास को प्रभावित कर सकता है. डॉक्टर डेंगोर ने कहा गंदे पानी डायरिया और विकास के बीच संबंध पूरी तरह समझ आता है लेकिन मज़ेदार बात यह है कि इसे पहले दर्शाया नहीं गया. वह कहते हैं आधा सेंटीमीटर बहुत ज़्यादा नहीं लगता लेकिन हमारा अनुमान है कि यह वृद्धि बौनेपन में 15 तक कमी ला सकती है और यह बहुत महत्वपूर्ण है. विश्व स्वास्थ्य संगठन में स्वास्थ्य और विकास के लिए पोषण के निदेशक डॉक्टर फ्रांसेस्को ब्रांका कहते हैं इस विश्लेषण से पता चलता है कि इस क्षेत्र में कई तरह से दिशा में काम करने की ज़रूरत है. दीर्घकालिक कुपोषण के अभिशाप से मुक्ति पाने के लिए खाने की गुणवत्ता और सुरक्षा को बढ़ाने बच्चों के खाने और देखरेख के साथ ही संक्रमणों का इलाज करने घरों का माहौल बेहतर बनाने पर साथ-साथ काम करने की ज़रूरत है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लंबाई बढ़ने की कमी या बौनेपन से दुनिया भर में 16-5 करोड़ बच्चे प्रभावित हैं. इससे मौत और जवानी में उत्पादकता में कमी का ख़तरा बढ़ जाता है. हर साल अल्पपोषण की वजह से 30 लाख से ज़्यादा मौत होती हैं. यह आंकड़ा पांच साल से पहले मरने वाले बच्चों की संख्या का आधा है. |
| DATE: 2013-08-04 |
| LABEL: science |
| [334] TITLE: आख़िर क्या है फॉरेंसिक जाँच ? |
| CONTENT: जब भी कोई वारदात होती है तो उसके सभी पहलुओ की जाँच करने में सबसे ज़्यादा मददगार होती है फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट. बिहार में सरकार की मिड डे मील योजना के तहत मिलने वाले विषाक्त भोजन खाने से बच्चों की मौत हो गई. फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट में पाया कि खाने में ज़हर था. तो आख़िर फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट इतनी अहम क्यों है और फ़ॉरेंसिक जांच आख़िर क्या है नमूनों का विश्लेषण किया जाता है . पोस्टमॉर्टम होने के बाद भी कुछ नमूने रखे हैं. जैसे विसरा संभाल कर रखा जाता है और उसका विश्लेषण अलग से होता है. वारदात के अनुसार कारवाई होती है. जैसे ज़हर दिए जाने की वारदात हुई है तो इसमें सामान रखने के कंटेनर्स को भी लिया जाता है. पीड़ित से गैस्ट्रिक लावास नाम का एक नमूना लिया जाता है और इन सभी का रासायनिक विश्लेषण किया जाता है. मान लीजिए कि भोजन में कीटनाशक मिले होंने का शक हो तो फ़ॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी वाले रासायनिक विश्लेषण करते हैं तो वे वैसे ज़हर की जांच करते हैं जिसके बारे में आमतौर पर जानकारी नहीं होती है. इनसे जुड़ी एक पूरी सूची होती है और कीटनाशक भी उसी सूची में से एक है. रिपोर्ट फ़ॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी में बनती है. जिन मामलों में पोस्टमॉर्टम किया गया था उसमें इस रिपोर्ट को मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी को दी जाती है. पुलिस अधिकारी इस रिपोर्ट की एक प्रति डॉक्टर के पास भेजकर पूछेगा कि आख़िरकार मौत किस वजह से हुई वह डॉक्टर फिर रिपोर्ट देख कर इसका जवाब बताएगा. जिन मामलों में पोस्टमॉर्टम नहीं किया गया था वह रिपोर्ट भी जांच कर रहे अधिकारी के माध्यम से अदालत में जाएगी. रिपोर्ट को सीधे अदालत में नहीं भेजा जा सकता. एक नमूने की जाँच के लिए फ़ॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी को दो से तीन दिन का समय लग सकता है जिसमे वो सारे अनाम ज़हर की जांच करते हैं. अब यह इस पर निर्भर करता है कि लैबोरेटरी में कितने कर्मचारी हैं. इसके अनुसार वह सारे नमूनों की जांच भी एक साथ कर सकते हैं और एक-एक करके भी. पूरे मामले की जांच किस तेज़ी से होगी यह इसी बात पर निर्भर करता है. लेकिन एक नमूने की जांच के लिए दो से तीन दिन लगते ही हैं. |
| DATE: 2013-08-03 |
| LABEL: science |
| [335] TITLE: भारत: ब्रह्मांड के दूसरे छोर तक झांकेगी सबसे बड़ी दूरबीन |
| CONTENT: सर्न की महत्वाकांक्षी परियोजना लार्ज हैड्रान कोलाइडर के बाद एक बार फिर भारतीय वैज्ञानिक एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय परियोजना– थर्टी मीटर टेलीस्कोप टीएमटी में महत्वपूर्ण योगदान करने जा रहे हैं. इस परियोजना के तहत पांच देश कनाडा चीन भारत जापान और अमरीका दुनिया की सबसे बड़ी दूरबीन बनाएंगे. इस परियोजना की लागत करीब 1-4 अरब डालर है और इसमें भारत लगभग 14 करोड़ डालर यानी 10 प्रतिशत योगदान करेगा. इस दूरबीन के लिए भारत का 75 प्रतिशत योगदान इसके कलपुर्जों का डिजायन तैयार करने और दूरबीन के लिए साफ्टवेयर तैयार करने के रूप में होगा जबकि शेष 25 प्रतिशत राशि नकद दी जाएगी. इस दूरबीन को हवाई में स्थापित किया जाएगा. सुदूर तारों और आकाशगंगा की पड़ताल करने के लिए वर्तमान दूरबीनों की भी अपनी सीमा है. टीएमटी के जरिए ब्रह्मांड का अध्ययन ऐसे किया जा सकेगा जैसा इससे पहले कभी नहीं हुआ और विज्ञान की कई बड़ी चुनौतियों के जवाब खोजे जा सकेगा. इस दूरबीन के काम शुरू करने के बाद वैज्ञानिक ब्रह्मांड की उत्पत्ति सहित अन्य रहस्यों से पर्दा हटा सकेगा. इसके इस्तेमाल से वैज्ञानिक कॉस्मिक डार्क एज के अंत से लेकर पहले तारे की उत्पत्ति पुन आयनीकरण और आकाशगंगा की उत्पत्ति के युग के बारे में जानकारी हासिल कर सकेंगे. इसके अलावा टीएमटी से सौर मंडल के बारे में हमारी जानकारी अधिक बेहतर होगी. भारत सरकार ने भारतीय एस्ट्रोफिजिक्स संस्थान आईआईए को इस परियोजना के लिए नोडल एजेंसी बनाया है और संस्थान के निदेशक पी. श्रीकुमार परियोजना का समन्वय कर रहे है. आईआईए के अलावा पुणे स्थित इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स आईयूसीसीए और नैनीताल स्थित आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंस भी इस परियोजना में योगदान देंगे. टीएमटी के गवर्निंग बोर्ड को अध्यक्ष हेनरी यंग ने कहा है कि बुनियादी शोध के लिहाज से भारत महत्वपूर्ण देश है और उसकी प्रतिष्ठा जगज़ाहिर है और यह उनके लिए खुशी की बात है कि भारत इस परियोजना का साझेदार है. जैसा कि इस दूरबीन के नाम से ही पता चलता है इसमें 30 मीटर व्यास के लेंस का इस्तेमाल किया जाएगा जिसकी क्षमता इस समय मौजूद सबसे बड़ी दूरबीन के मुकाबले नौ गुनी होगी. बड़े आकार के बावजूद टीएमटी को ज़मीन पर स्थापित किया जाएगा और यह अंतरिक्ष में स्थित दूरबीनों के मुकाबले अधिक शक्तिशाली होगी. इस दूरबीन का निर्माण अगले साल शुरू होगा और उम्मीद है कि 2022 तक यह काम करने लगेगी. इंडिया टीएमटी के कार्यक्रम निदेशक बी ईश्वर रेड्डी ने बताया है कि कई भारतीय कंपनियों ने टीएमटी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में दिलचस्पी दिखाई है. पांडिचेरी स्थित जनरल ऑप्टिक्स एशिया लिमिटेड के साथ समझौता किया जा चुका है जबकि गेदरेज सहित कुछ अन्य भी इस परियोजना के लिए कलपुर्जों की आपूर्ति करेंगी. |
| DATE: 2013-08-03 |
| LABEL: science |
| [336] TITLE: हत्या और बलात्कार का रिश्ता मौसम से? |
| CONTENT: शोध पत्रिका साइंस में प्रकाशित एक शोध के अनुसार दुनिया में हिंसा के घटने-बढ़ने और जलवायु परिवर्तन में सीधा संबंध है. अमरीकी वैज्ञानिकों के दल ने अपने शोध में पाया है कि तापमान गिरने या बारिश होने जैसे मामूली जलवायु परिवर्तन का भी हिंसा बलात्कार हत्या समूहों के बीच टकराव और युद्ध से सीधा संबंध हो सकता है. वैज्ञानिकों के इस दल का अनुमान है कि वैश्विक तापमान में दो सेंटीग्रेड की बढ़ोत्तरी होने पर व्यक्तिगत हिंसा के 15 प्रतिशत और सामूहिक हिंसा के 50 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना रहती है. वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन की वर्तमान स्थिति देखते हुए पूरी दुनिया के और ज़्यादा हिंसक होने की संभावना है. इस शोध से जुड़े कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय बर्कले के मार्शल बर्क कहते हैं अपने निरीक्षण के दौरान हमने कई काल खंडों और कई प्रमुख महाद्वीपों का अध्ययन किया. हमने पाया कि जलवायु परिवर्तन और हिंसा के बीच गहरा संबंध है. इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने पूरी दुनिया में कई सौ सालों के आंकड़ों के आधार पर किए गए 60 से ज़्यादा अध्ययनों की पड़ताल की. इस शोध में सूखे के दौरान भारत में घरेलू हिंसा में बढ़ोत्तरी और अमरीका में लू चलने के दौरान छीनाझपटी बलात्कार और हत्या के मामले में बढ़ोत्तरी के मामलों का उदाहरण दिया गया है. साइंस जर्नल में प्रकाशित इस शोध में इस बात की ओर भी इशारा किया गया है कि यूरोप में होने वाली नस्लीय टकराहटों और अफ्रीका में होने वाले गृहयुद्ध का बढ़ते हुए तापमान से अंतर्संबंध है. वैज्ञानिकों का यह दल अब इस बात का अध्ययन कर रहा है कि जलवायु परिवर्तन और हिंसा में परिवर्तन के संबंध के पीछे कौन से कारण हैं. मार्शल बर्क कहते हैं हम पूरी सावधानी के साथ इस परिघटना का अध्ययन कर रहे हैं. हम किसी खास घटना को मौसम में होने वाले किसी खास परिवर्तन से नहीं जोड़ सकते लेकिन हमें जो परिणाम प्राप्त हुए हैं वो रुचिकर हैं. हमारे पास जो दस्तावेज हैं उनसे कुछ अनुमान लगाए जा सकते हैं. जलवायु परिवर्तन का एक खास संबंध आर्थिक स्थिति से दिखता है. हम जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन का पूरी दुनिया की आर्थिक स्थिति पर फर्क पड़ता है खास तौर पर उन समाजों में जिनकी अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है. हमारे पास इस बात के भी पर्याप्त सबूत हैं कि लोगों के किसी विद्रोह में हिस्सेदारी के निर्णय और उनकी आर्थिक स्थिति के बीच सीधा संबंध होता है. मार्शल बर्क के अनुसार इन परिवर्तनों का आधार जलवायु परिवर्तन के कारण शरीर में आने वाले बदलाव भी हो सकते हैं. कुछ अध्ययनों में इस बात की ओर इशारा किया गया है कि गर्मी बढ़ने पर लोगों के हिंसक होने की संभावना बढ़ जाती है. वैज्ञानिक अपने शोध के अगले चरण में जलवायु में होने वाले विशेष परिवर्तनों का समाज में पड़ने वाले विशेष प्रभावों का अध्ययन करेंगे. हालाँकि अन्य वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन और हिंसा में बढ़ोत्तरी के बीच किसी तरह के अंतर्संबंध होने के अनुमान पर शंका जताई है. नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस से प्रकाशित प्रपत्र में कहा गया है कि अफ्रीका में हुए गृहयुद्ध का जलवायु परिवर्तन से कोई संबंध नहीं था. नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस के अनुसार अफ्रीका के गृह युद्ध का जलवायु परिवर्तन से ज़्यादा संबंध शिशु मृत्यु दर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से निकटता तथा उच्च जनसंख्या घनत्व दर से था. |
| DATE: 2013-08-02 |
| LABEL: science |
| [337] TITLE: फ़ोन जो आपकी आवाज़ सुनकर करेगा बात |
| CONTENT: गूगल के स्वामित्व वाली मोटोरोला ने एक ऐसा फ़ोन लॉन्च किया है जो ऑलवेज़ लिसनिंग यानी हमेशा फ़ोन मालिक की आवाज़ के इशारों पर काम करता है. मोटो एक्स नाम से लॉन्च हुआ ये फ़ोन टच स्क्रीन वाला फ़ोन नहीं है बल्कि सुनकर कमांड लेता है. इस फ़ोन का निर्माण अमरीका में किया जाएगा. इसे उपभोक्ताओं की ज़रूरतों के अनुकूल बनाने के लिए इसमें तमाम विकल्प दिए गए हैं. इंटरनेट के क्षेत्र में शीर्ष कंपनी गूगल ने पिछले साल मोटोरोला को 12-5 अरब डॉलर में खरीद लिया था. उसके बाद से मोटोरोला ने ये पहला उत्पाद पेश किया है. मोबाइल फ़ोन उद्योग के विश्लेषकों का कहना है कि मोटो एक्स के बाज़ार में आने से एंड्राएड ऑपरेटिंग सिस्टम के बाज़ार पर असर पड़ेगा क्योंकि कई दूसरे फ़ोन निर्माता गूगल के इस ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं और वो मुनाफ़े के लिए संघर्ष कर रहे हैं. मोटो एक्स का हार्डवेयर अमरीका के टेक्सास में एक नए प्लांट में बनाया जाएगा. कई कंपनियां अब मेड इन यूएसए को भुनाने की दिशा में काम कर रही हैं और मोटोरोला भी अब उनमें शामिल हो गई है. पिछले साल मई में मोटोरोला का स्वामित्व गूगल के पास आने के बाद से मोटो एक्स पहला ऐसा फ़ोन है जिसे कंपनी ने पूरी तरह खुद डिज़ाइन किया है. हालांकि गूगल के नियंत्रण में आने के बाद मोटोरोला ने कुछ अन्य हैंडसेट बाज़ार में उतारे हैं लेकिन उन पर पहले से ही काम चल रहा था. मतलब ये कि मोटो एक्स एक ऐसा फ़ोन है जिसे गूगल की मोबाइल फ़ोन को लेकर बाज़ार रणनीति के संकेतक के रूप में देखा जा रहा है. मार्केट इंटेलिजेंस फर्म आईडीसी के मोबाइल फ़ोन विश्लेषक फ़्रांसिस्को जरोनिमो का कहना है कि कंपनी ने फ़ोन की नियंत्रण प्रणाली की मूलभूत अवधारणा को बदलने की कोशिश की है. बोलकर फ़ोन को कमांड देना एक अलग अनुभव है. यूज़र्स को इसमें बड़ा स्क्रीन मिलता है वॉयस कंट्रोल है. इसलिए उपभोक्ता अगर इसकी ओर आकर्षित होते हैं तो उसकी सबसे बड़ी वजह होगी मौजूदा स्मार्ट फ़ोन से अलग नया अनुभव. मेरे हिसाब से ये अगले साल के सबसे बड़े मोबाइल ट्रेंड में से एक होगा. जरोनिमो बताते हैं वॉयस कमांड सिस्टम वाले दूसरे फ़ोन में पहले एक बटन दबाना होता है फिर आप कमांड दे सकते हैं. लेकिन इस ऑपरेटिंग सिस्टम में आपको पहले सिर्फ ये बोलना होगा - ओके गूगल नाउ. और फिर अपना कमांड देना होगा फ़ोन कमांड के अनुसार काम करने लगेगा. ये वाक़ई बेहद आसान होगा. मोटो एक्स के लॉन्च ने एक बार फिर गूगल और सैमसंग के कारोबारी रिश्ते को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. सैमसंग गूगल के एंड्रॉएड ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल करने वाली सबसे प्रभावी कंपनी है लेकिन अब इस नए फ़ोन से होने वाली संभावित प्रतिस्पर्धा को लेकर दोनों कंपनियों के बीच तनाव बढ़ सकता है. जेरोनिमो कहते हैं एंड्रॉएड ऑपरेटिंग सिस्टम का पूरी दुनिया में होने वाले इस्तेमाल का 60 फ़ीसदी अकेले सैमसंग करती है. एक तरह से गूगल और सैमसंग कारोबारी हित को देखते हुए एक-दूसरे पर निर्भर हैं. ऐसे में मोटो एक्स के बाज़ार में आने के साथ गूगल की कोशिश ये होगी कि ये सफल साबित हो और अगर ऐसा होता है तो सैमसंग के बाज़ार पर उसका असर होगा. शायद इसी चुनौती को भांपते हुए पिछले हफ्ते ही सैमसंग ने घोषणा की कि जल्दी ही वो विशेषज्ञों का एक सम्मेलन आयोजित करेगा जिसमें तमाम सॉफ्टवेयर डेवलपर्स हिस्सा लेंगे. मोटोरोला का कहना है कि मोटो एक्स को अमरीका कनाडा और लैटिन अमरीका के बाज़ार में अगस्त के अंत या सितंबर की शुरुआत में उतारा जाएगा. दो साल के कॉन्ट्रैक्ट डील के तहत ख़रीदे जाने पर इसकी क़ीमत होगी 199 डॉलर. |
| DATE: 2013-08-02 |
| LABEL: science |
| [338] TITLE: कृत्रिम कान बनाने में कामयाबी |
| CONTENT: अमरीकी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि वे मरीज की कोशिकाओं की मदद से पूरा का पूरा मानव कान बनाने के करीब पहुंच गए हैं. कोशिका इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नए शोधों के तहत अब इंसान या जानवरों की कोशिकाओं से मानव कान बनाना संभव होगा. बॉस्टन के मैसाच्यूसेट्स जनरल हॉस्पीटल के शोधकर्ताओं के मुताबिक कृत्रिम तौर पर बना कान पूरी तरह से वास्तविक कान जैसा ही होगा. इस तकनीक के ज़रिए एक दिन उन लोगों की मदद की जा सकेगी जिनके या तो कान नहीं हैं या फिर कान ख़राब हो चुके हैं. कोशिका इंजीनियरिंग चिकित्सा विज्ञान का तेज़ी से उभरता क्षेत्र है जिसके तहत प्रयोगशालाओं में इंसानी अंगों को विकसित करने की कोशिश की जा रही है. अमरीकी शोधकर्ताओं की टीम अगर कृत्रिम कान को आम प्रयोग में लाने में कामयाब हो जाती है तो इससे निश्चित तौर पर उन लोगों को काफी मदद मिलेगी जो किसी दुर्घटना में अपने कान गंवा चुके हैं या जन्म से कान की अपंगता के शिकार हैं. इससे पहले शोधकर्ताओं ने बेबी साइज के कृत्रिम कान बनाने में कामयाबी हासिल की थी. बहरहाल ये नया शोध जर्नल ऑफ़ द रॉयल सोसायटी इंटरफेस में प्रकाशित हुआ है जिसमें बताया गया है कि गाय और भेड़ की कोशिकाओं से वे त्रि आयामी वास्तविक इंसानी कान बनाने में कामयाबी मिली है. इस कान को विकसित करने के बाद उसे चूहे में लगाया गया है. इस शोध अध्ययन दल के प्रमुख डॉक्टर थॉमस केरवांट्स ने बीबीसी न्यूज़ को बताया हमने चूहे के मॉडल पर पहली बार पूरी तरह वयस्क कान को प्रदर्शित किया है. केरवांट्स के मुताबिक यह प्रयोग कई कारणों से बेहद अहम साबित हुआ है. उन्होंने कहा हमने देखा कि कान अपने स्वरूप में बढ़ रहा है जो हमने 12 सप्ताह पहले चूहे में लगाया था. दूसरी अहम बात ये है कि कान में प्राकृतिक तौर पर लचीलापन भी देखने को मिल रहा है. दरअसल इस प्रयोग के दौरान कोशिकाओं को टाइटेनियम से बने कान की बनावट वाले बॉक्स में विकसित किया गया है. इस प्रयोग में सैद्धांतिक तौर पर ये भी स्पष्ट हुआ है कि कोशिकाओं को पूरी तरह से इंसानी कान के तौर पर विकसित किया जा सकता है. डॉक्टर कारवेंट्स कहते हैं क्लिनिकल प्रयोग में हम मरीज़ की कुछ लचीली हड्डी को लेकर उसे इस तरह से विकसित करेंगे कि कान तैयार हो जाए. यह अनुसंधान कोशिका इंजीनियरिंग के ज़रिए कान बनाने की दिशा में अहम क़दम साबित हुआ है. शोध दल के मुखिया डॉक्टर कारवेंट्स ने उम्मीद जताई है कि इस प्रयोग की मदद से आने वाले पाँच सालों में मानव का कान बनाना संभव होगा. मानवों के दूसरे अंगों के लिए बायो इंजीनियरिंग के दूसरे प्रयोग भी तेज़ी से किए जा रहे हैं. करीब एक दर्जन मरीजों में कृत्रिम गले की पाइप का प्रतिरोपण किया गया है जबकि प्रयोगशाला में किडनी को भी विकसित किया जा रहा है. एक चूहे में विकसित हो रही किडनी में मूत्र का बनना भी शुरू हो गया है. |
| DATE: 2013-08-01 |
| LABEL: science |
| [339] TITLE: क्या हमेशा खाता ही रहता है आपका लाडला? |
| CONTENT: ज़्यादातर बच्चे खाना पसंद करते हैं लेकिन कुछ बच्चों को जितना खिलाओ कम होता है. वो हर वक़्त खाना ही चाहते हैं जिससे उनके माता-पिता के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है. ऐसा ही एक उदाहरण एमिली वास्तविक नाम नहीं की चार साल की बेटी का है जो काफ़ी खाती है. एमिली ने बताया एकदम सुबह की बात है. मुझे अपने फ्रीज़र डोर अलार्म की आवाज़ सुनाई दी. मैं किचन में गई. देखा कि मेरी बेटी फ़्रॉज़ेन आलू केक खा रही थी. एमिली बताती हैं कि उन्होंने अब यह मान लिया है कि घर में जो भी खाद्य पदार्थ होगा उनकी बेटी उसे खा लेगी. वह कहती हैं कि एक ऐसा बच्चा जिसे हर वक़्त खाने की मज़बूरी हो उसकी माँ बनना काफी जटिलता भरा है. बच्चों की खाने संबंधी आदतें अक्सर ख़बरों में रहती है. हाल में ख़बर आई थी कि पिछले एक दशक में मोटापे के चलते अस्पताल में भर्ती होने वाले बच्चों और किशोरों की तादाद चार गुनी बढ़ गई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि हर व्यक्ति की भूख अलग-अलग होती है. इंपीरियल कॉलेज ऑफ लंदन के मोटापा रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर स्टीफ़न ब्लूम का कहना है हम सभी के शरीर का आकार-प्रकार अलग होता है. आप बाहर से कहते हैं कि हर व्यक्ति अलग है. ठीक ऐसा ही हमारे शरीर के भीतर भी है. प्रोफेसर स्टीफ़न ब्लूम ने इंसान के शरीर की भूख नियंत्रण प्रणाली पर काफ़ी अध्ययन किया है. बहुत कम खाने वाले और बहुत ज़्यादा खाने वाले दोनों तरह के बच्चे हैं. मिशेल वास्तवित नाम नहीं बताती हैं कि उनका 11 साल का बेटा हमेशा भूखा रहता है. उसके खानपान का इंतज़ाम करना काफ़ी जटिल और थकाऊ है. वह बताती हैं इतना भूखा होने के कारण आप अक्सर अपने बच्चे से परेशान रहते हैं और ग़ुस्सा भी हो जाते हैं लेकिन मैं नहीं सोचती कि इसके लिए किसी को दोषी ठहराया जा सकता है. उन्होंने कहा मेरे बच्चे के साथ कुछ ग़लत नहीं है. खाने को लेकर कोई चिकित्सकीय दशा या मसला नहीं है. वह वास्तव में भूखा है न कि लालची. मैं ख़ुद को भी दोषी नहीं ठहराती क्योंकि मैं उसे पोषक आहार देने का हरसंभव प्रयास करती हूँ. मिशेल के मुताबिक़ इस समय उसका वज़न ज़्यादा नहीं है क्योंकि मैं उसके खाने पर नियंत्रण रखती हूँ. मैं उसे बुरे खाने के नतीजों के बारे में समझाने की कोशिश करती हूँ. मगर वह हर समय मेरे साथ नहीं रहता. मुझे चिंता है कि भविष्य में क्या होगा. माता-पिता के लिए बच्चों का वज़न एक बड़ी चिंता का सबब बन जाता है. यह एमिली की चिंता का विषय भी है. वह कहती हैं कि उनकी बेटी अपने भाई-बहनों के मुक़ाबले हमेशा लंबी और अधिक भूखी रही है. उन्होंने कहा कि वह बचपन में खूब खाती थी और अक्सर वज़न की ऊपरी सीमा के नज़दीक रहती थी जबकि उसका बड़ा भाई दुबला-पतला था. इंसान की भूख नियंत्रित करने को लेकर कई शोध हुए हैं. कैम्ब्रिज़ विश्वविद्यालय में मेडिसिन की प्रोफेसर सदफ़ फारूक़ी ने कहा भूख इतनी जटिल चीज है कि वास्तव में हम उसके बारे में बहुत कम जानते हैं. वह बताती हैं कि हम भूख के बारे में इतना जानते हैं कि इसमें आनुवंशिक कारण शामिल हैं लेकिन यह दूसरी बातों के अलावा माहौल और व्यवहार से भी प्रभावित होती है. वह बताती हैं कि स्वाद भी इसकी एक वजह है. सभी लोग एक ही तरह से स्वाद का अनुभव नहीं करते और एक ही खाना किसी व्यक्ति को अच्छा लग सकता है और दूसरे को नहीं. स्वास्थ्य संबंधी अभियानों से जुड़े लोग बताते हैं कि कई माता-पिता उनसे संपर्क कर अपने बच्चों की भूख के बारे में चिंता जताते हैं लेकिन ज़्यादातर मामलों में ऐसा माता-पिता की लापरवाही के चलते होता है. कुछ की दलील है कि बच्चे जब तक स्वस्थ हैं वो जो खाना चाहते हैं उन्हें खाने दीजिए क्योंकि चिकित्सकीय साक्ष्य बताते हैं कि बच्चे आमतौर पर अपनी भूख के मुताबिक़ ही खाते हैं. नेशनल ओबेसिटी फोरम के प्रवक्ता टॉम फ्राई कहते हैं आमतौर पर बच्चे अपनी ज़रूरत से ज्यादा नहीं खाते. यदि आप उन्हें स्वयं निर्णय लेने के लिए छोड़ देते हैं तो वो यह सीखते हैं कि खाने को कैसे नियंत्रित करना है. |
| DATE: 2013-08-01 |
| LABEL: science |
| [340] TITLE: खाते समय बच्चों से बातें बढ़ाती है आत्मविश्वास |
| CONTENT: ब्रिटेन में राष्ट्रीय साक्षरता संगठन के अनुसार अगर खाते वक्त बच्चों के साथ बातचीत की जाए तो उनमें संवाद का कौशल विकसित होता है. ब्रिटेन में करीब 35000 बच्चों पर राष्ट्रीय साक्षरता संगठन ने एक अध्ययन किया है. इस अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जो बच्चे परिवार के साथ बैठकर खाना खाते हैं और आपस में बातें करते हैं वे आत्मविश्वास से भरे होते हैं. अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि प्रत्येक चार में से एक से ज्यादा बच्चे खाना खाते वक्त अपने परिवार से संवाद करने से वंचित रह जाते हैं. अभिनेत्री मां और शिक्षा प्रचारक नताली कसीदी ने बताया जिस तरह खाना हमारे शरीर का ईंधन होता है. उसी तरह संवाद हमारे मस्तिष्क का. कसीदी प्रत्येक माता-पिता से गुजारिश करती हैं आपके पास अगर वक्त की कमी भी हो तो भी अपने बच्चे के साथ कम से कम 10 से 15 मिनट जरूर बैठें और बातें करें. नताली कसिदी कहती हैं बातें करना और सुनना सीखने की ओर बढाया गया पहला कदम है. ब्रिटेन के 188 स्कूलों के आठ से 16 साल के बच्चों ने पिछले साल अध्ययन से जुड़े सवालों के जवाब अपनी कक्षा में दिए. इस तरह के सवाल जवाब से जो जानकारियां जुटाई गईं उनमें कई बातें सामने आई. इसके अनुसार बच्चों के साथ बैठकर खाना नहीं खाने की अपेक्षा खाते समय चुप करना बच्चे के आत्मविश्वास पर ज्यादा बुरा असर डालती है. अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि खाते वक्त अपने परिवार के साथ बातचीत करने वाले 100 बच्चों में से 62 बच्चे किसी ग्रुप के सामने ज्यादा आत्मविश्वास से बोलते हैं. जबकि खाते समय चुप रहने वाले 100 बच्चों में से केवल 47 बच्चे और परिवार के साथ बैठकर खाना नहीं खाने वाले 100 में से 52 बच्चे ही ग्रुप के सामने बोलते वक्त आत्मविश्वास दिखा पाते हैं. अगर कक्षा में आयोजित किए जाने वाले वाद-विवाद की बात करें तो परिवार के साथ बैठकर भोजन करने और बातचीत करने वाले 100 में से 75 बच्चे बेहद आत्मविश्वास के साथ बहस में हिस्सा लेते हैं. वहीं साथ में बैठकर चुपचाप खाना खाने वाले केवल 57 बच्चे और अकेले खाना खाने वाले 64 बच्चे ही बहस में आत्मविश्वास के साथ बोल पाते हैं. शोध के अनुसार करीब 87 फीसदी बच्चे और युवा अपने परिवार के साथ बैठकर खाना तो खाते हैं मगर हर दिन खाते वक्त केवल 74 फीसदी बच्चे ही बात करते हैं. 7 फीसदी बच्चे तो एकदम चुप होकर खाते हैं. राष्ट्रीय साक्षरता संगठन अपने अभियान शब्दों से जीवन है वर्ड्स फॉर लाइफ के जरिए माता पिताओं में इस बात की जागरुकता पैदा करने की कोशिश कर रहा है कि वे बच्चों में बोलने और सुनने का कौशल जगाएं. वे उन्हें बताते हैं कि इसकी शुरुआत वे खाना खाते समय हल्की-फुल्की बातचीत से करें. संगठन प्रमुख जोनाथन डगलस ने कहा हमारे शोध का निचोड़ कहता है कि बच्चों और युवाओं की सफलता के लिए घर में उनके साथ किए जाने वाले संवाद बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. उन्होंने आगे कहा खाते वक्त बच्चों के साथ बातचीत और संवाद उनमें सफल और खुशहाल जीवन के लिए जरूर प्रतिभा विकसित करने में बेहद कारगर साबित होते है. |
| DATE: 2013-08-01 |
| LABEL: science |
| [341] TITLE: फेफड़े के कैंसर का रहस्य सुलझाएंगे ब्रितानी वैज्ञानिक |
| CONTENT: ब्रितानी वैज्ञानिक फेफड़े के कैंसर से पीड़ित 850 लोगों के ट्यूमर का अध्ययन करेंगे ताकि इस प्राणघातक बीमारी के बारे में ज़्यादा जानकारी हासिल हो सके. ब्रिटेन में कैंसर में होने वाली मौतों में सबसे ज़्यादा मौंतें फेफड़े के कैंसर से होती है. ब्रिटेन के छह केंद्रों में होने वाले इस शोध के लिए एक करोड़ चालीस लाख पाउंड की लागत आएगी. इस शोध में यह पता किया जाएगा कि कैंसर पीड़ित पर उपचार का असर होना क्यों बंद हो जाता है. इस अध्ययन में यह भी पता लगाया जाएगा कि पिछले नौ सालों के दौरान फेफड़े का कैंसर किस तरह विकसित हुआ और फैला. इंग्लैंड में हर साल फेफड़े के कैंसर के 42000 नए मामले सामने आते हैं और इनमें से 35000 की मौत हो जाती है. पिछले पाँच सालों में फेफड़े के कैंसर से पीड़ित सिर्फ़ 9 प्रतिशत मरीजों की ही जान बचाई जा सकी है. इस शोध समूह से जु़ड़े प्रमुख शोधकर्ता और लंदन रिसर्च इंस्टीट्यूट एवं यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में प्रोफेसर चार्ली स्वॉनटन कहते हैं कि फेफड़े के कैंसर का इलाज करना हमेशा से बहुत मुश्किल रहा है लेकिन अब यह स्थिति बदलेगी. प्रोफेसर स्वॉनटम ने बीबीसी से कहा हमें पूरी उम्मीद है कि इस शोध से हम यह समझ पाएँगे कि नॉन-स्मॉल-सेल-कैंसर किस तरह बदलता है और यह किस तरह अपने को परिस्थिति के अनुकूल ढाल लेता है. ब्रिटेन के कैंसर शोध संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉक्टर हरपाल कुमार ने कहा कि अन्य प्रकार के कैंसर के मुकाबले फेफड़े के कैंसर के अध्ययन के लिए पर्याप्त राशि उपलब्ध नहीं रही है. आमतौर पर कैंसर के मरीज़ों में इस बीमारी का काफी देर से पता चलता है. डॉक्टर कुमार ने कहा कि यह एक मिथक है कि फेफड़े का कैंसर केवल धूम्रपान करने वालों को होता है क्योंकि ऐसे हर दस मे से दो मरीज़ ऐसे होते हैं जो धूम्रपान नहीं करने वाले होते हैं. उनका कहना है हमें धूम्रपान से अपना ध्यान नहीं हटाना चाहिए क्योंकि हम जानते हैं कि न केवल फेफड़े के कैंसर बल्कि किसी भी प्रकार के कैंसर से होनी वाली कुल मौतों में एक चौथाई मौतें धूम्रपान के चलते होती हैं. |
| DATE: 2013-07-31 |
| LABEL: science |
| [342] TITLE: वैज्ञानिकों ने मूत्र से बनाई दाँत जैसी संरचना |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने मानव मूत्र से दाँत जैसी अल्पविकसित संरचनाएं विकसित की हैं. सेल रीजनरेशन जर्नल नाम की एक विज्ञान पत्रिका में इसके नतीजे प्रकाशित हुए हैं. इसमें बताया गया है कि दांत की तरह की छोटी संरचनाएं विकसित करने के लिए मूत्र को स्टेम सेल के स्रोत के रूप में प्रयोग किया जा सकता है. अध्ययन करने वाली टीम ने उम्मीद जताई है कि इस तकनीक का उपयोग करते हुए टूटे हुए दाँत की जगह दाँत उगाए जा सकते हैं. स्टेम सेल के क्षेत्र में काम करने वाले अन्य वैज्ञानिकों ने कहा है कि इस लक्ष्य को पाने के लिए अभी और चुनैतियों का सामना करना पड़ेगा. आयु और ख़राब स्वास्थ्य स्थिति की वजह से टूटने वाले दातों की जगह नए दाँत उगाने की तकनीक तलाशने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक जुटे रहे हैं. स्टेम सेल के जरिए किसी भी तरह के ऊतक को उगाया जा सकता है. वैज्ञानिकों की दुनिया में यह शोध का पसंदीदा क्षेत्र भी रहा हैं. गुआंगझू के इंस्टीट्यूट ऑफ़ बायोमेडिसिन एंड हेल्थ की टीम ने मूत्र का प्रयोग शुरुआत के लिए किया. आमतौर पर शरीर से निकलने वाली कोशिकाओं सेल जो कि शरीर के पानी के काम से जुड़ी होती हैं उन्हें प्रयोगशाला में उगाया गया. इस तरह जमा की गई कोशिकाओं को स्टेम सेल के रूप में तैयार किया गया. इस तरह की मिश्रित कोशिकाओं और एक चूहे से ली गई अन्य सामग्री को जानवरों में प्रत्यारोपित किया गया. शोधकर्ताओं का कहना है कि तीन हफ्ते बाद कोशिकाओं का बंडल दाँत के रूप में उभरने लगा. दाँत की तरह की इस संरचना में दाँत की लुगदी डेंटीन इनैमल और इनैमल ऑर्गन शामिल थे. हालांकि दांत जैसी यह संरचना प्राकृतिक दाँत जैसी मजबूत नहीं थी. यह शोध अभी दंत चिकित्सकों के काम का नहीं है. लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि चिकित्सकीय उपयोग के लिए इंसानी दाँत उगाने के सपने की दिशा में और अध्ययन के लिए यह प्रेरित करेगा. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के स्टेम सेल वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर क्रिस मैसन ने कहा इसके लिए मूत्र एक खराब शुरुआत थी. यह शायद सबसे ख़राब स्रोतों में से एक है इसके शुरूआती हिस्से में केवल कुछ कोशिकाएं होती हैं. इनको स्टेम सेल में बदलने की क्षमता बहुत कम होती है. उन्होंने कहा कि अन्य स्रोतों की तुलना में इसमें बैक्टिरिया के संपर्क में आकर संक्रिमत होने की आशंका ज्यादा होती है. प्रोफ़ेसर मैसन ने कहा स्थायी दाँत प्राप्त करने के लिए यहाँ बड़ी चुनैती यह है कि इस तरह से बनने वाली संरचना में दाँत की लुगदी के साथ-साथ तंत्रिकाएं और रक्त वहिकाएं भी हों. |
| DATE: 2013-07-30 |
| LABEL: science |
| [343] TITLE: पूर्णिमा की रात क्यों नहीं आती है नींद? |
| CONTENT: वैज्ञानिकों का मानना है कि पूर्णिमा की रात ठीक से नींद लेने में ख़लल डालती है. प्रयोगशाला में हुए एक प्रयोग के दौरान पूर्णिमा के दिन नींद में पांच मिनट ज़्यादा समय लगा और लोग 20 मिनट कम सोए. प्रयोगशाला की कठिन परिस्थितियों में 33 स्वयंसेवकों पर किए गए इस प्रयोग के दौरान चंद्रमा के प्रभाव संबंधी साक्ष्य जुटाए गए हैं. करेंट बायोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ जब चांद पूरा था तो स्वयंसेवकों को नींद आने और अच्छी तरह नींद लेने में वक़्त लगा जबकि बंद अंधेरे कमरे में उन्हें अच्छी नींद आई. इस दौरान उनके शरीर की जैविक घड़ी से जुड़े मेलटोनिन नाम के हार्मोन स्तर में भी कमी देखी गई. अंधेरे में शरीर में अधिक मेलटोनिन बना जबकि उजाले में इसके निर्माण में कमी आई. शाम के चमकीले प्रकाश या दिन का थोड़ा कम प्रकाश शरीर के सामान्य मेलटोनिन चक्र पर असर डाल सकता है. स्विट्जरलैंड के बेसल विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर क्रिश्चियन कैजोहेन और उनके साथियों के इस अध्ययन में यह सुझाव दिया गया है कि चंद्रमा का प्रभाव इसकी चमक से संबंधित नहीं हो सकता. इसमें शामिल स्वयंसेवक इस बात से अनजान थे कि इस अध्ययन का उद्देश्य क्या है. उन्हें प्रयोगशाला में जिस बिस्तर पर सुलाया गया था वहाँ से वे चंद्रमा को नहीं देख सकते थे. इनमें से हर स्वयंसेवक ने प्रयोगशाला में दो रातें बिताईं. अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि पूर्णिमा की रात गहरी नींद से जुड़ी दिमाग़ी गतिविधियाँ घटकर आधी रह गईं. मेलटोनिन का स्तर भी गिर गया. प्रोफ़ेसर क्रिश्चियन कैजोहेन कहते हैं चंद्रमा की गति इंसान की नींद पर असर डालती हुई लगती है. यह तब भी होता है कि जब कोई चांद को देखता भी नहीं है और उसे यह भी नहीं पता होता कि चांद किस अवस्था में है. शोधकर्ताओं के मुताबिक़ हो सकता है कि कुछ लोग चंद्रमा के लिए बहुत अधिक संवेदनशील हों. उन्होंने यह अध्ययन चंद्रमा का प्रभाव जानने के लिए नहीं किया था. इसके विश्लेषण का ख़्याल उन्हें बाद के सालों में आया. उन्होंने पुराने आंकड़े लिए. उनका विश्लेषण किया कि जब लोग प्रयोगशाला में सोए थे तो उस रात पूर्णिमा थी या नहीं. ब्रिटेन के नींद विशेषज्ञ डॉक्टर नील स्टेनली का कहना है कि छोटा अध्ययन होने के बावजूद इसके नतीजे महत्वपूर्ण हैं. वो कहते हैं पूर्णिमा को लेकर कई कहानियाँ है. इसलिए अगर उनका कोई प्रभाव पड़ता है तो उस पर ताज्जुब नहीं होना चाहिए. अब यह विज्ञान पर है कि वह यह पता लगाए कि पूर्णिमा पर हमारे अलग-अलग ढंग से सोने का कारण क्या है. |
| DATE: 2013-07-29 |
| LABEL: science |
| [344] TITLE: मोर नहीं उसके पंख पर मोरनी होती है फ़िदा ? |
| CONTENT: अमरीका के वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने की कोशिश में जुटे हैं कि किसी मोर के पिछले हिस्से में मौजूद पंख में मोरनी की दिलचस्पी आख़िर क्यों होती है. वैज्ञानिकों ने इसके लिए आंखों की निगरानी करने वाले एक विशेष कैमरे का इस्तेमाल भी किया हैं. नर पक्षी की यह चमकदार पंखों वाली पूंछ मादा पक्षी के संपर्क में आने पर आता है जिसका इस्तेमाल वे अपनी मादा पक्षी को आकर्षित करने के लिए करते हैं. वैज्ञानिकों की इस टीम ने मोरनी की आंखों में यह विशेष कैमरा लगाया है ताकि यह अंदाज़ा मिल सके कि वे आख़िर क्या देखती हैं. इससे जुड़ी दिलचस्प रिपोर्ट जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजी में छपी है. आंखों की निगरानी से जुड़े फुटेज में यह खुलासा हुआ है कि मोरनी का ध्यान आकर्षित करना कितना मुश्किल है और साथ ही इससे यह अंदाज़ा लगाने में मदद मिलती है कि आख़िर एक बड़ा और सुंदर पंख कैसे नज़र आने लगता है. इससे इस राज़ पर से भी थोड़ा पर्दा हटता है कि आख़िर मोरनी मोर के पिछले हिस्से के पंख में क्या देखती है. उनके आंखों की दाएं-बाएं की गति से यह अंदाज़ा मिलता है कि मोरनी पंख की चौड़ाई का अनुमान लगाने की कोशिश करती हैं और उनकी दिलचस्पी आंखों को आकर्षित करने वाले पंख में ही थी. लैंगिक चुनाव सेक्सुअल सेलेक्शन के लिए मोर का पंख शायद सबसे मशहूर मिसाल है और इस तथ्य की पहचान चार्ल्स डार्विन ने की थी. इस दौरान जानवरों में यह विशेष लक्षण देखने को मिलता है जो विपरीत लिंग के लिए आकर्षण की वजह बनती है. कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय और नॉर्थ कैरोलिना के डेविस और ड्यूक विश्वविद्यालय ने इस शोध किया है. इस शोध परियोजना को अंजाम देने वाले डॉक्टर जेसिका योरजिंस्की का कहना है बेहद कम प्रजाति ही ऐसे रंगीन और विशिष्ट लक्षण दर्शाते हैं जिनका जीवित रहने की प्रक्रिया में कोई योगदान नहीं होता. उनका कहना है कि किसी परभक्षी जानवर से बचने में ये लंबे पंख बाधक बन सकते हैं. योरजिंस्की कहते हैं मैं यह जानना चाहता था कि जब मोरनी अपने साथी की तलाश कर रही होती हैं तो वे क्या अनुमान लगा रही होती हैं. शोधकर्ताओं ने 12 मोरनी की आंखों में कैमरे जैसा उपकरण लगाया. इसमें दो छोटे कैमरे लगे हुए थे. एक कैमरा पक्षी के सामने वाले नज़ारे को रिकॉर्ड कर रहा था जबकि दूसरा आंख की गतिविधि को रिकॉर्ड कर रहा था. वह कहते हैं हम नतीजे से बेहद हैरान थे. कैमरे से अंदाज़ा लगा कि मोरनी मोर के सिर के हिस्से में मौजूद कलगी को देखने के बजाए सबसे पहले उनके पिछले हिस्से के पंख की ओर देखती हैं. वह कहते हैं उनकी निगाहें निचले हिस्से की ओर ही थीं. इस प्रयोग से अंदाज़ा मिला कि मोरनी का ध्यान हमेशा माहौल और मोर के पिछले हिस्से के पंख के बीच ही बदलता रहता है. शोध में यह सवाल भी उठा कि अगर मोरनी निचले हिस्से की तरफ़ ही देखती हैं तो फिर मोर का पिछले हिस्से का पंख ऊंचा क्यों रहता है. योरजिंस्की ने इसके लिए भी तर्क देते हुए कहा कि भारत में उनका जहां प्राकृतिक वास होता है वहां पौधे ऊंची जगहों पर उगते हैं ऐसे में उनका ऊपरी पंख ही दिखाई देता है. शेफील्ड विश्वविद्यालय के पक्षी विशेषज्ञ प्रोफेसर टिम बर्कहेड का कहना है कि यह शोध बेहद रोचक और नए तरीके का था. |
| DATE: 2013-07-28 |
| LABEL: science |
| [345] TITLE: सर्च के अलावा क्या हैं गूगल के विकल्प? |
| CONTENT: पिछले कुछ समय में गूगल ने काफ़ी नए काम किए हैं. सोशल नेटवर्किंग साइट गूगल प्लस पर नया फोटो सॉफ़्टवेयर डाला इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए एयर बलून लाँच किए शुल्क वाली संगीत सेवा शुरू की एक नए स्मार्टफ़ोन से छेड़खानी की और अपने मैप्स को फिर से लॉंच किया. लेकिन जब कंपनी अपनी कमाई की बात करेगी तो निवेशक सिर्फ़ एक बात पर ध्यान देंगे कि कंपनी के सर्च इंजन के विज्ञापन कैसे हैं. इन सभी खोजों परीक्षणों के लिए पैसा गूगल सर्च से ही आता है. इंटरनेट विश्लेषण प्रदानकर्ता स्टैटकाउंटर के अनुसार जून में ब्रिटेन के डेस्कटॉप कंप्यूटरों से 90 प्रतिशत और मोबाइल फ़ोनों से 92 प्रतिशत चीज़ें गूगल के ज़रिए ही ढूंढी गईं. यह ऐसा आंकड़ा है जिससे किसी भी कंपनी को जलन होगी. दुनिया के आंकड़े इससे भी अधिक हैं. हालांकि इसके अपने घरेलू बाज़ार अमरीका में इसका हिस्सा औसत से कम है 78 डेस्कटॉप सर्च. इसके अलावा चीन रूस और दक्षिण कोरिया में भी कंपनी पिछड़ गई है. सर्च इंजन लैंड न्यूज़ वेबसाइट के लिए लिखने वाले तकनीक विश्लेषक ग्रेग स्टर्लिंग कहते हैं एक वक्त था जब यकीकन गूगल बेहतर सर्च इंजन था- लेकिन अब इस बात पर बहस हो सकती है. हालांकि गूगल के ब्रांड की ताकत और कंपनी के मोबाइल बाज़ार में जो़रदार प्रवेश ने आने वाले समय में अधिकांश बाजा़रों में इसके अग्रणी रहने को पक्का कर दिया है. स्टर्लिंग कहते हैं वैसे तो कुछ भी निश्चित नहीं है लेकिन रूस और एशिया के कुछ भागों के अलावा और किसी प्रतियोगी का सामान्य सर्च में उल्लेखनीय हासिल करना आसान नहीं लगता. हालांकि दूसरी कंपनियां अब भी कोशिश कर रही हैं अलग तरह के फ़ीचर्स दे रही हैं और तो और इस तकनीक के मूलभूत सिद्धांत पर भी विचार कर रही हैं. आइए ऐसे ही कुछ वैकल्पिक सर्च इंजनों को देखते हैं. स्टैटकाउंटर के अनुसार माइक्रोसॉफक्ट का बिंग सर्च इंजन गूगल का सबसे बड़ा प्रतियोगी है. हालांकि इसके हिस्से में दुनिया की खोज का सिर्फ़ 20वां भाग ही आता है. दोनों में सबसे बड़ा फर्क़ यह है कि बिंग अपने होमपेज की पृष्ठभूमि में रंगीन तस्वीरों का इस्तेमाल करता है और महत्वपूर्ण जगहों से संबंधित लिंक भी दिखाता है. माइक्रोसॉफ़्ट सोशल फ़ीचर्स के साथ भी प्रयोग कर रहा है. अमरीका में बिंग इस्तेमाल करने वालों को किनारे की एक पट्टी में उनके फ़ेसबुक दोस्त भी दिखाई देते हैं जो ढूंढी गई जानकारी को पसंद कर सकते हैं. इसके अलावा वह बोर्ड्स भी दिखाई देते हैं- ऐसी तस्वीरें और लिंक जिन्हें ब्लॉगर और अन्य विशेषज्ञों ने चुना हो. |
| DATE: 2013-07-26 |
| LABEL: science |
| [346] TITLE: बालों में कंघी से अंतरिक्ष में टाइमपास |
| CONTENT: भारतीय मूल की अमरीकी अंतरिक्षयात्री सुनीता विलियम्स ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के अपने दोनों अभियान के दौरान अंतरिक्ष में 322 दिन बिताए हैं. बीबीसी संवाददाता क्रिस्टीन जिवांस ने सुनीता विलियम्स से पूछा कि मंगल ग्रह जाने के लंबे अंतरिक्ष अभियान को अंतरिक्ष यात्री कैसे सहन कर सकता है. सुनीता ने साझा किए अंतरिक्ष के अपने अनुभव. मैं अपने बालों को रोज़ाना कंघी करती थी मुझे नहीं पता कि इससे मेरे बाल बेहतर लगते थे या नहीं लेकिन मैं पृथ्वी पर भी ऐसा करती थी इसलिए ऐसा करने से मैं सामान्य रहती थी. जब आप लंबी अवधि के मिशन पर जाने के बारे में सोच रहे हैं तो ये आपके दिमाग़ में होना चाहिए कि आप परिवार को छोड़कर जा रहे हैं लेकिन ये अच्छे कारणों से है और शायद इंसानियत की मदद करेगा. हम ऐसी चीज़ें लेकर जाते हैं जो हमें घर की याद दिलाए. मेरी पसंदीदा चीज़ मेरा खिलौनानुमा कुत्ता है जिसे घर पर ही मेरे नन्हे कुत्ते जैक रसैल की तस्वीर से बनाया गया है. खाना बेहद अहम है और मुझे मार्शमैलो क्रीम भेजी गई थी ताकि मैं टॉर्टिला पर मूंगफली के मक्खन से अपने बचपन के पसंदीदा फ्लफरनटर सैंडविच बना सकूं. मेरी पसंद की और चीज़ें मुझे घर की याद दिलाती हैं अपने ननिहाल की ओर की सूखी हुई क्रैनबेरी डिब्बाबंद झींगा और स्लोवेनियाई सॉसेजेस और पिता के परिवार की तरफ़ से भारतीय समोसे. हम स्लीप स्टेशन में सोते हैं जहां आप दरवाज़ा बंद कर लें तो सब कुछ शांत और अंधेरे से भरा होता है. अगर कोई गड़बड़ी हो तो आप अलार्म सुन सकते हैं. हम यूं तो सभी लाइट बंद कर देते हैं सिर्फ़ टॉयलेट के पास कुछ नाइट लाइट होती हैं ताकि लोग जान सकें कि वो कहां जा रहे हैं. इस सब का तकनीकी पक्ष ये है कि आप को ये समझना होता है कि आप एक छोटी सी जगह में और लोगों के साथ रह सकते हैं. टीम मिलकर काम करती है और अगर आपने हाल ही के स्पेसवॉक देखे हों जिनमें लुका पारमितानो के हेलमेट में कुछ तरल पदार्थ रिस गया था तो आपने ज़रूर देखा होगा आप साथ में ट्रेनिंग लेते हैं और जब थोड़ी मुश्किल आती है तो सभी एक दूसरे की मदद करना चाहते हैं. मेरे लिए ख़बरें नहीं लोग अहम होते हैं जब आग या तूफान जैसी किसी प्राकृतिक आपदा के बारे में सुनती हूं तो घर की याद आती है और सोचती हूं कि सब कैसे हैं. लेकिन मैं धरती की ओर भी देखती हूं और सोचती हूं कि कितना सा ग्रह है और लोग बीच पर टहलने के लिए निकले होंगे या कुछ और काम कर रहे होंगे वहां सब ज़रूर जीवन का आनंद उठा रहे होंगे. जब दिन बुरा गुज़रे तो आप क्यूपोला विंडो की ओर जा कर धरती को देख सकते हैं. इससे आपके चेहरे पर मुस्कान आ जाएगी. जब बात करने की सुविधा हो तो घर पर कॉल कर सकते हैं और दोस्ताना आवाज़ सुन सकते हैं. |
| DATE: 2013-07-26 |
| LABEL: science |
| [347] TITLE: डॉक्टर जिसने की 60 हज़ार ब्रेस्ट सर्जरी |
| CONTENT: डॉक्टर थेप वेजविसिथ पिछले 25 साल से थाइलैंड की राजधानी बैंकाक में अपना कॉस्मेटिक सर्जरी क्लिनिक चला रहे हैं. चीनी मूल के इस डॉक्टर ने अब तक क़रीब 60 हज़ार ब्रेस्ट सर्जरी की हैं. उनके पास ज्यादातर बार बालाएं और ट्रांससेक्सुअल आते हैं. वे बता रहे हैं कैसा गुज़रता है उनका एक दिन. मैं सुबह आठ बजे सोकर उठता हूँ और नौ बजे तक अपने क्लिनिक में होता हूँ. कई बार तो सर्जरी करते-करते रात हो जाती है और क्लिनिक में ही रुकना पड़ जाता है. मेरे कई मरीज़ ऐसे भी होते हैं जिन्हें क्लिनिक में ही ठहरना पड़ता है. मैं पाँच मिनट में ही नाश्ता निपटा देता हूँ. मैं थाई-चीनी परिवार से हूँ और रोजाना नाश्ते में चावल सूप लेता हूँ. प्रत्येक चीनी नाश्ते में चावल का सूप ही लेता है. मेरा दिन ब्रेस्ट इंप्लांट सर्जरी से ही शुरू होता है. सुबह नौ बजे से दोपहर तीन या चार बजे तक मैं सर्जरी करता हूँ. इस दौरान मैं रोज़ाना क़रीब दस ऑपरेशन करता हूँ. हर ऑपरेशन में क़रीब आधा घंटा लगता है. यदि ऑपरेशन थोड़ा मुश्किल हो तो 45 मिनट तक भी लग जाते हैं. बहुत सी गृहणियाँ बच्चे पैदा होने के बाद मेरी सेवाएं लेती हैं. बच्चे होने के बाद उनकी ब्रेस्ट सिकुड़ जाती हैं और उनकी चाहत पहले जैसे ब्रेस्ट पाने की होती है. इंटरनेट और मीडिया के प्रभाव के कारण मेरे मरीज़ों में उन युवतियों की संख्या भी बढ़ रही है जो बड़े ब्रेस्ट चाहती हैं. मैं क़रीब बीस प्रतिशत ऑपरेशन ट्रांससेक्सुअल जिन्हें हम यहाँ लेडी ब्वॉएज़ कहते हैं लोगों पर करता हूँ. वे मेरे पास इंप्लांट कराने इसलिए आते हैं क्योंकि यह उन्हें बहुत सस्ता पड़ता है. मैं एक ऑपरेशन के क़रीब 1400 डॉलरक़रीब 82 हज़ार रुपए लेता हूँ. जब मैं गिनती करता हूँ तो पाता हूँ कि मैंने अब तक क़रीब 60 हज़ार ऑपरेशन कर दिए हैं. हालाँकि इस पर यक़ीन करना मुश्किल है. यहाँ बहुत सी महिलाएँ कास्मेटिक सर्जरी के बाद बहुत पैसा कमाती हैं. वे बार में काम करने जाती हैं और शो विमेन बन जाती हैं और उन्हें ख़ूब पैसा मिलता है. उनकी कमाई दस गुना तक बढ़ जाती है. ब्रेस्ट इंप्लांट के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है. और आत्मविश्वास आने से वे काम भी अच्छा करती हैं. मेरी सेवाएं लेने वाली आधी से ज्यादा महिलाएँ और लेडी ब्वॉएज़ पर्यटन व्यवसाय और बारों में काम करते हैं. मैं अमूमन दो बजे लंच करता हूँ और अक्सर करी चावल या फ्राइड राइस खाता हूँ. मेरे स्टाफ़ के लोग बाहर से मेरे लिए खाना लाते हैं. वे नहीं चाहते कि मेरा एक भी मिनट बर्बाद हो. वे चाहते हैं कि मैं हर वक़्त सर्जरी में ही लगा रहूँ. यदि वे मेरे बदले टॉयलेट जा सकते तो शायद मैं कभी टॉयलेट भी जाना नहीं चाहता. दोपहर में मैं सेक्स चेंज फेस़लिफ्ट और टमी सक ऑपरेशन जैसी मुश्किल सर्जरी करता हूँ. इसमें लगभग तीन घंटे लग जाते हैं. पश्चिम के मुक़ाबले हमारी सेवाएँ काफी सस्ती हैं. सेक्स चेंज ऑपरेशन के लिए हम लगभग 2200 डॉलर लेते हैं. क़ानूनन मरीज़ को पहले मनोवैज्ञानिक के पास जाना पड़ता है ताकि उन्हें पक्का पता चल जाए कि वे ट्रांससेक्सुअल हैं. मुझे इससे थोड़ा ख़राब लगता है क्योंकि मैं इस पेशे में 25 साल से हूँ और मरीज़ को देखकर बता सकता हूँ कि वे ट्रांससेक्सुअल है या नहीं. मैंने प्रशासन से गुहार लगाकर क़ानून में बदलाव की माँग भी की थी लेकिन नाकाम रहा. मैं पुरुष से महिला बनने वाले लोगों पर स्टेंडर्ड सेक्स चेंज सर्जरी करता हूँ. यह ऐसी ही है जैसी की लंदन के चैरिंग क्रॉस हॉस्पिटल में की जाती है. हम पुरुष अंग के सभी हिस्सो को हटा देते हैं और फिर शरीर में छेद करके खाल का इस्तेमाल महिला जननांग बनाने में करते हैं. इसके नतीजे अच्छे होते हैं. सर्जरी के बाद लेडी ब्वॉएज़ मसाज पार्लर में नौकरी करने लगते हैं. मुझे लगता है कि यदि आप उनके साथ सेक्स करें तो भी शायद पता न लगा पाएं कि वे ट्रांससेक्सुअल हैं. क्योंकि अपने काम में वे बहुत पेशेवर होते हैं. मैं महिला को पुरुष में परिवर्तन करने वाली सेक्स चेंज सर्जरी नहीं करता क्योंकि इसके नतीजे बहुत अच्छे नहीं हैं. लेकिन मुझे लगता है कि भविष्य में इसमें भी सुधार होगा और पुरुषों को जननांग को महिलाओं में ट्रांसप्लांट करना संभव हो सकेगा. मैं रोज आठ या नौ बजे अपना काम ख़त्म कर देता हूँ. शनिवार हो या इतवार या फिर क्रिसमस जैसा त्यौहार मैं रोज़ाना काम करता हूँ. यदि कोई ज़रूरी मीटिंग न हो या मुझे अदालत न जाना है तो मैं अपने काम पर ही होता हूँ. अक्सर चिकित्सीय अपराध के मामलों में मैं गवाह होता हूँ. जो डॉक्टर मरीज़ों का ग़लत इलाज करते हैं मैं उनके ख़िलाफ़ अदालत में गवाही देता हूँ. इसके लिए बहुत से डॉक्टर और मेडिकल काउंसिल मुझे पसंद नहीं करते. लेकिन इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मुझे बस यही लगता है कि फ़ैसला सुनाने से पहले अदालत को सभी तथ्यों की जानकारी होनी चाहिए. महीने में कम से कम तीन-चार बार मुझे अदालत जाना ही पड़ता है. इसके लिए मुझे कोई पैसा नहीं मिलता है. हालाँकि मुझे टैक्सी का किराया दिया जाता है. बहुते से लेडी ब्वॉएज़ और थाई महिलाएं अपनी ब्रेस्ट को सुडौल बनाने के लिए फ़िलर इंजेक्शन लेती हैं. लेकिन यह गलत तरीक़ा है. बेहतर हो वे इसके लिए सर्जरी करवाएं. कई बार तो हमें पूरी की पूरी ब्रेस्ट हटानी पड़ती है क्योंकि उनमें ख़राब फ़िलर इंजेक्शन लगाए गए होते हैं. कई बार तो पाराफिन ओलाइव ऑयल जॉनसन बेबी ऑयल के भी इंजेक्शन लगा दिए जाते हैं. अपने काम से मैंने बहुत पैसा कमाया लेकिन ख़राब निवेश के कारण गँवा भी दिया. मैंने बैंक स्टॉक मैं पैसा लगाया था लेकिन 1997 में जब थाईलैंड दीवालिया हुआ तो मेरा सारा पैसा चला गया. यह एशियाई वित्तीय संकट के दौरान की बात है. मेरी पत्नी नज़दीक ही स्थित एक अस्पताल में नर्स हैं. मैंने अपनी पत्नी को कभी भी अपने क्लिनिक पर काम करने नहीं दिया. वे अस्पताल में ही काम करते खुश हैं. मैंने अपनी पत्नी पर आईब्रो लिफ्ट पलकें ऊपर उठाने के लिए सर्जरी की है. इसके सिवा उन पर कभी कोई सर्जरी नहीं की. उन्होंने कभी भी ब्रेस्ट इंप्लांट की इच्छा जाहिर नहीं की और वैसे भी मेरे पास यहाँ बड़े ब्रेस्ट वाली बहुत महिलाएँ आती हैं. मेरे क्लिनिक में कोई भी शीशा नहीं है यहाँ तक की टॉयलेट में भी नहीं. क्योंकि पहले जब मरीज़ सर्जरी के बाद नीचे आतीं और शीशे में अपना चेहरा देखती थे तो उन्हें कुछ गड़बड़ लगती थी. निशान या सूजन को देखकर वे रोने लगती थीं और घर जाना ही नहीं चाहती थीं. मैं उन्हें समझाने की कोशिश करता कि अभी सर्जरी को बस एक घंटा ही हुआ है. इस तरह की कई घटनाओं के बाद से मैंने अपने पूरे क्लिनिक से शीशे ही हटवा दिए हैं. मैंने कभी अपनी कॉस्मेटिक सर्जरी भी नहीं करवाई है. मेरी आज तक एक ही सर्जरी हुई है और वे घुटने पर हुई थी. मैं खुद भी शीशा नहीं देखता हूँ. मैं कभी बूढ़ा भी नहीं होता क्योंकि मैं अपना चेहरा नहीं देखता हूँ. |
| DATE: 2013-07-26 |
| LABEL: science |
| [348] TITLE: शनि से कैसी दिखती है पृथ्वी ? |
| CONTENT: अमरीकी अंतरिक्ष एजंसी नासा ने शनि की कक्षा में परिक्रमा कर रहे एक अंतरिक्ष यान से क़रीब एक अरब मील की दूरी से ली गई पृथ्वी और चंद्रमा की तस्वीरें जारी की हैं. कैसिनी नाम के इस अंतरिक्ष यान ने 19 जुलाई को ये तस्वीरें ली थीं. इन तस्वीरों में हमारी पृथ्वी और उसका एकमात्र उपग्रह चंद्रमा एक बिंदु की तरह नजर आ रहे हैं. इन तस्वीरों के जरिए वैज्ञानिक वोयजर-एक की ओर से 1990 में ली गईं पेल ब्लू डॉट तस्वीरों के प्रति सम्मान जताना चाहते हैं. यह पहली बार था जब लोगों को पहले से ही पता था कि उनकी काफ़ी दूर से तस्वीर ली जा रही है. नासा की ओर से शुरू किए गए कार्यक्रम के तहत कैसिनी पर लगे कैमरे का संचालन करने वाली टीम की प्रमुख कैरोलिन पार्को ने लोगों से हाथ हिलाने के लिए कहा. इसे अंतरग्रहीय अंतरिक्ष फ़ोटो सेशन का नाम दिया गया है. कोलोराडो के ब्यूलडर के अंतरीक्ष विज्ञान संस्थान से डॉक्टर पार्को ने कहामुझे यह रोमांचित कर रहा है कि दुनिया भर के लोग अपनी आम गतिविधियों से थोड़ा समय निकालकर बाहर गए और उन्होंने रोबोट और इन तस्वीरों को बनाने वालों के अंतरग्रहीय अभिवादन का आनंद उठाया. पृथ्वी की यह तस्वीर बहुत ही दुर्लभ है क्योंकि यह सौर प्रणाली के बाहर से ली गई है. इस दूरी से पृथ्वी सूर्य से काफी क़रीब है. इस दूरी से अगर कोई व्यक्ति अगर सीधे सूर्य की ओर देखे तो उसके आंखों की रोशनी जा सकती है और कैमरों में लगे संवेदनशील यंत्र चमकीली किरणों से ख़राब हो सकते हैं. अंतरीक्ष यान से ये तस्वीरें तब ली गईं जब सूर्य शनि के पीछे चला गया था और प्रकाश का आना बंद हो गया था. |
| DATE: 2013-07-25 |
| LABEL: science |
| [349] TITLE: अमरीका में तीन सौ चिम्पांज़ी होंगे रिटायर |
| CONTENT: अमरीका में चिकित्सा क्षेत्र में सबसे ज्यादा आर्थिक मदद मुहैया कराने वाला नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ प्रयोगशाला में होने वाले प्रयोगों में चिम्पांज़ियों के इस्तेमाल पर रोक लगाने की तैयारी कर रहा है. हालांकि ये सवाल भी उठाए जा रहे हैं कि ये चिम्पांज़ी कहां जाएंगे और इससे वैज्ञानिक शोध पर किस तरह का असर पड़ेगा. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एनआईएच के प्रमुख का कहना है कि 300 से ज्यादा चिम्पांज़ियों को रिटायर करने के फैसले से वैज्ञानिक शोध को करुणामयी दौर में दाखिल होने में मदद मिलेगी. डॉक्टर फ्रांसिस कॉलिंस का कहना है कि इंसानों से सबसे नजदीकी रिश्तेदार चिम्पांज़ी विशेष सम्मान के हकदार हैं. वो कहते हैं ये अदभुत जीव पहले ही हमें बहुत कुछ सिखा चुके हैं. वैसे कुछ समय से जैव चिकित्सीय अनुसंधानों में चिम्पांज़ियों का इस्तेमाल घट रहा है लेकिन उनका इस्तेमाल बंद करने के एनआईएच के फैसले को वन्यजीव प्रेमी बड़ा फैसला मान रहे हैं. ह्यूमन सोसाइटी नाम की संस्था के लिए काम करने वाली कैथलीन कोनली कहती हैं कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान एनआईएच ने अपने प्रयोगों में शायद ही किसी चिम्पांज़ी का इस्तेमाल किया हो. एनआईएच पशु शोध पर एक साल में 32 अरब डॉलर खर्च करता है लेकिन इसमें से एक प्रतिशत ही चिम्पांज़ियों वाले शोध पर खर्च होता है. लेकिन इयोवा यूनिवर्सिटी में हेल्थ एंड ह्यूमन फिलोस्फी विभाग में प्रोफेसर केविन क्रेगेल कहते हैं कि वैज्ञानिक हल्कों में एनआईएच के फैसले को एक हद तक विवादास्पद माना जा रहा है. वो कहते हैं अब इस बात को शोध के क्षेत्र में महसूस किया जा रहा है कि चिम्पांज़ियों का इस्तेमाल कम होगा लेकिन अब भी शोध के कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां चिम्पांज़ियों की जरूरत है. वो कहते हैं कि टीके विकसित करना एक ऐसा ही क्षेत्र है. खास कर हेपेटाइटिस सी का टीका तैयार करने के लिए चिम्पांज़ियों की अब भी जरूरत है. लेकिन वन्य जीव प्रेमियों का कहना है कि इस तरह के क्षेत्रों में चिम्पांज़ियों के विकल्प मौजूद हैं. कोनली का कहना है चिम्पांज़ियों को इस्तेमाल किए बिना दवाओं के परीक्षण करने और इलाज को जांचने के और भी ढेरों तरीके हैं. उनका कहना है कि इंसानी ऊत्तकों पर इन्हें आजमाया जा सकता है. क्रेगेल शोध के लिए मानवीय कोशिकाओं या चूहों वाले विकल्प से सहमत हैं लेकिन उनके अनुसार पूरे शरीर पर जटिल असर डालने वाले वायरसों का अध्ययन करते समय सिर्फ कुछ कोशिकाओं या चूहों से काम नहीं चलेगा. अपने हालिया फैसले में एनआईएच ने कहा है कि वो फिलहाल 50 चिम्पांज़ियों को अपने साथ बनाए रखेगा. पांच साल बाद चिम्पांज़ियों का इस्तेमाल रोकने की नीति की समीक्षा के बाद इन चिम्पांज़ियों को भी रिटायर किया जा सकता है. अमरीकी कांग्रेस ने 2000 में चिंप एक्ट पास किया था जिसके अनुसार रिसर्च के क्षेत्र से रिटायर होने वाले चिम्पांज़ियों की देखभाल के लिए तीन करोड़ डॉलर की रकम निर्धारित की गई थी. लेकिन अब दस साल बाद इसमें सिर्फ 10 लाख डॉलर ही बचे हैं और अमरीका संसद को इन चिम्पांज़ियों के लिए और रकम आबंटित करनी होगी. |
| DATE: 2013-07-25 |
| LABEL: science |
| [350] TITLE: दिल दुरुस्त रखना चाहते हैं तो नाश्ता न छोड़ें! |
| CONTENT: अगर आपको अपने दिल को दुरुस्त रखना है तो नाश्ता करना न भूलें. नाश्ता न करने वालों के दिल की सेहत ख़तरे में पड़ सकती है. 27 हज़ार लोगों की जीवनशैली पर शोध करने के बाद अमरीकी शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है. सर्कुलेशन नाम के जर्नल में जारी इस शोध में हार्वर्ड स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ का कहना है कि एक बार का खाना छोड़ने का सीधा मतलब है- दिमाग़ पर अतिरिक्त बोझ डालना. ब्रिटिश हार्ट फ़ाउंडेशन के मुताबिक नाश्ता आदमी को दोपहर के खाने से पहले मीठे स्नैक्स खाने से रोकता है. शोध के दौरान 45 से 82 साल के पुरुषों पर 16 साल तक अध्ययन किया गया. इस दौरान डेढ़ हज़ार से ज़्यादा को दिल के दौरे पड़े या उनके दिल ने पूरी तरह काम करना बंद कर दिया. हालांकि जिन लोगों ने नाश्ता छोड़ा था उनमें सुबह कुछ खाने वालों के मुक़ाबले 27 फ़ीसदी दिल की बीमारियां ज़्यादा देखने को मिलीं. शोधकर्ताओं ने जीवनशैली से जुड़ी दूसरी चीज़ों जैसे धूम्रपान और व्यायाम को भी इनके साथ जोड़ा. शोधकर्ता डॉक्टर लिया काहिल ने बीबीसी को बताया सभी बातों का सार यह है कि जब आप सुबह उठें तो खाना न भूलें और वह भी एक घंटे के भीतर. ये नतीजे बताते हैं कि कुछ होने से कुछ भी न होना अच्छा है लेकिन यह हमेशा अच्छा है कि सेहत को फ़ायदा देने वाला और संतुलित कुछ खा लिया जाए. डॉक्टर लिया के मुताबिक खाने का वक़्त असल में सेहत की कुंजी है और उपवास तोड़ने के बजाय दोपहर के खाने तक इंतज़ार आपके जिस्म को समय के साथ कमज़ोर बना देता है. उन्होंने कहा कि इस वजह से उच्च रक्तचाप मोटापा और डायबिटीज़ के ख़तरे बढ़ जाते हैं जो आख़िर में दिल पर असर डालते हैं. डॉक्टर कैहिल अपनी बात का समापन यह कहकर करती हैं नाश्ता न छोड़ेंब्रिटिश हार्ट फ़ाउंडेशन की डायटीशियन विक्टोरिया टेलर कहती हैं इन शोधकर्ताओं ने सिर्फ़ 45 साल से ऊपर के पुरुषों पर अध्ययन किया है. इसलिए अभी यह भी देखना है कि क्या दूसरी उम्र के लोगों के दिल पर भी इसका यही असर पड़ता है. हम यह तो जानते हैं कि एक सेहतमंद और पेट भरने वाले नाश्ते के बाद आपको बिस्किट उतने अच्छे नहीं लगेंगे दूसरे यह आपको अपनी डायट में भोजन की विविधता बढ़ाने में भी मदद देगा. अनाज का टोस्ट या दालें कम चर्बी के दूध का दलिया दिन की शुरुआत के लिए बेहद अच्छे हैं. ज़रा केले के टुकड़े या सूखा हुआ मेवा खाकर देखें और आप घर से निकलने से पहले ही पूरी तरह तैयार हो चुके होंगे. |
| DATE: 2013-07-25 |
| LABEL: science |
| [351] TITLE: वो 6 तरकीबें जिनसे दुनिया को मिलेगा भोजन |
| CONTENT: भारत में सब के लिए भोजन की गारंटी के कानून पर बहस हो रही है लेकिन सवाल ये भी उठ रहे हैं कि इतनी बड़ी आबादी के लिए खाने का इंतजाम कहां से होगा. ये सवाल सिर्फ भारत का ही नहीं पूरी दुनिया का है लेकिन कई नए और उभरते हुए शोध से इसका जवाब मिलने की उम्मीद नज़र आ रही है. अनुमानों के मुताबिक 2050 तक दुनिया की आबादी 9 अरब तक पहुंच जाएगी. इतनी बड़ी आबादी के लिए ख़ाने का इंतज़ाम करने के लिए खाद्यान्न उत्पादन कम से कम 60 बढ़ाना होगा. फसल आनुवांशिकी के एसोसिएट प्रोफेसर शॉन मेज़ का कहना है कि ये मानने के कई कारण हैं कि पर्याप्त भोजन पैदा करना एक अहम चुनौती होगी. उन्होंने बीबीसी न्यूज़ से कहा ये सिर्फ अभी के उत्पादन को दोगुना करना नहीं है क्योंकि पर्याप्त ज़मीन नहीं है. इस का सिर्फ एक हल नहीं है और कभी नहीं हो सकता. जितने पहलू संभव हैं उनकी कोशिश करनी होगी. वैज्ञानिकों का मानना है कि 6 आइडिया हैं जो मदद कर सकते हैं. एक टीम ने हाल ही में एक ऐसे रसायन की खोज की है जो फसलों को ऊंचे तापमान से बचा सकेगा. क्विनबैक्टीन नाम का ये रसायन पौधों में प्राकृतिक रूप से मिलने वाले एक हॉरमोन की नकल करता है जिससे वो गर्मी का मुकाबला कर पाते हैं. इस शोध की अगुवाई करने वाले अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शॉन कटलर का कहना है कि जब इस रसायन को पौधों पर छिड़का जाता है तो पौधों का मुर्झाना कम होता है उनका कम पानी खर्च होता है और वो ज़्यादा मुश्किलें झेल पाते हैं. तकनीकी कंपनियां रोज़मर्रा के इस्तेमाल में काम आने वाली चीज़ें छापने के ज़्यादा दक्ष तरीके तैयार कर रही हैं. अब भोजन की छपाई करना वास्तविकता बनता जा रहा है. नासा छपे हुए भोजन के साथ प्रयोग कर रहा है जिससे सुदूर अंतरिक्ष के अभियानों पर भेजे जाने वालों अंतरिक्षयात्रियों को खाना खिलाया जा सकेगा. मॉर्डन मिडो नाम की एक और कंपनी ने एलान किया है कि ये कृत्रिम मांस छाप सकती है और एक्सटर यूनिवर्सिटी की एक टीम ने तो छपी हुई चॉकलेट तैयार कर ली है. कृत्रिम जीव विज्ञान के क्षेत्र में कृत्रिम जीन को जोड़कर नए जीवन की शुरुआत करना शामिल है. ये अभी शुरुआती दौर में है लेकिन कुछ खोजों का असर बहुत दूर तक हो सकता है. इसमें प्रकृति को इंजीनियरिंग की तरह इस्तेमाल किया जाता है जहां एक-एक कर कृत्रिम जीन को कम्प्यूटर पर कृत्रिम डीएनए से तैयार किया जाता है. अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी ने हाल ही में खमीर का एक तंतु तैयार किया है इस में जीव में विटामिन मिला दिए जाते हैं. और जब खमीर से ब्रेड तैयार की जाती है तो उसमें भरपूर विटामिन सी होता है. गेहूं चावल और मक्का हमारे भोजन का 60 हिस्सा बनाते हैं. लेकिन मलेशिया में वैज्ञानिक ऐसे अनाजों पर ध्यान दे रहे हैं जिनमें सूखा सहने की शानदार क्षमता है और खराब मिट्टी में भी उगाए जा सकते हैं. इन लक्षणों को व्यवसायिक फसलों में डालने पर ऐसी फसलें पैदा करने में मदद मिल सकती है जो बदलती जलवायु का ज़्यादा बेहतर ढंग से सामना कर सके. संकर फसलों को उगाने के बजाय जीन संवर्धित फसलों में खाने का आनुवांशिक रंग रूप प्रयोगशाला में बदला जाता है. ब्रितानी सरकार ने हाल ही में एलान किया कि जीन संवर्धित फसलें पारंपरिक पौधों से ज्यादा सुरक्षित हो सकती हैं. ज़्यादातर सुपरमार्केट जीन संवर्धित भोजन पर पाबंदी लगा चुके हैं लेकिन उन जानवरों का मांस बिकता है जिन्हें जीन संवर्धित फसलें खिलाई गई हैं. शॉन मेज़ का कहना है कि हम ये कहने की हालत में नहीं हैं कि जीन संवर्धित भोजन का इस्तेमाल नहीं करेंगे क्योंकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं जब खेती से जुड़ी किसी समस्या का हल पारंपरिक रूप से संभव न हो. ग्रीनहाउस में पौधा खूब ऊंचा होता है लेकिन इसके बाहर जाने के बाद ये मुर्झा जाता है क्योंकि ये खुद को संभाल नहीं पाता. कलाकार और द इनक्रेडिबल श्रिंकिंग मैन की शुरुआत करने वाले आर्न हेंड्रिक्स ने ये तुलना की है. हेंड्रिक्स का कहना है कि उचित पर्यावरणीय परिस्थितियों में मानव सिकुड़ सकता है या लंबे अरसे में छोटा हो सकता है. यानी बदलते पर्यावरण के साथ ख़ुद को ढाल सकता है. |
| DATE: 2013-07-24 |
| LABEL: science |
| [352] TITLE: एक दूसरे को नाम से बुलाती हैं डॉल्फिनें |
| CONTENT: डॉल्फिनें इंसान की दोस्त मानी जाती हैं लेकिन एक नए शोध से पता चला है कि वे इंसानों की तरह एक-दूसरे को नाम से भी बुलाती हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि ये समुद्री स्तनपायी एक दूसरे की पहचान जानने के लिए अलग-अलग तरह की सीटी बजाती हैं. स्कॉटलैंड के सेंट एंड्रूज विश्वविद्यालय के अनुसंधान दल के मुताबिक जब डॉल्फिनों को लगता है कि उनका नाम पुकारा जा रहा है तो वो इस पर प्रतिक्रिया देती हैं. ये शोध प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज में प्रकाशित हुआ है. विश्वविद्यालय की समुद्री स्तनपायी शोध इकाई के डॉक्टर विंसेंट जानिक ने कहा डॉल्फिनें समुद्र में त्रिआयामी माहौल में रहती हैं जहां कोई निश्चित चिन्ह या सीमा नहीं होती है. ऐसे में उन्हें एक समूह में एक दूसरे के संपर्क में रहने के लिए एक सुगम व्यवस्था की जरूरत होती है. लंबे समय से ये माना जाता रहा है कि क्डॉल्फिनें एक-दूसरे को पुकारने के लिए एक विशेष प्रकार की सीटी बजाती हैं. ठीक वैसे ही जैसे हम एक-दूसरे को नाम से पुकारते हैं. पहले किए गए शोधों से ये बात सामने आई है कि डॉल्फिनें निरंतर सीटी बजाती रहती हैं और एक ही समूह की डॉल्फिनें इस ध्वनि को सीखती हैं और कॉपी करती हैं. लेकिन पहली बार नाम से पुकारे जाने पर इन जीवों की प्रतिक्रिया पर शोध किया गया है. इसके लिए वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक वातावरण में रहने वाली बॉटलनोज़ डॉल्फिनों की ध्वनि को रिकॉर्ड किया. इसके बाद उन्होंने पानी के नीचे स्पीकर लगाकर इस रिकॉर्ड को बजाया. डॉक्टर जानिक ने कहा हमने एक समूह की विशेष सीटी बजाई उनकी दूसरी तरह की आवाज़े भी बजाई और फिर दूसरे समूहों की विशेष सीटियां बजाई. दूसरे समूहों से ये डॉल्फिनें कभी नहीं मिली थीं. अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि डॉल्फिनों ने केवल उन्हीं आवाज़ों पर प्रतिक्रिया दी जिनमें उन्हें पुकारा गया था. अपने नाम की पुकार पर उन्होंने प्रतिक्रिया देते हुए सीटी बजाई. शोध दल का मानना है कि डॉल्फिनें इंसान की तरह व्यवहार करती हैं और नाम पुकारे जाने पर जवाब देती हैं. डॉक्टर जानिक का कहना है कि संभवतः विशाल समुद्र में एक साथ रहने की जरुरत के कारण डॉल्फिनों ने ये क्षमता विकसित की है. उन्होंने कहा अधिकांश समय वे एक-दूसरे को देख नहीं पाती हैं. वे पानी से नीचे सूंघने की क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर सकती हैं जो कि जीवों को एक दूसरे को पहचानने की अहम ताकत होती है. साथ ही वे लंबे समय तक एक ही स्थान पर नहीं रह सकती हैं. उनके पास कोई घोंसला या बिल नहीं होता है जहां वे लौटकर जा सकें. अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि पहली बार किसी जीव में ऐसी अद्भुत क्षमता का पता चला है. हालांकि दूसरे शोधों से पता चला है कि संभवतः तोते की कुछ प्रजातियां अपने समूह में दूसरों की पहचान के लिए ध्वनि का इस्तेमाल करती हैं. डॉक्टर जानिक ने कहा कि ऐसे शोध से इंसान में आपसी संपर्क के विकास को समझने में मदद मिलेगी. |
| DATE: 2013-07-24 |
| LABEL: science |
| [353] TITLE: लाखों सिम कार्ड पर मंडरा रहा है हैकिंग का ख़तरा |
| CONTENT: जाने माने सुरक्षा विशेषज्ञ के मुताबिक मोबाइल फोन सिम कार्ड की तकनीक की एक खामी लाखों लोगों के लिए जासूसी और चोरी के खतरे पैदा कर रही है. कर्स्टन नोल बताते हैं कि उन्हें एक खास संदेश भेजकर सिम के कुछ डिजीटल सूचनाओं को हासिल करने का तरीका पता चला है. उन्होंने चेतावनी दी है कि अपराधी इस तकनीक का गलत इस्तेमाल कर यूजर की निजी बातें सुन सकते हैं या उनके पैसे चुरा सकते हैं. मोबाइल इंडस्ट्री से जुड़ी संस्था जीएसएमए का कहना है कि वह इस जानकारी के बारे में जांच पड़ताल कर रही है. नोल ने इस तरह के खतरे की शुरुआती जानकारी अपनी बर्लिन स्थित कंपनी सुरक्षा अनुसंधान प्रयोगशाला की वेबसाइट पर जारी की है. सिम सबस्क्राइबर आइडेंटिटी मॉड्यूल कार्ड यूजर को उसके नेटवर्क से जोड़ते हुए उसकी पहचान को प्रमाणित करता है. इसमें थोड़े बहुत आंकड़े भी एकत्रित रहते हैं जैसे कि अक्षर संदेश संपर्क नंबर और कुछ ऐप्लीकेशन से जुड़ी जानकारियां. इसके अलावा इसमें भुगतान और बैंकिंग सेवाओं से जुड़ा नंबर भी होता है. नोल का कहना है कि उन्होंने किसी उपकरण को संदेश भेज कर यूजर के सत्यापन कोड का पता लगाने का एक रास्ता खोज निकाला है. इस संदेश में फर्जी डिजीटल हस्ताक्षर मौजूद होता है. उन्होंने बताया कि ज्यादातर फोन फर्जी हस्ताक्षर को पहचानते ही संपर्क काट देते हैं मगर एक चौथाई मामले में हैंडसेट एक एरर मैसेज वापस भेजता है जिसमें सिम के सत्यापित कोड का कूट संस्करण होता है. सत्यापन कोड कोई पढ़ न ले इससे बचने के लिए इस कूट संस्करण को तैयार किया गया था. मगर नोल के अनुसार ऐसे करीब आधे मामलों में इनका आधार 1970 की डिजीटल इनक्रिप्शन स्टैंडर्ड डीईएस कोडिंग प्रणाली थी. नोल का मानना है यह प्रणाली कभी सुरक्षित मानी जाती थी मगर अब इस कोड को तोड़ पाना आसान हो गया है. एक मानक कंप्यूटर इसे बस दो मिनट में तोड़ डालता हैं. नोल कहते हैं कि हैकर को बस एक बार ये जानकारी हाथ लग जाए तो वह प्रोग्रामिंग भाषा जावा में लिखे इस सिम के मालवेयर को डाउनलोड किया जा सकता है. उनके अनुसार फिर इसका इस्तेमाल करके हैकर अपने मतलब की जानकारी और कोड जुटा लेता है. यही नहीं नोल इस बात के लिए भी आगाह करते हैं कि इन वजहों से सिम के जरिए आप पर निगरानी भी रखी जा सकती है. नोल ने बीबीसी को बताया सिम आपके कॉल्स एसएमएस और इंटरनेट से जुड़ी सारी जानकारियों जो कूट भाषा में होती हैं का पता लगा लेने का रास्ता बना देता है. वे कहते हैं ऑपरेटर का तर्क है कि ऐसा 3जी या 4जी कॉल में संभव नहीं है- मगर सिम कार्ड तक यदि पहुंच हो तो बेशक यह भी संभव है. नोल बताते हैं कि उनके शोध के अनुसार 10 में से 8 सिम कार्ड से इस तरह के खतरे हैं. उन्होंने यह भी बताया यूरोप में हम कॉल करने या संदेश भेजने के लिए सिम कार्ड का इस्तेमाल करते हैं मगर अफ्रीका में तो बहुत लोग सिम कार्ड से मोबाइल बैंकिंग भी करते हैं. नोल के अनुसार सिम कार्ड के जरिए उनके बैंक अकाउंट की सारी डिटेल चुराई जा सकती है. जीएसएमए का कहना है कि उन्हें अब तक नोल के शोध की सारी जानकारी नहीं है. अगर इस तरह का कोई मसला है तो जरूर अध्ययन कर के सुलझा लिया जाएगा. संस्था ने आगे कहा हमारे पास इस बात के पुख्ता प्रमाण नहीं है कि आज का इतना सुरक्षित माना जाने वाला सिम ऐसे किसी खतरे से घिरा है. संयुक्त राष्ट्र की टेलिकॉम एजेंसी- अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ ने कहा कि वह दुनियाभर के नियामक एजेंसियों और अन्य सरकारी एजेंसियों से संपर्क कर के उन्हें इस खतरे से आगाह करेगी. |
| DATE: 2013-07-23 |
| LABEL: science |
| [354] TITLE: क्या मिलेगा अंधेपन से छुटकारा? |
| CONTENT: जैव प्रौद्योगिकी पर किए गये एक शोध से पता चला है कि आँख का वह हिस्सा जो रोशनी को पकड़ता है उसे अब स्टेम कोशिकाओं के ज़रिए ठीक किया जा सकेगा. मूरफील्ड नेत्र अस्पताल एवं यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की टीम के मुताबिक पहली बार सच में इंसानों पर यह परीक्षण किया जा सकता है. विशेषज्ञों ने इसे एक महत्वपूर्ण सफलता और आगे के लिए बड़ा कदम बताया है. फोटोरिसेप्टर रेटिना में उपस्थित वे कोशिकाएँ है जो रोशनी को यांत्रिक तरंगों में परिवर्तित कर मस्तिष्क में भेज देती हैं. हालाँकि ये कोशिकाएँ अंधेपन की कुछ स्थितियों में मर भी सकती हैं जैसे कि किसी गंभीर बीमारी के होने या उम्र के ढलने पर. लोगों में फोटोरिसेप्टर कोशिकाओं को जीवित रखने के लिए स्टेम कोशिकाओं के प्रयोग का परीक्षण पहले से हो रहा है. लंदन स्थित टीम ने यह दिखाया कि रोशनी को ढूँढने वाली कोशिकाओं को बदला जा सकता है जिससे अंधेपन को दूर करने की संभावना बढ़ जाती है. उन्होंने बताया कि प्रयोगशाला में रेटिना को बनाने की नई तकनीक का प्रयोग किया है. इसमें हज़ारों स्टेम कोशिकाओं को इकठ्ठा किया गया जिन्हें फोटोरिसेप्टर कोशिकाओं से बदल कर एक अंधे चूहे की आँख में इंजेक्ट कर दिया गया. अध्ययन में यह पता चला है कि इन कोशिकाओं ने पहले से मौजूद कोशिकाओं के साथ जुड़कर आँख में ठीक से कम करना शुरू कर दिया. हालाँकि इसका असर अभी भी बहुत कम है क्योंकि लगभग दो लाख कोशिकाओं में से सिर्फ़ एक हज़ार कोशिकाओं ने ही वाकई में कम करना शुरू किया था. मुख्य शोधकर्ता प्रोफेसर रॉबिन अली ने बीबीसी को बताया अब इससे हमें मानवों में प्रयोग करने का तरीका भी मिल गया है. इसलिए हम बहुत ही उत्साहित हैं. पाँच साल से चल रहे इस शोध का चिकित्सीय परीक्षण करना अब हमारा लक्ष्य है. आँख का प्रतिरक्षी तंत्र बहुत कमजोर होने से भी इस प्रतिरोपण के खारिज होने के अवसर बहुत कम हैं. हज़ारों स्टेम कोशिकाएँ आँख की दृष्टि को सुधार सकती हैं जबकि इतनी ही संख्या में स्टेम कोशिकाएँ खराब लीवर जैसे बड़े अंग को दोबारा नहीं बना सकती. |
| DATE: 2013-07-23 |
| LABEL: science |
| [355] TITLE: ये लोग चमका देंगे आपका ऑनलाइन प्रोफाइल |
| CONTENT: आप बिना जिम जाए ही अपनी छुट्टियों की तस्वीरों में शानदार दिखना चाहते हों या फिर बिना ऑनलाइन गेम खेले ही हाई स्कोर के बादशाह बनना चाहते हैं तो कुछ लोग हैं जो आपका काम आसान कर देंगे. बस इसके बदले आपको कुछ फीस चुकानी है. इस बात की भी संभावना है कि आप ऑनलाइन सेवा देने वाले इन लोगों से कभी मिले भी न. बस थोड़ी सी फ़ीस के बदले ये आपके प्रोफाइल को शानदार बनाए रखने में आपकी पूरी मदद करेंगे. आजकल पूरा एक उद्योग है जो लोगों और संस्थाओं को उनके ऑनलाइन प्रोफाइल का बेहतर प्रबंधन करने में मदद करता है. वर्ल्ड ऑफ वारक्रॉफ्ट ऑनलाइन गेम को क़रीब एक करोड़ लोग खेलते हैं जिनमें से बहुत से रोजाना 12 घंटे से अधिक इसमें लगे रहते हैं. ऐसे में यहाँ अपनी अलग पहचान बनाना खासा मुश्किल होता है. हालांकि यह खेल के नियमों के बिलकुल विपरीत है लेकिन फिर भी बहुत से एरेना बूस्टर हैं जो लोगों को ऊंचे स्कोर हासिल करने में मदद करते हैं. एरेना बूस्टर लोगों के बदले गेम खेलते हैं और जब उनका किरदार ऊंचा स्तर हासिल कर लेता है तो वे उन्हें सौंप देते हैं. हालाँकि इसके बदले वे फ़ीस लेते हैं. पूर्व एरेना बूस्टर फिलिप कारबुन ने बीबीसी को बताया कि किशोरावस्था में जब वे इस खेल के टॉप रेटेड प्लेयर थे तब लोग संदेश भेजकर उनसे मदद माँगते थे. यह संदेश दुनियाभर से आते थे. वे कहते हैं कि शुरू में तो मैं सिर्फ लोगों की मदद करना चाहता था फिर मैं इसके बदले पैसे लेना लगा. उनसे सलाह माँगने वाले ज्यादातर अमीर लोग थे जो सऊदी अरब जैसे देशों में रहते थे. वे कहते हैं एक कंप्यूटर प्रोग्रामर के तौर पर मैं जल्द ही यह जान गया था कि कितना पैसा बनाया जा सकता है. फिलिप अब 25 साल के हैं और अपने द्वारा शुरू की गई एरेना बूस्टर कंपनी के लिए काम नहीं करते हैं. एक समय उनके साथ दस लोग काम करते थे और वे एक ग्राहक से 130 से 420 पाउंड तक लेते थे. ऑस्ट्रिया में रहने वाले फिलिप दावा करते हैं कि गेम कंपनियाँ इस तरह की गतिविधियों को रोकने का पूरा प्रयास करती हैं लेकिन फिर भी ये काम धड़ल्ले से होता है. एरेना बूस्टर आजकल प्रॉक्सी आईपी एड्रेस और वीपीएन वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क के जरिए अपने ग्राहकों को सेवाएं देते हैं ताकि वे कंपनियों की पकड़ में न आ सकें. फिलिप अब वर्ल्ड ऑफ वारक्रॉफ्ट नहीं खेलते हैं और पैसा कमाने के लिए अब अपने वीडियो पोस्ट करते हैं. वे कहते हैं मैंने इस खेल पर करीब बीस हजार घंटे खर्च किए और अंततः इसमें मेरी रूचि नहीं रही. मैं अब पैसा कमाने का नया जरिया पाकर खुश हूँ. डेन कोबैन मार्केटिंग एजेंसी एफएसटी ग्रुप में सोशल मीडिया विशेषज्ञ हैं. वे एक समय में कई ग्राहकों की सोशल मीडिया एक्टिविटी का प्रबंधन करते हैं. एक वक्त ऐसा भी था जब वे एक साथ 15 लोगों के ऑनलाइन खाते चलाते थे. वे कहते हैं कि कुछ लोग अपने आप में ब्रांड होते हैं. उन लोगों के लिए बात करने का लहजा मायने रखता है. प्रोफाइल में स्माइली का इस्तेमाल करना या न करना या गंभीरता दिखाना या न दिखाना इन लोगों के लिए अहम होता है. कोबैन की कंपनी कई तरह की सेवाएँ देती है. वे ऑनलाइन खातों के संचालन से संबंधित राय भी देते हैं और पूरे खाते के प्रबंधन का काम भी देखते हैं. उनकी फीस सेवाओं पर निर्भर करती हैं लेकिन नतीजे हमेशा ठोस ही होते हैं. वे कहते हैं कि मार्केटिंग में निवेश का रिटर्न साबित करना मुश्किल काम हैं लेकिन कुछ चीजें तो हैं जो निश्चित तौर पर सोशल मीडिया के जरिए की जा सकती हैं. वे कहते हैं आप फेसबुक या ट्विटर के जरिए आने वाले लोगों की संख्या जान सकते हैं और आप इसे आय से जोड़कर भी देख सकते हैं. सोशल मीडिया यदि इतना ही अहम है तो लोग फिर अपने खातों का प्रबंधन स्वयं ही क्यों नहीं करते इस बारे में कोबैन कहते हैं लोगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती तमाम तरह के सोशल मीडिया से खुद को अपडेट रखना होता है. वे कहते हैं बहुत से लोग अभी फेसबुक और ट्विटर को ही सही से नहीं समझ पाए हैं जबकि इंस्टाग्राम पिंट्रेस्ट और स्नैपचैट जैसी वेबसाइटें लगातार बढ़ रही हैं. रिकॉर्डधारी यॉचमैन सर रोबिन नॉक्स जॉनस्टन ट्विटर पर व्यक्तिगत रूप से न आने के अपने फैसले पर अभी तक टिके हैं. हालाँकि एक साल पहले ही उनके नाम से खाता बन गया था. फिलहाल करीब 700 लोग उन्हें फ़ॉलो करते हैं और उन्होंने 136 ट्वीट की हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा मुझे समझाया गया था कि ट्विटर जरूरी है लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मेरी इसमें कोई रूचि नहीं है. लेकिन मेरे साथ काम करने वाली टीम इस बात पर जोर देती रही कि मेरा ट्विटर खाता होना ही चाहिए. मैं राजी हो गया लेकिन स्वयं कुछ भी न करने की शर्त पर. अकेले बिना रुके पूरे ग्लोब का चक्कर लगाने वाले सर रॉबिन की क्लिपर वैंचर बोट एंपायर के चेयरमैन हैं. वे कहते हैं कि मैं अपना ट्वीट स्वयं लिखता हूँ और फिर उन्हें अपने ऑफिस भेज देता हूँ. वे कहते हैं कि जब मैं ज्यादातर ट्वीट्स को बेहद सांसारिक पाता हूँ तो मुझे नहीं लगता कि मैं कुछ मिस कर रहा हूं. जेम ब्रैडली ने इसी साल अपनी कम खर्च वाली तस्वीर सुधार सेवा शुरू की है. वे एक फोटो को सही करने के लिए 10 पाउंड से भी कम फीस लेते हैं. और थोड़े से और ज्यादा पैसे में वे कई तस्वीर सुधार संबंधी सेवाएँ उपलब्ध करवाते हैं. वे कहते हैं कि लोग अभी भी छुट्टियों पर घूम रहे हैं और उनके पास तस्वीरें सुधारने का काफी काम आ रहा है. वे कहते हैं हो सकता है बहुत सी तस्वीरें रोजमर्रा की हों लेकिन बहुत सी तस्वीरें जीवन में एक ही बार होने वाले लम्हों की भी होती हैं. ब्रैडली कहते हैं कि कुछ लोगों के लिए तस्वीरें ठीक करने वाले सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करना बेहद चुनौतीपूर्ण काम होता है. कई लोगों के लिए तो बेहद सरल टूल इस्तेमाल करना भी मुश्किल होता है. कई बार तस्वीर को ठीक करने के लिए उन लोगों की जरूरत होती है जो तस्वीरों को समझते हैं. ब्रैडली ने बीबीसी को बताया कि वे अपने ग्राहकों की उम्र के बारे में रिकॉर्ड नहीं रखते हैं लेकिन ज्यादातर ग्राहक बढ़ती उम्र के हैं. उनकी सेवाएं रियल स्टेट एजेंटों के बीच भी खासी लोकप्रिय हो रही हैं. इनमें से ज्यादातर अपने फोन के जरिए तस्वीरें खींचते हैं. ब्रैडली कहते हैं कैमरा तो अच्छा होता है लेकिन लेंस का साइज और मौसम कई बार समस्या खड़ी कर देता है. हम तस्वीरें सीधी करते हैं मैदान से गंदगी साफ कर देते हैं और आसमान को साफ और नीला कर देते हैं. और यह व्यापार विवरण अधिनियम के खिलाफ़ भी नहीं है. |
| DATE: 2013-07-22 |
| LABEL: science |
| [356] TITLE: क्यों बढ़ रही हैं महिलाओं की मौत |
| CONTENT: ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि ऐसी महिलाओं की तादाद बढ़ती जा रही है जो शराब में डूब कर अपनी ज़िंदगी गंवा रही हैं. शराब पीकर बहक जाने या बीमार पड़ जाने का अरोप अक्सर पुरुषों पर लगता है लेकिन महिलाऐं भी इन मामलों में पीछे नहीं हैं. ब्रिटेन के तीन शहरों ग्लॉसगो लिवरपूल और मेनचेस्टर में हुए शोध में यह बात सामने आई है. इस शोध में वर्ष 1980 से 2011 के बीच सभी उम्र की महिलाओं और पुरुषों का अध्ययन किया गया. इस अध्ययन में ये बात सामने आई कि शराब पीने से होने वाली बीमारियों के चलते मरने वालों की कुल संख्या में कमी आई है. लेकिन इसके उलट महिलाओं में इन बीमारियों के कारण मृत्यु दर बढ़ गई है. विशेषज्ञों ने कहा है कि अध्ययन के नतीजे 1970 के दशक में जन्मी उन महिलाओं के लिए चेतावनी हैं जिन्हें शराब पीने की आदत है. उन्होंने यह भी कहा कि ज़्यादा शराब पीने की समस्या से निपटने के लिए इंग्लैंड और वेल्स की सरकार ने शराब के लिए न्यूनतम मूल्य की नीति बनाई है. इस सप्ताह ही इस नीति को लागू किया गया है. एपिडेमियोलॉजी एंड कम्यूनिटी हेल्थ नाम की पत्रिका में यह अध्ययन प्रकाशित हुआ है. इसमें तीन शहरों में शराब से संबंधित नैतिकताओं के स्वरूपों का अध्ययन किया गया. इन तीनों ही शहरों में अभाव ख़राब स्वास्थ्य और औद्योगिकीकरण का स्तर समान है. इस अध्ययन में 1910-1979 और 1980 -2011 के बीच जन्मे लोगों की शराब पीने से हुई मौतों की तुलना की गई है. मोटे तौर पर यह बात सामने आई कि शराब पीने से औरतों की तुलना में आदमी ज़्यादा मरते हैं. सबसे ज़्यादा प्रभावित वह होते हैं जो अपनी उम्र के चालीसवें या पचासवें पड़ाव पर होते हैं. विशेषज्ञों ने दोनों समय कालों की जनसँख्या से लिए गए नमूनों में 34 साल की महिलाओं की मृत्यु दर की तुलना का दमदार उदाहरण दिया है. इस उम्र की 1950 के दशक में जन्मी महिलाओं में शराब पीने से प्रति एक लाख में से आठ महिलाओं की मृत्यु होती थी. 1960 के दशक में जन्मी महिलाओं में यह आंकड़ा बढ़ कर 14 हो गया. 1970 के दशक में जन्मी महिलाओं के लिए स्थिति और भी ख़तरनाक हो गई. इस वर्ग की प्रति एक लाख में से 20 महिलाओं की मृत्यु शराब पीने से हुई. हर दशक में तेज़ी से बढ़ता हुआ यह रुझान चेतावनी देता है. पुरुषों के लिए 1910-1979 और 1980 -2011 के बीच की तुलना के नतीजे थोड़ा राहत देते हैं. शराब के सेवन से मरने वाले पुरुषों की सँख्या में कमी आई है. 1950 के दशक के पुरुषों में हर एक लाख में से 22 शराब पीने की वजह से मर जाते थे. 1960 के दशक के प्रति एक लाख में से 38 पुरुष इस वजह से अपनी जान से हाथ धो बैठते थे. लेकिन 1970 के दशक में यह आँकड़ा घट गया. 1970 के दशक में जन्में पुरुषों में प्रति एक लाख में से केवल 30 शराब की बलि चढ़े. अध्ययन करने वाले दल की प्रमुख डॉक्टर डेबोरा शिपटन ने एपिडेमियोलॉजी एंड कम्यूनिटी हेल्थ पत्रिका में लिखा है कि महिलाओं की बढ़ती मृत्यु दर को नज़रंदाज़ करना मुश्किल है. वह कहती हैं क्योंकि तीनों ही शहरों की युवा महिलाओं में यह रुझान देखने को मिला है इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि यह केवल एक शहर की बात है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस नए प्रचलन से आने वाले दशकों में यह मृत्यु दर बढ़ सकती है. अध्ययन करने वाले दल ने बताया कि आसानी से उपलब्ध सस्ती शराब और पीने के ज़्यादा घंटों की वजह से यह समस्या बढ़ी है. डॉक्टर डेबोरा शिपटन ने बीबीसी को बताया कि शराब के लिए न्यूनतम मूल्य की नीति को इंग्लैंड और वेल्स में ख़ारिज किया जाना शर्मनाक है. उन्होंने कहा कि इस नीति से समस्या का समाधान होता. हालांकि इससे शराब से संबंधित गहरे सांस्कृतिक प्रभाव पर फ़र्क़ नहीं पड़ता. सरकार ने कहा कि इस बात के कोई पुख्ता सुबूत नहीं थे कि शराब के लिए न्यूनतम मूल्य की नीति बनाने से पीने के हानिकारक प्रभाव की समस्या कम हो जाएगी और इससे वो लोग प्रभावित नहीं होंगे जो कि ज़िम्मेदारी से पीते हैं. स्कॉटलैंड की सरकार अभी भी शराब की क़ीमत 50 पेनी प्रति यूनिट रखने के लिए प्रतिबद्ध है. स्कॉच विह्स्की एसोसिएशन ने भी कुछ क़ानूनी प्रक्रियाऐं शुरू कर दी हैं. इनसे निपटे बिना शराब के लिए न्यूनतम मूल्य की नीति को लागू नहीं किया जा सकता. |
| DATE: 2013-07-20 |
| LABEL: science |
| [357] TITLE: मंगल पर जीवन के 'मज़बूत साक्ष्य' |
| CONTENT: अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के क्यूरियोसिटी रोवर को मंगल पर गए करीब एक साल हो चुके हैं. इस दौरान क्यूरियोसिटी रोवर ने जो तथ्य इकमंगल ग्रह के वायुमंडल के विस्तृत अध्ययन से पता चला है कि चार अरब साल पहले मंगल ग्रह का वायुमंडल पृथ्वी से ज़्यादा अलग नहीं था. उस समय मंगल का वायुमंडल काफ़ी सघन हुआ करता था. इन नए नतीजों से इस बात को बल मिलता है कि उस समय इस ग्रह की सतह गर्म और शुष्क रही होगी और यहाँ पानी भी मौजूद रहा होगा. हालाँकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि मंगल पर कभी भी किसी प्रकार का जीवन था या नहींओपेन यूनिवर्सिटी की डॉक्टर मोनिका ग्रैडी कहती हैं इस अध्ययन से पहली बार यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मंगल ग्रह पर जल और वायुमंडल की कितनी क्षति हुई होगी उस समय मंगल का वायुमंडल कैसा रहा होगा और क्या उस समय मंगल ग्रह पर जीवन संभव रहा होगा. पूरी संभावना है कि समय का साथ मंगल ग्रह का चुम्बकीय क्षेत्र और वायुमंडल नष्ट हो गया और यह ग्रह एक सूखे निर्जन ग्रह में बदल गया. 26 नवंबर 2011 को इस यान को अंतरिक्ष से छोड़ा गया था और क़रीब 24 हज़ार करोड़ मील की दूरी तय कर यह यान मंगल पर उतरा था. परमाणु ईधन से चलने वाले इस क्यूरियोसिटी रोवर अभियान की लागत है क़रीब 2-5 अरब डॉलर. इस अभियान के तहत नासा वैज्ञानिकों ने एक अति उन्नत घूमती फिरती प्रयोगशाला को मंगल ग्रह पर भेजा है. इस प्रयोगशाला से मिली जानकारी मंगल ग्रह के इतिहास को समझने में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है. रोवर की यात्रा के तीन चरण हैं पहला है मंगल ग्रह में प्रवेश दूसरा नीचे सतह की ओर आना और तीसरा ज़मीन पर उतरना. इस मार्स रोवर का वज़न 900 किलो है और यह अपनी क़िस्म के अनोखे कवच में ढँका हुआ है. |
| DATE: 2013-07-19 |
| LABEL: science |
| [358] TITLE: अब शार्क को 'चकमा' देगा ये सूट |
| CONTENT: शिकारी शार्क मछलियाँ अपने खूँखार व्यवहार और आतंक के लिए जानी जाती हैं. लेकिन उनकी भी कुछ कमज़ोरियाँ हैं. इन्हीं का फायदा उठाते हुए एक सूट बनाया गया है. दावा किया जा रहा है कि द डाइवर्टर नाम का सूट पहन कर समुद्र में जाने से शार्क के हमले से बचा जा सकेगा. समुद्र में जाना रोमांचक होता है लेकिन साथ ही समुद्री जीवों के हमले का ख़तरा भी हमेशा बना रहता है. जब शार्क की बात आती है तो अच्छे- अच्छों के छक्के छूट जाते हैं. इसे बनाने वाले ऑस्ट्रेलिया के दो व्यवसायियों का दावा है कि यह अपनी तरह का पहला सूट है. इसे एक विश्वविद्यालय की शोध परियोजना की मदद से तैयार किया गया है. इसकी बनावट भी ख़ास है. पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में शार्क के हमलों के बढ़ते मामलों के बाद इसे बनाने का काम शुरू किया गया था. द डाइवर्टर के निर्माताओं का कहना है कि उन्होंने इस सूट को शार्क के बारे में मिली नई वैज्ञानिक जानकारियों के आधार पर तैयार किया है. निर्माताओं का कहना है कि शार्क रोशनी को किस तरह से देखती है. किन रंगो को वह देख पाती हैं किन्हें नहीं देख पाती है इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए इस सूट को तैयार किया गया है. उन्होंने कहा कि यह शार्क की नज़र से गोताखोर या उसकी साँस लेने की नली को छिपा सकेगा. दोनों ऑस्ट्रेलियाई उद्यमियों में से एक क्रेग एंडर्सन ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि यह वेटसूट शार्क की नज़र को भ्रमित कर देगा. वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय की शोधकर्ता शोइन कॉलिन कहती हैं कि काले- सफ़ेद रंग वाला यह सूट इंसान से शार्क को दूर रखेगा. वह कहती हैं कई जानवर पट्टियों को देख कर दूर भागते हैं. इससे उन्हें संकेत मिलते है कि इसका शिकार करना सुरक्षित नहीं होगा. पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने टाइगर शार्क पर परीक्षण करने के लिए वित्तीय मदद दी है. परीक्षण के लिए पुतलों को वेटसूट पहना कर समुद्र में डाला गया. पाया गया कि टाइगर शार्क उन पुतलों के पास से आगे बढ़ गई जिन पुतलों ने पट्टीदार वेटसूट पहना था. शार्क ने उन्हीं पुतलों पर हमला किया जिन्होंने काली पोशाक पहन रखी थी. दक्षिण ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के समुद्र में और भी परीक्षण किये जाने हैं. क्रेग एंडर्सन ने कहा कि दुनिया भर में शार्क को दूर भगाने की तकनीक की बहुत अधिक माँग है. उन्होंने कहा सभी को उपाय चाहिए दुनिया में सभी को पानी में जाने से घबराहट होती है. ब्रिटेन में शार्क संरक्षण ट्रस्ट की अध्यक्ष एली हुड ने बीबीसी को बताया कि पानी के खेलों में लोगों की रूचि बढ़ी है और अब पहले से ज्यादा लोग पानी में जा रहे हैं. ट्रस्ट शार्क को दूर रखने के उपायों में हो रही प्रगति का स्वागत करता है. उन्होंने यह भी कहा कि शार्क से संबंधित दुर्घटनाएँ या मौतें तभी होती हैं जब लोग तटों पर लगाई गई चेतावनी पर ध्यान न देकर समुद्र में चले जाते हैं. सुबह और शाम के समय समुद्र में जाने से शार्क का खतरा बढ़ जाता है. |
| DATE: 2013-07-19 |
| LABEL: science |
| [359] TITLE: आप पिएँगे पसीने से बना पीने वाला पानी? |
| CONTENT: स्वीडन में एक ऐसी मशीन का इस्तेमाल हो रहा है जो पसीने से भीगे कपड़ों से नमी लेकर उसे पीने के पानी में तब्दील कर देती है. ये उपकरण कपड़े को घुमाकर और गर्म करके उसमें से पसीना निकाल देता है फिर उससे निकले वाष्प को एक ख़ास पतली झिल्ली से गुज़ारा जाता है. उस झिल्ली से सिर्फ़ पानी के ही अणु गुज़र सकते हैं. इसे बनाने वालों के मुताबिक़ सोमवार को इस मशीन के लॉन्च के बाद से गोथेनबर्ग में लगभग 1000 लोग दूसरों का पसीना पी चुके हैं. उन्होंने कहा है कि उस मशीन से बनने वाला पानी स्थानीय नल के पानी से ज़्यादा साफ़ है. ये उपकरण बच्चों के संयुक्त राष्ट्र के संगठन यूनिसेफ़ के एक अभियान के लिए बनाया गया है जिसमें ये बताने की कोशिश की जा रही है कि दुनिया के 78 करोड़ लोगों को पीने का साफ़ पानी तक नहीं मिल पा रहा है. इंजीनियर आंद्रियास हैमर ने ये मशीन बनाई है. उन्होंने बताया ये मशीन एक तकनीक का इस्तेमाल करती है जिसे मेम्ब्रेन डिस्टिलेश यानी झिल्ली के ज़रिए होने वाला आसवन कहा जाता है. हैमर के मुताबिक़ हम गोर्टेक्स जैसे एक पदार्थ का इस्तेमाल करते हैं जो सिर्फ़ भाप को आगे जाने देता है मगर विषाणुओं विभिन्न सॉल्ट यानी लवण कपड़े के रेशे और अन्य चीज़ों को बाहर ही रखता है. उन्होंने बताया अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र पर भी कुछ ऐसी ही व्यवस्था है जहाँ अंतरिक्ष यात्रियों के मूत्र से जल बनाया जाता है मगर हमारी मशीन बनाने में सस्ती थी. वह कहते हैं इससे कितना पानी बनता है ये इस बात पर निर्भर करता है कि उस व्यक्ति का पसीना कितना निकलता है. मगर एक व्यक्ति के पसीने से आम तौर पर 10 मिलीलीटर या एक कुल्ला भर पानी निकल आता है. इस मशीन का सार्वजनिक प्रदर्शन करने वालों के मुताबिक़ मशीन से यूनिसेफ़ के बारे में जागरूकता तो बढ़ी है मगर असलियत में इसकी अपनी सीमाएँ हैं. स्टॉकहोम स्थित विज्ञापन एजेंसी डेपोर्टिवो के मुख्य कार्यकारी मैटियास रोंगे कहते हैं हमें जितनी उम्मीद थी लोगों से उतना पसीना मिला नहीं. इसलिए हमने बगल में एक्सरसाइज़ करने वाली साइकिलें लगा रखी हैं और लोग पागलों की तरह उसे चलाकर पसीना निकाल रहे हैं. वैसे रोंगे के मुताबिक़ फिर भी जितने पसीने की ज़रूरत है उसके मुक़ाबले आपूर्ति काफ़ी कम है. साथ ही मशीन कभी भी बड़े पैमाने पर शायद न ही बने क्योंकि पानी साफ़ करने वाली गोलियों जैसे कुछ और सस्ते साधन लोगों के पास उपलब्ध हैं. |
| DATE: 2013-07-19 |
| LABEL: science |
| [360] TITLE: ये चाकू सूँघ लेगा कैंसर का ट्यूमर |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने एक ऐसा आधुनिक चाकू बनाया है जो कैंसर की सर्जरी के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है. लंदन के इम्पीरियल कॉलेज की टीम ने इस समझदार चाकू को बनाया है. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इससे कैंसर सर्जरी के दौरान ट्यूमर की कोशिकाएं शरीर में छूटने के खतरे और समस्याओं को दूर किया जा सकता है. कई बार यही कोशिकाएं फिर से ट्यूमर को जन्म देने लगती हैं. विज्ञान पत्रिका ट्रांसलेशनल मेडिसिन में प्रकाशित शुरुआती नतीजों के अनुसार आई नाइफ़ ऑपरेशन के दौरान कैंसर उत्तकों की सही-सही पहचान कर पाने में सक्षम था. अब इस उपकरण का चिकित्सीय परीक्षण हो रहा है ताकि पता लगाया जा सके कि क्या ये वाकई लोगों की जान बचाने में मददगार होगा. कैंसर वाले ऊतकों के शरीर में रह जाने के खतरे से बचने के लिए सर्जन आस-पास के उत्तकों को भी काट देते हैं. कई बार ऑपरेशन के दौरान ही वह जाँच के लिए नमूने भेजते हैं. इस प्रक्रिया में समय लगता है. फिर भी कई बार कैंसर कोशिकाएँ शरीर में बची रह जाती हैं. ब्रेस्ट कैंसर के मामले में पाँच में से एक मरीज़ को दोबारा ऑपरेशन करवाना पड़ता है. फेंफड़ों के कैंसर के मामले में हर 10 में से एक मरीज़ को दोबारा ऑपरेशन करवाने की ज़रुरत पड़ती है. इम्पीरियल कॉलेज की टीम ने ऑपरेशन में काम आने वाले चाक़ू में कुछ तकनीकी सुधार किए हैं. इस नए चाकू में कोशिका को काटने के लिए ऊष्मा का प्रयोग किया जाता है. दुनिया भर के अस्पतालों में इस तरह के सर्जिकल चाकू का प्रयोग होता रहा है. अब इस चाकू आई नाइफ़ की ऊष्मा से कट रही कोशिका के धूँए से सर्जन जान सकेंगे कि कोशिका में कैंसर है या नहीं. इस चाकू में तकनीकी रूप से उन्नत मास स्पेक्टोमीटर लगा है जो इसकी नाक की तरह काम करता है. यह स्वस्थ और कैंसर वाले धुएं के अंतर बता देता है. अब तक 91 मरीज़ों पर इसका सफल परीक्षण किया जा चुका है. इम्पीरियल कॉलेज के डॉक्टर ज़ोल्टन ने इसे बनाया है. वह बताते हैं इसके नतीजे बताते हैं कि इसे कई तरह के कैंसर के ऑपरेशन में प्रयोग किया जा सकता है. उन्होंने कहा हमें उम्मीद है कि इससे दोबारा ट्यूमर होने के मामले कम होंगे और ज़्यादा मरीज़ नया जीवन पा सकेंगे. ब्रिटेन के तीन अस्पतालों में अब इस चाकू को आज़माया जा रहा है. |
| DATE: 2013-07-18 |
| LABEL: science |
| [361] TITLE: कौन बढ़ाता है आपकी तोंद? |
| CONTENT: अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने जीन में गड़बड़ी के कारण मोटापा बढ़ने के रहस्य को सुलझाने का दावा किया है. बढ़ी हुई तोंद के लिए जीन के एक प्रारूप एफटीओ को जिम्मेदार माना जाता है लेकिन ऐसा क्यों होता है इसका कारण स्पष्ट नहीं था. द जर्नल ऑफ़ क्लिनिकल इन्वेस्टिगेशन में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक़ वसायुक्त भोजन ज़्यादा ललचाता है और भूख के लिए जिम्मेदार हॉर्मोन ग्रेलिन के स्तर में बदलाव करता है. मोटापा घटाने पर काम करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रेलिन को प्रभावित करने वाली दवाओं से वज़न को कम किया जा सकता है. मोटापे को पारिवारिक पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा जाता है और माना जाता है कि किसी व्यक्ति का जेनेटिक कोड उसके मोटापे में अहम भूमिका निभाता है. हर व्यक्ति में एफटीओ जीन के दो प्रारूप होते हैं. एक मां से आता है और एक पिता से. हर प्रारूप में उच्च और कम जोखिम वाले स्वरूप होते है. जिन लोगों में दोनों उच्च जोख़िम वाले प्रारूप होते हैं उनके मोटे होने की संभावना कम जोख़िम जीन प्रारूप वाले लोगों से 70 प्रतिशत अधिक होती है. लेकिन कोई नहीं जानता था कि ऐसा क्यों होता है. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के अनुसंधानकर्ताओं के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने लोगों के दो समूहों पर प्रयोग किए. दोनों समूहों में सामान्य वज़न वाले लोगों को रखा गया लेकिन एक समूह के लोगों में उच्च जोख़िम वाले एफटीओ जीन थे जबकि दूसरे समूह के लोगों में कम जोख़िम वाले जीन थे. पहले प्रयोग में खाने के बाद हर समूह में ग्रेलिन के स्तर को देखा गया. खाना खाने के बाद उच्च जोख़िम जीन वाले लोगों में भूख बढ़ाने वाले हॉर्मोन के स्तर में कोई कमी नहीं आई. उनमें ग्रेलिन का स्तर भी तेज़ी से बढ़ता है. दूसरे प्रयोगों में खाना खाने के बाद मस्तिष्क स्कैन से दोनों समूहों के बीच अंतर और स्पष्ट हो गया. उच्च जोख़िम जीन वाले लोगों के स्कैन को देखने पर पता चला कि उनमें उच्च वसा वाले खाने के प्रति लालसा कम जोख़िम जीन वाले लोगों से ज़्यादा थी. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में मोटापे से संबंधित अध्ययन केंद्र के प्रमुख डॉक्टर रशेल बैटरहैम ने बीबीसी से कहा उनका दिमाग उच्च कैलोरी वाले खाने की ही बात सोचता रहता है. जैविक रूप से वो ज़्यादा खाने के लिए ही बने होते हैं. उन्होंने कहा कि इस रिसर्च से पता चलता है कि एफटीओ की कार्यप्रणाली समझ में आने के बाद मोटे लोगों के इलाज में मदद मिलेगी. डॉक्टर बैटरहैम ने कहा कि साइक्लिंग जैसी कसरत ग्रेलिन के स्तर को घटाने का बढ़िया तरीका है और इस हॉर्मोन पर दवा कंपनियां कई अनुसंधान कर रही हैं. |
| DATE: 2013-07-18 |
| LABEL: science |
| [362] TITLE: जल्दी ही फ़र्राटा भरेगी चालक रहित कार |
| CONTENT: ब्रिटेन में इस साल के अंत तक मानवरहित कारें दौड़ेंगी. ब्रिटिश सरकार के मुताबिक़ मानव रहित कारों का परीक्षण सार्वजनिक सड़कों पर किया जाएगा. अब तक ब्रिटेन में इस तरह की कारों के परीक्षण निजी स्थानों पर ही होते रहे थे. चालक रहित कारें सेंसरों और कैमरा प्रणाली के ज़रिए चलती हैं. इन्हें सामान्य कारों के मुक़ाबले अधिक सुरक्षित और कुशल माना जाता रहा है. परीक्षण के दौरान सुरक्षा की दृष्टि से एक ड्राइवर भी कार में सवार रहेगा जो आपात स्थिति में कार की कमान संभाल लेगा. इस योजना के ब्लूप्रिंट को ब्रिटेन के यातायात विभाग ने जारी किया. विभाग सड़कों पर भीड़ कम करने के लिए 28 अरब पाउंड ख़र्च कर रहा है. जारी की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि चालक रहित कारें अपने आप चलने में सक्षम हैं. ये कारें सुरक्षित चलने के लिए यातायात के माहौल के बारे में अपना ज्ञान इस्तेमाल करती हैं. रिपोर्ट के मुताबिक़ यह कारें ड्राइवर के बिना ही आगे चल रहे वाहनों से उचित दूरी बनाए रखती हैं और अपने लेन से बाहर नहीं निकलती. फ़िलहाल कारों को ग्रामीण एव अर्धशहरी इलाक़ों में सेमी-आटो मोड में चलाया जाएगा. यानि कार में सवार यात्री के पास कार का नियंत्रण अपने हाथ में लेने का विकल्प रहेगा. कारों का परीक्षण ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की टीम करेगी. यह टीम चालक रहित कार तकनीक के विकास पर काम कर रही है और ऑक्सफोर्ड साइंस पार्क के नज़दीक परिवर्तित निसान लीफ कारों पर परीक्षण कर रही है. इस तकनीक में रास्तों को याद करने के लिए लेजर और छोटे कैमरों का इस्तेमाल किया जाता है. कार अपने रास्ते को याद कर लेती है. ऑक्सफोर्ड टीम का नेतृत्व कर रहे प्रोफैसर पॉल न्यूमैन ने बीबीसी से कहा हम सार्वजनिक सड़कों पर कार के परीक्षणों को लेकर उत्साहित हैं. इस योजना पर काम करना रोमांचकारी है. इसमें हम सूचना प्राद्योगिकी और कंप्यूटर तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं. ब्रिटिश सरकार को भी लगता है कि इंजीनियरिंग महत्वपूर्ण हैं. निजी क्षेत्र में इस तकनीक के इस्तेमाल की अगुवाई इंटरनेट कंपनी गूगल कर रही है. गूगल ने एक परिवर्तित टोयेटा पायरस कार से सार्वजनिक सड़कों पर तीन लाख मील का सफर तय किया है. गूगल के सह-संस्थापक सर्जे ब्रिन को विश्वास है कि चालक रहित कार मानव जीवन के स्तर को और ऊपर उठा देगी. उन्हें लगता है कि यह कार एक दशक के अंदर बाजार में मिलने लगेगी. प्रोफेसर न्यूमैन स्वीकार करते हैं कि गूगल इस मामले में आगे रहा है लेकिन वह यह भी कहते हैं कि अब गूगल मैदान में अकेला नहीं है. हालाँकि अभी तक इस तकनीक को कार के मौजूदा मॉडलों पर ही टेस्ट किया गया है लेकिन फोर्ड ऑडी और वोल्वो जैसे कंपनियों ने तकनीक की लागत कम होने पर नई कारें इजाद करने में रूची दिखाई है. यदि इन कंपनियों ने चालक रहित कारें बनाई तो निश्चित रूप से इनका इस्तेमाल बढ़ेगा. हालाँकि इंश्योरेंस कंपनी एए के सड़क पॉलिसी विभाग के मुखिया पॉल वाटर्स सावधानी बरतने पर जोर देते हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया अतीत में हमारे सदस्यों ने पूर्ण रूप से स्वचलित कारों के प्रति चिंता ज़ाहिर की है और मानव संचालित कारों को तरजीह दी है. वे कहते हैं कॉफ़ी पीते हुए अख़बार पढ़ना अभी दूर की कौड़ी है. यह तकनीक अभी शुरुआती दौर में है और चालक रहित कारें लंबे वक़्त तक मुख्यधारा में नहीं आ पाएंगी. आज की कार पहले से ही गाइडेड पार्किंग और क्रूज कंट्रोल जैसी आधुनिक तकनीकों से लैस है. इसलिए पूरी तरह से चालक रहित कार विकास की इस प्रक्रिया का नतीजा होगी न कि एक रात के अंदर हुआ चमत्कार. |
| DATE: 2013-07-18 |
| LABEL: science |
| [363] TITLE: मोबाइल चार्जर जो पेशाब से चलेगा. |
| CONTENT: पश्चिमी इंग्लैंड की ब्रिस्टल रोबोटिक्स लैब के वैज्ञानिक एक ऐसी योजना पर काम कर रहे हैं जिसमें पेशाब घर या शौचालय का इस्तेमाल एक छोटे से बिजली घर के रूप में किया जा सकेगा. इसके लिए पहले चरण में वैज्ञानिक एक ऐसा मोबाइल फ़ोन चार्जर बनाएंगे जिससे कम से कम इतनी काम लायक बैटरी चार्ज हो सके ताकि छह मिनट तक बातचीत हो सके इंटरनेट चल सके साथ ही संदेश भी भेजे जा सकें. योजना के मुख्य शोधकर्ता डॉक्टर इऑनिस इरोपोयुलॉस कहते हैं कि विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए तमाम विकल्प संभव हैं. वो कहते हैं कल्पना कीजिए कि हम संसार के किसी देश के ऐसे कोने में हों जो बाहरी दुनिया से अलग-थलग हो. वहाँ हम उस मल मूत्र का इस्तेमाल कर पाएं. दूसरी ओर कल्पना कीजिए कि हमारे पास एक ऐसा प्लग हो जो घर के स्नानघर में बने शौचालय से निकलता हो. दरअसल ये बेहद सूक्ष्म ईंधन कोशिकाओं से चलता है इन कोशिकाओं को 12 साल के शोध के बाद बनाया गया है. इन कोशिकाओं में बिजली पैदा करने वाले जीवाणु होते हैं. इन जीवाणुओं का प्रिय भोजन पेशाब है. वैज्ञानिकों को इसमें आशा की किरण नज़र आ रही है. उन्हें उम्मीद है कि आने वाले दो-तीन सालों में ऐसी तकनीक विकसित कर ली जाएगी जिसका इस्तेमाल किया जा सके. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी कीमत कम होगी और इसे घर के स्नानघर शौचालयों में लगाया जा सकेगा. यहाँ आप न सिर्फ बिजली से चलने वाले उपकरणों का इस्तेमाल कर सकेंगे बल्कि मोबाइल फ़ोन भी चार्ज कर सकेंगे. |
| DATE: 2013-07-18 |
| LABEL: science |
| [364] TITLE: सूरज की सतह पर सूनामी सी हलचल |
| CONTENT: अंतरिक्ष में मौजूद दो उपग्रहों ने सूरज की सतह पर सूनामी सी हलचल का पता लगाया है. सूर्य की सतह पर हो रहे विस्फोटों से पैदा होने वाली सौर हवाओं का प्रसार अंतरिक्ष में होते हुए देखा गया है. इसे कोरोनल मास इंजेक्शन या सीएमई भी कहा जाता है. ये सौर हवाएँ सूर्य के चुम्बकीय क्षेत्र के प्रभाव को और अधिक बढ़ा रही हैं. इसके साथ ही गर्म एवं विद्युतीय रूप से आवेशित आयोनाइज़्ड गैसों का प्रसार 400 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ़्तार से हो रहा है. इत्तेफ़ाक़ से देखी गई इन सौर हलचलों का विश्लेषण सोलर फ़िज़िक्स में प्रकाशित किया जाना है. इससे सूरज के सीएमई से दूर के चुम्बकीय प्रभाव वाले क्षेत्र के शांत हिस्सों को मापा जाना है. माना जा रहा है कि इस क्षेत्र के अध्ययन से पृथ्वी पर सीएमई के पड़ने वाले असर का पता लगाया जा सकता है. इसका श्रेय हिनोडे नाम के उपग्रह को दिया गया है. हिनोडे उन दो उपग्रहों में से एक है जिसने सौर हलचलों से संबंधित ये आँकड़ें इकठ्ठे किए थे. सूर्य के चारों ओर मौजूद वलयाकार आकृति या कोरोना इसकी सतह से अधिक गर्म रहता है. वैज्ञानिकों के लिए यह तथ्य 70 सालों से एक रहस्य बना हुआ है. इस प्रगति के बाद अनुसंधानकर्ता का कहना है कि इस रहस्य का पता लगाना अब संभव हो पाएगा. जापानी उपग्रह हिनोडे साल 2006 से ही सूर्य का अध्ययन कर रहा है. यह 2010 में सोलर डायनमिक्स ऑब्जर्वेट्री की सहायता से पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया था. दोनों ही उपग्रह सूर्य से निकलनेवाली पराबैंगनी किरणों का अध्ययन कर रहे हैं. हालांकि इन रंगों को आँखों से देखा नहीं जा सकता लेकिन सूर्य की हलचल भरी सतह के पास की परिस्थितियों और वहाँ होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं से जुड़े संकेत प्राप्त हुए हैं. यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लंदन के डेविड लांग और उनके सहयोगियों ने आख़िरकार उन ईआईटी तरंगों को पकड़ ही लिया जो सीएमई के बाद निकलते हैं. यह किसी भूकंप सरीखी घटना के बाद उठने वाले सूनामी जैसे तूफ़ान की तरह है. ईआईटी तरंगें उच्च दबाव वाली तरंगें हैं जिनमें ऊष्मा एवं चुम्बकीय प्रभाव रहता है. इसके अलावा इनमें विद्युतीय आवेशित प्लाज़्मा का भी अवशेष पाया गया है. डॉक्टर लॉन्ग ने बीबीसी न्यूज़ से कहा ये ईआईटी तरंगें बेहद पेचीदा क़िस्म की हैं. ये अनियमित क़िस्म की हैं और कभी-कभार ही होती हैं. ज़रूरत इस बात की थी कि हम सही वक़्त पर सही जगह पर रहें. यह बहुत लंबे समय के बाद हुआ है. |
| DATE: 2013-07-14 |
| LABEL: science |
| [365] TITLE: देर से सोएगा बच्चा तो पढ़ाई में होगा कमजोर! |
| CONTENT: एक ताज़ा शोध कहता है कि अगर बच्चे रात को देर से सोते हैं तो इससे उनके दिमाग़ पर असर पड़ सकता है. ब्रिटेन में सोने की आदतों और दिमाग की क्षमता के बीच संबंध पर इस शोध में सात साल की उम्र के 11 हज़ार से ज्यादा बच्चों पर अध्ययन किया गया है. जिन बच्चों का रात को सोने का कोई नियमति समय नहीं था या जो रात के नौ बजे के बाद सोते थे वो पढ़ने में और गणित में कमजोर पाए गए. शोधकर्ताओं का कहना है कि नींद की कमी से एक तरफ तो शरीर की लय बिगड़ सकती है तो दूसरी तरफ नई बातें सीखने की दिमाग की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है. शोधकर्ताओं ने पहले तीन साल फिर पांच साल और उसके बाद सात साल की उम्र में नई चीजें सीखने की इन बच्चों की क्षमता पर जानकारी जुटाई और ये जानने की कोशिश भी की कि क्या इस क्षमता का नींद से कोई संबंध है. तीन साल की उम्र में ज्यादातर बच्चे के सोने के समय में बहुत अनियमितता पाई गई. पांच में से लगभग एक बच्चे के सोने का बहुत ही अलग अलग पाया गया. जब बच्चे सात साल के हुए तो उनमें से आधे आधे बच्चे एक निश्चित समय पर सोने लगे जो शाम साढ़े साथ से साढ़े आठ के बीच था. मिलाजुला कर देखा गया कि जिन बच्चों के सोने का समय निश्चित नहीं था उनके अंक रीडिंग गणित और सामान्य ज्ञान की परीक्षा में अपने बाकी साथियों से कम आए. देर से सोने की आदत का बुरा असर लड़कों से ज्यादा लड़कियों में देखा गया. यह भी पाया गया कि लडकियों में इस तरह की परेशानियां आगे भी रहीं. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की प्रोफेसर अमांडा सैकर नेतृत्व में शोधकर्ताओं की टीम ने बताया कि यह भी संभव है कि सोने की अनियमित दिनचर्या परिवार में अशांत माहौल के कारण हो. इन परिस्थितियों में यह कहा जा सकता है कि देर से सोने की आदत की बजाय पारिवारिक कलह या अशांति बच्चे के विकास पर बुरा असर डाल रही है. प्रोफ़ेसर सैकर ने कहा हम इन कारणों पर भी सोच विचार कर रहे हैं. देर से और अनियमित समय से सोने वाले बच्चे ज्यादातर गरीब परिवारों से आते हैं. ऐसे बच्चे रात को पढ़ने की बजाय टीवी ज्यादा देखते रहते हैं. यह टीवा अकसर उनके बेडरुम में ही लगा होता है. प्रोफेसर सैकर आगे कहती हैं महत्वपूर्ण बात यह है कि एक अच्छी दिनचर्या बच्चों के लिए खास महत्व रखती है. बचपन में ही सोने का एक सही समय तय करना सबसे अच्छा होता है. मगर अब भी देर नहीं हुई है. वे यह भी मानती हैं कि इस बात के कोई प्रमाण नहीं है कि जिन बच्चों को समय से पहले सुला दिया गया हो उनका दिमाग ज्यादा तेज़ चलता है. |
| DATE: 2013-07-11 |
| LABEL: science |
| [366] TITLE: मूत्र से 'सूँघा जा सकेगा' मूत्राशय का कैंसर? |
| CONTENT: ब्रितानी वैज्ञानिकों ने एक ऐसा उपकरण तैयार किया है जो मूत्राशय में होने वाला कैंसर मूत्र के नमूने से सूँघ सकता है. अगर मूत्राशय में कैंसर पनप चुका है तो इसमें गैस के रूप में रसायन की मौजूदगी पाई जाती है. यह उपकरण एक सेंसर की मदद से इस रसायन का पता लगा लेता है. इसको बनाने वालों ने प्लॉस नामक एक पत्रिका को बताया है कि शुरुआती परीक्षणों में हुई 10 बार की जांच में से 9 बार जांच से सटीक परिणाम मिले. मगर विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पहले कि यह व्यापक पैमाने पर उपलब्ध हो जाँच से शत-प्रतिशत परिणाम पाने के लिए अभी और अध्ययन करने की जरूरत है. ब्रिटेन में हर साल करीब 10000 लोगों के मूत्राशय के कैंसर का इलाज किया जाता है. डॉक्टर लंबे समय से ऐसे तरीकों की तलाश कर रहे हैं जिनसे इस कैंसर का पता पहले चरण में ही लगाया जा सके. उस समय उसका इलाज आसान होता है. इनमें से कई डॉक्टर मूत्र की गंध की मदद से मूत्राशय कैंसर के खतरों का पता लगाने में लगे हैं. कैंसर का पता लगाने के लिए पिछले कुछ सालों में जो अनुसंधान किए गए हैं वे बताते है कि यदि कुत्तों को प्रशिक्षित किया जाए तो वह कैंसर को सूंघ लेते हैं. लिवरपूल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर क्रिस प्रोबर्ट और पश्चिमी इंग्लैंड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नार्मन रैटक्लिफ का कहना है कि उनके नए उपकरण कैंसर का पता लगा सकते हैं. प्रोफेसर रैटक्लिफ़ ने कहा यह उपकरण मूत्र में मौजूद उन रसायनों को सूंघ लेता है जो नमूने को गर्म करने पर पैदा होते हैं. उन्होंने अपने इस उपकरण को जांचने के लिए मूत्र के 98 नमूनों का इस्तेमाल किया. ये नमूने उन 24 पुरुषों के थे जो मूत्राशय के कैंसर से पीड़ित थे. और इसमें वैसे 74 पुरुषों के मूत्र के नमूने भी शामिल थे जो मूत्राशय से संबंधित बीमारियों से ग्रस्त थे. प्रोफेसर प्रोबर्ट का कहना है कि जांच के परिणाम बेहद उत्साहजनक थे. मगर उन्होंने बताया इससे पहले कि इस उपकरण का इस्तेमाल अस्पतालों में किया जाने लगे इसकी अभी और जांच करने की जरूरत है. इसके लिए हमें मरीजों से बड़े पैमाने पर नमूने इकट्ठे करने होंगे. |
| DATE: 2013-07-09 |
| LABEL: science |
| [367] TITLE: सूरज के बूते अमरीका के पार उड़ा जहाज़ |
| CONTENT: पूरी तरह सौर ऊर्जा से चलने वाले हवाई जहाज़ ने पूरे अमरीका की अपनी यात्रा पूरी कर ली है. जहाज़ ने भारतीय समयानुसार शनिवार दोपहर 0226 पर वॉशिंगटन से उड़ान भरी और रविवार सुबह 9. 15 पर यह न्यूयॉर्क के जेएफ़के हवाई अड्डे पर उतरा. जहाज़ की बाएँ डैने के क्षतिग्रस्त होने के कारण स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी के ऊपर से उड़ने की योजना को स्थगित करना पड़ा. पूरे अमरीका की यह अंतरमहाद्वीपीय यात्रा मई महीने की शुरुआत में सैन फ्रांसिस्को से शुरू हुई थी. इसमें जहाज़ 70 किमी/प्रति घंटा की अधिकतम रफ़्तार से उड़ा. अपनी यात्रा में यह सौर ऊर्जा विमान फ़ीनिक्स एरिज़ोना डलास टेक्सस सेंट लुई मिसौरी में रुका. इस सौर ऊर्जा विमान एचबी-एसआईए के पंखों की चौड़ाई एयरबस ए340 जितनी ही है लेकिन इसका वज़न महज़ 1. 6 टन है. जबकि पूरी तरह लदे हुए एयरबस ए340 का वज़न 370 टन होता है. जहाज़ के पंखों और स्टेबलाइज़रों पर 12000 सौर सेल लगाए गए हैं. इनसे इसके चार प्रोपेलर चलते हैं और रात की यात्रा के लिए 400 किलो वजनी लीथीयन-आयोन बैटरी चार्ज होती है. ऐसा पहली बार हुआ है कि सौर ऊर्जा से चलने वाले किसी जहाज़ ने दिन-रात उड़ान भरी है और पूरे अमरीका की यात्रा की है. इस सिंगल सीट जहाज़ को एंड्रे बोर्शबर्ग और उनके साथी पायलट बर्टेड पिकार्ड ने बारी-बारी चलाया. इसकी उड़ान को एक बार में 24 घंटे से कम का ही रखा गया था. बोर्शबर्ग ने आखिरी उड़ान से पहले बीबीसी को बताया हमें इस उड़ान को संभव बनाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी. वॉशिंगटन से कैनेडी हवाई अड्डे तक के दुनिया के सबसे व्यस्त उड़ान मार्ग तक एक प्रायोगिक हवाई जहाज़ को उड़ाना बहुत मुश्किल था. जहाज़ के बाएं डैने के नीचे की तरफ़ से फट जाने के चलते यात्रा को छोटा कर दिया गया. अधिकारियों के अनुसार डैने के क्षतिग्रस्त होने के बावजूद न तो पायलट और न ही जहाज़ को किसी किस्म का कोई ख़तरा था. पूरे अमरीका की यह यात्रा एचबी-एसआईए प्रोटोटाइप जहाज़ की आखिरी यात्रा होगी. क्योंकि बोर्शबर्ग और पिकार्ड की योजना 2015 के वसंत में एक बड़े दो सीटों वाले जहाज़ एचबी-एसआईबी में बैठकर पूरी दुनिया की यात्रा करने की है. बोर्शबर्ग के अनुसार वह उड़ान हमारी अमरीका की इस यात्रा के मुकाबले काफ़ी मुश्किल होगी. योजना का अनजाना पक्ष बहुत सी तैयारी की मांग करता है. वह कहते हैं इस प्रचालन तंत्र के साथ अलग-अलग महाद्वीपों में यात्रा करने के बजाय एक देश में एक भाषा बोलने वालों के साथ काम करना यकीनन आसान है. एचबी-एसआईए जहाज़ ने पहली अंतर-महाद्वीपीय यात्रा 2012 को की थी. इसके नाम इंसान द्वारा चलाए जाने वाले सौर ऊर्जा विमान की सबसे लंबी यात्रा का विश्व रिकॉर्ड भी है जो 26 घंटे की थी. अमरीका यात्रा के दौरान इसने इंसान द्वारा चलाए जाने वाले सौर ऊर्जा विमान की सबसे लंबी यात्रा का रिकॉर्ड भी बनाया. पिकार्ड और बोर्शबर्ग का स्वच्छ ऊर्जा उत्पाद प्रयास इस परियोजना में भागीदार था. उनकी कोशिश नीति-निर्माताओं और उद्योग को टिकाऊ ऊर्जा तकनीक को अपनाने लिए प्रेरित करना है. जहाज़ के वॉशिंगटन पहुंचने पर अमरीका के ऊर्जा मंत्री अर्नेस्ट मोनिज़ ने कहा ऊर्जा विभाग की योजनाएं भी कुछ इसी तरह की नई तकनीक पर केंद्रित हैं जिनका इस्तेमाल इन लोगों ने अपनी उड़ान में किया है. एक ऐसी चीज़ जिसके बारे में कुछ साल पहले तक कोई सोच भी नहीं सकता था. उन्होंने कहा मुझे यकीन है कि 10 साल बाद दुनिया को बदलने वाली इन तकनीकों का असर दिखने लगेगा. |
| DATE: 2013-07-08 |
| LABEL: science |
| [368] TITLE: आनुवांशिक शोध बताएगा दमे का ख़तरा किसको ज़्यादा |
| CONTENT: दमे के आनुवांशिक ख़तरे पर हो रहे शोध के अनुसार एक ऐसी जांच विकसित की जा सकती है जिससे यह पता चल सके कि कौन से बच्चे कभी इससे मुक्त नहीं हो पाएंगे. मेडिकल जर्नल द लांसेट में छपे एक शोधपत्र के अनुसार जिन लोगों को दमा होने का आनुवांशिक खतरा ज़्यादा होता है उन्हें कम आनुवांशिक खतरे वाले लोगों के मुकाबले जीवन भर दमे से परेशान होने की आशंका 36 प्रतिशत ज़्यादा होती है. हालांकि शोध यह भी कहता है कि इसे एक विश्वसनीय क्लिनिकल टेस्ट के रूप में इस्तेमाल किया जाना जल्दबाज़ी होगी. धर्मार्थ संस्था अस्थमा यूके का कहना है कि यह निष्कर्ष उन लोगों की पहचान में सहायक हो सकते हैं जिनका दमा गंभीर हो सकता है. उत्तरी केरोलिना के ड्यूक विश्वविद्यालय की एक टीम के इस शोध में इंसानी जीनों के समूह में 15 ऐसी जगहों की पहचान की गई जो दमे से जुड़ी हुई हैं. इससे पहले न्यूज़ीलैंड स्वास्थ्य विभाग ने 1000 लोगों के जन्म से ही अध्ययन किया था. उसके निष्कर्षों को ताजा अध्य्यन के साथ मिलाकर देखा गाय तो शोधकर्ता 880 लोगों पर दमे के आनुवांशिक खतरे की पहचान कर सके. इसके बाद उन्होंने बचपन से लगभग चालीस साल तक इन लोगों के दमे की स्थिति और उसके विकास को देखा. जिन लोगों को इस बीमारी का आनुवांशिक रूप से ख़तरा ज़्यादा था उनका दमा बचपन से ही गंभीर था और अधिकतर मामलों में उन्हें फेफड़ों का संक्रमण भी हो गया था. उन्हें दमे की वजह से स्कूल या काम से छुट्टी भी लेनी पड़ती थी और अस्पताल में भर्ती भी होना पड़ता था. अभी तक ऐसी कोई जांच नहीं है जो बता सके कि कौन सा बच्चा बड़ा होने पर दमे से छुटकारा पा सकेगा. जीन विज्ञान और उससे जुड़ी नीति के ड्यूक संस्थान में वरिष्ठ शोधकर्ता डॉक्टर डेनियल बेल्स्की कहते हैं कि गंभीर दमे के पूर्वानुमान की जांच के बारे में कहना जल्दबाज़ी होगी. वह कहते हैं हालांकि हमारे शोध से यह पता चलता है कि आनुवांशिक खतरों से यह अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है कि कौन बच्चा दमे से मुक्ति पा सकता है और किसे पूरी ज़िंदगी इससे जूझना पड़ेगा. वह यह भी कहते हैं दमे को लेकर आनुवांशिक खतरों के अनुमान अभी शैशवावस्था में हैं. जैसे ही ख़तरा पैदा करने वाले अन्य जीन्स का पता चलता है आनुवांशिक ख़तरों के अनुमान बेहतर होते जाएंगे. वह कहते हैं कि इलाज के लिए सामान्य इस्तेमाल में आने के लिए आनुवांशिक ख़तरों के अध्ययन को अभी लंबा सफ़र तय करना है. हालांकि वह कहते हैं कि यह अध्ययन दमे को बेहतर ढंग से समझने और इलाज की राह प्रशस्त कर सकता है. |
| DATE: 2013-07-07 |
| LABEL: science |
| [369] TITLE: अब दर्शक भी खोल सकेंगे ममी के रहस्य |
| CONTENT: पट्टियों और मसालों में लिपटी ममी के अंदर क्या होता है यह जानने की जिज्ञासा जल्द ही पूरी हो सकती है. स्वीडन का एक संग्रहालय ममी के अपने संकलन का थ्री डी रूप में डिजिटलीकरण करेगा. इससे यहां आने वाले लोग डिजिटल रूप में रखी उस ममी को खोलकर देख सकेंगे कि उसके भीतर क्या है. स्टॉकहोम में मेडेलहाव्समुसीट की ममीज़ का थ्रीडी मॉडल फ़ोटो और एक्सरे स्कैन द्वारा तैयार किया जाएगा. साल 2014 के वसंत में इन्हें स्थाई रूप से प्रदर्शन के लिए खोल दिया जाएगा. संग्रहालय के प्रमुख का कहना है कि इससे दर्शक प्राचीन मिस्र के लोगों की जीवन शैली के बारे में बेहतर ढंग से समझ सकेंगे. संग्रहालय छह ममी को रियलिटी कैप्चर टेक्नोलॉजी के ज़रिये हाई रेज़्योल्यूशन 3डी डिजिटल मॉडल्स में तैयार करेगा. इस तकनीक में फोटो ऑर एक्स-रे स्कैन के माध्यम से डाटा जुटाया जाता है. संग्रहालय में आने वाले लोग ममी को उसी तरह देख सकेंगे जैसे कि पुरातत्वविद् प्राचीन काल के अवशेषों को देखते हैं. स्वीडिश इंटरैक्टिव इंस्टीट्यूट के थॉमस रेडेल कहते हैं हम संग्रहालयों के थ्रीडी डिजिटलीकरण और इंटरैक्टिव विज़ु्अलाइज़ेशन के नए मापदंड तय करना चाहते हैं ताकि यह संकलन अन्य संग्रहालयों शोधकर्ताओं और दर्शकों के बेहतर इस्तेमाल आ सके. वह कहते हैं यहां हम ममीज़ पर काम कर रहे हैं लेकिन यह प्रक्रिया अन्य चीजों के लिए भी इस्तेमाल की जा सकती है जैसे कि ऐतिहासिक कलाकृतियों पर. संग्रहालय में आने वाले दर्शक ममीज़ को काफ़ी उच्च रेज्योल्यूशन पर ज़ूम कर ताबूत पर नक्काशी जैसी चीज़ों को काफ़ी बारीकी से देख सकते हैं. दर्शक कई वर्चुअल परतों को हटाकर ममी को खोलकर भी देख सकेंगे और जान सकेंगे के शरीर के साथ क्या कलाकृति रखी गई हैं. रेडेल कहते हैं हम वस्तुतः ममी की एक वर्चुअल प्रति बना सकते हैं. इसे अन्य संग्रहालयों के साथ बांटा जा सकता है शोध के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है या इंटरैक्टिव दर्शक अनुभव के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. स्टॉकहोम में मेडेलहाव्समुसीट के स्वीडिश इंटरैक्टिव इंस्टीट्यूट और दो टेक्नोलॉजी कंपनियों ऑटोडेस्क और फारो मिलकर इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं. इस प्रदर्शनी की निर्माता एल्ना नॉर्ड कहती हैं यह तकनीक हमारे दर्शकों को ममी में लिपटे महिला-पुरुष को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेगी. वह कहती हैं लोग ममी को परत-दर-परत खोलकर और उसके अंदर बंद व्यक्ति के लिंग आयु जीवन यापन की स्थितियों और विश्वासों के बारे में जान सकते हैं. तकनीक की मदद से ममीज़ प्राचीन समय के ज्ञान को जानने का बहुत मज़बूत ज़रिया बन गई हैं. |
| DATE: 2013-07-06 |
| LABEL: science |
| [370] TITLE: एंड्रॉयड फो़न की सुरक्षा है ख़तरे में |
| CONTENT: अगर आपका फ़ोन एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलता है तो अब से हर नया ऐप डाउनलोड करते समय सावधान रहिए. क्योंकि मोबाइल सुरक्षा पर शोध करने वाली कंपनी ब्लूबॉक्स ने एंड्रॉयड की ऐप वेरिफ़िकेशन प्रणाली में एक ख़ामी ढूंढ निकाली है. कंप्यूटर की भाषा में ऐसी कमियों या ख़ामियों को बग कहा जाता है. इस बग के कारण आप ग़लती से कोई ऐसा ऐप डाउनलोड कर सकते हैं जो आपके डाटा को सफ़ाचट कर जाए. ब्लूबॉक्स का दावा है कि इस बग के कारण एंड्रॉयड फोनों के डाटा को चुराना संभव है. ब्लूबॉक्स ने इस खामी को मास्टर की नाम दिया है. एंड्रॉयड की इस खामी का फ़ायदा उठाकर चोर किसी एंड्रॉयड फ़ोन से डाटा चुराने चोरी से बातचीत सुनने या अवांछित मैसेज भेजने के साथ ही अन्य कोई भी मनचाही हरकत कर सकते हैं. साल 2009 के बाद आए सभी एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम में ये कमी मौजूद है. गूगल का कहना कि उसे ब्लूबॉक्स की खोज पर फिलहाल कुछ नहीं कहना है. ब्लूबॉक्स के ब्लॉग पर जेफ फोरीस्टॉल ने लिखा है कि इस खोज के व्यापक परिणाम हो सकते हैं. इस बग के सामने आने का मुख्य कारण एंड्रॉयड फ़ोन में प्रोग्राम इंस्टॉल करने के पहले किया जाने वाला क्रिप्टोग्राफिक वेरीफिकेशन है. एंड्रॉयड किसी ऐप या प्रोग्राम की वैधानिकता और सुरक्षा जाँचने के लिए क्रिप्टोग्राफिक हस्ताक्षर का प्रयोग करता है. फोरीस्टॉल और उनके साथियों ने एंड्रॉयड के इस तरीके से हस्ताक्षर जाँचने की विधि का तोड़ खोज लिया है. इसके बाद ऐप में किए गए नुकसानदेह बदलाव का पता नहीं चलता. इस बग का लाभ उठाने के लिए बनाए गए हर ऐप या प्रोग्राम की किसी फ़ोन तक पहुँच असली एप्लीकेशन की ही तरह होती है. अपने ब्लॉग में फोरीस्टॉल लिखते हैं ये फ़ोन के सामान्य फंक्शन पर नियंत्रण कर लेता है और उसके बाद जो चाहे सो करता है. ब्लूबॉक्स ने गूगल को फरवरी में ही इस बग की खोज के बारे में बता दिया था. फोरीस्टॉल इस साल अगस्त में होने वाले ब्लैक हैट हैकर सम्मेलन में इस समस्या के बारे में और जानकारी देने की योजना बना रहे हैं. एंड्रॉयड फ़ोन की इस कमी से अभी केवल सैद्धांतिक तौर पर ही ख़तरा है क्योंकि अभी तक इसके दुरुपयोग का कोई मामला सामने नहीं आया है. और आपकी जानकारी चुराने के लिए हैकरों को इस बग के अलावा थोड़ी और मशक्कत करनी होगी. आर्स टेकनिका नाम के प्रकाशन को दिए साक्षात्कार में सुरक्षा विशेषज्ञ डैन वैलेच ने इसी ओर इशारा किया है. डैन वैलेच लिखते हैं कि एंड्रॉयड उपभोक्ताओं तक पहुँचने के लिए हैकरों को किसी असली एप्लीकेशन के जाली संस्करण को गूगल प्लेस्टोर पर डालना होगा. |
| DATE: 2013-07-05 |
| LABEL: science |
| [371] TITLE: भरपूर नींद 'रखेगी दिल का भरपूर ख्याल' |
| CONTENT: रात को सात घंटे या उससे भी ज्यादा नींद दिल के लिए काफ़ी फ़ायदेमंद होने का दावा किया गया है. एक शोध के अनुसार कसरत खान-पान शराब और सिगरेट के सेवन से जुड़ी जो सलाह हैं उससे तो लोग दिल के दौरे और दिल की अन्य बीमारियों से दूर रहते ही हैं मगर जो लोग पर्याप्त मात्रा में सोते हैं वे इन बीमारियों से और ज़्यादा बचे रहते हैं. यूरोपीय शोधकर्ताओं का कहना है कि अच्छी नींद का सेहत पर लंबा और गहरा असर होता है. शोधकर्ताओं के अनुसार यदि नींद का ध्यान रखा जाए तो दिल से जुड़ी कई जानलेवा बीमारियों और स्ट्रोक से बचना मुमकिन है. नीदरलैंड की एक टीम ने 14 हज़ार पुरुषों और महिलाओं में दिल की बीमारियों और दिल के दौरे पर लगभग एक दशक तक नज़र रखी. जब शोध की अवधि पूरी हुई तो पाया गया कि 14 हज़ार में से लगभग 600 दिल के रोग और स्ट्रोक से पीड़ित हुए. उनमें से 129 की मौत हो गई. इस अध्ययन में टीम ने पाया कि उन लोगों में दिल की बीमारियों से मौत होने की संभावना कम पाई गई जिन्होंने स्वस्थ जीवन शैली के लिए आवश्यक चार हिदायतों को अपनाया. इसमें व्यायाम अच्छा खान-पान धूमपान से तौबा और शराब का कम सेवन शामिल है. अध्ययन करने वाली टीम ने बताया कि स्वस्थ जीवन शैली से जुड़ी इन चार हिदायतों पर चलने वालों में हृदय संबंधी रोग का खतरा 57 फीसदी और जान जाने का खतरा 67 फीसदी कम पाया गया. उन्होंने बताया कि जब लोगों को सेहतमंद जीवन शैली के इन चार कारकों का पालन करने के साथ ही रात में सात या उससे ज्यादा घंटे की नींद लेने के लिए कहा गया तो पाया गया कि उन लोगों में दिल के रोगों का खतरा 65 फीसदी तक कम हो गया और इन बीमारियों से जान का खतरा 83 फीसदी तक कम हुआ. शोधकर्ताओं का कहना है कि वैसे तो पहले भी ऐसे अध्ययन किए गए हैं जो बताते हैं कि कम नींद और दिल के रोग के बीच संबंध है मगर इस बात का पता पहली बार चला है कि सेहतमंद जीवन शैली के चार कारकों में नींद का कारक जोड़ने से खतरा कम हो जाता है. राष्ट्रीय सेहत और पर्यावरण संस्था के शोधकर्ता बताते हैं यदि शोध में शामिल सभी प्रतिभागी स्वस्थ जीवन शैली की पांच हिदायतों का पालन करें तो दिल के रोग और हृदयाघात का ख़तरा 36 फीसदी और जान का खतरा 57 फीसदी कम किया जा सकता है. नॉर्वे के बर्जेन विश्वविद्यालय की जानी मानी प्रोफेसर ग्रेथ एस टेल ने बीबीसी को बताया इस शोध का मुख्य संदेश ये है कि सेहत के लिए अच्छी नींद एक महत्वपूर्ण कारक है. टेल के मुताबिक़ सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से हमें लोगों को पर्याप्त नींद लेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. हर घर में इसकी सीख मिलनी चाहिए. ब्रितानी हार्ट फाउन्डेशन में वरिष्ठ नर्स का कहना है कि पूरी रात जागने वाले लोगों को घबराने की ज़रूरत नहीं है. वह कहती हैं यह शोध इस बात पर ज़ोर देता है कि स्वस्थ जीवन शैली के साथ-साथ अच्छी नींद आपके दिल पर मंडराने वाले ख़तरों को कम करती है. वह ये भी कहती हैं मगर जिन्हें रात में अच्छी नींद नहीं आती वे कतई ये न समझें कि इससे उन्हें दिल के रोग हो सकते हैं. दिल और सोने की आदत के बीच के रिश्ते को सही-सही समझने के लिए हमें और ज्यादा शोध की जरूरत है. नींद में कमी अब समस्या बनती जा रही है. इसलिए जब भी ऐसा हो तुरंत अपने डॉक्टर से मिलें. |
| DATE: 2013-07-04 |
| LABEL: science |
| [372] TITLE: अब कॉन्टैक्ट लेंस में ही होगी दूरबीन |
| CONTENT: शोधकर्ताओं ने ऐसे कॉन्टैक्ट लेंस तैयार किए हैं जिन्हें चश्मों के साथ पहनने पर दूर की चीज़ें देखने के लिए दूरबीन की ज़रूरत नहीं होगी. चश्मे के साथ मिलकर ये लेंस चीज़ों को 2-8 गुना तक बड़ा देखा जा सकता है. चश्मे में इस तरह के पोलराइज़्ड फ़िल्टर लगे हैं जो अलग-अलग दिशाओं से आने वाली प्रकाश की किरणों को एक ही दिशा में भेज देते हैं. यह चश्मा पहनने वाला तय कर सकता है कि कब उसे सामान्य चश्मे वाली दृष्टि से देखना है और कब दूरबीन वाली दृष्टि से. वह कभी भी सामान्य और दूरबीन के बीच आसानी से बदलाव कर सकता है. दूरबीन वाले यह चश्मे उम्र बढ़ने के चलते आंखों की रोशनी कम होने की दिक्कत से निजात पाने के लिए ईजाद किए गए हैं. उम्र के साथ मैक्यूला रेटीना के बीच का पीला भाग जो चीज़ को स्पष्ट देखने में सहायता करता है का कमज़ोर होना अंधेपन का सबसे बड़ा कारण है. जैसे-जैसे मैक्यूला कमज़ोर होता जाता है वैसे-वैसे आदमी की चेहरे पहचानने पढ़ने और गाड़ी चलाने- यानी की हर वह क्षमता जिसमें ब्यौरे की ज़रूरत होती है कमज़ोर पड़ती जाती है. शोधकर्ताओं द्वारा तैयार कॉन्टैक्ट लेंस में एक मुख्य क्षेत्र है जिससे सामान्य दृष्टि के लिए रोशनी मिलती है. दूर की चीज़ों को नज़दीक दिखाने के लिए मुख्य क्षेत्र के चारों तरफ़ एक छल्ला है. ख़ास तरीक़े के छोटे-छोटे एल्यूमिनियम के शीशे चीज़ों को बढ़ाकर दिखाने के लिए चारों तरफ़ रोशनी को चार गुना कर रेटीना की ओर भेजते हैं. सामान्य रूप से प्रयोग करने पर बढ़ाई गई तस्वीर नहीं दिखाई देती क्योंकि जोड़ीदार चश्मे में लगे पोलेराइज़िंग फ़िल्टर इसे रोक देते हैं. देखने वाला इन फ़िल्टर्स को बदल सकता है ताकि उसे सिर्फ़ बढ़ाई गई तस्वीर ही देखने को मिले. कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय सैन डिएगो के जोसेफ़ फ़ोर्ड और स्विट्ज़रलैंड के ईपीएफ़एल के एरिक ट्रेम्बले के नेतृत्व में शोधकर्ताओं के दल ने फ़िल्टर करने के लिए सैमसंग के थ्री डी त्रिआयामी टीवी सेट में इस्तेमाल किया जाने वाले लेंस का इस्तेमाल किया. सामान्यतः प्रयोग किए जाने पर यह लेंस बाएं या दाएं लेंस को वैकल्पिक रूप से बंद कर एक थ्री डी तस्वीर बनाता है. दल द्वारा तैयार किए गए लेंस के पहले प्रारूप का व्यास 8 मिमी मोटाई एक मिमी थी और छल्ले वाले क्षेत्र में यह मोटाई 1-17 मिमी थी. डॉक्टर ट्रेंबले ने बीबीसी को बताया सबसे बड़ी मुश्किल लेंस को हवा के आर-पार होने योग्य बनाने की थी. अगर आप 30 मिनट तक यह लेंस पहनना चाहते हैं तो आपको इसे हवादार बनाना ही होगा. लेंस में गैस गुज़र जानी चाहिए ताकि कांटेक्ट लेंस से घिरे आंख के हिस्से ख़ासतौर पर रेटिना को ऑक्सीजन की आपूर्ति हो सके. टीम ने लेंस में बहुत छोटे-छोटे ऐसे रास्ते बनाए जिनसे ऑक्सीजन आ-जा सके. डॉक्टर ट्रेंबले के अनुसार इस जटिलता की वजह से लेंस का निर्माण करना और मुश्किल हो गया. बहरहाल यह लेंस तैयार किए जा रहे हैं और नवंबर में इनका क्लीनिकल ट्रायल शुरू हो जाएगा. वह कहते हैं कि अंततः उम्र बढ़ने की वजह से दृष्टि संबंधी दिक्कतों से जूझ रहे लोगों तक यह लेंस पहुंच सकेंगे. अब तक नज़र की दिक्कत को दूर करने के लिए या तो सर्जरी करके एक दूरबीन वाला लेंस लगाया जाता था या भारी चश्मे पहनने होते थे जिसमें दूरबीन वाले लेंस मुख्य लेंस का एक भाग होते थे. आरएनआईबी में नेत्र स्वास्थ्य प्रचार प्रबंधक क्लारा ईग्लेन कहती हैं कि शोध रुचिकर लगता है. वह मैक्यूला के क्षय पर इसके केंद्रित होने के लिए इसकी तारीफ़ करती हैं. हालांकि इन लेंसों का भविष्य में कोई और इस्तेमाल भी हो सकता है क्योंकि इस शोध को अमरीकी सेना के शोध विभाग डार्पा द्वारा आर्थिक सहायता दी जा रही है. डॉक्टर ट्रेंबले कहते हैं उन्हें मैक्यूला के क्षय के बारे में चिंता नहीं है. वह तो अति दृष्टि के बारे में सोच रहे हैं जो कि एक ज़्यादा बड़ी दिक्कत है. |
| DATE: 2013-07-03 |
| LABEL: science |
| [373] TITLE: एक-दूसरे को बचा रहे हैं कंप्यूटर वायरस |
| CONTENT: माइक्रोसॉफ़्ट के एक शोध से पता चला है कि दो ऐसे कंप्यूटर वायरस जो आपस में मिलकर काम कर रहे हैं उन्हें संक्रमित कंप्यूटर से निकालना मुश्किल साबित हो रहा है. ये दो कंप्यूटर वायरस ऐसे हैं जो आपस में गठजोड़ कर एक दूसरे को बचाने में मदद करते हैं और एक दूसरे के नए संस्करण को नियमित रूप से डाउनलोड कर कंप्यूटर में बने रहते हैं. एंटी-वायरस प्रोग्राम्स को सामान्यतः इन नए संस्करणों के बारे में पता नहीं होता जिससे यह मालवेयर ख़तरनाक प्रोग्राम कंप्यूटर में बने रहते हैं. एक बार कंप्यूटर में घुसने के बाद ये वायरस चोरों को कंप्यूटर में घुसने का रास्ता दे देते हैं जिससे ऐसे आंकड़े चुराए जा सकें जिन्हें बेचा जा सकता है या स्पैम मेल भेज दें या फिर दूसरे कंप्यूटरों पर वायरस हमले कर सकें. दोनों वायरसों के बीच इस संबंध के बारे में माइक्रोसॉफ़्ट मालवेयर ख़तरनाक प्रोग्राम रिसर्च टीम के ह्यून चोई ने एक ब्लॉग पोस्ट में खुलासा किया. चोई ने कहा कि दो विंडोज़ वायरस वोबफ़स और बीबोन नियमित रूप से साथ पाए गए. उन्होंने कहा कि वोबफ़स मशीन में पहले पहुंचता है और उसे संक्रमित करने के लिए कई तरह की तरकीबें अपनाता है. यह वेबसाइट्स पर ललचाने वाले लिंक के माध्यम से कंप्यूटर में पहुंच सकता है कंप्यूटर नेटवर्क में एक मशीन से दूसरी मशीन में जा सकता है या यूएसबी ड्राइव के माध्यम से कंप्यूटर में घुस सकता है. एक बार कंप्यूटर में घुसने के बाद वोबफ़स बीबोन को डाउनलोड कर लेता है जो कंप्यूटर को कई संक्रमित कंप्यूटरों के बेड़े में शामिल कर देता है. इसके बाद दोनों एक-दूसरे से मिलकर काम करने लगते हैं और अपने साथी के नवीनतम संस्करणों को डाउनलोड करने लगते हैं. चोई कहते हैं कि कंप्यूटर में बने रहने के लिए यह एक बेहद मज़बूत कार्यप्रणाली है. वह कहते हैं अगर हम बोवफ़स की पहचान कर उसे हटा देते हैं तो संभव है कि उसने एक ऐसा बीबोन प्रोग्राम डाउनलोड कर रखा हो जिसकी पहचान नहीं हुई है. वह बीबोन वोबफ़स के नए संस्करण को डाउनलोड कर सकता है. चोई के अनुसार दोनों के आपसी संबंध की वजह से 2009 में पहली बार पहचान के बाद से ही वोबफ़स दिक्कत बना हुआ है. वह कहते हैं कि दोनों वायरसों से एक साथ निपटना आसान नहीं होता क्योंकि वोबफ़स नेटवर्क के माध्यम से आवाजाही में माहिर है. वह सलाह देते हैं कि न सिर्फ़ अपने सॉफ़्टवेयर को अपडेट रखें बल्कि विंडोज़ के ऑटोरन फ़ीचर को भी बंद रखें क्योंकि यूएसबी ड्राइव के माध्यम से कंप्यूटर में पहुंचने के बाद वोबफ़स इसी का इस्तेमाल करता है. वह इंटरनेट पर ललचाने वाले लिंक का इस्तेमाल करने से भी बचने की सलाह देते हैं. |
| DATE: 2013-07-02 |
| LABEL: science |
| [374] TITLE: प्राचीन घोड़े के सात लाख साल पुराने डीएनए मिले |
| CONTENT: सात लाख वर्ष पुराने अस्थि जीवाश्म से आधुनिक नस्ल के घोड़ों के एक अति-प्राचीन पूर्वज का जीनोम प्राप्त हुआ है. प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित शोध के अनुसार इस जीनोम में अब तक का सबसे पुराना डीएनए अनुक्रम मिला है. यह डीएनए अनुक्रम पहले ज्ञात सभी डीएनए अनुक्रमों से पाँच लाख वर्ष से भी ज़्यादा पुराना है. नेचर पत्रिका में प्रकाशित यह शोध इसलिए संभव हो सका क्योंकि घोड़े जैसे इस जीव की मृत्यु के बाद इसकी अस्थियाँ कनाडा के स्थायी-हिम में सुरक्षित हो गई थीं. इस अध्ययन से यह भी पता चलता है कि घोड़ों की प्रजाति चार लाख वर्ष पहले भी मौजूद थी. प्राचीन घोड़े की लम्बी हड्डी का यह अवशेष कनाड़ा स्थित पश्चिम-मध्य यूकोन इलाके के थिसल क्रीक में मिला है. जीवाश्म वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह घोड़े इस क्षेत्र में करीब पाँच से सात लाख वर्ष पहले पाए जाते थे. इस अस्थि के विश्लेषण से पता चला है हिमनदों के बाच की गर्म अवधि के दौरान गलन के बावजूद भी इसमें जोड़ेने वाले ऊतक और ख़ून जमाने वाले प्रोटीन जैसे जैविक तत्व बचे रह गए थे. आमतौर पर इतने पुराने जीवाश्मों में ऐसे जैविक तत्व नहीं बचते. इस शोध-पत्र के लेखकों में एक कोपेनहेगेन विश्वविद्यालय के डॉक्टर लुडोविक ऑरलैंडो ने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के साइंस इन एक्शन प्रोग्राम में बताया कि यह जानकारी बहुत महत्वपूर्ण है. हम सचमुच ही बहुत खुश थे क्योंकि यह जीवाश्म बहुत ही अच्छे ढंग से संरक्षित था. हमने सोचा कि हम इसका डीएनए निकालकर देखते हैं कि हम इस जीनोम के चरित्र को कहाँ तक जान पाते हैं. कई देशों के वैज्ञानिकों वाली इस शोध-टीम ने इस हड्डी के एक टुकड़े को चूर-चूर करके इस अति-प्राचीन घोड़े का डीएनए का अनुक्रम और मानचित्र प्राप्त किया. पहले प्रयास में वैज्ञानिकों को ख़ास सफलता नहीं मिली थी. फिर उन्होंने डीएनए के एक अणु को चुना और एक विशेष अत्याधुनिक तकनीक के सहारे से उसका अध्ययन किया. इस तकनीक के प्रयोग से काफी लाभ मिला और इससे प्रचुर मात्रा में आंकड़े मिले. इन आंकड़ों की गणना के लिए वैज्ञानिकों ने उच्च क्षमता वाले कम्प्यूटर की सहायता ली. उन्होंने एक जीवित घोड़े के जीनोम अनुक्रम को संदर्भ के रूप में प्रयोग किया. इस अति-प्राचीन घोड़े के डीएनए के नमूने में जीवाणु इत्यादि जैसे संक्रमणकारी जीवों के डीएनए के आपस में मिल जाने की वजह से वैज्ञानिकों के 12 अरब डीएनए अनुक्रमों का अध्ययन करना पड़ा. फिर इस श्रमसाध्य प्रक्रिया से मिले डीएनए अंश की सहायता से इसके जीनोम की मानचित्र बनाया गया. अब तक सम्पूर्ण जीनोम के 70 प्रतिशत भाग का ही मानचित्र बनाया जा सका है जो अर्थपूर्ण विश्लेषण के लिए पर्याप्त था. थिसल क्रीक में प्राप्त इस अस्थि में वाई क्रोमोजोम की उपस्थिति से यह भी स्पष्ट हुआ कि यह किसी नर घोड़े की अस्थि है. इस डीएनए अध्ययन से घोड़ों और जेब्राओं की प्रजाति के विकासक्रम का इतिहास जानने में भी वैज्ञानिकों को सहायता मिली है. |
| DATE: 2013-07-01 |
| LABEL: science |
| [375] TITLE: डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए नई उम्मीद |
| CONTENT: एक ताजा शोध के मुताबिक़ टाइप 1 डायबिटीज़ शुगर की बीमारी को मरीज़ के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के ज़रिए ही ठीक करना संभव हो सकेगा. डायबिटीज़ के मरीज़ों का प्रतिरोधक तंत्र शरीर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता उन कोशिकाओं को नष्ट कर देता है जो शरीर में ब्लड शुगर की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए ज़रूरी हार्मोन इंसुलिन का निर्माण करती हैं. साइंस ट्रांस्लेशनल मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित ताज़ा शोध से पता चला है कि ऐसी वैक्सीन विकसित की जा सकती है जो मरीज़ों के प्रतिरोधक तंत्र को ठीक कर सके. यह शोध 80 मरीज़ों पर किया गया. विशेषज्ञों ने नतीजों को डायबिटीज़ से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम बताया है. सामान्यतः वैक्सीन जैसे कि पोलियो टीका प्रतिरोधक तंत्र को उन वॉयरस या बैक्टीरिया पर हमला करना सिखाती है जिनसे शरीर में बीमारी पैदा होती है. स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर में शोधकर्ताओं ने ठीक इसके वैक्सीन का इस्तेमाल प्रतिरोधक तंत्र को हमले से बचाने के लिए किया. टाइप 1 डायबिटीज़ में प्रतिरोधक तंत्र पेनक्रियाज अग्न्याशय की बीटा कोशिकाओं को नष्ट कर देता है जिस कारण मरीज़ का शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन हार्मोन निर्मित नहीं कर पाता है. जीवित रहने के लिए मरीज़ को जीवन भर इंसुलिन के इंजेक्शन नियमित तौर पर लेने पड़ते हैं. यह टाइप 2 डायबिटीज़ जो खाने की ख़राब आदतों से होती है से अलग बीमारी है. शोध के दौरान वेक्सीन को मरीज़ के शरीर की बीटा कोशिकाओं पर हमला करने वाली सफ़ेद रक्त कोशिकाओं पर इस्तेमाल किया गया. मरीज़ों को तीन महीनों तक हर हफ्ते इंजेक्शन दिए जाने के बाद शरीर में सफ़ेद रक्त कोशिकाओं की मात्रा कम हो गई. मरीज़ों की रक्त जाँच से पता चला कि वैक्सीन लेने वाले मरीज़ों के शरीर में बीटा कोशिकाएं सिर्फ़ इंसुलिन के इंजेक्शन लेने वाले मरीज़ों की तुलना में बेहतर काम कर रही थी. हालांकि प्रतिरोधक तंत्र के अन्य हिस्से पहले की तरह ही थे. प्रोफेसर लॉरेंस स्टीनमैन ने कहा हम नतीजों से बहुत उत्साहित हैं. इससे पता चलता है कि पूरे प्रतिरोधक तंत्र को नष्ट किए बिना सिर्फ़ बेकार प्रतिरोधक कोशिकाओं को नष्ट करना संभव हो सकेगा. अभी यह यह वैक्सीन एक नया विचार है. यह एक शरीर की एक निश्चित प्रतिरोधक प्रतिक्रिया को बंद करने जैसा है. यह शोध अभी शुरूआती दौर में है. अभी वैक्सीन के दूरगामी परिणामों को परखने के लिए बड़ी संख्या में मरीज़ों पर इसके परीक्षण की ज़रूरत है. प्रोफेसर स्टीनमैन के मुताबिक़ वैक्सीन का असर क़रीब दो माह तक रहता है ऐसे में इसकी नियमित ख़ुराक़ की ज़रूरत होगी. टाइप 1 डायबिटीज़ चैरिटी संस्था जेडीआरएफ की ब्रिटिश इकाई की मुखिया कैरेन एडिंगटन ने कहा हमें पहली बार सबूत मिला है कि इस वैक्सीन के ज़रिए मानव शरीर में इंसुलिन निर्माण की प्रक्रिया को संरक्षित किया जा सकता है. टाइप 1 डायबिटीज़ रहित विश्व बनाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण क़दम है. उन्होंने कहा हम इस डीएनए वैक्सीन रिसर्च शोध से उम्मीद रखते हैं. जेडीआरएफ के अरबो रुपए के वैश्विक शोध कार्यक्रम की प्राथमिकता टाइप 1 डायबिटीज़ के लिए वैक्सीन विकसित करना है. लेकिन यह अभी शुरुआती दिनों में है. अभी इसका क्लिनिकल परीक्षण कुछ समय दूर है. |
| DATE: 2013-06-28 |
| LABEL: science |
| [376] TITLE: छुरी, काँटा या चम्मच बदल सकते हैं खाने का स्वाद? |
| CONTENT: भोजन के स्वाद के बारे में हमारा नज़रिया कटलरी या छुरी-कांटे से प्रभावित होता है. ये कहना है एक नए शोध का. यह अध्ययन करने वाली ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय की टीम का कहना है कि कटलरी के आकार वजन आकृति और उसके रंग का प्रभाव भोजन के स्वाद पर पड़ता है. जैसे प्रयोगों में पता चला है कि काँटे की जगह छुरी से खाने से चीज़ या पनीर अधिक नमकीन लगता है. जबकि दही को सफ़ेद चम्मच से खाने पर उसका स्वाद बढ़ जाता है. फ्लेवर नाम के जर्नल में छपे इस अध्ययन के मुताबिक भोजन के मुँह में जाने से पहले ही दिमाग उसके बारे में राय बना लेता है. भोजन के स्वाद पर कटलरी के वज़न रंग और आकार के प्रभाव के बारे में तीन प्रयोग किए गए जिनमें सौ छात्रों ने हिस्सा लिया. अध्ययन में पता चला कि जब कटलरी का वजन उम्मीद के मुताबिक़ होता है तो इसका खाने के स्वाद पर असर पड़ता है. इसे इस उदाहरण से समझ सकते हैं कि परंपरागत रूप से मिठाई परोसने वाले छोटे चम्मच से खाए जाने पर भोजन मीठा लगता है. खाने के स्वाद में रंगों का अंतर भी एक बड़ा कारक पाया गया है. काले चम्मच की तुलना में सफ़ेद चम्मच से सफ़ेद दही ज़्यादा मीठा लगता है. इसी तरह जब स्वाद चखने वालों को छुरी चम्मच कांटा या टूथपिक से पनीर खाने के लिए दिया गया तो उन्हें छुरी वाला पनीर सबसे अधिक नमकीन लगा. प्रोफ़ेसर चार्ल्स स्पेंस और डॉक्टर वानिसा हारर ने कहा भोजन करना एक ऐसा अनुभव है जिसमें हमारी कई इंद्रियाँ इस्तेमाल होती हैं. इसमें खाद्य पदार्थ का स्वाद खुशबू वो मुँह में कैसा महसूस होता है और दिखने में कैसा दिखता है ये सब शामिल हैं. उन्होंने कहा खाने को मुँह में रखने से पहले हमारा दिमाग़ इसको लेकर एक राय बनाता है जो भोजन करने के पूरे अनुभव को प्रभावित करता है. इससे पहले हुए अध्ययनों से पता चलता है कि खाद्य और पेय पदार्थों के बारे में हमारे अनुभव क्रॉकरी की वजह से बदल सकते हैं. उदाहरण के लिए छोटी प्लेट में परोसे जाने पर लोग कम खाना खाते हैं. प्रोफ़ेसर स्पेंस कहते है कि दिमाग़ किस तरह भोजन के बारे में हमारा नज़रिया प्रभावित करता है. इस बारे में नए शोध से वज़न घटाने और रेस्त्रां में खाने के अनुभव को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है. |
| DATE: 2013-06-28 |
| LABEL: science |
| [377] TITLE: चिड़ियों की दुनिया में नई चहचहाअट |
| CONTENT: चिड़ियों की चहचहाअट के बीच आपको जल्द ही एक नई आवाज़ देगी जो इससे पहले आपने नहीं सुनी. वैज्ञानिकों ने पक्षियों की एक नई प्रजाति की खोज की है जो कंबोडिया की राजधानी नामपेन्ह में थी लेकिन उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया था. इस प्रजाति ऑर्थोटोमस चाकटोमक नाम दिया गया है. इसकी पहली झलक 2009 में बर्ड फ्लू की नियमित जाँच के दौरान मिली थी. उसके बाद से इसे शहर के आसपास कई बार देखा गया जो टेलरबर्ड प्रजाति से मिलती जुलती थी. वैज्ञानिकों की इस खोज का उल्लेख ओरिएण्टल बर्ड क्लब जर्नल फोर्कटेल में किया गया है. टेलरबर्ड वॉर्ब्लर परिवार में शामिल है और उसे यह नाम इसलिए दिया गया क्योंकि वह पत्तियों को आपस में सिलकर बेहद कुशलता के साथ अपना घोसला बनाती है. इस पक्षी के पंखों उसके गाने के अंदाज़ से लेकर उसके जीन्स तक का परीक्षण करने के बाद यह पाया गया कि वह एक अलग नई प्रजाति है. ऐसा बहुत कम होता है कि पक्षियों की किसी अज्ञात प्रजाति को शहरी इलाकों में खोजा जाए लेकिन ओरिएंटल बर्ड क्लब काउंसिल के सदस्य रिचर्ड थॉमस ने कहा कि इस साल की शुरुआत में उन्होंने एक निर्माणाधीन सड़क के बीच में इस नई टेलरबर्ड को देखा. पक्षियों का अध्ययन करने वाले आम तौर पर इस तरह की पारिस्थितकी पर बहुत अधिक ध्यान नहीं देते हैं क्योंकि ज्यादातर प्रजातियाँ दक्षिण पूर्व एशिया में दूसरे स्थानों पर पाई जाती हैं. इस अध्ययन के सह-लेखक वाइल्डलाइफ कंजरवेशन सोसाइटी के सिमोन माहूद ने बताया मेरे घर से महज 30 मिनट की दूरी पर एक घनी आबादी वाले शहर में पक्षियों की एक अपरचित प्रजाति की खोज असाधारण है. उन्होंने कहा यह खोज बताती है कि पक्षियों की नई प्रजातियों की खोज अभी भी अपने आसपास और अप्रत्याशित स्थानों पर की जा सकती है. इस चिड़िया के छोटे और लगातार घटते रहने की जगह के चलते अध्ययन दल ने सिफारिश की है कि इसे प्राकृति का संरक्षण करने वाली संस्था इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर की रेड लिस्ट में शामिल करना चाहिए. |
| DATE: 2013-06-27 |
| LABEL: science |
| [378] TITLE: 328 किमी/घंटे की रफ़्तार से दौड़ी इलेक्ट्रिक कार |
| CONTENT: हल्के वज़न वाली एक इलेक्ट्रिक कार ने 328-6 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार हासिल करके एक नया रिकॉर्ड बना दिया है. ड्रेसन रेसिंग टेक्नॉलॉजीज़ ने इस तरह दुनिया में सड़क पर सबसे तेज़ हल्के वज़न वाली इलेक्ट्रिक कार का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. यॉर्कशर के आरएएफ़ एलविंग्टन रेसट्रैक में कंपनी की लोला बी12 69ईवी कार 328-6 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से दौड़ी. गाड़ी चला रहे कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी लॉर्ड ड्रेसन ने कहा कि यह उपलब्धि इलेक्ट्रॉनिक वाहन की क्षमता को प्रदर्शित करने के लिए हासिल की गई है. इससे पहले 281-6 किमीघंटा का रिकॉर्ड बैट्री बॉक्स जनरल इलेक्ट्रिक ने 1974 में बनाया था. ड्रेसन रेसिंग अकेली इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता नहीं है जो इस तकनीक का इस्तेमाल मोटर स्पोर्ट्स में करने के लिए काम कर रही है. पिछले हफ्ते निसान ने ज़िओड आरसी ज़ीरो एमिशन ऑन डिमांड रेसिंग कार प्रदर्शित की थी जिसे पेट्रोल और इलेक्ट्रिक किसी भी माध्यम से चलाया जा सकता है. कंपनी अगले साल होने वाले ली मैन्स 24 रेस में शामिल होने की योजना बना रही है. उसका कहना है कि यह ऐसी तकनीकों के लिए एक चुनौतीपूर्ण परीक्षण होगा जो अंततः सड़कों पर चलने वाली हैं. ड्रेसन रेसिंग की स्थापना 2007 में स्वघोषित कारों के लिए पागल पॉल ड्रेसन ने की थी जो उस समय लेबर सरकार में मंत्री थे. ऑक्सफ़ोर्डशर के किडलिंग्टन में स्थित कंपनी दूसरों के साथ टिकाऊ स्वचालित तकनीक के विकास पर काम करती है और अपने काम को दिखाने के लिए मोटर स्पोर्ट्स प्रतियोगिताओं में भाग लेती है. फेडरेशन इंटरनेशनल डि लऑटोमोबाइल्स एफ़आईए वर्ल्ड इलेक्ट्रिक लैंड स्पीड रिकॉर्ड में भाग लेने के लिए इस कार का वज़न एक हज़ार किलो से कम रखना होगा. इसके लिए कंपनी ने मूलतः जैव-इथेनॉल ईंधन वाले इंजन के साथ बनाई गई ली मैन्स सीरीज़ की कार को चुना. फिर इसके पुर्ज़ों को हल्के वज़न वाले 20 किलोवाट घंटा बैट्री से बदल दिया. इसका इंजन 850 हॉर्सपावर की ताकत देता है. कंपनी ने कार के चेसिस को भी इस्तेमाल किया जो हवा के घर्षण को कम करने के लिए रिसाइकिल्ड फ़ाइबर से बना है. अपने नए रिकॉर्ड समय की पुष्टि होने के तुरंत बाद लॉर्ड ड्रेसन ने बीबीसी से कहा मैं उम्मीद करता हूं कि यह लोगों को इलेक्ट्रिक कारों की भावी क्षमता को दिखाएगी. उन्होंने कहा यकीनन यह एक बेहद ख़ास रेसिंग कार है लेकिन ब्रिटेन में नया विश्व रिकॉर्ड बनाकर हम दो बातें बताना चाहते हैं. पहली तो यह कि यह भविष्य की ओर संकेत करती है- इस कार के लिए जो तकनीक हमने विकसित की है वह रोज़मर्रा में इस्तेमाल की जाने वाली कारों तक पहुंच जाएगी. दूसरा संदेश यह है कि यहां ब्रिटेन में हम इस तकनीक के राजा हैं. हम मोटर स्पोर्ट्स इंजीनियरिंग में आगे रहे हैं और अब हम इलेक्ट्रिक मोटर स्पोर्ट्स इंजीनियरिंग में भी अग्रणी हैं. गूगल के चेयरमैन एरिक श्मिट ने रेस ट्रैक पर कार की प्रैक्टिस को दो घंटे देखा लेकिन वह रिकॉर्ड बनाते वक्त मौजूद नहीं थे. लॉर्ड ड्रेसन कहते हैं इलेक्ट्रिक वाहनों के मामले में गूगल का बहुत सक्रिय शोध और विकास कार्यक्रम है. तो अच्छा है कि दुनिया की अग्रणी तकनीक कंपनी आज हमारे आयोजन में शामिल हुई. आईएचएस ग्लोबल इनसाइट में ऑटो विश्लेषक पॉल न्यूटन कहते हैं कि ऐसे आयोजन इलेक्ट्रिक कारों को बढ़ावा देने की अच्छी कोशिश हैं. लेकिन साथ ही सवाल करते हैं कि ऐसी कितनी तकनीकें सचमुच सड़कों पर उतरने में कामयाब हो पाएंगी. |
| DATE: 2013-06-26 |
| LABEL: science |
| [379] TITLE: चीन में अंतरिक्ष से दिया गया विज्ञान पर लेक्चर |
| CONTENT: चीन की दूसरी महिला अंतरिक्ष यात्री वॉन्ग यापिंग अंतरिक्ष से वीडियो लेक्चर देने वालीं चीन की पहली व्यक्ति बन गई हैं. लाइव वीडियो के ज़रिए छात्रों से बात करते हुए वॉन्ग ने लट्टू बॉल पानी और साथी अंतरिक्ष यात्रियों की मदद से गुरुत्वाकर्षण विहीनता में भौतिकी के बारे में पढ़ाया. वह टियांगगोंग-1 अंतरिक्ष प्रयोगशाला से बात कर रही थीं जहां अंतरिक्षयान शेनझ़ाऊ फ़िलहाल खड़ा है. चीन का पांचवां अंतरिक्ष अभियान शेनझ़ाऊ-10 25 या 26 जून तक पूरा होना है. वॉन्ग ने अंतरिक्ष में वज़न और द्रव्यमान का सिद्धांत समझाने के लिए कई प्रयोगों का सहारा लिया. यह दिखाने के बाद कि किस तरह अंतरिक्ष में सामान्य पैमाने काम नहीं करते उन्होंने अभियान दल प्रमुख कमांडर नी हैशेन्ग का द्रव्यमान मापने के लिए एक ख़ास पैमाने का इस्तेमाल किया. इसके लिए उन्होंने न्यूटन के गति के दूसरे नियम का इस्तेमाल किया- किसी वस्तु का द्रव्यमान दबाव और गतिवर्धन द्वारा मापना. एक दूसरे उदाहरण में यह दिखाने के लिए कि सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण में वस्तुएं किस तरह चलती हैं उन्होंने अपने दल के एक साथी से खुद को 90 डिग्री पर और फिर 180 डिग्री पर घुमाने को कहा. अंतरिक्ष में घूर्णन अपनी धुरी पर घूमने के लिए लट्टू का इस्तेमाल किया गया और एक धागे से बॉल लटकाकर दोलन गति को दर्शाया गया. कक्षा की समाप्ति से पहले वॉन्ग ने अंतरिक्ष में अधिक पृष्ठ तनाव को दिखाने के लिए धातु के एक छल्ले की मदद से पानी की एक झिल्ली बनाई. फिर उन्होंने इस झल्ली में और पानी डालकर इसे पानी की एक बॉल में बदल दिया. उधर चीन में यह देख रहे उनके छात्र तालियां बजा रहे थे. सरकारी मीडिया के अनुसार बीजिंग में एक ख़ास कक्षा के ज़रिए 330 प्राथमिक और माध्यमिक कक्षा के विद्यार्थियों ने यह लेक्चर देखा. यहाँ वह लाइव वीडियो फीड के द्वारा सवाल भी पूछ सकते थे. एक छात्र के सवाल के जवाब में वॉन्ग ने बताया कि वह अंतरिक्ष में क्या देख सकती हैं. उन्होंने कहा जो तारे हम देख रहे हैं वह कहीं ज़्यादा चमकदार हैं लेकिन टिमटिमा नहीं रहे हैं. उन्होंने बताया कि वातावरण के चलते धरती पर तारे टिमटिमाते दिखते हैं और ऐसी बाधा उत्पन्न करने वाले वातावरण की अनुपस्थिति के कारण उन्हें तारे चमकदार दिखते हैं. उन्होंने बताया आसमान यहां से नीला नहीं बल्कि काला दिख रहा है और हम रोज़ सूरज को 16 बार उगते हुए देखते हैं क्योंकि हम हर 90 मिनट में पृथ्वी का चक्कर लगा रहे हैं. |
| DATE: 2013-06-26 |
| LABEL: science |
| [380] TITLE: सोनी लेकर आया सबसे पतला फ़ोन |
| CONTENT: सोनी ने अपना नया बड़ा 6-4 इंच स्क्रीन वाला वाटरप्रूफ एन्ड्रॉयड स्मार्ट फ़ोन एक्सपीरिया ज़ेड अल्ट्रा बाजार में उतारा है. सोनी इसे बाजार में उपलब्ध सबसे पतला बड़ी स्क्रीन वाला फ़ोन बता रही है. इस फ़ोन पर नुकीली कलम या मानक पेंसिल से चित्र बनाने और लिखने का काम भी किया जा सकता है. सोनी के अनुसार उसने यह फ़ोन बड़े फ़ोन के बाजार में सैमसंग के दबदबे को ख़त्म करने के लिए उतारा है. कंसल्टटेंट ट्रांसपरेंसी मार्केट रिसर्च के एक अध्ययन के अनुसार 2012 में सुपरफ़ोन और फैबलेट के 70 फीसद बाजार पर सैमसंग का कब्जा रहा था. इसमें सर्वाधिक योगदान उसके गैलेक्सी एस-3 और गैलेक्सी नोट-2 मॉडल का था. सैमसंग ने इस साल की शुरुआत में गैलेक्सी एस-4 और 6-3 इंच स्क्रीन वाला गैलेक्सी मेगाफ़ोन उतारा था. सोनी का 5 इंच स्क्रीन वाला एक्सपीरिया ज़ेड इसी साल जनवरी में बाजार में आया था. सोनी ने इस फ़ोन को सबसे पहले शंघाई के मोबाइल एशिया एक्सपो में प्रस्तुत किया. चीन इंडोनेशिया और सिंगापुर में यह फ़ोन जुलाई से बिकने लगेगा. यूरोप में यह सितम्बर से बिकेगा. एक्सपीरिया मार्केटिंग के निदेशक कैलम मैकडोगल ने बीबीसी संवाददाता को बताया कि इस फ़ोन का मुख्य बाजार दक्षिणपूर्वी एशिया है क्योंकि बड़ी स्क्रीन वाले फ़ोन की यहाँ भारी खपत है. साथ ही हम यूरोप के बाजार पर भी नजर रखे हुए हैं. 6-5 मिमी मोटाई वाला एक्सपीरिया ज़ेड अल्ट्रा बाजार में मौजूद सबसे पतले फ़ोन ह्वावे के एसेंड पी-6 से जरा ही पतला है. एक्सपीरिया ज़ेड अल्ट्रा को पानी से बचाने के लिए हेडफ़ोन साकेट कवर की जरूरत नहीं होती. एक्सपीरिया ज़ेड में इस साकेट के लिए कवर की जरूरत पड़ती थी जिसके बारे में उपभोक्ताओं ने काफी शिकायत की थी. एक्सपीरिया ज़ेड अल्ट्रा पानी में भी ज़्यादा देर तक डूबा रह सकता है. इसे 1-5 मीटर गहरे साफ पानी में आधे घण्टे तक डुबाए रखा जा सकता है. बड़ी स्क्रीन वाले स्मार्टफ़ोन के बाजार पर सोनी के अलावा दूसरी कंपनियों की भी नजर है. ह्वावे ने 6-1 इंच स्क्रीन वाला एसेंड मेट 5-7 इंच वाला ज़ेडटीई ग्रैंड मेमो एसर ने 5-7 इंच स्क्रीन वाला लिक्विड एस-1 आसुस ने छह इंच स्क्रीन वाला फ़ोनपैड नोट और लेनोवो ने 5-5 इंच स्क्रीन वाला आइडियाफ़ोन के-900 को हाल फिलहाल ही बाजार में उतारा है. मैकडोगल कहते हैं कि चीन और ताइवान की कंपनियों से दाम में होड़ करने के बजाय सोनी एक्सपीरिया अल्ट्रा को उसकी खूबियों के आधार पर प्रचारित करना चाहती है. इस जापानी कंपनी ने इस साल में मई में अपना आर्थिक लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हुए पिछले पाँच साल में पहली बार मुनाफा दिखाया था. विश्लेषकों को कहना था कि सोनी का यह मुनाफा अपनी परिसंपत्तियों की बिक्री से बढ़ा है. इससे इलेक्ट्रानिक संभाग में इसकी बिक्री का पता नहीं चलता. |
| DATE: 2013-06-25 |
| LABEL: science |
| [381] TITLE: एक ग़लती ने कर दिया फ़ेसबुक को परेशान और शर्मिंदा |
| CONTENT: फ़ेसबुक के डाटा आर्काइव में आई एक गड़बड़ी के कारण करीब 60 लाख लोगों की व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक हो गई. इस त्रुटि के कारण लोगों के ईमेल और फोन नंबर उन लोगों के साथ शेयर हो गए जिन्हें उनकी जानकारी नहीं थी. हालांकि फ़ेसबुक ने कहा है कि अभी तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिसके आधार पर कहा जा सके कि सार्वजनिक हुई जानकारियों का गलत इस्तेमाल किया गया है. कंपनी ने कहा कि वह प्रोग्राम में आई इस त्रुटि से परेशान और शर्मिंदा है. फ़ेसबुक के प्रोग्राम में आई इस गड़बड़ी को एक बाहरी प्रोग्रामर ने पकड़ा है. फ़ेसबुक की ओर से जारी की गई सुरक्षा सलाह में कहा गया है कि यह त्रुटि फ़ेसबुक पर अपलोड की जाने वाली कॉंटेक्ट लिस्ट और एड्रेस बुक को व्यवस्थित रखने के तरीके के कारण हुई है. दरअसल फ़ेसबुक कॉंटेक्ट लिस्ट से लोगों के नाम और उनकी संपर्क जानकारियों का विश्लेषण करता है और उन लोगों को दोस्त बनाने की सलाह देता है जिन्हें यूजर के पहले से जानने की संभावना हो. इस प्रक्रिया के दौरान फ़ेसबुक ने ईमेल और फोन नंबर जैसी जो जानकारियां इकट्ठा की वह भी कांटेक्ट लिस्ट और एड्रैस बुक में अपडेट हो गईं. फ़ेसबुक के मुताबिक जब लोगों ने अपने प्रोफाइल की जानकारियां डाउनलोड की तब तक यह संपर्क संबंधित जानकारी भी साथ में आ गई और उन लोगों तक पहुंच गई जिनके साथ वो शेयर नहीं की गईं थी. इस त्रुटि की जांच के बाद पता चला कि करीब 60 लाख लोगों की जानकारी इस तरह साझा हो गई. हालांकि इसके बाद भी फ़ेसबुक का कहना है कि इसका ज्यादा असर इसलिए नहीं हुआ क्योंकि यह जानकारी उन लोगों तक पहुँची थी जो यूजर को पहले से ही जानते थे. फ़ेसबुक का कहना है कि अब इस त्रुटि को ठीक कर दिया गया है. इस त्रुटि के बारे में जानकारी फ़ेसबुक के व्हाइट हैट कार्यक्रम से जुड़े एक प्रोग्रामर ने दी. यह कार्यक्रम फ़ेसबुक की कोडिंग में गलतियां या त्रुटियां पकड़ने के लिए है. इस त्रुटि को पकड़ने वाले प्रोग्रामर को फ़ेसबुक ने मोटी राशि दी है. इंटरनेट सुरक्षा विश्लेषक ग्राहम क्लूली ने सप्ताहांत से ठीक पहले इस जानकारी को सार्वजनिक करने पर फ़ेसबुक की आलोचना करते हुए कहा कि फ़ेसबुक ने इस जरूरी जानकारी का सभी लोगों तक पहुंचना सुनिश्चित करने के बजाए अपनी छवि बचाने की कोशिश की है. |
| DATE: 2013-06-25 |
| LABEL: science |
| [382] TITLE: पेड़-पौधे भी माहिर होते हैं गुणा-भाग में |
| CONTENT: अगर आप गणित के सवालों को देखकर ही डर जाते हैं तो आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि पेड़-पौधों में गणित की गुत्थियों को सुलझाने की अंतर्निहित क्षमता होती है. शोध बताते हैं कि अपनी गणितीय काबिलियत के कारण पेड़-पौधों को रात में अपने भोजन भंडार को नियंत्रित करने में मदद मिलती है. ब्रिटेन के वैज्ञानिकों का कहना है कि वे जीव विज्ञान में ऐसी परिष्कृत अंकगणतीय गणना के उदाहरण को देखकर आश्चर्यचकित रह गए. ई-लाइफ नाम के जर्नल में जॉन इंस सेंटर की टीम ने खुलासा किया कि गणितीय मॉडल दर्शाता है कि रात में उपभोग किए जाने वाले स्टार्च की मात्रा की गणना गुणा-भाग द्वारा की जाती है. इस प्रक्रिया में पत्तियों के रसायन शामिल होते हैं. संभव है कि प्रवास के दौरान वसा के स्तर को संरक्षित करने के लिए पक्षी भी इसी विधि का इस्तेमाल करते हों. वैज्ञानिकों ने एराबिडोप्सिस नाम के पौधे का अध्ययन किया जिसे इस प्रयोग के लिए मॉडल पौधा माना गया था. रात में कार्बन डाइ-ऑक्साइड को शर्करा और स्टार्च में बदलने के लिए पौधों को सूरज की रोशनी नहीं मिलती है. ऐसे में वे सुबह तक जीवित रहने के लिए निश्चित रूप से अपने स्टार्च भंडार को नियंत्रित करते हैं. नोर्विक स्थित जॉन इंस सेंटर के प्रयोगों से पता चलता है कि सटीक रूप से स्टार्च के उपभोग को समायोजित करने के लिए निश्चित रूप से पौधे एक गणितीय गणना करते हैं- एक अंकगणितीय विभाजन. अध्ययन की अगुवाई कर रहे प्रो. एलिसन स्मिथ ने बीबीसी न्यूज़ को बताया वे वास्तव में आसान रासायनिक ढंग से गुणा-भाग कर रहे हैं जो आश्चर्यजनक है. एक वैज्ञानिक के रूप में यह देखना हमारे लिए हैरान करने वाला है. उन्होंने कहा यह पूर्व माध्यमिक स्तर की गणना है लेकिन वो गणित का इस्तेमाल कर रहे हैं. वैज्ञानिकों ने एक पौधो के भीतर भाग की गणना किस तरह होती है इसका पता लगाने के लिए अंकगणितीय मॉडल का इस्तेमाल किया. रात में पत्तियों में मौजूद प्रणाली स्टार्च के भंडार का पता लगाती है. आंतरिक घड़ी से समय के बारे में जानकारी मिलती है ठीक उसी तरह जैसे इंसानों के शरीर में जैविक घड़ी होती है. शोध में बताया गया है कि यह प्रक्रिया में दो तरह के अणुओं की सघनता द्वारा नियंत्रित होती है जो स्टार्च के लिए एस और समय के लिए टी हैं. यदि एस अणु स्टार्च को टूटने के लिए उकसाता है जबकि टी अणु ऐसा होने से रोकने की कोशिश करता है तो स्टार्च की खपत की दर एस अणु और टी अणु के अनुपात में तय की जाती है. दूसरे शब्दों में एस की टी से भाग दिया जाता है. जॉन इंस सेंटर में मैथमेटिकल मॉडेलर के प्रो. मार्टिन हॉवर्ड ने बताया कि जीव विज्ञान में इस तरह के परिष्कृत अंकगणतीय गणना का पहला ठोस उदाहरण है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इसी तरह की प्रणाली पक्षियों जैसे जन्तुओं में भी पाई जाती है. इस शोध पर टिप्पणी करते हुए लंदन स्थित क्वीन मैरी विश्वविद्यालय के डा. रिचर्ड बग्स ने बताया यह पौधों में बुद्धि का प्रमाण नहीं है. इससे यही पता चलता है कि पौधों में एक ऐसी प्रणाली है जो स्वचालित रूप से इस बात को नियंत्रित करती है कि रात में कितनी तेजी से कार्बोहाईड्रेट का उपभोग कर सकते हैं. |
| DATE: 2013-06-25 |
| LABEL: science |
| [383] TITLE: अब मोज़े और अंगूठी रखेंगे आपका ख्याल |
| CONTENT: जल्द ही बाज़ार में ऐसे उत्पाद आने वाले हैं जिन्हें आप पहन सकते हैं और ये आधुनिक तकनीक से लैस हैं. ये हैं स्मार्ट सॉक्स या मोज़े और अंगूठी. अमरीकी कंपनी हीपसिलोन ने कहा है कि वह ऐसे संवेदनशील मोज़े बना रही है जो पहनने वाले का टहलते या दौड़ते समय संतुलन बनाए रखने में मदद करेंगे. वहीं एक चीनी कंपनी शांदा ने कहा है कि उसने एक ऐसी अंगूठी बनाई है जिसकी मदद से स्मार्टफ़ोन को अनलॉक किया जा सकता है. इसकी मदद से फ़ोन के डाटा को आसानी से किसी दूसरे व्यक्ति को भेजा जा सकता है. बहुराष्ट्रीय बैंक क्रेडिट स्विस बैंक ने उम्मीद जताई है कि अगले पाँच साल में पहने जाने लायक तकनीक वाली वस्तुओं का बाज़ार 50 अरब डॉलर तक पहुँच जाएगा. बैंक का कहना है कि यह इसके वर्तमान बाज़ार का 10 गुना होगा. लेकिन वहीं कुछ लोगों ने चेतावनी दी है कि प्रयोगों के इस दौर में बहुत सी चीजें उतनी लोकप्रिय नहीं रह जाएंगी. हीपसिलोन के तीनों संस्थापक पहले मोइक्रोसाफ़्ट एक्सबॉक्स और हेल्थ साफ़्टवेयर डिविजन में काम करते थे. इन लोगों का कहना है कि संवेदी मोज़े के कपड़ों में ही सेंसर लगा हुआ है. यह सेंसर उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह बताएगा उन्हें पहनने वाला किस तरह चल या दौड़ रहा है. यह मोज़ा टखने से जुड़ा होगा और आंकड़ों को ब्लूटूथ के ज़रिए कंपनी के साफ़्टेवेयर से जुड़े स्मार्टफ़ोन या कंप्यूटर को भेजेगा. मोज़े को बनाने वालों का कहना है कि इसे धोया भी जा सकता है और यह धावक को दौड़ते समय की तमाम जानकारियां उपलब्ध कराएगा. इसके जरिए धावक यह तय कर पाएगा कि उसे किसी तरह की चोट के खतरे से बचने के लिए किस तरह दौड़ लगानी है या कितना लंबा डग भरना है. कंपनी का कहना है कि इसका उपयोग शुगर या मधुमेह के रोगियों में होने वाले घाव की स्थिति पर नजर रखने और बुजुर्ग लोगों को दौड़ते समय संतुलन बिगड़ने की चेतावनी देने के लिए किया जा सकता है. अभी इस मोज़े का केवल प्रारूप ही उपलब्ध है. कंपनी इस उत्पाद को एक पैसा उगाहने के अभियान के जरिए बाज़ार में उतारना चाहती है यह अभियान इस हफ़्ते के अंत तक इंडिगोगो नाम की वेबसाइट पर शुरू होगा. वहीं एक चीनी कंपनी शांदा अंगूठी में एक्सेसरी की पहचान करने के लिए एनएफ़सी नियर फ़ील्ड कम्युनिकेशन चिप का इस्तेमाल कर रही है. कंपनी का कहना है कि इस अंगूठी का उपयोग एंड्रॉएड पर आधारित स्मार्टफ़ोन को अनलॉक करने में किया जा सकता है. इसका उपयोग पासवर्ड के रूप में भी हो सकता है. कंपनी इस साल के अंत तक इसे अन्य मोबाइल फ़ोन के लायक भी बनाने का प्रयास कर रही है. इसे बनाने वाली कंपनी का कहना है कि इसे पहनने वाला व्यक्ति इसे अपने दोस्त के हैंडसेट में सटाकर अपनी फ़ोटो और अन्य जानकारियां उसमें डाउनलोड कर सकता है. कंपनी का कहना है कि यह अंगूठी 99 साल तक चल सकती है और उसे चार्ज करने की भी ज़रूरत नहीं रहेगी. शांदा ने एंड्रॉएड पर आधारित एक कलाई घड़ी भी बनाई है. इसमें लगे ऐप के ज़रिए मौसम की भविष्वाणी की जा सकती है और कसरत पर प्रतिक्रिया ली जा सकती है. इस घड़ी को स्मार्टफोन कैमरे के रिमोट कंट्रोल के रूप में भी इस्तेमाल में लाया जा सकता है. कंपनी का कहना है कि चीनी ग्राहकों के लिए इस कलाई घड़ी की बुकिंग जुलाई में शुरू कर दी जाएगी. वहीं अंगूठी के लिए इसके बाद आर्डर लिया जाएगा. |
| DATE: 2013-06-21 |
| LABEL: science |
| [384] TITLE: क्या है ‘एज’, कैसे चलता है 4जी? |
| CONTENT: मोबाइल इंटरनेट ने बीते कुछ वर्षों में जिस तरह से दुनिया भर में अपनी पकड़ बनाई है उससे साफ़ पता चलता है कि कुछ ही समय में ये इंटरनेट उपयोग की परिभाषा बदल देगा. दुनिया के कई विकसित देशों में जहाँ फिक्स लाइन इंटरनेट की व्यवस्था पूर्वस्थापित है वहाँ भी मोबाइल इंटरनेट बाज़ार के आधे से ज़्यादा या लगभग उतने ही हिस्से पर कब्जा कर चुका है. भारत की बात करें तो विभिन्न स्रोतों से मिले आँकड़ों के अनुसार पूरे देश में लगभग 15 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं जिनमें से 9 करोड़ मोबाइल से इंटरनेट पर आते हैं. मोबाइल इंटरनेट के बढ़ते दायरे के साथ ही बाज़ार में उतारी जा रही है सेलुलर नेटवर्किंग की नई तकनीकें जिनके बारे में आपमें से कई लोग जानते होंगे और कई नहीं. मोबाइल इवोल्यूशन यानी मोबाइल नेटवर्किंग के विकास की चौथी जेनरेशन का संक्षिप्त नाम है 4जी. सेलुलर नेटवर्किंग के क्षेत्र में ये अभी तक की सबसे नई तकनीकों में से एक है. माना जा रहा है कि भारत में 4जी के पूरी तरह से आने पर बैंडविथ से जुड़ी समस्याएं सुलझेंगी. भारत के कुछ चुनिंदा शहरों में एयरटेल 4जी सेवाएं उपलब्ध करा रही है जबकि मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली कंपनी रिलायंस इंफोकॉम बड़े स्तर पर 4जी सेवाएं बाज़ार में उतारने की तैयारियां कर रही है. ज़्यादातर देशों में 4जी के दाम 3जी के बराबर या थोड़े ज़्यादा रखे गए हैं. रिसर्च एजेंसी गार्टनर के प्रमुख विश्लेशक ऋषि तेजपाल मानते हैं कि भारत में भी 4जी का दाम 3जी से थोड़ा अधिक रखा जा सकता है. मोबाइल इवोल्यूशन की तीसरी जेनरेशन की तकनीक है 3जी. भारत के लगभग सभी बड़े शहरों में अलग-अलग मोबाइल नेटवर्क कंपनियों के माध्यम से ये सेवा उपलब्ध है. भारत में कुछ कंपनियां एचएसआईए हाई स्पीड इंटरनेट एक्सेस या 3जी प्लस सेवाएं भी उपलब्ध कराती हैं जो आम 3जी से तेज़ होती है. डेस्कटॉप या लैपटॉप पर इंटरनेट के लिए जो 3जी डॉन्गल प्रयोग किए जाते हैं वो भी एचएसआईए तकनीक पर काम करते हैं. मोबाइल इवोल्यूशन की दूसरी जेनरेशन को 2जी प्रणाली बताई गई. इस तकनीक में पहली बार फॉन कॉल का डिजिटल प्रारूप जारी किया गया और साथ ही डाटा सेवाएं भी जारी की गई. 2जी की उत्पत्ति फ़ॉन कॉल और स्लो डाटा ट्रांसफ़र सेवाओं के लिए हुई थी. द्वितीय जेनरेशन के ही तकनीक में थोड़ी उन्नत सेवा जीपीआरएस जनरल पैकेट रेडियो सर्विस यानि 2-5 जी और ईडीजीई एन्हांस्ड डाटा रेट्स फॉर जीएसएम इवोल्यूशन यानि 2-75जी जारी की गई जो अब भी भारत के कई इलाके में चलती है. दूर दराज के इलाकों में 3जी नेटवर्क कनेक्टिविटी के अभाव में ईडीजीई और जीपीआरएस के माध्यम से ही डाटा सेवाएं प्रदान की जा रही है. 2जी या डिजिटल तकनीक आने से पहले जो सेलुलर नेटवर्किंग तकनीक मौजूद थी उसे 1जी तकनीक कहा जाता है. दुनिया के कई हिस्सों में ये एनालॉग तकनीक साल 1980 के दशक में आम लोगों के लिए बाज़ार में उतारी गई थी. ये सेवा काफ़ी महंगी थी और केवल वॉइस कॉल को ही सपोर्ट करती थी. दुनिया भर के ज़्यादातर देशों से 1जी सेवा खत्म हो चुकी है. |
| DATE: 2013-06-20 |
| LABEL: science |
| [385] TITLE: ब्रह्माण्ड की कोख में झांकने वाले का आखिरी सलाम |
| CONTENT: सुदूर अंतरिक्ष में चक्कर लगी रही एक अरब यूरो लागत की वेधशाला हर्शेल का संचालन बंद कर दिया गया है. नियंत्रकों ने सोमवार को यान के ईंधन टैंकों को खाली कर दिया और उसे सभी तरह के संपर्क समाप्त करने का कमांड दिया. ये वेधशाला अब धरती से 21. 4 लाख किलोमीटर दूर धीरे-धीरे सूर्य के आसपास मंडरा रही है. कई अत्याधुनिक उपकरणों से सुसज्जित हर्शेल अंतरिक्ष में स्थापित की जाने वाली अपनी तरह की सबसे सशक्त वेधशाला थी. इसे 2009 में प्रक्षेपित किया गया था. अपने चार साल के संचालन के दौरान इस वेधशाला ने कई तस्वीरें और आंकड़े भेजे जिससे तारों की उत्पत्ति और आकाश गंगा के विकास के बारे में समझने में मदद मिली. जर्मनी के दार्मस्टेड स्थित यूरोपीय अंतरिक्ष संचालन केन्द्र ने सोमवार को 12 बजकर 25 मिनट पर संचार ट्रांसपोंडर बंद करने के लिए अंतिम कमांड भेजा. रेडियो संदेश को हर्शेल तक पहुंचने में छह सेकेंड लगे और इसके बाद धरती पर मौजूद केन्द्र को इस बात की पुष्टि करने में छह सेकेंड लगे कि वेधशाला के संपर्क टूट चुका है. यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के हर्शेल यान संचालन मैनेजर मिख श्मिट ने कहा ये वास्तव में एक खूबसूरत यान था. उन्होंने बीबीसी न्यूज़ से कहा इस यान ने कभी भी हमें ज़्यादा परेशान नहीं किया. इससे हमें बेहद आसानी हुई और हम उसका अधिक से अधिक इस्तेमाल कर सके. हर्शेल ने अपने अंतिम हीलियम कूलेंट का इस्तेमाल कर लिया था जिसके बाद उसे सेवामुक्त करना जरूरी हो गया था. हीलियम के खत्म हो जाने के बाद हर्शेल एक तरह से अंधा हो गया था. सात मीटर लंबे इस अंतरिक्षयान को सेवामुक्त किए जाने के साथ ही इसके हाइड्राजीन प्रणोदक टैंक भी खाली कर दिए गए हैं ताकि भविष्य में किसी तरह के जोखिम से बचा जा सके. श्मिट ने कहा हर्शेल अब कभी भी पृथ्वी से संपर्क नहीं साधेगा. हालांकि हम उसे दोबारा कमांड दे सकते हैं लेकिन हमारी ऐसी कोई मंशा नहीं है. हर्शेल को हालांकि सेवामुक्त कर दिया गया है लेकिन इससे मिले आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण जारी रहेगा. |
| DATE: 2013-06-19 |
| LABEL: science |
| [386] TITLE: कैसे जांचते हैं आप इंटरनेट स्पीड, देखिए ये पांच तरीके |
| CONTENT: अपने इंटरनेट स्पीड की जांच कैसे करते हैं आप कई लोग वेब पेज लोड होने में लगने वाले समय से स्पीड का अनुमान लगाते हैं तो कई यू-ट्यूब पर वीडियों की बफ़र स्पीड से इसका अंदाज़ा लगाते हैं. लेकिन इंटरनेट पर ही कई ऐसी वेबसाइट मौजूद है जो आपकी इंटरनेट कनेक्टिविटी की जांच कर कुछ ही सेकंड्स में बता सकती है कि आपकी मौजूदा अनुमानित इंटरनेट स्पीड कितनी है. अलग-अलग दिन कई बार स्पीड जांचकर आप अपनी औसत बैंडविथ जान सकते हैं. दरअसल ये वेबसाइटें आपके कंप्यूटर से अपने सर्वर तक कुछ डेटा भेजती है और उसमें लगने वाले समय को अंकित करती है. डेटा भेजने और सर्वर से जवाब आने के बीच लगने वाले समय से स्पीड का पता लगाया जाता है. इंटरनेट कंपनियों की तरफ़ से किए जाने वाले स्पीड के दावों को भी परखने में ये वेब टूल्स काफ़ी कारगर साबित हो सकते हैं. सबसे खास बात ये है कि इन में से ज्यादातर वेबसाइटें उपयोग के लिए कोई शुल्क नहीं लेतीं. तो लीजिए पेश है इंटरनेट स्पीड जांचने के पांच रास्ते. स्पीडटेस्ट डॉट नेट इस्तेमाल में काफ़ी तेज़ और सरल वेबसाइट है. इस वेबसाइट को खोलते ही जबरदस्त ग्राफ़िक्स के साथ आपकों स्पीड टेस्ट बटन दिखता है. ये वेबसाइट खुद ही आपकी आईपी और इंटरनेट सर्विस देने वाली कंपनी का पता लगा लेती है और आपको नज़दीकी सर्वर से स्पीड टेस्ट कराती है. ये टूल आइफ़ोन और एंड्रॉएड मोबाइल पर भी काम करता है स्पीडटेस्ट ऐप आईट्यून्स और गूगल प्ले में उपलब्ध है. स्पीडऑफ़ डॉट मी एक ऐसा इंटरनेट टूल है जिसके लिए फ्लैश प्लेयर या जावा की ज़रूरत नहीं होती. ये एचटीएमएल-5 पर काम करता है जिससे इसे लोड होने में कम समय लगता है. इंटरनेट स्पीड जांचने के लिए स्पीडऑफ़ डॉट मी दुनियाभर में फैले अपने कुल 31 सर्वरों का इस्तेमाल करता है. एचटीएमएल-5 पर चलने वाली ये वेबसाइट किसी भी कंप्यूटर या ब्राउज़र पर आसानी से खुल जाती है. इसे मोबाइल के ब्राउज़र से भी खोल सकते हैं. स्पीकइज़ी डॉट नेट बैंडविथ टेस्ट में अपलोड और डाउनलोड स्पीड जांच सकता है. इसके लिए यूज़र को चुनना होता है वेबसाइट में मौजूद सर्वरों की सूची में से कोई एक सर्वर और शुरू हो जाता है टेस्ट. स्पीडटेस्ट डॉट मी की ही तरह सीनेट बैंडविथ मीटर इंटरनेट की स्पीड जांचने वाला एक वेब टूल है. ये टूल काफ़ी साधारण है और केवल डाउनलोड स्पीड बताता है. हालांकि इसके ग्राफिक्स अच्छे हैं. ऑडिट माइ पीसी आपके इंटरनेट की डाउनलोड और अपलोड स्पीड जांच सकता है. इस टूल में आपको कई सर्वरों का ऑप्शन मिलेगा जिनपर आप अपना बैंडविथ जांच पाएंगे. इसके जांच की प्रक्रिया काफ़ी सरल और तेज़ है. |
| DATE: 2013-06-18 |
| LABEL: science |
| [387] TITLE: क्या आपका भी इंटरनेट चलता है कछुआ चाल? |
| CONTENT: क्या आपको दस रुपए में कोई दुनिया से जोड़ सकता है ये करामात सिर्फ और सिर्फ इंटरनेट ही कर सकता है. चाहे गूगल हो फ़ेसबुक हो या फ़िर विकिपीडिया अब दुनिया इंटरनेट के बिना अधूरी सी लगती है. इस डिजिटल युग में एक अच्छे इंटरनेट कनेक्शन का होना ज़रूरी होता है. फ़िनलैंड जैसे कई देशों में तो इंटरनेट कनेक्शन नागरिकों का कानूनी अधिकार हैं. भारत में इस तरह का कोई कानून तो नहीं है लेकिन सरकार की नीति देश के हर कोने तक इंटरनेट पहुंचाने की है नेशनल ऑप्टिक फ़ाइबर नेटवर्क इसी दिशा में एक कदम है. ट्राई भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार भारत में डेढ़ करोड़ से ज़्यादा ब्रॉडबैंड इंटरनेट यूज़र्स हैं. पूरे देश में इंटरनेट सेवा मुहैया कराने के लिए सरकारी और ग़ैर सरकारी कंपनियां कोशिश में लगी हैं. लेकिन इंटरनेट से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या जो इस समय लोगों के सामने आ रही है वो है बेहद कम स्पीड या फिर रूक-रूक कर चलना. बीबीसी हिन्दी ने अपने फेसबुक पन्ने पर लोगों से इंटरनेट कनेक्शन से जुड़े उनके अनुभवों के बारे में पूछा जिसमें 400 से ज्यादा लोगों ने अपनी बात रखी. राजस्थान के बीकानेर से राजेंद्र सेन ने फ़ेसबुक पर कहा सभी कंपनियां जो इंटरनेट की स्पीड कनेक्शन लेते समय बताती है वह स्पीड कभी नही मिलती है. जबकि शिकायत करने पर कंपनी के प्रतिनिधि कोई ठोस जवाब भी नही दे पाते. इसलिए ग्राहक अपने आपको ठगा सा महसूस करता है. दिल्ली में रहने वाले रवि प्रकाश पिछले सात साल से अलग-अलग इंटरनेट कंपनियों की सेवाएं ले रहे हैं वो बताते हैं ब्रॉडबैंड में बताए गए स्पीड से आधा ही मिल पाता है जबकि 2जी या 3जी डॉन्गल से मिल रही इंटरनेट की स्पीड नेटवर्क पर आधारित होती है. पुणे से चरनजीत सिंह भारीवाल बताते हैं जो स्पीड बताई गई वो कभी मिली ही नहीं चाहे कोई भी नेटवर्क परख लीजिए. लेकिन पैसे पूरे लिए जाते हैं. पटना से अखिलेश चौधरी कहते हैं इंटरनेट की स्पीड कभी मन मुताबिक नहीं मिली. उदाहरण के तौर पर 10 एमबीपीएस के कनेक्शन पर सिर्फ 512 केबीपीएस की स्पीड ही मिलती है यहां. फ़ेसबुक पर आए इन सवालों का जवाब देते हुए सेलुलर ऑपरेटर्स असोसिएशन ऑफ़ इंडिया के महानिदेशक राजन मैथ्यू ने कहा इंटरनेट स्पीड कई तकनीकी बातों पर निर्भर करती है. जैसे किसी उपरोक्त समय नेटवर्क पर कितने लोग इंटरनेट प्रयोग कर रहे हैं. या किसी क्षेत्र में इंटरनेट कंपनी की तकनीक कितनी उतकृष्ट है. इसके अलावा ब्रॉडबैंड इंटरनेट सर्विस से संबंधित ट्राई के कई गाइडलाइन्स मौजूद है जिन्हें इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियों को मानना अनिवार्य है. जैसे कि किसी प्लान पर औसत स्पीड कितनी होगी वगैरह. गूगल के कार्यकारी अध्यक्ष एरिक श्मिट जब मार्च में भारत आए थे तो उन्होंने कहा था कि भारत अभी भी अपनी वेब रणनीति में दूसरे देशों से पीछे है. सवा अरब की आबादी वाले भारत जैसे देश में सिर्फ 15 करोड़ इंटरनेट यूज़र्स हैं. दुनियाभर में हुए गैलप के एक सर्वे में भारत के सिर्फ तीन फ़ीसदी लोगों ने कहा उनके घर में इंटरनेट हैं जबकि चीन में 34 फ़ीसदी रूस में 51 फ़ीसदी और ब्राज़ील में 40 फ़ीसदी लोगों ने घर में इंटरनेट के होने की पुष्टि की. इंटरनेट उत्पाद कंपनी अकामाई की साल 2012 की आखिरी तिमाही में किए रिसर्च में इंटरनेट की स्थिति से जुड़े कई रोचक आकड़ें उजागर हुए गए हैं. अकामाई के अनुसार भारत में इंटरनेट की औसत स्पीड 1-2 एमबीपीएस है जबकि सबसे अच्छी इंटरनेट औसत स्पीड दक्षिण कोरिया में है जो कि 14 एमबीपीएस है. दुनियाभर में औसत इंटरनेट स्पीड की रैंकिंग में भारत 116वें पायदान पर है और दक्षिण कोरिया नंबर एक पर. |
| DATE: 2013-06-17 |
| LABEL: science |
| [388] TITLE: गूगल के गुब्बारे गाँवों तक पहुंचाएंगे इंटरनेट |
| CONTENT: इंटरनेट जायंट गूगल ने दुर्गम इलाकों को इंटरनेट से जोड़ने के लिए एक नई तकनीक ईजाद की है. इसके तहत गूगल ने आकाश में ऐसे प्रायोगिक गुब्बारे छोड़े हैं जो अपने आसपास के इलाकों में इंटरनेट सेवाएँ उपलब्ध कराएंगे. कंपनी ने न्यूज़ीलैंड में 30 अत्यधिक दबाव वाले गुब्बारे छोडे़ हैं जहाँ से वो दुनिया भर में एक नियंत्रित रास्ते पर उड़ते हुए जाएंगे. इन गुब्बारों में लगे उपकरण रेंज में आनेवाले इलाके के बड़े हिस्से में 3जी जैसी स्पीड वाली इंटरनेट सेवाएं मुहैय्या कराएंगे. शुरुआत में यह सेवा थोड़ी अबाध नहीं मिल पाएगी. लेकिन कंपनी को उम्मीद है कि समय के साथ वह पर्याप्त बेड़ा तैयार कर लेगी ताकि दुर्गम इलाकों में रह रहे लोगों को भरोसेमंद सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकेगी. कंपनी ने बताया है कि इन गुब्बारों को किसी दिन किसी आपदा प्रभावित इलाके की ओर भेजा जा सकता है ताकि बचाव कार्यों में मदद की जा सके. लेकिन एक विशेषज्ञ ने चेतावनी दी है कि वैश्विक स्तर पर हवाओं के रुझानों को देखते हुए अत्यधिक ऊँचाई पर हजारों की संख्या में ऐसे गुब्बारों को नियंत्रित करना एक मुश्किल काम है. गूगल ने इस परियोजना को प्रोजेक्ट लून का नाम दिया है और उसने माना है कि अभी यह अत्यधिक प्रयोगात्मक स्तर पर है. प्रत्येक गुब्बारे का व्यास 15 मीटर है और इसमें उड़ने वाली गैस भरी हुई है. गुब्बारे के नीचे कुछ इलेक्ट्रानिक उपकरण लटके हैं जिसमें रेडियो एंटीना एक फ्लाइट कम्प्यूटर एक ऊँचाई नियंत्रक प्रणाली और ऊर्जा के लिए एक सोलर पैनल शामिल हैं. गूगल ने बताया कि प्रत्येक गुब्बारा हवा में 100 दिन तक रहेगा और पश्चिम से पूर्व की ओर उड़ते हुए अपने आसपास 40 किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट कनेक्टविटी उपलब्ध कराएगा. कंपनी ने बताया कि इस परियोजना के जरिए दुनिया की दो-तिहाई आबादी को जोड़ा जाएगा जिनके पास वाजिव कीमत पर इंटरनेट उपलब्ध नहीं है. कंपनी ने न्यूजीलैंड में परीक्षण के लिए कुछ घरों पर विशेष एंटीने भी लगाएं गए हैं. इस योजना पर काम कर रहे विभाग गूगल एक्स के मुख्य तकनीकी आर्किटेक्ट रिचर्ड डेवाल ने बताया लून के पीछे विचार यह है कि दुनिया को उस चीज के जरिए जोड़ना आसान होगा जो सभी के पास समान तरीके से उपलब्ध है यानी आकाश. उन्मुक्त रूप से उड़ने वाले गुब्बारों के साथ एक दिक्कत यह है कि वो सही जगह पर हैं यह कैसे सुनिश्चित किया जाएगा. डेवाल बताते हैं हम यह नहीं चाहते हैं कि वो हवा से साथ बहते जाएं. हम चाहते हैं कि वो वहाँ जाएं जहाँ जमीन पर इंटरनेट की ज़रूरत है. इसलिए उन्हें गूगल के मिशन कंट्रोल के जरिए नियंत्रित किया जाएगा. जब इन गुब्बारों की उम्र खत्म होने वाली होगी साफ्टवेयर की मदद से उन्हें उतार लिया जाएगा ताकि स्थानीय कर्मचारी किट वापस ले लें. गूगल के लिए गुब्बारों के इन बेड़ों को संभालना मुश्किल भी हो सकता है. सरेय विश्वविद्यालय के गणना विभाग के विजिटिंग प्रोफेसर एलेन वुडवार्ड ने बताया मौसम की मार को देखते हुए हवा से हल्की मशीनों को नियंत्रित करने की व्यावहारिकता जगजाहिर है. उन्होंने बताया एक स्वतंत्र मार्ग पर ऐसी चीजों को संचालित करने के लिए काफी प्रयासों की ज़रूरत है और मैं सोचता हूँ कि जैसा वो सोच रहे हैं उसके मुकाबले सफल होने में उन्हें थोड़ा अधिक समय लगेगा. |
| DATE: 2013-06-16 |
| LABEL: science |
| [389] TITLE: बिना सुई टीका लगाने का तरीका |
| CONTENT: ब्रिटेन के एडिनब्रा में एक ऐसे स्किनपैच को पेश किया गया जिसके जरिए सस्ते और अधिक प्रभावी टीके तैयार किए जा सकते हैं. इस टीके के आविष्कारक ने बताया कि सुई की जगह पैच के इस्तेमाल से दुनिया भर में बीमारियों की रोकथाम के तौरे तरीके बदले सकते हैं. प्रोफेसर मार्क केंडल ने कहा कि इस नए तरीके से मलेरिया जैसी बीमारियों के लिए उपयोगी टीके तैयार हो सकते हैं. चिकित्सा विशेषज्ञों ने इस खबर का स्वागत किया है लेकिन ये चेतावनी भी दी है कि यह कुछ मरीजों के लिए उचित नहीं हो सकता है. यह महज संयोग है कि केंडेल ने उसी एडिनब्रा में अपने आविष्कार को पेश किया जहाँ 160 साल पहले एलेक्जेंडर वुड ने पहली बार किसी मरीज को सुई लगाई थी. उन्होंने कहा आजकल मरीज के लिए सुई लगवाना कोई नई अनोखी बात नहीं है. यह 160 साल पुरानी तकनीक है. साफ पानी और साफ-सफाई के साथ ही यह एक ऐसी चीज है जिसने दुनिया भर में लंबा जीवनकाल सुनिश्चित करने में प्रमुख भूमिका निभाई है. लेकिन वो कहते हैं कि इस तकनीक में लंबे समय से बेहतरी की जरूरत महसूस की जा रही थी. नैनोपैच सुई के जरिए दिए जाने वाले टीकों की कई खामियां दूर करता है मसलन सुई के लेकर अनजाना सा डर या दूषित सुई के इस्तेमाल से संक्रमण की आशंका. प्रोफेसर केंडल बताते हैं कि इसके अलावा कुछ अन्य वजहें भी इसे अहम आविष्कार बना देती हैं. पैच में हजारों की संख्या में छोटे प्रक्षेपक टीके को रिलीज करते हैं जिसे सूखे रूप में त्वचा पर लगाया जाता है. वह बताते हैं कि नैनोपैच में प्रक्षेपक त्वचा की प्रतिरोधक प्रणाली पर काम करते हैं. हम त्वचा की सतह से इन कोशिकाओं को निशाना बनाते हैं जो बाल की चौड़ाई के बराबर होती हैं. उन्होंने बताया ऐसा लगता है कि हम प्रतिरोधक बिन्दु को नजरअंदाज कर रहे हैं जो मांसपोशियों की बजाए त्वचा में हो सकता है. जबकि परंपरागत सुई मांसपेशियों को निशाना बनाती हैं. ऑस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन में क्वींसलैंड विश्वविद्यालय स्थित उनकी प्रयोगशाला में परीक्षणों के दौरान नैनोपैच का इस्तेमाल फ्लू टीके के लिए किया गया. शोधकर्ताओं ने पाया कि नैनोपैच द्वारा दिए गए टीके पर प्रतिरोधक तंत्र की प्रतिक्रिया परंपरागत सुई के मुकाबले बिल्कुल अलग थी. प्रोफेसर केंडल बताते हैं कि इसका अर्थ है कि हम टीकाकरण का एक बिल्कुल अलग तरीका तैयार कर सकते हैं. इस तकनीक में आवश्यक खुराक की मात्रा भी काफी कम है परंपरागत खुराक के मुकाबले महज सौंवाँ हिस्सा. उन्होंने बताया कि एक टीका जिसकी कीमत 10 डॉलर है उसे घटाकर महज 10 सेंट तक लाया जा सकता है. परंपरागत टीके के साथ एक दिक्कत यह है कि तरल रूप में होने के चलते उसे रेफ्रिजरेटर में रखना पड़ता है. केंडल ने बताया कि रेफ्रिजरेटर फेल हो जाने के कारण अफ्रीका में आधे टीके काम नहीं करते हैं. उन्होंने बताया कि नैनोपैच से बने टीके को 23 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर एक साल तक रखा जा सकता है. इस खबर का ब्रिटिश सोसाइटी फॉर इम्यूनोलॉजी ने स्वागत किया है. |
| DATE: 2013-06-16 |
| LABEL: science |
| [390] TITLE: कभी देखी है उड़ने वाली मोटर-बाइक |
| CONTENT: उड़ने वाली कार अब भी सपना ही है लेकिन क्या उड़ने वाली बाइक जल्द ही हकीकत बनकर सामने आ सकती है चेक गणराज्य में शोधकर्ताओं ने 95 किलोग्राम की रिमोट से चलने वाली बाइक तैयार की है जो जमीन से कुछ मीटर की ऊँचाई पर पाँच मिनट तक चक्कर लगा सकती है. राजधानी प्राग के एक प्रदर्शनी हाल में एक डमी उड़ान के दौरान इस इलेक्ट्रॉनिक प्रोटोटाइप ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी चारों तरफ घूमा और सफलतापूर्वक उतर गया. इस बाइक में सामने और पीछे की ओर दो-दो और अगल बगल एक-एक बैटरी चालित प्रोपेलर लगे हैं. प्रोपेलर एक तरह का पंख है जो घूम घूम कर ऊर्जा पैदा करता है. इस मशीन की मदद से दुपहिया यात्रियों के भीड़भाड़ भरे जाम से निजात मिल सकती है लेकिय यह भी सड़क पर उतरने या हवा में कुलाँचे भरने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है. इसकी मौजूदा बैटरी की मदद से यह कुछ मिनट तक उड़ान ही भर सकती है और फिर इसे रिचार्ज करना पड़ता है. ड्यूरेटिक बाइसिकिल्स के तकनीकी निदेशक मिलान डूचेक ने बताया चूंकि हर दस साल में बैटरी की क्षमता दोगुनी हो जाती है इसलिए हम उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में बाइक की इतनी क्षमता होगी कि वह खेल पर्यटन या छोटे कामों के लिए प्रयोग में आ सके. इस बाइक को तैयार करने के लिए ड्यूरेटिक ने दो अन्य चेक कंपनियों टेक्नोडैट और एवेक्टोर के साथ काम किया. बाइक को उड़ाने की यह पहली कोशिश नहीं है. इससे पहले अगस्त 2009 में ऑक्सफोर्डशायर के एक आईटी अध्यापक जॉन कार्वर ने एक बाइक तैयार कर उसे फ्लाइक नाम दिया. यह एक उड़ान भरने वाला तिपहिया वाहन था. उन्होंने चैरिटी के उद्देश्य से ब्रिटेन में उड़ान भी भरी. कार्वर का वाहन नागर विमानन प्राधिकरण में पंजीकृत था और इसमें टू-स्ट्रोक ट्विन प्रोपेलर मोटर के साथ ही पैराग्लाइडर छतरी भी लगी थी. इसमें एक पैराशूट भी लगा था जो बाइक के हवा में होने के दौरान हमेशा खुला रहता था. कार्वर की वेबसाइट के मुताबिक बाइक में प्रत्येक दो घंटे बाद ईंधन भरना पड़ता था और यह 25-4 किलोग्राम तक सामान ले जाने में सक्षम हैं और यह उड़ान के दौरान 32 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल कर सकती है. पैरा-साइकिल जैसी कंपनियां भी छोटे उपकरणों की बिक्री करती हैं लेकिन एक बड़ा पैराशूट शहरी यात्रियों के लिए बोझिल हो सकता है. 20वीं शताब्दी की शुरुआत में फ्लाइंग मशीन वास्तव में साइकिल ही थीं जिनमें पंख जोड़ दिए गए थे. |
| DATE: 2013-06-15 |
| LABEL: science |
| [391] TITLE: मुर्गे की मर्दानगी कब और क्यों बदली ? |
| CONTENT: ताज़ा शोध में ये बात सामने आई है कि बड़े होने के दौरान कुछ पक्षियों के मर्दाना अंग क्यों ग़ायब हो जाते हैं. ज़मीन पर रहने वाले पक्षी जैसे कि मुर्गों के शिश्न भ्रूण के वक़्त से ही विकसित होने लगते हैं लेकिन वयस्कों में ये अल्पविकसित अवस्था में पाया जाता है. विज्ञान पत्रिका करेंट बायोलॉजी में छपी एक स्टडी में ये बताया गया है कि ये पक्षियां जब बड़े हो रहे होते हैं तो इनके भीतर एक तरह के आनुवांशिक प्रोग्राम की पहल हो जाती है जो तैयार हो रहे शिश्न के विकास को रोक देता है. मर्दाना अंग के ग़ायब होने की वजह से मुर्गियों के लिए प्रजनन पर अधिक नियंत्रण रखना संभव होता होगा. सह-लेखक डॉक्टर मार्टिन कोहन कहते हैं हमारी खोज में ये पता चला है कि कुछ पक्षियों में मर्दाना अंग के छोर पर मौजूद कोशाणु खुद ब खुद मरने लगते हैं जिससे शिश्न के विकास की प्रक्रिया रूक जाती है. फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी के मार्टिन ने कहा कि इस पूरे मामले में बीएमपी4 नाम का एक जीन अहम भूमिका निभाता है. मुर्गों में इस जीन के जागते ही मर्दाना अंग सिकुड़ जाता है. बत्तखों और इमूस नाम की एक चिड़िया में ये जीन सक्रिय नहीं होता इसलिए उनके शिश्न का विकास जारी रहता है. चूंकि मुर्गियों और कुछ दूसरे पक्षियों के मर्दाना अंग नहीं होते हैं इसलिए उनमें प्रजनन की प्रक्रिया शिश्न के बिना प्रवेश के ही संभव हो जाती है. नर और मादा दोनों के जिस्म में एक खुली जगह होती है जिसे क्लोका कहते हैं. जब क्लोका एक दूसरे से मिलते हैं तो शुक्राणु मादा के भीतर प्रवेश कर जाता है. इसे क्लोकल किस कहते हैं. हालांकि ये साफ़ नहीं हो पाया है कि आख़िर शिश्न के ग़ायब होने की प्रक्रिया क्यों शुरू हुई. शोधकर्ताओं का कहना है कि आगे चलकर इस स्टडी के ज़रिये इस तरह के सवालों का जवाब भी ढू़ढा जा सकेगा कि सांप में पैरों का विकास कैसे और किस वजह से रूक गया. |
| DATE: 2013-06-15 |
| LABEL: science |
| [392] TITLE: लीजिए आ गई है एयरबस ए350 |
| CONTENT: कई सालों के लंबे इंतजार के बाद यूरोपीय हवाई जहाज़ निर्माण कंपनी एयरबस के नए और खास विमान ने सफलता पूर्वक अपनी परीक्षण उड़ान पूरी कर ली है. एयरबस का यह विमान है ए350. इस विमान में 86-73 खरब रुपए का निवेश किया गया है. इस विमान ने चार घंटे की सफल भरी. ए350 के बारे में कहा जा रहा है कि ईंधन क्षमता और पर्यावरण की दृष्टि से यह विमान कई नए मानक स्थापित करने वाला है. दो इंजनों और लंबी दूरी की खासियतों वाले ए350 को बोइंग के 787 ड्रीमलाइनर के सीधे प्रतिद्वंद्वी के रुप में पेश किया जा रहा है. बोइंग 787 ड्रीमलाइनर के बारे में कहा जाता है कि इसने विमान प्रौद्योगिकी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है. लेकिन यह भी सच है कि एयरबस इस एअरक्राफ्ट ए350 को वास्तव में बनाना ही नहीं चाहता था. पिछले दशक के मध्य तक एयरबस बहुप्रतीक्षित सुपरजंबो ए380 को बनाने की तैयारी में पूरी तरह व्यस्त थी. विशालकाय डबल डेकर सुपरजंबो ए380 विमान में बेहद जटिल मशीनें लगाई गई थी. इसे बनाने की लागत बढ़ती ही जा रही थी. इन परिस्थितियों में अरबों डॉलर की लागत वाला एक और विमान बनाने में एअरबस थोड़ा झिझक रही थी. मगर एअरबस को एक ऐसे विमान की भी जरूरत थी जो बोइंग की ड्रीमलाइनर को कड़ी चुनौती दे सके. इसकी वजह यह थी कि कई प्रमुख एअरलाइन कंपनियां ड्रीमलाइनर में खासी रुचि ले रही थीं. ड्रीमलाइनर में हल्के कार्बन यौगिकों का इस्तेमाल किया जाना था. इसके अलावा इसमें वायुयान निर्माण से जुड़ी उन्नत तकनीकों की इस्तेमाल भी किया जाना था ताकि इसकी ईंधन की खपत और उड़ाने की लागत काफी कम हो जाए. ड्रीमलाइनर की ईंधन क्षमता का मुकाबला करने के लिए एअरबस ने ए350 का खाका खींचते समय ए330 के अपने वर्तमान मॉडल को अपना आधार बनाया. लेकिन इसमें नए पंख नए इंजन और हल्के धड़ लगाए गए. शुरुआती दौर में इससे संभावित ग्राहक कुछ खास प्रभावित नजर नहीं आए. इस मॉडल के कट्टर आलोचकों में से एक थे स्टीवन उदवर-हेज़ी. वे तब इंटरनेशनल लीज फायनांस कॉरपोरेशन के प्रमुख थे. ये कंपनी भारी तादाद में विमानों की खरीद करती है. विमान उद्योग में मजबूत छवि रखने वाले स्टीवन ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ए350 के बारे में जैसा सोचा गया था यह उसके अनुरुप बन कर नहीं आया है. कई और एअरलाइनों के प्रमुख भी स्टीवन की इस बात से सहमत थे. नतीजा यह हुआ कि 2006 के मध्य में एयरबस ने वह डिजाइन वापस ले लिया और इस पर फिर से काम करना शुरू कर दिया. और नतीजा आपके सामने है ए350 विमान जो एयरबस के मुख्यालय टोलूस की हवाई पट्टी पर आत्मविश्वास के साथ खड़ा है और ऐसा अंदाजा है कि एयरबस ने इसे अपनी ओर से हरी झंडी दे दी है. ए350को लांच किए जाने के पहले ही 600 से ज्यादा आर्डर आ चुके हैं. अगले सप्ताह होने वाले पेरिस एयर शो में और इसकी और ज्यादा खरीद होने की संभावना है. रिपोर्ट है कि पेरिस एयर शो में एयर फ्रांस 25 ए350 विमानों को खरीदने के बारे में सोच रहा है. 787 की तरह ए350 भी एक ज़बरदस्त विमान है. यह विमान कंपनियों को बेहतर ईंधन क्षमता के साथ लंबी दूरी की सेवाएं भी देगा. ए350 का धड़ और अन्य हिस्से टाइटेनियम से बने हैं जिससे इसका वज़न कम हो गया है. एयरबस का दावा है कि ए350 अन्य विमानों की अपेक्षा 25 फीसदी कम ईंधन खर्च करेगा. यहीं नहीं यह विमान ध्वनि प्रदूषण और उत्सर्जन को इनकी आदर्श सीमा के भीतर बनाए रखेगा. एयरबस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जॉन लीही ने बीबीसी को बताया कि ए350 का लक्ष्य अपने बाजार में भारी इजाफा करना है. उनके आकलन के अनुसार विश्व के विभिन्न एयरलाइनों को आने वाले 20 सालों में करीब 6500 ऐसे विमानों की जरूरत पड़ेगी. जॉन लीही का कहना है 787 के मुकाबले ए350 बहुत तेजी से 600 से ज्यादा की बिक्री के स्तर पर पहुंच गया है. बाजार ने ए350 का पुरज़ोर स्वागत किया है. |
| DATE: 2013-06-15 |
| LABEL: science |
| [393] TITLE: इंसानी डीएनए का पेटेंट नहीं |
| CONTENT: अमरीका के सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मेडिकल कंपनियां मनुष्य के प्राकृतिक डीएनए का पेटेंट नहीं करा सकतीं लेकिन प्रयोगशाला में तैयार किया गया डीएनए पेटेंट योग्य माना जाएगा. कोर्ट का कहना है कि डीएनए प्रकृति की देन है और सिर्फ़ इस आधार पर उसका पेटेंट नहीं किया जा सकता कि किसी शोध के लिए वह शरीर से अलग किया गया है. कोर्ट ने मिरियड जेनेटिक्स नाम की एक अमरीकी कंपनी द्वारा स्तन और गर्भाशय कैंसर का पता लगाने संबंधी शोध में इस्तेमाल हुए जीन के पेटेंट को अवैध क़रार दिया है. चिकित्सकीय शोध और जीव विज्ञान तकनीक के लिए कोर्ट के इस फ़ैसले के दूरगामी परिणाम होंगे. अमरीकी जैव वैज्ञानिक समुदाय ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि ऐसे पेटेंट पर बंदिशें लगाने से जीन से जुड़े शोध पर नकारात्मक असर पड़ेगा. कोर्ट का ये फ़ैसला मिरियड जेनेटिक्स और अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन के बीच चले एक मुक़दमे का नतीजा है. इस संगठन ने 2009 में एक मुक़दमा दायर कर ये सवाल उठाया था कि क्या मेडिकल कंपनियों को मानव जीन का पेटेंट करने की इजाज़त होनी चाहिए. मामला मुख्य रूप से स्तन और गर्भाशय कैंसर का पता लगाने संबंधी शोध से जुड़ा था. मिरियड जेनेटिक्स एक ऐसे टेस्ट पर काम कर रही थी जिससे कैंसर को जन्म देने के लिए जिम्मेदार जीन में तब्दीली की संभावना को तलाशा जा सके. अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन का तर्क था कि डीएनए प्रकृति की रचना है इसलिए इसका पेटेंट नहीं हो सकता लेकिन कंपनी का कहना था कि जिस जीन पर सवाल उठाए जा रहे हैं उसे कंपनी ने शरीर से बाहर निकाल कर शोध किया है इसलिए उसका पेटेंट हो सकता है. 2010 में एक न्यूयॉर्क फ़ेडरल कोर्ट ने यूनियन का पक्ष लिया लेकिन अपीलीय न्यायालय ने मिरियड जेनेटिक्स की बात स्वीकार करते हुए कहा कि मानव शरीर से निकाले गए डीएनए का रासायनिक स्वरूप बिल्कुल भिन्न होता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को नहीं माना. न्यायाधीश जस्टिस टॉमस ने फ़ैसले में लिखा कि सिर्फ़ इस आधार पर कि जीन को शरीर से बाहर निकाल लिया गया है उससे मिलने वाली जानकारी को पेटेंट योग्य नहीं माना जा सकता. इस कथन के समर्थन में ही न्यायाधीश जस्टिस एन्टोनिन स्केलिया ने लिखा कि डीएनए का एक हिस्सा अगर बाहर निकाल भी लिया जाए तब भी वह अपने स्वरूप में उस प्राकृतिक डीएनए का ही हिस्सा है. अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन की वक़ील सैन्ड्रा पार्क इस फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहती हैं कि अब वैज्ञानिकों के लिए इन जीन पर शोध करना ज़्यादा आसान होगा क्योंकि किसी तरह की बौद्धिक संपत्ति के उल्लंघन का कोई डर नहीं रहेगा. |
| DATE: 2013-06-14 |
| LABEL: science |
| [394] TITLE: पूरी तरह बदल जाएगा आपका हवाई सफ़र! |
| CONTENT: जाली जैसी बनावट वाला हवाई जहाज़ यात्रा करने का सबसे अच्छा तरीका तो नहीं लगता लेकिन यह भविष्य में यात्रा करने के अनूठे विचारों में से एक है. स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबरा में हुई टेडग्लोबल कांफ्रेंस में एयरबस द्वारा डिज़ाइन किए गए एक ऐसे ही हवाई जहाज़ के मॉडल को दिखाया गया. इंसान के कंकाल से प्रेरित यह डिज़ाइन मजबूत तो है ही तुलनात्मक रूप से हल्का भी है. इसका अर्थ यह हुआ कि सिद्धांत रूप में यह यात्रा का ईंधन खर्च चमत्कारिक रूप से कम कर सकता है. कंपनी का लक्ष्य जहाज़ के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले मिश्रित पदार्थ को थ्रीडी प्रिंट लेकर तैयार करना है. इस कांसेप्ट हवाई जहाज़ को एयरबस के स्ट्रक्चरल इंजीनियरों की एक टीम ने तैयार किया है. भविष्य के जहाज़ों को लेकर एक दूसरा विचार जहाज़ की पूंछ को ऊपर की तरफ़ मोड़ने का है जिससे इंजन का शोर ऊपर की ओर जाए. इससे ध्वनि प्रदूषण कम किया जा सकेगा. जहाज़ के अंदर एयरबस के इंजीनियरों ने बैठने के पारंपरिक तरीकों की बजाय नए क्षेत्रों को तैयार किया है जिनमें मॉर्फ़िंग कुर्सियां होंगीं. यह कुर्सियां न सिर्फ़ बैठने वालों की ऊर्जा को संग्रहित कर सकेंगी बल्कि यात्री के शरीर के मुताबिक आकार भी बदल सकेंगी. टीम का सुझाव है कि जहाज़ के आगे की तरफ़ कुर्सियों में ऐसे सेंसर लगाए जाएं जो यात्रियों के स्वास्थ्य पर भी नज़र रख सकें. इसके अलावा एक गेमिंग ज़ोन भी बनाया जा सकता है जिस पर यात्री आभासी खेलों का आनंद उठा सकें. सुझाव यह भी है कि आजकल के छोटे दरवाज़ों के बजाय भविष्य के जहाज़ों में ज़्यादा चौड़े दरवाज़े हों जिनसे प्रवेश करते हुए लोग अपने हाथ के थैले वहीं छोड़ दें. ये बाद में खुद-ब-खुद उनकी कुर्सियों तक पहुंचा दिए जाएंगे. इससे गलियारों में भीड़ होने की समस्या से निजात मिल सकेगी जिससे समय बचेगा. एयरबस के इंजीनियर शाफेर कहते हैं भविष्य में हवाई यात्रा आदमी और पर्यावरण दोनों के लिहाज से किफ़ायती होनी चाहिए. हालांकि वह स्वीकार करते हैं कि सिर्फ़ डिज़ाइन से ही उद्योग की सारी समस्याएं हल नहीं हो जाएंगी. वह कहते हैं हमारे पास तेल ख़त्म हो रहा है और हमें इसका हल निकालना होगा. समस्या का कुछ हल तो तकनीक की मदद से निकाला जा सकता है लेकिन इसके साथ ही हमें वैकल्पिक ईंधन भी ढूंढना होगा. अपने खुद के कांसेप्ट हवाई जहाज़ को विकसित करने के साथ ही कंपनी ने छात्रों से पर्यावरण-अनुरूप हवाई यात्रा के विचार भी आमंत्रित किए थे. इस हफ़्ते छात्रों की पांच टीमों को चुना गया. एक विशेष प्रकार के आकार बदलने वाले पदार्थ द्वारा इंजन में बदलाव किए जाएं जिससे इंजन से हवा के गुज़रने की राह बदलकर ध्वनि प्रदूषण कम किया जा सके. सामान को हवा पर तैराकर ले जाया जाए. ऊर्जा के साधन के रूप में मीथेन का प्रयोग. शाफेर कहते हैं दस साल पहले लिक्विड हाइड्रोजन को इस्तेमाल करने का सुझाव आया था लेकिन हम अब भी इंतज़ार कर रहे हैं कि कोई इसके संग्रहण के लिए अच्छा सा तरीका विकसित कर सके. |
| DATE: 2013-06-13 |
| LABEL: science |
| [395] TITLE: मौत के तीन हज़ार साल बाद सीटी-स्कैन |
| CONTENT: यूँ तो तीन हज़ार साल बहुत होते हैं लेकिन प्राचीन मिस्र के लोगों का जीवन कैसा होता था यह जानने की कोशिश एक ममी के सीटी स्कैन और एक्स-रे किया जा रहा है. ये तीन हज़ार साल पुरानी है. पर्थ म्यूजियम के क्यूरेटरों ने फैसला किया है कि वे मिस्र की पुरानी ममी को सीटी स्कैन और एक्स-रे के लिए भेजेंगे. मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी और मैनचेस्टर हॉस्पीटल की जाँच से उन्हें उम्मीद है कि इस ममी की जिंदगी और मौत के बारे में ज्यादा जानकारियाँ जुटाई जा सकेंगी. यह सोचा गया है कि ममी कोई राजकुमारी या पुजारिन हो सकती है. संभावना इस बात की भी है कि वह थीब्स के प्राचीन शहर से संबंध रखती हो. यह ममी पहले अल्लोआ म्यूजियम के पास थी लेकिन बंद हो जाने के बाद पर्थ के संग्रहालय को दान में दी गई. पर्थ की ममी को लेकर यह पहली बार है कि किसी तरह की जाँच की जा रही है. हालांकि इससे पहले पर्थ म्यूजियम ने प्राचीन मिस्र के लोगों के लिए पवित्र मानी जानी वाली एक चिड़िया की मेडिकल जाँच कराई थी. इस मेडिकल जाँच के पीछे एक वजह यह भी बताई जा रही है कि मानवों और जानवरों की उपलब्ध ममियों का एक अंतरराष्ट्रीय डाटाबेस तैयार किया जा सके. जाँच के नतीजों से वैज्ञानिकों को प्राचीन मिस्र के लोगों के खान-पान के बारे में पहले से अधिक जानकारी मिली है. साथ ही यह भी पता चला है कि उन्हें किस तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ता था. हाल ही में मैनचेस्टर के अपने संग्रह में रखी ममियों का भी स्कैन किया गया था. इस जाँच से पता चला है कि उनमें से कई लोगों को खून की कमी की समस्या थी कई लोगों को दाँत में तकलीफ थी. संभवतः यह बालू भरी हुई ब्रेड खाने से हुई थी. कई बार तो जाँच से यह भी पता चला कि ममी के शरीर पर लिपटी पट्टियों में धातु की ताबीज़ रखी हुई थी. माना जाता है कि मौत के बाद उनकी रक्षा के लिए उन्हें यह पहनाया गया था. यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर बायोमेडिकल इजिप्टोलॉजी की डॉक्टर लिडिजा मैकनाइट कहती हैं सबसे अहम सवाल यही है कि इनके भीतर क्या सचमुच में कोई शरीर है वह आगे कहती हैं संभवतः क्योंकि आप पट्टियों से बाहर निकलती हड्डियाँ और पैर देख सकते हैं. डॉक्टर लिडिजा के मुताबिक ममी की उम्र का अंदाजा लगाने की कोशिश की जाएगी. वह व्यस्क था या किशोर और क्या उस व्यक्ति को कोई बीमारी या चोट लगी थी. ममियों के अध्ययन की शुरुआत 1908 में ही हो चुकी थी जब मैनचेस्टर के लेक्चर रूम में एक ममी की पट्टियाँ सावधानी से उतारी गई थीं. लेकिन मौजूदा परियोजना से यह कोशिश है कि शोधकर्ता इन संरक्षित लोगों को बिना नुकसान पहुँचाए इनकी पहेली को सुलझा सकते हैं. यह भविष्य में भी काम आएगा जब इन ममियों के संरक्षण के बारे में कौई फैसला लिया जाना होगा. आखिरकार लोग ममियों की पहेली सुलझाने को लेकर अक्सर उत्सुक रहते हैं. |
| DATE: 2013-06-09 |
| LABEL: science |
| [396] TITLE: फ़ोन इस्तेमाल करना है तो जीभ दिखाइए! |
| CONTENT: आप अगर आड़े-तिरछे मुंह बनाने में माहिर हैं तो ये हुनर जल्द ही आपके एंड्राएड फ़ोन की ज़रूरत भी बन सकता है. सॉफ़्टवेयर कंपनी गूगल ने एंड्राएड फ़ोन और टैबलेट की सुरक्षा के लिए एक ऐसा उपाय ढूंढा है जिसके चलते फ़ोन का इस्तेमाल करने के लिए उसे अनलॉक करते समय टेढ़ा-मेढ़ा मुंह बनाना होगा या फिर ज़बान बाहर निकालनी होगी. कंपनी ने इसके लिए पेटेंट अर्ज़ी 2012 में दाख़िल की थी जिसे अब सार्वजनिक किया गया है. इसके मुताबिक़ नया सॉफ़्टवेयर ऐंड्रायड फ़ोन की सुरक्षा के लिए कुछ ऐसे मानकों की मांग करेगा जिनकी नकल करना मुमकिन ना हो. फ़ोन इस्तेमाल करने के लिए चेहरे के विभिन्न भावों का इस्तेमाल करना होगा. जैसे जीभ निकालना मुंह खोलकर हंसना माथे पर पड़ी शिकन या फिर भंवों का कंपन. इस तरह की विशेष पहचान फ़ोन को बेहतर सुरक्षा प्रदान करेगी. हालांकि जेली बीन एंड्राएड में ये सुविधा पहले से मौजूद है जहां फ़ोन खोलने के लिए चेहरे की पहचान औऱ आंखें झपकाना शामिल है. लेकिन फ़ोटो और थोड़ी एडिटिंग के ज़रिए इस सुरक्षा घेरे को तो़ड़ना मुमकिन है. एंड्रॉयड उपकरणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कवायद में यह नया पेटेंट एक क़दम आगे बढ़ने का प्रयास है. फ़ोन लॉक खोलने के लिए चेहरे के दो तीन भावों का इस्तेमाल एक के बाद एक करने की हिदायत किसी धोखाधड़ी की संभावना को कम कर सकता है. हालांकि गूगल ख़ुद इस बात को स्वीकार करती है कि शायद इस हल का काट भी ढूंढ लिया जाए और ये काफ़ी ना हो. कंपनी इसे और पुख्ता बनाने के लिए उपकरणों में लेज़र बीम का प्रयोग करने का इरादा भी रखती है. लेकिन साइबर सुरक्षा के जानकारों का मानना है कि इसे हक़ीक़त बनने में लंबा वक्त लगेगा. एक तकनीकी जानकार प्रोफ़ेसर ऐलेन वुडवर्ड ने बीबीसी से बातचीत में कहा सुरक्षा के लिए गूगल कुछ विचारों और हाव-भाव पर निर्भरता की बात कर रहा है लेकिन एक पेटेंट अर्ज़ी लिखने और उसे वास्तविक उपाय बनाने में अंतर है. मुझे लगता है अभी कुछ समय तक पुराने तरीक़े से पासवर्ड पर निर्भरता जारी रहेगी. उधर गूगल के एक प्रवक्ता का कहना है कि कंपनी ने अपने कर्मचारियों द्वारा सुझाए गए विभिन्न उपायों को सामने रखा है. इनमें से कुछ आगे चलकर वास्तविक परिणाम लाते हैं और कुछ नहीं. हर पेटेंट किसी नए उत्पाद की गारंटी तो नहीं देता. |
| DATE: 2013-06-08 |
| LABEL: science |
| [397] TITLE: कैसे और कब की जाए मौत की घोषणा |
| CONTENT: डॉक्टर अब इस बात पर अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाने का प्रयास कर रहे हैं कि किसी व्यक्ति को कब और कैसे मृत माना जाए. उनका कहना है कि तकनीकी विकास की वजह से जिंदगी और मौत के बीच की विभाजक रेखा बहुत धुंधली हो गई है. डॉक्टरों ने पहले मृत घोषित किए लोगों के बाद में जिंदा पाए जाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए अधिक शोध और साफ दिशा-निर्देशों की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है. इस मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आम सहमति बनाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने काम करना शुरू कर दिया है. अधिकांश अस्पतालों में डॉक्टर किसी व्यक्ति के दिल फेफड़ों और सांस का परीक्षण करने के बाद ही उसकी मौत की घोषणा करते हैं. ब्रिस्टल के फ्रिंचे अस्पताल के सलाहकार एनेस्थेटिक डॉक्टर एलेक्स मानारा कहते हैं चिकित्सा साहित्य में 30 से अधिक ऐसे मामलों का जिक्र है जिसमें मृत बताए गए लोग बाद में ज़िंदा पाए गए. उनका कहना है कि इन घटनाओं ने वैज्ञानिकों को इस बात के लिए प्रेरित किया है कि क्या मौत की घोषणा में और सुधार किया जा सकता है. यूरोपियन सोसाइटी ऑफ़ एनिस्थेलॉजी की एक बैठक में उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में किसी को मृत घोषित करने से पहले उसके शरीर पर बहुत ध्यान नहीं दिया जाता है. किसी व्यक्ति की मौत की घोषणा करने के लिए डॉक्टर द्वारा उसके शरीर पर कम से कम पांच मिनट तक नज़र रखने के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य दिशा-निर्देश बनाने की मांग हो रही है. जिससे किसी ऐसे व्यक्ति को मृत न घोषित किया जा सके जिसके दिल और फेफड़े सामान्य रूप से ठीक हो सकते हैं. अमरीका और ऑस्ट्रेलिया के बहुत से संस्थान किसी व्यक्ति को मृत घोषित करने के लिए दो मिनट तक निरीक्षण करते हैं. जबकि ब्रिटेन और कनाडा में इसके लिए पांच मिनट का समय लिया जाता है. वहीं अंगदान करने की स्थिति में इटली में डॉक्टर किसी व्यक्ति को मृत घोषित करने के लिए 20 मिनट का समय लेते हैं. बॉथ के रॉयल यूनाइटेड अस्पताल में सघन चिकित्सा के सलाहकार डॉक्टर जेरी नोलन कहते हैं अस्पताल में जहाँ मरीज़ों पर क़रीब से नजर रखी जाती है वहां मरीज़ को होश में लाने की उपयुक्त प्रक्रिया के बाद शरीर पर पाँच मिनट तक नजर रखने का विचार अच्छा है. डॉक्टर नोलन इस सम्मेलन में शामिल नहीं हुए थे. वे कहते हैं इस बात के प्रमाण हैं कि दिमाग को ऑक्सीजन की आपूर्ति बंद होने के पाँच मिनट बाद दिमाग की कोशिकाओं को स्थायी रूप से नुक़ासन होने लगता है. बार्सिलोना विश्वविद्यालय में एनस्थिसिया के प्रोफ़ेसर रिकर्ड वालेरो सघन चिकित्सा कक्ष में रखे गए किसी व्यक्ति के हृदय और फेफड़ों को मशीन के जरिए चलाने के दुर्लभ मामलों पर विचार करेंगे. इस तरह के मामलों में मौत की घोषणा के लिए डॉक्टर ब्रेन डेथ या दिमागी तौर पर मौत होने का सहारा लेते हैं. मरीज़ के दिमाग की सक्रियता का पता लगाने के लिए कई तरह के न्यूरोलॉजिकल परीक्षणों का सहारा लिया जाता है. दुनियाभर में ब्रेन डेथ को स्थापित करन वाली प्रक्रिया में थोड़ा बदलाव आया है. उदाहरण के लिए कनाडा में एक डॉक्टर ब्रेन डेथ की घोषणा कर सकता है वहीं ब्रिटेन में इसके लिए दो डॉक्टरों की ज़रूरत होती है. स्पेन में इसके लिए तीन डॉक्टर चाहिए. ब्रेन डेथ की घोषणा से पहले होने वाले न्यूरोलॉजिकल परीक्षण भी अलग-अलग जगह अलग-अलग संख्या में किए जाते हैं. प्रोफ़ेसर वालेरो कहते हैं ये बदलाव तार्किक नहीं लगते हैं. ब्रेन डेथ की घोषणा करने के लिए किसी उपयुक्त प्रक्रिया पर दुनिया भर में आम सहमति बनाने के लिए डॉक्टर वालेरो ने और शोधों की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है. डॉक्टर नोलन कहते हैं मृत्यु की घोषणा के लिए दिशा-निर्देश बहुत बढ़िया विचार है. यह दुनिया भर के डॉक्टरों की मदद करेगा और लोगों में आत्मविश्वास बढ़ाएगा. वे कहते हैं इटली और ब्रिटेन शायद समान रास्ता विकसित करें. इससे मृत्यु की घोषणा करने के मापदंड दोनों के लिए एक ही होंगे. |
| DATE: 2013-06-07 |
| LABEL: science |
| [398] TITLE: क्या वक्त से लुका-छिपी का खेल मुमकिन है? |
| CONTENT: रोशनी की चकाचौंध में भी इस लबादे का इस्तेमाल कर वक़्त को चकमा दिया जा सकता है. यह लबादा ऑप्टिकल फ़ाइबर में प्रकाश की रफ़्तार बदल सकता है. इसका मतलब है कि वक़्त के गड्ढे में घटने वाली कोई भी घटना इस दौरान नहीं पकड़ी जा सकती. यानी प्रकाश की किरण को उसके रास्ते में ही अपने हिसाब से बदल पाना मुमकिन हो गया है. नेचर पत्रिका में छपा यह शोध पिछले साल बने अदृश्य होने वाले लबादे के आगे का काम है. वो लबादा समय के महज़ कुछ हिस्सों को ही छिपाने की ताक़त रखता था. मौजूदा शोध दूसरे अदृश्य लबादों से इस मायने में अलग है कि इसके तहत किसी ख़ास चीज़ के मुक़ाबले एक ख़ास वक़्त में घटने वाली घटनाएं छिपाई जा सकती है. परड्यू यूनिवर्सिटी ऑफ इंडियाना की टीम ने इसे अंजाम दिया और दिखाया कि किसी जगह लगातार आ रही प्रकाश की किरणों के एक हिस्से में कई समय के गड्ढों को पैदा कर इसमें घट रही चीज़ें छिपाई जा सकती हैं. शोधकर्ता प्रकाश किरण के रास्ते में आने वाला क़रीब आधा डेटा अदृश्य बनाने में कामयाब रहे जिसे पहले आराम से देखा जा सकता था. इस क्लोक या लबादे का मतलब है कि जब कोई चीज़ या घटना आंखों की पकड़ में न आ सके. यह लबादा प्रकाश और आवाज़ दोनों की फ्रीक्वेंसी पर काम करता है. मिसाल के लिए लड़ाकू विमान दुश्मन के राडार की पकड़ में नहीं आ पाते. शोधकर्ता प्रोफेसर एंड्र्यू वाइनर ने बताया हम इलेक्ट्रिक सिग्नल से नियंत्रित होने वाले व्यावसायिक दूरसंचार के अंश के ज़रिए प्रकाश को आगे-पीछे फेंकने में कामयाब रहे. जब कोई ऑप्टिकल फ़ाइबर के ज़रिए हाई स्पीड डेटा भेजता है तो ज़्यादातर मामलों में यह एक या ज़ीरो सेकेंड बायनरी कोड के बराबर होता है. प्रोफेसर वाइनर ने बीबीसी को बताया अपने सिस्टम में हम इसे एक या ज़ीरो सेकेंड को छिपा सकते हैं. प्रकाश की किरण में दूसरे कई उतार-चढ़ाव हो सकते हैं पर ये आवरण ऐसी ज़ोन तैयार करता है जिसमें कोई ये पता नहीं लगा सकता कि प्रकाश की किरण कैसे बदली. उन्होंने इसकी तुलना बहती हुई नदी से करते हुए कहा आप नदी के किसी ऐसे हिस्से की कल्पना करें और उसे इस तरह आगे-पीछे खींचें कि उसमें पानी न बचे. मान लीजिए कि इसके लिए किसी बांध को बार-बार लगाया-हटाया जाए ताकि पानी का रुख़ मोड़ा जा सके. प्रोफ़ेसर वाइनर ने बताया अब हम पानी को ऐसे अलग करें कि ये उस उठते-गिरते बांध को न देख पाए उसमें कोई विघ्न न पड़े और इसके बाद हम उसे फिर नदी के शांत पानी में तब्दील कर दें. इस तरह हम रोशनी के बहाव को नियंत्रित कर सकते हैं. हम उसे समय में आगे-पीछे करते हैं और कुछ घटनाएं इस तरह ग़ायब कर देते हैं जो सामान्य स्थिति में पूरे बहाव में गड़बड़ पैदा करतीं. नॉर्थ कैरॉलिना यूनिवर्सिटी में ऑप्टिकल फ़िज़िक्स के विशेषज्ञ ग्रेग बर ने समझाया कि हालांकि इसे टाइम क्लोक कहा जा रहा है पर असल में ये समय का नहीं प्रकाश का अपने ढंग से इस्तेमाल है. ग्रेग इस शोध में शामिल नहीं हैं पर उनका मानना है कि ये टाइम क्लोक की दिशा में एक बड़ी छलांग है. डॉक्टर ग्रेग के मुताबिक पहली बार उन्होंने एक सेकेंड के अरबवें हिस्से के बराबर घटनाएं अदृश्य करने की बात की गई है. यहां वो समय का 46 फ़ीसदी हिस्सा छिपाने में कामयाब रहने की बात कर रहे हैं. इससे पता चलता है कि अब यह महज़ उत्सुकता नहीं बल्कि इसे प्रकाश संबंधी संचार और डेटा प्रोसेसिंग में इस्तेमाल किया जा सकता है. इम्पीरियल कॉलेज लंदन के फ़िज़िसिस्ट ऑर्टविन हेस का कहना है कि ये शोध अब तक ईजाद किए गए टाइम लेंस सिद्धांत का विस्तार है. प्रोफेसर हेस ने बीबीसी को बताया कि मौजूदा शोध में समय-आकाश के विरोधाभास को शामिल किया गया है. इसका मतलब है कि लौकिक लबादे के मूल सिद्धांत की तरह इसमें किसी लबादे की जगह समय ने ले ली है. इससे पता चलता है कि ऑप्टिक्स में कितनी ख़ूबसूरती से समय-आकाश के सिद्धांतों का इस्तेमाल किया जा सकता है. इस शोध से कई संभावनाएं खुल गई हैं. प्रोफेसर हेस के मुताबिक़ इसका इस्तेमाल करके डेटा को छेड़छाड़ से बचाया जा सकता है. ग़ैरज़रूरी संवाद पर नज़र रखी जा सकती है और संवेदनशील जानकारियां इस्तेमाल करने के लिए सरकारें या बड़ी संस्थाएं इसका उपयोग कर सकती हैं. |
| DATE: 2013-06-07 |
| LABEL: science |
| [399] TITLE: आपने सोचा और वो उड़ा हेलिकॉप्टर. |
| CONTENT: शोधकर्ताओं ने सोच की शक्ति का ऐसा इस्तेमाल कर दिखाया है कि हेलिकॉप्टर के नियंत्रण के लिए मस्तिष्क का इस्तेमाल रिमोट-कंट्रोल के तौर पर किया जा सकेगा. दुनिया भर में शोधकर्ता सोच की शक्ति को इलेक्ट्रिक सिग्नल में बदलने की कोशिश में लगे हैं और इस आविष्कार के साथ उन कोशिशों में एक नया अध्याय जुड़ गया है. यानी काल्पनिक और वास्तविक दुनिया के बीच अब एक नायाब रिश्ता जुड़ गया है जिसके बारे में कुछ वर्षों पहले सोचा भी नहीं जा सकता था. इस आविष्कार का मकसद है मानसिक रूप से कमज़ोर लोगों की मदद करना और साथ ही वीडियो गेम खेलने के नायाब तरीके इजाद करना. इस शोध में दिमाग की विद्युत किरणों को कैद किया गया. हालांकि इसका मतलब ये नहीं है कि ये उपकरण खुद-ब-खुद ही जान सकता है कि आपके दिमाग में क्या चल रहा है. बल्कि इसके लिए एक इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को तैयार किया जाता है जिसे दिमाग की विद्युत किरणों का स्वरूप पढ़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. इस उपकरण की मदद से इंसान के दिमाग में चल रही सोच को हेलिकॉप्टर के साथ जोड़ा जाता है. इस प्रक्रिया के दौरान कंप्यूटर स्क्रीन पर प्रतीत होने वाला ग्राफ़ अजब ही लगता है लेकिन ये तकनीक प्रभावशाली साबित हुई है. इससे पहले ऐसी तकनीक का इस्तेमाल व्हीलचेयर को चलाने और दिमागी ऑरकेस्ट्रा चलाने के लिए भी हो चुका है. तकनीक से जुड़ी कंपनियों को भी इस प्रयोग में कई संभावनाएं दिखाई देती हैं. खबरों के मुताबिक सैमसंग भी दिमागी कंट्रोल तकनीक का इस्तेमाल करने वाली एक टैबलेट डिवाइस पर काम कर रहा है. अब जब शोधकर्ता दिमाग के भीतर तक तकनीक का इस्तेमाल कर पहुंच सकते हैं तो अब वे अपना ध्यान और ज़्यादा सूक्ष्म विषयों पर केंद्रित कर सकते हैं. इस शोध के वरिष्ठ आविष्कारक बिन हे का कहना है कि उनकी टीम इस प्रयोग पर काफी समय से काम कर रही थी. प्रॉफेसर बिन हे ने बीबीसी को बताया हमारा मकसद है उन लोगों की या मरीज़ों की मदद करना जो चल-फिर नहीं पाते हैं. इस तकनीक के ज़रिए हम व्हीलचेयर को कंट्रोल करना चाहते हैं टीवी को नियंत्रित करना चाहते हैं और साथ ही अगर हो सके तो शरीर के किसी कृत्रिम अंग का संचालन भी इस तकनीक के ज़रिए करना चाहते हैं. इस प्रयोग के लिए पांच लोगों को चुना गया और उन्हें एक साधारण टोपी पहनाई गई जिसमें 64 इलेक्ट्रोड लगे थे. इन इलेक्ट्रोड्स के ज़रिए कंप्यूटर को दिमाग में होने वाली हलचल के बारे में बताया जाता है और फिर वाई-फाई की मदद से कंप्यूटर कमांड देता है जिससे हेलिकॉप्टर चलता है. इंसान की दिमागी कमांड का पालन करते हुए ये हेलिकॉप्टर अपने सामने आने वाली रुकावटों को भी झांसा दे सकता है. इसके अलावा इस तकनीक का इस्तेमाल घर में रोबोट के संचालन के लिए भी हो सकता है. |
| DATE: 2013-06-06 |
| LABEL: science |
| [400] TITLE: आख़िर डिप्रेशन यानी अवसाद है क्या? |
| CONTENT: हम सब ज़िंदग़ी में कभी न कभी थोड़े समय के लिए नाख़ुश होते हैं मगर डिप्रेशन यानी अवसाद उससे कहीं ज़्यादा गहरा लंबा और ज़्यादा दुखद होता है. इसकी वजह से लोगों की ज़िंदगी से रुचि ख़त्म होने लगती है और रोज़मर्रा के कामकाज से मन उचट जाता है. अभी तक ये स्पष्ट रूप से नहीं बताया जा सका है कि अवसाद किस वजह से होता है मगर माना जाता है कि इसमें कई चीज़ों की अहम भूमिका होती है. ज़िंदग़ी के कई अहम पड़ाव जैसे- किसी नज़दीक़ी की मौत नौकरी चले जाना या शादी का टूट जाना आम तौर पर अवसाद की वजह बनते हैं. इनके साथ ही अगर आपके मन में हर समय कुछ बुरा होने की आशंका रहती है तो इससे भी अवसाद में जाने का ख़तरा रहता है. इसके तहत लोग सोचते रहते हैं मैं तो हर चीज़ में विफल हूँ. कुछ मेडिकल कारणों से भी लोगों को अवसाद होता है जिनमें एक है थायरॉयड की कम सक्रियता होना. कुछ दवाओं के साइड इफ़ेक्ट्स में भी अवसाद हो सकता है. इनमें ब्लड प्रेशर कम करने के लिए इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएँ शामिल हैं. इतना ही नहीं अवसाद बिना किसी एक ख़ास कारण के भी हो सकता है. ये धीरे-धीरे घर कर लेता है और बजाए मदद की कोशिश के आप उसी से संघर्ष करते रहते हैं. दिमाग़ के रसायन अवसाद की हालत में किस तरह की भूमिका अदा करते हैं अभी तक ये भी पूरी तरह नहीं समझा जा सका है. मगर ज़्यादातर विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि ये सिर्फ़ दिमाग़ में किसी तरह के असंतुलन की वजह से ही नहीं होता. इसका एक छोटा जवाब है- ये किसी को भी हो सकता है. वैसे शोध से पता चलता है कि इसके पीछे कोई आनुवांशिक वजह भी हो सकती है. इसके तहत कुछ लोग जब चुनौतीपूर्ण समय से गुज़र रहे होते हैं तो उनके अवसाद में जाने की आशंका अधिक रहती है. जिन लोगों के परिवार में अवसाद का इतिहास रहा हो वहाँ लोगों के डिप्रेस्ड होने की आशंका भी ज़्यादा होती है. इसके अलावा गुणसूत्र 3 में होने वाले कुछ आनुवांशिकीय बदलावों से भी अवसाद हो सकता है. इससे लगभग चार प्रतिशत लोग प्रभावित होते हैं. दिमाग़ में रसायन जिस तरह काम करता है एंटी डिप्रेसेंट्स उसे प्रभावित करता है. मगर इन रसायनों की अवसाद में क्या भूमिका होती है ये पूरी तरह समझी नहीं जा सकी है और एंटी डिप्रेसेंट्स सबके लिए काम भी नहीं करते. दिमाग़ में न्यूरोट्रांसमिटर जिस तरह काम करते हैं उसका संतुलन भी अवसाद के चलते बिगड़ जाता है. ये रासायनिक संदेशवाहक होते हैं जो कि न्यूरॉन्स यानी दिमाग़ की कोशिकाओं के बीच संपर्क क़ायम करते हैं. न्यूरोट्रांसमिटर जो संदेश भेजते हैं उन्हें अगले न्यूरॉन में लगे रेसेप्टर ग्रहण करते हैं. कुछ रेसेप्टर किसी ख़ास न्यूरोट्रांसमिटर के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो सकते हैं या फिर असंवेदनशील हो सकते हैं. एंटी डिप्रेसेंट्स मूड बदलने वाले न्यूरोट्रांसमिटर्स का स्तर धीरे-धीरे करके बढ़ाते हैं. सेरोटॉनिन नॉरपाइनफ़्राइन और डोपामाइन जैसे न्यूरोट्रांसमिटर्स इसमें शामिल हैं. यही वजह है कि अधिकतर लोगों को ये दवाएँ कुछ हफ़्तों तक लेनी पड़ती हैं और उसके बाद ही इसका असर दिखना शुरू होता है. एंटी डिप्रेसेंट दवाएँ सबसे पहले सन् 1950 में बनी थीं और कुल चार तरह के एंटी डिप्रेसेंट्स हैं. ये रसायन मस्तिष्क को कुछ अलग तरीक़ों से प्रभावित करते हैं. सबसे आम तौर पर इस्तेमाल होने वाला एंटी डिप्रेसेंट वो है जो सेरोटॉनिन का स्तर दिमाग़ में बढ़ा देता है. इसके अलावा सेरोटॉनिन और नॉरएड्रीनेलिन री-अपटेक इनहिबिटर्स यानी एसएनआरआई नए एंटी डिप्रेसेंट हैं जो नॉरपाइनफ़्राइन को निशाना बनाते हैं. ट्राइसाइ एंटीडिप्रेसेंट्स और मोनोएमाइन-ऑक्सिडेज़ इनहिबिटर्स पुराने एंटी डिप्रेसेंट्स हैं और आम तौर पर इस्तेमाल नहीं होते हैं क्योंकि उनमें साइट इफ़ेक्ट्स भी होते हैं. एंटी डिप्रेसेंट्स अवसाद के कुछ लक्षणों में तो आराम पहुँचाते हैं मगर वे उसकी मूल वजह पर असर नहीं करते. यही वजह है कि ये बाक़ी उपचारों के साथ इस्तेमाल होते हैं अकेले नहीं. |
| DATE: 2013-06-05 |
| LABEL: science |
| [401] TITLE: फिर पनप रहे हैं सदियों पहले बर्फ में दबे पौधे |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने कहा है कि सदियों पहले लिटिल आइस एज या क़रीब साढ़े चार सौ साल पहले ग्लेशियर के नीचे जम गए पौधे फिर से पनप रहे हैं. चार सौ साल पुराने इन पौधों को ब्रायोफ़ाइट्स के नाम से जाना जाता है. ये पौधे प्रयोगशाला जैसी परिस्थितियों में विकसित हुए हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि शुष्क हुए पौधों को हरा करने की तरकीब में यह बात निहित है कि कैसे बर्फ की चादर में ढंके रहने के बाद भी उन पर वातावरण का असर पड़ता है. इस अध्ययन के नतीजे प्रोसिडिंग ऑफ़ नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंस में प्रकाशित हुए हैं. अल्बर्टा विश्वविद्यालय के शोधकर्ता कनाडियन उत्तरी ध्रुव के टीयरड्राप ग्लेशियरों में घूम रहे थे इस दौरान उन्हें ये पौधे नजर आए. यहां के ग्लेशियर 2004 के बाद से तीन-चार मीटर प्रतिवर्ष की दर से पिघले हैं. ग्लेशियरों के पिघलने से यहां की जमीन अब उभरने लगी है. यह ज़मीन तथाकथित लिटिल आइस एज के समय से ही प्रकाश के संपर्क में नहीं आई थी. साल 1550 से 1850 तक के समय को लिटिल आइस एज के नाम से जाना जाता है. माना जाता है कि इस दौरान वातावरण का तापमान काफी गिरा था. इस अध्ययन की प्रमुख लेखक कैथरीन ला फार्ज कहती हैं जब हमने ग्लेशियर के किनारों पर चलना बंद किया तो देखा कि पौधे बहुत बड़े पैमाने पर धरती के नीचे से निकल रहे थे. ऐसा लग रहा था कि ग्लेशियर हरा हो गया है. ब्रायोफ़ाइट उन लैंड प्लांट से अलग होते हैं जिन्हें हम आमतौर पर जानते हैं. इन पौधों में वे नलियां नहीं होती हैं जो इसके विभिन्न भागों में तरल पदार्थ पहुंचाती हैं. डॉक्टर ला फार्ज यह देखकर आश्चर्यचकित रह गई थीं कि ये पौधे अत्यधिक ठंडे वातावरण में शुष्क रहकर जीवित बचे रहते हैं और गर्म मौसम वापस आने पर बढ़न लगते हैं. लेकिन डॉक्टर ला फार्ज इस बात पर आश्चर्यचकित थीं कि जो पौधे इतने लंबे समय से बर्फ में दबे थे वे फिर से पनपने लगे हैं. उन्होंने बीबीसी से कहाहमने उन्हें ध्यान से देखा और प्रयोगशाला में लेकर आए मैंने देखा कि उनमें से कुछ के डंठलों के किनारों पर हरी शाखाएं उग आई हैं. और मैं हैरान रह गई जब उन्होंने मुझे बताया कि वे इन पौधों को फिर से खेत में उगा रहे हैं. डॉक्टर ला फार्ज बहुत समय पहले बर्फ के नीचे दब गए ब्रायोफाइट्स में हो रहे विकास को देखकर हैरान थीं. वे कहती हैं अगर बर्फ से ढंकी जमीन के बारे में सोचते हैं तो हमारी हमेशा से यही राय थी कि एक ग्लेशियर के किनारे की विपरीत परिस्थिति में पौधे उगते हैं. लेकिन हम कभी यह नहीं सोचते थे कि पौधे किसी ग्लेशियर के नीचे से बाहर आएंगे. सर्वड्रप पास के टीयरट्राप ग्लेशियर की पिघलती बर्फ में से जीवन की एक नई श्रृंखला सामने आ रही है इनमें सायनोबैक्टिरिया और हरे स्थलीय शैवाल शामिल हैं. यहां पाई गईं कई प्रजातियां विज्ञान के लिए बिल्कुल नई हैं. डॉक्टर ला फार्ज कहती हैं ग्लेशियर के नीचे से बाहर आ रही इस पूरी दुनिया का अध्ययन करने की जरूरत हैं. वह कहती हैं ग्लेशियर बहुत तेज़ी से पिघल रहे हैं. इससे बहुत सी स्थलीय वनस्पतियां सामने आएंगी जिनका बहुत गहरा प्रभाव पड़ेगा. |
| DATE: 2013-06-05 |
| LABEL: science |
| [402] TITLE: क्या चींटियां दिखा पाएंगी रोबोट के लिए राह? |
| CONTENT: संकरी जगहों पर रास्ता बनाने की चींटियों की काबिलियत की नकल करके ऐसे रोबोट तैयार किए जा सकते हैं जिनका इस्तेमाल खोज और राहत-बचाव के काम में किया जा सकता है. ये नतीजा चींटियों के बारे में किए गए एक अध्ययन के बाद सामने आया है. अमरीका के जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के वैज्ञानिकों ने शोध में पाया है कि चींटियां अपने एंटीना का इस्तेमाल उस वक्त अतिरिक्त अंग के तौर पर करने लगती हैं जब वो गिरने लगती है. इसका इस्तेमाल वो बालू के भीतर सुरंग बनाने में भी करती हैं. शोधकर्ताओं ने चींटियों की इस खासियत का अध्ययन करने के लिए हाई स्पीड कैमरे का सहारा लिया. इससे संबंधित अध्ययन पीएनएएस में प्रकाशित हुआ है. पीएनएएस अमरीका की नेशनल एडेकमी ऑफ साइंस को कहते हैं. इस रिसर्च का नेतृत्व करने वाले डॉक्टर निक ग्रैविश ने चींटियों का पता लगाने के लिए दो प्रयोग किए. पहला प्रयोग साइंटफिक ग्रेड आंट फार्म्स का था. इस प्रयोग में पहले उन्होंने चींटियों को सुरंग बनाने दिया गया इसके बाद उन्हें ग्लास के दो प्लेट के बीच फंसा दिया गया. इसकी वजह से चींटियों की हर गतिविधि और सुरंग को देखा जा सका और इसका फिल्मांकन भी किया गया. डॉक्टर ग्रैविश कहते हैं चींटियां बहुत तेजी से चल सकती हैं. अगर आप इसे स्लो मोशन में देखें तो आप पाएंगे कि वो कई कई बार गिरती हैं. हां इस बारे में महत्वपूर्ण बात ये है कि हर बार गिरने के बाद चींटियों ने खुद को तुरंत संभाल भी लिया. चींटियों के इस व्यवहार को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने एक दूसरा प्रयोग भी किया. इसमें एक ग्लास सुरंग लगाई गई जिससे गुजरने के बाद ही चींटियां अपने घोसलों से भोजन तक जा सकती थीं. डॉक्टर ग्रैविश कहते हैं हम इन ग्लास सुरंगों के अंदर देख पा रहे थे और पता लगा रहे थे कि चींटियों के शरीर का हर हिस्सा उस वक्त क्या करता है जब वो चढ़ती हैं फिसलती या फिर नीचे गिरती हैं. ग्रैविश के मुताबिक वैज्ञानिक ये देखकर हैरान थे कि किस तरह चींटियां गिरने के दौरान अपने पैरों का इस्तेमाल करती हैं. इसके अलावा वो अपने एंटीना को भी जरूरत के वक्त अतिरिकत अंग के तौर पर अपना वजन संभालने के लिए इस्तेमाल कर लेती हैं. ये जानने के लिए कि चींटियों ने कैसे बालू और मिट्टी के अंदर भूल भुलैया बनाया वैज्ञानिकों ने बालू और मिट्टी से भरे एक बर्तन के अंदर उन्हें छोड़ दिया. इसके बाद वैज्ञानिकों ने एक्स रे सिटी स्कैनर की सहायता से सुरंगों की थ्री डी फोटों खींची. डॉक्टर ग्रैविश का कहना है कि इस प्रयोग के बाद साबित हुआ है कि चीटिंया हमेशा एक ही चौड़ाई की सुरंग खोदती हैं फिर चाहे मिट्टी किसी भी तरह की हो. एक चीटीं के बराबर की चौड़ाई और मोटाई की सुरंग खोजने का मतलब ये हुआ कि जब चीटी गिरती है तो वो खुद को संभाल सके और फिर से दोबारा खुदाई के काम में लग सके. इस शोद में शामिल प्रोफेसर डान ग्लोडमैन का कहना है कि चीटीं वातावरण को अपने जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल कर सकती हैं. वो कहते हैं कि उनका मकसद उस सिद्धांत को समझना है जिसमें चींटियां और दूसरे जानवर जटिल वातावरण को भी अपने तरीके से इस्तेमाल कर लेते हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया कि खोज और राहत में रोबोट की भूमिका अभी बहुत सीमित है. वो कहते हैं तबाही वाली जगहों पर जहां जमीन धंसती या फिर जहां मलबा जमा होता है वहीं पर आपको सुरंग बनाना होता है. उदाहरण के लिए आप उन लोगों के लिए अस्थायी संरचना विकसित करना चाह रहे हों जो मलबे के नीचे दबे होते हैं. चींटियां बालू और मिट्टी में बिना किसी आर्द्रता के सुरंग बना लेती हैं. इनसे सीख लेकर ऐसे रोबोट तैयार किए जा सकते हैं जो इस तरह की समस्याओं से निजात दिला सकते हैं. |
| DATE: 2013-06-04 |
| LABEL: science |
| [403] TITLE: स्तन कैंसर की गाज 'युवतियों पर ज़्यादा' |
| CONTENT: विशेषज्ञों का मानना है कि स्तन कैंसर के युवा मरीजों के लंबे समय तक जीवित न रहने की समस्या के लिए कुछ हद तक क्लीनिकल परीक्षण की कमी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. ब्रिटेन में स्तन कैंसर का इलाज करा चुकी 40 साल से कम उम्र की तीन हज़ार महिलाओं का विश्लेषण किया गया. इस अध्ययन के लिए कैंसर रिसर्च यूके और वेसेक्स कैंसर ट्रस्ट ने वित्तीय सहायता दी थी. अध्ययन में पाया गया कि कुछ विशेष प्रकार के कैंसर के युवा मरीज़ों की हालत इलाज के पांच साल बाद पहले जैसी ही हो गई है. यह विरोधाभास इस तरह की बीमारियों के साथ आमतौर पर होता है. नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के जर्नल में प्रकाशित आँकडों के मुताबिक़ इलाज के पांच साल बाद तक जीवित रहने की दर 80 फ़ीसदी और आठ साल तक जीवित रहने की दर 68 फ़ीसदी थी. रजोनिवृत्ति के बाद की अधिकांश महिलाओं के स्तन कैंसर का इलाज़ तो हो जाता है. लेकिन ब्रिटेन में 40 साल से कम उम्र की केवल पाँच फ़ीसदी मरीज़ो का ही इलाज हो पाया. अध्ययन में महिलाओं में पाए जाने वाले हार्मोन एस्ट्रोजन से बढ़ने वाले कैंसर पर भी ध्यान दिया गया. इस तरह के कैंसर में कैंसर कोशिकाएं एस्ट्रोजन ग्राही होती है. इस तरह के कैंसर में एस्ट्रोजन ग्राही कोशिकाओं को आमतौर पर कीमोथेरेपी से ब्लॉक किया जाता है और टैमोक्सिफ़िन नामक दवा का भी उपयोग किया जाता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि टैमोक्सिफ़िन का लंबे समय तक उपयोग लाभदायक हो सकता है. वे कहते हैं कि मूल समस्या इस परीक्षण में और युवा मरीजों को शामिल करने की है. अध्ययन की प्रमुख प्रोफ़सर डायना एलिक्स कहती है यह अध्ययन इस बात के और प्रमाण देता है कि जब युवा महिलाओं के स्तन कैंसर का इलाज किया जाता है तो यह अलग तरीके से व्यवहार करता है. वे कहती हैं उनके इलाज के लिए अलग नजरिए की ज़रूरत है यह ज़रूरी नहीं हैं कि उन्हें कैंसर के उम्रदराज मरीज़ों के इलाज से समझा जा सके. कैंसर रिसर्च यूके के क्लीनिकल रिसर्च के निदेशक केट लॉ कहते हैं हाल के दशकों में स्तन कैंसर के इलाज के बाद जीवित रहने की दर में नाटकीय रूप से सुधार हुआ है. 1970 के दशक की तुलना में इलाज के बाद कम से कम 10 साल तक जीवित रहने वाली महिलाओं की संख्या दो गुनी हो गई है. लेकिन ऐसा ही स्तन कैंसर की युवा मरीजों के बारे में नहीं कहा जा सकता है. |
| DATE: 2013-06-03 |
| LABEL: science |
| [404] TITLE: खुद कर सकते हैं आप अपने ऐप को पॉपुलर |
| CONTENT: ब्रितानी किशोर निक डीअलोसियो के बनाए ऐप को दिग्गज वेब कंपनी याहू ने करोड़ों में खरीदा. कश्मीर निवासी महविश मुश्ताक़ डायल कश्मीर ऐप बना कर ऐप बनाने वाली पहली कश्मीरी महिला बन गईं. चाहे ब्रितानी किशोर हो या भारतीय युवती ऐप बनाना अब हर किसी के लिए आसान होता जा रहा है. तकनीकी के शौकीन युवा अपने मनपसंद ऐप बना रहे हैं. लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि अपने ऐप को खरीददार तक ले कर जाने का सही तरीका क्या है. जिससे उनका ऐप जल्द से जल्द अच्छे से अच्छे दाम में बिक सके. आज हम आपको बताएंगे कि अपने ऐप को बाजार में सही तरीके से कैसे पेश करें. एरिका सैडन एक डेवलपर लेखक और ब्लॉगर हैं. अपने सहयोगी स्टीव सैंडे के साथ मिलकर एरिका ने अपने ऐप को सही तरीके से सही खरीददार तक पहुंचाने के बारे में एक किताब भी लिखी है. एरिका कहती हैं ऐसा करने के लिए आपको मानवीय संबंधों का विशेषज्ञ होने की ज़रूरत नहीं है. आपको बस एक ख़ास तरीक़े से समझाना होता है कि आपके पास कैसा ऐप है और वो महत्वपूर्ण क्यों है. आपको क्यों लगा कि यह ऐप बनाना चाहिए और दूसरे लोगों को इस ऐप से क्या फायदा हो सकता है. एरिका के अनुसार ऐप बनाने के लिए कोड की पहली लाइन लिखने से पहले ही आपको सोच लेना चाहिए कि आप उसका वितरण किस प्रकार करेंगे. ऐप बनाने के बाद सबसे जरूरी है अपने ऐप की उपस्थिति दर्ज कराना. ऐप बनाते ही इसके प्रचार के लिए आप अपने सोशल मीडिया और अपने निजी नेटवर्क का इस्तेमाल शुरू कर दें. मैग्नम पीआर कंपनी के टोनी मैग्नम कहते हैं यह जरूरी है कि आपके दोस्त रिश्तेदार सहकर्मी वकील अकाउंटेंट सहायक आपका ऐप डाउनलोड करें प्रयोग करें और ऐप के बारे में अपनी राय से आपको अवगत कराएं. एरिका कहती हैं कि संभावित खरीददारों के बारे सटीक जानकारी जुटाना ऐप के बिक्री के बहुत जरूरी है. एरिका ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया हमें कई बार ऐसे ऐप पेश किए जाते हैं जिनसे हमारा कोई वास्ता ही नहीं होता. लोग भूल जाते हैं कि अगर आप हर किसी को ऐप बेचते फिरेंगे तो इससे आपके ऐप में किसी के रुचि लेने की संभावना कम हो जाती है. नए डेवलपरों के लिए एरिका का सुझाव है कि ऐसे पत्रकारों और ब्लॉगरों के बारे में पता कीजिए जिन्होंने पहले कभी आपके ऐप से मिलते-जुलते ऐप की समीक्षा की हो. उनकी समीक्षाओं को पढ़िए और उसके हिसाब से उनके विचार के लिए अपन ऐप प्रस्तुत कीजिए. एरिका सैडन ने उन बातों की सूची तैयार की है जो हर ऐप डेवलपर को अपने ऐप के बारे में ईमेल भेजने से पहले जरूर ध्यान रखनी चाहिए. एरिका सैडन कहती हैं आपके ईमेल के शीर्षक में इस बात को स्पष्ट कर दें कि आपका ऐप किस बारे में है और इस पर विचार करना क्यों जरूरी है. अगर आपका शीर्षक ध्यान खींचने लायक नहीं है तो संभव है कि कोई आपके ईमेल को पढ़े ही नहीं. अपने ईमेल के साथ ऐप को डाउनलोड करने के लिए प्रोमो कोड जरूर भेजें. उन्होंने बताया बेहतर होगा कि आप अपने ईमेल के साथ एक ऐसा वीडियो भेजें जो मात्र 30 सेकेंड में आपके ऐप के बारे में बता सके. इस तरह थोड़ी सी किस्मत और ढेर सारी मेहनत से आप कर सकते हैं अपने ऐप को हिट. |
| DATE: 2013-06-03 |
| LABEL: science |
| [405] TITLE: धरती के पास से गुज़रा विशालकाय एस्टरॉयड |
| CONTENT: धरती पर जीवन तबाह करने में सक्षम लगभग 2-7 किलोमीटर चौड़ा एक एस्टरॉयड शुक्रवार की रात धरती के पास से गुज़रा. 1998 क्यूई2 नाम का ये ऐस्टरॉयड इतना बड़ा था कि इसका खुद का चंद्रमा था. ये एस्टरॉयड या क्षुद्रग्रह धरती के सबसे नज़दीक शुक्रवार रात भारतीय समयनुसार 230 बजे आया. लेकिन वैज्ञानिकों का कहना था कि इसके धरती से टकराने की कोई संभावना नहीं थी. अपने सबसे नज़दीकी बिंदु पर भी ये धरती से लगभग 58 लाख किलोमीटर की सुरक्षित दूरी पर था जो कि धरती और चंद्रमा के बीच की दूरी से लगभग 15 गुना ज़्यादा है. 1998 क्यूई2 की धरती से ये दूरी इस साल फ़रवरी में धरती के पास से गुज़रे एक अन्य एस्टरॉयड की दूरी से दो सौ गुना ज़्यादा थी. लेकिन शुक्रवार वाला एस्टरॉयड उस एस्टरॉयड से 50000 गुना ज़्यादा बड़ा है. बेलफास्ट के क्वींस विश्वविद्यालय के खगोलशास्त्री प्रोफ़ेसर ऐलन फिटज़सिमंस का कहना था ये एक बड़ी ग्रहिका है. और इस तरह के बहुत ही कम पिंडों के बारे में जानकारी है. धरती के करीब अंतरिक्ष में शायद इतने बड़े या इससे बड़े लगभग 600 खगोलीय पिंड ही हैं. उन्होंने ये भी कहा ख़ास बात ये है कि अगर इस आकार का कोई पिंड भविष्य में धरती से टकराता है तो बहुत मुमकिन है कि इससे वैश्विक पर्यावरण संबंधी तबाही होगी. इसलिए इन्हें समझने की कोशिश ज़रूरी है. शुक्रवार रात की घटना से खगोलशास्त्रियों को इस चट्टान के बारे में ज़्यादा विस्तार से जांच करने का मौका मिला. उन्होंने इसकी हाई रेज़ोल्यूशन छवियाँ रडार टेलिस्कोप से उतारीं. अब वैज्ञानिक जानना चाहते हैं कि ये एस्टरॉयड किन तत्वों से बना है और ये सौर मंडल में कहां से आया है. 1998 क्यूई2 के शुरुआती विश्लेषण से पता लग चुका है कि इस एस्टरॉयड का अपना खुद का चंद्रमा है क्योंकि लगभग 600 मीटर चौड़ी एक छोटी सी चट्टान इसकी परिक्रमा करती है. हालांकि इस खगोलीय घटना को सीधे तौर पर आंखों से नहीं देखा जा सकता था लेकिन माना जा रहा था कि अंतरिक्षप्रेमी शायद इसे एक टेलिस्कोप की मदद से देख पाएंगे. इसके बाद 1998 क्यूई2 वापस सुदूर अंतरिक्ष में लीन हो जाएगा. अब ये कम से कम दो सदी बाद ही धरती के इतने नज़दीक से गुज़रेगा. अंतरिक्ष में संभावित खतरों के बारे में शोधकर्ताओं की दिलचस्पी बढ़ रही है. अब तक धरती के क़रीबी अंतरिक्ष में नौ हज़ार से ज़्यादा एस्टरॉयडों गिने जा चुके हैं और हर वर्ष औसतन 800 नई अंतरिक्ष चट्टानों की खोज होती है. |
| DATE: 2013-06-01 |
| LABEL: science |
| [406] TITLE: आपके मिज़ाज के लिए कॉफ़ी कितनी ज़रूरी है? |
| CONTENT: अमरीकी अधिकारी स्नैक्स और एनर्जी ड्रिंक में कैफ़ीन की सुरक्षित मात्रा की जांच कर रहे है. वे इस शक्तिवर्धक पदार्थ के प्रभाव को लेकर चिंतित हैं. आजकल कैफ़ीन का प्रयोग बहुत से खाद्य पदार्थों में होने लगा है. क्या चाय और कॉफ़ी पीने वाले हमारे समाज की निर्भरता दुनिया भर में लोकप्रिय इस दवा पर बढ़ती जा रही है. बुदबुदाती केतली मग से उठती ख़ुशबू और सुबह का पहला कड़वा निवाला यह एक ऐसी रस्म बन गई है जिसके बिना दुनिया के लाखों लोगों के लिए दिन की शुरुआत सोचना मुश्किल लगता है. न्यू साइंटिस्ट नाम की पत्रिका के मुताबिक़ कैफ़ीन दिमाग़ पर प्रभाव डालने वाली दुनिया की सबसे लोकप्रिय दवा है. एक अनुमान के मुताबिक़ अमरीका में 90 फ़ीसदी से अधिक व्यस्क रोज़ाना इसका इस्तेमाल करते हैं. लेकिन कोका कोला स्टारबक्स और 5 ऑवर एनर्जी शॉट्स के देश अमरीका में वॉफ़ेल सूरजमुखी के बीजों और जेली बिंस जैसे खाद्य पदार्थों में कैफ़ीन मिलाए जाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं. अमरीका के खाद्य और दवा प्रशासन एफ़डीए की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि ब्रिगले चूइंग गम के एक चूइंग गम में आधे कप कॉफ़ी के बराबर कैफ़ीन होती है. एफ़डीए के इस बयान के बाद ब्रिगले ने कहा है कि वह इसका उत्पादन रोक देगा. एफ़डीए अत्यधित कैफ़ीन वाले एनर्जी ड्रिंक पर भी ध्यान दे रहा है. उसने कहा है कि उत्पादों में उत्तेजक पदार्थों मिलाने से पड़ने वाला प्रभाव चिंता का विषय है. अमरीका के खाद्य पदार्थों के दुष्प्रभाव और मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रशासन के मुताबिक़ एनर्जी ड्रिंक पीने के बाद इमरजेंसी उपचार चाहने वालों की संख्या 2011 मे दो गुना बढ़कर 20 हज़ार से अधिक हो गई. हालांकि एनर्जी ड्रिंक निर्माताओं का कहना है कि उनके उत्पाद सुरक्षित हैं और उनके इस्तेमाल से किसी नुक़सानदायक प्रभाव का कोई प्रमाण नहीं मिला है. कैफ़ीन के ज़हरीलेपन के कुछ लिखित प्रमाण भी है. लेकिन यह बहुत कम है. कैफीन की लत का अध्ययन कर रहे जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार कैफीन छोड़ने की प्रतिक्रिया में थकान सिरदर्द एकाग्रता में परेशानी मासंपेशियों में दर्द और उबकाई जैसे लक्षणों दिखाई देते हैं. कैफीन का प्रयोग हानिकारक है इस पर वैज्ञानिक आम सहमति अभी बहुत दूर है. हॉवर्ड स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ की ओर से अभी हाल में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़ कॉफ़ी पीने का स्वास्थ्य पर कोई ख़तरनाक़ प्रभाव नहीं पड़ता है. अध्ययन के मुताबिक़ एक दिन में छह कप से अधिक कॉफ़ी पीने से भी कोई नुक़सान नहीं होता है. कैफ़ीन का कुछ सकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है. अध्ययन बताते है कि कैफ़ीन के प्रयोग से प्रॉस्टेट और स्तन कैंसर का ख़तरा कम होता है. अभी हाल में हुए एक अध्ययन के मुताबिक़ कॉफ़ी और चाय पीने से टाइप टू डायबीटीज़ का ख़तरा कम होता है. इन सबके परिणामस्वरूप एफ़डीए ने वादा किया है कि अब वह यह तय करेगा कि कैफ़ीन का कितना प्रयोग सुरक्षित है. एफ़डीए के इस क़दम का उन लोगों ने स्वागत किया है जिन्हें डर है कि कैफ़ीन ने उनके रोज़मर्रा के जीवन पहले से ही अतिक्रमण कर रखा है. जॉर्ज वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ एंड हेल्थ सर्विस के डीन लायने गोल्डमैन कहते हैं बहुत से लोगों को यह पता नहीं होता है कि वे कितना कैफ़ीन ले रहे हैं. वे कहती हैं इसके परिणामस्वरूप यह अनजाने में ही ख़ुद के लिए अनिद्रा अपच और अपनी ब्लड प्रेशर के लिए समस्या पैदा कर सकते हैं. यह अभिभावकों के लिए चिंता का विषय है जिनके लिए अपने बच्चों के खाने पर नियंत्रण कर पाना कठिन है. लेकिन पृथ्वी पर कैफ़ीन को चुनौती देना एक मुश्किल काम हो सकता है इसकी सालना खपत एक लाख 20 हज़ार टन है. कैफ़ीन का उपयोग सबसे अधिक फ़िनलैंड में होता है. वहां एक व्यस्क इंसान औसतन चार सौ मिलीग्राम कैफ़ीन का उपयोग प्रतिदिन करता है. यह चार-पांच कप क़ाफी के बराबर और यूके फूड स्टैंडर्ड एजेंसी की ओर से निर्धारित अधिकतम मात्रा के बराबर होता है. इतिहास में बहुत से ऐसे लोग हुए है जिनका कॉफ़ी से बहुत गहरा लगाव रहा है. एक जीवनीलेखक के मुताबिक़ फ्रांसीसी उपान्यासकार और नाटककार बल्ज़ाक एक दिन में 50 कप तक कॉफ़ी पी जाते थे. वहीं फ़िल्मकार डेविड लिंच खाते समय सात कप कॉफ़ी पी जाते थे. वे अधिक चीनी वाली कॉफ़ी पीते थे. उनका कहना था कि इससे अधिक विचार आते थे. हाल के दिनों में जिनके कॉफ़ी पीने की चर्चा हुई है वे हैं गायक राब्बी विलियम्स वे एक दिन में 36 एस्प्रेसो कॉफी और रेड बुल की 20 केन पी जाते हैं. |
| DATE: 2013-06-01 |
| LABEL: science |
| [407] TITLE: इंसान की तरह ही फ़ैसला करते और खीझते हैं बंदर |
| CONTENT: अपने किसी फ़ैसले का उचित प्रतिफल न मिलने पर जैसे कई इंसान बेहद उत्तेजित होकर प्रतिक्रिया करते हैं ठीक उसी तरह चिंपाज़ी और बोनोबो बौना चिंपाज़ी भी करते हैं. यह कहना है अमरीका के ड्यूक विश्वविद्यालय में शोधकर्ताओं के एक दल का जिसने एक ऐसा खेल तैयार किया जिसमें फ़ैसले लेने होते थे और जीतने पर खाने की चीज़ें मिलती थीं. इसमें खेल में हारने वाले बंदरों को स्वादिष्ट केले के बजाय हल्का खीरा दिया गया तो उन्होंने ऐसी प्रतिक्रिया की जिसे बंदरों की झल्लाहट कहा जा सकता है. शोध के निष्कर्ष प्लोस वन में छपे हैं. शोधकर्ताओं ने कॉन्गो के दो वानर अभ्यारण्यों में 23 चिंपांज़ियों और 15 बोनोबो का अध्ययन किया. येल विश्वविद्यालय में कार्यरत शोध प्रमुख अलेक्जेंड्रा रोसाटी कहती हैं सभी जानवर शिकारियों से बचाए गए अनाथ थे. वह एक किस्म की अर्ध कैद जैसी स्थिति में थे लेकिन उनके साथ खेला जाना संभव था. डॉक्टर रोसाटी बंदरों की दिक्कतें दूर करने का अध्ययन कर रही हैं ताकि इंसानों में उनकी उत्पत्ति को समझा जा सके. उन्होंने दो खेल तैयार किए. पहले में तो जानवर तुरंत एक छोटा खाद्य पदार्थ पाने या इंतज़ार के बाद बड़ा खाद्य पदार्थ पाने के बीच में से एक चुन सकते थे. दूसरे खेल में एक सुरक्षित और जोखिम भरे विकल्पों के बीच चुनाव करना था. सुरक्षित चुनाव में एक कटोरी के नीचे छुपे मूंगफली के छह दाने थे. दूसरी कटोरी के नीचे या तो खीरे का एक टुकड़ा था या फिर पसंदीदा केले का टुकड़ा. कई चिंपाज़ी और बोनोबो तब बेहद उत्तेजित हो गए जब उन्हें इंतज़ार करना पड़ा या उन्होंने कोई दांव खेला और उसका फ़ायदा नहीं मिला. शोधकर्ताओं ने बंदरों की कई झल्लाहट भरी हरकतें रिकॉर्ड कीं जैसे कि खीझ भरी आवाज़ें और चीखें. इसके अलावा बाड़े की सलाखों को पीटना और रगड़ना. डॉक्टर रोसाटी कहती हैं कई हरकतें तो एकदम किसी बच्चे जैसी लगती हैं जो नहीं मुझे यह चाहिए ही चिल्ला रहा हो. डॉक्टर रोसाटी कहती हैं कि फ़ैसला करने के भावनात्मक परिणाम- निराशा और दुख दोनों ही बंदर प्रजाति में भी मूलभूत रूप से मौजूद हैं और यह सिर्फ़ इंसानों का आद्वितीय गुण नहीं है. शोधकर्ताओं ने दोनों प्रजातियों में खेल के प्रति अंतर भी देखा. चिंपाज़ी जोखिम उठाने को अधिक तैयार थे और बोनोबो के मुकाबले उनमें ज़्यादा सब्र भी था. इससे यह माना जा सकता है कि भावनाओं पर नियंत्रण की बंदरों की क्षमता ने उनके रहने के तरीके को प्रभावित किया हो. डॉक्टर रोसाटी कहती हैं इस अंतर से यह पता लग सकता है कि बंदर जंगल में अपना खाना कैसे ढूंढते हैं. उनके अनुसार शोध से पता चलता है कि फ़ैसला करने की बंदरों की क्षमता हमारी तरह ही मनःस्थिति और प्रेरणा पर निर्भर करती है. |
| DATE: 2013-05-31 |
| LABEL: science |
| [408] TITLE: इंटरनेट आपको आपका पैसा कब देगा? |
| CONTENT: इस सदी के अंत में एक ऐसी दुनिया की कल्पना करिए जब मशीनें आज के मुकाबले कहीं बेहतर होंगी. कारें और ट्रक अपने आप चलेंगे और उनसे शायद ही कभी कोई दुर्घटना हो. धरती से खनिज निकालने के काम में रोबोट लगे होंगे और मज़दूर कभी खान में नहीं फंसेंगे. मानव शरीर के ऑपरेशन करने वाले रोबोट से कभी गलती नहीं करेंगे. कपड़े हमेशा नए डिजाइन के होंगे वे हमेशा फिट आएंगे क्योंकि घर पर लगी मशीन आपके एक दिन पुराने कपड़े को रिसाइकल करके उन्हें नया बना देगी. कपड़ों को धोने का झंझट न होगा. मैं ये तो नहीं बता सकता हूं कि इनमें से कौन सी तकनीक इस सदी में काम करना शुरू कर देगी और कौन सी तकनीक अपनी खामियों की वजह से बेकार हो जाएगी. लेकिन इनमें से कुछ तकनीकें तो काम ज़रूर करने लगेंगी. इससे कौन अमीर होगा अगर रोबोटिक सर्जन ने बढ़िया काम किया तो क्या आने वाले कल के सर्जन उसी नाव में सवार होंगे जिस पर आज के संगीतकार सवार हैं मसलन कुछ संगीगकार तो यूट्यूब या किकस्टार्टर पर रातोंरात हिट हो जाते हैं जबकि अधिकांश के लिए अपना गुजारा चलाना भी मुश्किल होता है. यह सवाल पूछा जाना चाहिए. हालांकि यह जानना थोड़ा टेढ़ा काम है कि तकनीक ने हाल के समय में कैसे फ़ायदा पहुंचाया है. यह कैसे हो सकता है कि डिजिटल नेटवर्किंग की अविश्वसनीय खूबियां इतने विशाल जनसमुदाय के पास पहुंच गईं और हमें इनका व्यापक फायदा न दिखे. यह कैसे हो सकता है कि नेटवर्किंग का यह समय अंतहीन कटौतियों बेरोजगारी और सामाजिक गतिशीलता की कमी का समय दिख रहा है और बाजार में इतना पैसा डालने के बावजूद भी क्यों कोई हलचल नहीं है. हमारे इस दौर का सबसे बड़ा नुस्खा है खुली सूचना. ये नुस्खा अलग-अलग रूपों में देखने को मिलता है. मसलन ओपन साफ्टवेयर मुफ्त ऑनलाइन शिक्षा यूरोपीयन पाइरेट्स पार्टियां विकीलीक्स सोशल मीडिया और भी न जाने कितने रूपों में. सूचनाओं को मुफ़्त बनाने का सिद्धांत पहली नज़र में यह संकेत देता है कि इसका मतलब सूचना को कुछ खास लोगों से चंगुल से निकाल कर उसका फ़ायदा सब तक पहुंचाना है. दुर्भाग्य से ये नुस्खा अब जहर बन गया है हालांकि इस पर अभी कोई ध्यान नहीं दे रहा है. इंसानों को तो एक जैसा बनाया गया है. लेकिन कंप्यूटरों को नहीं. जब लोग मुक्त रूप से सूचनाओं को साझा करते हैं तो जिन लोगों के पास सबसे अच्छे कंप्यूटर होते हैं वो उस सूचना का सबसे अधिक फायदा उठा सकते हैं जबकि अन्य लोग उसका सीमित ही उपयोग कर पाते हैं. जिन लोगों के पास बेहतरीन कंप्यूटर हैं उनके पास ज्यादा दौलत और ज्यादा शक्तियां हैं. इन बेहतरीन कंप्यूटरों का इस्तेमाल बड़ी कारोबारी कंपनियों सोशल मीडिया साइटों राष्ट्रीय खुफ़िया एजेंसियों विशाल ऑनलाइन स्टोरों बड़ी राजनीतिक मुहिमों बीमा कंपनियों या फिर सर्च इंजनों किसी के लिए भी हो सकता है. विशाल डाटा संरक्षित करने वाले सभी कंप्यूटर आम तौर पर एक जैसे ही दिखते हैं. उन्हें किसी अज्ञात स्थान पर रखा गया है और किसी खजाने की तरह उनकी रखवाली की जाती है. ये बेहतरीन कंप्यूटर जिन प्रोग्रामों से संचालित होते हैं वो भी तकरीबन एक जैसे ही होते हैं. इनका सबसे पहला काम होता है दुनिया भर के लोगों से जुड़ी वो सूचनाएं जुटाना जो मुफ़्त रूप से उपलब्ध है. इसमें स्कैन की गईं ईमेल सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारियां क्लाउड कनेक्टेड कैमरों से ली गई तस्वीरें विज्ञापन या मेडिकल फ़ाइलें सभी कुछ शामिल हैं. यहाँ ताक-झांक की पूरी आजादी होती है. लोगों से जुड़ी विशेष सूचनाएं हासिल करने के लिए उन्हें कई बार ललचाया भी जाता है. इस तरह के प्रलोभनों में मुफ्त इंटरनेट या संगीत सर्विस शामिल हो सकती है. जो लोग इन प्रलोभनों में आ जाते हैं उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. कईयों के लिए नौकरियों के अवसर सिमट जाते हैं तो लोगों को बड़ी आर्थिक चपत लगती है. आम लोग या कहिए साधारण कंप्यूटरों वाले लोग ही वो सूचना मुहैया कराते हैं जिनसे बड़े कंप्यूटर इतने ताकतवर और मूल्यवान बनते हैं. इसके बदले में इन आम लोगों को भी कुछ थोड़े-बहुत फायदे होते हैं. ज्यादा से ज्यादा लोग इस अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं जिनमें सबका फ़ायदा दिखाई देता है. सोशल मीडिया पर चहल पहल सबको पसंद है लेकिन यही उस जानकारी को हासिल करने का जरिया है जो ताकत का स्रोत है. अधिकांश मामलों में यहां कोई गड़बड़ नहीं होती है. बड़े कंप्यूटरों के बहुत से मालिक अच्छे लोग हैं. मैं भी एक सिस्टम को तैयार करने और उसके फ़ायदे सब तक पहुंचाने की परियोजना का हिस्सा रहा हूं. बावजूद इसके इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता है. मुख्य समस्या ये है कि बड़े कंप्यूटरों के मालिक खुद को एक बड़ा कृत्रिम दिमाग समझने लगते हैं. लेकिन वास्तव में वे उन सूचनाओं की रीपैकेजिंग ही कर रहे होते हैं जो अन्य लोगों से उन्हें मिली है. बड़े डाटा का यही मतलब है. उदाहरण के लिए अगर देखें तो गूगल या माइक्रोसाफ़्ट का कंप्यूटर किसी लेख का अंग्रेजी से किसी अन्य भाषा में कमोबेश अनुवाद कर सकता है. लेकिन इसमें होता ये है कि इंसानों के जरिए किए गए अनुवाद को अलग अलग स्तरों पर जमा किया जाता है और उसकी मदद से नया टेक्सट तैयार किया जाता है. ऐसे में पुराने अनुवादों के अंशों को मिला कर नया अनुवाद तैयार किया जाता है. ऐसे में पुराने अनुवाद के रूप में जितने ज्यादा स्रोत होंगे अनुवाद उतना ही ज्यादा सटीक होगा. वैसे पहले डिजिटल नेटवर्क संचार की शुरुआत 1960 के आसपास हुई. मैं यहां टेड नेलसन के के शुरुआती कामों का जिक्र कर रहा हूं. नेटवर्क डिजिटल मीडिया का विचार पहली बार तब आया जब एक वैश्विक माइक्रोपेमेंट सिस्टम के बारे में सोचा गया ताकि अगर किसी व्यक्ति ने नेटवर्क में कोई डाटा जोड़ा है और कहीं कोई और उसका इस्तेमाल कर रहा है तो डाटा जोड़ने वाले को इसका भुगतान किया जा सके. ठीक वैसे ही ही जैसे किसी लेखक की किताब बिकने पर उसे रॉयल्टी मिलती है. लेकिन आजकल जिस तरह की दकियानूसी व्यवस्था है ये उसके पूरी तरह खिलाफ़ था. चीजें अगर क़ीमती है तो इसका मतलब यह नहीं हुआ कि उन्हें खरीदा नहीं जा सकता है. चीजों को मुफ्त बनाने की मांग करने का मतलब है कि आप ग़रीबी को गले लगा रहे हैं. समस्या कीमत नहीं बल्कि गरीबी है. सूचानाओं को पैसे में बदलने यानी उसके व्यवसायिकरण से बड़े फायदे होंगे. लेकिन समस्या ये है कि कई बार आपकी सूचना पर आपका नियंत्रण ही नहीं है. सरकारी कैमरे आपको शहर में घूमते हुए कैद कर लेंगे भले ही इस बात पर कितनी ही बहस होती रहे कि सरकार को ऐसा करने का अधिकार है या नहीं. सरकार को छोड़िए बड़े कंप्यूटरों के मालिक भी यही करते हैं. निजी कैमरे भी आपको सरकार के कैमरे की तरह ही खोजते रहते हैं. निजता बनाए रखने के नियमों के जरिए प्रयास तो बहुत होते हैं लेकिन उनका कोई खास नतीजा नहीं निकलता है. पता नहीं ये नियम कभी पूरी तरह कारगर होंगे भी या नहीं. लेकिन अगर आपको उन सूचनाओं के लिए पैसा मिले जो आपकी वजह से हैं तो कैसा रहेगा एकाउंटेंट और वकील इसी काम के लिए हैं. सरकार को मुफ्त में आपकी जासूसी करने का अधिकार भला क्यों होना चाहिएवैसे अगर बड़े कंप्यूटर को सूचनाओं के लिए भुगतान करना पड़े तो उनका अस्तित्व खत्म नहीं हो जाएगा. हां फिर बड़े कप्यूटरों को अपनी कमाई के नए रास्ते तलाशने होंगे. जासूसी और हेराफेरी से अधिक समय तक कारोबार नहीं हो पाएगा क्योंकि कच्चा माल ज्यादा समय तक मुफ्त में नहीं मिलता है. दरअसल सूचना को पूरी तरह व्यावसायिक कर दिया जाएगा तो इससे बड़े कंप्यूटर वालों का कारोबार अच्छा चलेगा क्योंकि इससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्था में गति आएगी. दूसरी तरफ अगर सूचनाएं मुफ्त होंगी तो अर्थव्यवस्था सिकुड़ने लगेगी. लेकिन सबसे जरूरी बात ये है सूचना के व्यावसायिकरण के बाद सूचना के आदान प्रदान से एक मजबूत मध्यवर्ग उभरेगा. और ये मजबूत मध्य वर्ग खर्च करने के मामले में उच्च वर्ग को पछाड़ देगा. मुक्त सूचना का विचार यूं तो सबको सशक्त बनाने वाला लगता है लेकिन वास्तव में इससे पैसा वही लोग बना रहे हैं जिनके पास सबसे बड़े कंप्यूटर हैं और ये कहीं न कहीं लोकतंत्र को भी कमजोर कर रहे हैं. |
| DATE: 2013-05-30 |
| LABEL: science |
| [409] TITLE: क्या मौत के बाद भी बढ़ते हैं नाखून और बाल? |
| CONTENT: मरने के बाद शरीर का क्या होता है दिल का धड़कना रुक जाता है. खून ठंडा पड़ने लगता है और अन्य अंग अकड़ने लगते हैं. लेकिन नाखून और बाल बढ़ते रहते हैं- कम से कम हमें तो ऐसा ही बताया गया है. एरिक मारिया रेमरक्यू के उपन्यास ऑल क्वाइट ऑफ़ द वेस्टर्न फ्रंट का युवा कथावाचक कल्पना करता है कि गैंगरीन से मारे गए उसके एक दोस्त के नाखून एक बड़े पेच की तरह बढ़ रहे हैं और धंस रही उसकी खोपड़ी में भी बाल लंबे हो रहे हैं. यह कोई सुखद विचार नहीं है पर चला आ रहा है. लेकिन क्या यह सच है कोई आश्चर्य की बात नहीं कि मृतकों के नाखून और बालों के बढ़ने को नापने वाले सुनियोजित अध्ययन बहुत कम हुए हैं. जानकारी के लिए हमें ऐतिहासिक कथाओं और शवों पर काम करने वाले मेडिकल छात्रों के वर्णनों पर ध्यान देना होगा. ट्रांस्प्लांट करने वाले सर्जनों को भी मृत्यु के बाद कई प्रकार की कोशिकाओं के काम करने का अनुभव होता है. विभिन्न कोशिकाएं अलग-अलग गति से मरती हैं. दिल के धड़कना बंद करने के बाद दिमाग को ऑक्सीजन की आपूर्ति बंद हो जाती है. चूंकि दिमाग में ग्लूकोज़ का संग्रहण नहीं होता है इसलिए स्नायु कोशिकाएं तीन से सात मिनट के अंदर मर जाती हैं. ट्रांस्प्लांट सर्जनों को दानदाता की मौत के तीस मिनट के अंदर ही शरीर से गुर्दे कलेजा और दिल निकाल लेना होता है. इन्हें प्राप्तकर्ता के शरीर में छह घंटे के अंदर लगा देना पड़ता है. चमड़ी की कोशिकाएं अधिक देर तक जिंदा रहती हैं. नाखूनों के बढ़ने के लिए नई कोशिकाओं का पैदा होना ज़रूरी है और ग्लूकोज़ के बिना यह संभव नहीं. नाखून करीब 0-1 मिमी प्रतिदिन की रफ़्तार से बढ़ते हैं और यह गति उम्र बढ़ने के साथ कम होती जाती है. नाखून की सरंचना के ठीक नीचे कोशिकाओं की एक परत होती है जिसे जीवाणु-जाल कहते हैं. यह परत बड़ी मात्रा में कोशिकाओं का उत्पादन करती है जिससे नाखून के नए भाग बनते हैं. नई कोशिकाएं पुरानी को आगे ठेलती हैं जिससे नाखून कोने से बढ़ता हुआ लगता है. मृत्यु ग्लूकोज़ की आपूर्ति पर रोक लगा देती है इस तरह नाखूनों के बढ़ने पर भी. बालों के साथ भी यही होता है. हर बाल फॉलिकल में होता है जिसमें यह बढ़ता है. फॉलिकल के मूल में बालों का एक सांचा कोशिकाओं का समूह होता है जो विभाजित होकर नई कोशिकाओं का उत्पादन करते हैं जिससे बाल लंबे होते हैं. यह कोशिकाएं बहुत तेजी से विभाजित होती हैं लेकिन तभी जब इन्हें ऊर्जा मिलती रहती है. जब हृदय खून में ऑक्सीजन की आपूर्ति बंद कर देता है तो ऊर्जा ख़त्म होने लगती है और कोशिकाओं का विभाजन भी रुक जाता है जिसकी वजह से बाल बढ़ने भी रुक जाते हैं. तो मिथकों में ऐसी बात क्यों कही जाती है हालांकि ऐसे अनुमान ग़लत हैं लेकिन इनके पीछे एक जैविक आधार है. ऐसा नहीं है कि नाखून बढ़ रहे होते हैं लेकिन उनके चारों तरफ़ त्वचा सूख रही होती है जिससे नाखून लंबे लगते हैं. मृतक की ठोड़ी की चमड़ी भी सूखने लगती है जिससे यह खोपड़ी की ओर खिंचने लगती है. इससे ठुड्डी ज़्यादा प्रभावी दिखने लगती है. तो अगर आपके दिमाग में भी किसी कब्रिस्तान में कब्रों से लंबे और मुड़े हुए नाखूनों वाली लाशों के चित्र बनते हैं तो समझ लें कि यह किस किसी डरावनी कहानी या फिल्म में ही हो सकता है हकीकत में नहीं. |
| DATE: 2013-05-29 |
| LABEL: science |
| [410] TITLE: फ़ेसबुक पर उठाया औरतों ने इज़्ज़त का सवाल |
| CONTENT: हज़ारों लोगों ने फ़ेसबुक प्रबंधन से महिलाओं को कथित तौर पर अपमानित करने वाली फ़ेसबुक टिप्पणियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है. कुछ लोगों ने एफ़बीरेप नाम के अभियान की शुरूआत की है जिसका मुख्य उद्देश्य फ़ेसबुक पर बलात्कार और महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को बढ़ावा देने वाले विषयों को उजागर कर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग करना है. फ़ेसबुक ने इस तरह की कई टिप्पणियों को पन्ने से हटा दिया है. लेकिन इस अभियान को लोगों का लगातार समर्थन मिल रहा है. अब तक 50 हज़ार से ज्यादा लोगों ने इस अभियान के समर्थन पर ट्वीट किया है और लगभग पांच हज़ार लोगों ने कथित महिला विरोधी सामग्री के साथ आने वाले विज्ञापन की कंपनियों को पत्र लिखकर अपना विरोध जताया है. इस अभियान के समर्थन में एक ऑनलाइन पीटिशन भी जारी की गई है जिसके समर्थन में अब तक दो लाख 20 हज़ार लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं. अमरीका स्थित महिला संगठन विमेन एक्शन और मीडिया वैम और ब्रिटेन स्थित संगठन एवरेडी सेक्सिज़म समेत 40 महिला संगठनों ने इस अभियान की शुरूआत की है. फ़ेसबुक प्रबंधन को सार्वजनिक तौर पर लिखे पत्र में इस अभियान ने मांग की है कि महिला विरोधी टिप्पणी करने वालों के ख़िलाफ़ त्वरित व्यापक और प्रभावी क़दम उठाए जाएं. फ़ेसबुक को लिखे पत्र में उन्होंने कुछ उदाहरण भी दिए हैं जो उनके अनुसार महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को बढ़ावा देते है जो अस्वीकार्य है. उस पत्र में फ़ेसबुक इस्तेमाल करने वाले एक ग्रुप इसी कारण भारतीय महिलाओं का बलात्कार होता है का उदाहरण भी दिया गया है. एक और जगह पर एक महिला को सीढ़ियों के नीचे पड़े हुए दिखाया गया है और उसके साथ ही लिखा हुआ है अगली बार गर्भवती मत होना. विज्ञापन देने वाली कई कंपिनयां भी इस अभियान के बाद हरकत में आ गई हैं. यूनीलिवर कंपनी के एक उत्पाद डव ने बयान जारी कर कहा है डव इस विषय को काफ़ी गंभीरता से लेता है और ऐसी किसी गतिविधि की अनेदेखी नहीं कर सकता जो जानबूझकर किसी को भी अपमानित करता है. डव कंपनी और फ़ेसबुक के प्रवक्ता ने बयान जारी कर कहा है कि पत्र में जो उदाहरण दिए गए थे उन्हें फ़ेसबुक से हटा दिया गया है. फ़ेसबुक के प्रवक्ता ने कहा फ़ेसबुक पर किसी भी तरह के भड़काऊ भाषण या किसी को धमकी देने वाली या हिंसा को बढ़ावा देने वाली टिप्पणी के लिए कोई जगह नहीं है. हम ऐसी किसी भी सामग्री को बर्दाश्त नहीं करेंगे जो कि किसी के लिए हानिकारक हो. फ़ेसबुक ने अपने बयान में ये भी कहा कि हर ऐसी टिप्पणी या सामग्री जो किसी के अनुसार अश्लील और भद्दा है ज़रूरी नहीं कि वो फ़ेसबुक की नीतियों के ख़िलाफ़ हो. एवरेडी सेक्सिज़म प्रोजेक्ट की संस्थापक लॉरा बेट्स ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा कि उनके अभियान की शुरूआत तब हुई जब फ़ेसबुक पर कथित महिला विरोधी टिप्पणियों से आहत होकर बहुत सारी महिलाओं ने उनसे संपर्क किया. लॉरा बेट्स का कहना था ज़ाहिर है ऐसे किसी भी प्लेटफ़ॉर्म को नियंत्रित करना बहुत मुश्किल है जिसे एक अरब से ज़्यादा लोग इस्तेमाल करते हों लेकिन महिलाओं पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है. बहुत सारी महिलाओं का कहना है कि महिला विरोधी सामग्री के कारण वो फ़ेसबुक का इस्तेमाल नहीं करती हैं. लॉरा बेट्स ने कहा कि इस विषय पर अभियान चलाने वाले संगठन और फ़ेसबुक प्रबंधन एक दूसरे से संपर्क में है और दोनों ही पक्षों को आशा है कि जल्द ही इसका समाधान ढ़ूंढ लिया जाएगा. |
| DATE: 2013-05-29 |
| LABEL: science |
| [411] TITLE: क्या बृहस्पति के चंद्रमाओं पर है एलियन? |
| CONTENT: मंगल पर भेजे गए उपग्रह अपॉर्च्युनिटी ने पिछले सप्ताह ऐसी कई दशाओं की खोज की जिससे इस बात को बल मिलता है कि मंगल पर कभी जीवन रहा होगा. सौर मंडल में कहीं और जीवन की खोज की अधिकतम संभावनाओं के लिए हमें धूल भरे मैदानों विशाल पर्वतों और मंगल की गहरी घाटियों से परे जाना होगा. इसके लिए हमें एस्टेरॉयड बेल्ट से भी आगे जाकर छानबीन करनी होगी. वहाँ बृहस्पति ग्रह पर असली ज़िंदा जीव हो सकते हैं. दूसरी ओर लाल ग्रह कहे जाने वाले मंगल पर वैज्ञानिकों को वर्षों पहले मर चुके कुछ जीवाणुओं के मिलने की उम्मीद ही है. बृहस्पति के लगभग 70 चंद्रमाओं का ब्यौरा मिल चुका है और उनमें चार सबसे प्रमुख चंद्रमा हैं लो कैलिस्टो गेनीमेड और यूरोपा. लो ज्वालामुखियों उबलते लावा और जहरीले सल्फर के गुबार से भरा हुआ है कैलिस्टो बर्फ़ीले चट्टानों में ढका है लेकिन गेनीमेड और यूरोपा पर बर्फ की विशाल परत जमा है जिसके नीचे पानी का समंदर है. और जहाँ पानी है वहाँ जीवन की संभावना तो होगी ही. इस कारण यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थित बृहस्पति चंद्रमाओं के मिशन जूस की शुरुआत की है. जूस ज्यूपिटर आइसी मून्स एक्सप्लोरर का संक्षित्त नाम है. इस अभियान के तहत 2022 में उपग्रह को प्रक्षेपित करने की योजना है जो 2030 बृहस्पति तक पहुँचेगा. उपग्रह करीब 3 वर्षों तक बृहस्पति के वातावरण और उसके बर्फीले चन्द्रमाओं का अध्ययन करेगा और अंत में गेनीमेड की कक्षा में दम तोड़ देगा. गेनीमेड सौर मंडल में सबसे कम उम्र का चंद्रमा है. इस परियोजना के एक प्रमुख वैज्ञानिक यूनिवर्सीटी कॉलेज लंदन के एंड्रयू कोट्स ने कहा कि इस शानदार मिशन में सभी तीन बर्फ वाले चंद्रमाओं की तुलना की जाएगी और वहाँ जीवन की संभावनाओं को तलाशा जाएगा. कोट्स ने कहा आप को जीवन के लिए ऊर्जा के स्रोत तरल जल कार्बन नाईट्रोजन ऑक्सीजन फास्फोरस और सल्फर की आवश्यकता है. उसके बाद जीवन के विकास के लिए पर्याप्त समय की आवश्यकता है. गेनीमेड और यूरोपा दोनों में ये सभी चीजें पाई जा सकती हैं. उनमें तरल जल तो निश्चित रूप से है और उनमें जीवन के लिए मॉलिकुलर बिल्डिंग ब्लॉक्स भी आसानी से हो सकते हैं. जहाँ तक ऊर्जा की बात है तो अंतरिक्ष जीवविज्ञानियों के बीच पारंपरिक तौर पर यूरोपा पसंदीदा रहा है. यह बृहस्पति के चंद्रमाओं में एकलौता है जहाँ लहराता समुद्र हो सकता है. इसका अर्थ है कि वहाँ जलतापीय प्रपात की संभावना हो सकती है. चूंकि वहाँ सूर्य से उल्लेखनीय ऊर्जा नहीं मिलती है इसलिए जलतापीय प्रपात जीवन के लिए रासायनिक ऊर्जा उपलब्ध करा सकते हैं. यूरोपा के बारे में हम जो कुछ भी जानते हैं वह नासा के गैलिलियो मिशन से मिली है. 1990 के दशक के मध्य में शुरू हुए इस मिशन ने बृहस्पति और उसके चंद्रमाओं पर करीब 8 साल गुजारे. जीवन के बारे में किसी सटीक निष्कर्ष तक पहुँच पाना अभी तक मुश्किल बना हुआ है हालांकि नए शोध इस दावे को बल प्रदान करते हैं कि यूरोपा पर जीवन हो सकता है. नासा के कैलिफोर्निया स्थित जेट प्रपल्शन लैब्रटॉरी के अंतरिक्ष जीवविज्ञानी केविन हैंड ने कहा जिसे हम जीवन मानते हैं उसके मद्देनजर यह माना जा सकता है कि वहां पृथ्वी के मानकों के अनुसार जीवन की संभावना है. पृथ्वी पर स्थित दूरदर्शियों का इस्तेमाल करते हुए हैंड और उनके साथियों ने हाल में इस बात का पुष्टि की है कि यूरोपा की अधिकांश सतह पर हाइड्रोजन परऑक्साइड काफी मात्रा में उपलब्ध है. और मंगल के विपरीत वहाँ बड़े बहुकोशकीय जीव के लिए पर्याप्त ऊर्जा हो सकती है. उन्होंने बताया कि हम पृथ्वी पर जीवन के जटिल स्वरूपों के विकास के बारे में बहुत अधिक नहीं जानते हैं और इसलिए यूरोपा के बारे में अधिक अटकलें लगाना मुश्किल है. हैंड ने समझाया यूरोपा के सतह पर बर्फ के विकिरण से तैयार हाइड्रोजन परऑक्साइड और ऑक्सीजन जैसे घटकों के संकेत मिलते हैं कि इससे रासायनिक और ऊर्जा सम्पन्न समुद्र की संभावना को बल मिलता है जो जटिल जीवों को जन्म देने में सक्षम हो सकता है. तो यदि वहाँ जीवन है तो वह किस रूप में हो सकता है हैंड ने बताया जब आप एक दूसरे स्वतंत्र जीवन की उत्पत्ति के बारे में विचार करते हैं तो कुछ भी संभव है. मेरा दावा है कि यह ध्वनिक और सोनार संवेदी अवधारणा पर काफी निर्भर होगा क्योंकि यह विशाल समुद्र में होगा और चूँकि बृहस्पति चंद्रमा को लगातार अपनी तरफ खींच रहा है बर्फ की चट्टानें दिन-प्रति-दिन टूटती जा रही हैं. हालांकि विशाल कानों वाली एलियन मछलियों से भरे एक समुद्र की कल्पना काफी रोमांचक है लेकिन जाहिर तौर पर यह अभी तक केवल अटकलबाजी ही है. जीवन की संभावनाओं के प्रमाण बढ़ रहे हैं लेकिन जीवन की संभावनाओं का अर्थ यह नहीं है कि वह जीव हैं. वास्तव में कोट्स बताते हैं कि गेनीमेड में कहीं बेहतर संभावनाएँ हैं. वह कहते हैं कि इसके पास एक चुम्बकीय क्षेत्र है जो उसे विकिरण से बचाता है. खास तौर से यूरोपा के साथ एक समस्या यह है कि वहाँ के वातावरण में विकिरण काफी अधिक है. इसके अलावा गेनीमेड के तरल समुद्र के ऊपर जमी बर्फ भी उसे विकिरण से बचाती है. इस बारे में निराश करने बात बात यह है कि यदि सब कुछ तय योजना के मुताबिक होता चला गया तो भी हमें जूस के बृहस्पति तक पहुँचने के लिए 17 साल तक और गेनीमेड की कक्षाओं तक पहुँचने के लिए 19 साल इंतजार करना पड़ेगा तभी हम किसी जवाब के नजदीक होंगे. लेकिन कोट्स इसके उजले पक्ष की ओर देखते है यह सोचना उल्लेखनीय है कि जब जूस गेनीमेड की कक्षाओं में प्रवेश करेगा उस समय आज दो साल का बच्चा पीएचडी कर रहा होगा. और अगर यह साबित होता है कि यूरोपा और गेनीमेड जैसी अजीबो-गरीब दुनिया में जीवन है तो इस बात की बहुत अधिक संभावनाएँ होंगी कि इस ब्रहमांड में जीवन बड़े पैमाने पर है. और वास्तव में यह काफी रोमांचक है. |
| DATE: 2013-05-28 |
| LABEL: science |
| [412] TITLE: कॉकरोचों को आप यूं ही नहीं हरा पाएंगे |
| CONTENT: अमरीकी शोधकर्ताओं के दल को यूरोप में कॉकरोचों की ऐसी किस्म मिली है जो कॉकरोच के लिए तैयार किए गए कीटनाशक को चखते ही पहचान लेते हैं. जैव विकास के परिणामस्वरूप इन कॉकरोचों की स्वाद ग्रंथि परिवर्तित हो गई है. कीटनाशक गोलियों पर चढ़ाई गई चीनी की परत इन्हें मीठी के बजाय कड़वी लगती है. नार्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के एक दल ने कॉकरोचों को जैम और पीनट बटर में से एक को चुनने का विकल्प दिया. इसके बाद वैज्ञानिकों ने इनकी स्वाद ग्रंथियों का विश्लेषण किया. शोधकर्ताओं के इसी दल ने बीस साल पहले किए गए अपने अध्ययन में पाया था कि कॉकरोचों के लिए तैयार किए गए कुछ कीटनाशक उन पर असर नहीं कर रहे हैं क्योंकि कॉकरोच कीटनाशक मिलाकर रखी गई गोलियों को खाते ही नहीं थे. डॉक्टर कॉबी शाल ने साइंस जर्नल में इस शोध के बारे में समझाते हुए कहा है कि इस नए अध्ययन से कॉकरोचों के इस व्यवहार के पीछे की स्नायविक प्रक्रिया सामने आ चुकी है. इस प्रयोग के पहले चरण में वैज्ञानिकों ने भूखे कॉकरोचों को पीनट बटर और ग्लूकोज़ वाला जैम खाने को दिया. जैम में ग्लूकोज़ की मात्रा बहुत ज्यादा होती है जबकि पीनट बटर में काफी कम ग्लूकोज़ होता है. डॉक्टर कॉबी कहते हैं आप देख सकते हैं कि ये कॉकरोच जेली खाते ही झटका खा कर पीछे हट जाते हैं लेकिन पीनट बटर पर वे टूट पड़ते हैं. वैज्ञानिकों ने कॉकरोचों को स्थिर कर दिया और उनकी स्वाद कोशिकाओं का अध्ययन करने के लिए उन्हें पतले-पतले तारों से जोड़ दिया. ये स्वाद कोशिकाएं कॉकरोचों के मुँह पर स्थित नन्हें बालों में जमे स्वाद का अनुभव करती हैं. डॉक्टर शाल के अनुसार ग्लूकोज़ चखने पर कॉकरोचों की स्वाद कोशिकाओं में वैसी ही प्रतिक्रिया हुई जैसी प्रतिक्रिया आमतौर पर उनमें कड़वी चीजें चखने पर होती है. इसका अर्थ है कि इन कॉकरोचों को ग्लूकोज़ भी कड़वा लग रहा है. डॉक्टर शाल बताते हैं कि ग्लूकोज़ को चखने पर कॉकरोचों की उन कोशिकाओं में भी प्रतिक्रिया होती है जो मीठा खाने पर सक्रिय होती हैं. लेकिन कड़वे स्वाद की ग्रंथियां इन्हें बीच में ही रोक देते हैं जिसकी वजह से आखिर में इसका स्वाद कड़वा प्रतीत होता है. इन कॉकरोचों के व्यवहार को स्प्ष्ट करते हुए डॉक्टर शाल कहते हैं कि ये कॉकरोच ग्लूकोज़ खाने पर वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा कि छोटे बच्चे पालक का साग खाने पर करते हैं. ग्लूकोज़ चखने पर ये कॉकरोच अपना सिर झटकते हैं तथा उसे और चखने से मना कर देते हैं. लंदन स्थित इंस्टीट्यूट आफ जूलॉजी की डॉक्टर एली लीडबीटर ने इस प्रयोग पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा यह एक रोचक काम है. डॉक्टर एली कहती हैं असल में प्राकृतिक चयन जब स्वाद क्षमता को परिवर्तित करता है तो यह जंतुओं को किसी खास स्वाद के प्रति कम या ज्यादा संवेदनशील बना देता है. जैसे कि शहद एकत्रित करने वाली मक्खियाँ दूसरी मक्खियों की तुलना में चीनी के प्रति कम संवेदनशील होती हैं. इसका मतलब है कि शहद बनाने वाली मक्खियां केवल गाढ़ा शहद ही एकत्रित कर सकती हैं. जैविक विकास ने उनके लिए चीनी को कम मीठा कर दिया है लेकिन अभी भी वो चीनी को पसंद करती हैं. डॉक्टर एली कहती हैं कि इन कॉकरोचों को चीनी कड़वी लग रही है. प्राकृतिक चयन का यह एक आसान तरीका है जिससे ऐसे कॉकरोचों का जन्म होता है जो चीनी में लपेट कर रखी गई जहरीली गोलियों को नहीं खाते. डॉक्टर शाल कहते हैं मनुष्य और कॉकरोचों के बीच चल रही ऐतिहासिक होड़ में यह एक नया अध्याय है. हम कॉकरोचों को मिटाने के लिए कीटनाशक बनाते जा रहे हैं और कॉकरोच इन कीटनाशकों से बचने के उपाय करते जा रहे हैं डॉक्टर शाल कहते हैं कॉकरोचों का मैं बहुत सम्मान करता हूं. वो हम पर निर्भर हैं लेकिन वो हमारा फायदा उठाना भी जानते हैं. |
| DATE: 2013-05-25 |
| LABEL: science |
| [413] TITLE: विटामिन 'सी' से हो सकता है लाइलाज टीबी का इलाज? |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि विटामिन सी से टीबी या तपेदिक के उस स्वरूप का भी इलाज किया जा सकता है जिनपर कुछ ताकतवर दवाएं भी कारगर नहीं हो पाती हैं. येशिवा युनिवर्सिटी के अमरीकी शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि चौंका देने वाली यह खोज टीबी के संक्रमण से निपटने के एक नए तरीके पर रोशनी डालती है. नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित इस रिपोर्ट के मुताबिक मल्टीड्रग रेजिस्टेंट टीबी का यह संक्रमण दिन पर दिन लाइलाज होता जाता है. मल्टीड्रग रेजिस्टेंट टीबी की वह अवस्था है जब इसके शुरुआती इलाज के काम आने वाली कुछ असरदार दवाएं भी नाकाम हो जाती हैं. एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में इस तरह की टीबी या तपेदिक के तकरीबन साढ़े छह लाख मरीज हैं. इन नतीजों के बाद अब इस बात के अध्ययन की और अधिक जरूरत महसूस की जा रही है कि क्या इलाज के इस तरीके में विटामिन सी का इस्तेमाल मनुष्यों में टीबी की दवा के तौर पर किया जाना फायदेमंद रहेगा. प्रयोगशाला में किए गए अध्ययनों में यह बात सामने आई कि विटामिन सी शरीर में कुछ ऐसे तत्वों के उत्पादन को सक्रिय करता है जो टीबी को खत्म करती हैं. ये तत्व फ्री रैडिकल्स के नाम से जाने जाते हैं और यह टीबी के उस स्वरूप में भी कारगर होता है जब पारंपरिक एंटीबायोटिक्स दवाएं भी नाकाम हो जाती हैं. डॉक्टर विलियम जैकब्स येशिवा युनिवर्सिटी में अलबर्ट आइंसटीन कॉलेज ऑफ मेडिसिन के प्रोफेसर हैं और उन्होंने इस शोध की अगुवाई भी की है. वह कहते हैं हम इसे अभी तक एक टेस्ट ट्यूब में ही दिखा पाने में कामयाब हुए हैं और हमें नहीं पता कि यह मनुष्यों या जानवरों पर कारगर होगा या नहीं. डॉक्टर विलियम ने बताया इस बात पर विचार करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण अध्ययन होगा क्योंकि हमारे पास टीबी का नमूना है इनके लिए हमारे पास कोई दवा नहीं है और हमने प्रयोगशाला में देखा कि टीबी के इन नमूनों को विटामिन सी असरहीन कर देता है. वह बताते हैं सब को पता है कि विटामिन सी सस्ता है आसानी से उपलब्ध है और इसे इस्तेमाल करना सुरक्षित भी है. और आखिर में सबसे अच्छी बात ये है कि टेस्ट से हमें यह पता चलता है कि इस तरीके से हम टीबी के इलाज की संभावनाओं का पता लगा सकते हैं. |
| DATE: 2013-05-23 |
| LABEL: science |
| [414] TITLE: कवर के साथ रंग बदलेगा ये स्मार्टफ़ोन |
| CONTENT: फ़िनलैंड की मोबाइल कंपनी नोकिया के पूर्व कर्मचारियों ने योला नाम का स्मार्टफ़ोन विकसित किया है जो सेलफ़िश नाम के नए ऑपरेटिंग सिस्टम पर काम करेगा. दरअसल नोकिया ने वर्ष 2011 में मीगो नाम की परियोजना पर बीच में ही काम छोड़कर अपने फ़ोन के लिए माइक्रोसॉफ्ट के विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम को अपना लिया था. इसी के बाद नोकिया के पूर्व कर्मचारियों ने यॉला पर काम शुरू कर दिया. योला फ़ोन को साल के अंत में बाज़ार में उतारा जाएगा और इसे सिर्फ़ ऑनलाइन खरीदा जा सकेगा. योला का आना ऐसे वक्त हो रहा है जब बाज़ार में पहले से ही कई ऑपरेटिंग सिस्टम मौजूद हैं. योला के प्रमुख और सह-निर्माता ऐंटी सार्नियो कहते हैं पिछले दो सालों से बाज़ार में कोई अच्छा मोबाइल फ़ोन नहीं आया है. इससे नई कंपनियों के लिए मौके बढ़े हैं. फ़ोन में 4-5 इंच स्क्रीन और आठ मेगापिक्सल कैमरा है. ये फ़ोन 4-जी नेटवर्क पर काम कर सकता है. योला फ़ोन में द अदर हाफ़ नाम की एक खासियत है. इसका मतलब ये कि फ़ोन के रंगीन कवर को मन मुताबिक बदला जा सकता है और मज़ेदार बात ये कि कवर बदलने के साथ ही फ़ोन के सॉफ्टवेयर में भी बदलाव देखा जा सकेगा. वर्ष 2011 में नोकिया छोड़ने के बाद सार्नियो ने अपने पूर्व साथियों के साथ मिलकर एक नई कंपनी बनाई और मीगो पर काम करना शुरू किया हालाँकि उन्होंने मीगो का नाम बदलकर सेलफ़िश रख दिया. दरअसल नोकिया के भीतर ये सभी लोग ऐपल के आईओएस और गूगल ऐंड्रॉयड को टक्कर देने के लिए एक नए मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम पर काम कर रहे थे. नोकिया ने मीगो सॉफ्टवेयर पर चलने वाले फ़ोन एन9-00 को बाज़ार में उतारा भी लेकिन सार्नियो के मुताबिक इसे बाज़ार में जिस तरह का समर्थन मिलना चाहिए था वो नहीं मिला. सोर्नियो कहते हैं कि अगर नोकिया चाहे तो वो अपने मोबाइल फ़ोन में सेलफ़िश का इस्तेमाल कर सकता है. वो कहते हैं हमारा रवैया बहुत खुला है. हम दूसरे स्मार्टफ़ोन उत्पादकों से भी आग्रह कर रहे हैं कि अगर वो चाहें तो इस ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल कर सकते हैं. |
| DATE: 2013-05-22 |
| LABEL: science |
| [415] TITLE: दफ़्तर में थोड़ा 'पागलपन जरूरी' है |
| CONTENT: मनोरोगी कहते ही हम में से ज्यादातर के ज़ेहन में एक ऐसे ख़तरनाक शख्स की छवि उभरती है जिसे सलाखों के पीछे होना चाहिए. लेकिन ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रायोगिक मनोविज्ञानी प्रोफेसर केविन डटन का कहना है कि ऐसा सोचना पूरी तरह गलत है. मनोरोग का सच हमारी सोच से उलट भी हो सकता है. केविन बताते हैं कि जब हमारे जैसे मनोविज्ञानी मनोरोगी शब्द का प्रयोग करते हैं तो ज्यादातर लोगों के ज़ेहन में सबसे पहले पागल हत्यारों की छवि ही उभरती है. केविन के अनुसार निर्दयी निडर आत्मविश्वासी एकनिष्ठ मानसिक दृढ़ता चमत्कारिक या आकर्षक व्यक्तित्व जैसे गुण मनोरोगियों में भी पाए जाते हैं. ये सभी गुण अपने आप में कोई मुसीबत नहीं हैं. समस्या तब होती है जब इन सारे गुणों की अति होने लगती है और आप ऐसे लोगों से मिलने लगते हैं जो कि अजीब तरीके से व्यवहार करते हैं. प्रोफेसर डटन कहते हैं कि मैं मनोरोगियों को महिमामंडित नहीं कर रहा. ऐसे लोग दूसरों का जीवन बर्बाद कर देते हैं. अपनी नई किताब विज़डम आफ साइकोपैथ में प्रोफेसर डटन ने बताया है कि मनोरोगियों में पाए जाने वाले कुछ गुणों को अपनाने से हमारी कार्यक्षमता बढ़ सकती है. वो कहते हैं मनोरोगी किसी काम को टालते नहीं हैं. वे किसी चीज को निजी तौर पर नहीं लेते और किसी काम के बिगड़ जाने पर वो खुद को तकलीफ नहीं पहुंचाते. मनोरोगी आमतौर पर दूसरों के कष्ट की परवाह नहीं करते. लेकिन यह गुण भी कुछ पेशों में उपयोगी हो सकता है. प्रोफेसर डटन कहते हैं मान लीजिए कि आपमें बढ़िया सर्जन बनने की योग्यता है लेकिन रोगी की सर्जरी करते समय आप उसके कष्ट की अनदेखी नहीं कर पाते. यानी लोगों के प्रति लापरवाह होना कई क्षेत्रों में आपकी सफलता सुनिश्चित कर सकता है. प्रोफेसर डटन बताते हैं कि सफल राजनीतिज्ञों में भी कई बार मनोरोगियों की प्रवृत्तियां पाई जाती हैं. राजनीतिज्ञों को कई बार विरोध के बावजूद पूरी कड़ाई से फैसले लेने होते हैं. यदि आप इस पर विचार करें तो देखेंगे कि ज्यादातर सफल राजनीतिज्ञ वो होते हैं जो अक्सर जनता को पसंद आने वाली बातें करते हैं. राजनीतिज्ञ लोगों की भावनाओं को समझने में माहिर होते हैं. आप कह सकते हैं कि वो दिमाग में झांक लेने वाले लोग होते हैं. अन्य मनौवैज्ञानिकों का मानना है कि मनोरोगियों की संख्या कुल जनसंख्या के एक प्रतिशत से ज़्यादा नहीं है लेकिन डटन जिस अर्थ में मनोरोग का प्रयोग कर रहे हैं वह इसे बहुत व्यापक बना देती है. लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट स्कूल के प्रोफेसर कैरी कूपर कहते हैं क्लीनिकल साइकॉलजी में जिन अर्थों में मनोरोगी शब्द का प्रयोग होता है उसके आधार पर इन लोगों को मनोरोगी कहना गलत होगा. मनोविज्ञान में मनोरोग एक परिभाषित अवधारणा है. ये लोग किसी की हत्या करने नहीं जा रहे लेकिन अपने लक्ष्य के प्रति अत्यधिक केन्द्रित होने के कारण ये लोग दूसरों को परोक्ष नुकसान पहुंचा सकते हैं. मनोरोगियों को परिभाषित करने के सवाल को दरकिनार करते हुए चार्टर्ड इंस्टीट्यूट आफ पर्सनल एंड डेवलपमेंट के प्रोफेसर जॉनी गिफ़र्ड प्रोफेसर डटन से सहमति जताते हैं. वह मानते हैं कि इन व्यावहारिक प्रवृत्तियों से हम काफी कुछ सीख सकते हैं. गिफ़र्ड कहते हैं कि हममें से बहुत से लोग सक्रिय राजनीति में नहीं जाना चाहते लेकिन हमें सच स्वीकार करते हुए यह मान लेना चाहिए कि राजनीति में जाने के लिए थोड़ी कुटिलता जरूरी है. वो कहते हैं कि हमें कई बार उचित राह पर चलने के लिए कड़ाई से पेश आना होता है. यह कहना आसान है कि आप अपने मूल्यों के अनुसार काम करें लेकिन संभव है कि आपके मूल्य किसी काम के न हों. ऐसे लोग जो अपने साथियों की परवाह किए बगैर सिर्फ़ अपनी प्रगति के बारे में सोचते हैं वो छोटा—मोटा लाभ कमा सकते हैं लेकिन लंबे दौर में ऐसे लोग संस्थान के लिए नुकसानदेह होते हैं. गिफ़र्ड कहते हैं वे खुद तो बहुत अच्छे होते हैं लेकिन उनकी टीम को उनके कारण कष्ट सहना पड़ता है. इस पर प्रोफेसर डटन का कहना है एक बड़ी कंपनी चलाने के लिए आपको कई बार निर्दयी और असहिष्णु होना पड़ता है. जिन लोगों को लगता है कि उनके बॉस में मनोरोग की प्रवृत्तियां कुछ ज्यादा ही हैं तो उनके लिए प्रोफेसर डटन के पास एक ही सलाह है. यदि आपका बॉस अपने से नीचे वालों को दबाए रखता है लेकिन अपने से ऊपर के लोगों को खुश करने की हर कोशिश करता है तो आपको दूसरी नौकरी खोज लेनी चाहि |
| DATE: 2013-05-21 |
| LABEL: science |
| [416] TITLE: एक लबादा जो आग से रखे महफूज़ |
| CONTENT: अनुसंधानकर्ताओं ने एक ऐसी लबादे सरीखी चीज़ का परीक्षण किया जो किसी वस्तु को आग से छुपाकर उसे सुरक्षित रख सकेगी. वैज्ञानिक इसे थर्मल इनविजिबिलिटी क्लोक नाम से पुकार रहे हैं. हालांकि ऐसा नहीं है कि इस तरह की कोई कोशिश पहली बार की गई है. कुछ और भी प्रयास चल रहे हैं जैसे कि किसी वस्तु को रोशनी और यहां तक कि ध्वनि तरंगों से भी बचाकर कैसे रखा जा सकेगा. लेकिन यह पहली बार हुआ है कि एक ऐसी डिवाइस बनाई गई है जो किसी वस्तु को ऊष्मा से भी बचा सकेगी. इसका नमूना फिज़ीकल रिव्यू लेटर्स में जारी किया गया है. इस तकनीक का इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़ी चीजों में ताप के प्रबंधन में किया जाता है. जारी किए गए नमूने का सैंद्धांतिक विचार साल 2012 में सबसे पहले फ्रांस के अनुसंधनकर्ताओं ने दिया था. यह विचार अब हकीकत में बदल गया है. ताम्बे और सिलिकॉन से बनी इस चीज को पीडीएमएम का नाम दिया गया है. इसके काम करने का तरीका भी कम रोचक नहीं है. यह ऊष्मा की धारा को करीने से बनाई गई डिजाइन के तहत केंद्रीय हिस्से के इर्द गिर्द दो पदार्थों से बने घेरे में फैला दिया जाता है. अध्ययन रिपोर्ट जर्मनी के कार्लश्रुहे इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के रॉबर्ट स्किट्टनी की अगुवाई वाले समूह ने लिखी थी. रॉबर्ट अपनी समूह की कोशिशों के नतीजे के बारे में बताते हैं अगर आप चारों तरफ बने घेरे पर गौर करते हैं तो आप ऊष्मा के अधिक प्रभाव वाले क्षेत्रों को देख सकते हैं लेकिन अगर आप केंद्र की तरफ बढ़ेगे तो निम्न असर वाली सतह आपको बार-बार रोक देगी. उन्होंने बीबीसी से कहा आप देख सकते हैं कि ऊष्मा के लिए उस वस्तु के केंद्र तक पहुंचने की तुलना में उसके चारों तरफ पहुंचना ज्यादा आसान होगा. रॉबर्ट ने बताया कि उनके काम से ऐसे उपकरण बनाए जाने की उम्मीदें बढ़ी है जिनमें ऊष्मा के प्रबंधन की जरूरत पड़ती है. खासकर इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम शीतक मशीनों या ऊर्जा संयंत्रों में इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा. यह नमूना ठीक वैसे ही काम करता है जैसा कि अनुसंधानकर्ताओं ने साल 2012 में बताया था. रॉबर्ट ने कहा हम सभी इस बात को लेकर आश्चर्यचकित हैं कि सैंद्धांतिक विचार और प्रायोगिक नतीजों में आखिरकार मेल हो गया. |
| DATE: 2013-05-19 |
| LABEL: science |
| [417] TITLE: मोटापा 'कम करने वाला बैक्टीरिया' मिला |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने पेट में रहने वाले एक जीवाणु का इस्तेमाल जानवरों में मोटापे को कम करने तथा टाइप-टू मधुमेह को नियंत्रित करने के लिए किया है. प्रोसीडिंग्स ऑफ़ नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज में प्रकाशित शोध के मुताबिक जीवाणु की एक प्रजाति से युक्त शोरबा पीने से मोटे चूहों के स्वास्थ्य में नाटकीय बदलाव देखा गया. माना जा रहा है कि ये जीवाणु पेट की भीतरी झिल्ली में बदलाव करता है और भोजन के पचने के तरीके को भी बदल देता है. अब मनुष्यों में भी ऐसे परीक्षण किए जाने की जरूरत है ताकि इस बात का पता लगाया जा सके कि ये जीवाणु उनका मोटापा कम कर सकता है या नहीं. मानव शरीर में अनगिनत जीवाणु रहते हैं और इनकी संख्या शरीर की कुल कोशिकाओं से दस गुना ज्यादा है. शोधों से ये बात साबित हो रही है कि ये जीवाणु मनुष्य के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं. अध्ययनों से ये बात भी पता चली है कि मोटे और पतले लोगों के पेट में रहने वाले जीवाणुओं की किस्म और संख्या अलग-अलग होती है. गैस्ट्रिक बाइपास सर्जरी यानी मोटापा कम करने के लिए किए जाने वाले ऑपरेशनों से भी इस बात का पता चला है कि इससे पेट में जीवाणुओं के संतुलन में बदलाव आता है. बेल्जियम में कैथोलिक यूनिवर्सिटी ऑफ़ लूवैन के शोधकर्ताओं ने जीवाणु की एक प्रजाति एकरमेंसिया म्यूसिनिफिला पर काम किया. पेट में रहने वाले जीवाणुओं में इस प्रजाति की संख्या तीन से पाँच प्रतिशत तक होती है लेकिन मोटे लोगों में इसकी संख्या घट जाती है. चूहों को उच्च वसा युक्त भोजन कराया गया जिससे वे सामान्य चूहों से दो-तीन गुना मोटे हो गए. इन मोटे चूहों को फिर जीवाणु युक्त शोरबा पिलाया गया और इस दौरान उनके आहार में कोई दूसरा बदलाव नहीं किया गया. शोरबा पीने के बाद इन चूहों के आकार में तो कोई बदलाव नहीं हुआ लेकिन उनका वज़न आधा रह गया. साथ ही उनमें इंसुलिन प्रतिरोध का स्तर भी कम पाया गया जो कि टाइप-2 मधुमेह का एक प्रमुख लक्षण है. कैथोलिक यूनिवर्सिटी ऑफ़ लूवैन के प्रोफेसर पैट्रिस कानी ने बीबीसी से कहा हम पूरी तरह मोटापे को खत्म नहीं कर पाए लेकिन इसे बहुत हद तक नियंत्रित करने में सफल रहे. पहली बार ये बात सिद्ध हुई है कि जीवाणु की एक खास प्रजाति और मोटापा कम करने में सीधा संबंध है. ये जीवाणु पेट की आंतरिक झिल्ली में श्लेष्मा के स्तर बढ़ा देता है जो एक अवरोधक की तरह काम करता है और कुछ पदार्थों को पेट से खून में जाने से रोकता है. साथ ही ये पाचन तंत्र से आ रहे रासायनिक संकेतों को भी बदल देता है जिससे शरीर में अन्यत्र वसा बनने की प्रक्रिया में बदलाव आता है. भोजन में एक खास प्रकार के फाइबर के इस्तेमाल से भी ऐसे ही परिणाम देखने को मिले क्योंकि इससे पेट में एकरमेंसिया म्यूसिनिफिला का स्तर बढ़ गया. प्रोफेसर कानी ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि पेट में रहने वाले हजारों किस्म के जीवाणुओं में से केवल एक प्रजाति का ऐसा असर हो सकता है. उन्होंने कहा कि मोटोपे को रोकने या उसके इलाज और टाइप-2 मधुमेह को रोकने के लिए जीवाणु के इस्तेमाल की तरफ ये पहला कदम है और निकट भविष्य में जीवाणु आधारित इलाज संभव हो सकेगा. यूनिवर्सिटी कॉलेज कॉर्क में जीवाणु विज्ञानी प्रोफेसर कॉलिन हिल ने कहा ये बेहद उत्साहित करने वाला अध्ययन है. जीवाणुओं और मोटापे के बीच संबध के बारे में हमने कई बार सुना था लेकिन पहली बार ये बात साबित हुई है. उन्होंने कहा मुझे ये व्यावहारिक नहीं लगता कि दिनभर आप क्रीम केक चिप्स और सॉसेज खाइए और फिर उनके प्रभाव को कम करने के लिए जीवाणु खाइए. प्रोफेसर हिल ने कहा कि संभव है कि इस शोध से ये समझने में मदद मिले कि असल में पेट में होता क्या है जिससे मोटे लोगों को अपना वजन घटाने के लिए सही सलाह दी जा सके. |
| DATE: 2013-05-17 |
| LABEL: science |
| [418] TITLE: मानव क्लोनिंग की ओर एक और कदम |
| CONTENT: अमरीकी वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने मानव क्लोनिंग विधि का इस्तेमाल कर एक शुरुआती भ्रूण तैयार किया है जिसे चिकित्सा क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी माना जा रहा है. क्लोन किए गए भ्रूण को स्टेम सेल के स्रोत के तौर पर इस्तेमाल किया गया जिससे हृदय की नई मांसपेशी हड्डी मस्तिष्क के ऊतक और शरीर की अन्य कोशिकाएं तैयार की जा सकती हैं. सेल जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में उन्हीं विधियों को प्रयोग में लाया गया जिनसे 1996 में ब्रिटेन में पहली क्लोन भेड़ डॉली तैयार की गई थी. हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि स्टेम सेल्स के लिए अन्य स्रोत भी हो सकते हैं जो अधिक आसान सस्ते और कम विवादित हों. वहीं आलोचकों ने मानवीय भ्रूणों पर प्रयोग को अनैतिक बताते हुए इस पर प्रतिबंध की मांग की है. स्टेम सेल पर चिकित्सा जगत की बड़ी उम्मीदें टिकी हैं. दरअसल नए ऊतक बनाने में सक्षम होने पर दिल के दौरे से होने वाली क्षति को ठीक किया जा सकता है या फिर क्षतिग्रस्त रीढ़ की हड्डी को दुरुस्त किया जा सकता है. ऐसे कुछ प्रयोग पहले से हो रहे हैं जिनमें दान किए गए भ्रूण से स्टेम सेल लेकर उनके जरिए लोगों की दृष्ठि को बहाल किया जा रहा है. हालांकि दान की हुए ये कोशिकाएं मरीज के शरीर से मिलती नहीं हैं और इसीलिए शरीर के द्वारा उन्हें खारिज कर दिया जाता है. क्लोनिंग से ये समस्या दूर हो जाती है. 1996 में जब क्लोनिंग के जरिए पहले स्तनधारी जीव के रूप में डॉली का जन्म हुआ तभी से सोमेटिक सेल न्यूक्लियर ट्रांसफर एक जानी मानी तकनीक है और इसका इस्तेमाल भी होता है. एक वयस्क की त्वचा कोशिकाएं लेकर आनुवांशिक सूचना के साथ उसे दानदाता के ऐसे अंडाणु में रखा गया जिससे उसके डीएनए को अलग कर दिया गया था. इसके बाद बिजली का इस्तेमाल कर अंडाणु को एक भ्रूण में विकसित होने के लिए प्रेरित किया गया. फिर भी इंसानों में डॉली जैसे चमत्कार को साकार करने के लिए वैज्ञानिकों ने खूब संघर्ष किया है. दरअसल अंडाणु विभाजित होना तो शुरू हो जाता है लेकिन 6 से 12 कोशिकाओं के चरण से आगे नहीं बढ़ता है. दक्षिण कोरिया के एक वैज्ञानिक ह्वांग वू सुक ने क्लोन किए गए मानव भ्रूण से स्टेम सेल बनाने का दावा किया था लेकिन बाद में वो सही नहीं पाया गया. अब ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी में शोधकर्ताओं की एक टीम ने भ्रूण को ब्लास्टोसिस्ट यानी लगभग 150 कोशिकाओं के चरण तक विकसित किया है जिससे भ्रूणीय स्टेम सेल्स तैयार की जा सकती हैं. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में रिजेनेरेटिव मेडिसन के प्रोफेसर इस प्रयोग से उत्साहित हैं. वो कहते हैं उन्होंने ठीक वैसा ही किया है जैसा राइट बंधुओं ने किया था. राइट बंधुओं ने उड़ान भरी थी और वो भ्रूणीय स्टेम सेल बनाने में कामयाब रहे हैं. हालांकि भ्रूणीय स्टेम सेल के मुकाबले इस विधि से तैयार स्टेम सेल की कोशिकाओं की गुणवत्ता को लेकर अभी कई तरह के सवाल अनुत्तरित हैं. |
| DATE: 2013-05-16 |
| LABEL: science |
| [419] TITLE: कार जो दौड़ेगी 1600 किलोमीटर प्रतिघंटा |
| CONTENT: ब्रिटेन में एक ऐसी कार बनाने पर काम चल रहा है जिसकी रफ़्तार प्रति घंटा एक हजार मील से ज़्यादा होगी. ब्रिटिश ब्लडहाउंड के इस प्रोजेक्ट को विमान इंजन बनाने वाली कंपनी रॉल्स रॉयस प्रायोजित कर रही है. रॉल्स रॉयस इसके लिए वित्तीय और तकनीकी दोनों तरह की मदद मुहैया कराएगी. इस सुपरकार में ईजे200 जेट इंजन लगाया जाएगा जिसका इस्तेमाल अकसर लड़ाकू विमान यूरोफ़ाइटर टाइफ़ून में होता है. ब्लडहाउंड का कहना है कि पहले जेट इंजन का इस्तेमाल कर कार की रफ़्तार को लगभग 350 मील प्रति घंटा किया जाएगा. उसके बाद उसकी रॉकेट मोटर को शुरू कर दिया जाएगा जिससे कार को सुपरसोनिक रफ़्तार मिलेगी. इस प्रोजेक्ट का मकसद अगले साल ज़मीनी रफ़्तार के मौजूदा रिकॉर्ड 763 मील प्रति घंटा को तोड़ना है. इसके बाद 2015 तक इस रफ़्तार को बढ़ा कर एक हजार मील प्रति घंटा यानी 1610 किलोमीटर प्रति घंटा तक ले जाने की योजना है. इस कार को पहली बार दक्षिण अफ्रीका में किसी सूखी झील की सतह पर चलाया जाएगा. ब्लडहाउंड ने इस कार को बनाने वाली टीम में उन अहम लोगों को भी शामिल किया हैं जिन्होंने 1997 में ज़मीनी रफ़्तार का मौजूदा रिकॉर्ड कायम किया था. इनमें ड्राइवर एंडी ग्रीन और प्रोजेक्ट निदेशक रिचर्ड नोबल के नाम खास तौर से शामिल हैं. वैसे रॉल्स रॉयस रफ़्तार के रिकॉर्ड बनाने की ऐसी कोशिशों में शामिल होने के लिए आसानी से तैयार नहीं होती है. लेकिन ब्लडहाउंड के पेशेवर काम को देखते हुए वो इसका हिस्सा बने हैं. रॉल्स रॉयस के इंजीनियरिंग और टेक्नॉलजी के निदेशक कॉलिन स्मिथ कहते हैं मैं रिचर्ड नोबल के डिजाइन और उनकी सुरक्षा से जुड़ी प्रक्रिया से प्रभावित हूं और उनका रिकॉर्ड अच्छा रहा है. इस कार परियोजना के लिए ब्रितानी रक्षा विभाग से तीन ईजे200 विमान इंजन उधार लिए गए हैं जिनमें से दो कार में इस्तेमाल होंगे जबकि एक स्पेयर पार्ट्स की तरह इस्तेमाल में आएगा. ब्लडहाउंड के मुख्य इंजीनियर मार्क चैपमैन कहते हैं ईजे200 को यूरोफ़ाइटर टाइफ़ून को ध्यान में रख कर ही तैयार किया गया था और ये टाइफून कंट्रोल सिस्टम में ही रहता है. तो हमें इस कार को टाइफ़ून के अंदाज़ में ही तैयार करना होगा ताकि उसका इंजन यूरोफ़ाइटर वाले अंदाज़ में ही काम कर सके. ज़मीनी रफ़्तार का मौजूदा रिकॉर्ड बनाने वाली ग्रीन और नोबेल की पिछली कार थ्रस्ट एसएससी में रॉल्स रॉयस का स्पे 202 इंजन लगा था जो बुनियादी तौर पर फैंटम और बुकानियर जैसे सैन्य विमानों के लिए तैयार किया गया था. लेकिन ईजे200 इससे भी कहीं आगे की चीज़ है. रॉल्स रॉयस का कहना है कि ब्लडहाउंड की शिक्षा को लेकर प्रतिबद्धता भी उनके इस परियोजना से जुड़ने की एक वजह है. मौजूदा परियोजना की रुपरेखा पूर्व ब्रितानी रक्षा और विज्ञान मंत्री लॉर्ड ड्रेसन ने ये सोच तक तैयार की थी कि इसके ज़रिए विज्ञान टेक्नॉलजी इंजीनियरिंग और गणित जैसे विषयों में बच्चों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया जाए. फ़िलहाल ब्लडहाउंड पांच हज़ार स्कूलों के साथ काम करता है जिनके पाठ्यक्रम में सुपरसोनिकार से जुड़ी तकनीक को शामिल किया गया है. ब्लडहाउंड अपनी नई कार को ब्रिटेन के ब्रिस्टल में एवनमॉउथ में तैयार कर रहा है. विमान उद्योग से जुड़े अन्य कंपनियां भी इस काम में मदद कर रही हैं. |
| DATE: 2013-05-14 |
| LABEL: science |
| [420] TITLE: अब मच्छर को लगेगा मलेरिया का टीका! |
| CONTENT: मलेरिया इंसानों में मच्छरों के द्वारा ही फैलता है और ऐसी उम्मीद की जा रही है कि मच्छरों को मलेरिया प्रतिरोधी बनाकर इंसानों में इसके फैलने को कम किया जा सकता है. वैज्ञानिकों ने एक ऐसे जीवाणु की खोज की ही है जो मच्छरों को संक्रमित कर उन्हें मलेरिया के परजीवी के प्रति प्रतिरोधी बना सकता है. साइंस जर्नल में छपे एक शोध के अनुसार इस नए जीवाणु से संक्रमित मच्छरों में मलेरिया के परजीवी को जिंदा रहने के लिए संघर्ष करना पड़ा. मलेरिया दुनिया में फैली सबसे बड़ी बीमारियों में से एक है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि 2-2 अरब लोग हर साल इसके शिकार होते हैं जिनमें से साढ़े छह लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हो जाती है. अमरीका के मिशीगन विश्वविद्यालय में हुए शोध में वॉलबशिया बैक्टीरियम पर शोध किया गया जो सामान्यतः कीटों को संक्रमित करता है. यह सिर्फ़ मादा के ज़रिए नई नस्ल तक जाता है. कई कीटों में तो यह जीवाणु कीटों को मादा की संख्या बढ़ाने के लिए तैयार कर लेता है. वॉलबशिया कुछ तितलियों और इंद्रगोपों लाल-काली चित्तियों वाले कीट में नर भ्रूण को मार देता है. कुछ अन्य स्थितियों में यह ऐसे नर पैदा कर सकता है जो किसी संक्रमित मादा के साथ ही संबंध बना सकते हैं. यह कुछ मादा ततैया को बिना नर से संबंध बनाए वंश बढ़ाने की क्षमता भी प्रदान करता है. मलेरिया के वाहक एनाफ़िलीज़ मच्छर प्राकृतिक रूप से वॉलबशिया से संक्रमित नहीं होते. लेकिन प्रयोगशाला में किए गए शोध से पता चला कि अस्थाई रूप से संक्रमित किए जाने पर इन कीटों में मलेरिया के परजीवी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो गई. वैज्ञानिकों के समक्ष चुनौती इस अस्थाई संक्रमण के अगली नस्ल तक भेजने की थी. शोधकर्ताओं ने वॉलबशिया की एक ऐसी नस्ल ढूंढी जो एक जाति के कीटों एनोफ़िलिस स्टेफ़ेन्सी में पूरे अध्ययन के दौरान बनी रही. यह अध्ययन 34 नस्लों तक चला था. मलेरिया के परजीवी के लिए इन मच्छरों में रहना मुश्किल हो गया. इन संक्रमित मच्छरों में वह गैर-संक्रमित मच्छरों की तुलना में चार गुना कम पाए गए. ऑस्ट्रेलिया में हुए एक अध्ययन में पता चला कि वॉलबशिया की एक अन्य नस्ल मच्छरों द्वारा डेंगू फैलने से बचा सकती है. यह शोध ज़्यादा विस्तृत है और जंगलों में इसके लंबे परीक्षण भी किए जा चुके हैं. अमरीका के एलर्जी और संक्रामक रोग राष्ट्रीय संस्थान के निदेशक डॉक्टर एंथनी फॉसी कहते हैं कि यह अध्ययन इस विचार की पुष्टि करता है कि मलेरिया के लिए भी यही काम किया जा सकता है. उनके अनुसार अगर आप इसे मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में जीवित रहने और फैलने दें तो यह मलेरिया की रोकथान में महत्वपूर्ण असर डाल सकता है. डॉक्टर फ़ॉसी कहते हैं मेरे ख़्याल से इसकी क्षमताएं बहुत महत्वपूर्ण हैं लेकिन इसे लागू कर पाना एक चुनौती है. लंदन स्कूल के प्रोफ़ेसर डेविड कॉनवे इस शोध पर कहते हैं कि संक्रमित मादाएं गैर संक्रमित के मुकाबले कम अंडे देती हैं. इसका मतलब यह हुआ कि असली दुनिया में उन्हें फैलने के लिए संघर्ष करना होगा. वह कहते हैं कि यह मच्छर की सिर्फ़ एक प्रजाति एनाफ़िलीज़ स्टेफेन्सी पर किया गया प्रयोग है ये प्रजाति दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में मलेरिया फैलाती है. दूसरी प्रजाति एनाफ़िलीज़ गैम्बिया अफ्रीका में है और वही बड़ी समस्या है. शोधकर्ताओं की टीम में से एक डॉक्टर ज़ियोंग ज़ी ने बीबीसी को बताया हमने सिर्फ़ एक नस्ल पर काम किया है. अगर हम एनाफ़िलीज़ गैम्बिया पर काम करते हैं तो हमें यही तकनीक फिर अपनानी होगी. वह कहते हैं कि अगर अभी इस्तेमाल करना है तो वॉलबशिया अभी उपलब्ध उपायों का पूरक हो सकता है जिसमें मच्छरदानियां और दवाइयां शामिल हैं. |
| DATE: 2013-05-14 |
| LABEL: science |
| [421] TITLE: आपका बच्चा पूरी नींद तो सोता है न? |
| CONTENT: शोधकर्ताओं का कहना है कि नींद पूरी नहीं होने से स्कूल में छात्रों का प्रदर्शन प्रभावित होता है. खासकर धनी देशों में ये समस्या ज़्यादा है. विशेषज्ञों का कहना है कि देर रात तक मोबाइल और कम्प्यूटर का इस्तेमाल इसका मुख्य कारण है. अध्ययन से पता चला है कि नींद पूरी नहीं होना गंभीर मामला है. कक्षा में ऊंघ रहे छात्रों के कारण दूसरे छात्रों को भी परेशानी होती है और पढ़ाई की रफ्तार थम जाती है. बॉस्टन कॉलेज ने इस संबंध में दुनियाभर से आंकड़े जुटाए और फिर इनकी आपस में तुलना की. इसमें पाया गया कि नींद से वंचित छात्रों की सबसे ज्यादा संख्या अमरीका में है. शिक्षकों के मुताबिक नौ और दस साल के 73 प्रतिशत तथा 13 और 14 साल के 80 प्रतिशत छात्र कम नींद की समस्या से जूझ रहे हैं. ये अंतरराष्ट्रीय औसत से बहुत अधिक है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 47 प्रतिशत प्राथमिक छात्रों को और 57 प्रतिशत माध्यमिक छात्रों को और अधिक नींद की जरूरत है. न्यूजीलैंड सऊदी अरब ऑस्ट्रेलिया इंग्लैंड आयरलैंड और फ्रांस जैसे देशों में भी नींद से वंचित छात्रों का आंकड़ा अंतरराष्ट्रीय औसत से अधिक है. फिनलैंड भी उन देशों में भी शामिल है जहां बच्चे अपनी नींद पूरी नहीं कर पाते. दूसरी तरफ अजरबैजान कजाक़स्तान पुर्तगाल चेक गणराज्य जापान और माल्टा ऐसे देश हैं जिनका रिकॉर्ड इस मामले में बहुत अच्छा है. यानी इन देशों में बच्चे भरपूर नींद लेते हैं. ये विश्लेषण वैश्विक शैक्षिक रैंकिंग के लिए जुटाए गए आंकड़े का एक हिस्सा है. इसके तहत 50 से भी अधिक देशों में नौ लाख से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक छात्रों का टेस्ट लिया गया. नींद नहीं आने से आपके सीखने की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं. सर्रे विश्वविद्यालय के निद्रा शोध केन्द्र के निदेशक डर्क जान डिज्क ने कहा नींद पूरी नहीं होने से सीखने याद रखने और पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया प्रभावित होती है. नींद नहीं आने और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को लेकर हुए शोध से ये बात साबित हुई है कि याददाश्त के लिए नींद बेहद जरूरी है. उनींदी स्थिति में दिमाग को चीजों को ग्रहण करने और याद रखने में परेशानी होती है. |
| DATE: 2013-05-13 |
| LABEL: science |
| [422] TITLE: डायनासोरों की मशहूर भगदड़, जो हुई ही नहीं! |
| CONTENT: करीब एक अरब साल पुरानी डायनासोरों की भगदड़ की एकमात्र कहानी ख़तरे में है. ऑस्ट्रेलिया के लार्क क्वैरी में चट्टानों पर सौ से भी ज़्यादा डायनासोरों के पैरों के निशान हैं जिन्हें दुनिया डायनासोर की भगदड़ के नाम से जानती है. इस कहानी पर कुछ वैज्ञानिकों ने सवाल उठा दिए हैं. इन सवालों के बारे में बताने से पहले आपको भगदड़ के बारे में बताना ज़रूरी है. करोड़ों साल पहले उत्तर पूर्वी ऑस्ट्रेलिया के इस इलाके में पानी का एक कुंड था. सौ से ज़्यादा छोटे डायनासोर जिनका आकार मुर्गे से लेकर ऑस्ट्रिच के बराबर था यहां आराम से पानी पी रहे थे. अचानक एक मांसभक्षी डायनासोर झाड़ियों के पीछे से निकलता है और अपने दांत और पंजे चमकाता हुआ इन छोटे डायनासोरों की तरफ़ बढ़ता है. छोटे-छोटे डायनासोर अपनी जान बचाकर भागते हैं और उनके पैरों के निशान कोमल ज़मीन पर पड़ जाते हैं. यही डायनासोरों की भगदड़ है. मध्य क्वींसलैंड के लार्क क्वैरी में स्थित डायनासोर भगदड़ राष्ट्रीय स्मारक में एक टूर गाइड जॉन टेलर कहते हैं इस घटना में बस पांच मिनट ही लगे होंगे और यह समय की यात्रा में यह पलक झपकने भर की देरी है. एक विशाल चट्टान पर बने पदचिन्हों के जीवाश्म दिखाते हुए वह कहते हैं आपके सामने जिस घटना के चिन्ह हैं वह आपको पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलेंगे. हर साल पूरी दुनिया से हज़ारों लोग इस जगह को देखने आते हैं. वर्ष 2004 में इसे ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय धरोहरों की सूची में शामिल कर लिया गया है. इन पदचिन्हों को 1970 में एक खदान प्रबंधक ने देखा था- जिसने सोचा कि यह पक्षियों के पैरों के निशान हैं. वर्ष 1970 में इनकी पहचान डायनासोरों के पदचिन्हों के रूप में की गई और फिर इस इलाके की खुदाई की गई. तीन से चार हज़ार पदचिन्ह ढूंढने के लिए 60 टन से ज़्यादा पत्थर निकाले गए. वर्ष 1984 में वैज्ञानकों ने निष्कर्ष निकाला कि यह निशान डायनासोरों की भगदड़ की वजह से बने हैं. लेकिन अब इस निष्कर्ष पर सवाल उठने लगे हैं. क्वींसलैंड विश्वविद्यालय में जीवाश्व विज्ञान के छात्र और युवा वैज्ञानिक एंथनी रोमिलियो और उनके साथी लेखकों ने इस निष्कर्ष को ग़लत क़रार दिया है. जनवरी में जनरल ऑफ़ वेर्टेब्रेट पैलिअन्टोलॉजी या कशेरुकी जीवाश्म विज्ञान पर जनरल में छपे शोधपत्र में रोमिलियो और उनके साथी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि लार्क क्वैरी में कभी भगदड़ हुई ही नहीं थी. रोमिलियो का कहना है कि भगदड़ का निष्कर्ष निकालने वाले वैज्ञानिकों ने तथ्यों की ग़लत व्याख्या कर दी. वह कहते हैं कि भगदड़ की कहानी में आने वाले विशाल हमलावर डायनासोर मांसभक्षी था ही नहीं. मांसभक्षी डायनासोरों के पैर लंबे पतली उंगलियों वाले थे जबकि शाकाहारी डायनासोरों के पैर छोटी उंगलियों वाले और काफ़ी चौड़े थे. रोमिलियो कहते हैं कि लार्क क्वैरी में पैरों के निशान शाकाहारियों वाले हैं. उनके अनुसार इसके शाकाहारी डायनासोर मुटाब्रासॉरस होने की संभावना ज़्यादा है. वह कहते हैं कि छोटे डायनासोरों को शाकाहारी डायनासोर से डरकर भागने की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं थी. रोमिलियो के अनुसार वे भाग ही नहीं रहे थे वे तो तैर रहे थे. वैज्ञानिकों ने पैरों के निशान के बीच दूरी का निष्कर्ष यह निकाला था कि छोटे डायनासोर भाग रहे थे. लेकिन रोमिलिया को तर्क है कि क्योंकि वह जानवर तैर रहे थे इसलिए पानी के अंदर मिट्टी में उनके पैरों के निशान दूर-दूर हैं. उनके अनुसार डायनासोर किसी मांसभक्षी से बचने के लिए भाग नहीं रहे थे बल्कि नदी में कई दिन या कई हफ़्तों तक तैरते रहे थे. रोमिलियो के निष्कर्ष से जीवाश्म विज्ञानियों के बीच एक नई बहस खड़ी हो गई है. कुछ मानते हैं कि रोमिलियो की बात में दम है तो कुछ इसकी आलोचना भी करते हैं. क्वींसलैंड संग्रहालय में मुख्य डायनासोर विशेषज्ञ स्कॉट हॉकनल कहते हैं कि सिर्फ़ पद चिन्ह देखना ही काफ़ी नहीं है. यह भी देखना होगा कि कीचड़ में डायनासोर के पैर पड़ने से क्या प्रभाव पड़ा. वह कहते हैं जब आप पदचिन्हों को देखते हैं तो यह बड़ा गोल पंजा लगता है लेकिन दरअसल कीचड़ के पंजे तले मसले जाने से ऐसा हुआ है क्योंकि जानवर जोर से कीचड़ में पैर पटक रहा है. वह एक स्पॉटलाइट की मदद से बड़े पदचिन्हों में से एक के जटिल ढांचे को दिखाते हैं वह तिकोना आकार देख रहे हैं वह पंजे का निशान है. ऐसा निशान सिर्फ़ एक जानवर के पैर से बनता है और वह एक मांसाहारी डायनासोर है. रोमिलियो के भागने की बजाय तैरने वाले तर्क पर हॉकनल कहते हैं पानी के अंदर कीचड़ में पैरों के निशान टिकते ही नहीं. वह कहते हैं मैं किसी कमज़ोर वैज्ञानिक क्रिया को एक शानदार कहानी के आड़े नहीं आने दूंगा. टुअर गाइड जॉन टेलर तैरने वाले निष्कर्ष पर अभी यकीन नहीं करते. लेकिन वह कहते हैं कि अगर उसके पक्ष में तर्क आए तो वह अपनी कहानी भी बदल देंगे. चाहे वैज्ञानिक कुछ भी सोचते हों उन्हें नहीं लगता कि इससे पर्यटन पर कोई फ़र्क पड़ेगा. लार्क क्वैरी डायनासोर के पैरों के निशान वाला दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली स्थान तो है ही. |
| DATE: 2013-05-13 |
| LABEL: science |
| [423] TITLE: ठीक हुई अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में आई ख़राबी |
| CONTENT: अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के कूलिंग सिस्टम यानी उसे ठंडा रखने वाले तंत्र में आई ख़राबी को दो अमरीकी अंतरिक्ष यात्रियों ने एक पंप बदलकर ठीक कर दिया है. इसके लिए उन्हें अंतरिक्ष में चहलक़दमी करनी पड़ी. क्रिस कैसेडी और टॉम मार्शबर्न ने इस काम को तय समय से एक घंटे पहले ही पूरा कर लिया. अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर मौज़ूद वैज्ञानिकों ने गुरुवार को प्रयोगशाला से दूर बिखरे अमोनिया के कण देखे थे. अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने कहा है कि इससे दल को कोई ख़तरा तो नहीं था. लेकिन अंतरिक्ष स्टेशन के प्रबंधक इस ख़राबी को मार्शबर्न के स्टेशन से पृथ्वी पर रवाना से पहले ही ठीक कर लेना चाहते थे. मार्शबर्न अगले हफ़्ते अंतरिक्ष केंद्र के कनाडाई कमांडर क्रिस हैडफ़िल्ड और रूसी अंतरिक्ष यात्री रोमन रोमानकेव के साध पृथ्वी के लिए रवाना होने वाले हैं. अंतरिक्ष केंद्र पर तरल अमोनिया का इस्तेमाल इसके इलेक्ट्रानिक सिस्टम से पैदा हुई गर्मी को निकालने में किया जाता है. इस अतिरिक्त ऊर्जा को रेडियटर के जरिए अंतरिक्ष में फेंका जाता है. क्रिस हैडफ़िल्ड ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा है अब कही रिसाव नहीं है. अंतरिक्ष में करीब साढ़े चार घंटे की चहलक़दमी करने के बाद टॉम और क्रिस हम अंदर ला रहे हैं. यह रिसाव उस जगह पर हो रहा था जहाँ इस प्रयोगशाला का एक विशाल सोलर पैनल जुड़ता है. गुरुवार को हैडफ़िल्ड ने अंतरिक्ष में अमोनिया के टुकड़ों को देखने की सूचना दी थी. यह पहली बार नहीं है जब अंतरिक्ष केंद्र के कूलिंग सिस्टम में खराबी आई हो. ठीक इसी जगह पर 2007 में एक छोटे रिसाव का पता चला था. उसे दूर करने के लिए अंतरिक्ष यात्रियों ने 2012 में अंतरिक्ष में चहलक़दमी की थी. हालांकि इससे स्टेशन पर मौजूद वैज्ञानिकों को कोई ख़तरा नहीं था. लेकिन यह स्टेशन के वैज्ञानिक कार्यों को प्रभावित कर सकता था. इस समय इस स्टेशन पर छह अंतरिक्ष यात्री काम कर रहे हैं. |
| DATE: 2013-05-12 |
| LABEL: science |
| [424] TITLE: पायलट रहित विमान की उड़ान भरने की तैयारी |
| CONTENT: हम सभी जानते हैं कि यात्री विमान पायलट उड़ाते हैं. लेकिन विज्ञान की तेज़ी से हो रही तरक्की की बदौलत जल्दी ही वो समय भी आने वाला है जब विमान बिना पायलट के उड़ा करेंगे. आज जब आप विमान पर सवार होते हैं तो आपके कानों में एक आवाज़ सुनाई देती है जो आपको विमान के रूट समय और मौसम की जानकारी देती है. ये आवाज़ विमान के पायलट की होती है. लेकिन अब ये आवाज़ अतीत की बात हो जाएगी. ये संभव हो सकेगा नई पीढ़ी के रोबोटिक यात्री विमान की वजह से जो स्वनियंत्रित रूप से आसमान की ऊंचाइयों में उड़ान भरेगा. न्यू मैक्सिको स्टेट यूनिवर्सिटी के पायलट विहीन एयरक्राफ़्ट प्रोग्राम के निदेशक डॉग डेविस कहते हैं हमारा विश्वास है कि विमान उद्योग में पायलट विहीन एयरक्राफ़्ट अगला सबसे बड़ा बदलाव होगा. हालांकि सेना के लोग इस तरह के विमान के बारे में जानते हैं. सालों से विमानवाहक युद्धपोत के संकरे रनवे पर स्वचालित लैंडिंग सिस्टम की मदद से एफ-18 एयरक्राफ्ट उतारे जाते रहे हैं. उसके बाद आए पायलट रहित ड्रोन लड़ाकू एयरक्राफ्ट. इन विमानों को दूर बैठे पायलट रिमोट से संचालित करते हैं लेकिन इनकी खासियत ये होती है कि ये एयरक्राफ्ट एक निश्चित हवाई मार्ग का अनुसरण करते हैं और समस्या पैदा होने पर खुद नीचे उतर सकते हैं. अगली पीढ़ी का अमरीकी नौसेना का एक्स-47बी एयरक्राफ्ट तकनीकी रूप से और भी आधुनिक होगा. इसमें पायलट का हस्तक्षेप कम से कम रह जाएगा. स्वचालित विमान के सपने को साकार करने की शुरुआत क़रीब 100 साल पहले हुई जब पहले ऑटोपायलट विमान ने उड़ान भरा. इसके बाद पूरी बीसवीं सदी में लगातार कोशिश होती रही कि विमानन तकनीक को कैसे और आधुनिक बनाया जा सके. इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक्स का ज्यादा से ज्यादा उपयोग किया गया और कोशिश ये की गई कि पायलट की भूमिका कम से कम रह जाए. पायलट रहित लड़ाकू एयरक्राफ्ट ड्रोन को दूर से नियंत्रित किया जाता है. अब कुछ आधुनिक एयरक्राफ्ट में तो आलम ये है कि पायलट विमान को केवल रनवे तक ले जाते हैं और उसके बाद उडा़न भरने से लेकर विमान को सुरक्षित उतारने की पूरी प्रक्रिया लगभग स्वचालित होती है. पूर्व वायुसैनिक पायलट मिस्सी कमिंग्स जो अब मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के एयरोनॉटिक्स और एस्ट्रोनॉटिक्स विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं कहती हैं ये सब तकनीक का कमाल है. वो फ्लाई-बाई-वायर तकनीक के बारे में बताती हैं जिसने पायलट और विमान के इंजन के बीच की यांत्रिक कड़ी को बदल कर रख दिया है क्योंकि इस तकनीक से अब विमान के नियंत्रण का काम पूरी तरह कंप्यूटर नियंत्रित हो गया है. पायलट रहित यात्री विमान के प्रयोग को और आगे ले जाने के मक़सद से तकनीक के क्षेत्र की कंपनी बीएई सिस्टम्स ने हाल ही में ब्रिटेन के आसमान में एक पायलट रहित विमान उड़ाया. इस विमान पर यात्री सवार थे और ये व्यवस्था की गई थी कि आपात स्थिति पैदा होने पर एक पायलट विमान का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेगा. लेकिन ये प्रयोग सफल रहा. बिना पायलट के प्रायोगिक उड़ान भरना एक बात है लेकिन 350 यात्रियों से भरे एक विमान को बिना पायलट के अटलांटिक महासागर के ऊपर भेज देना फिलहाल संभव नहीं हो सका है. एक समय था जब यात्री विमानों में पांच पायलट हुआ करते थे. अब ये संख्या घटकर दो रह गई है लेकिन जिस तरह से तकनीक आगे बढ़ रही है जल्दी ही कॉकपिट में एक पायलट रह जाएगा और फिर वो समय भी आएगा जब सैन्य और वैज्ञानिक एयरक्राफ्ट की तरह यात्री विमान भी दूर से नियंत्रित किए जा सकेंगे. इस तकनीकी विकास का आखिरी पड़ाव है मानव नियंत्रण को पूरी तरह ख़त्म कर देना. इसके लिए ज़रूरी है कि विमान खुद फैसले ले सके. डॉग डेविस कहते हैं इसके लिए ज़रूरी है कि विमान को हवा में अपनी स्थिति गंतव्य और मौसम की जानकारी हो. इसके साथ ही विमान में ये क्षमता भी होनी चाहिए कि वो मार्ग में आनेवाली बाधाओं को देख सके और उससे बचने के उपाय ढूंठ सके. आज ये काम पायलट करते हैं जो राडार पर नज़र रख कर और खिड़की से बाहर देखकर फैसले लेते हैं. लेकिन मशीन ये सब देख पाए इसके लिए ज़रूरी है कि वीडियो कैमरे सेंसर और शक्तिशाली कंप्यूटर फैसले लेने में रियल टाइम में उसकी मदद करें. जिस तरह से तकनीक आगे बढ़ रही है वो दिन दूर नहीं जब विमान बिना पायलट के उड़ सकेंगे लेकिन एक समस्या फिर भी बनी रहेगी - लोगों को भरोसे में लेने की. आम लोग इस बात पर कैसे सहजता से यक़ीन कर लेंगे कि बिना पायलट के विमान सुरक्षित हो सकता है. प्रोफ़ेसर मिस्सी कमिंग्स कहती हैं कि आंकड़े पायलट रहित विमान के पक्ष में हैं. तीन साल पहले यूएवी यानी अनमैन्ड एरियल व्हीकल सामान्य विमान से ज्यादा सुरक्षित हो गए. इसका मतलब ये है कि यूएवी की तुलना में सामान्य विमान अब ज्यादा दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं. हालांकि इन आंकड़ों के बल पर फिलहाल लोगों को समझाया नहीं जा सकता कि वो बिना पायलट वाले विमान पर सवार हो सकते हैं. इसका कारण बताती हुए प्रोफ़ेसर कमिंग्स कहती हैं लोग विमान में पायलट की मौजूदगी इसलिए चाहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि विमान के साथ जो कुछ होगा उसके भुक्तभोगी वो भी होंगे. इसलिए अगर कोई विमान संकटग्रस्त होता है तो यात्रियों को ये तसल्ली रहती है कि विमान की सबसे आगे की सीट पर एक व्यक्ति ऐसा है जो उनकी ज़िंदगी बचाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा है. |
| DATE: 2013-05-11 |
| LABEL: science |
| [425] TITLE: कार्बन डाई ऑक्साइड ख़तरनाक स्तर पर |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने दुनिया भर के नेताओं को चेतावनी दी है कि वायुमंडल में बढ़ते कार्बन डाई ऑक्साइड के स्तर के देखते हुए इस पर नियंत्रण करने के लिए तुरंत कदम उठाएं. हवाई में मौजूद अमरीकी प्रयोगशाला में रोजाना होने वाले कार्बन डाई ऑक्साइड Co2 के उत्सर्जन की माप से अंदाजा मिला है कि पहली बार इस गैस का उत्सर्जन 400 पार्ट्स प्रति 10 लाख के स्तर पर पहुंच गया है. ब्रिटेन की रॉयल सोसायटी के मौसम परिवर्तन विभाग के प्रमुख ब्रायन हस्किंस का कहना है कि कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि दुनिया की सरकारों को इसके लिए उचित क़दम उठाना चाहिए. साल 1958 से लेकर अब तक माउना लोआ ज्वालामुखी पर मौजूद गैस मापक स्टेशन में दर्ज किए जाने वाले आंकड़े दर्शाते हैं कि इस गैस की मात्रा लगातार बढ़ रही है. दिलचस्प है कि मानव जीवन के अस्तित्व से करीब 30 से 50 लाख साल पहले नियमित तौर पर कार्बन डाई ऑक्साइड Co2 की मात्रा 400 पीपीएम से ऊपर थी. वैज्ञानिकों का कहना है कि उस वक्त का मौसम आज के मुकाबले काफी गर्म हुआ करता था. कार्बन डाई ऑक्साइड को सबसे प्रमुख मानव जनित ग्रीनहाउस गैस माना जाता है और उसे पिछले कुछ दशकों से धरती के तापमान को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार माना जाता है. जीवाश्म ईंधन मसलन कोयला तेल और गैस के जलने से मुख्यतौर पर कार्बन का उत्सर्जन होता है. ज्वालामुखी के आसपास आमतौर पर यह रुझान देखा जाता है Co2 की मात्रा ठंड के मौसम में बढ़ती है लेकिन उत्तरी गोलार्द्ध में मौसम बदलने के साथ ही इसकी मात्रा कम हो जाती है. वैसे जंगलों दूसरे पौधों और वनस्पतियों की वजह से वातावरण को नुकसान पहुंचाने वाले गैस की मात्रा कम होती है. इसका मतलब यह है कि आने वाले हफ़्तों में Co2 की मात्रा 400पीपीएम में कुछ कमी आ सकती है. लेकिन आने वाले लंबे समय तक इसकी मात्रा में तेजी के रुझान हैं. माउना लोआ में नैशनल ओसनिक ऐंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन एनओएए से जुड़े अर्थ सिस्टम रिसर्च लैबोरेटरी को स्थापित करने में जेम्स बटलर का मुख्य योगदान है. यहां Co2 की औसत दैनिक सांद्रता का आंकड़ा 400-03 था. डॉक्टर बटलर ने बीबीसी न्यूज़ से कहा Co2 में घंटे दैनिक और साप्ताहिक आधार पर परिवर्तनशीलता का रुझान देखा जाता है इसलिए हम इसका कोई एक आंकड़ा बताने में सहज नहीं हैं. सबसे कम आंकड़ा रोजाना औसत आधार पर तय होता है जिसे इस मामले में भी देखा जा रहा है. माउना लोआ और दक्षिणी ध्रुव की वेधशालाएं दो ऐसी प्रतिष्ठित जगहें हैं जहां साल 1958 से ही Co2 की मात्रा मापी जा रही है. पिछले साल पहली बार आर्कटिक क्षेत्र की सभी जगहों पर Co2 की मात्रा 400 पीपीएम के स्तर पर पहुंच गई. ऐसा पहली बार है कि माउना लोआ में भी Co2 की दैनिक औसत मात्रा ने 400 पीपीएम के स्तर को पार कर लिया है. माउना लोआ पर लंबी अवधि की माप की शुरुआत स्क्रिप्स इंस्टीट्यूशन ऑफ ओशनोग्राफी के वैज्ञानिक चार्ल्स कीलिंग ने कराई थी. उन्होंने अपनी खोज में यह पाया कि ज्वालामुखी के शीर्ष पर Co2 की सघनता करीब 315 पीपीएम है. स्क्रिप्स एनओएए के साथ-साथ पहाड़ों की चोटी पर Co2 की मात्रा मापने की कोशिश में जुटा है. हाल के दिनों में इसने Co2 की मात्रा 400 पीपीएम दर्ज की है और शुक्रवार को इसने 399-73 दैनिक औसत रिकॉर्ड किया. डॉक्टर बटलर का कहना है संभवतः अगले साल तक या उसके बाद औसत सालाना रीडिंग 400 पीपीएम के स्तर को पार कर लेगी. कुछ सालों बाद दक्षिणी ध्रुव की रीडिंग 400 पीपीएम होगी और अगले आठ से नौ सालों में Co2 की रीडिंग शायद ही 400 पीपीएम से कम होगी. Co2 के स्तर को तय करने से वैज्ञानिकों को प्रॉक्सी मापन का इस्तेमाल ज़रूर करना पड़ता है. इसके तहत अंटार्कटिक के बर्फ में मौजूद प्राचीन काल के हवा के बुलबुले का अध्ययन किया जाता है. इस तरीके का इस्तेमाल कर पिछले 800000 सालों के Co2 के स्तर को बताया जा सकता है. इस अध्ययन से यह नतीजे भी निकले कि इस लंबी अवधि में Co2 की मात्रा 200 पीपीएम से 300 पीपीएम के बीच रही. ब्रिटेन के वायुमंडलीय भौतिकशास्त्री प्रोफेसर जोएना हेग का कहना है मौसम तंत्र की भौतिकी के लिए 400 पीपीएम Co2 की कोई खास अहमियत नहीं है. लंबे समय तक इस गैस की सांद्रता का स्तर 300 तक रहा था और अब हमने 400 के स्तर को पार कर लिया है. हालांकि इससे हमें Co2 की लगातार बढ़ रही मात्रा और मौसम के लिए आखिर यह एक समस्या क्यों है इस पर सोचने को मौका मिल रहा है. |
| DATE: 2013-05-11 |
| LABEL: science |
| [426] TITLE: बदसूरत मछली को चाहिए एक हमसफ़र |
| CONTENT: लंदन के चिड़ियाघर ने मछली पालने वालों से अपील की है कि वे विलुप्त होने की कगार पर पहुंचे उष्णकटिबंधीय प्रजाति की मछलियों के लिए साथी की तलाश करें. मैंगरहारा सिकलिड मछली करीब लुप्तप्राय हो चुकी है और चिड़ियाघर में मौजूद तीनों मछलियां नर हैं. लंदन ज़ू का कहना है कि यह मछली बेहद बदसूरत होती है. इस चिड़ियाघर को उम्मीद है अगर इन नर मछलियों के लिए मादा मछली की तलाश पूरी हो जाती है तो इनके संरक्षण का कार्यक्रम शुरू हो सकता है. ये दो नर मछलियां 12 साल की हैं ऐसे में इनके लिए साथी की तलाश बेहद महत्वपूर्ण है. इन सिकलिड मछलियों का नाम मैडागास्कर में मौजूद मैंगरहारा नदी पर पड़ा है जहां से ये पहली बार पाई गई थीं. इस नदी पर बांध के निर्माण की वजह से पानी की धाराएं सूख गईं इस वजह से इस प्रजाति की मछलियां ख़त्म होने की कगार पहुंच गई हैं. इस प्रजाति की दो नर मछली लंदन के चिड़ियाघर में हैं और एक नर मछली बर्लिन में है. जर्मनी के चिड़ियाघर में पहले एक मादा मछली हुआ करती थी लेकिन उसके प्रजनन से जुड़ी संभावनाएं तब खत्म हो गईं जब नर मछली ने मादा मछली को मार दिया. लंदन ज़ू के एक्वेरियम के संरक्षक ब्रायन जिम्मरमैन ने बीबीसी को बताया सिकलिड के साथ यह बेहद आम बात है. कई अन्य मछलियों जो अपने साथी के साथ जोड़ा बनाती हैं और अंडे को सेती हैं उनके मुकाबले इस प्रजाति की मछलियां बेहद असामान्य होती हैं. ये आपस में उलझती हैं. ज़ूलॉजिकल सोसायटी ऑफ लंदन की एक टीम ने दुनिया भर के एक्वेरियम में इन मछलियों के लिए मादा मछली की खोज कराई लेकिन वे असफल रहे. हालांकि उन्हें उम्मीद है कि किसी के निजी एक्वेरियम में इस प्रजाति की मादा मछली हो सकती है. जिम्मरमैन का कहना है ये बदसूरत मछलियां बेहद असामान्य होती हैं. उनके लिए बड़े जगह की ज़रूरत होती है और ये मादा मछलियां आपके हाथ से बड़ी होती हैं. उनके लिए एक अच्छे टैंक की जरूरत पड़ती है. लंदन के चिड़ियाघर में मौजूद इन मछलियों की उम्र को देखते हुए ऐसा लगता है कि अगर दुनिया भर के चिड़ियाघरों से इनके लिए जल्द मादा मछली की खोज नहीं की जाती तो इनका भविष्य खतरे में है. जिम्मरमैन कहते हैं मुझे ज्यादा उम्मीद नहीं है. दुनियाभर में ताज़े पानी की मछलियों का संकट बढ़ रहा है. ज़्यादातर पानी का इस्तेमाल मानव जाति के लिए किया जा रहा है ऐसे में मछलियों के लिए पानी का अभाव एक बड़ा संकट बन गया है. मुझे लगता है कि इन मछलियों के बचने की कम संभावना है. लंदन ज़ू ने मादा सिकलिड मछली के बारे में सूचना देने के लिए फिशअपीलजेडएसएल डॉट ओआरजी पर ईमेल करने की अपील की है. |
| DATE: 2013-05-11 |
| LABEL: science |
| [427] TITLE: अपने दरवाजे को फ़ोन कीजिए वो खुल जाएगा |
| CONTENT: यदि आप चाभी भूलने की आदत से परेशान हैं तो अब आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है. किसी नामक कंपनी को उम्मीद है कि उन्होंने इस समस्या का हल ढूंढ लिया है. अब आप अपने स्मार्टफोन ही से अपने घर का दरवाजा खोल सकेंगे. किसी के सहसंस्थापक मैक्सीलियन सुएट्ज का कहना है कि ज्यादातर लोग चाभी भूलने या संभालने को लेकर परेशान होते हैं. किसी उन्हें इस समस्या से छुटकारा दिलाएगी. किसी का प्रयोग बहुत आसान है. आप जिस ब्लॉक में रहते हैं यदि उसमें पहले से इंटरकाम लगा हुआ है तो आपको उसमें एक छोटी सी चिप लगानी होगी. इसके अलावा अपने घर के दरवाजे में एक डिजिटल लॉक लगाना होगा. इसके बाद इस डिजिटल लॉक की कंट्रोल इकाई को अपने अपार्टमेंट के अंदर जोड़ना होगा. डिजिटल लॉक को लगाने के बाद किसी ऐप को डाउनलोड करते ही यह लॉ़क काम करने लगता है. जब आप दरवाजे के पास जाकर अपने फोन का बटन दबाते हैं तो यह आपके अपार्टमेंट में लगे कंट्रोल यूनिट को एक संदेश भेजता है और दरवाजा खुल जाता है. बहुत से लोगों को यह डर होगा कि अगर फोन खो जाए तो क्या होगा डरने की कोई जरूरत नहीं है. आपके लॉक से जुड़ी सारी जानकारी क्लाउड जिसे आप अपने फोन से प्रयोग करते हैं में सुरक्षित रहती है. आप किसी अन्य डिवाइस से ऑनलाइन होकर इस जानकारी को हासिल कर सकते हैं. इतना ही नहीं जरूरत पड़ने पर आप अपने सफाईकर्मी किसी दोस्त या किसी पड़ोसी को इस सॉफ्टवेयर की मदद से घर में प्रवेश की अनुमति दे सकते हैं. सुएट्ज कहते हैं आप बारमुडा में बैठकर न्यूयार्क में किसी को अपने घर में प्रवेश की अनुमति दे सकते हैं. इससे आपके समय और पैसे दोनों की बचत होगी. किसी हाल ही में न्यू यॉर्क में लांच हुई है. किसी के सहसंस्थापक बर्नहार्ड मेह्ल और सुएट्ज मूलत जर्मन निवासी हैं लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई न्यू यॉर्क से की है. न्यूयॉर्क में पहले ही से काफी जानपहचान होने के कारण उन्होंने न्यूयार्क में कम्पनी स्थापित की. सुएट्ज कहते हैं कि न्यूयार्क के लोग नई तकनीक को तेजी से स्वीकार करते हैं. जर्मन लोग इस मामले में बहुत रूढ़िवादी हैं. इसके अलावा यहां नेटवर्क बनाने के भी ज्यादा अवसर मिलते हैं. किसी के निर्माताओं को उम्मीद है कि उनकी तकनीक जल्दी ही शहर भर में लोकप्रिय हो जाएगी. |
| DATE: 2013-05-11 |
| LABEL: science |
| [428] TITLE: क्या पैसे से ख़ुशी खरीदी जा सकती है? |
| CONTENT: क्या आपको लगता है कि एक लॉटरी लग जाए तो आप हमेशा ख़ुश रह सकते हैं बहुत से लोगों को ऐसा लगता है-अमरीका के उस दुकानदार समेत जिसने 18297630000 रुपये की पावरबॉल लॉटरी जीती थी. लेकिन इससे पहले कि आप अपनी सभी उम्मीदें और सपने किसी लॉटरी टिकट पर दांव में लगा दें कुछ तथ्यों पर नज़र डालाना ज़रूरी है. तथ्य बताते हैं कि बहुत ज़्यादा पैसे मिलने से अंततः कोई फ़र्क नहीं पड़ता. लॉटरी जीतना सच्ची खुशी की वजह नहीं बन सकता. एक शोध के अनुसार जिनकी बड़ी लॉटरी निकली थीं वो अंततः उन लोगों से ज़्यादा ख़ुश नहीं थे जिन्होंने टिकट तो खरीदा थी लेकिन उनकी लॉटरी नहीं निकली थी. इसकी एक वजह तो यह हो सकती है कि जिनकी लॉटरी निकली थी वह अपनी नई संपत्ति के आदी हो जाते हैं और खुशी के पुराने स्तर के अनुकूल हो जाते हैं. इस प्रक्रिया को हेडोनिक ट्रेडमिल भी कहा जाता है. इसकी एक अन्य व्याख्या यह भी है कि ख़ुशी इस पर निर्भर करती है कि हम अपने साथियों के साथ तुलनात्मक रूप से कैसा महसूस करते हैं. मान लीजिए कि आपकी लॉटरी निकलती है और आप अपने पड़ोसियों से रईस हो जाते हैं. फिर आप किसी महंगी जगह पर बड़े बंगले में रहने के लिए चले जाते हैं. आपको लगता है कि नए बंगले नए पड़ोसियों से आपको ख़ुशी मिलेगी. लेकिन आप अपने नए बंगले से बाहर झांकते हैं और देखते हैं कि आपके सभी नए पड़ोसियों के बंगले आपसे बड़े हैं. यकीनन यह दोनों तथ्य ख़ुशी पर प्रभाव डालते हैं लेकिन ज़्यादा गहरा रहस्य यह है कि हम यह क्यों नहीं जानते कि किस सीज़ से हमें ख़ुशी मिलेगीआखिर हम पैसा उन चीज़ों पर ख़र्च क्यों नहीं करते जिस चीज़ से हमें ख़ुशी मिलेगीदिक्कत यह है कि ख़ुशी ऊंचाई वज़न या आय जैसी कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आसानी से मापा जा सकता हो. ख़ुशी एक जटिल अनिश्चित स्थिति है जो कई बार मामूली मज़ेदार चीज़ों से मिल जाती है और कई बार इसके लिए सालों या दशकों के संदर्भ की ज़रूरत पड़ती है. ऐसा भी लगता है कि ख़ुशी को मापने की कोशिश भर से हम उस चीज़ से दूर हो जाते हैं जिससे हमें सबसे ज़्यादा ख़ुशी मिल सकती है. शिकागो स्कूल ऑफ़ बिज़नेस के क्रिस्टोफ़र ह्सी द्वारा किए गए एक महत्वपूर्ण अध्ययन से यह बात सामने आती है. ह्सी का अध्ययन एक सामान्य चयन पर आधारित था इसमें सहभागियों को छह मिनट के एक काम के लिए पुरस्कार के रूप में वनीला आइसक्रीम और सात मिनट के काम के लिए पुरस्कार के रूप में पिस्ता आइसक्रीम जीतने का विकल्प दिया गया. सामान्य परिस्थितियों में 30 से भी कम लोगों ने 7 मिनट के काम को चुना. मुख्यतः इसलिए क्योंकि उन्हें वनीला आइसक्रीम पिस्ता से ज़्यादा पसंद थी. इस शोध के दूसरे चरण में सहभागियों के एक और समूह को भी यही विकल्प दिए गए लेकिन इस बार अंकों को भी इसमें शामिल कर लिया गया. छह मिनट के काम के लिए 60 अंक या सात मिनट के काम के लिए 100 अंक दिए गए. 50-99 अंक पर वनीला और 100 अंक पर पिस्ता आइसक्रीम का पुरस्कार था. हालांकि सभी कार्य और प्रभाव एक जैसे ही थे फिर भी अंक प्रणाली ने लोगों के चयन को नाटकीय रूप से प्रभावित किया. अधिकतर लोगों ने ज़्यादा समय वाले काम को चुनाव और 100 अंक कमाए- जिससे वह पिस्ता आइसक्रीम वाला पुरस्कार जीत सकते थे. फिर भी उसी अनुपात में करीब 70 लोगों ने कहा कि उन्हें वनीला पसंद है. इस और अन्य प्रयोगों के आधार पर ह्सी का निष्कर्ष था कि सहभागी अपने अंकों के साथ अपनी ख़ुशी बढ़ा रहे हैं. अंक सिर्फ़ माध्यम है- ऐसी चीज़ जो हमें उस चीज़ तक पहुंचने का मौका देती है जो हमें ख़ुशी देगी. चूंकि अंकों को मापना और तुलना करना बेहद आसान है- 60 और 100 का फ़र्क बहुत अधिक है- इसलिए यह हमारी आइसक्रीम की पसंद पर हावी हो जाता है. तो अगली बार अगर आप इनामी राशि को देखकर लॉटरी टिकट खरीद रहे हैं या किसी सामान की गुणवत्ता उसकी कीमत से तय कर रहे हैं या वेतन से नौकरियों का आकलन कर रहे हैं तो इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करें कि लॉटरी कपड़े या नौकरी आपको कितनी ख़ुशी देगी. बनिस्पत इसके कि अंकों के आधार पर चीज़ों की तुलना करें. पैसे से ख़ुशी नहीं ख़रीदी जा सकती और इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि पैसा दरअसल हमें उस चीज़ से विमुख कर देता है जिससे हमें सचमुच में ख़ुशी मिलती है. |
| DATE: 2013-05-09 |
| LABEL: science |
| [429] TITLE: कैसे बचें स्पैम और ऑनलाइन धोखाधड़ी से |
| CONTENT: आप अगर इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं तो आपको भी स्पैम संदेशों प्रमोशनल ईमेल्स से जूझना पड़ता होगा. लेकिन इनसे ज़्यादा सावधान रहने की ज़रूरत है वायरस और क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी से. साइबर दुनिया एक ऐसी जगह हो गई है जहां सावधानी हटी तो दुर्घटना घटने की आशंका बहुत ज़्यादा है. सोशल मीडिया पर मैसेज बॉक्स में किसी परिचित का संदिग्ध लिंक आपने क्लिक किया नहीं कि वायरस आपके प्रोफाइल में भी चला आता है. इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए इंटरनेट का इस्तेमाल करते समय कई सावधानियां बरतनी चाहिए. हम आपके लिए लाए हैं इंटरनेट पर समस्याओं से बचने के लिए कुछ टिप्स. अगर आप इंटरनेट के ज़रिये ख़रीदारी करते हैं तो क्रेडिट कार्ड की सीमा कम ही रखवाएं- बीस से पचास हज़ार के आसपास. इससे ये फायदा होगा कि अगर आपने ग़लती की तो आपको बहुत बड़ा झटका नहीं लगेगा. कई बार बड़ी राशि के झटके से उबरने में लोगों की पूरी ज़िंदगी लग जाती है. आप सबने सुना होगा कि नए कंप्यूटर में सिक्योरिटी बहुत अच्छी होती है. एपल के कंप्यूटर खासे जाने-माने हैं. हालांकि कंप्यूटर भी गलती करते हैं और हमसे-आपसे भी गलती होती है. इसलिए सिक्योरिटी सॉफ्टवेयर या एंटी वायरस सॉफ़्टवेयर को अपडेट रखें. इससे नए वायरसों को पहचानने में मदद मिलेगी. अगर आप मोबाइल के ज़रिए शॉपिंग करते हैं या सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं तो खास ध्यान रखें. इस्तेमाल के बाद देख लें कि मोबाइल लॉक हो गया है. जल्दबाज़ी में मोबाइल लॉक हुए बिना जेब में रखे जाने से कोई भी गलत बटन दब सकता है और आप नुकसान में पड़ सकते हैं. ब्राउजर यानी इंटरनेट एक्सप्लोरर गूगल क्रोम मोज़िला और सफारी जैसे ब्राउज़र. जिस किसी भी सिस्टम का इस्तेमाल कर रहे हों चाहे वो विंडोज़ हो मैक या लाइनेक्स ब्राउज़र बिल्कुल अपडेट रखें. नए ब्राउज़र का काम खतरनाक साइटों को चेक करना भी होता है. सिक्योर प्रोटोकॉल यानी जो लिंक खुले उसके ऊपर HTTPS है या नहीं. यहां S सबसे ज़रुरी है. ये उन वेबसाइटों के लिए जिसके ज़रिए आप क्रेडिट कार्ड से खरीदारी करते हैं. अगर S नहीं है लिंक में तो खरीदारी करने से पहले दस बार सोचें. सोशल मीडिया पर या ईमेल पर जब परिचित या अपरिचित कोई लिंक भेजे जिसमें कोई आम सा या चौंकाने वाला संदेश हो. मसलन - हैलो ये लिंक बहुत अच्छा है. ये तुम्हारी फोटो है या अरे ये कैसी फोटो है तुम्हारी. ऐसे संदेशों वाले लिंक आम तौर पर वायरस होते हैं. एक बार क्लिक किया तो ये फिर आपकी प्रोफाइल को करप्ट कर देते हैं. ईमेल पर अनजाने लोगों या कंपनियों से आने वाले बिजनेस प्रस्तावों के ज़रिए धोखाधड़ी आम हो गई है. इनसे बचें. पासवर्ड सबसे ज़रूरी हिस्सा हैं आपकी सुरक्षा का. पासवर्ड कभी भी अपने परिवार वालों के नाम पर या अपने बच्चों के बर्थडे की तारीखों से न रखें. ये हैक करने में आसान होते हैं. पासवर्ड में अक्षर नंबर और संकेतों का इस्तेमाल करें. कुछ कुछ समय पर इसे बदलते रहें. किसी भी वेबसाइट पर पासवर्ड याद रखने के विकल्प रिमेंमबर मी को क्लिक न करें. इसमें कोई शब्द न हो जैसे किसी का नाम. अक्षर मिले जुले हों कोई कैपिटल में कोई स्माल में. कम से कम दस अक्षरों का हो पासवर्ड. अलग अलग साइटों के पासवर्ड अलग अलग रखें. पासवर्ड लगातार बदलते रहें. |
| DATE: 2013-05-09 |
| LABEL: science |
| [430] TITLE: दवा जो सफेद बालों को काला कर दे |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने सफेद बालों को फिर से प्राकृतिक रंग देने का तरीका ढूंढ निकालने का दावा किया है. प्रोफेसर कैरिन स्कॉलरायटर और उनकी टीम ने पाया कि ऑक्सि़डेटिव स्ट्रेस प्रक्रिया के कारण बाल सफेद होते हैं जिससे बालों को नुकसान होता है. वैज्ञानिक इसका इलाज ढूंढने का दावा कर रहे हैं. दरअसल जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है बालों में हाइड्रोजन परऑक्साइड जमा होता जाता है. ये एक ब्लीच है जो बालों को उनके प्राकृतिक रंग से वंचित कर देता है. फासेब जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिक जिस दवा का दावा कर रहे हैं वो इस ब्लीच को हटा देती है. हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि इससे बालों का सफेद होना रोका जा सकता है या नहीं. शोधकर्ता टीम ने ब्रिटेन के ब्रैडफोर्ड विश्वविद्यालय और जर्मनी के ग्रीफ्सवाल्ड विश्वविद्यालय में सफेद दाग की समस्या से ग्रसित मरीजों पर अपने इलाज को आजमाया. प्राकृतिक पिगमेंट मेलेनिन की कमी के कारण त्वचा पर सफेद दाग उभरते हैं. शोधकर्ताओं ने पाया कि उनकी दवा मॉडिफाइड स्यूडोकैटालेस के इस्तेमाल से मरीजों की त्वचा और पलकों का प्राकृतिक रंग लौट आया. फासेब जर्नल के एडिटर इन चीफ़ गेराल्ड वीसमैन ने कहा सफेद बालों को छिपाने से लिए पीढ़ियों से कई नुस्खों को आजमाया जा रहा है लेकिन पहली बार ऐसी दवा बनी है जो कि समस्या के जड़ तक पहुंचती है. उन्होंने कहा ये उत्साहित करने वाली ख़बर है. इससे भी ज़्यादा उत्साहजनक बात ये है कि ये दवा सफेद दाग में भी कारगर है. इस बीमारी के प्रभावी इलाज से कई लोगों के जीवन में खुशियां लाई जा सकेंगी. |
| DATE: 2013-05-08 |
| LABEL: science |
| [431] TITLE: कब टपकेगी तारकोल की नौंवी बूंद |
| CONTENT: आस्ट्रेलिया के ब्रिसवेन की क्वींसलैंड विश्वविद्यालय में 1927 से एक प्रयोग जारी है. इसका मकसद तारकोल के गाढ़ेपन का पता लगाना है. प्रोफ़ेसर थॉमस परनेल ने 1927 में अपने छात्रों का यह दिखाने के लिए यह प्रयोग शुरू किया था कि कुछ पदार्थ जो हमें ठोस के रूप में दिखाई देते हैं वास्तव में वे गाढ़े पदार्थ होते हैं. उनमें कुछ असाधारण गुण होते हैं. इसके लिए उन्होंने एक कीप में गरम तारकोल भरा. तीन साल तक तारकोल को कीप में जमने दिया गया. इसके बाद 1930 में उसकी सील हटा दी गई और तारकोल को बहने के लिए छोड़ दिया गया. उस समय से लेकर आज तक तारकोल से केवल आठ बूंदें ही टपकी हैं. लेकिन इन बूंदों को टपकते हुए आज तक किसी ने नहीं देखा है. माना जा रहा है कि इसकी नौंवीं बूंद इस साल टपक सकती है. नौंवीं बूंद को टपकते हुए देखने के लिए आम लोगों और वैज्ञानिकों में काफी उत्सुकुता है. कोई भी इस क्षण को छोड़ना नहीं चाहता है. इसे रिकॉर्ड करने के लिए कैमरे लगाए गए हैं. पिछले आठ दशकों में ऐसा पहली बार होगा जब टपकती बूंद को कोई देख पाएगा. इस प्रयोग के उपकरण क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के गणित और भौतिक विज्ञान विभाग की लॉबी में रखे गए हैं. यह डिब्बे में बंद किसी भी अन्य तरल पदार्थ की तरह बूंद-बूंद टपक रहा है. लेकिन इसे बूंद की जगह थक्का कहना ज्यादा उचित होगा. इस प्रयोग की देखरेख कर रहे भौतिकविज्ञानी प्रोफ़ेसर जॉन मेनस्टन ने बीबीसी को बतायामैंने इसकी कुछ बूंदों को तो देखा है. लेकिन किसी को टपकते नहीं देखा है. उन्होंने कहाअगर आपने पलक भी झपकाई तो आप इसे देखने से वंचित रह जाएंगे. हर 10-12 साल में इसकी एक बूंद एक सेकेंड से भी कम समय में टपक जाती है. इस प्रयोग के इतने साल तक जारी रहने के सवाल पर वैज्ञानिकों की प्रतिक्रिया सामान्य है वे कहते हैं अगर आप कुछ असामान्य देखते हैं आप उसके बारे में और अधिक जानना चाहते हैं. हालांकि जो संभावित है वह आठ बार पहले भी हो चुका है. अब कोलतार भी लोगों के लिए अनजान नहीं रह गया है. नौंवीं बूंद के टपकने को रिकॉर्ड करने के लिए कैमरे लगाए गए हैं. इसके सजीव प्रसारण की व्यवस्था है. लेकिन कभी-कभी यह पर्याप्त नहीं होता है. जब इस प्रयोग में आठवीं बूंद टपकी तो प्रोफ़ेसर जॉन मेनस्टन लंदन में थे. इस दौरान उन्हें तीन ई-मेल मिले. पहले में कहा गया था लगता है कि यह होगा. दूसरे में कहा गया था माफ करना बूंद टपक गई. इसके जवाब में मैंने कहा जब आप इसे डीजिटल मेमोरी में देखें तो परेशान न हों. तीसरे ईमेल में कहा गया. नहीं आप ऐसा नहीं कर सकते तंत्र ने हमें विफल कर दिया. यह साल 2000 के नवंबर था जब यह घटना हुई. प्रोफ़ेसर मेनस्टन तबसे इस घड़ी का इंतजार कर रहे हैं. वे कहते हैं मैं 78 साल का हो चुका हूं और दसवीं बूंद दस साल से पहले नहीं टपकेगी. इसलिए यह मेरे लिए बूंद को टपकते देखने का आखिरी मौका हो सकता है. बीसवीं सदी के शुरुआत तक तारकोल का उपयोग लकड़ी से बनी नावों को रंगने के लिए किया जाता था. यह इतना कठोर होता है कि इसे हथौड़े से तोड़ा जाता है. वैज्ञानिकों की गणना के मुताबिक तारकोल पानी की तुलना में 230 अरब अधिक गाढ़ा होता है और ठोस की तरह दिखता है. |
| DATE: 2013-05-07 |
| LABEL: science |
| [432] TITLE: क्या ज़िंदग़ी बदल देगा गूगल का चश्मा? |
| CONTENT: गूगल की बहुप्रतीक्षित स्मार्ट ग्लासेज परियोजना के बारे में तकनीकी दुनिया में पिछले कई महीनों से तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं कि आखिरकार ये ग्लास कैसे होंगे और क्या ये अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे. दुनियाभर में लगभग 1000 विशेषज्ञ इसके प्रोटोटाइप का परीक्षण कर रहे हैं और इनके अगले साल बिक्री के लिए उपलब्ध होने की उम्मीद है. कुछ विशेषज्ञ इसे डिजिटल दुनिया में अगला कदम मानते हैं तो बाकी नेटवर्क से इतनी नजदीकी को भयावह मानते हैं. बीबीसी ने उन लोगों के विचार जाने जो ये ग्लास आजमा चुके हैं और उनसे जानने की कोशिश की कि वे स्मार्ट ग्लासेज का क्या भविष्य देखते हैं. मैं अमरीका के पश्चिमी तट पर ये ग्लास पहनने वाला पहला आदमी था. मैं पिछले कई हफ्तों से ये ग्लास पहन रहा हूं लेकिन अब भी इसे इस्तेमाल करने के बारे में बहुत कुछ सीखना बाकी है. पहली बात जो मेरे दिमाग में आई वो ये थी कि ग्लास को पहनने से पहले जो बातें हमारे दिमाग में थी उनका कोई मतलब नहीं था. ये ग्लास अलग तरह का है और इसे सिर्फ नया कहना पर्याप्त नहीं है. व्यक्तिगत तौर पर मैं इतने कम समय में इतने अधिक लोगों से पहले कभी नहीं मिला. लोग इसे लेकर उत्सुक हैं. वे जानना चाहते हैं कि ये क्या चीज है और इसका भविष्य क्या है. इस ग्लास से मेरा वास्ता तकनीकी था. मैं गैर पेशेवर फोटोग्राफर हूं और मुझे ये ग्लास कोई बहुत ज्यादा अलग नहीं लग रहा है. बल्कि इसे इस्तेमाल करना आसान है. मैं आसानी से फोन कॉल्स उठा सकता हूं कैमरे से तस्वीर ले सकता हूं और ईमेल चेक कर सकता हूं. ये ऑफिस में कम्प्यूटर पर काम करने जैसा नहीं है. मैं चाहता हूं कि भविष्य में ये मेरा काम आसान बनाए. जैसे मैं अपने कम्प्यूटर पर टास्क मैनेजमेंट सिस्टम का इस्तेमाल करता हूं तो क्या मैं ग्लास पर ऐसा ऐप विकसित कर सकता हूं जिससे मेरा काम आसान हो जाए क्या मैं काम करते समय अपने किसी साथी की मदद कर सकता हूं क्या मैं दूर रह रहे अपने परिजनों को अपनी जिंदगी के करीब ला सकता हूं मुझे पता नहीं है कि इसकी परिणति क्या होगी लेकिन मैं इतना जानता हूं कि ये बेहद दिलचस्प होगा. गूगल ग्लास को 2013 के अंत तक बिक्री के लिए तैयार होना है लेकिन मुझे अब भी इस पूरी परियोजना की सफलता पर संदेह है. जो लोग गूगल ग्लास को लेकर उत्साहित हैं उनमें से अधिकांश मोबाइल डेवाइस के गुलाम हैं. ये ऐसे लोग हैं जो हर टेक्स्ट मैसेज का जवाब देना और हर ईमेल को पढ़ना जरूरी मानते हैं. उन्हें लगता है कि गूगल ग्लास ऐसा डेवाइस है जिसका निर्माण उनके लिए स्वर्ग में हुआ है. सौभाग्य की बात ये है कि ऐसे लोगों की संख्या सीमित है. मेरे विचार से गूगल ग्लास एक भयावह रेसिपी की तरह है जो ऐसे लोगों की संख्या बढ़ा देगी जो सार्वजनिक स्थानों पर खुद से ही बातें करते रहते हैं. मेरा मतलब ऐसे लोगों से है जो दुनिया से बेखबर अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं लेकिन दूसरों का जीना दूभर कर देते हैं. मुझे गलत मत समझिए. मेरा मानना है कि भविष्य में गूगल ग्लास का इस्तेमाल आम हो जाएगा. मुझे नहीं लगता है कि हर कोई रोजाना ऐसे ग्लास पहनेगा. कम से कम तब तक तो नहीं जब तक कोई मुझे ये समझा नहीं देता कि हमें ऐसा क्यों करना चाहिए. हर ऑनलाइन सर्विस की तरह गूगल की भी कोशिश यही है कि हम खुद को गूगल का उपभोक्ता समझें. लेकिन असल में हम गूगल के उत्पाद हैं. गूगल के उपभोक्ता ही उसका विज्ञापन करते हैं और इसी से कंपनी को 96 प्रतिशत राजस्व मिलता है. हम गूगल की मुफ्त सेवाएं लेते हैं और अगर हम ऐसा नहीं करना चाहें तो हम कोई दूसरी सर्विस ले सकते हैं. गूगल ग्लास में भी डेटा कलेक्शन का एक जरिया हैं. एक सेकेंड के लिए भी इस मुगालते में मत रहिए कि आपके गूगल ग्लास में जो डेटा है उस पर आपका नियंत्रण है. आपके साथ सफर कर रहा आदमी अब कोई मुसाफिर नहीं है बल्कि वो गूगल एजेंट है. इसके सामने सीसीटीवी कैमरा बेहद मामूली नज़र आता है. गूगल एजेंट जो कुछ देखेगा गूगल उसे देख सकता है और उसका इस्तेमाल कर सकता है. उसके बाद क्या होगा कौन जानेपिछले 20 सालों से मैं हेड अप डिस्प्ले वाला कम्प्यूटर इस्तेमाल कर रहा हूं और ये मेरे दैनिक जीवन में काफी उपयोगी रहा है. मेरी रिसर्च टीम ने यूजर्स की कम्युनिटीज बनाई हैं जहां हम ऐसे डेवाइसेज के सामाजिक और दूसरे पहलुओं पर चर्चा करते हैं. हमने पाया कि हेड अप डिस्प्ले का इस्तेमाल करते समय कोई व्यक्ति अपने आस-पास हो रही घटनाओं पर भी ध्यान दे सकता है जबकि लैपटॉप और मोबाइल फोन स्क्रीन के साथ ऐसा नहीं है. इसे एक्सेस करने में दो सेकेंड से भी कम समय लगता है और आप किसी भी स्थिति में अहम सूचना हासिल कर सकते हैं. भविष्य में ये तकनीक हमारी जीवन में भारी बदलाव लाएगी और हमें डेस्कटॉप जैसे डेवाइस से मुक्ति दिलाएगी. |
| DATE: 2013-05-07 |
| LABEL: science |
| [433] TITLE: अब अमरीकी सैनिकों के पास भी होगा एंड्रॉयड फोन |
| CONTENT: अमरीका के रक्षा मंत्रालय ने सैनिकों के लिए एंड्रॉयड सैमसंग फोन के सुरक्षित संस्करण के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है. इस मंजूरी के साथ ही अमरीकी सैनिकों के लिए अलग-अलग तरह के मोबाइल उपकरणों के इस्तेमाल किए जाने की प्रक्रिया की शुरुआत हो गई है. उम्मीद जताई जा रही है कि एप्पल फोन और टेबलेट जैसे अन्य एंड्रॉयड आधारित उपकरणों के इस्तेमाल को मई के अंत मंज़ूरी मिल जाएगी. अब से पहले ब्लैकबेरी ही एक मात्र ऐसी फोन निर्माता कंपनी थी जिसके उत्पादों का इस्तेमाल अमरीकी सेवा कर्मियों के लिए किया जाता था. अमरीकी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल डेमियन पिकार्ट ने बताया कि इस फोन के इस्तेमाल को मंज़ूरी मिल जाने से सैनिक ड्यूटी दौरे के दौरान स्मार्टफोन और टेबलेट जैसे आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल कर सकेंगें. सैंमसंग को मंजूरी दिया जाना तो इस रणनीति का पहला कदम है. प्रवक्ता का ये भी कहना है कि इसका मतलब उपकरणों की खरीद के लिए आर्डर देना नही है. इसके मायने ये हैं कि रक्षा मंत्रालय के भीतर काम कर रहे अलग अलग विभाग अब अपनी ज़रुरत के हिसाब से उपयुक्त संचार उपकरण को खरीद सकेंगे. कर्नल डेमियन पिकार्ट का कहना है कि अमरीकी रक्षा मंत्रालय में लगभग छह लाख स्मार्टफोन उपभोक्ता हैं और इनमें से चार लाख 70 हज़ार कर्मचारी ब्लैकबेरी हैंडसेट का इस्तेमाल कर रहे हैं. अमरीका की फेडरल न्यूज़ रेडियो की एक रिपोर्ट के मुताबिक दूसरे हैंडसेट निर्माताओं को मंज़ूरी दिया जाना 2014 तक अमरीकी सशस्त्र बलों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सुरक्षित उपकरणों की संख्या के दोगुना करने की योजना के तहत ही है. अब से पहले अमरीका के सेना में ब्लैकबेरी हैंडसेट का ही वर्चस्व रहा है क्योंकि ये फोन ही विभाग के कड़े सुरक्षा मानदंडो पर खरा उतरने में कामयाब रहा है. अब एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम पर काम करने वाला सैमसंग फोन सुरक्षा मानदंडों पर खरा उतरा है. इस समय एप्पल IOS 6 ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ ही अन्य एंड्रॉयड प्रणाली पर चलने वाले फोन रक्षा सूचना प्रणाली एजेंसी द्वारा परीक्षण के दौर से गुजर रहे हैं और उम्मीद है कि इस महीने के अंत उन्हें भी स्वीकृत मिल सकती है. |
| DATE: 2013-05-06 |
| LABEL: science |
| [434] TITLE: पेटू होना कहीं आपकी मजबूरी तो नहीं |
| CONTENT: ज्यादा खाने की लत वैश्विक स्तर पर मोटापा बढ़ा रही है. इस बारे में वैज्ञानिकों के बीच काफी मतभेद है. कुछ लोगों का मानना है कि खाने की लत जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं है. यह गुत्थी सुलझाने के लिए शोध हो रहे हैं कि क्या ज्यादा खाने की लत जैसी कोई चीज़ होती भी है या नहीं और अगर होती है तो इसका उपचार क्या है शराब सिगरेट और कैफीन का सेवन करने वाले बताते हैं कि किसी लत पर काबू पाना आसान नहीं होता है. किसी तरह की लत से छुटकारा पाने का एक जांचा-परखा तरीका है कि नशे वाली वस्तु के सेवन से बचना. जैसे शराब पीने वाले पब में जाने और सिगरेट पीने वाले घर में इसके इस्तेमाल से बचते हैं. लेकिन इस तरह के उपायों को आजमाने में लोगों को काफी दिक्कत होती है और वे बार-बार विफल होते हैं. अगर आपको जिस चीज़ की लत है वह सहजता से आपके घर में उपलब्ध है तो आप क्या करेंगे मसलन खाने-पीने की वस्तुएं. ऐसी स्थिति में खाने से दूर रहना संभव नहीं होता. वैश्विक स्तर पर मोटापे की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है इसलिए वैज्ञानिक मोटापे और खाने की लत के बीच रिश्ते की पड़ताल कर रहे हैं यूरोपीय यूनियन इस तरह के न्यूरो फास्ट नाम के प्रोजेक्ट को आर्थिक मदद दे रही है. इसमें कोशिश हो रही है कि सारे साक्ष्यों को एकसाथ जुटाकर उनके विश्लेषण से कोई निष्कर्ष निकाला जा सके. अभी तक केवल एक तरह के खाने का विकार शोध में सामने आया है जिसमें बार-बार खाना एक लत का रुप ले लेता है. जिसका साइड एफेक्ट मोटापे के रुप में सामने आता है. वैज्ञानिक ज्यादा खाने और इसकी लत के बीच किसी तरह का रिश्ता होने की बात से साफ तौर पर इंकार करते हैं. लेकिन कुछ वैज्ञानिक चॉकलेट खाने की लत के साथ जोड़कर अपनी बात को साबित करने का प्रयास करते हैं जो किसी अन्य लत के समान हमें शारीरिक और मनोवैज्ञानिक नुकसान पहुंचाती है. शोधकर्ता ने अपनी टीम के एक सदस्य माइकल से पूछा तो उन्होंने बताया मोटापे का कारण समझना काफी कठिन है. हर कोई ज्यादा खाता है और वे सोचते हैं कि बस थोड़ा सा ज्यादा खा रहे हैं. दिन में हर मिनट पर कुछ न कुछ खाते रहना बेहद अलग तरीके का अनुभव है. शोध करने वाली टीम की एक अन्य सदस्य लुइस ने खाने की आदतों के बारे में काफी रोचक जानकारी दी. उन्होंने बताया कि किसी लत के शिकार लोगों के व्यवहार में काफी समानताएं होती हैं. लुइस के अनुसार एक शराबी अपनी पहचान छिपाने के लिए अलग-अलग दुकानों से शराब खरीदता है. उसी तरह मैं भी चॉकलेट के लिए दुकानें बदलती हूं. घरों में शराबी शराब छिपाते हैं उसी तरह से चॉकलेट के लती लोग चॉकलेट छिपाने की कोशिश करते हैं. डॉक्टर नोरा वोल्को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ड्रग एब्यूज की प्रमुख और प्रसिद्ध न्यूरोसाइंटिस्ट हैं. उनका मानना है माइकल और लुइस जो बात कह रही हैं दरअसल वह एक जैविक प्रक्रिया है. उन्होनें शोध में पाया डोपामाइन नाम का एक न्यूरो ट्रांसमीटर खाने की लत को बढ़ाना देता है. यह मस्तिष्क में ड्रग की लत के समान काम करता है. जो खाने की लत के मौजूदगी की पुष्टि करता है. किसी चीज़ की लत छुड़ाने के दौरान कोशिश होती है कि या तो व्यक्ति पूरी तरह से लत छुटकारा पा जाए या फिर उससे होने वाला नुकसान कम हो जाए. शोधकर्ता यह भी कहते हैं कि खाने से परहेज़ मुश्किल है लेकिन ज्यादा खाने से बचना संभव है. |
| DATE: 2013-05-06 |
| LABEL: science |
| [435] TITLE: दुनिया का सबसे नन्हा उड़नेवाला रोबोट |
| CONTENT: अमरीकी वैज्ञानिकों ने कीट के आकार का उड़ने वाला एक रोबोट बनाया है. यह रोबोट कीट की तरह फुर्तीला चालाक और तेज है. यह कीट रोबोट कार्बन फाइबर से बनाया गया है. इसका वजन एक ग्राम से भी कम है. अमरीकी वैज्ञानिकों द्वारा इज़ाद किए गए इस कीट रोबोट के पास ख़ास सुपर फास्ट इलेक्ट्रॉनिक मांसपेशियां हैं. ये मांसपेशियां इसके पंखों को गति और ताक़त देती हैं. इसको बनाने वाले हार्वर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह के नन्हें रोबोट का इस्तेमाल बचाव कार्यों के लिए बखूबी किया जा सकता है. उदाहरण के लिए ये कीट रोबोट ढही हुई इमारत के मलबों के बीच के छोटे-छोटे बेहद अंदरुनी हिस्सों में आ-जा सकते हैं. इस कीट रोबोट को बनाया है डॉक्टर रॉबर्ट वूड के नेतृत्व में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के डॉक्टर केविन मा और उनकी टीम ने. इस टीम का दावा है कि उन्होंने दुनिया का सबसे छोटा उड़ने वाला रोबोट बनाया है. वैज्ञानिकों के अनुसार कीट के आकार के इस रोबोट में कीट-पतंगों जैसी गजब की फुर्ती है. अपनी इसी फुर्ती के कारण ही यह किसी भी तरह के गंभीर प्रहार से आराम से बच निकलने में कामयाब हो जाता है. कीट रोबोट की ये चुस्ती काफी हद तक उसके पंखों की गति के कारण संभव हो पाती है. बेहद तीव्र गति से उड़ते हुए यह रोबोट अपनी उड़ान को संतुलित रख सकता है. हवा में मंडराने या दुश्मन की ओर से किए गए अचानक हमले से निपटने में इसके पंख इसकी मदद करते हैं. किसी भी जीते जागते कीट की तरह ही इस कीट रोबोट के पंख भी एक सेकेण्ड में 120 बार फड़फड़ाते हैं. शोधकर्ताओं ने पंख को गति देने के लिए पीजोइलेक्ट्रिक नाम के एक खास तरह का पदार्थ इस्तेमाल किया है. वोल्टेज देने पर यह फैलता-सिकुड़ता है. बहुत तेजी से वोल्टेज घटाने-बढ़ाने से यह वैसे ही काम करता है जैसे कोई कीट अपनी नन्हीं मांसपेशियों का इस्तेमाल करते हुए अपने पंखों को तेज़ी से फड़फड़ाता हैं. डॉक्टर मा बताते हैं हम किसी भी जैविक मांसपेशियों की ही तरह इसे फैला सकते हैं सिकोड़ सकते हैं. इस शोध का मुख्य लक्ष्य किसी उपयोगी रोबोट को बनाने से ज़्यादा यह समझना था कि कोई कीट किस तरह से उड़ता है. डॉक्टर ने आगे बताया कि इस तरह के उड़ने वाले रोबोट का इस्तेमाल कई तरीके से किया जा सकता है. उन्होंने बताया हम इस तरह के रोबोट का इस्तेमाल आपदा वाली स्थितियों में कर सकते हैं. जब कोई इमारत गिरती है तो हम उसके मलबों में दबे जिंदा लोगों का पता लगाने और उनको बचाने के लिए कीट रोबोट का उपयोग कर सकते हैं. इनका इस्तेमाल पर्यावरण की निगरानी के लिए भी किया जा सकता है. इन्हें रिहायशी इलाकों में खास रसायनों या अन्य कारकों का पता लगाने के लिए भेजा जा सकता है. डॉक्टर मा का तो यहां तक मानना है कि यह रोबोट किसी भी दूसरे कीट पतंगों की तरह फसलों के परागण में भी सहायक हो सकता है. वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के जीवविज्ञानी डॉक्टर जॉन डायर भी कीटों की उड़ान का अध्ययन करते हैं. उन्होंने भी माना है कि ये उड़ने वाले रोबोट इंजीनियरिंग का कमाल हैं. |
| DATE: 2013-05-04 |
| LABEL: science |
| [436] TITLE: क्या होती है साइबर बुलिंग और इससे कैसे बचें? |
| CONTENT: साइबर बुलिंग यानि गंदी भाषा तस्वीरों या धमकियों से इंटरनेट पर तंग करना आम होती जा रही इस समस्या से निपटने के तरीके जानने के लिए बीबीसी हिन्दी ने साइबर एक्सपर्ट्स के साथ फेसबुक चैट किया. अगर आप इससे ना जुड़ पाए हों तो पेश हैं क्रिमिनॉलॉजी के प्रोफेसर के जयशंकर और वकील देबरती हलदर की ओर से दिए गए ये जवाब. फेसबुक पर बहुत से पेज ऐसे हैं जिनपर सभी धर्मों और उनके देवी-देवताओं पर अशोभनीय कमेंट किए गए हैं उन्हें कैसे रोका जा सकता है. भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत कोई भी व्यक्ति किसी धर्म के बारे में आहत करने वाली टिप्पणी नहीं कर सकता. ये कानून दंगों को ध्यान में रखते हुए बना था. ऐसी टिप्पणियों के लिए उपाय ये है कि ऐसे कमेंट्स के आने पर पुलिस को जानकारी दी जानी चाहिए. ऐसे कई मामले हैं जहां लोग पुलिस के पास गए हैं और शिकायत दर्ज की गई है. फेसबुक पर भी रिपोर्ट अब्यूज़ पर जाकर रिपोर्ट किया जा सकता है. लेकिन मामला अत्यंत गंभीर हो तो पुलिस के पास जाना चाहिए. अगर किसी की प्रोफाइल पर ना लिखा हो तो उसकी लोकेशन कैसे जानेंप्रोफाइल लोकेशन का पता लगाने के लिए आपको भाषा पर ध्यान देना होता है कि कोई प्रोफाइल किस तरह की भाषा इस्तेमाल कर रहा हैं. चूंकि फेसबुक में आईपी एड्रेस नहीं खोजा जा सकता इसलिए वकील की मदद लेनी होगी. कोर्ट में केस फेसबुक के ख़िलाफ दायर होता है जो उन्हें मज़बूर करता है कि प्रोफाइल की असली लोकेशन बताई जाए. फेसबुक पर फेक आईडी चलाना आजकल आम बात हो गई है और उससे सही और ग़लत आदमी का पता लगा पाना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में क्या किया जाएफेक आईडी एक बड़ी समस्या है. फेक आईडी के ज़रिए सेक्स से जुड़े मैसेज भेजते हैं या फिर बहुत खराब भाषा का इस्तेमाल करते हुए धमकी भेजते हैं. जिसके नाम पर ये फेक आईडी हैं अगर आप उस आदमी को जानते हैं या वो आपका परिचित है तो उनसे बात करनी चाहिए और फेसबुक से फेक आईडी की रिपोर्ट की जानी चाहिए. जिसके नाम से फेक आईडी बना है उसकी पुलिस से शिकायत करनी चाहिए. अगर कोई साइबर बुलिंग करे तो क्या करना चाहिएसाइबर बुलिंग से निपटने के दो तरह के विकल्प हैं. कानून की मदद से और निजी स्तर पर. अगर किसी फोरम पर कोई आपको तंग कर रहा है तो उस फोरम से निकल जाइए. अगर फिर भी आपको तंग किया जाए तो फेसबुक को रिपोर्ट करें हालांकि फेसबुक इस पर कोई एक्शन नहीं लेता. अगर धमकी मिले जैसा कि कविता कृष्णन और मीना कंडासामी को मिली तो इस पर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की जानी चाहिए. अगर पुलिस एक्शन न ले तो सीधे वकील के ज़रिए केस दायर किया जा सकता है. महिलाओं के साथ अगर बुलिंग हो तो वो कानून में किन धाराओं का सहारा ले सकती हैं. पहला तो सेक्शन 509 कहता है कि शब्द या गतिविधि या संकेत अगर महिलाओं की मॉडेस्टी को भंग करता है तो इसके खिलाफ मामला दर्ज हो सकता है. ये बुलिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्दों पर भी लागू होता है. क्योंकि महिलाओं के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल अपराध है. सेक्शन 66 ए का क्लाज़ बी बुलिंग के लिए ठीक बैठता है. ये कानून इंटरनेट से जुड़े क़ानूनों का हिस्सा है. इनमें तीन साल तक की सज़ा होती है. कई बार पुलिस को इन कानूनों के बारे में पता नहीं होता है. ऐसे में प्रिंटआउट लेकर जाएं और उन्हें दिखाएं. कई बार साइबर प्रोपेगैंडा के मक़सद से किसी इंसान के प्रति गलत अफवाहों को फेसबुक या अन्य सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर फैलाया जाता है. ऐसे मामलों में जब उस संदेश को फेसबुक को रिपोर्ट एब्यूज़ करके भेजा जाता है तो जवाब आता है कि हमारे मापदंडों के आधार पर कुछ भी गलत नहीं पाया गया. ऐसे मामलों को कैसे निपटा जाएफेसबुक ऐसी टिप्पणियों को तवज्जो इसलिए नहीं देता है क्योंकि फेसबुक पर अमरीकी कानून लागू होता है. लेकिन भारतीय कानून के अनुसार ऐसे मामलों में मानहानि का मामला बनता है. सीधे पुलिस में शिकायत होनी चाहिए. इसमें सूचना प्रसारण का कानून भी लग सकता है. ऐसे मामले में दोनों कानून साथ साथ चलेंगे. मेरी दोस्त पूजा को एक लड़का गंदे संदेश और गालियां लिखकर भेजता है इस समस्या से कैसे निपटेंये संभवत लड़की को परेशान करने का मामला है. पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की जानी चाहिए. पूजा को अपना फेसबुक डिऐक्टिवेट करना चाहिए लेकिन इसके अलावा प्राइवेसी सेटिंग्स में जाकर बदलाव करें ताकि मेसेज भेजने वाले आपको ऐसे संदेश न भेज पाएं. अगर गंदे संदेश भेजने वाला आदमी आपके फ्रेंड लिस्ट में है तो उसे ब्लॉक किया जा सकता है ताकि वो संदेश न भेज पाए. आप लोग सागरिका घोष के मामले को इतना तूल क्यों दे रहे हैं सागरिका कविता और मीना कंडासामी के जो मामले हैं वो प्रकाश में आए हैं. यह सब बड़ी हस्तियों के साथ हुआ और इन्होंने आवाज़ उठाई तो इनके बारे में पता चला है. हमारे साइबर सेल में कई महिलाओं ने शिकायत की है कि फेक आईडी के ज़रिए पोर्न वेबसाइट पर उनके नाम डाले गए हैं गालियां दी गई हैं. मैं बीबीसी को धन्यवाद देती हूं कि इनके ज़रिए ये महिलाएं सामने आईँ और अन्य पीड़ित महिलाओं को हौंसला दिया कि वो अकेली नहीं हैं. फेसबुक पर अगर कोई ज़बरदस्ती दोस्त बनना चाहे तो उसे ब्लॉक करने के सिवाय और क्या विकल्प हो सकता हैं आप उस प्रोफाइल को रिपोर्ट कर सकते हैं लेकिन ब्लॉक कर देने पर वो आपको देख नहीं पाएगा तो फिर वो आपको दोस्त बनाने की कोई कोशिश कर ही नहीं पाएगा. फेसबुक से शिकायत भी कर सकते हैं कि ये प्रोफाइल आपको परेशान कर सकता है. जब कोई बीबीसी के पन्ने पर गालियां देता है तो बीबीसी उनके विरुद्ध ऐक्शन क्यों नहीं लेता जब लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ ही चुप रहेगा तो इससे गंदी मानसिकता के लोगों को बढ़ावा नहीं मिलेगाइस पन्ने के ज़रिए हमने एक समुदाय बनाया है जहां स्वस्थ बहस हो सके और इसे इस्तेमाल करने वाले लोग भी इसकी ज़िम्मेदारी लें. हम बहसों पर नज़र रखते हैं दिन में एक से दो बार मॉडरेट करते हैं. हमने लोगों को चेतावनी भी दी हैं और अगर चेतावनी के बाद भी अगर किसी ने गलत भाषा जारी रखी है तो हमने ऐसे लोगों को ब्लॉक भी किया हैं. |
| DATE: 2013-05-03 |
| LABEL: science |
| [437] TITLE: आईबीएम की फ़िल्म में 'एटम की ऐक्टिंग' |
| CONTENT: आईबीएम के शोधकर्ताओं ने ताँबे की सतह पर परमाणुओं को कुशलतापूर्वक नियंत्रित करके दुनिया की सबसे छोटी फिल्म तैयार की है. इसके लिए स्टॉप मोशन एनिमेशन ने कार्बन के कुछ परमाणुओं का इस्तेमाल किया. उन्हें एक पतले सिरे के साथ घुमाया गया जिसे स्कैनिंग टनलिंग माइक्रोस्कोप एसटीएम कहते हैं. इंसान के एक बाल के बराबर फैलाव के लिए फिल्म में 1000 से ज्यादा फ्रेम का इस्तेमाल किया गया. परमाणुओं के इस असाधारण करतब को गिनिज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने प्रमाणित किया है. यह आईबीएम के प्रयासों का एक उदाहरण है जिसके तहत वह एकल परमाणुओं पर आधारित अगली पीढ़ी के डेटा स्टोरेज समाधान तैयार कर रहा है. आईबीएम के वैज्ञानिकों ने कई ऐसी तकनीक तैयार की हैं जिनका इस्तेमाल परमाणु या आणविक प्रणाली में किया जा सकता है. इन्हीं कोशिशों के क्रम में उन्होंने एटॉमिक फोर्स माइक्रोस्कोप नाम की मशीन का इस्तेमाल करते हुए एकल अणुओं की तस्वीर तैयार की. इतना ही नहीं वे अणुओं के बीच परमाणु बांड की तस्वीर लेने में कामयाब रहे. नई फिल्म का शीर्षक ए ब्वॉय एंड हिज एटम है और इसमें आईबीएम के आविष्कार एसटीएम का इस्तेमाल किया गया है जिसके वैज्ञानिक को 1986 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था. यह डिवाइस चमत्कारिक रूप से सतह पर नुकीली धातु की सुई पर विद्युत आवेश के प्रवाहित होने के जरिए काम करती है. क्वांटम भौतिकी प्रभाव टनेलिंग में सतह पर नोंक के बीच अंतर के कारण आवेश अंतर के बीच छलांग लगा सकता है. 90 सेकेंड की इस फिल्म के 242 फ्रेम दरअसल परमाणुओं की दी गई एक व्यवस्था के साथ इस टनलिंग करेंट का मानचित्र है. इसमें एक लड़के को गेंद से खेलते हुए दिखाया गया है जो दरअसल एक परमाणु से बना है और ट्रैम्पोलाइन पर नाच रहा है. इस कवायद को पूरा करने में चार वैज्ञानिकों को दो सप्ताह लगे और इसे यू-ट्यूब वीडियो के जरिए समझाया गया है. उन्होंने बताया कि वास्तव में यह कोशिश किसी खास वैज्ञानिक खोज के लिए नहीं थी. यह फिल्म बच्चों और अन्य लोगों में गणित विज्ञान और तकनीक के बारे में कौतुहल पैदा करने के लिए है. |
| DATE: 2013-05-01 |
| LABEL: science |
| [438] TITLE: शनि पर भयानक तूफान की तस्वीरें |
| CONTENT: सौरमंडल के दूसरे सबसे बड़े ग्रह शनि के उत्तरी ध्रुव पर एक भयानक तूफान उमड़ रहा है. यह इतना बड़ा है कि इसकी सीमा में 12 से अधिक ब्रिटेन समा सकते हैं. इस तूफान की तस्वीरें खींची है कासिनी नाम के अंतरिक्ष यान ने जो 2004 में यहां पहुंचा था. तस्वीरें 4 लाख 20 हजार किलोमीटर की ऊंचाई से खींची गई हैं. तस्वीरें लाल और खून के रंग की हैं. हालांकि इससे तूफान के असली रंग का पता नहीं चलता. वैज्ञानिकों का कहना है कि तूफान की गति 330 किलोमीटर प्रति घंटे की है. हालांकि वो ये नहीं बताते कि तूफान कब से चल रहा है. कासिनी जब पहली बार शनि ग्रह में पहुँचा था तो वहां पर अंधेरा था. उस वक्त शनि में सर्दी का मौसम चल रहा था. ये पहली बार है जब दिन के उजाले में शनि ग्रह के उत्तरी ध्रुव की तस्वीरें भेजी गई हैं. इससे पहले आखिरी बार 1981 में वोयजर-2 नाम के अंतरिक्ष यान ने तस्वीरें भेजी थीं. कासिनी आंतरिक्ष यान की टीम के एक सदस्य एंड्रू इंगरसोल ने कहा जब हमें ये भंवर दिखाई पड़ा तो हमने इसकी दोबारा तस्वीरें लीं. ये बहुत कुछ धरती पर आने वाले तूफान के जैसा है. हालांकि ये शनि ग्रह में है और इसका दायरा बहुत बड़ा है. किसी तरह से इसे शनि के वातापरण में मौजूद हाइड्रोजन से थो़ड़ा बहुत पानी भी मिल जा रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि तूफान ध्रुव तक सीमित रहेगा क्योंकि इसे हवाओं ने उत्तर की तरफ धकेल दिया है. ये वैसे हुआ है जैसे कि धरती पर होता है. इससे पहले भी कासिनी 2006 में भी किसी दूसरे ग्रह में आए तूफान की तस्वीर खींच चुका है. |
| DATE: 2013-05-01 |
| LABEL: science |
| [439] TITLE: क्या मछलियों को सिखाई जा सकती है गिनती? |
| CONTENT: क्या केवल इंसान ही गिनती कर सकता है या दूसरे प्राणी भी ऐसा करने में सक्षम हैं वैज्ञानिकों की मानें तो नवजात मछलियां न केवल गिनती कर सकती हैं बल्कि वे उन्हें बेहतर ढंग से गिनती करना सिखाया जा सकता है. इटली में पाडोवा विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिकों की एक टीम की ये खोज भले ही पहली नज़र में बेतुकी लगती हो लेकिन इससे ये दिलचस्प सवाल पैदा होता है कि हम लोगों जानवरों या चीजों को देखकर कैसे उनकी संख्या का अनुमान लगाते हैं. माना जाता है कि मनुष्यों में गिनती करने की क्षमता जन्मजात होती है. लेकिन अनुसंधानों से ये बात साबित हो चुकी है कि इंसान के अलावा कुछ दूसरे प्राणी भी हैं जो कम और ज्यादा के भेद को समझते हैं यानि उनके लिए दस चीजें सौ के बराबर नहीं हैं. जंगल में इसका बड़ा महत्व है. उदाहरण के लिए जानवरों को ये समझने की जरूरत होती है कि भोजन के दो स्रोतों में से कौन बड़ा है या फिर साथियों का कौन सा समूह बड़ा है ताकि उसमें शामिल होकर शिकार बनने की संभावना कम की जा सके. लेकिन दो समूहों के छोटा बड़ा होने में भेद करना और हर समूह के सदस्यों की गिनती करना दोनों में अंतर है. एक धारणा ये है कि प्राणी छोटे समूहों के लिए गिनती का इस्तेमाल करते हैं और बड़े समूहों के लिए आनुपातिक प्रणाली अपनाते हैं. इसी आधार पर कुछ मछलियां चार की संख्या तक तो गिनती करती हैं लेकिन उसके आगे आनुपातिक व्यवस्था पर आ जाती हैं. मछलियां भी बच्चों की तरह उम्र बढ़ने के साथ-साथ गिनती करना सीखती हैं. नवजात मछलियां एक या दो और यहां तक कि तीन या चार में भेद कर सकती हैं. लेकिन उनमें चार और आठ में भेद करने की क्षमता 20 से 40 दिन के भीतर विकसित होती है. इस तरह नवजात मछलियों में चार तक की गिनती करने की क्षमता जन्मजात होती है लेकिन आनुपातिक प्रणाली वे उम्र बढ़ने से साथ सीखती हैं. लेकिन सवाल उठता है कि मछलियों को गणित कैसे सिखाया जाए इसका सीधा उत्तर ये है कि इनाम के तौर पर उन्हें खाने की पेशकश की जाए. अनुसंधानकर्ताओं ने मछलियों को एक आयताकार टैंक में रखा और हर छोर पर बिंदु बनाए. जिस छोर पर सबसे ज्यादा बिंदु बनाए गए वहां भोजन रखा गया. दो नंबरों में भेद करने की मछलियों की क्षमता को इस बात से आंका जा सकता है कि वे हर छोर पर कितना समय गुजारती हैं. नवजात मछलियां सात और 14 बिंदुओं में भेद नहीं कर सकीं लेकिन 20 बार अभ्यास के बाद वे इसमें माहिर हो गईं. इससे इस बात की भी संभावना प्रबल हो जाती हैं कि मनुष्य के बच्चों में भी ऐसी छिपी प्रतिभा हो सकती है. |
| DATE: 2013-05-01 |
| LABEL: science |
| [440] TITLE: मलेरिया के इस जीवाणु से कैसे बचें किसी को नहीं पता |
| CONTENT: वैज्ञानिकों ने मलेरिया के ऐसे परजीवी का पता लगाया है जिस पर मलेरिया की सबसे कारगर दवा का भी असर नहीं होता. मलेरिया की सबसे कारगर दवा है आर्टीमिसिनिन है जिसका प्रयोग पूरी दुनिया में किया जाता है. परजीवियों की ये प्रजाति पाई गई है कंबोडिया के पश्चिमी इलाको में. वैज्ञानिकों का कहना है कि मलेरिया के जीवाणुओं की ये प्रजाति दुनिया मे पाई जाने वाली दूसरी प्रजातियों से अनुवांशिक रूप से अलग है. पहली बार इस इलाके में मलेरिया की दवाओं के असर न होने की घटना 2008 में सामने आई थी. इसके बाद से ये समस्या दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे हिस्सों में भी फैल गई है. इस खोज से संबंधित अध्ययन को नेचर जेनेटिक्स में प्रकाशित किया गया है. इसके प्रमुख शोधकर्ता ऑक्सफ़ोर्ड विश्विद्यालय के डॉक्टर ओलियो मियोतो का कहना है पिछले कुछ दशकों में मलेरिया की जो भी सबसे असरदायक दवाइयां हमारे पास थीं वो सब एक के बाद एक बेअसर साबित होती जा रही हैं. मलेरिया के जीवाणुओं में दवाओं के लिए प्रतिरोध विकसित करने की गजब की क्षमता है. लेकिन आर्टीमिसिनिन अभी तक पूरा तो असर कर रही है. ये ऐसा हथियार है जिसे हमें बनाए रखने की जरूरत है. वैज्ञानिकों ने पश्चिमी कंबोडिया को मलेरिया के प्रतिरोधी जीवाणुओं के लिए हॉटस्पॉट घोषित किया है. हालांकि इसके पीछे वजह क्या है इसे वैज्ञानिक भी नहीं समझ पाए हैं. 1950 के बाद से ही इस इलाके में पाए जाने वाले मलेरिया के परजीवियों ने दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली थी. अब वैज्ञानिकों की चिंता है कि आर्टीमिसिनिन के साथ भी ऐसा ही होगा. इस दवाई का मच्छरों से होने वाली बीमारियों के खिलाफ़ पूरी दुनिया में इस्तेमाल किया जाता है. दूसरी दवाओं के साथ मिलाकर जब इसकी ख़ुराक मरीजों को दी जाती है तो ये कुछ ही दिनों में संक्रमण को खत्म कर सकती है. आगे के शोध के लिए वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में मलेरिया फैलाने वाले 800 प्रकार के जीवाणुओं के जीनोम को जमा किया है. जीनोम जीन के समूह को कहते हैं. डॉक्टर मियोतो का कहना है जब हमने कंबोडिया में पाए जाने वाले मच्छरों के डीएनए के साथ इनकी तुलना की तो पता चला कि उन मच्छरों ने एक अलग ही प्रजाति विकसित कर ली है जिसे हमने अभी तक नहीं देखा था. इस के बारे में शोध कर रही अंतर्राष्ट्रीय टीम ने पाया है कि इस इलाके में मच्छरों के तीन खास समूह हैं जिनमें दवाओं के लिए प्रतिरोधक क्षमता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि वो अभी तक ये नहीं समझ पाए हैं कि ऐसे कौन से अनुवांशिक परिवर्तन हुए हैं जिन्होंने परजीवियों को आर्टीमिसिनिन के खिलाफ़ प्रतिरोधी बना दिया है. हालांकि उनका ये भी कहना है कि इसकी अनुवांशिक संरचना ये समझने में मदद करेगी कि ये कहीं और तो नहीं फैल रहे हैं. डॉक्टर मियोतो कहते हैं इसके जरिए हम जीवाणुओं के अंदर प्रतिरोध विकसित होने के असली समय को समझ सकेंगे. इस पर विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इसका असली मकसद मलेरिया परजीवियों के अंदर दवाओं के लिए प्रतिरोधी क्षमता को विकसित होने से रोकना है. हालिया अनुमानों के मुताबिक 2010 में 21 करोड़ 90 लाख मलेरिया के मामले सामने आए थे. इसी साल मलेरिया की वजह से 6 लाख 60 हजार मौतें भी हुईं. अफ़्रीका मलेरिया से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला महाद्वीप है. मलेरिया से होने वाली 90 प्रतिशत मौतें यहीं होती हैं. |
| DATE: 2013-04-30 |
| LABEL: science |
| [441] TITLE: कमज़ोर नहीं, वीडियो गेम से ठीक होगी आंख |
| CONTENT: कनाडा के डॉक्टरों का कहना है कि उन्होंने सुस्त-आंख के इलाज का नया और मज़ेदार तरीका ढूंढ निकाला है- और यह है टेटरिस वीडियो गेम खेलना. मैकगिल विश्वविद्यालय के डॉक्टरों की टीम का कहना है कि एक बिल्डिंग के गिरते हुए टुकड़ों को एक लाइन में लगाए जाने वाले इस खेल से दोनों आंखों को साथ काम करना सिखाया जा सकता है. चिकित्सा की भाषा में एमब्लिओपिया कही जाने वाली सुस्त-आंख की समस्या पचास में से एक बच्चे को होती है. यह समस्या तब होती है जब एक आंख में दृष्टि का ठीक से विकास नहीं हो पाता. अक्सर इस आंखं में भेंगापन भी पाया जाता है. इलाज न कराए जाने पर कमज़ोर आंख की दृष्टि पूरी तरह जा सकती है. इसी वजह से डॉक्टर इस समस्या का जल्द से जल्द इलाज करवाने पर ज़ोर देते हैं. सामान्यतः डॉक्टर इसके इलाज के लिए ठीक आंख को ढक देते हैं और बच्चे को सुस्त-आंख से ही देखने को कहा जाता है. बच्चे को आंख कई महीने तक करीब-करीब पूरे दिन ढक कर रखना पड़ता है जिससे बच्चा हताश होने लगता है. एक छोटे से शोध में सुस्त आंख की दिक्कत से ग्रस्त 18 जवान लोगों को शामिल किया गया. डॉक्टरों के अनुसार आंख को ढकने के पारंपरिक तरीके के मुताबिक इससे बेहतर परिणाम हासिल हुए. अब शोधकर्ता इस तरीके को बच्चों पर भी आज़माना चाहते हैं. मांट्रियल में शोधकर्ता रॉबर्ट हेस और उनके साथी यह पता लगाने की कोशिश में थे कि क्या सुस्त आंख के इलाज के लिए और कोई तरीका कारगर हो सकता है. एक ख़ास किस्म के वीडियो चश्मे के साथ उन्होंने यह प्रयोग किया जिससे दोनों आंखें एक साथ काम कर सकें. एमब्लिओपिया के शिकार नौ वॉलंटियर्स को अगले दो हफ़्तों तक दिन में एक घंटे के लिए यह गॉगल्स पहनकर टेटरिस खेलने के लिए कहा गया. इस ख़ास चश्मे की एक आंख से उन्हें गेम के अंदर सिर्फ़ गिरते हुए बिल्डिंग के टुकड़े दिखते थे तो दूसरी आंख से ज़मीन पर जमा होते हुए टुकड़े. तुलना के लिए नौ वॉलंटियर्स को यही चश्मे दिए गए लेकिन उनकी सही आंख को ढक दिया गया और वह सिर्फ़ सुस्त-आंख से ही देख पा रहे थे. दो हफ़्ते बाद दोनों आंखें इस्तेमाल कर खेलने वाले समूह की दृष्टि में आंख ढक कर देखने वाले की दृष्टि के मुकाबले ज़्यादा सुधार नज़र आया. इसके बाद दूसरे ग्रुप को भी दोनों आंखों का इस्तेमाल कर चश्मे के साथ टेटरिस खेलने को कहा गया. उनकी दृष्टि में भी उल्लेखनीय सुधार आया. डॉक्टर हेस का कहना है कि यह तरीका आंख ढकने के मुकाबले ज़्यादा कारगर है ख़ासकर जवान लोगों में क्योंकि आंख ढकने से उन्हें यूं भी कोई फ़ायदा नहीं होता. वह कहते हैं कि सिर्फ़ टेटरिस ही नहीं कोई भी कंप्यूटर गेम खेला जा सकता है. डॉक्टर हेस के अनुसार जब दोनों आंखें साथ काम करती हैं तो दृष्टि में सुधार होता है. आंख ढकने के मुकाबले यह बेहतर है इसमें मज़ा आता है और इसका फ़ायदा भी जल्दी होता है. वह कहते हैं कि उनके और अन्य शोधों से यह पता चलता है कि एमब्लीयोपिया दरअसल दोनों-आखों की समस्या है. सही आंख को ढकने से सुस्त के ठीक होने के बजाय ठीक के भी ख़राब होने का ख़तरा रहता है. दोनों आंखों के साथ काम करने की स्थिति में दिमाग में सामंजस्य और अनुकूलता बढ़ती है. यह सुस्त-आंख को फिर से देखना सीखने में मदद करता है. |
| DATE: 2013-04-28 |
| LABEL: science |
| [442] TITLE: पृथ्वी का केंद्र सूर्य जितना ही गर्म है |
| CONTENT: पृथ्वी की सतह के अंदर जाने पर तापमान बढ़ने लगता है. ये गर्मी कितनी ज़्यादा होती है इसके बारे में अब तक वैज्ञानिक अंदाजा लगाते रहे हैं. लेकिन अब वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि पृथ्वी के अंदर का तापमान पहले के आकलन से कई गुना ज़्यादा है. नए आकलन के मुताबिक पृथ्वी के भीतरी कोर का तापमान छह हजार डिग्री सेल्सियस के करीब है. ये तापमान कितना ज़्यादा है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि सूर्य की सतह का तापमान भी इतना ही होता है. पहले माना जाता रहा है कि पृथ्वी का केंद्र लौह अयस्क से बना है लेकिन वास्तव में ये क्रिस्टलीय धातु से बना है जिसके बाहर तरलीय घेरा होता है. लेकिन इस क्रिस्टलीय धातु का तापमान कितना हो सकता है इस पर लंबे समय से बहस होती रही है. साइंस मैगज़ीन में प्रकाशित एक प्रयोग के मुताबिक पृथ्वी के केंद्र में मौजूद लौह अयस्क पर अत्यधिक दबाव डालकर ये देखा गया है कि वो किस तरह बनता है और पिघलता है. इस प्रयोग में दुनिया भर में भूकंप के दौरान कैप्चर किए गए सिस्मिक वेव का अध्ययन किया गया. इससे पृथ्वी की गहराई और उसकी परतों के घनत्व के बारे में पता चला लेकिन तापमान के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. 1990 के शुरुआती सालों में ये अनुमान लगाया गया कि पृथ्वी के केंद्र का तापमान करीब 5000 डिग्री सेंटीग्रेड तक हो सकता है. यह आकलन तमाम नतीजों को कंप्यूटर के जरिए आकलित करके निकाला गया था. नए शोध अध्ययन के सह लेखक और फ्रांसीसी शोध एजंसी सीआईए के एजनेस डवेल ने बताया तब ऐसे आकलनों की शुरुआत थी और उन लोगों ने पहला अनुमान 5000 सेल्सियस का लगाया. लेकिन बड़ी मुश्किल बात ये थी कि इस नतीजे पर हर कोई सहमत नहीं हो पा रहा था. डवेल ने बीबीसी को बताया कुछ लोग कंप्यूटर के ज़रिए अलग-अलग अनुमान लगाते हैं लेकिन हमारे क्षेत्र में एक दूसरे से असहमत होना कोई अच्छी बात नहीं है. डॉक्टर डवेल ने बताया हमें जियोफिजिस्टि सिस्मोलोजॉस्टि जियोडायनामिस्ट के सवालों का जवाब देना पड़ रहा था इसके लिए उन्हें कुछ आंकड़े दिए जाने की जरूरत थी. डवेल के नेतृत्व में शोध वैज्ञानिकों के दल ने 20 साल पुराने आकलन की छानबीन की है. इसके लिए यूरोपियन सायक्रोटोन रेडिएशन फैसिलिटी का इस्तेमाल किया गया. यह दुनिया के सबसे बहेतरीन एक्स रे अध्ययन की व्यवस्था है. इसके तहत पृथ्वी के केंद्र की परत पर अत्यधिक दबाव डाला जो समु्द्र तल के दबाव से करीब दस लाख गुना ज़्यादा था. इसके बाद वैज्ञानिकों ने उस परत पर एक्स रे किरणों की बौछार डाली और ये देखा किस तरह तौर लौह तत्व पिघल कर तरल अवस्था में तब्दील हो रही है. इसके बाद पृथ्वी के केंद्र का तापमान आंका गया जो करीब 6000 डिग्री सेल्सियस था. यह तापमान उतना ही जितना सूर्य की सतह का तापमान होता है. डवेल अपने इस नए आकलन के बारे में बताते हुए कहती हैं कि इस नतीजे से अब हर कोई सहमत है. |
| DATE: 2013-04-28 |
| LABEL: science |
| [443] TITLE: सॉफ्ट ड्रिंक के रोज़ सेवन से डाइबीटीज़ का खतरा |
| CONTENT: एक अध्ययन के मुताबिक़ एक दिन में चीनी वाले सॉफ्ट ड्रिंक के एक या दो कैन पीने से बाद में डाइबीटीज़ का ख़तरा बढ़ जाता है. यूरोप में वैज्ञानिकों का कहना है कि एक कैन रोज़ पीने से डाइबीटीज़ का ख़तरा पांच गुना बढ़ जाता है. डाइबीटीज़ पर छपने वाली विशेष पत्रिका डाइबेटोलोगिया में छपे लेख के नतीजे अमरीका में हुए पहले हुए अध्ययनों से मिलते जुलते हैं. डाइबीटीज़ के लिए काम करने वाली संस्थाओं का कहना है कि चीनी वाली खानेपीने की चीज़ों के इस्तेमाल पर ध्यान रखने की ज़रूरत है क्योंकि इससे वज़न बढ़ने का ख़तरा रहता है. इस रिसर्च के नतीजे ब्रिटेन जर्मनी डेनमार्क इटली स्पेन स्वीडेन फ्रांस और नीदरलैंड्स में किए गए अध्ययनों पर आधारित हैं. रिसर्च के लिए शोधकर्ताओं ने साढ़े तीन लाख लोगों से बातचीत की. ये एक बड़े अध्ययन का हिस्सा था जिसमें भोजन और कैंसर में संबंध पर शोध किया जा रहा है. लंदन के इंपिरियल कॉलेज की डोरा रामागेयुरा ने बीबीसी से कहा अगर आप चीनी वाले शीतल पेय का इस्तेमाल करते हैं तो डाइबीटीज़ का ख़तरा बढ़ जाता है. आप जितने कैन सॉफ़्ट ड्रिंक का इस्तेमाल एक दिन में करते हैं आपके डाइबीटीज़ का ख़तरा ख़तरा उतना ही बढ़ जाता है. उन्होंने कहा कि इस ख़तरे से लोगों को आगाह किया जाए. हालांकि फलों के जूस के इस्तेमाल और डाइबीटीज़ के मामलों में कोई संबंध नहीं पाया गया. लेकिन बीमारी के होने में बीएमआई का बहुत मुख्य भूमिका है. बीएमआई यानी बॉडी मास इंडेक्स मोटोपे को मापने की इकाई है. |
| DATE: 2013-04-26 |
| LABEL: science |
| [444] TITLE: अगर मेन्यू कार्ड बताए, कम कैलोरी खाएँ |
| CONTENT: अमरीका में एक अध्ययन से पता चलता है कि अगर रेस्तरां में मेन्यू कार्ड पर ये लिखा हो कि उस भोजन को खाने के बाद कैलोरी घटाने के लिए कितनी कसरत करनी पड़ेगी तो शायद लोग खाना कम मात्रा में खाएँगे. टेक्सस क्रिसचियन यूनिवर्सिटी ने शोध में पाया कि जिन लोगों को ये अतिरिक्त जानकारी मुहैया कराई गई उन्होंने कम कैलोरी वाले व्यंजन ऑर्डर किए. शोधकर्ताओं के मुताबिक लोगों को इस बात से काफ़ी ज़्यादा फर्क पड़ता है कि खाना खाने के बाद कैलोरी बर्न करने के लिए कितने घंटे चलना पड़ेगा. अब शोधकर्ता बड़े पैमाने पर शोध करने की योजना बना रहे हैं. शोधकर्ताओं डॉक्टर मीना शाह और ऐशलेई जेम्स ने 300 लोगों को तीन ग्रुप में बाँटा. एक ग्रुप को दिए गए मेन्यू में कैलोरी के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई. दूसरे ग्रुप को खाने के साथ कैलोरी की जानकारी भी दी गई. तीसरे मेन्यू कार्ड में कैलोरी के अलावा ये भी बताया गया कि इस कैलोरी को घटाने के लिए कितनी देर कसरत करनी पड़ेगी. इस ग्रुप ने बाकी लोगों के मुकाबले 100 कैलोरी कम खाना खाया. किसी को भी पता नहीं था कि ये शोध क्यों हो रहा है. इस शोध को जल्द ही जर्मनी में होने वाले सम्मेलन में पेश किया जाएगा. ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन की विक्टोरिया टेलर भी मानती हैं कि खाने के स्वस्थ विकल्पों के बारे में अगर बताया जाए तो लोग अपने खान-पान को लेकर सजग होंगे. हालांकि वो ये भी कहती हैं कि रेस्तरां वाले खाने में नमक सेचुरेटेड फैट और मीठा कम करके ग्राहकों को स्वास्थ्यवर्धक खाना देने में मदद कर सकते हैं. |
| DATE: 2013-04-25 |
| LABEL: science |
| [445] TITLE: दिमाग से नियंत्रित होने वाला टैबलेट |
| CONTENT: मोबाइल कंपनी सैमसंग एक ऐसा टैबलेट तैयार कर रही है जो दिमाग से नियंत्रित होगा. अगर यह प्रयोग सफल हो गया तो टैबलेट की दुनिया में क्रांति आ जाएगी. दक्षिण कोरियाई कंपनी सैमसंग के इस प्रयोग में अमरीकी शोधकर्ता भी काम कर रहे हैं. इन लोगों ने प्रयोग करके भी दिखाया है कि कैसे लोग सैमसंग गैलेक्सी टैबलेट में एक टिमटिमाते आइकन पर ध्यान केंद्रित करके उसे संचालित कर सकते हैं. इसके लिए लोगों को ऐसी टोपी पहननी होगी जिसमें ईईजी यानी इलेक्ट्रो इन्सीफैलोग्राम को मापने वाले इलेक्ट्रोड लगे होंगे. ईईजी इलेक्ट्रो इन्सीफैलोग्राम ऐसी तकनीक है जिसके सहारे दिमाग की विद्युतीय हलचलों का अध्ययन किया जाता है. ये तकनीक उन लोगों के लिए वरदान साबित होगी जिनको चलने फिरने में दिक्कत होती है. सैमसंग के प्रमुख शोधकर्ता इन्सू किम ने मासाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी रीव्यू की वेबसाइट को बताया कि किसी भी यंत्र के साथ नियंत्रित करना मुख्य बात है. उन्होंने बताया कई साल पहले फोन को नियंत्रित करने के लिए केवल एक छोटा सा की-बोर्ड हुआ करता था लेकिन अब आप अपनी आवाज स्पर्श हाव भाव और यहां तक कि आंखों को भी मोबाइल फोन को नियंत्रित करने या फिर संचालित करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं सैमसंग गैलेक्सी-एस फोर में पहले से ही ऐसी तकनीक लगी है जिसमें लोग आंखों के सहारे फोन को नियंत्रित कर सकते हैं. जैसे कि स्मार्ट पॉज में मोबाइल में चल रहे किसी वीडियो को दूसरी तरफ देख कर रोका जा सकता है. नीचे की ओर आंख झुकाकर भी पेज के नीचे जाया जा सकता है. स्मार्ट फोन बनाने वालों ने एक शख्स के साथ इससे संबंधित प्रयोग का प्रदर्शन भी किया. उसे दिमाग को नियंत्रित करने वाला यंत्र पहनाया गया और फिर उससे कहा गया कि वो एक पुराने गाने का चयन करे चलाए और उसे नियंत्रित भी करे. किम का कहना है ये प्रयोग हमें ये बताते हैं कि आने वाले समय में तकनीक हमें कहां ले जा रही है. इसके परिणाम 80 से 95 प्रतिशत सटीक हैं. सैमसंग इमर्जिंग टेक्नॉलॉजी लैब के शोधकर्ताओं के साथ काम करने वाले रूजबे जाफरी कोशिश कर रहे हैं कि कैसे इलेक्ट्रोड से लगी टोपी के प्रयोग को और आसान बनाया जा सके. वो अमरीका के टेक्सस विश्वविद्यालय में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर हैं. उनकी योजना है कि इलेक्ट्रो़ड कैप का सूखा संस्करण तैयार किया जाए. अभी जो टोपी मौजूद है उसमें गीले इलेक्ट्रोड का इस्तेमाल किया जाता है. न्यूरोस्काई और इमोटी नाम की कंपनियां पहले ही बाजार में ऐसे हेडसेट लेकर आ चुकी हैं जो लोगों की मनोदशा का आंकलन करता है और लोगों को मोबाइल या टैबलेट के इस्तेमाल में मदद करता है. कंप्यूटर हार्डवेयर बनाने वाली जानी मानी कंपनी आईबीएम भी दिमाग से चलने वाले हेडसेट तैयार कर रही है. इमोटी हेडसेट के साथ इस बारे में कई प्रयोग भी किए गए हैं. |
| DATE: 2013-04-24 |
| LABEL: science |
| [446] TITLE: कैसे ज़िंदगी का हिस्सा बन गई ये दवा |
| CONTENT: पच्चीस वर्ष पहले जब प्रौज़ैक का पहली बार इस्तेमाल हुआ उसके बाद से ही ये दवा हमारी जीवनशैली में शामिल होती चली गई. 1990 के दशक में प्रोज़ैक ने वह पाया जो बहुत कम दवाएं पाती हैं. यह बेहद फैशनेबल तो बन ही गई थी साथ ही साथ इस दवा ने आम आदमी के बीच भी शोहरत पा ली थी. इसके लिए एलिज़ाबेथ वुर्टेल की किताब प्रोज़ैक नेशन भी काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार थी. सबसे पहले अमरीका में ये दवा 1988 में आई और इसके एक वर्ष बाद ब्रिटेन में इसे उतारा गया. उसके बाद से ही यह मानसिक बीमारी के बारे में कुछ भी बताने का एक मुहावरा हो गया. साथ ही यह बात भी शुरू हो गई कि क्या मानसिक बीमारियों को किसी पेशेवर की सहायता से ठीक किया जाए या फिर इसके लिए दवा दी जाएमशहूर उपन्यास ऐन एंथोलॉजी ऑफ़ एसेज़ द एज ऑफ़ एंग्ज़ायटी की सह-लेखिका साराह डांट बताती हैं यह मानों अपने अंदर जलती सलाख उतार देने सा होता था. वैसे हर कोई इससे खुश नहीं है. कार्डिफ़ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और फ़ार्मागेडान नामक किताब के लेखक डेविड हीले कहते हैं प्रोज़ैक को जिसने बेहतरीन बनाया वह इसकी गुणवत्ता नहीं इसकी शानदार मार्केटिंग थी. वह कहते हैं कि उन्होंने दवाओं के प्रति प्राकृतिक सावधानी को भूलने पर मजबूर कर दिया. प्रोज़ैक एक दवा और विचार के तौर पर भी चल पड़ी. इस पर आधारित पुस्तक प्रोज़ैक नेशन तो बहुत बड़ी हिट साबित हुई. इसे 2002 में पुनर्प्रकाशित किया गया और क्रिस्टीना रिक्की को लेकर एक फ़िल्म भी बनाई गई. इसकी लगभग सवा लाख प्रतियां उस साल बिकी जैसा पब्लिशर्स वीकली का दावा है. किताब और फ़िल्म के ज़रिए प्रोज़ैक दरअसल मानसिक बीमारी का जैसे पर्याय ही बन गया. प्रौज़ैक अब हरेक अवसादरोधी के लिए लगभग दूसरा नाम है और वह ऑक्सफ़ोर्ड के शब्दकोश में भी आ गया है. लोगों के पास अब प्रौज़ैक पल हो सकते हैं जिसका मतलब खुशी या भूलना होता है. अचरज नहीं कि प्रौज़ैक अब फ़िल्म निर्देशकों के लिए भी एक विषय बन गया. स्टीवन सोडेरबर्ग की मनोवैज्ञानिक थ्रिलर साइड इफ़ेक्ट्स में एक न्यूयॉर्क निवासी अवसाद के लिए दवा लेता है और वहां प्रोज़ैक का उल्लेख होता है. आज यूरोप और अमरीका के लोग एक समान दर पर ही अवसादरोधी दवाएं लेते हैं. बॉन के इंस्टीट्यूट फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ लेबर के आकलन के अनुसार 2010 में यूरोप के हर 10 में से एक आदमी यह लेता था. यूएस सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल रिसर्च के मुताबिक़ अमरीका में 12 वर्ष के ऊपर के लगभग 11 फ़ीसदी लोग अवसादरोधी दवाओं का सेवन करते हैं. हालांकि इन्हें प्रेस्क्राइब करनेवाले कई इसके इस्तेमाल करने के तरीक़े की आलोचना भी करते हैं. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में न्यूरोसाइंस की वरिष्ठ लेक्चरर जोआना मॉनक्राइफ़ कहती हैं कि वह इसे लेकर बहुत पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकतीं. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि अवसादरोधी काम के हैं. मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के इयान एंडरसन कहते हैं कि दवाओं को लेकर रूढ़िवादी रवैया नहीं अपनाना चाहिए. इयान कहते हैं मैंने कई लोगों को अवसाद से बुरी तरह प्रभावित होते देखा है. यह ठीक नहीं है. डुनांट कहती हैं कि एक बार ब्रेकअप के दौरान उनको इन दवाओं से मदद मिली. वह कहती हैं कि काश ये दवाएं 1970 में भी होतीं जब उनके पिता को तनाव से निपटने के लिए इलेक्ट्रिक शॉक थेरेपी लेनी पड़ी. कई लोग बेहतर महसूस करते हैं जब वे ये दवाएं लेते हैं. अवसादरोधी दवाओं का असर दिमाग़ में मौजूद सेरोटॉनिन के स्तर पर होता है जो भावनात्मक संवेदना से जुड़ा हुआ है. हालांकि सेरोटॉनिन और खुशी का संबंध स्पष्ट नहीं है. ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के स्टैफोर्ड लाइटमैन कहते हैं हमारी राय इस मामले में बिल्कुल साफ़-साफ़ नहीं है. आख़िरकार कोई चूहा अवसाद में तो होता नहीं जो हम प्रयोगशाला में उस पर शोध कर सकें. वह निष्कर्ष के तौर पर कहते हैं कि शायद ये दवाएं लेने के बाद आत्मविश्वास कई गुणा बढ़ जाता है. |
| DATE: 2013-04-23 |
| LABEL: science |
| [447] TITLE: अब घाव जल्द भरेगा सुइयों वाला बैंडेज |
| CONTENT: अमरीका के वैज्ञानिकों ने ऑपरेशन के बाद बीमार त्वचा को ठीक करने के लिए ऐसी पट्टी का डिजाइन तैयार किया है जिसमें छोटी छोटी सुइयां लगी होंगी. इसे नाम दिया गया है बेड ऑफ नीडल्स या दूसरे शब्दों में कहें तो सुइयों का बिछौना. इसको बनाने की प्रेरणा मिली है एक परजीवी कीड़े से जो मछलियों की आंत में रहता है. ऊपर चढ़ने के लिए ये नागफनी जैसे उभारों का इस्तेमाल करता है. इसे बनाने बनाने वालों ने दावा किया है कि जलने वालों मरीजों के लिए ये इस समय इस्तेमाल किए जा रहे प्लास्टर के मुकाबले तीन गुना ज्यादा मजबूत है. नेचर कम्युनिकेशन नाम की विज्ञान पत्रिका के मुताबिक जानवरों में इसका प्रयोग सफल साबित हो चुका है. इस प्लास्टर की खास डिजाइन ही इसे ज्यादा कारगर बनाती है. इसकी सुइयां त्वचा को बिना नुकसान पहुंचाए उनसे आसानी से चिपक जाती हैं. ज्यादातर चिपकाने वाले बैंडेज गीली चमड़ी में काम नहीं करते. स्टेपल करना और धागे की सहायता से चमडी़ को जोड़ा तो जा सकता है लेकिन उसमें त्वचा को कुछ हद तक नुकसान होता है. इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए ही डॉक्टर जेफरी कार्प ने प्रकृति की ओर देखने का फैसला किया. परजीवी कीड़ा मछलियों की फिसलने वाली आंतों में सुइयों जैसे नुकीले उभारों का उपयोग करके चढ़ता है. ये सुइयां आंत की सतह में पहले छेद करती हैं और जब गीली हो जाती हैं तो फिर इनमें सूजन आ जाती है जिससे पकड़ और भी मजबूत हो जाती है. इसका मतलब ये हुआ कि सुइयां भी त्वचा को नुकसान पहुंचाती हैं लेकिन उनकी पकड़ अधिकतम मजबूत होती है. डॉक्टर कार्प ने इसी की नकल करते हुए ऐसा प्लास्टर तैयार किया है जिसमें प्लास्टिक की छोटी सुइयां हैं जो सूखी और कड़ी होती हैं लेकिन जैसे ही वो गीली त्वचा के अंदर प्रवेश करती हैं उनमें सूजन आ जाती है. डांक्टर कार्प के मुताबिक इसकी खास डिजाइन ही सुइयों त्वचा के साथ चिपकने में मदद करती है. इतना ही नहीं जब इसे निकालने की बारी आती है तब भी त्वचा को कम नुकासान होता है. इससे संक्रमण का खतरा भी कम होता है. |
| DATE: 2013-04-22 |
| LABEL: science |
| [448] TITLE: शोहरत बन सकती है जान की आफ़त! |
| CONTENT: हो सकता है कि आप अपने पेशेवर ज़िदगी में बहुत कामयाब हों. लोग आपके शानदार करियर को देखकर जलते भी हों. लेकिन शायद बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि लोगों की शोहरत जानलेवा भी हो सकती है. अमरीका के एक अख़बार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ मृत्यु के बाद लोगों के बारे में लिखे जाने वाले विश्लेषण के आधार पर ये आकलन किए गए हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार फ़िल्मी सितारे और खिलाड़ी दूसरे कामयाब लोगों की तुलना में कम उम्र में मर जाते हैं. शोधकर्ताओं ने हालांकि इस बात को स्वीकार किया है कि इस आकलन के आधार पर निर्णायक तौर पर कुछ कहना मुश्किल है लेकिन बावजूद इसके इस रिपोर्ट से ऐसी बहुत सी रोचक बातें सामने आईं हैं. क्यूजेएम नाम के एक अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में ये शोध छपा है. ऑस्ट्रेलिया की क्यून्सलैंड यूनिवर्सिटी और न्यूसाउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने साल 2009 से लेकर 2011 के बीच न्यूयॉर्क टाइम्स अख़बार में एक हज़ार लोगों की मौत के बाद छपी रिपोर्टों का विश्लेषण किया. शोध से पता चला कि फ़िल्म अभिनेता गायक संगीतकार खिलाड़ी वगैरह की औसतन 77 साल की उम्र में मौत हुई जो कि दूसरे मरने वालों की तुलना में सबसे कम उम्र के थे. रिपोर्ट में पाया गया कि लेखक चित्रकार वगैरह 79 साल में मरे. इतिहासकार और अर्थशास्त्री 82 साल तक जीवित रहे जबकि व्यापार और राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय लोग 83 साल की उम्र में मरे. प्रोफ़ेसर रिचर्ड एप्सटिन का कहना था इससे कुछ भी साबित नहीं होता लेकिन इतना ज़रूर है कि इसने कुछ बहुत ही रोचक सवाल उठाएं हैं. उनका कहना था ये तो सच है कि सफल फ़िल्म स्टार और खिलाडी़ कम उम्र में मरते हैं तो क्या इसका मतलब ये है कि कम उम्र में मिली शोहरत के कारण बाद के दिनों में लोग अपनी सेहत का ख़्याल नहीं रखा पाते हैं ख़ासकर जब शोहरत कम हो जाती है. प्रोफ़ेसर एप्सटिन के अनुसार कारण चाहे जो भी हो इस रिपोर्ट को उन नौजवानों के लिए चेतावनी समझी जानी चाहिए जो कि स्टार बनने का सपना रखते हैं. सेलेब्रेटी लोगों के जीवन शैली का अध्ययन करने वाली मनोवैज्ञानिक हनी लैंगकैस्टर जेम्स का कहना है कि स्टार का दर्जा पाने वालों की तादाद इतनी कम है कि वैज्ञानिक तौर पर इसका विश्लेषण करना मुश्किल है कि लोगों के जीवन पर स्टार होने के क्या प्रभाव पड़े हैं. हनी जेम्स कहती है सफल लोग अपने पेशे में उस स्थान पर बने रहने के लिए भारी क़ीमत चुकाते हैं. लेकिन जेम्स का ये भी कहना है कि इस तरह के शोध की कोई वैज्ञानिक व्याख्या करना मुश्किल है. |
| DATE: 2013-04-21 |
| LABEL: science |
| [449] TITLE: प्रोस्टेट कैंसरः 40 के बाद टेस्ट ज़रूर करा लें |
| CONTENT: क्या आपकी उम्र 40 से ज़्यादा है अगर हां तो आप अपना टेस्ट ज़रुर करवा लें. कहीं ऐसा न हो कि प्रोस्टेट कैंसर आपको भी अपनी चपेट में ले ले. शोधकर्ताओं के अनुसार 40 साल से ज़्यादा की उम्र वाले व्यक्ति को प्रोस्टेट कैंसर की आशंकाओं का पता लगाने के लिए जांच करवानी चाहिए. हालांकि इस विचार को विवादास्पद बताया जा रहा है. मतलब प्रोस्टेट विशिष्ट ऐंटीजेन पीएसए जांच ग़ैर भरोसेमंद भी साबित हो सकती है. इस जांच के परिणाम केवल दिखने में पॉजिटिव हो सकते है. फिर भी कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि यदि 45 से 49 साल के उम्र के बीच के पुरुषों का टेस्ट किया जाए तो इससे प्रोस्टेट कैंसर से होने वाली लगभग आधी मौतों पर रोक लग सकती है. 21 हज़ार से भी ज़्यादा पुरुषों की जांच करने के बाद स्वीडन स्थित शोधकर्ताओं का एक दल इस नतीजे पर पहुंचा है. ब्रिटेन में प्रोस्टेट कैंसर का पता लगाने का कोई नियमित तरीक़ा नहीं है. हां 50 साल से ज़्यादा के पुरुष अगर चाहें तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना यानी एनएचएस में मुफ़्त पीएसए टेस्ट के लिए अनुरोध कर सकते हैं. यूरोप में हाल ही में की गई प्रोस्टेट कैंसर की स्क्रीनिंग टेस्ट ईआरएसपीसी बताती है कि जांच की मदद से प्रोस्टेट कैंसर से होने वाली मौतों में 20 फ़ीसदी की कमी आई है. यह जांच इलाज पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान से जुड़ा हुआ है. मतलब यह कि यदि एक ज़िंदगी बचानी है तो प्रोस्टेट कैंसर के 48 अतिरिक्त मरीज़ों का इलाज पहले करना होगा. साल 2010 में तो इंग्लैंड की जांच समिति ने तय किया था कि जांच की शुरुआत करने की कोई ज़रूरत नहीं. मगर स्वीडन की लुंद यूनिवर्सिटी तथा अमरीका के मेमोरियल स्लोअन कीटरिंग कैंसर सेंटर के प्रोफ़ेसर हैंस लिलिया और उनके साथी प्रोफ़ेसरों का कहना है 40 साल से ज़्यादा के पुरुषों के लिए पीएसए का नियमित टेस्ट करवाना ज़रूरी है. अपने इस तर्क को दमदार बनाने के लिए उन्होंने 1974 और 1984 के बीच किए गए एक अध्ययन का उदाहरण दिया है. इस अध्ययन में 27 और 52 साल के क़रीब 21277 स्वीडेन नागरिक शामिल थें. शोधकर्ताओं ने इनके ख़ून के नमूनों के आधार पर पीएसए टेस्ट किया था. इस जांच के परिणाम पर नज़र रखते हुए पीएसए के ज़रिए इन शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की थी कि इन लोगों की बीमारी का मेडिकल नाम क्या दिया जाए. इन शोधकर्ताओं ने यह जानने की भी कोशिश की थी कि जिनका पीएसए टेस्ट पॉजिटीव था उन्हें बाद में प्रोस्टेट कैंसर हुआ या नहीं. और इस तरह यह साबित हुआ कि जिनका पीएसए ज़्यादा था उनमें प्रोस्टेट कैंसर का ख़तरा ज़्यादा पाया गया. अब शोधकर्ताओं ने यह पता लगाने की कोशिश की है कि इस जांच के लिए कौन सी उम्र सबसे सही होगी. जब 45 साल से कम उम्र के व्यक्ति की जांच की गई तो पाया गया कि उनमें घातक कैंसर विकसित होने का ख़तरा कम था. और जब 50 साल के उपर के लोगों की जांच की गई तो उनमें कैंसर का ख़तरा सबसे ज़्यादा पाया गया. 45 से 49 साल के बीच के पुरुषों की जांच में पाया गया कि क़रीब आधे 44 फीसदी मामले में कैंसर जानलेवा बन चुका था. जांच में शामिल 1369 पुरुषों को प्रोस्टेट कैंसर था 241 में यह रोग पूरी तरह फैल चुका था और 162 ऐसे थे जिनकी इस कैंसर से मौत हो चुकी थी. इन सबका यही निष्कर्ष निकाला गया कि सभी को 45 से 50 के बीच अपना पीएसए टेस्ट ज़रूर करवा लेना चाहिए. इसके अलावा जिनके टेस्ट में पीएसए का स्तर ज़्यादा हो वो जांच के लिए जल्दी जल्दी आएं और जिनका स्तर सामान्य हो वे 50 साल की उम्र पूरी होने के बाद अपना अगला पीएसए टेस्ट करवाएं. |
| DATE: 2013-04-21 |
| LABEL: science |
| [450] TITLE: एलईडी लाइट्स की रोशनी में इमारतें |
| CONTENT: लाइट बल्ब की खोज ने हमारे घरों को रोशनी दी और हमारी जिंदगी को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया. यह ऐसी दुनिया के लिए खास मायने रखता है जहां ऊर्जा की कम खपत करके ज्यादा रोशनी की जरूरत पूरी करने की चुनौती सामने रहती है. लेकिन दुनिया के जाने-माने लाइटिंग डिज़ाइनरों में से एक मार्क मेजर मानते हैं कि हम अभी रोशनी से जुड़ी नई तकनीकों के विकास के शुरुआती दौर में हैं. वह कहते हैं तकनीक में हो रहे बदलाव से यह साफ तौर पर मालूम हो रहा है कि यह बड़े परिवर्तन का समय है. जब गैस की जगह बिजली के बल्ब से रोशनी पैदा की गई थी तब भी वैसा ही समय रहा होगा. सेंट पॉल कैथेड्रल चर्च की मनोरम छटा देखते ही बनती है. लेकिन सवाल उठता है कि ऐसी क्या चीज है जो रोशनी को खूबसूरत बनाती है. और हमारी इमारतों को रोशन करने और सुकून देने वाली रोशनी को लेकर तकनीक की क्या भूमिका हो सकती है. मार्क ने अपने साथी जोनाथन स्पीयर्स के साथ मिलकर मशहूर इमारतों के आभामंडल को और अधिक खूबसूरत बनाने में उम्दा काम किया है. जोनाथन अब इस दुनिया में नहीं हैं पर वे दोनों अपने काम के लिए सम्मानित भी किए गए हैं. लंदन के सेंट पॉल कैथेड्रल चर्च की इमारत की खूबसूरत में चार चांद और गढ़ने के लिए मार्क और जोनाथन को दुनिया भर से सराहना मिली थी. अबू धाबी की शेख ज़ईद मस्जिद धार्मिक महत्व की महत्वपूर्ण इमारत है. उन्होंने कहासेंट पॉल कैथेड्रल चर्च की परियोजना पर काम करना हमारे लिए बड़े सम्मान की बात थी. मार्क कहते हैं हमने अब तक जितनी भी परियोजनाओं पर काम किया है उनमें सेंट पॉल कैथेड्रल चर्च शायद सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण था. लाइटिंग से जुड़ी साज-सज्जा को पूरा करने में हमें पांच साल लग गए. लंदन की चहल-पहल के बीच हलकी रोशनी में भीगे इस चर्च की इमारत को देखकर सुकून का एहसास मिलता है और मार्क और जोनाथन की मेहनत का नतीजा है. लेड लाइट्स के चलन ने रोशनी की साज-सज्जा के काम को कई आयाम दिए हैं. परंपरागत तौर पर इस्तेमाल में आने वाले फिलामेंट बल्बों से प्रयोग की बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं थी. लाइट एमिटिंग डियोड तकनीक या बोलचाल की भाषा में कहे जाने वाले एलईडी बल्ब के आने से रोशनी के काम में कई तरह की सुविधाएं आ गईं. मार्क कहते हैं मोमबत्तियों से गैसलाइट्स तक हमने लंबा सफर तय कर लिया है. एलईडी रोशनी से जुड़े हमारे काम को बुनियादी तौर पर बदल रहा है. उन्होंने कहाये छोटे होते हैं. सुखद एहसास देते हैं. और लेड रोशनी की तकनीक में आए सुधार की वजह से यह तेज रोशनी देता है. इसकी रोशनी भी दूर तक जाती है. एलईडी की रोशनी में रंगों का बेहतर ताल-मेल बनता है. कॉपेनहेगन का ओपेरा हाउस दुनिया की भव्य इमारतों में शुमार होता है. हालांकि मार्क के मुताबिक इस क्रांति के कुछ निराशाजनक पहलू भी हैं. मार्क कहते हैं हम दुनिया में जितनी भी रोशनी ले आएं लेकिन इसके साथ ही चुनौतियां भी शुरू हो जाती है. उन्होंने कहाइस बात को लेकर शोध किए जा रहे हैं एक अच्छी चीज से जुड़ी कई बातें हो सकती हैं लेकिन हम सभी रोशीन से जुड़े प्रदूषण के बारे में जानते हैं. मार्क साफ करते हैं कि इसका असर सिर्फ मानव समुदाय पर ही नहीं पड़ेगा. रोशनी के साथ कई और चीजें भी जुड़ जाती हैं. ज्यादा रोशनी का असर कुछ जीवों की जीवन शैली उनके खान-पान और प्रजनन के तौर तरीकों पर भी पड़ता है. मार्क कहते हैं ताकि हम अपनी जिंदगी को और समृद्ध बना सकें लेकिन हमें अपने काम काज के तौर तरीकों को लेकर बेहद सावधानी बरतनी होगी. |
| DATE: 2013-04-19 |
| LABEL: science |
| [451] TITLE: कपड़े जो राह दिखाएंगे और ना गुम होंगे |
| CONTENT: चेन्नई में इंजीनियरिंग छात्राओं ने छेड़खानी करने वालों को करंट मारने वाले अंतर्वस्त्र बनाए तो ज़्यादातर लोगों को पहली बार पता चला कि तकनीक का इस्तेमाल कपड़ों में कितने काम का हो सकता है. लेकिन दुनिया भर में पहनने योग्य तकनीक को लेकर कई तरह के प्रयोग किए जा रहे हैं. कैलिफ़ोर्निया की एक नई कंपनी मचीना मेक्सिकन कारीगरों का इस्तेमाल कर एक ऐसी जैकेट तैयार कर रही हैं जो संगीत पैदा कर सके. कंपनी की सह संस्थापक लिंडा मचीना कहती हैं हम एक कार्यक्रम में गए और देखा कि एक व्यक्ति सिर्फ़ कंप्यूटर से संगीत बजा रहा था. व कहती हैं हमने सोचा कि ऐसी चीज़ बनाई जाए जिससे संगीतकार अपने शरीर का इस्तेमाल कर ही संगीत पैदा कर सके. उनकी जैकेट में कपड़ों के नीचे चार लचीले सेंसर हैं. एक एक्सलेरोमीटर मीटर है जो आपकी बांह की हरकत को भांप लेता है. एक जॉयस्टिक है और चार दबाने वाले बटन हैं. पहनने वाले की ज़रूरत के अनुसार सेंसर और बटन जैसे चाहे लगाए जा सकते हैं. यह एक इंटरफ़ेस सॉफ्टवेयर से कंप्यूटर या मोबाइल फ़ोन से जुड़े होते हैं. मचीना कहती हैं यह शुरुआती स्तर पर है. हम एक किराए का स्टोर भी बना रहे हैं जो यूज़र्स को अपने निजी प्राथमिकताएं और अपने कार्यक्रम अपलोग करने की सुविधा देगा. मचीना के अनुसार अगर आप इसे अपने आईपॉड को नियंत्रित करने वीडियो मिक्स करने के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं तो अतिरिक्त सेंसर जोड़िए या फिर ऐसी हरकत को किराए पर ले लीजिए जिससे आप यह कर पाएं. वह यह भी कहती हैं हमारे सारे कोड मुफ़्त में उपलब्ध होंगे. कंपनी इसमें कुछ और बदलाव करने की सोच रही है. जैकेट के इस साल के अंत तक तैयार होने की उम्मीद है. संगीत पैदा करने वाली जैकेट शायद ही सुनने से लाचार लोगों को आकर्षित कर पाए. लेकिन उनके लिए एक दूसरा अविष्कार भी है. फ़्लटर नाम की ड्रेस को कोलोरेडो विश्वविद्यालय की पीएचडी छात्रा हैली प्रोफ़िटा ने ईजाद किया है. वह बताती हैं इस ड्रेस में माइक्रोफ़ोन का एक जाल है जो आवाज़ों को सुनता है. ये सूक्ष्म नियंत्रण प्रणाली से जुड़े होते हैं जो यह तय करती हैं कि आवाज़ किस दिशा से आई थी. एक बार यह तय कर लेती है कि आवाज़ किस दिशा से आई थी तो वह कंपन के माध्यम से सूचना दे देती है. अगर आपको पीछे देखना है तो ऐसा लगेगा कि कोई पीछे से आपके कंधे को थपथपा रहा है. इसका अहसास वैसा ही होता है जैसा मोबाइल फ़ोन के कंपन का. वो कहती हैं इसके पहले हमने ऐसे उत्पाद बनाए जिन्हें लोग इसलिए पहनना नहीं चाहते क्योंकि वह ख़राब दिखते हैं और वह व्यक्ति की अक्षमता की ओर ध्यान खींचते हैं. प्रोफ़िटा पहने जाने योग्य तकनीक को लेकर बेहद उत्साहित हैं. वो कहते हैं कि यह न सिर्फ़ पहनने वाले का जीवन स्तर बेहतर बनाते हैं बल्कि इन्हें सुंदर भी बनाया जा सकता है. फ़्लटर अभी शोध के स्तर पर ही है. प्रोफ़िटा को उम्मीद है कि जल्दी ही इसका इंसानों पर प्रयोग किया जा सकेगा. भविष्य के डिज़ाइनों में इसमें सुनने के उपकरण भी शामिल किए जा सकते हैं. और आखिर में चर्चा उस प्रयोग की जिसके ज़रिए कपड़ें ही आपको ढूंढने या संपर्क करने की क्षमता रखेंगे. एशर लेवाइन न्यूयॉर्क फ़ैशन हाउस के मालिक हैं. वो लेडी गागा बियोन्स ब्लैक आइड पीज़ जैसे संगीत स्टारों के कपड़े डिज़ाइन करते हैं. वो भी अपने काम में तकनीक का समावेश करना पसंद करते हैं. अपने 2012 फ़ॉलविंटर कलेक्शन में उन्होंने मेकरबोट के साथ मिलकर थ्रीडी-प्रिंटिड ग्लासेस पेश किए थे. ब्लूटूथ के इस्तेमाल के लिए इस साल 2013 में उन्होंने एक नई कंपनी फ़ोन हालो से हाथ मिलाया है. एशर कहते हैं मेरे कई दस्ताने खो चुके हैं. इसलिए मैं अपने बेहतरीन उत्पाद में इसे लगाने के पक्ष में हूं. क्योंकि कई बार हमारे उत्पाद इतने महंगे होते हैं कि कपड़ों पर बहुत सा पैसा खर्च करने वालों को भी यह महंगे लगते हैं. अगर आप चिप लगी वस्तु से दूर जाते हैं तो एशर का ट्रैकआर ऐप अलार्म बजा देता है. अगर आप इसके बाद भी अपने पसंदीदा जैकेट को छोड़ जाते हैं तो यह आपको एक टेक्स्ट मैसेज ईमेल या फ़ेसबुक मैसेज भेज देता है. इसमें सामान के जीपीएस कॉर्डिनेट्स होते हैं जिनके आधार पर आप गूगल मैप से अपना सामान ढूंढ सकते हैं. |
| DATE: 2013-04-18 |
| LABEL: science |
| [452] TITLE: मंगल जाना है, तुरंत अर्ज़ी लगाइए |
| CONTENT: क्या आप मंगल ग्रह पर जाना चाहते हैं अगर आपकी इसमें दिलचस्पी है तो तैयार हो जाइए क्योंकि हालैंड की एक कंपनी मार्स वन जल्दी ही इसके लिए आवेदन मंगा रही है. लेकिन इसमें एक पेंच हैं. कंपनी का कहना है कि ये एकतरफा यात्रा है. यानि आप मंगल पर तो चले जाएंगे लेकिन वापसी का कोई जुगाड़ नहीं होगा. मार्स वन की योजना मंगल पर मानव बस्ती बसाने की है. ये मिशन 2018 में संपन्न होने की उम्मीद है. प्रकृति के रहस्यों पर से पर्दा उठाने के लिए मनुष्य हमेशा से बेकरार रहा है. इतिहास की किताबें इस बात की गवाह हैं कि जोखिम उठाने से उसने कभी परहेज नहीं किया. इसलिए ये बात चौंकाने वाली नहीं है कि मार्स वन को पहले ही हज़ारों आवेदन मिल चुके हैं. मंगल पर जाने के लिए अभ्यर्थियों को रिएलटी शो की तरह की एक चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा जिसका टीवी पर प्रसारण होगा. मार्स वन के सह संस्थापक बैस लैंसडोर्प ने बीबीसी के लंदन कार्यालय पहुँचकर इस बारे में विस्तार से जानकारी दी कि मंगल का टिकट एकतरफा क्यों है. उन्होंने कहा कि पृथ्वी से मंगल पर जाने की सात-आठ महीने का यात्रा के दौरान अंतरिक्षयात्री अपनी हड्डियों और मांसपेशियों का वज़न खो देंगे. मंगल के बेहद कमजोर गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में समय गुजारने के बाद उनके लिए खुद को पृथ्वी के वातावरण के मुताबिक ढ़ालना संभव नहीं होगा. सफल अभ्यर्थियों को शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण दिया जाएगा. इस परियोजना में टीम सभी क्षेत्रों में मौजूदा तकनीक का ही इस्तेमाल करेगी. ऊर्जा सोलर पैनलों से पैदा की जाएगी पानी रिसाइकिल किया जाएगा और मिट्टी से निचोड़ा जाएगा. अंतरिक्षयात्री खुद अपना खाना तैयार करेंगे. उनके लिए आपात राशन का जुगाड़ होगा और हर दो साल में नए लोग उनसे जुड़ेंगे. लेकिन क्या वास्तव में लाल ग्रह मानव बस्ती फलफूल सकती है मंगल सूर्य से निकलने वाली हवाओं के रास्ते में पड़ता है. उसका वायुमंडलीय बेहद छितरा है. माना जाता है कि सौर हवाओं ने मंगल का ये हाल किया है. पृथ्वी को सौर हवाओं से बचाने के लिए सशक्त चुम्बकीय क्षेत्र मौजूद है. मंगल पर भी चार अरब साल पहले ये व्यवस्था थी लेकिन आज़ वो इस सुरक्षा कवच से वंचित है. एरिजोना विश्वविद्यालय के लूनर एंड प्लेनेटरी लेबोरेटरी की डॉक्टर वेरोनिका ब्रे को मार्श वन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना की सफलता पर संदेह है. उनका कहना है कि मंगल की सतह मानव के रहने के लिए उपयुक्त नहीं है. उन्होंने कहा कि मंगल पर पानी तरल अवस्था में मौजूद नहीं है विकिरण का स्तर बहुत ज़्यादा है और तापमान बहुत तेजी से बदलता है. डॉक्टर वेरोनिका ने कहा यात्रा के दौरान खासकर विकिरण सबसे बड़ी चिंता है. इससे कैंसर का खतरा बढ़ जाता है प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है और आदमी नपुंसक हो सकता है. उन्होंने कहा इसमें कोई संदेह नहीं है कि हम मानव को मंगल पर भेजने में सफल हो सकते हैं. लेकिन मुझे इस बात पर संदेह है कि लोग वहां लंबे समय तक जिंदा रह पाएंगे. मार्स वन की परियोजना के एंबेसे़डर और नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर गेरार्ड हूफ़्ट भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि इसमें स्वास्थ्य से जुड़े गंभीर जोखिम हैं लेकिन उन्हें सहनीय स्तर तक रखा जाएगा. अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अंतरिक्षयात्री स्टेन लव को अंदाज़ है कि उनके साथियों को अंतरिक्ष में तकनीक के साथ किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. वो हाल ही में अंटार्कटिका से लौटे हैं. उनका कहना है कि मंगल की तुलना में अंटार्कटिका पिकनिक के समान है. वहां पर्याप्त पानी है आप बाहर निकलकर टहल सकते हैं और ताजी हवा में सांस ले सकते हैं लेकिन फिर भी कोई स्थाई तौर पर वहां नहीं रहता. हालांकि परियोजना के आलोचकों का कहना है कि इतनी बड़ी परियोजना के लिए पैसे का इंतज़ाम करना एक समस्या है. पहले ग्रुप को भेजने के लिए छह अरब डॉलर का खर्च आने की उम्मीद है. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के डॉक्टर क्रिस लिनटॉट ने कहा कि ये परियोजना तकनीकी तौर पर संभव दिखती है लेकिन इसके लिए पैसा जुटाना आसान नहीं होगा. उन्होंने कहा इसे संभव बनाने के लिए आपको राजनीतिक इच्छाशक्ति और वित्तीय मजबूती की जरूरत है. लैंसडोर्प का कहना है कि फंडिंग कोई समस्या नहीं है. उन्होंने कहा ये ऐसी चीज है जो पहली बार हो रही है. अगले 15 सालों तक लोग इसे देखते रहेंगे. ऐसे में मुझे लगता है कि फंडिंग कोई मुद्दा नहीं है. ये मिशन अपना लक्ष्य हासिल कर पाएगा या नहीं ये तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन बिग ब्रदर के तरह की चयन प्रक्रिया का मतलब है कि दुनिया इसे जरूर देखेगी. |
| DATE: 2013-04-17 |
| LABEL: science |
| [453] TITLE: हाई ब्लड प्रेशर में फ़ायदेमंद चुकंदर का जूस! |
| CONTENT: शोधकर्ताओं का कहना है कि चुकंदर के जूस का एक कप पीना हाई ब्लड प्रेशर के शिकार लोगों के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है. हाइपरटेंशन पत्रिका में छपे एक शोध के अनुसार हाई ब्लड प्रेशर के 15 मरीज़ों ने 250 मिलीलीटर जूस पीया जिससे उनका रक्तचाप 10 एमएमएचजी कम पाया गया. इसका ज़्यादातर असर तीन से छह घंटे तक रहता है लेकिन अगले दिन भी इसका प्रभाव देखा गया. वैज्ञानिकों का कहना है कि चुकंदर में नाइट्रेट होता है जो रक्त की धमनियों को खोलता है. इससे रक्त के प्रवाह में मदद मिलती है. छाती में दर्द से पीड़ित लोग अक्सर ऐसी दवाएं लेते हैं जिनमें नाइट्रेट होता है. बार्ट्स एंड द लंदन स्कूल ऑफ़ मेडिसन एंड डेंसिट्री के शोधकर्ता कई वर्षों से ब्लड प्रेशर को कम करने के सिलसिले में चुकंदर के प्रभावों पर अध्ययन कर रहे हैं. उनका कहना है कि अभी इस बारे में और काम किए जाने की ज़रूरत है. वो चुकंदर के जूस पीने को लेकर इस बात से भी ख़बरदार करते हैं कि इससे पेशाब का रंग गुलाबी हो सकता है. नाइट्रेट ज़मीन में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है. वहीं से ये सब्ज़ियों की जड़ों में पहुंचता है और उन्हें बढ़ने में मदद करता है. शोधकर्ता अमृता अहलूवालिया का कहना है हम ये देख कर हैरान है कि इस तरह का नतीजा पाने के लिए बस थोड़े से नाइट्रेट की ही दरकार होती है. उनका कहना है हम उम्मीद करते हैं कि जो व्यक्ति नाइट्रेट से भरपूर सब्जि़यां लेगा उसका हृदय बेहतर तरीक़े से काम करता रहेगा. पत्तियों वाली सब्ज़ियां या फिर चुकंदर बहुत फ़ायदेमंद हो सकती हैं. ब्रिटिश हर्ट फ़ाउंडेशन में मेडिकल डायरेक्टर प्रोफ़ेसर पीटर वाइसबर्ग का कहना है ये शोध इस मौजूदा सलाह का समर्थन करता है कि हमें भरपूर हरी सब्जि़यां खानी चाहिए. वो कहते हैं लेकिन हमें इस बारे में अभी और शोध करना होगा कि क्या नाइट्रेट से परिपूर्ण सब्ज़ियां लंबे समय तक ब्लड प्रेशर को कम करने में मददगार हो सकती हैं. ब्रिटिश हर्ट फ़ाउंडेशन ही इस शोध के लिए आर्थिक मदद मुहैया करा रहा है. |
| DATE: 2013-04-17 |
| LABEL: science |
| [454] TITLE: पॉर्न साइट्स का दावा: देखने में ख़तरा नहीं |
| CONTENT: पॉर्न वेबसाइट्स ने इस आरोप से इनकार किया है कि उनमें उपभोक्ताओं के कंप्यूटर में ख़तरनाक सॉफ़्टवेयर डालने वाले विज्ञापन होते हैं. पिछले हफ्ते बीबीसी ने ख़बर दी थी कि दो मशहूर पॉर्न वेबसाइट्स देखने में काफ़ी ख़तरा है. शोधकर्ता कॉनराड लॉंगमोर ने वेबसाइटों की नुक़सानदायक सामग्री का नियमित विश्लेषण करने वाली गूगल की सुविधा का सहारा लेकर निष्कर्ष निकाले थे. जिन दो वेबसाइट्स का नाम लिया गया है उनमे से एक पॉर्नहब का कहना है कि ख़तरे के आंकड़ों को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया है. दूसरी वेबसाइट एक्सहेम्सटर ने भूतकाल में उसे यह दिक्कत हुई थी लेकिन कहा कि अब ज़्यादा सख्त प्रणाली का इस्तेमाल किया जा रहा है. वेबसाइट के प्रवक्ता ने ईमेल में कहा है पहले हुई दिक्कत की वजह से हमने एक विज्ञापन एजेंसी के साथ करार ख़त्म कर दिया है. अब हमारे भरोसेमंद सहयोगी सभी विज्ञापनदाताओं की सख्ती से जांच कर रहे हैं और अब एक्सहेमस्टर पर ख़तरनाक कार्यक्रम के साथ नई साइट डालना असंभव है. शोध को अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करने वाले लॉंगमोर ने पॉर्नसाइट के जवाब को एक खंडन के नाम पर खंडन करार दिया. वह कहते हैं दिखाने के लिए आंकड़े तैयार हैं लेकिन वहां एक हफ़्ते पहले गड़बड़ थी और आज भी गड़बड़ हो सकती है. यकीनन वहां कल भी गड़बड़ हो सकती है. लॉंगमोर का शोध गूगल की डायग्नोस्टिक सर्विस पर आधारित थी जो वेब पेजों को अच्छी तरह पढ़कर उसमें नुक्सानदायक समाग्री को परखता है और 90 दिन की पुनरीक्षण रिपोर्ट देता है. गूगल के अनुसार एक्सहेमस्टर में संदिग्ध सामग्री 6 अप्रैल को भी पाई गई थी. आंकड़ों के अनुसार पॉर्नहब में संदिग्ध सामग्री पिछली बार 28 जनवरी को पाई गई थी. पॉर्नहब के मालिकाना हक़ वाली कंपनी मैनविन की एक प्रवक्ता के अनुसार पॉर्नहब के अपने आंकड़ों के अनुसार तीन महीने में इसकी वेबसाइट पर दिखाए गए विज्ञापनों में सिर्फ़ 0. 003 ही संभावित ख़तरा था. |
| DATE: 2013-04-16 |
| LABEL: science |
| [455] TITLE: क्या है फ़ेसबुक का भविष्य? |
| CONTENT: पिछले कुछ दिनों से मैंने एक बात नोटिस की है. अपने फ़ोन पर जब भी फ़ेसबुक खोलता हूं तो किसी रेस्तरां का ऐप बार-बार न्यूज़ फ़ीड में आ जाता है. मैंने न तो इस ऐप को लाइक किया है और न ही कभी किसी ऐसे पन्ने पर क्लिक किया है फिर भी पता नहीं क्यों ये ज़ोमाटो. कॉम बार बार न्यूज़ फ़ीड में आता है. वैसे कमाल ये है कि डेस्कटॉप पर ऐसा कुछ नहीं होता. आपके साथ भी अगर ऐसा हो रहा है तो मैं जवाब खोज लाया हूं आपके लिए. फ़ेसबुक की मुख्य कार्यकारी अधिकारी सैली सैंडबर्ग ने पिछले दिनों लंदन में संवाददाताओं से बातचीत में बताया कि कंपनी के लिए सबसे महत्वपूर्ण दो चीज़ों में एक मोबाइल और दूसरा विज्ञापन है. मोबाइल में भी फ़ेसबुक का अधिक ध्यान एंड्रॉयड प्लेटफॉर्म पर है. जब बीबीसी के टेक्नोलॉजी संवाददाता रोरी जोन्स ने सैली से पूछा कि क्या आईफ़ोन को दिक्कत होने वाली है तो सैली का कहना था हम ऐपल के साथ मिलकर काम कर रहे हैं लेकिन फ़ेसबुक का असली मज़ा फ़ेसबुक होम पर ही आएगा जो एंड्रॉयड से जुड़ा हुआ है. सैली ने ये भी साफ किया कि फ़ेसबुक पर विज्ञापन भी ज़रूरी हैं और ये टेलीविज़न जितना महत्वपूर्ण नहीं तो उससे कम भी नहीं है. ज़ाहिर है अब आप समझ गए होंगे कि आपके मोबाइल पर फ़ेसबुक देखने पर क्यों विज्ञापन आपके न्यूज़फ़ीड में आ जाता है. लेकिन फ़ेसबुक के लिए भी विज्ञापन और मोबाइल क्यों है इतना ज़रुरीज़रा इन आंकड़ों को देखिए. पूरी दुनिया में फ़ेसबुक का इस्तेमाल करने वालों की संख्या एक अरब से अधिक है. सिर्फ भारत में ही 6-38 करोड़ लोग फ़ेसबुक पर हैं. इसका एक बड़ा हिस्सा मोबाइल और स्मार्टफ़ोन के ज़रिए सोशल मीडिया या फ़ेसबुक का इस्तेमाल करता है. चौबीस घंटों में लोग जितना समय टीवी पर नहीं देते उतना समय फ़ोन पर बिताते हैं. नील्सन के एक सर्वे में लोग दिन में ढाई घंटा समय अपने स्मार्टफ़ोन को देते हैं. जिसमें वो ऐप डाउनलोड करते हैं संगीत सुनते हैं ब्राउज़िंग करते हैं. अब मोबाइल से बातचीत और मैसेज बहुत कम होता है. भारत में मोबाइल के ज़रिए इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या है करीब चार करोड़. अब अगर स्मार्टफ़ोन की बात करें और फ़ेसबुक के एंड्रॉ़यड संबंधी बयान को ध्यान में रखें तो आप पाएंगे कि आखिर फ़ेसबुक किस दिशा में जा रहा है. इंटरनेशनल डाटा कॉरपोरेशन यानी आईटीसी जो दुनिया भर में मोबाइल के आंकड़े जुटाता है- उसके अनुसार भारत में 2013 में स्मार्टफ़ोन बाज़ार में 38. 8 प्रतिशत पर सैमसंग का कब्ज़ा है जबकि 15-5 प्रतिशत पर ऐपल का. नोकिया तीसरे नंबर पर 7-7 प्रतिशत लोगों के पास है. सैमसंग ज़ाहिर है कि एंड्रॉयड प्लेटफॉर्म का प्रयोग करता है और फ़ेसबुक इसी वर्ग पर अपनी नज़रें जमा रहा है. यानी इन आकड़ों से ये समझा जा सकता है कि फ़ेसबुक मूल रुप से एंड्रॉयड फ़ोन के बढ़ते बाज़ार के साथ अपनी पैठ बनाना चाह रहा है और अगर ऐसा दिन आए कि जब डेस्कटॉप पर फ़ेसबुक न दिखे तो घबराइएगा नहीं. फ़ेसबुक मोबाइल पर उपलब्ध होगा और वो भी बेहतर फॉर्मेट के साथ. |
| DATE: 2013-04-16 |
| LABEL: science |
| [456] TITLE: अब तो लैब में ही बन गई किडनी |
| CONTENT: अमरीकी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि प्रयोगशाला में विकसित किए गए एक गुर्दे को सफलतापूर्वक जानवरों में प्रत्यारोपित कर दिया गया है. इसने मूत्र बनाना भी शुरू कर दिया है. इसी तकनीक से शरीर के अन्य अंग पहले ही बनाकर मरीज़ों को लगाए जा चुके हैं लेकिन गुर्दा अब तक बनाए गए अंगों में गुर्दा सबसे जटिल अंग है. गुर्दा ख़ून की सफ़ाई करके इसमें से फ़ालतू पानी और बेकार के तत्व निकालता है. प्रत्यारोपण के लिए इसकी मांग भी सबसे ज़्यादा है. नेचर मेडिसन नाम के जनरल में प्रकाशित शोध के अनुसार कृत्रिम रूप से बनाए गए गुर्दे अभी तक प्राकृतिक गुर्दे की तुलना में कम कारगर साबित हुए हैं. लेकिन पुनर्उत्पादक दवाओं के शोधकर्ताओं का कहना है कि इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं. शोधकर्ताओं का विचार है कि पुरानी किडनी को निकालकर इसमें से सभी पुरानी कोशिकाओं को निकाल दिया जाए. इससे यह मधुमक्खी के छत्ते जैसा ढांचा रह जाएगा. इसके बाद मरीज़ के शरीर से कोशिकाएं लेकर इसका पुनर्निर्माण किया जाएगा. वर्तमान अंग प्रत्यारोपण के मुकाबले इसमें दो बड़े फ़ायदे होंगे. पहला तो यह कि कोशिकाएं मरीज़ के शरीर से तालमेल बैठा लेंगी. इसलिए शरीर के इनकार से बचने के लिए प्रतिरोधक क्षमता को दबाने के लिए ज़िंदगी भर दवाइयां खाने की ज़रूरत नहीं रहेगी. इसके अलावा यह प्रत्यारोपण के लिए अंगों की उपलब्धता को भी बढ़ाएगा. ज़्यादातर प्रत्यारोपित अंगों के शरीर अस्वीकार कर देता है लेकिन नए अंग बनने तक अन्य को नमूने के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा. मैसाचुसेट्स के सामान्य अस्पताल में शोधकर्ताओं ने प्रयोग योग्य कृत्रिम गुर्दे बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. उन्होंने चूहे की एक किडनी ली और डिटर्जेंट से उसकी सभी पुरानी कोशिकाओं को धो दिया. बचा हुआ प्रोटीन का जाल बिल्कुल गुर्दे जैसा दिख रहा था. इसमें अंदर ख़ून की कोशिकाओं और निकासी के पाइप का जटिल ढांचा भी मौजूद था. प्रोटीन के इस ढांचे को गुर्दे से सही भाग में सही कोशिका को भेजने के लिए इस्तेमाल किया गया जहां वो पुनर्निर्माण के लिए ढांचे के साथ मिल गए. इसके बाद एक खास तरह के अवन जिसमें चूहे के शरीर जैसे तापमान को पैदा किया गया था में इसे रखा गया. जब इस गुर्दे की प्रयोगशाला में जांच की गई तो प्राकृतिक के मुकाबले इसने 23 मूत्र निर्माण किया. इसके बाद शोध दल ने इस गुर्दे को एक चूहे में प्रत्यारोपित कर दिया लेकिन इसकी मूत्र निर्माण क्षमता 5 तक गिर गई. लेकिन शोधदल के प्रमुख डॉक्टर हैराल्ड ओट कहते हैं कि सामान्य प्रक्रिया का छोटा सा भाग हासिल कर लेना भी काफ़ी है. अगर आप हेमोडायलिसिस पर हैं और गुर्दा 10 से 15 काम करना शुरू कर देता है तो आप डायलिसिस से मुक्ति पा सकते हैं. आपको पूरी सफलता हासिल करने की ज़रूरत नहीं है. वह कहते हैं कि इसकी संभावनाएं असीमित हैं सिर्फ़ अमरीका में ही एक लाख लोग गुर्दे के प्रत्यारोपण का इंतज़ार कर रहे हैं और साल में सिर्फ़ 18000 प्रत्यारोपण ही होते हैं. हालांकि इंसान पर इसके प्रयोग के बारे में विचार करने से पहले ही भारी शोध की ज़रूरत है. |
| DATE: 2013-04-15 |
| LABEL: science |
| [457] TITLE: सब्जी-फलों से भी हासिल होगें फिंगर प्रिंट |
| CONTENT: ब्रिटेन के एबर्टे विश्वविद्यालय के फॉरेंसिक वैज्ञानिकों ने पहली बार ऐसी तकनीक विकसित की है जिसकी मदद से खाद्य पदार्थों से भी फिंगर प्रिंट लिए जा सकते हैं. इससे पहले केवल भारत और स्लोवानिया में ही इस तरह के अध्ययन किए गए हैं. हालांकि उन दोनों अध्ययनों में रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किया गया था जबकि ब्रिटेन के अध्ययन में रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल नहीं किया गया है. ये तकनीक पुलिस बल और मुकदमे के निपटान में सहायक साबित होगी. हालांकि पहले ये तकनीक इतनी सफल साबित नहीं हुई थी. लेकिन अब इसी तकनीक में सुधार किया गया है. विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की टीम ने कहा है कि पहले ये माना जाता था कि इस काम को नहीं किया जा सकता लेकिन उन्होंने इसे कर दिखाया है. पिछले 10 सालों से विश्वविद्यालय में काम करने वाले फॉरेंसिक एक्सपर्ट डेनिस जेन्टलेस कहते है हालांकि अलग अलग सतहों से फिंगर प्रिंट लेने की सफल विधियां पहले से ही हैं लेकिन कुछ सतहें ऐसी भी हैं जो इससे अछूती रहती हैं. जैसे इंसान और जानवर की चमड़ी. पहले इस श्रेणी में फल और सब्जियां भी आते थे क्योंकि उनकी सतह एक दूसरे से बहुत अलग होती है. अब जबकि हम लोग इस तरह की सतहों से भी फिंगर प्रिंट लेने में कामयाब हुए हैं ये अपराध रोकने की दिशा में एक कदम आगे की बात होगी. इससे पहले के दोनों अध्ययनों में फिंगर प्रिंट लेने के लिए रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किया गया था. इसके बजाय ब्रिटेन के डॉकटरों ने एक पाउडर जैसा पदार्थ विकसित किया है जो प्याज और टमाटर और दूसरे चिकने फलों की सतह से भी उंगलियो की छाप को पकड़ लेता है. जेनटेल्स का कहना है शुरुआत में इस तकनीक का विकास चिपकने वाले टेप से प्रिंट हासिल करने के लिए किया गया था. चूंकि ये दूसरी सतह पर भी का कर रह था इसलिए हमने सोचा कि ये खाद्य पदार्थों पर भी काम कर सकता है. हमने पाया कि ये दूसरी विधियों से ज्यादा कारगर साबित हुआ. हलांकि वैज्ञानिक मानते हैं कि इस तकनीक को सभी तरह के फलों पर लागू करने से पहले बहुत तरह के शोध की जरूरत है. फॉरेंसिक साइंस की पत्रिता साइंस एंड जस्टिस में इस शोध के प्रकाशित होने का मतलब ये है कि दूसरे लोग भी इस रिपोर्ट की नकल करेंगे. |
| DATE: 2013-04-15 |
| LABEL: science |
| [458] TITLE: नेत्रहीन भी चला सकेंगे कार? |
| CONTENT: क्या पूरी तरह से नेत्रहीन व्यक्ति कभी कार चला सकते हैं ऑटोमेटेड ड्राइविंग यानि अपना रास्ता ख़ुद तय करने में सक्षम कार बनाने की दिशा में जिस गति से काम चल रहा है उससे तो ये संभव लगता है. गूगल ने पिछले साल इसी समय एक वीडियो जारी किया था जिसमें एक नेत्रहीन को कार चलाते दिखाया गया था. वो बिना किसी परेशानी के कार चलाते हुए कैलिफोर्निया के सैन जोस में अपने घर से निकलकर पास के एक रेस्त्रां में जाता है और फिर वापसी में ड्राई क्लीन किए हुए कपड़े लेता है. उस वीडियों में ड्राइवर बने स्टीव मैहन सांता क्लारा वैली ब्लाइंड सेंटर के प्रमुख हैं. आठ साल पहले उनकी आँखों की 95 प्रतिशत रोशनी चली गई थी और उन्हें अपने लाइसेंस से हाथ धोना पड़ा था. तबसे वो चालक की सीट में नहीं बैठे थे. लेकिन वीडियो में इस बार उन्होंने केवल एक बटन दबाया और बाकी का काम कार ने खुद किया. वीडियो का मकसद ये संदेश देना था कि ड्राइविंग सभी के लिए आसान और सुरक्षित होनी चाहिए. मैहन ने कहा चालकविहीन कारों को लेकर नेत्रहीनों में काफी उत्साह और चर्चा है. अमरीका में ड्राइविंग लाइसेंस पाना इस बात का प्रतीक है कि आपको कहीं भी जाने की आज़ादी है. अमरीका में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था बहुत विकसित नहीं है. ऐसे में कार नहीं होने से आप अलग-थलग पड़ जाते हैं और आपकी दुश्वारियां बढ़ जाती हैं. यही वजह है कि ये नेत्रहीनों के लिए एक भावनात्मक मुद्दा है. चालकविहीन कार जीपीएस लेजर राडार और थ्री डी डेटा का इस्तेमाल करती है. 60 साल के मैहन को पूरा भरोसा है कि उनके जीवनकाल में ही नेत्रहीनों के लिए कार का सपना साकार हो जाएगा. गूगल की ऑटोमेटेड कारें 300000 मील का सफर तय कर चुकी हैं और वो भी बिना किसी दुर्घटना के. इंगमार पोस्नर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के मोबाइल रोबोटिक्स ग्रुप में इंजीनियर हैं. ये एक इंजीनियरिंग टीम है जो ऐसी कार बनाने में जुटे हैं जो आंशिक स्वचालन से चालक का काम आसान कर देगी. उन्होंने कहा कल्पना कीजिए कि आप कार से एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं. आपके डैशबोर्ड पर एक प्रकाश पुंज उभरता है और कहता है कि मैं जानता हूँ कि इस समय मैं कहां पर हूँ. हमने कितनी दूरी तय कर ली है. अगर आप चाहे तो अगले 500 मीटर मैं संभाल सकता हूँ. पूरी तरह स्वचालित वाहन की कल्पना सबका ध्यान आकर्षित करती है. ये ऐसा वाहन होगा जिस पर आप अख़बार पढ़ते और चाय की चुस्की लेते हुए घर से ऑफिस जा सकेंगे. लेकिन ऐसी कार बाज़ार में जल्द उपलब्ध होने वाली नहीं है. लेकिन ट्रैफिक जाम में कार को नियंत्रित करने और आपको लेन मार्किंग के भीतर रखने जैसे छोटे मोटे काम करने वाली कारें बाजार में उपलब्ध हैं या आने वाली हैं. टोयोटा मर्सिडीज बीएमडब्ल्यू और अन्य कंपनियां ऐसी कारें बना रहे हैं. पोस्नर ने कहा कि उनकी कार को बाज़ार में आने में दस से 15 साल का समय लग सकता है लेकिन पूरी तरह से नेत्रहीन लोग फिर भी इस कार को नहीं चला सकेंगे. उनका मानना है कि उनकी कार के आने से कई ऐसे लोग भी कार चला सकेंगे जो अभी किसी कमजोरी के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे हैं. उन्होंने कहा मेरी कल्पना अगर साकार होती है तो उन लोगों की बड़ी मदद होगी जिन्हें रात में वाहन चलाने में दिक्कत आती है. आजकल ऐसी कारें आ रही हैं जो पैदल यात्रियों की चहलकदमी को भाँप सकती हैं. पूरी तरह स्वचालित कारों के आने से इस बात का फ़र्क मिट जाएगा कि शारीरिक रूप से सक्षम हैं या नहीं. बहुत कम लोग इस बात से सहमत होंगे कि नेत्रहीनों को सड़क पर वाहन चलाने की अनुमति दी जानी चाहिए. लेकिन मैहन का मानना है कि कारों में स्वचालित खूबियां आने से उनका वाहन चलाने का सपना साकार हो सकेगा. उन्होंने कहा ये होगा कि लोगों को नेत्रहीनों के कार चलाने पर तो आपत्ति होगी लेकिन उन्हें ऐसी स्वचालित कारों से कोई दिक्कत नहीं होगी जो नेत्रहीन चलाएंगे. हालांकि वो साथ ही मानते हैं कि केवल स्वचालित कार ही उनकी सभी चुनौतियों को दूर नहीं कर सकती है. उन्होंने कहा कार के अपने आप पार्क होने के बाद उससे बाहर निकलने और अपने गंतव्य तक पहुंचने में तो दिक्कत रहेगी. |
| DATE: 2013-04-15 |
| LABEL: science |
| [459] TITLE: गर्भ में भी हो सकता है ब्लड कैंसर |
| CONTENT: वैज्ञानिकों के एक दल ने दावा किया है कि ल्यूकेमिया कैंसर की मूल वजह का पता लग गया है और बच्चों में मां के गर्भ से भी यह बीमारी हो सकती है. युवावस्था में कैंसर के जितने भी मामले सामने आते हैं उनमें एक तिहाई कैंसर ल्यूकेमिया के ही होते हैं. ब्रिटेन में हर साल करीब सौ बच्चे की मौत ल्यूकेमिया से होती है. जुड़वा बच्चों की एक जोड़ी के जींस के डीएनए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि उन्हें प्रभावित करने वाला ब्लड कैंसर एक्यूट लायमहोबलास्टिक ल्यूकेमिया होता जिसे आम तौर पर श्वेत रक्त कणों का कैंसर भी कहा जाता है. पहले से ये मालूम था कि जींस की ख़ामियों के चलते ये बीमारी होती है और पर्यावरण के असर के चलते यह बढ़ने लगता है. लेकिन इसके पीछे की वजहों के बारे में पहली बार कुछ ठोस बात उभर कर सामने आई हैं. इंस्टीट्यूट ऑफ़ कैंसर रिसर्च के विशेषज्ञ मानव शरीर के तीन अरब जींस के डीएनए अध्ययन के बाद इस नतीजे तक पहुंचे हैं. इन नतीजों को पीएनएस जर्नल में प्रकाशित किया गया है. शोध में शामिल वैज्ञानिकों ने इस बात की उम्मीद जताई है कि इसके परिणाम से कैंसर के इलाज की नई दवा खोजने में मदद मिल सकेगी. दरअसल दुनिया भर में बच्चे सबसे ज़्यादा ल्यूकेमिया कैंसर की चपेट में ही आते हैं. शोध वैज्ञानिक इस बीमारी के बारे में ज़्यादा जानना चाहते हैं ताकि इस बीमारी का बेहतर इलाज संभव हो सके. हालांकि कई मामलों में ल्यूकेमिया का इलाज कामयाब होता है लेकिन इसके इलाज में प्रयुक्त होने वाली दवाईयों के गंभीर साइइ इफेक्टस भी होते हैं. प्रोफेसर मेल ग्रीव्स और उनके साथियों ने एक समान जुड़वा बच्चों को अपने अध्ययन के लिए इसलिए चुना क्योंकि उनमें एक जैसे डीएनए होते हैं जो उन्हें अपने माता-पिता से विरासत में मिले होते हैं. इन जुड़वा बच्चों में दोनों को चार साल की उम्र में एक्यूट लायमहोबलास्टिक ल्यूकेमिया हो गया था. इनके रक्त और अस्थि मज्जा के नमूने के अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने देखा कि दोनों बच्चों की एक जींस में बदलाव हुआ है इसके चलते ही ये ल्यूकेमिया की चपेट में आए हैं. इस जीन का नाम इटीवी6-आरयूएनएक्सआई है. शोध वैज्ञानिकों के मुताबिक जुड़वां बच्चों में एक के जीन में बदलाव गर्भ में ही हुआ होगा जो बाद में दूसरे बच्चे तक गया. वैसे दिलचस्प ये है कि इस जुड़वां बच्चों के जींस में 22 तरह के बदलाव हुए हैं लेकिन इनमें कोई भी एक दूसरे से मिलता नहीं है. इस अध्ययन की सहयोगी प्रोफेसर ग्रीव्स ने कहा हमने मानव के सभी जीनोम के सीक्वेंस का अध्ययन किया है. पहली बार हमें उस बदलाव का पता चला है जिससे ल्यूकेमिया की शुरुआत होती है. इंस्टीच्यूट ऑफ़ कैंसर रिसर्च की प्रोफेसर डॉक्टर जूली शार्प कहती हैं बच्चों में कैंसर होने के मामले में डीएनए का अध्ययन मददगार साबित हुआ है. ऐसे अध्ययनों के जरिए हम कैंसर का बेहतर इलाज़ तलाश पाएंगे जिससे कैंसर से जंग जीतने वाले लोगों की संख्या में इज़ाफा होगा. |
| DATE: 2013-04-14 |
| LABEL: science |
| [460] TITLE: इंटरनेट पर गेम्स कहीं आपके पैसे तो नहीं लूट रहीं? |
| CONTENT: इंटरनेट पर खेली जाने वाली गेम्स के पीछे कहीं पैसे खर्च करवाने की साज़िश तो नहीं ब्रिटेन में ऐसी शिकायतें आने के बाद अब एक जांच का आदेश दिया गया है. यह जांच उस मीडिया रिपोर्ट के बाद हो रही है जिसमें बच्चों के स्मार्टफोन और वेब गेम्स में वर्चुअल वस्तुओं पर काफी पैसा खर्च करने की बात कही गई है. मार्च के महीने में ब्रिस्टल में पांच साल के एक स्कूली बच्चे डैनी किचन ने अपने अभिभावकों के आईपैड पर जॉंम्बीज वर्सेस निंनाज नाम का गेम खेला. इसका बिल बढ़ते-बढ़ते 1700 पाउंड हो गया हालांकि बाद में ऐप्पल कंपनी ने इसे लौटा दिया. इस साल जनवरी में मोबाइल गेमिंग पर नजर रखने वाली एजेंसी फोन पे प्लस ने बताया कि गेम्स और दूसरी चीजों के लिए एड-ऑन खरीदने पर बहुत ज्यादा बिलिंग से जुड़ी उपभोक्ताओं की शिकायत में 300 फीसदी बढ़ोतरी हुई है. अब ऑफिस ऑफ फेटर ट्रेडिंग यानि ओएफटी जांच करना चाहता है कि गेम्स कहीं भटकाने वाले आक्रामक तौर पर व्यावसायिक या किसी भी तरीके से गलत तो नहीं हैं. वह यह भी जांचना चाहता है कि बच्चों को खास तौर पर तो लक्षित नहीं किया जा रहा है ओएफटी पता लगाना चाहता है कि बच्चों पर दबाव बनाने के लिए तो ये गेम्स नहीं दिए जाते ताकि अतिरिक्त कमाई हो सके. कुछ ऑनलाइन गेम्स में खिलाड़ियों को वर्चुअल सिक्के और हीरे-मोती जैसे पुरस्कार दिए जाते हैं जिससे वे खेल के स्तर में आगे बढ़ सकें. ओएफटी उन अभिभावकों से सच जानना चाहता है जिन्होंने कंपनियों को आक्रामक तरीके से बच्चों के लिए गेम्स की मार्केटिंग करते देखा है. ओएफटी के वरिष्ठ निदेशक उत्पाद व ग्राहक कैवेंडिश एलिथॉर्न कहते हैं हम चिंचित है कि बच्चों और उनके अभिभावकों पर अवांछित दबाव तो नहीं दिया जा रहा. वे गेम को मुफ्त में समझते हों लेकिन जो असल में काफी लागत वाले साबित होते हैं. ओएफटी के मुताबिक गेम्स बनानेवाले अगर बच्चों को को बहुत अधिक ललचाते या अभिभावकों पर उन्हें खरीदने का दबाव बनाते हैं तो वे उचित व्यापार के कानून तोड़ रहे होते है. एलिथॉर्न ने कहा कि वे इन-गेम खरीदारी को प्रतिबंधित नहीं करना चाहते लेकिन कंपनियों से बस इस संदर्भ में कानूनी नियमों का पालन करवाना चाहते हैं. ओएफटी द्वारा एकत्रित आंकड़े बताते हैं कि सबसे लोकप्रिय स्मार्टफोन गेम इंस्टॉल तो मुफ्त में होते हैं पर उनके निर्माताओं के लिए इन-एप खरीददारी के तहत नकद जुटाते हैं. ऐसे अतिरिक्त शुल्क विभिन्न तरीकों से वसूल किए जाते हैं. इनमें से सबसे ऊंची कीमत वाला एप्लिकेशन 70 पाउंड तक का हो जाता है. |
| DATE: 2013-04-14 |
| LABEL: science |
| [461] TITLE: ख़तरे में है मोटे लोगों की किडनी |
| CONTENT: पेट पर ज़्यादा वजन सिर्फ़ आपको बेडौल ही नहीं बनाता इससे गुर्दे के रोगों की आशंका भी बढ़ जाती है. अमरीकन सोसायटी ऑफ़ नेफ़्रोलॉजी के जरनल में छपे शोध में यह दावा दिया गया है. यह पहले से ही माना जाता है कि नाशपाती के आकार के बजाय सेब के आकार के शरीर वालों को हृदयसंबंधी रोग होने की आशंका ज़्यादा होती है. शोध में कहा गया है कि सामान्यतः स्वस्थ दिखने वाले मोटे लोगों में भी गुर्दे के रोग के लक्षण पाए गए हैं. नीदरलैंड्स के ग्रोनिन्गेन विश्वविद्यालय के स्वास्थ्य केंद्र में शोधकर्ताओं के एक दल ने 300 से अधिक ऐसे लोगों को अध्ययन किया जिनका वजन या तो स्वास्थ्य के लिहाज से सही था या वे मोटे थे. शोधकर्ताओं ने पाया कि कमर और कूल्हे का अधिक अनुपात रखने वाले मोटे लोगों के गुर्दे कम कुशलता से काम कर रहे थे. उनके गुर्दे रक्त के कम प्रवाह और उच्च रक्त दाब से प्रभावित थे. यह सब उन लोगों में भी पाया गया जो कि आम तौर पर स्वस्थ थे. शोध प्रमुख अर्जन के वाकेरनाक कहते हैं हमें पता चला कि मोटे लोग जो कि सामान्य रूप से स्वस्थ हैं और जिनका रक्तचाप सामान्य है उनके गुर्दों में भी उच्च रक्तचाप पाया गया है. जब वो थोड़े ज़्यादा या बहुत मोटे होते हैं तो स्थिति बदतर हो जाती है. शोध के परिणामों के अनुसार ऐसे लोगों को गुर्दे के उच्च रक्तचाप वाले इलाज से लाभ मिल सकता है. इसमें नमक का स्तर कम करना और आवश्यकतानुसार दवाएं देना शामिल है. ब्रिटेन के गुर्दा शोध संस्थान के एक प्रवक्ता के अनुसार हम पहले से ही मानते हैं कि नाशपाती के आकार के मोटापे के बजाय सेब के आकार के मोटापे से हृदय संबंधी रोग होने की आशंका ज़्यादा होती है. इससे पता चलता है कि गुर्दा रोग के लिए भी यही सही है. वह आगे कहते हैं यह इस बात का भी सबूत है कि मोटापे और बढ़ते गुर्दा रोगों के बीच संबंध है. लोगों को अपने गुर्दे को सही रखने के लिए ज़्यादा सचेत करने की ज़रूरत है. |
| DATE: 2013-04-13 |
| LABEL: science |
| [462] TITLE: दिमाग के लिए 'टॉनिक' है नया संगीत |
| CONTENT: किसी संगीत को पहली बार सुनना दिमाग को ख़ुशी दे सकता है. एक नए शोध में यह दावा किया गया है. कनाडा के वैज्ञानिकों के एक दल ने एमआरआई स्कैन के ज़रिए संगीत का कोई टुकड़ा पहली बार सुनने पर दिमाग के उन क्षेत्रों में सक्रियता दर्ज की जिन्हें रिवॉर्ड सेंटर के नाम से जाना जाता है. जैसे-जैसे श्रोता संगीत को पसंद करता जाता है न्यूक्लियस एक्यूमबेन्स कहे जाने वाले दिमाग के क्षेत्र से उसका संबंध मज़बूत होता जाता है. यह शोध साइंस जनरल में प्रकाशित हुआ है. टोरंटो में रॉटमैन रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉक्टर वलौरी सालिमपूर ने बीबीसी के साइंस इन ऐक्शन प्रोग्राम को बताया हम जानते हैं कि न्यूक्लियस एक्यूमबेन्स का संबंध पुरस्कार से है. वह कहते हैं लेकिन संगीत भावनाओं से जुड़ी हुई चीज़ है. यह ऐसा नहीं है कि आप भूखे हैं और आपको खाने के लिए कुछ मिलने वाला है और आप इसे खाने के बारे में उत्साहित हैं या ऐसा सेक्स और पैसे के बारे में हो. अक्सर ऐसी स्थिति में ही हम न्यूक्लियस एक्यूमबेन्स में हलचल देखते हैं. मज़ेदार बात यह है कि आप ऐसी चीज़ के बारे में अंदाज़ लगा रहे हैं और उत्साहित हो रहे हैं जो पूरी तरह भावनात्मक है- और वह है संगीत के टुकड़े में आने वाली अगली ध्वनि. मैक्गिल विश्वविद्यालय के मांट्रियल न्यूरोलॉजिकल सेंटर में वैज्ञानिकों ने 19 प्रतिभागियों को उनकी पसंद के आधार पर संगीत के 60 टुकड़े पहली बार सुनाए. सभी को 30 सेकेंड लंबा एक टुकड़ा सुनाया गया और उनके पास यह मौका था कि वह चाहें तो उसे एक कृत्रिम ऑन लाइन स्टोर से ख़रीद सकते हैं. प्रतिभागियों को यह संगीत तब सुनाया गया जब वह एमआरआई मशीन के अंदर लेटे हुए थे. स्कैन को देखकर वैज्ञानिकों को पता चला कि न्यक्लियस एक्यूमबेन्स चमक रहा था. इस हलचल के आधार पर शोधकर्ता यह अनुमान लगा सकते थे कि प्रतिभागी को संगीत पसंद आया या नहीं. डॉक्टर सालिमपूर कहते हैं जब वे संगीत सुन रहे थे तब हम उनकी दिमागी हलचल को देखकर उनके बताने से पहले ही यह जान सकते थे कि वह संगीत को सराह रहे हैं या पसंद कर रहे हैं. न्यूरोसाइंस इसी नई दिशा में बढ़ रही है यह समझने की कोशिश में कि लोग क्या सोच रहे हैं. लोगों की दिमागी क्रिया के माध्यम से उनके विचारों प्रेरणाओं और अंततः उनके बर्ताव का निष्कर्ष निकालने की कोशिश की जा रही है. शोधकर्ताओं ने पाया कि न्यूक्लियस एक्यूमबेन्स दिमाग के एक दूसरे क्षेत्र ऑडिटरी कॉर्टिकल स्टोर्स से भी संपर्क करने की कोशिश कर रहा है. यह वह क्षेत्र है जिसमें पहले से सुने हुए संगीत के आधार पर ध्वनि से संबंधित जानकारियों को जमा किया जाता है. डॉक्टर सालिमपूर कहते हैं दिमाग का यह क्षेत्र हर व्यक्ति के लिहाज से विशिष्ट होता है क्योंकि हम सबने अलग तरह का संगीत सुना होता है. अब शोधकर्ता यह जानने की कोशिश में हैं कि यह हमारे संगीत की पसंद को किस तरह प्रभावित करता है. और क्या दिमागी हलचल यह बता सकती है कि क्यों लोगों का झुकाव किसी ख़ास किस्म के संगीत की तरफ़ होता ह |
| DATE: 2013-04-12 |
| LABEL: science |
| [463] TITLE: पासवर्ड याद रखने के झंझट से छुटकारा? |
| CONTENT: तकनीक के बढ़ते चलन की वजह से आप अपना कोई भी काम इलेक्ट्रॉनिक तरीके से कर सकते हैं. चाहे वो बैंक से भुगतान करना हो या फिर शॉपिंग. ऑनलाइन गतिविधियों के लिए आपको विभिन्न फोरम में अपना खाता खोलना होता है और हर खाते के साथ एक पासवर्ड भी बनाना होता है. कई बार तो इतने तरह के अकाउंट बन जाते हैं कि उनके पासवर्ड को संभालना भी एक भारी भरकम काम हो जाता है. लेकिन आने वाले दिनों में आपको अपने इलेक्ट्रॉनिक खातों को खोलने के लिए पासवर्ड टाइप करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. आप अपने दिमाग में सोचेंगे और आपका अकाउंट खुल जाएगा. ये संभव होगा वायरलेस हेडसेट डिवाइस के जरिए. यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया के बर्कले स्कूल ऑफ़ इन्फॉर्मेशन के शोध वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो आपके दिमाग की तरंगों के जरिए ही आपकी वैधता को सत्यापित कर लेगा. ये हेडसेट डिवाइस कंप्यूटर से ब्लूटूथ के जरिए भी जुड़ सकता है. जब आप इसे पहनेंगे तो आपके दिमाग के इलेक्ट्रॉनसेप्लोग्राम ईईजी तरंगों को कैच कर लेगा. इसके जरिए ही आप जो सोचेंगे वह पासवर्ड इसे मालूम हो जाएगा. जॉन चुआंग के नेतृत्व में वैज्ञानिकों के दल ने इस डिवाइस को तैयार किया है जो करीब सौ डॉलर की कीमत पर उपलब्ध है. शोध वैज्ञानिकों ने यूनिवर्सिटी की न्यूज़ रिलीज़ में बताया है हमने दिमाग की तरंगों को कैच किया है. इसमें बेहद सस्ता ईईजी सेंसर का इस्तेमाल किया गया है. इसके बावजूद ये काफी प्रमाणिकता के साथ आपकी वैधता की पहचान करने में सक्षम है. लेकिन आप जो सोच रहे हों वही कोई दूसरा सोचे तब क्या होगा. तब क्या आपका अकाउंट सुरक्षित रहेगा. तो परेशान मत होइए आपका अकाउंट सुरक्षित रहेगा क्योंकि सोच समान होने के बाद भी दोनों के दिमाग की तरंग अलग अलग होंगी. इस हेडसेट के शुरुआती प्रयोगों में शोध वैज्ञानिकों ने इस्तेमाल करने वालों से सात तरह के मानसिक काम करने को कहा. इसमें पहले तीन काम तो सभी के लिए एक समान थे जिसमें सांस लेना की बोर्ड पर उंगलियों के उतार चढ़ाव आवाज को सुनने और उसके बाद की प्रतिक्रिया पर नजर रखी गई. इसके बाद के चार अलग अलग तरह के मानसिक अभ्यासों के जरिए आदमी के मानसिक तंरगों को पढ़ने की कोशिश की है. इसमें महज एक फ़ीसदी गड़बड़ी की आशंका बताई गई है. |
| DATE: 2013-04-12 |
| LABEL: science |
| [464] TITLE: पॉर्न वेबसाइट ख़राब कर सकती है कंप्यूटर |
| CONTENT: अध्ययनों में पाया गया है कि दुनिया भर में मशहूर पॉर्न यानी अश्लील सामग्री दिखाने वाली वेबसाइटें अपने उपयोगकर्ताओं के लिए ख़तरा बनती जा रही हैं. लाखों लोग इन वेबसाइट का उपयोग करते है. लेकिन इन पर मौज़ूद विज्ञापन कंप्यूटर को नुक़सान पहुंचाने वाली फ़ाइलें डाल देते हैं. उपयोगकर्ता को इसकी जानकारी नहीं हो पाती है. शोधकर्ता कॉनराड लॉंगमोर ने पाया कि एक्सहैमस्टर और पॉर्नहब नाम की दो मशहूर वेबसाइटों पर यह ख़तरा कुछ ज्यादा ही था. उनका कहना है कि उपयोगकर्ताओं के लिए दुर्भावना से भरे इन विज्ञापनों की शिकायत कर पाना आसान होना चाहिए. लॉंगमोर कहते हैं कि अभी तो यह केवल विंडोज का उपयोग करने वालों के लिए ही ख़तरा हैं. लेकिन इसके लिए जिम्मेदार लोग अब मोबाइल फ़ोन पर भी तेज़ी ध्यान दे रहे हैं. हालांकि यह पाया गया कि किसी भी पॉर्न वेबसाइट पर उनका अपना कोई वायरस नहीं था. लेकिन उनपर लगे विज्ञापनों ने उपयोगकर्ताओं के लिए परेशानी खड़ी की. लॉंगमोर ने बतायाहम इन दुर्भावनापूर्ण विज्ञापनों को मालवरटाइजिंग के नाम से पुकारते हैं. उन्होंने बताया कि दुनियाभर में इन विज्ञापनों को जिस तरह से बेचा जाता है वह काफी जटिल है. ऐसे विज्ञापन कई बार दोबारा बेच दिए जाते हैं इसलिए यह पता लगाना काफ़ी कठिन है कि आख़िर इनके पीछे हाथ किसका है. वे अक्सर अपना रूप बदलते रहते हैं. लॉंगमोर ने इन आंकड़ों का विश्लेषण करने के लिए वेबसाइटों की नुक़सानदायक सामग्री का नियमित विश्लेषण करने वाली गूगल की सुविधा का सहारा लिया. वेबसाइटों पर नजर रखने वाली वेबसाइट एलेक्सा के मुताबिक़ इंटरनेट पर लोकप्रियता के मामले में एक्सहैमस्टर 46वें नंबर पर है. पिछले तीन महीनों में इसके 20 हज़ार 986 पन्नों में से 1067 पन्नों पर मालवरटाइजिंग पाए गए. एलेक्सा के आंकड़ों के मुताबिक़ एक औसत उपयोगकर्ता इसके 10-3 पन्नों को देखता है. इसका मतलब यह हुआ कि इस दौरान उसे इन नुकसानदायक विज्ञापनों का ख़तरा 42 फ़ीसदी है. वहीं दूसरी मशहूर वेबसाइट पॉर्नहब के कुल पन्नों में से 12-7 फ़ीसदी पर नुक़सानदायक विज्ञापन पाए गए. लॉंगमोर कहते हैं ऐसा लगता है कि मशहूर वेबसाइटों पर पिछले हफ़्तों या उससे पहले से ऐसी ख़तरनाक फाइलों में बढ़ोतरी हुई है. उन्होंने बताया कि गूगल की ओर से की गई जांच के समय सबसे अधिक मशहूर वेबसाइट एक्सवीडियो पर कोई भी नुक़सानदाक विज्ञापन नहीं पाया गया. इसका मतलब यह हुआ कि उसे साफ किया गया था. लॉंगमोर का मानना है कि बहुत से उपयोगकर्ता इन वेवसाइटों के इस खतरे से डरे हुए हैं इसका मतलब यह हुआ कि बहुत सी मालवरटाइजिंग की शिकायत नहीं हो पाएगी. उन्होंने कहा कि इस समस्या का एक भाग यह भी है कि सेक्स को वर्जित विषय माना जाता है. उन्होंने कहा कि वास्तविकता यह है कि पॉर्न वेबसाइटें बहुत ही मशहूर है इनमें से कई तो दुनिया की सौ मशहूर वेबसाइटों में भी शामिल हैं. इनमें से कुछ के पास बीबीसी से भी अधिक उपयोगकर्ता हैं. इसलिए यह एक बहुत ही गंभीर विषय है. उन्होंने कहा कि इनके संचालकों को वेबसाइट्स पर दिखने वाले ऐसे विज्ञापनों की शिकायत की एक व्यवस्था बनानी चाहिए और नेटवर्क को भी कुछ जिम्मेदारी लेनी चाहिए. उन्होंने कहामुझे नहीं लगता की यह बहुत जल्द होने वाला है. लेकिन इनके उपयोगकर्ताओं के लिए अच्छी बात यह होगी की वे अपने कंप्यूटर को अप टू डेट रखे. बीबीसी ने एक्सहैमस्टर और पॉर्नहब के मालिकों से संपर्क किया. लेकिन इस संबध में उनसे अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली हैं. |
| DATE: 2013-04-11 |
| LABEL: science |
| [465] TITLE: नहीं रहे टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक के जनक |
| CONTENT: परखनली शिशु यानी आईवीएफ तकनीक विकसित करके लाखों लोगों की जिंदगी में खुशियां लाने वाले प्रोफेसर सर रॉबर्ट एडवर्ड्स का निधन हो गया है. वो 87 साल के थे. दुनिया की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी लुईस ब्राउन ने एडवर्ड्स को श्रदांजलि देते हुए कहा मैंने हमेशा रॉबर्ट एडवर्ड्स को अपने दादा की तरह माना. उन्होंने जो काम किया उससे दुनियाभर में लाखों लोगों की जिंदगी में खुशियां आईं. उन्होंने कहा मुझे इस बात की खुशी है कि वो इतने लंबे समय तक हमारे बीच रहे कि अपने काम को नोबेल की मान्यता मिलते देख सके. दुनियाभर में आईवीएफ पर हो रहे काम के साथ उनकी विरासत आगे बढ़ती रहेगी. प्रोफेसर एडवर्ड्स के ही प्रयासों से 1978 में ओल्डहैम जनरल हॉस्पिटल में 1978 में लुईस ब्राउन का जन्म हुआ था. प्रोफेसर एडवर्ड्स को 2010 में नोबेल और 2011 में नाइटहुड से सम्मानित किया गया था. आज़ आईवीएफ का दुनियाभर में इस्तेमाल हो रहा है और इस तकनीक से 50 लाख से अधिक बच्चों का जन्म हो चुका है. प्रोफेसर एडवर्ड्स कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में फेलो थे. विश्वविद्यालय ने कहा कि प्रोफेसर एडवर्ड्स के काम ने क्रांतिकारी बदलाव लाने का काम किया है. वर्ष 1925 में यॉर्कशायर के एक कामकाजी परिवार में जन्मे प्रोफेसर एडवर्ड्स द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रितानी सेना से जुड़े रहे. वतन वापसी के बाद उन्होंने पहले कृषि विज्ञान की पढ़ाई की और फिर आनुवांशिकी विज्ञान का रुख़ किया. पहले किए गए शोध में इस बात की पुष्टि की जा चुकी थी कि मादा खरगोश के अंडे को नर खरगोश के शुक्राणुओं से परखनली में निषेचित किया जा सकता है. प्रोफेसर एडवर्ड्स ने इस तकनीक को इंसानों पर आजमाया. साल 1968 में कैम्ब्रिज में एक प्रयोगशाला में उन्होंने पहली बार गर्भ के बाहर एक मानव भ्रूण को विकसित किया. प्रोफेसर एडवर्ड्स ने उस क्षण को याद करते हुए कहा था मैं उस दिन को कभी नहीं भुला सकता जब मैंने सूक्ष्मदर्शीं में देखा और पाया कि एक मानव ब्लास्टोसिस्ट निषेचन के तुरंत बाद की स्थिति मुझे घूर रहा है. मेरे मुंह से अनायास ही निकल पड़ा हम अपने काम में सफल रहे. बीमारी और कमजोरी के कारण प्रोफेसर एडवर्ड्स 2010 में नोबेल पुरस्कार ग्रहण करने स्टॉकहोम नहीं जा सके और उनकी तरफ से उनकी पत्नी रूथ ने ये सम्मान हासिल किया. |
| DATE: 2013-04-11 |
| LABEL: science |
| [466] TITLE: एक किलोमीटर तक की तस्वीरें खींचने वाला कैमरा |
| CONTENT: एडिनबरा में वैज्ञानिकों के एक दल ने करीब एक किलोमीटर तक थ्रीडी तस्वीरें लेने वाला कैमरा तैयार किया है. हैरिएट-वॉट विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञानियों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो लेज़र का इस्तेमाल कर तकरीबन सभी चीज़ों को स्कैन कर लेता है. दल का दावा है कि थोड़े से और शोध के बाद कैमरे की रेंज को 10 किमी तक बढ़ाया जा सकता है. इस कैमरे का इस्तेमाल मुख्यतः वाहनों जैसी चीज़ों को स्कैन करने के लिए किया जाएगा. यह कैमरा अभी इंसानी त्वचा को नहीं देख सकता. इसकी वजह यह है कि त्वचा लेज़र को उस तरह परावर्तित नहीं करती जैसे अन्य चीज़ें करती हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि अगर आप ऐसे कैमरे की नज़र में आने से बचना चाहते हैं तो नंगा होना आसान उपाय है. वस्तुओं की तस्वीरें लेने के अलावा इस तकनीक का इस्तेमाल चट्टानों के सरकने या हरियाली के पनपने पर नज़र रखने के लिए किया जा सकता है. टीम के अनुसार कैमरा लेज़र को विभिन्न पदार्थों की ओर फेंकता है और रोशनी के वापस डिटेक्टर तक पहुंचने में लगे समय के आधार पर तस्वीरें बनाता है. यह कैमरा एक मिलीमीटर की सटीकता से चीज़ों को रिकॉर्ड कर सकता है. शोध दल को यकीन है कि इसके तस्वीर बनाने वाले सॉफ़्टवेयर में कुछ और सुधार करके इसी तकनीक को वस्तु की दिशा और गति मापने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है. हैरिएट-वॉट में एक शोधार्थी ऑगनस मैकर्थी ने कहा इस खोज ने एक बड़े इलाके में सामान्य छोटे लक्ष्यों की विस्तृत तस्वीर बनाने का रास्ता खोल दिया है. वह आगे कहते हैं ये साफ़ है कि इस मशीन को छोटा और तेज़ बनाए जाने की ज़रूरत है. लेकिन हमारा यकीन है कि एक हल्का पूरी तरह लाए-ले जाने में सक्षम स्कैनिंग डेप्थ इमेजर बनाना संभव है और ऐसा उत्पाद पांच साल से भी कम वक्त में तैयार हो सकता है. |
| DATE: 2013-04-10 |
| LABEL: science |
| [467] TITLE: विमानों पर हिचकोले खाएँ और पैसा भी दें |
| CONTENT: वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में उत्तरी अटलांटिक पार जाने वाले विमानों को और भी अधिक हिचकोले झेलने पड़ेंगे. ब्रितानी रीडिंग विश्वविद्यालय की देख-रेख में हुए एक शोध के मुताबिक़ विमानों को पहले ही तेज़ हवाओं का सामना करना पड़ रहा है और आने वाले दिनों में झटके और बढ़ेंगे. पर्यावरण से जुड़ी पत्रिका नेचर क्लाइमेट चेंज में छपे अध्ययन में संकेत दिए गए हैं कि सदी के मध्य तक यात्रियों को और अधिक झटके बर्दाश्त करने होंगे और वो जल्दी-जल्दी होंगे. उत्तरी अटलांटिक के उन इलाक़ों जिनमें विमानों को झटके लगते हैं उनकी परिधि बढ़ जाएगी. रीडिंग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉक्टर पॉल विलियम्स कहते हैं कि ये महज़ आरामदेह सफ़र का मामला नहीं है बल्कि इसके आर्थिक पहलू भी है. उन्होंने बीबीसी से कहा कि इन परिधियों से बचने के लिए विमान लंबा रास्ता लेगें जिससे तेल का ख़र्च बढ़ेगा. उन्होंने कहा कि ईंधन के लिए पैसे लगते हैं जो विमान कंपनियों को खर्च करने होंगे और ज़ाहिर है कि ये आख़िरकार यात्रियों की जेब से ही बाहर आएगा. वैज्ञानिकों ने अपनी जांच का केंद्र उत्तरी अटलांटिक कॉरिडोर को बनाया था जिससे होकर अमरीका और यूरोप के बीच हर दिन तक़रीबन 600 विमान उड़ान भरते हैं. हालांकि इसपर कोई ठोस आंकड़े मौजूद नहीं है लेकिन विमानों को हिचकोलों से जो नुक़सान बर्दाश्त करना पड़ता है वो सालाना अनुमानत 15 करोड़ डॉलर है. ये ख़र्च विमानों को हुए नुक़सान में किसी भी बड़ी घटना के बाद उसकी जांच में आया ख़र्च लोगों को आई चोटों वग़ैरह पर आने वाला खर्च शामिल है. |
| DATE: 2013-04-09 |
| LABEL: science |
| [468] TITLE: डांस कीजिए, बुढ़ापा दूर भगाइए |
| CONTENT: दुनिया की आबादी आहिस्ता-आहिस्ता बूढ़ी हो रही है. माना जा रहा है कि 2030 तक हर आठवें व्यक्ति की उम्र 65 साल या इससे भी ज्यादा होगी. यही नहीं उनके इससे भी ज्यादा दिन तक जिंदा रहने की उम्मीदें है. लंबी उम्र के कई खतरे होते हैं. उन अतिरिक्त सालों में पुरानी बीमारियों के कारण लोग बीमारी और कमजोरी से जूझते दिखेंगे. यही नहीं स्वस्थ रहने का खर्च आसमान छुएगा. अमरीका में अल्जाइमर जैसी बुढापे की बीमारी से पीड़ित लोगों की संख्या एक करोड़ 32 लाख होने की संभावना है यानी अल्जाइमर के रोगियों की संख्या सदी के मध्य तक दोगुनी हो जाएगी. ऐसे मरीजों की देखभाल का खर्चा भी एक लाख करोड़ डॉलर होने की संभावना है. पूरी दुनिया के वैज्ञानिक ये पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि उम्र के बढ़ने के साथ ही साथ वे कैसे स्वस्थ भी रहें. इसके नए और किफायती तरीके तलाशने की कोशिश की जा रही है. इस बात की भी संभावनाएं तलाशने की कोशिश हो रही है कि क्या कला के जरिए अधिक उम्र में होने वाली बीमारियों का इलाज संभव है तात्पर्य ये कि क्या रचनात्मक गतिविधियों के जरिए व्यक्ति ज्यादा दिनों तक जवान बना रह सकता है शीली 66 साल की हैं. उनमें जो आकर्षण और जोश है वह उनसे आधी उम्र की महिला को भी मात दे सकता है. वे इसका श्रेय डांस को देती हैं. मैं डांस करती हूं क्योंकि मैं डांस नहीं कर सकती थी. अब जब एक बार इसे शुरु कर दिया तो मुझे कोई नहीं रोक सकता. आज ये हाल है कि डांस मेरी जिंदगी बन गया है. वो बताती हैं कि एक कंपनी हर सप्ताह डांस का वर्कशाप करती है जिसने यहां डांस सीखने आने वाले सभी बुजुर्गों का जीवन बदल दिया है. डांस के इस वर्कशाप में आने वाले एक और बुजुर्ग थॉमस डायर 78 साल के हैं. वे अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं जब से मैंने डांस करना शुरु किया है मेरी तन्मयता और मुस्तैदी बढ़ गई है. वे मानते हैं कि डांस में हर स्टेप की टाइमिंग बेहद उतार-चढ़ाव वाली होती है और इस तरह की गतिविधियों से ही इस उम्र में भी सक्रियता और ऊर्जा बनी रहती है. 2030 में ऐसा पहली बार होगा कि बूढ़ों की गिनती बच्चों से ज्यादा हो जाएगी और अब नीति निर्माताओं के लिए यह चिंता का प्रमुख विषय होने वाला है कि बुढ़ापे में भी लोग शारीरिक और मानसिक रूप से कैसे भले-चंगे रह सकते हैं ये माना जा रहा है कि इस संदर्भ में कला एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. वॉशिंगटन में सेंटर फॉर सीनियर्स है. इस सेंटर का मकसद बूढ़ों को सामाजिक रूप से सक्रिय रखना है. वे बुजुर्ग जो अपने जीवन में अलगाव व अवसाद झेल रहे हैं उनमें यहां आने के बाद खुद को काफी जोशो-खरोश और उत्साह से भरा पा रहे हैं. एक शोध के अनुसार कला के विभिन्न रूपों जैसे डांस पेंटिंग ड्राइंग आदि में सक्रिय होने से शरीर और मन पर काफी गहरा असर होता है. हम शारीरिक और मानसिक रूप से निरोग महसूस करते हैं. मगर ये सुनिश्चित करना जरूरी है कि व्यक्ति ज्यादा दिन जीने के साथ-साथ तंदुरुस्त भी रहे. अधिक उम्र से जुडे़ रोग न केवल कष्टकारी होते हैं बल्कि उनसे जूझना जेब पर भी भारी पड़ता है. सक्रियता रोगों के लक्षणों को टालने में कामयाब होती है. |
| DATE: 2013-04-09 |
| LABEL: science |
| [469] TITLE: क्या दिल के लिए ख़तरनाक है रेड मीट? |
| CONTENT: अमरीका में हुए एक अध्ययन में पता चला है कि गोमांस सूअर और बकरे के गोश्त या दूसरे शब्दों में कहें तो रेड मीट में पाया जाने वाला एक रसायन दिल के लिए ख़तरनाक होता है. नेचर मेडिसिन नाम की विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक़ रेड मीट में पाया जाने वाला क्रेनिटाइन नाम के रसायन को बैक्टिरिया पेट में छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देते हैं. इसके बाद होने वाली रासायनिक क्रिया की वजह से शरीर में कॉलस्ट्रॉल के स्तर में बेहद इजाफा होता है जिससे हृदय रोग की आशंका भी बढ़ जाती है. खान-पान विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि क्रेनिटाइन की खुराक लेने वालों के लिए यह एक ख़तरनाक संकेत हो सकता है. नियमित तौर पर रेड मीट खाने वालों के लिए इस अध्ययन के नतीजे बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. ब्रिटेन में सरकार एक दिन में 70 ग्राम रेड मीट या डिब्बा बंद गोश्त खाने की अनुशंसा करती है. ऐसा माना जाता है कि डिब्बा बंद गोश्त का संतृप्त वसा हृदय रोगों का कारण बनता है. लेकिन यह कहानी का पूरा सच नहीं है. शोधकर्ता डॉक्टर स्टैनिली हेजन कहते हैं कोलेस्ट्राल और रेड मीट का संतृप्त वसा ही इसका प्रमुख कारक नहीं है यहां कुछ और भी है जो हृदय रोग का जोखिम बढ़ाने में योगदान देता है. चूहों और इंसानों पर हुए प्रयोगों में पता चला कि पेट में मौज़ूद यह बैक्टिरिया क्रेनिटाइन को खा जाता है. इससे क्रेनिटाइन गैस में बदल जाता है फिर यह लीवर में जाकर टामो नाम के एक रसायन में परिवर्तित हो जाता है. इस अध्ययन से यह पता चला कि टामो का संबंध रक्त वाहिकाओं में वसा के जमने से था. इससे हृदय रोगों का ख़तरा बढ़ने के साथ-साथ मौत भी हो सकती है. क्लीवलैंड क्लिनिक के डॉक्टर हेज़न कहते हैं टामो को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है. हो सकता है कि यह बेकार हो. लेकिन यह कोलेस्ट्राल मेटाबॉलिजम को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है. यह कोलेस्ट्राल के स्तर को बढ़ा सकता है. वह कहते हैं अध्ययन बताता है कि कम रेड मीट खाना ही बेहतर है. पहले मैं हफ़्ते में पांच दिन रेड मीट खाता था. लेकिन अब मैंने इसे घटाकर दो हफ़्ते में एक बार या और भी कम कर दिया है. उन्होंने बताया अध्ययन के नतीजों से इस बात को बल मिला है कि पेट में बैक्टिरिया के संतुलन में बदलाव के लिए प्रोबायोटिक दही खाई जाए. मांसाहारी लोगों की तुलना में शाकाहारी लोगों में प्राकृतिक रूप से कुछ ऐसे बैक्टिरिया पाए जाते हैं जो क्रेनिटाइन को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने में सक्षम होते हैं. ब्रिटिश हर्ट फाउंडेशन की वरिष्ठ आहार विशेषज्ञ विक्टोरिया टेलर कहती हैं निश्चित रूप से यह एक दिलचस्प खोज है जो इस बात पर प्रकाश डालती है कि रेड मीट हृदय पर प्रभाव डाल सकता है. हालांकि कुछ विशेषज्ञों की राय इससे अलग भी है. सेंट जार्ज अस्पताल की आहार विशेषज्ञ कैथरीन कोलिंस कहती हैं यह बहुत ही ठोस तर्क है. लेकिन हम जानते हैं कि हफ्ते में एक बार कुछ रेड मीट खाने से दिल को कोई ख़तरा नहीं है. वह कहती हैं इससे हमें अपने खान-पान की सिफारिशें बदलने की ज़रूरत नहीं है. थोड़ा गोश्त मछली दूध से बनी चीजें और शराब दालें फल सब्जियां खड़े अनाज और असंतृप्त वसा का उपयोग अभी भी स्वास्थ्य और स्वस्थ जीवन की कुंजी है. |
| DATE: 2013-04-09 |
| LABEL: science |
| [470] TITLE: क्या भूख पर लग सकती है लगाम? |
| CONTENT: क्या विज्ञान के जरिए भूख पर नियंत्रण पाया जा सकता है मुमकिन है कि इस सवाल का जवाब हां में हो जाए. दरअसल वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क में कोशिकाओं के एक ऐसे समूह की पहचान की है जिसमें भूख को नियंत्रित करने की ताकत है. इन्हीं कोशिकाओं की वजह से खाने की आदत गड़बड़ हो जाती है जिससे मोटापे जैसी स्थिति पैदा होती है. कुतरने वाले जानवर मसलन चूहे गिलहरी आदि पर किए गए प्रयोगों से अंदाजा मिला है कि टैनिसाइटिस नाम की कोशिकाएं न्यूरॉन पैदा करती हैं जो विशेष रूप से भूख को नियंत्रित करता है. इस जानकारी से मस्तिष्क की स्टेम कोशिकाओं के बारे में समझ और बढ़ेगी जिसके जरिए ऐसी दवा बनाने की कोशिश हो सकती है जो भूख को नियंत्रित करने वाले न्यूरॉन की संख्या और उसके काम को व्यवस्थित कर सके. ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने अपने शोध में यह निष्कर्ष निकाला है कि भूख जन्म के समय से ही तय नहीं होती है. उनका यह शोध जर्नल ऑफ न्यूरोसाइंस में प्रकाशित हुआ है. पहले यह माना जाता था कि भूख को नियंत्रित करने वाली मस्तिष्क में मौजूद तंत्रिका कोशिकाएं गर्भ में भ्रूण के विकास के दौरान बनती हैं और इसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है. लेकिन यूएई के शोध में युवा और बड़े चूहों व गिलहरी के दिमाग में स्टेम कोशिकाओं की तरह काम करने वाले टैनिसाइटिस की खोज से यह अंदाजा मिलता है कि भूख में बदलाव किया जा सकता है. शोधकर्ताओं ने दिमाग के एक अहम हिस्से हाइपोथैलेमस पर गहराई से अध्ययन किया जो नींद ऊर्जा ह्रास भूख प्यास और कई अन्य महत्वपूर्ण जैविक कार्यों को नियंत्रित करता है. उन्होंने जेनेटिक फेट मैपिंग तकनीक का उपयोग करते हुए तंत्रिका कोशिकाओं का अध्ययन किया जो भूख को नियंत्रित करती हैं. उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि कुछ कोशिकाओं ने जन्म के बाद से लेकर वयस्क होने तक चूहे के दिमाग में भूख को नियंत्रित करने वाले तंत्र में न्यूरॉन जोड़ा. विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के प्रमुख शोधकर्ता मोहम्मद हाजी हुसैनी का कहना है कि इस खोज से मोटापे से निपटने के लिए एक स्थायी समाधान की पेशकश की जा सकती है लेकिन इस खोज को मानव शरीर पर आजमाने में अभी पांच या दस साल लग सकते हैं. उन्होंने कहा इस अध्ययन से पता चला है कि भूख पर नियंत्रण करने वाले तंत्रिका तंत्र के चक्र की संख्या तय नहीं है और संभवतः खाने से जुड़े विकारों से निपटने के लिए इसकी संख्या में फेरबदल किया जा सकता है. हाजी हुसैनी का कहना है अगला कदम जीनों के समूह और कोशिकाओं की प्रक्रिया को परिभाषित करना है जो टैनिसाइटिस की गतिविधि और व्यवहार को नियंत्रित करता है. वह कहते हैं कि भूख को नियंत्रित करने के लिए भले ही कोई एक उपाय न हो लेकिन मोटापे से जुड़ा कोई भी समाधान दिमाग के हिस्से से जरूर जुड़ा होगा जिससे भूख से जुड़े फैसले होते हैं. |
| DATE: 2013-04-08 |
| LABEL: science |
| [471] TITLE: जब विंटेज कारें बिजली से चलेंगी. |
| CONTENT: कैलिफ़ोर्निया स्थित जेलिक्ट्रिक मोटर्स इन्वेस्टमेंट ग्रेड क्रेडिट रेटिंग का दर्जा हासिल फॉक्सवैगन की क्लासिक बीटल को 100 इलेक्ट्रिक कार में बदलने की योजना बना रही है. इससे प्रेरित होकर बीबीसी ऑटो ने गैस से चलने वाली कुछ विंटेज कारों को चुना है जो इलेक्ट्रिक व्हीकल ईवी में बदलने जाने के लिए प्रमुख दावेदार हो सकती हैं. लैंबोर्गिनी यूरैको को मिउरा और काउन्टेक जैसी मशहूर कारें बनाने वाले मार्सेलो गान्डिनि ने डिज़ाइन किया है. टू सिटर बेहद तेज़ और भयंकर महंगी कारें बनाने वाली कंपनी ने यह ठीक-ठाक ताकतवर तुलनात्मक रूप से खरीदने योग्य और फ़ोर सिटर कार बनाई जो कि अच्छी-ख़ासी चली भी. कंपनी ने छह साल के दौरान 791 कारें बनाईं जो 2 2-5 और 3 लीटर के वी-8 इंजन से लैस थीं जो क्रमशः 180 217 और 247 हॉर्सपावर की ताकत देते थे. यूरैको ईवी में कन्वर्ट होने के लिए अच्छी गाड़ी है. भविष्य के लिए डिज़ाइन की गई लेकिन अविश्वसनीयता के लिए मशहूर हुई ट्रिंफ़ टीआर7 चाहे कूप हो या कंवर्टिबल निर्विवाद रूप से ईवी में बदलाव के लिए उपयुक्त है. इसमें ईवी हार्डवेयर को लगाने के लिए पर्याप्त जगह है और ऐसा लगता नहीं कि कोई इसके दो लीटर इंजन के लिए रोएगा. क्योंकि ट्रिंफ ने 112000 कूप और 29000 कनवर्टिबल गाड़ियां बनाई थीं इसलिए इनके मिलने में भी कोई परेशानी नहीं होगी. हां चालू हालत में मिलने में दिक्कत हो सकती है लेकिन हमारे प्रयोग के लिए इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. हालांकि इसमें इसकी कोई ग़लती नहीं थी लेकिन तीसरी पीढ़ी की कोर्वेट एक मज़ाक ही थी. कड़े उत्सर्जन नियमों के बोझ तले दबकर अमरीका की यह स्पोर्ट्स कार अपनी शानदार शरीर के हिसाब से प्रदर्शन नहीं कर सकी. 1980 में कैलिफ़ोर्निया कोर्वेट के लॉंच के साथ ही इसका सबसे ख़राब समय आ गया. इसके 350सीसी के वी-8 इंजन को बदलकर काफ़ी हल्का 305सीसी का 180 बीएचपी ताकत वाला इंजन लगा दिया गया लेकिन कार्बन मोनोऑक्साइड उत्सर्जन के स्तर में फ़र्क भी बहुत कम पड़ा. लेकिन 305 सीसी के इंजन को हटाकर लीथियम-आयन बैटरी और उसके अनुसार जबरदस्त इलेक्ट्रिक मोटर लगाने के लिए सी3 बिल्कुल उपयुक्त है. बर्टन की डिज़ाइन की गई इस कार की फ़िएट ने करीब 140000 यूनिट बेची. इसके बाद बर्टन ने खुद 1989 तक इसका निर्माण किया और 20000 और कारें बेचीं. चार दशक पुरानी गाड़ियां भी ज़ंग से बची हुई हैं और अब भी चमकदार दिखती हैं. हालांकि इटली की यह गाड़ी बहुत तेज नहीं भागती थी लेकिन इसका इलाज किया जा सकता है. च होने के चालीस साल बाद भी पोर्श-फ़ॉक्सवैगन के संयुक्त उपक्रम से बनी पोर्श 914 जर्मन इंजीनियरिंग का शानदार नमूना बनी हुई है. इसके बीच में इंजन वाले डिजाइन के चलते यह ईवी में बदलने के लिए एक प्रमुख दावेदार बन जाती है. कम ही लोग इसके चार सिलेंजर वाले इंजन को बदलने पर ऐतराज़ करेंगे जो अपने सात साल के निर्माण के दौरान कभी 100 एचपी की ताकत तक नहीं पहुंच पाया हम महंगे छह सिलेंडर इंजन को छोड़ देते हैं. जर्मन इंजीनियरिंग और इसकी उत्पादन क्षमता का धन्यवाद 119000 गाड़ियां बनाई गई थीं कि अब भी बहुत सी गाड़ियां चलती मिल जाती हैं. हालांकि उत्पादन शुरू करने पर 1997 के इस मॉडल का मीडिया ने बहुत मज़ाक बनाया था लेकिन प्रोलेर अमरीका की चमकदार प्रतीक थी. लेकिन प्रोलेर की असल कमी इसका इंजन था वही 3-5 लीटर वी-6 इंजन को किसी भी सामान्य सिडान जासे कि क्रिसलर कॉनकोर्ड और डॉज इंट्रिपिड में मिल जाता था. इसे बहुत से हल्के एल्यूमिनियम के टुकड़ों से बनाया जाता था जिससे इसका वजन 3000 पाउंज से कम रहता था. क्रिसलर ने पांच साल के दौरान 12000 प्रोलेर बनाई. बोनस यह है कि असली प्रोलेर ट्रेलर भी मिल सकता है जो 5000 डॉलर में कार में डिग्गी की दिक्कत को दूर करने के लिए बनाया जाता था. इसमें एक ऑक्सिलेरी बैटरी को रखा जा सकता है. चाहे आप इससे पसंद करें या ससे नफ़रत करें लागोन्डा की सितारों वाली चमक से इनकार नहीं किया जा सकता. दुर्भाग्य से कई और चीज़ें ऐसी हैं जिनसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. इलेक्ट्रिकल सिस्टम जिससे कई शानदार डिजिटल उपकरण जुड़े थे यकीनन अविश्वसनीय था. फिर 5-3 लीटर का कार्बोरेटेड वी-8 इंजन जो तीन स्पीड वाले क्रिसलर टॉर्कफ्लाइट ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन के जोड़ का था बहुत ज़्यादा तेल पीता था. एस्टन मार्टिन ने 14 साल तक 645 लैगोन्डा बनाईं. इस कार का मिलना कोई आसान काम नहीं है और फिर इसे ईवी में बदलना कमज़ोर दिल और हल्के बटुवे वालों के बस का नहीं. फिर भी अगर ऐसा हो गया तो. बीसवीं सदी की सबसे ख़राब कार चित्र गैलरी की एंकर कार यही है. पेसर अच्छे इरादों और मौलिक फ़ीचर वाली गाड़ी थी- जैसे कि सवारी वाला दरवाज़ा ड्राइवर के दरवाज़े के चार इंच बड़ा था ताकि उतरने और चढ़ने में दिक्कत न हो. गाड़ी को शुरू में वांकेल रोटरी इंजन के लिहाज से डिजा़इन किया गया था लेकिन जब यह योजना सिरे नहीं चढ़ी तो इसमें इन-लाइन सिक्स को बैठा दिया गया. इसका परिणाम यह हुआ कि पेसर दिखती तो अंतरिक्ष में रहने वाले जॉर्ज जेटसन की तरह थी और तेल पाषाण युग के फ्रेड फ़्लिंटस्टोन की तरह पीती थी. लेकिन आधुनिक तकनीक का शुक्रिया ये दिक्कतें दूर की जा सकती हैं. वैन 1960 में बहुत हिट थीं. फ़ोर्ड जनरल मोटर्स क्रिसलर सभी की इस वर्ग में एक सी आधुनिक गाड़ियां थीं. सभी 1950 की फ़ॉक्सवैगन टाइप-2 से प्रेरित थीं जो सामने से फ़्लैट और पीछे से उठी सी दिखती थी. इनमें सबसे बढ़िया थी डॉज ए 100 जिसके बड़े गोल हैडलैंप थे बड़ी विंडस्क्रीन थी और 90 इंच का व्हीलबेस था. ये मजबूत भी थीं और इनमें क्रिसलर के स्लैंट-सिक्स इंजन के अलावा सीट के नीचे वी-8 इंजिन भी फिट किए जा सकते थे. जगुआर एक्सजेएस की संदिग्ध विश्ववसनीयता ही वह वजह है जिसके चलते यह इस सूची में शामिल हो पाई है. वैसे ई-टाइप की यह अर्ध-वारिस हैं भी काफ़ी संख्या में. 21 साल की अवधि में जगुआर की फ़ैक्ट्री से 115000 कूपे सेमी-कनवर्टिबल और कनवर्टिबल गाड़ियां निकलीं. एक ख़ूबसूरत गाड़ी को ढूंढना मुश्किल नहीं है और तकनीकी रूप से अक्षम लेकिन ख़ूबसूरत गाड़ी को ढूंढना तो और आसान है. |
| DATE: 2013-04-08 |
| LABEL: science |
| [472] TITLE: शतरंज खेलनी वाली मशीन क्या एक छलावा था? |
| CONTENT: शतरंज में अपने विरोधियों को हराने में सक्षम 18 वीं सदी की एक मशीन मनुष्य की कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आगमन को साफ तौर पर बताती थी. यह एक अच्छी तरह से बुना गया धोखा था लेकिन इसमें अपनी तरह की खूबियां भी थीं. पिछले कुछ समय से मैं उस मशीन के बारे में सोच रहा हूं जिसे तुर्क नाम दिया गया था. हाल ही में कैलिफ़ोर्निया में 18 वीं सदी के शतरंज खेलने वाले इस मानव निर्मित मशीन को दोबारा बनाया गया है. जो लोग तुर्क के बारे में नहीं जानते हैं उन्हें बता दूं कि तुर्क 1970 में पहली बार वियना में देखा गया था. यह एक शतरंज खेलने वाली मशीन थी जिसके कैबिनेट के ऊपर तुर्की कपड़े पहने एक दाढ़ी वाला व्यक्ति बैठा था और सामने शतरंज का बोर्ड रखा था. ऑपरेटर योहान मायज़ेल शतरंज खेलने वाले लोगों को एकत्र कर लेता था और उनके सामने कैबिनेट के नीचे के दरवाज़े खोलकर प्रभावशाली ढंग से चलते यंत्र को दिखाता. तुर्क और शतरंज की बिसात के नीचे का स्थान यह यंत्र घेरे रहता था. इसके बाद वो कैबिनेट को बंद कर देता और किसी चुनौती देने वाले को खेलने के लिए बुलाता. यह यंत्रमानव या रोबोट विरोधी की चाल को देखता विचार करता और फिर अपनी मशीनी बांह उठाकर अपनी चाल चलता. यह एक सनसनीखेज शो था. न्यूयॉर्क में 1850 में आग में नष्ट होने से पहले इसने बेंजामिन फ़्रैंकलिन समेत सबके साथ शतरंज खेला. दंतकथाओं के अनुसार तो नेपोलियन बोनापार्ट से भी. 18वीं सदी को तो लगा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आ गई है कैप्टन हुक की तरह टिक-टिक करते और तुर्की टोपी लगाए. बात आगे बढ़ाने से पहले मैं बता दूं कि ये सब एक धोखा था यूं कहें कि एक चाल एक चालाक जादूगर का भ्रमजाल. अच्छी तरह से फ़िसलने वाला एक पटरा कैबिनेट की निचली ओर लगाया जाता था जिसके सहारे एक शतरंज खिलाड़ी चुपके से उसके अंदर पहुंच जाता था. दरअसल चलती हुई मशीनरी को देखकर जितना लगता था अंदर उससे ज़्यादा जगह थी. तो बात ये है कि ये तुर्क मुझे कई वजह से मोहता है. पहला तो इसलिए कि ये आदमी की तार्किकता की एक बड़ी कमी की ओर इशारा करता था. अगर तुर्क सचमुच में शतरंज खेलने वाली मशीन थी तो ये लंबी कड़ी का सबसे ताज़ा हिस्सा होना चाहिए था. अगर मशीनी तुर्क शतरंज खेल रहा था तो दस साल पहले चेकर्स खेलने वाला कोई मशीन यूनानी होना चाहिए था. कंप्यूटर विज्ञान के पितामह चार्ल्स बैबेज ने तुर्क को देखा और महसूस किया कि ये संभवतः जादू का एक खेल है. उन्होंने खुद से पूछा कि अगर शतरंज खेलने वाली मशीन बनानी हो तो आपको कैसी मशीन बनानी होगीऔर उनका पहला कंप्यूटर डिफरेंस इंजन इसी विचार से पैदा हुआ कि इस समस्या का सबसे अच्छा हल क्या हो सकता है. इसका दूसरा पक्ष भी है जो मुझे बार-बार परेशान करता है. जिस बात ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया था वो ये थी कि आप एक शतरंज का बौना प्रतिभाशाली खिलाड़ी कहां से लाएंगे जो कैबिनेट में फिट हो जाए. या फिर शैतान ऑपरेटर अच्छी तरह से प्रशिक्षित बच्चों का इस्तेमाल कर रहा था. अगर आप ये मान लें कि वो वयस्क खिलाड़ी है तो वो छुपा हुआ लाजवाब चैंपियन कौन होगा. पता चला कि शतरंज के खिलाड़ी जो तुर्क को चलाते थे सिर्फ़ शतरंज के खिलाड़ी थे. हमेशा बदलते रहने वाले अच्छे शतरंज के खिलाड़ी लेकिन स्टार नहीं. ऐसे खिलाड़ी जिन्हें काम की इतनी ज़रूरत होती थी कि वो हफ़्ता या महीना उस घुटनभरी अलमारी के अंदर बिताने के लिए तैयार हो जाते. मायज़ेल खिलाड़ियों को रास्ते में से ही चुनता चाहे वो कहीं भी हो जैसे कि चक बैरी अपने बैंड के सहायकों को रास्ते से ही लिया करते थे. तो ईजाद करने वाले की योग्यता शतरंज खेलने वाली मशीन बनाना नहीं थी. उसकी योग्यता तो ये देखने में थी कि आधुनिक समय में दक्षता उससे ज़्यादा उपलब्ध है जितना आप सोचते हैं. इसके साथ ही असाधारण प्रतिभा आसानी से उपलब्ध है और ज़्यादातर सस्ते में काम करने को तैयार रहती है. तो दरअसल सच ये है कि हम विशेषज्ञ को अक्सर ज़्यादा भाव दे देते हैं और विशेषज्ञता को कम. ऐसे लोग जो ये बात समझते हैं कि दरअसल संपूर्ण रूप से दक्ष कुछ ही लोग होते हैं लेकिन उनके नीचे बहुत सारे लोग भी जानकार होते हैं जिन्हें काम की ज़रूरत है. मायज़ेल ने भी ये सच समझ लिया था और इससे उसने काफ़ी फ़ायदा कमाया. किसी भी खेल में सबसे अच्छा प्रबंधक वो होता है जो प्रतिभावान को बाहर कर सकता है और उसकी जगह लेने के लिए औरों को ढूंढ लाता है. बेकहम को मैदान के बाहर बैठाने वाला मैनेजर उस मैनेजर की जगह कई गुना ज़्यादा सफल होगा जो बेकहम की बॉल घुमाने की प्रतिभा का कायल होगा. |
| DATE: 2013-04-07 |
| LABEL: science |
| [473] TITLE: 'योग' करेंगी कारें, सुधरेगी शहरों की सेहत |
| CONTENT: योग सेहत के लिए हमेशा फायदेमंद होता है चाहे उसे इंसान करे या कारें. चौंक गए ना जी हां कारों की दुनिया में न सिर्फ योग क्रियाएं हो रही हैं बल्कि स्पेन तो कारों की योग क्रांति का केंद्र बन चुका है. हम बात कर रहे हैं बिजली से चलने वाली फोल्डिंग कारों की जो न सिर्फ भीड़ से बजबजाते हुए हमारे शहरों के लिए फायदेमंद हैं बल्कि ग्रीनहाउस उत्सर्जन को रोकने में भी कामयाब साबित होने जा रही हैं. जनवरी 2012 में जब स्पेन के एक कारोबारी उपक्रम हिरिको ड्राइविंग मोबिलिटी समूह ने पहली फोल्डिंग माइक्रो-ईवी कार हिरिको फोल्ड को दुनिया के सामने पेश किया था. उस वक्त किसी को विश्वास नहीं हुआ था कि विचार के स्तर पर अपने जन्म के महज़ दस साल के भीतर यह सपना साकार हो जाएगा. बीते मार्च महीने में दुनिया के सबसे पुराने कार शो जेनेवा मोटर शो में जब दोबारा यह कार दिखी तो यह उत्पादन के चरण तक पहुंच चुकी थी. भारत में इसकी कीमत नौ लाख रुपए से कुछ कम आंकी गई थी. अब ताज़ा खबर यह है कि हिरिको को अपने घर में ही तगड़ी टक्कर मिल रही है. हालिया चुनौती स्पेन के कास्पल समूह की ओर से आई है. इसकी नई फोल्डिंग कार को डिज़ाइनर फ्रा पोदादेरा ने डिज़ाइन किया है. हिरिको की कुल लंबाई ढाई फुट है और इसे मोड़ने के बाद यह सिर्फ डेढ़ फुट की रह जाती है. जबकि पोदादेरा की डिज़ाइन की हुई कार मुड़ने के बाद छह फुट तीन इंच लंबी रहती है. इसकी खूबी यह है कि हिरिको के मुकाबले इसकी अधिकतम गति 66 मील प्रतिघंटा है जबकि हिरिको की 31 मील प्रतिघंटा ही है. महानगरों के लिए विशेष तौर पर बनाई गई हिरिको फोल्ड के एक प्रमुख डिज़ाइनर रायन चिन कहते हैं हमारा उद्देश्य शहरों और वाहनों के रिश्ते को बुनियादी रूप से बदलना था. सवाल यह नहीं कि हम अपने शहरों को गाड़ियों के हिसाब से कैसे तैयार करते हैं बल्कि हमारी चुनौती यह थी कि अपने शहरों के हिसाब से वाहनों को हम कैसे अनुकूलित कर सकते हैं. सिटी कार का विचार पहली बार जनरल मोटर्स द्वारा प्रायोजित एक डिज़ाइन कार्यशाला मीडिया लैब में 2003 में जन्मा था. इसके बाद वास्तुकला शहरी नियोजन कंप्यूटर विज्ञान और मेकैनिकल इंजीनियरिंग आदि विविध क्षेत्रों के लोगों को एक स्टूडियो में इस परियोजना पर काम करने के लिए साथ लाया गया. कई दौर के विमर्श के बाद बिजली से चलने वाली एक छोटी सी कार बनाने का फैसला लिया गया जिसे मोड़ कर एक कतार में पार्किंग में खड़ा किया जा सके और जिसे एशिया अमरीका व यूरोप के शहरों में एक से ज्यादा लोग इस्तेमाल कर सकें. यहां से शुरू हुआ कारों के योग का युग. फोल्डिंग कार आज बाज़ार में उतरने की स्थिति में आ चुकी है. भारत में टाटा ने भी ऐसी ही एक कार बनाई है हालांकि उसकी कीमत दस लाख रुपए बताई जा रही है. ज़ाहिर है हिरिको की कारें सस्ती होने के कारण भारतीय उपभोक्ताओं के लिए ज्यादा किफायती होंगी लेकिन इस तरह की कारों के साथ एक दिक्कत भी है. ऐसी कारें तैयार करने वालों के सामने एक बड़ा सवाल यह आ खड़ा हुआ है कि ऐसे लोगों को कैसे इन कारों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा जो सार्वजनिक परिवहन लेने के लिए बस अड्डे या मेट्रो स्टेशन के करीब न रहते या काम करते हों. शहरी योजनाकार इस समस्या को पहली और आखिरी पहेली का नाम देते हैं. बर्कले में कैलिफोर्निया युनिवर्सिटी की शहरी और परिवहन योजनाकार एलिज़ाबेथ डीकिन कहती हैं जैसे-जैसे पिछले 50 साल में शहरों का विस्तार हुआ है पहली और आखिरी पहेली वैसे-वैसे और कठिन होती गई है. माना जा रहा है कि इस समस्या से निपटने का एक तरीका यह हो सकता है कि फोल्डिंग कारों का बेड़ा शहर में कुछ तय स्थानों पर रखा जाए जहां उन्हें चार्ज करने वाले या फिर किराये पर उठाने वाले स्टेशन भी हों. इससे लोग आसानी से ऐसे वाहन लेकर बस अड्डे या मेट्रो तक जा सकेंगे और नतीजतन सड़कों पर वाहनों का भार कम होगा. इससे शहरों की हवा भी साफ सुथरी बनी रह सकेगी. फिलहाल हिरिको समूह की योजना ऐसी कारें यूरोप और दूसरे चुनिंदा शहरों में बेचने की है. विशेष तौर पर चुने गए स्थानों में बार्सिलोना बर्लिन माल्मो सेन फ्रांसिस्को आदि हैं. इसके अलावा स्पेन के बास्क इलाके में आने वाले उर्दइबे इबिज़ा हांगकांग और दक्षिणी ब्राज़ील के फ्लोरियानापोलिस में भी यह कार बेचे जाने की योजना है. हिरिको अपनी 400 माइक्रो ईवी कारों की पहली खेप जल्द ही बार्सिलोना में उतारने जा रही है. एक बार यह योजना यूरोप और अमरीका में कारगर हो गई तो दिल्ली और बंगलुरु जैसे भीड़भाड़ वाले शहरों से हिरिको फोल्ड जैसी कारें दूर नहीं रह जाएंगी. जिस तरीके से हमारे शहरों का वातावरण वाहनों की अधिकता से तबाह हुआ है उम्मीद की जा रही है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में बिजली से चलने वाली फोल्डिंग कारें बेहद कारगर साबित होंगी. |
| DATE: 2013-04-07 |
| LABEL: science |
| [474] TITLE: किस तरह लड़े जाएंगे भविष्य के युद्ध? |
| CONTENT: अमरीकी नौसेना भविष्य की जंग के लिए तैयार हो रही है. उसका मानना है कि भविष्य में ऐसे हथियारों का इस्तेमाल किया जाएगा जो अदृश्य हों जिनका पता न लगाया जा सके और वो सैटेलाइट कंप्यूटर राडार और विमानों सहित सब कुछ बंद कर सकते हों. भविष्य के यह हथियार हैं इलेक्ट्रो मैग्नेटिक हथियार. यह वह हथियार होंगे जिनमें इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन का इस्तेमाल किया जाता है. यह हथियार इलेक्ट्रोनिक उपकरणों को जाम या पूरी तरह से तबाह कर सकते हैं. अमरीकी समुद्री अभियानों के प्रमुख एडमिरल जॉनेथन ग्रीनर्ट ज़ोर देते हैं कि साइबर हथियारों को इलेक्ट्रो मैग्नेटिक हथियारों को साथ मिलाकर देखा जाए जिसे वह इलेक्ट्रो मैग्नेटिक साइबर विभाग कहना पसंद करते हैं. हाल ही में लिखे गए एक आर्टिकल में वह कहते हैं ईएम-साइबर विभाग सैन्य अभियानों के लिए इतना ज़रूरी और देश के हितों के लिए इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि हमें इसे ज़मीन समुद्र हवा और अंतरिक्ष के समान या उससे भी महत्वपूर्ण युद्ध क्षेत्र मानना चाहिए. स्टक्सनेट जैसे कंप्यूटर वायरस के बारे में बहुत लिखा गया है जिसने ईरान के परमाणु ठिकानों में घुसपैठ की थी. इसके अलावा भी सरकारी सैन्य विभागों और निजी कंपनियों पर वायरसों के हमले तो हुए हैं लेकिन इलेक्ट्रोमैग्नेट हमले बमुश्किल ही सामने आए हैं. यह हथियार शीत युद्ध के समय के विचार पर काम करते हैं. दुश्मन के क्षेत्र में काफ़ी ऊंचाई पर परमाणु बम विस्फोट किया जाए जिससे इलेक्ट्रो मैग्नेटिक पल्स या ईएमपी बने जो बिजली और संचार नेटवर्क को तबाह कर दें. हालांकि परमाणु विस्फोट से ईएमपी हथियार बनाने का विचार अब भी सैद्धांतिक ही है लेकिन अमरीका पारंपरिक स्रोत उच्च शक्ति वाले माइक्रोवेव जनरेटर्स को विकसित करने पर ध्यान दे रहा है. ऐसे हथियार कम से कम सैद्धांतिक रूप से वाहनों को जाम कर दते हैं और हथियारों को भी ठंडा कर सकते हैं. हालांकि ऐसे ज़्यादातर हथियारों का काम गुप्त है लेकिन कुछ ऐसे हथियार भी हैं जिनके बारे में जानकारी उपलब्ध है. जैसे कि अमरीकी सेना ने एक रेडियो-फ्रीक्वेंसी व्हीकल स्टॉपर के लिए धन उपलब्ध करवाया है. यह सैटेलाइट डिश के साइज़ का एक हथियार है जिसे जीप के ऊपर लगाया जा सकता है और यह कुछ दूरी से दुश्मन के वाहन को बेकार कर देता है. एविएशन वीक और स्पेस टेक्नोलॉजी मैग्ज़ीन के पूर्व वरिष्ठ संपादक डेव फलग़म कहते हैं इस्तेमाल किए जा रहे ज़्यादातर हथियार नज़दीक से इस्तेमाल किए जाने वाले हैं. इन्हें प्रभावी ढंग से इस्तेमाल के लिए नज़दीक लाना पड़ता है. सुरक्षा उपकरण बनाने में लगी कंपनियां ऐसे हथियार भी विकसित करने में लगी हैं जो पर्याप्त दूरी से वार कर सकें. पिछले साल अक्टूबर में बोइंग ने काउंटर-इलेक्ट्रोनिक्स हाई पावर्ड माइक्रोवेव एडवांस्ड मिसाइल प्रोजेक्ट चैंप के विकास की फुटेज दिखाई थी. यह एक क्रूज़ मिसाइल है जिसपर इलेक्ट्रो मैग्नेटिक वारहेड लगा हुआ है. हालांकि बोइंग ने इस प्रोजक्ट के बारे में विस्तार से बात करने से मना कर दिया लेकिन फ़िल्म में दिखाया गया था कि मिसाइल डेस्कटॉप कंप्यूटरों को बेकार निष्क्रिय कर रही है. फलग़म के अनुसार अमरीकी कंपनी रेथिऑन ने इलेक्ट्रो मैग्नेटिक वारहेड वाली मिसाइल के विकास पर काम किया है. अमरीकी सेना इलेक्ट्रो मैग्नेटिक हथियारों के विस्तार को इतनी गंभीरता से ले रही है कि उसने एक गेम डिज़ाइन किया है जिसे एमएमओडब्ल्यूजीएलआई कहा जाता है. यह इंटरनेट पर कई खिलाड़ियों द्वारा खेले जाने वाला एक वॉरगेम है. इसे अमरीकी नौसेना के तीन अंग- नौसेना युद्धकला विकास कमांड नौसेना शोध कार्यालय और नौसेना स्नातकोत्तर विद्यालय मिलकर चलाते हैं. इस खेल के माध्यम से खिलाड़ियों से सुझाव मांगे जाते हैं कि नौसेना ऐसे हथियारों जो अदृश्य हों और अक्सर उनका पता न चल सके- जो सैटेलाइट राडार कंप्यूटर जहाज़ को निष्क्रिय कर दे का मुकाबला कैसे करे. इस खेल तक पहुंच सिर्फ़ सैन्य या सरकारी ईमेल एकाउंट वालों को ही मिलती है. हालांकि इसे सेना और सरकारी अधिकारियों तक सीमित कर देना सुझावों को सीमित कर देता है. लेकिन नौसेना स्नातकोत्तर विद्यालय में मूव्स इंस्टीट्यूट में शोधकर्ता रेबेका लॉ बताती हैं कि अब भी इसके 200 सक्रिय खिलाड़ी हैं. फिर खेल में इंटरनेट पर खिलाड़ियों को जो आवरण प्रदान किया जाता है उससे वे अपनी रैंक या स्थिति का ख़्याल किए बिना सुझाव दे सकते हैं. फिर खेल की तर्ज पर जिसमें पॉएंट्स मिलते हैं और विजेता घोषित किया जाता है एक रचनात्मक स्थिति पैदा करता है. रेबेका कहती हैं उन्हें नौसेना को आइडिया चाहिए वह खेल में जीतना चाहते हैं. हालांकि जीतेगा कौन यह तो वक्त ही बताएगा. |
| DATE: 2013-04-05 |
| LABEL: science |
| [475] TITLE: कैसे होते हैं सपनों के रंग? |
| CONTENT: बॉस से अपने अपमान का बदला सपने में लेने की सोच रहे हैं तो संभल जाइए. एक शोध के अनुसार जापान में वैज्ञानिकों ने सपनों को पढ़ने का तरीका खोज निकाला है. साइंस जनरल में छपी रिपोर्ट के अनुसार जापान में शोधकर्ताओं ने एमआरआई स्कैन से नींद की शुरुआती अवस्था में देखी गई चीज़ों का अनुमान लगाया है. रिपोर्ट के अनुसार ये अनुमान 60 तक सही बैठे हैं. अब शोधकर्ता यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या मानसिक हलचलों से नींद के दौरान महसूस की गई अन्य बातों जैसे कि भावनाओं का भी अनुमान लगाया जा सकता है. क्योटो में स्थित एटीआर कम्प्यूटेशनल न्यूरोसाइंस लैबोरेट्री के प्रोफ़ेसर युकियासु कामितानि कहते हैं मुझे पक्का यकीन है कि सपनों की व्याख्या की जा सकती है कम से कम इसके कुछ भागों की. मैं इससे चकित नहीं हूं बल्कि उत्साहित हूं. शोधकर्ताओं के दल ने तीन लोगों के सोते वक्त एमआरआई स्कैन से उन पर नज़र रखी. जैसे ही इन लोगों को स्कैनर के अंदर नींद आई उन्हें उठा दिया गया और याद करने को कहा गया कि उन्होंने क्या देखा था. हर तस्वीर को चाहे वह कोई मूर्ति हो या कार या बर्फ़ के टुकड़े या फिर कोई और अजीब लगने वाली चीज़ सभी को नोट कर लिया गया. हर प्रतिभागी के साथ इस क्रिया को 200 बार दोहराया गया. इसके बाद शोधकर्ताओं ने एक डाटाबेस बनाया. इसमें उन्होंने एक जैसी दिखने वाली चीज़ों को एक ग्रुप में रख दिया. उदाहरणार्थ होटल घर बिल्डिंग को भवन नाम के एक ग्रुप में रख दिया गया. इसके बाद शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों का फिर से स्कैन किया लेकिन इस बार जागते हुए और तब जब वह कंप्यूटर पर तस्वीरें देख रहे थे. उन्हें संबंधित तस्वीर के साथ दिमाग की वैसी ही हलचल देखने को मिली. नींद के परीक्षणों के दूसरे दौर में शोधकर्ता दिमागी हलचलों को देखकर यह अनुमान लगाने में सक्षम थे कि प्रतिभागी नींद में क्या देख रहे हैं. यह अनुमान कि जो तस्वीर प्रतिभागी देख रहा है वह किस ग्रुप की है 60 तक सटीक रहे. प्रोफ़ेसर कामितानि कहते हैं हम सपनों में देखी गई चीजों को जानने में सफल रहे और प्रतिभागियों की बात ने इसका समर्थन किया. अब शोधकर्ता गहरी नींद में झांकना चाहते हैं. माना जाता है कि उसमें सपने ज़्यादा सजीव होते हैं. वे यह भी जानना चाहते हैं कि क्या दिमाग के स्कैन उन्हें भावनाओं गंधों रंगों और लोगों के व्यवहार का अनुमान लगाने में सहायता कर सकते हैं. ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में कॉग्निटिव न्यूरोसाइंटिस्ट डॉक्टर मार्क स्टोक्स इस शोध को उत्साहवर्धक बताते हैं जो हमें सपनों को पढ़ने वाली मशीन बनाने के करीब ले आया है. वह कहते हैं हालांकि अभी लंबा रास्ता तय करना होगा लेकिन सिद्धांत रूप में यह संभव है. मुश्किल काम तो देखी जा रही चीज़ और दिमागी हलचल को सुनियोजित ढंग से मापने का है. वह यह भी कहते हैं कि सपनों को पढ़ने का एक तरीका सबके लिए काम नहीं कर सकता. डॉक्टर स्टोक्स के अनुसार यह व्यक्तिगत रूप के किया जाना चाहिए. इसलिए आप ऐसा कोई सामान्य ढांचा नहीं बना सकते जो किसी के भी सपने पढ़ ले. अलग स्वभाव या प्रकृति के लोग हमेशा मौजूद रहेंगे इसलिए लोगों की दिमागी हलचल कभी भी एक समान नहीं हो सकती. वह कहते हैं जैसे कि आप दूसरे के जाने बिना उसके विचार पढ़ने वाली कोई चीज़ कभी नहीं बना सकते. |
| DATE: 2013-04-05 |
| LABEL: science |
| [476] TITLE: गंजे लोगों को 'दिल की बीमारियों का ख़तरा ज़्यादा' |
| CONTENT: जापान में हुए एक अध्ययन में पता चला है कि गंजे लोगों में उन लोगों की तुलना में हृदय रोगों की संभावना अधिक होती है जिनके सिर पर भरपूर बाल होते हैं. विज्ञान पत्रिका बीएमजे में प्रकाशित इस अध्ययन में 37 हज़ार लोगों को शामिल किया गया था. इसके मुताबिक़ गंजे लोगों में हृदय रोगों की संभावना 32 फ़ीसदी अधिक होती है. शोधकर्ताओं का कहना है कि हृदय रोगों का यह जोखिम धूम्रपान और मोटापे की तुलना में कम है. बहुत से पुरुषों के लिए गंजापन एक सामान्य बात है. उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनके बाल गिरने लगते हैं. आधे लोग पचास साल की आयु तक गंजे होने लगते हैं और 70 साल तक 80 फ़ीसदी लोगों के बाल झड़ने लगते हैं. टोकियो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पुराने अध्ययनों के आधार पर बालों के झड़ने और हृदय रोगों के बीच संबंध स्थापित किया. शोधकर्ताओं ने अध्ययन के आधार पर बताया कि सिर से गिरे बालों का संबंध कोरनोरी हृदय रोगों यानी हृदय को ख़ून और ऑक्सीजन की सप्लाई करने वाली धमनियों में असमानता से था. हालांकि बालों का झड़ना कम होने का हृदय रोगों संबंधी जोखिम पर कोई प्रभाव नहीं दिखा. टोकियो विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर तोमोहिदे यामादा ने बीबीसी को बतायाहमें गंजेपन और कोरोनरी हृदय रोगों के जोखिम के बीच मामूली लेकिन महत्वपूर्ण संबंध का पता चलाउन्होंने कहाहमें लगता है कि यह एक संबंध है. लेकिन उनता मजबूत नहीं जितना कि धूम्रपान मोटापा कोलेस्टराल के स्तर और ब्लड प्रेशर से होता है. प्रोफ़ेसर यामादा ने कहा कि ऐसे युवक जिनके सिर के बाल गिर रहे हों उन्हें अपने हृदय को स्वस्थ बनाए रखने के लिए जीवन शैली पर ध्यान देना चाहिए. उन्होंने बताया कि गंजे पुरुषों और हृदय रोगों में संबंध स्थापित करने के लिए हालांकि पर्याप्त सबूत नहीं हैं. ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन में दिल के मरीजों की देखभाल करने वाली डोरियन मैडॉक कहती है हालांकि ये नतीजें दिलचस्प हैं लेकिन इससे उन पुरुषों को चिंतित नहीं होना चाहिए जिनके बाल झड़ चुके हैं. वे कहती हैं पुरुषों के गंजे होने और हृदय रोगों के जोखिम के बीच संबंध स्थापित करने के लिए अभी और शोध की जरूरत है. लेकिन बालों से अधिक फ़िलहाल लोगों को मोटापे पर ध्यान देने की ज़रूरत है डोरियन मैडॉक कहती हैं आनुवांशिक रूप से झड़ते बालों को रोकना तो आपके बस में नहीं है. लेकिन आप धूम्रपान छोड़कर वजन को नियंत्रित कर और ख़ुद को सक्रिय रखकर अपने हृदय की रक्षा कर सकते हैं. |
| DATE: 2013-04-04 |
| LABEL: science |
| [477] TITLE: क्या चांद पर भी कभी खनन होगा? |
| CONTENT: यूँ ही नहीं कहते कि आसमाँ के आगे जहां और भी हैं. जहाँ दशकों से अंतरिक्ष में दूरदराज की दुनिया का देखने-जानने की होड़ थी वहीं अब सिलिकॉन वैली में इस दौड़ ने नई शक्ल ले ली है. अब नई होड़ है चांद के और अन्य ग्रहों-उपग्रहों के भी रहस्यों को समझने की संभवत वहाँ खनन कर इससे पैसा बनाने की. क्या ये मुमकिन है गूगल ने चांद पर जाने वाली निजी कंपनियों के लिए 200 लाख डॉलर या करीब 110 करोड़ भारतीय रुपए के बराबर के भारी-भरकम पुरस्कार की घोषणा की है. शर्त है कि इसके लिए कंपनी चांद पर रोबोट उतारे जो उसकी सतह पर 500 मीटर चलकर जांच करे और इसका हाई डेफ़िनेशन विडियो 2015 तक धरती पर वापस भेजा जाए. मिशन पूरा करके दूसरे नंबर पर रहने वाली कंपनी को भी 50 लाख डॉलर का इनाम दिया जाएगा. इसके अलावा 5 किमी तक चलने पानी ढूंढने और चांद पर इंसान की पहले से मौजूदगी के निशान जैसे कि अपोलो के पहुंचने के निशान पर अतिरिक्त इनाम भी दिया जाएगा. मून एक्सप्रेस उन 25 कंपनियों में से एक है जो चांद पर उतरकर पैसा कमाने के बारे में सोच रही हैं. नासा ने उसे अपनी सुविधाओं का इस्तेमाल करने और अंतरिक्ष यान की जांच की इजाज़त दे दी है. बीबीसी संवाददाता अलेस्टर लीटहेड ने मून एक्सप्रेस की प्रयोगशाला में जाकर चांद पर जाने की उसकी तैयारी को देखा. कंपनी के सीईओ बॉब रिचर्ड्स कहते हैं चांद पर उतरने के लिए हमारी प्रोद्यौगिकी का ध्यान मून लैंडर पर है. कंपनी ने मून लैंडर का प्रोटोटाइप तैयार कर लिया है और वो उसे नासा की प्रयोगशाला में जांच रही है. मून एक्सप्रेस जैसी कंपनियों के सामने पहली चुनौती मून लैंडर को चांद पर खुद ही उतरने योग्य बनाना है. इसकी सफलता क्रांतिकारी परिणाम दे सकती है. मून एक्सप्रेस के मुख्यकार्यकारी अधिकारी बॉब रिचर्ड्स कहते हैं ये ठीक है कि हम चांद के बारे में अभी ज़्यादा जानते नहीं हैं लेकिन हम ये जानते हैं कि चांद पर धरती के पूरे भंडार से ज़्यादा प्लैटिनम ग्रुप की धातुएं हो सकती हैं. वो ये भी कहते हैं इसके अलावा चांद पर पानी है. पानी सौर मंडल की सूरत बदलने वाली शक्ति है पानी रॉकेट का ईंधन है पानी खेती करने में मददगार हो सकता है पानी ज़िंदगी दे सकता है. लेकिन इस दौड़ में वो अकेले नहीं हैं. चीन चांद के लिए रोबोट्स और इंसानों वाले अभियान तैयार कर रहा है. वो इसकी असीम संभावनाओं वाली ज़मीन भी चाहता है. लेकिन क्या कोई अकेला व्यक्ति या देश चांद की ज़मीन पर कब्ज़ा कर सकता है1967 की बाहरी अंतरिक्ष संधि के अनुसार ऐसा नहीं हो सकता. अंतरिक्ष वकील जेम्स डंसटन कहते हैं बाहरी अंतरिक्ष संधि में चांद पर स्वतंत्र पहुंच स्वतंत्र प्रयोग और स्वतंत्र दोहन को न सिर्फ़ प्रोत्साहित किया गया है बल्कि शर्त बना दिया गया है. वो कहते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार आप चांद के मालिक नहीं हो सकते लेकिन आप वहां जा सकते हैं और इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. सवाल ये है कि इन दोनों में आप संतुलन कैसे कायम करेंगे. लेकिन मून एक्सप्रेस जैसी कंपनियों की नज़र तो अभी चांद के व्यावसायिक दोहन में है. रिचर्ड्स कहते हैं चांद के व्यावसायिक दोहन का मतलब है कि हम चांद को इंसानी दुनिया के करीब ला रहे हैं वो दुनिया जिसे इंसान अपनी समझता है. |
| DATE: 2013-04-03 |
| LABEL: science |
| [478] TITLE: चींटी की तरह के रोबोट, लेकिन दिखने में नहीं! |
| CONTENT: अमरीका में वैज्ञानिकों ने ऐसे रोबोट तैयार किए गए हैं जो उसी तरह व्यवहार करते हैं जैसे चींटियाँ अपनी बस्तियों में करती हैं. लेकिन ये देखने में किसी भी तरह असली चींटियों जैसे नहीं हैं. यह छोटे-छोटे क्यूब या घन हैं जिनके पहियों को चलाने के लिए हाथघड़ी की दो मोटरों का इस्तेमाल किया गया है इन रोबोटों की प्रोग्रामिंग बेहद सरल है जिसका मकसद बाधाओं को पार करते हुए लक्ष्य की ओर बढ़ने में एक-दूसरे की मदद करना है. इसकी म़दद से रोबोट चीटियों की बस्ती रूपी भूलभुलैया में तेज़ी से रास्ता खोज़ सकते हैं. प्लौस कम्प्यूटेशनल बायोलॉज़ी नामक जर्नल में प्रकाशित इस शोध में बताया गया है कि झुंड में एक-दूसरे का आभास कर लेने की काबिलियत के कारण ये रोबोट आसानी से अपना रास्ता खोज़ लेते हैं. इस अध्ययन के शीर्ष शोधकर्ता न्यू जर्सी इन्स्टीच्यूट के सीमन गर्नियर ने बताया कि प्रत्येक रोबोट अपने आप में खूबसूरत और भोलाभाला है. उनका कहना है कि उनकी याददाश्त और प्रोसेसिंग क्षमता सीमित है. अगर उनको उनके हाल पर छोड़ दिया जाए तो वे यूं ही घूमते रह जाएंगे और खो जाएंगे. लेकिन वे एक-दूसरे के साथ मिलकर काम कर सकते हैं और संवाद कायम कर सकते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि चीटियों की तरह रोबोट भी एक निशान छोड़ते हैं जिसका अनुसरण दूसरे रोबोट करते हैं. इसके लिए शोधकर्ताओं ने प्रत्येक रोबोट के मार्ग की निगरानी करने के लिए कैमरा लगाया. इसके बाद कैमरे से जुड़े एक प्रोजेक्टर द्वारा नियमित अंतराल पर रोबोट के रास्ते पर प्रकाश-बिन्दु डाला गया. दूसरे रोबोट के उसी रास्ते पर आने की स्थिति में यह प्रकाश अधिक चमकदार हो जाता है. डॉक्टर गार्नियर बताते हैं कि प्रत्येक रोबोट के शीर्ष पर दो एन्टीना हैं जो प्रकाश को लेकर संवेदनशील हैं. यदि उनके बायें सेंसर पर अघिक रोशनी गिरती है तो वे बाएं मुड़ जाते हैं और यदि उनके दायें सेंसर पर अघिक रोशनी गिरती है तो वे दाएं मुड़ जाते हैं. चीटियाँ भी ठीक ऐसा ही करती हैं. ससेक्स विश्वविद्यालय के जीव विज्ञानी डॉक्टर पॉल ग्राहम ने बताया कि समस्याओं को सुलझाने या रोबोट डिजाइन करने की ऐसी कई अन्य शोध और इंजीनियरिंग परियोजनाएं हैं जिनके लिए प्रकृति से प्रेरणा ली जा सकती है. |
| DATE: 2013-04-02 |
| LABEL: science |
| [479] TITLE: क्या चॉकलेट खाने से होते हैं मुंहासे? |
| CONTENT: बच्चों को चॉकलेट खाने से मना करने का एक आसान तरीका उन्हें यह बोलना है कि अगर वे चॉकलेट खाते हैं तो उनके चेहरे पर मुंहासे हो जाएंगे. लेकिन क्या यह वास्तव में सच है चॉकलेट और चेहरे के दाग-धब्बों तथा मुंहासे के बीच क्या संबंध है यह वैज्ञानिक बहस का मुद्दा बना हुआ है. वैसे त्वचा संबंधी रोग मसलन मुंहासे या दाग धब्बों के फैलने की कई अन्य वजहें भी बताई जाती हैं जिनमें पारिवारिक पृष्ठभूमि उम्र और संभवतः मानसिक तनाव भी शामिल है. 1960 के दशक तक वैज्ञानिकों में यह धारणा बनी रही कि चॉकलेट की वजह से चेहरे की त्वचा से जुड़ी यह दिक्कत और बढ़ जाती है. 40 और 50 के दशक की कई मशहूर किताबों में मुंहासे के इलाज के लिए मीठे खाद्य और पेय पदार्थ जिसमें चॉकलेट भी शामिल है को न खाने की सलाह दी गई. हालांकि 1969 में जी ई फुल्टॉन और उनके सहयोगी जी प्लेविग और ए एम क्लिंगमैन द्वारा किए गए एक प्रभावी शोध में चॉकलेट और मुंहासे में किसी भी तरह का कोई संबंध होने की संभावना को खारिज करने की कोशिश की गई. शोधकर्ताओं ने कम और ज्यादा मुंहासे वाले 65 लोगों को दो समूह में बांटा. इसमें से एक समूह को चॉकलेट दी गई जिसमें सामान्य से 10 गुना ज्यादा मात्रा में कोकोआ था. दूसरे समूह को बिना अतिरिक्त कोकोआ वाला खाद्य पदार्थ दिया. शोधकर्ताओं ने साप्ताहिक जांच में यह पाया कि चॉकलेट का मुंहासे के बढ़ने में कोई प्रभाव नहीं था. इस शोध का बड़ा असर देखा गया. लेकिन हाल ही में इस शोध की आलोचना की गई है. मानोआ के हवाई विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर एमी ब्राउन का कहना है इस शोध में अमरीका के चॉकलेट निर्माता संगठन की भूमिका भी थी. इस शोध की प्रणाली में भी कई खामियां हैं. वर्ष 1971 में एंडरसन और उनके सहयोगियों ने भी कुछ ऐसा ही शोध किया लेकिन वे चॉकलेट खाने से मुंहासे में बढ़ोतरी जैसे लक्षण पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाल पाए. हाल में शोध करने वाली यूनिवर्सिटी ऑफ मियामी मिलर स्कूल ऑफ मेडिसिन की छात्रा सामंता ब्लॉक ने यह महसूस किया कि फुल्टन और एंडरसन के शोध में एक बड़ी खामी यह थी कि उन्होंने जिन चॉकलेटों का इस्तेमाल किया था वह शुद्ध नहीं था. उन्होंने अपने शोध में लोगों को विभिन्न मात्रा में 340 ग्राम तक चॉकलेट खाने के लिए दिया. उन्होंने यह देखा कि जिन लोगों ने जितनी मात्रा में चॉकलेट खाया था उसी हिसाब से उनके चेहरे पर मुंहासे में भी तेजी देखी गई. ब्लॉक का कहना है 18 से 35 साल की उम्र के पुरुषों जिन्हें पहले मुंहासा रहा है उनके चॉकलेट खाने से उसमें और तेजी देखी गई. अब वह महिलाओं पर भी अपने शोध के निष्कर्षों को आजमाने वाली हैं. हाल में एकेडमी ऑफ न्यूट्रिशन ऐंड डायटेटिक्स के जर्नल में प्रकाशित समीक्षा पत्र ने मुंहासे और भोजन न कि केवल चॉकलेट के बीच संबंधों को पड़ताल करने वाले शोधों का परीक्षण किया है. इसकी लेखक जेनिफर बुरिस का कहना है पहले के शोध में सिर्फ चॉकलेट और मुंहासे के बीच के संबंध पर जोर देकर निष्कर्ष निकाला गया इसकी वजह से लोगों ने यह समझा कि मुंहासे और भोजन का कोई ताल्लुक नहीं है. वह और उनके सहयोगियों ने अपने शोध में यह निष्कर्ष निकाला है कि भोजन और मुंहासे के बीच संबंध है हालांकि वे अभी इसके पुख्ता असर के बारे में नहीं बता सकते है. शोधकर्ता इस बात से आश्वस्त नहीं हैं कि डेयरी उत्पाद या खाद्य पदार्थ ब्लड शुगर के स्तर को बढ़ाते हैं या नहीं. निश्चित तौर पर विज्ञान अभी यह साबित नहीं कर पाया है कि शुद्ध या मिलावटी रूप में भी चॉकलेट मुंहासे का कारण बनता है या नहीं. |
| DATE: 2013-04-02 |
| LABEL: science |
| [480] TITLE: चिप लगाओ, मोटापा घटाओ? |
| CONTENT: इंग्लैंड में वैज्ञानिकों ने एक बुद्धिमान इलेक्ट्रॉनिक माइक्रोचिप बनाया और दावा कर रहे हैं कि ये चिप वज़न घटाने में मददगार साबित हो सकती है. इस चिप का जानवरों पर प्रयोग शुरू होने वाला है और आने वाले तीन साल में इसका प्रयोग इंसानों पर किया जा सकेगा. इस शोध पर इंपीरियल कॉलेज लंदन के प्रोफेसर क्रिस टूमाज़ू और प्रोफेसर सर स्टीफन ब्लूम काम कर रहे हैं. ये चिप एक इम्प्लांट है जो पेट के अंदर वेगस तंत्रिका पर लगाई जाएगी. ये चिप वेगस तंत्रिका से मिलने वाली केमिकल और इलेक्ट्रिकल संकेतों को पढ़ सकेगी. उसके बाद ये चिप उन संकेतों पर कार्रवाई करते हुए दिमाग को संकेत भेजेगी जिससे भूख कम हो जाएगी या खत्म हो जाएगी. प्रोफेसर टूमाज़ू ने बीबीसी को बताया ये चिप नर्व की उन संकेतों की कॉपी कर सकती है जो भूख लगने की क्रिया पर लगाम रखते हैं. इस तरह ये भूख को कम करेगी और ये नहीं इशारा देगी कि खाना ही न खाया जाए. प्रोफेसर ब्लूम कहते हैं कि इस चिप की मदद से वज़न घटाने के लिए सर्जरी नहीं करानी पड़ेगी. वो कहते हैं कि चिप से दिमाग को ऐसे संकेत मिलेंगे जैसे पेट भर जाने के बाद मिलता है कि अब और खाना न खाया जाए. इन शोधकर्ताओं का कहना है कि चिप का कोई साइड इफेक्ट नहीं होगा. यूरोपीय शोध संघ ने इस रिसर्च के लिए नौ मिलियन डॉलर की रकम मुहैया कराई है. वेगस तंत्रिका पर चिप लगाकर वज़न कम कराने का शोध सिर्फ इंग्लैंड में ही नहीं हो रहा है. अमरीका की एक कंपनी एंट्रोमेडिक्स भी इसपर काम कर रही है. इन शोधकर्ताओं का कहना है कि वज़न घटाने के लिए सर्जरी करने से ये सस्ता उपाय और बेहतर साबित हो सकता है. |
| DATE: 2013-03-31 |
| LABEL: science |
| [481] TITLE: ऑपरेशन किए बग़ैर कैसे कम हो मोटापा |
| CONTENT: अमरीकी शोधकर्ताओं का कहना है कि गैस्ट्रिक बैंड के ऑपरेशन के बाद वज़न कम होने की वजह संभवतः आंतों में मौजूद सूक्ष्म जीवाणुओं में होने वाला बदलाव है. चूहों पर कराए गए अध्ययन में यह बात पता चली है कि ऑपरेशन की वजह से विभिन्न तरह के जीवाणु आंत में एकत्र होते हैं. स्वस्थ चूहों में जब नमूने के तौर पर उन जीवाणुओं को डाला गया तो उससे अंदाज़ा मिला कि बिना किसी ऑपरेशन के ही उनका वज़न तेजी से कम हो गया. हालांकि हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का कहना है कि वे फिलहाल यह नहीं बता सकते कि उनके शोध के नतीजे के पीछे कौन सी प्रणाली काम कर रही है. सामान्य वज़न वाले लोगों के मुकाबले मोटे लोगों के पेट और आंतों के जीवाणु में फ़र्क है. जिन लोगों ने वज़न कम करने के लिए गैस्ट्रिक बाइपास ऑपरेशन कराया है उनके आंत में पाए जाने वाले जीवाणु में भी बदलाव दिखता है. ताज़ा शोध में शोधकर्ताओं ने ज्यादा कैलोरी वाले आहार लेने वाले मोटे चूहों के तीन समूहों की तुलना की है. एक समूह के चूहों का गैस्ट्रिक बाइपास हुआ था जबकि दूसरे समूह के चूहों का एक नकली ऑपरेशन किया गया था जिन्हें ज्यादा कैलोरी वाला आहार दिया गया. तीसरे समूह के चूहों का भी नकली ऑपरेशन हुआ था लेकिन उन्हें वज़न कम करने के लिए कम कैलोरी वाला आहार दिया गया. एक हफ्ते बाद वास्तव में जिन चूहों का मोटापे वाला ऑपरेशन हुआ था उनके आंत में अलग तरह के जीवाणु पाए गए जो आमतौर पर पतले लोगों में पाए जाते हैं वहीं मोटे लोगों में पाए जाने वाले जीवाणुओं की तादाद में कमी देखी गई. शोधकर्ताओं ने साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन में दी गई अपनी रिपोर्ट में कहा कि ऑपरेशन के तीन हफ़्ते बाद उनके शरीर के वज़न में करीब 30 फीसदी की कमी देखी गई. जिन चूहों का नकली ऑपरेशन किया गया था उनके शरीर में मौजूद सूक्ष्म जीवाणुओं में थोड़ा बदलाव देखा गया. हालांकि जिन समूहों को कम कैलोरी का आहार दिया गया उनका वज़न उतना ही कम हुआ जितना कि बाइपास सर्जरी कराने वाले चूहों का हुआ था. शोधकर्ताओं ने चूहों के तीन समूहों के आंतों में मौजूद जीवाणुओं के नमूने को उन दूसरे चूहों में डाला जो कीटाणुरहित थे. जिन चूहों में बाइपास ऑपरेशन वाले चूहे का जीवाणु डाला गया उनका वज़न दो हफ्ते में काफी घट गया जबकि दूसरे चूहों में कोई बदलाव नहीं दिखा. हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सूक्ष्म जीवाणु कैसे वजन कम करने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं लेकिन एक मत यह भी है कि उनका पाचन क्रिया पर असर पड़ता है. हॉर्वर्ड मेडिकल स्कूल में मेडिसिन के सहायक प्रोफेसर और शोध के लेखक डॉक्टर ली काप्लान का कहना है हमें अभी यह जानना है कि गैस्ट्रिक बाइपास के प्रभाव के ज़रिये सूक्ष्म जीवाणुओं की तादाद में बदलाव की यह कैसा प्रणाली है. उनका कहना है अगर हम बिना ऑपरेशन के इनमें से कुछ प्रभावों को हासिल करते हैं तो इससे मोटापे जैसी गंभीर समस्या से निजात पाने का एक नया तरीक़ा मिलेगा. इससे उन मरीज़ों को राहत मिलेगी जो ऑपरेशन कराने में सक्षम नहीं हैं या ऑपरेशन कराना नहीं चाहते. सह लेखक पीटर टर्नबॉग का कहना है ऐसा नहीं है कि हमारे पास एक जादू की गोली होगी जो उन सभी लोगों के लिए कारगर होगी जिनका वज़न थोड़ा ज्यादा है. लेकिन कम से कम हम गैस्ट्रिक बाइपास सर्जरी का कुछ विकल्प जरूर दे सकते हैं जिसका समान प्रभाव होगा. नैशनल ओबेसिटी फोरम के प्रोफेसर डेविड हसलैम का कहना है हम यह जानते हैं कि बैरियाट्रिक सर्जरी यानी मोटापा कम करने के ऑपरेशन का प्रभाव केवल यांत्रिक नहीं है लेकिन यह इतने बेहतर तरीके से कैसे कारगर है उसकी पूरी वजह भी हम नहीं जानते है. खासतौर से डायबिटीज कम करने में यह कैसे कारगर है इसका अंदाजा हमें नहीं है. |
| DATE: 2013-03-30 |
| LABEL: science |
| [482] TITLE: गेम्स के ज़रिए सीखिए फिज़िक्स |
| CONTENT: कुछ बच्चों के लिए भौतिकी काफी बोझिल विषय हो सकता है कुछ को यह मज़ेदार लगता है लेकिन शॉन यंग जैसा शिक्षक हो तो यह एक खेल बन जाता है. यंग कनाडा के क्यूबेक में 16 साल तक के बच्चों को भौतिकी पढ़ाते हैं. अपनी क्लास को रोचक बनाने के लिए वह वीडियो गेम्स की तरफ मुड़े. अपना आभार जताने के लिए उन्होंने पढ़ाई की इस पद्धति का नाम भी क्लासक्राफ्ट रखा है जो वारक्राफ्ट नामक ऑनलाइन गेम से प्रेरित है. यंग की क्लास में बच्चे आठ-आठ के समूह में बांटे जाते हैं. हरेक टीम में एक-एक बच्चा योद्धा पादरी या ज्ञानी बनता है. हरेक भूमिका से उसकी ताकत जुड़ी हुई है. कुछ छोटी ताकतें हैं कुछ बड़ी. इस ताकत का नाम टाइम वार्प है. यंग कहते हैं कि निचले लेवल की ताकतें तो बस मनोरंजक हैं लेकिन ऊपरी स्तर की ताकतें बेहद आकर्षक है. विद्यार्थियों को एक्सपिरियंस प्वाइंट या एक्सपी इकट्ठा करने होते हैं जिसके बाद उसे ताकतें मिलती हैं. ये प्वाइंट क्लास में अच्छे व्यवहार समय पर होमवर्क करने परीक्षा में बेहतर करने और दूसरों की मदद करने पर मिलता है. फिलहाल 1000 एक्सपी इकट्ठा करने पर एक पावर प्वाइंट मिलता है जिससे एक बेसिक पावर मिल जाती है. वैसे क्लासक्राफ्ट केवल उपहारों का नाम नहीं है. उन विद्यार्थियों के लिए सजा भी है जो अपना होमवर्क नहीं करते या इधर-उधर गंदगी फैलाते हैं. ऐसा होने पर उस विद्यार्थी के कुछ हिट प्वाइंट खोने पड़ते हैं. गेम में ये किसी के चरित्र की दृढ़ता का पैमाना है. पादरी उन सदस्यों की मदद कर सकते हैं जिन्हें जुर्माना हुआ है. प्रेयर- यह परीक्षा में अपने क्लास नोट्स इस्तेमाल करने की छूट देता है इनविज़िबिलिटी- यह क्लास में देर से पहुंचने की छूट देता है एंबुश- विद्यार्थी कोई एक पर्चा एक दिन बाद दे सकता है आर्डेंट फेथ- परीक्षा में विद्यार्थी जवाब के सही होने की बात पूछ सकता है अगर किसी का चरित्र सारे हिट प्वाइंट खो देता है और मर जाता है तो उसे वास्तविक दुनिया के दंड मिलेंगे. नतीजे के तौर पर परीक्षा में कम समय मिलने या शनिवार की सुबह डिटेन हो सकता है. यंग ने हरेक विद्यार्थी के चरित्र का आंकड़ा रखने के लिए एक गेम इंजन बनाया हैं जिससे रोजाना एक्सपी हिट प्वाइंट और पावर के इस्तेमाल में होनेवाले बदलाव की जानकारी मिल जाती है. इस इंजन के जरिए यंग क्लास में अनायास कोई कार्यक्रम भी करते हैं जिसका प्रभाव हरेक पर पड़ता है. कुछ मददगार हैं जैसे ब्लेसिंग जिससे हिट प्वाइंट ठीक होते हैं तो कुछ बुरे है जैसे कर्स- जिससे हिट प्वाइंट कम होते हैं. डॉक्टर लाडन कॉकशट ने ऑनलाइन गेम खेलनेवालों औऱ उनकी संस्कृति पर पीएचडी की है. वह कहती हैं कि ऐसा उन्होंने पहली बार देखा है जब इतने बड़े स्तर पर कई खिलाड़ियों वाले गेम को पढ़ाई से जोड़ दिया है. लाडन का मानना है कि शिक्षक आजकल ऑनलाइन गेम्स का इस्तेमाल कर रहे हैं. इनकी सहायता से टीमवर्क व्यक्तिगत उन्नति शोध और डिबेट वगैरह जैसे गुण पाने में मदद मिलती है वह कहती हैं यह एक अच्छा रास्ता है जिससे विद्यार्थियों के गेमिंग के प्यार को पढ़ने के प्यार में बदल दिया जाए. यंग कहते हैं कि गेम थोड़ा जटिल है लेकिन अधिकतर बच्चे इसे पसंद कर रहे हैं. यहां तक कि लड़कियां भी इसमें शिरकत करती हैं हालांकि वीडियो गेम खेलने के लिए लड़के मशहूर हैं. पर क्या यह काम करता है क्या इससे पढ़ाई पर ध्यान नहीं देनेवाले बच्चों नें ध्यान देना शुरू कर दिया है यंग कहते हैं कि गेम और ग्रेड्स के बीच सीधा रिश्ता तलाशना तो मुश्किल है लेकिन बच्चों के रुझान में बदलाव दिखता है. यह बदलाव उन विद्यार्थियों के समूह में साफ दिखता है जो क्लासक्राफ्ट शुरू होने के पहले बेहद धीमे थे एक्सपी जमा करने के लिए उन्होंने काफी मदद की. यह इतना लोकप्रिय है कि दूसरे शिक्षकों ने भी बेहतर प्रदर्शन के लिए एक्सपी देना शुरू कर दिया है. टीचिंग में तकनीक पर काम करनेवाले ऑली ब्रे का कहना है कि वर्ल्ड ऑफ क्लासक्राफ्ट तो महज शिक्षा के गेम्स से गठजोड़ का उदाहरण है. ऐसी ही एक व्यवस्था अमेरिकी शिक्षाविद ली शेल्डन ने भी की थी लेकिन वह प्रयोग कॉलेज के लड़कों के साथ थी. पहली बार सेकंडरी स्कूल के बच्चों के साथ क्लासक्राफ्ट ही लागू हुआ है. बताया जा रहा है कि तकनीक के बहाने शिक्षा के फायदे हैं क्योंकि बच्चों ने कंप्यूटर पर अपने किए काम देखे. अंक मिलने के मामले में कंप्यूटर उन्हें तटस्थ भूमिका वाला लगता है. हालांकि इस मामले में सबसे अहम है आपका रवैया. वह कहते हैं कि यह जादू की छड़ी नहीं है लेकिन एक उपयोगी औजार जरूर है इससे शिक्षकों को मदद तो मिलती ही है. |
| DATE: 2013-03-30 |
| LABEL: science |
| [483] TITLE: सात किलो का बच्चा छाया खबरों में |
| CONTENT: इंग्लैंड में एक नवजात बच्चा खबरों में छाया हुआ है जिसका जन्म के वक्त वज़न सात किलोग्राम था. छह हफ्ते पहले जन्मे इस बच्चे का नाम जॉर्ज किंग रखा गया है. इसकी मां का नाम जेड और पिता का नाम रायन है. जब जॉर्ज का जन्म हुआ तो उसका वज़न था 15 पाउंड और 7 आउंस यानी सात किलो से कुछ ज्यादा. पैदाइश के वक्त तीन से चार किलो वज़न वाले बच्चों को सामान्य माना जाता है जॉर्ज की मां जेड के अनुसार उनके परिवार में कभी कोई भी इतना वज़नी पैदा नहीं हुआ है. वो कहती हैं हमारे लिए ये एक छोटा सा करिश्मा है सच पूछिए तो बड़ा करिश्मा है. जॉर्ज का जन्म सामान्य तरीके से हुआ लेकिन उनके बाहर निकलने में काफी वक्त लगा ज़ाहिर है मां को परेशानी भी हुई. दरअसल डॉक्टरों समेत किसी को पहले अंदाज़ा नहीं था कि बच्चा इतना भारी होगा. इसलिए अस्पताल को भी डिलिवरी करवाने में दिक्कत आई. जेड कहती हैं डिलिवरी के समय मेरे आस-पास 20 से भी ज़्यादा डॉक्टर इकट्ठे हो गए थे. यह देखकर मैं तो घबरा ही गई थीं लेकिन शुक्र है सब ठीक हो गयाजन्म के वक्त जॉर्ज बिना ऑक्सीजनके पांच मिनट तक रहा और डॉक्टरों ने कहा कि उसके बचे रहने की उम्मीद सिर्फ 10 प्रतिशत है. बाद में उसे ब्रिस्टल के सैंट माइकल अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां चार हफ्ते रहने के बाद वो अपने घर आ पाया है. जॉर्ज के मां-बाप कहते हैं कि अब उनका बच्चा स्वस्थ नज़र आ रहा है. जेड कहती हैं उसका एमआईआई स्कैन हुआ है औऱ सब कुछ सामान्य नज़र आ रहा है. शायद सब ठीक है शायद बस वो चीज़ों को समझने बूझने में थोड़ा धीमा होगा और उसे कोई ज़्यादा परेशानी नहीं आएगी. इंग्लैंड में जितने भी बच्चों का सामान्य तरीके से जन्म हुआ है उनमें से जॉर्ज दूसरा सबसे ज्यादा वज़नी है. जॉर्ज की मां ने उसके लिए जो कपड़े बनाए थे वो छोटे पड़ रहे हैं और उसे दोगुने साइज़ के कपड़े फिट आ रहे हैं. जेड कहती हैं कि नए कपड़े दिलवाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं बस बच्चे को सेहत की समस्याएं न आए. |
| DATE: 2013-03-29 |
| LABEL: science |
| [484] TITLE: यौन रोगियों के लिए ऑनलाइन डेटिंग |
| CONTENT: लाइलाज यौन संक्रमण से पीड़ित लोगों के लिए डेटिंग वेबसाइटों का चलन लगातार बढ़ रहा है लेकिन क्या इससे उन लोगों की जिंदगी आसान हो पाती है जो अपनी स्थिति के बारे में अपने संभावित साथी को खुल बताने से भी कतराते हैं पिछले एक दशक में डेटिंग वेबसाइटों की संख्या तेजी से बढ़ी है इनमें भी यौन रूप से संक्रमित लोगों के लिए ऐसी वेबसाइटों की तादाद खास तौर से बढ़ी है. इनमें से एच-वाईपीई या एच-डेट जैसी कई वेबसाइटें खास कर उन लोगों के लिए हैं जो आम तौर पर लाइलाज हर्पेस और एचपीवी जैसे यौन संक्रमण से पीड़ित हैं. इन संक्रमणों से जननांगों पर गांठें या मस्से होने लगते हैं. एच-वाईपीई वेबसाइट का कहना है अगर आपको पता चले कि आप हर्पीस या एचपीवी से पीड़ित हैं तो आपको लगेगा कि जैसे जिंदगी खत्म ही हो गई है लेकिन हम ये साबित करेंगे कि ऐसा नहीं है. दरअसल ये तो एक नई शुरुआत है. इस तरह की कई और वेबसाइटें भी हैं. इनमें पॉजिटिव सिंगल्स के ब्रिटेन में तीस हजार सदस्य हैं और दुनिया भर में पिछले साल इसके एक लाख नए सदस्य बने हैं. इसके अलावा डेटपॉजिटिव वेबसाइट पर छह हजार लोगों के प्रोफाइल हैं. यहां आप ऐसे लोगों को तलाश सकते हैं जो किसी भी तरह के यौन संक्रमण से पीड़ित हों. इस तरह की वेबसाइटों की संख्या में इजाफा यौन संक्रमण के पीड़ितों की बढ़ती तादाद को दर्शाता है. हेल्थ प्रोटेक्शन एजेंसी के ताजा आंकड़ों के अनुसार ब्रिटेन में 2010-2011 में इस तरह के मामले में 2 प्रतिशत की बढ़त देखी गई. ब्रिटेन में हर साल हर्पीस या एचपीवी से पीड़ित एक लाख नए मामले सामने आते हैं. वहीं अमरीका में हर साल ऐसे दो करोड़ नए मामले देखने को मिलते हैं जबकि ऐसे लोगों की कुल संख्या 11 करोड़ मानी जाती है. सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के आंकड़ों से ये बात सामने आती है. हालांकि क्लामेडिया जैसे संक्रमणों का इलाज किया जा सकता है जबकि हर्पीस एचपीवी और एचआईवी लाइलाज हैं. इसका मतलब है कि डेटिंग की दुनिया में दाखिल होने वाले बहुत से लोगों का यौन संक्रमण से पीड़ित होना एक सच्चाई है. ऐसे में उन्हें लेकर गलत सोच इस काम को उनके लिए मुश्किल बना देती है. हर्पीस से पीड़ित मैनचेस्टर की 36 वर्षीय केट का कहना है कि यौन संक्रमण से पीड़ित व्यक्ति के बारे में लोग यही समझते हैं कि उसे यूं ही लोगों के साथ सो जाने की आदत होगी. ये तथ्य है कि बहुत से लोगों के यौन संक्रमण लंबे समय से अपने पार्टनर रहे लोगों से मिलता है जबकि कुछ लोगों को ये संक्रमण अपने पार्टनर की बेवफ़ाई की देन है. पीड़ित लोगों के लिए इसके बारे में अपने नए पार्टनर को बताना हमेशा एक मुश्किल काम होता है. इससे उन्हें अपना रिश्ता टूट जाने का डर सताता रहता है. केट बताती है कि जब उन्हें हर्पीस होने की बात सामने आई तो कैसे उन्हें अपने एक भरोसेमंद दिखने वाले रिश्तों को गंवाना पड़ा था. वो बताती हैं बातों बातों में ही इसकी बात निकल गई जिससे मैं हक्की बक्की थी. फिर हमारा रिश्ता टूट गया वो कई जोखिम नहीं उठाना चाहता था. दूसरी तरफ ऐसे भी लोग है जिनको ठुकराए जाने के बाद डेटिंग से पूरी तरह मोहभंग हो जाता है. पिछले 20 वर्षों से भी ज्यादा समय से एचपीवी और हर्पीस दोनों से पीड़ित लंदन में रहने वाले 50 वर्षीय मार्क बताते हैं पहले लोगों से मेरी बात हुई और उन्हें कुछ नहीं जानना था भले ही कोई कुछ भी कहे. लेकिन फिर ये बातें आपके आत्मविश्वास को तोड़ती हैं. इससे आपको अहसास होता है कि आप औरों से अलग हैं. ऐसे में यौन संक्रमित लोगों के लिए डेटिंग वेबसाइटों की कामयाबी समझना आसान है. ऐसी ज्यादातर वेबसाइटों पर यूजर को आजादी है कि अपने बारे में वो कितना ज्यादा ज्यादा या कितना कम से कम लिखना चाहते हैं. एच-वाईपीई के संस्थापक 44 वर्षीय मैक्स कहते हैं ये हर्पीस पीड़ित लोगों के फ़ेसबुक की तरह है. हालांकि कुछ लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यौन संक्रमित लोगों की डेटिंग वेबसाइटों से क्या संदेश जा रहा है. एचवीए की निदेशक मारियन निकोलसन का मानना है कि कुछ वेबसाइट हर्पीस को लेकर नकारात्मक संदेश देतीं हैं. वो कहती हैं कि ये उन लोगों के जीवन की सच्चाई से बिल्कुल दूर है जो हर्पीस जैसी परिस्थितियों में रहे हैं. ज्यादातर लोगों के लिए इससे उनकी जिंदगी पर शायद ही कोई असर पड़ता हो जबकि अन्य बहुत से लोगों को तो इस बारे में जानकारी नहीं होगी. यौन विशेषज्ञ डॉक्टर मार्क पकियानाथन का कहा है कि एचपीवी तकनीकी रूप से लाइलाज होने के बावजूद जननांगों पर मस्से या गांठें बनाने लगती हैं. उनका कहना है इस तरह की वेबसाइटों लोगों को ये अहसास दे सकती हैं मैं अब कुष्ठ रोगी हूं और मुझे डेटिंग के लिए कोई कुष्ठ रोगी ही चाहिए लोगों को अपने संभावित पार्टनरों के समूह को सीमित नहीं करना चाहिए. यौन स्वास्थ्य के लिए काम कर रहे फ़ैमिली प्लांनिंग एसोसिएशन नाम के संगठन की सूचना निदेशक नकिता हलीली का कहना है. हम इन वेबसाइटों का समर्थन नहीं करेंगे. सच ये है कि यौन संक्रमण को आगे फैलाए बिना भी सुखी और स्वस्थ सेक्स जीवन बिताया जा सकता है. बेशक यौन संक्रमित लोगों को भी ऐसे पार्टनर मिल जाते हैं जिन्हें ऐसा कोई संक्रमण न हो. मैक्स कहते हैं लगभग 90 प्रतिशत मामलों में ये आप पर निर्भर करता है कि आप कैसे बताते हैं. दरअसल ये तो लोगों की जानकारी बढ़ाना है और इसे सामान्य तौर पर पेश किया जाना चाहिए. इसके बजाय अगर आप रोओगे कहोगे कि इससे जिंदगी बर्बाद हो जाती है तो फिर वो आपसे वैसा ही बर्ताव करेंगे. हालांकि ऐसे मामलों में सामने वाले की ओर से ठुकराए जाने के लिए भी तैयार रहना होगा. जब तक समाज में यौन संक्रमण को एक कलंक के तौर देखा जाता रहेगा यौन संक्रमित लोगों के लिए बनी डेटिंग वेबसाइटें लगातार लोकप्रिय होती जाएंगी. |
| DATE: 2013-03-29 |
| LABEL: science |
| [485] TITLE: दो मां और एक पिता से पैदा हो सकेंगे बच्चे |
| CONTENT: एक मां और एक पिता अब तक तो यही होता आया है. अब अगर ब्रिटेन के वैज्ञानिकों की चली तो एक बच्चे के जन्म के पीछे दो मां और एक पिता होंगे. इस प्रक्रिया में दो मां और एक पिता के डीएनए को मिलाकर आईवीएफ इनविट्रो-फर्टिलाइजेशन तकनीक के सहारे बच्चे का विकास किया जाएगा. इस बारे में ब्रिटेन की संस्था द ह्यूमन फर्टिलाइज़ेशन एंड एमब्रिऑलोजी अथॉरिटी से रिपोर्ट पेश करने के लिए भी कहा गया है. इस तकनीक के ज़रिए उन दम्पतियों को मदद मिल सकती है जिनमें मां के शरीर से बच्चे को को होनेवाली जानलेवा बीमारियों की वजह से वो सेहतंद बच्चे पैदा नहीं कर पा रहे. हालांकि कुछ संगठनों ने इस प्रयोग की नैतिकता पर सवाल भी उठाए हैं. लेकिन ये तकनीक आखिर काम कैसे करती है इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से दो लोगों के डीएनए लिए जाएंगे. तीसरे आदमी का डीएनए कम मात्रा में रखा जाएगा. फिर उसे टेस्ट ट्यूब में विकसित किया जाएगा. ये तकनीक उन लोगों के लिए राहत का पैगाम साबित हो सकती है जिनके बच्चे दुर्बलता की वजह से या फिर माइटोकॉन्ड्रिया की बीमारी की वजह से अकाल मौत का शिकार हो जाते हैं. माइटोकॉन्ड्रिया को शरीर का पावर हाउस भी कहते हैं. माइटोकॉनड्रिया की कोशिकाएं ही पूरे शरीर में ऊर्जा पहुंचाती हैं. बीमारी की वजह से ये कोशिकाएं कमज़ोर या छत विछत हो जाती हैं. इसकी वजह से मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं. कुछ को तो दिल का दौरा भी पड़ जाता है. खास बात ये है कि बच्चे के शरीर में माइटोकॉन्ड्रिया का विकास मां के डीएनए से ही होता है. पिता के डीएनए में माइटोकॉन्ड्रिया नहीं होता इसीलिए वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग में दो महिलाओं का डीएनए रखा है. ब्रिटेन में औसतन प्रति 6500 बच्चों में से एक को माइटोकॉन्ड्रिया से जुड़ी बीमारी होता है. इस प्रयोग में वैज्ञानिक मां के डीएनए से जानकारी लेकर उसे स्वस्थ्य दानदाता महिला के डीएनए से मिलाएंगे. उम्मीद है इससे टेस्ट ट्यूब में बीमारी से मुक्त संतान को विकसित किया जा सकेगा. इस प्रयोग का असर केवल बच्चे तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि कई पीढ़ियों तक चलेगा. इस बारे में द ह्यूमन फर्टिलाइज़ेशन एंड एमब्रिऑलोजी अथॉरिटी सरकार को सलाह देगी. हालांकि इसे कानून सम्मत बनाने के लिए ब्रितानी संसद में किसी ऐक्ट की जरूरत नहीं है. फिर भी संसद में वोटिंग करना जरूरी होगा. संगठन की अध्यक्ष प्रोफेसर लिसा जार्डिन का कहना है कि दरअसल असली सवाल लोगों की स्वस्थ्य संतान की इच्छा और समाज पर इसके व्यापक प्रभाव के बीच संतुलन बनाने का है. ब्रिटेन में अब इस प्रयोग के लेकर बहस भी शुरु हो चुकी है. हालांकि ये पहली बार नहीं है जब इस तरह के वैज्ञानिक प्रयोग की बात की जा रही है. नफील्ड काउंसिल ऑन बायोएथिक्स ने प्रयोग से सहमित जताई है वहीं ह्यूमन जेनेटिक अलर्ट ने इस पर कड़ा ऐतराज जाहिर किया है. संस्था का कहना है कि यह प्रयोग अनावश्यक खतरनाक और जीन में संशोधन करके मनचाहे बच्चे पाने की परंपरा शुरु करने वाला है. |
| DATE: 2013-03-27 |
| LABEL: science |
| [486] TITLE: क्या आप भी सुनना चाहेंगे मुर्दों की गपशप? |
| CONTENT: क्या मृत लोग आपस में बात करते हैं क्या कोई जीवित इंसान किसी मृत शख्स से संवाद स्थापित कर सकता है क्या आप मुर्दों की गपशप सुन सकते हैं या फिर क्या ऐसा दावा करने वाले लोग वही सुन रहे होते हैं जो वो सुनना चाहते हैं यह अंसभव भले ही लगता हो लेकिन दुनिया भर में इसे संभव बनाने का दावा करने वाले मौजूद हैं. ऐसा दावा करने वाले एक ख़ास प्रणाली इलेक्ट्रॉनिक वॉयस प्रोजेक्शन ईवीपी का इस्तेमाल कर दावा करते हैं कि रेडियो उपकरणों के इस्तेमाल से मृत लोगों से संवाद कायम हो सकता है. इस कहानी की शुरुआत 1969 में हुई जब एक अधेड़ लातवियन डॉक्टर ने रिकॉर्ड किए हुए ढेर सारे टेप पेश किए. उन्होंने ये टेप इंग्लैंड के बकिंगमशयर के एक गांव जेरार्ड क्रॉस में प्रस्तुत किए. उन्होंने दावा किया था कि हिटलर स्टालिन मुसोलिनी ही नहीं 20वीं सदी के कई अन्य जानी-मानी हस्तियों के साथ उन्होंने संवाद कायम किया. उनके मुताबिक उस रिकॉर्डिंग में करीब 72000 मुर्दों की आवाजें कैद थीं. दावा करने वाले शख्स कोनस्टैनटिन रॉडिवे थे और वे अपनी इस तकनीक को इलेक्ट्रॉनिक वॉयस प्रोजेक्शन ईवीपी कहते थें. कोनस्टैनटिन रॉडिवे के ये टेप अब भी जेरार्ड क्रॉस मे रखे हुए हैं. जेरार्ड क्रॉस प्रकाशक कॉलिन स्मिथ का गांव है. रॉडिवे को उम्मीद थी कि स्मिथ उनकी इस अदभुत खोज के बारे में एक किताब छापेंगे. यह स्मिथ के प्रयासों का ही नतीजा रहा कि उनकी इस असाधारण शोध के बारे में एक महत्वपूर्ण खोज नाम से किताब आई और ईवीपी के बारे में सारी दुनिया को पता चला. मृतकों की बातें सुनने के लिए पहले स्लेट पर लिखने और एक्टोप्लाज्म जैसे उलझे तरीके प्रचलित थे. मगर इन तरीकों के मुकाबले ईवीपी जैसी आधुनिक तकनीक ने 20वीं सदी को अध्यात्मिकता से जोड़ दिया. आजकल ईवीपी को पूरी दुनिया में आत्मा को खोजने और उनसे बात करने का एक मानक ज़रिया माना जाता है. आज इंटरनेट से जुड़े सैकड़ों ईवीपी फोरम हैं जिन पर पढ़े-लिखे और गंभीर किस्म के लोग आत्मा से बात करने आते हैं. उनका कहना है कि मृत आत्माएं उनसे बात करती हैं. अनाबेला कारडोसे ऐसे ही लोगों में एक हैं. वे स्पेन में रहती हैं. उनके पास पूर्ण सुसज्जित रिकॉर्डिंग स्टूडियो है तकरीबन जेरार्ड क्रॉस की ही तरह. वे कहती हैं मैंने जिन आवाजों को टेप किया है वे कोई साधारण आवाजें नहीं हैं. उन्होंने आगे कहा ये आवाजें न सिर्फ ऊंची और साफ हैं बल्कि पूरी तरह समझ में भी आती हैं. हालांकि रॉडिवे की टेपों में कैद आवाजों के बारे में अलग-अलग राय है. किसी का मानना है कि इनमें कैद मृत आत्माओं की आवाजें स्पष्ट नहीं है. बस एक फुसफुसाहट सी सुनाई देती है. जब प्रसारक गेल्स ब्रैनड्रेथ ने स्वर्गीय विंस्टन चर्चिल की आवाज सुनी उनके मुंह से बरबस यही निकला ये तो बिलकुल विंस्टन चर्चिल की आवाज है. मगर दूसरी ओर कुछ और लोगों का मानना है कि ये आवाज कहीं से भी ब्रितानी प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल से नहीं मिलती. उनकी चिर-परिचित रोबीली आवाज़ के मुकाबले ये आवाज़ एकदम हल्की है. इसके बारे में सरल व्याख्या यही की गई है कि ईवीपी की आवाजें बिखरी हुई आवाजें हैं. अमूमन ये इतनी धीमी और अस्पष्ट हैं कि इन्हें समझना मुश्किल होता है कि ये आवाजें क्या कह रही हैं. लेकिन ईवीपी के जानकार इसकी व्याख्या कर इन्हें समझना आसान बना देते हैं. ईवीपी के शोधकर्ता ब्रायन जोन्स सियाटल में इसी से मिलती-जुलती कुछ कोशिशें कर रहे हैं. वे समुद्री जीव जंतु कुत्तों बिल्लियों यहां तक कि दरवाजों की चरमराहटें और कंकड़ों की चुर्र-मुर्र तक को रिकॉर्ड करते हैं. एक कुत्ता अपनी मालकिन के बारे में कहता है अरे शीला कहां गई दूसरा कुत्ता अपने मालिक की शिकायत करते हुए बोलता है वे तो हमेशा समुद्री यात्रा पर ही होती हैं. जोन्स इस तकनीक का इस्तेमाल अपराधिक मामलों को हल करने में या उन मरीजों की मदद करने में करते हैं जिन्होंने अपनी बोलने की क्षमता खो दी है. |
| DATE: 2013-03-27 |
| LABEL: science |
| [487] TITLE: एड्स और कैंसर पर जीत पाने वाला बर्लिन का मरीज़ |
| CONTENT: आमतौर पर एचआईवी का होना किसी मरीज़ के लिए मौत का फ़रमान होता है. लेकिन एक व्यक्ति ऐसा है जिसने इस गंभीर बीमारी पर जीत पाई और आज एक स्वस्थ जीवन जी रहा है. टीमोथी रे ब्राउन को मेडिकल की दुनिया में बर्लिन का मरीज़ के नाम से जाना जाता है जो एड्स और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से उबर पाए. लेकिन उनका इलाज कैसे संभव हुआ ये भी एक रोचक किस्सा है. टिमोथी पहले मरीज है जो एचआईवी से पूरी तरह उबर चुके हैं. एचआईवी एड्स से दुनिया के लगभग 3-4 करोड़ लोग प्रभावित हैं और इस बीमारी की गिनती दुनिया के सबसे खतरनाक बीमारियों में होती है. बीबीसी के मैथ्यू बैनिस्टर से बात करते हुए 47 साल के टिमोथी कहते हैं साल 1995 में मेरे पार्टनर ने कहा कि उसे एचआईवी और मुझे भी डॉक्टर से इसकी जांच करानी चाहिए. मेरे टेस्ट में भी एचआईवी पॉज़िटिव आया औऱ वो मेरे लिए मौत की सज़ा जैसा था. मुझे कहा गया कि मैं सिर्फ चंद साल और जी सकता हूं. डॉक्टरों ने उन्हें दवाईयां दी और उनका इलाज चलने लगा. फिर एक दिन वर्ष 2006 में साइकिल चलाते वक्त टिमोथी को चक्कर आने लगे और वो फिर डॉकटरों के पास गए. वहां जब दुबारा उनका टेस्ट हुआ तो पाया गया कि उन्हें रक्त का कैंसर ल्यूकीमिया है. इस दूसरी बीमारी से निपटने के लिए उन्हें कीमोथेरैपी दी जाने लगी. टिमोथी कहते हैं दूसरी कीमोथेरैपी के बाद डॉक्टरों ने कहा कि मेरी स्टेम सेल को बदलना होगा और स्टेम सेल दाता भी मिल गया. डॉक्टरों ने मेरी इम्यून सिस्टम प्रतिरक्षी तंत्र को दाता के इम्यून सिस्टम से बदल दिया. टिमोथी कहते हैं कि इस इलाज का असर एक महीने में ही दिखने लगा. मैं बेहतर महसूस करने लगा था. मेरी जांच हुई और मुझे स्वस्थ पाया गया. मेरे उपर एक शोध पेपर भी लिखा गया और क्योंकि मेरा इलाज बर्लिन में हो रहा था इसलिए मुझे बर्लिन का मरीज कहा गया. टिमोथी कहते हैं उसके बाद उन्हें आज तक एचआईवी से संबंधित तकलीफ नहीं हुई. 2012 में उनपर एक लैब में परीक्षण हुआ जिसके बाद पाया गया कि उनके शरीर में एचआईवी की मृत कोषिकाएं हैं. लैब टेस्ट में पाया गया कि ये मृत एचआईवी सेल्स दोबारा पैदा नहीं हो सकते हैं और टिमोथी को एचआईवी मुक्त घोषित किया गया. टिमोथी कहते हैं कि वो अब उस खतरनाक वायरस से मुक्त हो गए हैं लेकिन उनके इलाज को हर मरीज पर दोहराया नहीं जा सकता. वो कहते हैं कि स्टेम सेल को परिवर्तित करना बेहद जटिल प्रक्रिया है और क्योंकि उन्हें कैंसर भी था इसलिए उनके पास इस इलाज के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. टिमोथी अब एक गैर सरकारी संस्था चला रहे हैं और वो एचआईवी के इलाज पर काम करना चाहते हैं. |
| DATE: 2013-03-26 |
| LABEL: science |
| [488] TITLE: अब ज़हर से नहीं डरते हैं खटमल |
| CONTENT: खटमल और इंसानों के बीच खून का रिश्ता है. इंसान की लाख कोशिशों के बाद भी खटमल सदियों से उसके साथ हमबिस्तर हैं और लगता है कि यह नाता टूटने वाला नहीं. खटमलों को मारने के लिए लोग कई तरीके अपनाते हैं जहरीली दवाओं का छिड़काव भी इनमें शामिल है. लेकिन अब खटमलों ने इनसे बचने का तरीक़ा खोज लिया है. अमरीका में हुए एक शोध में पता चला है कि खटमलों की चमड़ी मोटी हो गई है. इस वजह से कई ज़हरीली दवाएं रिसकर उनके शरीर में नहीं जा पाती हैं. साइंसटिफ़िक जर्नल नाम की पत्रिका में प्रकाशित शोध के मुताबिक़ वैज्ञानिकों ने इससे जुड़े जैविक बदलाव वाले 14 जीन का पता लगाया है. शोध के मुताबिक़ इनमें खटमलों की चमड़ी का मोटा हो जाना भी शामिल है. मोटी चमड़ी ज़हर को रिस कर अंदर जाने से रोकती है. इस वजह से ज़हरीले पदार्थ खटमल के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित नहीं कर पाते हैं. अध्ययन में यह भी पता चला है कि खटमल कुछ ऊंचे दर्जे का एंजाइम भी बना रहे हैं जो कीटनाशकों के मेटाबॉलिजम की रफ़्तार को तेज़ कर देते हैं. अमरीका के केंटकि विश्वविद्यालय में कीट विज्ञान के प्रोफ़ेसर और इस शोध के लेखकों में से एक सुब्बा पिल्लई कहते हैं कि ऐसे साहसी कीड़े आणविक तरक़ीबों का सहारा ले रहे हैं. वे बताते हैं खटमल कीटनाशकों के प्रभाव से बचने के लिए प्रतिरोध की एक से अधिक तकनीकों को अपनाते हैं. खटमल वैसे तो पूरी दुनिया में पाए जाते हैं. लेकिन हाल के वर्षों में ये यूरोप अमरीका कनाडा ऑस्ट्रेलिया में इनकी बाढ़ सी आ गई है. खटमल सोए हुए इंसान का ख़ून चूसकर ही ज़िंदा रहते हैं. ख़ून चूसने के बाद वे खुजली और लाल चकत्ते छोड़ जाते हैं. खटमल से छुटकारा पाना आसान नहीं है. ये कई महीने तक बिना खाए-पिए रह सकते हैं. ये तबतक खु़द को छिपाए रखते हैं जबतक कि उनका शिकार वापस नहीं आ जाता. खटमलों को मारने के लिए दुनियाभर में कृत्रिम कार्बनिक यौगिक पायरथ्राइड का इस्तेमाल किया जाता है. एक समय तो यह खटमल मारने के लिए बहुत प्रभावशाली दवा थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है. प्रोफ़ेसर पिल्लई बताते हैं कि ज़हर से होने वाली मौत से बचने के लिए खटमलों ने जैविक तंत्र विकसित कर लिए हैं. अध्ययन के लिए विश्विवद्यालय के पास के अपार्टमेंट से कीटों की 21 प्रजातियां ली गई थीं. इनके अध्ययन से पता चला कि खटमल में खोजे गए जीन जो पायरथ्राइड से बचने की प्रतिरोधक क्षमता रखते थे वे खटमल के चमड़ी में थे. अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे वैज्ञानिकों अधिक प्रभावशाली रसायन विकसित करने में मदद मिलेगी. प्रोफ़ेसर पिल्लई कहते हैं कि भारत जैसे देशों में जहाँ खटमल बहुत बड़ी समस्या नहीं हैं लोग अपने फ़र्नीचर को धूप में रख देते हैं. धूप की वजह से खटमल नीचे गिरकर मर जाते हैं. वे कहते हैं कि अमरीका में भी खटमल मारने के लिए कुछ इसी तरह की तरकीब अपनाई जा रही है. इसका सबसे अच्छा तरीका यह है कि खटमल वाली जगह को 30-35 डिग्री सेंटीग्रेड तक गर्म कर दिया जाए इसके बाद खमटल गर्मी की वजह से खुद बाहर आएंगे और मर जाएंगे. |
| DATE: 2013-03-26 |
| LABEL: science |
| [489] TITLE: यह मीठा इतना अच्छा क्यों लगता है? |
| CONTENT: मिठाइयां कितने रंगों आकारों नामों की हों वो किसी भी तरह की पैकिंग में आती हों- कैडबरी के चॉकलेट से लल्लू हलवाई की जलेबी तक- खाने के लिए मन ललचा ही जाता है. अक्सर ये जानते हुए भी कि ठीक नहीं है एक के बाद एक टुकड़ा मुंह के रास्ते पेट में पहुंच ही जाता है. लेकिन इस मीठे में ऐसा ख़ास है क्याकई वैज्ञानिकों का मानना है कि मीठे की चाह हममें सहज रूप से होती है क्योंकि ये हमारे ज़िंदा रहने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. हमारे स्वाद तंतु जीवन के लिए महत्वपूर्ण नमक वसा और शक्कर को पसंद करने लिए विकसित हो गए हैं. जब हम खाना खाते हैं तो सामान्य शक्कर ग्लूकोज़ आंतों द्वारा सोख कर रक्त में पहुंचा दी जाती है जो समान रूप से शरीर की सारी कोशिकाओं में बांट दी जाती है. दिमाग के लिए ग्लूकोज़ ख़ासतौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि सौ अरब स्नायु कोशिकाओं जिन्हें न्यूरॉन्स कहा जाता है के लिए यही एकमात्र ऊर्जा स्रोत है. क्योंकि न्यूरॉन्स के पास ग्लूकोज़ के संग्रहण की क्षमता नहीं होती इसलिए इन्हें रक्त द्वारा लगातार इसकी आपूर्ति की ज़रूरत होती है. इसीलिए मधुमेह के रोगी जिनका रक्त में शक्कर की मात्रा कम होती है उनके कोमा में जाने की आशंका अधिक होती है. हाल ही के शोधों से वैज्ञानिकों को पता चला है कि शक्कर का सिर्फ़ स्वाद ही हमारे दिमाग को उछाल दे सकता है. परीक्षणों से पता चला है कि ऐसे प्रतिभागी जो शक्कर से मीठा किया गया पानी अपने मुंह में घुमाते रहे उन्होंने मानसिक परीक्षणों में उनसे बेहतर प्रदर्शन किया जो कृत्रिम रूप से मीठे किए गए पानी को मुंह में रखे थे. वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के हालिया शोध से पता चला है कि नवजात मीठे को अन्य स्वादों के बजाय प्राथमिकता देते हैं. कई वैज्ञानिकों का मानना है कि मीठे के प्रति बच्चों की प्राथमिकता विकासमूलक है. क्योंकि बीते वक्त में जो बच्चे उच्च कैलोरी वाला ख़ाना पसंद करते थे उनके खाने की कमी वाले समय में बचने की संभावना ज़्यादा थीं. लेकिन आज के वक्त की दिक्कत ये है कि परिष्कृत शक्कर बहुत आसानी से उपलब्ध है और बच्चों में मोटापे की समस्या को बढ़ा रही है. स्वास्थ्य विशेषज्ञ अब सलाह देते हैं कि अभिभावक बच्चों को खाने या पीने की मीठी चीज़ें देने से बचें और मीठे को पहली पसंद बनाने से रोकें. शक्कर दरअसल मिजाज़ को ख़ुशनुमा बना सकती है क्योंकि ये शरीर को ख़ुशी का हार्मोन सेरोटोनिन जारी करने के लिए प्रेरित करती है. शक्कर से जो हमें जो त्वरित उछाल मिलता है वो भी एक वजह है कि उत्सव या किसी उपलब्धि के अवसर पर हम मीठा खाने को तत्पर होते हैं. लेकिन ज़्यादा मात्रा में खाए गए मीठे को संतुलित करने के लिए शरीर को ज़्यादा इंसुलिन भी छोड़ना पड़ता है. ये प्रक्रिया शुगर-क्रैश ज़्यादा मीठा खाने से होने वाली थकान की ओर धकेलती है जिससे और ज़्यादा मीठा खाने का मन करता है. ये अत्यधिक भोजन का एक चक्र बना सकती है. सिर्फ़ यही नहीं हमारे शरीर को ये भी पता नहीं चलता कि क्या हमने ख़ास किस्म की शक्कर काफ़ी मात्रा में ले ली है. शोधकर्ताओं के अनुसार सामान्य शक्कर फ्रूक्टोज़ से मीठे बनाए गए खाद्य और पेय पदार्थ उस तरह भरे होने का भाव पैदा नहीं करते जैसे कि उतनी ही कैलोरी वाले अन्य खाद्य पदार्थ करते हैं. येल विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक शोध में पाया गया कि दिमाग़ का वो भाग जो हमें खाने को प्रेरित करता है ग्लूकोज़ से तो दब जाता है लेकिन फ्रूक्टोज़ से नही. संबंधित परीक्षण में भाग लेने वाले प्रतिभागियों ने ग्लूकोज़ लेने के बाद फ्रूक्टोज़ के मुकाबले ज़्यादा संतुष्ट महसूस किया. इन निष्कर्षों को साथ देखें तो ज़्यादा खाने का खतरा बढ़ता हुआ दिखता है. ज़्यादातर प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में मीठे के लिए सरकोज़ का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें 50 फ्रूक्टोज़ होता है. शरीर प्राकृतिक रूप से फलों शहद दूध में पाए जाने वाली शक्कर और गन्ने या चुकंदर से निकाली गई प्रसंस्कृत शक्कर में फ़र्क नहीं कर पाता है. सभी किस्म की शक्कर को शरीर ग्लूकोज़ और फ्रूक्टोज़ में बदल देता है और यकृत में इन्हें परिवर्तित कर दिया जाता है. शक्कर को चर्बी या ग्लाइकोजेन में बदल दिया जाता है या फिर ग्लूकोज़ में बदलकर कोशिकाओं के लिए रक्त में शामिल कर दिया जाता है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा एनएचएस के अनुसार आपके एक दिन में खाने-पीने से मिलने वाली ऊर्जा के बाद अतिरिक्त शक्कर 10 से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए. चाहे ये शहद से मिले फलों से जूस या जैम से या फिर प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ या टेबल शुगर से. इसका मतलब ये हुआ कि आदमी को 70 ग्राम और महिला को 50 ग्राम से शक्कर लेनी चाहिए हालांकि ये आकार उम्र और सक्रियता पर निर्भर करता है. 50 ग्राम शक्कर 13 चम्मच शक्कर या दो कैन कोल्ड ड्रिंक या आठ चॉकलेट बिस्किट के बराबर होती है. |
| DATE: 2013-03-26 |
| LABEL: science |
| [490] TITLE: ड्रेन पाइप से कृत्रिम टांग बनाने वाला पाकिस्तानी डॉक्टर |
| CONTENT: पाकिस्तान और सीरिया के शरणार्थी कैंपों में ऐसे बहुत सारे शर्णार्थी हैं जो लड़ाई के दौरान अपने शरीर का कोई न कोई अंग गंवा चुके हैं. ऐसे लोगों के लिए पाकिस्तानी मूल के प्रोस्थेटिक सर्जन डॉक्टर विकार कुरैशी भगवान का दर्जा रखते हैं. दुनिया का सबसे सस्ता कृत्रिम अंग बनाने के लिए डॉक्टर कुरैशी को बहुत सराहा गया है. डॉक्टर कुरैशी ड्रेन पाइप या निकास नली के सहारे लोगों के कटे हुए अंगों में लगाने के लिए कृत्रिम अंग बनाते हैं. वे इस ड्रेन पाइप से नकली पैर और हाथ बनाकर कई लोगों की मदद कर चुके हैं. साल 2005 में जब पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में भूकंप आया था तब वहां कई लोग अपने शरीर का कोई न कोई अंग गंवा बैठे और परेशानी का सामना कर रहे थे. इस हादसे के बाद डॉक्टर कुरैशी ने वापिस पाकिस्तान जाने का फैसला किया. वहाँ पहुंच कर उन्होंने काफी कठिन हालात में पीड़ितों के लिए काम किया. ख़ासकर मलबे में दबे हुए लोगों की मदद करना डॉक्टर कुरैशी के लिए बड़ी चुनौती थी. इनमें से बहुत से लोग ऐसे थे जिनकी जान बचाने के लिए डॉक्टर कुरैशी को उनके पैर काटने पड़ गए क्योंकि वे मलबे में दबकर बुरी तरह से कुचल गए थे. लंदन में एक प्रोस्थेटिक सर्जन के तौर पर वे अक्सर अपने मरीज़ों को कृत्रिम अंग लगाया करते थे. लेकिन पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के इस संकटग्रस्त इलाके में ख़राब मौसम की वजह से उनके पास जरूरी सुविधाओं की भारी कमी थी. इन परिस्थितियों में डॉक्टर कुरैशी ने एक मु्फ्त अस्पताल बनाने की सोची जिससे ग़रीब और मजबूर मरीज़ो को सस्ते में इलाज मुहैया कराया जा सके. इस पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है लेकिन अपने मरीज़ों के लिए वे कृत्रिम अंगों का निर्माण प्लास्टिक की निकास नली या ड्रेन पाईप से करते हैं. सबसे पहले उन्होंने ये सेवा पाकिस्तान के ज़रुरतमंदों को दी. बाद में श्रीलंका और अब सीरिया व तुर्की के सीमावर्ती इलाकों में रह रहे लोगों के लिए डॉक्टर कुरैशी ने काम किया. बीबीसी से बातचीत करते हुए डॉक्टर कुरैशी ने कश्मीर में पाए अपने अनुभव को बाँटा. उन्होंने बताया वहां बेहद ख़राब हालात थे संचार व्यवस्था पूरी तरह से ठप्प हो चुकी थी यातायात की कोई सुविधा नहीं थी कोई सरकारी मदद नहीं थी ऐसे में हमने खुद अपने खर्चे पर टेंटों में चिकित्सा शिविर लगाया और धीरे-धीरे काम करने लगे. डॉक्टर कुरैशी कहते हैं हमने पीड़ितों का कई तरह से इलाज किया. उनकी टूटी हड्डियां ठीक की. हड्डियों को जोड़ने के लिए प्लेट लगाई और दवा भी दी. लेकिन वहां सबसे ज़्यादा ज़रुरत उन्हें कृत्रिम अंग लगाने और उसे दोबारा स्थापित करने की थी. डॉक्टर कुरैशी के अनुसार उस भूकंप के दौरान एक 14-15 साल के बच्चे के उपर करीब एक टन की लकड़ी का तख्त़ा आ गिरा था जो लाख कोशिश के बाद भी हटाया नहीं जा सका. जब ये बच्चा कोमा में जाने लगा तब उसके लकड़हारे पिता ने उसके बेटे के कहने पर उसके पाँव को काट दिया और बच्चे की जान बच गई. उस भूकंप के बाद सिर्फ कश्मीर में ऐसे 740 लोग थे जिनके कोई ना कोई अंग पूरी तरह से ख़राब हो चुका था. ये लोग हर उम्र के थे और इन्हें ज़ख्म के साथ छोड़ा नहीं जा सकता था. ऐसे में डॉक्टर कुरैशी ने भारत के प्रसिद्ध जयपुर फुट से बातचीत की और दो साल के लंबे संघर्ष के बाद अंत में जयपुर फुट बनाने वाले डॉक्टर चिकित्सीय उपकरणों के साथ ट्रक से पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के इस हिस्से में पहुंचे. डॉक्टर कुरैशी को जयपुर फुट तैयार करने की प्रणाली पर पूरी तरह से भरोसा नहीं था इसलिए उन्होंने एचडीपी या हाई जेनसिटी पॉलीएथलीन के प्रयोग वाली ड्रेन पाइप का इस्तेमाल किया. ये ड्रेन पाइप दुनिया के हर कोने में हर रंग में आसानी से उपलब्ध हैं जो त्वचा के रंग से मेल खाती है. डॉक्टर विकार कुरैशी ना सिर्फ अपने मरीज़ों को कृत्रिम अंग लगाते हैं और उन्हें ये बनाना भी सिखाते हैं ताकि आगे भी ज़रुरत पड़ने पर ये मरीज़ अपनी नाप के कृत्रिम अंग खुद बना लें. विकार कुरैशी के अनुसार वे नहीं चाहते हैं कि कृत्रिम अंग बनाने का ये तरीका या हुनर उनके साथ ही खत्म हो जाए बल्कि हर ज़रुरतमंद को इसके बारे में इसे बनाना आना चाहिए. |
| DATE: 2013-03-26 |
| LABEL: science |
| [491] TITLE: क्या होगा जब रोबोट चलाएगा आपकी कार? |
| CONTENT: आप अपनी कार खुद चलाते होंगे या शायद आपका ड्राइवर. पर सोचिए क्या होगा जब आपकी कार कोई इंसान नहीं बल्कि एक मशीन चलाएगी. कैलीफ़ॉर्निया में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के कैंपस में हमारी मुलाक़ात ऑटोमोटिव रिसर्च सेंटर में काम करने वाली हॉली से हुई. वे कहती हैं इस कार की स्टियरिंग पूरी तरह से कंप्यूटर संचालित है. उन्होंने कहाइसमें सब कुछ इलेक्ट्रॉनिक है कुछ भी मशीनी नहीं है. ताकि इसे हम अपनी जरूरत के हिसाब से प्रोग्राम कर सकें. हॉली जिस गाड़ी को ड्राईव करती हैं उसे एक्स वन कहते हैं और वह कार और समंदर किनारे चलने वाली बग्घी के मिले जुले रूप की तरह लगती है. कार की बॉडी पर बहुत ज्यादा काम नहीं किया गया है बस इसके फ्रेम में मेटल ट्यूब्स का इस्तेमाल किया गया है. इसमें सवारियों के बैठने के लिए बनी सीट का डिजाइन बाल्टी जैसा है और यह रस्सी से बंधी हुई होती है. जब ये कार सड़क पर चलती है तब इसके स्प्रिंग पर होने वाली एक-एक हरकत को आसानी से देखा जा सकता है. इस गाड़ी में सौ फीसदी वायरिंग स्विच और इलेकट्रॉनिक मशीनों का इस्तेमाल किया गया है. इस कार में इस्तेमाल की गई तक़नीक भले ही आज असाधारण लगे लेकिन थोड़े वक्त के बाद ये आम हो जाएगी. एक्स वन इस संस्थान द्वारा बनाई गई कई गाड़ियों में से एक है जो इलेक्ट्रॉनिक शोध का नतीजा है. शुरु में भले ही इसका मक़सद इंसानो की मदद करने का रही हो लेकिन बाद में ये इंसानों की जगह भी ले सकता है. इसकी संभावना इसलिए भी बनती है क्योंकि कई कारों को बनाने में कृत्रिम ज्ञान का इस्तेमाल किया जाता है. उनमें इंजन को नियंत्रित करने की प्रणाली और कंप्यूटर लगे होते हैं जो यह तय करते हैं कि कार की मशीन ठीक से चले. एबीएस के ज़रिए ये पता चलता है कि कब एक कार चालक ने अपनी कार का ब्रेक काफी तेज़ी से लगाया है और कब कार का पहिया घूमते हुए रुक गया. अब तक गाड़ी चलाते वक्त उसकी कमान ड्राईवर के हाथों में ही होती है लेकिन बिना ड्राईवर की कारों पर चल रहे शोध से पता चलता है कि आनेवाले वक्त में गाड़ियों को अपने ऊपर अधिक अधिकार हो सकता है. इंटरनेट कंपनी गूगल वॉक्सवैगन बॉस्च जनरल मोटर्स और मर्सिडीज़ जैसी कंपनियां भी ऐसी कारों के विकास पर काम कर रही हैं. लेकिन सवाल यह उठता है कि हमें बिना ड्राइवर वाली कारों की जरूरत क्या है. स्टैनफोर्ड के ऑटोमोटिव रिसर्च सेंटर की कार्यकारी निदेशक स्वेन बीकर का मानना है कि सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा का है. बीकर कहते हैं हम इस बात में दिलचस्पी रखते हैं कि ड्राइवर की क्या खूबी होती है और कंप्यूटर क्या अच्छा कर सकता है और हम कार और ड्राइवर के तालमेल पर काम कर रहे हैं. स्वेन बीकर ने कहाइसलिए हम ऐसी चीज की तलाश कर रहे हैं कि जब ड्राइवर मुश्किल में पड़ जाए और जैसा कि अक्सर होता है तब कार हालात संभाल ले. लेकिन ड्राइवर विहीन कारों के वजूद कुछ नए सवाल खड़े कर सकता है. उदाहरण के लिए दुर्घटना की स्थिति में कानूनी जिम्मेदारी किस पर आएगी. भले ही साक्ष्य यह कहें कि कंप्यूटर कारों को बेहतर तरीके से चला सकता है लेकिन क्या लोग खुद को इलेक्ट्रॉनिक मशीनों के किसी डब्बे के हवाले छोड़ने के लिए तैयार होंगे. कुछ सवालों के जवाब खोजे जा रहे हैं. एक सीधा सा विचार है कि अगर आने वाले कल की गाड़ियाँ बिना ड्राइवरों के चलेंगी तो फुटपाथ पर खड़े लोग बेचैन हो सकते हैं. |
| DATE: 2013-03-25 |
| LABEL: science |
| [492] TITLE: होर्डिंग जो हवा को पानी में बदल डालता है! |
| CONTENT: पेरु की राजधानी लीमा की दहलीज़ पर एक होर्डिंग लगा है जो लोगों की पानी की ज़रूरतों को पूरा कर रहा है. अब आप ये सोच रहे होंगे कि होर्डिंग भला लोगों को पानी कैसे पिला सकता है वो ऐसे कि ये होर्डिंग वातावरण में मौजूद नमी का इस्तेमाल कर साफ पानी पैदा करता है. लीमा में युनिवर्सिटी ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नॉलॉजी यूटेक के कुछ शोधकर्ता और विज्ञापन एजेंसी मायो पेरु ड्राफ्ट एफसीबी ने मिल कर ये नायाब होर्डिंग तैयार किया है. इस होर्डिंग पर लिखा है ये वो होर्डिंग है जो हवा से पानी पैदा करता है. इस होर्डिंग ने पेरु के लोगों को सकते में डाल दिया है और ये वाकई फायदेमंद भी साबित हो रहा है. इस होर्डिंग के ज़रिए हर दिन 96 लीटर पानी पैदा किया जा रहा है. हवा में नमी को कैद कर ये होर्डिंग अब तक 9000 लीटर साफ पानी बना चुका है. यूटेक का कहना है कि वो कल्पना को सच में तब्दील करना चाहते थे और इस होर्डिंग की सफलता से ये साबित होता है कि तकनीक की मदद से कुछ भी असंभव नहीं है. पेरु में बहुत कम बारिश होती है लेकिन यहा कि हवा में करीब 98 प्रतिशत नमी मौजूद होती है. यूटेक की प्रवक्ता जेसिका रुआस का कहना है यहां पानी की यूं तो कमी नहीं है. समुद्र में बहुत सा पानी है लेकिन वो पीने लायक नहीं है. समुद्र के पानी को पीने लायक बनाने के लिए बड़ी धनराशि की भी ज़रूरत पड़ती है. लेकिन इस होर्डिंग में इतना खर्च नहीं आता और ये बड़ी आसानी से हवा की नमी को पानी में परिवर्तित कर देता है. रुआस का मानना है कि ये होर्डिंग पानी की किल्लत की समस्या का सही समाधान साबित हो सकता है. इस होर्डिंग के भीतर पांच ऐसे यंत्र होते हैं जो हवा की नमी को कन्डेंसर और फिल्टर की मदद से पानी में परिवर्तित कर देते हैं. हवा से बना ये पानी होर्डिंग के ऊपर बनी टंकी में जमा हो जाता है. होर्डिंग के नीचे एक नल लगा है जहां से आम आदमी पानी पी सकते हैं. ज़ाहिर है कि ये होर्डिंग अब इतना मशहूर हो गया है कि आसपास के लोग खास इसे देखने और यहां का पानी पीने चले आते हैं. इस पूरे सेट-अप को बनाने में करीब 1200 डॉलर का खर्च आया है. |
| DATE: 2013-03-25 |
| LABEL: science |
| [493] TITLE: आपके बच्चे का बोर होना ज़रूरी है |
| CONTENT: विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को बोर होने देना चाहिए ताकि वो सृजनशील होने की स्वाभाविक क्षमता को विकसित कर सकें. शिक्षा विशेषज्ञ डॉक्टर टेरेसा बेल्टन ने बीबीसी को बताया कि बच्चों का लगातार सक्रिय रहना उनकी कल्पनाशीलता के विकास को बाधित कर सकता है. उन्होंने लेखक मीरा सयाल और कलाकार गैरीसन पैरी से भी पूछा कि बचपन में बोरियत से कैसे उन्हें अपनी सृजनशीलता में मदद मिली. सयाल का कहना है कि बोरियत ने उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया जबकि पैरी का कहना है कि ये बोरियत एक सृजनशील अवस्था होती है. ब्रिटेन में यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट अंगेलिकाज स्कूल ऑफ एजुकेशन में वरिष्ठ शोधकर्ता डॉक्टर टेरेसा बेल्टन ने बोरियत के प्रभावों पर अपने अध्य्यन में कई लेखकों कलाकारों और वैज्ञानिकों का इंटरव्यू किया. उन्होंने सयाल की यादों को बारे में सुना कि कैसे एक छोटे से खनन गांव में उनका बचपन बीता. डॉक्टर बेल्टन बताती हैं उनके पास करने को ज्यादा कुछ खास नहीं था. इसलिए वो लोगों से बातें करती थीं. अगर उनके पास करने को कुछ और चीजें होती तो ऐसा नहीं करतीं. वो कहती हैं बोरियत अकसर अकेलेपन से जुड़ी होती है और सयाल को अपने बचपन में घंटों खिड़की पर खड़े होकर खेतों को देखकर बिताने पड़ते थे. वहीं से वो बदलते मौसम को देखती रहती थीं. लेकिन इस बोरियत ने आखिरकार उन्हें लेखक बना दिया. वो बचपन से डायरी लिखने लगीं. इसमें लघु कहानियां कविताएं और वो सब कुछ होता था जो वो महसूस करती थीं. बाद में अपने लेखक बनने का श्रेय उन्होंने इन सब चीजों को ही दिया. वहीं हास्य अभिनेत्री से लेखक बनीं पैरी का कहना है कि खाली पन्नों के साथ थोपा गया अकेलापन अद्भुत प्रेरक होता है. पैरी का मानना है कि बोरियत बड़ों के लिए भी बहुत फायदेमंद है. उनका कहना है बोरियत बहुत ही सृजनशील अवस्था है. तंत्रिका विज्ञानी प्रोफेसर सुजन ग्रीनफ़ील्ड से भी डॉक्टर बेल्टन ने बात की. ग्रीनफ़ील्ड अपने बचपन को याद करते हुए बताती हैं कि कैसे उनके परिवार में पैसे की कमी थी और 13 साल की उम्र तक उनका कोई भाई बहन नहीं था. बेल्टन बताती हैं उन्होंने खुशी खुशी अपना दिल बहलाया. इसके लिए वो कहानियां बनाती थीं. अपनी कहानियों के चित्र बनाती थीं और लाइब्रेरी जाती थीं. लेकिन डॉक्टर बेल्टन का कहना है कि सृजनशील होने के लिए आपके अंदर प्रेरणा जगनी जरूरी है. वो कहती हैं प्रकृति खालीपन को पसंद नहीं करती है और हम इसे भरने की कोशिश करते हैं. कुछ बच्चे बोरियत से पैदा होने वाली जगह को आंतरिक रूप से भरने में सक्षम नहीं होते हैं उनके लिए स्थिति बदतर हो जाती है. |
| DATE: 2013-03-25 |
| LABEL: science |
| [494] TITLE: क्या आप लिखेंगे किसी अजनबी को प्रेम पत्र? |
| CONTENT: तुम मेरे लिए बहुत अहमियत रखते हो. मैं बता नहीं सकती हूं लेकिन तुम मेरे लिए बहुत अहम हो. और तुम तुम बहुत ही अच्छे हो. इस तरह की बातें आप अजनबियों के लिए नहीं लिखते हैं. लेकिन जब हन्ना ब्रेंशनर स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद न्यूयॉर्क शहर जाकर वहां रहने लगीं तो वो चिंतित और परेशान रहने लगीं. उन्हें लगा कि आसपास के लोगों को उनकी कोई कद्र या जरूरत नहीं है. फिर उन्होंने अजनबी लोगों को प्रेम पत्र लिखने शुरू किए जिन्हें वो शहर के अलग अलग हिस्सों में छोड़ती थीं. पहला पत्र उन्होंने एक ट्रेन में छोड़ा जिस पर लिखा था अगर आपको ये मिलता है तो ये आपके लिए ही है. इसके बाद उन्होंने लाइब्रेरी कैफे जैसी कई जगहों पर ऐसे प्रेम पत्र छोड़े. उन्होंने बीबीसी को बताया मैंने महसूस किया कि मेरी उदासी और अकेलापन दूर हो गया. मुझे कुछ ऐसा मिल गया था जिसने मेरा ध्यान अपने आप पर से हटा दिया था. हन्ना और उनकी मोर लव लेटर्स मुहिम कुछ लोगों को बकवास लग सकती है लेकिन शोध बताते हैं कि दूसरों के प्रति दयालु होना या अच्छे ख्याल रखना दरअसल आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है. इमोशन पत्रिका में छपा एक अध्ययन कहता है कि दयालुता सामाजिक तौर पर अलग थलग पड़े या तनावग्रस्त लोगों को सकारात्मक नजरिया देने में मदद कर सकती है. यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया की डॉक्टर लिन एल्डेन और डॉक्टर जेनिफर ट्रू ने चार हफ्तों तक उदासी और अकेलेपन के शिकार कुछ लोगों से हफ्ते में दो दिन दयालुता और भलाई के काम करने को कहा. डॉक्टर एल्डेन कहती हैं कभी कभी लोग किसी को एक छोटा का तोहफा देते हैं किसी बीमार से मिलने जाते हैं या कभी कभी बस ड्राइवर को शुक्रिया बोलते हैं. कहने को तो ये सब छोटे काम हैं लेकिन इनका असर बड़ा होता है. एल्डेन के अध्ययन में चार हफ्तों तक हिस्सा लेने के बाद उन लोगों ने न सिर्फ अपने आप में बेहतरी महसूस की बल्कि उनमें संबंधों को लेकर संतोष भी पहले से ज्यादा पाया गया. वैसे लंदन के सेंटर फॉर एंग्जाइटी डिसऑर्डर्स और ट्रोमा के निदेशक डॉक्टर निक ग्रे को शुरुआत में इस विचार पर संदेह था कि भलाई के काम करने से चिंता और तनाव से जूझ रहे इन लोगों पर कोई चिकित्सीय असर होगा. वो कहते हैं मैंने शोधपत्र नहीं देखा था. इसलिए मुझे इसका शीर्षक देख कर कुछ शक हुआ था. लेकिन ये अच्छा शोधपत्र है और इसे एक सम्मानित टीम ने तैयार किया है. एल्डेन मानती हैं कि इस तरह की परेशानियों से जूझ रहे लोगों के लंबे इलाज में दयालुता एक शुरुआती कदम हो सकता है. |
| DATE: 2013-03-24 |
| LABEL: science |
| [495] TITLE: अब भी मंडरा रहा है टीबी का ख़तरा |
| CONTENT: दुनिया भर में क्षयरोग टीबी को कम करने की योजनाएं सफल नहीं हो पा रही हैं. डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय समूह के मुताबिक़ इस बीमारी को रोकने के लिए एक नए दूरदर्शी दृष्टिकोण की ज़रूरत है. दुनिया भर में चिंता का विषय यह है कि अगर क्षयरोग में वृद्धि होती है तो यह कई देशों के लिए एक ख़तरा बन सकता है. समूह ने लैंसेट मेडिकल जर्नल में लिखा है कि दुनिया भर की सरकारें इस बीमारी के प्रति उदासीन और लापरवाह हैं. इस रिपोर्ट में दुनिया के देशों से यह गुज़ारिश की गई है कि वह इस समस्या को दूर करने के लिए कुछ और पहल करें. विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि हर साल क्षय रोग से 90 लाख लोग बीमार पड़ते हैं और 14 लाख लोग मरते हैं. कुछ देश दवा की प्रतिरोध क्षमता घटने की समस्या का सामना कर रहे हैं. अब आलम यह है कि क्षयरोग के जीवाणुओं को नियंत्रण में करने के लिए जिन एंटीबॉयोटिक दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल करने को तरजीह दी जाती थी अब वे असर नहीं करती हैं. पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया के कुछ हिस्से में यह बीमारी ज्यादा गंभीर है. इन क्षेत्रों में इस बीमारी के एक-तिहाई मामले में कई दवाइयां लेने के बावजूद उनका असर नहीं होता है जिसे एमडीआर-टीबी कहते हैं. कई प्रयोगशालाएं इस बात की पुष्टि करती हैं कि दुनिया भर में एमडीआर-टीबी के मामले वर्ष 2005 के 12000 के मुक़ाबले बढ़कर 2011 में 62000 हो गए. हालांकि ऐसा माना जाता है कि वास्तविक आंकड़े 300000 के क़रीब हो सकते हैं. दवा प्रतिरोधक क्षयरोग के मामले 84 देशों में देखे गए हैं. रिपोर्ट में कहा गया है दुनिया भर में यात्रा करने में अब कोई मुश्किल न आने और पूर्वी यूरोप मध्य एशिया तथा कई अन्य जगहों पर एमडीआर टीबी की दरों में बढ़ोत्तरी होने से वास्तव में इलाज न हो सकने वाले क्षयरोग में तेज़ी आएगी और ख़तरा बढ़ेगा. प्रोफेसर अलीमुद्दीन जुमला का कहना है यह लंदन और यूरोप में एक बड़ी समस्या तो है ही इसके अलावा पिछड़े देशों के लिए भी एक बड़ा संकट है. इस रिपोर्ट का यह तर्क है कि कई देशों ने इस बीमारी के संक्रमण के प्रति दशकों तक उदासीनता दिखाई जिसके लिए बड़े वैचारिक परिवर्तन और दूरदर्शी वैश्विक नेतृत्व की ज़रुरत थी. इसमें कहा गया कि इस बीमारी को रोकने के लिए राजनीतिक और वैज्ञानिक सोच में मूल बदलाव के साथ ही दुनिया भर में विशेष उपायों पर अमल करने की ज़रूरत है. इस रिपोर्ट में कहा गया है वैश्विक आर्थिक संकट और स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश कम होने से राष्ट्रीय क्षयरोग योजनाओं पर ख़तरा मंडरा रहा है. रिपोर्ट के लेखकों में से एक प्रोफेसर अलीमुद्दीन जुमला का कहना है यह लंदन और यूरोप में एक बड़ी समस्या तो है ही इसके अलावा पिछड़े देशों के लिए भी एक बड़ा संकट है. हालांकि उन्होंने यह चेतावनी भी दी है कि रातों-रात इस बीमारी का कोई इलाज नहीं हो सकता है. उनका कहना है कि इस बीमारी के रोकथाम के लिए एंटीबॉयोटिक के अलावा और कई दवाईयां पहले ही तैयार की गई हैं लेकिन गरीब देशों में उपयुक्त तरीक़े से इसका इस्तेमाल करना सबसे बड़ी चुनौती है. |
| DATE: 2013-03-24 |
| LABEL: science |
| [496] TITLE: नमक कम कर देता है शरीर की प्रतिरोधी ताकत |
| CONTENT: एक नए शोध से इस बात के संकेत मिले हैं कि खाने में ज्यादा नमक होने से इंसान की प्रतिरोधी ताकत अपने शरीर के खिलाफ ही विद्रोह कर सकती हैं. इस तरह की प्रतिक्रिया से कई बीमारियों को बढ़ावा मिलता है जिनमें डाइबिटीज़ गठिया और मल्टीपल स्लिरोसिस यानी एमएस भी शामिल है. एमएस सेंट्रल नर्वस सिस्टम यानी केंद्रीय तंत्रिकाओं पर हमला करने वाली एक घातक बीमारी मानी जाती है. वैज्ञानिकों की कई टीम ने नेचर जर्नल पत्रिका में रिपोर्ट प्रकाशित किए हैं जिससे नमक और प्रतिरोधी शक्ति के बीच संबंध का उल्लेख होता है. इस शोध से संकेत मिलता है कि शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र बिल्कुल पलट जाती है जिससे कई गंभीर बीमारियां पैदा हो सकती हैं. हालांकि इस शोध अभी बहुत प्रारंभिक दौर में है और इस पर पुख्ता मेडिकल राय बनाने के लिए और ज्यादा काम की ज़ररूत है. ब्रॉड इंस्टीट्यूट के डॉक्टर अवीव रेगेव कहते हैं हम बस यही कर सकते हैं की हमारे पास जितनी जानकारियां है हम उसे जनता तक पंहुचा सकते हैं. लेकिन जहां ज्यादा नमक से इन बीमारियों का खतरा बढता है कम नमक खाने से खतरा नहीं है. इन नतीजों पर राय देते हुए कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी के प्रोफेसर एलेस्टेयर कॉम्पस्टन कहते हैं ये नहीं कहा जा सकता कि कम नमक लेने से एमएस या दूसरी बीमारी नहीं होगी. नमक बस इन बीमारियों का एक दूसरा कारण हो सकता है. शोध के इन नतीजों पर डॉक्टर कहते हैं कि फिलहाल आम लोग सरकार के दिशा निर्देशों का पालन करे और इन शोधों को किसी परिपक्व नतीजों पर पंहुचने से पहले पक्की राय न बना ले. |
| DATE: 2013-03-23 |
| LABEL: science |
| [497] TITLE: बच्चे ने बनाया शेरों को डराने का उपकरण |
| CONTENT: आजकल रिहाइशी इलाकें जंगलों की हद तक जा पहुँचे है. अकसर आपने सुना होगा कि शेर जैसे जानवर घरों पर हमला कर देते हैं जिससे लोग खौफज़दा रहते हैं. अब कीनिया में 11 साल का लड़का एक ऐसा उपकरण बनाने में कामयाब हो गया है जिससे शेर जैसा खूँखार जानवर भी डरता है. कीनिया में रहने वाले रिचर्ड टुरेरे ने बिना किसी मैकेनिकल या तकनीकी ट्रेनिंग के रिचर्ड ने सिर्फ़ 11 साल की उम्र में शेरों को प्रभावी ढंग से दूर रखने वाली शेर लाइट बनाने में सफ़लता हासिल कर की है. रिचर्ड का ये उपकरण 500 रुपये से भी कम कीमत में तैयार हो गया. इस शेर लाइट को रिचर्ड ने टूटी हुई टॉर्च के एलईडी बल्बों पुरानी कार बैट्री एक सोलर पैनल और मोटरसाइकिल के लाइट इंडिकेटर बॉक्स से तैयार किया है. इंडिकेटर बॉक्स से बल्ब टिमटिमाते हैं और रुक-रुक जलने की यही विशेषता शेर लाइट को ख़ास बनाती है. कीनिया वन्य जीव सेवा में परभक्षी मामलों के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर चार्ल्स मुस्योकी कहते हैं दरअसल स्थिर लाइट से शेर नहीं डरते लेकिन कई स्रोतों से आने वाली टिमटिमाती रोशनी को वो ऐसा गंभीर खतरा मानते हैं. रिचर्ड का ये उपकरण 500 रुपये से भी कम कीमत में तैयार हो गया. इस शेर लाइट को रिचर्ड ने टूटी हुई टॉर्च के एलईडी बल्बों पुरानी कार बैट्री एक सोलर पैनल और मोटरसाइकिल के लाइट इंडिकेटर बॉक्स से तैयार किया है. इंडिकेटर बॉक्स से बल्ब टिमटिमाते हैं और रुक-रुक जलने की यही विशेषता शेर लाइट को ख़ास बनाती है. कीनिया वन्य जीव सेवा में परभक्षी मामलों के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर चार्ल्स मुस्योकी कहते हैं दरअसल स्थिर लाइट से शेर नहीं डरते लेकिन कई स्रोतों से आने वाली टिमटिमाती रोशनी को वो ऐसा गंभीर खतरा मानते हैं. पिछली जुलाई की एक घटना में अंधेरा छंटा तो नैरोबी के बाहरी इलाके में घास के मैदान में छह शेर मरे हुए मिले. दर्जन भर से ज़्यादा स्थानीय मसाई लोगों ने भालों से उनकी हत्या कर दी थी. चैरिटी मुटुनकेई की चार बकरियों को शेर मार चुके हैं. वो कहते हैं हम उन्हें मारते हैं क्योंकि हमारे पास कोई और चारा नहीं है शेर बार-बार हमला जो करते हैं. शेर रात में निकलकर आसानी से पकड़ में आ जाने वाले पालतू पशुओं को शिकार बनाते हैं. कई लोगों के लिए पालतू पशु ही उनकी जीविका का आधार हैं और इन्हें बचाने के लिए वो कुछ भी कर सकते हैं- चाहे इसमें शेर जैसे परभक्षी का शिकार ही क्यों न शामिल हो. आदमी और शेर के इस संघर्ष का परिणाम ये है कि कीनिया में हर साल 100 शेरों का शिकार हो रहा है और अब वहां सिर्फ़ 2000 शेर ही बचे हैं. |
| DATE: 2013-03-23 |
| LABEL: science |
| [498] TITLE: जहाँ कचरापेटी खुद बताती है खाली करो मुझे. |
| CONTENT: तकनीक और नेटवर्किंग भविष्य में हमारे दैनिक जीवन में कितनी अहम भूमिका निभाने वाली है इसकी झलक आपको ब्रिटेन में शहर बाथ की ऐतिहासिक सड़कों पर घूमते हुए मिल जाएगी. यहां की सड़कें साफ सुथरी हैं और इसकी वजह है यहां लगाई गईं कचरापेटियां. ये कोई साधारण कचरापेटियां नहीं हैं. बल्कि ये खुद ही सफाई विभाग को संदेश भेजकर इस बात की जानकारी देती हैं कि अब उन्हें खाली करने का समय आ गया है. ये एक बेतुका विचार लग सकता है लेकिन स्मार्ट कचरापेटियां आने वाले भविष्य की झलक दिखलाती हैं जब मशीनें आपस में बात करेंगी. कचरापेटी अपने बारे में सूचना एसएमएस के जरिए विभाग को प्रेषित करता है और इसी सूचना के आधार पर विभाग कूड़ा निस्तारण के लिए ट्रक भेजता है. कंपनी बोस्टन से इंटरनेट के जरिए अपना कामकाज संभालती है. ये इस बात का संकेत है कि इंटरनेट भविष्य में कितनी बड़ी भूमिका निभा सकता है. कंपनी ने दुनियाभर में 18000 कचरापेटियों में चिप लगाया हैं लेकिन ये ऊंट के मुंह में जीरे के समान है. सेलफोन बनाने वाली दुनिया की जानी मानी कंपनी एरिक्सन के मुताबिक वर्ष 2020 तक 50 अरब मशीनें आपस में जुड़ेगी. अमेरिकी नेशनल इंटेलीजेंस काउंसिल का कहना है कि 2025 तक इंटरनेट जीवन के हर क्षेत्र में अहम भूमिका निभाएगा. इसके पीछे मूल विचार ये है कि सभी चीजों को बेसिक नेटवर्किंग क्षमता से सुसज्जित किया जाए ताकि कम्प्यूटर उनकी पहचान करके उनसे सवाल जवाब कर सके. इससे दुनिया स्मार्ट हो जाएगी और आम लोगों का जीवन सुगम हो जाएगा. बाथ की इन कचरापेटियों की आपूर्ति करने वाली कंपनी बिगबैली सोलर की स्थापना 2003 में हुई थी. कंपनी के संस्थापक जिम पौस कहते हैं बोस्टन में घूमते हुए मैंने बजबजाती हुई कचरापेटियां और कूड़ा ले जाने वाले ट्रकों की खस्ताहाल स्थिती देखी थी. जब-जब ट्रक रुकते थे और शुरू होते थे तब-तब वो काले धुंए का गुबार छोड़ते थे. मुझे लगा कि इस व्यवस्था में गड़बड़ी है. इसका कारण जानकारी का अभाव है. सफाई विभाग को पता नहीं होता था कि किस कचरापेटी को साफ करने की जरूरत है. ऐसे में ट्रकों के कई चक्कर बर्बाद हो जाते थे. कचरापेटी में सौर ऊर्जा से संचालित एक चिप लगाकर इसे चमत्कारिक मशीन में बदला जा सकता है. |
| DATE: 2013-03-22 |
| LABEL: science |
| [499] TITLE: आपके ख़ून का आँखों देखा हाल बताएगा आपका मोबाइल |
| CONTENT: मोबाइल फोन के बिना मौजूदा जीवन शैली की कल्पना भी नहीं की जा सकती. लिहाजा शोध वैज्ञानिक भी ऐसी तकनीकों को ईज़ाद करने लगे हैं जिसका इस्तेमाल मोबाइल फोन से संभव हो. अब वैज्ञानिकों ने ब्लड टेस्ट के लिए ऐसा उपकरण विकसित किया जिसे आपको साथ लेकर चलने की जरूरत नहीं होगी क्योंकि ये आपकी त्वचा के अंदर हमेशा आपके साथ ही मौजूद होगा. और आपकी रिपोर्ट मोबाइल फोन पर देता रहेगा. स्विट्जरलैंड के वैज्ञानिकों ने वायरलेस प्रोटोटाइप नामक इस उपकरण को विकसित किया है. करीब आधे इंच 14 मिलीमीटर लंबा और 2 मिली मीटर चौड़ा ये उपकरण एक साथ पांच तरह के ब्लड टेस्ट करने में सक्षम है. इसके जरिए कैलेस्ट्रोल डायबिटीज की मात्रा का पता लगाया जा सकता है. इन मरीजों के लिए ये उपकरण काफी कारगर साबित हो सकता है. इसके अलावा उपकरण कैंसर मरीजों के लिए बेहद उपयोगी है. इससे कीमियोथेरेपी जैसे इलाज के दौरान शरीर पर पड़ने वाले असर की जानकारी भी मिलेगी. ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट ब्लूटूथ की तकनीक के माध्यम से डॉक्टर या मरीजों के मोबाइल फोन पर आ जाएगी. इस उपकरण को सुई के माध्यम से पेट पांव या बांह की त्वचा के अंदर स्थापित किया जा सकता है. एक बार स्थापित किए जाने के बाद उपकरण वहां महीनों तक काम करता रहेगा. जरूरत पड़ने पर उसे निकाला भी जा सकता है या फिर दूसरी जगह स्थापित किया जा सकता है. इस तरह के उपकरण को विकसित करने की कोशिश दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी लंबे समय से चल रही थी. लेकिन कामयाबी इटली के शोध वैज्ञानिकों को मिली है. फेडरल डी लुज़ाने के इकोल पॉलिटेक्नीक के प्रोफेसर गिओवेनी द मिचेली और शोध वैज्ञानिक सांद्रो कारारा की टीम ने इस उपकरण को विकसित किया है. शोध वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि एक साथ इतने तरह के टेस्ट करने वाला उपकरण अपने आप में अनोखा है. प्रोफेसर गिओवेनी द मिचेली ने कहा इसके इस्तेमाल से आपको पल पल की जानकारी मिलेगी. यह आपके ब्लड टेस्ट पर लगातार नजर रखेगा. इसके इस्तेमाल से आपको रोजाना या साप्ताहिक जांच की जरूरत नहीं पड़ेगी. शोध वैज्ञानिकों के मुताबिक इस उपकरण का सफल प्रयोग अभी तक प्रयोगशाला में जानवरों पर ही हुआ है. अब इसका इस्तेमाल उन मरीजों पर करने की कोशिश की जा रही है जिन्हें नियमित अंतराल पर ब्लड टेस्ट की कराना पड़ता है. इंसानों पर होने वाले प्रयोग के बारे में रिपोर्ट आने वाले दिनों में यूरोपीय इलेक्ट्रानिक्स कांफ्रेंस में जारी होगी. हालांकि इस उपकरण को विकसित करने वालों को यकीन है कि चार साल के बाद यह आम लोगों के लिए भी उपलब्ध होगा. |
| DATE: 2013-03-20 |
| LABEL: science |
| [500] TITLE: परिंदों ने आपकी ज़िन्दगी को सुर दिए और आपने? |
| CONTENT: पक्षियों का चहचाहना किसे अच्छा नहीं लगता होगा. पर ये पंछी खुद शहर के बढ़ते शोर से इस कदर परेशान हैं कि उन्हें अपने लिए एक अदद आशियाना नहीं मिल पा रहा है. कनाडा के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन में यह पाया कि शोर शराबे के माहौल में पक्षियों के संगीत की सदा गुम होती जा रही है. इतना ही नहीं बढ़ते ध्वनि प्रदूषण की वजह से पंछियों के संवाद करने की क्षमता पर भी असर पड़ा है. पक्षियों की गतिविधियों पर नजर रखने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि नर पक्षी के आवाज़ को पूरी तरह से सुन पाने में नाकाम होने वाली मादाएं अपने नर साथियों को बीमार समझकर खारिज कर सकती हैं. इस शोध के नतीजे ग्लोबल चेंज बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुए हैं. शोध से जुड़े डैरेन प्रॉपे कहते हैं शहरी इलाकों में मधुर आवाज़ वाले पक्षियों को बचाने को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है. यह जैव विविधता से भी जुड़ा हुआ है. उन्होंने कहाहम यह भी जानते हैं कि इन इलाकों में शोर का स्तर अधिक होता है. शोध के दौरान युनिवर्सिटी ऑफ अलबर्टा से जुड़े डॉक्टर प्रॉपे फिलहाल अमरीका के कैल्विन कॉलेज के लिए काम कर रहे हैं. वह कहते हैं शहर के कुछ इलाकों को देखकर ऐसा लगता है कि यहां गाने वाले पक्षियों के लिए माकूल माहौल होगा लेकिन वहां इनकी तादाद बहुत कम होती है. शोध करते वक्त में इसी मुद्दे को केंद्र में रखा गया था कि क्या किसी शहर में रहने वाले पक्षियों और वहां के शोर के स्तर के बीच कोई संबंध भी है. एडमंटन में इस अध्ययन के लिए एक टीम शहर के 113 प्राकृतिक जगहों पर गई. डॉक्टर प्रॉपे ने इस बारे में कहाशोध में हमने पाया कि शहर के जिन इलाकों में शोर ज्यादा था वहां गाने वाले पक्षियों की तादाद कम थी. अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि मादा पक्षी निम्न आवृत्ति वाले किसी गीत को सुन पाने में खुद को जब असमर्थ पाती हैं तो वे नर पक्षी की आवाज को असामान्य महसूस करने लगती हैं तो धीरे-धीरे इसका नतीजा सामने आने लगता है. अगर नर पक्षियों को मादा जोड़े ना मिले तो उनकी नस्लें कम होने लगेंगी और इसका असर उनकी आबादी पर दिखेगा. |
| DATE: 2013-03-20 |
| LABEL: science |
| [501] TITLE: चौकों-छक्कों के कारण जीत गया राजस्थान |
| CONTENT: आईपीएल 7 में मंगलवार को खेले गए एक अत्यंत रोमांचक मुक़ाबले में राजस्थान रॉयल्स ने कोलकाता नाइटराइडर्स को सुपर ओवर में हराकर जीत हासिल की. सुपर ओवर में राजस्थान रॉयल्स को जीत के लिए 12 रन बनाने थे लेकिन उसने बिना किसी नुक़सान के 11 रन बनाए यानी सुपर ओवर भी टाई रहा. इसके बावजूद अधिक बाउंड्री लगाने के आधार पर उसने मैच अपने नाम किया. सुपर ओवर कोलकाता की ओर से सुनील नारायण ने किया जिसमें राजस्थान के कप्तान शेन वॉटसन छह और स्टीव स्मिथ पांच रन बनाकर नाबाद रहे. इससे पहले राजस्थान रॉयल्स ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए निर्धारित 20 ओवर में अजिंक्य रहाणे के 72 रनों की मदद से पांच विकेट खोकर 152 रन बनाए. जबाव में कोलकाता नाइट राइडर्स ने भी निर्धारित 20 ओवर में आठ विकेट खोकर 152 रन बनाए और टाई रहने के कारण मैच सुपर ओवर में चला गया. सुपर ओवर में कोलकाता नाइट राइडर्स की शुरुआत सूर्य कुमार यादव और साकिब अल हसन ने की. जबकि गेंदबाज़ी की कमान जेम्स फॉकनर ने संभाली. सुपर ओवर में कोलकाता की टीम दो विकेट खोकर 11 रन ही बना सकी. इससे पहले राजस्थान रॉयल्स के कप्तान शेन वॉटसन ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करने का फ़ैसला किया. अजिंक्य रहाणे ने 59 गेंदों पर छह चौक्के और एक छक्के की मदद से 72 रन बनाए. उनके अलावा कप्तान शेन वॉटसन ने रन आउट होने से पहले 24 गेंदों पर पांच चौक्कों की मदद से 33 रनों की तेज़-तर्रार पारी खेली. आख़िरी ओवरों में स्टीव स्मिथ ने भी केवल 11 गेदों पर नाबाद 19 रन बनाकर टीम के स्कोर को पांच विकेट पर 152 रन तक पहुंचाया. कोलकाता की ओर से आर विनय कुमार ने 30 रन देकर दो और साकिब अल हसन ने 23 रन देकर एक विकेट हासिल किया. मोर्नी मॉर्कल थोड़े महंगे साबित हुए और उन्होंने 40 रन देकर एक विकेट हासिल किया. जबाव में कोलकाता नाइट राइडर्स ने भी गौतम गंभीर के 45 और सूर्य कुमार यादव के 31 रनों की मदद से एक समय जीत की स्थिति पैदा की. तभी जेम्स फॉक्नर ने पारी के 19वें और अपने दूसरे ओवर में तीन विकेट चटकाकर मैच का रुख़ राजस्थान रॉयल्स की तरफ़ कर दिया. अंतिम ओवर में कोलकाता को जीत के लिए 12 रनों की ज़रूरत थी. ऐसे में केन रिचर्डसन ख़ासे महंगे साबित हुए और उन्होंने 11 रन दिए जिससे कोलकाता की टीम आठ विकेट खोकर 152 रन बनाने में क़ामयाब रहा और मैच टाई हो गया. राजस्थान रॉयल्स की ओर से फॉक्नर ने दो ओवर में 11 रन देकर तीन और केन रिचर्डसन ने चार ओवर में 28 रन देकर एक विकेट हासिल किया जबकि परवीन ताम्बे ने 31 रन देकर दो विकेट झटके. आईपीएल 7 में यह पहला टाई मैच रहा. बुधवार को आईपीएल 7 के पहले चरण का आख़िरी मुक़ाबला मुंबई इंडियंस और सनराइज़र्स हैदराबाद के बीच खेला जाएगा. |
| DATE: 2014-04-30 |
| LABEL: sports |
| [502] TITLE: ब्रिटेन: तीन रन पर पूरी टीम आउट |
| CONTENT: ब्रिटेन में क्लब लेवल के मैच में एक टीम केवल तीन रन ही बना सकी इसमें से दो रन उसे अतिरिक्त के रूप में मिले. चेशायर लीग डिविजन क्रिकेट में विराल क्रिकेट क्लब और हसलिंगटन के बीच हुए मैच में जीत के लिए विराल को 109 रन बनाने की जरूरत थी. लेकिन उसके 10 बल्लेबाज़ शून्य के स्कोर पर आउट हो गए. इस टीम ने दो अतिरिक्त रन लेग बाई से जुटाए. हालांकि यह एक शर्मनाक हार है इसके बाद भी यह सबसे कम स्कोर नहीं है. सबसे कम स्कोर का रिकॉर्ड समरसेट के क्लब लैंगपोर्ट के नाम दर्ज है साल 1913 में ग्लासटनबरी के खिलाफ खेले गए एक मैच में लैंगपोर्ट की पूरी टीम शून्य रन के स्कोर पर आउट हो गई थी. पहले दर्जे के मैचों में सबसे कम स्कोर छह रन का है. इसे ओल्ड लार्ड्स मैदान में 1810 में इंग्लैंड के खिलाफ खेलते हुए दी बी ने बनाए थे. वहीं टेस्ट क्रिकेट में सबसे कम स्कोर न्यूज़ीलैंड के नाम दर्ज है. न्यूजीलैंड की पूरी टीम 1955 में खेले गए एक मैच में 26 रन बनाकर आउट हो गई थी. रविवार को खेले गए मैच में एक समय विराल का स्कोर आठ विकेट के नुक़सान पर शून्य रन था. इसके बाद उसे लेग बाई के रूप में दो अतिरिक्त रन मिले. वहीं कॉनर हब्सन ने एक रन बनाए और अंत तक आउट नहीं हुए. वो मैच को 10 ओवर तक खींच कर ले गए. हैरानी की बात यह है कि हसलिंगटन ने केवल दो गेंदबाजों का प्रयोग किया. बेन इस्टीड ने अपने पांच ओवर की गेंदबाजी में एक रन देकर छह विकेट चटकाए. उनके साथी गेंजबाज टॉम ग्लेडहिल ने 4-2 ओवर में चार विकेट हासिल किए. विराल की टीम के इस ख़राब प्रदर्शन पर नौंवे नंबर पर बल्लेबाजी करने आने वाले मैट गारेट ने बीबीसी रेडियो फ़ाइव से कहा वास्तव में यह सब पलक झपकते ही हो गया. उन्होंने कहा मुझे लगता है कि जब मैं पैड बांधने के लिए चेंजिंग रूम में गया तो उस समय हमारे तीन विकेट गिर चुके थे और सातवां विकेट गिरने पर मैं गार्ड लेने गया. वो कहते हैं आपके दिमाग में कहीं न कहीं ये बात होती है कि आप अब भी कुछ कर सकते हैं. लेकिन दो गेंद बाद जब आपके सभी साथी पवेलियन लौट चुके होते हैं तो आपको लगता है कि शायद आज आपका दिन नहीं था. मैच हारने के बाद विराल सीसी ने ट्वीट किया आज पहला मैच 105 रन से हार गए. दुखद बात यह है कि विपक्षी टीम ने केवल 108 रन बनाए. |
| DATE: 2014-04-29 |
| LABEL: sports |
| [503] TITLE: किंग्स इलेवन पंजाब की जीत का सिलसिला बरक़रार |
| CONTENT: आईपीएल 7 में सोमवार को खेले गए मुक़ाबले में किंग्स इलेवन पंजाब को अपनी जीत का सिलसिला बरक़रार रखते हुए रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर को पांच विकेट से मात दी है. यह किंग्स इलेवन पंजाब की लगातार पांचवी जीत है. उसके सामने जीत के लिए केवल 125 रनों का लक्ष्य था जो उसने थोड़ा संघर्ष करने के बाद 18-5 ओवर में पांच विकेट खोकर हासिल कर लिया. पंजाब की जीत में वीरेंदर सहवाग ने अहम भूमिका निभाते हुए 4 चौकों की मदद से 26 गेंदों पर 32 रन बनाए. अभी तक पंजाब की बल्लेबाज़ी की धार रहे ग्लेन मैक्सवेल कल केवल छह रन बनाकर वरुण एरॉन का शिकार बने. लेकिन डेविड मिलर ने 26 रन बनाकर मध्यम क्रम को थोड़ा संभाल लिया. बाकी का काम कप्तान जॉर्ज बेली और ऋषि धवन ने पूरा किया. बेली 16 और धवन 23 रन बनाकर नाबाद रहे. बंगलौर के लिए वरुण एरॉन ने 3-5 ओवर में 29 रन देकर दो विकेट चटकाए. इससे पहले किंग्स इलेवन पंजाब के कप्तान जॉर्ज बेली ने टॉस जीतकर पहले क्षेत्ररक्षण का फ़ैसला किया जिसे उनके गेंदबाज़ों ने सही साबित करते हुए बंगलौर को निर्धारित बीस ओवर में आठ विकेट खोकर केवल 124 रन बनाने दिए. वैसे बंगलौर की टीम ने क्रिस गेल जैसे धुंआधांर बल्लेबाज़ की वापसी हुई और उन्होंने केवल 7 गेंदों पर दो चौकों और दो छक्कों की मदद से 20 रन भी बनाए. उन्हें संदीप शर्मा ने बोल्ड किया. इसके बाद संदीप शर्मा ने पार्थिव पटेल और कप्तान विराट कोहली को भी पवैलियन की राह दिखाकर बंगलौर को करारे झटके दिए. पार्थिव पटेल दो और कप्तान विराट कोहली केवल चार रन बना सके. इसके बाद युवराज सिंह ने 32 गेदों पर 35 रन बनाकर पारी को संभाला लेकिन बाकी बल्लेबाज़ मिचेल जॉनसन और ऋषि धवन का सामना नहीं कर सके. संदीप शर्मा ने तीन ओवर में 15 रन देकर तीन विकेट हासिल किए जबकि मिचेल जॉनसन ने 19 रन देकर दो और ऋषि धवन ने 14 रन देकर दो विकेट हासिल किए. मंगलवार को आईपीएल 7 में कोलकाता नाइट राइडर्स का सामना राजस्थान रॉयल्स से होगा. किंग्स इलेवन पंजाब पांच मैचों के बाद दस अंक लेकर अंक तालिका में पहले स्थान पर है. |
| DATE: 2014-04-29 |
| LABEL: sports |
| [504] TITLE: चेन्नई ने हैदराबाद को पांच विकेट से हराया |
| CONTENT: ड्वायन स्मिथ के शानदार अर्धशतक और ब्रेंडन मैक्लम के साथ पहले विकेट के लिए उनकी 85 रनों की तेज़ साझेदारी की बदौलत चेन्नई सुपर किंग्स टीम ने रविवार को शारजाह क्रिकेट स्टेडियम में खेले गए इंडियन प्रीमियर लीग आईपीएल के सातवें संस्करण के अपने पांचवें लीग मैच में सनराइज़र्स हैदराबाद को पांच विकेट से हरा दिया. सनराइज़र्स हैदराबाद ने पहले बल्लेबाज़़ी करते हुए पांच विकेट पर 145 रन बनाए थे जिसके जवाब में चेन्नई सुपरकिंग्स ने ड्वायन स्मिथ और ब्रेंडन मैक्लम की शानदार शुरूआत की बदौलत 19-3 ओवरों में पांच विकेट के नुक़सान पर लक्ष्य हासिल कर लिया. मैक्लम ने कुल 85 रन बनाए जिनमें तीन चौके और दो छक्के शामिल थे. स्मिथ ने 46 गेंदों पर चार चौकों और पांच छक्के की मदद से 66 रन बनाए. अंतिम ओवर में सुपर किंग्स को जीत के लिए छह रनों की ज़रूरत थी. चेन्नई के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने तीसरी गेंद पर चौका लगाकर अपनी टीम की जीत दिला दी. इससे पहले सनराइज़र्स ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करने का फ़ैसला किया. सनराइज़र्स की शुरूआत अच्छी नहीं रही. कप्तान शिखर धवन 7 की नाकामी ने उनका साथ नहीं छोड़ा और वह 15 के कुल योग पर पवेलियन लौट गए. हैदराबाद की तरफ़ से एरान फिंच ने सबसे अधिक 44 रन बनाए. इसके अलावा लोकेश राहुल ने 25 डारेन सैमी ने नाबाद 23 और कर्ण शर्मा ने नाबाद 17 रन जोड़े. इस तरह हैदराबाद ने निर्धारित 20 ओवरों में पांच विकेट पर 145 रन बनाए. सनराइज़र्स को अब तक खेले गए तीन मुक़ाबलों में से एक में जीत मिली है जबकि सुपर किंग्स को चार में से तीन मैचों में जीत मिली है. सनराइज़र्स को सुपर किंग्स के अलावा किंग्स इलेवन पंजाब और राजस्थान रॉयल्स टीमों के ख़िलाफ़ हार मिली थी जबकि उसने अपने अंतिम मैच में दिल्ली डेयरडेविल्स को पराजित किया था. दूसरी ओर सुपर किंग्स ने अब तक डेयरडेविल्स सनराइज़र्स राजस्थान रॉयल्स और मुम्बई इंडियंस को हराया है. किंग्स इलेवन पंजाब के हाथों उसे हार मिली है. सुपर किंग्स फ़िलहाल आठ अंकों के साथ दूसरे और सनराइज़र्स दो अंकों के साथ सातवें स्थान पर हैं. |
| DATE: 2014-04-28 |
| LABEL: sports |
| [505] TITLE: मुंबई इंडियंस की लगातार चौथी हार |
| CONTENT: आईपीएल -7 में रविवार को शारजाह में खेले गए एक मैच में मुंबई इंडियंस को एक बार फिर हार का मुंह देखना पड़ा. इस बार उसे दिल्ली डेयरडेविल्स ने सात गेंद शेष रहते छह विकेट से मात दी. दिल्ली के सामने जीत के लिए केवल 126 रनों का लक्ष्य था जो उसने 18-5 ओवर में चार विकेट खोकर हासिल किया. दिल्ली डेयरडेविल्स के लिए मुरली विजय और क्विंटन डीकॉक ने पहले विकेट के लिए 34 रन जोड़ कर अच्छी शुरुआत दी. मुरली विजय ने 34 गेंदों का सामना करते हुए चार चौके और एक छक्के की मदद से 40 रन बनाए. वो रोहित शर्मा की गेंद पर बोल्ड हुए. क्विंटन डीकॉक ने हालांकि रन तो केवल 16 बनाए लेकिन मुरली विजय के साथ एक अच्छी शुरुआत देने के कारण वो दिल्ली को जीत की राह दिखाने में कामयाब रहे. बाकी का काम कप्तान केविन पीटरसन ने 18 गेंदों पर दो चौके और एक छक्के की मदद से नाबाद 26 रन बना कर किया. इससे पहले मुंबई इंडियंस ने कप्तान रोहित शर्मा ने टॉस जीत कर पहले बल्लेबाज़ी करने का फैसला किया लेकिन उनकी बल्लेबाज़ी एक बार फिर दिल्ली डेयरडेविल्स के गेंदबाज़ों के सामने भी नाकाम रही. पिछले सीज़न की चैंपियन टीम के कप्तान रोहित शर्मा केवल चार बना कर रन आउट हुए तो उनके जोड़ीदार आदित्य तरे भी केवल आठ रन बना कर वाइने पार्नेल के शिकार बने. मुंबई के लिए किरन पोलार्ड ने तीस गेंदों पर दो चौके और दो छक्के लगाते हुए 33 रनों की नाबाद सर्वाधिक रनों की पारी खेली. इसके बावजूद मुंबई की टीम निर्धारित बीस ओवर में छह विकेट खोकर 125 रन ही बना सकी. मुंबई के आक्रामक बल्लेबाज़ कोरी एंडरसन भी टीम को कोई विशेष योगदान नहीं दे सके और उन्होंने 13 रन बनाए. दिल्ली डेयरडेविल्स की ओर से जयदेव उनादकट ने कसी हुई गेंदबाजी करते हुए चार ओवरों में 29 रन देकर दो विकेट लिए जबकि शाहबाज़ नदीम ने 19 रन देकर एक विकेट लिया. ये मुंबई की लगातार चौथी हार रही वहीं दिल्ली पांच में दो मैच जीती है और तीन मैच हारी है. |
| DATE: 2014-04-27 |
| LABEL: sports |
| [506] TITLE: अमरीकी बास्केटबॉल टीम के मालिक की नस्ली टिप्पणी से हंगामा |
| CONTENT: अमरीकी नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन एनबीए एक शिकायत की जांच कर रहा है जिसमें लॉस एंजेल्स क्लिपर्स टीम के मुखिया पर नस्ली टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया है. एक सेलिब्रिटी समाचार वेबसाइट टीएमज़ेड पर पोस्ट की गई ऑडियो क्लिप में टीम के मालिक डोनाल्ड स्टर्लिंग को एक महिला से यह कहते हुए सुना गया है कि वो अश्वेत लोगों के साथ अपने जुड़ाव को प्रसारित न करे और ना ही उन्हें खेलों में ले आए. एनबीए ने इस टिप्पणी को चिंतनीय और अपमानजनक करार दिया है. हालांकि बाद में स्टर्लिंग ने टीएमज़ेड से कहा कि रिकॉर्डिंग में आए विचार उनके नहीं हैं. टीएमज़ेड ने शुक्रवार को अपनी वेबसाइट पर 10 मिनट की इस ऑडियो रिकॉर्डिंग को प्रसारित किया था. कथित रूप से यह बातचीत उसके तुरंत बाद की है जब उक्त महिला ने बास्केटबॉल के दिग्गज खिलाड़ी मैजिक जॉन्सन के साथ अपनी तस्वीर इंटरनेट पर पोस्ट की थी. रिकॉर्डिंग में जिस व्यक्ति की आवाज़ है वो मैजिक जॉन्सन को विशेष रूप से संदर्भित करते हुए कह रहे हैं उन्हें मेरे मैचों में मत लाओ ठीक है हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि कैसे और कब यह बातचीत रिकॉर्ड की गई. एक बयान में एनबीए के प्रवक्ता माइक बास ने कहा टीएमज़ेड से प्राप्त ऑडियो रिकॉर्डिंग के बारे में हम पूरी जांच कर रहे हैं. रिकॉर्डिंग में सुनाई दे रही टिप्पणी बहुत चिंतनीय और अपमानजनक है लेकिन इसके अलावा हमारे पास और कोई जानकारी नहीं है. मैजिक जॉन्सन ने ट्विटर पर कहा है डोनाल्ड स्टर्लिंग जब तक टीम के मालिक हैं मैं क्लिपर्स के मैच में दोबारा नहीं जाउंगा. टीएमज़ेड स्पोर्ट्स में एक प्रकाशित एक संयुक्त बयान में स्टर्लिंग और क्लिपर्स ने कहा हमने टीएमज़ेड पर जारी एक वीडियो क्लिप के बारे में सुना है. हम नहीं जानते कि यह कहां तक सही है या इसके साथ कोई छेड़-छाड़ तो नहीं हुई है. स्टर्लिंग इस बात पर दृढ़ हैं कि रिकॉर्डिंग में जो कुछ है वो सही नहीं है और न ही ये उनके विचारों विश्वास और भावनाओं को प्रदर्शित करता है. वो जैसा सोचते हैं और जिस तरह उन्होंने अपना जीवन जिया है यह ठीक उससे उलट है. बयान में कहा गया है वो इस बात से दुखी हैं कि इस तरह की भावनाओं को उनके साथ जोड़ा गया और वो किसी भी ऐसे व्यक्ति से माफी मांगते हैं जिसकी भावनाएं आहत हुई हैं. डोनाल्ड स्टर्लिंग ने लॉस एंजेल्स क्लिपर्स बास्केटबॉल टीम को 1981 में ख़रीदा था. |
| DATE: 2014-04-27 |
| LABEL: sports |
| [507] TITLE: राजस्थान ने बेंगलोर को छह विकेट से मात दी |
| CONTENT: आईपीएल-7 के अबु धाबी में खेले गए एक मुक़ाबले में शनिवार को रॉयल चैलेंजर्स बेंगलोर की टीम 15 ओवर में केवल 70 रन पर सिमट गई जिसके बाद राजस्थान रॉयल्स ने उसे आसानी से छह विकेट से हरा दिया. इससे पहले राजस्थान की टीम के कप्तान शेन वाट्सन ने जब टॉस जीतकर पहले गेंदबाज़ी करने का फ़ैसला किया तो शायद ही उन्होंने सोचा होगा कि जिस टीम में युवराज सिंह एबी डिविलियर्स और विराट कोहली के साथ साथ अच्छी फॉर्म में चल रहे पार्थिक पटेल जैसे बल्लेबाज हों वो टीम एक समय अपने छह विकेट केवल 28 रन पर खो देगी. लेकिन ऐसा हुआ जब पार्थिव पटेल केवल एक रन बनाकर रन आउट होकर चलते बने तो युवराज सिंह के बल्ले से भी केवल तीन रन निकले. एबी डिविलियर्स तो अपना खाता भी नहीं खोल सके. विराट कोहली ने जैसे तैसे 21 रन बना कर टीम को आईपीएल का न्यूनतम स्कोर होने से बचाया. उनके अलावा मिचेल स्टार्क ने 18 और रवि रामपाल ने 13 रन बनाए. इस मैच में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलोर की टीम मुश्किल में तो तभी पड़ गई थी जब उसके चार अहम बल्लेबाज़ केवल पांच रन का स्कोर बनते बनते पैवेलियन लौट चुके थे. राजस्थान की ओर से लेग स्पिनर परवीन तांबे ने 20 देकर चार विकेट हासिल किए. उनके अलावा रिचर्ड्सन ने भी 18 रन देकर दो विकेट हासिल किए जिनमें युवराज सिंह और एबी डिविलियर्स के विकेट शामिल हैं. इसके बाद राजस्थान रॉयल्स ने अजिंक्य रहाणे के 23 और कप्तान शेव वाट्सन के 24 रनों की मदद से जीत के लिए 71 रनों का लक्ष्य 13 ओवर में केवल चार विकेट खोकर हासिल कर लिया. आईपीएल के सातवें सीज़न में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलोर की चौथे मैच में ये दूसरी हार रही वहीं राजस्थान रॉयल्स ने इस जीत के साथ ही अंक तालिका में वापसी करते हुए अपनी स्थिति को सुधार लिया है. अब उसके खाते में भी दो हार और दो जीत हैं. |
| DATE: 2014-04-26 |
| LABEL: sports |
| [508] TITLE: चेन्नई सुपरकिंग्स ने दी राजस्थान रॉयल्स को मात |
| CONTENT: आईपीएल-7 में दुबई में बुधवार रात खेले गए मैच में चेन्नई सुपरकिंग्स ने राजस्थान रॉयल्स को सात रनों से हरा दिया. चेन्नई सुपरकिंग्स ने पहले खेलते हुए निर्धारित 20 ओवर में छह विकेट खोकर 140 रन बनाए थे लक्ष्य का पीछा करने उतरी राजस्थान रॉयल्स 19-5 ओवर में सिर्फ़ 133 रन ही बना सकी. रवींद्र जाडेजा ने इस जीत में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने पहले तो 36 रन बनाए और बाद में राजस्थान रॉयल्स के चार अहम विकेट भी झटके. ऑलराउंड प्रदर्शन के लिए उन्हें मैन ऑफ द मैच से नवाज़ा गया. इस जीत के साथ ही चेन्नई सुपरकिंग्स के तीन मैचों में अब चार अंक हो गए हैं और वो दूसरे स्थान पर भी पहुंच गई है. वहीं राजस्थान रॉयल्स की तीन मैचों में ये दूसरी हार है. इससे पहले चेन्नई सुपरकिंग्स को टॉस हारने की वजह से पहले बल्लेबाज़ी करनी पड़ी और उसके चोटी के बल्लेबाज़ कुछ ख़ास रन नहीं जोड़ सके. डवेन स्मिथ ही उसके एकमात्र ऐसे बल्लेबाज़ रहे जो अपने बल्ले का कुछ क़माल दिखा सके. डवेन स्मिथ ने 28 गेंदों पर छह चौकों और तीन छक्कों की मदद से 50 रन बनाए. जाडेजा ने 33 गेंदों पर 36 रन बनाए और वे आख़िर तक विकेट पर डटे रहे. राजस्थान रॉयल्स की टीम थोड़ी-थोड़ी देर में अपने विकेट गंवाती रही और पूरी टीम 20वें ओवर की एक गेंद बाकी रहते 133 रनों पर सिमट गई. राजस्थान रॉयल्स के लिए सबसे अधिक रनों का योगदान धवल कुलकर्णी ने दिया जिन्होंने 27 रन बनाए और नाबाद रहे. रजत भाटिया ने 23 रनों का योगदान दिया. पहले बल्लेबाज़ी करते हुए चेन्नई के सलामी बल्लेबाज़ स्मिथ ने शुरू से ही रन बनाने की कोशिश की जिसकी बदौलत उनकी टीम पावरप्ले में एक विकेट पर 51 रन बना सकी. कप्तान महेंद्र सिंह धोनी महज़ पांच रन बना सके. चेन्नई का स्कोर 15वें ओवर में किसी तरह 100 रन के पार पहुंचा. लेकिन जडेजा एक छोर पर लगातार टिके रहे और उनकी बदौलत टीम 140 रन बना सकी. |
| DATE: 2014-04-24 |
| LABEL: sports |
| [509] TITLE: पंजाब ने बनाई जीत की हैट्रिक |
| CONTENT: किंग्स इलेवन पंजाब ने आईपीएल-7 में मंगलवार को सनराइजर्स हैदराबाद को 72 रन से हराकर जीत की हैट्रिक पूरी कर ली. शारजाह में खेले गए इस मैच में पंजाब ने छह विकेट पर 193 रन का मज़बूत स्कोर बनाया और फिर हैदराबाद को 19-2 ओवर में 121 रन पर ढेर कर दिया. पंजाब की यह लगातार तीसरी जीत है और टीम छह अंकों के साथ अंकतालिका में शीर्ष पर पहुंच गई है जबकि हैदराबाद को लगतार दूसरी हार का सामना करना पड़ा है. पंजाब के ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ ग्लेन मैक्सवेल लगातार तीसरे मैच में शतक से चूक गए. उन्होंने दो बार मिले जीवनदार का भरपूर फ़ायदा उठाते हुए 43 गेंदों पर पाँच चौकों और नौ छक्कों की मदद से 95 रन की तूफ़ानी पारी खेली. मैक्सवेल ने पिछले दो मैचों में 95 और 89 रन बनाए थे और वह श्रीलंका के माहेला जयवर्धने के बाद टी-20 में लगातार तीन पारियों 80 से अधिक रन बनाने वाले दूसरे बल्लेबाज़ बन गए. इससे पहले चेतेश्वर पुजारा 35 और वीरेंद्र सहवाग 30 ने पहले विकेट के लिए 51 रन जोड़कर पंजाब को ठोस शुरुआत दी. डेविड मिलर इस बार दस रन ही बना पाए जबकि कप्तान जॉर्ज बैली के खाते में भी दस ही रन आए. हैदराबाद की तरफ़ से भुवनेश्वर कुमार ने 19 रन देकर तीन विकेट लिए जबकि अमित मिश्रा को दो और डैरन सैमी को एक विकेट मिला. इसके जवाब में हैदराबाद की टीम कभी भी मुक़ाबले में नज़र में नहीं आई. उसकी तरफ से लोकेश राहुल ने सर्वाधिक 27 रन बनाये. ओपनर आरोन फिंच 19 कप्तान शिखर धवन एक डेविड वार्नर आठ वेणुगोपाल राव 11 इरफ़ान पठान पाँच और डैरन सैमी 15 रन ही बना सके. पंजाब की तरफ़ से लक्ष्मीपति बालाजी ने गेंदबाज़ी में कमाल दिखाया और चार ओवर में 13 रन देकर चार विकेट लिए. अक्षर पटेल और मिशेल जानसन ने दो-दो विकेट लिए. |
| DATE: 2014-04-23 |
| LABEL: sports |
| [510] TITLE: श्रीनिवासन और अन्य की जांच को तैयार जस्टिस मुद्गल |
| CONTENT: जस्टिस मुद्गल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पूर्व चेयरमैन एन श्रीनिवासन और आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाजी से कथित तौर पर जुड़े 12 दूसरे लोगों के खिलाफ़ जांच करने को तैयार हैं. इन 12 लोगों में कुछ बड़े खिलाड़ियों का नाम भी शामिल होने की बात कही जा रही है. मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस मुद्गल समिति से पूछा था कि क्या वो आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग और सट्टा के सिलसिले में एन श्रीनिवासन और 12 दूसरे लोगों के खिलाफ आगे और जांच करना चाहेंगेन्यायमूर्ति एके पटनाईक की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अगर समिति चाहे तो उसे जांच एजेंसियों की सहायता भी मुहैया कराई जाएगी. जांच के दायरे में कई प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी भी शामिल हैं. जस्टिस मुद्गल की सहमति के बाद अब सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में फ़ैसला लेना है. इससे पहले भारत में क्रिकेट की नियामक संस्था बीसीसीआई ने सुप्रीम कोर्ट को सामने तीन सदस्यीय जांच पैनल का प्रस्ताव रखा था जिसे देश की सर्वोच्च न्यायालय ने हितों के टकराव के आधार पर ख़ारिज कर दिया. जिन 13 लोगों की जांच की बात कही गई है उनके नाम अभी तक सार्वजनिक नहीं हुए हैं. बोर्ड ने जिस तीन सदस्यीय जांच दल का नाम सुझाया था उनमें भारत के आल-राउंडर खिलाड़ी रवि शास्त्री कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे ए पटेल और सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन के नाम शामिल थे. आईपीएल के पिछले संस्करण में स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाज़ी के आरोपों की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर में मुद्गल समिति का गठन किया था. इस समिति ने इस साल फ़रवरी में अपनी रिपोर्ट पेश की थी. समिति ने साथ ही अदालत को एक सीलबंद लिफाफा भी सौंपा था जिसमें ख़बरों के मुताबिक़ 13 लोगों के नाम थे. समिति ने रिपोर्ट में कहा था कि इन लोगों की व्यापक जाँच किए जाने की ज़रूरत है. |
| DATE: 2014-04-22 |
| LABEL: sports |
| [511] TITLE: सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज किया बीसीसीआई का पैनल |
| CONTENT: उच्चतम न्यायालय ने आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग और भ्रष्टाचार की जाँच के लिए बीसीसीआई द्वारा गठित पैनल को ख़ारिज कर दिया है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ न्यायालय ने मुद्गल समिति से पूछा है कि क्या वह एन श्रीनिवासन और सीनियर खिलाड़ियों के ख़िलाफ़ जाँच करने के लिए तैयार है. न्यायालय ने समिति को दो बजे तक अपना जवाब देने को कहा है. उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर मुद्गल समिति इस जाँच के लिए तैयार होती है तो उसे जाँच एजेंसियों की तरफ से पूरा सहयोग मिलेगा. बीसीसीआई कार्य समिति की रविवार को मुंबई में एक आपात बैठक हुई थी जिसमें तीन सदस्यीय एक कमेटी बनाने का फ़ैसला किया था. समिति में भारत के पूर्व कप्तान और कमेंटेटर रवि शास्त्री कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस जे एन पटेल और सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर आरके राघवन को शामिल किया गया था. हालांकि बोर्ड ने आधिकारिक तौर पर इस कमेटी का ऐलान नहीं किया था. आईपीएल के पिछले संस्करण में स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाज़ी के आरोपों की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर में मुद्गल समिति का गठन किया था. इस समिति ने इस साल फ़रवरी में अपनी रिपोर्ट पेश की थी. समिति ने साथ ही अदालत को एक सीलबंद लिफाफा भी सौंपा था जिसमें 13 लोगों के नाम थे. समिति ने रिपोर्ट में कहा था कि इन लोगों की व्यापक जाँच किए जाने की ज़रूरत है. सुप्रीम कोर्ट ने 16 अप्रैल को कहा था कि सीलबंद लिफाफे में श्रीनिवासन का नाम भी है. अदालत ने तब भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बीसीसीआई से कहा था कि मामले की निष्पक्ष जाँच के लिए वह कोई ठोस प्रस्ताव लेकर आए. इस मामले में याचिकाकर्ता क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ बिहार सीएबी के आदित्य वर्मा ने कहा कि उन्हें सीबीआई और एनआईए जांच से कम कुछ भी मंजूर नहीं है. उन्होंने कहा अगर मुद्गल समिति इस मामले की आगे की जाँच के लिए तैयार होती है और उसे कुछ अधिकार दिए जाते हैं तो हम इस जाँच के लिए तैयार हैं. मुद्गल समिति की तरफ से गोपाल सुब्रमण्यम अदालत में पेश हुए और उन्होंने समिति के समक्ष राघवन की गवाही के बारे में विस्तार के कोर्ट को बताया. उन्होंने कहा कि राघवन ने मुद्गल समिति से कहा था कि वह श्रीनिवासन के बारे में बात करने की स्थिति नहीं हैं क्योंकि चेन्नई में उनका एक क्लब है और इस तरह वह तमिलनाडु क्रिकेट संघ से जुड़े हैं. |
| DATE: 2014-04-22 |
| LABEL: sports |
| [512] TITLE: चेन्नई ने दिल्ली को हराया |
| CONTENT: दो बार के चैंपियन चेन्नई सुपर किंग्स ने दिल्ली डेयरडेविल्स को सोमवार को 93 रन से हराकर आईपीएल-7 में अपनी पहली जीत दर्ज की. चेन्नई को टूर्नामेंट के अपने पहले मैच में किंग्स इलेवन पंजाब के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा था लेकिन दिल्ली के ख़िलाफ़ टीम ने खेल के हर विभाग में सधा प्रदर्शन किया. अबु धाबी के शेख जायेद स्टेडियम में खेले गए इस मैच में सुपर किंग्स ने निर्धारित 20 ओवर में सात विकेट पर 177 रन का चुनौतीपूर्ण स्कोर बनाया और फिर दिल्ली की टीम को 15-4 ओवर में 84 रन पर ढेर कर दिया. चेन्नई की रनों के लिहाज से यह टूर्नामेंट के इतिहास में सबसे बड़ी जीत है. सुपर किंग्स के लिए 56 रनों की शानदार पारी खेलने वाले सुरेश रैना को मैन ऑफ़ द मैच चुना गया. रैना ने इस मैच में बल्लेबाज़ी के साथ-साथ क्षेत्ररक्षण में भी अपना कमाल दिखाते हुए तीन कैच भी लपके. रैना आईपीएल में अब तक सर्वाधिक 55 कैच ले चुके हैं. टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी महेंद्र सिंह धोनी की टीम ने ब्रेंडन मैक्लम 9 को जल्दी गंवाया लेकिन ड्वेन स्मिथ 29 और रैना के दूसरे विकेट के लिए 54 रन जोड़कर टीम को शुरुआती संकट से उबार लिया. स्मिथ 28 गेंदों में तीन चौकों के सहारे 29 रन बनाकर 11वें ओवर की आख़िरी गेंद पर शाबाज़ नदीम की गेंद पर बोल्ड हो गए. रैना ने फिर फ़ाफ़ डू प्लेसिस 24 के साथ तीसरे विकेट के लिए 22 गेंदों में 31 रन की तेज़तर्रार साझेदारी की. रैना 41 गेंदों में पांच चौकों और एक छक्के के साथ 56 रन बनाकर जिमी नीशम का शिकार बने. उन्हें लांग ऑन पर मुरली विजय ने कैच किया. धोनी ने 15 गेंदों में दो चौके और दो छक्के उड़ाते हुए 32 रन ठोके और वह जयदेव उनादकट की गेंद पर मयंक अग्रवाल के हाथों लपके गए. दिल्ली की तरफ से उनादकत ने 32 रन देकर तीन विकेट लिए जबकि मोहम्मद शमी नदीम और नीशम को एक-एक विकेट मिला. इसके जवाब में दिल्ली ने नियमित अंतराल में विकेट गंवाए. जिमी नीशम 22 और कार्यवाहक कप्तान दिनेश कार्तिक 21 ही कुछ हद तक संघर्ष कर सके जबकि जे पी ड्यूमिनी सिर्फ़ 15 रनों का योगदान किया. सुपर किंग्स के गेंदबाज़ों ने शुरुआत से ही बेहद कसी हुई गेंदबाजी की. ईश्वर पांडेय रवींद्र जडेजा और रविचंद्रन अश्विन ने भी दो-दो विकेट साझा किए. |
| DATE: 2014-04-22 |
| LABEL: sports |
| [513] TITLE: क्या सुप्रीम कोर्ट नई कमेटी को हरी झंडी देगा? |
| CONTENT: एक तरफ़ जहां इन दिनों संयुक्त अरब अमीरात में आईपीएल-7 के मुक़ाबले जारी हैं वहीं सुप्रीम कोर्ट में आईपीएल से जुड़े विवादों की सुनवाई भी चल रही है. मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में आईपीएल में स्पॉट फ़िक्सिंग और सट्टेबाज़ी से जुड़े मामले की सुनवाई होगी. वैसे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बीसीसीआई ने सुप्रीम कोर्ट के 16 अप्रैल के निर्देश के बाद बीते रविवार को वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाई और उसमें अहम निर्णय लेते हुए मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाने का फ़ैसला किया. इस कमेटी में भारत के पूर्व कप्तान और कमेंटेटर रवि शास्त्री कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस जे एन पटेल और सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर आरके राघवन को शामिल किया गया है. हांलाकि बीसीसीआई ने आधिकारिक तौर पर इस कमेटी का ऐलान नहीं किया है. बोर्ड का कहना है कि वह अपना प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट में पेश करेगा. सुप्रीम कोर्ट की ओर से इन नामों पर मुहर लगने के बाद ही यह कमेटी जांच का काम शुरू कर सकेगी. अब बड़ा सवाल यह है कि इस कमेटी में कितना दमख़म है और क्या यह जांच कर भी पाएगी अब बाक़ी लोगों की तो बात छोड़िए ख़ुद बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष शशांक मनोहर ने शास्त्री के नाम पर आपत्ति दर्ज की है. अब यह बात अलग है कि उन्हे समर्थन नहीं मिला. अब इसी सवाल को लेकर जाने-माने क्रिकेट समीक्षक प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं कि इस प्रस्तावित कमेटी के दमख़म की बात तो बाद में करें पहले तो सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में एक पैनल बनाया जिसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इसकी पुलिस जांच होनी चाहिए. उन्होंने कहा इसका अर्थ यह था कि यह पैनल उन खिलाड़ियों की जांच नहीं कर सकता जिनका नाम सामने आया है और पुलिस ही इसकी जांच कर सकती है. अब इसके बाद बीसीसीआई एक और कमेटी बनाती है जिसमें रवि शास्त्री भी है जो ख़ुद उसके कर्मचारी हैं तो वह अपने ही अधिकारियों की क्या जांच करेंगे. मैगज़ीन ने कहा अब अगर इस बात को अलग भी कर दें तो यह कोई पुलिस जांच टीम तो नहीं है और ना ही इनके पास पुलिस जैसे अधिकार है. मुझे नहीं लगता कि सुप्रीम कोर्ट इस जाँच पैनल को मानेगा. ऐसे में बोर्ड को चाहिए था कि वह सीलबंद रिपोर्ट ख़ुद पुलिस को देता और जांच कराता. मैगज़ीन कहते हैं इसके अलावा ऐसा नहीं लगता कि बोर्ड के ख़िलाफ़ लड़ाई लड रहे क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ बिहार के आदित्य वर्मा भी इस समिति को मानेंगे. इसी मसले को लेकर आदित्य वर्मा का कहना है कि अदालत में सुनवाई चल रही है जहां उनकी स्पष्ट मांग रहेगी कि इस मामले की जांच के लिए जो भी कमीशन बनेगा उसके पास जांच के सीमित अधिकार रहेंगे. आदित्य वर्मा कहते हैं उनके पास एफ़आईआर दर्ज करने का अधिकार नहीं है तो जो काम पुलिस या सीबीआई कर सकती है वह यह पैनल नहीं कर सकता इसलिये सीलबंद लिफाफा पुलिस या सीबीआई को जांच के लिए दिया जाए. उन्होंने कहा हम तो मुद्गल कमेटी का नाम ही सामने लाएंगे जिसने ईमानदारी से अपनी रिपोर्ट दी जो इसलिए बीसीसीआई को पसंद नहीं है. रही बात बीसीसीआई की इस प्रस्तावित कमेटी की तो हम याचिकाकर्ता होने के नाते इसे सिरे से ख़ारिज करते है. अब देखिए क्या होता ह |
| DATE: 2014-04-22 |
| LABEL: sports |
| [514] TITLE: पंजाब की राजस्थान पर शानदार जीत |
| CONTENT: किंग्स इलेवन पंजाब ने राजस्थान रॉयल्स को रविवार को सात विकेट से हराकर आईपीएल-सात में अपनी दूसरी जीत दर्ज की. शारजाह क्रिकेट स्टेडियम में खेले गए इस मैच में पंजाब को जीत के लिए 192 रन का लक्ष्य मिला था जो उसने 18-4 ओवर में तीन विकेट पर 193 रन बनाकर हासिल कर लिया. पिछले मैच में चेन्नई सुपरकिंग्स के ख़िलाफ़ पंजाब की जीत के हीरो रहे ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ ग्लेन मैक्सवेल ने 45 गेंदों में आठ चौकों और छह छक्कों के सहारे 89 रन बनाए. दक्षिण अफ़्रीकी बल्लेबाज़ डेविड मिलर ने भी पिछले मैच की अपनी फॉर्म को बरक़रार रखते हुए 19 गेंदों में छह छक्कों के सहारे नाबाद 51 रन बनाए. मिलर ने 18वें ओवर में धवल कुलकर्णी की गेंदों पर चार छक्के मारकर मैच का रुख़ बदल दिया और पंजाब ने आठ गेंदें शेष रहते मैच जीत लिया. ओपनर चेतेश्वर पुजारा ने नाबाद 40 रन बनाए लेकिन वीरेन्द्र सहवाग एक बार फिर फ्लॉप रहे और केवल दो रन बनाकर चलते बने. इससे पहले राजस्थान की टीम ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए निर्धारित 20 ओवन में पांच विकेट पर 191 रन का मज़बूत स्कोर बनाया. युवा बल्लेबाज़ संजू सेम्सन ने 34 गेंदों में तीन चौकों और चार छक्कों की मदद से 52 रन और कप्तान शेन वाटसन ने 29 गेंदों में पांच चौकों और तीन छक्कों की मदद से 50 रन बनाए. पंजाब की यह टूर्नामेंट में दूसरी जीत है जबकि आईपीएल के पहले संस्करण की विजेता राजस्थान की दो मैचों में यह पहली हार है. |
| DATE: 2014-04-21 |
| LABEL: sports |
| [515] TITLE: बीसीसीआई ने जाँच के लिए तीन नाम सुझाए |
| CONTENT: फ़टाफ़ट क्रिकेट टी-टवेंटी टूर्नामेंट इंडियन प्रीमियर लीग में स्पॉट फ़िक्सिंग के आरोपों की जाँच के लिए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बीसीसीआई ने तीन सदस्यीय जाँच दल की सिफ़ारिश की है. समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक बीसीसीआई ने पूर्व क्रिकेटर रवि शास्त्री कोलकाता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएन पटेल और सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन का नाम सुझाए हैं. सुप्रीम कोर्ट आईपीएल में स्पॉट फ़िक्सिंग के आरोपों की सुनवाई कर रहा है. पिछले साल के आईपीएल में भ्रष्टाचार के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का पालन करने के लिए रास्ता निकालने के लिए बीसीसीआई की वर्किंग कमेटी ने रविवार को मुंबई में बैठक की. बैठक के बाद तीन सदस्यीय जाँच दल की सिफ़ारिश की गई. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने एन श्रीनिवासन की उस याचिका को ख़ारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने फिर से बोर्ड अध्यक्ष पद संभालने की अनुमति माँगी थी. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि जब तक यह साबित न हो जाए कि श्रीनिवासन भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं हैं वे बोर्ड अध्यक्ष का पद नहीं संभाल सकते हैं. आईपीएल भ्रष्टाचार स्कैंडल में जस्टिस मुद्गल समिति ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जो रिपोर्ट पेश की है उसमें कुछ भारतीय क्रिकेटरों और बोर्ड अध्यक्ष समेत कुल तेरह लोगों के नाम हैं. सुप्रीम कोर्ट ने मुद्गल समिति की रिपोर्ट की जाँच की ज़िम्मेदारी बीसीसीआई को सौंप दी थी. 16 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बीसीसीआई को एन श्रीनिवासन और बारह अन्य लोगों पर लगे आरोपों की जाँच करनी चाहिए. अदालत ने यह भी कहा था कि वह जस्टिस मुकुल मुद्गल की रिपोर्ट पर आँखें नहीं मूंद सकती है. |
| DATE: 2014-04-20 |
| LABEL: sports |
| [516] TITLE: दिल्ली ने कोलकाता को दी मात |
| CONTENT: इंडियन प्रीमियर लीग के शनिवार को हुए छठे मैच में दिल्ली डेयरडेविल्स ने कोलकाता नाइटराइडर्स को चार विकेट से हरा दिया. नाइट राइडर्स ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए डेयरडेविल्स को 167 रनों का लक्ष्य दिया था जिसे दिल्ली की टीम ने तीन गेंदें शेष रहते ही हासिल कर लिया. दिल्ली की ओर से जेपी ड्यूमिनी ने शानदार 52 रन बनाए और अंत तक आउट नहीं हुए. ड्यूमिनी ने सिर्फ 35 गेंदों का सामना किया और तीन चौकों के अलावा तीन शानदार छक्के भी लगाए. इससे पहले मुरली कार्तिक ने भी 56 रनों का महत्वपूर्ण योगदान दिया जिसमें उन्होंने पांच चौके और दो शानदार छक्के लगाए. इससे पहले कोलकाता नाइटराइडर्स की टीम ने पांच विकेट खोकर 166 रन बनाए थे. कोलकाता नाइटराइडर्स की ओर से रॉबिन उथप्पा ने सबसे ज्यादा 55 रन बनाए. ये स्कोर उन्होंने 41 गेंदों पर 6 चौकों और एक छक्के की मदद से हासिल किया. जबकि एमके पांडेय ने 45 रनों का योगदान दिया. पांडेय ने अपनी पारी में पांच चौके लगाए. वहीं शनिवार को ही आईपीएल के एक अन्य मैच में रॉयल चैलेंजर्स बंगलोर ने मुंबई इंडियंस को सात विकेट से हरा दिया. रॉयल चैलेंजर्स बंगलोर ने पहले शानदार गेंदबाजी फिर पार्थिव पटेल नाबाद 57 और अब्राहम डिविलियर्स नाबाद 45 के बीच हुई नाबाद 99 रनों की उम्दा साझेदारी की बदौलत मुंबई इंडियंस को 15 गेंद शेष रहते सात विकेट से हरा दिया. मुंबई से मिले 116 रनों के मामूली लक्ष्य का पीछा करने उतरी रॉयल चैलेंजर्स की शुरूआत खराब रही. लसिथ मलिंगा ने तीसरे ओवर की आखिरी गेंद पर जहां निक मैडिंसन को क्लीन बोल्ड कर पवेलियन की राह दिखाई वहीं अगला ही ओवर लेकर आए जहीर खान ने विराट कोहली और युवराज सिंह को खाता भी नहीं खोलने दिया. लेकिन इसके बाद पार्थिव और डिविलियर्स ने रॉयल चैलेंजर्स को कोई नुकसान नहीं होने दिया और टीम को जीत तक पहुंचाया. इससे पहले टॉस हारकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी मुंबई इंडियंस के बल्लेबाज रॉयल चैलेंजर्स के गेंदबाजों के आगे बेबस नजर आए. रॉयल चैलेंजर्स के गेंदबाजों मुंबई इंडियंस निर्धारित 20 ओवरों में नौ विकेट पर 115 रनों पर सीमित कर दिया. |
| DATE: 2014-04-20 |
| LABEL: sports |
| [517] TITLE: राजस्थान ने हैदराबाद को हराया |
| CONTENT: इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल के सातवें संस्करण के चौथे मैच में राजस्थान रॉयल्स ने सनराइज़र्स हैदराबाद को चार विकेट से हरा दिया. हैदराबाद ने राजस्थान के सामने जीत के लिए 134 रन का लक्ष्य रखा था जिसे राजस्थान ने आखिरी ओवर में छह विकेट खोकर हासिल कर लिया. राजस्थान रॉयल्स की ओर से सबसे ज़्यादा रन अजिंक्य रहाणे ने बनाए. रहाणे ने 53 गेंदों पर 59 रन बनाए और अमित मिश्रा की गेंद पर आउट हुए. रहाणे के अलावा राजस्थान की जीत में एसटीआर बिन्नी का बड़ा योगदान रहा जिन्होंने महज 32 गेंदों पर शानदार 48 रन बनाए और अंत तक आउट नहीं हुए. अपनी पारी में बिन्नी ने तीन चौके और एक छक्का लगाया. हालांकि 134 रन के लक्ष्य का पीछा करने उतरी राजस्थान रॉयल्स की शुरूआत अच्छी नहीं रही. डेल स्टेन ने पहले ही ओवर में अभिषेक नायर को महज चार के निजी स्कोर पर आउट कर दिया. लेकिन उसके बाद राजस्थान की टीम सँभल गई और आखिरकार उसने इस लक्ष्य को हासिल कर लिया. सनराइज़र्स हैदराबाद की ओर से अमित मिश्रा और डेल स्टेन ने दो-दो विकेट लिए. इससे पहले हैदराबाद की तरफ से बल्लेबाज़ी की शुरूआत शिखर धवन और एरॉन फिंच ने की. मगर पहले ही ओवर में एरॉन फिंच धवल कुलकर्णी के शिकार बने और 2 रन के निजी स्कोर पर पैवेलियन लौट गए. पहला विकेट जल्द खोने के बाद कप्तान धवन और वॉर्नर ने दूसरे विकेट के लिए 75 रनों की साझेदारी की. इसके बाद रजत भाटिया ने शिखर धवन और डेविड वॉर्नर को आउट कर सनराईजर्स हैदराबाद की मुश्किलें बढ़ा दीं. रजत भाटिया की धीमी गेंद को धवन पूरी तरह भांप नहीं पाए और छक्का मारने के प्रयास में डीप स्कवेयर लेग पर मुस्तैद केन रिचर्डसन को कैच थमा बैठे. हैदराबाद की ओर से कप्तान शिखर धवन ने सर्वाधिक 38 रन बनाए जबकि डेविड वार्नर ने 32 रनों का योगदान दिया. राजस्थान रॉयल्स की ओर से रजत भाटिया ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए चार ओवर में 22 रन देकर दो विकेट लिए. धवल कुलकर्णी ने चार ओवर में 23 देकर दो विकेट लिए जबकि केन रिचर्डसन के खाते में भी दो विकेट आए. |
| DATE: 2014-04-18 |
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| [518] TITLE: मैक्सवेल की पारी से जीता पंजाब |
| CONTENT: आईपीएल के सातवें संस्करण के तहत शुक्रवार को खेले गए मैच में किंग्स इलेवन पंजाब ने ग्लेन मैक्सवेल की शानदारी बल्लेबाज़ी के चलते चेन्नई सुपर किंग्स को छह विकेट से हरा दिया. इससे पहले डीआर स्मिथ और ब्रेंडन मैक्लम की बल्लेबाज़ी के बदौलत चेन्नई सुपर किंग्स ने किंग्स इलेवन पंजाब के सामने 206 रनों का लक्ष्य रखा था. जवाब में मैक्सवेल ने शानदार बल्लेबाज़ी करते हुए महज़ 43 गेंदों पर 95 रन बनाए. इस दौरान उन्होंने 15 चौके और दो छक्के जड़े. मैक्सवेल जब शतक से पांच रन दूर थे तो स्मिथ ने उन्हें बोल्ड कर दिया. मैक्सवेल का साथ मिलर ने बख़ूबी दिया और उन्होंने 37 गेंदों में 54 रन बनाए. किंग्स इलेवन पंजाब ने 19वें ओवर में ही जीत दर्ज कर ली. चेन्नई सुपर किंग्स की तरफ़ से सलामी बल्लेबाज़ मैक्लम और स्मिथ ने चेन्नई सुपर किंग्स को ज़ोरदार शुरुआत दी. इस दौरान स्मिथ ने 43 गेंदों पर नाबाद 66 रन बनाए. उनका विकेट बाला जी ने लिया. मैक्लम 45 गेंदों पर 67 रन बनाकर अक्षर पटेल का शिकार बने. उन्होंने अपनी पारे में चार चौके और पांच छक्के जड़े. दोनों खिलाड़ियों के बीच क़रीब दस के औसत से 123 रनों की साझेदारी हुई. मैक्लम के आउट होने पर मैदान पर आए सुरेश रैना ने 19 गेंदों पर 24 रन बनाए. चौथे नंबर पर बल्लेबाज़ी करने आए धोनी ने शानदार खेल का प्रदर्शन करते हुए 11 गेंदों पर शानदार 26 रन बनाए. इससे पहले चेन्नई सुपर किंग्स ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करने का फ़ैसला किया. किंग्स इलेवन पंजाब की तरफ़ से बालाजी को दो जबकि पटेल और अवाना को एक-एक विकेट मिले. इसके अलावा मिशेल जॉनसन और मैक्सवेल की जमकर धुनाई हुई. आईपीएल के मौजूदा संस्करण में ये दोनों टीमों का पहला मैच है. चेन्नई सुपर किंग्स दो बार आईपीएल की चैंपियन और पिछली बार उपविजेता रह चुकी है. एडम गिलक्रिस्ट के पिछले सत्र में सन्यास ले लेने के कारण इस बार पंजाब की कमान जॉर्ज बैली को सौंपी गई है. |
| DATE: 2014-04-18 |
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| [519] TITLE: नडाल क्वॉर्टर फ़ाइनल में हारे |
| CONTENT: स्पेन के राफ़ेल नडाल मोंटे कार्लो मास्टर्स के क्वॉर्टरफ़ाइनल में डेविड फ़ेरर के हाथों हार गए है. डेविड फ़ेरर ने क्वॉर्टरफ़ाइनल में राफ़ेल को 7-61 6-4 से हराया. इससे पहले दुनिया के नंबर एक टेनिस खिलाड़ी स्पेन के राफ़ेल नडाल ने क्ले कोर्ट पर अपनी 300वीं जीत दर्ज की थी. क्ले कोर्ट मशीन के नाम से मशहूर नडाल ने गुरुवार को मोंटे कार्लो मास्टर्स में इटली के आंद्रेस सेप्पी को 6-1 6-3 से हराकर यह उपलब्धि हासिल की थी. नडाल क्ले कोर्ट पर 300 मैच जीतने वाले दुनिया के 11वें खिलाड़ी हैं. नडाल से पहले इस मुकाम पर पहुँचने वाले खिलाड़ी उनके हमवतन कार्लोस मोया थे जिन्होंने 2007 में टेनिस को अलविदा कह दिया था. नडाल आठ बार मोंटे कार्लो मास्टर्स का ख़िताब जीत चुके है. डेविड फ़ेरर ने इससे पहले बुल्गारिया के ग्रिगोर दिमित्रोव को 6-4 6-2 से हराया था. इस सत्र में नडाल दो ख़िताब जीत चुके हैं. गत चैंपियन सर्बिया के नोवाक जोकोविच और रिकॉर्ड 17 ग्रैंड स्लेम ख़िताबों के मालिक स्विटज़रलैंड के रोजर फ़ेडरर भी अंतिम आठ में पहुँच गए हैं. जोकोविच ने पेब्लो कोरेनो को 6-0 6-1 से और फ़ेडरर ने चेक गणराज्य के लुकास रोसोल को 6-4 6-1 से हराया. क्वॉर्टरफ़ाइनल में जोकोविच का स्पेन के गुइलर्मो गार्सिया लोपेज़ से और फ़ेडरर का फ्रांस के जो विल्फ्रेड सोंगा से मुक़ाबला होगा. |
| DATE: 2014-04-18 |
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| [520] TITLE: नडाल ने क्ले कोर्ट पर दर्ज की 300वीं जीत |
| CONTENT: दुनिया के नंबर एक टेनिस खिलाड़ी स्पेन के राफ़ेल नडाल ने क्ले कोर्ट पर अपनी 300वीं जीत दर्ज की है. क्ले कोर्ट मशीन के नाम से मशहूर नडाल ने गुरुवार को मोंटे कार्लो मास्टर्स में इटली के आंद्रेस सेप्पी को 6-1 6-3 से हराकर यह उपलब्धि हासिल की है. नडाल क्ले कोर्ट पर 300 मैच जीतने वाले दुनिया के 11वें खिलाड़ी हैं. नडाल से पहले इस मुकाम पर पहुँचने वाले खिलाड़ी उनके हमवतन कार्लोस मोया थे जिन्होंने 2007 में टेनिस को अलविदा कह दिया था. आठ बार मोंटे कार्लो मास्टर्स का ख़िताब जीत चुके नडाल का क्वॉर्टरफ़ाइनल में हमवतन डेविड फ़ेरर से मुक़ाबला होगा जिन्होंने बुल्गारिया के ग्रिगोर दिमित्रोव को 6-4 6-2 से हराया. इस सत्र में दो ख़िताब जीत चुके नडाल के अलावा गत चैंपियन सर्बिया के नोवाक जोकोविच और रिकॉर्ड 17 ग्रैंड स्लेम ख़िताबों के मालिक स्विटज़रलैंड के रोजर फ़ेडरर भी अंतिम आठ में पहुँच गए हैं. जोकोविच ने पेब्लो कोरेनो को 6-0 6-1 से और फ़ेडरर ने चेक गणराज्य के लुकास रोसोल को 6-4 6-1 से हराया. क्वॉर्टरफ़ाइनल में जोकोविच का स्पेन के गुइलर्मो गार्सिया लोपेज़ से और फ़ेडरर का फ्रांस के जो विल्फ्रेड सोंगा से मुक़ाबला होगा. |
| DATE: 2014-04-18 |
| LABEL: sports |
| [521] TITLE: बंगलोर ने दिल्ली को हराया |
| CONTENT: युवराज सिंह और कप्तान विराट कोहली की धुआंधार बल्लेबाजी के दम पर आईपीएल के सातवें संस्करण के दूसरे दिन आज रॉयल चैलेंजर्स बंगलोर ने दिल्ली डेयरडेविल्स को आठ विकेट से हरा दिया. दिल्ली की तरफ से दिए गए 146 रन के स्कोर का पीछा करने उतरी बंगलोर की टीम ने महज दो विकेट के नुकसान पर तीन ओवर पहले ही लक्ष्य हासिल कर लिया. युवराज सिंह ने केवल 29 गेंदों पर नाबाद 59 रन बनाए जिसमें उनके तीन चौके पांच शानदार छक्के शामिल थे. वहीं विराट कोहली ने 38 गेंदों पर नाबाद 49 रन बनाए. कोहली ने दो चौके और तीन छक्के लगाए. राहुल शर्मा ने 33 रन देकर एक और मोहम्मद शमी ने 30 रन देकर एक विकेट हासिल किया. इससे पहले दिल्ली डेयरडेविल्स ने टॉस हारकर पहले बल्लेबाजी करते हुए निर्धारित 20 ओवर में चार विकेट खोकर 145 रन बनाए. एक समय दिल्ली ने अपने चार विकेट केवल 35 रन पर खो दिए थे. उसके बाद जेपी ड्यूमिनी ने नाबाद 67 और रॉस टेलर ने नाबाद 43 रन बनाकर दिल्ली को सम्मानजनक स्कोर तक पहुंचाया. इन दोनों ने पांचवें विकेट के लिए नाबाद 110 रनों की साझेदारी की लेकिन विराट कोहली ने युवराज सिंह के साथ मिलकर बंगलोर के लिए 84 रन की विजयी साझेदारी करके इनकी मेहनत पर पानी फेर दिया. शुक्रवार को आईपीएल के दो मुकाबले खेले जाएंगे. पहले मैच में चेन्नई सुपरकिंग्स का सामना किंग्स इलेवन पंजाब से होगा जबकि दूसरे मुकाबले में सनराइजर्स हैदराबाद और राजस्थान रॉयल्स आमने-सामने होंगे. |
| DATE: 2014-04-18 |
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| [522] TITLE: कोलकाता ने मुंबई को हराया |
| CONTENT: इंडियन प्रीमियर लीग के सातवें सीज़न के पहले मैच में कोलकाता नाइटराइडर्स ने मुंबई इंडियंस को 41 रनों से हरा दिया. आइपीएल 7 की शुरुआत आज अबु धाबी स्टेडियम में कोलकाता और मुंबई के बीच मैच से हुई जिसमें कोलकाता ने मुंबई को 164 रनों की चुनौती दी थी. लेकिन मुंबई की टीम सात विकेट के नुकसान पर महज़ 122 रन ही बना सकी. इससे पहले कोलकाता नाइट राइडर्स ने पांच विकेट खोकर 163 रन बनाए थे. इससे पहले विवादों के साए के बीच आईपीएल के सातवें सत्र का आग़ाज़ अबु धाबी स्टेडियम में बुधवार को कोलकाता नाइट राइडर्स और मुंबई इंडियंस के बीच खेले गए पहले मैच से हुआ. कोलकाता ने टॉस जीत कर पहले बल्लेबाज़ी करने का फ़ैसला लिया. नाइट राइडर्स ने 20 ओवरों में पांच विकेट खोकर 163 रन बनाए. इस दौरान दक्षिण अफ़्रीक़ी बल्लेबाज़ जैक कॉलिस ने शानदार बल्लेबाज़ी करते हुए 46 गेंदों पर 72 रन बनाए. भारतीय बल्लेबाज़ मनीष पाण्डेय ने उनका साथ देते हुए 53 गेंदों पर 64 रन बनाए. इस मैच में सबकी निगाहें गौतम गंभीर पर टिकीं थीं लेकिन उन्होंने दर्शकों को निराश किया और बिना कोई खाता खोले मलिंगा का शिकार बने. मुंबई इंडियंस की तरफ़ से मलिंगा ने शानदार गेंदबाज़ी करते हुए चार विकेट लिए. उन्होंने चार ओवर में 23 रन दिए. वहीं मुंबई इंडियंस की ओर से सिर्फ अंबाती रायडू ही कुछ जमकर बल्लेबाज़ी कर सके और उन्होंने 48 रन बनाए. मुंबई के बाकी बल्लेबाज सुनील नरैन की घातक गेंदबाजी का सामना नहीं कर सके. नरैन ने चार ओवर में केवल बीस रन देकर चार विकेट झटके. गुरुवार को आइपीएल में दिल्ली डेयरडेविल्स का सामना रॉयल चैलेंजर्स बेंगलोर से होगा जहां दिल्ली के लिए खबर अच्छी नहीं है. दिल्ली के कप्तान केविन पीटरसन चोट के कारण नहीं खेल सकेंगे और टीम की कमान दिनेश कार्तिक सँभालेंगे. भारत में चुनावों के चलते आईपीएल के सातवें संस्करण के पहले चरण का आयोजन संयुक्त अरब अमीरात में किया जा रहा है. वहां 30 अप्रैल तक पहले चरण के मुक़ाबले होंगे और उसके बाद दो मई से आईपीएल भारत लौट आएगा. |
| DATE: 2014-04-16 |
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| [523] TITLE: विवादों के बीच आईपीएल का आग़ाज़ |
| CONTENT: मंगलवार को कुछ भारतीय अख़बारों में आबू धाबी के होटल की लॉबी में खड़े चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और उनकी पत्नी की मुस्कुराती हुई तस्वीर छपी. भारत के इस सबसे मंहगे खिलाड़ी की मुस्कुराहट देखने से लगता ही नहीं कि इंडियन प्रीमियर लीग अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है. यह भी रोचक है कि बुधवार को जब चकाचौंध से भरी तथाकथित कई हज़ार करोड़ वाले आईपीएल के सातवें सीज़न की शुरुआत होगी उससे घंटो पहले दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट आईपीएल में स्पॉट फ़िक्सिंग मामले की जांच पर कुछ अहम टिप्पणियां भी कर चुकी है. बुधवार को अदालत में हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा है कि जस्टिस मुदगल की अध्यक्षता वाली जांच समीति ने जो रिपोर्ट कोर्ट को सौंपी है उसमें 12 आईपीएल खिलाडियों समेत पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन का भी ज़िक्र है. यह बताना ज़रुरी है कि पिछले महीने इस अदालत ने लीग की दो टीमों चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रॉयल्स को बाहर का रास्ता तक दिखाने का मन बना लिया था. एक बार लगा कि आईपीएल डूबने वाला है. लेकिन उसने अपने अंतरिम आदेश में न केवल इन दोनों टीमों बल्कि पूरी आईपीएल को ही राहत दे दी. चेन्नई सुपरकिंग्स के मालिक और बोर्ड के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन पर टीम की रणनीति की जानकारी सट्टेबाज़ों को देने और आईपीएल के मैचों में सट्टा लगाने का आरोप है. मुबंई पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा भी दर्ज किया है. जबकि राजस्थान के मालिक राज कुंद्रा पर भी मैचों मैं पैसा लगाने का आरोप है. क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ बंगाल के सचिव आदित्य वर्मा ने बीबीसी से कहा मैंने सुनवाई में अदालत से इस पूरी आईपीएल की जांच सीबीआई या एनआईए से करवाने की मांग करी है. आईपीएल के घोटालों के पर्दा उठना ही चाहिए. वर्मा ही भारतीय क्रिकेट बोर्ड पर आईपीएल में हुई मैच फ़िक्सिंग के आरोप लगाते हुए कोर्ट में गए हैं. भारत में इस समय आम चुनाव हो रहे हैं. इसके मद्देनज़र आईपीएल का एक हिस्सा संयुक्त अरब अमीरात में खेला जाना है जिसमें शारजाह शामिल है. 15 मई के बाद आईपीएल भारत में लौटेगा. वैसे भारतीय क्रिकेट बोर्ड और टीमों को इसका नुक़सान उठाना पड़ेगा लेकिन वे राहत शायद इस बात से है कि मीडिया फ़िलहाल उनका पीछा छोड़ देगा. हालांकि भारतीय खेल मंत्रालय ने बोर्ड को पत्र लिख कर आईपीएल का यूएई ले जाने के कारण पूछे हैं. क्रिकेट समीक्षकों के अनुसार 80 के दशक में यूएई ख़ासकर शारजाह मैच फिक्सरों का गढ़ सा माना जाता था. बेशक इन दिनों कूल कप्तान धोनी हर फोटो में मुस्कुराते नज़र आ रहे हैं लेकिन आईपीएल में लगे दाग से पार पाना उनके लिए भी मुश्किल भरा साबित हो रहा है. उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के जसटिस मुदगल आयोग के सामने झूठ बोलने और मयप्पन को बचाने का कथित आरोप लगा है. टीम की हार या फिर आईपीएल में उनकी टीम के फिर किसी विवाद में फंसने की स्थिति में धोनी खुद को शायद ही जवाबदेयी से बचा पाएं. ऐसे में यह सत्र उनके लिए काफी दबाव भरा हो सकता है इस सब के बीच आईपीएल की टीमों ने आबू धावी और शारजाह पहुंचाना शुरु कर दिया है. इस सत्र की शुरुआत मुंबई इंडियंस और कोलकाता नाइट राइडर्स के बीच बेहद गर्म आबू धाबी में होना है. यकीनी तौर पर मुंबई इंडियंस की ओर से रोहित शर्मा बड़ा नाम होंगे लेकिन सबकी निगाहें न्यूज़ीलैंड के 23 वर्षिय आतिशी बल्लेबाज़ कोरे एंडरसन पर रहेंगी. एंडरसन इसी साल वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ 36 गेंद पर शतक बनाने का विश्व रिकॉर्ड बनाने के कारण चर्चा में आए थे. कोलकाता के कप्तान गौतम गंभीर के लिए यह सत्र ख़ुद को साबित करने का है लेकिन इस टीम में सबसे बड़ा आकर्षण रिटायरमेंट ले चुके ज़ाक कालिस होंगे. जाहिर है कि पहला मैच काफ़ी रोचक होने वाला है. हालांकि पूरे टूर्नामेंट की बात करें तो आईसीसी टी-20 कप में धीमा खेलने के कारण अपने चाहने वालों की आलोचनाओं का शिकार बने युवराज सिंह के खेल को काफी क़रीब के आंका जाना है. रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर के मालिक विजय माल्या ने उन्हें इस बार की बोली में 14 करोड में ख़रीदा है. वह भी ऐसे समय में जब एयरलाइंस कंपनी चलाने वाले माल्या के अनुसार उनके पास अपने पाटलटों व अन्य स्टाफ़ का वेतन देने के लिए पैसा भी नहीं है. यह सीज़न आईपीएल के कुछ युवा खिलाड़ियों के लिए खुद को साबित करने का एक बड़ा मंच रहेगा. इनमें चेन्नई सुपरकिंग्स के बाबा अपाराजित और रॉयल चैलेंजर्स के विजय जोल भी शामिल हैं. इन दोनों के अंडर-19 और अपने राज्य की टीमों के लिए बेहतरीन प्रदर्शन की बदौलत आईपीएल टीमों को अपनी और खींचा है. इसके अलावा सन राइजर्स हैदराबाद के रिकी भूई भी हैं जिनकी उम्र सिर्फ़ 17 साल है. यक़ीनी तौर पर आईपीएल में हुई स्पॉट फ़िक्सिंग और उजागर हुए कई विवादों के कारण इसकी छवि को काफी नुक़सान हुआ है लेकिन लगता नहीं कि इसका असर संयुक्त अरब अमीरात के क्रिकेट प्रेमियों पर पड़ा है. आईपीएल ने दावा किया है कि पहले हफ्ते की सारी टिकटें बिक चुकी हैं. यह दावे कितने सहीं हैं यह मैच शुरु होने के बाद ही पता लग पाएगा. |
| DATE: 2014-04-16 |
| LABEL: sports |
| [524] TITLE: मुद्गल रिपोर्ट में श्रीनिवासन का भी ज़िक्र |
| CONTENT: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग मामले की जांच में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन और 12 खिलाड़ियों के खिलाफ़ आरोप लगे हैं. अदालत ने ये बात इस मामले पर बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान कही. अदालत ने कहा है कि आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग की जांच कर रही मुदगल समिति में जिन 13 लोगों के ख़िलाफ़ जो आरोप लगाए गए हैं उनकी जांच ख़ुद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बीसीससीआई को करनी चाहिए. समाचार एजेंसी पीटीआई ने कहा है कि जिन पर आरोप लगाया गया है उनकी जांच बीसीसीआई को करनी ज़रूरी है ताकि संगठन अपनी स्वायत्ता बरक़रार रख सके. अदालत ने कहा है कि वो किसी की छवि ख़राब नहीं करना चाहते हैं लेकिन वो क्रिकेट के खेल की बदनामी को लेकर चिंतित है. आईपीएल की टीम चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक और बीसीसीआई प्रमुख श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मेयप्पन उन तमाम अधिकारियों खिलाड़ियों और सट्टेबाज़ों में शामिल हैं जिनके ख़िलाफ़ आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग के तहत धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोप हैं और जांच जारी है. पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस मुकुल मुद्गल की अध्यक्षता में आईपीएल 2013 के दौरान स्पॉट फ़िक्सिंग मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई गई थी. समिति ने रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी है. हाल में ही सुप्रीम कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान एन श्रीनिवासन को पद छोड़ने का आदेश दिया था. उनकी जगह भारतीय टीम के पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है. पिछले आईपीएल के दौरान स्पॉट फ़िक्सिंग का मामला उस समय सामने आया था जब राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों शांतकुमारन श्रीसंत अंकित चव्हाण और अजीत चंडीला को दिल्ली पुलिस ने गिरफ़्तार किया था. मुंबई पुलिस ने इसके बाद कुछ और लोगों को इस सिलसिले में गिरफ्तार किया. |
| DATE: 2014-04-16 |
| LABEL: sports |
| [525] TITLE: बुधवार से शुरू होगा आईपीएल का मुक़ाबला |
| CONTENT: इंडियन प्रीमियर लीग आईपीएल के सीज़न-7 की शुरुआत बुधवार से होने जा रही है. भारत में चुनावों के कारण आईपीएल का पहला चरण संयुक्त अरब अमीरात में आयोजित होगा. पहले चरण के मुक़ाबले अबुधाबी शारजाह और दुबई में खेले जाएंगे. सातवें आईपीएल का उद्घाटना मुक़ाबला बुधवार को अबु धाबी में गत चैंपियन मुंबई इंडियंस और कोलकाता नाइटराइडर्स के बीच खेला जाएगा. इस बार आईपीएल कई विवादों के बीच शुरू हो रहा है. यहां तक की चेन्नई सुपर किंग्स और राजस्थान रॉयल्स पर तो एक बार इस टुर्नामेंट में भाग लेने पर ही सवाल खड़े हो गए थे. इसकी जड़ में दोनो टीमों के मालिकों और खिलाड़ियों पर सट्टेबाज़ी और मैच से जुडी जानकारियां दूसरों को देने के गंभीर आरोप लगे थे. ख़ैर अभी भी ये मामले अदालत में हैं और फिलहाल सभी टीमों ने शानदार प्रदर्शन करने के लिए कमर कस ली है. आईपीएल में मुंबई इंडियंस और कोलकाता नाइटराइडर्स के अलावा बाकि टीमों में विराट कोहली की कप्तानी वाली रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर शिखर धवन की कप्तानी वाली सनराइजर्स हैदराबाद भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की चेन्नई सुपर किंग्स इंग्लैंड के पूर्व स्टार बल्लेबाज़ केविन पीटरसन के कप्तानी वाली दिल्ली डेयरडेविल्स ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी जॉर्ज बेली की कप्तानी वाली किंग्स इलेवन पंजाब और ऑस्ट्रेलियाई आलराउंडर शेन वाटसन की कप्तानी वाली टीम राजस्थान रायल्स है. मुंबई इंडियंस की कमान रोहित शर्मा और कोलकाता नाइटराइडर्स की कमान गौतम गंभीर के हाथों में है. आईपीएल का पिछला संस्करण मुंबई इंडियंस के नाम रहा था. आईपीएल में अभी तक केवल चेन्नई सुपर किंग्स अकेली ऐसी टीम है जिसके कप्तान नहीं बदले हैं. महेंद्र सिंह धोनी इस बार भी इस टीम की अगुवाई कर रहे हैं. बाक़ी सभी टीमों के कप्तान बदल चुके है. इसके अलावा बहुत से चेहरे ऐसे है जो इस बार आईपीएल में खेलते हुए नज़र नहीं आएंगे. इनमें भारत के पूर्व महान बल्लेबाज़ सचिन तेंदूलकर राहुल द्रविड़ श्रीलंका के विकेटकीपर बल्लेबाज़ कुमार संगकारा और महेला जयवर्धने ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान रिकी पोंटिग का नाम शामिल है. इस बार सबसे अधिक बदला हुआ चेहरा दिल्ली डेयरडेविल्स का है जिसकी कमान कभी वीरेंद्र सहवाग गौतम गंभीर और महेला जयवर्धने ने संभाली थी. अब इस टीम में दिनेश कार्तिक मुरली विजय सौरव तिवारी क्विंटन डी कॉक जेपी डूमिनी मोहम्मद शामी जैसे खिलाड़ी हैं तो कोच के रूप में दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कप्तान और साल 2011 में अपनी कोचिंग में भारत को विश्व कप क्रिकेट टुर्नामेंट जीता चुके गैरी कस्टर्न है. कप्तान के तौर पर केविन पीटरसन के लिए यह सीज़न एक परीक्षा की तरह है क्योंकि दिल्ली डेयरडेविल्स पिछले सीज़न में सबसे निचले पायदान पर रहा था. इस बार आईपीएल में जिन खिलाड़ियों पर सबसे अधिक नज़र रहेगी उनमें 14 करोड़ रुपये की भारी भरकम रक़म में बिकने वाले रॉयल चैलेंजर्स के युवराज सिंह और इससे कुछ ही कम क़ीमत पर बिकने वाले दिल्ली डेयरडेविल्स के दिनेश कार्तिक शामिल हैं. पहली बार दिल्ली का दामन छोड़कर पंजाब से जुड़ने वाले वीरेंद्र सहवाग सनराइजर्स हैदराबाद के इरफान पठान और कोलकाता नाइटराइडर्स के कप्तान गौतम गंभीर भी इस बार आईपीएल में पुरानी नाकामी का चोला उतारकर आईपीएल सीज़न-7 में चमकना चाहेंगे. उनमें अभी भी भारतीय टीम में वापसी का दमख़म है लेकिन यह उनके प्रदर्शन पर निर्भर करेगा. अब रही बात संयुक्त अरब अमीरात में टीमों को मिलने वाले समर्थन की तो ख़बर तो यह है कि शुरुआती मैचों के लगभग सभी टिकट बिक चुके है. 30 अप्रैल तक वहां पहले चरण के मुक़ाबले होंगे उसके बाद दो मई से आईपीएल भारत लौट आएगा. इस दौरान काफ़ी हद तक पता भी चल जाएगा कि कौन सी टीम कितने पानी में है. |
| DATE: 2014-04-15 |
| LABEL: sports |
| [526] TITLE: पहले ही मैच में सचिन का विकेट सबसे यादगार: मॉन्टी पनेसर |
| CONTENT: भारत के अलावा किसी और देश की तरफ़ से टेस्ट क्रिकेट खेलने वाले मॉन्टी पनेसर चंद सिख खिलाड़ियों में से एक हैं. इंग्लैंड के लिए 2006 में अपना पहला मैच खेलने वाले मॉन्टी पनेसर का करियर उतार चढ़ाव वाला रहा है. फ़िलहाल काउंटी क्रिकेट खेल रहे मॉन्टी सचिन तेंदुलकर के विकेट झटकने को अपने करियर का सबसे बेहतरीन पल मानते हैं. नागपुर में हुआ वो मॉन्टी के करियर का पहला टेस्ट मैच था और सामने थे उनके बचपन के क्रिकेटिंग होरी सचिन तेंदुलकर. एंड्रयू फ्लिटॉफ मुरलीधरन सचिन तेंदुलकर और शेन वॉर्न उनके पसंदीदा क्रिकेट खिलाड़ी हैं. मॉन्टी के पूर्वज 70 के दशक में भारत से इंग्लैंड आए थे. उनका पूरा नाम मदसूदन सिंह पनेसर हैं. ज़ाहिर है परिवार का नाता जहाँ भारत से है वहीं इंग्लैंड से भी है. तो क्रिकेट मैच में दोनों देशों में से किसे उनके परिवार का समर्थन मिलता है लंदन में हुई मुलाक़ात में जब मैंने मॉन्टी से ये सवाल पूछा तो शरारती मुस्कान के साथ उन्होंने बताया जब इंग्लैंड के साथ भारत का मैच होता है तो मेरे घर के लोग मेरा समर्थन करते रहते हैं क्योंकि मैं इंग्लैंड से हूँ. पर साथ ही साथ वे भारत का भी समर्थन करते हैं क्योंकि वे मूल रूप से भारत से आए हैं. इसलिए चाहे भारत जीते या इंग्लैंड- आख़िरकर जीत हमारे पूरे परिवार की ही होती है. मॉन्टी पनेसर ने जब इंग्लैंड के लिए खेलना शुरू किया था तो शुरुआती दौरे में काफ़ी वाहवाही मिली. लेकिन साल 2009 तक आते-आते उनका करियर ढलान पर था. अभी काउंटी क्रिकेट में वे डटे हुए हैं. उन्होंने 50 टेस्ट मैचों में 167 विकेट लिए हैं तो 26 वनडे में 24. ब्रिटेन में यूँ तो क्रिकेट में एशियाई मूल के कई खिलाड़ी रहे हैं लेकिन फिर भी उनकी संख्या कम ही मानी जाती है. इस पर मॉन्टी का कहना है ब्रिटेन में एशियाई मूल के लोगों के लिए काफ़ी अवसर हैं. मुझे देखिए मैं अभी एमबीए भी कर रहा हूँ खेलता भी हूँ. मौके तो हैं लेकिन आपको मौका पहचानकर उसका फ़ायदा उठाना आना चाहिए. मॉन्टी ने कहा हर काउंटी में कम से कम एक एशियाई मूल का खिलाड़ी है और ये अच्छा संकेत है. ब्रिटेन में क्रिकेट के बाहर भी आप दूसरे क्षेत्रों में देखें तो एशियाई लोग अच्छा कर रहे हैं. पर क्या एशियाई मूल के खिलाड़ियों के लिए ब्रितानी समाज में वातारण अनुकूल है इस पर मॉन्टी कहते हैं कि आपको डटे रहना पड़ता है. हो सकता है कि कभी-कभी आपको वो सब न मिले जो आप चाहते हैं. लेकिन अगर आप डटे रहें तो रास्ता ज़रूर बन जाता है. जब उनसे पूछा गया कि वे आगे क्या करना चाहते हैं तो मॉन्टी ने हम पर ही सवाल दाग़ते हुए पूछा मुझे सिंगर या एक्टर बन जाना चाहिए. आप क्या सोचती हैं बॉलीवुड फ़िल्में देखने का तो उन्हें ज़्यादा मौका नहीं मिलता लेकिन मॉन्टी ने बताया कि उन्हें गाना गाना और एक्टिंग पसंद है और जस्टिन टिंबरलेक उनके पसंदीदा गायक हैं. कुछ लोगों की गुज़ारिश के बाद मॉन्टी ने एक गाना गाकर भी सुनाया. क्या मालूम आने वाले दिनों में क्रिकेटर मॉन्टी किसी और ही अवतार में नज़र आएँ. |
| DATE: 2014-04-15 |
| LABEL: sports |
| [527] TITLE: फ़ुटबॉल से जुड़े सचिन और गांगुली |
| CONTENT: भारत में क्रिकेट की आईपीएल और बैडमिंटन की आईबीएल की तर्ज़ पर अब फ़ुटबॉल की भी इंडियन सुपर लीग शुरू होने जा रही है. वैसे तो इसके मुक़ाबले सितंबर में शुरू होंगे लेकिन रविवार को इस लीग के आयोजकों ने आठ फ्रेंचाइज़ी टीमों का एलान कर दिया. फ्रेंचाइज़ी मालिकों में कोई छोटे-मोटे नाम नहीं बल्कि खेलों को दुनिया के बडे नामों के अलावा बॉलीवुड के बडे सितारे और कॉरपोरेट दिग्गज भी शामिल है. मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने पीवीपी वेंचर्स के साथ मिलकर कोच्चि फ्रेंचाइजी ख़रीदी है. भारत के ही एक और क्रिकेट सितारे और पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने तो एक क़दम आगे बढ़कर स्पेनिश लीग की दिग्गज टीम एटलेटिको मेड्रिड और बिजनेसमैन हर्षवर्धन नेवतिया संजीव गोयनका और उत्सव पारेख के साथ मिलकर कोलकाता फ्रेंचाइज़ी अपने नाम की. फ़ुटबॉल की इस इंडियन सुपर लीग की फ्रेंचाइज़ी ख़रीदने वालो में फ़िल्मी सितारे भी पीछे नहीं रहे. बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान ने वाधवन ग्रुप के साथ मिलकर पुणे फ्रेंचाइज़ी ख़रीदी. युवा दिलों की धड़कन कहे जाने वाले रणबीर कपूर ने विमल पारेख के साथ मिलकर मुंबई फ्रेंचाइज़ी अपने नाम की. इसी तरह अभिनेता जॉन अब्राहम तो कई बार भारतीय फ़ुटबॉल के कार्यक्रमों में भारत के पूर्व कप्तान बाईचुंग भूटिया के साथ नज़र आ चुके है लेकिन अब वह गुवाहाटी फ्रेंचाइज़ी के मालिक हैं. उनके साथ आई-लीग की एक अहम टीम शिलांग लाजोंग भी साझीदार है. समीर मनचंदा के स्वामित्व वाले डेन केबल नेटवर्क ने दिल्ली फ्रेंचाइज़ी और सन ग्रुप ने बैंगलोर टीम को ख़रीदा. सन ग्रुप के पास आईपीएल की टीम हैदराबाद सनराइजर्स भी है. इसके अलावा वीडियोकॉन के वेणुगोपाल धूत और उनके साथियों ने मिलकर गोवा फ्रेंचाइज़ी ख़रीदी. इंडियन सुपर लीग का मुख्य आयोजक आईएमजी-रिलांयस है. यह टूर्नामेंट आने वाले समय में कितना कामयाब होगा इसकी रूपरेखा क्या होगी इन सवालों का जवाब जानने के लिए थोडा इंतज़ार करना होगा. जाने-माने फ़ुटबॉल विशेषज्ञ और खेल पत्रकार जयदीप बासु कहते है कि अभी तक तो सिर्फ़ टीम मालिकों के नाम सामने आए है लेकिन इनमें कई टीवी चैनल और जानी मानी हस्तियाँ भी शामिल है ऐसे में यह जब शुरू होगा तो कामयाब तो होगा ही. रही खिलाड़ियों की बात तो इसमें अधिकतर वे खिलाड़ी होंगे जिन्होने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉल को अलविदा कहा है. हर टीम में कुल 20-22 खिलाड़ी हो सकते है जिनमें 8-10 विदेशी तथा बाक़ी भारतीय फ़ुटबॉलर होंगे. इनमें कई युवा भारतीय फ़ुटबॉलर भी होंगे. सुनने में ऐसा भी आ रहा है कि हर टीम को एक मार्की फ़ुटबॉलर दिया जाएगा. यह मार्की खिलाड़ी वह होगा जिसने हाल ही में अंतराष्ट्रीय फ़ुटबॉल छोडी हो इनमें माइकल लोरेन थियरे हैनरी और लुई फिगो का नाम भी चर्चा में है. फिलहाल तो बस यही कहा जा सकता है कि जब तक खिलाड़ियों की नीलामी नहीं हो जाती तब तक थोड़ा इंतज़ार करना ही ठीक है. |
| DATE: 2014-04-14 |
| LABEL: sports |
| [528] TITLE: वाटसन ने जीता दूसरा मास्टर्स ख़िताब |
| CONTENT: अमरीका के बब्बा वाटसन ने चौथे और अंतिम राउंड में रविवार को तीन अंडर 69 का कार्ड खेलकर तीन साल में दूसरी बार अगस्ता मास्टर्स गोल्फ टूर्नामेंट का ख़िताब जीत लिया. बांए हाथ से खेलने वाले 35 साल के वाटसन को हमवतन युवा गोल्फर जॉर्डन स्पीथ और स्वीडन के जोनास ब्लिक्स्ट से कड़ी चुनौती मिली लेकिन उन्होंने तीन स्ट्रोक की बढ़त के साथ ख़िताब पर क़ब्ज़ा कर लिया. वाटसन का कुल स्कोर आठ अंडर 280 रहा. जोनास और पहली बार इस टूर्नामेंट में खेल रहे स्पिथ तीन स्ट्रोक पीछे संयुक्त दूसरे स्थान पर रहे. टाइगर वुड्स को पछाड़कर सबसे कम उम्र में मास्टर्स ख़िताब जीतने का मंसूबा पाले 20 साल के स्पिथ का शॉट आमीन कॉर्नर में पानी में चला गया और वह 72 का कार्ड खेलकर ख़िताब की होड़ में पिछड़ गए. दुनिया के नंबर एक गोल्फर अमरीका के टाइगर वुड्स घुटने की चोट के कारण इस टूर्नामेंट में नहीं खेले. उनकी ग़ैर मौजूदगी में उत्तरी आयरलैंड के रॉरी मैकलरॉय को जीत का प्रबल दावेदार माना जा रहा था लेकिन दूसरे राउंड में पांच ओवर 77 का निराशाजनक कार्ड खेलने से उनकी संभावनाओं को क्षीण हो गई थी. मैकलरॉय ने अंतिम राउंड में तीन अंडर 69 का कार्ड खेला और लेवल पार स्कोर के साथ संयुक्त आठवें स्थान पर रहे. |
| DATE: 2014-04-14 |
| LABEL: sports |
| [529] TITLE: मोहम्मद आमिर की जल्द क्रिकेट में वापसी संभव: पीसीबी |
| CONTENT: पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष नजम सेठी ने उम्मीद जताई है कि स्पॉट फिक्सिंग के मामले में प्रतिबंधित पाकिस्तानी तेज़ गेंदबाज मोहम्मद आमिर जल्द क्रिकेट खेल सकेंगे. वो दुबई में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की बैठक में हिस्सा लेकर शुक्रवार को ही स्वदेश लौटे हैं. उन्होंने स्पॉट फिक्सिंग के जुर्म में सज़ा पाने वाले मोहम्मद आमिर के बारे में कहा कि उन्होंने ये मुद्दा आईसीसी के सामने उठाया है जिसने कानून में बदलाव के लिए एक नई समिति बनाई है. ये समिति जून में आमिर के मामले की समीक्षा करेगी. सेठी ने उम्मीद जताई की आमिर की सज़ा पांच साल से घटा कर चार साल कर दी जाएगी. 2010 में ब्रिटेन के दौरे पर गई पाकिस्तानी टीम के तीन क्रिकेटरों मोहम्मद आमिर मोहम्मद आसिफ़ और सलमान बट को स्पॉट फिक्सिंग के लिए पांच-पांच साल के लिए क्रिकेट से प्रतिबंधित कर दिया गया था. ये प्रतिबंध 2015 में खत्म होगा. अगर जून में मोहम्मद आमिर की सज़ा को घटा कर चार साल कर दिया गया तो वो तत्काल क्रिकेट में वापसी कर सकते हैं. नजम सेठी ने ये भी कहा कि अगले साल पाकिस्तान आईसीसी का अध्यक्ष नामजद करेगा. उन्होंने बताया कि आईसीसी की बैठक के दौरान आठ साल के लिए पाकिस्तानी टीम के घरेलू और विदेशी दौरे तय कर लिए हैं. इनसे पाकिस्तान को 30 अरब रुपये की आमदनी होगी. उन्होंने बताया कि भारत के साथ भी सीरिज़ के समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं और अब इस बारे में भारतीय बोर्ड की अंतिम मंजूरी का इंतजार है. |
| DATE: 2014-04-12 |
| LABEL: sports |
| [530] TITLE: पॉवेल पर 18 महीने का प्रतिबंध |
| CONTENT: 100 मीटर रेस के पूर्व विश्व रिकॉर्डधारी जमैका के असाफ़ा पॉवेल को ड्रग टेस्ट में नाकाम रहने के कारण 18 महीने के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है. 31 साल के पॉवेल के पिछले साल राष्ट्रीय चैंपियनशिप के दौरान लिए गए नमूने में प्रदर्शन बढ़ाने वाली प्रतिबंधित दवा ऑक्सिलोफ्राइन पाया गया है. उन पर पिछली तारीख़ से प्रतिबंध लगाया गया है जो 20 दिसंबर 2014 को ख़त्म होगा. जमैकाई एथलीट ने इस प्रतिबंध को अनुचित बताते हुए कहा कि उन्होंने जो वैध सप्लीमेंट एपिफ़ेनी डी1 लिया था वह दूषित था. वह इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय खेल पंचाट में अपील करने की योजना बना रहे हैं. इससे पहले मंगलवार को पॉवेल की साथी धावक शेरोन सिंपसन को भी जमैका की डोपिंग रोधी समिति ने प्रतिबंधित कर दिया था. ओलंपिक में चार गुणा 100 मीटर रिले की स्वर्ण विजेता और पॉवेल की ट्रेनिंग पार्टनर सिंपसन ने भी वही दवा ली थी जो पॉवेल ने ली. इसी तरह ओलंपिक चक्का फेंक एथलीट एलीसन रैंडाल को भी प्रतिबंधित डाईयूरेटिक का सेवन करने के कारण दो साल के लिए प्रतिबंधित किया गया है. पॉवेल और सिंपसन के नमूने 21 जून 2013 के लिए गए थे और प्रतिबंध के कारण वे इस साल जुलाई में ग्लास्गो में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा नहीं ले पाएंगे. तीन सदस्तीय डोपिंग रोधी समिति ने कहा कि पॉवेल बेहद लापरवाह थे. उसेन बोल्ट के उभरने से पहले पॉवेल जमैका में फर्राटा दौड़ में सबसे बड़ा नाम थे. लेकिन प्रतिबंध के कारण पिछले साल विश्व चैंपियनशिप में भी हिस्सा नहीं ले पाए थे. |
| DATE: 2014-04-11 |
| LABEL: sports |
| [531] TITLE: शिखर धवन बने विज़डन क्रिकेटर |
| CONTENT: भारतीय खिलाड़ी शिखर धवन साल 2014 के विज़डन के पाँच सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट खिलाड़ियों की सूची में शामिल किए गए हैं. शिखर को साल 2013 में किए गए उनके प्रदर्शन के आधार पर इस सूची में चुना गया है. विज़डन साल 1889 से हर साल सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटरों की सूची जारी करती है. 28 वर्षीय धवन आईसीसी चैंपियन ट्राफ़ी में सबसे अधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज़ थे. उन्होंने पाँच एकदिवसीय मैचों में 90-75 के औसत से कुल 363 रन बनाए थे. उन्हें इस सीरीज़ में उनके प्रदर्शन के लिए मैन ऑफ़ द सीरीज़ चुना गया था. शिखर ने इस सीरीज़ में दक्षिण अफ़्रीका और वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ शतक बनाए थे. शिखर के अलावा ऑस्ट्रेलिया के क्रिस रोज़र्स और रियान हैरिस इंग्लैंड के बल्लेबाज़ जो रूट और इंग्लैंड की महिला क्रिकेट टीम की कप्तान शैरलेट एडवर्ड्स भी विज़डन सूची में शामिल हैं. सलामी बल्लेबाज़ रोज़र तेज़ गेदंबाज़ हैरिस और रूट को साल 2013 के एशेज़ श्रृंखला में उनके शानदार प्रदर्शन के लिए विज़डन की सूची में चुना गया है. एडवर्ड को विश्व ट्वेंटी-20 में इंग्लैंड टीम के उम्दा प्रदर्शन के लिए सूची में स्थान दिया गया. साल 2013 में शिखर ने 26 एकदिवसीय मैचों में 50-52 के औसत से कुल 1162 रन बनाए थे. लेकिन बाएं हाथ के बल्लेबाज़ शिखर बांग्लादेश में हुए वर्ल्ड टी-20 मैचों में उम्मीद के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सके. विज़डन पत्रिका के संपादक साल के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट खिलाड़ियों का चुनाव पिछले साल के उनके उम्दा प्रदर्शन के आधार पर करते हैं. किसी भी खिलाड़ी को केवल एक बार ही विज़डन में साल का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना जा सकता है. साल 2013 में दक्षिण अफ़्रीका के तेज़ गेंदबाज़ डेल स्टीन को विज़डन का विश्व का सबसे अग्रणी खिलाड़ी चुना गया था. यह सम्मान पाने वाले वह दूसरे दक्षिण अफ़्रीकी खिलाड़ी थे. उनसे पहले जैक कैलिस को 2007 में विज़डन सूची में स्थान मिला था. |
| DATE: 2014-04-09 |
| LABEL: sports |
| [532] TITLE: टी-20 का फ़ाइनल भी गंवाया और नंबर वन की रैंकिंग भी |
| CONTENT: बीते रविवार को बांग्लादेश में खेले गए वर्ल्ड ट्वेंटी-20 क्रिकेट टूर्नामेंट के फ़ाइनल में श्रीलंका के हाथों छह विकेट से हारने के साथ ही भारत ने आईसीसीसी ट्वेंटी-20 में अपनी पहली रैंकिंग भी गंवा दी. श्रीलंका चैंपियन तो बना ही साथ ही क्रिकेट के सबसे छोटे प्रारूप की रैंकिंग में भी नम्बर एक बन गया जबकि भारत अब दूसरे स्थान पर ख़िसक गया है. वैसे इस टूर्नामेंट के शुरू होने से पहले श्रीलंका ही नम्बर एक रैंकिंग पर था लेकिन विश्वकप के लीग चरण में लगातार चार जीत से भारत ने उसकी जगह ले ली थी. इसके साथ ही श्रीलंका ने साल 2011 में एकदिवसीय क्रिकेट के विश्व कप में भारत के हाथो मिली हार की कड़वी यादों को भी मिटा दिया. इससे पहले श्रीलंका ने साल 1996 में एकदिवसीय विश्व कप जीता था जबकि पिछले ट्वेंटी-20 विश्व कप में वह उपविजेता था. फ़ाइनल में हार के बावजूद भारत के विराट कोहली विश्वकप के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुने गए. इस टूर्नामेंट के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनने वाले वह पहले भारतीय क्रिकेटर हैं. उन्होने छह मैचों में चार अर्द्धशतकों की मदद से सर्वाधिक 319 रन बनाए. विराट कोहली बल्लेबाज़ो की ट्वेंटी-20 रैंकिंग मे दूसरे स्थान पर पहुंच गए है. अब भारतीय टीम जिस एकतरफा रूप से श्रीलंका से फ़ाइनल हारी उससे टीम पर कई सवाल एक बार फिर उठने शुरू हो गए हैं. पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह कहते है कि श्रीलंकाई टीम पूरी तरह से प्रशंसा की हक़दार है क्योंकि एक समय ऐसा लग रहा था कि भारतीय टीम शायद 160 या 170 रन बना लेगी लेकिन पहले तो उसने भारत को केवल 130 रन तक रोका और उसके बाद 13 गेंद शेष रहते मैच जीत भी लिया. उन्होंने कहा हार से इतना दुःख नहीं है क्योंकि जब दो टीमें खेलेंगी तो एक तो हारेगी ही लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि जब भारतीय टीम हारती है तो आत्मसमर्पण ही कर देती है. लड़ कर हारें तो परेशानी नहीं है लेकिन ऐसी हार तो दुखी करती है. जहां तक रैंकिंग की बात है तो उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. उन्होंने कहा टीम ने इस टूर्नामेंट में लगातार पांच मैच जीते वो भी एकतरफ़ा अंदाज में लेकिन हारे भी तो एकतरफ़ा जो ठीक नहीं है. इससे पहले दक्षिण अफ्रीका गए वहां एकतरफ़ा हारे फिर न्यूज़ीलैंड में भी यही हाल हुआ. उसके बाद एशिया कप के फाइनल में भी नहीं पहुंचे उसका अफ़सोस नहीं है क्योंकि वहां संघर्ष करते हुए तो हारे. वहीं फ़ाइनल मुक़ाबले में 21 गेंदो पर 11 रन बनाकर सभी क्रिकेट प्रेमियों कि आंखों की किरकिरी बने युवराज सिंह को लेकर मनिंदर सिंह का कहना है कि जब शानदार खेल रहे थे तब सभी तारीफ़ भी कर रहे थे लेकिन रविवार को वह बहुत ख़राब खेले जिसके लिए उनकी आलोचना तो होगी ही. मनिंदर सिंह कहते हैं ट्वेंटी-20 क्रिकेट का यह स्वभाव है कि कोई एक बल्लेबाज़ एक पारी से मैच जिता देता है या एक गेंदबाज़ एक ही ओवर में दो-तीन विकेट लेकर मैच का रुख़ बदल देता है. यहां तो एक बल्लेबाज़ ने मैच हरवा दिया तो कुछ तो लोग कहेंगे ही लेकिन इस आलोचना को सकारात्मक रूप से लिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा जहां तक कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की बात है तो उन्होंने तो उन्हें सही नम्बर पर बल्लेबाज़ी करने भेजा था क्योंकि इससे पहले युवराज सिंह ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ ताबड़तोड़ बल्लेबाज़ी की थी लेकिन जब टीम फील्डिंग कर रही थी तब धोनी ने ग़लतिया की. वह कुछ होने का इंतज़ार करते रहे और मैच हाथ से निकल गया. उन्होंने कहा उदाहरण के लिए जब अमित मिश्रा ने अपने पहले ओवर में केवल एक रन दिया तो उसके बाद उन्हें हटा दिया. उसके बाद जब अश्विन ने विकेट लेकर दिया तो उन्हें भी हटा दिया. ऐसे में तो पूरी तरह आक्रमण करना चाहिए था क्योंकि लगातार विकेट लेकर ही तो भारत मैच जीत सकता था यहां उन्होने ज़रूर ग़लती की. मनिंदर सिंह रोहित शर्मा और शिखर धवन को लेकर कहते हैं कि शिखर धवन का इस तरह आउट आफ़ फ़ार्म होना चिंताजनक है. लगता है कि वह मेहनत नहीं कर रहे हैं. ऐसा भारत के कई युवा खिलाड़ियों के साथ हो चुका है. उन्होंने कहा तीन-चार शानदार पारियां खेलने के बाद वे हीरो बन जाते हैं लेकिन उन्हें समझना होगा कि रातोंरात शोहरत पाने के बाद दोगुनी मेहनत करनी चाहिए जैसे विराट कोहली करते हैं. शिखर धवन बड़े ही होनहार और दिलेर खिलाड़ी है उन्हें समझाने की ज़रूरत है लेकिन रोहित शर्मा ने तो जैसे विकेट गंवाने में पीएचडी कर ली है. मनिंदर सिंह ने कहा अच्छी शुरूआत करते हैं लेकिन विकेट थ्रो कर आते हैं. यही हाल सुरेश रैना का है जो चार-पांच पारी अच्छी खेलने के बाद गेंद को मिड विकेट पर उड़ाते हुए आउट हो जाते हैं. अगर इन सब चीज़ो पर ध्यान दिया जाए तो बेहतर होगा क्योंकि ये सब होनहार खिलाड़ी हैं. उन्होंने कहा विराट कोहली ख़ुद को आत्मप्रेरित करते हैं यही काम सचिन राहुल द्रविड़ और लक्ष्मण किया करते थे जो हर कोई नहीं कर सकता. यह काम कोच का है जहां लगता है कि डंकन फ्लैचर ने कुछ नहीं किया है. वह केवल रबड़ी खा रहे हैं और ख़ुश हैं कि इतना ख़राब करने के बाद भी टीम के कोच हैं. |
| DATE: 2014-04-08 |
| LABEL: sports |
| [533] TITLE: युवी की आलोचना कीजिए, सूली पर मत चढ़ाइए: सचिन |
| CONTENT: ट्वेंटी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप के फाइनल में निराशाजनक बल्लेबाजी के चलते आलोचकों के निशाने पर आए भारतीय बल्लेबाज युवराज सिंह को सचिन तेंदुलकर का साथ मिला है. सचिन ने युवराज सिंह का बचाव करते हुए उम्मीद जताई है कि वो जल्द ही आलोचकों को गलत साबित करेंगे और शानदार बल्लेबाजी करते हुए नज़र आएंगे. सचिन ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है बीती शाम युवी के लिए एक कठिन दिन था और उनकी आलोचना की जा सकती है. लेकिन सूली पर नहीं चढ़ाना चाहिए और न ही उन्हें टीम से बाहर करना चाहिए. सचिन ने युवराज के पिछले प्रदर्शनों की याद दिलाते हुए लिखा है हम सभी को युवी के उस साहसपूर्ण प्रदर्शन पर गर्व है जब हमने 2007 में टी20 वर्ल्ड कप जीता था. 2011 में वनडे विश्व कप में उनके असाधारण योगदान को हम हमेशा याद रखेंगे. सचिन ने कहा है कि युवराज मैदान के भीतर और बाहर कई चुनौतियों से उबरे हैं और वो अपने आलोचकों को गलत साबित करते हुए एक बार फिर अधिक मजबूत होकर उभरेंगे. रविवार को टी-20 वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में युवराज से काफी उम्मीदें थीं लेकिन उनकी बल्लेबाज़ी ने सबको निराश कर दिया. युवराज 21 गेंदों में मात्र 11 रन ही बना पाए थे. भारत के 130 रनों के जवाब में श्रीलंका ने चार विकेट खोकर मात्र 17-5 ओवर में जीत दर्ज़ कर ली. भारत और श्रीलंका के बीच बांग्लादेश में चल रहे टी-20 वर्ल्ड कप के फाइनल में युवराज को सुरेश रैना से पहले चौथे नंबर पर बल्लेबाजी के लिए भेजा गया था. इससे पहले भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी भी युवराज का बचाव कर चुके हैं. धोनी ने कहा कि युवराज ने अपनी तरफ से मैच जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन उनका दिन ही खराब था. टी-20 वर्ल्ड कप के फाइनल मैच के बाद महेंद्र सिंह धोनी से जब प्रेस कांफ्रेंस में पूछा गया कि क्या धीमी बल्लेबाजी कर रहे युवराज को उन्होंने मैच के बीच में कोई सलाह दी थी तो उन्होंने कहा नहीं वे पूरी कोशिश कर रहे थे. उन स्थितियों में कोई उससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकता था. उन्होंने कहा किसी भी मैच में जीत या हार पूरी टीम पर टिकी होती है. इसलिए किसी व्यक्ति-विशेष पर सवाल ना उठाए जाएं. |
| DATE: 2014-04-07 |
| LABEL: sports |
| [534] TITLE: धोनी ने किया युवराज का बचाव |
| CONTENT: श्रीलंका के खिलाफ टी-20 वर्ल्ड कप के फाइनल में हारने के बाद हताश और निराश भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने युवराज सिंह का बचाव किया लेकिन युवराज की धीमी बल्लेबाजी पर उठ रहे सवालों का जवाब देने में काफी असहज नज़र आए. धोनी का कहना था कि युवराज ने अपनी तरफ से मैच जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ी. रविवार को टी-20 वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में भारतीय बल्लेबाज़ी ने निराश किया. युवराज से सबको उम्मीदें थी लेकिन युवराज की बल्लेबाज़ी ने सबको निराश कर दिया. युवराज 21 गेंदों में मात्र 11 रन ही बना पाए. भारत के 130 रनों के जवाब में श्रीलंका ने चार विकेट खोकर मात्र 17-5 ओवर में जीत दर्ज़ कर ली. टी-20 वर्ल्ड कप के फाइनल मैच के बाद एक प्रेस कांफ्रेंस हुई जिसमें भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी से युवराज के प्रदर्शन पर कई सवाल किए गए. धोनी ने इन सवालों का जवाब देते हुए कहा युवराज के लिए वो दिन ही खराब था. उन्होंने अपनी ओर से पूरी कोशिश की लेकिन पहली गेंद से ही धुंआधार बल्लेबाजी करना आसान नहीं है. महेंद्र सिंह धोनी से जब प्रेस कांफ्रेंस में पूछा गया कि क्या धीमी बल्लेबाजी कर रहे युवराज को उन्होंने मैच के बीच में कोई सलाह दी थी तो उन्होंने कहा नहीं वे पूरी कोशिश कर रहे थे. उन स्थितियों में कोई उससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकता था. प्रेस कांफ्रेंस के दौरान जब धोनी से खासतौर पर भारतीय क्रिकेट टीम में भविष्य में युवराज के खेलने पर सवाल किया गया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए सहज भाव से जवाब दिया भारतीय क्रिकेट का मौसम अभी खत्म हो चुका है. अब इंडियन प्रीमियर लीग सहित सारे घरेलू टूर्नामेंट खेले जाने हैं. खिलाड़ियों को चुने जाने में अभी काफी देरी है इसलिए फिलहाल इस बारे में बात करना सही नहीं. गंभीर मुद्रा में बोलते हुए धोनी ने कहा एक खिलाड़ी कभी नहीं चाहता कि वह 40000 लोगों के सामने खराब प्रदर्शन करे. ना ही कोई खिलाड़ी कैच छोड़ना चाहता है. मगर कभी-कभी ऐसा हो जाता है. ऐसा किसी एथलीट के साथ भी हो सकता है. हो सकता है कि वो दिन युवराज के लिए खराब हो. महेंद्र सिंह धोनी ने कहा प्रशंसक तो खराब प्रदर्शन से निराश होते ही हैं लेकिन उनसे भी ज्यादा निराशा खिलाड़ियों को होती है. युवराज की ओर से खेली गई धीमी पारी ही मैच में जीत की उम्मीदों पर तो भारी नहीं पड़ी ये पूछे जाने पर धोनी इस अंतहीन होती बातचीत का सिलसिला खत्म करने के इच्छुक नजर आए. उन्होंने कहा किसी भी मैच में जीत या हार पूरी टीम पर टिकी होती है. इसलिए किसी व्यक्ति-विशेष पर सवाल ना उठाए जाएं. भारत और श्रीलंका के बीच बांग्लादेश में चल रहे टी-20 वर्ल्ड कप के फाइनल में युवराज को सुरेश रैना से पहले चौथे नंबर पर बल्लेबाजी के लिए भेजा गया. प्रेस कांफ्रेंस में धोनी से युवराज को चौथे नंबर पर भेजे जाने के निर्णय पर भी सवाल उठाया गया. महेंद्र सिंह धोनी ने बताया हमारे अधिकांश बल्लेबाज बिग शॉट खेलने में वक्त लेते हैं. केवल रैना ही अकेले ऐसे खिलाड़ी हैं जो शुरूआत से ही आक्रामक बल्लेबाजी कर सकते हैं. इसीलिए हमने बल्लेबाजी के लिए युवी को चौथे नंबर पर भेजा. धोनी ने श्रीलंका टीम के खिलाड़ियों के खेल खासकर डेथ ओवर में फेंके गए वाइड यॉर्कर की तारीफ की. श्रीलंकाई खिलाड़ियों की तारीफ करते हुए धोनी ने कहा हम अंतिम चार ओवर में ज्यादा से ज्यादा रन बनाना चाहते थे लेकिन श्रीलंकाई गेंदबाजों ने ऐसा होने नहीं दिया. उन्होंने वाइड यॉर्कर फेंके. मलिंगा ने बेहतरीन वाइड यॉर्कर फेंके. रणनीति के तहत शानदार तरीके से खेलते हुए श्रीलंका के खिलाड़ियों ने अपनी योजना को बखूबी अंजाम दिया. धोनी ने अपने खास गेंदबाज रविचंद्रन अश्विन से शुरूआत क्यों नहीं की इसके जवाब में धोनी ने अपना बचाव करते हुए कहा हमारी योजना ये थी कि हम अश्विन को लेफ्ट हैंडर्स बल्लेबाजों के खिलाफ मैच के मध्य में उतारेंगे. इसीलिए हमने उनसे शुरूआत नहीं की. लेकिन पेसर जब रन बनाने लगे तो मुझे उन्हें पहले बल्लेबाजी करने के लिए बुलाना पड़ा. अश्विन ने विकेट भी ली. |
| DATE: 2014-04-07 |
| LABEL: sports |
| [535] TITLE: श्रीलंका ने टी-20 वर्ल्ड कप पर कब्ज़ा किया |
| CONTENT: वर्ल्ड टी-20 फ़ाइनल में जीत के लिए 131 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए श्रीलंका की टीम ने टी-20 वर्ल्ड कप पर कब्ज़ा कर लिया है. श्रीलंका ने 13 गेंद शेष रहते ये जीत हासिल की. श्रीलंका की जीत में कुमार संगकारा ने सबसे ज़्यादा 52 रनों का योगदान दिया. उन्होंने 35 गेंदों पर 6 चौके और एक छक्का लगाते हुए मैच का रूख़ श्रीलंका की तरफ मोड़ दिया. कुमार संगकारा के अलावा महेला जयवर्धने ने भी 24 रनों का उपयोगी पारी खेली. दरअसल इस मैच में श्रीलंका के सामने जीत के लिए कोई बहुत बड़ा लक्ष्य था ही नहीं. तिलकरत्ने दिलशान ने 18 रनों की पारी खेली जिसमें उनके चार चौके शामिल थे. दूसरे विकेट के रूप में तिलकरत्ने दिलशान को विराट कोहली ने कैच आउट किया. श्रीलंका के सलामी बल्लेबाज कुसल परेरा सिर्फ़ 4 रन बनाकर पवेलियन लौट गए. इससे पहले श्रीलंका ने टॉस जीत कर पहले गेंदबाज़ी करने का फैसला किया. भारत ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए श्रीलंका के सामने जीत के लिए 131 रनों का लक्ष्य रखा. विराट कोहली ने शानदार बल्लेबाज़ी की और ताबड़तोड़ रन बटोरे. विराट कोहली अंतिम ओवर के अंतिम गेंद पर 77 रन बनाकर रन आउट हुए. कप्तान महेंद्र सिंह धोनी 4 रन बनाकर नाबाद रहे. कुल मिलाकर भारत का स्कोर रहा चार विकेट के नुकसान पर 130 रनपहले विकेट के रूप में अजिंक्य रहाणे 3 रन बनाकर पवेलियन लौट गए. उनकी जगह ली रन मशीन कहे जाने वाले भारतीय बल्लेबाज़विराट कोहली ने. भारत का दूसरा विकेट गिरा मैच के ग्यारहवें ओवर में . रोहित शर्मा 29 रन बनाकर कैच आउट हो गए. उनकी जगह युवराज बल्लेबाज़ी के लिए आए. 18 ओवर में भारत का तीसरा विकेट गिरा और युवराज की जगह ली भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने. भारत और श्रीलंका की टीम सेमीफ़ाइनल में क्रमशः दक्षिण अफ्रीका और वेस्टइंडीज़ को हराकर फ़ाइनल में पहुँची है. |
| DATE: 2014-04-06 |
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| [536] TITLE: वर्ल्ड टी-20 के चैंपियन का फ़ैसला आज |
| CONTENT: वर्ल्ड टी-20 विश्व कप के फाइनल मुकाबले में श्रीलंका ने टॉस जीतकर गेंदबाजी करने का फैसला किया है. भारत पहले बल्लेबाजी कर रहा है. मैच के दूसरे ओवर में ही भारत के बल्लेबाज अजिंक्य रहाणे 4 रन पर आउट हो गए हैं. इस तरह भारत का अब तक का स्कोर बोर्ड दो ओवर में पांच रन पर एक विकेट है. बल्लेबाज अजिंक्य रहाणे की जगह ली है रन मशीन कहे जाने वाले भारतीय बल्लेबाज विराट कोहली ने. बांग्लादेश में खेले जा रहे वर्ल्ड टी-20 क्रिकेट टूर्नामेंट का चैंपियन कौन बनेगा इस सवाल का जवाब रविवार को भारत और श्रीलंका फ़ाइनल के बाद मिल ही जाएगा. इससे पहले खेले गए सेमी फ़ाइनल मुक़ाबलों में भारत ने दक्षिण अफ़्रीका और श्रीलंका ने पिछले चैंपियन वेस्टइंडीज़ को मात दी. अब अगर दोनों टीमों की तुलना की जाए तो भारतीय क्रिकेट टीम ने इस टूर्नामेंट में बेहद दमदार खेल दिखाया है. सेमी फ़ाइनल में दक्षिण अफ्रीका को छह विकेट से हराने से पहले भारत ने सुपर टेन के मुक़ाबलों में पाकिस्तान मेज़बान बांग्लादेश वेस्टइंडीज़ और ऑस्ट्रेलिया को शिकस्त दी यानी भारत अभी तक इस टूर्नामेंट में अजेय रहा है. सेमी फ़ाइनल में दक्षिण अफ्रीका ने भारत के ख़िलाफ चार विकेट खोकर 172 रन बनाए. इससे पहले भारत के ख़िलाफ़ इस टूर्नामेंट में बांग्लादेश ने 138 रन बनाए थे जो भारत के ख़िलाफ सर्वाधिक स्कोर रहा था. इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि भारत के गेंदबाज़ों ने कितनी शानदार गेंदबाज़ी की है. भले ही अमित मिश्रा ने सेमीफ़ाइनल में दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ तीन ओवर में 36 रन दिए हों लेकिन दूसरे छोर से आर अश्विन ने 22 रन देकर तीन विकेट झटककर मैच को हाथ से बाहर निकलने से बचा लिया. वैसे भी ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट टूर्नामेंट में हर मैच में तो हर टीम को कम स्कोर पर रोका नहीं जा सकता. अगर सेमी फ़ाइनल में भारत के ख़िलाफ़ कुछ अधिक रन बने भी तो विराट कोहली ने अपने कंधों पर ज़िम्मेदारी लेते हुए केवल 44 गेंदों पर पांच चौके और दो छक्के लगाते हुए नाबाद 72 रन बनाकर पांच गेंद शेष रहते मैच भारत की झोली में डाल दिया. सलामी बल्लेबाज़ रोहित शर्मा ने भी इस टूर्नामेंट में कुछ अच्छी बल्लेबाज़ी की है तो सुरेश रैना ने दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ केवल 10 गेंदों पर तीन चौके और एक छक्का लगाते हुए तेज़तर्रार 21 रन बनाकर रन गति को रफ़्तार दी. विराट कोहली अभी तक इस विश्व कप में 128-04 के स्ट्राइक रेट के साथ 242 रन बना चुके हैं. उनकी बल्लेबाज़ी के महत्व को भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी भी महसूस करते हुए मानते हैं कि विराट तीन नंबर पर बल्लेबाज़ी करने वाले सबसे समझदार बल्लेबाज़ों में से एक हैं और बाक़ी बल्लेबाज़ों को भी उनसे सीखना चाहिए. अब अगर भारत फ़ाइनल भी अपने नाम करना चाहता है तो टीम के हर बल्लेबाज़ को अपना योगदान देना होगा चाहे वह युवराज सिंह सुरेश रैना ख़ुद कप्तान धोनी अजिंक्य रहाणे रोहित शर्मा और समय पड़ने पर आर अश्विन ही क्यों न हो. दूसरी तरफ़ श्रीलंका भी कोई कमज़ोर टीम नहीं है. ट्वेंटी-20 क्रिकेट टूर्नामेंट से पहले उसने बांग्लादेश में ही खेले गए एशिया कप क्रिकेट टूर्नामेंट को अपने नाम किया था. इसके अलावा श्रीलंका के दो बेहद महत्वपूर्ण और अनुभवी खिलाड़ी कुमार संगकारा और महेला जयवर्धने पहले ही कह चुके है कि यह उनका अंतिम ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप है इसलिए टीम के बाक़ी खिलाड़ी जी-जान लगाकर ख़िताब का तोहफ़ा इन्हें देना चाहेंगे. तिलकरत्ने दिलशान एंजेलो मैथ्यूज़ लाहिरू थिरिमन्ने और कुसल परेरा के होते उनकी बल्लेबाज़ी भी कम नही. गेंदबाज़ी में तो लसिथ मलिंगा अपने दिन सिर्फ यॉर्कर के दम पर क्या कुछ कर सकते हैं यह सभी जानते हैं. अब अगर भारत की टीम इस विश्व कप को जीत जाती है तो इसे दो बार जीतने वाली वह पहली टीम बन सकती है. इससे पहले भारत ने साल 2007 में वर्ल्ड ट्वेंटी-20 क्रिकेट टूर्नामेंट जीता था. इसके अलावा भारत धोनी की कप्तानी में 2011 में एकदिवसीय विश्व कप भी जीता था. अगर धोनी रविवार को ख़िताब जीतने में कामयाब होते हैं तो वह तीन विश्व कप जीतने वाले पहले कप्तान होंगे. वैसे धोनी श्रीलंका को लेकर कहते हैं कि वह एक बेहद शानदार और प्रतिभाशाली टीम है उनके पास इन विकेट का लाभ उठाने की क्षमता वाले स्पिनर है. इसके अलावा उनके पास अनुभवी और युवा खिलाड़ियों का मिश्रण है. इसके अलावा महेंद्र सिंह धोनी ने फ़ाइनल से पहले कहा इस टूर्नामेंट में टीम को सेमी फ़ाइनल में पहली बार 138 से अधिक रनों का लक्ष्य हासिल करने का अवसर मिला विकेट पहले से बेहतर था. कुल मिलाकर हमारे लिए अच्छी परीक्षा रही क्योंकि हमने बड़े स्कोर का पीछा भी किया और बड़ी टीमों को कम स्कोर पर भी आउट किया. फ़ाइनल में भी टीम इसी अंदाज़ के साथ खेलेगी. अब देखना है कि फ़ाइनल किसके नाम रहता है. |
| DATE: 2014-04-06 |
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| [537] TITLE: वर्ल्ड टी-20 के फ़ाइनल में पहुँचा भारत |
| CONTENT: बांग्लादेश में खेले जा रहे वर्ल्ड टी-20 के दूसरे सेमी फ़ाइनल में भारत ने दक्षिण अफ़्रीका को छह विकेट से हरा दिया है. रविवार को होने वाले फ़ाइनल में भारत का मुक़ाबला श्रीलंका से होगा. विराट कोहली के अर्धशतक की मदद से भारत ने पाँच गेंद रहते ही चार विकेट खोकर आवश्यक रन बना लिए. कोहली को मैन ऑफ़ द मैच भी चुना गया. दक्षिण अफ़्रीका ने पहले खेलते हुए बीस ओवरों में चार विकेट खोकर 172 रन बनाए थे. भारत की तरफ़ से सबसे अधिक नाबाद 72 रन विराट कोहली ने बनाए. सुरेश रैना ने मात्र दस गेंदों पर तेज़ गति से 21 रन बनाए. रोहित शर्मा ने 24 अजिंक्य रहाणे 32 रन युवराज सिंह ने 18 और सुरेश रैना ने 21 रन की पारी खेली. रविवार को होने वाले फ़ाइनल में भारत का मुक़ाबला श्रीलंका से होगा. दक्षिण अफ़्रीका की गेंदबाजी ख़ास प्रभावी नहीं रही. दक्षिण अफ़्रीका के लिए बिवरैन हेनड्रिक्स ने दो विकेट लिए. वेन पॉर्नेल और इमरान ताहिर ने एक-एक विकेट लिया. श्रीलंका ने पहले सेमी फ़ाइनल में वेस्टइंडीज को हराकर फ़ाइनल में जगह बनाई थी. दक्षिण अफ़्रीका की तरफ से सर्वाधिक 58 रन कप्तान डू प्लेसी ने बनाए. जेपी ड्यूमिनी ने 45 डीए मिलर ने 23 और हाशिम अमला ने 22 रन बनाए. भारत की तरफ़ से आर अश्विन ने तीन विकेट और भुवनेश्वर कुमार ने एक विकेट लिया. दक्षिण अफ़्रीका के बड़े स्कोर को देखते हुए मैच के रोमांचक होने की उम्मीद थी लेकिन भारतीय बल्लेबाजों ने दक्षिण अफ़्रीकी गेंदबाजों को हावी होने का कोई मौका नहीं दिया. |
| DATE: 2014-04-04 |
| LABEL: sports |
| [538] TITLE: लाइव स्कोर: भारत और दक्षिण अफ़्रीका |
| CONTENT: बांग्लादेश में चल रहे वर्ल्ड टी-20 के दूसरे फ़ाइनल में भारत का मुक़ाबला दक्षिण अफ़्रीका से हो रहा है. दक्षिण अफ़्रीका के कप्तान फफ़ डू प्लेसी ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करने का फ़ैसला किया है. श्रीलंका की टीम पहले ही फ़ाइनल में पहुँच चुकी है. बारिश के प्रभावित पहले सेमी फ़ाइनल में श्रीलंका ने वेस्टइंडीज़ को डकवर्थ लुइस नियम के तहत 27 रनों से मात दी. भारत की टीम ग्रुप मुक़ाबले में एक भी मैच नहीं हारी है. भारतीय टीम महेंद्र सिंह धोनी कप्तान रोहित शर्मा युवराज सिंह सुरेश रैना विराट कोहली अजिंक्य रहाणे आर अश्विन रवींद्र जडेजा अमित मिश्रा भुवनेश्वर कुमार और मोहित शर्मा. दक्षिण अफ़्रीका की टीम फफ़ डू प्लेसी कप्तान क्विंटन डी कॉक हाशिम अमला एबी डी विलियर्स जेपी ड्यूमिनी डेविड मिलर एल्बी मॉर्केल डेल स्टेन बिवरैन हेनड्रिक्स इमरान ताहिर और वेन पॉर्नेल. |
| DATE: 2014-04-04 |
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| [539] TITLE: दक्षिण अफ़्रीक़ा से पिछली हार का हिसाब चुका पाएगा भारत? |
| CONTENT: बांग्लादेश में खेले जा रहे वर्ल्ड ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट टूर्नामेंट में शुक्रवार को खेले जाने वाले दूसरे सेमीफ़ाइनल में भारत और दक्षिण अफ़्रीक़ा आमने-सामने होंगे. इससे पहले भारत ने इस विश्व कप में बेहद शानदार प्रदर्शन करते हुए अपने ग्रुप में शीर्ष पर रहते हुए सेमीफ़ाइनल में अपनी जगह बनाई थी. भारतीय टीम की ताक़त जहां स्पिन गेंदबाज़ी है तो वही दक्षिण अफ़्रीक़ा के तेज़ गेंदबाज़ डेल स्टेन ने अपना दमख़म दिखाया है. अमित मिश्रा और आर अश्विन ने न सिर्फ़ लगातार विकेट लिए हैं बल्कि उन्होंने विपक्षी बल्लेबाज़ों को बांध कर भी रखा है. वैसे दक्षिण अफ़्रीक़ा के पास भी इमरान ताहिर जैसा प्रतिभाशाली स्पिनर है. बल्लेबाज़ी में भारत के सलामी बल्लेबाज़ रोहित शर्मा और विराट कोहली ने लगातार रन बनाए है. इस विश्व कप में दरअसल भारतीय गेंदबाज़ों ने इतनी शानदार गेंदबाज़ी की है कि उन्होंने बल्लेबाज़ों का काम हर मैच में आसान किया. सेमीफ़ाइनल में पहुंचने से पहले भारत ने पाकिस्तान बांग्लादेश वेस्टइंडीज़ और ऑस्ट्रेलिया को हराया. दूसरी तरफ दक्षिण अफ़्रीक़ा ने न्यूज़ीलैंड नीदरलैंड और इंग्लैंड को मात देकर सेमीफ़ाइनल तक का सफ़र तय किया. भारत ने सुपर टेन के अपने आख़िरी मुक़ाबले में ऑस्ट्रेलिया को 73 रन से करारी मात दी थी. उस मैच में ऑस्ट्रेलिया के सामने जीत के लिए 160 रनों का लक्ष्य था जबकि वह केवल 16-2 ओवर में महज़ 86 रनों पर सिमट गई. आर अश्विन ने 3-2 ओवर में 11 रन देकर चार और अमित मिश्रा ने तीन ओवर में 13 रन देकर दो विकेट हासिल किए यानि इन दोनों गेंदबाज़ों ने मैच में बडा अंतर पैदा किया. इसके बावजूद भारत के लिए कुछ चिंता युवराज सिंह और शिखर धवन है. युवराज सिंह शायद पूरी तरह फ़िट नहीं हैं तो शिखर धवन इस टूर्नामेंट में अपने बल्ले से कुछ ख़ास नही कर सके है. पिछले मुक़ाबले में कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने उनकी जगह अजिंक्य रहाणे को टीम में शामिल किया था. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या धोनी दक्षिण अफ़्रीक़ा के ख़िलाफ़ शिखर को मौक़ा देते या फिर रहाणे ही टीम में बने रहेंगे. अगर युवराज सिंह फ़िटनेस की वजह से नहीं खेल पाते हैं तो फिर यह दोनों खिलाड़ी टीम में खेल सकते हैं. युवराज सिंह ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ अपनी खोई फ़ॉर्म वापस हासिल करते हुए केवल 43 गेंदो पर पांच चौके और चार छक्के लगाते हुए शानदार 60 रन बनाए. यानि युवराज सिंह की कमी भारत को खल सकती है. भारतीय गेंदबाज़ों ने सुपर टेन के किसी भी मुक़ाबले में विरोधी टीम को 138 रन से अधिक रन बनाने का अवसर नहीं दिया जबकि भारतीय गेंदबाज़ी ही पिछले लंबे समय से महंगी साबित हो रही थी. इस टूर्नामेंट में भारत के ख़िलाफ़ सबसे अधिक रन बांग्लादेश ने बनाए वह भी सात विकेट खोकर 138 रन. जवाब में भारत ने उसे आठ विकेट से हराया. दूसरी तरफ दक्षिण अफ़्रीक़ी टीम में हाशिम आमला एबी डिविलियर्स जेपी डूमिनी और क्विंटन डी कोक जैसे आक्रामक बल्लेबाज़ है. दक्षिण अफ़्रीक़ा ने सूपर टेन में न्यूज़ीलैंड को महज़ दो रन से हराया था और वह एक बेहद रोमांचक मुक़ाबला था. डेल स्टेन ने अपनी तूफ़ानी गेंदों से न्यूज़ीलैंड के मुंह से जीत छीन ली थी. इसके अलावा दक्षिण अफ़्रीक़ा के गेंदबाज़ों ने ही नीदरलैंड के ख़िलाफ़ टीम को हार से बचाया जब जीत के लिए 146 रनों का पीछा करते हुए नीदरलैंड की टीम संघर्ष करते हुए 18 ओवर में 139 रन बना सकी और केवल छह रन से हारी. अब देखना है कि एक के बाद एक आसान जीत के साथ सेमीफ़ाइनल में पहुंचने वाली भारतीय क्रिकेट टीम क्या दक्षिण अफ़्रीक़ा के ख़िलाफ़ भी आसानी से खेल पाएगी या फिर दक्षिण अफ़्रीक़ा मुश्किलें पैदा कर पाती है. |
| DATE: 2014-04-04 |
| LABEL: sports |
| [540] TITLE: वेस्टइंडीज़ को हरा श्रीलंका फ़ाइनल में |
| CONTENT: श्रीलंका टी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में पहुंच गया है. गुरुवार को हुए सेमीफ़ाइनल में उसने वेस्टइंडीज़ को 27 रन से हरा दिया. मैच बारिश के कारण बाधित हो गया था और डकवर्थ लुइस नियम के हिसाब से वेस्टइंडीज़ को 13-5 ओवर में जीत के लिए 108 रन बनाने थे लेकिन टीम सिर्फ़ 80 रन ही बना सकी. इससे पहले श्रीलंका ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 20 ओवरों में 160 रन बनाए थे. श्रीलंका की ओर से सबसे ज़्य़ादा 44 रन थिरिमाने ने बनाए. 35 गेंदें खेलते हुए उन्होंने तीन चौकों और दो छक्कों की मदद से यह स्कोर खड़ा किया. संतोकी की बॉल पर सिमंस ने कैच कर उन्हें पैवेलियन भेजा. एडी मैथ्यूज़ श्रीलंका की ओर से सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले दूसरे बल्लेबाज़ रहे. उन्होंने 23 गेंदों पर तीन चौकों और दो छक्कों की मदद से 40 रन ठोके. संतोकी द्वारा रनआउट होने तक दिलशान 39 गेंदे खेलकर 39 रन बना चुके थे. श्रीलंका की ओर से तीसरे ज़्यादा रन बनाने वाले इस ओपनर ने दो चौका और एक छक्का लगाया. उनके साथ पारी की शुरुआत करने वाले पेरेरा 12 रनों पर 26 रन बनाकर संतोकी का शिकार बने. उन्होंने अपनी संक्षिप्त पारी में दो चौके और दो छक्के जड़े. संगकारा एक और जयवर्धने शून्य रन बनाकर पैवेलियन लौट गए. एस प्रसन्ना छह रन बनाकर नाबाद रहे. वेस्टइंडीज़ की ओर से संतोकी ने दो विकेट लिए तो बद्री और रसेल के हाथ एक-एक विकेट लगा. जयवर्द्धने और दिलशान रन आउट हुए. वेस्टइंडीज़ की ओर से पारी की शुरुआत करने वाले स्मिथ 17 रन बनाकर और गेल 3 रन बनाकर मलिंगा के शिकार बने. टीम की ओर से सबसे ज़्यादा रन ब्रावो ने बनाए. उन्होंने 19 गेंदों में तीन चौकों और एक छक्के की मदद से 30 रन ठोके. सिमंस चार रन बनाकर आउट हुए तो 18 रन के साथ सैमुअल्स मैच ख़त्म होने तक क्रीज़ पर जमे रहे थे. उनके साथ देने पिछली बारी के मैच विनर सैमी भी क्रीज़ पर थे लेकिन किस्मत शायद वेस्टइंडीज़ के साथ नहीं थी. बारिश के कारण बाधित मैच को 13-5 ओवरों तक सीमित कर दिया गया था जिसमें वेस्टइंडीज़ सिर्फ़ 80 रन ही बना सकी. श्रीलंका की ओर से मलिंगा ने दो और कुलासेकारा प्रसन्ना ने एक-एक विकेट लिया. |
| DATE: 2014-04-03 |
| LABEL: sports |
| [541] TITLE: कैंसर मरीज़ बना फुटबॉल खिलाड़ी |
| CONTENT: चेचन्या के एक प्रमुख फुटबॉल क्लब ने दिमाग के कैंसर से पीड़ित लड़के को अपनी फुटबॉल टीम में शामिल किया है. रूस के एक नेता द्वारा लड़के के प्रति सहानुभूति व्यक्त करने के बाद क्लब ने यह निर्णय लिया. तेरेक ग्रोजनी फुटबॉल क्लब के मानद् अध्यक्ष और चेचन्या के जानेमाने क्षेत्रीय नेता रमज़ान कादरोव ने कहा कि वे ग्रिगोरी सिमोनयान की बीमारी के बारे में जानकार बहुत आहत हुए. अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर 18 साल के कैंसर से पीड़ित सिमोनयान की फोटो लगा कर कादरोव ने लिखा कि उन्होंने फुटबॉल क्लब को सिमोनयान के कैंसर के इलाज का खर्चा उठाने को भी कहा है. कादरोव का इंस्टाग्राम अकाउंट बहुत लोकप्रिय है. उन्होंने लिखा पूरी तरह ठीक होने पर ग्रिगोरी क्लब के लिए खेल सकेगा. ठीक होने में भगवान उसकी मदद करें. रूस के प्रमुख खेल समाचार पत्र सोवियत स्पोर्ट ने कहा है कि समझौते पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद सिमोनयान का इलाज जर्मनी में किया जाएगा जिससे उसके इलाज की अवधि का पता चल सके. सिमोनयान के विषय में रूस की मीड़िया में पहले भी लिखा गया है. खेल समाचार वेबसाइट चैम्पीयोनेट ने लिखा था कि सिमोनयान को पिछले साल सितम्बर में अपनी बिमारी के बारे में पता चला. उसके तुरंत बाद उनका एक ऑपरेशन भी हुआ. वेबसाइट ने सिमोनयान के कैंसर के इलाज के लिए ऑनलाइन 14000 डॉलर दान जमा करने की कोशिश भी की. रूसी प्रीमियर लीग में तेरेक ग्रोनज़ी फुटबॉल क्लब का 13वां स्थान है. वर्ष 2011 में क्लब ने डच फुटबालर और चेलसिया फुटबॉल क्लब के कोच रूड गुलेट को टीम में शामिल किया था. पांच महीनें बाद ही टीम के ख़राब प्रदर्शन को देखते हुए केदरोव ने उन्हें टीम से निकाल दिया. |
| DATE: 2014-04-03 |
| LABEL: sports |
| [542] TITLE: पाकिस्तान हारा, वेस्टइंडीज़ सेमीफ़ाइनल में |
| CONTENT: बांग्लादेश में चल रहे वर्ल्ड टी-20 के एक महत्वपूर्ण मैच में वेस्टइंडीज़ ने पाकिस्तान को 84 रन से हराकर सेमीफ़ाइनल मे अपनी जगह बना ली है. जीत के लिए 167 रन का पीछा करने उतरी पाकिस्तानी टीम 17 ओवर पांच गेंदों पर 82 रन बनाकर आल आउट हो गई. पहले बैटिंग करते हुए वेस्टइंडीज़ ने 20 ओवरों में छह विकेट खोकर 166 रन बनाए थे. सेमीफ़ाइनल में वेस्टइंडीज़ का मुक़ाबला श्रीलंका से होगा. वहीं दूसरे सेमीफ़ाइनल में भारत और दक्षिण अफ़्रीका की टीमें आमने-सामने होंगी. पाकिस्तान की शुरुआत बेहद ख़राब रही और दहाई का आंकड़ा छूने से पहले ही उनके तीन विकेट गिर चुके थे. कप्तान मोहम्मद हफ़ीज़ ने सर्वाधिक 19 रन बनाए. सौहेब मक़सूद और शाहिद अफ़रीदी ने 18-18 रन बनाए. एस बद्री और एसपी नारायन ने तीन-तीन विकेट के लिए. आंद्रे रसेल और के संतोकी ने दो-दो विकेट लिए. वेस्टइंडी़ज़ की तरफ़ से डीजे ब्रैवो ने 46 और एलएमपी सिमंस ने 31 रन बनाए. वहीं डीजेजी सैमी 42 रन बनाकर नाबाद रहे. मोहम्मद हफ़ीज़ सोहैल तनवीर ज़ुल्फ़िक़ार बाबर और शाहिद आफ़रीदी ने एक-एक विकेट लिए. वेस्टइंडीज़ के दो खिलाड़ी रन आउट हुए. |
| DATE: 2014-04-02 |
| LABEL: sports |
| [543] TITLE: श्रीलंका ने सेमी फ़ाइनल में जगह बनाई |
| CONTENT: बांग्लादेश में चल रहे वर्ल्ड टी-20 में श्रीलंका और न्यूज़ीलैंड के बीच एक रोमांचक मैच हुआ लेकिन आख़िरकार श्रीलंका ने बाज़ी मारी और सेमी फ़ाइनल में जगह बनाई. अब सेमी फ़ाइनल में श्रीलंका की टक्कर पाकिस्तान और वेस्टइंडीज़ के बीच होने वाले मैच के विजेता से होगी. इस मैच के बाद ये भी तय हो गया कि दूसरे सेमी फ़ाइनल में भारत की टक्कर दक्षिण अफ़्रीका से होगी. एक समय मैच में श्रीलंका की स्थिति काफ़ी ख़राब लग रही थी और पहले बल्लेबाज़ी करते हुए उसने सिर्फ 119 रन बनाए. लेकिन श्रीलंका को भी ये उम्मीद नहीं होगी कि वो न्यूज़ीलैंड को इतने सस्ते में निपटा कर मैच आसानी से जीत लेगा. श्रीलंका ने सिर्फ़ 60 रनों पर ही न्यूज़ीलैंड को आउट कर दिया और 59 रनों से शानदार जीत हासिल की. श्रीलंका की जीत के हीरो रहे रंगना हेरात जिन्होंने बेहतरीन गेंदबाज़ी का प्रदर्शन करते हुए सिर्फ़ तीन रन देकर पाँच विकेट लिए. न्यूज़ीलैंड की ओर से सलामी बल्लेबाज़ के रूप में उतरे केन विलियम्सन ने 42 रनों की पारी खेली वे आठवें विकेट के रूप में आउट हुए. उनके अलावा न्यूज़ीलैंड के किसी भी बल्लेबाज़ का स्कोर दहाई में नहीं पहुँच पाया. इससे पहले श्रीलंका ने बल्लेबाज़ी करते हुए 119 रन बनाए. श्रीलंका की बल्लेबाज़ी भी अच्छी नहीं रही. श्रीलंका की ओर से जयवर्धने ने 25 और थिरिमाने ने 20 रन बनाए. |
| DATE: 2014-03-31 |
| LABEL: sports |
| [544] TITLE: नीदरलैंड्स ने इंग्लैंड को धूल चटाई |
| CONTENT: बांग्लादेश में चल रहे वर्ल्ड टी-20 में नीदरलैंड्स ने एक बड़ा उलटफेर करते हुए पूर्व चैम्पियन इंग्लैंड की टीम को 45 रनों से हरा दिया है. नीदरलैंड्स ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 20 ओवरों में 133 रन बनाए थे. जवाब में इंग्लैंड की टीम 17-4 ओवरों में 88 रन पर आउट हो गई. इंग्लैंड की ओर से सर्वाधिक 18 रन रवि बोपारा ने बनाए. इंग्लैंड और नीदरलैंड्स की टीमें पहले ही सेमी फ़ाइनल की दौड़ से बाहर हो चुकी हैं. चटगाँव में हुए इस मैच में इंग्लैंड ने टॉस जीतकर पहले फ़ील्डिंग करने का फ़ैसला किया. नीदरलैंड्स ने बैरेसी के 48 और माइबर्ग के 39 रनों की बदौलत 20 ओवरों में पाँच विकेट के नुक़सान पर 133 रन बनाए. इंग्लैंड के कप्तान स्टुअर्ट ब्रॉड ने 24 रन देकर तीन विकेट लिए. जीत के लिए 134 रनों के लक्ष्य का पीछा कर रहे इंग्लैंड ने काफ़ी ख़राब शुरुआत की. उसके पाँच विकेट सिर्फ़ 42 रन पर गिर गए थे. हेल्स 12 लंब छह मोईन अली तीन मॉर्गन छह और बटलर सिर्फ़ छह रन बनाकर पवेलियन लौट चुके थे. नीदरलैंड्स की ओर से वैन बीक ने सिर्फ़ नौ रन देकर तीन विकेट लिए जबकि मुदस्सर बुख़ारी ने 12 रन देकर तीन विकेट चटकाए. |
| DATE: 2014-03-31 |
| LABEL: sports |
| [545] TITLE: जोकोविच ने चौथी बार जीता सोनी ओपन |
| CONTENT: दुनिया के दूसरे नंबर के खिलाड़ी सर्बिया के नोवाक जोकोविच ने चिर प्रतिद्वंद्वी स्पेन के राफ़ेल नडाल को 6-3 6-3 से हराकर चौथी बार सोनी ओपन का ख़िताब जीत लिया. 26 वर्षीय जोकोविच की विश्व के नंबर एक खिलाड़ी नडाल के ख़िलाफ़ यह लगातार तीसरी जीत है. दुनिया के दो शीर्ष खिलाड़ियों के बीच यह रिकॉर्ड 40वीं भिडंत थी. सर्बियाई खिलाड़ी ने पहले सेट में एक बार और दूसरे सेट में दो बार नडाल की सर्विस भंग करते हुए ख़िताब पर क़ब्ज़ा किया. जोकोविच सर्वाधिक बार यह ख़िताब जीतने वाले खिलाड़ियों की सूची में अब अमरीका के पीट सम्प्रास के आगे निकल गए. सबसे ज़्यादा बार यह ख़िताब जीतने का रिकॉर्ड अमरीका के आंद्रे अगासी के नाम है जिन्होंने छह बार यह ख़िताब जीता है. ख़िताब जीतने के बाद जोकोविच ने कहा मेरे लिए यह टूर्नामेंट शुरुआत से लेकर अंत तक शानदार रहा. टूर्नामेंट के आगे बढ़ने के साथ-साथ मेरे खेल में सुधार आया. दूसरी तरफ़ नडाल ने कहा कोई निराशा नहीं है. यही टेनिस की खूबी है. मैंने अपनी तरफ से अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन जोकोविच का खेल मुझसे बेहतर रहा. इस तरह सभी नौ मास्टर्स ख़िताबों पर इस समय नडाल और जोकोविच का क़ब्ज़ा है. जोकोविच ने हाल में इंडियन वेल्स में भी ख़िताब जीता था. टेनिस सत्र अब अमरीका के हार्ड कोर्ट से यूरोप के क्ले कोर्ट की तरफ जा रहा है जहां नडाल की बादशाहत है. इससे पहले महिला वर्ग में अमरीका की सरीना विलियम्स ने चीन की ली ना को हराकर रिकॉर्ड सातवीं बार ख़िताब जीता. |
| DATE: 2014-03-31 |
| LABEL: sports |
| [546] TITLE: भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 73 रन से हराया |
| CONTENT: बांग्लादेश में खेले जा रहे टी20 वर्ल्ड कप में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 73 रन से हरा दिया. टीम इंडिया इस तरह अपने ग्रुप में शीर्ष पर रहते हुए सेमीफाइनल में पहुंच गई है. भारत ने इससे पहले पाकिस्तान वेस्ट इंडीज और बांग्लादेश को भी आसानी से मात दी थी. रविवार को खेले गए मुक़ाबले में भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी पहली बार इस टूर्नामेंट में पहली बार टॉस जीतने में नाकाम रहे. इसके बाद पहले बल्लेबाज़ी की दावत पाकर भारत ने निर्धारित बीस ओवर में सात विकेट खोकर 159 रन बनाए. जवाब में ऑस्ट्रेलियाई टीम 16-2 ओवर में ही महज़ 86 रनों पर सिमट गई. इसके साथ ही भारतीय गेंदबाजों ने साबित किया कि इससे पहले खेले गए मुकाबलों में उनका प्रदर्शन कोई तीर तुक्का नहीं था. इस मैच में भारत के लिए सबसे ज्यादा संतोषजनक बात युवराज सिंह का फॉर्म में आना रहा जिन्होंने केवल 43 गेंदों पर पांच चौके और चार छक्के लगाते हुए 60 रनों की पारी खेली. उनकी पारी दोनों टीमों में एक बड़ा अंतर साबित हुई. युवराज के अलावा कप्तान धोनी ने 20 गेंदों पर 24 रन बनाए. ऑस्ट्रेलिया की ओर से ब्रैड हॉज ने 13 रन देकर एक और ग्लेन मैक्सवेल ने 20 रन देकर एक विकेट लिया. उनके अलावा बॉलिंजर और वाट्सन को भी एक एक विकेट मिला. ऑस्ट्रेलियाई टीम जब बल्लेबाजी करने मैदान में उतरी तो आर अश्विन की घातक गेंदबाजी के सामने वो टिक ही नहीं पाई. उन्होने 3-2 ओवर में 11 रन देकर चार विकेट झटके. अमित मिश्रा ने भी 13 रन देकर दो विकेट हासिल किए. एक समय तो ऑस्ट्रेलिया ने जब अपने पांच विकेट केवल 55 रन पर खो दिए थे तभी लगने लगा था कि ऑस्ट्रेलिया का भारत के पंजे से निकलना मुश्किल है. ऑस्ट्रेलिया की ओर से ग्लेन मैक्सवेल ने 23 और डेविड वार्नर ने 19 रन बनाए. बाकी कोई भी बल्लेबाज़ भारतीय गेंदबाजों का सामना नहीं कर सका. इससे पहले रविवार को ही एक अन्य मुकाबले में पाकिस्तान ने मेजबान बांग्लादेश को 50 रन से करारी मात दी. सोमवार को इंग्लैंड का सामना नीदरलैंड्स से और श्रीलंका का सामना न्यूज़ीलैंड से होगा. |
| DATE: 2014-03-30 |
| LABEL: sports |
| [547] TITLE: दमदार होगा भारत-ऑस्ट्रेलिया मुक़ाबला |
| CONTENT: बांग्लादेश में खेले जा रहे वर्ल्ड टवेंटी-टवेंटी क्रिकेट टूर्नामेंट में भारत का सामना ऑस्ट्रेलिया से हो रहा है. कहने को दो बेहतरीन टीमें आमने-सामने हैं और एक दमदार मुक़ाबला होने की उम्मीद भी है. इसके बावजूद इस मैच में कुछ भी दांव पर नहीं क्योंकि लगातार तीन जीत के साथ भारत पहले ही सेमीफ़ाइनल में अपनी जगह पक्की कर चुका है तो दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया लगातार दो मैच हारने के साथ ही सेमीफ़ाइनल की दौड़ से बाहर हो चुका है. भारत ने शुक्रवार के टवेंटी-टवेंटी वर्ल्ड क्रिकेट टूर्नामेंट में मेज़बान बांग्लादेश को आठ विकेट से मात दी तो वेस्टइंडीज़ ने ऑस्ट्रेलिया को एक बेहद रोमांचक मुक़ाबले में छह विकेट से हराया. साथ ही सारे समीकरण भारत के पक्ष में बनते चले गए. भारत ने इस टूर्नामेंट में पहले तो पाकिस्तान और उसके बाद वेस्टइंडीज़ को मात दी थी. शुरुआती दो जीत मिलने से भारतीय टीम का खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आया. इसके बावजूद भारतीय गेंदबाज़ बांग्लादेश के ख़िलाफ़ भी अपने शानदार प्रदर्शन का सिलसिला जारी रखेंगे उस पर शायद ही किसी को इतना भरोसा रहा हो. ख़ास बात यह है कि भारत के सामने पाकिस्तान की टीम सात विकेट खोकर महज़ 131 रन बना सकी जबकि वेस्टइंडीज़ जैसी मज़बूत टीम भी सात विकेट खोकर 129 रन ही बना सकी. बांग्लादेश की टीम भी इससे अलग साबित नही हुई और वह भी सात विकेट खोकर 138 रन ही बना सकी. जवाब में भारत ने पाकिस्तान और वेस्टइंडीज़ को 7-7 विकेट से तो बांग्लादेश को तो आठ विकेट से हराया. भारत की जीत में विराट कोहली और सलामी बल्लेबाज़ रोहित शर्मा चमके. अब जब सात या आठ विकेट से भारत आसानी से जीत रहा है तो इसका अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि इस टूर्नामेंट में भारत के बल्लेबाज़ भी फ़ॉर्म में हैं. भारत की जीत से उत्साहित कप्तान महेंद्र सिंह धोनी भी आखिरकार अपनी चुप्पी तोड़ने पर मजबूर हुए. बांग्लादेश के ख़िलाफ मिली जीत के बाद पत्रकारों से मुख़ातिब धोनी ने कहा कि जीत के बावजूद अभी भी एक दो क्षेत्र ऐसे हैं जहां सुधार किया जा सकता है. उन्होंने कहा कुछ कैच ज़रूर छूटे हैं लेकिन कुल मिलाकर फ़ील्डिंग भी ठीक है. वैसे कैच पकड़ने में तो सभी टीमों से ग़लतियां हो रही हैं. अभी तक मध्यमक्रम की परीक्षा नहीं हुई है लेकिन उसमें हम कुछ नहीं कर सकते. वह हमारे हाथ में नहीं है. विराट और रोहित ने अच्छी बल्लेबाज़ी की है. थोड़ी बहुत बल्लेबाज़ी सबने की है. सुरेश रैना ने भी की है युवराज ने भी की है. रविंद्र जडेजा और आर अश्विन को मौक़ा नहीं मिला लेकिन उन्हें नैट में अभ्यास कराया जा रहा है. भारतीय टीम के लिए अच्छी बात यह है कि भुवनेश्वर कुमार अमित मिश्रा और आर अश्विन की कसी हुई और किफ़ायती गेंदबाज़ी के कारण विरोधी टीमें बड़ा स्कोर नहीं बना पा रही हैं लेकिन ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ भारत को जी-जान लगानी पड़ सकती है. भारत भले ही तीनों मैच जीतकर अंक तालिका में छह अंकों से साथ ग्रुप-2 में पहले स्थान पर है लेकिन उसे ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ भी जीत हासिल करनी होगी ताकि अपने ग्रुप की पहली टीम के रुतबे के साथ सेमीफ़ाइनल में जाए. ऐसा नहीं है कि ऑस्ट्रेलिया ने कोई ख़राब खेल दिखाया है. हक़ीक़त तो यह है कि वेस्टइंडीज़ ने पिछले मुक़ाबले में ऑस्ट्रेलिया के मुंह से जीत छीन ली वरना एक समय 16. 3 ओवर में वेस्टइंडीज़ के चार विकेट 130 रन पर गिर चुके थे तब ड्वेन ब्रावो और डेरेन सैमी ने धुंआधार बल्लेबाज़ी कर टीम को जीत दिला दी. एक अन्य मुक़ाबले में पाकिस्तान और मेज़बान बांग्लादेश आमने-सामने होंगे. पाकिस्तान इस मैच में बड़ी जीत हासिल करने की पूरी कोशिश करेगा ताकि वह वेस्टइंडीज़ के साथ दूसरी टीम के तौर पर सेमीफ़ाइनल में पहुंचने की दौड़ में शामिल हो सके. |
| DATE: 2014-03-30 |
| LABEL: sports |
| [548] TITLE: 13 सालों का एन श्रीनिवासन का सफ़रनामा |
| CONTENT: एक खेल प्रशासक के तौर पर क्रिकेट में नारायणसामी श्रीनिवासन का 13 सालों का सफ़र काफ़ी दिलचस्प माना जाता है. वर्ष 2001 में उन्होंने एक क्रिकेट प्रशासक के बतौर अपने सफ़र की शुरुआत की. उन्होंने तमिलनाडु के वैल्लोर ज़िला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा और जीते. इसके बाद तत्कालीन तमिलनाडु क्रिकेट संघटीएनसीए के अध्यक्ष एसी मुथैया ने उन्हें राज्य क्रिकेट संघ का उपाध्यक्ष बना दिया. दरअसल श्रीनिवासन को क्रिकेट में मुथैया ही लेकर आए थे. 90 के दशक में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बीसीसीआई में उनकी तूती बोलती थी. श्रीनिवासन और वह दोनों मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में साथ साथ पढ़ते थे. दोनों के बीच ख़ासी दोस्ती बताई जाती है. वर्ष 2002 में टीएनसीए में मुथैया ने अध्यक्ष के बतौर अधिकतम आठ का कार्यकाल पूरा होने पर श्रीनिवासन ने यह कार्यभार संभाला. बेशक तब टीएनसीए के चप्पे-चप्पे पर मुथैया की पकड़ थी और श्रीनिवासन की पहचान मुथैया के आदमी के तौर पर थी. श्रीनिवासन ने धीरे-धीरे तमिलनाडु क्रिकेट संघ टीएनसीए की इकाइयों पर अपना प्रभाव बना लिया. धीरे-धीरे टीएनसीए पर मुथैया की पकड़ ढीली पड़ चुकी थी. इस बीच श्रीनिवासन और जगमोहन डालमिया की बढ़ती नज़दीकियां भी सुर्ख़ी बटोरने लगी थी. जब डालमिया बीसीसीआई अध्यक्ष के तौर पर कार्यकाल ख़त्म कर रहे थे तब ऐसा माना जाता है कि यह श्रीनिवासन ही थे जिन्होंने बीसीसीआई में डालमिया को संरक्षक बनाने का सुझाव दिया था. वर्ष 2006 में जब डालमिया को वर्ष 1996 विश्व कप आयोजन में वित्तीय अनियमितताओं के लिए बर्ख़ास्त कर दिया गया तो वो कमेटी जिसने इन अनियमितताओं का पर्दाफ़ाश किया था उसके प्रमुख भी श्रीनिवासन ही थे. अब तक श्रीनिवासन बीसीसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष शरद पवार के ख़ेमे में थे. पवार ने अकाउंट में माहिर श्रीनिवासन को बोर्ड का कोषाध्यक्ष बना दिया. फिर वर्ष 2008 में वह बीसीसीआई के सचिव बन गए. अब उन्हें बोर्ड के नए अध्यक्ष शशांक मनोहर का ख़ास माना जाता था. आईपीएल के पूर्व आयुक्त ललित मोदी को शशांक मनोहर के ही कार्यकाल में जब हटाया गया तो उसके लिए असली भूमिका श्रीनिवासन ने ही बांधी थी. वर्ष 2011 में श्रीनिवासन बीसीसीआई के अध्यक्ष बने. लेकिन माना गया कि अब तक शरद पवार खेमे से उनकी अनबन हो चुकी थी. बतौर बीसीसीआई अध्यक्ष उनका कार्यकाल मिलाजुला रहा. जहां एक तरफ़ उन्होंने बोर्ड की वित्तीय स्थिति को और मजबूत किया वहीं दूसरी तरफ़ क्रिकेटरों की सुविधाएं बढाने के लिए उल्लेखनीय काम किया. लेकिन आईपीएल-7 में फिक्सिंग विवाद उनके लिए सबसे बड़ी फांस बन गया. उनके सहयोगी मानते हैं कि श्रीनिवासन की नज़र बहुत पहले से इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल आईसीसी में प्रमुख के पद पर थी. जब लार्ड वूल्फ कमेटी की रिपोर्ट आई तो ऐसा लगने लगा कि उनका इस पद पर पहुंचना मुश्किल होगा. लेकिन बीसीसीआई के प्रभाव के चलते इस रिपोर्ट पर अमल नहीं किया गया. पिछले वर्ष नए वित्तीय फ़ार्मूले के आधार पर श्रीनिवासन की अगुवाई में आईसीसी की नई संरचना पर मुहर लगी. अब इस साल जुलाई से वह आईसीसी के प्रमुख का कार्यभार संभालने वाले हैं. इसलिए ये देखना होगा हाल के विवादों और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों का असर उनके आईसीसी प्रमुख बनने पर पड़ता है या नहीं. श्रीनिवासन दक्षिण भारत के जाने माने उद्योगपति हैं. इंडिया सीमेंट में उनका सफ़र 1968 में तब शुरू हुआ जब वह केवल 23 साल के थे. हालांकि यहां भी उनका सफ़र आसान नहीं था. उस समय इंडिया सीमेंट के मैनेजिंग डायरेक्टर केएस नारायण थे जो कंपनी के दूसरे संस्थापक एसएनएन शंकरलिंगम के बेटे थे. अस्सी के दशक में श्रीनिवासन और नारायण के बीच ठन गई तो श्रीनिवासन को कंपनी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. तभी भारतीय औद्योगिक विकास बैंक आईडीबीआई ने कंपनी के प्रबंधन को अपने हाथों में ले लिया. माना जाता है कि तब उन्होंने द्रमुक प्रमुख एम करुणानिधि के भतीजे मुरोसोली मारन के साथ अपनी नज़दीकियां बढ़ानी शुरू की. 90 के दशक की शुरुआत में उन्होंने डीएमके की मदद से फिर इंडिया सीमेंट कंपनी में वापसी की. कंपनी में दोबारा प्रवेश के बाद उन्होंने 28 फ़ीसदी हिस्सेदारी ख़रीद ली. बीसीसीआई अध्यक्ष के पद से हटने के बाद श्रीनिवासन के करियर को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बरक़रार है. |
| DATE: 2014-03-29 |
| LABEL: sports |
| [549] TITLE: भारत ने बांग्लादेश को आठ विकेट से हराया |
| CONTENT: ट्वेंटी-20 विश्व कप के लीग मैच में भारत ने बांग्लादेश को आठ विकेट से हरा दिया है. भारत के लिए रोहित शर्मा और विराट कोहली ने अर्धशतक लगाए. अश्विन मैन ऑफ़ द मैच चुने गए. बांग्लादेश ने भारत के सामने जीत के लिए निर्धारित 20 ओवर में 139 रन का लक्ष्य रखा था. भारत ने नौ गेंद बाकी रहते हुए दो ही विकेट खोकर 141 रन बना लिए. भारत का पहला विकेट सिर्फ़ 13 रन पर गिर गया था. शिखर धवन सिर्फ़ एक रन बनाकर आउट हो गए. इसके बाद रोहित शर्मा और विराट कोहली ने दूसरे विकेट के लिए 100 रन की साझेदारी की. रोहित शर्मा ने 44 गेंद पर 56 रन बनाए विराट कोहली ने 50 गेंद पर 57 रन बनाए वो आखिर तक आउट नहीं हुए. रोहित शर्मा के आउट होने के बाद खेलने उतरे कप्तान धोनी ने 12 गेंद पर 22 रन बनाए. इससे पहले भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने टॉस जीतकर गेंदबाज़ी करने का फ़ैसला किया. बांग्लादेश की शुरुआत अच्छी नहीं रही. बांग्लादेश ने तीन विकेट सिर्फ़ 21 रन पर गंवा दिए थे. इसके बाद अनामुल हक और मुशफ़ीकुर रहीम ने चौथे विकेट के लिए 46 रन की साझेदारी की. मुशफ़ीकुर रहीम ने 21 गेंद पर 24 रन बनाए उन्हें शमी ने आउट किया. अनामुल हक ने 43 गेंद पर 44 रन बनाए. उन्हें अमित मिश्रा ने बोल्ड किया. बांग्लादेश के लिए आखिरी ओवरों में महमूदुल्लाह ने तेज़ बल्लेबाज़ी कर स्कोर 138 तक पहुंचाया. महमूदुल्लाह ने 27 गेंद पर 33 रन बनाए. भारत के लिए अमित मिश्रा ने तीन और अश्विन ने दो विकेट लिए. शमी और भुवनेश्वर कुमार को एक-एक विकेट मिला. इस जीत के बाद भारत का सेमीफ़ाइनल में पहुंचना करीब-करीब तय माना जा रहा है. भारत का अगला मुकाबला 30 मार्च को ऑस्ट्रेलिया से होगा. |
| DATE: 2014-03-28 |
| LABEL: sports |
| [550] TITLE: वेस्टइंडीज़ के आगे मेज़बान बांग्लादेश पस्त |
| CONTENT: बांग्लादेश में चल रहे वर्ल्ड टी-20 के एक मैच में मौजूदा चैम्पियन वेस्टइंडीज़ ने मेज़बान बांग्लादेश को 73 रनों से हराकर सेमी फ़ाइनल में जगह बनाने की अपनी उम्मीद बरकरार रखी है. मीरपुर में हुए मैच में पहले तो वेस्टइंडीज़ की ओर से ड्वेन स्मिथ ने 43 गेंदों पर 72 रन बनाए और फिर जब गेंदबाज़ी की बारी आई तो उसके स्पिनर सैमुएल बद्री ने 15 रन देकर चार विकेट लिए और बांग्लादेश की बल्लेबाज़ी की कमर तोड़ दी. वेस्टइंडीज़ ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 20 ओवरों में सात विकेट के नुक़सान पर 171 रन बनाए जवाब में बांग्लादेश की टीम 98 रन बनाकर ही आउट हो गई और इस तरह वेस्टइंडीज़ ने 73 रनों के बड़े अंतर से जीत हासिल की. इस जीत के साथ ही वेस्टइंडीज़ ने अपने ग्रुप में दूसरे स्थान पर जगह बना ली है. भारत की टीम इस ग्रुप में अपने दोनों मैच जीतकर शीर्ष पर है. जबकि वेस्टइंडीज़ ने भारत के ख़िलाफ़ मैच गँवा दिया था. इस ग्रुप में भारत और वेस्टइंडीज़ के अलावा पाकिस्तान ऑस्ट्रेलिया और बांग्लादेश की टीमें हैं. बांग्लादेश ने इस मैच में टॉस जीतकर पहले गेंदबाज़ी करने का फ़ैसला किया. क्रिस गेल और स्मिथ ने पहले विकेट की साझेदारी में 97 रन जोड़े. हालाँकि गेल स्मिथ के मुक़ाबले कुछ धीमी बल्लेबाज़ी कर रहे थे. स्मिथ ने 10 चौके और तीन छक्कों की मदद से 72 रन बनाए. जबकि गेल ने भी 48 रनों की पारी खेली. उन्होंने अपनी पारी में तीन चौके और दो छक्के मारे. इन दोनों के अलावा सैमुएल्स ने 18 और कप्तान डेरेन सैमी ने 14 रन बनाए. जीत के लिए 171 रनों का पीछा कर रही बांग्लादेश की टीम बल्लेबाज़ी में फिसड्डी साबित हुई. पूरी टीम 98 रन बनाकर आउट हो गई. कप्तान मुशफिकुर रहीम ने सर्वाधिक 22 रन बनाए. |
| DATE: 2014-03-26 |
| LABEL: sports |
| [551] TITLE: अभ्यास मैच में इंग्लैंड से जीता भारत |
| CONTENT: 20-20 वर्ल्ड कप के पहले अभ्यास मैच में श्रीलंका से हारने के बाद भारतीय टीम ने अपने दूसरे अभ्यास मैच में इंग्लैंड को 20 रन से हरा दिया. भारत ने इंग्लैंड के सामने जीत के लिए 179 रनों का लक्ष्य रखा था. अब टीम इंडिया का 20-20 विश्व कप में पहला मुक़ाबला 21 मार्च को पाकिस्तान के साथ होगा. इंग्लैंड के खिलाफ इस अभ्यास मैच में सुरेश रैना और विराट कोहली ने शानदार बल्लेबाज़ी की. जहाँ सुरेश रैना ने 31 गेंदों में 54 रन की धमाके दार पारी खेली वहीं विराट कोहली ने 74 रन बनाए और आउट नहीं हुए. आखिरी ओवरों में विराट कोहली और कप्तान धोनी की जोड़ी ने ताबड़तोड़ रन बनाए. धोनी ने 14 गेंदें खेलीं और 21 रन जुटाए. कुल मिला कर भारत का स्कोर रहा चार विकेट पर 178 रन. भारत के 179 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए इंग्लैंड को माइकल लंब 36 और एलेक्स हेल्स 16 ने पहले विकेट के लिए पांच ओवर में 43 रन जोड़कर शुरुआत तो अच्छी दी लेकिन बाकी बल्लेबाज लड़खड़ा गए. इंग्लैंड की टीम छह विकेट पर 158 रन ही बना सकी. मोईन अली ने 38 गेंदों में चार चौकों और एक छक्के के साथ सर्वाधिक 46 रन बनाए. भारत की ओर से स्पिनर रविंद्र जडेजा ने दो विकेट चटकाए. |
| DATE: 2014-03-20 |
| LABEL: sports |
| [552] TITLE: धोनी ने ज़ी न्यूज़ पर ठोका 100 करोड़ का दावा |
| CONTENT: भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने आईपीएल फिक्सिंग मामले में अपना नाम घसीटे जाने पर एक हिंदी न्यूज़ चैनल ज़ी टीवी पर 100 करोड़ रुपये का मानहानि का केस दर्ज किया है. धोनी ने मद्रास हाई कोर्ट में अर्ज़ी दी जिसके बाद कोर्ट ने दो सप्ताह के लिए ऐसी किसी भी ख़बर या इंटरव्यू के प्रसारण या प्रकाशन पर रोक लगा दी है जिसमें धोनी के ख़िलाफ आईपीएल में फिक्सिंग के आरोप लगे हों. धोनी ने आरोप लगाया कि इन ख़बरों से उनकी छवि को ठेस पहुंची है. जाने-माने क्रिकेट समीक्षक प्रदीप मैगज़ीन ने कहा यह बड़े ताज्जुब की बात है कि धोनी ने मानहानि का दावा सिर्फ़ ज़ी न्यूज़ के ख़िलाफ किया है. वह ख़बर तो दूसरे टीवी चैनलों और अखबारों में भी आई हैं. ऐसे में उन्होंने दूसरे चैनल या जाने-माने अखबारों पर केस क्यों नहीं किया यह हैरानी वाली बात है. धोनी की ओर से किए गए मुकदमे का मीडिया पर असर क्या होगा इस सवाल पर प्रदीप मैगज़ीन का मानना है कि अब तो केस की सुनवाई होगी. इसके अलावा अब तक जो आरोप धोनी पर लगाए या दिखाए जा रहे थे उसे बंद कर देंगे लेकिन उस पर बहस तो ज़रूर करेंगे. इसके अलावा धोनी ने क्या किया क्या नही किया यह भी एक केस की शक्ल में सामने आएगी. सिर्फ़ एक टीवी चैनल को निशाना बनाने को लेकर प्रदीप मैगज़ीन का कहना है कि एक को कोर्ट में ले जाने से दूसरों को संदेश दिया गया है कि आप ऐसा नहीं कर सकते. मामले की तह में जाए बिना या बिना किसी ठोस सबूत के ऐसे ही भारतीय कप्तान पर आरोप नहीं लगाए जा सकते. मैगज़ीन के अनुसार कोर्ट में जाना उनका अधिकार है लेकिन एक बार फिर यह बात हैरान करती है कि वह केवल एक चैनल के ख़िलाफ़ कोर्ट में क्यों गए. वह कहते हैं कि क्योंकि इस चैनल ने कई स्टिंग आपरेशन किए हैं जिसमें न सिर्फ़ धोनी बल्कि बोर्ड के बड़े-बड़े अधिकारी भी शामिल हैं. इसलिए हो सकता है कि बोर्ड ने धोनी को कहा हो कि कम से कम इस चैनल का तो मुंह बंद करो. एक को निशाना बनाकर बाकी को चेतावनी दी है कि चुप रहिए. इसके बावजूद यह सब भारतीय क्रिकेट की छवि के लिए बेहद खराब है जो पहले से ही शक और इस तरह के आरोपों के कारण खराब हो चुकी है. |
| DATE: 2014-03-18 |
| LABEL: sports |
| [553] TITLE: 'ब्लेड रनर' को पता था बंदूक चलाने का मतलब |
| CONTENT: एक बंदूक विशेषज्ञ ने दावा किया है कि हत्या के आरोपों का सामना कर रहे दक्षिण अफ्रीका के पैरालंपियन एथलीट ऑस्कर पिस्टोरियस बंदूक का प्रयोग करने के नियमों और घुसपैठियों से निपटने से अच्छी तरह वाकि़फ़ हैं. ये दावा ब्लेड रनर के नाम से मशहूर पिस्टोरियस के ख़िलाफ़ दक्षिण अफ्रीका की एक अदालत में चल रहे हत्या के मुक़दमे की सुनवाई के दौरान किया गया. पिस्टोरियस ने बंदूक का लाइसेंस हासिल करने के लिए भरे गए फॉर्म में लिखा था कि अगर किसी को जान का ख़तरा है तो वह बंदूक़ का इस्तेमाल कर सकता है. इस नई जानकारी के सामने आने के बाद पिस्टोरियस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. उन पर अपनी प्रेमिका रीवा स्टीनकैंप की हत्या का आरोप है लेकिन पिस्टोरियस का कहना है कि उन्होंने रीवा को ग़लती से घुसपैठिया समझ लिया था. अभियोजन पक्ष का कहना है कि उन्होंने जानबूझकर पिछले साल वेलेंटाइन डे को उनके घर पर हुई एक बहस के बाद रीवा को गोली मारी थी. शॉन पैट्रिक रेंस बंदूकों के विशेषज्ञ हैं और एक आपसी दोस्त के माध्यम से साल 2012 में पिस्टोरियस से मिले थे. मुक़दमे के 11वें दिन रेंस ने अदालत को बताया कि पिस्टोरियस ने उनसे एक स्मिथ एंड वेसन 500 बंदूक ख़रीदी थी. उसके बाद उन्होंने छह और बंदूकों का ऑर्डर दिया था. रेंस के मुताबिक़ पिस्टोरियस से उन्होंने एक फॉर्म भरवाया था जो बंदूक ख़रीदने के लिए ज़रूरी होता है. उससे यह तय होता है कि बंदूक के ख़रीदार को उसके इस्तेमाल औऱ क़ानून की पूरी जानकारी होती है. पिस्टोरियस को इस फॉर्म में सबसे ज़्यादा नंबर उस सवाल पर मिले थे जो क़ानूनी तौर पर घुसपैठियों को गोली मारने से संबंधी नियमों के बारे में थे. एक सवाल था आपके और चोरों के बीच कोई सुरक्षा गेट नहीं है. वे हथियारों से लैस हैं और आपकी ओर बढ़ रहे हैं. आपको अपने जीवन के लिए ख़तरा महसूस हो रहा है तो क्या आप अपनी बंदूक़ से गोलीबारी करेंगेपिस्टोरियस ने जवाब में कहा हां. अगला सवाल था कि निजी इस्तेमाल के लिए बंदूक के उपयोग की क़ानूनी ज़रूरतों को स्पष्ट करें. इसके जवाब में पिस्टोरियस ने कहा हमला आप के ख़िलाफ़ होना चाहिए यह अवैध होना चाहिए यह लोगों के ख़िलाफ़ होना चाहिए. लक्ष्य की पहचान करने के महत्व पर किए गए अंतिम सवाल पर पिस्टोरियस का जवाब था हमेशा अपने लक्ष्य और उसकी मंशा को जानिए. सुनवाई अब मंगलवार तक स्थगित कर दी गई है. सुनवाई में 100 से अधिक गवाहों को बुलाए जाने की उम्मीद है. तीन सप्ताह में सुनवाई पूरे होने की संभावना थी लेकिन अब लगता है और वक़्त लगेगा. अभियोजन पक्ष अदालत में यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि 29 वर्षीय मॉडल रियलिटी टीवी स्टार और क़ानून स्नातक रीवा स्टीनकैंप की पिस्टोरियस ने जानबूझकर गोली मार कर हत्या की थी. पिस्टोरियस अगर दोषी पाए गए तो उन्हें आजीवन कारावास की सजा मुमकिन है. |
| DATE: 2014-03-18 |
| LABEL: sports |
| [554] TITLE: आयरलैंड ने जिम्बॉब्वे को हराया |
| CONTENT: बांग्लादेश में चल रहे आईसीसी ट्वंटी-20 विश्वकप के क्वालिफ़ाइंग मैच में सोमवार को आयरलैंड ने ज़िम्बॉब्वे को बेहद रोमांचक मुक़ाबले में तीन विकेट से हरा दिया. आयरलैंड को जीत के लिए 164 रन का लक्ष्य मिला था जो उसने अंतिम गेंद में सात विकेट खोकर हासिल कर लिया. ओपनर पॉल स्टर्लिंग ने 34 गेंदों में नौ चौके और एक छक्का उड़ाते हुए 60 रन की ताबड़तोड़ पारी खेली. इस शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें मैन ऑफ द मैच घोषित किया गया. स्टर्लिंग और कप्तान विलियम पोर्टरफील्ड ने पहले विकेट की साझेदारी में 8. 2 ओवर में 80 रन जोड़कर अपनी टीम को मज़बूत आधार दिया. एड जॉएस ने 22 एंड्रयू पॉइन्टर ने 22 और केविन ओ ब्रायन ने 17 रन बनाकर टीम की जीत में अहम योगदान दिया. ज़िम्बाब्वे की ओर से मध्यम तेज़ गेंदबाज़ तिनाशे पेनिनगारा ने अपने कोटे के ओवरों में 37 रन देकर चार विकेट लिए. सिल्हट में खेले गए इस मैच में आयरलैंड ने टॉस जीतकर पहले फ़ील्डिंग करने का फ़ैसला किया. ज़िम्बॉब्वे ने 20 ओवरों में पाँच विकेट के नुक़सान पर 163 रन बनाए. कप्तान ब्रैंडन टेलर ने 46 गेंदों पर 59 रन की पारी खेली. उन्होंने छह चौके और दो छक्के भी जड़े. ओपनर हेमिल्टन मस्काद्ज़ा ने 21 और एल्टन चिगुंबुरा ने नाबाद 22 रन बनाए. आयरलैंड के लिए अपना पहला अंतरराष्ट्रीय मैच खेल रहे एंडी मैकब्रायन ने 26 रन देकर दो और जॉर्ज डॉकरैल ने 18 रन देकर दो विकेट हासिल किए. |
| DATE: 2014-03-18 |
| LABEL: sports |
| [555] TITLE: सिंधू और कश्यप हारे, भारतीय चुनौती समाप्त |
| CONTENT: भारत की पी वी सिंधू और परूपल्ली कश्यप को स्विस ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट के सेमीफ़ाइनल में हार का सामना करना पड़ा है. सातवीं वरीयता प्राप्त सिंधू को ग़ैर वरीय चीन की सुन यू ने एक घंटे चार मिनट तक चले मैराथन संघर्ष में 18-21 21-12 और 21-19 से शिकस्त दी. दुनिया की नौवें नंबर की खिलाड़ी सिंधू ने क्वार्टरफ़ाइनल में ऑल इंग्लैंड चैंपियन चीन की शिजियान वांग को हराकर तहलका मचाया था. लेकिन वह विश्व रैंकिंग में 27वें नंबर की सुन यू से पार नहीं पा सकीं. सिंधू ने पहला गेम जीतकर बढ़त बनाई लेकिन वह अगले दोनों गेम हारकर टूर्नामेंट से रुखसत हो गईं. सिंधू की सुन यू के ख़िलाफ़ पांच मुक़ाबलों में यह तीसरी हार है. चीनी खिलाड़ी ने सिंधू को ऑल इंग्लैंड के पहले दौर में भी शिकस्त दी थी. तीसरी सीड कश्यप को भी ग़ैर वरीय खिलाड़ी चीन को होऊवेई तिएन के हाथों 17-21 11-21 से हार का सामना करना पड़ा. इसी के साथ टूर्नामेंट में भारतीय चुनौती समाप्त हो गई है. पूर्व चैंपियन सायना नेहवाल को पहले ही क्वार्टरफ़ाइनल में हार का सामना करना पड़ा था. पुरुष एकल के फ़ाइनल में डेनमार्क के विक्टर एलेक्सन का मुक़ाबला तिएन से होगा जबकि महिला एकल के फ़ाइनल में शीर्ष वरीय चीन की यिहान वांग के सामने हमवतन सुन लू की चुनौती रहेगी. |
| DATE: 2014-03-16 |
| LABEL: sports |
| [556] TITLE: सचिन को 'पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर' का तमग़ा |
| CONTENT: हाल ही में क्रिकेट से रिटायर होने वाले भारत के महान क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को मुंबई में सातवें सालाना ईएसपीएन-क्रिकइंफ़ो अवॉर्ड के आयोजन में पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर का ख़िताब दिया गया. पूर्व और वर्तमान क्रिकेटरों क्रिकेट लेखकों और टिप्पणीकारों की एक उच्चस्तरीय निर्णायक समिति ने ईएसपीएन-क्रिकइंफ़ो की 20वीं वर्षगांठ के मौक़े पर पिछले 20 साल के दौरान सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का चयन किया. यह पुरस्कार वर्ष 1993 से 2013 तक बीस साल के दौरान इस पीढ़ी के महानतम क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए था और इस पुरस्कार के लिए सचिन तेंदुलकर का मुकाबला ऑस्ट्रेलिया के लेग स्पिनर शेन वॉर्न और दक्षिण अफ्रीका के ऑलराउंडर जैक्स कैलिस से था. पाकिस्तान के ऑलराउंडर शाहिद अफरीदी को वेस्टइंडीज के खिलाफ 12 रन देकर सात विकेट लेने के शानदार प्रदर्शन के लिए वनडे बॉलिंग अवॉर्ड दिया गया. इस मैच में शाहिद अफरीदी ने शानदार बल्लेबाजी भी की थी. इससे पहले वर्ष 2009 में भी शाहिद अफरीदी को बेहतरीन वनडे बॉलर का पुरस्कार दिया गया था. बल्लेबाजी से जुड़े दो पुरस्कार हासिल करने में भारतीय खिलाड़ियों ने बाज़ी मारी. पिछले साल मोहाली में शिखर धवन ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ 187 रन की शानदार पारी खेली थी जिसके लिए उन्हें टेस्ट बैटिंग अवॉर्ड दिया गया. रोहित शर्मा को बेंगलूर में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वनडे में दोहरा शतक बनाने के लिए पुरस्कार दिया गया. भारत के मोहम्मद शामी को साल के सर्वश्रेष्ठ नवोदित खिलाड़ी का पुरस्कार दिया गया. ईएसपीएन-क्रिकइंफो अवॉर्ड का यह सातवां साल है. इस मौक़े पर सचिन तेंदुलकर ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद आईसीसी को ज़्यादा से ज़्यादा टेस्ट मैच का आयोजन करना चाहिए तभी टेस्ट क्रिकेट का भविष्य उज्ज्वल हो सकेगा. उन्होंने कहा मुझे पूरा यक़ीन है कि टेस्ट क्रिकेट का दारोमदार अच्छे खिलाड़ियों के हाथों में है और खिलाड़ी आश्चर्यजनक ढंग से खेल रहे हैं. दुनिया भर में ज़्यादातर टेस्ट मैचों में नतीजे आते हैं और बेहद कम मैच ड्रॉ होते हैं. हालांकि उनका कहना था कि किसी भी खिलाड़ी को टेस्ट मैच खेलने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है क्योंकि टेस्ट मैच के लिए किसी खिलाड़ी का मानसिक और तकनीकी रूप से तैयार रहना ज़रूरी है. उनका कहना था कि सीमित ओवर वाले क्रिकेट के प्रभाव से ही हाल के दिनों में इस खेल का विकास हुआ है और ट्वेंटी-20 क्रिकेट टेस्ट क्रिकेट का पूरक बन गया है. उनके मुताबिक़ क्रिकेट से नए खिलाड़ियों को जोड़ने के लिए ट्वेंटी-20 एक बेहतरीन ज़रिया है क्योंकि इसके बाद ही ये खिलाड़ी एकदिवसीय क्रिकेट और टेस्ट क्रिकेट के लिए तैयार हो सकते हैं. मास्टर बलास्टर तेंदुलकर ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से पिछले साल 16 नवंबर को सन्यास ले लिया था. मुंबई के घरेलू मैदान में उन्होंने अपने करियर का 200वां टेस्ट खेलने के साथ क्रिकेट से सन्यास लिया. हाल ही में उन्हें भारत रत्न से भी नवाज़ा गया और वह यह सम्मान पाने वाले पहले खिलाड़ी है. |
| DATE: 2014-03-15 |
| LABEL: sports |
| [557] TITLE: फ़ुटबॉल विश्वकप उद्घाटन में नहीं होंगे भाषण |
| CONTENT: फ़ुटबॉल विश्वकप कराने वाली संस्था फ़ीफ़ा ने कहा है कि इस साल जून में ब्राज़ील में होने वाले विश्व कप के उद्घाटन समारोह में भाषण नहीं होंगे. पिछले साल कन्फ़ेडरेशन कप में ब्राज़ील की राष्ट्रपति डिल्मा रूसेफ़ के उद्घाटन भाषण के दौरान हूटिंग की गई थी. इस कप को विश्वकप का आग़ाज़ माना जाता है. समाचार एजेंसी डीपीए को दिए गए साक्षात्कार में फ़ीफ़ा प्रमुख सेप्प ब्लैटर ने ब्राज़ील में सामाजिक अशांति को लेकर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इस आयोजन के बाद ब्राज़ील में विरोध शांत होने में मदद मिलेगी. इस साल होने वाले विश्वकप और साल 2016 में रियो डि जेनरो में होने वाले ओलिंपिक के लिए कराए जा रहे निर्माण की ऊँची लागत और भ्रष्टाचार की शिकायतों को उन्होंने नकार दिया. विश्वकप में इस्तेमाल होने वाले 12 स्टेडियमों में अब भी निर्माण कार्य जारी है. जिन स्टेडियमों में निर्माण कार्य जारी है उनमें साओ पाओलो का एरिना कोरिंथिरियन भी है. साल 2014 के विश्वकप का उद्घाटन मैच ब्राज़ील और क्रोएशिया के बीच 12 जून को इसी स्टेडियम में खेला जाना है. ब्लैटर ने इस आशंका को भी ख़ारिज किया कि स्टेडियम समय से तैयार नहीं हो पाएँगे. उन्होंने डीपीए से कहा स्टेडियम का सारा काम पूरा हो जाएगा. यह मेरा पहला विश्वकप नहीं है. अंत तक सारे स्टेडियम तैयार हो जाएंगे. ब्लैटर ने उद्घाटन भाषण में भाषणों पर रोक लगाने के निर्णय के बारे में विस्तार से नहीं बताया. पिछले साल कन्फ़ेडरेशन कप के उद्घाटन भाषण में जब रूसेफ़ को हूट किया गया था तब भी ब्लैटर ने उनका बचाव किया था. अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि उद्घाटन समारोह में रूसेफ़ के भाषण को हटाने के निर्णय में ब्राज़ील की सरकार की कोई भूमिका है या नहीं. ब्लैटर ने कहा कि भविष्य में फ़ुटबॉल विश्व कप की मेज़बानी देते समय आयोजक देश में मानव अधिकार की स्थिति का भी ख़्याल रखा जाएगा. फ़ीफ़ा ने जब साल 2018 के विश्व कप की मेज़बानी रूस को और साल 2022 की क़तर को दी थी तो उसकी चयन प्रक्रिया की काफ़ी आलोचना हुई थी. |
| DATE: 2014-03-12 |
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| [558] TITLE: शूमाकर की स्थिति में सुधार के 'आशाजनक संकेत' |
| CONTENT: फ़ॉर्मूला वन के सफलतम ड्राइवरों में से एक माइकल शूमाकर की सेहत में मामूली लेकिन आशाजनक संकेत दिखाई दिए हैं. उनके संबंधियों ने एक बयान में कहा है हमें अब भी उम्मीद है कि माइकल इससे उबरेंगे और जाग जाएंगे. सात बार चैंपियन रह चुके शूमाकर को फ़्रेंच एल्प्स में स्कीइंग के दौरान हुई दुर्घटना में सिर में गंभीर चोट आई थी. उनके मस्तिष्क में आई सूजन कम करने के लिए उन्हें चिकित्सकीय रूप से कोमा में रखा जा रहा है. शूमाकर के मैनेजर सैबाइन केम ने बुधवार को उनके परिवार की तरह से एक विज्ञप्ति जारी की क्योंकि फार्मूला वन सत्र की शुरुआत के मद्देनज़र उनकी सेहत को लेकर सभी की दिलचस्पी बढ़ गई थी. परिवार ने ग्रेनेबल अस्पताल में फ्रांसीसी डॉक्टरों के प्रयासों की तारीफ़ की साथ ही कहा कि यह समय काफी धैर्य रखने का है. बयान में कहा गया है यह शुरुआत से ही साफ़ था कि यह माइकल के लिए एक लंबी और कठिन लड़ाई है. हादसे की जांच कर रहे अधिकारियों का कहना है कि शूमाकर के दुर्घटना का शिकार होने से पहले उनकी गति अच्छे स्कीअर की रही होगी. फिर वह गिर गए और पत्थर से टकरा गए. विशेषज्ञों ने शूमाकर के स्कीइंग उपकरण और उनके हेलमेट में लगे कैमरे की फ़ुटेज के आधार पर दुर्घटना का दृश्य पुनर्निर्मित किया ताकि दुर्घटना के कारणों का पता चल सके. फ़ॉर्मूला वन रेसिंग में 19 साल के करियर के बाद शूमाकर 2012 में रिटायर हो गए थे. उन्होंने बेनेटन के साथ 1994 और 1995 में खिताब जीते थे. 1996 में उन्होंने फ़ेरारी के साथ रेसिंग शुरू की और 2000 तक लगातार पाँच ख़िताब जीते. |
| DATE: 2014-03-12 |
| LABEL: sports |
| [559] TITLE: शूमाकर की स्थिति में 'कोई बदलाव नहीं' |
| CONTENT: फ़ॉर्मूला वन के सफलतम ड्राइवरों में से एक माइकल शूमाकर का इलाज कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि वे शूमाकर को कोमा से निकालने की कोशिश कर रहे हैं. सात बार चैंपियन रह चुके शूमाकर को फ़्रेंच एल्प्स में स्कीइंग के दौरान हुई दुर्घटना में सिर में गंभीर चोट आई थी. शुक्रवार को उनकी मैनेजर सबीन केहम ने एक वक्तव्य में कहा था उन्हें कोमा से निकालने की प्रक्रिया जारी है और माइकल की स्थिति अब भी नहीं बदली है. उनके मस्तिष्क में आई सूजन को कम करने के लिए उन्हें चिकित्सकीय रूप से कोमा में रखा जा रहा है. पिछले महीने शूमाकर के परिवार ने पूरा भरोसा जताते हुए कहा था कि वह ठीक हो जाएंगे और परिवार ये समझता है कि कोमा से निकलने में उन्हें लंबा समय लगेगा. उस दुर्घटना की जांच कर रहे अधिकारियों का कहना है कि शूमाकर के दुर्घटना का शिकार होने से पहले उनकी गति अच्छे स्कीअर की रही होगी और फिर वह गिर गए तथा पत्थर से टकरा गए. विशेषज्ञों ने शूमाकर के स्कीइंग उपकरण और उनके हेलमेट में लगे कैमरे की फ़ुटेज के आधार पर दुर्घटना का दृश्य पुनर्निर्मित किया ताकि दुर्घटना के कारणों का पता चल सके. फ़ॉर्मूला वन रेसिंग में 19 साल के करियर के बाद शूमाकर 2012 में रिटायर हो गए थे. उन्होंने बेनेटन के साथ 1994 और 1995 में खिताब जीते थे. 1996 में उन्होंने फ़ेरारी के साथ रेसिंग शुरू की और 2000 तक लगातार पाँच ख़िताब जीते. |
| DATE: 2014-03-07 |
| LABEL: sports |
| [560] TITLE: अफ़ग़ानिस्तान से जीत पाएगा भारत? |
| CONTENT: बांग्लादेश में खेले जा रहे एशिया कप में बुधवार को जब भारतीय क्रिकेट टीम अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ अपना आखिरी राउंड रॉबिन लीग मैच खेलने के लिए मीरपुर में उतरेगी तो उस पर हार-जीत का दबाव नहीं होगा. भारतीय टीम पहले श्रीलंका और उसके बाद पाकिस्तान से हारने के कारण फ़ाइनल की दौड़ से बाहर हो चुकी है. श्रीलंका और पाकिस्तान की टीमें 8 मार्च को होने वाले फ़ाइनल में अपनी जगह बना चुकी है. भारत ने एशिया कप में मेज़बान बांग्लादेश को 6 विकेट से हराकर जीत के साथ शुरूआत की थी. 280 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारत ने एक ओवर पहले जीत हासिल की. कप्तान विराट कोहली ने 136 रनों की शतकीय पारी खेली तो अजिंक्य रहाणे ने 73 रन बनाए. उस मैच में भारतीय गेंदबाज़ बांग्लादेश की टीम को ऑलआउट नही कर सके थे तभी उनकी क्षमता पर सवाल खडे हो गए थे. मोहम्मद शमी ने ज़रूर चार विकेट हासिल किए लेकिन भुवनेश्वर कुमार और वरूण एरॉन बांग्लादेशी बल्लेबाज़ों पर कुछ ख़ास दबाव नहीं बना पाए थे. भारत का अगला मुक़ाबला श्रीलंका से था. इस मैच में शिखर धवन ने 94 रनों की पारी खेली लेकिन उनके जोड़ीदार रोहित शर्मा केवल 13 रन ही बना सके. अजिंक्य रहाणे दिनेश कार्तिक अंबाती रायडू और रवींद्र जाडेजा बड़ा स्कोर नहीं बना सके. विराट कोहली ने एक बार फिर 48 रनों की जुझारू पारी खेली. 264 रन हालांकि कोई बहुत बड़ा स्कोर नहीं होता लेकिन असमान उछाल वाले विकेट पर भारतीय गेंदबाज़ निर्णायक क्षणों में विकेट लेने में नाकाम रहे नतीजा निकला हार में. भारत की जीत की राह में रोड़ा बने विकेटकीपर बल्लेबाज़ कुमार संगकारा जिन्होंने 103 रनों की शतकीय पारी खेली. एशिया कप में अगले मैच में भारत और पाकिस्तान आमने-सामने हुए. अब भले ही भारतीय कप्तान विराट कोहली ये कहें कि मुक़ाबला ज़ोरदार हुआ आखिरी ओवर तक चला लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि भारतीय बल्लेबाज़ अच्छी शुरूआत मिलने के बाद ग़ैरज़िम्मेदाराना शॉट खेलकर अपने विकेट देते रहे. रोहित शर्मा अजिंक्य रहाणे और दिनेश कार्तिक छक्के लगाने की कोशिश में कैच आउट हुए. हालांकि इस तरह आउट होकर विकेट गंवाने में पाकिस्तानी बल्लेबाज़ भी कम नहीं रहे लेकिन शाहिद अफ़रीदी ने आखिरी ओवर में जो दो छक्के लगाए उन्होंने पाकिस्तान को जीत दिला दी. श्रीलंका और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ हार से यह भी साबित हो गया कि भारतीय टीम में एक भी ऐसा गेंदबाज़ नहीं है जो स्लॉग ओवर में किफ़ायती गेंदबाज़ी कर सके. अब भारतीय टीम एक ऐसी टीम है जिसके बल्लेबाज़ एक के बाद एक नाकाम हो रहे हैं और गेंदबाज़ भी बेअसर हैं. दूसरी तरफ़ पहली बार एशिया कप खेल रही अफ़ग़ानिस्तान के हौसले मेज़बान बांग्लादेश को 32 रन से हराने के बाद बुलंद हैं. वैसे अफ़ग़ानिस्तान अपने पिछले मैच में श्रीलंका से 129 रनों के विशाल अंतर से हारा लेकिन वह अपने आखिरी मैच में अपना सब कुछ झोंक देना चाहेगा. भारतीय टीम अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ टीम में शायद अधिक बदलाव न करे लेकिन चेतेश्वर पुजारा को कम से कम एक अवसर तो दिया ही जा सकता है. अब इस मैच में अगर भारतीय टीम एक असरदार जीत हासिल करती है तो अपने प्रशंसकों को पूरी तरह नाउम्मीद और मायूस होने से तो बचा ही सकती है. |
| DATE: 2014-03-05 |
| LABEL: sports |
| [561] TITLE: बांग्लादेश को हरा पाकिस्तान फ़ाइनल में |
| CONTENT: शाहिद अफ़रीदी के तूफ़ानी 59 रनों की मदद से पाकिस्तान ने मेज़बान बांग्लादेश को तीन विकेट से हराकर एशिया कप क्रिकेट टूर्नामेंट के फ़ाइनल में अपनी जगह पक्की कर ली है. पाकिस्तान के सामने जीत के लिए 327 रनों का विशाल लक्ष्य था जो उसने केवल एक गेंद बाकी रहते हासिल कर लिया. एक समय 225 रनों पर पांच विकेट खोने वाली पाकिस्तान टीम पर हार का ख़तरा मंडरा रहा था और तब तक 41-2 ओवर हो चुके थे. ऐसे में मोर्चा संभाला शाहिद अफ़रीदी ने और उन्होंने केवल 25 गेंदों पर दो चौके और सात छक्के लगाते हुए मैच का रुख़ पाकिस्तान की तरफ़ मोड़ दिया. अफ़रीदी का बख़ूबी साथ दिया फ़वाद आलम ने जिन्होंने 74 रन बनाए. यह पाकिस्तान के क्रिकेट इतिहास में पहला अवसर है जब उसने एक दिवसीय क्रिकेट में इतना बड़ा लक्ष्य हासिल किया. वैसे पाकिस्तान की जीत में उसके सलामी बल्लेबाज़ अहमद शहज़ाद की भी अहम भूमिका रही जिन्होंने 103 रनों की ज़ोरदार शतकीय पारी खेली. इससे पहले बांग्लादेश ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए निर्धारित 50 ओवर में तीन विकेट खोकर 326 रन बनाए. बांग्लादेश के सलामी बल्लेबाज़ अनामुल हक़ ने पूरे सौ रनों की शतकीय पारी खेली. उनके अलावा इमरुल कैयस ने 59 मोमिनुल हक़ ने 51 और मुश्फिकुर रहीम ने नाबाद 51 रन बनाए. पाकिस्तान की जीत के साथ ही अब एशिया कप क्रिकेट टूर्नामेंट का फ़ाइनल मुक़ाबला भी तय हो गया है जो आठ तारीख़ को श्रीलंका और पाकिस्तान के बीच खेला जाएगा. वहीं बुधवार को भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच होने वाला मुक़ाबला महज़ औपचारिक बनकर रह गया है. बांग्लादेश पर जीत हासिल करने के बाद एशिया कप क्रिकेट टूर्नामेंट की अंक तालिका में अब पाकिस्तान और श्रीलंका के 13-13 अंक हैं. |
| DATE: 2014-03-04 |
| LABEL: sports |
| [562] TITLE: अब टेनिस की भी प्रीमियर लीग |
| CONTENT: क्रिकेट की आईपीएल की तर्ज़ पर अब टेनिस खिलाड़ियों की इंटरनेशनल टेनिस प्रीमियर लीग शुरू होने जा रही है. रविवार शाम को दुबई में इस लीग के लिए टेनिस खिलाड़ियों की नीलामी हुई. भारत के जाने-माने टेनिस खिलाड़ी महेश भूपति इस लीग के मुख्य सूत्रधार हैं और उनके ड्रीम प्रोजेक्ट में कई वर्तमान और पूर्व महान खिलाड़ी नीलामी का हिस्सा बने. इंटरनेशनल टेनिस प्रीमियर लीग का आयोजन 28 नवंबर से 14 दिसंबर के बीच किया जाएगा. यह लीग सिंगापुर में शुरू होगी और आखिरी मुक़ाबले दुबई में खेले जाएंगे. इसके अलावा मुंबई और बैंकॉक में भी मैच खेले जाएंगे. इस लीग में चार टीमें हिस्सा लेंगी. इनमें मुंबई सिंगापुर बैंकाक और दुबई की टीम शामिल है. रविवार को खिलाड़ियों की नीलामी में टीम मालिकों ने 2-39 करोड़ डॉलर खर्च किए. मुंबई की टीम में राफ़ेल नडाल अमरीका के पूर्व खिलाड़ी पीट सैम्प्रास और भारत की सानिया मिर्ज़ा शामिल हैं. सिंगापुर की टीम में अमरीका की सेरेना विलियम्स और पुरूष खिलाड़ी के रूप में टॉमस बर्डिच और पैट्रिक राफ्टर हैं. बैंकॉक की टीम में ब्रिटेन के एंडी मरे बेलारूस की विक्टोरिया अज़ारेंका स्पेन के कार्लोस मोया और दुबई की टीम में नोवाक जोकोविच गोरान इवानोसोविच जैसे धुरंधर खिलाड़ी शामिल हैं जो अपनी तेज़-तर्रार सर्विस के दम पर ही मैच जीतने की काबलियत दिखा चुके हैं. इस लीग का हर मैच पांच सेट में खेला जाएगा. मुक़ाबले पुरूष एकल महिला एकल पुरुष युगल और मिश्रित युगल वर्ग में खेले जाएंगे और इसके बाद भी अगर स्कोर बराबर रहता है तो पांचवा सेट लिजेंड्स के बीच खेला जाएगा. भारत के पूर्व डेविस कप खिलाड़ी और फिलहाल डेविस कप टीम के कोच ज़ीशान अली कहते हैं इसकी शुरूआत की बात तो दो-तीन साल से चल रही थी लेकिन बात सिरे नही चढ़ रही थी. अब महेश भूपति इसे शुरू करने जा रहे हैं तो इससे भारतीय टेनिस को भी लाभ होगा. ज़ीशान अली कहते हैं कि टेनिस में भी बहुत पैसा है. हालांकि भारत में क्रिकेट में अधिक पैसा लगा है. इस लीग में दुनिया भर के जो शीर्ष खिलाड़ी खेलेंगे वह कोई छोटी-मोटी रक़म के लिए नही खेलेंगे. इसके अलावा जिन टीम मालिकों ने खिलाड़ियों की नीलामी पर मोटा पैसा लगाया है वह जानते है कि इसका दुगना पैसा उन्हे वापस मिलेगा. ज़ीशान कहते हैं इस टेनिस लीग में गोरान इवानोसेविच और पीट सैमप्रास जैसे खिलाड़ियों को फिर से खेलते हुए देखने का मज़ा ही कुछ और होगा. सैम्प्रास को तो मैंने भी टूर्नामेंट खेलते हुए हराया है लेकिन आज के युवा खिलाड़ियों ने उन्हें खेलते हुए नही देखा है तो यह उनके लिए भी अच्छा अनुभव होगा. इस लीग में भारत की सानिया मिर्ज़ा और रोहन बोपन्ना भी खेलते हुए नज़र आएंगे. कम भारतीय खिलाड़ियों की मौजूदगी के सवाल पर ज़ीशान अली कहते हैं कि एक टीम में पांच या छह खिलाड़ी ही होंगे और वह भी शीर्ष स्तर के. ऐसे में कम रैंकिंग वाले भारतीय खिलाड़ी अधिक संख्या में नही खेल सकते. |
| DATE: 2014-03-04 |
| LABEL: sports |
| [563] TITLE: ग्रैम स्मिथ ने की संन्यास की घोषणा |
| CONTENT: दक्षिण अफ़्रीक़ी क्रिकेट टीम के कप्तान ग्रैम स्मिथ ने घोषणा की है कि वह ऑस्ट्रेलिया के साथ तीसरे टेस्ट मैच के बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह देंगे. न्यूलैंड में 33 साल के स्मिथ दक्षिण अफ़्रीक़ा की तरफ़ से 347वां मैच खेल रहे हैं इसमें उनके 117 टेस्ट मैच भी शामिल हैं. उन्होंने 109 टेस्ट मैंचों में कप्तानी की है जो एक रिकॉर्ड है. स्मिथ ने कहा मेरी ज़िंदगी का यह सबसे मुश्किल फ़ैसला था. मैं इस फ़ैसले के बारे में अप्रैल महीने में अपने घुटने की सर्जरी के बाद से सोच रहा था. मैंने यह निर्णय अपने परिवार को ध्यान में रख कर किया है. अपने घरेलू मैदान पर ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध खेल रहे स्मिथ ने अपने पूरे करियर में 48-72 की औसत से 9257 रन बनाए हैं. दक्षिण अफ़्रीक़ा की तरफ़ से टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ियों में जैक कैलिस के बाद उनका ही स्थान है. जैक कैलिस ने 13289 रन बनाए हैं. अपने टेस्ट करियर का अंतिम मैच खेल रहे स्मिथ ने कहा मैं अपने माता-पिता भाई मेरी पत्नी बच्चों अपने दोस्तों आयोजकों प्रशंसकों और क्रिकेट साउथ अफ़्रीक़ा का तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहूंगा. उन्होंने आगे कहा मैं अपने साथ खेलने वाले खिलाड़ियों का शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्होंने मेरा साथ दिया और कप्तान के साथ-साथ वह इंसान बनने में मेरी मदद की जो मैं आज हूँ. 2003 में टेस्ट क्रिकेट की कप्तानी संभालने से पहले स्मिथ ने केवल आठ टेस्ट मैच खेले थे. उन्होंने 22 साल की उम्र में दक्षिण अफ़्रीक़ी क्रिकेट टीम की कप्तानी संभाली जब उनकी टीम घरेलू विश्वकप के पहले दौर में बाहर हो गई थी. उनकी कप्तानी में दक्षिण अफ़्रीक़ा की टीम 2012 में टेस्ट रैंकिंग में सबसे शीर्ष पर पहुंची. स्मिथ कहते हैं मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे दुनिया की सबसे अच्छी टेस्ट टीम की कप्तानी करने और उसका हिस्सा बनने का मौक़ा मिला. क्रिकेट साउथ अफ़्रीक़ा के प्रमुख हारुन लोरगाट ने कहा वह एक शक्तिशाली योद्धा नेतृत्वकर्ता और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का असाधारण हिस्सा थे. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से उनके संन्यास की घोषणा जैक कैलिस के टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहने के दो महीने बाद हुई है. ग्रैम स्मिथ ने कहा मैं इन लम्हों को जीवन भर याद रखूंगा आपका सभी का दिल से बहुत-बहुत शुक्रिय |
| DATE: 2014-03-04 |
| LABEL: sports |
| [564] TITLE: अरविंद ने जीता जर्मन ओपन |
| CONTENT: भारत के अरविंद भट ने शानदार प्रदर्शन करते हुए जर्मन ओपन ग्रां प्री गोल्ड बैडमिंटन टूर्नामेंट का ख़िताब जीत लिया है. दो बार के राष्ट्रीय चैंपियन अरविंद ने ख़िताबी मुक़ाबले में 12वीं सीड और दुनिया के 25वें नंबर के खिलाड़ी डेनमार्क के हांस क्रिस्टियन विटिनगस को तीन गेमों में 24-22 19-21 और 21-11 से शिकस्त दी. जर्मनी के मुलहाइम अन डेर रूर में खेले गए एक लाख 20 हज़ार डॉलर इनामी राशि के इस टू्र्नामेंट में 34 साल के भट ने अपने ख़िताब तक के सफ़र में पहले राउंड को छोड़कर हर बार अपने से ऊँची रैंकिंग के खिलाड़ी को हराया. बंगलौर के बट का यह पाँच साल और नौ महीने के बाद पहला ख़िताब है. पहली बार किसी भारतीय ने जर्मन ओपन पर क़ब्ज़ा किया है. एक घंटे तक चले ख़िताबी मुक़ाबले के पहले गेम में दोनों खिलाड़ियों के बीच ज़बर्दस्त संघर्ष देखने को मिला. भट ने 18-20 से पिछड़ने के बाद चार गेम प्वाइंट बचाते हुए इसे 24-20 से जीत लिया. दूसरे गेम में भट ने एक समय 13-7 और फिर 17-12 की बढ़त बनी ली थी लेकिन विटिनगस ने फिर 11 में से नौ अंक जीतते हुए मैच मे 1-1 की बराबरी कर ली. निर्णायक गेम में भट ने 12-11 की बढ़त के बाद लगातार नौ अंक जीतकर ख़िताब अपनी झोली में समेट लिया. |
| DATE: 2014-03-03 |
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| [565] TITLE: भारत कैसे पहुंचेगा फ़ाइनल में |
| CONTENT: एशिया कप के फ़ाइनल में भारत को उसके खिलाड़ी नहीं बल्कि दूसरी टीमों का दुर्भाग्य ही पहुंचा सकता है. पाकिस्तान पहले ही एक बोनस अंक के साथ अब 9 अंक अपने खाते में जोड़ चुका है. दूसरी तरफ भारत के पास केवल 4 अंक हैं. दोनों टीमों को एशिया कप में अब केवल एक-एक मैच खेलना है. भारत का मुक़ाबला अफ़ग़ानिस्तान से और पाकिस्तान का सामना बांग्लादेश से होना है. अगर भारत अफ़ग़ानिस्तान को बोनस अंक के साथ हराए और दूसरी तरफ पाकिस्तान बांग्लादेश से एक बड़े अंतर से हार जाए तभी भारत फ़ाइनल में पहुंच सकता है. अन्यथा पाकिस्तान और श्रीलंका का फ़ाइनल में भिड़ना लगभग तय है. पिछले दिनों दक्षिण अफ्रीका और न्यूज़ीलैंड में जब भारतीय टीम एक के बाद एक मैच हार रही थी तब कहा जा रहा था कि भारतीय खिलाड़ी दक्षिण एशिया के बाहर अच्छा नहीं खेल पाते हैं. अब तो एशिया कप में भारतीय टीम के निराशाजनक प्रदर्शन ने साबित कर दिया है कि दक्षिण एशिया में खेलना भी भारत के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. भारतीय टीम में अब कई बदलाव की ज़रूरत है. भारतीय सलामी जोड़ी शिखर धवन और रोहित शर्मा इन दिनों एक बड़ी शुरुआत देने में नाक़ाम रहे हैं. दो-तीन मैचों में शिखर धवन ने कुछ बड़ा स्कोर ज़रूर बनाया है लेकिन उनके प्रदर्शन में अभी निरंतरता नहीं है. कुछ यही हाल रोहित शर्मा का है. मध्यक्रम में रवींद्र जड़ेजा अंबाती रायडू और अंजिक्य रहाणे का भी लगभग यही हाल है. रहाणे फिर भी कुछ ठीकठाक खेल रहे हैं लेकिन पूरी भारतीय टीम इस समय कप्तान विराट कोहली पर ही निर्भर नज़र आती है. कप्तानी के दबाव में एशिया कप में विराट भी प्रभावित होते नज़र आ रहे हैं और वैसे भी केवल दो खिलाड़ियों के दम पर कोई टीम भला कैसे जीत सकती है. इसके अलावा भुवनेश्वर कुमार अब बेहद साधारण गेंदबाज़ नज़र आते हैं. वहीं रवींद्र जडेजा को किसी भी सूरत में विशेषज्ञ स्पिनर नहीं कहा जा सकता है. इसके अलावा टीम के कोचिंग स्टाफ पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं. यही हाल पाकिस्तान का भी है लेकिन जब दो टीमें खेलेंगी तो कोई एक टीम तो जीतेगी ही. पाकिस्तान ने भी कोई प्रभावशाली अंदाज़ में भारत से जीत हासिल नहीं की. पाकिस्तान के कप्तान मिसबाह-उल-हक़ अपनी बल्लेबाज़ी के दम पर टीम की धुरी ज़रूर बने हुए हैं लेकिन लगातार तीन मैचों में रन आउट होने से उनकी टीम संकट में फंसती रही है. पाकिस्तान के सलामी बल्लेबाज़ शरजील ख़ान और अहमद शहज़ाद इन दिनों अच्छी फॉर्म में हैं लेकिन पाकिस्तान के पास मोहम्मद हफ़ीज़ के रूप में इन दिनों एक बेहतरीन ऑल राउंडर है. भारत के ख़िलाफ़ मोहम्मद हफ़ीज़ ने 75 रनों की पारी खेलकर दिखा दिया कि वो कितने अच्छे बल्लेबाज़ भी हैं. वैसे एशिया कप में अभी तक किसी टीम ने अपना दबदबा दिखाया है तो वह है श्रीलंका. कुमार संगकारा महिला जयवर्धने लाहिरु थिरीमन्ने और कप्तान एंजेलो मैथ्यूज़ अपनी बल्लेबाज़ी के दम पर टीम को मैच जिताने की क्षमता रखते हैं तो लसिथ मलिंगा ने दिखा दिया है कि भले ही उनकी रफ़्तार में कमी आई है. उनके यॉर्कर आज भी ख़तरनाक हैं. लिहाज़ा श्रीलंका इस टूर्नामेंट को जीतने का सबसे बड़ा दावेदार माना जा सकता है. |
| DATE: 2014-03-03 |
| LABEL: sports |
| [566] TITLE: पहली बार द. अफ्रीका ने जीता 'क्रिकेट वर्ल्ड कप' |
| CONTENT: पाकिस्तान को हरा कर दक्षिण अफ्रीका ने अंडर-19 वर्ल्ड कप का खिताब अपनी झोली में डाल लिया है. यह पहला मौका है जब क्रिकेट के किसी भी तरह के क्रिकेट के प्रारूप में दक्षिण अफ्रीकी टीम ने वर्ल्ड कप ख़िताब पर कब्ज़ा किया है. युवा कप्तान एडन मरक्रम की पारी और कॉर्बिन बॉश की शानदार गेंदबाज़ी के दम पर दक्षिण अफ्रीका ने ये कारनामा कर दिखाया. दुबई इंटरनेशनल स्टेडियम में हुए फाइनल मुकाबले में पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए दक्षिण अफ्रीकी टीम के सामने 132 रन का लक्ष्य रखा. लेकिन कप्तान एडन मरक्रम की नाबाद 66 रन की नाबाद पारी के दम पर दक्षिण अफ्रीका ने इस लक्ष्य को चार विकेट के नुकसान पर 42-1 वें ओवर में ही हासिल कर लिया. दक्षिण अफ्रीका को पहला झटका अमाद बट्ट ने दिया. सलामी बल्लेबाज़ क्लाइड फॉर्टुइन सिर्फ एक रन बनाकर कैच आउट हुए. इसके बाद स्मिथ भी 9 रन बनाकर पवैलियन लौट गए. एडन के बाद अगर किसी ने सबसे ज़्यादा रन बनाए तो वो थे ओल्डफ़ील्ड. उन्होंने 40 रन बनाए. पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए दक्षिण अफ्रीका के सामने जीत के लिए 132 रन लक्ष्य दिया. टॉस जीतकर पहले बैटिंग करने उतरी पाकिस्तानी टीम का प्रदर्शन बेहद खराब रहा. कॉर्बिन बॉश की घातक गेंदबाजी के चलते एक समय पाकिस्तान का स्कोर 72 रन पर 7 विकेट था. ज़फर गौहर और अमाद बट्ट ने पारी को संभालने की कोशिश की लेकिन 44-3 ओवरों में पूरी टीम 131 रन ही जुटा सकी. पाकिस्तान की ओर से सबसे ज़्यादा रन अमाद बट्ट ने ही बनाए. उन्होंने 37 रनों का योगदान दिया. दक्षिण अफ्रीका के लिए बॉश ने 15 रन देकर 4 विकेट झटके. मैन ऑफ द मैच रहे कॉर्बिन बॉश और मैन ऑफ सिरीज़ का ख़िताब मिला एडन मरक्रम को. |
| DATE: 2014-03-01 |
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| [567] TITLE: फुटबॉल विश्वकप पर वेब 'ख़तरा' |
| CONTENT: ब्राज़ील से मिल रही ख़बरों में कहा गया है कि इसी वर्ष जून में होने वाले फ़ीफ़ा विश्वकप के आयोजन में कुछ लोग इंटरनेट के ज़रिए बाधा पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं. कुछ अज्ञात लोगों ने एक समूह बनाया है जिसने आधिकारिक वेबसाइटों को निशाना बनाने की चेतावनी दी है. फ़ुटबॉल विश्व कप के आयोजन के ख़िलाफ़ ब्राज़ील में विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं. कुछ लोग इस महंगे आयोजन को फ़िज़ूलख़र्ची बता रहे हैं. फ़ीफ़ा विश्वकप के आयोजन पर 8-4 अरब पाउंड की लागत आने का अनुमान है. वहीं ब्राज़ील की सेना भी स्वीकार कर चुकी है कि वह इस आयोजन को पूरी तरह से सुरक्षा मुहैया नहीं करा सकेगी. सेना का यह भी कहना है कि वह संभावित ख़तरों से निपटने के लिए तैयार रहेगी. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने ऐसे ही एक प्रदर्शनकारी एडुरडा डायोरेट्टो के हवाले से ख़बर दी है. हमने अपनी योजना पहली ही बना ली है. मुझे नहीं लगता है कि हमें रोकने के लिए वह बहुत कुछ कर सकते हैं. ख़बरों के मुताबिक़ आयोजन का विरोध कर रहे इन लोगों का कहना है कि फ़ीफ़ा विश्वकप दुनियाभर के दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र होगा. यह फ़ीफ़ा ब्राज़ील की सरकार और कॉर्पोरेट प्रायोजकों की वेबसाइटों को निशाना बनाने का अच्छा अवसर होगा. अपना नाम चे कोमोडोरे बताने वाले एक प्रदर्शनकारी का कहना है आधिकारिक वेबसाइट और प्रायोजक कंपनियों की वेबसाइट पर हमला किया जाएगा. कोमोडोरे ने रॉयटर्स को बताया यह सब कुछ बड़ी तेज़ी से होगा. इससे नुक़सान पहुंचेगा और करने में यह सब अपेक्षाकृत सरल भी होगा. उनका कहना है कि ब्राज़ील के आम लोगों को परेशान नहीं किया जायेगा. संभावित ख़तरे के मद्देनज़र ब्राज़ील की सरकार ने भी कुछ तैयारियां की हैं लेकिन कोमोडोरे का कहना है कि वह अपनी सफलता के प्रति आश्वस्त हैं. इसी तरह अपना नाम बिली डे बताने वाले एक प्रदर्शनकारी का कहना है इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है. सुरक्षा बहुत कम रहती है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स का कहना है कि उसने इस तरह के जिन प्रदर्शनकारियों से ऑनलाइन सम्पर्क किया उनकी असल पहचान की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है. ब्राज़ील की साइबर कमांड के प्रमुख डोस सेंटोस का कहना है किसी भी देश के लिए यह कहना मुश्किल है कि वह किसी ख़तरे से निपटने के लिए सौ प्रतिशत तैयार है. लेकिन संभावित साइबर ख़तरों से निपटने की तैयारी कर ली गई है. वहीं फ़ीफ़ा के एक प्रवक्ता ने ऑनलाइन सिक्योरिटी के बारे में किसी तरह की टिप्पणी करने से इंकार कर दिया. |
| DATE: 2014-03-01 |
| LABEL: sports |
| [568] TITLE: भारत को 280 रन की चुनौती |
| CONTENT: एशिया कप के पहले मैच में भारत के सामने बांग्लादेश ने 280 रन बनाने का लक्ष्य रखा है. बांग्लादेश के लिए कप्तान मुशफ़ीकुर रहीम ने शानदार शतक बनाया. अनामुल ने अर्धशतक बनाया. बांग्लादेश की शुरुआत अच्छी नहीं रही उसके पहले दो विकेट सिर्फ़ 49 रन पर गिर गए थे. सात रन बनाने वाले शम्सुर के बाद मोमिनुल हक़ सिर्फ़ 23 बनाकर आउट हो गए थे. इसके बाद अनामुल और मुशफ़ीकर ने मिलकर तीसरे विकेट के लिए 133 रन जोड़े. मुशफ़ीकुर ने 117 रन बनाए और अनामुल ने 77 रन बनाए. बांग्लादेश के लिए ज़ियाउर रहमान ने 18 और नईम इस्लाम ने 14 रन बनाए. भारत के गेंदबाज़ वरुण एरॉन ख़ासे महंगे साबित हुए. वरुण ने 7-5 ओवर में 74 रन दिए और उन्हें सिर्फ़ एक विकेट हासिल हुआ. एरॉन ने मुशफ़ीकर रहीम को एक बीमर भी फेंकी थी जो उनकी छाती पर लगी. इसके बाद एरॉन को गेंदबाज़ी से हटा लिया गया. मोहम्मद शामी सबसे कामयाब रहे उन्होंने 10 ओवर में 50 रन देकर चार विकेट लिए. इससे पहले भारत के कप्तान विराट कोहली ने टॉस जीता और पहले गेंदबाज़ी करने का फ़ैसला किया. विराट कोहली पहली बार किसी बड़े टूर्नामेंट में भारत की कप्तानी कर रहे हैं. |
| DATE: 2014-02-26 |
| LABEL: sports |
| [569] TITLE: कोहली की कप्तानी में जीत से हो पाएगी शुरुआत? |
| CONTENT: एशिया कप क्रिकेट टूर्नामेंट में बुधवार को भारत और मेज़बान बांग्लादेश आमने-सामने होंगे. पांच बार की चैंपियन भारतीय टीम इस बार विराट कोहली की कप्तानी में उतरी है क्योंकि भारत के नियमित कप्तान महेंद्र सिंह धोनी चोटग्रस्त हैं. विराट कोहली सीनियर स्तर पर पहली बार किसी टूर्नामेंट में भारत की कप्तानी कर रहे हैं इसलिए उन पर ख़ास तौर से नज़रें टिकी हैं. इससे पहले वह वेस्टइंडीज़ और ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ भारत की कमान संभाल चुके हैं. टूर्नामेंट का पहला मैच मंगलवार को पाकिस्तान और श्रीलंका के बीच खेला गया जिसमें श्रीलंका को 12 रनों से जीत मिली. इस टूर्नामेंट में जो पांच टीमें हिस्सा ले रही हैं उनमें अफ़ग़ानिस्तान भी शामिल है. विराट पहली बार तब चर्चा में आए थे जब उनकी कप्तानी में भारत ने अंडर-19 विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट जीता था. एक कप्तान के तौर पर विराट अभी तक आठ मैचों में भारत की कप्तानी कर चुके है जिनमें सात मैच भारत ने जीते और एक मैच में उसे हार का सामना करना पडा. एकदिवसीय क्रिकेट में एक बल्लेबाज़ के रूप में विराट का रिकॉर्ड दमदार है. विराट अभी तक 130 एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुके हैं. उन्होंने 18 शतक और 30 अर्धशतक जमाए हैं. विराट ने 51. 85 के प्रभावी औसत से 5445 रन बनाए हैं. भारत और बांग्लादेश की तुलना करें तो भारतीय टीम ख़ासी मज़बूत रही है लेकिन बांग्लादेश ने भी कई उलटफेर किए हैं. साल 2012 में खेले गए पिछले एशिया कप में तो बांग्लादेश फाइनल तक पहुंचा जहां उसे पाकिस्तान ने मुश्किल से दो रन से हराया. इसके अलावा बांग्लादेश की टीम ने हाल ही में श्रीलंका के ख़िलाफ़ टेस्ट और एकदिवसीय सिरीज़ खेली है जिसमें भले ही उसे हार का सामना करना पड़ा लेकिन उसके खिलाड़ियों की तैयारी अच्छी है. अगर भारत के पास शिखर धवन रोहित शर्मा कप्तान विराट कोहली अजिंक्य रहाणे दिनेश कार्तिक रविंद्र जडेजा अंबाती रायडू और चेतेश्वर पुजारा जैसे अच्छे बल्लेबाज़ हैं तो बांग्लादेश के पास कप्तान मुशफ़िकुर रहीम के रूप में अनुभवी और शानदार बल्लेबाज़ है. सलामी बल्लेबाज़ अनामुल हक़ और शमसुर रहमान भी अच्छी शुरुआत देने में माहिर हैं. बांग्लादेश को एशिया कप शुरू होने से पहले तब बड़ा झटका लगा जब उसके भरोसेमंद बल्लेबाज़ तमीम इक़बाल चोट के कारण टूर्नामेंट से बाहर हो गए. ऑलराउंडर शाकिब अल हसन टीवी पर अभद्र इशारे के कारण तीन मैच के प्रतिबंध का सामना कर रहे हैं और एशिया कप के शुरुआती दो मैचों में नहीं खेलेंगे. गेंदबाज़ी में भारत के पास भुवनेश्वर कुमार मोहम्मद शामी और ऑफ़ स्पिनर आर अश्विन के रूप में तेज़ और स्पिन का मिश्रण है जबकि लेफ्ट आर्म स्पिनर रवींद्र जडेजा भी स्पिन का दायित्व संभालेंगे. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या लेग स्पिनर अमित मिश्रा को अवसर मिलेगा या नहीएशिया कप में विराट कोहली के सामने जहां भविष्य के कप्तान के रूप में ख़ुद को स्थापित करने का अवसर होगा तो वहीं टीम इंडिया के पास इस सत्र में पहली जीत करने का मौका होगा. |
| DATE: 2014-02-26 |
| LABEL: sports |
| [570] TITLE: अंडर-19: इंग्लैंड को हरा पाकिस्तान फ़ाइनल में |
| CONTENT: पाकिस्तान ने इंग्लैंड को तीन विकेट से हराकर अंडर-19 टूर्नामेंट के फाइनल में जगह बना ली है. दुबई में सोमवार को खेले गए पहले सेमीफ़ाइनल में पाकिस्तान को जीत के लिए 205 रन का लक्ष्य मिला था. पाकिस्तान ने 142 रन पर अपना सातवां विकेट गंवाया तब लगा कि मैच उसके हाथ से निकल गया है. लेकिन ज़फ़र गौहर और अमद बट्ट ने संयम के साथ खेलते हुए आठवें विकेट के लिए 63 रन की अविजित साझेदारी करते हुए अपनी टीम को पांच गेंदें शेष रहते जीत की मंजिल पर पहुँचा दिया. गौहर ने नाबाद 37 और बट्ट ने नाबाद 26 रन बनाए. गौहर को उनके शानदार खेल क लिए मैन ऑफ़ द मैच का पुरस्कार दिया गया. पाकिस्तान का फ़ाइनल में दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के बीच होने वाले दूसरे सेमीफ़ाइनल की विजेता टीम से मुक़ाबला होगा. इससे पहले इंग्लैंड ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए सात विकेट पर 204 रन बनाए. कप्तान विल रॉड्स ने नाबाद 76 रन बनाए जबकि रेयान हिगिंस ने 52 रन का योगदान दिया. क्वार्टरफ़ाइनल में गत चैंपियन भारत को हराने वाली इंग्लिश टीम ने अपने विकेट एक रन के स्कोर पर ही गंवा दिए थे लेकिन रॉड्स और हिगिंस ने फिर उपयोगी पारियां खेलते हुए टीम को सम्मानजनक स्कोर तक पहुँचाया. पाकिस्तान की ओर से ज़िया-उल-हक़ अमद बट और करामात अली ने दो-दो विकेट लिए. |
| DATE: 2014-02-25 |
| LABEL: sports |
| [571] TITLE: सोची ओलंपिक का समापन, शीर्ष पर रूस |
| CONTENT: रूस के सोची में 22वें शीतकालीन ओलंपिक खेल रंगारंग कार्यक्रम के साथ ही संपन्न हो गए हैं. इन खेलों में मेज़बान रूस पदक तालिका में शीर्ष पर रहा. 17 दिन चले खेलों के समापन समारोह की अध्यक्षता अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के अध्यक्ष थॉमस बाक ने की. 130 मिनट के समापन समारोह में रूस ने जमकर ख़र्च किया. समापन समारोह के दौरान ओलंपिक ध्वज दक्षिण कोरिया को सौंप दिया गया. सोची में ब्रिटेन ने 26 पदकों के साथ शीतकालीन ओलंपिक खेलों में अपने अब तक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की बराबरी की. सोची में ओलंपिक खेल शुरू होने से पहले चरमपंथी हमले की आशंका और रूस के कठोर समलैंगिकता विरोधी क़ानूनों को लेकर प्रदर्शनों ने खेलों को लेकर मेज़बान रूस की चिंता बढ़ा दी थी. समापन समारोह में थॉमस बाक ने कहा रूस और सोची ने अपना वादा पूरा किया और चिंताओं से ऊपर उठकर प्रभावशाली ओलंपिक खेल आयोजित किए. बाक ने कहा यह उत्कृष्ट खेल आयोजन था और इससे खेलों के शुरू होने से पहले की गई आयोजकों की आलोचना पलट जाएगी. फिश्ट स्टेडियम में आयोजित समापन समारोह में अपने भाषण में बाक ने ओलंपिक के मूल मूल्यों पर ज़ोर देते हुए कहा ओलंपिक गाँव में एक छत के नीचे एक साथ रहकर धावकों ने सोची से दुनिया को समाज में शांति सम्मान और सहिष्णुता का संदेश दिया है. सोची ओलंपिक खेलों में रूस ने 13 स्वर्ण पदकों के साथ कुल 33 पदक जीतकर पदक तालिका में पहला स्थान हासिल किया. हालाँकि राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की आइस हॉकी में स्वर्ण पदक की ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी. 2010 में कनाडा के वेंकोवर में हुए शीतकालीन ओलंपिक खेलों में रूस सिर्फ 15 पदक ही जीत सका था और पदक तालिका में 11वें स्थान पर था. यह रूस का शीतकालीन ओलंपिक खेलों में सबसे ख़राब प्रदर्शन भी था. सोची ओलंपिक खेलों पर करीब तीस अरब पाउंड खर्च हुए और इन्हें अब तक का सबसे महंगा खेल आयोजन माना जा रहा है. सोची में 88 देशों के कुल 2800 एथलीटों ने हिस्सा लिया. इस बार युवा प्रशंसकों को जोड़ने के लिए 12 नई स्पर्धाएं ओलंपिक में जोड़ी गईं थी. शीतकालीन ओलंपिक खेलों के इतिहास में सबसे बड़ा डोपिंग निरोधक अभियान भी सोची में चलाया गया. ओलंपिक के दौरान कुल 2453 डोप टेस्ट किए गए जिनमें छह एथलीट टेस्ट पास करने में नाकाम रहे. सोची ओलंपिक के दौरान आवारा कुत्तों की समस्या भी सामने आई और इसके बारे में भी खासी चर्चा होती रही. |
| DATE: 2014-02-24 |
| LABEL: sports |
| [572] TITLE: क्या ज़हीर को टेस्ट क्रिकेट छोड़ देना चाहिए? |
| CONTENT: ज़हीर ख़ान को अब अपने भविष्य के बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए क्योंकि इस साल के आख़िर में जब भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड का दौरा करेगी तब पांच दिवसीय क्रिकेट खेलना उनके लिए मुश्किल होगा. यह कहना है भारत के पूर्व कप्तान राहुल द्रविड़ का और जब दुनिया भर के विकेटों पर तेज़ गेंदबाज़ों का बखूबी सामना करने वाले द्रविड़ जैसे बल्लेबाज़ अगर ज़हीर ख़ान के बारे में ऐसा कहते हैं तो उनकी बात को खारिज करना थोड़ा मुश्किल ज़रूर है. जाने माने क्रिकेट समीक्षक विजय लोकपल्ली ज़हीर ख़ान को लेकर कहते हैं अगर द्रविड़ ने ऐसा कहा है तो ठीक ही कहा है क्योंकि वह ज़हीर के कप्तान रह चुके हैं. वह ज़हीर की काबिलियत को भली भांति जानते हैं. यहां पर मुद्दा उनकी क्षमता का नहीं बल्कि उनकी फिटनेस का है. उम्र के साथ-साथ खिलाड़ी के प्रदर्शन का स्तर भी गिरता है. विशेषकर जब कोई गेंदबाज़ हो और तेज़ गेंदबाज़ को तो अधिक मेहनत करनी पड़ती है. ज़हीर ख़ान एक अंतराल के बाद टीम में आए थे. उन्हें चोट लगी थी. उन्होंने कोशिश की. उनके साथियों का कहना था कि ज़हीर की मौजूदगी से मैदान में बहुत मदद मिलती है. उनकी सलाह से फायदा होता है. अब यह चयनकर्ताओं पर निर्भर करता है कि वह ज़हीर को ज़हीर ख़ान के रूप में खिलाते हैं या फिर बाक़ी तीन-चार गेंदबाज़ उनसे सीखकर मैदान पर अच्छा प्रदर्शन करें. दूसरी तरफ भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज़ आकाश चोपड़ा कहते हैं मै द्रविड़ की बात से पूरी तरह सहमत हूं. ज़हीर ख़ान 90 से ऊपर टेस्ट मैच खेल चुके हैं. एक तेज़ गेंदबाज़ इतने टेस्ट मैच खेलने के बाद अगर टीम में सफल वापसी करे तो यह किसी चमत्कार से कम नही है. चोपड़ा आगे कहते हैं पिछली सात पारियों में उन्होंने जैसी गेंदबाज़ी की है उसे देखते हुए यह चयनकर्ताओं पर निर्भर करता है कि वह ज़हीर के साथ टेस्ट टीम चुनेंगे या फिर उमेश यादव भुवनेश्वर कुमार वरूण ऐरोन या ईश्वर पांडेय जैसे युवा गेंदबाज़ों को अवसर देंगे. ज़हीर ख़ान की हालिया गेंदबाज़ी को लेकर विजय लोकपल्ली कहते हैं. उनका पहला स्पेल अच्छा निकलता था थोड़ी स्पीड कम थी. पहले ज़हीर की गेंदों को अच्छा मूवमेंट मिलता था रिवर्स बेहतरीन था अंदर गेंद लाते थे राइट हैंड बैट्समैन के लिए आउट स्विंग शानदार था लेकिन जैसा राहुल द्रविड़ ने कहा कि यह अब उन्हें सोचना पड़ेगा कि क्या वह इंग्लैंड में पांच टेस्ट मैचों की सिरीज़ में अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकेंगेवैसे तो पूरी गेंदबाज़ी ही भारत के लिए चिंता का कारण रही है. गेंदबाज़ी कोच फेल हो रहे हैं ऐसे में ज़हीर को एक गेंदबाज़ के तौर पर ना सही तो गेंदबाज़ी कोच के रूप में टीम के साथ ले जाइए. वहीं आकाश चोपड़ा कहते हैं आज से 13 साल पहले जब ज़हीर ख़ान टीम में आए थे तब वह 140 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से गेंद करते थे. उनके इतने लंबे सफर में उनकी गति में काफी कमी आई है. ज़हीर ख़ान ने इससे पहले साल 2007 के इंग्लैड दौरे पर कम गति के साथ भी शानदार गेंदबाज़ी की थी लेकिन अब उनकी गेंदबाज़ी में वह धार वह पैनापन नही है. चोपड़ा का कहना है इन दिनों जितनी गेंदबाज़ी भारतीय गेंदबाज़ कर रहे हैं उसे देखते हुए मैच दर मैच इनिंग दर इनिंग उतनी ताक़त से गेंदबाज़ी करना शायद ज़हीर ख़ान के लिए मुमकिन नहीं है. अब शायद उनके करियर में वह समय वह मोड़ आ गया है जब उन्हें टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहना पड़े. आख़िरी बार उन्हें शानदार गेंदबाज़ी करते हुए हमने साल 2011 के विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट में देखा था. वो कहते हैं उन्होंने भारत को चैंपियन बनाने में महत्वपूर्ण किरदार निभाया था. हम हमेशा युवराज सिंह महेंद्र सिंह धोनी और गौतम गंभीर की बात करते हैं लेकिन भारत का परचम फहराने में ज़हीर का ज़बरदस्त योगदान रहा. पर अब वह दौर बीत चुका है और भारत को भविष्य की तरफ देखने की ज़रूरत है. |
| DATE: 2014-02-21 |
| LABEL: sports |
| [573] TITLE: लकड़ी से सीखा स्कीइंग का ककहरा |
| CONTENT: रूस के सोची में चल रहे शीतकालीन ओलंपिक खेलों में हिस्सा लेने वाले पाकिस्तान के एकमात्र एथलीट मोहम्मद करीम ने लकड़ी से स्कीइंग की शुरुआत की थी. करीम ने बुधवार को जाएंट स्लेलोम स्पर्द्धा में पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व किया और 71वें स्थान पर रहे. भारत के हिमांशु ठाकुर 72वें और आख़िरी स्थान पर रहे. 16 साल के करीम का जन्म पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के गिलगित-बल्टिस्तान में हुआ था और वहीं उन्होंने बिना उपकरणों के स्कीइंग का ककहरा सीखा था. करीम ने बीबीसी से कहा चार साल की उम्र से मैंने स्कीइंग शुरू की थी. मेरे गांव में हर साल भारी बर्फबारी होती थी. उन्होंने कहा मेरे चार भाई शौकिया तौर पर प्राकृतिक बर्फ की ढलानों पर स्कीइंग करते थे. मैं भी मज़े लेने के लिए उनके साथ हो लेता था. करीम ने कहा फिर मैंने लकड़ियों की स्कीइंग से शुरुआत की. तब हमारे पास इसके लिए कोई पेशेवर उपकरण नहीं थे. मेरे भाई मुझसे कहते थे कि अगर आपके मन में डर होगा तो आप अच्छे स्कीयर नहीं बन पाएंगे. उन्होंने कहा शुरुआत में हम ढलान के बीच में से स्कीइंग करते थे लेकिन फिर मेरे भाई मुझे ढलान के ऊपर ले गए और उन्होंने मुझे चोटी से तलहटी तक स्कीइंग करने के लिए प्रेरित किया. करीम का कहना था कि शुरुआत में वो कई ग़लतियां करते थे लेकिन फिर जल्दी ही उन्होंने अपने खेल को सुधार लिया. वो कहते हैं सोची ओलंपिक से मुझे अपने खेल में बदलाव लाने और दूसरे प्रतिद्वंद्वियों से सीखने का मौका मिला. सबसे बड़ी बात यह है कि दुनिया के सबसे ऊंची और कठिन ढलान पर खेलने का मौका मिला. इससे मेरे करियर में बदलाव आएगा. करीम ने कहा स्कीइंग करते समय जो बात मेरे दिमाग में रहती है वो यह है कि मुझे निर्धारित समय में यह दूरी पार करनी है. उन्होंने कहा मेरे कोच कहते हैं कि खिलाड़ी को किसी भी स्पर्धा को बड़ा या छोटा नहीं समझना चाहिए और हमें पूरे जुनून के साथ उतरना चाहिए. मैं हमेशा इस बात को अपने दिमाग में रखता हूं. मैं हर स्कीइंग को अपनी अंतिम स्कीइंग मानता हूं और यह बात मुझे और अच्छा करने के लिए प्रेरित करती है. |
| DATE: 2014-02-20 |
| LABEL: sports |
| [574] TITLE: क्या भारत को नए टेस्ट कप्तान की जरूरत है? |
| CONTENT: भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच वेलिंग्टन में खेला गया दूसरा टेस्ट मैच बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गया. इसके साथ ही भारत का न्यूज़ीलैंड दौरा भी समाप्त हो गया. भारत दो टेस्ट मैच की सिरीज़ 1-0 से हारा जबकि इससे पहले पांच एकदिवसीय मैचों की सिरीज़ में उसे 4-0 से हार का सामना करना पड़ा था. कुल मिलाकर भारत न्यूज़ीलैंड दौरे पर एक भी मैच जीतने में नाकाम रहा. कुछ ऐसा ही प्रदर्शन भारत ने इससे पहले दक्षिण अफ्रीका में किया था जहां वह दो टेस्ट मैचों की सिरीज़ 0-1 से और तीन एकदिवसीय मैचों की सिरीज़ 0-2 से हारा था. विदेशी ज़मीन पर मिलती लगातार हार ने भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और उनके धुरंधरों पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या विदेशी पिचों पर भारत का यही हाल होता रहेगा और क्या भारत के हाथ से जीत इसी तरह से फिसलती रहेगी और क्या धोनी के चहेते खिलाड़ी यूँ ही टीम में बने रहेंगे और सबसे बड़ा सवाल कि क्या अब आगामी एशिया कप और ट्वेंटी-ट्वेंटी विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट के दौरान इन हार को भुला दिया जाएगाभारत के पूर्व चयनकर्ता और क्रिकेटर मोहिंदर अमरनाथ कहते हैं न्यूज़ीलैंड में भारत से सभी को अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद थी लेकिन उसका खेल बेहद निराशाजनक रहा. उसका सबसे बड़ा कारण भारतीय खिलाड़ियों का अपने खेल में तब्दीली न ला पाना रहा. इसके अलावा भारतीय स्पिनरों का वहां नाकाम होना भी चिंता का कारण है. दूसरी तरफ़ भारत के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ अतुल वासन कहते हैं दिल में मलाल है क्योंकि यह सिरीज़ भारत जीत सकता था. इसके अलावा कम से कम दूसरा टेस्ट मैच जीतकर भारत सिरीज़ को बराबर तो कर ही सकता था. जैसा दक्षिण अफ्रीका में हुआ वैसा ही न्यूज़ीलैंड में हुआ एक जीता-जिताया मैच ड्रॉ कराकर ही टीम ख़ुश हो रही है. इसके अलावा एकदिवसीय सिरीज़ में भी हार से से विदेशो में हार का दौर लम्बा होता जा रहा है. भारतीय गेंदबाज़ी को लेकर मोहिंदर अमरनाथ कहते है भारत में धीमी और धूल भरे विकेट पर कामयाब भारतीय स्पिनर विदेशो में कामयाब नही हो सकते. बल्लेबाज़ी में केवल तीन बल्लेबाज़ कुछ ठीक-ठाक खेले. विराट कोहली बेशक शानदार बल्लेबाज़ हैं अजिंक्य रहाणे अच्छा खेले. शिखर धवन को अभी विदेशी पिचों पर खेलने का अनुभव चाहिए खासकर तेज़ गेंदबाज़ी को. दूसरी तरफ़ अतुल वासन कहते हैं विदेशो में विकेट चाहे जैसे भी हो लेकिन टीम में एक विकेट लेने वाला गेंदबाज़ तो होना ही चाहिए. एक गेंदबाज़ विकेट लेता है तो दूसरा मदद नही करता. दूसरा विकेट लेता है तो पहला मदद नही करता जिससे दोनों छोर से दबाव नही बन पाता है. तीन तेज़ गेंदबाज़ जिनकी टीम में जगह भी पक्की नही है उनके साथ खेलना और रवींद्र जडेजा को बल्लेबाज़ी मज़बूत करने के लिए स्पिनर बना देना समझ से बाहर है. साढ़े तीन या पौने चार गेंदबाज़ो से टेस्ट मैच नही जीते जाते. धोनी की यह रक्षात्मक सोच नज़र आई. अतुल का कहना है अब समय आ गया है कि एक कप्तान के तौर पर धोनी को एकदिवसीय या टेस्ट मैच में से एक को चुनना होगा. इसके अलावा चयनकर्ताओं की भी जवाबदेही होनी चाहिए. अगर धोनी के चहेते खिलाड़ी बिना किसी ख़ास प्रदर्शन के टीम में खेलते रहेंगे तो वह उन्हें खिलाते रहेंगे. मोहिंदर अमरनाथ भी अतुल वासन से इत्तेफाक रखते हैं और कहते हैं अब किसी और खिलाड़ी को कप्तान के रूप में अवसर देना चाहिए. मोहिंदर अमरनाथ और अतुल वासन दोनों ही मानते हैं कि न्यूज़ीलैंड के कप्तान ब्रेंडन मैकुलम ने एक कप्तान के रूप में बेहतरीन उदाहरण पेश किया. उनका मानना है कि एशिया कप और ट्वेंटी-20 विश्व कप की तैयारियों के बीच इस हार को नही भूलाना चाहिए क्योंकि यह भारत का भविष्य नही है और ये भी नहीं भूलना चाहिए कि अगला विश्व कप ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में होगा. अब देखना है कि इस हार से भारत क्या सबक़ लेता है या फिर पहले की तरह ढाक के तीन पात रहते हैं. |
| DATE: 2014-02-19 |
| LABEL: sports |
| [575] TITLE: तिरंगे के बाद सोची में कामयाबी का झंडा भी लहराएगा? |
| CONTENT: मेरे विचार से यह भारत के लिए बेहद ख़ुशी का अवसर है. मैं वैसे विंटर ओलंपिक खेलों का अपना मान्यता पत्र हासिल कर चुका हूं जिस पर भारत लिखा हुआ है. यह कहना है रूस के सोची शहर में आयोजित किए जा रहे शीतकालीन ओलंपिक खेलों में भाग लेने वाले भारतीय एथलीट शिवा केशवन का जो ल्यूज़ स्पर्द्धा में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे है. उनके अलावा दो अन्य भारतीय एथलीट हिमांशु ठाकुर और नदीम इक़बाल भी इन खेलों में भाग ले रहे है. शिवा केशवन कहते हैं इससे पहले मैं स्वतंत्र ओलंपिक भागीदार के तौर पर यहां था. आख़िरकार अब हम अपना तिरंगा यहां लहरा पाएंगे यह हमारे लिए बड़े गर्व की बात है. शीतकालीन ओलंपिक खेलों में विशेष समारोह के दौरान कल भारतीय ध्वज फहराया गया. समारोह में इन तीनों भारतीय खिलाड़ियों के अलावा भारतीय ओलंपिक संघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष एन. रामचंद्रन और अंतराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के पदाधिकारियों ने भाग लिया. अब भारतीय खिलाड़ी 23 फ़रवरी को शीतकालीन खेलों के समापन समारोह में तिरंगा लेकर चल सकेंगे. उल्लेखनीय है कि पिछले दिनो अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने भारतीय ओलंपिक संघ पर लगाया गया निलंबन हटा दिया था. भारतीय ओलपिंक संघ के पदाधिकारियों पर चुनाव में घांघली और भ्रष्ट्राचार के गंभीर आरोप थे जिसके बाद क़रीब 14 महिने पहले अंतराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने भारतीय ओलंपिक संघ को निलंबित कर दिया था. सोची शीतकालीन ओलंपिक सात फ़रवरी को शुरू हुए थे जबकि भारतीय ओलंपिक संघ के पदाधिकारियों के नए चुनाव नौ फ़रवरी को हुऐ और उसके दो दिन बाद ही भारत का निलंबन समाप्त हो गया. इसके साथ ही खेल गांव में भारतीय ध्वज तिरंगे के लहराने का रास्ता भी साफ़ हो गया. जबकि इससे पहले निलंबन के दौरान भारतीय खिलाड़ी दुनिया भर की अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के झंडे के नीचे प्रदर्शन कर रहे थे. शिवा केशवन ने कहा कि भारतीय ओलंपिक संध के निलंबन के कारण पूरी दुनिया के सामने हमें शर्मशार होना पड़ा. भारतीय खिलाड़ियों के लिए ऐसी स्थिति का सामना करना असहनीय था. इससे आगे शिवा कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने दिखा दिया कि वह कितनी तेज़ी से कोई निर्णय ले सकते है. वैसे शिवा को इस बात का दर्द है कि भारतीय ओलंपिक संघ के चुनाव थोड़ा देर से हुए. काश कि चुनाव शीतकालीन ओलंपिक शुरू होने से केवल एक सप्ताह पहले भी हो जाते तो ऐसी स्थिति नही आती. शिवा का कहना है कि चलो जो होना था हुआ लेकिन अब नए सिरे से भविष्य को लेकर योजनाए बनाई जा सकती हैं और एक नया इतिहास लिखा जा सकता है. संघ के नए पदाधिकारी भारतीय खेलों के लिए बहुत कुछ कर सकते है. अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि नए पदाधिकारी क्या कुछ करते हैं लेकिन उनके सामने सबसे बडी चुनौती तो आगामी राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों के लिए भारतीय खिलाड़ियों में जोश भरना है. इसके अलावा पिछले 14 महीने से लगभग निष्क्रिय पडे विभिन्न खेल संधो को भी संदेश देना होगा कि वह राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों के लिए खिलाड़ियों के चयन से लेकर उनकी ट्रेनिंग पर पूरा ध्यान दे. वैसे नवनिर्वाचित अध्यक्ष एन रामचंद्रन पहले ही कह चुके हैं कि उनकी पहली प्राथमिकता एथलीटो के लिए पैसा जुटाना है. एथलीटों का प्रदर्शन बेहतरीन हो क्योंकि हम केवल एथलीटो की वजह से संघ में हैं. |
| DATE: 2014-02-17 |
| LABEL: sports |
| [576] TITLE: वेलिंगटन: मैकुलम 281 नाबाद, भारत चिंतित |
| CONTENT: वेलिंगटन में चल रहे दूसरे टेस्ट मैच के चौथे दिन न्यूज़ीलैंड के कप्तान ब्रैंडन मैकुलम और विकेटकीपर बीजे वाटलिंग की शानदार बल्लेबाज़ी की बदौलत न्यूज़ीलैंड ने भारत पर 325 रनों की बढ़त हासिल कर ली है. चौथे दिन का खेल ख़त्म होने पर न्यूज़ीलैंड का स्कोर छह विकेट के नुक़सान पर 571 रन रहा. चौथे दिन के खेल की सबसे ख़ास बात रही मैकुलम और वाटलिंग की छठे विकेट के लिए विश्व रिकॉर्ड साझेदारी. इन दोनों ने छठे विकेट की साझेदारी में 352 रन जोड़े. उन्होंने श्रीलंका के माहेला जयवर्द्धने और प्रसन्ना जयवर्द्धने का रिकॉर्ड तोड़ा जिन्होंने 2009 में भारत के ख़िलाफ़ अहमदाबाद टेस्ट में 351 रन जोड़े थे. वाटलिंग चायकाल के बाद 124 रन बनाकर मोहम्मद शमी की गेंद पर पगबाधा क़रार दिए गए. मैकुलम फिर भी जमे रहे और वाटलिंग के आउट होने के बाद उनका साथ मैदान में उतरे जिम्मी नीषम. नीषम ने भी शानदार खेल का प्रदर्शन किया और अंत तक 67 रन बनाकर नाबाद रहे. मैकुलम की यह करियर की सर्वश्रेष्ठ पारी है और वो तेज़ी से ट्रिपल सेंचुरी की ओर बढ़ रहे हैं. साथ ही वह एक ही सिरीज़ में दो दोहरे शतक ठोकने वाले न्यूज़ीलैंड के दूसरे बल्लेबाज़ बन गए हैं. पीठ घुटने और कंधे की परेशानी से जूझ रहे मैकुलम ने लंच के बाद से सत्र में ज़हीर ख़ान की गेंद पर चौका मारकर अपना तीसरा दोहरा शतक पूरा किया. मैकुलम न्यूज़ीलैंड की तरफ़ से तीन दोहरे शतक बनाने वाले दूसरे बल्लेबाज़ हैं और हर बार उन्होंने भारत के ख़िलाफ़ यह कारनामा किया है. कीवी कप्तान ने साल 2010 में हैदराबाद टेस्ट में 225 रन बनाए थे जबकि मौजूदा सिरीज़ के पहले टेस्ट में उन्होंने 224 रन की पारी खेली थी. न्यूज़ीलैंड की ओर से तीन दोहरे शतक बनाने वाले दूसरे बल्लेबाज़ स्टीफ़न फ्लेमिंग हैं. मैकुलम और वाटलिंग की छठे विकेट के लिए 352 रन की साझेदारी भारत के ख़िलाफ़ किसी भी विकेट के लिए न्यूज़ीलैंड की तरफ़ से सबसे बड़ी साझेदारी है. अभी तक यह रिकॉर्ड रॉस टेलर और जेस राइडर के नाम था जिन्होंने साल 2009 में नेपियर टेस्ट में 271 रन की साझेदारी की थी. अमूमन आक्रामक बल्लेबाज़ी के लिए मशहूर मैकुलम वक़्त की नज़ाकत को देखते हुए संयम के साथ बल्लेबाज़ी कर रहे हैं. इससे पहले न्यूज़ीलैंड ने रविवार के स्कोर पाँच विकेट पर 252 रन से आगे खेलना शुरू किया. मैकुलम 114 और वाटलिंग 52 रन बनाकर क्रीज़ पर थे. न्यूज़ीलैंड ने पहला टेस्ट 40 रन से जीता था और भारत को सिरीज़ बराबर करने के लिए यह मैच जीतना ज़रूरी है. |
| DATE: 2014-02-17 |
| LABEL: sports |
| [577] TITLE: आख़िर लहराया भारत का तिरंगा शीतकालीन ओलंपिक में |
| CONTENT: इंडियन ओलंपिक एसोसिशन पर से निलंबन हटा लेने के बाद रूस के सोची में हो रहे शीतकालीन ओलंपिक में भारत का तिरंगा लहराया गया. अब सोची में खेलों के समापन समारोह में भारतीय एथलीट अपने देश के तिरंगे तले मार्चपास्ट कर सकेंगे. पिछले दिनों हुए इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन आईओए के चुनाव के बाद इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी आईओसी ने भारत के ऊपर से निलंबन हटाने का फ़ैसला किया था. आईओसी ने एक बयान में कहा है कि उसके कार्यकारी बोर्ड ने मंगलवार को सोची में हुई एक बैठक में यह फ़ैसला लिया. आईओए के अध्यक्ष पद के लिए नौ फरवरी को हुए चुनाव में एन रामचंद्रन नए अध्यक्ष बने हैं जो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के भाई हैं. रॉबिन मिशेल की अध्यक्षता में आईओसी का एक प्रतिनिधिमंडल इन चुनावों के दौरान मौजूद था जिसकी रिपोर्ट के बाद आईओए पर से निलंबन हटाने का फ़ैसला किया गया. ओलंपिक आयोजन के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब ओलंपिक खेलों के दौरान किसी राष्ट्रीय खेल समिति का निलंबन ख़त्म किया गया है. आईओए पर से निलंबन हटने के बाद अब सोची शीतकालीन ओलंपिक के खेलगांव में भारतीय तिरंगा लहराया गया और 23 फरवरी को होने वाले समापन समारोह के दौरान भारतीय खिलाड़ी तिरंगे तले मार्चपास्ट करेंगे. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति को भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन की चुनाव प्रक्रिया पर ऐतराज़ था और इसी कारण भारत को ओलंपिक से निलंबित कर दिया गया था. निलंबन के कारण भारतीय खिलाड़ियों को सोची में देश के झंडे तले मैदान में उतरने का मौक़ा नहीं मिला था. आईओए का अध्यक्ष बनने के बाद एन रामचंद्रन ने कहा था कि उनकी प्राथमिकता सोची शीतकालीन ओलंपिक के दौरान निलंबन हटवाना है. निलंबन हटने के कारण उन एथलीटों ने भी राहत की साँस ली है जो इस साल होने वाले राष्ट्रमंडल खेल और एशियन गेम्स की तैयारी कर रहे हैं. पूरा विवाद उस समय उठ खड़ा हुआ था जब दिसंबर 2012 में आईओसी ने चुनाव प्रक्रिया में ओलंपिक चार्टर का पालन न करने का आरोप लगाते हुए भारत को निलंबित कर दिया था. आईओसी ने कहा था कि आईओए के चुनाव में उन लोगों को नहीं शामिल किया जाना चाहिए जिनके ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल की गई है. |
| DATE: 2014-02-16 |
| LABEL: sports |
| [578] TITLE: न्यूज़ीलैंड ने बचाई पारी से हार, भारत अब भी मज़बूत |
| CONTENT: न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ वेलिंगटन टेस्ट में भारत की स्थिति अब भी मजबूत है लेकिन न्यूज़ीलैंड टीम ने पारी की हार के ख़तरे को ज़रूर टाल दिया है. तीसरे दिन का खेल ख़त्म होने तक न्यूज़ीलैंड ने पाँच विकेट के नुक़सान पर 252 रन बना लिए हैं. न्यूज़ीलैंड को सिर्फ़ छह रन की बढ़त मिली हुई है क्योंकि भारत ने पहली पारी के आधार पर 246 रनों की अहम बढ़त हासिल की थी. तीसरे दिन के खेल की ख़ासियत कप्तान ब्रैंडन मैकुलम की बल्लेबाज़ी रही जिन्होंने अपनी टीम को पारी की हार से बचा लिया. मैकुलम ने ब्रैडली जॉन वॉल्टिंग के साथ मिलकर बेहतरीन बल्लेबाज़ी की. दोनों ने अभी तक छठे विकेट के लिए 158 रन जोड़ लिए हैं. मैकुलम ने तो शानदार शतक पूरा कर लिया है और वे 114 रन बनाकर नाबाद हैं. ये टेस्ट करियर में उनका नौवाँ शतक है. तीसरे दिन का खेल शुरू होने पर न्यूज़ीलैंड ने अपने स्कोर एक विकेट पर 24 रनों से आगे खेलना शुरू किया. सबसे पहले केन विलियम्सन आउट हुए जिन्हें सात रन के निजी स्कोर पर ज़हीर ख़ान ने आउट किया. रदरफ़ोर्ड को भी 35 रनों के निजी स्कोर पर ज़हीर ख़ान ने पवेलियन भेजा. लैथम 29 रन बनाकर मोहम्मद शामी का शिकार बने तो कोरी एंडरसन का विकेट रवींद्र जडेजा को मिला. एक समय न्यूज़ीलैंड का स्कोर था पाँच विकेट के नुक़सान पर 94 रन. लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने भारतीय गेंदबाज़ काफ़ी परेशान रहे. ब्रैंडन मैकुलम और वॉल्टिंग ने संभल कर खेलना शुरू किया. एक समय न्यूज़ीलैंड पर पारी की हार का ख़तरा मँडरा रहा था. लेकिन अब वो संकट टल गया है. हालाँकि मैच पर भारत की पकड़ मज़बूत है. लेकिन ये चौथे दिन के खेल और ख़ासकर मैकुलम पर निर्भर करेगा कि न्यूज़ीलैंड की टीम जीत के लिए भारत के सामने कितना बड़ा लक्ष्य रखती है. न्यूज़ीलैंड की दूसरी पारी में ज़हीर ख़ान ने तीन विकेट लिए हैं. मोहम्मद शामी और रवींद्र जडेजा ने एक-एक विकेट लिया. न्यूज़ीलैंड की टीम ने पहली पारी में सिर्फ़ 192 रन बनाए थे जबकि भारत ने 438 रन बनाकर 246 रनों की बढ़त हासिल की. |
| DATE: 2014-02-16 |
| LABEL: sports |
| [579] TITLE: मुकाबला हुआ रोचक, लाइव स्कोर |
| CONTENT: न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ दूसरे टेस्ट के तीसरे दिन न्यूज़ीलैंड की टीम वापसी करती दिख रही है. पाँच विकेट तेज़ी से गिरने के बाद न्यूज़ीलैंड के कप्तान मैकुलम साथी बल्लेबाज़ वॉटलिंग के साथ पिच पर जम गए हैं. मैकुलम की सेंचुरी और वॉटलिंग की हाफ़ सेंचुरी पूरी हो गई है. भारत की ओर से पाँच में से तीन विकेट ज़हीर खान ने लिए हैं. ज़हीर ने फुल्टन विलियमसन और रदरफ़ोर्ड को पवेलियन भेजा. वहीं मोहम्मद शमी ने लैटहैम को आउट किया. जाडेजा ने एंडरसन का कैच अपनी ही गेंद पर लपक लिया. ब्रैंडन मैक्कुलम 19 रन पर खेल रहे हैं. लेकिन न्यूज़ीलैंड के लिए इस मैच में वापसी करना बेहद मुश्किल नज़र आ रहा है. न्यूज़ीलैंड को ये मैच बचाने के लिए बड़ी साझेदारियों की ज़रूरत है लेकिन उसके विकेट अब तक नियमित अंतराल पर गिरे हैं. इससे पहले शनिवार को भारत की पूरी टीम पहली पारी में 438 रन बनाकर आउट हो गई थी. अजिंक्य रहाणे ने अपना पहला शतक लगाया और वो 118 रन बनाकर आउट हुए जबकि शिखर धवन सिर्फ़ दो रन से शतक से चूक गए. भारत का पहला विकेट मुरली विजय की शक्ल में तब गिर गया था जब टीम का स्कोर सिर्फ दो रन था. पुजारा भी 19 रन ही बना सके. ईशांत शर्मा ने 26 रनों का योगदान दिया. रोहित शर्मा अपना खाता भी नहीं खोल पाए. विराट कोहली ने 38 रन बनाए वहीं कप्तान धोनी ने 68 रनों की पारी खेली. जडेजा ने 26 रन बनाए. न्यूज़ीलैंड की ओर से जिमी नीशम ने एक और बोल्ट साउदी तथा वैगनर ने तीन तीन विकेट चटकाए. शुक्रवार को न्यूज़ीलैंड की टीम अपनी पहली पारी में 192 रन बनाकर आउट हो गई थी. ईशांत शर्मा ने 51 रन देकर छह विकेट लिए जबकि मोहम्मद शामी ने 71 रन देकर चार विकेट उखाड़े. दो टेस्ट मैचों की सिरीज़ में न्यूज़ीलैंड 1-0 से आगे है. न्यूज़ीलैंड ने पहला टेस्ट 40 रनों से जीता था. |
| DATE: 2014-02-16 |
| LABEL: sports |
| [580] TITLE: पहली पारी में भारतीय टीम 438 पर ऑल आउट |
| CONTENT: न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ दूसरे टेस्ट मैच में भारत ने पहली पारी के आधार पर अच्छी बढ़त बना ली है. पूरी टीम 438 रन पर ऑल आउट हो गई है. अजिंक्य रहाणे ने सबसे ज्यादा 118 रनों का योगदान दिया. शिखर धवन महज दो रन से शतक से चूक गए. जबाव में न्यूज़ीलैंड की शुरुआत अच्छी नहीं रही. पीटर फ़ुल्टन एक रन बनाकर ज़हीर ख़ान की गेंद पर आउट हो गए हैं. इससे पहले भारत का पहला विकेट मुरली विजय की शक्ल में तब गिरा जब टीम का स्कोर सिर्फ दो रन था. पुजारा भी 19 रन ही बना सके. ईशांत शर्मा ने 26 रनों का योगदान दिया. धवन बस दो रन से शतक से चूक गए. रोहित शर्मा अपना खाता भी नहीं खोल पाए. विराट कोहली ने 38 रन बनाए वहीं कप्तान धोनी ने 68 रनों की पारी खेली. जडेजा ने 26 रन बनाए. रहाणे ने सबसे अधिक 118 रनों का योगदान दिया. न्यूज़ीलैंड की ओर से जिमी नीशम ने एक और बोल्ट साउदी तथा वैगनर ने तीन तीन विकेट चटकाए. इससे पहले शुक्रवार को न्यूज़ीलैंड की टीम अपनी पहली पारी में 192 रन बनाकर आउट हो गई. ईशांत शर्मा और मोहम्मद शामी ने न्यूज़ीलैंड के बल्लेबाज़ों को जमने नहीं दिया. ईशांत शर्मा ने 51 रन देकर छह विकेट लिए जबकि मोहम्मद शामी ने 71 रन देकर चार विकेट उखाड़े. न्यूज़ीलैंड की ओर से केन विलियम्सन ने सर्वाधिक 47 रन बनाए. जिमी नीशम ने 33 और टिम साउदी ने 32 रनों की पारी खेली. दो टेस्ट मैचों की सिरीज़ में न्यूज़ीलैंड 1-0 से आगे है. न्यूज़ीलैंड ने पहला टेस्ट 40 रनों से जीता था. भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने टॉस जीतकर पहले फ़ील्डिंग करने का फ़ैसला किया. न्यूज़ीलैंड की शुरुआत काफ़ी ख़राब रही और उसके तीन विकेट सिर्फ़ 26 रन पर गिर गए थे. शुरू के तीनों विकेट ईशांत शर्मा ने लिए. फुल्टन ने 12 और रदरफ़ोर्ड ने 13 रन बनाए. न्यूज़ीलैंड ईशांत शर्मा की बेहतरीन गेंदबाज़ी से पार पाने की कोशिश में ही जुटा था कि मोहम्मद शामी ने भी दूसरे छोर से उनकी नाक में दम करना शुरू कर दिया. न्यूज़ीलैंड की स्थिति और बिगड़ने लगी और उसके छह विकेट 86 रन पर गिर गए. नीशम और विलियम्सन ने सातवें विकेट के लिए अहम 47 रन जोड़े. लेकिन फिर विलियम्सन 47 और नीशन 33 रन बनाकर आउट हो गए. उनके आउट होने के बाद न्यूज़ीलैंड की रही-सही उम्मीद भी जाती रही. आख़िर में टिम साउदी ने तीन छक्कों की मदद से 32 रन बनाकर स्कोर को कुछ सम्मानजनक स्थिति में पहुँचाने में मदद की. |
| DATE: 2014-02-15 |
| LABEL: sports |
| [581] TITLE: ओलंपिक में भारत की वापसी, निलंबन हटा |
| CONTENT: पिछले दिनों हुए भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन के चुनाव के बाद अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति आईओसी ने उस पर से निलंबन हटाने का फ़ैसला किया है. आईओसी ने एक बयान में कहा कि उसकी कार्यकारी बोर्ड की मंगलवार को सोची में हुई एक बैठक में यह फ़ैसला किया गया. आईओए के नौ फरवरी को हुए चुनाव में एन रामचंद्रन नए अध्यक्ष बने हैं जो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के भाई हैं. रॉबिन मिशेल की अध्यक्षता में आईओसी का एक प्रतिनिधिमंडल इन चुनावों के दौरान मौजूद था जिसकी रिपोर्ट के बाद आईओए पर से निलंबन हटाने का फ़ैसला किया. ओलंपिक आंदोलन के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब ओलंपिक खेलों के दौरान किसी राष्ट्रीय खेल समिति का निलंबन ख़त्म किया गया है. आईओए पर से निलंबन हटने के बाद अब सोची शीतकालीन ओलंपिक के खेलगांव में भारतीय तिरंगा लहराया जाएगा और 23 फरवरी को होने वाले समापन समारोह के दौरान भारतीय खिलाड़ी तिरंगे तले मार्चपास्ट करेंगे. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति को भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन की चुनाव प्रक्रिया पर ऐतराज़ था और इसी कारण भारत को ओलंपिक से निलंबित कर दिया गया था. निलंबन के कारण भारतीय खिलाड़ियों को सोची में देश के झंडे तले मैदान में उतरने का मौक़ा नहीं मिला था. लेकिन अब आईओसी की निगरानी में हुए चुनाव के बाद उस पर से निलंबन हटाने का फ़ैसला किया गया है. आईओए का अध्यक्ष बनने के बाद एन रामचंद्रन ने कहा था कि उनकी प्राथमिकता सोची शीतकालीन ओलंपिक के दौरान निलंबन हटवाना है. निलंबन हटने के कारण उन एथलीटों ने भी राहत की साँस ली है जो इस साल होने वाले राष्ट्रमंडल खेल और एशियन गेम्स की तैयारी कर रहे हैं. पूरा विवाद उस समय उठ खड़ा हुआ था जब दिसंबर 2012 में आईओसी ने चुनाव प्रक्रिया में ओलंपिक चार्टर का पालन न करने का आरोप लगाते हुए भारत को निलंबित कर दिया था. आईओसी ने ज़ोर दिया था कि आईओए के चुनाव में उन लोगों को नहीं शामिल किया जाना चाहिए जिनके ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल की गई है. |
| DATE: 2014-02-11 |
| LABEL: sports |
| [582] TITLE: बीसीसीआई से कोई उम्मीद नहीं: प्रदीप मैगज़ीन |
| CONTENT: क्रिकेट मामलो के जानकार और क्रिकेट में मैच फ़िक्सिंग जैसे मसलों को बहुत पहले उठा चुके प्रदीप मैगज़ीन के अनुसार मुकुल मुदगल की रिपोर्ट का बड़ा महत्व है. प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं अगर दूरगामी परिणामों की बात करें तो यह सब सुप्रीम कोर्ट पर निर्भर करेगा कि वह रिपोर्ट के आधार पर क्या निर्णय लेती है. वह कुछ ना कुछ तो ज़रूर कहेगी क्योंकि जांच पैनल का गठन उसी ने किया है. इस मामले में बीसीसीआई से कोई उम्मीद नही है क्योंकि एन श्रीनिवासन तो अब आईसीसी के अध्यक्ष भी बनने जा रहे हैं और उन्होंने तो पिछले दिनों आईसीसी के भी घुटने टिकवा दिए. लेकिन आईपीएल के पूर्व कमिशनर और केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला ने बहुत सावधानी बरतते हुए कहा कि सबको सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार करना चाहिए. शुक्ला का कहना था मुदगल कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दी है जबकि एक सदस्य की इसमें सहमति नही है. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हमें इंतज़ार करना चाहिए. ग़ौरतलब है कि 2013 में आईपीएल में कथित तौर पर मैच फ़िक्सिंग की बात सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस मुकुल मुदगल की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था. इस कमेटी ने सोमवार को अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार रिपोर्ट में बीसीसीआई के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद गुरूनाथ मेयप्पन को मैच की जानकारियां सट्टेबाज़ों के साथ शेयर करने का दोषी पाया गया है. जाने माने क्रिकेट समीक्षक और दिल्ली डेयरडेविल्स के मीडिया मैनेजर रह चुके वी कृष्णास्वामी कहते हैं कि जस्टिस मुकुल मुदगल की रिपोर्ट से यह साबित होता है कि इससे पहले जो कुछ इसे लेकर सुना गया उसमें थोडा बहुत सच हो सकता है. उनका कहना था अब तक जब भी इस तरह की बात उठती थी उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता था. मुकुल मुदगल जिनका क्रिकेट को लेकर गहरा लगाव भी है वह अगर चार महीने बाद ऐसी रिपोर्ट दे रहे हैं तो उसे ग़ौर से देखना बहुत ज़रूरी है. कृष्णास्वामी ने आगे कहा यह जानना बहुत ज़रूरी है कि इस रिपोर्ट के बाद बीसीसीआई के अधिकारी श्रीनिवासन को किस नज़र से देखेंगे क्योंकि किसी भी टीम के अधिकारी पर आरोपों के बाद टीम को आईपीएल से निलंबित भी किया जा सकता है. इस टीम पर भारी भरकम पैसा लगाया गया है और इसी टीम के कप्तान भारत के कप्तान भी हैं तथा भारतीय टीम के कई सदस्य इसी टीम से खेलते हैं. वही भारत के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ अतुल वासन का इस मसले को लेकर कहना है कि अगर टीम के कर्ता-धर्ता ही मैच फ़िक्सिंग न सही बेटिंग में ही लिप्त पाए जाते हैं तो यह गंभीर चिंता का विषय है. वासन के अनुसार ये देखना दिलचस्प होगा कि अब बोर्ड इस मामले में क्या अनुशासनात्मक क़दम उठाएगा क्योंकि उसके अध्यक्ष तो ख़ुद श्रीनिवासन हैं. रिपोर्ट से आईपीएल की छवि के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए वासन ने कहा उसे तो सबसे बडा धक्का तभी लगा था जब टीम से जुडे गुरूनाथ मेयप्पन का नाम सामने आया था. अब यह तो नैतिकता का सवाल है क़ायदे-क़ानून का नही. जब कोर्ट सीधे-सीधे एक व्यक्ति पर आरोप लगा रहा है तो अब गेंद बोर्ड के पाले में है कि वह क्या क़दम उठाता है. आईपीएल मामलों को अक्सर ज़ोर-शोर से उठाने वाले पूर्व क्रिकेटर और भारतीय जनता पार्टी के सांसद कीर्ति आज़ाद कहते हैं कि आईपीएल ही ऐसा क्यों है जिसमें स्पॉट फ़िक्सिंग मैच फ़िक्सिंग ड्रग पार्टी रेव पार्टी दुर्व्यवहार जैसी अलग-अलग घटनाएं होती हैं. आज़ाद कहते हैं हर फ्रेंचायज़ी और फ़िल्म स्टार आईपीएल को विवादो में रखना चाहता है जिससे वह लगातार सुर्ख़ियों में बना रहे. जब तक एन्फ़ोर्समेंट डिपार्टमेंट तह तक जाकर इसकी जांच नहीं करेगा तब तक यह सब राजनीतिक लोग इक्कठे होकर चोरी करते रहेंगे. पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह कहते हैं कि यह रिपोर्ट बीसीसीआई के लिए पूर्व चेतावनी है ख़ासकर आईपीएल के लिए. मनिंदर के अनुसार इन सब वजहों से आईपीएल की छवि पर द़ाग लगते है जबकि क्रिकेट के लिए यह एक बेहतरीन प्लेटफ़ार्म है. |
| DATE: 2014-02-10 |
| LABEL: sports |
| [583] TITLE: आईपीएल फ़िक्सिंग: मेयप्पन को लेकर फिर हंगामा |
| CONTENT: बीसीसीआई के अध्यक्ष और चेन्नई सुपरकिंग्स के मालिक एन श्रीनिवासन के दामाद गुरूनाथ मेयप्पन पर हंगामा शुरू हो गया है. जस्टिस मुदगल समिति ने कथित तौर पर उन्हें मैच फ़िक्सिंग और सट्टेबाज़ी का दोषी पाया है. आईपीएल में भ्रष्टाचार की जाँच के लिए गठित जस्टिस मुदगल समिति ने गुरुनाथ मेयप्पन के ख़िलाफ़ मैच फ़िक्सिंग और सट्टेबाज़ी के आरोपों को सही पाया है. मुदगल समिति की रिपोर्ट का स्वागत करते हुए आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी ने कहा है कि मुदगल रिपोर्ट ने उनकी बातों की पुष्टि कर दी है जो वो अब तक कहते रहे हैं. मोदी ने ट्वीट किया है कि पूरी रिपोर्ट पढ़ने के बाद ही वो आधिकारिक तौर पर अपनी कोई प्रतिक्रिया देंगे. लेकिन वो ट्विटर पर लगातार लिख रहे हैं. मोदी ने कहा है कि चेन्नई सुपरकिंग्स की तमाम जीत को रद्द किया जाना चाहिए उनको दिए गए ईनामी रक़म वापस लिए जाने चाहिए टीम के मालिकों पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए और इसमें शामिल खिलाड़ियों पर आजीवन प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए. चेन्नई सुपरकिंग्स के मालिक और बीसीसीआई के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन पर ख़ास हमला करते हुए मोदी ने ट्वीट किया है कि श्रीनिवासन की दो दिन पहले मिली सफलता बहुत कम समय के लिए रही. एन श्रीनिवासन को केवल दो दिन पहले ही आईसीसी का अगला अध्यक्ष चुना गया है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ समिति ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपी 170 पृष्ठों की रिपोर्ट में कहा है कि अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति और राजस्थान रॉयल्स के सह मालिक राज कुंद्रा के ख़िलाफ़ स्पॉट फ़िक्सिंग और सट्टेबाज़ी के आरोपों की और जाँच होनी चाहिए. रिपोर्ट में कहा गया है कि मेयप्पन चेन्नई सुपरकिंग्स के शीर्ष अधिकारी थे जबकि श्रीनिवासन ने दावा किया था कि वह एक क्रिकेटप्रेमी होने के नाते टीम से जुड़े थे. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अक्तूबर में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मुद्गल की अगुवाई में इस कमेटी का गठन किया था. कमेटी ने आईपीएल से जुड़े खिलाड़ियों अधिकारियों और पत्रकारों के बयानों के आधार पर इस रिपोर्ट को तैयार किया है. रिपोर्ट में बीसीसीआई को सलाह दी गई है कि उसे भ्रष्टाचार और मैच फ़िक्सिंग से निपटने के लिए सशस्त्र सेनाओं और पुलिस के पूर्व अधिकारियों की सेवाएं लेनी चाहिए. रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि श्रीनिवासन बीसीसीआई अध्यक्ष होने के साथ ही आईपीएल की एक टीम के मालिक भी हैं और यह हितों के टकराव का गंभीर मामला है जिस पर कोर्ट को विचार करना चाहिए. समिति ने क्रिकेट को साफ़ सुथरा बनाने और स्पॉट एवं मैच फ़िक्सिंग को ख़त्म करने लिए दस सिफ़ारिशें भी दी हैं. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रॉयल्स की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. अगर इन दोनों टीमों के मालिकों को भ्रष्टाचार को दोषी पाया जाता है तो आईपीएल के संविधान के मुताबिक़ उन टीमों को आईपीएल से बाहर किया जा सकता है. यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब 12 फ़रवरी को आईपीएल के अगले संस्करण के लिए बंगलौर में खिलाड़ियों की नीलामी होनी है. चेन्नई सुपरकिंग्स ने अपने पाँच खिलाड़ियों को अगले संस्करण के लिए बरक़रार रखा है. राजस्थान रॉयल्स ने भी अपने कुछ स्टार खिलाड़ियों पर भरोसा जताया है. आईपीएल-6 के दौरान स्पॉट फ़िक्सिंग का मामला उस समय सामने आया था जब राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों शांतकुमारन श्रीसंत अंकित चव्हाण और अजीत चंडीला को दिल्ली पुलिस ने गिरफ़्तार किया. श्रीसंत अंकित चव्हाण और अजीत चंडीला को गत 16 मई को 16 सटोरियों समेत दिल्ली पुलिस ने गिरफ़्तार किया था. उन पर 420 और 120बी के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया गया था. उनके साथ-साथ कई सटोरियों को भी पुलिस ने गिरफ़्तार किया. इसके बाद मुंबई पुलिस ने मेयप्पन और फिल्म कलाकार विंदू दारा सिंह को गिरफ़्तार किया. फिर दिल्ली पुलिस ने राजस्थान रॉयल्स के मालिक राज कुंद्रा का भी नाम लिया. बीसीसीआई ने फ़िक्सिंग मामले में श्रीसंत और अंकित चव्हाण पर आजीवन पाबंदी लगाई गई है. |
| DATE: 2014-02-10 |
| LABEL: sports |
| [584] TITLE: केवल 'भाई' नहीं हैं रामचंद्रन |
| CONTENT: भारतीय ओलंपिक संघ आईओए के अध्यक्ष चुने गए एन रामचंद्रन को भले ही दुनिया भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बीसीसीआई के अध्यक्ष एन श्रीनिसावन के भाई के तौर पर जानती है लेकिन एक खेल प्रशासक के रूप में उनका लंबा अनुभव है. दुनिया की सबसे अमीर खेल संस्था बीसीसीआई का अध्यक्ष होने के नाते श्रीनिसावन का बड़ा रुतबा और नाम है लेकिन रामचंद्रन ने उनसे इतर अपना अलग मुकाम हासिल किया है. विश्व स्क्वॉश महासंघ के मुताबिक़ रामचंद्रन का संबंध दक्षिण भारत की सबसे बड़ी सीमेंट कंपनी इंडिया सीमेंट के प्रोमोटरों के परिवार से है और हाल तक वह कंपनी के कार्यकारी निदेशक थे. आईओए चुनावों में रविवार को निर्विरोध चुने गए रामचंद्रन की खेलों में बहुत दिलचस्पी है और वह कई खेल संगठनों से जुड़े रहे हैं. जब वह भारतीय ट्राएथलॉन महासंघ के अध्यक्ष थे तो उन्होंने भारत में इस नए खेल के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभाई. भारतीय स्कवॉश रैकेट्स महासंघ के महासचिव के कार्यकाल के दौरान उन्होंने चेन्नई को देश की स्कवॉश राजधानी बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई और इस खेल को नई ऊँचाइयों पर ले गए. साल 2001 में रामचंद्रन को एशियन स्कवॉश फ़ेडरेशन का अध्यक्ष चुना गया और साल 2005 में एक बार फिर वह इस पद के लिए चुने गए. रामचंद्रन को साल 2001 में आईओए का एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट चुना गया और फिर चार साल बाद वह इसके उपाध्यक्ष बने. साल 2007 में रामचंद्रन को तमिलनाडु में खेल विकास प्राधिकरण की कार्यकारी समिति का सदस्य बनाया गया. साल 2008 में उन्हें वित्त और ख़रीद समिति का अध्यक्ष बनाया गया. वह 2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों की लेखा समिति के सदस्य और इन खेलों के कार्यकारी बोर्ड के सदस्य भी हैं. रामचंद्रन को साल 2008 में विश्व स्क्वॉश महासंघ का अध्यक्ष चुना गया. इसके अगले साल वह एशियन स्कवॉश फ़ेडरेशन और भारतीय स्कवॉश रैकेट्स महासंघ के संरक्षक बने. उसी साल तमिलनाडु सरकार ने उन्हें तमिलनाडु खेल विकास प्राधिकरण का उपाध्यक्ष नियुक्त किया. साल 2012 में रामचंद्रन को एक बार फिर चार साल के लिए विश्व स्क्वॉश महासंघ का अध्यक्ष चुना गया. रामचंद्रन की असली चुनौती आईओए की ओलंपिक आंदोलन में वापसी कराना है. आईओए चुनावों में आईओसी के पर्यवेक्षक भी मौजूद थे जिनकी रिपोर्ट के बाद ही आईओए का वनवास ख़त्म होगा. आईओए को दिसंबर 2012 में ललित भनोट और अभय सिंह चौटाला जैसे कथित रूप से विवादित लोगों को चुनने के बाद उठे बवाल के चलते निलंबित कर दिया गया था और भारत के खिलाड़ियों को सोची शीतकालीन ओलंपिक में तिरंगे के बिना उतरना पड़ा. |
| DATE: 2014-02-10 |
| LABEL: sports |
| [585] TITLE: आख़िर पीटरसन को क्यों हटाया गया? |
| CONTENT: इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड ईसीबी ने कहा है कि टीम के खिलाड़ियों को एकदूसरे पर भरोसा करने की ज़रूरत है और यही कारण है कि दिग्गज बल्लेबाज़ केविन पीटरसन के अंतरराष्ट्रीय करियर पर विराम लगाया गया. ईसीबी पर आरोप लग रहा था कि वह पीटरसन को बाहर किए जाने के बारे में स्पष्टीकरण नहीं दे रहा है. 33 साल के पीटरसन को ऑस्ट्रेलिया के हाथों एशेज सिरीज़ में 0-5 मिली हार के बाद केंद्रीय अनुबंध से मुक्त कर दिया गया था. लेकिन रविवार को ईसीबी ने कहा कि वह इंग्लिश टीम में ऐसी संस्कृति विकसित करना चाहता है जिसमें सभी खिलाड़ियों का टेस्ट और वनडे कप्तान एलेस्टर कुक के लिए पूरा समर्थन हो. ऑस्ट्रेलिया दौरे में इंग्लैंड की तरफ़ से सर्वाधिक रन बनाने के बावजूद सरे के बल्लेबाज़ पीटरसन सिरीज़ में कई बार जिस तरह से आउट हुए उसके लिए उनकी आलोचना हुई. ईसीबी ने पीटरसन को वेस्टइंडीज दौरे और ट्वेन्टी-20 विश्वकप के लिए नज़रअंदाज करके उनके करियर पर विराम लगा दिया है. ईसीबी ने शुरुआत में उन कारणों का सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया था जिनकी वजह पीटरसन को बाहर किया गया. राष्ट्रीय चयनकर्ता जेम्स व्हिटेकर ने गुरुवार को केवल इतना कहा कि यह टीम के पुनर्निर्माण का समय है. लेकिन ईसीबी ने अब प्रोफ़ेशनल क्रिकेटर्स एसोसिएशन के साथ एक संयु्क्त बयान में पीटरसन के बाहर का रास्ता दिखाए जाने के कारणों के बारे में जानकारी दी है. बयान के मुताबिक़ ऑस्ट्रेलिया में मिली करारी शिकस्त के बाद इंग्लिश टीम को फिर से खड़ा करने की ज़रूरत है. इसके लिए टीम के खिलाड़ियों के बीच एकदूसरे के प्रति भरोसा और कप्तान कुक के लिए समर्थन की ज़रूरत है. ईसीबी ने कहा इन्हीं कारणों के चलते पीटरसन के बिना टीम को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया गया. इससे पहले ईसीबी की तरफ़ से इस मामले में कोई स्पष्टीकरण नहीं देने के कारण इंग्लिश ड्रेसिंग रूम में नाराज़गी की ख़बरें आ रही थीं. विकेटकीपर मैट प्रायर ने टीवी प्रस्तोता पीयर्स मोर्गन के इन आरोपों का खंडन किया कि उन्होंने टीम डायरेक्टर एंडी फ्लावर की खुलेआम आलोचना की थी. फ्लावर ने इससे पहले इन आरोपों का खंडन किया था कि जनवरी में पद छोड़ने से पहले उन्होंने ईसीबी को उनमें या पीटरसन में से किसी एक को चुनने की सलाह दी थी. ईसीबी ने कहा क्रिकेट की दुनिया के बाहर के कुछ लोगों ने भी आरोप लगाए जिसमें ईसीबी के फ़ैसले के और इंग्लिश टीम के डायरेक्टर तथा खिलाड़ियों की निष्ठा पर सवाल उठाए गए. बोर्ड ने कहा ड्रेसिंग रूम में जो कुछ होता है उसे वहीं तक सीमित रहना चाहिए और इसका टीम के बाहर के लोगों से कोई लेनादेना नहीं है. ईसीबी ने कहा किसी भी खेल में यह टीम भावना का आधारभूत सिद्धांत है और इस तरह की कोई भी काम भरोसे और टीम भावना का उल्लंघन होगा. बोर्ड ने कहा इस सिद्धांत का सम्मान करते हुए यह बात बतानी ज़रूरी है कि आलोचकों का निशाना बने एंडी फ्लावर एलेस्टर कुक और मैट प्रायर को एशेज दौरे में शामिल सभी दूसरे खिलाड़ियों का समर्थन और सम्मान प्राप्त है. |
| DATE: 2014-02-10 |
| LABEL: sports |
| [586] TITLE: एन रामचंद्रन बने आईओए के नए अध्यक्ष |
| CONTENT: अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति या आईओसी से क़रीब 14 महीने तक निलंबित रहने के बाद आख़िरकार भारतीय ओलंपिक संघ अपनी सदस्यता बहाली की राह पर आगे बढ़ा है. बीसीसीआई प्रमुख एन श्रीनिवासन के भाई और वर्ल्ड स्क्वॉश फ़ेडरेशन के अध्यक्ष एन रामचंद्रन भारतीय एसोसिएशन के नए अध्यक्ष चुन लिए गए हैं. रविवार को हुए चुनावों में रामचंद्रन को निर्विरोध चुन लिए गया. भारतीय ओलंपिक संघ यानी आईओए की सदस्यता बहाल करने से पहले आईओसी की सबसे बड़ी शर्त यह थी कि एसोसिएशन साफ़ छवि वाले पदाधिकारियों को चुने. हालांकि चुनाव आईओसी की मंशा के अनुरूप कराए गए हैं लेकिन आईओए की सदस्यता की बहाली आईओसी के पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट आने के बाद ही होगी. चुनाव के पहले आईओए की कार्यकारी समिति की एक विशेष बैठक हुई. इस बैठक में आईओसी के कहे अनुसार आईओए ने अपने संविधान में बदलाव किया. नए नियमों को इस तरह से बनाया गया है कि कोई भी ऐसा आदमी जिसके ख़िलाफ़ आरोप तय कर दिए गए हों आईओए में कोई बड़ी भूमिका नहीं निभा पाए. इसका अर्थ यह हुआ कि ललित भनोट या उनकी तरह के विवादित लोग अब समिति में कोई पद नहीं ले पाएंगे. भनोट के ऊपर 2010 के कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान भ्रष्टाचार की शिकायतों को लेकर आरोप तय हो गए हैं. आईओए के संविधान में बदलाव के बाद भनोट अब आईओए का चुनाव तक नहीं लड़ पाएंगे. एन रामचंद्रन के अलावा खोखो फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष राजीव मेहता और ऑल इंडिया टेनिस एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल खन्ना भी निर्विरोध महासचिव और कोषाध्यक्ष चुने गए हैं. स्विमिंग फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के सीईओ वीरेंद्र नानावटी को वरिष्ठ उपाध्यक्ष चुना गया है. कुछ लोगों को जो बात अजीब लग सकती है वो यह है कि ना ही स्क्वॉश ना ही खोखो ओलंपिक खेलों का हिस्सा हैं. |
| DATE: 2014-02-10 |
| LABEL: sports |
| [587] TITLE: न्यूज़ीलैंड ने भारत को दी पहले टेस्ट में मात |
| CONTENT: ऑकलैंड के ईडेन पार्क में हुए पहले टेस्ट मैच में मेज़बान न्यूज़ीलैंड ने भारत को 40 रनों से हरा दिया. इसी के साथ भारत दो टेस्टों की इस सीरिज़ में 1-0 से पिछड़ गया है. न्यूज़ीलैंड ने पहली पारी में 503 रनों का स्कोर खड़ा किया था. जिसके जवाब में भारत ने 202 रन बनाए. मेज़बान दल ने दूसरी पारी में 105 रने बनाए थे. जीत के लिए भारत को 407 रन की ज़रूरत थी. तीसरे दिन की समाप्ति पर भारत ने एक विकेट खोकर 87 रन बना लिए थे. गेंदबाज़ों ने भारत को मैच में वापस ला दिया था और तीसरे की दिन का खेल ख़त्म होने के बाद मैच में थोड़ा रोमांस पैदा हो गया था. लेकिन रविवार को टेस्ट मैच के चौथे दिन भारत कुल 366 रन ही बना पाया. इस तरह न्यूज़ीलैंड ने पहले टेस्ट को जीत लिया. भारत की तरफ़ से शिखर धवन ने शतक जड़ते हुए 115 रन बनाए. लेकिन उनका शतक भी मैच बचाने में नाकाम रहा. विराट कोहली ने 67 रन और कप्तान 39 रन बनाए. पहले बैटिंग करते हुए न्यूज़ीलैंड की तरफ़ से पहली पारी में केन विलियम्सन ने 113 रन और कप्तान ब्रैंडन मैकुलम ने 224 रन बनाए. पहली पारी में भारत ने न्यूज़ीलैंड के तीन विकेट 30 रन पर चटका दिए थे लेकिन विलियम्सन और मैकुलम ने 221 रन की साझेदारी करके अपनी टीम को संकट से उबार लिया था. पहली पारी में भारत की तरफ़ से सबसे अधिक विकेट लेने वाले गेंदबाज़ रहे ईशांत शर्मा. ईशांत ने 134 रन देकर छह विकेट लिए थे. ज़हीर ख़ान ने दो और रविंद्र जाडेजा और मोहम्मद शमी ने एक-एक विकेट लिया. न्यूज़ीलैंड के 503 रनों के जवाब में बल्लेबाज़ी करने उतरी भारतीय टीम का प्रदर्शन निराशाजनक रहा. भारत सभी विकेट खोकर 202 रन ही बना सका. पहली पारी में भारत की तरफ़ से सबसे सफल बल्लेबाज़ रहे रोहित शर्मा जिन्होंने 72 रन बनाए. पहली पारी में न्यूज़ीलैंड की तरफ़ सभी गेंदबाज़ों ने अच्छा प्रदर्शन किया. न्यूज़ीलैंड की तरफ़ से सबसे अधिक चार विकेट लिए नील वैग्नर ने. ट्रेंट बाउल्ट और टीम साउदी ने तीन-तीन विकेट आपस में बांटे. दूसरी पारी में भारतीय गेंदबाज़ों ने ज़ोरदार वापसी की. भारतीय गेंदबाज़ों ने न्यूज़़ीलैंड की पूरी टीम को मात्र 41 ओवर और दो गेंद पर 105 रन पर समेट दिया. दूसरी पारी में शमी और ईशांत ने तीन-तीन विकेट लिए. वहीं ज़हीर ने दो और जाडेजा ने एक विकेट लिया. भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी ने न्यूज़ीलैंड दौरे पर लगातार छठी बार टॉस जीतकर पहले गेंदबाज़ी का फ़ैसला करते हुए न्यूज़ीलैंड को पहले बल्लेबाज़ी के लिए आमंत्रित किया था. दूसरी पारी में भी न्यूज़ीलैंड की तरफ वैग्नर बाउल्ट और साउदी ने सभी 10 विकेट आपस में बांट लिए. वैग्नर ने चार और बाउल्ट और साउदी ने तीन-तीन विकेट लिए. |
| DATE: 2014-02-09 |
| LABEL: sports |
| [588] TITLE: कितनी मजबूत है सोची में भारत की चुनौती |
| CONTENT: शिवा केशवन नदीम इक़बाल और हिमांशु ठाकुर रूस के सोची शहर में हो रहे विंटर ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. इन तीनों एथलीटों में शिवा केशवन सबसे अनुभवी हैं. शिवा केशवन ल्यूज सिंगल्स स्पर्धा में भाग लेंगे. उनके लिए विंटर ओलंपिक में अपना हुनर दिखाने का यह पांचवां अवसर है. नदीम इक़बाल क्रॉस कंट्री स्कीइंग में भाग लेंगे. नदीम इससे पहले इटली में विश्व चैंपियनशिप में हिस्सा ले चुके हैं. हिमांशु ठाकुर एल्पाइन स्कीइंग में हिस्सा लेंगे. हिमांशु ठाकुर भी ऑस्ट्रेलिया में पिछले साल हुई विश्व चैंपियनशिप में भाग ले चुके हैं. शिवा केशवन शनिवार और रविवार को ल्यूज स्पर्धा में भाग लेंगे. 32 साल के शिवा केशवन साल 2011-12 में एशिया कप में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं. इसके अलावा उन्हें पिछले महीने जापान के नागानो शहर में रजत पदक भी मिला. उनके नाम ल्यूज स्पर्धा में सबसे तेज़ रफ़्तार का एशियाई रिकॉर्ड भी है. उन्होंने यह रिकार्ड साल 2011-12 में जापान में एशिया कप के दौरान बनाया और 134-3 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार निकाली. इससे पहले वह केवल 16 साल की उम्र में साल 1998 में जापान के नागानो शहर में हुए विंटर ओलंपिक में भाग लेकर सबसे कम उम्र में यह उपलब्धि हासिल करने का भारतीय रिकॉर्ड भी बना चुके हैं. तब शिवा केशवन 28वें स्थान पर रहे थे. जापान में भारतीय उपस्थिति के नाम पर केवल शिवा ही थे. इसके बाद साल 2002 में अमरीका के साल्ट लेक सिटी शहर में हुए विंटर ओलंपिक में भी शिवा केशवन इकलौते भारतीय थे. वहां वह 33वें स्थान पर रहे थे. तीसरी बार विंटर ओलंपिक में शिवा केशवन ने साल 2006 में इटली में भाग लिया और 25वें स्थान पर रहे. विंटर ओलंपिक में चौथी बार उन्होंने साल 2010 में कनाडा के वेंकूवर शहर में 28वां स्थान हासिल किया. विंटर ओलंपिक के अभी तक के आंकड़े शिवा को लेकर कोई बड़ा भरोसा नहीं जगाते लेकिन एशियाई स्तर पर उनका हालिया प्रदर्शन थोड़ी उम्मीद ज़रूर जगाता है. हिमांशु ठाकुर के पास व्यक्तिगत रूप से अनुभव की कोई कमी नहीं है लेकिन उपलब्धियां हासिल करने के लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. कुछ-कुछ ऐसी ही स्थिति क्रॉस कंट्री स्कीइंग में भाग लेने वाले नदीम इक़बाल की भी है. वैसे भी भारत में पिछले दिनों सुविधाओं के नाम पर इनके पास कुछ ख़ास नहीं था. यहां तक कि विंटर ओलंपिक में इस्तेमाल होने वाले बुनियादी उपकरण तक की कमी ये एथलीट महसूस कर रहे थे. ऐसे में कोई चमत्कार ही इन्हें सोची में पदक के क़रीब पहुंचा सकता है लेकिन पहली बार विंटर ओलंपिक के इतिहास में तीन भारतीय खिलाड़ियों की मौजूदगी ने इन खेलों में भारतीय खेल प्रेमियों की दिलचस्पी तो जगा ही दी है. इतना ज़रूर है कि भारतीय ओलंपिक संघ के निलंबन के कारण यह तीनों भारतीय एथलीट बिना तिरंगे के ही मैदान में उतरने को मजबूर हैं. |
| DATE: 2014-02-08 |
| LABEL: sports |
| [589] TITLE: भारतीय गेंदबाज़ों ने बनाया ऑकलैंड टेस्ट को रोमांचक |
| CONTENT: न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ भारतीय गेंदबाज़ों के बेहतरीन प्रदर्शन ने ऑकलैंड टेस्ट को रोमांचक स्थिति में ला खड़ा किया है. टेस्ट के तीसरे दिन ज़हीर ख़ान मोहम्मद शमी और ईशांत शर्मा की तिकड़ी ने ज़ोरदार प्रदर्शन करते हुए न्यूज़ीलैंड की दूसरी पारी को 105 रनों पर समेट दिया. जीत के लिए 406 रन बनाने उतरी भारतीय टीम ने तीसरे दिन का खेल ख़त्म होने तक एक विकेट के नुकसान पर 87 रन बना लिए हैं. मुरली विजय के सस्ते में आउट हो जाने के बाद दौरे में अब तक बेहद साधारण रहे शिखर धवन की फॉर्म में वापसी दिखी और वो 49 रन बनाकर नॉट आउट हैं. क्रीज़ पर उनका साथ दे रहे हैं चेतेश्वर पुजारा जो 22 रन बनाकर खेल रहे हैं. मैच में अभी दो दिन बाक़ी हैं और ऐसे में अगर मौसम ठीक रहा तो इस टेस्ट का नतीजा निकलना तय है. तीसरे दिन का खेल जब शुरू हुआ तो न्यूज़ीलैंड के 503 रनों के जवाब में भारत का स्कोर चार विकेट के नुकसान पर 130 रन था. लेकिन भारतीय पारी सिर्फ़ 72 रन और जोड़कर 202 रनों पर ऑल आउट हो गई. सबसे ज़्यादा 72 रन रोहित शर्मा ने बनाए जबकि रविंद्र जडेजा 30 रन बनाकर नॉट आउट रहे. न्यूज़ीलैंड को भारत से पहली पारी के आधार पर 301 रनों की बढ़त मिली लेकिन हैरानी की बात ये रही कि उन्होंने भारत को फ़ॉलोऑन खेलने के लिए नहीं कहा और ख़ुद बैटिंग करने का फ़ैसला किया. न्यूज़ीलैंड का ये फ़ैसला उनके लिए उल्टा साबित हुआ और भारतीय तेज़ गेंदबाज़ों ने पिच से मिल रही मदद का पूरा फ़ायदा उठाया. मोहम्मद शमी और ज़हीर ख़ान की बेहतरीन गेंदबाज़ी के चलते न्यूज़ीलैंड की आधी टीम 25 रनों पर पवैलियन वापस जा चुकी थी. इसके बाद मोर्चा संभाला ईशांत शर्मा ने और न्यूज़ीलैंड की पूरी टीम 105 रन बनाकर ऑलआउट हो गई. शमी और ईशांत ने तीन-तीन और ज़हीर ख़ान ने दो विकेट लिए. न्यूज़ीलैंड की ओर से रॉस टेलर ही कुछ प्रतिरोध कर पाए और उन्होंने 41 रन बनाए. |
| DATE: 2014-02-08 |
| LABEL: sports |
| [590] TITLE: सोची ओलंपिक में 'तिरंगे के बिना' भारतीय खिलाड़ी |
| CONTENT: सोची शीतकालीन ओलंपिक में हिस्सा ले रहे शिवा केशवन का सपना था कि भारतीय तिरंगे के साथ ओलंपिक में शिरकत ही नहीं करें बल्कि पदक भी जीतें. तिरंगे के साथ हिस्सा लेने का उनका सपना तो पूरा नहीं हो सका लेकिन उनका वादा पदक के साथ देश लौटकर आने का है. सोची में अपनी स्पर्धा ल्यूज़ की तैयारियों में लगे शिवा केशवन ने बीबीसी को मेल के ज़रिए बताया मेरी हार्दिक इच्छा भारतीय तिरंगे के साथ ओलंपिक में शिरकत करने की थी ऐसा नहीं कर सका. अलबत्ता अपने इवेंट में गोल्ड मेडल जीतने की कोशिश करूंगा. उम्मीद है कि कामयाब होकर लौटूंगा. ओलंपिक में पहली बार भारतीय टीम के हाथों में तिरंगा नहीं होगा. उन्हें ओलंपिक के झंडे तले ही मार्चपास्ट में हिस्सा लेना होगा. वह बतौर स्वतंत्र एथलीट इस ओलंपिक में हिस्सा ले रहे हैं. बगैर तिरंगे के ओलंपिक में उतरना क्या होता है ये कोई खिलाड़ी ही महसूस कर सकता है. पूर्व ओलंपियनों और खेल की जानी-मानी हस्तियों ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया है. पूर्व ओलंपियन और हॉकी टीम के कप्तान रहे परगट सिंह भी इसे अफ़सोसजनक कहते हैं. उन्होंने कहा हमारी टीम राष्ट्रीय झंडे के साथ शीतकालीन ओलंपिक में शिरकत नहीं कर रही. मैं समझ सकता हूं कि ऐसी स्थिति में हमारे खिलाड़ी कितना खराब महसूस कर रहे होंगे. उन्होंने इस स्थिति के लिए आईओए के पूर्व कर्ताधर्ताओं को ज़िम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा भारतीय ओलंपिक संघ में बैठे कुछ लोगों के कारण ही हमें ये दिन देखना पड़ा. इन लोगों को देश की परवाह ही कहाँ है. अगर ऐसा होता तो ये स्थिति आती ही नहीं. गौरतलब है कि ये स्थिति अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति आईओसी द्वारा भारतीय ओलंपिक संघ आईओए की सदस्यता निलंबित करने से पैदा हुई है. भारतीय ओलंपिक संघ से जुड़े सदस्य और तमाम खेल संघों के पदाधिकारी चाहते तो ये स्थिति पहले ही सुलझाई जा चुकी होती और सोची ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ी भी गर्व से हाथों में तिरंगा लिए होते. सितंबर 2012 में भारतीय ओलंपिक संघ के चुनाव में कुछ उम्मीदवारों के हिस्सा लेने पर ऐतराज़ जताते हुए उनकी जीत के बाद आईओसी ने भारतीय संघ को प्रतिबंधित कर दिया था. आईओसी के कड़े रुख़ के बाद नौ फरवरी को फिर से आईओए के चुनाव होने जा रहे हैं. भारतीय ओलंपिक संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और वर्ष 2011 से कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर काम कर रहे विजय कुमार मल्होत्रा कहते हैं कि ये दुर्भाग्यजनक स्थिति जरूर है लेकिन लगता है कि नौ फरवरी को ये हालात सुलझा लिए जाएंगे. वह कहते हैं आईओसी ने हमें दस फरवरी से पहले नए चुनाव कराने के लिए कहा था. उससे पहले कुछ कारणों से चुनाव नहीं कराए जा सके. अब मैं उम्मीद करता हूँ कि हमारा निलंबन खत्म हो जाएगा और भविष्य में होने वाले खेलों में हमारा तिरंगा फिर से ऊंचा होगा. वहीं भारतीय ओलंपिक संघ के पूर्व महासचिव रणधीर सिंह ने कहा कि चूंकि वह खुद अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति से जुड़े हैं लिहाजा इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकते. देश को सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त जैसे दो ओलंपिक पदक विजेता पहलवान देने वाले महाबली सतपाल ने भी इसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बताया. उन्होंने कहा हमारा खेलों का ग्राफ ऊपर की ओर जाने लगा था कहीं ऐसा नहीं हो कि ये ग्राफ नीचे आ जाए. भारतीय ओलंपिक संघ और सरकार को इस विवाद को जल्दी सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए. ओलंपियन तीरंदाज संजीव सिंह ने कहा ये बहुत उदास करने वाली बात है. देश के झंडे तले ओलंपिक में हिस्सा लेना किसी भी खिलाड़ी के लिए बहुत सम्मान की बात होती है. इतने बड़े मंच पर हर खिलाड़ी चाहता है कि दुनिया देखे कि वह अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रहा है. भारतीय टेबल टेनिस संघ के सचिव धनराज चौधरी ने कहा कि अच्छी ख़बर मिलने वाली है. नौ फरवरी को आईओए के चुनाव के बाद नए संघ का गठन हो जाएगा. फिर उम्मीद है कि आईओसी से भारत को शीघ्र मान्यता मिल जाएगी. |
| DATE: 2014-02-07 |
| LABEL: sports |
| [591] TITLE: ऑकलैंड टेस्ट में भारत की हालत ख़स्ता |
| CONTENT: ऑकलैंड में न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ पहले टेस्ट मैच में भारत की हालत ख़राब है. दूसरे दिन का खेल ख़त्म होते समय भारत ने चार विकेट के नुक़सान पर 130 रन बना लिए थे. न्यूज़ीलैंड ने अपनी पहली पारी में 503 रन बनाए हैं. मैच के दूसरे दिन पहली पारी में खेलने उतरी भारतीय टीम ने पहले ही ओवर में अपने दो विकेट गंवा दिए. शिखर धवन बिना खाता खोले ट्रैंट बोल्ट की दूसरी गेंद पर आउट हो गए. उन्हें केन विलियमसन ने कैच किया. टीम इंडिया अभी इस झटके से उबर भी नहीं पाई थी कि इसी ओवर की अंतिम गेंद पर चेतेश्वर पुजारा भी चलते बने. वह केवल एक रन ही बना पाए. विस्फोटक बल्लेबाज़ विराट कोहली चार रन बनाकर पवेलियन लौटे. उन्हें टिम साउथी ने पीटर फल्टन के हाथों कैच आउट करवाया. इस तरह भारत ने दस विकेट तक अपने तीन विकेट गंवा दिए थे. चौथा विकेट मुरली विजय के रूप में गिरा. उन्हें 26 रन के व्यक्तिगत स्कोर पर नील वागनर ने बोल्ड किया. विजय ने 60 गेदों का सामना किया और इस दौरान पाँच चौके लगाए. मैच के दूसरे दिन का खेल ख़त्म होते समय भारत ने 39 ओवर में चार विकेट के नुक़सान पर 130 रन बना लिए थे. रोहित शर्मा 67 रन और आजिंक्य रहाणे ने 23 रन बना कर क्रीज पर जमे हुए थे. ये दोनों बल्लेबाज़ पांचवें विकेट की अविजित साझेदारी में 79 रन जोड़ चुके हैं. इसके पहले न्यूज़ीलैंड की पूरी टीम 503 रन बनाकर आउट हो गई. भारत की ओर से ईशांत शर्मा सबसे सफल गेंदबाज़ रहे. उन्होंने 33-4 ओवर की गेंदबाज़ी की और 134 रन देते हुए छह विकेट हासिल किए. ज़हीर ख़ान को दो मोहम्मद शामी को एक और रविंद्र जडेजा को एक विकेट मिला था. हालांकि मैच में भारत को पहले दिन अच्छी शुरुआत मिली थी. लेकिन टीम उसका फ़ायदा नहीं उठा पाई. भारत ने न्यूज़ीलैंड के तीन विकेट 30 रन पर ही चटका दिए थे. लेकिन केन विलियम्सन और कप्तान ब्रैंडन मैकुलम ने पारी को संभाल लिया था. कप्तान मैकुलम 224 रन की शानदार पारी खेलकर अंतिम विकेट के रूप में आउट हुए. उन्होंने 307 गेंदों का सामना किया और 29 चौके तथा पाँच छक्के लगाए. |
| DATE: 2014-02-07 |
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| [592] TITLE: सोची ओलंपिक: क्या चमकेगी रूस की छवि |
| CONTENT: ये जुलाई 1980 था और मॉस्को का सेंट्रल लेनिन स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था. सोवियत नेता लियोनिद ब्रेझनेव ने ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों के शुरुआत की घोषणा की. मज़बूत पहरे और रंगारंग समारोह के बीच ब्रेझनेव ने अपने स्वागत भाषण में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं किय कि कुछ ही साल पहले वह गंभीरता से इस पूरे प्रोजेक्ट को ही ख़त्म करने का विचार कर रहे थे. साल 1975 में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव ब्रेझनेव ने पोलित ब्यूरो में एक सहयोगी को शिकायती लहजे में लिखा था कि अगर मॉस्को ओलंपिक खेलों की मेजबानी करता है तो इस पर बहुत ख़र्च होगा और घोटाले होने की भी संभावना है. उन्होंने लिखा कुछ कामरेडों ने मुझे सुझाव दिया है कि छोटा सा जुर्माना चुकाकर हम इस झंझट से मुक्ति पा सकते हैं. लेकिन व्लादीमीर पुतिन ने अपने ओलंपिक खेलों के लिए एकदम अलग दृष्टिकोण अपनाया. शुरुआत से ही राष्ट्रपति पुतिन पूरे मनोयोग से सोची ओलंपिक में शामिल रहे. रूस को खेलों की मेजबानी दिलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति में लॉबिंग करने से लेकर खेल स्थलों की निगरानी और हाल में विकसित हो चुकी खेल सुविधाओं के परीक्षण तक उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई. सोची उनका पसंदीदा प्रोजक्ट है क्योंकि वह इन खेलों के रूस को दुनिया के सामने एक मज़बूत विश्व शक्ति के तौर पर पेश करने और ख़ुद को एक महान नेता के तौर पर दिखाने के अवसर के रूप में देख रहे हैं. ब्रेझनेव जिन दो बातों से डर रहे थे वे थीं लगातार बढती लागत और संभावित घोटाले. यही दोनों बातें पुतिन के ओलंपिक खेलों में सामने आई हैं. इन खेलों के लिए स्थलों और आधारभूत ढ़ांचे पर क़रीब 50 अरब डॉलर की रकम ख़र्च हो चुकी है और इन्हें अब तक का सबसे महंगा ओलंपिक माना जा रहा है. इन खेलों से जुड़ी गड़बड़ियों की फेहरिश्त जो पश्चिम में सुर्ख़ियां बनती रही हैं उतनी ही लंबी है जितने कि सोची के स्की स्लोप्स. इनमें भ्रष्टाचार निर्माण कार्यों से जुड़े मज़दूरों को भुगतान नहीं होने की शिकायत रूस में समलैंगिकों के अधिकारों और सुरक्षा को लेकर व्याप्त चिंताएं शामिल हैं. मॉस्को कार्नेगी सेंटर में सीनियर एसोसिएट लिलिया श्वेत्सोवा कहती हैं यह ओलंपिक पहले ही एक स्कैंडल है. ये भ्रष्टाचार अक्षमता अविवेक अत्यधिक घमंड और महत्वाकांक्षाओं से घिरा हुआ है. उन्होंने कहा ये एक ऐसे देश में पैसे की बर्बादी है जो साधारण जनता के लिए बेहतर ज़िदगी भी नहीं जुटा सकता. ये मुझे मुसोलिनी और चाउशेस्कू की याद दिलाता है. उन्होंने भी ग्लैमरम प्रोजेक्ट्स बनाए जो अब विसंगितियों के प्रतीक हैं. रूसी अधिकारी इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं कि ओलंपिक के फंड में चोरी की गई या ग़लत तरीक़े से ख़र्च किया गया. रूसी ओलंपिक कमेटी के अध्यक्ष अलेक्जेंडर झुकोव ने बताया रूस के ऑडिट चैंबर और रूस के टैक्स सर्विस डिपार्टमेंट ने सोची से संबंधित भ्रष्टाचार के कोई मामले नहीं पाए हैं. झुकोव ये भी कहते हैं कि संरचना परियोजनाओं की लागत को ओलंपिक बिल में जोड़ना गलत होगा. उन्होंने कहा सोची के लिए कभी केवल एक सड़क इस्तेमाल होती थी. अब वहां 20 नई सड़कें बन गई हैं. वहां नया सीवेज सिस्टम नया पॉवर स्टेशन और नई गैस पाइप लाइनें हैं. लेकिन ये ओलंपिक के ख़र्चे से अलग है. पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए सोची को इन सारी संरचनाओं की ज़रूरत थी. ये आख़िरकार रूस का मुख्य रिजॉर्ट है. जब सोवियत संघ ने साल 1980 में ग्रीष्मकालीन ओलिंपक की मेज़बानी की थी तब 60 से भी ज़्यादा देशों ने अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत मौजूदगी के कारण इन खेलों का बहिष्कार किया था. इस बार राष्ट्रपति पुतिन की इस ओलंपिक पार्टी को कोई अंतरराष्ट्रीय बॉयकाट नहीं हो रहा है. हालांकि बहुत पश्चिम नेताओं ने सोची नहीं जाने का फ़ैसला किया है. रूस के सरकारी टेलीविज़न के प्रस्तोता व्लादीमीर सोलोवयोव कहते हैं ये हैरानी की बात होगी अगर सभी अंतरराष्ट्रीय नेता किसी एक ओलंपिक में शिरकत करें. उन्होंने कहा उनके पास कोई बेहतर काम नहीं है. यह राजनीति या राजनेताओं का अखाड़ा नहीं है. ये खेल हैं. अगर राष्ट्रपति ओबामा एथलीट होते और इन खेलों में हिस्सा नहीं लेते तो सोची ओलंपिक की छवि खराब होती. शुक्रवार को रूसी टेलीविज़न सोची ओलंपिक में पुतिन के व्यक्तिगत योगदान पर एक डॉक्यूमेंट्री प्रसारित करेगा. इस सप्ताह इसके प्रीव्यू में राष्ट्रपति ने खुलासा किया कि किस तरह व्यक्तिगत तौर पर उन्होंने ओलंपिक स्थल का चयन किया था. इसने मुझे जार पीटर महान की याद दिला दी जिन्होंने 300 साल पहले अपनी नई राजधानी के लिए सेंट पीटर्सबर्ग का चयन किया था. पीटर का राजधानी को मॉस्को से सेंट पीटर्सबर्ग ले जाने का मकसद रूस को यूरोप के क़रीब लाने की कोशिश थी. नया शहर पश्चिम के लिए उनकी खिड़की थी. राष्ट्रपति पुतिन ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सोची ओलंपिक पश्चिम के साथ सेतु का काम करेगा. लेकिन लगता नहीं कि ये ओलंपिक खेल आधुनिक रूस को पश्चिम के क़रीब ला पाएगा. लिलिया श्वेत्सोवा कहती हैं पुतिन ख़ुद को बनाए रखने के अपने तौरतरीक़े नहीं बदल सकते और उनका सिद्धांत पश्चिम पर नियंत्रण और रूस को परंपरागत सभ्यता के केंद्र स्थापित करना है. वह कहती हैं पश्चिमी सभ्यता के विरोध के उनके तरीक़े से हम पश्चिम से दूर ही हो रहे हैं. सोची कुछ नहीं बदल सकता. मैं मॉस्को से उत्तर में कुछ मील दूर मितिशी कस्बे में पहुंचता हूं जहां एक सड़क 1980 के नाम पर ओलंपिक प्रॉस्पेक्ट कही जाती है. यहां सफाई कर्मचारी सड़क पर इकट्ठा बर्फ साफ कर रहा है और स्थानीय निवासी फर के कोटों में लिपटे हुए पूर्व सोवियत दौर के अपार्टमेंट ब्लॉक्स से गुजरते हुए दुकानों या ऑफिसों की ओर आवाजाही कर रहे हैं. मैं यहां लोगों से बातचीत करता हूं और ये पाता हूं कि उनकी सोची स्कैंडल्स में बहुत कम दिलचस्पी है. विक्टर कहते हैं मैं खेलों के शुरू होने का इंतजार नहीं कर सकता. मैं जानता हूं कि उन पर काफी धन ख़र्च हुआ है लेकिन ये तो स्वाभाविक ही है ओलंपिक एक अच्छी भावना है. राष्ट्रपति पुतिन जानते हैं कि उनके ओलंपिक ने विदेशों में विवाद पैदा किए हैं. वह अच्छी तरह वाकिफ़ हैं कि बहुत से पश्चिमी नेता इसमें शिरकत नहीं करने वाले. लेकिन उन्हें ये भी मालूम है कि ज़्यादातर रूसी लोग टीवी सेटों से चिपके रहेंगे. उन्हें ये चिंता रहेगी कि उनका देश कितने पदक जीतेगा न कि इस शो पर कितना पैसा ख़र्च हुआ. |
| DATE: 2014-02-07 |
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| [593] TITLE: सोचीः 'समलैंगिकों का स्वर्ग' |
| CONTENT: रूस में काले सागर के तट पर स्थित शहर सोची में शुक्रवार से शीत ओलंपिक खेल शुरू हो रहे हैं लेकिन क्या आप सोची की उन ख़ूबियों के बारे में जानते हैं जो इस शहर को ख़ास बनाती हैं. यहां हम आपको सोची के बारे में पांच ऐसी रोचक बातें बता रहे हैं जिसके बारे में शायद आपको पता न हो. शीतकालीन ओलंपिक का आयोजन सोची में न होकर उसके दो उपनगरीय इलाक़ों एडलर और क्रासनाया पोल्याना में किया जा रहा है. एडलर समुद्र के किनारे है जबकि क्रासानाया पोल्याना पहाड़ों के बीच स्थित है. ग्रेटर सोची काले सागर के तट पर 90 मील लंबाई में फैला हुआ है और दावा किया जाता है कि ये यूरोप का सबसे लंबा शहर है. वास्तव में जिस जगह पर ओलंपिक का आयोजन किया जा रहा है वो अब्खाज़िया के नजदीक है. अब्खाज़िया पूर्वी पट पर स्थित एक विवादित क्षेत्र है जो ख़ुद को स्वतंत्र राज्य मानता है. सोवियत संघ के दौर में सोची बड़ी संख्या में समलैंगिकों यानी गे लोगों का अड्डा बन गया था. साल 1993 तक रूस में समलैंगिक संबंधों को अपराध माना जाता था. ऐसे में समलैंगिक रुझान वाले लोग सोची आना अधिक पसंद करते थे. उनके लिए सोची जाना आसान था और ये स्थान उनके परिवारों और मित्रों की नज़र से काफ़ी दूर था. सोची के दरवाजे आज भी ऐसे गे लोगों के लिए खुले हैं जिन्हें उनके समाज में पसंद नहीं किया जाता है और जो विदेश यात्रा का ख़र्च नहीं उठा सकते हैं. सोची पहली बार शीत ओलंपिक की मेजबानी कर रहा है लेकिन वास्तव में यहां टेनिस जैसे गर्मियों के खेल अधिक लोकप्रिय हैं. ख़ासतौर से बच्चे और जवान यहां साल भर टेनिस की प्रैक्टिस करते हैं. दुनिया की शीर्ष टेनिस खिलाड़ी रह चुकीं मारिया शारापोवा और येवगेनी काफेलनिकोव दोनों को सोची में ही पहली सफलता मिली थी. काफेलनिकोव का जन्म सोची में ही हुआ था जबकि शारापोवा का जन्म साइबेरिया में हुआ था. लेकिन जब वो चार साल की थीं तो उनके माता-पिता सोची आ गए थे. शारापोवा ने शुरुआती प्रशिक्षण सोची में ही लिया जिसके बाद वो अमरीका के फ्लोरिडा चली गईं. उनकी दादी अभी भी सोची में रहती हैं और शारापोवा सोची ओलंपिक में एक टीवी संवाददाता की भूमिका में नजर आएंगी. सोची का केवल एक खिलाड़ी ही अपनी धरती पर हो रहे ओलंपिक खेलों में शामिल हो रहा है. ये खिलाड़ी एलेक्सी वोएवोदा हैं. वोएवोदा एक पेशेवर आर्म रेसलर हैं और उनके नाम कई ख़िताब हैं. वो 2011 में बोबस्लेय में वर्ल्ड चैंपियन थे और उन्होंने ट्यूरिन ओलंपिक में रजत और वैंकूवर ओलंपिक में कांस्य पदक जीता. सोची में वो दो-पुरुष और चार-पुरुष स्पर्धा में प्रमुख ब्रेकमैन होंगे. इस स्पर्धा में रूस को पदक हासिल करने की काफ़ी उम्मीद है. सोची में पिछले दो दशक से रूसी फ़िल्म महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है. इस आयोजन का नाम किनोत्वर है. यह रूस का सबसे बड़ा फिल्म महोत्सव है और इसका मुख्यालय जानेमाने होटल जेमचुझीना में है. इस होटल को 1973 में बनाया गया था और सोची घूमने आने वाले प्रसिद्ध संगीतकार इसी होटल में ठहरते थे. इस होटल में अभी भी सोवियत स्टाइल की सजावट है. इस फ़िल्म महोत्सव के दौरान कई पापराजी समुद्र तटों पर फुर्सत के क्षण बिता रहे फ़िल्मी सितारों की तस्वीर खींचने की ताक में रहते हैं. |
| DATE: 2014-02-07 |
| LABEL: sports |
| [594] TITLE: लॉर्ड्स पर आमने सामने होंगे सचिन और वॉर्न |
| CONTENT: भारत के पूर्व महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व लेग स्पिनर शेन वॉर्न क्रिकेट के मक्का कहे जाने वाले मैदान लॉर्ड्स पर आमने सामने होंगे. 50 ओवर के मैच में सचिन मेरिलिबोन क्रिकेट क्लब एमसीसी की कप्तानी करेंगे जबकि शेन वॉर्न रेस्ट ऑफ़ द वर्ल्ड टीम के कप्तान होंगे. यह मैच मैदान के 200 साल पूरे होने के मौक़े पर हो रहे आयोजनों का हिस्सा होगा. एमसीसी के अध्यक्ष माइक गैटिंग टीम के प्रबंधक होंगे जबकि राहुल द्रविड़ भी इस टीम का हिस्सा होंगे. दक्षिण अफ़्रीका के पूर्व तेज़ गेंजबाज़ शॉन पोलॉक रेस्ट ऑफ़ द वर्ल्ड टीम के प्रबंधक होंगे. इंग्लैंड की महिला क्रिकेट टीम की कप्तान शेरलॉट एडवर्ड्स एमसीसी की महिला टीम की कप्तानी करेंगी जबकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद आईसीसी 19 मई को शेष विश्व महिला टीम का चुनाव करेगी. यह दूसरी बार होगा जब सचिन तेंदुलकर लॉर्ड्स पर इस तरह के मैच का हिस्सा होंगे. इससे पहले द डायना प्रिंसेज़ ऑफ़ वेल्स मेमोरियल मैच में वे 1998 में रेस्ट ऑफ़ द वर्ल्ड टीम के कप्तान थे. 664 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों में रिकॉर्ड 34357 रन बनाने वाले सचिन तेंदुलकर ने कहा लॉर्ड्स क्रिकेट खेलने के लिए एक विशेष जगह है और मैं इस मैदान के दो सौ साल पूरे होने के अवसर पर होने वाले मैच को लेकर उत्साहित हूँ. लॉर्ड्स पर खेले चार टेस्ट मैचों में 19 विकेट लेने वाले शेन वॉर्न कहते हैं मैं वापस मैदान पर आने को लेकर बेहद उत्साहित हूँ. मुझे विश्वास है मैच में बहुत मज़ा आएगा और दुनिया के सबसे प्रसिद्ध क्रिकेट मैदान के 200 साल पूरे होने के समारोह में शामिल होना आनंददायक होगा. |
| DATE: 2014-02-06 |
| LABEL: sports |
| [595] TITLE: अच्छी शुरुआत का फ़ायदा नहीं उठा पाई टीम इंडिया |
| CONTENT: भारतीय टीम न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ ऑकलैंड में खेले जा रहे पहले क्रिकेट टेस्ट के शुरुआती दिन गुरुवार को अच्छी शुरुआत का फ़ायदा नहीं उठा पाई और उसने मेजबान टीम को वापसी का मौका दे दिया. भारत ने न्यूज़ीलैंड के तीन विकेट 30 रन पर चटका दिए थे लेकिन केन विलियम्सन और कप्तान ब्रैंडन मैकुलम ने फिर 221 रन की साझेदारी कर अपनी टीम को संकट से उबार लिया. दिन का खेल समाप्त होने तक न्यूज़ीलैंड ने चार विकेट पर 329 रन बना लिए. विलियम्सन 113 रन बनाकर आउट हुए जबकि मैकुलम 143 रन बनाकर क्रीज पर डटे हुए हैं. मैकुलम के साथ कोरी एंडरसन 42 रन बनाकर खेल रहे हैं. मैकुलम ने रवीन्द्र जडेजा की गेंद पर छक्का मारकर अपना आठवां और भारत के ख़िलाफ़ तीसरा शतक पूरा किया. न्यूज़ीलैंड के कप्तान मैकुलम अपनी 210 गेंदों की पारी में 18 चौके और दो छक्के लगा चुके हैं. दूसरे छोर पर 23 साल के विलियम्सन जब 32 रन पर खेल रहे थे तो मोहम्मद शमी की गेंद पर मुरली विजय ने पहली स्लिप में उनका कैच टपका दिया. विलियम्सन ने इस जीवनदान का पूरा फ़ायदा उठाते हुए अपना पांचवां टेस्ट शतक पूरा किया. वह चौथे विकेट के रूप में 251 रन के टीम स्कोर पर आउट हुए. वह ज़हीर की गेंद पर विकेट के पीछे लपके गए. इससे पहले भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी ने इस दौरे पर लगातार छठी बार टॉस जीतकर पहले गेंदबाज़ी का फ़ैसला किया और न्यूज़ीलैंड को पहले बल्लेबाज़ी के लिए आमंत्रित किया. मोहम्मद शमी ज़हीर ख़ान और ईशांत शर्मा की पेस तिकड़ी ने पिच पर मौजूद ग्रीन टॉप और आसमान में छाए बादलों का पूरा फ़ायदा उठाते हुए न्यूज़ीलैंड के बल्लेबाज़ों की कड़ी परीक्षा ली. ईशांत ने ओपनर हामिश रदरफोर्ड को गली में अजिंक्या रहाणे के हाथों कैच कराया. रदरफोर्ड केवल छह रन ही बना सके. इसके कुछ देर बाद ज़हीर ने दूसरे ओपनर पीटर फल्टन को पगबाधा कर दिया. फल्टन ने 35 गेंदों में दो चौकों की मदद से 13 रन बनाए. कीवी टीम अभी इन झटकों से उबर भी नहीं पाई थी कि ईशांत ने रोस टेलर तीन के मिड ऑफ़ में रवीन्द्र जडेजा के हाथों कैच करा दिया. लेकिन लंच के बाद भारतीय गेंदबाज़ अपनी लाइन और लेंथ पर नियंत्रण नहीं रख पाए जिसका फ़ायदा उठाते हुए विलियम्सन और मैकुलम ने अपनी टीम को शुरुआती संकट से उबार लिया. |
| DATE: 2014-02-06 |
| LABEL: sports |
| [596] TITLE: संगकारा का तिहरा शतक, सबसे तेज़ 11,000 रन |
| CONTENT: श्रीलंका के बल्लेबाज़ कुमार संगकारा ने बुधवार को अपना पहला तिहरा शतक जड़ा और इसके साथ ही वह टेस्ट क्रिकेट में 11000 रन बनाने वाले नौवें बल्लेबाज़ भी बन गए हैं. संगकारा के तिहरे शतक की बदौलत बांग्लादेश के ख़िलाफ़ खेले जा रहे दूसरे और अंतिम टेस्ट में श्रीलंका की पकड़ मज़बूत हो गई है. छत्तीस वर्षीय संगकारा सबसे कम पारियों में 11000 टेस्ट रन बनाने वाले बल्लेबाज़ भी बन गए हैं. उनसे पहले यह रिकॉर्ड वेस्ट इंडीज़ के बल्लेबाज़ ब्रायन लारा के नाम था. 11000 रन बनाने के लिए संगकारा ने लारा से पाँच पारियाँ कम खेलीं. संगकारा बांग्लादेश के ख़िलाफ़ टेस्ट क्रिकेट में सबसे अधिक निजी स्कोर बनाने वाले खिलाड़ी भी बन गए हैं. इस मैच में कुल 319 रन बनाने वाले संगकारा सबसे आखिर में आउट हुए. उन्होंने 482 गेंदें खेलकर 32 चौकों और आठ छक्कों की मदद से यह विशाल स्कोर खड़ा किया. उनकी बेहतरीन पारी की बदौलत चटगांव के ज़हूर अहमद चौधरी स्टेडियम में खेल के दूसरे दिन श्रीलंकाई टीम का स्कोर 587 रन रहा. टीम के 11 नंबर के बल्लेबाज़ नुवान प्रदीप के साथ खेल रहे संगकारा 286 रन के निजी स्कोर पर बाएं हाथ के स्पिनर शाकिब अल हसन की तीन गेंदों पर एक चौका और दो छक्के लगाकर 300 के पार पहुंचे. इसके साथ ही उन्होंने अपने 287 रन के सर्वश्रेष्ठ स्कोर को भी पीछे छोड़ दिया. किथुरुवान विथानागे 35 और अजंता मेंडिस 47 ने अच्छी तरह से संगकारा का साथ दिया और छठे और आठवें विकेट के लिए 90 और 100 रन जोड़े. ऑल राउंडर शाकिब ने 11वीं बार पांच विकेट लेने का कारनामा किया लेकिन बांग्लादेश को चटगांव टेस्ट जीतने के लिए किसी चमत्कार की ही ज़रूरत होगी. दो मैचों की सिरीज़ का ढाका में हुआ पहला मैच श्रीलंका पहले ही एक पारी और 248 रन से जीत चुका है. |
| DATE: 2014-02-05 |
| LABEL: sports |
| [597] TITLE: 79 साल बाद ब्रिटेन से हारा अमरीका |
| CONTENT: विंबलडन चैंपियन एंडी मरे के शानदार प्रदर्शन से ब्रिटेन ने अमरीका को हराकर 1986 के बाद पहली बार डेविस कप के क्वार्टर फ़ाइनल में प्रवेश कर लिया. मरे ने सेन डिएगो में खेले गए मुक़ाबले में उलट एकल में सैम क्वेरी को 7-6 7-5 6-7 3-7 6-1 6-3 से हराकर ब्रिटेन को 3-1 की अजेय बढ़त दिलाई. साल 1935 के बाद यह पहला मौका है जब ब्रिटेन ने डेविस कप में अमरीका को हराया है. ब्रिटेन का अब अप्रैल में होने वाले क्वार्टर फ़ाइनल में इटली से मुक़ाबला होगा. इटली में होने वाला यह मुक़ाबला क्ले कोर्ट पर होगा. इससे पहले मरे ने शुक्रवार को पहले एकल मैच में डोनाल्ड यंग को शिकस्त दी थी और फिर जेम्स वार्ड ने क्वेरी को हराकर उलटफेर किया था. मरे को युगल मैच में आराम दिया गया था. इस मैच में ब्रिटेन के कोलिन फ्लेमिंग और डॉमिनिक इंग्लोट की जोड़ी ब्रायन बंधुओं की विश्व की नंबर एक जोड़ी से हार गए थे. 26 साल के मरे ने पहला सेट टाइब्रेक में जीता लेकिन वह दूसरा सेट टाईब्रेक में हार गए. लेकिन अगले दो सेट में उन्होंने अपना दबदबा स्थापित करते हुए ब्रिटेन को अंतिम आठ में पहुँचा दिया. मरे की डेविस कप में यह लगातार 17वीं जीत है. इटली ने अर्जेंटीना को 3-1 से हराकर क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बनाई. |
| DATE: 2014-02-03 |
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| [598] TITLE: यौन शोषण: खिलाड़ियों को बचाने वालों से ख़तरा |
| CONTENT: एशियाई मैराथन की पूर्व चैंपियन सुनीता गोदारा का कहना है कि खेल संघों में जिन लोगों पर महिला खिलाड़ियों को यौन शोषण से बचाने की ज़िम्मेदारी है वही संदिग्ध चाल चरित्र के लोग हैं और वो आमतौर पर दोषियों का साथ ज़्यादा देते हैं. लंबी दूरी की चैंपियन धाविका रही सुनीता गोदारा कहती हैं खेल संघों में विशाखा गाइडलाइंस लागू होने की बात तो मैंने नहीं सुनी. अगर ऐसा हो भी रहा है तो इक्का-दुक्का ही. भारतीय खेल प्राधिकरण में ऐसा एक प्रकोष्ठ बनाया गया है. लेकिन इसमें जिन लोगों को रखा गया वो ख़ुद पीछे विवादों में रहे हैं. वहां कुछ समय पहले नंदिता केस सामने आया था जिन्होंने जब आवाज़ उठाने की कोशिश की तो प्रकोष्ठ के लोगों ने उन्हीं को फंसा दिया. खेलों के राष्ट्रीय कैंपों हॉस्टलों में ऐसी शिकायतें दशकों से भारतीय खेलों में चर्चा का विषय बनती रही हैं. बतौर गोदारा खेल संघों और खेलों से जुड़े महकमों में इस तरह की शिकायतों पर पयार्प्त जांच तक की ओर ध्यान नहीं दिया जाता. ज़्यादातर मामलों में संदिग्ध बच निकलते हैं. वह बताती हैं एक-डेढ़ साल पहले पूर्वोत्तर के शिलारू में एक कोच को लेकर शिकायतें सामने आईं थीं मामला गंभीर था लेकिन लिखित शिकायत के बावजूद कोच को सस्पेंड नहीं किया गया बल्कि बस दिल्ली ट्रांसफ़र कर दिया गया. ये थी सज़ा. सुनीता कई सालों से खेलों में महिला खिलाड़ियों के यौन शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती रही हैं. इसके लिए उन्होंने तमाम सार्वजनिक मंचों का भी इस्तेमाल किया. उनका कहना है कि खेलों में छोटी लड़कियां यौन शोषण का ज्यादा शिकार होती हैं क्योंकि वो अमूमन आवाज़ नहीं उठा पातीं. वह कहती हैं अब तस्वीर बदल रही है. मीडिया की ताक़त और पहुंच बढ़ने से महिला खिलाड़ियों की हिम्मत भी बढ़ रही है. मेरे पास अब लगातार इस बारे में सलाह लेने के लिए फ़ोन आते हैं. पिछले कुछ बरसों में महिला खिलाड़ियों के शोषण की ख़बरें लगातार सुर्ख़ियां बनी हैं. भारतीय महिला हॉकी खिलाड़ियों ने जहां खुलेआम राष्ट्रीय कोच पर यौन शोषण का गंभीर आरोप लगाया था. वहीं कुछ साल पहले भारतीय महिला क्रिकेट टीम के साथ विदेश दौरे पर गए मैनेजर को इसलिए बर्ख़ास्त कर दिया गया क्योंकि महिला क्रिकेटरों ने उनके आचरण को लेकर शिकायतें की थीं. गोदरा कहती हैं अमूमन महिला खिलाड़ियों आवाज़ उठाने से इसलिए बचती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करने पर उन्हें कैंप से बाहर कर दिया जाएगा. टीम में उनका चयन नहीं किया जाएगा. भारतीय तीरंदाज़ी संघ के उपाध्यक्ष अजय गुप्ता कहते हैं कि खेलों में सबसे बड़ी चिंता की वजह यही है. उनके अनुसार ऐसे लोगों को तुरंत बर्ख़ास्त कर देना चाहिए. वह कहते हैं कि आप कैसी भी गाइडलाइंस बना दें लेकिन अगर ग़लत आदमियों को दूर नहीं रखेंगे तो कड़ा क़ानून भी क्या कर लेगा. लिहाज़ा पहली ज़रूरत खेलों के प्रशासन को साफ़सुथरा करने का है. भारतीय टीम के साथ कई बार मैनेजर के तौर पर विदेश जा चुके अजय गुप्ता ख़ुद मेरठ में तीरंदाज़ी को प्राचीन गुरुकुल से जोड़कर तीरंदाज़ी अकादमी चला रहे हैं. वह दावा करते हैं कि भारतीय तीरंदाज़ी संघ अब तक इस तरह की अनैतिक बातों से दूर रहा है क्योंकि संघ में ऊपर की स्थितियों पर बैठे लोग कड़ाई से अनुशासन और स्वच्छता पर ज़ोर देते हैं. |
| DATE: 2014-02-01 |
| LABEL: sports |
| [599] TITLE: प्रतिभा ठीक है, पर दिमाग भी तो लगाओ : महेंद्र सिंह धोनी |
| CONTENT: न्यूज़ीलैंड के हाथों वनडे सीरिज़ में करारी हार के बाद भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने गेंदबाज़ों से नाराज़गी जाहिर की है. धोनी का कहना था कि गेंदबाज़ों में प्रतिभा की कमी नहीं है लेकिन गेंदबाज़ों को अपने दिमाग का इस्तेमाल भी करना चाहिए. धोनी का कहना था जहां तक प्रतिभा की बात है तो प्रतिभा की कमी नहीं है लेकिन गेंदबाज़ों को चाहिए कि वो दिमाग का इस्तेमाल करें और खुद को बेहत करें. न्यूज़ीलैंड से भारत वनडे सीरिज़ 3-0 से हार चुका है. धोनी का कहना था सामी अच्छे गेंदबाज़ हैं और लगातार अच्छी बॉलिंग कर रहे हैं लेकिन इस सीरिज़ को छोड़कर. भुवनेश्वर भी इस सीरिज़ में अच्छी बॉलिंग नहीं कर रहे थे जबकि वो भी अच्छे गेंदबाज़ हैं. नियमों के बदलने से कठिनाई बढ़ गई है लेकिन नियमों के अलावा हमारे गेंदबाज़ भी ख़राब प्रदर्शन कर रहे हैं. धोनी का कहना था कि गेंदबाज़ लगातार शार्ट और वाइड लेंथ की बॉलिंग कर रहे हैं और बहुत अधिक रन दे रहे हैं. धोनी का कहना था साफ़ साफ़ कहूं तो गेंदबाज़ी से निराश रहा हूं. इस विकेट पर आप एक काम तो कर ही सकते हैं कि शॉर्ट गेंदे न डालें. तेज़ गेंदबाज़ों ने बहुत रन दिए हैं. धोनी गेंदबाज़ों से इतने नाराज़ दिखे कि उन्होंने किसी को नहीं बख़्शा. उन्होंने कहा स्पिनरों ने तो ठीक गेंदबाज़ी की लेकिन तेज़ गेंदबाज़ों ने बेहद ख़राब प्रदर्शन किया और बहुत रन दिए हैं. धोनी ने बल्लेबाज़ों को भी नहीं छोड़ और कहा कि शीर्ष क्रम के बल्लेबाज़ों ने भी ख़राब प्रदर्शन किया है. उनका कहना था हमने बल्लेबाज़ी में कई गलतियां की हैं. हमने गलत मौकों पर विकेट गंवाए. सीरिज़ में बार बार हमने ऐसा ही किया. चौथे मैच में सात विकेट से हारने के बाद धोनी गुस्साए से थे. उन्होंने कहा कि शीर्ष क्रम के विकेट जल्दी गिरने से पूरा दबाव निचले क्रम पर आता रहा. उनका कहना था अगर 280 रन भी बनते हैं तो गेंदबाज़ों की ख़राब गेंदबाज़ी के कारण हम हार गए हैं. पिछले मैच में हमें अच्छी शुरुआत मिली लेकिन इस मैच में फिर प्रदर्शन ख़राब रहा. हमने विकेट जल्दी गंवा दिए. धोनी ने बल्लेबाज़ों की बीच बड़ी साझेदारी नहीं होने पर भी निशाना साधा और कहा कि किसी न किसी स्तर पर अच्छी पार्टनरशिप की ज़रुरत रहती है लेकिन पूरी सीरिज़ में लगातार विकेट गिरते रहे और अच्छी पार्टनरशिप बन नहीं पाई. |
| DATE: 2014-01-28 |
| LABEL: sports |
| [600] TITLE: क्या ये स्मार्ट रैकेट, टेनिस में लाएगा क्रांति ? |
| CONTENT: कल्पना कीजिए एक ऐसे आभासी टेनिस कोच की जिसे यह ठीक-ठीक पता होगा कि आपने गेंद को अपने रैकेट के किस हिस्से से मारा है. यह कोच आपके फोरहैंड बैकहैंड स्मैश और सर्विस का पूरा हिसाब रखेगा और खेल खत्म होने के बाद मौजूदा टेनिस डेटा के साथ आँकड़ों की तुलना भी करेगा. लेकिन यह कोच ट्रैकसूट और ट्रेनर्स जूतों वाला कोच नहीं है. बल्कि यह सेंसर और चिप्स पर निर्भर एक कोच होगा. यह भविष्य की किसी कल्पना की तरह लगता है लेकिन इस तरह की तकनीक बाजार में नए टेनिस रैकेट बेबोलैट प्ले प्योर ड्राइव के रूप में उपलब्ध है. इस रैकेट में तारों की कंपन और गति को मापने वाला सेंसर है और यह ब्लूटूथ के माध्यम से स्मार्टफ़ोन और यूएसबी के ज़रिए कंप्यूटर से जुड़ सकता है. इसको बनाने वाली कंपनी का कहना है कि यह दुनिया का पहला कनेक्टेड रैकेट है. फ़्रांस के लिओन शहर में बेबोलेट के मुख्यालय में रैकेट के प्रोडक्ट मैनेजर गेल मॉरेक्स ने बीबीसी को बताया हमने रैकेट के हैंडल में सेंसर लगाए हैं लेकिन इससे उसके आकार-भार में कोई फ़र्क नहीं पड़ता. यह सेंसर आपके खेल का विश्लेषण करते हैं. इसलिए आपके रैकेट घुमाने और उसकी गति जैसी सारी जानकारियां रैकेट में रिकॉर्ड कर ली जाती हैं. वह कहते हैं रैकेट विकसित करने की प्रक्रिया के दौरान हमने दुनिया भर के खिलाड़ियों के साथ बहुत सारे परीक्षण किए ताकि आंकड़े एकदम सटीक हों और खिलाड़ी को सही आंकड़े मिल सकें. बेबोलेट का व्यक्तिगत खेल विश्लेषक पेशेवर टेनिस की दुनिया को काफ़ी हद तक प्रभावित कर सकता है. यह इसलिए भी क्योंकि यह पहली कंपनी है जिसने अंतरराष्ट्रीय टेनिस महासंघ आईटीएफ के अनुमोदन के लिए ये कनेक्टेड रैकेट पेश किया है. अंतरराष्ट्रीय टेनिस महासंघ ने टेनिस में उच्च-तकनीक के उपकरणों के इस्तेमाल को देखते हुए बेबोलेट रैकेट जैसे आभासी कोचों को नियंत्रित करने के लिए एक विशेष कार्यक्रम प्लेयर एनालिसिस टेक्नॉलॉजी शुरू किया है. आईटीएफ़ से अनुमति मिलने का मतलब है कि नामचीन खिलाड़ी इन रैकेटों का इस्तेमाल ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट में भी कर सकेंगे. अनुमति मिलने की स्थिति में इस साल होने वाले फ्रेंच ओपन में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है. टेनिस के इतिहास में तकनीक के नए प्रयोगों ने इस खेल का स्वरूप काफी हद तक बदल दिया है. 50 सालों में लकड़ी के रैकेट की जगह धातु और कार्बन फाइबर के रैकेट से लेकर अब कंप्यूटरीकृत रैकेट ने ले ली है. इस बार टेनिस की अधिकृत संस्थाओं ने नई तकनीक के प्रति लचीला रूख अपनाया है नहीं तो इससे पहले बाजार में उपलब्ध दो धागों वाले रैकेट पर रोक लगा दी गई थी. नए रैकेट के परीक्षण में इस बात का ख्याल रखा गया है कि हर खिलाड़ी के पास जीतने के बराबर मौके हों. अंतरराष्ट्रीय टेनिस महासंघ दक्षिण-पश्चिम लंदन स्थित उच्च तकनीकी क्षमता वाले अपने लैब में रैकेटों या गेंदों का परीक्षण करता है. अंतरराष्ट्रीय टेनिस महासंघ के स्टुअर्ट मिलर ने कहा टेनिस की दुनिया में यह बहुत बड़ी क्रांति थी जब लकड़ी के बने रैकेट की जगह पर धातु के बने बड़े आकार वाले रैकेट को बनाने में सफलता प्राप्त की गई. धातु का रैकेट उपयोग करने वाले खिलाड़ियों का खेल लकड़ी के रैकेट उपयोग करने वाले खिलाड़ियों की तुलना में बेहतर होता है. इसकी वजह धातु के रैकेट का बड़ा आकार का होना होता है जिससे गेंद को मारने के लिए अधिक जगह मिलती है. मिलर कहते है इसके कारण रैकेट का भार हल्का होता चला गया और खेल में और गति आ गई. यह कदम इस खेल की गुणवत्ता में परिवर्तन लाने वाला था. यह कोई मायने नहीं रखता कि कुछ लोग आज भी लकड़ी वाले रैकेट की जगह टेनिस में मानते हैं. अंतरराष्ट्रीय टेनिस महासंघ ने इस रैकेट के उपयोग के संदर्भ में नियम-31 लाया है ताकि इसके उपयोग को आगामी टूर्नामेंट में संभव बनाया जा सके. मौजूदा नियम खेल के दौरान किसी भी तरह के उच्च तकनीक वाले कोचिंग और सहायता पर प्रतिबंध लगाता है लेकिन नए नियम के तहत तकनीक की सहायता से एकत्रित किए गए स्ट्रोक के आकड़ों का इस्तेमाल खिलाड़ी अपने प्रदर्शन को सुधारने में कर सकता है. इसके अनुसार खेल के दौरान तो इसकी सहायता नहीं ली जा सकती लेकिन जब खेल स्थगित या कोचिंग की अनुमति हो तो उस दौरान इसकी सहायता ली जा सकती है. इस नए तरह के प्रयोग के बावजूद प्रशिक्षक अपने लिए कोई खतरा महसूस नहीं कर रहे हैं. |
| DATE: 2014-01-28 |
| LABEL: sports |
| [601] TITLE: हैमिल्टन में ख़त्म होगा जीत का इंतज़ार? |
| CONTENT: न्यूज़ीलैंड दौरे पर भारतीय क्रिकेट टीम की अग्निपरीक्षा जारी है. उसे अभी भी अपनी पहली जीत की दरकार है. पाँच एकदिवसीय अंतराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों की सिरीज़ के शुरूआती दो मैच गंवाने के बाद ऑकलैंड में खेला गया तीसरा मैच भारत जीतते-जीतते रह गया. आख़िरी गेंद पर भारत को जीत के लिए दो रन बनाने थे लेकिन केवल एक रन बन सका और मैच टाई पर समाप्त हुआ. अब भारत और न्यूज़ीलैंड हैमिल्टन में चौथे एकदिवसीय मैच के दौरान मंगलवार को आमने-सामने होंगे. एक बार फिर वही सवाल भारतीय क्रिकेट टीम के सामने है कि क्या भारत इस साल विदेशी दौरे पर अपनी पहली जीत दर्ज कर पाएगा भारत ने पिछले मैच में जीत के लिए कड़ा संघर्ष किया लेकिन वहां वह हार भी सकता था. आख़िरी ओवर में जीत के लिए 19 रन बनाना कोई आसान काम नही है. न्यूज़ीलैंड के कप्तान ब्रैंडन मैकुलम ने कोरी एंडरसन को गेंद थमाई जो कोई जाने-पहचाने गेंदबाज़ नही है. दो वाइड गेंद करना इस बात का संकेत देता है. एंडरसन ने अभी तक केवल 12 एकदिवसीय मैच खेले हैं और उनकी पहचान एक तेज़-तर्रार बल्लेबाज़ के रूप में अधिक है इसके बावजूद रवींद्र जाडेजा से उनकी नाबाद 66 रनों की साहसी पारी का श्रेय छीना नही जा सकता. रविंद्र जाडेजा का यह पिछली 10 पारियों में लगाया गया एकमात्र अर्धशतक है. इस दौरान उन्होने 13 विकेट ज़रूर लिए है. दूसरी तरफ़ आर अश्विन ने भी पिछले मैच में अपने एकदिवसीय क्रिकेट करियर का पहला अर्धशतक जमाते हुए 65 रन बनाए. गेंदबाज़ी में उन्होने पिछले 10 मैचो में 10 विकेट लिए है. दक्षिण अफ्रीका में खेले गए तीन और न्यूज़ीलैंड में भी अभी तक खेले गए तीन मैचों में अश्विन के हाथ केवल 2 विकेट लगे है. इसके बावजूद कप्तान धोनी का भरोसा उन पर बरक़रार है और वह नियमित गेंदबाज़ के तौर पर टीम में मौजूद है. तेज़ गेंदबाज़ी में ईशांत शर्मा गए तो वरूण एरॉन आए लेकिन हाल वही ढाक के तीन पात रहा. भारतीय गेंदबाज़ी का ऑकलैंड में यह हाल था कि एक समय न्यूज़ीलैंड का स्कोर 2 विकेट खोकर 189 रन था यानी भारत एक-एक विकेट के लिए तरस रहा था. ऑकलैंड में न्यूज़ीलैंड की फ़िल्डिंग बेहद कमज़ोर थी उनके क्षेत्ररक्षकों ने एक के बाद एक कई कैच छोड़े अन्यथा सिरीज़ का फ़ैसला ऑकलैंड में ही हो गया होता. भारत अब बाकी बचे दोनो मैच जीतकर सिरीज़ को केवल बराबरी पर समाप्त करा सकता है जीत नहीं सकता. इस दौरे पर भारतीय टीम के प्रदर्शन को देखते हुए ऐसा कहना मुश्किल ही है कि भारत सिरीज़ बचा पाएगा. सलामी जोडी शिखर धवन और रोहित शर्मा ने कुछ अच्छी शुरूआत दी तो मिडिल आर्डर ढह गया. चौथे एकदिवसीय मैच से पहले आर अश्विन ने कहा है कि भारत से बाहर के विकेट पर किस तरह की गेंदबाज़ी की जाए इसे सीखना ज़रूरी है. अब अगर हर विदेशी दौरा सिर्फ सीखने के लिए होगा तब तो भारतीय टीम जीतने से रही. वैसे न्यूज़ीलैंड दौरे पर पहली बार भारतीय सलामी जोड़ी ने कुछ खुलकर हाथ दिखाए जिसका असर अन्य बल्लेबाज़ों पर भी पडा और न्यूज़ीलैंड के गेंदबाज़ दबाव में आए. अब हैमिल्टन में भारतीय टीम हार से बचे तो बात बने वर्ना विदेशी ज़मीन पर साल की पहली सिरीज़ गवांने का ख़तरा तो सिर पर मंडरा ही रहा है. सुरेश रैना कप्तान महेंद्र सिंह धोनी से अभयदान पाकर भी कुछ ख़ास नही कर पा रहे है. पिछली 15 पारियों में उनका उच्चतम स्कोर 39 रन है. एक बल्लेबाज़ के तौर पर रैना की मौजूदगी कई सवाल पैदा कर रही है. कप्तान धोनी और उनकी टीम विश्व कप की चिंता छोड़े उसमें अभी वक़्त है लेकिन उससे पहले न्यूज़ीलैंड में जारी अग्निपरीक्षा से तो पार पाएं. |
| DATE: 2014-01-27 |
| LABEL: sports |
| [602] TITLE: इंडियन ओपनः चीनी दबदबे के बीच चमका साइना का सितारा |
| CONTENT: भारत की स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल ने आख़िरकार पिछले लंबे समय से चले आ रहे निराशाजनक दौर को ख़त्म करते हुए रविवार को लखनऊ में सैयद मोदी इंडियन ग्रां प्री गोल्ड बैडमिंटन टूर्नामेंट का महिला एकल का ख़िताब अपने नाम किया. फ़ाइनल में उन्होंने भारत की ही पीवी सिंधु को 21-14 21-17 से मात दी. दर्शकों से खचाखच भरे बीबीडी अकादमी में शीर्ष वरीयता प्राप्त साइना ने दूसरी सीड सिंधु को केवल 40 मिनट में मात दे दी. ख़िताबी मुक़ाबले में दोनों खिलाड़ियों के बीच कड़ी टक्कर की उम्मीद की जा रही थी लेकिन सिंधु साइना के सामने टिक ही नहीं सकीं. साइना ने सिंधु के ख़िलाफ़ शुरू से ही आक्रामक रुख़ अपनाया जबकि सिंधु केवल रिटर्न ही करती रहीं. पूरे मैच के दौरान सिंधु का खेल बेहद रक्षात्मक रहा. कभी-कभी तो ऐसा लगा जैसे सिंधु साइना के बड़े नाम का दबाव महसूस कर रही हैं. सिंधु के स्मैश में कभी ज़ोरदार ताक़त नज़र नहीं आई बस इसी का फ़ायदा उठाते हुए साइना ने लगातार एक के बाद एक स्मैश और नेट पर ज़बरदस्त खेल दिखाकर साबित कर दिया कि उनमें और सिंधु के खेल में अभी ज़मीन-आसमान का अंतर है. अपनी इसी ख़ूबी का प्रदर्शन साइना ने पहली इंडियन बैडमिंटन लीग में भी किया था. इत्तेफाक़ से सिंधु को वहां भी साइना के ख़िलाफ़ एक नहीं बल्कि दो बार हार का सामना करना पडा था. इंडियन ओपन में भारत को यही एकमात्र स्वर्णिम कामयाबी मिली. पुरुष एकल के फ़ाइनल में छठी वरीयता प्राप्त भारत के के श्रीकांत नौवीं सीड चीन के झी सोंग से 16-21 21-19 और 21-13 से हार गए. चीन का दबदबा केवल यहीं नहीं रहा. उसने पुरुष युगल महिला युगल और मिश्रित युगल के ख़िताब भी अपने नाम किए. इंडियन ओपन में अपनी जीत से उत्साहित साइना ने कहा कि उम्मीद करती हूं कि अब जब सब कुछ अच्छा चल रहा है तो आगे भी ऐसा ही चलता रहे. यह सब कुछ अच्छे फॉर्म पर निर्भर करता है और ऐसे फॉर्म का लगातार बने रहना ज़रुरी है. उल्लेखनीय है कि साइना पिछले लगभग 15 महीनों से अपनी चोट और ख़राब फॉर्म से जूझ रही हैं. इस दौरान उनकी विश्व बैडमिंटन रैंकिंग भी गिरकर नौवें पायदान पर पहुंच गई. साइना ने स्वीकार किया कि वह हर टूर्नामेंट में बेहतर प्रदर्शन करना चाहती हैं लेकिन सब कुछ उनके हाथ में नहीं है. साइना ने यह भी साफ़ किया है कि कभी-कभी परिणाम सकारात्मक आते हैं तो कभी नकारात्मक लेकिन इस साल वह कम टूर्नामेंट खेलकर अधिक से अधिक ध्यान अपनी फिटनेस पर देंगी. इस टूर्नामेंट में चीनी खिलाड़ियों की चुनौती से पार पाने की बात पर साइना ने कहा कि चीनी खिलाड़ी बेहद मज़बूती से खेलते हैं और उनके ख़िलाफ़ लम्बी-लम्बी रैलियों पर अपनी आक्रामता पर काबू रखकर उन्हें मात दी जा सकती है. अब देखना है कि कामयाबी का स्वाद एक बार फिर चखने के बाद साइना अपनी फॉर्म को बरक़रार रख पाती हैं या नहीं क्योंकि समर्थकों की उम्मीदों का भार तो उनके कंधो पर हमेशा रहेगा. |
| DATE: 2014-01-27 |
| LABEL: sports |
| [603] TITLE: सानिया मिर्ज़ा ऑस्ट्रेलियन ओपन में हारीं |
| CONTENT: सानिया मिर्ज़ा का मिश्रित युगल का तीसरा ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीतने का सपना टूट गया है. ऑस्ट्रेलियन ओपन के मिश्रित युगल का फ़ाइनल मुक़ाबला रविवार को खेला गया. इसमें भारत की सानिया मिर्ज़ा और रोमानिया के होरिया तेकाऊ की जोड़ी को फ्रांस की क्रिस्टिना मालदोवनिक और कनाडा के डेनियल नेस्टर की जोड़ी को सीधे सेटों में 6-3 और 6-2 से मात दी. मेलबर्न पार्क के रॉड लेवर एरिना में इस मैच का पहले सेट 28 मिनट और दूसरा सेट 30 मिनट तक चला. सेमी फ़ाइनल में सानिया मिर्ज़ा और होरिया की तेकाऊ की जोड़ी ने ऑस्ट्रेलिया के जार्मिला ग़ाजदसोवा और मैथ्यू एडन की जोड़ी को 2-6 6-3 और 10-2 टाई ब्रेकर से हराया था. यह मैच एक घंटा 13 मिनट तक चला था. क्वार्टर फाइनल में छठी वरीयता वाले सानिया और तेकाऊ ने पाकिस्तान के एसाम उल हक कुरैशी और जर्मनी की जूलिया जार्जेस को सीधे सेटों में 6-3 6-4 से हराया था. इससे पहले सानिया मिर्ज़ा दो बार मिश्रित युगल ख़िताब जीत चुकी हैं. उन्होंने साल 2009 में ऑस्ट्रेलियन ओपन और साल 2012 में फ़्रैंच ओपन में महेश भूपति के साथ ये ख़िताब जीते हैं. ऑस्ट्रेलियन ओपन के पुरुष सिंगल्स का फ़ाइनल मुक़ाबला रविवार शाम को ही खेला जाएगा. इसमें पहली वरीयता प्राप्त स्पेन के राफ़ेल नडाल का मुक़ाबला आठवीं वरीयता प्राप्त स्विट्जरलैंड के स्टैनसिल्स बारनिका के बीच होगा. इससे पहले महिला एकल के एक घंटा 37 मिनट तक चले मुकाबले में चौथी वरीयता प्राप्त जापान की ली ना ने 20वीं वरीय स्लोवाकिया की डोमीनिका सिबुलकोवा को सीधे सेटों में 7-6 7-3 6-0 से हराया था. यह उनके करियर का दूसरा ग्रैंड स्लैम खिताब था. |
| DATE: 2014-01-26 |
| LABEL: sports |
| [604] TITLE: सैयद मोदी टूर्नामेंट: साइना फ़ाइनल में |
| CONTENT: भारतीय खिलाड़ी साइना नेहवाल सैयद मोदी इंटरनेशनल इंडिया ग्रां प्री गोल्ड बैडमिंटन टूर्नामेंट के फ़ाइनल में पहुंच गई हैं. साइना ने सेमीफ़ाइनल में चीन की ज़ुआन डेंग को हराया. 79 मिनट तक चले इस सेमीफ़ाइनल मुकाबले में साइना और डेंग के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिली लेकिन साइना ने निर्णायक आख़िरी गेम में शानदार वापसी करते हुए विजेता बनीं. साइना ने पहला गेम 21-14 से जीता था लेकिन इसके बाद दूसरे गेम में वो अपना खेल बरकरार नहीं रख सकीं. साइना दूसरा गेम 17-21 से हार गईं जबकि तीसरे मैच में उन्होंने डेंग को कड़ी मेहनत के बाद 21-19 से हराया. हालांकि तीसरे गेम में साइना शुरुआत में 0-7 से पिछड़ गई थीं लेकिन उन्होंने शानदार वापसी की और डेंग को हावी नहीं होने दिया. साइना ने इससे पहले क्वार्टरफ़ाइनल में इंडोनेशिया की बेलेट्रिक्स मनुपुत्ती को हराया था. 1-20 लाख डॉलर के इनाम वाले इस टूर्नामेंट में साइना रविवार को फ़ाइनल खेलेंगी. |
| DATE: 2014-01-25 |
| LABEL: sports |
| [605] TITLE: नडाल ने रोका फ़ेडरर का विजय रथ |
| CONTENT: दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी स्पेन के रफ़ाएल नडाल ने ऑस्ट्रेलियन ओपन टेनिस में रोजर फ़ेडरर का न सिर्फ़ विजय रथ रोका बल्कि सीधे सेटों में हराकर फ़ाइनल में भी जगह बनाई. नडाल ने फ़ेडरर को 7-6 6-3 और 6-3 से मात दी. साल के पहले ग्रैंड स्लैम ऑस्ट्रेलियन ओपन में रोजर फ़ेडरर बेहतरीन फ़ॉर्म में नज़र आ रहे थे. यही उम्मीद लगाई जा रही थी कि फ़ेडरर और नडाल में जबरदस्त मुक़ाबला होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पहला सेट ज़रूर रोमांचक रहा और टाई ब्रेकर तक गया. लेकिन नडाल ने ये सेट जीतकर फ़ेडरर को बैकफुट पर ला दिया. इसके बाद तो नडाल अपने बेहतरीन फ़ॉर्म में आ गए और उन्होंने फ़ेडरर को कोई मौक़ा नहीं दिया. अगले दोनों सेटों में नडाल ने शानदार खेल दिखाया और फ़ेडरर बस देखते रह गए. फेडरर ने नडाल के खिलाफ आखिरी जीत वर्ष 2007 में विंबलडन के फाइनल में दर्ज की थी. ऑस्ट्रेलियन ओपन के पिछले 11 दिनों में फेडरर बिल्कुल बदले नजर आए हैं. नए कोच स्टीफ़न एडबर्ग के अधीन उनके खेल में काफ़ी सुधार भी देखा जा रहा था. खासकर जिस तरीके से उन्होंने जो विल्फ्रेड सोंगा और एंडी मरे को हराया उसके बाद उनका 18वां ग्रैंड स्लैम जीतना की उम्मीद जग गई थी. लेकिन उनका सपना चकनाचूर हो गया. |
| DATE: 2014-01-24 |
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| [606] TITLE: टेनिस का महामैच यानी नडाल बनाम फेडरर |
| CONTENT: टेनिस के आधुनिक काल में सबसे चर्चित होड़ के दो किरदार आज ऑस्ट्रेलियाई ओपन के सेमी-फ़ाइनल दो-दो हाथ करेंगे. शुक्रवार को दोनों जब आस्ट्रेलियन ओपन के सेमीफाइनल में एक-दूसरे को टक्कर देंगे तो खेलप्रेमियों के लिए ये मुकाबला किसी फाइनल से कम नहीं होगा. रोजर फेडरर को लगता है कि उनके नए कोच स्टीफन एडबर्ग के गुर मंत्र उनके काम आएंगे और वह नडाल के खिलाफ जीत हासिल कर पाएंगे. 32 साल के फेडरर का आत्मविश्वास कहीं ज्यादा है. वह कहीं ज्यादा चुस्ती और फुर्ती से जीत हासिल कर रहे हैं. पिछले सात सालों में जब भी नडाल और फेडरर आमने-सामने आए हैं तब स्पेनी टेनिस दिग्गज ने स्विस खिलाड़ी की उम्मीदों को चकनाचूर ही किया है. फेडरर ने नडाल के खिलाफ आखिरी जीत वर्ष 2007 में विंबलडन के फाइनल में दर्ज की थी. फेडरर बताते हैं कि किस तरह पिछले महीने दुबई में उनकी स्टीफन एडबर्ग से मुलाकात हुई. तब एडबर्ग ने संकेत दिया कि वह नडाल के खिलाफ मुझको बेहतर तरीके से तैयार कर सकते हैं. वह कहते हैं स्टीफन के पास कुछ अच्छी योजनाएं थीं. मुझे लगा कि इन योजनाओं पर चलना चाहिए. ऑस्ट्रेलियन ओपन के पिछले 11 दिनों में फेडरर बिल्कुल बदले नजर आए हैं. खासकर जिस तरीके से उन्होंने जो विल्फ्रेड सोंगा और एंडी मरे को हराया उसके बाद उनका 18वां ग्रैंड स्लैम जीतना फिर एक संभावना लगने लगा. फेडरर के पास अब नया और कहीं चौड़ा रैकेट है साथ ही हैं बेहतर राय देने के लिए कोच के रूप में छह बार के ग्रैंड स्लैम चैंपियन स्टीफन एडबर्ग. वैसे फेडरर पिछले साल की दिक्कतों से भी उबर गए लगते हैं. फेडरर कहते हैं मेरे लिए तो ये ड्रीम रन की तरह और उम्मीद करता हूं कि ये जारी रहेगा. 27 वर्षीय नडाल भी अपना 14वां ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने के करीब हैं. अगर उन्होंने ऐसा कर लिया तो वह तीसरे ऐसे खिलाड़ी होंगे जिन्होंने चारों बड़ी टेनिस प्रतियोगिताओं को कम से कम दो बार जीता है. अगर इन दिनों फेडरर लगातार सुर्खियां बटोर रहे हैं तो नडाल को सेमीफाइनल तक पहुंचने के लिए कड़ी मेहनत करनी पडी है. नडाल कहते हैं फोरहैंड मेरे लिए कोई समस्या नहीं है लेकिन सर्विस पर जरूर चिंता है. सर्विस करने के दौरान रैकेट की ग्रिप बनाए रखने में मुश्किल हो रही है मुझे लगता है कि रैकेट मेरे हाथ से छूट जाएगा. नडाल और फेडरर के बीच हार जीत का रिकॉर्ड 22-10 से स्पेनी टेनिस दिग्गज के पक्ष में है. पिछले साल घुटने की चोट से उबरकर जोरदार वापसी करने वाले नडाल ने फ्रेंच औऱ अमरीकी ओपन जीते थे. इन दोनों खिलाड़ियों की पिछली टक्कर दो साल पहले यहीं मेलबर्न में ही हुई थी तब नडाल ने चार सेट में मैच जीत लिया था. फेडरर कहते हैं कौन जानता है कि क्या होगा वह मेरे खिलाफ वह हमेशा मुश्किल खिलाड़ी रहे हैं. लेकिन मैं खुश हूं कि मुझे उनके खिलाफ फिर स्लैम में खेलने का मौका मिला है. |
| DATE: 2014-01-24 |
| LABEL: sports |
| [607] TITLE: सानिया मिर्जा मिश्रित युगल के फाइनल में |
| CONTENT: भारत की सानिया मिर्जा और रोमानिया के होरिया तेचाऊ ऑस्ट्रेलियन ओपन टेनिस के मिक्स्ड डबल्स फाइनल में पहुंच गए हैं. इसके साथ ही इस प्रतियोगिता में कोई भी खिताब जीतने की भारतीय उम्मीदें भी बरकरार हैं. सानिया और तेचाऊ ने आस्ट्रेलिया की जेर्मिला गेजदोसोवा और मैथ्यू एबडन को जोरदार मुकाबले में 2-6 6-3 और 10-2 टाई ब्रेकर से हराया. इससे पहले इस जोड़ी ने क्वार्टर फाइनल में छठी वरीयता वाले सानिया और तेकाऊ ने क्वार्टर फाइनल में पाकिस्तान के एसाम उल हक कुरैशी और जर्मनी की जूलिया जार्जेस को सीधे सेटों में 6-3 6-4 से हराया था. इससे पहले सानिया मिर्ज़ा दो बार मिश्रित युगल ख़िताब जीत चुकी हैं. उन्होंने साल 2009 में ऑस्ट्रेलियन ओपन और साल 2012 में फ़्रैंच ओपन में महेश भूपति के साथ ये ख़िताब जीते हैं. वैसे इस वर्ष के ऑस्ट्रेलियन ओपन भारत के अन्य खिलाड़ी पहले खिताब की दौड़ से बाहर हो चुके हैं. जहां लिएंडर पेस की पुरुष युगल की चुनौती खत्म हो गई तो रोहन बोपन्ना और कैटरिना श्रेबोतिक की जोड़ी मिक्स्ड डबल्स के क्वार्टर फाइनल में पराजित हुई. महिला युगल का फाइनल आज ही शाम को खेला जाना है. इसमें पहली सीड इटली की सारा इरानी और राबर्ट विंची का मुकाबला नंबर तीन जोड़ी रूस की एक्तेरीना माकारोवा और एलीना वैसनीना से है. ये मैच भारतीय समयानुसार शाम 4. 15 से खेला जाना है. पुरुषों का एकल सेमीफाइनल मैच भी आज ही खेला जाने वाला है जो प्रतियोगिता का सबसे चर्चित मैच होगा. ये राफेल नडाल और रोजर फेडरर के बीच खेला जाएगा. टेनिस के ये दोनों दिग्गज 33वीं बार आमने सामने होंगे. दोनों के बीच का आंकड़ा 22-10 का है. नंबर एक टेनिस खिलाड़ी स्पेन के नडाल ने 22 बार जीत दर्ज की है जबकि फेडरर ने दस बार उन्हें हराया है. |
| DATE: 2014-01-24 |
| LABEL: sports |
| [608] TITLE: फ़ोर्स इंडिया की फॉर्मूला वन कार की तस्वीर रिलीज़ |
| CONTENT: फोर्स इंडिया ने 2014 सीज़न के लिए अपनी फॉर्मूला वन कार की तस्वीर जारी कर दी है. इसके साथ ही फोर्स इंडिया आने वाले सीज़न के लिए अपनी रेसिंग कार की फोटो सार्वजनिक करने वाली पहली टीम बन गई है. टीम ने बुधवार को फॉर्मूला वन कार VJM07 की एक तस्वीर जारी करते हुए यह स्वीकार किया कि उसने रेसिंग कार के बारे में ज्यादा जानकारी सार्वजनिक न करने की सावधानी बरती है. इस सीज़न के लिए फॉर्मूला वन रेसिंग के नियमों में बड़े बदलाव करने जा रही है और इसमें शामिल होने वाली टीमें अपने प्रतिद्वंदियों की डिजाइनों पर करीबी नजर रखी हुई हैं. 2014 के सीज़न के लिए फोर्स इंडिया ने अपनी फॉर्मूला वन कार का नया रंग चुना है जिसका अधिकांश हिस्सा काले रंग में होगा. टीम ने कहा है कि उसकी कोशिश पिछले प्रदर्शन से बेहतर करने की होगी. साल 2013 के फॉर्मूला वन सीज़न में फोर्स इंडिया छठे स्थान पर रही थी. टीम के मालिक विजय माल्या ने कहा हमारा लक्ष्य पिछले साल के प्रदर्शन से बेहतर करने का है. यह एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य है लेकिन मुझे यकीन है कि यह साकार होगा क्योंकि हमें आगे बढना है और हमसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली टीमों से प्रतिस्पर्द्धा करनी है. लक्ष्य हासिल करने के लिए जो चीजें जरूरी होती हैं वो हमारे पास हैं. उन्होंने फोर्स इंडिया की मर्सिडीज़ के साथ तकनीकी साझेदारी की ओर भी इशारा किया. उनकी नई रेसिंग कार VJM07 की आपूर्ति पूरी तरह से मर्सिडीज कर रही है. फोर्स इंडिया की फॉर्मूला वन कार की स्टीयरिंग भी अब जर्मनी के निको हल्कनबर्ग और मेक्सिको के सर्गियो पेरेज़ के नए हाथों में होगी. ऊँची रैकिंग वाले निको हल्कनबर्ग 2012 के रेसिंग सीज़न के बाद फोर्स इंडिया की स्टीयरिंग संभालने के लिए उसके खेमे में दोबारा लौटे हैं. साल 2012 सीज़न में आखिरी दौर की कुछ रेसों में अपने फन से कई लोगों की नजर चुरा ली थी. सर्गियो पेरेज़ अपनी साख को फिर से स्थापित करने के लिए ठान चुक हैं. मैकलैरन ने उन्हें एक सीज़न के बाद टीम से हटा दिया था. माल्या ने बताया निको हल्कनबर्ग पहले भी हमारे साथ रह चुके हैं. इसलिए हम जानते हैं कि उनमें कितनी रफ्तार है. उनका वापस लौटना हमारे लिए अच्छी बात है. और सर्गियो पेरेज़ एक असाधारण प्रतिभा वाले ड्राइवर हैं. मैं उन्हें पिछले तीन साल से रेसिंग करते हुए देख रहा हूँ. महज 23 की उम्र में उनकी रफ्तार जबर्दस्त है. हमें लगता है कि उन दोनों की जोड़ी बेहद मजबूत है. रेसिंग कार VJM07 की जो तस्वीर जारी की गई है उससे कार की नोक का पूरा अंदाजा लगाना मुश्किल है. नए सीज़न में रेसिंग कारों की डिजाइन के इस हिस्से पर चर्चा जोर शोर से चल रही है. फॉर्मूला वन की रेसिंग के नियमों के मुताबिक कारों की नोक पिछले साल की तुलना में 365 मिलीमीटर नीचे होगी. माना जा रहा है कि इस रेसिंग सीज़न में उतरने वाली कारों की नोक बहुत खूबसूरत नहीं होने वाली है. |
| DATE: 2014-01-23 |
| LABEL: sports |
| [609] TITLE: ऑस्ट्रेलियन ओपन: फेडरर ने किया मरे को बाहर |
| CONTENT: ऑस्ट्रेलियन ओपन के चार बार विजेता रहे रोजर फ़ेडरर ने साल के पहले ग्रैंड स्लैम ऑस्ट्रेलियन ओपन टेनिस के क्वार्टर-फाइनल में एंडी मरे को हरा दिया है. 32 वर्षीय स्विट्जरलैंड के फ़ेडरर ने मरे को 6-3 6-4 6-76-8 6-3 से हराया. दोनों के बीच मुक़ाबला तीन घंटे 20 मिनट तक चला. फ़ेडरर अब सेमी-फाइनल में दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी रफ़ाएल नडाल का सामना करेंगे. फ़ेडरर के पास मरे को सीधे सेटों में हराने का अच्छा अवसर था लेकिन तीसरे सेट में वो जीत की कगार पर जाकर टाई ब्रेकर में मरे से हार गए. पीठ की सर्जरी कराने के बाद मरे का यह दूसरा टूर्नामेंट था. पहले दोनों सेट में रोजर फ़ेडरर उसी अंदाज में दिखे जिसमें उन्होंने जो-विल्फ्रेड सोंगा को सोमवार को हराया था. पहले की तुलना में इस साल बड़े रैकेट से खेल रहे रोजर फ़ेडरर इस मुकाबले में मरे पर पूरी तरह हावी रहे. इस टूर्नामेंट में फ़ेडरर छह बार के ग्रैंड स्लैम चैंपियन स्टीफ़ेन एडबर्ग के देखरेख में खेल रहे हैं. मैच के शुरुआती 80 मिनट में दो सेट पूरे होने तक फ़ेडरर ने अपनी सर्विस के दौरान केवल एक बार ड्यूस होने दिया. मंगलवार को पिछले तीन बार के ऑस्ट्रेलियन ओपन टेनिस चैम्पियन सर्बिया के नोवाक जोकोविच भी ऑस्ट्रेलियन ओपन से बाहर हो गए थे. जोकोविच को इस टूर्नामेंट में दूसरी वरीयता प्राप्त थी. एक दूसरे क्वार्टर-फ़ाइनल मुक़ाबले में जोकोविच को स्विट्ज़रलैंड के स्टैनिसलास वावरिन्का ने हराया था. वहीं महिला वर्ग में ख़िताब की प्रबल दावेदार और तीसरी वरीयता प्राप्त रूस की मारिया शारापोवा को साल के इस पहले ग्रैंड स्लैम के चौथे दौर में शिकस्त का सामना करना पड़ा था. चार बार की ग्रैंड स्लैम चैंपियन शारापोवा को स्लोवाकिया की खिलाड़ी डोमिनिका सिबुलकोवा ने 3-6 6-4 और 6-1 से हराकर टूर्नामेंट से बाहर कर दिया. इससे पहले महिला वर्ग में शीर्ष वरीयता प्राप्त अमरीका की सरीना विलियम्स को रविवार को चौथे दौर में उलटफेर का शिकार होना पड़ा था. उन्हें विश्व की पूर्व नंबर एक खिलाड़ी सर्बिया की अना इवानोविक ने हराया था. |
| DATE: 2014-01-22 |
| LABEL: sports |
| [610] TITLE: हैमिल्टन वनडे में भी हारा भारत |
| CONTENT: न्यूज़ीलैंड ने हैमिल्टन में हुए दूसरे एक दिवसीय मैच में भारत को हराकर पाँच मैचों की सिरीज़ में 2-0 की बढ़त ले ली है. बारिश के कारण मैच 42 ओवरों का कर दिया गया था. न्यूज़ीलैंड ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 42 ओवरों में सात विकेट के नुक़सान पर 271 रन बनाए. डकवर्थ लुईस नियम के तहत भारत को 42 ओवरों में 297 रनों का लक्ष्य मिला था. जवाब में भारत ने जब नौ विकेट के नुक़सान पर 277 रन बनाए थे उस समय फिर बारिश शुरू हो गई. उस समय तीन और गेंद फेंकी जानी बाक़ी थी. अंपायरों ने मैच समाप्त करने की घोषणा की और डकवर्थ लुईस नियम के तहत भारत 15 रनों से मैच हार गया. भारतीय टीम की शुरुआत अच्छी नहीं रही और 37 रनों पर उसके दो विकेट गिर गए थे. शिखर धवन 12 और रोहित शर्मा 20 रन बनाकर पवेलियन लौट गए. लेकिन अजिंक्य रहाणे और विराट कोहली ने तीसरे विकेट के लिए 90 रन जोड़े. रहाणे के 36 के निजी स्कोर पर आउट हो जाने के बाद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और कोहली ने कमान संभाली. दोनों के पिच पर रहते ऐसी उम्मीद बँध रही थी कि शायद भारत मैच में वापसी कर सकता है. लेकिन पहले मैच में शतक लगाने वाले कोहली 78 रन बनाकर आउट हो गए. रैना ने तेज़ी से रन बनाने की कोशिश की. लेकिन वे 35 रन ही बना सके. कप्तान धोनी के 56 रन पर आउट होने के बाद भारत की रही-सही उम्मीद जाती रही. न्यूज़ीलैंड की ओर से टिम साउदी ने सबसे ज़्यादा चार विकेट लिए. इससे पहले न्यूज़ीलैंड की ओर से केन विलियम्सन ने सर्वाधिक 77 रनों की पारी खेली जबकि रॉस टेलर ने 57 रन बनाए. लेकिन न्यूज़ीलैंड की पारी के स्टार रहे कोरी एंडरसन जिन्होंने सिर्फ़ 17 गेंदों पर 44 रनों की पारी खेली. हाल ही में उन्होंने वनडे में सबसे तेज़ शतक का रिकॉर्ड अपने नाम किया था. उन्होंने 44 रनों की पारी में दो चौके और पाँच छक्के लगाए. सलामी बल्लेबाज़ मार्टिन गुप्टिल ने भी 44 रनों की पारी खेली. भारतीय गेंदबाज़ों का प्रदर्शन कोई ख़ास नहीं रहा. मोहम्मद शामी ने 55 रन देकर तीन विकेट लिए. जबकि भुवनेश्वर कुमार ईशांत शर्मा रवींद्र जडेजा और सुरेश रैना ने एक-एक विकेट लिए. |
| DATE: 2014-01-22 |
| LABEL: sports |
| [611] TITLE: आईपीटीएल में खेल सकते हैं जोकोविच और सरीना |
| CONTENT: इंडियन प्रीमियर लीग की तर्ज पर होने वाली इंटरनेशनल प्रीमियर टेनिस लीग आईपीटीएल के पहले संस्करण में नोवाक जोकोविच और सरीना विलियम्स हिस्सा ले सकते हैं. यह लीग भारत के दिग्गज युगल खिलाड़ी महेश भूपति के दिमाग की उपज है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ इस लीग में पाँच टीमें हिस्सा लेंगी जिनमें एक टीम मुंबई की होगी. लीग के मैच बैंकॉक सिंगापुर मुंबई कुआलालंपुर और मध्य पू्र्व के एक शहर में खेले जाएंगे. मध्य पूर्व के इस शहर की घोषणा अभी नहीं की गई है. 28 नवंबर से 20 दिसंबर तक होने वाले इस लीग के पहले संस्करण में छह बार के ग्रैंड स्लेम चैंपियन सर्बिया के जोकोविच और दुनिया की नंबर एक महिला खिलाड़ा सरीना के हिस्सा लेने की संभावना है. इस लीग के लिए खिलाड़ियों की नीलामी दो मार्च को संयुक्त अरब अमीरात में होगी. आईपीटीएल के सह संस्थापक भूपति ने एक प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि नीलामी के लिए हर टीम के पास एक करोड़ डॉलर होंगे. उन्होंने कहा कि टीमों के मालिकों की जल्दी घोषणा की जाएगी. हर टीम में कम से कम छह और अधिकतम दस खिलाड़ी हो सकते हैं. विश्व के पूर्व नंबर एक खिलाड़ी ऑस्ट्रेलिया के लेटन हैविट ने लीग के पहले संस्करण में खेलने की पुष्टि की है. उन्होंने कहा मैंने सुना है कि इस लीग में कई चीजों को जोड़ा जा रहा है. मैं इसे लेकर उत्साहित हूं. आईपीटीएल के सह संस्थापक और दिग्गज खिलाड़ी रहे जर्मनी के बोरिस बेकर ने कहा टेनिस को इसकी ज़रूरत है. हमारे ज़माने में एशिया में ऐसी सिरीज़ होती तो हमें खेलने में मज़ा आता. इस लीग के टेलीविज़न प्रसारण के अधिकार एमपी एंड सिल्वा के हासिल किए हैं जिसके पास इस साल ब्राज़ील में होने वाले फुटबॉल कप इंग्लिश प्रीमियर लीग और फ्रेंच ओपन के प्रसारण अधिकार भी हैं. |
| DATE: 2014-01-22 |
| LABEL: sports |
| [612] TITLE: न्यूज़ीलैंड दौराः आसान नहीं हेमिल्टन की राह |
| CONTENT: भारतीय क्रिकेट टीम के लिए इस साल की शुरुआत अच्छी नहीं रही और उसका आग़ाज़ हार के साथ हुआ. टीम इन दिनों न्यूज़ीलैंड के दौरे पर है जहां नेपियर में खेले गए पहले एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच में मेज़बान टीम भारत को 24 रन से हरा चुकी है. दोनों टीमें अब बुधवार को हेमिल्टन में एक बार फिर आमने-सामने होंगी. नेपियर में भारतीय गेंदबाज़ों ने आईसीसी की एकदिवसीय रैंकिंग में आठवें नंबर की टीम न्यूज़ीलैंड के बल्लेबाज़ों के सामने 292 रन लुटाए. एक समय जब न्यूज़ीलैंड ने अपने 5 विकेट 213 रन पर गंवा दिए थे वह भी 41-4 ओवर में तब लगा कि शायद भारत अब मैच में वापसी करेगा और न्यूज़ीलैंड 250 या फिर 260 रन तक बना पाएगी. ऐसे में भारतीय गेंदबाज़ों की कमज़ोरी एक बार फिर सामने आई और उन्होंने बाकी बचे ओवरों में 79 रन दे दिए. सबसे अनुभवी गेंदबाज़ होने के कारण ईशांत शर्मा के कंधों पर ज़िम्मेदारी थी कि वह भुवनेश्वर कुमार और मोहम्मद शामी का मार्गदर्शन करते लेकिन हुआ उलटा. पहले वनडे में न्यूज़ीलैंड ने भारत को पराजित किया था. भुवनेश्वर कुमार ने कसी हुई गेंदबाज़ी करते हुए केवल 38 रन देकर एक विकेट लिया तो मोहम्मद शामी ने 55 रन देकर चार विकेट झटके. इशांत शर्मा अपनी दिशा से भटके और सबसे महंगे साबित होते हुए उन्होंने 9 ओवर में 72 रन दिए. बाद में बल्लेबाज़ी में भी केवल विराट कोहली और कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने अपना दमख़म दिखाया. अगर विराट कोहली की शतकीय पारी में बने 123 रनों को हटा दिया जाए तो भारतीय टीम की दशा जानने में और भी आसानी हो जाएगी. शिखर धवन और रोहित शर्मा की सलामी जोड़ी दक्षिण अफ्रीका के बाद न्यूज़ीलैंड में भी नाकाम रही. बड़ी शुरुआत ना मिलने से सारा दबाव विराट कोहली पर आया और उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया लेकिन दूसरे छोर से उन्हें सुरेश रैना और अजिंक्य रहाणे से कुछ ख़ास योगदान नही मिला. रविंद्र जडेजा तो अपना खाता भी नही खोल सके. अब हेमिल्टन में हार के साथ मैदान में उतरने वाली भारतीय टीम कैसे मनोबल के साथ मैदान में उतरेगीइस बारे में पूर्व तेज़ गेंदबाज़ अतुल वासन कहते हैं कि दक्षिण अफ्रीका में उछाल वाले विकेट का अनुभव हासिल करने के बावजूद भारतीय गेंदबाज़ों ने न्यूज़ीलैंड में ख़राब प्रदर्शन किया. वो कहते हैं अब हर बार तो बल्लेबाज़ 300 या इससे अधिक के स्कोर का मैच नही जिता सकते इसका असर बाकी मैचों पर भी पडेगा. ईशांत शर्मा के बारे में अतुल वासन कहते हैं उन्हें इतने अधिक मौक़े दिए गए इसके बावजूद उनके पास ना तो गति है और ना ही बल्लेबाज़ों को परेशान करने के लिए कोई अन्य हथियार. ऐसे में उन्हें अगले विश्व कप की रणनीति में रखना भी ग़लत होगा उनकी जगह अब दूसरे गेंदबाज़ को अवसर देना चाहिए. वो कहते हैं इसके अलावा रविंद्र जडेजा को भी बताना होगा कि उनकी ज़रूरत बल्लेबाज़ी में भी है वह एक अच्छे ऑलराउंडर हैं. हेमिल्टन में भारत को स्टुअर्ट बिन्नी को अवसर देना चाहिए क्योंकि यहीं का अनुभव उनके भविष्य में काम आएगा. अब देखना है कि नेपियर के बाद हेमिल्टन में भारतीय क्रिकेट टीम कैसा खेल दिखाती है अगर हेमिल्टन में भी भारत को हार मिली तो फिर उसकी वापसी और भी मुश्किल होगी. |
| DATE: 2014-01-21 |
| LABEL: sports |
| [613] TITLE: चैम्पियन जोकोविच ऑस्ट्रेलियन ओपन से बाहर |
| CONTENT: पिछले तीन बार के ऑस्ट्रेलियन ओपन टेनिस चैम्पियन सर्बिया के नोवाक जोकोविच प्रतियोगिता से बाहर हो गए हैं. क्वार्टर फ़ाइनल में उन्हें स्विट्ज़रलैंड के स्टैनिसलास वावरिन्का ने पाँच सेटों तक चले रोमांचक मैच में 2-6 6-4 6-2 3-6 और 9-7 से हरा दिया. जोकोविच को इस प्रतियोगिता में दूसरी वरीयता मिली हुई थी. वैसे तो उन्होंने चार बार इस प्रतियोगिता का ख़िताब जीता है लेकिन पिछले तीन बार से वे लगातार ख़िताब जीत रहे हैं. इस मैच से पहले वावरिन्का उनसे 14 बार हार चुके थे. लेकिन ऑस्ट्रेलियन ओपन का क्वार्टर फ़ाइनल मैच उनके लिए भाग्यशाली साबित हुआ. चार घंटे तक चले इस मैच में उन्होंने जोकोविच को हरा दिया. सेमी फ़ाइनल में उनका मुक़ाबला टॉमस बर्डिच से होगा. पहला सेट 2-6 से हारने के बाद वावरिन्का ने शानदार वापसी की और लगातार दो सेट जीतकर उन्होंने जोकोविच पर काफ़ी दबाव बना दिया. दूसरा सेट उन्होंने 6-4 और तीसरा सेट उन्होंने 6-2 से जीता. लेकिन जोकोविच इतनी जल्दी कहाँ हार मानने वाले थे. उन्होंने चौथे सेट में अपने अनुभव का बेहतरीन प्रदर्शन किया और सेट 6-3 से जीता. मैच काफ़ी रोमांचक हो चुका था. पाँचवें और आख़िरी सेट में दोनों खिलाड़ी कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे थे. 6-6 7-7 तक स्कोर गया और फिर वावरिन्का ने यहीं बाजी मार ली और आख़िरी सेट 9-7 से जीतकर सेमी फ़ाइनल में जगह पक्की की. |
| DATE: 2014-01-21 |
| LABEL: sports |
| [614] TITLE: शारापोवा हुईं ऑस्ट्रलियन ओपन से बाहर |
| CONTENT: ख़िताब की प्रबल दावेदार और तीसरी वरीयता प्राप्त रूस की मारिया शारापोवा को साल के पहले ग्रैंड स्लेम ऑस्ट्रेलियन ओपन के चौथे दौर में शिकस्त का सामना करना पड़ा है. चार बार की ग्रैंड स्लेम चैंपियन शारापोवा को स्लोवाकिया की खिलाड़ी डोमिनिका सिबुलकोवा ने 3-6 6-4 और 6-1 से हराकर टूर्नामेंट से बाहर कर दिया. रॉड लेवर एरेना में सोमवार को खेले गए इस मैच में 20वीं सीड सिबुलकोवा के ख़िलाफ़ पहला सेट जीतने के बाद शारापोवा ने अगले दो सेट गंवा दिए. इससे पहले टॉप सीड अमरीका की सेरेना विलियम्स को रविवार को चौथे दौर में उलटफेर का शिकार होना पड़ा था. उन्हें विश्व की पूर्व नंबर एक खिलाड़ी सर्बिया की अना इवानोविक ने हराया था. शारापोवा और सिबुलकोवा को पहले सेट में सर्व करने में दिक्कत आ रही थी लेकिन शारापोवा ने इसे 6-3 से जीतकर बढ़त बनाई. दूसरे सेट में सिबुलकोवा ने अपने खेल का स्तर ऊंचा करते हुए 5-0 की बढ़त बना ली. शारापोवा ने इसके बाद लगातार चार गेम जीतकर स्कोर 4-5 किया लेकिन सिबुलकोवा ने फिर अगले गेम में अपनी सर्विस बरक़रार रखते हुए इसे 6-4 से जीत लिया. साल 2008 की ऑस्ट्रेलियन ओपन चैंपियन शारापोवा ने दूसरे और तीसरे सेट के बीच में मेडिकल टाइम आउट लिया. लेकिन निर्णायक सेट में सिबुलकोवा पूरी तरह छाई रहीं और उन्होंने शारापोवा को केवल एक गेम जीतने का मौका दिया. पहली बार इस टूर्नामेंट के क्वार्टर फ़ाइनल में पहुँची सिबुलकोवा का अगले दौर में आठवीं सीड सर्बिया का येलेना यांकोविच और 11वीं सीड रोमानिया की सिमोना हालेप के बीच होने वाले मैच की विजेता से मुक़ाबला होगा. |
| DATE: 2014-01-20 |
| LABEL: sports |
| [615] TITLE: वनडे की कप्तानी छोड़ सकते हैं कुक |
| CONTENT: ऑस्ट्रेलिया के हाथों एशेज गंवाने के बाद एकदिवसीय सिरीज़ भी हार चुकी इंग्लिश टीम के कप्तान एलेस्टेयर कुक ने कहा है कि वह वनडे की कप्तानी छोड़ सकते हैं. इंग्लैंड को एशेज सिरीज़ में 0-5 से शिकस्त का सामना करना पड़ा था और वनडे सिरीज़ में भी टीम पहले तीन मैच हार पाँच मैचों की शृंखला गंवा चुकी है. कुक ने कहा मुझे लगता है कि इंग्लिश क्रिकेट में थोड़ा बहुत बदलाव की ज़रूरत है. उन्होंने कहा हम कई मुद्दों पर बात करेंगे और कुछ बदलाव किए जाएंगे. हम लगातार मैच हार रहे हैं और मैं टीम में जीत का जज्बा पैदा नहीं कर पा रहा हूं. कुक ने मई 2011 में एंड्रयू स्ट्रॉस से वनडे टीम की कप्तानी संभाली थी. पिछले साल टीम चैंपियंस ट्रॉफी के फ़ाइनल में पहुँची थी जहां उसे भारत के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा था. कुक की कप्तानी में इंग्लैंड ने 52 मैच खेले हैं जिनमें से 29 में जीत दर्ज की है. यह पूछने पर कि क्या वह वनडे में कप्तान बने रहना चाहते हैं कुक ने कहा कभी न कभी मुझे इस पर फ़ैसला लेना होगा लेकिन मैं अभी इस सवाल का जवाब नहीं दे सकता क्योंकि अभी हम सिरीज़ के बीच में हैं. मैं नहीं जानता कि स्वदेश वापसी के बाद मैं कैसा महसूस करूंगा. उन्होंने कहा अभी मेरा काम बाक़ी बचे दो मैचों को जीतने की कोशिश करना है. सच्चाई यह है कि हम कोई भी मैच नहीं जीत पाए हैं. बाएं हाथ के बल्लेबाज़ कुक ने साल 2006 में वनडे पदार्पण किया था और 75 मैचों में 38-08 के औसत से 2742 रन बनाए हैं. |
| DATE: 2014-01-20 |
| LABEL: sports |
| [616] TITLE: साल के पहले ही वनडे में भारत की हार |
| CONTENT: भारत के लिए न्यूज़ीलैंड दौरे की शुरुआत बेहद ख़राब रही है. इस साल और सिरीज़ के पहले ही वनडे मैच में भारत को हार का सामना करना पड़ा है. न्यूज़ीलैंड ने भारत के सामने जीत के लिए 50 ओवर में 293 रन बनाने का लक्ष्य रखा था लेकिन भारत की पूरी टीम आठ गेंद बाकी रहते सिर्फ़ 268 रन बनाकर आउट हो गई. हालांकि न्यूज़ीलैंड की शुरुआत अच्छी नहीं रही थी. सिर्फ़ 32 रन पर उसके दो विकेट गिर गए थे. लेकिन इसके बाद न्यूज़ीलैंड के लिए विलियमसन रॉस टेलर और एंडरसन ने शानदार पारियां खेलीं. विलियमसन ने 71 टेलर ने 55 और एंडरसन ने नाबाद 68 रन बनाए. भारत के लिए मोहम्मद शमी ने 55 रन देकर चार विकेट लिए. जवाब में भारत ने अपना पहला विकेट रोहित शर्मा के रूप में सिर्फ़ 15 रन पर खो दिया था. रोहित शर्मा ने तीन रन बनाए. धवन ने 32 रन बनाए. जबकि रहाणे सात और रैना 18 रन बनाकर आउट हो गए. धोनी और कोहली ने मिलकर पांचवें विकेट के लिए 95 रन की साझेदारी की. धोनी 40 रन बनाकर आउट हुए. उनकी जगह आए जाडेजा बगैर खाता खोले आउट हो गए. 237 के स्कोर पर कोहली के रूप में भारत का सातवां विकेट गिरा जिन्होंने 123 रन बनाए. इसके साथ ही भारत की जीत की उम्मीदें धुंधली पड़ गई थीं. भारत के पुछल्ले बल्लेबाज़ भी कोई कमाल नहीं दिखा सके. निचले क्रम के तीन बल्लेबाज़ों ने मिलकर 31 रन जोड़े. न्यूज़ीलैंड के लिए मिचेल मक्कलैनेगन ने चार विकेट लिए. इस जीत के साथ न्यूज़ीलैंड ने पांच मैचों की सिरीज़ में 1-0 से बढ़त बना ली है. |
| DATE: 2014-01-19 |
| LABEL: sports |
| [617] TITLE: हॉकी वर्ल्ड लीग का चैम्पियन बना नीदरलैंड्स |
| CONTENT: नीदरलैंड्स ने न्यूज़ीलैंड को 7-2 के बड़े अंतर से हराकर हॉकी वर्ल्ड लीग का ख़िताब अपने नाम कर लिया है. ये प्रतियोगिता पहली बार आयोजित की गई. मेज़बान भारत बेल्जियम से 1-2 से हारकर छठे स्थान पर रहा. दिल्ली में हुई इस प्रतियोगिता के फ़ाइनल में नीदरलैंड्स की ओर से कॉन्सटैन्टिन योन्कर्स ने हैट्रिक लगाई. हाफ़ टाइम तक नीदरलैंड्स की टीम 3-0 से आगे थे. इनमें से दो गोल योन्कर्स ने किए. जबकि तीसरा गोल बिली बेकर ने किया. दूसरा हाफ़ शुरू होते ही बॉब डी वुड ने एक और गोल करके स्कोर 4-0 कर दिया. लेकिन फिर न्यूज़ीलैंड के स्टीव एडवर्ड्स ने अपनी टीम की ओर से पहला गोल किया. उस समय स्कोर था 4-1. लेकिन न्यूज़ीलैंड को क्या पता था कि नीदरलैंड्स की ओर से एक के बाद एक तीन और गोल होने हैं. हॉफ़मैन बेकर और योन्कर्स ने एक-एक गोल किया. जबकि एडवर्ड्स ने न्यूज़ीलैंड की ओर से एक और गोल किया. इस तरह नीदरलैंड्स ने 7-2 से शानदार जीत हासिल की. इंग्लैंड ने ऑस्ट्रेलिया को हराकर तीसरा स्थान हासिल किया. ऑस्ट्रेलिया की टीम चौथे स्थान पर रही. पाँचवें और छठे स्थान के लिए हुए मैच में भारत बेल्जियम से 1-2 से हार गया. |
| DATE: 2014-01-19 |
| LABEL: sports |
| [618] TITLE: न्यूज़ीलैंड दौराः नए साल में नेपियर में भारत का पहला वनडे |
| CONTENT: रविवार को जब भारत में खेल प्रेमी ख़ासकर क्रिकेट प्रेमी सुबह-सुबह चाय की चुस्किया ले रहे होंगे और उसी समय भारतीय क्रिकेट टीम न्यूज़ीलैंड से नेपियर में पांच एकदिवसीय क्रिकेट मैचों की सिरीज़ का पहला मैच खेल रही होगी. सभी एकदिवसीय मैच भारतीय समय के अनुसार सुबह के साढ़े छह बजे से शुरू होंगे. भारत न्यूज़ीलैंड में दो टेस्ट मैच भी खेलेगा. भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच आज तक इससे पहले छह एकदिवसीय सिरीज़ खेली गई है. साल 1975-76 में न्यूज़ीलैंड ने भारत को दो मैचों की सिरीज़ में 2-0 से 1980-81 में एक बार फिर दो मैचों की सिरीज़ में भारत को 2-0 से मात दी थी. साल 1993-94 में चार मैचोंं की सिरीज़ 2-2 से बराबरी पर रही. 1998-99 में पांच मैचों की सिरीज़ भी 2-2 से बराबरी पर छूटी. इसके बाद साल 2002-03 में सात मैचों की सिरीज़ न्यूज़ीलैंड ने 5-2 से अपने नाम की लेकिन साल 2008-09 में पांच मैचों की सिरीज़ भारत 3-1 से जीतने में कामयाब रहा और वह भारत की न्यूज़ीलैंड में पहली एकदिवसीय सिरीज़ में मिली जीत थी. तब भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के पास सलामी जोड़ी के रूप में तूफानी वीरेन्द्र सहवाग और गौतम गंभीर थे. इसके अलावा सचिन तेंदुलकर ख़ुद धोनी और युवराज सिंह पूरी फ़ॉर्म में थे. कप्तान धोनी की इस वर्तमान टीम के अधिकतर खिलाड़ी तो पहली बार न्यूज़ीलैंड में खेलेंगे. इससे पहले भारत अपने पिछले दौरे में दक्षिण अफ्रीका से एकदिवसीय सिरीज़ 2-0 से हारा था. न्यूज़ीलैंड में भारत की कामयाबी सलामी बल्लेबाज़ शिखर धवन और रोहित शर्मा के साथ-साथ विराट कोहली सुरेश रैना और धोनी पर निर्भर करेगी. अगर बल्लेबाज़ रन बनाएंगे तो गेंदबाज़ भी कुछ कर सकेंगे. वैसे भी गेंदबाज़ी में अनुभव के नाम पर भारत के पास एकदिवसीय सिरीज़ मे केवल इशांत शर्मा ही है जो पिछले दौरे पर न्यूज़ीलैंड में खेले थे. भुवनेश्वर कुमार मौहम्मद शमी अहमद ईश्वर पांडेय उमेश यादव और वरुण एरोन के रूप में कहने को तो पांच-पांच तेज़ गेंदबाज़ भारतीय टीम में है लेकिन इनमें से किसी भी गेंदबाज़ में निरंतरता देखने को नही मिली और ना ही कोई मैच जिताऊ लगता है. अब जबकि न्यूज़ीलैंड के पूर्व कप्तान मार्टिन क्रो ने कहा है कि न्यूज़ीलैंड के तेज़ गेंदबाज़ो टिम साउथी मिल्स और मिलान को भारत के शीर्ष छह बल्लेबाज़ो को निशाना बनाना चाहिए. इसके अलावा पिचें पर हरियाली और उनमें नमी होनी चाहिए. अब क्रो के इस सुझाव को लेकर भारत के पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह कहते हैं अपनी घरेलू परिस्थिति का फ़ायदा तो सभी को मिलता है लेकिन अगर उन्होंने तेज़ पिचें बनाने की कोशिश की तो भारतीय गेंदबाज़ो को भी लाभ होगा. न्यूज़ीलैंड को समझना होगा कि अब भारतीय टीम की हालत पहले जैसी नही है कि उसके पास एकाध तेज़ गेंदबाज़ हों. लिहाज़ा न्यूज़ीलैंड को तेज़ पिचें बनाने से पहले सोचना होगा. दूसरी तरफ भारतीय बल्लेबाज़ी को लेकर मनिंदर सिंह मानते है कि शिखर धवन की फॉर्म थोड़ी चिंता की बात है. शिखर धवन टेस्ट मैच में भी भारत के लिए सलामी बल्लेबाज़ी करते है इसलिए उनका फार्म में आना ज़रूरी है. विराट कोहली ने दक्षिण अफ्रीका में जिस तरह की शानदार बल्लेबाज़ी की उसे देखते हुए सबसे अधिक उम्मीदे उन्हीं से रहेगी. वह नंबर तीन पर बल्लेबाज़ी करने आते है ऐसे में अगर पहला विकेट जल्दी गिर जाता है तो सारा दारोमदार उन पर आ जाएगा इसलिए विराट पूरी भारतीय टीम की धुरी साबित होंगे. भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच होने वाले मैचों को लेकर मनिंदर सिंह का मानना है कि जिस तरह दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ एकदिवसीय सिरीज़ बिलकुल एकतरफा हो गई थीं इस बार ख़ैर वैसा होने की आशंका तो नही है. इसके बावजूद भारतीय गेंदबाज़ो को एकदिवसीय क्रिकेट के नए तूफानी बल्लेबाज़ कोरी एंडरसन जेसी राइडर रोस टेलर कप्तान ब्रेंडन मेकुलम और ल्यूक रोंची से बचकर रहना होगा. भारत एकदिवसीय रैंकिंग में पहले स्थान पर है और न्यूज़ीलैंड आठवें पर. भारत अगर सिरीज़ हारा तो फिर ऑस्ट्रेलिया या इंग्लैंड में से कोई भी एक टीम नंबर एक बन जाएगी ऐसे में नंबर एक बने रहने के लिए भारत को एकदिवसीय सिरीज़ जीतनी ही होगी. |
| DATE: 2014-01-18 |
| LABEL: sports |
| [619] TITLE: इंसाफ़ मिलने में नौ साल लग गएः अंजू जॉर्ज |
| CONTENT: मैं बहुत खुश हूं. हालांकि न्याय मिलने में नौ साल का लम्बा समय लग गया. विश्व एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में आज़ाद भारत का ये पहला स्वर्ण पदक है. यह कारनामा मैंने किया इसलिए यह ख़शी और भी अधिक है. यह कहना है भारत की जानी-मानी लंबी कूद एथलीट अंजू बॉबी जॉर्ज का जिन्होंने साल 2005 में मोनाको विश्व एथलेटिक्स में दूसरे स्थान पर रहते हुए रजत पदक जीता था. उस वक़्त स्वर्ण पदक रूस की तात्याना कोतोवा ने जीता था लेकिन बीते मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स महासंघ ने कोतोवा को डोपिंग का दोषी मानते हुए अंजू को स्वर्ण पदक देने का फ़ैसला किया है. इस ख़बर के साथ ही भारतीय एथलेटिक्स जगत में एक नए इतिहास का उदय भी हो गया. अंजू किसी प्रमुख विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय एथलीट बन गई हैं. इससे पहले उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा साल 2003 में भी मनवाया था. तब उन्होंने पेरिस में हुई विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता था. उस वक़्त भी ऐसी उपलब्धि हासिल करने वाली वह पहली भारतीय एथलीट थीं. उन दिनों को याद करते हुए अंजू ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में कहा तब मैंने अपने पति और कोच रॉबर्ट बॉबी जॉर्ज से ट्रेनिंग के बाद अंतराष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी पाना शुरू किया था. वे भारत के सर्वश्रेष्ठ एथलीट कोच में से एक हैं. पेरिस में विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप से पहले मैंने दो महीने तक विश्व रिकॉर्डधारी एथलीट माइक पॉवेल के साथ अमरीका में प्रशिक्षण लिया था. इसका मुझे बहुत लाभ मिला. अंजू ने अपने बीते दिनो में मिली कड़ी प्रतिद्वंदिता को याद करते हुए बताया तीन रूसी महिला एथलीट सात मीटर से ऊपर की लंबी कूद लगा रही थीं. इनके अलावा कुछ अमरीकी और यूरोपीय महिला एथलीट भी ऐसा कर रही थीं. साल 2004 में एथेंस ओलंपिक में मैं छठे स्थान पर रही. उनमें से बाक़ी तीन एथलीट कुछ सालों बाद डोप टेस्ट में नाकाम हो गईं इससे मुझे उनकी कामयाबी पर शुरू से ही शक था. अंजू ने कहा कि उनके समय में भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजन नहीं होते थे. उन्होंने कहा अंतरराष्ट्रीय ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं के लिए हम कड़ी मेहनत करते थे. यहाँ तक कि अमरीका में होने वाली ट्रेनिंग का ख़र्चा स्वीकृत कराने के लिए मुझे दिल्ली में दो महीने बिताने पड़े. वो समय बडा तकलीफदेह था लेकिन आख़िरकार मैंने वह उपलब्धि हासिल कर ही ली जिसके लिए संघर्ष किया. भारतीय एथलेटिक्स जगत की वर्तमान दशा से अंजू थोड़ा निराश हैं. उन्होंने कहा साठ-सत्तर के दशक में हमारे पास उड़न सिख मिल्खा सिंह थे अस्सी के दशक में पीटी ऊषा थीं और साल 2008 तक मैं थी. उम्मीद है कि आने वाले कुछ वर्षो में अच्छे एथलीट भारत के पास होंगे. अंजू ने कहा हमारे समय में एशियाई खेलों में छह-सात स्वर्ण पदक और कुछ रजत पदक आ जाते थे जबकि अब तो गिने-चुने पदक ही मिल पाते हैं. आशा है कि इस बार एशियाई खेलों में अधिक पदक मिलेंगे. इसके अलावा इन दिनों निलंबित भारतीय ओलंपिक संघ के सवाल पर अंजू कहती हैं अगले कुछ महीनों में एथलेटिक्स के दृष्टिकोण से कोई बड़ी चैंपियनशिप नहीं है. छह महीने बाद राष्ट्रमंडल और एशियन गेम्स जैसे बड़े मुक़ाबले हैं. मुझे विश्वास है कि तब तक सब कुछ सही हो जाएगा और हमारे खिलाड़ी अपने राष्ट्रीय झंडे तले खेल सकेंगे. भविष्य की योजनाओं को लेकर अंजू कहती हैं कि वह और उनके कोच पति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन करने वाले अच्छे जंपर्स को तैयार करने की निश्चित रूप से कोशिश करेंगे. |
| DATE: 2014-01-17 |
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| [620] TITLE: ऑस्ट्रेलियन ओपनः दूसरे ही दौर में हारे डेल पोत्रो |
| CONTENT: राफेल नडाल नोवाक जोकोविच और एंडी मरे के साथ ख़िताब के दावेदार माने जा रहे अर्जेंटीना के जुआन मार्टिन डेल पोत्रो की चुनौती ऑस्ट्रेलियन ओपन के दूसरे दौर में ही दम तोड़ गई. पाँचवीं सीड डेल पोत्रो को शुक्रवार सुबह खेले गए मैच में स्पेन के रॉबर्टो बतिस्ता ने 4-6 6-3 5-7 6-4 7-5 से हराकर टूर्नामेंट से बाहर कर दिया. अर्जेंटीनी खिलाड़ी ने सिडनी में अभ्यास टूर्नामेंट जीतकर फॉर्म में वापसी के संकेत दिए थे लेकिन वह बतिस्ता के ख़िलाफ़ तीन घंटे 53 मिनट तक चले मुक़ाबले में हरा दिया. हार के बाद 25 साल के डेल पोत्रो ने कहा बतिस्ता ने शानदार खेल दिखाया. इतने बड़े स्तर पर चार घंटे तक खेलना मुश्किल होता है. भीषण गर्मी के कारण पूर्व यू एस ओपन चैंपियन और 62 रैंकिंग के बतिस्ता के बीच मैच सुबह नौ बजकर 25 मिनट पर शुरू हुआ जो पाँच सेटों तक चला. इस दौरान दोनों खिलाड़ियों ने 100 बेजा भूलें की और 125 विनर लगाए. गर्मी से बेहाल दिख रहे डेल पोत्रो का शॉट जैसे ही नेट से उलझा बतिस्ता को पहली बार किसी ग्रैंड स्लेम टूर्नामेंट में तीसरे दौर का टिकट मिल गया. साल के पहले ग्रैंड स्लेम के दूसरे ही दौर में हारने के बावजूद डेल पोत्रो निराश नहीं हैं. उन्होंने कहा मैंने पिछले ही सप्ताह एक टूर्नामेंट जीता था और इससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा है. मैं आगे अपने खेल में सुधार का प्रयास करूंगा. डेल पोत्रो ने कहा ऐसे मैचों से आपको सीखने को मिलता है और मैं इस मैच से सकारात्मक चीजें लेकर आगे बढूंगा. |
| DATE: 2014-01-17 |
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| [621] TITLE: ऑस्ट्रेलियन ओपनः गर्मी ने रोका खेल |
| CONTENT: साल के पहले ग्रैंड स्लेम ऑस्ट्रेलियन ओपन में भीषण गर्मी के कारण गुरुवार को चौथे दिन खेल रोक देना पड़ा. मेलबोर्न में पिछले तीन दिन से भीषण गर्मी पड़ रही है. गुरुवार को दोपहर बाद क़रीब दो बजे तापमान 41 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया. इसके बाद बिना छत वाले कोर्ट पर खेल रोक दिया गया और रॉड लेवर एरेना तथा हाईसेंस एरेना की छत खोल दी गई. अधिकारियों का कहना है कि मैच शाम चार बजे से पहले शुरू नहीं होंगे. आयोजकों ने एक बयान में कहा तापमान कम होने तक बिना छत वाले कोर्ट में नए मैच नहीं होंगे. इससे पहले मंगलवार को तापमान 42. 2 डिग्री और बुधवार को 41. 5 डिग्री सेल्सियस पहुँच गया था. गुरुवार को इसके 44 डिग्री तक पहुँचने की भविष्यवाणी की गई थी और सुबह 11 बजे जब खेल शुरू हुआ तो तापमान 38 डिग्री तक पहुँच चुका था. भीषण गर्मी के कारण खेल को बंद करने का फ़ैसला टूर्नामेंट डायरेक्टर वायने मैककीवन ने किया. इसके लिए उन्होंने वैट बल्ब ग्लोब टेंपरेचर का इस्तेमाल किया जिसमें उमस हवा के रुख़ और गर्मी को आधार बनाया जाता है. मैककीवन की इस बात के लिए आचोलना की जा रही थी कि उन्होंने पिछले दो दिन भीषण गर्मी के कारण खेल क्यों नहीं रोका. क्रोएशिया के इवान डोडिग ने बुधवार को कहा था कि यह गर्मी उनकी जान ही ले लेगी. मंगलवार को कनाडा के फ्रेंक डानसेविच पहले दौर के मैच के बाद बेहोश हो गए थे और डॉक्टरों की मदद लेनी पड़ी थी. डानसेविच ने कहा था कि इस गर्मी में खेल की अनुमति देना अमानवीय है. गुरुवार को दोपहर ढाई बजे तापमान 43 डिग्री पहुँच चुका था. इस दौरान कई मैच चल रहे थे जिनमें मारिया शारापोवा और कैरिन नैप का मुक़ाबला भी शामिल था. शारापोवा ने रॉड लेवर एरेना में तीन घंटे 28 मिनट में मैच जीता. इस दौरान उन्हें सिर पर बर्फ़ का तौलिया लपेटे देखा जा सकता था. मार्गरेट कोर्ट एरेना पर 25वीं सीड फ्रांस की एलिज कॉर्नेट गर्मी से बेहाल दिखीं. |
| DATE: 2014-01-16 |
| LABEL: sports |
| [622] TITLE: वर्ल्ड हॉकी लीग: ऑस्ट्रेलिया ने भारत को 7-2 से रौंदा |
| CONTENT: ऑस्ट्रेलिया ने भारत को हॉकी वर्ल्ड लीग के क्वार्टर फ़ाइनल मैच में 7-2 से करारी शिक़स्त दी. इसके साथ ही भारत ख़िताबी दौड़ से बाहर हो गया है जबकि ऑस्ट्रेलिया ने सेमीफ़ाइनल में जगह बना ली है. दिल्ली के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में खेले जा रहे टूर्नामेंट में बुधवार को खेले गए क्वार्टर फ़ाइनल मैच में भारत ने बढ़िया शुरुआत की और पहले 15 मिनट में ही दो गोल दाग दिए. बीरेंद्र लाकड़ा ने छठे और युवराज वाल्मिकी ने 11वें मिनट में गोल किए. लेकिन विश्व चैंपियन ऑस्ट्रेलिया ने वापसी की और पहले सत्र में निकोलस बजियन जेसन विल्सन और ग्लेन टर्नर के ज़रिए तीन गोल किए. दूसरा हाफ़ पूरी तरह से ऑस्ट्रेलिया के नाम रहा और उसने चार गोल बनाए. हालांकि भारत ने टक्कर देने की कोशिश की लेकिन वो कामयाब नहीं हो सका. भारत को तीन पेनल्टी कॉर्नर भी मिले लेकिन वो उन्हें गोल में नहीं बदल सका. ऑस्ट्रेलिया के लिए दूसरे हाफ़ में साइमन ऑर्चड और जेकब व्हेटन ने एक-एक और रसल फ़ोर्ड ने दो गोल किए. शुक्रवार को सेमीफ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया का मुकाबला नीदरलैंड्स से होगा. नीदरलैंड्स ने एक अन्य क्वार्टर फ़ाइनल मैच में जर्मनी को 2-1 से हराया. शुक्रवार को ही भारतीय टीम पांचवें स्थान के प्ले ऑफ़ मैच में ओलंपिक चैंपियन जर्मनी के साथ खेलेगी. बुधवार को खेले गए अन्य क्वार्टर फ़ाइनल मैचों में इंग्लैंड ने बेल्जियम को और न्यूज़ीलैंड ने अर्जेंटीना को हराकर अंतिम चार में जगह बनाई. |
| DATE: 2014-01-16 |
| LABEL: sports |
| [623] TITLE: रोनाल्डो ने मेसी को पछाड़ा, बने सर्वश्रेष्ठ फ़ुटबॉलर |
| CONTENT: रियाल मड्रिड फ़ुटबॉल क्लब के फॉरवर्ड खिलाड़ी क्रिस्तियानो रोनाल्डो ने साल 2013 का फ़ीफ़ा बैलॉन डिओर पुरस्कार जीत लिया है. उन्होंने बार्सिलोना क्लब के लायनेल मेसी और बायर्न म्यूनिख के फ़्रैंक रिबेरी को मात देकर ये ख़िताब हासिल किया है. रियाल के इस 28 वर्षीय पुर्तगाली कप्तान को राष्ट्रीय कोचों कप्तानों और पत्रकारों ने साल 2008 के बाद पहली बार दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के तौर पर नामांकित किया था. रोनाल्डो को कुल मिलाकर 1365 अंक हासिल हुए जबकि मेसी 1205 और रिबेरी 1127 अंक ही पा सके. इसमें 184 कोच 184 राष्ट्रीय कप्तानों और वैश्विक मीडिया के 173 सदस्यों ने अपना मत दिया था. लायनेल मेसी लगातार चार बार ये ख़िताब जीत चुके हैं लेकिन इस बार रोनाल्डो इसके प्रबल दावेदार माने जा रहे थे. साल 2013 उनके लिए बेहद शानदार रहा था. उन्होने 56 मैचों में 66 गोल दाग़े थे. पुरस्कार की घोषणा के बाद मंच पर बोलने आए रोनाल्डो बेहद भावुक हो गए. नम आंखों के साथ उन्होंने उन्होने कहा सबसे पहले मैं अपने क्लब और राष्ट्रीय टीम के सभी साथियों को धन्यवाद देता हूं. उन सबके प्रयासों के बिना ये मुमकिन नहीं हो पाता. मैं बहुत ख़ुश हूं. इस पुरस्कार को जीतना बहुत मुश्किल है. रोनाल्डो ने कहा हर वो शख़्स जो निजी तौर पर मुझसे जुड़ा है मैं उसका शुक्रिया अदा करता हूं. मेरी पत्नी मेरे दोस्त मेरा बेटा. ये बहुत ही भावुक पल है. मैं इसमें शामिल हर किसी का शुक्रिया ही कह सकता हूं. जर्मनी की गोलकीपर नदीन आंगरर ने दुनिया की सर्वश्रेष्ठ महिला खिलाड़ी का पुरस्कार जीता. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी के पूर्व अध्यक्ष जॉक रोग को फ़ीफ़ा प्रेज़ीडेंशियल अवॉर्ड दिया गया. अफ़ग़ानिस्तान फ़ुटबॉल संघ को एक युद्धग्रस्त देश में खेल को बढ़ावा देने के लिए फ़ेयर प्ले पुरस्कार के लिए चुना गया. |
| DATE: 2014-01-14 |
| LABEL: sports |
| [624] TITLE: घर में शेर, क्या न्यूज़ीलैंड में होंगे ढेर? |
| CONTENT: भारतीय क्रिकेट टीम महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में रविवार की सुबह न्यूज़ीलैंड के दौरे पर रवाना हो गई. भारतीय टीम न्यूज़ीलैंड में पांच एकदिवसीय और दो टेस्ट मैच खेलेगी. भारतीय टीम न्यूज़ीलैंड में पहले एकदिवसीय सिरीज़ खेलेगी जिसका पहला मैच 19 जनवरी को नेपियर में खेला जाएगा. इससे पहले शनिवार की शाम को मुंबई में भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने खेल पत्रकारों को अपने ही अंदाज़ में जवाब दिए. पहले तो उन्होंने भारतीय टीम के विदेशो में किए गए प्रदर्शन को सराहा. उन्होंने कहा कि पिछले दिनों हम दक्षिण अफ़्रीका से टेस्ट और एकदिवसीय सिरीज़ हारे. उससे पहले इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में हमारी टीम ने अच्छा खेल नहीं दिखाया था. इसके अलावा हम जहां भी खेले अच्छा खेले. धोनी ने यह भी कहा कि टीम इंडिया ने वेस्ट इंडीज़ न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ्रीका में शानदार खेल दिखाया है. महेंद्र सिंह धोनी ने कहा घर में शेर बाहर ढेर यह एक टैग लाइन है जिसे अक्सर हमारे साथ जोड़ दिया जाता है जो बोलने में भी अच्छा लगता है लेकिन एक टीम के रूप में हम अच्छा करना चाहते हैं. दक्षिण अफ़्रीका में भी हमने अच्छा खेल दिखाया हालांकि हम दूसरा टेस्ट मैच हार गए. हमने मैच में दो ढाई घंटे का एक कुछ ज़्यादा ही खराब सत्र खेला जिसकी वजह से हार की स्थिति आई. उल्लेखनीय है कि भारत अपने इंग्लैंड दौरे पर चारों टेस्ट मैच हार गया था और उसका यही हाल ऑस्ट्रेलिया में भी हुआ था. महेंद्र सिंह धोनी ने यह भी कहा कि विदेशी दौरों पर तकनीक की चर्चा अधिक होती है जो बल्लेबाज़ी और गेंदबाज़ी में दोनों में ज़रूरी भी है. उन्होंने कहा हमारे बल्लेबाज़ों ने दक्षिण अफ्रीका में ख़ासकर टेस्ट मैचों में अच्छा प्रदर्शन किया और अच्छे तेज़ गेंदबाज़ों का सामना किया. यह ज़रूरी है कि हम अपने ही क़िले यानी घरेलू सिरीज़ में ज़रूर जीतें. इसी के साथ विदेशों में जीतने की कोशिश करनी चाहिए. उन्होंने आगे कहा ऐसा विदेशी टीमों के साथ भी हो रहा है लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप की टीमों की आलोचना अधिक की जाती है. एक टीम के रूप में हमें सुधार करना चाहिए और विदेशों में जहां तक हो सके हमें अधिक से अधिक जीत हासिल करनी होगी. न्यूज़ीलैंड के मैदानों को लेकर कप्तान धोनी ने कहा कि पिछली बार हम पुराने नियमों के तहत वहां खेले और अब आईसीसी के नए नियमों के कारण बड़े स्कोर वाले मैच देखने को मिल सकते हैं लेकिन यह सब वहां के विकेट पर निर्भर करेगा. धोनी ने कहा अगर एक सपाट विकेट और छोटा मैदान हुआ और बल्लेबाज़ों ने अच्छी साझेदारी के साथ शानदार बल्लेबाज़ी की तो उस परिदृश्य में हाई स्कोरिंग वाले मैच हो सकते हैं. मुझे लग रहा है कि एक बहुत रोमांचक सिरीज़ होने वाली है. धोनी के मुताबिक अगला विश्व कप न्यज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में होने वाला है ऐसे में न्यूज़ीलैंड के मैदानों की स्थिति और बनावट का अनुभव टीम को मिलेगा उसका फ़ायदा आने वाले विश्व कप में होगा. इसके अलावा धोनी ने बीसीसीआई के इस निर्णय का भी बचाव किया जिसमें उसने घरेलू क्रिकेट के रणजी ट्रॉफी क्वार्टर फाईनल मुक़ाबले खेलने की अनुमति उन खिलाड़ियों को नहीं दी जो न्यूज़ीलैंड दौरे पर जा रहे थे. धोनी ने कहा दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ सिरीज़ के बाद केवल दस दिन के आराम का अवसर मिला. शारीरिक थकान को आप दूर कर सकते हैं लेकिन कई बार मानसिक तौर पर ताज़गी ज़रूरी होती है. मुझे लगता है कि यह एक अच्छा क़दम था जिससे इस खाली समय में खिलाड़ियों को न्यूज़ीलैंड दौरे के लिए अपने आपको तैयार करने का अवसर मिला. अब देखना है कि यह आराम और कप्तान धोनी का भरोसा न्यूज़ीलैंड दौरे पर क्या रंग लाता ह |
| DATE: 2014-01-13 |
| LABEL: sports |
| [625] TITLE: आसान नहीं है नडाल की राह |
| CONTENT: दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी स्पेन के राफ़ेल नडाल की अगले सप्ताह शुरू हो रहे साल के पहले ग्रैंड स्लेम ऑस्ट्रेलियन ओपन में राह आसान नहीं लगती. टूर्नामेंट के लिए शुक्रवार को निकाले गए ड्रॉ के मुताबिक़ 13 बार के ग्रैंड स्लैम चैंपियन और शीर्षवरीय नडाल को पहले राउंड में ऑस्ट्रेलिया के बर्नार्ड टॉमिच से भिड़ना है. नडाल ने साल 2011 में टॉमिच को शिकस्त दी थी लेकिन तबसे इस ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी के खेल में काफ़ी निखार आ चुका है. टॉमिच हाल ही में सिडनी इंटरनेशनल के सेमीफ़ाइनल में पहुँचे थे और स्थानीय दर्शकों के सामने नडाल को कड़ी चुनौती देने में सक्षम हैं. अगर नडाल शुरुआती बाधा पार कर जाते हैं तो तीसरे दौर में उनका सामना 25वीं सीड फ्रांस के गेल मोंफिल्स से और चौथे दौर में 16वीं सीड जापान के केई निशिकोरी से हो सकती है. क्वार्टर फ़ाइनल में उनकी भिड़ंत पांचवीं सीड और पूर्व यूएस चैंपियन अर्जेंटीना के जुआन मार्टिन डेल पोत्रो से हो सकती है. तीन बार के चैंपियन और दूसरी सीड सर्बिया के नोवाक जोकोविच को अपेक्षाकृत आसान ड्रॉ मिला है और पहले दौर में उनके सामने 90वीं रैंकिंग के लुकास लेको की चुनौती रहेगी. जोकोविच की असली परीक्षा क्वार्टर फ़ाइनल में होगी जहाँ उनके सामने आठवीं सीड स्विटजरलैंड के स्टेनिस्लास वावरिंका चुनौती पेश कर सकते हैं. विंबलडन चैंपियन ब्रिटेन के एंडी मरे को रिकॉर्ड 17 बार के ग्रैंड स्लेम विजेता स्विटजरलैंड के रॉजर फ़ेडरर के साथ निचले हाफ़ में रखा गया है. मरे के सामने पहले दौर में 112वीं रैंकिंग के जापान के गो सोएदा की चुनौती होगी जबकि चौथे दौर में उनकी भिड़ंत 13वीं सीड अमरीका के जॉन इस्नर से हो सकती है. अगर कोई उलटफेर नहीं हुआ तो क्वार्टर फ़ाइनल में मरे और फ़ेडरर आमने-सामने होंगे. पिछले सत्र में निराशाजनक प्रदर्शन करने वाले दुनिया के पूर्व नंबर एक खिलाड़ी फ़ेडरर के सामने पहले दौर में ऑस्ट्रेलिया के वाइल्ड कार्ड प्रवेशी जेम्स डकवर्थ की चुनौती रहेगी और फिर चौथे दौर में उनका सामना दसवीं सीड फ्रांस के जो विल्फ़्रेड सोंगा से हो सकता है. महिला एकल में दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी अमरीका की रीना विलियम्स का पहले दौर में स्थानीय खिलाड़ी एश्ले बार्टी से मुक़ाबला होगा. सरीना ने 17 ग्रैंड स्लेम ख़िताब जीते हैं जिनमें पाँच ऑस्ट्रेलियन ओपन ख़िताब शामिल हैं. शीर्षवरीय सरीना की पहली कड़ी परीक्षा चौथे दौर में होगी जहां उनके सामने ऑस्ट्रेलिया की सामंता स्तोसुर की चुनौती हो सकती है. गत दो बार की चैंपियन बेलारूस की विक्टोरिया अज़ारेंका का पहले दौर में स्वीडन की जोहाना लारसन से मुक़ाबला होगा. अगर कोई उलटफेर नहीं हुआ तो चौथे दौर में उनके सामने 13वीं सीड अमरीका की स्लोएन स्टीफंस की चुनौती रहेगी. तीसरी सीड रूस की मारिया शारापोवा अमरीका की बिथानी माटेक सेंड्स के ख़िलाफ़ अपने अभियान की शुरुआत करेंगी. क्वार्टर फ़ाइनल तक उनकी राह आसान लगती है. अंतिम आठ में उनकी भिड़ंत आठवीं सीड और दुनिया की पूर्व नंबर एक खिलाड़ी सर्बिया की येलेना यांकोविच से हो सकती है. गत उप विजेता और चौथी सीड के सामने पहले दौर में क्वालीफ़ायर की चुनौती रहेगी. क्वार्टर फ़ाइनल में उनका सामना पूर्व विंबलडन चैंपियन चेक गणराज्य की पेत्रा क्वितोवा से हो सकता है. |
| DATE: 2014-01-10 |
| LABEL: sports |
| [626] TITLE: आदित्य हैं भारत के बैडमिंटन का भविष्य? |
| CONTENT: सिर्फ़ 17 साल के आदित्य जोशी किसी आम लड़के की तरह ही हैं. उन्हें भूत-प्रेत की कहानियों वाली अंग्रेज़ी फ़िल्में देखना बहुत पसंद है लेकिन मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल ज़िले धार के रहने वाले आदित्य जोशी ने वो कर दिखाया है जो अब तक कोई भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी नहीं कर सका. आदित्य जोशी ने जूनियर बैडमिंटन विश्व रैंकिंग में पहली रैंक हासिल की है. ऐसा करने वाले वह पहले भारतीय खिलाड़ी हैं. आदित्य जोशी को लेकर कई उम्मीदें जताई जा रही हैं. इस बारे में वह क्या सोचते हैं आदित्य जोशी कहते हैं आगे आने वाले टूर्नामेंट में अच्छा खेलना मेरा लक्ष्य है. ओलंपिक वर्ल्ड जूनियर जैसे जो बड़े टूर्नामेंट हैं उनमें पदक लाना मेरा लक्ष्य है. लेकिन जो चीज़ हैरान करती है वो है आदित्य की रैंकिंग में ज़बरदस्त सुधार. एक साल पहले आदित्य की जूनियर रैंकिंग 54 थी. नंबर वन तक का सफ़र उन्होंने कैसे इतनी जल्दी तय किया इसके जवाब में वह कहते हैं इसके पीछे बहुत लोगों की मेहनत है. मेरे पापा मेरे कोच हैं प्रकाश पादुकोण बैडमिंटन एकेडमी में मैंने प्रैक्टिस की है वहां के कोच मेरी मां इन सभी का मेरी सफलता में हाथ है. आदित्य ने सिर्फ़ पांच साल की उम्र में बैडमिंटन खेलना शुरू कर दिया था. उनके भाई प्रतुल भी बैडमिंटन के राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी हैं. कम उम्र से ही उनके पिता दोनों भाइयों को सुबह साढ़े पांच बजे उठाकर स्टेडियम लेकर जाते थे. अतुल जोशी कहते हैं मुझे लगता था कि आदित्य नंबर वन रैंकिंग हासिल कर सकता है. आदित्य ने बहुत कम उम्र से ही अपने बड़े भाई के साथ टूर्नामेंट जीतने शुरू कर दिए थे. आदित्य की पृष्ठभूमि उन लोगों के लिए मिसाल है जो कहते हैं कि छोटे शहरों के खिलाड़ियों को मौके नहीं मिलते या वे आगे नहीं बढ़ सकते. आदित्य के ज़िले धार के पिछड़ेपन का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि धार को रेल लाइन दूर-दूर तक नहीं छूती. फिर भी उन्होंने मुश्किलों को सफलता की राह में नहीं आने दिया. आदित्य कहते हैं मुझे ऐसा नहीं लगता कि मैं किसी बड़े शहर में होने पर अलग मुकाम पर होता. अगर आप किसी बड़े शहर में हों और कुछ न करें तब भी आप कहीं नहीं पहुंच सकते. आदित्य ने धार में भारतीय खेल प्राधिकरण के सेंटर में ट्रेनिंग ली है. ये सेंटर विक्रम वर्मा ने बतौर खेल मंत्री शुरू करवाया था. आदित्य के पिता कहते हैं धार छोटी जगह है लेकिन यहां हमें सुविधाएं मिल जाती हैं. आदित्य और उनके साथी खिलाड़ी यहां से हर वर्ग में राष्ट्रीय चैंपियन बन चुके हैं. आदित्य हर रोज़ कम से कम छह घंटे प्रैक्टिस करते हैं. लेकिन बी कॉम फर्स्ट ईयर के छात्र आदित्य को पढ़ाई और खेल में संतुलन बिठाना मुश्किल नहीं लगता. वह हर रविवार को वक़्त मिलने पर फ़िल्में देखने का मौका हाथ से नहीं जाने देते और टेनिस और क्रिकेट के मैच भी देखते हैं. ख़ुद आदित्य को साइना नेहवाल और पीवी सिंधु का खेल बहुत पसंद है. तो क्या वाकई आदित्य से भारतीय बैडमिंटन के प्रशंसक बहुत उम्मीदें लगा सकते हैं इस सवाल के जवाब में पूर्व एशियन बैडमिंटन चैम्पियन दिनेश खन्ना कहते हैं रैंकिंग से ये अनुमान लगाना कि यही खिलाड़ी भारत में बैडमिंटन का भविष्य है ठीक नहीं होगा. लेकिन ये कहना ज़्यादा सही होगा कि वह एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी हैं जिनसे हमें भविष्य में उम्मीदें हो सकती हैं. वरिष्ठ बैडमिंटन खिलाड़ी पारुपल्ली कश्यप कहते हैं किसी भी वर्ल्ड रैंकिंग में नंबर वन आना निश्चित तौर पर शानदार है. जूनियर रैंकिंग में नंबर वन आना उनके लिए अच्छी बात है. उन्हें और मेहनत कर के अच्छा प्रदर्शन करना होगा. वरिष्ठ खेल पत्रकार कृष्णास्वामी कहते हैं कि आदित्य से इतनी उम्मीदें लगाना ठीक नहीं. वह कहते हैं इतनी कम उम्र में उन पर ये टैग लगाना थोड़ा ग़लत होगा क्योंकि उन पर दबाव बढ़ता जाएगा क्योंकि जूनियर से जब भी सीनियर वर्ग में कोई खिलाड़ी आता है तो उस पर कई दबाव आते हैं. ये सब देखने के लिए शायद एक-दो साल का वक़्त लगेगा. हालांकि अभी आदित्य की सीनियर रैंकिंग 460 है लेकिन इसके पीछे वजह ये है कि उन्होंने सीनियर टूर्नामेंट ज़्यादा नहीं खेले हैं. मुमकिन है कि वह ज़्यादा मैच खेलें तो उनकी रैंकिंग में सुधार हो. हालांकि अभी आदित्य का पूरा ध्यान ताइपेई में होने वाली एशियाई चैंपियनशिप और मलेशिया में होने वाली वर्ल्ड जूनियर चैंपियनशिप पर है. शायद आदित्य भी रैंकिंग के साथ आए दबाव को समझते हैं. वह कहते हैं अभी मैंने रणनीति तैयार नहीं की है. बस यही है कि इस बार अच्छा प्रदर्शन करना है क्योंकि रैंक वन हो गई है तो इसके साथ काफ़ी ज़िम्मेदारी भी है. |
| DATE: 2014-01-09 |
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| [627] TITLE: शूमाकर की रफ़्तार ठीक थी: जांचकर्ता |
| CONTENT: माइकल शूमाकर के हेलमेट कैमरे से मिली तस्वीरों से लगता है कि जब हादसा हुआ तब मुश्किल सतह पर भी उनकी रफ़्तार किसी अच्छे स्कीयर जैसी थी. स्कीइंग हादसे की जांच कर रहे लोगों ने यह जानकारी दी है. फ़्रांस में स्कीइंग करते हुए शूमाकर एक चट्टान से टकरा गए थे और गिर गए थे. पूर्व फ़ॉर्मूला वन ड्राइवर के हादसे की जांच कर रहे अधिकारियों का कहना है कि शूमाकर जब हादसे का शिकार बने तब वह तैयार ढलान पिस्ट से आठ मीटर दूर थे. जांचकर्ताओं के मुताबिक जब 45 साल के शूमाकर ढलान से हटे तब भी ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने रफ़्तार कम की हो. शूमाकर को 29 दिसंबर को हुए हादसे में सिर में गंभीर चोटें आईं थीं. अभी वे ग्रेनोबल के एक अस्पताल में कोमा में हैं. डॉक्टर उनकी हालत नाज़ुक लेकिन स्थिर बता रहे हैं. अल्बर्टविले में पत्रकारों से बातचीत में जांचकर्ताओं ने कहा कि अभी उन्होंने वह जगह देखी है जहां हादसा हुआ और चश्मदीदों और डॉक्टरों से भी बात की है. इसके अलावा उन्होंने शूमाकर का हेलमेट और स्की भी देखी थी और उनके हेलमेट से लगे कैमरे से मिली तस्वीरों की भी जांच की गई थी. प्रमुख जांचकर्ता पैट्रिक क्विंसी ने कहा शूमाकर अच्छे स्कीयर हैं लेकिन उनकी एक स्की उभरी हुई चट्टान से टकरा गई थी. इससे वह गिर गए और उनका सिर चट्टान से टकरा गया. |
| DATE: 2014-01-08 |
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| [628] TITLE: हॉकी वर्ल्ड लीगः दिल्ली में श्रेष्ठ टीमों का जमावड़ा |
| CONTENT: इन दिनों दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ हॉकी टीमें जमकर अभ्यास कर रही हैं. इन टीमों में पिछले लंदन ओलंपिक की स्वर्ण पदक विजेता जर्मनी और पिछले विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट की विजेता ऑस्ट्रेलिया तो है ही इनके अलावा मेज़बान भारत इंग्लैंड हॉलैंड बेल्जियम अर्जेंटीना और न्यूज़ीलैंड भी शामिल है. इन सभी आठ टीमों का उद्देश्य हॉकी वर्ल्ड लीग फ़ाइनल का ख़िताब जीतना है. दरअसल दिल्ली में 10 जनवरी से 18 जनवरी तक हॉकी वर्ल्ड लीग का चौथा और आख़िरी दौर खेला जाएगा. इससे पहले इस लीग का पहला दौर साल 2012 में दुनिया के नौ देशों में आयोजित किया गया. इसमें 35 देशों की टीमों ने भाग लिया. इनमें से 13 टीमों ने अगले दौर के लिए जगह बनाई. इसके बाद साल 2013 में दूसरे और तीसरे दौर के मुक़ाबले खेले गए. इसके बाद आख़िरकार इन आठ टीमों ने चौथे और फ़ाइनल दौर में खेलने का हक़ हासिल किया. इसी लीग के माध्यम से विश्व हॉकी संस्था ने इस साल होने वाले विश्वकप के लिए 12 टीमों का चुनाव किया है. इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि ये लीग कितनी महत्वपूर्ण है. वैसे इसी तरह की लीग महिला वर्ग में भी आयोजित की गई. भारतीय पुरुष हॉकी टीम के लिए सांत्वना की बात यह रही कि उसे विश्व हॉकी संस्था की मेहरबानी से न सिर्फ़ विश्व कप में जगह मिल गई बल्कि मेज़बान होने के कारण हॉकी वर्ल्ड लीग फ़ाइनल में खेलने का मौक़ा भी मिल गया. अब अगर हॉकी वर्ल्ड लीग की बात की जाए तो इसमें भाग लेने वाली आठ टीमों को दो पूल में बांटा गया है. पूल ए में जर्मनी इंग्लैंड न्यूज़ीलैंड और मेज़बान भारत हैं. पूल बी में ऑस्ट्रेलिया हॉलैंड बेल्जियम और अर्जेंटीना हैं. ज़ाहिर है कि भारत को अपने से बेहतर रैंकिंग वाली टीमों के ख़िलाफ़ खेलना है. भारत अपना पहला मैच 10 जनवरी को इंग्लैंड से 11 जनवरी को न्यूज़ीलैंड से और 13 जनवरी को जर्मनी से खेलेगा. भारतीय हॉकी टीम के नए चीफ़ कोच ऑस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध पूर्व खिलाड़ी टेरी वॉल्श ने भारतीय टीम की संभावनाओ को लेकर बेहद ईमानदारी से कहा कुछ खिलाड़ी चोटिल हैं जिसका असर प्रदर्शन पर पडेगा. इसी साल विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट और एशियन गेम्स होने हैं और उसकी तैयारी करना हमारा मुख्य लक्ष्य है. वॉल्श का कहना है विश्व कप से पहले हमें दुनिया की सबसे बेहतरीन टीमों के साथ खेलने का अवसर मिल रहा है. हम धीरे-धीरे आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे. हमारी टीम के खिलाड़ियों में कोई कमी नही है लेकिन विश्व स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन करने के लिए इन्हें तकनीकी रूप से मज़बूत होना ज़रूरी है लेकिन यही बात राष्ट्रीय टीम ही नहीं बल्कि जूनियर स्तर से शुरू होकर पूरे हॉकी सिस्टम पर लागू होती है. उन्होंने कहा हम आने वाले महीनों में इस पर काम करेंगे क्योंकि इसी से आगे बढ़ने का रास्ता खुलेगा. हम परिणाम की चिंता किए बिना हर मैच जीतने की कोशिश करेंगे. ये बेहद महत्वपूर्ण टूर्नामेंट है लेकिन हम किस नंबर पर रहेंगे कहना मुश्किल है. हमारी सबसे बड़ी कमी गोल न कर पाना है और इस आदत को 14 से 16 साल की उम्र के खिलाड़ियों में बनाना ज़रूरी है. टेरी वॉल्श जहां बातों ही बातों में पूरे भारतीय हॉकी सिस्टम की पोल खोल गए वहीं उन्होंने गुरु मंत्र भी दे दिया कि भारत में हॉकी का विकास कैसे होगा. दूसरी तरफ भारतीय हॉकी टीम के कप्तान सरदार सिंह भी टीम की वास्तविकता से भलीभांति परिचित हैं. सरदार सिंह ने भी साफ़-साफ़ कहा हम इस टूर्नामेंट को केवल सीखने के लिए या फिर बिना किसी दबाव के खेलेंगे. देश की हॉकी की वर्तमान स्थिति को देखकर हमें भी बहुत दुख होता है लेकिन हम पूरी कोशिश करेंगे कि देश को मेडल जीतकर दें. अभी तो विश्व कप की तैयारी करना हमारा मुख्य उद्देश्य है इस लीग से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलेगा. अब यह तो समय ही बताएगा कि आठ टीमों के बीच भारतीय टीम कहां रहती है लेकिन बिल्ली के भाग्य से छीका टूटा है यानी मेज़बान होने के नाते जब इतने बडे टूर्नामेंट में खेलने का मौक़ा मिला है तो टीम भी कुछ कर दिखाए तभी बात बने. |
| DATE: 2014-01-07 |
| LABEL: sports |
| [629] TITLE: फ़ुटबॉल के 'अमर' खिलाड़ी यूसेबियो नहीं रहे |
| CONTENT: पुर्तगाल के जानेमाने फ़ुटबॉल खिलाड़ी यूसेबियो का निधन हो गया है. वे 71 वर्ष के थे. उन्हें फ़ुटबॉल के सर्वकालिक उत्कृष्ट खिलाड़ियों में से एक माना जाता है. समाचार एजेंसी एपी के मुताबिक़ यूसेबियो की जीवनी लिखने वाले जोस मेलहेयरो का कहना है कि यूसेबियो की मौत रविवार को दिल का दौरा पड़ने की वजह से हुई. मोज़ाम्बिक में 25 जुलाई वर्ष 1942 को जन्में यूसेबियो को बेनफिका ने अपनी टीम में तब जगह दी थी जब वो सिर्फ 19 वर्ष के थे. बेनफिका के पूर्व स्ट्राइकर यूसेबियो ने 745 पेशेवर मैचों में 733 गोल दागे और वर्ष 1966 के विश्व कप में सबसे ज्यादा गोल करने का कीर्तिमान अपने नाम किया. चेल्सी के पुर्तगाल प्रबंधक जोस मौरिन्हो का कहना है मुझे लगता है कि वो अमर हैं. मैनचेस्टर यूनाइटेड के सर बॉबी चार्लटन का कहना है कि यूसेबियो उन तमाम खिलाड़ियों में सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों में से एक थे जिनके ख़िलाफ़ मुझे खेलने का मौका मिला. फ़ीफ़ा के अध्यक्ष सेप ब्लेटर ने ट्वीटर के ज़रिए अपने संदेश में कहा यूसेबियो का महान खिलाड़ियों में जो स्थान है वो हमेशा क़ायम रहेगा. बेनफिका ने भी एक बयान जारी कर कहा है हम उनकी प्रतिभा उनके चरित्र को याद रखेंगे जो उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर का फ़ुटबॉल खिलाड़ी बनाता है. बयान में कहा गया है यूसेबियो का जीवन उन सभी के लिए विरासत की तरह है जो फ़ुटबॉल से प्रेम करते हैं. |
| DATE: 2014-01-05 |
| LABEL: sports |
| [630] TITLE: एशेज में इंग्लैंड का सफ़ाया, ऑस्ट्रेलिया की 5-0 से जीत |
| CONTENT: ऑस्ट्रेलिया से पाँचवाँ टेस्ट मैच महज़ तीन दिन में हारने के साथ ही इंग्लैंड ने एशेज श्रृंखला पाँच शून्य से गँवा दी. ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम ने मौजूदा एशेज सीरीज के पाँचवें मैच में इंग्लैंड को 281 रनों से हरा दिया है. ऑस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड के सामने जीत के लिए 448 रनों का लक्ष्य दिया था जिसके जवाब में इंग्लैंड की टीम दूसरी पारी में महज 166 रन पर सिमट गई. इस जीत के साथ ही मेजबान टीम ने इस सीरीज़ में 5-0 से इंग्लैंड का सूपड़ा साफ़ कर दिया. तीसरे दिन रविवार को मेजबान टीम ने इंग्लैंड के सामने 448 रनों का लक्ष्य रखा जिसका पीछा करते हुए मेहमान 32वें ओवर में ही 166 रनों पर ढेर हो गए. ऑस्ट्रेलिया की ओर से रायन हैरिस ने दूसरी पारी में पांच विकेट लिए जबकि मिशेल जॉनसन को तीन और नेथन लियोन को दो सफलता मिलीं. इंग्लैंड की ओर से माइकल कारबैरी ने 43 स्टुअर्ट ब्रॉड ने 42 और बेन स्टोक्स ने 32 रनों का योगदान दिया. इसके अलावा कप्तान एलिस्टर समेत सभी बल्लेबाजों ने निराश किया. मेजबान टीम ने दूसरी पारी में 276 रन बनाए. रोजर्स ने तीसरे दिन इस सीरीज का तीसरा शतक पूरा किया. उन्होंने 119 रन बनाए. रोजर्स और बेले ने पांचवें विकेट के लिए 109 रन जोड़े. वहीं इंग्लैंड की ओर से अपना पहला टेस्ट खेल रहे बॉर्थविक ने तीन विकेट लिए जबकि जेम्स एंडरसन बेन स्टोक्स और स्टुअर्ट ब्रॉड को दो-दो सफलता मिली. वैसे तो इंग्लैंड ने 0-3 से पिछड़ने के बाद ही एशेज गँवा दी थी लेकिन उसके बाद भी श्रृंखला में भी मैच वो न तो जीत सकी और न ही ड्रॉ करा पाई. ऐसी उम्मीद थी कि चौथा और पांचवां टेस्ट जीतकर इंग्लिश टीम अपनी प्रतिष्ठा बचाने का प्रयास करेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मेलबर्न और सिडनी में हुई हार के साथ इंग्लैंड ने रही-सही प्रतिष्ठा भी गँवा दी. |
| DATE: 2014-01-05 |
| LABEL: sports |
| [631] TITLE: ऑस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड पर कसा शिकंजा |
| CONTENT: ऑस्ट्रेलिया ने पाँचवें और अंतिम एशेज़ टेस्ट के दूसरे दिन शनिवार को इंग्लैंड को 155 रन पर ढेर करके पहली पारी में 171 रन की अहम बढ़त हासिल कर ली. सिरीज़ में 4-0 की बढ़त बना चुकी ऑस्टेलियाई टीम ने सिडनी क्रिकेट ग्राउंड में खेले जा रहे इस टेस्ट में पहली पारी में 326 रन बनाए थे. इंग्लैंड ने एक विकेट पर आठ रन से आगे खेलना शुरू किया और पहले एक घंटे में ही ऑस्ट्रेलिया के तेज़ गेंदबाजों ने मेहमान टीम के शीर्ष क्रम को तहस-नहस कर दिया. ऑस्ट्रलिया के लिए प्रचंड फॉर्म में चल रहे बाएं हाथ के तेज़ गेंदबाज़ मिशेल जॉनसन रेयान हैरिस और पीटर सिडल ने तीन-तीन विकेट साझा किए. कप्तान एलेस्टेयर कुक सात नाइट वॉचमैन जेम्स एंडरसन सात केविन पीटरसन तीन और इयान बेल दो रन बनाकर आउट हुए. इंग्लैंड ने अपने पाँच विकेट 23 रन पर ही गंवा दिए थे और उस समय लग रहा था कि इंग्लिश टीम 100 रन तक भी नहीं पहुँच पाएगी. लेकिन बेन स्टोक्स 47 ने फिर अपना पहला टेस्ट खेल रहे गैरी बलांस 18 और विकेटकीपर बल्लेबाज़ जॉनी बेयरस्टो 18 के साथ उपयोगी साझेदारियां करते हुए टीम को 100 रन के पार पहुँचाया. लंच के समय इंग्लैंड का स्कोर पाँच विकेट पर 61 रन था. बलांस और बेयरस्टो ने छठे विकेट के लिए 39 रन जोड़े. बलांस लंच के बाद स्पिनर नाथन लियोन की गेंद पर विकेट के पीछ लपके गए. बेयरस्टो और स्टोक्स ने फिर सातवें विकेट के लिए 49 रन की साझेदारी की लेकिन सिडल ने इन दोनों बल्लेबाज़ों को एक ही ओवर में चलता कर दिया. पदार्पण टेस्ट में उतरे लेग स्पिनर स्कॉट बोर्थविक एक रन बनाकर हैरिस की गेंद को तीसरी स्लिप में स्टीव स्मिथ के हाथों में खेल बैठे. स्टुअर्ट ब्रॉड नाबाद 30 और बॉएड रैंकिन 13 ने आख़िरी विकेट की साझेदारी में 30 रन जोड़े. ऐसा लग रहा था कि इंग्लिश टीम चायकाल तक अपनी पारी को खींच लेगी लेकिन जॉनसन ने रैंकिन को बोल्ड कर इंग्लिश पारी समेट दी. |
| DATE: 2014-01-04 |
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| [632] TITLE: माइकल शूमाकर का जन्मदिन मना रहे हैं प्रशंसक |
| CONTENT: सात बार के फ़ॉर्मूला वन चैंपियन माइकल शूमाकर के प्रशंसक शुक्रवार को उनके 45वें जन्मदिन पर एक शांत जुलूस निकाल रहे हैं. शूमाकर रविवार को फ्रांस के अल्पाइन रिजॉर्ट मेरिबल में स्कीइंग करते हुए गंभीर रूप से घायल हो गए थे. उनका इस समय फ्रांस के ग्रेनोबल यूनिवर्सिटी अस्पताल में इलाज चल रहा है. फ़्रांस और इटली के फ़ेरारी क्लब के सदस्य शुक्रवार सुबह अस्पताल के बाहर जमा हो रहे हैं. शूमाकर के परिवार ने अभी हाल ही में उनके प्रशंसकों का समर्थन के लिए आभार जताया था और जर्मन लोगों को योद्धा बताया था. मस्तिष्क पर दबाव कम करने के लिए डॉक्टरों ने उन्हें कोमा में रखा हुआ है. फॉर्मूला वन के इतिहास के शूमाकर सबसे सफल ड्राइवर हैं. शूमाकर की मैनेजर का कहना है कि शूमाकर की स्थिति चिंताजनक लेकिन स्थिर बनी हुई है. अल्पाइन रिजॉर्ट मेरिबल में स्कीइंग करते समय शूमाकर का सिर एक पत्थर से टकरा गया था. इससे उनका हेलमट फट गया था. उनका इलाज कर रहे डॉक्टरों ने गुरुवार को कहा था कि शूमाकर में सुधार के कुछ लक्षण दिखे हैं लेकिन वे अब भी ख़तरे से बाहर नहीं हैं. डॉक्टरों ने अगले कुछ दिनों या महीनों में उनके स्वास्थ्य को लेकर कोई पूर्वानुमान लगाने से इनकार कर दिया. लेकिन चिकित्सकीय रूप से यह संभव है कि किसी को चिकित्सकीय रूप से कोमा में ले जाया जाए और बाद में वह उससे पूरी तरह उबर जाए. शूमाकर की पूर्व टीम फ़ेरारी ने कहा है कि इटली और फ्रांस में रहने वाले शूमाकर के प्रशंसकों को जन्मदिन पर ग्रेनोबल ले जाने के लिए बसों की व्यवस्था की गई है. फ़ेरारी के प्रवक्ता रिनाटो बिसिगानी ने कहा शूमाकर से निकटता प्रदर्शित करने के लिए लोगों को लाल रंग के कपड़े पहनने और झंडे लाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. यह सब बहुत शांतिपूर्वक किया जाएगा. प्रवक्ता ने ज़ोर देकर कहा कि यह सब ब्रांड फ़ेरारी या उसके ग्राहकों को प्रोत्साहित करने के लिए नहीं किया जा रहा है. उन्होंने कहा हम यह सुनिश्चित करेंगे कि इस कठिन समय में हम संवेदनशील बने रहें. शूमाकर के परिवार ने गुरुवार को दुनिया के कोने-कोने से शूमाकर के जल्द ठीक होने की शुभकामनाएं भेजने और सहानुभूति व्यक्त करने के लिए उनके प्रशंसकों का आभार जताया था. इंटरनेट पर जारी एक बयान में शूमाकर के परिवार ने कहा था हम सब जानते हैं कि वह एक योद्धा हैं और हम उन्हें यूं ही नहीं जाने देंगे. माइकल शूमाकर 2012 में दूसरी बार फ़ॉर्मूला वन से रिटायर हो गए थे. इस प्रतियोगिता का ख़िताब उन्होंने सात बार जीता था. अपने 19 साल के करिअर में शूमाकर ने 91 रेसों में जीत दर्ज की. उन्होंने 1994 और 1995 में बेनेटन के लिए विश्व ख़िताब जीते थे और फिर उन्होंने साल 2000 से लगातार पाँच बार फेरारी के लिए ख़िताब अपने नाम किए. शूमाकर ने साल 2006 में खेल से संन्यास ले लिया था लेकिन साल 2010 में उन्होंने मर्सिडीज़ के साथ फिर ट्रैक पर वापसी की और फिर 2012 में दोबारा संन्यास ले लिया. |
| DATE: 2014-01-03 |
| LABEL: sports |
| [633] TITLE: भांबरी चेन्नई ओपन से क्वार्टर फ़ाइनल में |
| CONTENT: भारत के युवा टेनिस खिलाड़ी यूकी भांबरी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सत्र के पहले एटीपी टूर्नामेंट चेन्नई ओपन के क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बना ली है. भांबरी को तीसरी सीड इटली के फैबियो फोग्निनी के पैर की चोट के कारण दूसरे दौर का मुक़ाबला बीच में ही छोड़ देने से अंतिम आठ का टिकट मिल गया. दुनिया के 16वें नंबर के खिलाड़ी फोग्निनी ने जब मैच छोड़ने का फ़ैसला किया तो उस समय वह भांबरी के ख़िलाफ़ पहला सेट 1-6 से हारने के बाद दूसरे सेट में 5-5 की बराबरी पर थे. दिल्ली के भांबरी इस टूर्नामेंट के इतिहास में क्वार्टर फ़ाइनल में पहुंचने वाले भारत के दूसरे खिलाड़ी हैं. सोमदेव देववर्मन साल 2009 में यह कारनामा कर चुके हैं. जूनियर ऑस्ट्रेलियन ओपन चैंपियन रह चुके भांबरी का क्वार्टर फ़ाइनल में पांचवीं सीड के कनाडा के वासेक पॉसपिसिल से मुक़ाबला होगा. लेकिन पहले दौर में सोमदेव को हराकर तहलका मचाने वाले स्थानीय खिलाड़ी आर रामकुमार का अभियान दूसरे दौर में ही थम गया. रामकुमार को छठी सीड स्पेन के मार्सेल ग्रैनोलर्स ने लगातार सेटों में 6-2 6-4 से हराकर स्थानीय दर्शकों का दिल तोड़ दिया. रामकुमार की चुनौती एकल में तो समाप्त हो गई लेकिन युगल में वह श्रीराम बालाजी के साथ क्वार्टर फ़ाइनल में उतरेंगे. |
| DATE: 2014-01-03 |
| LABEL: sports |
| [634] TITLE: युवराज के साथ ये तो होना ही था: अतुल वासन |
| CONTENT: दक्षिण अफ़्रीका में एकदिवसीय और टेस्ट सिरीज़ में भारत को हार मिली. दक्षिण अफ़्रीका सिरीज़ में किस खिलाड़ी ने कैसा प्रदर्शन किया अभी इसी की चर्चा हो रही है लेकिन इस बीच न्यूज़ीलैंड के आगामी दौरे के लिए टीम का एलान हुआ. न्यूज़ीलैंड में भारत को पांच एकदिवसीय और दो टेस्ट मैच खेलने हैं. एकदिवसीय टीम में युवराज सिंह और टेस्ट टीम में प्रज्ञान ओझा को जगह नहीं मिली है. युवराज सिंह को टीम से बाहर रखने के बारे में पूर्व तेज़ गेंदबाज़ अतुल वासन ने बीबीसी से कहा मुझे लग रहा था कि ये होने वाला है क्योंकि चयनकर्ताओं का धैर्य भी अब जवाब दे गया है. नए खिलाड़ी भी तेज़ी से उभर रहे हैं. अतुल वासन का मानना है कि अजिंक्य रहाणे ने उम्दा प्रदर्शन किया है और इसी तरह दो-तीन खिलाड़ी और हैं जिन्हें भारत की टीम में मौका मिलना चाहिए. साल 2015 में होने वाले विश्वकप का उल्लेख करते हुए अतुल वासन कहते हैं कि भारत को अपनी टीम तैयार करनी है और शायद चयनकर्ताओं को लगता है कि युवराज सिंह तब तक अपना प्रदर्शन संभाल नहीं पाएंगे इस हिसाब से उन्हें टीम से बाहर रखने का फैसला सही प्रतीत होता है. स्टुअर्ट बिन्नी को टीम में जगह मिलने के सवाल पर अतुल वासन कहते हैं कि बिन्नी प्रथम श्रेणी क्रिकेट में कई वर्षों से अच्छे खेल का प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय एकदिवसीय मैच में एक हरफ़नमौला खिलाड़ी की भूमिका वह निभा पाएंगे या नहीं उस मंच पर उनका प्रदर्शन देखे बिना अटकलबाज़ी नहीं हो सकती. वरुण ऐरॉन को भी एकदिवसीय मैचों के लिए चुनी गई भारतीय टीम में जगह मिली है. वरुण के बारे में पूछे जाने पर अतुल वासन कहते हैं मुझे लगता है कि वरुण को उनके पुराने प्रदर्शन और क्षमता के आधार पर टीम में चुना गया है क्योंकि हाल के दिनों में तो उन्होंने ऐसा कोई ख़ास प्रदर्शन किया नहीं है. अतुल वासन ये भी मानते हैं कि उम्दा फ़िटनेस ने वरुण को टीम में जगह दिलाने में अहम भूमिका निभाई है. भारत की टेस्ट टीम में बहुत अधिक बदलाव नहीं किए गए हैं. शिखर धवन और रोहित शर्मा पिछले टेस्ट मैचों में बहुत उम्दा नहीं खेले हैं फिर भी उन्हें टीम में जगह मिली है. इस बारे में अतुल वासन कहते हैं रोहित शर्मा की प्रतिभा साबित हो चुकी है. भारतीय टेस्ट टीम में असली चुनौती मध्यक्रम की बल्लेबाज़ी है और मुझे लगता है कि अब सारा दबाव सुरेश रैना पर आएगा. दक्षिण अफ्रीका में भारतीय टीम के हालिया प्रदर्शन से न्यूज़ीलैंड में उसके मनोबल पर क्या असर पड़ेगा इस सवाल पर अतुल वासन कहते हैं न्यूज़ीलैंड की टीम उतनी ज़बर्दस्त नहीं है जितनी दक्षिण अफ्रीका की टीम है. लेकिन वहां के मौसम के हिसाब से भारतीय टीम के लिए कुछ मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं. वह ये भी मानते हैं कि न्यूज़ीलैंड का दौरा भारत के लिए दक्षिण अफ्रीका की तरह कठिन नहीं होगा. |
| DATE: 2014-01-02 |
| LABEL: sports |
| [635] TITLE: अस्पताल में शूमाकर की हालत 'स्थिर' |
| CONTENT: जर्मन मोटर रेसिंग स्टार और सात बार के फ़ॉर्मूला वन चैंपियन माइकल शूमाकर की हालत स्थिर है यह जानकारी उनके मैनेजर ने दी है. उनके प्रबंधक ज़बीने केम के मुताबिक़ ग्रेनोबल अस्पताल में शूमाकर की अच्छे से देखभाल हो रही है. साथ ही उन्होंने शूमाकर की हालत से जुड़ी अफ़वाहों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. रविवार को स्कीइंग दुर्घटना में शूमाकर को सिर पर चोट लगी थी. शूमाकर फ़्रांस की एल्प्स पर्वत श्रृंखला पर स्कीइंग करते हुए गंभीर रूप से घायल हो गए थे. वह अभी कोमा में हैं. डॉक्टरों ने मंगलवार को कहा था कि उनकी हालत में सुधार के संकेत मिल रहे हैं लेकिन उन्होंने कहा था कि वह अब भी ख़तरे से बाहर नहीं है. स्कीईंग के दौरान एक चट्टान से टकराने के बाद उनका हेल्मेट टूट गया था. केम ने संवाददाताओं से कहा इसका मतलब यह नहीं है कि शूमाकर बहुत तेज़ रफ़्तार से सफ़र कर रहे थे. उनकी रफ़्तार बहुत तेज़ नहीं थी. उन्होंने मीडिया को बताया कि शूमाकर केवल अपने किशोर बेटे के साथ स्कीइंग नहीं कर रहे थे जैसा कि ख़बरों में लिखा जा रहा है. इस दौरान वह अपने दोस्तों के एक समूह के साथ थे. पूरी दुनिया से शूमाकर के समर्थन में संदेश आ रहे हैं. संवाददाताओं का कहना है कि उनको लोगों का काफ़ी स्नेह मिल रहा है. उनको ऐसे उदार व्यक्ति के रूप में देखा जाता है जिन्होंने लोगों की मदद के लिए बहुत कुछ किया है. माइकल शूमाकर सात बार के फ़ॉर्मूला वन चैंपियन रह चुके हैं. पूर्व चैंपियन शूमाकर तीन जनवरी को 45 साल के हो जाएंगे. उन्होंने फ़ॉर्मूला-वन से 2012 में दोबारा संन्यास ले लिया था. उन्होंने सात विश्व चैंपियनशिप और 91 रेस में जीत हासिल की. फ़रारी के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने बेनेटन के लिए 1994 और 1995 में जीत हासिल की. उन्होंने फ़ॉर्मूला वन से 2006 में संन्यास ले लिया था. लेकिन 2010 में फिर से मर्सिडीज़ के साथ रेस के मैदान पर वापसी करने के बाद तीन सीजन बाद 2012 के आख़िर में फिर से संन्यास ले लिया था. |
| DATE: 2014-01-01 |
| LABEL: sports |
| [636] TITLE: सबसे तेज़ वनडे शतक का अफ़रीदी का रिकॉर्ड टूटा |
| CONTENT: वनडे क्रिकेट में सबसे तेज़ शतक का पाकिस्तान के शाहिद अफ़रीदी का रिकॉर्ड टूट गया है. ये रिकॉर्ड तोड़ा है न्यूज़ीलैंड के बल्लेबाज़ कोरी एंडरसन ने. एंडरसन ने 36 गेंदों पर ये धुआँधार शतक जड़ा. उन्होंने वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ बुधवार को क्वींसटाउन में खेले गए तीसरे वनडे में यह रिकॉर्ड बनाया. पाकिस्तान के शाहिद आफरीदी ने साल 1996 में श्रीलंका के ख़िलाफ़ 37 गेंदों में शतक पूरा किया था. लेकिन एंडरसन ने 36 गेंदों में ही यह कारनामा कर दिखाया. अपने शतक तक पहुंचने के लिए उन्होंने चार चौके और 12 छक्के लगाए. उन्होंने कुल 47 गेंदों में छह चौकों और 14 छक्कों की मदद से नाबाद 131 रन बनाए. हालांकि वह भारत के रोहित शर्मा का एक मैच में सर्वाधिक 16 छक्के मारने का रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाए लेकिन उनकी इस पारी से न्यूजीलैंड ने यह मैच 159 रनों से जीतकर पाँच मैचों की सीरीज में 1-1 से बराबरी कर ली है. दोनों टीमों के बीच दूसरा वनडे बारिश के कारण रद्द हो गया था. तीसरा मैच भी बारिश के कारण 21 ओवर प्रति पारी कर दिया गया था. मेजबान टीम ने निर्धारित 21 ओवर में बेहद आक्रामक बल्लेबाजी करते हुए चार विकेट के नुकसान पर 283 रन बनाए. पाँचवें नंबर पर बल्लेबाजी करने उतरे एंडरसन ने कैरेबियाई गेंदबाज़ों की जमकर धुनाई करते हुए आफरीदी के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया. ओपनर जेसी राइडर ने 51 गेंदों पर 12 चौकों और पांच छक्कों की मदद से 104 रन बनाए. एंडरसन और राइडर ने चौथे विकेट के लिए 191 रन की साझेदारी की. जीत के लिए वेस्टइंडीज की टीम को 13-5 रन प्रति ओवर के औसत से रन बनाने थे लेकिन टीम पाँच विकेट पर 124 रन ही बना सकी. कैरेबियाई टीम की शुरुआत खराब रही और 19 रन तक उसने अपने तीन विकेट गंवा दिए थे. वेस्टइंडीज के लिए ड्वेन ब्रावो ने सबसे ज़्यादा नाबाद 56 रन बनाए. |
| DATE: 2014-01-01 |
| LABEL: sports |
| [637] TITLE: कपिल को अपना आदर्श मानते हैं ईश्वर |
| CONTENT: न्यूज़ीलैंड दौरे के लिए भारत की टेस्ट और वनडे टीमों में चुने गए मध्य प्रदेश के तेज़ गेंदबाज़ ईश्वर पांडे देश के पहले विश्वविजेता कप्तान और महान ऑलराउंडर कपिल देव को अपना आदर्श मानते हैं. रीवा ज़िले की सिरमौर तहसील के एक छोटे से गांव के रहने वाले ईश्वर के पिता सेवानिवृत्त सूबेदार मेजर हैं. वो अपने बेटे को डॉक्टर बनाना चाहते थे लेकिन ईश्वर ने क्रिकेट को अपना करियर चुना. 130 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से गेंद फेंकने वाले ईश्वर ने टीम इंडिया में चुने जाने के बाद कहा अंतत मुझे मौका मिल गया है. मैं इस लम्हे के लिए कड़ी मेहनत कर रहा था और अंतत यह लम्हा आ गया. उन्होंने कहा लेकिन अभी जश्न मनाने का समय नहीं है क्योंकि मुझे आगामी चुनौतियों पर ध्यान लगाना है. मुझे कड़ी मेहनत जारी रखनी होगी और एकाग्र रहना होगा. 15 अगस्त 1989 को जन्मे छह फुट दो इंच लंबे ईश्वर ने अंडर-19 में शानदार प्रदर्शन से सबका ध्यान खींचा. लेकिन रीवांचल एक्सप्रेस के नाम से मशहूर ईश्वर उस वक़्त सुर्ख़ियों में आए जब वह 2012-13 रणजी सत्र में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज़ बने. इस दौरान उन्होंने 20-16 के औसत से कुल 48 विकेट लिए. मौजूदा रणजी सत्र में वह आठ मैचों में 30 विकेट झटक चुके हैं. इंदौर में रेलवे के ख़िलाफ़ मैच में ईश्वर ने 84 रन देकर आठ विकेट झटके थे जो उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. ईश्वर की ख़ासियत यह है कि वह अपनी लंबाई का फ़ायदा उठाते हुए गुड लेंथ से ऊंचाई लेती हुई गेंद पर बाउंस का अच्छा इस्तेमाल करते हैं. इंडिया ए की तरफ से खेल चुके ईश्वर ने दक्षिण अफ्रीका के महान गेंदबाज़ एलन डोनाल्ड की देखरेख में अपनी धार तेज़ की है. ईश्वर का मुख्य हथियार उनकी आउट स्विंग है जिसे उन्होंने इस साल आईपीएल में पुणे वॉरियर्स के साथ खेलने के दौरान डोनाल्ड की देखरेख में तराशा है. उन्होंने कहा मुझे हमेशा से आउटस्विंग गेंदबाजी करना पसंद है लेकिन पुणे वारियर्स के साथ खेलने के दौरान मैंने इसमें सुधार किया. उन्होंने डोनाल्ड मेरी आउट स्विंगर पर काफी काम किया. मैं उनका आभारी हूं. ईश्वर ने साथ ही ऑस्ट्रेलिया के डेनिल लिली और ग्लेन मैकग्रा के मार्गदर्शन में एमआरएफ़ पेस फाउंडेशन में तेज़ गेंदबाज़ी के गुर सीखे हैं. उन्होंने इस वर्ष की शुरुआत में भारत-ए की तरफ से दक्षिण अफ्रीका का दौरा किया था. इस दौरान उन्होंने चार दिवसीय दो मैचों में कुल 11 विकेट लिए थे और दो वनडे मैचों में पांच विकेट अपनी झोली में डाले थे. दक्षिण अफ्रीका दौरे के अपने अनुभव को वह न्यूज़ीलैंड में भुनाना चाहते हैं. उन्होंने कहा न्यूज़ीलैंड की परिस्थितियां दक्षिण अफ्रीका से मिलती जुलती हैं. |
| DATE: 2014-01-01 |
| LABEL: sports |
| [638] TITLE: शूमाकर की हालत में मामूली सुधार |
| CONTENT: स्कीईंग दुर्घटना में ज़ख्मी सात बार के फ़ॉर्मूला वन चैंपियन जर्मनी के माइकल शूमाकर की हालत में मामूली सुधार बताया गया है. डॉक्टरों के मुताबिक़ यह सुधार उनके दिमाग़ पर दबाव कम करने के लिए हुए ऑपरेशन के बाद हुआ है. शूमाकर का परिवार अस्पताल में उनके क़रीब बुला लिया गया था. उनकी मैनेजर ज़बीने केम के मुताबिक़ ग्रेनोबल अस्पताल में मोटर रेसिंग चैंपियन की पत्नी कोरिना बेटी गीना मारिया और बेटा मिक मौजूद हैं. 44 साल के शूमाकर रविवार को फ्रांस के अल्पाइन रिजॉर्ट मेरिबल में स्कीइंग के दौरान दुर्घटना का शिकार हो गए थे. उनके मस्तिष्क पर दबाव कम करने के लिए उन्हें अस्पताल में कोमा की हालत में रखा गया है. ज़बीने केम ने संवाददाताओं से कहा ज़ाहिर सी बात है कि परिवार सदमे में है. ग्रेनोबल यूनिवर्सिटी अस्पताल की गहन चिकित्सा इकाई के प्रोफ़ेसर ज्यां फ्रेंको पायेन ने बताया था अगर शूमाकर ने हेलमेट न पहना होता तो वह यहां तक नहीं पहुंच पाते. उनके मस्तिष्क से दबाव कम करने के लिए हमें तुरंत उनका ऑपरेशन करना पड़ा. न्यूरोसर्जन स्टीफ़न काबार्डेस ने कहा कि ऑपरेशन के बाद किए गए स्कैन से पता चला है कि उनके दिमाग के दोनों तरफ़ बने रक्त के थक्के अब साफ़ हो गए हैं. ग्रेनोबल में मौजूद बीबीसी की इमोगेन फॉल्केस का कहना है कि ऐसी दुर्घटना के शिकार कई लोग ज़िदगी की लड़ाई जीतने में सफल रहे हैं. उन्होंने कहा कि मरीज़ की स्थिति को सामान्य बनाने लिए उन्हें कई सप्ताह तक कोमा की स्थिति में रखा जा सकता है और फिर पूरी तरह स्वस्थ होने के लिए महीनों थेरेपी चल सकती है. कोमा में शूमाकर के शरीर के तापमान को कम करके 34-35 सेल्सियस रखा गया है और उनके मेटाबॉलिज्म को भी धीमा किया गया है. शूमाकर अपने 14 वर्षीय बेटे के साथ स्कीइंग कर रहे थे कि तभी वह गिर पड़े और उनका सिर पत्थर से टकरा गया. शूमाकर को हेलिकॉप्टर के ज़रिए क़रीबी शहर मोतीए के एक अस्पताल ले जाया गया जहाँ से उन्हें ग्रेनोबल के बड़े अस्पताल भेजा गया. इस बीच शूमाकर की सलामती के लिए दुनियाभर से संदेश आ रहे हैं. जर्मनी की चांसलर अंगेला मैर्केल के प्रवक्ता ने कहा कि करोड़ों जर्मन लोगों की तरह चांसलर और उनकी सरकार भी शूमाकर की हालत से फिक्रमंद है. प्रवक्ता ने कहा हमें उम्मीद है कि शूमाकर स्वस्थ होंगे और उनका परिवार इस सदमे से बाहर निकलेगा. फ़ेरारी में शूमाकर के साथी रहे ब्राज़ील के फेलिप मासा ने इंस्टाग्राम पर लिखा मैं आपके लिए दुआ कर रहा हूं मेरे भाई. मुझे उम्मीद है कि आप जल्द स्वस्थ होंगे. भगवान आपकी रक्षा करे माइकल. मासा 2009 में हंगेरियन ग्रां प्री के दौरान बुरी तरह घायल हो गए थे. उन्हें भी सिर पर गंभीर चोटें आई थीं. सोमवार को शूमाकर के कुछ प्रशंसक ग्रेनोबल में अस्पताल के बाहर जमा हुए थे. यहां पढ़ाई कर रहे किर्गिस्तान के एक छात्र नूराविल रैमबेकोव ने कहा कि शूमाकर एक प्रेरणा स्रोत हैं. उन्होंने कहा मैं उनकी सेहत को लेकर चिंतित हूं. लेकिन मूझे उम्मीद है कि वह स्वस्थ होंगे. मैं उनके लिए प्रार्थना कर रहा हूं. तीन जनवरी को 45 साल के होने जा रहे शूमाकर ने पिछले साल दूसरी बार फ़ॉर्मूला वन को अलविदा कहा था. अपने 19 साल लंबे एफ़-1 करियर में शूमाकर सात बार विश्व चैंपियन रहे और उन्होंने कुल 91 रेस जीतीं. उन्होंने 1994 और 1995 में बेनेटन के लिए विश्व ख़िताब जीते थे और फिर उन्होंने साल 2000 से लगातार पाँच बार फेरारी के लिए ख़िताब अपने नाम किए. शूमाकर ने साल 2006 में खेल से संन्यास ले लिया था लेकिन साल 2010 में उन्होंने मर्सीडीज़ के साथ फिर ट्रैक पर वापसी की और फिर 2012 में दोबारा संन्यास ले लिया. |
| DATE: 2013-12-31 |
| LABEL: sports |
| [639] TITLE: युवराज सिंह हुए वनडे टीम से बाहर |
| CONTENT: न्यूज़ीलैंड के विरुद्ध जनवरी-फ़रवरी में होने वाली वनडे श्रृंखला के लिए युवराज सिंह को टीम में जगह नहीं मिल पाई है. भारत को न्यूज़ीलैंड में होने वाली इस श्रृंखला में पाँच वनडे और दो टेस्ट मैच खेलने हैं. चयनकर्ताओं ने एक बार फिर वीरेंदर सहवाग और गौतम गंभीर को नज़रअंदाज़ किया है. युवराज के फ़ॉर्म को लेकर वैसे भी कुछ समय से सवाल उठ रहे थे. दक्षिण अफ़्रीका के विरुद्ध तीन वनडे मैचों की श्रृंखला में वह पहले वनडे में खेले थे. उसमें भी वह बिना कोई रन बनाए ही आउट हो गए थे. दूसरे वनडे में वह नहीं खेले और तीसरा वनडे रद्द हो गया था. इससे पहले वेस्टइंडीज़ के विरुद्ध वनडे मैचों में उन्होंने 16 28 और 55 रन बनाए थे. जबकि ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध जिन चार मैचों में वह खेल पाए उसमें दो में वह बिना खाता खोले आउट हुए थे. अन्य दो मैचों में से एक में उन्होंने सात और दूसरे में 12 रन बनाए थे. मध्य प्रदेश से ईश्वर पांडेय को वनडे और टेस्ट टीम में पहली बार जगह मिली है जबकि भारत के पूर्व ऑलराउंडर रोजर बिन्नी के बेटे स्टुअर्ट बिन्नी को वनडे में जगह दी गई है. |
| DATE: 2013-12-31 |
| LABEL: sports |
| [640] TITLE: भारत डरबन टेस्ट और श्रृंखला हारा |
| CONTENT: भारत का दक्षिण अफ़्रीका में जाकर टेस्ट सिरीज़ जीतने का सपना एक बार फिर पूरा नहीं हो सका जबकि डरबन में उसे 10 विकेट से हार का मुँह देखना पड़ा. डेल स्टेन की घातक गेंदबाज़ी ने भारत को डरबन टेस्ट में जो झटके दिए उनसे भारतीय टीम उबर नहीं पाई और ज़्याक कालिस के अंतिम टेस्ट में मेज़बान टीम ने जीत दर्ज की. भारत की पूरी टीम दूसरी पारी में 223 रनों पर सिमट गई थी. इसके जवाब में दक्षिण अफ़्रीकी सलामी बल्लेबाज़ों ने अपनी टीम के किसी और बल्लेबाज़ को पिच तक आने की परेशानी दिए बिना 59 रन बनाकर जीत हासिल कर ली. ग्रैम स्मिथ 27 और अल्वीरो पीटरसन 31 रन बनाकर नॉट आउट रहे. भारत ने मैच के अंतिम दिन 68 रनों पर दो विकेट के स्कोर से आगे बल्लेबाज़ी शुरू की तो स्टेन ने दिन की पहली ही गेंद पर विराट कोहली को आउट कर दिया. हालाँकि अंपायर रॉड टकर का वो विवादास्पद फ़ैसला था क्योंकि रीप्ले में लगा कि गेंद कोहली के हाथ के ऊपरी हिस्से से लगकर विकेट के पीछे ए बी डि विलियर्स तक पहुँची थी. इसके बाद एक बेहतरीन गेंद पर चेतेश्वर पुजारा तीसरे ओवर में बोल्ड हो गए. उन्हें स्टेन ने ही बोल्ड किया. इस तरह भारत के लिए मैच बचाने की दो बड़ी उम्मीदें बेहद जल्दी बुझ गईं और फिर अजिंक्य रहाणे के जुझारू 96 रन भी भारत के लिए ये मैच नहीं बचा सके. कोहली ने 11 और पुजारा ने 32 रन बनाए थे. वर्नान फ़िलैंडर ने रोहित शर्मा को 25 के स्कोर पर एलबीडब्ल्यू आउट किया और फिर स्पिनर रॉबिन पीटरसन ने एक के बाद एक करके महेंद्र सिंह धोनी रवींद्र जडेजा और ज़हीर ख़ान को पवेलियन की राह दिखा दी. भारत की पूरी पारी में संघर्ष सिर्फ़ रहाणे ने किया और उस तरह का संघर्ष अगर कप्तान धोनी या फिर जडेजा ने दिखाया होता तो भारत हार टालने की शायद गंभीर कोशिश कर सकता था. रहाणे ने 96 रनों की पारी 219 मिनट तक क्रीज़ पर रहकर पूरी की और इस दौरान उन्होंने 157 गेंदों का सामना किया. रहाणे फ़िलैंडर की गेंद पर बोल्ड हुए और शतक से चार रन दूर रहने के बावजूद दक्षिण अफ़्रीकी खिलाड़ियों ने उनकी जुझारू पारी के लिए उनसे हाथ मिलाकर बधाई दी. धोनी ने 15 रन बनाए जबकि जडेजा एक बार फिर विफल रहे और एक ऊँचा शॉट खेलने के चक्कर में सिर्फ़ आठ रन बनाकर कैच हो गए. जडेजा पहली पारी में बिना खाता खोले ही आउट हो गए थे. पहली पारी में छह विकेट लेने वाले स्टेन ने दूसरी पारी में भी भारतीय खिलाड़ियों को काफ़ी परेशान किया. उन्होंने कुल तीन विकेट लिए. भारत की पहली पारी में 334 रनों के जवाब में दक्षिण अफ़्रीका ने पहली पारी में 500 रन बनाए थे. श्रृंखला का पहला मैच जोहानेसबर्ग में खेला गया था और वो मैच ड्रॉ रहा था. कालिस ने 18 साल पहले इसी मैदान पर अपने क्रिकेट जीवन की शुरुआत की थी और ये भी एक वजह थी कि दक्षिण अफ़्रीकी टीम ने ये मैच जीतने के लिए जी-जान लगा दी. अपने अंतिम टेस्ट के अंतिम दिन से पहले कालिस ने ट्विटर पर लिखा कि ये उनके लिए काफ़ी भावुक अनुभव होगा. उन्होंने लिखा मेरे लिए टेस्ट क्रिकेट का अंतिम दिन. मेरे परिवार दोस्तों टीम के साथियों और प्रशंसकों की वजह से मेरे पास बहुत सी ख़ूबसूरत यादें और कहानियाँ हैं. मुश्किल दिन होगा. कालिस ने इस टेस्ट के चौथे दिन शतक जड़ा था. उन्होंने टेस्ट करियर का 45वाँ शतक लगाते हुए 115 रन बनाए थे. इस तरह वह टेस्ट में सर्वाधिक रन बनाने वालों की सूची में भारत के राहुल द्रविड़ को पीछे छोड़कर तीसरे नंबर पर आ गए. वह सचिन तेंदुलकर के बाद टेस्ट में सर्वाधिक शतक लगाने वाले बल्लेबाज़ हैं. |
| DATE: 2013-12-30 |
| LABEL: sports |
| [641] TITLE: टेस्ट मैच देखने पहुंचे रिकॉर्ड लोग |
| CONTENT: इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच गुरुवार को एशेज़ सिरीज़ के चौथे टेस्ट के पहले दिन का खेल देखने के लिए 91 हज़ार से ज़्यादा दर्शक जमा हुए जो एक विश्व रिकॉर्ड है. मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड एमसीजी पर खेले जा रहे टेस्ट मैच को देखने 91092 फैन्स स्टेडियम में मौजूद थे. समाचार एजेंसी एपी के मुताबिक इससे पहले एक दिन में टेस्ट मैच देखने पहुंचे दर्शकों की रिकॉर्ड संख्या 90800 थी. ये रिकॉर्ड 1961 में वेस्ट इंडीज़ और ऑस्ट्रेलिया के बीच पांचवे टेस्ट मैच के दूसरे दिन एमसीजी पर ही बना था. दिलचस्प बात ये है कि पिछले सप्ताह पर्थ में तीसरा टेस्ट मैच जीतकर मेज़बान ऑस्ट्रेलिया पहले ही एशेज़ पर कब्ज़ा कर चुकी है. इसके बावजूद ऑस्ट्रेलियाई फ़ैन्स अपनी टीम को देखने के लिए रिकॉर्ड संख्या में पहुंचे. इसकी वजह ये हो सकती है कि मौजूदा सिरीज़ से पहले ऑस्ट्रेलिया की टीम लगातार तीन बार एशेज़ शृंखला हार चुकी था और इसलिए इस जीत ने फ़ैन्स में नया उत्साह भर दिया है. स्थानीय समय शाम चार बज कर 15 मिनट पर स्टेडियम के स्कोरबोर्ड पर विश्व रिकॉर्ड का संदेश दिखाया गया. ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ रयान हैरिस ने कहा नब्बे हज़ार से ज़्यादा लोगों के सामने खेलना स्टेडियम में शोर की आवाज़ अविश्वसनीय थी. दिन का खेल ख़त्म होने के बाद पत्रकार सम्मेलन में हैरिस ने कहा टीम के सदस्य बेहद उत्साहित हैं कि वे इतने सारे लोगों के सामने खेले. और स्टेडियम में शोर तो अविश्वसनीय था. ख़ासकर आखिर में जब मिचेल जॉनसन गेंदबाज़ी करने आए. इंग्लैंड के उप कप्तान इयन बेल का कहना था कि इतने बड़ी भीड़ के सामने खेलना एक विरला अनुभव था. बेल ने कहा बतौर एक खिलाड़ी आप इस अनुभव को कभी नहीं भूलेंगे. इसलिए मैं मानता हूं कि एमसीजी में खेलने का कोई भी मौका मिलना बहुत शानदार होता है. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जेम्स सदरलैंड ने कहा हम मेलबर्न के क्रिकेट से प्यार करने वाले लोगों और मेलबर्न क्रिकेट क्लब को धन्यवाद और बधाई देना चाहते हैं कि उन्होंने कुछ ख़ास किया है. आने वाले सालों में शहर के निवासी 2013 के बॉक्सिंग डे को उस दिन के तौर पर याद करेंगे जब उनके शहर ने खेल इतिहास बनाया. एमसीजी की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक स्टेडियम में ज़्यादा से ज़्यादा एक लाख लोग बैठ सकते हैं. लेकिन इस स्टेडियम में फ़ुटबॉल और ऑस्ट्रेलियाई नियमों वाली फुटबॉल के मैचों के लिए इससे भी ज़्यादा लोग जुटे हैं. |
| DATE: 2013-12-26 |
| LABEL: sports |
| [642] TITLE: 'जी हाँ, मैंने सौरभ गांगुली के साथ क्रिकेट खेला' |
| CONTENT: क्रिकेट की सफ़ेद गेंद दाहिने हाथ में लेकर मैं गेंदबाज़ी के लिए तैयार था. दूसरे छोर पर बल्ला थामे मेरी गेंदें खेलने को तैयार थे भारतीय टीम के पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली. मेरे जैसे इंसान के लिए ये एक अकल्पनीय क्षण था. सौरभ गांगुली के लिए बोलिंग करने का ख़्वाब तो दूर क्रिकेट में मैं कभी गली-मोहल्ले के स्तर से आगे नहीं बढ़ पाया. गली-मोहल्ले में भी विकेट की जगह दीवार पर कोयले से तीन लकीरें खींच कर काम चला लेना या अगर किस्मत अच्छी रही तो आठ-दस ईंटों को एक दूसरे के ऊपर रखकर कुछ न मिले तो कपड़े धोने वाली थापी से ही क्रिकेट खेलने का भरम पाल लेना. ईमानदारी की बात तो ये है कि क्रिकेट देखना उसके आँकड़ों पर नज़र रखना किस खिलाड़ी ने हुक किया किसने कवर ड्राइव मारा और किसने सैकड़ा लगाया इस सबमें कभी अपनी दिलचस्पी रही ही नहीं. ऐसे में सौरभ गांगुली के घर के लॉन में उनसे क्रिकेट के गुर सीखना अकल्पनीय ही कहा जा सकता है. शुरुआत मैंने उनसे बिलकुल बुनियादी सवाल से की बल्ला पकड़ा कैसे जाता है सौरभ ने एक अच्छे अध्यापक की तरह इत्मीनान से मुझे समझाया कि क्रिकेट का बैट वैसे नहीं पकड़ा जाता जैसे टेनिस का रैकेट पकड़ा जाता है. कोलकाता के मध्यवर्गीय मोहल्ले बेकाला में अपने तिमंज़िले लाल मकान के छोटे से लॉन में उन्होंने मेरी गेंदें आहिस्ता से खेलीं. पर जब मेरी बारी आई तो उनकी गेंद पर मैंने कुछ ज़ोर से ही हिट कर दिया और गेंद सीधे ख़रगोशों के बाड़े में जा घुसी. सौरभ गेंद लेने के लिए भागे और कहा आपने तो खरगोशों को भगा ही दिया. उन्हें समझ में आ गया कि खिलाड़ी कच्चा है और अधजल गगरी की तरह छलक रहा है इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि अगर हम कैच करने की प्रैक्टिस करेंगे तो बेहतर होगा. फिर मैंने नज़दीक से गेंदें फेंकनी शुरू कीं और बाएँ हाथ के बल्लेबाज़ ने सधे हुए अंदाज़ में मुझे छकाना शुरू किया. ठीक उसी तरह जैसे चूहे को पंजे में दबाने के बाद बिल्ली कई बार छोड़ देती है और देखती है कि कहाँ तक भागेगा. सौरभ गांगुली की गेंद लपकने के लिए मैं दमतोड़ कोशिश में लगा था और अचानक उन्होंने मेरी दाहिनी ओर गेंद उछाल दी. मैं गेंद से काफ़ी दूर था मगर एक क्षणांश में मुझे याद आया कि डाइव मारकर इसे कैच किया जा सकता है. बिना आव-ताव देखे मैंने डाइव लगा दी और गेंद को ज़मीन पर गिरने से पहले अपनी दो उंगलियों में फँसा ही लिया. हालाँकि अगले ही क्षण मैं दाहिने कंधे के बल धरती से जा टकराया पर गेंद को फिर भी मैंने अपने हाथों से छूटने नहीं दिया. सौरभ गांगुली ने दिलखोल कर मेरे कैच की तारीफ़ की और कहा आज का आपका दिन सफल रहा. पर इन दिनों गांगुली की फ़िक्र में क्रिकेट के साथ साथ राजनीति भी शामिल हो गई है. भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें अगला चुनाव लड़ने की दावत दी है. गांगुली ने अभी राजनीति में जाने की संभावना को सिरे से ख़ारिज नहीं किया है. राजनीति में जाने के सवाल पर उन्होंने कहा मैंने अभी राजनीति के बारे में कोई फ़ैसला नहीं किया है. ये मेरे लिए बहुत बड़ा फ़ैसला होगा और जिंदगी पूरी तरह बदल जाएगी. अभी मैं इस सवाल का जवाब नहीं दे पाऊँगा. अलबत्ता बीजेपी की ओर से टिकट की पेशकश के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा था कि सौरभ गांगुली वामपंथी हैं. क्या वाक़ई सौरभ वामपंथी हैं उन्होंने कहा अगर मैं वामपंथी नहीं तो दक्षिणपंथी भी नहीं हूँ. हालाँकि सीताराम येचुरी मेरे अच्छे दोस्त हैं. गांगुली ने साल 2000 में तब भारतीय क्रिकेट टीम की कमान सँभाली थी जब कई महत्वपूर्ण खिलाड़ी मैच-फ़िक्सिंग के आरोपों में फँसे थे और सचिन तेंदुलकर भी ठीक स्वास्थ्य न होने के कारण कप्तानी छोड़ चुके थे. गांगुली को इस पस्तहिम्मती के दौर में टीम में जोश और जज़्बा भरने के लिए जाना जाता है. उनकी टीम में प्रतिभाशाली खिलाड़ी तो थे लेकिन उन्हें अभी सान पर चढ़ाया जाना बाक़ी था. गांगुली ने सबसे पहले यही काम किया. उन्होंने कहा मैंने इसे बहुत पेचीदा नहीं बनाया. दरअसल हम हिंदुस्तानी आराम पसंद लोग हैं. हम खाली समय का आनंद उठाते हैं दोस्तों के साथ चाय की चुस्कियाँ लेते हुए गपशप का मज़ा लेते हैं. पर मुझे उस आरामदायक स्थिति से ख़ुद को बाहर निकलना था ताकि अपनी टीम को आगे ले जा सकूँ. मुझे अचानक एहसास हुआ कि सौरभ गांगुली के दो व्यक्तित्व हैं एक क्रिकेट के मैदान में उग्र तेवरों वाला सौरभ और दूसरे मैदान के बाहर का सौम्य और शालीन तनिक शर्मीला-सा नौजवान. उनके बहुत से प्रशंसकों को याद है वो पल जब इंग्लैंड में क्रिकेट के मक्का कहलाए जाने वाले लॉर्ड्स के मैदान में सौरभ गांगुली नैटवेस्ट सीरीज़ में भारतीय टीम की जीत पर इतने उत्साहित और ख़ुश हुए कि उन्होंने वहीं मैदान में अपनी क़मीज़ उतारकर लहरानी शुरू कर दी. इसके लिए उनकी बहुत आलोचना हुई. सौरभ आज भी उस क्षण थोड़ा शरारती मुस्कान के साथ याद करते हैं. उन्होंने कहा मुझे नहीं पता था कि हम जीत जाएँगे क्योंकि मैच के बीच में हम 150 पर पाँच विकेट खोकर खेल रहे थे और हमें 325 रनों का पीछा करना था. इस स्थिति के बावजूद हम नैटवेस्ट फ़ाइनल जीत गए. मैं थोड़ा भावुक हो गया और भावनाओं में बह गया. अगर फिर ऐसा मौक़ा आएगा तो शायद मैं वो सब नहीं करूँगा. |
| DATE: 2013-12-26 |
| LABEL: sports |
| [643] TITLE: कैलिस ने की टेस्ट से संन्यास की घोषणा |
| CONTENT: दक्षिण अफ़्रीका के बहुचर्चित ऑलराउंडर ज़ाक कैलिस ने अंतरराष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले लिया है. वे भारत के ख़िलाफ़ दूसरे टेस्ट के बाद टेस्ट क्रिकेट नहीं खेलेंगे. दक्षिण अफ़्रीका क्रिकेट बोर्ड ने इसकी घोषणा की है. भारत और दक्षिण अफ़्रीका के बीच दूसरा क्रिकेट टेस्ट गुरुवार से डरबन में खेला जाएगा. क्रिकेट बोर्ड के मुताबिक़ ज़ाक कैलिस एक दिवसीय मैच खेलना जारी रखेंगे और उनका लक्ष्य 2015 का विश्व कप भी है. कैलिस ने अपने बयान में कहा है ये आसान फ़ैसला नहीं था. ख़ासकर ऐसे समय जब जल्द ही ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ टेस्ट सिरीज़ होने वाली है और टीम भी अच्छा प्रदर्शन कर रही है. लेकिन मेरा मानना है कि टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहने का ये सही समय है. कैलिस ने कहा कि उन्होंने अभी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा नहीं कहा है और वे एक दिवसीय मैच खेलना जारी रखेंगे. उन्होंने कहा कि अगर वे फ़िट रहें तो अगला विश्व कप क्रिकेट खेलना चाहेंगे. कैलिस ने अभी तक 165 टेस्ट मैच खेले हैं और 44 शतकों की मदद से 13174 रन बनाए हैं. |
| DATE: 2013-12-25 |
| LABEL: sports |
| [644] TITLE: पहलवान सुशील कुमार को बढ़ाना पड़ेगा वज़न |
| CONTENT: लंदन ओलंपिक में रजत पदक जीतने वाले भारतीय पहलवान सुशील कुमार का मानना है कि विश्व कुश्ती संघ के वज़न वर्ग में बदलाव करने से भारतीय पहलवानों पर भी बुरा असर पड़ेगा. सुशील कुमार का कहना है कि बदलाव की वजह से ओलंपिक खेलों में 60 और 66 किलोग्राम वर्ग की श्रेणियां ही ख़त्म हो गई हैं. वे ये भी कहते हैं कि इस बदलाव की वजह से पूरे विश्व के उन खिलाड़ियों पर असर पड़ेगा जो इन श्रेणियों में कुश्ती लड़ते हैं. वे मानते हैं कि इस बदलाव की वजह से उन्हें भी अपने वज़न वर्ग में परिवर्तन करना होगा. हमेशा 60 किलोग्राम वज़न वर्ग में कुश्ती लड़ने वाले सुशील कुमार का कहना है कि वे अब संभवत 67 किलोग्राम वज़न वर्ग में अपने दांव-पेंच आज़माएंगे. हालांकि उन्होंने इस बारे में अभी कोई अंतिम फ़ैसला नहीं लिया है. ओलंपिक में एक खेल के तौर पर कुश्ती को बरक़रार रखे जाने पर सुशील कुमार बहुत ख़ुश हैं. वे कहते हैं मैंने पहले भी कहा था कि कुश्ती वापस आएगी क्योंकि दुनिया के 204 देश कुश्ती खेलते हैं. कुश्ती नहीं होगी तो पूरी दुनिया में एक भूचाल आ जाएगा. सुशील कुमार इसके लिए भारत के नेताओं को भी श्रेय देते हैं. उनका कहना है कि कुश्ती को ओलंपिक में क़ायम रखने के लिए यहां के तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं ने ज़ोर लगाया. वे कहते हैं कि देश के झंडे तले खेलना बड़े गौरव की बात है. अगले साल फ़रवरी में होने वाले कोलेराडो स्प्रिंग की तैयारी में जुटे सुशील कुमार चाहते हैं कि देशवासी उन्हें दुआएं दें ताकि वे दोबारा अच्छा प्रदर्शन कर सकें. वे एशियाड और राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी में भी जुटे हैं. सुशील कुमार कहते हैं कि अब उनकी नज़र कांस्य और रजक पदक से आगे साल 2016 के रियो ओलंपिक पर टिकी है. |
| DATE: 2013-12-25 |
| LABEL: sports |
| [645] TITLE: आईपीएल नीलामी में 'मैचिंग कार्ड' का कमाल |
| CONTENT: इंडियन प्रीमियर लीग के सातवें सीज़न के लिए खिलाड़ियों की नीलामी 12 फरवरी को होगी. अगर जरूरत हुई तो नीलामी की प्रक्रिया 13 फरवरी को भी जारी रहेगी. इस सीजन की नीलामी में सबसे ख़ास पहलू होगा मैचिंग कार्ड. इस कार्ड के जरिए आईपीएल की फ्रेंचाइज़ी अपने छह खिलाड़ियों को वापस अपनी ही टीम में रोक पाएँगे. दरअसल प्रत्येक फ्रेंचाइजी टीम को अपने पांच-पांच खिलाड़ियों को रिटेन करने की इजाज़त थी लेकिन इस कार्ड के ज़रिए टीम एक अतिरिक्त खिलाड़ी को भी रिटेन कर पाएगी. यह अतिरिक्त खिलाड़ी भारत का हो सकता है या फिर कोई भी विदेशी खिलाड़ी. इस व्यवस्था के मुताबिक अगर कोई टीम अपने खिलाड़ी को नहीं रोकने का फ़ैसला लेती है और खिलाड़ी की नीलामी होती है तो उसमें खिलाड़ी की जो भी बोली लगेगी उसी रकम में उसे खरीदने का पहला अधिकार उनकी पहली टीम को होगा. हालांकि इस दौरान इस बात का पूरा ख्याल रखा गया है कि कोई भी फ्रेंचाइज़ी चार से ज़्यादा भारतीय टीम में खेल चुके खिलाड़ियों को शामिल नहीं कर पाए. तीन से पांच खिलाड़ियों को अपनी टीम में रोकने वाली टीम को ऐसा एक कार्ड मिलेगा. जबकि एक या दो खिलाड़ियों को रोकने की सूरत में टीम को दो ऐसे कार्ड दिए जाएंगे. जो टीम एक भी खिलाड़ी को अपने पास वापस नहीं रखेगी उसे तीन कार्ड दिए जाएंगे. अगर कोई टीम पांच खिलाड़ियों को वापस अपने पास रखती है तो उसके पर्स से 39 करोड़ रुपये खर्च माने जाएंगे और बाकी खिलाड़ियों की खरीदारी उन्हें अपने बाकी बचे 21 करोड़ रुपयों में करनी होगी. किसी भी टीम को कम से कम खिलाड़ियों की खरीदारी में 36 करोड़ रुपये खर्च करने ही होंगे. फ्रेंचाइजी अपनी टीम में कम से कम 16 और ज़्यादा से ज्यादा 27 खिलाड़ियों को शामिल कर सकते हैं. |
| DATE: 2013-12-24 |
| LABEL: sports |
| [646] TITLE: 'मैच भले ही ड्रॉ रहा लेकिन जीत क्रिकेट की हुई' |
| CONTENT: भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच जोहानिसबर्ग में खेले गए पहले टेस्ट मैच में क्रिकेट प्रेमियों की सांसें अंत तक मैच के नतीजे को लेकर अटकी रहीं. यहां तक कि जब डेल स्टने ने मैच की आखिरी गेंद पर छक्का जड़ा तब तक भी लोग या तो टेलिविज़न पर आंखें गड़ाए मैच देख रहे थे या कमेंट्री सुन रहे थे जबकि सबको मालूम था कि एक गेंद पर ना तो 14 रन बन सकते हैं और ना ही अब इस मैच का कोई फैसला निकलने वाला है. यानी पूरी तरह पैसा वसूल मैच वह भी ड्रॉ होने के बावजूद. दरअसल मैच के पहले चार दिन भारत दक्षिण अफ्रीका पर हावी रहा लेकिन उसके बाद जैसे ही पांचवे और अंतिम दिन का खेल आगे बढ़ता गया मैच भारत के हाथ से खिसकता गया. दक्षिण अफ्रीका ने मैच के पांचवे दिन दो विकेट पर 138 रन से आगे खेलना शुरू किया और चाय के वक्त तक चार विकेट खोकर 331 रन बना लिए तो जैसे सबके मन में एक ही बात आ रही थी कि क्या अब भारत इस मैच में बच सकेगा. चाय के वक्त के बाद भी दक्षिण अफ्रीका के फाफ डु प्लेसिस और एबी डिविलियर्स के बल्ले का कहर भारतीय गेंदबाज़ो पर बरसना जारी रहा. एक समय 197 रनों पर चार विकेट गंवाने वाली अफ्रीकी टीम के सामने भारतीय गेंदबाज़ बौने साबित हो रहे थे. आखिरकार दक्षिण अफ्रीका के 402 रनों के स्कोर पर डिविलियर्स 103 रन बनाकर इशांत शर्मा की गेंद पर बोल्ड हुए और भारत ने राहत की सांस ली. दरअसल एबी डिविलियर्स और डु प्लेसिस के बीच पांचवे विकेट के लिए हुई 205 रनों की साझेदारी ने मैच में नई जान फूंक दी. मैच के चौथे दिन दो विकेट पर 138 रन बनाने वाली अफ्रीकी टीम की हार की भविष्यवाणी हर क्रिकेट पंडित कर रहा था. डु प्लेसिस ने 135 रन बनाए. इसके बाद भी दक्षिण अफ्रीका जीत की कोशिश कर सकता था लेकिन जेपी डूमिनी के केवल पाँच रन बनाकर आउट होने से उसके हौंसले पस्त होने लगे. धीरे-धीरे टेस्ट मैच एकदिवसीय क्रिकेट में बदलना शुरू हो गया. एक समय तो ऐसा भी आया जब 16 गेंदो पर 16 रनों की जरुरत थी लेकिन फिलैंडर और स्टेन ज़हीर खान और इशांत शर्मा की गेंदो पर लम्बे-लम्बे प्रहार करने की हिम्मत नही जुटा पाए. और अंततः जब मैच समाप्त हुआ तब वह जीत के लक्ष्य से आठ रन पीछे थे और मैच ड्रॉ समाप्त हो गया. दक्षिण अफ्रीका की दूसरी पारी में जब कप्तान ग्रैम स्मिथ और अलवीरो पीटरसन ने पहले विकेट के लिए 108 रनो की साझेदारी की थी. दरअसल भारत के लिए खतरे की घंटी तो तभी बज चुकी थी. अजिक्य रहाणे की चुस्त और तेज़ तर्रार फिल्डिंग की वजह से भारत मैच में बच पाया. उन्होने पहले तो खतरनाक बनते जा रहे स्मिथ और उसके बाद फाफ डु प्लेसिस को रन आउट कर दक्षिण अफ्रीका को बड़े झटके दिए वह भी बड़े ही महत्वपूर्ण अवसर पर. अब कुछ बात भारतीय टीम की भी हो जाए जिसकी वजह से मैच बेहद रोमांचक अदांज़ में समाप्त हुआ. मैच भले ही ड्रॉ रहा लेकिन कहने वाले कह रहे हैं कि ऐसा केवल भारतीय टीम के साथ ही संभव है कि वह 458 रन जैसे बड़े स्कोर का बचाव करने में भी बेबस नज़र आई. ज़हीर खान ने पहली पारी में शानदार गेंदबाज़ी की लेकिन दूसरी पारी में वे एकदम साधारण लगे. ऑफ़ स्पिनर आर अश्विन को तो दोनो पारियों में एक भी विकेट नही मिला. युवा बल्लेबाज़ चेतेश्वर पुजारा ने मैच की दोनो पारियों में विकेट पर टिकने का दमख़म दिखाया तो दूसरी पारी में शानदार शतक भी जमाया. विराट कोहली थोड़ा बदकिस्मत रहे जो दोनो पारियों में शतक बनाने से चूक गए. इसके बावजूद भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की किस्मत के क्या कहने एक समय निश्चित हार को ड्रॉ में बदलने में कामयाब रहे. वैसे कहने वाले कुछ भी कहते रहे लेकिन मैच का टर्निंग प्वॉयंट तब आया जब भारत की दूसरी पारी में क्षेत्ररक्षण करते हुए दक्षिण अफ्रीका के तेज़ गेदंबाज़ मोर्ने मोर्कल चोट खा बैठे और केवल दो ओवर की गेंदबाज़ी कर सके. भारत की पहली पारी में मोर्कल ने केवल 34 रन देकर तीन विकेट लिए थे. मैदान में उनकी ग़ैरमौज़ूदगी का पूरा फ़ायदा उठाते हुए भारत ने दूसरी पारी में 421 रन बना डाले. अब भले ही खेल के मैदान में यह सब क्रिकेट का एक हिस्सा हो लेकिन इसके बावजूद यही वह सब कारण थे जिसकी वजह से एक समय जोहिनिसबर्ग में क्रिकेट प्रेमियों की जान गले में अटक गई थी. मैच भले ही ड्रॉ रहा लेकिन जीत क्रिकेट की हुई. |
| DATE: 2013-12-24 |
| LABEL: sports |
| [647] TITLE: फिलैंडर नंबर वन गेंदबाज़, कोहली को भी फ़ायदा |
| CONTENT: दक्षिण अफ़्रीका के तेज़ गेंदबाज़ वेरनॉन फिलैंडर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद आईसीसी की ताज़ा टेस्ट रैंकिंग में नंबर एक गेंदबाज़ बन गए हैं. जोहानेसबर्ग टेस्ट में भले ही नतीजा ड्रॉ रहा हो लेकिन फिलैंडर की शानदार गेंदबाज़ी का असर उनकी रैंकिंग में साफ़ देखने को मिला है. फिलैंडर ने अपने साथी खिलाड़ी डेल स्टेन को पीछे छोड़ते हुए यह स्थान हासिल किया है. डेल स्टेन जुलाई 2009 से नंबर वन टेस्ट गेंदबाज़ बने हुए थे उस समय उन्होंने श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन को पीछे छोड़ा था. फिलैंडर ने जोहानेसबर्ग टेस्ट में कुल सात विकेट लिए जबकि डेल स्टेन के खाते में सिर्फ़ एक विकेट आया. फिलैंडर ने अपने करियर में पहली बार टेस्ट रैंकिंग में पहला स्थान हासिल किया है. इस पर अपनी प्रतिक्रिया में उन्होंने कहा मैं रैंकिंग में नंबर वन टेस्ट गेंदबाज़ बनकर काफ़ी खुश हूँ. ये मेरे लिए सम्मान की बात है कि मुझे डेल स्टेन जैसे चैम्पियन के साथ गेंदबाज़ी करने का मौक़ा मिला है. जोहानेसबर्ग टेस्ट में बेहतरीन बल्लेबाज़ी करने वाले भारत के विराट कोहली की भी रैंकिंग अच्छी हुई है. कोहली ने पहली पारी में 119 और दूसरी पारी में 96 रन बनाए थे. इस प्रदर्शन के कारण वे बल्लेबाज़ों की रैंकिंग में नौ स्थान ऊपर चढ़कर 11वें नंबर पर पहुँच गए हैं. दक्षिण अफ़्रीका के फ़फ़ डू प्लेसी भी 16 स्थान ऊपर चढ़कर 28वें नंबर पर पहुँच गए हैं. जोहानेसबर्ग टेस्ट के ड्रॉ होने के बाद भारतीय टीम आईसीसी रैंकिंग में दूसरे स्थान पर बनी हुई है. बल्लेबाज़ों की रैंकिंग में चेतेश्वर पुजारा अपने शानदार प्रदर्शन की बदौलत दूसरे नंबर पर बने हुए हैं. टॉप टेन में वे भारत के एकमात्र बल्लेबाज़ हैं. गेंदबाज़ों की रैंकिंग में टॉप टेन में भारत के दो गेंदबाज़ हैं- आर अश्विन और प्रज्ञान ओझा. जोहानेसबर्ग टेस्ट के बाद अश्विन दो स्थान नीचे गिरकर सातवें स्थान पर पहुँच गए हैं जबकि प्रज्ञान ओझा आठवें स्थान पर बने हुए हैं. |
| DATE: 2013-12-23 |
| LABEL: sports |
| [648] TITLE: जुझारु दक्षिण अफ्रीका ने पहला टेस्ट ड्रॉ कराया |
| CONTENT: भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच जोहानेसबर्ग में खेला गया पहला टेस्ट मैच पांचवे दिन रोमांचक मोड़ पर आकर हार-जीत के फैसले के बिना ड्रॉ हो गया है. भारत के धुरंधर बल्लेबाज़ विराट कोहली को मेन ऑफ द मैच चुना गया है. रविवार को भारत के विरुद्ध जीत के लिए 458 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरी दक्षिण अफ्रीका की टीम 450 रन ही बना सकी जबकि दो विकेट उसके हाथ में बचे हुए थे. मेज़बान टीम ने रविवार को 138 रनों से आगे खेलना शुरू किया था लेकिन 143 के स्कोर पर उसका तीसरा विकेट पीटरसन की शक्ल में जल्द ही गिर गया. इसके बाद कैलिस ने पारी को संभालने की कोशिश की लेकिन वे भी 34 रन बनाकर ज़हीर ख़ान की गेंद पर एलबीडब्ल्यू आउट हो गए. कैलिस के बाद एबी डी विलियर्स 103 रन बनाकर ईशांत शर्मा की गेंद का शिकार बने. ड्यूमिनी भी पांच रन बनाकर मोहम्मद शमी की गेंद पर अपना विकेट खो बैठे. फिर डू प्लेसी जब तक पिच पर टिके रहे दक्षिण अफ्रीका की जीत की उम्मीदें जीवित रहीं लेकिन रहाणे ने उन्हें 134 रन के निजी स्कोर पर रन आउट करा दिया. इसके बाद धीरे-धीरे मैच दक्षिण अफ्रीका की पकड़ से निकलता गया. फिलेंडर 25 और स्टेन छह रन बनाकर आख़िर तक विकेट पर डटे ज़रूर रहे लेकिन अपनी टीम को जीत दिलाने में नाकाम रहे. स्टेन ने मैच की आख़िरी गेंद पर ज़ोरदार छक्का ज़रूर जड़ा लेकिन दक्षिण अफ्रीका की टीम के लिए तब तक बहुत देर हो चुकी थी. मेज़बान टीम ने शनिवार को अपनी जुझारु क्षमता दिखाते हुए भारतीय गेंदबाज़ों का जमकर मुक़ाबला किया था और पहले विकेट के लिए कप्तान स्मिथ और पीटरसन ने 108 रन जोड़े थे. शनिवार को दक्षिण अफ्रीका का पहला विकेट स्मिथ की शक्ल में गिरा था. उन्हें 44 रन के निजी स्कोर पर रहाणे ने रन-आउट कराया. दूसरा विकेट हाशिम अमला का गिरा जो केवल चार रन बनाकर मोहम्मद शमी की गेंद का शिकार बने. पीटरसन 76 और डू प्लेसी 10 रन बनाकर विकेट पर टिके रहे थे और उन्होंने रविवार को 138 रनों से आगे खेलना शुरू किया था. इससे पहले जीत के लिए भारत ने मेज़बान टीम के सामने 458 रनों का लक्ष्य रखा था. भारत ने दो विकेट के नुक़सान पर 284 रनों से आगे खेलना शुरु किया था और शनिवार को उसकी पूरी पारी 421 रन पर सिमट गई. चेतेश्वर पुजारा 153 रन बनाकर कैलिस की गेंद पर डिवीलियर्स के हाथों कैच आउट हुए. विराट कोहली चार रन से शतक से चूक गए और 96 के स्कोर पर जेपी ड्यूमिनी की गेंद पर एबी डी विलियर्स को कैच थमा बैठे. कप्तान धोनी और ज़हीर ख़ान ने 29-29 रन बनाए. धोनी को फ़िलैंडर ने कैच आउट कराया जबकि ज़हीर नाबाद रहे. मुरली विजय ने 39 रोहित शर्मा ने छह रहाणे ने 15 और ईशांत शर्मा तथा मोहम्मद शमी ने चार-चार रनों को योगदान दिया. |
| DATE: 2013-12-22 |
| LABEL: sports |
| [649] TITLE: मेरी नज़रें रियो ओलंपिक्स पर हैं: मेरीकॉम |
| CONTENT: पांच बार की बॉक्सिंग विश्व चैंपियन रह चुकी एमसी मेरीकॉम का अगला लक्ष्य साल 2016 में होने वाले रियो ओलंपिक खेलों में पदक जीतने का है. लंदन ओलंपिक खेलों में कांस्य पदक जीतने वाली मेरीकॉम ने सात महीने पहले ही अपने तीसरे बेटे को जन्म दिया है. तो एक बार फिर मां बनने के बाद क्या मेरीकॉम ओलंपिक जैसे बड़े मुकाबले के लिए खुद को तैयार कर पाएंगीअगर मेरीकॉम की माने तो उन्होंने अभी से अपनी कमर कस ली है. वो मानती हैं कि मातृत्व का मतलब ये बिलकुल नहीं हैं कि अपने लक्ष्य से नज़रें फेर ली जांए. बीबीसी से हुई एक बातचीत के दौरान मेरीकॉम ने बताया कि कैसे अपने तीसरे बेटे के जन्म के एक महीने बाद ही उन्होंने अभ्यास शुरु कर दिया था. मेरीकॉम कहती हैं रियो ओलंपिक्स को लेकर मेरे इरादे मज़बूत हैं. मैं अगले ओलंपिक्स में हिस्सा लेना चाहती हूं. मैंने अपनी ट्रेनिंग शुरु भी कर दी है. क्रिसमस और नए साल के उत्सव के बाद मैं अपनी ट्रेनिंग को और कड़ा करने वाली हूं. लेकिन क्या मां बनने के बाद कुछ बदला नहीं है मेरीकॉम के लिएबीबीसी के इस सवाल के जवाब में वो कहती हैं मां बनने के बाद मेरे शरीर में जो भी बदलाव आए हैं उनसे लड़ना मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं है. मैं अपने शरीर को जानती हूं और ये भी जानती हूं कि किस तरह कि कसरत मेरे लिए अच्छी है. इतना ही नहीं मेरीकॉम तो ये भी कहती हैं कि एक मां होने के बाद भी अगर वो पांच बार विश्व चैपियन बन सकती हैं और ओलंपिक पदक जीत सकती हैं तो बाकि लड़कियां ऐसा क्यों नहीं कर सकती. वो कहती हैं लोगों को लगता है कि मां बनने के बाद एक खिलाड़ी विश्व चैंपियन नहीं बन सकती. लेकिन अगर हमारे अंदर जीत की भूख है तो कुछ भी हासिल करना असंभव नहीं है. हां मैं एक मां हूं लेकिन इससे मैं मेहनत करना तो नहीं छोड़ सकती. सपने देखना तो नहीं छोड़ सकती. जीतना तो नहीं छोड़ सकती. मेरीकॉम ये भी मानती हैं कि जीत के लिए बड़े त्याग करने पड़ते हैं और इसमें आपके परिवार की भी अहम भूमिका होती है. वो कहती हैं मेरे परिवार ने हमेशा मेरा साथ दिया है और मेरे इरादे भी बुलंद हैं. और इसी वजह से मां बनने के बाद भी मैं विश्व चैंपियन बन पाई. हाल ही में मेरीकॉम ने अपनी आत्मकथा अनब्रेकेबल रिलीज़ की है. मेरीकॉम चाहती हैं कि उनकी जीवनी से नौजवान लड़कियां प्रेरणा लें. |
| DATE: 2013-12-19 |
| LABEL: sports |
| [650] TITLE: क्या क्रिकेट संघ में फिर लौटेंगे ललित मोदी? |
| CONTENT: राजस्थान क्रिकेट संघ आरसीए के बहुचर्चित चुनाव संपन्न हो गए हैं. ये चुनाव इसलिए ख़ास हैं क्योंकि आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी इस चुनाव में अध्यक्ष पद के उम्मीदवार हैं. मतदान राजधानी जयपुर के सवाई मानसिंह स्टेडियम स्थित क्रिकेट एकेडमी में हुआ. नतीजा छह जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आएगा. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई ने चेतावनी दे रखी है कि अगर मोदी इस चुनाव में जीते तो बीसीसीआई से आरसीए की सदस्यता समाप्त कर दी जाएगी. यह मुक़ाबला और भी रोचक होता अगर पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के महासचिव डॉक्टर. सीपी जोशी चुनाव लड़ते. वे अभी आरसीए के अध्यक्ष हैं. लेकिन राजस्थान में कांग्रेस की सरकार चले जाने और भाजपा की सरकार आ जाने के कारण आरसीए के सारे समीकरण उलट-पुलट गए हैं और सीपी जोशी मैदान छोड़ गए हैं. जोशी ने मोदी के सामने अपने विश्वासपात्र रामपाल शर्मा को चुनाव मैदान में अध्यक्ष पद के लिए उतारा है जो भीलवाड़ा से हैं. आरसीए के कुल 21 पदों के लिए गुरुवार सुबह 11 बजे से वोट पड़ने लगे थे. सबसे रोचक मुकाबला अध्यक्ष पद का ही है. इस चुनाव में राज्य के सभी 33 जिलों से एक-एक वोट है. हर जिले की क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव को वोट डालने का अधिकार होता है. कुछ समय पहले तक मोदी के चुनाव लड़ने की संभावना नहीं थी और ऐसा लग रहा था कि सीपी जोशी फिर से अध्यक्ष बन जाएंगे. लेकिन राज्य में वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री बनते ही सारे समीकरण बदल गए. ललित मोदी चुनाव लड़ने के योग्य हैं या नहीं ये विवाद सुप्रीम कोर्ट तक तक पहुंच गया था. इसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने एक चीफ ऑब्जर्वर एनएम कासलीवाल को लगा दिया था. उन्होंने सारी आपत्तियां सुनी और बुधवार को मोदी के खिलाफ आई सभी आपत्तियों को खारिज कर उन्हें उम्मीदवारी के काबिल माना. इस चुनाव पर मोदी को लेकर दी गई बीसीसीआई की चेतावनियों का कोई खास असर नजर नहीं आया. मोदी गुट से उपाध्यक्ष पद के उम्मीदवार महमूद आब्दी कहते हैं कि बीसीसीआई ने ये चेतावनियां तब क्यों नहीं जारी कीं जब 24 नवंबर को चुनाव होने वाले थे और मोदी को नागौर जिला संघ ने उम्मीदवारी के काबिल माना था. आरसीए का चुनावी माहौल बीसीसीआई के सचिव संजय पटेल की चेतावनियों के ईमेल को लेकर बार-बार चर्चित रहा. पटेल ने आरसीए अध्यक्ष सीपी जोशी को बुधवार को ई-मेल किया था कि आरसीए बोर्ड के दिशा-निर्देश का पालन करने में विफल रहा है. ईमेल में कहा गया है कि उन्होंने ललित मोदी को आरसीए के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की अनुमति कैसे दे दी जबकि उन पर बीसीसीआई ने आजीवन प्रतिबंध लगाया हुआ है. पटेल ने अपने पत्र में लिखा था कि वे अंतिम चेतावनी दे रहे हैं. सीपी जोशी को न केवल नागौर जिला संघ के खिलाफ कार्रवाई करनी है बल्कि आरसीए के अध्यक्ष के नाते बोर्ड को पर्याप्त सबूत भी देने होंगे कि मोदी 19 दिसंबर को होने वाले चुनाव के लिए अयोग्य हैं. सीपी जोशी ने इस बीसीसीआई के इस ईमेल को सभी जिला संघों को भेजकर इसका पालन करने के लिए कहा है. अगर आरसीए की सदस्यता निलंबित होती है तो उसे बीसीसीआई से न तो अनुदान मिलेगा और न ही क्रिकेट मैचों की मेजबानी ही मिलेगी. |
| DATE: 2013-12-19 |
| LABEL: sports |
| [651] TITLE: भारत बनाम दक्षिण अफ़्रीका: पहला दिन कोहली के नाम |
| CONTENT: भारत और दक्षिण अफ़्रीका के बीच वांडरर्स में खेले जा रहे पहले टेस्ट मैच का पहले दिन विराट कोहली के नाम रहा. पहले दिन का खेल समाप्त होने तक भारत ने पांच विकेट खोकर 255 रन बनाए हैं. वांडरर्स में दक्षिण अफ़्रीका की तरफ़ से मॉर्नी मॉर्केल और ज्याक कालिस ने किफ़ायती और सधी हुई गेंदबाज़ी की लेकिन विराट कोहली ने सँभलकर बल्लेबाज़ी की और टेस्ट में अपना पाँचवाँ शतक जड़ दिया. टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी कर रहे भारत की खराब शुरूआत के बाद चौथे नंबर पर बल्लेबाज़ी करने पिच पर उतरे कोहली ने शानदार 119 रन बनाए. अपनी करीब चार घंटे की पारी में विराट कोहली ने 181 गेंदों का सामना किया और 18 चौके लगाए. कोहली के अब तक के टेस्ट करियर का ये सर्वोत्तम प्रदर्शन है. एक अच्छी पारी खेलने के बाद जेपी ड्यूमिनी की गेंद पर विराट कोहली कवर ड्राइव करने की कोशिश में कालिस को कैच थमा बैठे. हालांकि कोहली के आउट होने का बुधवार के दिन दक्षिण अफ़्रीका को कोई खास फ़ायदा नहीं हुआ क्योंकि अपना दूसरा टेस्ट खेल रहे अजिंक्य रहाणे और कप्तान महेंद्र सिंह धोनी पहले दिन का खेल पूरा होने तक पिच पर डटे रहे. अपनी पारी में कोहली ने दो महत्वपूर्ण साझेदारियां निभाईं जिनमें चेतेश्वर पुजारा के साथ 89 रनों की और अजिंक्य रहाणे के साथ 68 रनों की साझेदारी शामिल है. वांडरर्स की हरी घास वाली पिच का दक्षिण अफ़्रीका को भी कोई खास फ़ायदा नहीं पहुंचा. गेंदबाज़ों को पिच से पर्याप्त बाउंस तो मिला लेकिन गेंद में स्विंग का अभाव दिखा. पहले दिन का खेल खत्म होने तक रहाणे ने अच्छी बल्लेबाज़ी की खासकर दूसरी नई गेंद आने के बाद और नाबाद 43 रन भी बनाए. कोहली और पुजारा की साझेदारी पुजारा के रन आउट होने से टूटी. इमरान ताहिर की गेंद को मिड विकेट की ओर भेजकर विराट कोहली ने एक रन के लिए पुजारा को बुलाया लेकिन बाद में उन्हें वापस भेज दिया. पर तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी और गेंद स्टंप उखाड़ चुकी था. आक्रामक खेल दिखाते हुए विराट कोहली ने 76 गेंदों में ही अपने पचास रन पूरे कर लिए थे. इससे पहले कोहली की सबसे अच्छी टेस्ट पारी ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ थी जिसमें उन्होंने 116 रन बनाए थे. भारत के सलामी बल्लेबाज़ दक्षिण अफ्रीकी तेज़ गेंदबाज़ों के आगे लड़खड़ाते हुए दिखे. शिखर धवन 13 रन बनाकर आउट हो गए जबकि मुरली विजय महज़ छह रनों पर अपना विकेट गँवा बैठे. पहले दिन के खेल में डेल स्टेन फिलैंडर मॉर्नी मॉर्केल और ज्याक कालिस को एक-एक सफलता मिली. मॉर्केल ने किफ़ायती गेंदबाज़ी करते हुए दस मेडन ऑवर फेंके. वांडरर्स में दूसरे दिन के खेल में भारतीय पारी को कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और अजिंक्य रहाणे आगे बढ़ाएंगे. |
| DATE: 2013-12-18 |
| LABEL: sports |
| [652] TITLE: अपने फैन्स के लिए रोनाल्डो ने खोला म्यूजियम |
| CONTENT: स्पेन के रियाल मैड्रिड क्लब की तरफ से खेलने वाले फुटबॉलर क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने अपने फैन्स के लिए एक म्यूजियम खोला है. उनके मुताबिक भविष्य में जीतने वाली ट्रॉफियों के लिए उनके म्यूजियम में एक अतिरिक्त कमरा है. 28 वर्षीय इस स्टार खिलाड़ी को तीन और खिलाड़ियों के साथ दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ फ़ुटबॉल खिलाड़ी के पुरस्कार के लिए नामंकित किया गया है. इस मौके पर रोनाल्डो ने कहा यह एक बहुत ही खास दिन है मैं कुछ विशिष्ट ट्रॉफियों को ही अपने फैन्स को दिखाना नहीं चाहता था. अगर मैं दूसरी बार पुरस्कार जीतता हूँ तो उस ट्रॉफी के लिए यहाँ एक अलग कमरा है. रोनाल्डो के पैतृक निवास स्थित इस म्यूजियम में 125 से अधिक ट्रॉफियों को प्रदर्शित किया गया है. रोनाल्डो ने 2008 में प्रतिष्ठित बैलॉन डी ऑर जीता था इससे पहले मैनचेस्टर यूनाइटेड के साथ खेलते समय उन्हें फीफा वर्ल्ड प्लेयर चुना गया था. रोनाल्डो ने रियाल मैड्रिड के साथ रिकॉर्ड अस्सी मिलियन डॉलर का करार किया था. पुर्तगाली खिलाड़ी ने अपने दीवाने फैन्स और पत्रकारों के सामने एक पाँच मंजिला इमारत में इस म्यूजियम की शुरुआत की. पुर्तगाल के दक्षिण तट से लगभग 250 मील दूर एक द्वीप पर उन्होंने कहा यहाँ वे स्मृतियां हैं जिन्हें मैंने जीता है. इन्हें यहाँ से कोई नहीं ले जाएगा ये वो चीजे हैं जिन्हें मैं अपने फैन्स के साथ साझा करना चाहता था. मैं उन्हें वो सब चीजें दिखाना चाहता था जो मैं हासिल कर चुका हूँ. पहली ट्रॉफी पर वो तारीख लिखी है जब रोनाल्डो ने आठ साल की उम्र में अपने बचपन के क्लब एन्डोरिन्हा से खेलते हुए सबसे ज्यादा गोल दागे थे. |
| DATE: 2013-12-18 |
| LABEL: sports |
| [653] TITLE: ऑस्ट्रेलिया ने किया एशेज पर कब्जा |
| CONTENT: ऑस्ट्रेलिया ने मंगलवार को पर्थ टेस्ट में इंग्लैंड को 150 से हराकर सात साल बाद फिर से एशेज पर अपना कब्जा सुनिश्चित कर लिया. इस जीत से साथ मेजबान टीम ने पांच मैचों की सिरीज़ में 3-0 की अपराजेय बढ़त बना ली है. इंग्लैंड को जीत के लिए 504 रन का लक्ष्य मिला था. इंग्लैंड ने अंतिम दिन अपनी दूसरी पारी को पांच विकेट पर 251 रन से आगे बढ़ाया और उसकी टीम 353 रन पर ढ़ेर हो गई. अपना दूसरा टेस्ट खेल रहे बेन स्टोक्स ने इंग्लैंड के लिए 120 रन बनाए लेकिन बाक़ी बल्लेबाज़ एक बार फिर नाकाम रहे. स्टोक्स ने 195 गेंदों की अपनी पारी में 18 चौके और एक छक्का लगाया. सिरीज़ में शानदार प्रदर्शन कर रहे बाएं हाथ के तेज़ गेंदबाज़ मिशेल जॉनसन ने लंच के बाद जेम्स एंडरसन को आउट कर इंग्लैंड के संघर्ष को ख़त्म कर दिया. जॉनसन ने 78 रन देकर चार विकेट लिए जबकि ऑफ़ स्पिनर नाथन लियोन ने 78 रन पर तीन विकेट लिए. जॉनसन सिरीज़ में अब तक 23 विकेट चटका चुके हैं. ऑस्ट्रेलिया को तीन महीने पहले इंग्लैंड में एशेज सिरीज़ में 0-3 से शिकस्त का सामना करना पड़ा था. उसकी एशेज में यह लगातार तीसरी पराजय थी. लेकिन इस सिरीज़ में कंगारू टीम गजब का प्रदर्शन कर रही है. ऑस्ट्रेलिया ने ब्रिसबेन में पहला टेस्ट 381 रन से और एडिलेड में दूसरा टेस्ट 218 रन से जीता था. इंग्लैंड पर अब मेलबर्न और सिडनी में होने वाले अंतिम दो टेस्टों में 0-5 से सिरीज़ गंवाने का ख़तरा रहेगा. जीत के बाद ऑस्ट्रेलिया के कप्तान माइकल क्लार्क ने कहा इस जीत का श्रेय पूरी टीम को जाता है. हम यह सिरीज़ 5-0 से सिरीज़ जीतना चाहते हैं और फिर हमारी नज़र आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में अपना नंबर एक का ताज वापस पाने पर है. |
| DATE: 2013-12-17 |
| LABEL: sports |
| [654] TITLE: एक बार फिर ललित मोदी और बीसीसीआई में ठनी |
| CONTENT: इंडियन प्रीमियर लीग के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी ने राजस्थान क्रिकेट संघ आरसीए के अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल किया है. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बीसीसीआई की तरफ़ से लगे आजीवन प्रतिबंधन के बावजूद मोदी ने 19 दिसंबर को होने वाले चुनाव के लिए अपनी दावेदारी पेश की है. ललित मोदी के नामांकन के बाद बीसीसीआई ने धमकी दी है कि अगर राजस्थान क्रिकेट संघ में ललित मोदी की वापसी होती है तो राज्य क्रिकेट संघ को निलंबित किया जा सकता है. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार ललित मोदी के वकील महमूद आब्दी ने उनका नामांकन पत्र दाखिल किया जबकि ख़ुद आब्दी राजस्थान क्रिकेट संघ के उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव में उतरे हैं. नामांकन पत्रों की जांच मंगलवार को होगी जबकि बुधवार नाम वापस लेने का आखिरी दिन होगा. इसके अगले दिन गुरुवार को चुनाव होगा. दूसरी तरफ़ बीसीसीआई ने राजस्थान क्रिकेट संघ के मौजूदा अध्यक्ष सीपी जोशी को एक पत्र लिख कर मोदी के नामांकन पर विरोध दर्ज कराया है. पत्र में कहा गया है हमें पता चला है कि नागौर क्रिकेट संघ ने ललित मोदी को अपना अध्यक्ष बना दिया है. हम उन्हें याद दिलाना चाहते हैं कि बीसीसीआई के नियमों के अनुसार आरसीए समेत सभी सदस्यों को बीसीसीआई के हित में लिए गए फैसलों को मानना होगा खास तौर से उन्हें जो अनुशासनात्मक कार्यवाही से जुड़े हैं. मोदी को बतौर आईपीएल कमिश्नर उनके कार्यकाल में वित्तीय अनियमितताओं का दोषी पाया गया था जिसके बाद बीसीसीआई ने उन्हें आजीवन क्रिकेट मामलों से प्रतिबंध कर दिया था. वहीं मोदी के वकील का कहना है कि आरसीए राजस्थान खेल अधिनियम से संचालित है इसलिए बीसीसीआई की ओर से लगाया गया प्रतिबंध मोदी पर लागू नहीं होता है. 2005 में वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री रहते ही राजस्थान खेल अधिनियम बनाया गया था. अब हालिया चुनाव में शानदार जीत दर्ज करने के बाद राजस्थान की कमान फिर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के हाथों में है. आरसीए के चुनाव में कुल 33 मतदाता हैं यानी हर जिले का एक मत है. |
| DATE: 2013-12-16 |
| LABEL: sports |
| [655] TITLE: एंडी मरे बने बीबीसी स्पोर्ट पर्सनैलिटी ऑफ़ द ईयर |
| CONTENT: इस साल विंबलडन जीतने वाले एंडी मरे ने 2013 का बीबीसी स्पोर्ट्स पर्सनैलिटी ऑफ़ द ईयर का पुरस्कार जीता है. 26 साल के मरे पिछले 77 साल में विंबलडन में पुरुष एकल ख़िताब जीतने वाले पहले ब्रितानी खिलाड़ी बने थे. उन्होंने फ़ाइनल में सर्बिया के नोवाक ज़ोकोविच को हराकर ख़िताब जीता था. बीबीसी के पुरस्कार के लिए कराई गई वोटिंग में मरे को कुल 56 फ़ीसदी वोट मिले. उनको चार लाख से ज़्यादा वोट मिले और उन्होंने बाक़ी प्रतिभागियों को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया. रग्बी खिलाड़ी लेह हाफपैनी दूसरे और जॉकी एपी मैककॉय तीसरे स्थान पर रहे. कुल सात लाख 17 हज़ार 454 लोगों ने वोट दिए. इस समारोह का आयोजन लीड्स में किया गया लेकिन मरे को यह पुरस्कार मियामी में दिया गया जहाँ वो नए सत्र की तैयारियों में जुटे हैं. 18 बार की ग्रैंड स्लैम विजेता मार्टिना नवरातिलोवा ने उनको ट्राफ़ी दी. पुरस्कार लेने के बाद मरे ने कहा मार्टिना का शुक्रिया कि उन्होंने मुझे सम्मानित किया. वह महान खिलाड़ी हैं. उन्होंने कहा मैं कुछ लोगों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं. सबसे पहले अपने परिवार का. मेरे परिवार के कई सदस्य आप लोगों के बीच बैठे हैं. उन्होंने बचपन से मेरी मदद की है और मेरे लिए त्याग किया है. मैंने जो कुछ हासिल किया है वह उऩके बग़ैर मुमकिन नहीं था. उन्होंने आगे कहा मैं अपनी टीम के साथियों को भी शुक्रिया कहना चाहता हूं वे लंबे समय तक मेरे साथ रहे. उनके बिना यह उपलब्धि संभव नहीं थी. एंडी मरे ने पुरस्कार मिलने के बाद लोगों का शुक्रिया अदा किया. उन्होंने कहा लंबे समय से मेरे ऊपर काफ़ी दबाव था. लेकिन मैं ख़ुश हूं कि मैंने कामयाबी पाई. मैं कितना भी उत्साहित दिखने की कोशिश करूं लेकिन मेरी आवाज़ बोर करने वाली है. मैं इसके लिए माफ़ी चाहता हूं. लेकिन इस समय मैं वाक़ई काफ़ी उत्साहित हूं. आप सभी लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया. पिछले साठ साल के इतिहास में मरे बीबीसी का यह पुरस्कार जीतने वाले चौथे टेनिस खिलाड़ी हैं. उनसे पहले एन जोंस 1969 में वर्जीनिया वाडे ने 1977 में और ग्रेग रुदेस्की ने 1997 में यह सम्मान जीता था. इस साल मरे को काफ़ी उतार-चढ़ाव देखने पड़े. साल की शुरुआत में वो सर्बिया के जोकोविच से ऑस्ट्रेलियन ओपन के फ़ाइनल में हार गए थे. मरे पीठ की समस्या के कारण मई में फ्रेंच ओपन में नहीं खेले लेकिन उन्होंने विंबलडन में ख़िताब जीतकर इतिहास रच दिया. |
| DATE: 2013-12-16 |
| LABEL: sports |
| [656] TITLE: न्यूज़ीलैंड की 13 महीने में पहली टेस्ट जीत |
| CONTENT: न्यूज़ीलैंड ने वेस्ट इंडीज को वेलिंगटन टेस्ट में तीसरे ही दिन पारी और 73 रन से हराकर करीब एक साल बाद किसी टेस्ट मैच में जीत हासिल की है. मेजबान टीम के लिए 24 साल के तेज़ गेंदबाज़ ट्रेंट बोल्ट ने अपने टेस्ट करियर का शानदार प्रदर्शन करते हुए पूरे मैच में 80 रन देकर कुल 10 विकेट लिए. न्यूज़ीलैंड ने अपनी पहली पारी में 441 रन बनाए थे जिसके जवाब में कैरेबियाई टीम पहली पारी में 193 रन पर ढ़ेर हो गई. फ़ॉलोऑन के बाद वेस्टइंडीज की दूसरी पारी में भी 175 रन ही बना सकी. वेस्ट इंडीज ने शुक्रवार को अपनी पहली पारी चार विकेट पर 158 रन से आगे बढ़ाई. मैच के तीसरे दिन कुल 16 विकेट गिरे. कैरेबियाई टीम के लिए मार्लन सैम्युअल्स ने पहली पारी में सर्वाधिक 60 रन बनाए जबकि दूसरी पारी में केरॉन पॉवेल ने सबसे ज़्यादा 36 रन बनाए. बोल्ट ने पहली पारी में 40 रन देकर छह विकेट लिए. इस दौरान उन्होंने 15 गेंदों में पाँच विकेट लेने का कारनामा भी किया. उन्होंने अपने इस शानदार प्रदर्शन को दूसरी पारी में भी जारी रखते हुए 40 रन देकर वेस्टइंडीज के चार बल्लेबाज़ों को पवेलियन की राह दिखाई. ब्रैंडन मैकुलम की कप्तानी में न्यूज़ीलैंड की 11 टेस्टों में यह पहली जीत है. मैकुलम को 11 महीने पहले रॉस टेलर की जगह कप्तान बनाया गया था. इससे पहले कीवी टीम ने मैकुलम की कप्तानी में दस टेस्टों में छह ड्रा खेले थे और चार मैचों में उसे हार का सामना करना पड़ा था. इस जीत के साथ न्यूज़ीलैंड ने तीन मैचों की इस सिरीज़ में 1-0 की बढ़त बना ली है. सिरीज़ का तीसरा और अंतिम टेस्ट 19 दिसंबर से हेमिल्टन के सेडन पार्क में शुरू होगा. |
| DATE: 2013-12-13 |
| LABEL: sports |
| [657] TITLE: भारत-दक्षिण अफ़्रीका मैच बारिश के कारण रद्द |
| CONTENT: भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच बुधवार को सेंचूरियन में तीसरा और फ़ाइनल एकदिवसीय मैच बारिश की वजह से रद्द हो गया. सुपर स्पोर्ट्स पार्क में खेले गए इस मैच में दक्षिण अफ्रीका ने भारत को 302 रन का लक्ष्य दिया था लेकिन फिर बारिश शुरू हो गई और भारत एक भी गेंद नहीं खेल सका. इसके साथ ही दक्षिण अफ्रीका ने यह सीरीज़ 2-0 से जीत ली है. दक्षिण अफ्रीका ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी चुनी. कप्तान एबी डिविलियर्स ने 109 रन बनाए जबकि सलामी बल्लेबाज़ क्यू दे कॉक ने 101 रन बनाए. इन दोनों के रनों के योगदान से दक्षिण अफ्रीका आठ विकेट खोकर 302 रन के लक्ष्य पर पहुँच गया. इसी मैच में क्यू दे कॉक वन डे मैच में एक के बाद एक लगातार तीन शतक शतक लगाने वाले पांचवे बल्लेबाज़ बन गए. उन्हें प्लेयर ऑफ़ द सीरीज़ भी चुना गया. भारत की तरफ से इशांत शर्मा ने 40 रन देकर चार विकेट लिए. दक्षिण अफ्रीका शुरूआती दोनो मैच जीतकर पहले ही सिरीज़ अपने नाम कर चुका था. लगातार छह एकदिवसीय सिरीज़ अपने नाम कर दक्षिण अफ्रीका पहुंची भारतीय क्रिकेट टीम जोहनसबर्ग में खेले गए पहले मैच में 141 और डरबन में खेले गए दूसरे मैच में 134 रनों से हारी थी. दक्षिण अफ्रीका इससे पहले अपनी ही ज़मीन पर पाकिस्तान से एक-दिवसीय सिरीज़ 2-1 से हारा था. इसे देखते हुए उम्मीद की जा रही थी कि एकदिवसीय क्रिकेट रैंकिंग में नम्बर एक भारतीय टीम दक्षिण अफ्रीका को कड़ी टक्कर देगी लेकिन टक्कर देना तो दूर भारतीय टीम उसके ख़िलाफ खडी भी नही हो सकी. इससे पहले भारतीय टीम अपने पहले अफ्रीका के दौरे में साल 1992-93 में जीत हासिल करने में कामयाब रही थी. तब जीत के लिए 215 रनों का लक्ष्य भारत ने सलामी बल्लेबाज़ वुरकेरी वेंकट रमन के 114 रनों की मदद से 4 विकेट खोकर हासिल किया था. इसके बावजूद भारत सात मैचों की उस सिरीज़ में 5-2 से हारा था. इसके बाद भारतीय टीम को साल 2006-07 में खेली गई एकदिवसीय सिरीज़ में सैंचुरीयन में 9 विकेट से करारी हार का सामना करना पडा. इसके अलावा साल 2010-11 में खेली गई सिरीज़ में भारत सैंचुरियन में डकवर्थ लुइस नियम के आधार पर 33 रनों से हारा. इसके बावजूद यह भारत का अपेक्षाकृत शानदार दौरा था जिसमें पांच मैचों की सिरीज़ में भारत 3-2 से हारा था. |
| DATE: 2013-12-12 |
| LABEL: sports |
| [658] TITLE: फ़ीफ़ाः क्या 'ग्रुप ऑफ डेथ' से बचा जा सकता है? |
| CONTENT: कुछ देश दूसरे कई देशों से ज्यादा बेताबी से विश्व कप के ड्रा की बाट जोह रहे थे. आइवरी कोस्ट की टीम हमेशा ही खतरनाक ग्रुप ऑफ डेथ में मौजूद होती है. आइवरी कोस्ट टीम के प्रशंसक जैसे कि साल 2006 में अर्जेंटीना और नीदरलैंड साल 2010 में ब्राजील और पुर्तगाल के प्रशंसकों की ही तरह शायद हर तरह के परिणाम के लिए तैयार हो रहे होंगे. कई और यूरोपीय देशों के बेचैन होने की घड़ी करीब आ रही है. इस घबराहट के भी कारण हैं इसके बारे में मैं बाद में बताऊंगा. पहले सवाल ये कि ग्रुप ऑफ डेथ से कैसे बचा जाए क्या इससे बचना संभव है हां इससे बचा जा सकता है. सभी टीमों को चार श्रेणी और आठ अलग-अलग ग्रुप में रखा गया है. हालांकि अभी इस बात का फैसला होना बाकी है कि यूरोप की नौ टीमों में से कौन सी एक टीम तीसरी श्रेणी में रखी जाए. प्रत्येक ग्रुप में हर श्रेणी से एक टीम होगी. सारी वरीयता प्राप्त टीमों को पहली श्रेणी में स्थान मिला है. इससे एक बात तो साफ हो जाती है कि इस श्रेणी की टीमें एक दूसरे से तब तक नहीं खेलेंगी जब तक कि मुकाबला अपने अंतिम चरण में नहीं पहुंच जाता. बची दो श्रेणियों में एशिया उत्तरी अमरीका और मध्य अमरीका दूसरी श्रेणी की टीमों और अफ्रीका और दक्षिणी अमरीका की गैर-वरीयता प्राप्त टीमों तीसरी श्रेणी को जगह मिली है. ये देखना होगा कि वे कौन से घातक ग्रुप हैं जिनके श्रेणी से बाहर निकल जाने की संभावना है इसके लिए हमें सबसे पहले टीमों को उनकी ताकत के हिसाब से वरीयता देनी होगी. इसका एक तरीका तो ये होगा कि हम फ़ीफ़ा की वर्ल्ड रैंकिंग का सहारा लें मगर जैसा कि मैंने पहले लिखा था अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों को दोस्ताना तरीके से खेलना किसी टीम को भले वो जीत जाए फ़ीफ़ा की वर्ल्ड रैंकिंग से नीचे उतार सकता है. इसलिए हम संशोधित वर्ल्ड रैंकिंग का इस्तेमाल करेंगे. अगर इस रैंकिंग को इस्तेमाल किया जाए तो पहली श्रेणी जिसमें शीर्ष वरीयता प्राप्त टीमें हैं 6-25 की औसत रैंकिंग के साथ सबसे मजबूत श्रेणी के रूप में उभर रही है. इसके बाद का स्थान यूरोपीय श्रेणी चौथी श्रेणी का आता है. इसकी रैंकिंग 14-25 होती अगर फ्रांस 15वें स्थान पर तीसरी श्रेणी में पहुंच पाता जैसा कि फ़ीफ़ा के पिछले हफ्ते में यू-टर्न लेने के पहले तक अपेक्षा की जा रही थी. इस अवस्था में थोड़ा कम या थोड़ा ज्यादा का फर्क आ सकता है अगर ऐसा होने की बजाय दूसरी यूरोपिय टीमों में से कोई एक वहां पहुंचे. यही कारण है कि यूरोपीय टीमों को अब थोड़ा बेचैन होना चाहिए. तीसरी और चौथी श्रेणी आसानी से मुश्किल ग्रुप में पहुंच सकती हैं क्योंकि वे एक की बजाय दमदार श्रेणी पहली और चौथी श्रेणी की दो टीमों से मुकाबला करेंगी. जो टीमें तीसरी श्रेणी में पहुंचने वाली हैं उन्हें छोड़कर यूरोप की सभी गैर-वरीयता प्राप्त टीमों को चौथी श्रेणी में रखा गया है. उम्मीद है कि तीसरी श्रेणी में पहुँचने वाली टीम फ्रांस हो सकती है. मगर फ़ीफ़ा ने इस हफ्ते घोषणा की है कि किसी भी यूरोपीय टीम को इसके लिए चुना जा सकता है. यह चुनाव बिना किसी क्रम के ऐट रैंडम होगा. फिलहाल इस बहस के लिए हम मान लेंगे कि फ्रांस तीसरी श्रेणी में होगा. अब अगर फ़ीफ़ा के नियमों का पालन किया जाए तो सबसे दमदार ग्रुप है स्पेन पहले स्थान पर अमरीका 11वें चिली 8वें और नीदरलैंड 5वें. इस ग्रुप में दुनिया के 11 शीर्ष टीमों में से चार शामिल हैं. आप इसे आखिरी ग्रुप ऑफ डेथ के रूप में देख सकते हैं. सबसे कमजोर संभावित ग्रुप में बोगोटा कोलंबिया 14वें दक्षिणी कोरिया 50वें अल्जीरिया 39वें और क्रोशिया हमारी रैंकिंग में 22वें स्थान के लिए मेक्सिको के साथ होंगे. इस काल्पनिक समूह में औसत रैंकिंग 31-25 होगा. दूसरे शब्दों में दुनिया की औसत रैंकिंग के लिहाज से देखा जाए तो सबसे मजबूत और सबसे कमजोर ग्रुप के बीच के 25 स्थान रिक्त हैं. हम इन श्रेणियों को अलग तरीके से भी व्यवस्थित कर सकते हैं ये तरीका बेहद साधारण होगा. इसे टीमों को उनकी विश्व स्तरीय रैंकिंग बेशक दोस्ताने मैच को हटाकर के अनुसार श्रेणियों में जगह देगें. इस तरीके का इस्तेमाल करते हुए और फ़ीफ़ा के नियमों के मुताबिक सबसे घातक ग्रुप इस तरह है स्पेन पहले स्विट्जरलैंड 9वें आइवरी कोस्ट 19वें और आस्ट्रेलिया 36वें. औसत रैंकिंग 16. सबसे कमजोर ग्रुपः चिली 8वें ग्रीस 17वें कैमरून 34वें और दक्षिणी कोरिया 50वें. औसत रैंकिंग 27-25. औसत विश्व रैंकिंग के अनुसार इस बार सबसे दमदार और सबसे कमजोर ग्रुप के बीच केवल 11 स्थानों का अंतर है. ग्रुप ऑफ डेथ को इस तरह स्टेडियम से निकाल बाहर कर दिया गया है. मगर क्या ये ठीक बात होगी शायद नहीं. ऐसा इसलिए कि सभी देश ग्रुप ऑफ डेथ में दिलचस्पी रखते हैं इसे चाहते हैं लेकिन तब तक जब तक उनका देश इसमें ना हो. |
| DATE: 2013-12-10 |
| LABEL: sports |
| [659] TITLE: सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बीच जूनियर हॉकी विश्वकप शुरू |
| CONTENT: सुप्रीम कोर्ट ने भारत में हॉकी के गिरते स्तर को लेकर चिंता जताते हुए गुरुवार को कहा है कि इसकी वजह राजनीति है. इसी के साथ कोर्ट ने कहा खेल महासंघों का नेतृत्व कारोबारियों की बजाय खिलाड़ियों को करना चाहिए. इनका स्तर उठाने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किए गए हैं और यह चिंता का विषय है. भारतीय हॉकी फेडरेशन और हॉकी इंडिया दोनों ही इस खेल पर अपने अधिकार का दावा करते हैं. हॉकी इंडिया ने दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दी थी और उसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस खेल को लेकर ये टिप्पणी की. इन दिनों एक तरफ जहां सभी खेल प्रेमियों की निगाहें भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच खेली जा रही एकदिवसीय सिरीज़ पर लगी हुई है वहीं दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नैशनल स्टेडियम में शुक्रवार से जूनियर पुरुष विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट शुरू हो रहा है. इस टूर्नामेंट में मेज़बान भारत सहित कुल मिलाकर 16 टीमें भाग ले रही हैं. भारतीय हॉकी टीम की कमान युवा खिलाड़ी मनप्रीत सिंह के हाथों में सौंपी गई है. टीम में अनुभवी कोथाजीत सिंह मालक सिंह मनदीप सिंह और गुरजिंदर सिंह के साथ-साथ अमित रोहिदास भी शामिल हैं. अमित रोहिदास को टीम का उपकप्तान बनाया गया है. इस विश्व कप में सभी 16 टीमों को चार पूलों में बांटा गया है. मेज़बान भारत को पूल-सी में हॉलैंड दक्षिण कोरिया और कनाडा के साथ रखा गया है. इस टूर्नामेंट में भारत अपने अभियान की शुरुआत शुक्रवार को ही हॉलैंड के ख़िलाफ़ करेगा. इस टूर्नामेंट की सबसे शक्तिशाली टीमों में जर्मनी हॉलैंड स्पेन ऑस्ट्रेलिया और अर्जेंटीना भी शामिल हैं. पूल-सी में भारत के अलावा पूल-ए में जर्मनी पाकिस्तान बेल्जियम और मिस्र हैं. पूल-बी में ऑस्ट्रेलिया स्पेन अर्जेंटीना और फ्रांस हैं तो पूल-डी में इंग्लैंड न्यूज़ीलैंड दक्षिण अफ्रीका और मलेशिया शामिल हैं. जूनियर विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट का पहला मैच शुक्रवार को दक्षिण कोरिया और कनाडा के बीच खेला जाएगा. वैसे इस टूर्नामेंट के कार्यक्रम के अनुसार पहले दिन आठ मैच खेले जाएंगे यानी सभी 16 टीमें एक ही दिन मैदान में उतरेंगी. भारत के दृष्टिकोण से हॉलैंड के ख़िलाफ होने वाला पहला ही मैच बेहद महत्वपूर्ण हैं. क्वार्टर फाइनल में पहुंचने के लिए किसी भी टीम को कम से कम दो मैच जीतने ज़रूरी हैं. इस लिहाज़ से भारत के पूल में केवल कनाडा की टीम थोड़ी सी कमज़ोर मानी जा रही है अन्यथा दक्षिण कोरिया भी एक बेहतरीन टीम हैं. इस टूर्नामेंट का फाइनल 15 दिसंबर को खेला जाएगा. भारत जूनियर स्तर के इस टूर्नामेंट को एक बार साल 2001 में अपने नाम कर चुका हैं. ऑस्ट्रेलिया में हुए साल 2001 के विश्व कप के फाइनल में भारत ने अर्जेंटीना को मात दी थी. इसके अलावा भारत साल 1997 में इंग्लैंड में हुए विश्व कप में उपविजेता रह चुका है तब फ़ाइनल में भारत को ऑस्ट्रेलिया ने हराया था. भारतीय टीम के कप्तान मनप्रीत सिंह को उम्मीद है कि टीम इस टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन करने की क्षमता रखती है. उनके इस भरोसे की सबसे बड़ी वजह पिछले दिनों इस टीम को मिला अनुभव है. लगभग इसी टीम ने पिछले दिनों सुल्तान जौहर कप जीता था और इसके अलावा एशियन चैंपियंस ट्रॉफी में भी भाग लिया था. इस जूनियर भारतीय हॉकी टीम में वे खिलाड़ी भी शामिल हैं जो पहली हॉकी इंडिया लीग में खेल चुके हैं. इसके अलावा हॉकी इंडिया लीग के दूसरे संस्करण की नीलामी में सबसे महंगे खिलाड़ी के रूप में उभरकर सामने आने वाले रमनदीप सिंह भी शामिल हैं. अब ये मुक़ाबले बस शुरू ही होने वाले हैं और देखना है कि भारतीय टीम हकीकत में कैसा खेल दिखाती है. |
| DATE: 2013-12-06 |
| LABEL: sports |
| [660] TITLE: एक ही खेल में शतरंज और मुक्केबाजी भी |
| CONTENT: चेस बाक्सिंग जिसमें शतरंज और मुक्केबाज़ी दोनों का मेल होता है भारत में इन दिनों ज़ोर पकड़ रहा है. कोलकाता शहर के एक जिम के भीतर एक बेंच पर दो लोग शतरंज के बोर्ड के सामने बैठे हैं दोनों ने अपनी हथेलियों को बॉक्सर की तरह कपड़ों से लपेट रखा है. दोनों साथ-साथ एक दूसरे के ख़िलाफ़ मुक्के के दांव भी लगाते जा रहे हैं. इस खेल में शामिल दोनों प्लेयर क्रमश शतरंज खेलते हैं और फिर मुक्केबाज़ी करते हैं. हालांकि इस खेल को भारत में शुरू हुए महज़ दो साल ही हुए हैं लेकिन खेल से जुड़े कई संघ तैयार हो गए हैं जिन्होंने अब तक राज्य स्तर पर 10 चैंपियनशिप मैच आयोजित किए हैं. सात अन्य राज्यों ने भी खेल में दिलचस्पी दिखाई है. बड़े राज्यों महाराष्ट्र तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में राज्य-स्तर की टीमें तैयार हो गई हैं. उत्तर-पूर्व के छोटे सूबे जैसे त्रिपुरा और मणिपुर की भी इसमें दिलचस्पी है. इस साल मुल्कों के स्तर पर हुए दो टूर्नामेंटों में से एक में 195 और दूसरे में 245 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया. इस वक़्त भारत में चेस-बॉक्सिंग के 300 पंजीकृत खिलाड़ी हैं. विश्व चेस-बॉक्सिंग संघ के अध्यक्ष लीपि रूबिंग ने भारतीय चेस-बॉक्सिंग संघ को लिखा है कि भारत चेस-बॉक्सिंग के अहम क्षेत्र के तौर पर उभर सकता है. विश्व चेस-बॉक्सिंग संघ जर्मनी के बर्लिन में मौजूद है. वहीं भारतीय संघ कोलकाता में स्थित है. दुनियाभर में अमरीका जर्मनी रूस ब्रिटेन और फ्रांस समेत 13 मुल्क हैं जहां चेस-बॉक्सिंग खेला जाता है. नए मुल्कों जैसे भारत ईरान चीन वग़ैरह के शामिल होने से खेल को और बढ़ावा मिला है. मुंबई के 27 साल के शैलेश त्रिपाठी पहले भारतीय खिलाड़ी हैं जिन्होंने 28 नवम्बर को मॉस्को में हुई विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लिया. त्रिपाठी कहते हैं कि विश्व स्तर पर होने वाला खेल वाक़ई में मस्तिष्क और जिस्म की ताक़त का इम्तिहान होता है. खेल को भारत में प्रचलित करने का काम भारतीय चेस-बॉक्सिंग संघ के संस्थापक मोंटू दास का है. संघ की वेबसाइट के मुताबिक़ दास को बचपन से ही किक बॉक्सिंग में दिलचस्पी थी और चेस-बॉक्सिंग के बारे में उन्हें ऑनलाइन से पता चला. उन्हें ये खेल बहुत भाया जिसमें 11 राउंड होते हैं इनमें शतरंज के छह दौर होते हैं. फिर बॉक्सिंग के तीन मिनट के पांच राउंड होते हैं. दोनों खेल बारी-बारी से खेले जाते हैं. चेस-बॉक्सिंग का ज़िक्र सबसे पहले वर्ष 1992 में फ्रांस के कार्टूनिस्ट इनके बिलाल के ग्राफ़िक नॉवेल में हुआ था. लीपि रूबिंग ने बाद में इसमें सुधार करके राउंड को कम अवधि का बना दिया ताकि देखने वालों की दिलचस्पी लगातार बनी रहे. |
| DATE: 2013-12-06 |
| LABEL: sports |
| [661] TITLE: 'खेल संगठनों पर खिलाड़ियों का नियंत्रण क्यों नहीं?' |
| CONTENT: विभिन्न खेल संगठनों में उच्च पदों पर बैठे नेताओं और व्यापारियों पर टिप्पणी करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि वे लोग खेल को नुक़सान ही पहुँचा रहे हैं. देश में हॉकी की स्थिति को बेहद ख़राब बताते हुए न्यायालय कहा है कि उन लोगों को खेल संस्थाओं को चलाने की ज़िम्मेदारी खिलाड़ियों पर छोड़ देनी चाहिए. न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और जे चेलामेश्वर की खंडपीठ ने कहा खेल को लोग निजी तौर पर चला रहे हैं. देश में खेल का नियंत्रण निजी तौर पर लोगों के पास है. क्या खेल को निजी हितों का बंधक बनाया जा सकता है खंडपीठ का कहना था इसीलिए हॉकी का ये हाल हो गया है और जहाँ हम स्वर्ण पदक जीतते थे वहाँ अब ओलंपिक में क्वॉलिफ़ाई करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है. खंडपीठ के मुताबिक़ ये अधिकारी खेल की क़ीमत पर ये संगठन चला रहे हैं. उनका खेल से कोई लेना-देना नहीं है. देश में खेल की बुरी स्थिति है. दरअसल भारतीय हॉकी महासंघ आईएचएफ़ और हॉकी इंडिया के बीच इस बात को लेकर खींचतान चल रही है कि हॉकी के प्रबंधन पर किसका नियंत्रण हो. इसी संदर्भ में भारतीय हॉकी महासंघ ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है. इस याचिका के ज़रिए वे अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ की उस कार्यवाही पर रोक लगाना चाहते हैं जिसके ज़रिए इन दोनों संगठनों में से किसी एक का चुनाव देश में हॉकी का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन के रूप में होना है. खंडपीठ ने कहा कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार खेल पर नियंत्रण नहीं रख पाई है. आईएचएफ़ की याचिका कुछ ही देर सुनने के बाद खंडपीठ ने पूछा कि महासंघ की अगुआई कौन कर रहा है और क्या उसमें कोई ओलंपिक खिलाड़ी है महासंघ की ओर से पेश हो रहे वकील यू यू ललित से खंडपीठ ने पूछा खेल संगठनों का नेतृत्व कौन कर रहा है वे व्यापारी हैं. समाज में कोई ओलंपिक खिलाड़ी भी है आप लोग खेल को इतनी ख़राब स्थिति में ले आए हैं कि अब अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों में टीम क्वॉलिफ़ाई भी नहीं हो पाती. |
| DATE: 2013-12-05 |
| LABEL: sports |
| [662] TITLE: क्या भारत दक्षिण अफ्रीका पर भी परचम फहराएगा? |
| CONTENT: आखिरकार लंबे समय से चला आ रहा क्रिकेट प्रेमियों का इंतज़ार अब बस समाप्त होने को है और दुनिया की दो बेहतरीन टीमें एक दूसरे का सामना करने के लिए तैयार है. भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच गुरूवार से तीन एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों की सिरीज़ का पहला मैच न्यू वांडरर्स जोहान्सबर्ग में खेला जाएगा. बाकि बचे दो मैच 8 और 11 दिसंबर को खेले जाएंगे. इसके बाद दो टेस्ट मैचों का संक्षिप्त सिरीज़ खेली जाएगी. दोनो टीमों के बीच पहला टेस्ट मैच 18 दिसंबर से और दूसरा टेस्ट मैच 26 दिसंबर से खेला जाएगा यानि जिस सिरीज़ पर पूरी दुनिया की निगाह हो वह एक महिने में ही निबट जाएगी. वैसे कुछ होना बिलकुल ना होने से अच्छा है क्योंकि कुछ मुद्दों को लेकर बीसीसीआई और दक्षिण अफ्रीकी बोर्ड में इतनी ठन चुकी थी कि एक समय तो यह सिरीज़ टलती हुई नज़र आ रही थी. अब यह देखना भी दिलचस्प होगा कि सचिन तेंदूलकर के टेस्ट क्रिकेट से संन्यास के बाद भारतीय टीम कैसा खेलती है जबकि टीम में राहुल द्रविण वी वी एस लक्ष्मण के साथ-साथ वीरेन्द्र सहवाग और गौतम गंभीर भी नही होंगे. भारतीय क्रिकेट टीम इन दिनो जीत के रथ पर सवार है. भारत ने साल की शुरूआत पाकिस्तान से भले ही तीन एकदिवसीय मैचों की सिरीज़ में 2-1 से हार के साथ की हो लेकिन उसके बाद उसने पीछे मुड़कर नही देखा. भारत ने इंग्लैंड को 5 एकदिवसीय मैचों की सिरीज़ में 3-2 से हराया. भारत ने इंग्लैंड में आखिरी बार आयोजित हुई चैंपियंस ट्रॉफी पहली बार अपने नाम की. इसके बाद उसने वैस्टइंडीज़ में खेली गई त्रिकोणीय एकदिवसीय सिरीज़ जीती. भारत की जीत का सिलसिला यहीं नही रुका और भारत ने ज़िम्बाबावे को एकदिवसीय सिरीज़ में एकतरफा रूप से 5-0 से हराया. इसके बाद भारत ने 7 एकदिवसीय मैचों की सिरीज़ में ऑस्ट्रेलिया को 3-2 से हराया. उल्लेखनीय है कि इस सिरीज़ के 2 मैच बारिश में धुल गए. वेस्ट इंड़ीज़ को भी भारत ने तीन मैचों की एकदिवसीय सिरीज़ में 2-1 से मात दी. कुल मिलाकर भारत ने इस साल 31 एकदिवसीय मैच खेले और 22 जीते तथा 8 हारे. इस साल अपने दमदार रिकार्ड के बाद भारतीय टीम एकदिवसीय क्रिकेट में आईसीसी की रैंकिंग में नंबर एक पर भी पहुंच गई. इसके बावजूद भारतीय क्रिकेट टीम का दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ ख़ासकर उसी की ज़मीन पर बेहद ख़राब रिकार्ड है. दक्षिण अफ्रीका ने अपनी ज़मीन पर भारत का 25 बार सामना किया हैं और अपने घर में उसकी स्तिथि लगभग बाली जैसी ही है. ऐसा लगता है जैसे वहॉ जाते ही भारत का आधा बल उसमें समा जाता है क्योंकि उसने भारत को 19 मैचों में मात दी है. भारत केवल 5 मैचों में ही दक्षिण अफ्रीका को हरा पाया है. कुछ यही हाल भारत का टेस्ट सिरीज़ में हैं. भारत ने दक्षिण अफ्रीका में अभी तक 15 टेस्ट मैच खेले हैं और उसे केवल 2 में जीत नसीब हुई है 7 बार हारा हैं और 6 टेस्ट मैच ड्रा रहे. भारतीय क्रिकेट टीम 1992 से दक्षिण अफ्रीका का दौरा कर रही है लेकिन अभी भी उसे पहली टेस्ट और एकदिवसीय सिरीज़ में जीत का इंतज़ार है. भारतीय क्रिकेट टीम के लिए अब परीक्षा का घड़ी आ चुकी है. अपने घरेलू मैदान पर स्पिनरों के लिए लाभदायक पिच बनाकर भारत ने ऑस्ट्रेलिया और वेस्ट इंडीज़ को मात दी लेकिन दक्षिण अफ्रीका के तेज़ गति और उछाल वाले विकेट भारतीय बल्लेबाज़ो के लिए मुश्किल साबित हो सकते है. विराट कोहली शिखर धवन रोहित शर्मा युवराज सिंह रविंद्र जडेजा कप्तान महेंद्र सिंह धोनी आर अश्विन युवा तेज़ गेंदबाज़ शमी अहमद भुवनेश्वर कुमार और उमेश यादव के साथ-साथ इशांत शर्मा के दम पर भारत यक़ीनन दक्षिण अफ्रीका को चुनौती देने की क्षमता रखता है. पुराने रिकार्ड भले ही दक्षिण अफ्रीका के पक्ष में हो लेकिन पिछले सप्ताह दक्षिण अफ्रीका को अपने ही घर में पाकिस्तान के हाथों एकदिवसीय सिरीज़ में 2-1 से हार का सामना करना पड़ा. पाकिस्तान की टीम पहली एशियाई टीम है जिसने दक्षिण अफ्रीकी शेरो को उसी की मांद में मात दी. उस हार की बौखलाहट दक्षिण अफ्रीका भारत पर उतारना चाहेगा इसके अलावा दोनो देशों के क्रिकेट बोर्ड के रिश्तो की कड़वाहट का असर मैदान पर देखने को मिल सकता है. दक्षिण अफ्रीका और भारत के बीच होने वाली एकदिवसीय सिरीज़ का पहला मैच दोनो टीमों का ताक़त का अंदाज़ा लगाने के लिए काफी होगा. भारतीय टीम को वहां अभ्यास करने का अधिक अवसर नही मिला है लेकिन भारतीय खिलाड़ियों के पास अनुभव की कोई कमी नही हैं लिहाज़ा एक संघर्षपूर्ण सिरीज़ क्रिकेट प्रेमियों के लिए होनी चाहिए. |
| DATE: 2013-12-05 |
| LABEL: sports |
| [663] TITLE: बीवी नहीं क्रिकेट है मेरा पहला प्यार: प्रवीण तांबे |
| CONTENT: मुंबई का मुलुंड इलाका. जहां मैं एक ऐसे क्रिकेटर से मिलने गया जो 42 साल की उम्र में मुंबई की रणजी टीम में चुना गया. पता ढूंढते ढूंढते मुझे कुछ सात-आठ बच्चों का झुंड दिखा. ये बच्चे बैट और बॉल लेकर जिस क्रिकेटर का इंतज़ार कर रहे थे वो थे प्रवीण तांबे. पहला बच्चा बोला अंकल मेरे बैट पर पहले ऑटोग्राफ़ दो में सबसे पहले आया था. दूसरा बोला पागल अंकल बॉलर है मेरी बॉल पर करेंगे. फिर मैं बोला अंकल मुझे इंटरव्यू देंगे और आप सब तस्वीर खिंचाएँगे. आईपीएल के छठे संस्करण में राजस्थान रॉयल्स के लिए तुरुप का पत्ता साबित हुए प्रवीण तांबे. जब टीवी पर गेंदबाज़ी करते इन्हें देखा गया तो सबका एक ही सवाल था कौन है ये खिलाडीरिकॉर्ड देखे गए गूगल पर इनको ढूँढा गया पर इनका कोई निशान नहीं. 42 साल की उम्र में आईपीएल डेब्यू और चैंपियंस लीग टी-20 में गोल्डन विकेट अवॉर्ड जीतने के बाद अब जाकर प्रवीण को मुंबई की रणजी टीम में जगह मिली है. वो छह दिसंबर से मुंबई और झारखंड के बीच शुरू होने वाले मैच से अपने रणजी करियर का आगाज़ करेंगे. वो कहते हैं मुझे नहीं पता कि मैं कब 42 का हो गया. ये तो मुझे तब अहसास हुआ जब मीडिया में ख़बरें आईं. मेरी ऊर्जा अब भी पहले जैसी ही है. प्रवीण के मुताबिक़ मुंबई में क्रिकेट खेलने वाले हर खिलाड़ी का सपना होता है कि वो एक बार तो मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन का शेर वाला टी शर्ट पहने. मेरा वो सपना अब पूरा हुआ है. मैं बहुत खुश हूँ. प्रवीण बताते हैं कि वो अपने पिता को खेलते देख कर बड़े हुए. उनके दादा भी क्रिकेट खेलते थे लेकिन इस स्तर तक उनके परिवार में कोई भी नहीं पहुंचा. वो अपने बड़े भाई प्रशांत के साथ घर के आस-पास टेनिस बॉल से खेलते रहते थे. पढ़ाई के बाद एक शिपिंग कंपनी में नौकरी मिली और साथ ही लीग और क्लब स्तर पर क्रिकेट खेलते रहे. इस बीच उन्हें कंपनी से कई बार विदेशी दौरे पर भेजा गया. कोच मिले और क्रिकेट पर फ़ोकस बढ़ता गया. प्रवीण शादीशुदा हैं. उनके 13 साल का एक बेटा और छह साल की बेटी है. उन्होंने मुझे बताया शादी करने से पहले मेरी एक शर्त थी. मैंने अपनी बीवी को बोल दिया था कि क्रिकेट मेरा पहला प्यार रहेगा और तुम दूसरा. मेरे क्रिकेट के प्रति इस प्रेम को देख मेरी पत्नी ने मेरा साथ दिया. इसलिए मैं भी अपने परिवार को बहुत प्यार करता हूं. शाम को काम से आने के बाद मेरा सारा समय मेरे परिवार के लिए है. प्रवीण एक मध्यमवर्गीय युवक हैं और अपने मातापिता के घर के क़रीब एक किराये के घर में रहते हैं. प्रवीन ने बताया कि जब चैंपियंस लीग टी-20 में उन्हें बेहतरीन गेंदबाज़ का अवॉर्ड मिला तो उनके इलाके में जश्न का माहौल था. लोग उनके नाम के नारे लगा रहे थे. उनकी मां मोहल्ले में मिठाई बांट रही थीं. प्रवीण कहते हैं अब लोग मुझे जानने लगे हैं. ऑटोग्राफ मांगते हैं. फ़ोटो खींचते हैं. पर मैं आज भी लोकल ट्रेन में सफ़र करता हूँ. अभी ज़्यादा बड़ा नहीं बना हूं ना. जब 40 की उम्र में सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट से संन्यास ले लिया तो प्रवीन तांबे 42 साल की उम्र में अपने करियर का आगाज़ कर रहे हैं. तेंदुलकर के आख़िरी टैस्ट मैच के तीनों दिन प्रवीण वानखेड़े स्टेडियम में मौजूद रहे. वो कहते हैं मुझे नहीं लगता था कि क्रिकेट के भगवान इतनी जल्दी संन्यास ले लेंगे. वो अभी और तीन-चार साल क्रिकेट खेल सकते थे. उनके संन्यास पर मुझे काफी दुःख हुआ. मैंने उन्हें नेट्स में 30-30 मिनट गेंदबाज़ी की. उनको खेलते देख कर लगता था कि क्रिकेट कितना आसान है. सचिन हमेशा मेरी प्रेरणा रहेंगे. राहुल द्रविड़ के नेतृत्व में राजस्थान रॉयल्स का हिस्सा रहे प्रवीण उन्हें अपना आदर्श मानते हैं. वो कहते हैं राहुल भाई ने मुझमें एक नया आत्मविश्वास भर दिया. टीम के हर सदस्य को वो एक जैसा समझते थे. मुझे टीम में कभी ये नहीं लगा की मैंने कभी कोई बड़े लेवल का क्रिकेट नहीं खेला. मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि मैं उनके जैसा ही हूं. जब प्रवीण से मैंने 2013 के आईपीएल में राजस्थान रॉयल्स के कुछ खिलाड़ियों के कथित तौर पर मैच फ़िक्सिंग में लिप्त होने के बारे में सवाल किए तो उन्होंने इस सवाल का जवाब नहीं दिया पर ये ज़रूर कहा जिस टीम के कप्तान राहुल भाई हों वो कैसे ऐसी घटनाओं से प्रभावित हो सकती है. हम एक टीम की तरह ही सारी बातों को भुलाकर आईपीएल फ़ाइनल में उतरे थे. फ़िलहाल प्रवीण का सारा ध्यान छह दिसंबर से शुरू होने वाले अपने पहले रणजी ट्रॉफ़ी मैच पर है. |
| DATE: 2013-12-05 |
| LABEL: sports |
| [664] TITLE: 40 में सचिन का संन्यास, 42 में प्रवीण का डेब्यू |
| CONTENT: एक तरफ जहां दुनिया के सबसे कामयाब बल्लेबाज़ सचिन तेंदुलकर ने पिछले दिनों 40 साल की उम्र में क्रिकेट को अलविदा कह दिया वहीं उनकी ही रणजी टीम मुंबई की ओर से प्रवीण तांबे 42 साल की उम्र में रणजी क्रिकेट में शुरुआत कर रहे हैं. छह दिसंबर से झारखंड के ख़िलाफ़ मुंबई का मुकाबला है. इस मैच के लिए प्रवीण तांबे को 15 खिलाड़ियों की मुंबई रणजी टीम में शामिल किया गया है. मूल रूप से लेग ब्रेक गेंदबाज़ तांबे ने इसी साल आईपीएल में अपना जलवा बखूबी दिखाया था और भले ही उन्हें तीन मैचों में केवल एक विकेट मिला हो लेकिन वह बेहद किफ़ायती साबित हुए. उनकी इसी प्रतिभा को राहुल द्रविड़ ने पहचाना और इसके बाद चैम्पियंस लीग ट्वेंटी-ट्वेंटी टूर्नामेंट में भी उन्हें खेलने का मौक़ा दिया. इस टूर्नामेंट में तांबे एक मैच विनर खिलाड़ी बन कर उभरे. उन्होंने पांच मैचों में 12 विकेट लिए. उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन हाइवेल्ड लायंस के ख़िलाफ़ रहा जब उन्होंने 15 रन देकर चार विकेट झटके. इसके अलावा उन्होंने चेन्नई सुपर किंग्स जैसी मज़बूत टीम के ख़िलाफ़ केवल 10 रन देकर तीन विकेट लिए. इनमें सुरेश रैना एस बद्रीनाथ और ट्वेंटी-ट्वेंटी के सबसे ख़तरनाक बल्लेबाज़ों में से एक वेस्टइंडीज़ के ड्वेन ब्रावो का विकेट शामिल था. उनकी घातक गेंदबाज़ी की बदौलत राजस्थान रॉयल्स ने चेन्नई सुपर किंग्स को 14 रन से मात देने में कामयाब हासिल की. इतना ही नहीं प्रवीण तांबे ने अपनी घूमती गेंदों से दिल्ली के फिरोज़शाह कोटला मैदान में चैम्पियंस लीग के फाइनल में मुंबई के ख़िलाफ 19 रन देकर दो विकेट हासिल किए. जब तांबे अपनी घूमती गेंदों से मुंबई के बल्लेबाज़ों की परीक्षा ले रहे थे तब शायद ही उन्होंने सोचा होगा कि एक दिन मुंबई की ही टीम उन्हें रणजी ट्रॉफी खेलने का अवसर भी देगी. वैसे प्रवीण तांबे ने इस साल मुंबई की कांगा लीग में खेलते हुए छह मैचों में 26 विकेट हासिल किए हैं. आठ अक्तूबर 1971 को मुंबई में जन्मे प्रवीण तांबे फिलहाल नवी मुंबई के नेरूल में डीवाई पाटिल स्पोर्ट्स एकैडमी में स्पोर्ट्स डेवलपमेंट ऑफ़िसर हैं. प्रवीण तांबे ने अभी तक कुल मिलाकर आठ ट्वेंटी-ट्वेंटी मैचों में 13 विकेट लिए हैं और उनके बल्ले से तीन रन निकले हैं. उनके परिवार में माता-पिता भाई बहन पत्नी और 13 वर्षीय बेटा प्रणय तथा छह वर्षीय बेटी परी है. अब जबकि प्रवीण तांबे की एक नई पारी शुरू हो रही है तो देखना है कि वह कैसा प्रदर्शन करते हैं लेकिन उम्र के इस मोड़ पर ऐसी शुरुआत भी किसी परी कथा से तो कम नही है. |
| DATE: 2013-12-04 |
| LABEL: sports |
| [665] TITLE: आईसीसी की टेस्ट और वनडे टीम में धोनी |
| CONTENT: भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को आईसीसी की साल की टेस्ट टीम और वनडे टीम दोनों में जगह मिली है. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से पिछले साल भर से वनडे में लगातार रनों की बरसात कर रहे विरोट कोहली को मंगलवार को घोषित टीम में जगह नहीं मिली है. आईसीसी के मुख्य कार्यकारी डेविड रिचर्डसन ने कहा कि कोहली बहुत बदकिस्मत रहे कि वह भारतीय कप्तान के नेतृत्व वाली एलजी आईसीसी वनडे टीम में स्थान नहीं बना पाए. लेकिन हो सकता है कि अगले साल वह ऐसा कर पाएं. मुंबई में 2013 के लिए आईसीसी की टेस्ट और वनडे टीम की घोषणा करने के बाद उन्होंने कहा कोहली उन लोगों में से हैं जो चयन न होने के चलते ख़ुद को बदक़िस्मत मान सकते हैं. इन अवार्ड्स में उन लोगों की चर्चा ज़्यादा होती है जो छूट गए बनिस्पत इसके कि कौन चुना गया. यहाँ जगह बनाने के लिए बहुत तगड़ी प्रतियोगिता होती है. रिचर्डसन ने कहा अगर कोहली अगले साल भी टीम में शामिल नहीं होते हैं तो यह बहुत आश्चर्यजनक होगा. चुनाव के लिए निर्धारित समय- 7 अगस्त 2012 से 25 अगस्त 2013- के दौरान दिल्ली के इस बल्लेबाज़ ने 4-52 की औसत से 689 रन बनाए जिनमें दो शतक भी शामिल हैं. भारत के विश्व विजेता कप्तान धोनी लगातार छठी बार इस टीम में शामिल हुए हैं और उम्मीदों के मुताबिक उन्हें कप्तान बनाया गया है. इस टीम में भारतीय ओपनर शिखर धवन और ऑल राउंडर रवींद्र जड़ेजा भी हैं. धोनी को आईसीसी साल की टेस्ट टीम में भी शामिल किया गया है. भारत से इसमें चेतेश्वर पुजारा और 12वें खिलाड़ी के रूप में ऑफ़ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन को भी शामिल किया गया है. धोनी आईसीसी क्रिकेटर ऑफ़ द ईयर के लिए छांटे गए अंतिम छह खिलाड़ियों में भी शामिल हैं. वह आईसीसी के वनडे क्रिकेटर ऑफ़ द ईयर के लिए भी प्रतियोगी हैं. इसकी दौड़ में धवन और जडेजा भी शामिल हैं. अश्विन और पुजारा टेस्ट क्रिकेटर ऑफ़ द ईयर के लिए छांटे गए अंतिम छह खिलाड़ियों में हैं. इंग्लैंड के कप्तान एलेस्टर कुक को टेस्ट टीम का कप्तान बनाया गया है. महेंद्र सिंह धोनी को इस साल के एलजी पीपल्स च्वाइस अवॉर्ड के लिए भी चुना गया है. यह पुरस्कार पाने वाले वह वह तीसरे व्यक्ति और दूसरे भारतीय हैं. साल 2010 में पहला पुरस्कार सचिन तेंदुलकर ने जीता था और 2011 2012 के पुरस्कार श्रीलंका के कुमार संगकारा को मिला था. पुरस्कार के अन्य दावेदारों में ऑस्ट्रेलिया के माइकल क्लार्क इंग्लैंड के एलेस्टर कुक भारत के विराट कोहली और दक्षिण अफ़्रीका के एबी डी विलियर्स शामिल थे. मुंबई में बीसीसी आई के सचिव संजय पटेल ने एलजी एलेक्ट्रॉनिक्स के होम एंटरटेनमेंट निदेशक हॉवर्ड ली ने धोनी की ओर से यह पुरस्कार ग्रहण किया. धोनी इस वक्त भारतीय क्रिकेट टीम के साथ दक्षिण अफ़्रीका में हैं. साल 2010 में बंगलुरु में शुरू एलजी आईसीसी अवॉर्ड के लिए दो नवंबर और 23 नवंबर की आधी रात के बीच एलजीआईसीसीअवार्ड्स डॉट कॉम या ट्विटर पर हैशटैग एलजीआईसीसीअवार्ड्स का इस्तेमाल कर वोटिंग की गई. दुनिया भर से करीब 188000 लोगों ने अपने पसंदीदा खिलाड़ी को चुनने के लिए वोट दिया. |
| DATE: 2013-12-03 |
| LABEL: sports |
| [666] TITLE: झारखंड की हॉकी हाशिये पर क्यों चली गई? |
| CONTENT: एक ज़माना था जब खेलों की दुनिया में झारखंड की शान हॉकी हुआ करती थी. यहां की मिट्टी से हॉकी का अभी भी गहरा नाता है. लेकिन अब पहले वाले दिन नहीं रहे. झारखंड में हॉकी की नर्सरी मुरझा रही हैं. भविष्य की चिंता में गांव-देहात से निकले हॉकी खिलाड़ियों के दिल बोझिल हो रहे हैं. 80 और 90 के दशक में जब भारतीय महिला टीम की घोषणा होती थी तो उसमें झारखंड की चार-पांच खिलाड़ी एक साथ शामिल होती थी. पुरुषों और महिलाओं के वर्ग में झारखंड के कई ऐसे चेहरे चमके जिनकी धाक सालों तक खेल के मैदानों में रही. लेकिन गुज़रते वक्त के साथ-साथ ये सब यादें बनती जा रही हैं. चार साल से भारत की राष्ट्रीय पुरुष टीम में झारखंड से एक ही खिलाड़ी है. साल भर से महिला वर्ग में भी यही हालत है. जबकि 2011-12 में भारतीय टीम की कप्तान झारखंड की ही असुंता लकड़ा थीं. उन्होंने दो बार वर्ल्ड कप भी खेले हैं. अभी अंसुता पटियाला में फिटनेस कैंप में शामिल हैं. असुंता बताती हैं गांव प्रखंड ज़िला स्तर पर टूर्नामेंट होने चाहिए. इसकी कमी है. खिलाड़ियों को अच्छे मैदान किट भोजन की भी ज़रूरत है. अब हॉकी फास्ट हो गई है. एस्ट्रोटर्फ़ पर गेंद तेज़ी से भागती है. अभ्यास के साथ मैच बेहद ज़रूरी हैं. जबकि झारखंड में हालात ऐसे हैं कि लड़कियां ऊबड़-खाबड़ मैदान में अभ्यास करती हैं. सुदूर गांव जंगल के युवक-युवतियों का चयन हो भी जाता है तो उन्हें भविष्य की चिंता हमेशा सताती रहती है. अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी सावित्री पूर्ति अभी राष्ट्रीय चयन समिति की सदस्य हैं. वे कहती हैं 80 के दशक में विश्वासी पूर्ति अलमा गुड़िया दयामणि सोय सलोमी भेंगरा सलोमी पूर्ति एसमणि सांगा की जोड़ियां जबरदस्त तरीके से जमती थी. इन खिलाड़ियों को भारतीय टीम में जगह मिलती रही. वो आगे बताती हैं बाद में मसीहा सोरेन एडमिन केरकेट्टा सरीखी खिलाड़ी भी चमकीं. पुरुष वर्ग में भी झारखंड के खिलाड़ियों का परचम लहराता था. लेकिन विमल लकड़ा के बाद पिछले चार साल से कोई खिलाड़ी चोटी पर नहीं पहुंच सका. ये सवाल कई लोगों के मन में उठता है कि आखिर कहां चूक हो रही है क्या कमियां रह गई हैं जो झारखंड की हॉकी हाशिये पर जा रही है मौजूदा हालात से सावित्री भी चिंतित हैं. वे कहती हैं सुविधाएं ठीक ठाक हैं लेकिन कायदे से प्रतिभाओं की तलाश नहीं की जाती. अखबारों में विज्ञापन निकाल दिए जाते हैं कि अमुक दिन खिलाड़ियों का चयन होगा. सुदूर गांवों में हॉकी खेलने वाले बच्चों को इसकी जानकारी नहीं होती. अभाव गरीबी की वजह से खिलाड़ी शहर नहीं पहुंच पाते. बातें यहीं खत्म नहीं होतीं. राष्ट्रीय स्तर की कई महिला खिलाड़ी गुमनामी की ज़िंदगी जी रही हैं. खूंटी के माहिल गांव की नौरी मुंडू मामूली पगार पर स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हैं. नौरी 18 राष्ट्रीय टूर्नामेंट खेल चुकी हैं. उनके पास सर्टिफिकेट की मोटी फाइल हैं. नौकरी की आस में वो सर्टिफिकेट व मेडल दिखती हैं. जसमणि तिरू भी राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुकी हैं. वे खेतों में काम करती हैं. जसमणि ने भी डेढ़ दर्जन राष्ट्रीय टूर्नामेंट खेले हैं. वो कहती हैं हालात से समझौता करना पड़ा. हालात ये हैं कि केंद्र सरकार ने झारखंड में स्थित रांची व गुमला के दोनों एनएसटीसी नेशनल स्पोर्ट्स टैलेंट्स कंटेस्टैंट्स सेंटर भी बंद कर दिए हैं. रांची का बरियातू हॉकी सेंटर सैंट इग्नेशियस स्कूल गुमला सैंट मेरी स्कूल सिमडेगा एसएस स्कूल खूंटी के प्रशिक्षण केंद्र हॉकी की नर्सरी हुआ करते थे. इन जगहों से हमेशा उम्दा खिलाड़ी निकलते थे. अकेले बरियातू प्रशिक्षण केंद्र ने ही देश को 35 से अधिक महिला अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दी हैं. बरियातू प्रशिक्षण केंद्र में अब तक एस्ट्रोटर्फ़ नहीं बिछाया जा सका. खूंटी का एस्ट्रोटर्फ़ मैदान रख-रखाव के अभाव में खराब हो रहा है. खूंटी एस्ट्रोटर्फ़ मैदान के पांच साल हो गए लेकिन यहां कभी कोई राष्ट्रीय स्तर का मैच नहीं हुआ. अभी सिमडेगा स्थित प्रशिक्षण केंद्र में कोई कोच नहीं हैं. वहां के कोच जगन टोपनो को खूंटी प्रशिक्षण केंद्र का कोच बनाया गया है. झारखंड के वरिष्ठ खेल पत्रकार अजय कुकरेती कहते हैं सरकारी हॉकी प्रशिक्षण केंद्रों का यह हाल है कि खिलाड़ियों को समय पर किट नहीं मिलते. गांवों में जाकर प्रतिभाओं की पहचान नहीं की जाती. रांची सिमडेगा खूंटी चाईबासा गुमला लोहरदगा के गांवों में स्कूल स्तर पर खिलाड़ियों को सुविधाएं मिले तो बेहतरीन खिलाड़ी तैयार किए जा सकते हैं. बरियातू सेंटर की नेहा टोप्पो सीनियर वर्ग की राज्य स्तरीय खिलाड़ी हैं. अपने साथी खिलाड़ियों के साथ सुबह छह बजे से वो अभ्यास कर रही हैं. पसीने से तरबतर लेकिन दमखम में कोई कमी नहीं. गोल दागने के साथ ही हुर्रे की आवाज़ें गूंजती हैं. नेहा कहती हैं अभ्यास के लिए कम से कम एस्ट्रोटर्फ़ होना चाहिए. मैदान में खेलने से जूते और हॉकी स्टिक बहुत जल्दी टूटते हैं. एस्ट्रोटर्फ़ पर खेलने का अनुभव अलग होता है. बंदगाव के युवक सुरीन बताते हैं गांवों और स्कूलों में हॉकी खेली जाती है. लेकिन आगे बढ़ने के मौके नहीं मिलते. अभी जूनियर स्तर पर झारखंड की कई महिला खिलाड़ी उभरी हैं. लेकिन इनकी संख्या कम ही है. सीनियर स्तर पर महिला पुरुष खिलाड़ियों का लगातार टोटा पड़ता जा रहा है. बरियातू सेंटर में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहीं बिरसी मुंडू का हाल ही में अंडर 19 में चयन हुआ है. वो कहती हैं झारखंड की लड़कियां विपरीत परिस्थितियों में भी मैदानों में खूब जूझती हैं. लेकिन यह कब तक संभव है लंबे दिनों तक खूंटी के प्रशिक्षक रहे ओलंपियन मनोहर टोपनो को छह महीने पहले मुख्यालय में को-आर्डिनेटर बनाया गया है. वो बताते हैं सुविधाओं की कमी खिलाड़ियों के चमकने में आड़े आ रही है. खिलाड़ी भी जी भर कर मन नहीं लगाते. सच कहूं तो उन्हें मैदान में ही मन लगता है. जबकि उन्हें पंखे गमले गिनने व रिपोर्ट तैयार करने के काम में लगा दिया गया है. पूर्व ओलंपिक खिलाड़ी सिलवानुस डुंगडुंग अभी झारखंड खेल प्राधिकरण के को-ऑर्डिनेटर हैं. वे पहले बरियातू हॉकी प्रशिक्षण केंद्र के कोच थे. झारखंड में हॉकी की बदहाली के सवाल पर सिलवानुस पल भर के लिए खामोश हो जाते हैं और कहते हैं पहले साइकिल स्कूटर मोटरसाइकिल आदि पर प्रशिक्षक खिलाड़ियों का चयन करने गांवों में जाते थे. एक नज़र में प्रतिभाएं पहचान ली जाती थीं. फिर उन्हें गहन अभ्यास से चमकाया जाता था लेकिन अब वो दिन नहीं रहे. झारखंड हॉकी संघ के अध्यक्ष सुदेश महतो कहते हैं कि झारखंड में हॉकी के खोए गौरव को फिर से हासिल करने के लिए कोशिशें की जा रही हैं. इसी मकसद से पिछले दिनों रांची में जूनियर वर्ग की लड़कियों का नैशनल टूर्नामेंट भी कराया गया था. खूंटी के स्थानीय पत्रकार अजय शर्मा बताते हैं तीन महीने के दरम्यां राज्य के मुख्यमंत्री दो बार खूंटी आए. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने वाले खिलाड़ियों को सरकार नौकरी देगी लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ. हॉकी के मैदानों की हालत अच्छी नहीं हैं. गांवों में बच्चे बांस के स्टीक से खेलते हैं. |
| DATE: 2013-12-03 |
| LABEL: sports |
| [667] TITLE: उम्मीदों के उतार-चढ़ाव में झूलतीं साइना और सिंधु |
| CONTENT: चीनी खिलाड़ी को हराने के बाद फाइनल में कदम रखने से पहले मैं आत्मविश्वास से भरी थी और मैं जानती थी कि अगर मैं गलती नहीं करती हूं तो ख़िताब जीत सकती हूं. बीते शनिवार को मकाऊ ओपन ग्रां प्री गोल्ड बैडमिंटन टूर्नामेंट अपने नाम करने वाली भारत की उभरती खिलाड़ी पीवी सिंधु का यह कहना उनके बारे में काफी कुछ बताता है. फाइनल में सिंधु ने कनाडा की मिशेल ली को 21-15 21-15 से मात दी जबकि सेमीफाइनल में उन्होंने चीन की क्वालिफायर किन जिनजिंग को 21-13 18-21 21-19 से हराया था. पीवी सिंधु की क्षमता पर तो शायद ही किसी को कोई शक हो क्योंकि इसी साल वह विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीत चुकी है. ऐसी महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करने वाली वह पहली भारतीय महिला बैडमिंटन खिलाड़ी हैं. इसके बावजूद पीवी सिंधु को अभी विश्व बैडमिंटन में लंबा रास्ता तय करना है. मकाऊ ओपन में उन्हें शीर्ष वरीयता दी गई थी. उन्होंने अपनी वरीयता के साथ न्याय भी किया. इससे पहले सिंधु ने मलेशियन ओपन भी जीता था. मकाऊ ओपन की जीत के बाद सबकी निगाहें सिंधु पर होंगी क्योंकि भारत की एक और बैडमिंटन स्टार खिलाड़ी साइना नेहवाल के सितारे इन दिनों इतने अच्छे नहीं चल रहे हैं. दरअसल साइना नेहवाल ने इस साल कोई भी ख़िताब नहीं जीता है. हालांकि उन्होंने पहली इंडियन बैडमिंटन लीग में बेहद शानदार प्रदर्शन किया था. साइना नेहवाल एक चैंपियन खिलाड़ी की तरह आईबीएल में खेलीं और अपनी फ्रैंचाइज़ी को चैंपियन बनाकर ही दम लिया. आईबीएल में साइना नेहवाल और पीवी सिंधु किसी टूर्नामेंट में पहली बार आमने-सामने थीं. दिल्ली में हुए उस मुक़ाबले में साइना के सामने सिंधु टिक नहीं सकीं और उनका यही हाल दूसरी भिड़ंत में हुआ. आईबीएल के बाद सबको लगने लगा था कि साइना नेहवाल और पीवी सिंधु के दम पर अब भारतीय बैडमिंटन की दुनिया बदलेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मकाऊ ओपन में हालांकि साइना नेहवाल ने भाग नहीं लिया लेकिन इससे पहले वह हॉन्गकॉन्ग ओपन में दूसरे दौर में ही हारकर बाहर हो गईं. सिंधु भी यहां कुछ खास नहीं कर सकीं और पहले ही दौर में हारकर बाहर हो गईं. हांगकांग ओपन से पहले साइना नेहवाल चाइना ओपन के दूसरे ही दौर में हारकर बाहर हो गई थी. इसके अलावा साइना नेहवाल फ्रेंच ओपन सुपर सिरीज़ के दूसरे ही दौर में हारीं तो डेनमार्क ओपन में वह अपना ख़िताब नहीं बचा सकीं. फ्रेंच ओपन में सिंधु दूसरे दौर में हार गईं तो डेनमार्क ओपन में वह पहले ही दौर में बाहर हो गई. जापान ओपन में सिंधु दूसरे दौर में हारकर बाहर हुई तो दूसरी तरफ साइना नेहवाल की नाकामी का सिलसिला नहीं टूटा. सिंगापुर ओपन में साइना नेहवाल तीसरे दौर तक ही पहुंच सकीं. इंडियन ओपन में सिंधु सेमीफाइनल तक पहुंचने में कामयाब रही लेकिन साइना दूसरे ही दौर में हारकर बाहर हो गई. इसी साल सिंधु को एशियन बैडमिंटन चैंपियनशिप में भाग लेने का अवसर मिला लेकिन वहां वह क्वार्टर फाइनल में बाहर हुई. स्विस ओपन में सिंधु दूसरे दौर में हारी तो साइना नेहवाल सेमीफाइनल में. साल 2013 की सबसे प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में से एक ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन चैंपियनशिप में सिंधु दूसरे दौर में हार गई. लेकिन साइना नेहवाल ने बेहद शानदार खेल दिखाते हुए सेमीफाइनल में अपनी जगह बनाई. तब साइना नेहवाल की विश्व रैंकिंग दूसरी थी जबकि सिंधु को रेंकिंग का इंतजार था. फिलहाल साइना नेहवाल विश्व रैंकिंग में छठे स्थान पर है. इसी साल जनवरी में खेले गए मलेशियन ओपन में साइना सेमीफाइनल में हारी तो सिंधु पहले ही दौर में. इससे पहले कोरिया ओपन में सिंधु दूसरे और साइना क्वार्टर फाइनल में हारी. पीवी सिंधु के लिए कामयाबी का रास्ता मलेशियन ओपन ग्रां प्री गोल्ड टूर्नामेंट में खुला जब उन्होंने सिंगापुर की जुआन गु को 21-17 17-21 21-19 से हराकर ख़िताब जीता. कुल मिलाकर आंकड़े यह साबित करते हैं कि पीवी सिंधु और साइना नेहवाल का प्रदर्शन इस साल उन ऊंचाइयों को नहीं छू सका जिसकी उम्मीद थी लेकिन सिंधु अभी सिर्फ 18 साल की हैं इसलिए उनका भविष्य बेहद उज्ज्वल है. साइना नेहवाल भले ही इस साल अधिक कामयाब नहीं रही लेकिन यह भी सच है कि वह कई ख़िताबी जीत के बेहद क़रीब आकर भी हार गईं. सिंधु के लिए कामयाबी का सफर अभी शुरू ही हुआ है तो साइना अपने अनुभव के दम पर अगले साल वैसी वापसी कर सकती है जैसी उनसे उम्मीदें हैं. |
| DATE: 2013-12-03 |
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| [668] TITLE: सचिन की जगह कौन, यह तय नहीं: धोनी |
| CONTENT: भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने कहा है कि सचिन तेंदुलकर की जगह टीम में नंबर चार पर कौन खेलेगा अभी यह तय नहीं है. दक्षिण अफ़्रीका के दौरे पर रवाना होने से पहले मीडिया से बातचीत में धोनी ने कहा हमने अभी यह तय नहीं किया है. कोई किसी की जगह लेने नहीं जा रहा है. वैसे भी हमें इतना समय ही नहीं मिला है कि हम यह तय कर पाएँ. उनका कहना था साथ ही टेस्ट क्रिकेट में हर खिलाड़ी काफ़ी अहम होता है. सलामी बल्लेबाज़ तीसरे या चौथे नंबर का खिलाड़ी-सभी अहम हैं. भारत को इस दौरे पर दो टेस्ट और तीन वनडे मैचों की श्रंखला खेलनी है. धोनी ने कहा कि विदेशी पिच पर सचिन तेंदुलकर के बिना खेलना वैसे ही टीम के लिए बड़ी चुनौती है मगर साथ ही उन्होंने उम्मीद भी जताई कि वनडे सिरीज़ पहले होने से बल्लेबाज़ों को वहाँ के माहौल में ढलने का मौक़ा मिल जाएगा. भारतीय कप्तान का कहना था टीम में से कई खिलाड़ियों का अगर टेस्ट में नहीं तो वनडे में काफ़ी अनुभव है. यह सभी के लिए नई चुनौती और सीखने का मौक़ा है. आप जब भी देश के बाहर खेलते हैं वह चुनौती तो होती ही है. जैसे विकेट के उछाल के अनुसार गेंदबाज़ी करना. यह अच्छी बात है कि पहले वनडे सिरीज़ हो रही है. वैसे तो अंतिम ओवरों में भारतीय गेंदबाज़ों का प्रदर्शन चिंता का विषय रहा है मगर धोनी को दक्षिण अफ़्रीका में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है. धोनी ने कहा तेज़ गेंदबाज़ों को वहाँ गति और उछाल मिलेगी. यॉर्कर के अलावा वे बाउंसर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं और साथ ही गति भी थोड़ी तेज़ होगी. तो हम देखेंगे कि वे कैसा प्रदर्शन करते हैं. उनका कहना था कि इन दोनों टीमों के साथ क्रिकेट प्रशंसकों को अच्छा क्रिकेट देखने को मिलेगा. उनके मुताबिक़ अगर आप रैंकिंग देखें तो दोनों ही टीमें अच्छे पायदान पर हैं. वनडे में हम सबसे ऊपर हैं तो टेस्ट में वे. ये काफ़ी रोमांचक सिरीज़ होने जा रही है. ऐसे में अहम होगा कि वहाँ के माहौल में कैसे जल्दी से जल्दी ढला जाए. |
| DATE: 2013-12-02 |
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| [669] TITLE: सिंधू ने जीता मकाऊ ओपन |
| CONTENT: भारत की उभरती बैडमिंटन खिलाड़ी पी वी सिंधू ने शानदार प्रदर्शन करते हुए मकाऊ ओपन ग्रां प्री गोल्ड टूर्नामेंट का ख़िताब जीत लिया है. शीर्ष वरीयता प्राप्त सिंधू ने रविवार को फ़ाइनल में दुनिया की 30वें नंबर की खिलाड़ी कनाडा की ली मिशेल को 37 मिनट में 21-15 21-12 से शिकस्त दी. विश्व चैंपियनशिप की कांस्य पदक विजेता और अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित सिंधू ने कनाडाई खिलाड़ी के ख़िलाफ़ शुरू से ही अपना दबदबा बनाए रखा और लगातार गेमों में जीत दर्ज की. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ हैदराबाद की 18 साल की सिंधू ने सातवीं सीड खिलाड़ी के ख़िलाफ़ पहले दो मिनट में ही 7-0 की बढ़त बनाई और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. सिंधू ने पहला गेम मात्र 16 मिनट में 21-15 से निपटा दिया. ली ने दूसरे गेम की शुरुआत में जुझारू खेल दिखाया और 5-5 से बराबरी पर आने में सफल रहीं. लेकिन सिंधू ने इसके बाद अपने खेल का स्तर ऊंचा करते हुए 11-6 की बढ़त बनाई और फिर 21-12 से जीत दर्ज करते हुए ख़िताब पर क़ब्ज़ा कर लिया. इस जीत से सिंधू को 9000 डॉलर की इनामी राशि हाथ लगी. सिंधू का इस सत्र में यह दूसरा ख़िताब है. इससे पहले उन्होंने मई में मलेशिया ओपन जीता था. |
| DATE: 2013-12-01 |
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| [670] TITLE: मोंटी पनेसर पर मज़ाक उद्घोषक को पड़ा महंगा |
| CONTENT: एलिस स्प्रिंग में चेयरमैन एकादश और इंग्लैंड के बीच खेले गए अभ्यास मैच में मोंटी पनेसर पर नस्ली टिप्पणी के लिए उद्घोषक डेविड निक्सन को क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने पद से हटा दिया है. मोंटी पनेसर की जड़ें भारत में हैं हालांकि उनका जन्म ल्यूटन में हुआ है. समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़ निक्सन ने मोंटी का नाम एक ख़ास लहज़े में लिया था जो नस्ली टिप्पणी की श्रेणी में आता है. इसके अलावा शुक्रवार को मैच के पहले दिन ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकॉस्टिंग कॉर्पोरेशन एबीसी के प्रोड्यूसर निक्सन ने इंग्लैंड के बल्लेबाज़ जो रूट के आउट होने पर कहा था अब आप जा सकते हैं और एक और ड्रिंक ले सकते हैं. जो रूट वही बल्लेबाज़ हैं जिन्हें बर्मिंघम बार में ऑस्ट्रेलिया के डेविड वॉर्नर ने मुक्का मारा था. वे अपनी पहली पारी के दौरान बार-बार पानी मांग रहे थे. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के प्रवक्ता का कहना है क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया डेविड निक्सन के आचरण की निंदा करता है. लेफ्ट आर्म स्पिनर मोंटी पनेसर 48 टेस्ट मैचों में 164 विकेट चटका चुके हैं. शनिवार को उन्होंने 41 रन देकर तीन विकेट लेकर ये सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि एडीलेड में पांच दिसम्बर से होने वाले दूसरे टेस्ट मैच के लिए टीम में उनका चयन किया जाएगा. वैसे ब्रिस्बेन में इंग्लैंड 381 रनों से हार चुका है जहां दोनों टीमों के खिलाड़ियों के बीच कई बार नोकझोक देखने को मिली थी. |
| DATE: 2013-12-01 |
| LABEL: sports |
| [671] TITLE: दुनिया भर के कबड्डी खिलाड़ियों का महाकुंभ पंजाब में |
| CONTENT: पंजाब में रविवार से चौथी वर्ल्ड कप कबड्डी चैम्पियनशिप शुरू होने जा रही है. सर्कल स्टाइल में खेले जाने वाली इस चैम्पियनशिप में पुरुष और महिला वर्ग में मुक़ाबले खेले जाएंगे. इस चैम्पियनशिप का आयोजन कितने भव्य रूप से होगा इसका अंदाज़ा लगाने के इतना ही काफ़ी है कि इसका बजट कुल मिलाकर 20 करोड़़ रुपये के आस-पास है. पुरुष वर्ग में विजेता टीम को दो करोड़़ रुपये उपविजेता को एक करोड़ और तीसरे नम्बर पर रहने वाली टीम को 51 लाख रुपये का पुरस्कार मिलेगा. महिला वर्ग में विजेता टीम को एक करोड़ रुपये उपविजेता टीम को 51 लाख रुपये और तीसरे स्थान पर रहने वाली टीम को 25 लाख रुपये का पुरस्कार मिलेगा. इस चैम्पियनशिप का मुख्य आकर्षण महिला वर्ग में पाकिस्तान की कबड्डी टीम का भाग लेना है. पाकिस्तान सहित इस वर्ग में मेज़बान भारत के अलावा इंग्लैंड डेनमार्क अमरीका मैक्सिको कीनिया और न्यूज़ीलैंड की टीमें हिस्सा लेगी. पुरुष वर्ग में मेज़बान भारत के अलावा पाकिस्तान ईरान इंग्लैंड स्पेन डेनमार्क स्कॉटलैंड अमरीका कनाडा अर्जेंटीना सिएरा लियोन और कीनिया अपने-अपने दांव आज़माएंगे. इस विश्व कप कबड्डी चैम्पियनशिप के मुक़ाबले पंजाब के विभिन्न हिस्सों में खेले जाएंगे. इनमें भटिंडा लुधियाना पटियाला अमृतसर और जालंधर शामिल है. इस चैम्पियनशिप को डोपिंग से बचाने के विशेष उपाय किए जा रहे है. इसके लिये नाडा यानी नैशनल एंटी डोपिंग एजेंसी समय-समय पर खिलाड़ियों का डोप-टेस्ट करती रहेगी. इस चैम्पियनशिप के उद्घाटन कार्यक्रम को भव्य रूप देने के लिये जानी-मानी सिने तारिका प्रियंका चोपड़ा और समापन समारोह में रणवीर सिंह के कार्यक्रम आयोजित करने की भी योजना है. विश्व कप कबड्डी चैम्पियनशिप का फ़ाइनल 14 दिसंबर को होगा. इस चैम्पियनशिप में शुरुआती मुक़ाबले एक दिसंबर से खेल जाएंगे. शुरूआती मुक़ाबलों में भारत का सामना अमरीका से ईरान का स्पेन से और अर्जेंटीना का सामना कीनिया से होगा. |
| DATE: 2013-11-30 |
| LABEL: sports |
| [672] TITLE: क्या कार्लसन हरा सकते हैं कंप्यूटर को ? |
| CONTENT: नार्वे के मैग्नस कार्लसन चेन्नई में पांच बार के विश्व चैम्पियन भारत के विश्वनाथन आनंद को हराकर शतरंज के नए विश्व चैम्पियन बन गए हैं. कार्लसन की प्रतिभा के आगे आनंद का अनुभव काम नहीं आ सका. लेकिन क्या कार्लसन अपनी इसी प्रतिभा के दम पर वह कारनामा भी कर सकते हैं जिस वर्ष 1997 में शतरंज के बादशाह गैरी कास्परोव करने से चूक गए थे कास्पारोव के बाद सबसे कम उम्र में वर्ल्ड चैम्पियन का खिताब जीतने वाले कार्लसन के लिए यह चुनौती संभवतः आसान नहीं है. दरअसल हम बात कर रहे हैं शह-मात के इस खेल में कृत्रिम बुद्धि आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस के प्रयोग की जिसके सामने तमाम दिग्गज खिलाड़ी धाराशायी होते रहे हैं. कृत्रिम बुद्धि और इंसानी दिमाग के बीच मुकाबला वर्ष 1968 में शुरू हुआ जब डेविड लेवी ने शर्त लगाई कि वर्ष 1978 तक कोई भी कंप्यूटर उनको इस खेल में मात नहीं दे सकेगा और उन्होंने यह शर्त जीत भी ली. पहली शर्त जीतने के बाद उन्होंने दूसरी बार पांच सालों के लिए शर्त लगाई लेकिन इसके बाद उन्होंने शर्त लगाना छोड़ दिया क्योंकि उस वक्त उनको आभास हो गया कि आगे क्या होने वाला है. साल 1997 में दुनिया के सबसे बेहतर शतरंज खिलाड़ी गैरी कास्परोव को एक विवादित सीरीज़ में आईबीएम के कंप्यूटर डीप ब्लू ने हरा दिया था. आज की तारीख़ में विश्व चैम्पियन कार्लसन अगर ऐसी कोई शर्त लगाते हैं तो कृत्रिम बुद्धि के आगे उनको भी नतमस्तक होना पड़ सकता है. जो भी हो लेकिन इस दिशा में कंप्यूटर ने जिस तरह से प्रगति की है उससे कृत्रिम बुद्धि के भविष्य के बारे में सोचने पर मजबूर होना लाज़िमी है. कंप्यूटर के मनुष्य के मस्तिष्क की तरह काम करने के इस कौशल को कृत्रिम बुद्धि नाम देने वाले अमरीकी वैज्ञानिक जॉन मैकार्थी का मानना है कि मशीनों की बुद्धि का परीक्षण करने का यह एक बेहतर तरीका है. मैकार्थी के मुताबिक वर्ष 1962 में बना पहला चेस प्रोग्राम औसत दर्जे का था लेकिन इसके बाद कंप्यूटर वाया कंप्यूटर के बीच के खेल ने वर्ल्ड कंप्यूटर चेस चैंपियनशिप को जन्म दिया. पिछले 40 सालों से प्रोग्रामर्स एक-दूसरे को मात देने की रणनीति बनाने में मशगूल हैं. दरअसल कृत्रिम बुद्धि का मुद्दा केवल चेस तक ही सीमित नहीं है. साल 2007 में यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बर्टा में जोनाथन शेएफर की टीम ने अपने प्रोग्राम के ज़रिए मुकाबले को ड्रा करवाने में सफलता हासिल की. करीब 18 सालों की मेहनत के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि अगर दोनों पक्ष बिल्कुल सटीक चालें चलें तो मुकाबला ड्रा हो सकता है. हाल में कार्लसन-आनंद के बीच हुए मुकाबलों के दौरान एक कमेंटेटर ने कहा यह एक बहुत ही मानवीय चाल है. इसका मतलब यह है कि इंसान गलतियां करता है और ऐसी ही गलत चालों के कारण वह शिकस्त खाता है. इतना ही नहीं ऐसी गलतियां हर क्षेत्र के दिग्गजों से होती है. साल 2006 में पूर्व वर्ल्ड चैम्पियन व्लादिमीर क्रेमनिक ने एक चर्चित गलती की थी. वह अपने प्रतिद्वंद्वी को चेकमेट करना ही भूल गए. लेकिन कंप्यूटर ऐसा नहीं करता. प्रोग्रामर उमर सईद कहते हैं जब डीप ब्लू की जीत हुई तो मुझे कास्पारोव के लिए दुख हुआ. मुझे पता है कि उनके पास कितना असाधारण दिमाग है लेकिन वह एक कंप्यूटर को हराने में सफल नहीं हो पाए. सईद मानते हैं जब आप कंप्यूटर के लिए इस खेल को जटिल बनाते हैं तो इंसान के लिए भी यह कठिन हो जाता है. सईद यह भी कहते हैं कि यदि आप आसान मूवमेंट अपनाते हैं तो इंसान के लिए यह गेम आसान बना रहेगा. वह शर्त लगाते हैं कि कंप्यूटर बेहतरीन खिलाड़ियों को नहीं हरा सकता. खेल के प्रति कंप्यूटर का नज़रिया इंसान से अलग होता है. इंसान सोच सकते हैं कि कोई ख़ास चाल ठीक है या नहीं और इसके बाद वे आगे की चालों के बारे में सोचते हुए दिमाग में इसका परीक्षण करते हैं लेकिन एक कंप्यूटर के खिलाफ वे कुछ नहीं कर सकते. कंप्यूटर एक गलत चाल और उसके बाद की दर्जनों चालों का परीक्षण कर सकता है. सईद का कहना है कि कंप्यूटर इंसान की तरह शतरंज खेलकर नहीं जीत सकता. वह इसलिए जीतता है क्योंकि उसके गणना करने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है. |
| DATE: 2013-11-29 |
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| [673] TITLE: नन्हे फ़ुटबॉलर की होड़ में बड़े क्लब |
| CONTENT: आठ साल के क्लॉडियो नान्सुफिल फुटबॉल के साथ की तुलना मशहूर फुटबॉलर लियोनेल मेसी से हो रही है. दुनिया के तीन बड़े फ़ुटबॉल क्लबों की दिलचस्पी इन दिनों किसी नामी-गिरामी फ़ुटबॉलर नहीं बल्कि एक आठ साल के बच्चे में है. स्पैनिश फ़ुटबॉल क्लब-बार्सीलोना रियाल मैड्रिड और एटलेटिको-तीनों ही आर्जन्टीना के आठ साल के क्लाडियो नान्सुफिल को क्लब में शामिल करने या साइन करने में दिलचस्पी ले रहे हैं. दक्षिणी एंडीज़ पहाड़ों के स्की रिजॉर्ट बारिलोच के फ़ुटबॉल क्लब मार्टिन गुएमेस के लिए खेलने वाले क्लॉडियो को मेसी ऑफ़ द स्नोज़ नाम दिया गया है. क्लॉडियो नान्सुफिल को ये नाम आर्जन्टीना के मशहूर खिलाड़ी और स्पैनिश क्लब बार्सीलोना के लिए खेलने वाले लियोनेल मेसी से शक्ल मिलने और प्रतिभा में समानता की वजह से दिया गया है. स्पेनिश क्लब-बार्सेलोना रियाल मेड्रिड एटलेटिको- ने क्लॉडियो नान्सुफिल में दिलचस्पी दिखाई है. नान्सुफिल को प्रमोट कर रही बार्सीलोना स्थित प्रचार एजेंसी के मैन्युल ओटेरो ने बताया क्रिसमस की छुट्टियों के बाद नान्सुफिल इन तीनों स्पैनिश टीमों को ट्रायल देंगे और फिर हम देखेंगे कि ये तीनों क्या ऑफ़र देते हैं. ख़बरें हैं कि क्लॉडियो में इंग्लिश क्लब-मैनचेस्टर युनाइटिड और चैलसी-की भी दिलचस्पी है. लियोनेल मेसी को बचपन में एक ग्रोथ हारमोन की कमी थी. जब वे 13 साल के थे तब बार्सीलोना फ़ुटबॉल क्लब ने उनके इलाज का ख़र्च उठाने का वादा किया जिसके बाद मेसी ने आर्जन्टीना छोड़ दिया. नान्सुफिल के क्लब के अध्यक्ष के मुताबिक उनके खेलने की तकनीक बहुत विशिष्ट है. क्लॉडियो नान्सुफिल को भी वही बीमारी है जो मेसी को थी. मार्टिन गुएमेस क्लब के अध्यक्ष मार्सेलो एरनाल्ज़ कहते हैं क्लॉडियो की क़द काठी कम है और उनमें भी स्वास्थ्य मुश्किलें हैं जो लियोनेल मेसी को बचपन में थीं. क्लॉडियो को उस बीमारी के लिए हॉरमोन ट्रीटमेंट दिया जा रहा है. साथ ही एरनाल्ज़ को दोंनो खिलाड़ियों के खेलने के तरीक़े में भी समानता दिखती है. वे कहते हैं जैसे ही क्लॉडियो ने चार साल की उम्र में खेलना शुरु किया तकनीक के मामले में वो अपने बाक़ी साथियों से अलग था चाहे वो फ़ुटबॉल किक करना हो रोकना या फिर गोल करना. क्लॉडियो नान्सुफिल की मां विवियाना का कहना था हम उससे पूछते हैं कि तुम ऐसे कैसे करते हो और वो कहता है मुझे नहीं पता. मैं सिर्फ़ सोचता हूं और मेरे पांव ख़ुद ही चलने लगते हैं. |
| DATE: 2013-11-28 |
| LABEL: sports |
| [674] TITLE: वनडे सिरीज़ पर भारत का कब्ज़ा |
| CONTENT: भारत ने वेस्टइंडीज़ को तीसरे और आखिरी वनडे मैच में पांच विकेट से हरा दिया है. भारत के लिए शिखर धवन ने शतक लगाया. भारत को जीत के लिए वेस्टइंडीज़ ने 264 रन का लक्ष्य दिया था जो उसने 23 गेंद रहते हासिल कर लिया. विराट कोहली मैन ऑफ़ द सिरीज़ और शिखर धवन मैन ऑफ़ द मैच चुने गए. शिखर धवन ने 119 रन बनाए. ये धवन के वनडे करियर का पांचवा शतक है और ये पांचों शतक उन्होंने साल 2013 में ही लगाए हैं. लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय टीम की शुरुआत अच्छी नहीं रही. रोहित शर्मा सिर्फ़ चार रन बनाकर आउट हो गए. उन्हें रामपॉल ने आउट किया. रोहित की जगह आए विराट कोहली भी 19 रन बनाकर आउट हो गए. लेकिन फिर शिखर धवन ने युवराज सिंह के साथ लंबी साझेदारी की. दोनों ने मिलकर तीसरे विकेट के लिए 129 रन जोड़े. युवराज सिंह ने 74 गेंदों पर 55 रन बनाए. सुरेश रैना 34 रन बनाकर आउट हुए जबकि महेंद्र सिंह धोनी 23 रन पर नाबाद रहे. इससे पहले ग्रीन पार्क में वेस्टइंडीज़ ने निर्धारित 50 ओवर में पांच विकेट खोकर 263 रन बनाए. मेहमान टीम के लिए सबसे ज़्यादा रन मार्लन सैम्युल्स और किएरन पॉवल ने बनाए. सैम्युल्स ने 71 और पॉवेल ने 70 रन का योगदान दिया. वहीं भारत के लिए आर अश्विन ने दो और भुवनेश्वर कुमार मोहम्मद शामी और रवींद्र जडेजा ने एक-एक विकेट लिए. भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने टॉस जीतकर गेंदबाज़ी करने का फ़ैसला किया. वेस्ट इंडीज़ की शुरुआत अच्छी नहीं रही. 5वें ओवर में भुवनेश्वर कुमार ने सलामी बल्लेबाज़ जॉनसन चार्ल्स को बोल्ड कर दिया. उस वक्त वेस्ट इंडीज़ का स्कोर 20 रन था. इसके बाद किरेन पॉवेल और मार्लन सैम्युल्स ने पारी संभाली. दूसरे वन डे में अर्धशतक जड़ने वाले पॉवेल ने कानपुर में भी बढ़िया प्रदर्शन जारी रखा जबकि पहले दो एकदिवसीय मैचों में कुछ ख़ास नहीं कर पाए सैम्युल्स ने ग्रीन पार्क में बढ़िया पारी खेली. दोनों ने दूसरे विकेट के लिए 114 रन की साझेदारी की. लेकिन फिर आर अश्विन ने पहले पॉवेल और फिर सैम्युल्स को आउट किया. तीसरा विकेट गिरने के वक्त वेस्ट इंडीज़ का स्कोर 168 रन था. लेकिन इसके बाद मेहमान टीम दबाव में आ गई और 28 रनों के अंतराल में उसके दो और विकेट गिर गए. छठे विकेट के लिए डैरन ब्रावो और डैरन सैमी ने 67 रन जोड़े और दोनों आखिर तक आउट नहीं हुए. ब्रावो ने 51 और सैमी ने 31 रन बनाए. भारत ने पहले एकदिवसीय मैच में वेस्टइंडीज़ को कोच्चि में छह विकेट से मात दी. इसके बाद वेस्टइंडीज़ ने दूसरे एकदिवसीय मैच में भारत को विशाखापत्तनम में तीन गेंद शेष रहते दो विकेट से हराया था. |
| DATE: 2013-11-27 |
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| [675] TITLE: सिरीज़ का निर्णायक मैच आज कानपुर में |
| CONTENT: कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम में बुधवार को मेज़बान भारत और वेस्टइंडीज़ के बीच तीन एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों की सिरीज़ का तीसरा और आख़िरी मैच खेल जाएगा. यह मैच इस सिरीज़ का निर्णायक मैच भी है क्योंकि दोनों टीमें एक-एक मैच जीतकर बराबरी पर हैं. भारत ने पहले एकदिवसीय मैच में वेस्टइंडीज़ को कोच्चि में छह विकेट से मात दी. इसके बाद वेस्टइंडीज़ ने दूसरे एकदिवसीय मैच में भारत को विशाखापत्तनम में तीन गेंद शेष रहते दो विकेट से हराया. वेस्टइंडीज़ ने पिछले मैच में जिस संघर्ष क्षमता का परिचय दिया काश ऐसा ही वह इससे पहले भी दे पाती. सचिन तेंदुलकर की विदाई टेस्ट सिरीज़ को दोनों मैच और उसके बाद पहले एकदिवसीय मैच में जैसे टीम अनमने ढंग से खेल रही थी. क्रिस गेल मानो विकेट पर रूकना ही नहीं चाहते थे. और तो और टीम के बाक़ी खिलाड़ियों का भी यही हाल था. लेकिन वनडे टीम का प्रदर्शन थोड़ा सुधरा है. वेस्टइंडीज़ की टीम भीगी बिल्ली की तरह खेल रही थी. कोच्चि वनडे में कैरेबियाई टीम केवल 211 रन बना सकी. केवल डेरेन ब्रावो और विकेटकीपर बल्लेबाज़ जॉनसन चार्ल्स ही कुछ जमकर खेल सके. क्रिस गेल एक मुश्किल रन लेने की कोशिश में रन आउट हो गए और घायल होकर बाक़ी मैचों से भी बाहर हो गए. दूसरे मैच में वेस्टइंडीज़ के गेंदबाज़ों ने भारतीय गेंदबाज़ों को 288 रनों पर रोका और उसके सात बल्लेबाज़ों को आउट किया. इसी के साथ उन्होंने भारतीय टीम की कमज़ोरी को भी जगज़ाहिर कर दिया कि यह टीम किस कदर शुरुआती तीन बल्लेबाज़ों पर निर्भर है. शिखर धवन और रोहित शर्मा के साथ-साथ जब-जब विराट कोहली का बल्ला चलता है टीम बड़ा स्कोर खड़ा करती है. युवराज सिंह और सुरेश रैना पिछले काफी समय से फॉर्म में नहीं है. ऐसे में कप्तान महेंद्र सिंह धोनी पारी को संभाल लेते हैं. धोनी ने तो ख़ैर पिछले मैच में भी 51 रन बनाए लेकिन रविंद्र जडेजा कुछ खास नहीं कर सके. |
| DATE: 2013-11-27 |
| LABEL: sports |
| [676] TITLE: वेटल ने की शूमाकर की बराबरी |
| CONTENT: चार बार के फ़ार्मूला वन विश्व चैंपियन जर्मनी के सेबेस्टियन वेटल ने एक सत्र में लगातार नौ रेस जीतने का नया विश्व रिकॉर्ड बनाया है. रेड बुल के रेसर वेटल ने रविवार को साओ पाउलो में सत्र की अंतिम रेस ब्राज़ीलियन ग्रां प्री जीतकर यह उपलब्धि हासिल की. 26 साल के वेटल एक ही सत्र में लगातार नौ जीत दर्ज करने वाले पहले ड्राइवर बन गए हैं. यह उनके करियर की 39वीं जीत है. इससे पहले लगातार नौ रेस जीतने का रिकॉर्ड इटली के अलबर्टो अस्करी के नाम था जिन्होंने 1952-1953 में दो सत्रों में यह कारनामा किया था. ब्राज़ीलियन ग्रां प्री में वेटल को पोल पोजीशन मिली थी. उनके टीम साथी ऑस्ट्रेलिया के मार्क बेबर दूसरे और फ़ेरारी के फर्नांडो अलोंसो तीसरे स्थान पर रहे. इसके साथ ही वेटल ने एक सत्र में 13 रेस जीतने के हमवतन माइकल शूमाकर के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली है. शूमाकर ने यह रिकॉर्ड साल 2004 में बनाया था. अंतिम बार फ़ार्मूला वन मे हिस्सा ले रहे वेबर ने अंतिम लैप में हेलमेट उतारकर दर्शकों का अभिवादन किया. यह उनके करियर की 215वीं रेस थी. वेटल ने पिछले महीने इंडियन ग्रां प्री में चौथी बार ड्राइवर्स और कंस्ट्रक्टर्स ख़िताब पर कब्जा कर लिया था. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ रेस जीतने के बाद वेटल ने रेडियो पर अपनी टीम से कहा दोस्तों मुझे आप पर गर्व है. मैं आपको प्यार करता हूं. इसे याद रखें. इस क्षण का आनंद उठाएं. हमने यह कर दिखाया है. यह अविश्वसनीय है. उन्होंने कहाशुक्रिया वेबर हमारे संबंध अच्छे नहीं हैं. लेकिन हमारे मन में एक दूसरे के प्रति बहुत सम्मान है और हम टीम के लिए सफल जोड़ी बन गए हैं. |
| DATE: 2013-11-25 |
| LABEL: sports |
| [677] TITLE: गाँव की पिच जिसने दी मोहम्मद शामी को रफ़्तार |
| CONTENT: दिल्ली से यूपी को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-24 पर क़रीब 130 किलोमीटर चलने के बाद बुढ़नपुर क़स्बा आता है. यहीं से घुमावदार सड़क सहसपुर अलगीनगर गाँव जाती है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले के इसी गाँव में किसान परिवार में पैदा हुए मोहम्मद शामी ने टीम इंडिया के तेज़ गेंदबाज़ के रूप में पहचान बनाई है. शामी के अब्बा तौसीफ़ अहमद आज जब उन्हें टीवी स्क्रीन पर विकेट लेकर उछलते देखते हैं तो उनकी आँखों में आँसू आ जाते हैं. शामी को प्यार से सिम्मी कहा जाता है. सिम्मी बचपन से क्रिकेट के शौकीन रहे हैं. उनके अब्बा बताते हैं उसे जहाँ जगह मिलती वहीं गेंदबाज़ी करने लगता. घर के आँगन में छत पर बाहर खाली पड़ी जगह में. 22 गज़ से लंबी हर जगह उसके लिए पिच होती. शामी की रफ़्तार ने बहुत कम उम्र में ही उन्हें आसपास के गाँवों में लोकप्रिय बना दिया. वह स्थानीय क्रिकेट टूर्नामेंटों का आकर्षण होते. शामी खेलने जाते और उनके अब्बा देखने. गाँव में उनके घर के पीछे क़ब्रिस्तान है और इसी क़ब्रिस्तान की खाली ज़मीन शामी के लिए पहला मैदान बनी. शामी ने यहीं पिच बनाई और गेंदबाज़ी का अभ्यास करने लगे. बचपन में शामी टेनिस बॉल से क्रिकेट खेलते थे. टेनिस की गेंद से भी उनकी रफ़्तार बल्लेबाज़ों में ख़ौफ़ पैदा कर देती. शामी के साथ स्थानीय टूर्नामेंटों में खेलने वाले खिलाड़ी मोहसीन कहते हैं रफ़्तार ही उसका सबसे बड़ा हथियार थी. वह गेंदबाज़ी में पूरी ताक़त लगा देता था. यही वजह थी कि ज़्यादातर बल्लेबाज़ उसके ख़िलाफ़ आक्रामक नहीं खेलते थे. शामी अब औसतन 140 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से गेंदबाज़ी करते हैं. बेटे की रफ़्तार देखकर तौसीफ़ अहमद ने शामी को अभ्यास के लिए मुरादाबाद के सोनकपुर स्टेडियम भेजा जहां पहली बार शामी को हरी घास का मैदान मिला. कोच बदर अहमद भी उनकी रफ़्तार से प्रभावित हुए. उनके कहने पर शामी ने उत्तर प्रदेश में ट्रायल दिए लेकिन चयनित नहीं हुए. यूपी में मौक़े कम थे. कोच की सलाह पर उन्हें कोलकाता में क्लब क्रिकेट खेलने के लिए भेज दिया गया. यहाँ शामी ने क्रिकेट का सही प्रशिक्षण लिया. शामी कोलकाता से जब गाँव आते तो उन्हें प्रैक्टिस के लिए पिच नहीं मिलती. अभ्यास के लिए उन्होंने गाँव में खाली पड़ी अपनी ज़मीन पर सीमेंट से पिच बनाई. गोबर के उपलों और घूड़ी के बीच शामी प्रैक्टिस करते. सीमेंट की पिच पर उनकी रफ़्तार और भी बढ़ गई. अब समस्या यह पैदा हुई कि किसके साथ खेलकर अभ्यास किया जाएउन्होंने अपने छोटे भाई मोहम्मद कैफ़ को गेंदबाज़ी की. उनकी रफ़्तार के मुक़ाबले का नतीजा यह हुआ कि कैफ़ ने एक क्रिकेटर के बतौर स्थानीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना ली है. जब हम उनके घर पहुँचे तो कैफ़ अलीगढ़ में क्रिकेट टूर्नामेंट में हिस्सा लेने गए थे. वह भी बंगाल की ओर से ही क्रिकेट खेल रहे हैं ट्रायल दे रहे हैं. शामी इस समय वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ खेली जा रही वनडे सिरीज़ खेल रहे हैं. कई साल गुज़रने के बाद भी सीमेंट की बनाई उनकी पिच बरक़रार है. अब उनके गाँव के बच्चे इसी पिच पर क्रिकेट खेलते हैं. शामी के अब्बा तौसीफ़ अहमद कहते हैं शामी ने अकेले इस पिच पर पसीना बहाया है. कभी-कभी तो कोई भी नहीं होता था और वह अकेला ही गेंदबाज़ी करता रहता. पीछे काँटों में गेंद चली जाती तो निकालने के लिए जद्दोजहद करता. उसने पिच के पास पथे गोबर को नहीं देखा घूड़ के ढेर भी नहीं देखे. बस अभ्यास करता रहा. उसी मेहनत का नतीजा है कि वह आज टीम इंडिया के लिए खेल रहा है. बच्चों को खेलता देखकर तौसीफ़ अहमद कहते हैं शामी अपने जुनून के बल पर टीम इंडिया में पहुँचा है. हो सकता है इनमें से कोई बच्चा कल अपने जुनून के दम पर दुनिया में नाम करे. ज़रूरत बस एक मौक़े की है. शामी को वह मौक़ा बंगाल ने दिया. हो सकता है इन्हें यूपी में ही मौक़ा मिल जाए. हालाँकि शामी के अब्बा चाहते हैं कि अमरोहा में कम से कम एक छोटा स्टेडियम बने जिससे इलाक़े के अन्य बच्चों को अभ्यास करने के लिए समझौता न करने पड़े. राहुल द्रविड़ ने एक बार कहा था कि भारतीय क्रिकेट टीम की अगली पीढ़ी के खिलाड़ी छोटे शहरों और कस्बों से आएंगे. गाँव के क़ब्रिस्तान की खाली ज़मीन पर बनी पिच से लेकर टीम इंडिया तक के मोहम्मद शामी के सफर ने द्रविड़ के इस बयान को सही साबित कर दिया है. शामी के अब्बा के शब्दों में कहें तो उनकी कामयाबी साबित करती है कि जुनून को अगर सही दिशा मिल जाए तो कुछ भी पाया जा सकता है. |
| DATE: 2013-11-25 |
| LABEL: sports |
| [678] TITLE: 22 साल के कार्लसन विश्व शतरंज के नए बादशाह |
| CONTENT: नार्वे के मैग्नस कार्लसन अब शतरंज के नए विश्व चैंपियन हैं. चेन्नई में उन्होंने पांच बार के विश्व चैंपियन भारत के विश्वनाथन आनंद से यह ख़िताब छीन लिया है. कार्लसन ने शुक्रवार को खेली गई दसवीं बाज़ी में विश्वनाथन आनंद को ड्रॉ खेलने के लिए मजबूर किया और इसी के साथ चैंपियन बनने के ज़रूरी आधा अंक भी हासिल कर लिया. इस चैंपियनशिप में कार्लसन के साढ़े छह और आनंद के कुल साढ़े तीन अंक रहे. विश्व शतरंज चैंपियनशिप के शुरू होने से पहले ही शतरंज के जानकारों का मानना था कि पलड़ा कार्लसन का ही भारी है. लेकिन 22 साल की उम्र में शतरंज के बादशाह बनने वाले कार्लसन के मुकाबले शतरंज के जानकारों ने आनंद को भी बहुत कम नहीं आंका था. उनके अनुसार लड़ाई 19-20 की ही थी. लेकिन चेन्नई में विश्वनाथन आनंद के मज़बूत क़िले में कार्लसन ने ऐसी सेंध लगाई कि चैंपियन बनकर ही दम लिया. इसके साथ ही उन्होंने दिखा दिया कि वह यूँ ही दुनिया के नम्बर एक शतरंज खिलाड़ी नहीं है. चैंपियनशिप में कार्लसन के दबदबे का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने चेन्नई में एक भी बाज़ी नहीं गँवाई है. उनका चैंपियन बनने की अटकलें तभी तेज़ हो गईं थीं जब उन्होंने आनंद को पांचवीं और छठी बाज़ी में मात देकर 4-2 की बढ़त हासिल कर ली. आनंद की रही सही उम्मीदों को उन्होने नौवीं बाज़ी भी अपने नाम कर तोड़ दी और उसके बाद तो जैसे महज़ औपचारिकता बाकी रह गई थी. महज़ 22 साल की छोटी उम्र में यह कारनामा करने वाले कार्लसन गैरी कास्पारोव के बाद दूसरे खिलाड़ी हैं. इस तरह के बडे मुक़ाबलों में वापसी करने में माहिर माने जाने वाले और साल 2000 2007 2008 2010 और 2012 के विश्व चैंपियन आनंद को कार्लसन ने बर्लिन डिफेंस के चक्रव्यूह में ऐसा फंसाया कि उसे तोड़ना तो बहुत दूर वह उससे निकल ही नहीं सके. जाने-माने खेल पत्रकार और शतरंज विश्लेषक वी कृष्णास्वामी कार्लसन की जीत के पांच कारण गिनाते हैं. उनके अनुसार सबसे बड़ा कारण तो यह है कि आनंद की उम्र अब 44 साल हो चुकी है. कार्लसन 30 नवंबर को 23 साल के होंगे. युवा शक्ति कार्लसन का हथियार बनी. दूसरा कारण आनंद का शुरूआती चालों में नाकाम होना जो उनका सबसे बड़ी ताक़त थी. कार्लसन ने उन्हें शुरआती बढ़त लेने का मौक़ा ही नहीं दिया. तीसरा कारण कार्लसन का अंतिम चालों में बेहद मज़बूत होना रहा. अंतिम लम्हो में कार्लसन का बोर्ड पर नियत्रंण ज़बरदस्त होता है. उन्होंने कम से कम दो बार आनंद को अंतिम समय में ही मात दी. चौथा कारण साफ दिखा कि अब शायद दबाव या उम्मीदों का भार सहना आनंद के लिए मुश्किल होता जा रहा है. पांचवां कारण विशाल अनुभव होने के बावजूद आनंद ने ऐसी-ऐसी ग़लतियां की जिसका लाभ कार्लसन को मिला. उदाहरण के लिए नौवें गेम में जहां ड्रा होने की पूरी संभावनाएं थी वहां उन्होंने अपनी 28वीं चाल में भयंकर भूल की जिसके कारण वे हार गए और इसके साथ ही कार्लसन की जीत की पटकथा भी तैयार हो गई. कार्लसन की ख़ासियतों का ज़िक्र करते हुए कृष्णास्वामी कहते हैं कि मिडिल गेम पर उनकी पकड़ बेहद मज़बूत है. पिछले चार-पांच वर्षों में इसी की बदौलत वह इतने बड़े खिलाड़ी होकर उभरे हैं. मिडिल गेम के बाद जब धीरे-धीरे सारे मोहरे एक-दूसरे के साथ कटकर बाहर हो जाते हैं तब जब किंगपॉन एंडिग आता है उसमें कार्लसन हमेशा अपने प्रतिद्वंद्वी को चकमा दे देते हैं. ऐसा ही हमें आनंद के ख़िलाफ पहले तो छठे और उसके बाद नौवें गेम में देखने को मिला. इस हार के बावजूद भारत के शतरंज इतिहास में विश्वनाथन आनंद के योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता. इतने लम्बे समय तक शतरंज की बादशाहत बनाए रखने के बाद ताज खोने से भारत की शतरंज दुनिया में एक खालीपन तो ज़रूर पैदा होगा. अब इसे इत्तेफाक़ कहें या कुछ और कि पिछले हफ्ते 24 साल अंतराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने के बाद सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट को अलविदा कहा और इस हफ्ते कार्लसन ने आनंद के दबदबे का अंत किया. इसके बावजूद आनंद अभी अपने शतरंज करियर को अलविदा नहीं कह रहे हैं. वह दिसंबर में लंदन में एक टूर्नामेंट खेलेंगे और उसके बाद अगले साल अप्रैल-मई में ज़्यूरिख़ में एक बडा टूर्नामेंट खेलने की तैयारी करेंगे. |
| DATE: 2013-11-22 |
| LABEL: sports |
| [679] TITLE: आनंद को हराकर कार्लसन नए विश्व चैम्पियन |
| CONTENT: नॉर्वे के मैग्नस कार्लसन ने भारत के विश्वनाथन आनंद को हराकर विश्व शतरंज चैम्पियनशिप का ख़िताब अपने नाम कर लिया है. कार्लसन को ख़िताब जीतने के लिए 10वीं बाज़ी सिर्फ़ ड्रॉ करनी थी. पाँच बार के विश्व चैम्पियन विश्वनाथन आनंद 10 बाज़ियों में से एक भी बाज़ी नहीं जीत पाए और कार्लसन ने उन्हें 6-3 से मात दी. चेन्नई में हुई विश्व चैंपियनशिप की नौवीं बाजी में भी आनंद को हार का सामना करना पड़ा था. जिसके बाद से ही ये माना जाने लगा था कि कार्लसन ख़िताब जीत जाएँगे. 12 बाजियों के इस टूर्नामेंट में आनंद तीन बार हारे. दोनों खिलाड़ियों के बीच पहली चार बाजियां ड्रा रही थी जबकि पांचवीं और छठी बाजी आनंद हार गए थे. फिर सातवीं और आठवीं बाजी ड्रा रही थी. नौवीं बाज़ी में आनंद हार गए और 10वीं बाजी ड्रॉ करके कार्लसन ने ख़िताब अपने नाम किया. |
| DATE: 2013-11-22 |
| LABEL: sports |
| [680] TITLE: ख़तरे में आनंद की बादशाहत |
| CONTENT: पांच बार के विश्व शतरंज चैंपियन भारत के विश्वनाथन आनंद की बादशाहत ख़तरे में है. आनंद को चेन्नई में चल रही विश्व चैंपियनशिप की नौवीं बाजी में गुरुवार दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी नॉर्वे के मैग्नस कार्लसन के ख़िलाफ़ हार का सामना करना पड़ा. 12 बाजियों के इस टूर्नामेंट में आनंद की यह तीसरी हार है. नौवीं बाजी के बाद कार्लसन के अब छह अंक हो गए हैं और ख़िताब पर क़ब्ज़ा करने के लिए उन्हें सिर्फ आधा अंक की ज़रूरत है. कार्लसन दसवीं बाजी में शुक्रवार को सफेद मोहरों से खेलेंगे और उनके पास दो बाजियां शेष रहते ख़िताब क़ब्ज़ाने का मौक़ा रहेगा. काले मोहरों से खेल रहे 23 साल के कार्लसन ने उनसे उम्र में क़रीब 20 साल बड़े आनंद को 28 चालों में घुटने टेकने पर मज़बूर कर दिया. काले मोहरों से खेल रहे कार्लसन ने निम्ज़ो इंडियन डिफेंस का सहारा लिया. आनंद ने इसे अच्छी तरह भांपते हुए सेमिक वेरिएशन अपनाया. आनंद पहले भी इसका सहारा ले चुके हैं. उन्होंने क्रैमनिक के ख़िलाफ़ विश्व चैंपियनशिप और फिर वांग हाओ के ख़िलाफ़ बाजी में इसे अपनाया था. कार्लसन बीच में कुछ नर्वस दिखे. आनंद ने 22वीं चाल चलने में कार्लसन से 25 मिनट ज़्यादा लिए. आनंद ने फिर अगली चाल चलने में 40 मिनट का समय लिया और ड्रा खेलने के बजाए खेलने का फ़ैसला किया. लेकिन कार्लसन ने 28 चालों में उन्हें मात दे दी. दोनों खिलाड़ियों के बीच पहली चार बाजियां ड्रा रही थी जबकि पांचवीं और छठी बाजी आनंद हार गए थे. फिर सातवीं और आठवीं बाजी ड्रा रही थी. |
| DATE: 2013-11-22 |
| LABEL: sports |
| [681] TITLE: वनडे का घमासान शुरू: कोच्चि में पहला मैच |
| CONTENT: पिछले दिनों पूरा क्रिकेट जगत सचिनमय था. अब दो टेस्ट मैचों की संक्षिप्त लेकिन एक बेहद महत्वपूर्ण सिरीज़ के बाद भारत और वेस्टइंडीज़ तीन एकदिवसीय मैचों की सिरीज़ में खेलने के लिए तैयार हैं. भारत और वेस्टइंडीज़ के बीच पहला एकदिवसीय मैच गुरुवार को कोच्चि में खेला जाएगा. वेस्टइंडीज़ की टीम ने दोनों टेस्ट मैचों में क्रिकेट प्रेमियों को बेहद निराश किया. क्रिस गेल शिवनारायण चंद्रपाल डेरेन सैमी और मर्लोन सैमुअल्स जैसे बल्लेबाज़ मानो विकेट पर टिकना ही नहीं चाहते थे तो गेंदबाज़ी में भी कोई दम नहीं था. अब एकदिवसीय टीम में कुछ परिवर्तन किए गए हैं. टीम की कमान ड्वेन ब्रावो संभालेंगे. वीरासामी पेरमल और नरसिंह देवनारायण की टीम में वापसी हुई है. इसके अलावा वेस्टइंडीज़ के जादुई स्पिनर सुनील नारायण और तेज़ गेंदबाज़ रवि रामपाल भी अपना जलवा दिखाएंगे. डेरेन ब्रावो डेरेन सैमी क्रिस गेल जैसन होल्डर और कीरेन पावेल तो एकदिवसीय क्रिकेट के माहिर हैं ही. इससे पहले वेस्टइंडीज़ को बड़ा झटका तब लगा जब केमार रोच और कीरोन पोलार्ड चोट के कारण एकदिवसीय सिरीज़ से बाहर हो गए. अब अगर भारतीय क्रिकेट टीम की बात करें तो पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया से सात मैचों की सिरीज़ को 3-2 से जीतने के बाद उसके हौसले बुलंद हैं. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ खराब गेंदबाज़ी का ख़ामियाज़ा ईशांत शर्मा को भुगतना पड़ा और चयनकर्ताओं ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. बाहर का रास्ता तो आर विनय कुमार को भी दिखाया गया था लेकिन उनकी जगह टीम में शामिल किए गए धवल कुलकर्णी चोट के कारण खेलने से पहले ही बाहर हो गए नतीजतन विनय कुमार की एक बार फिर टीम में वापसी हो गई. ईशांत शर्मा की जगह टीम में हरियाणा के तेज़ गेंदबाज़ मोहित शर्मा को शामिल किया गया है. भारतीय टीम शानदार फॉर्म में चल रहे रोहित शर्मा विराट कोहली शिखर धवन और कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के दम पर बल्लेबाज़ी में बेहद मज़बूत है. पिछले दिनों उसने ऑस्ट्रेलिया जैसी शानदार टीम के खिलाफ जिस तरह से 350 से अधिक रनों के लक्ष्य का सफलतापूर्वक पीछा किया उससे वेस्टइंडीज़ के गेंदबाज़ों की नींद यकीनन पहले से ही उड़ी हुई होगी. इसके बावजूद सुनील नारायण और रवि रामपाल ऐसे गेंदबाज़ हैं जिन्होंने इससे पहले भी भारतीय बल्लेबाज़ों को काफी परेशान किया है. इन दिनों जिस तरह के विकेट एकदिवसीय क्रिकेट में दिए जा रहे हैं उसे देखते हुए उभरते हुए तेज़ गेंदबाज़ भुवनेश्वर कुमार और मोहम्मद शमी पर थोड़ा भरोसा किया जा सकता है. वेस्टइंडीज़ की टीम भले ही हाल ही में खेले गए दोनों टेस्ट तीन-तीन दिन में हार गई लेकिन एकदिवसीय क्रिकेट उन्हें रास आता है. इन दिनों क्रिकेट के नए नियम भी बल्लेबाज़ों को फायदा पहुंचाते है. ऐसे में भारतीय गेंदबाज़ों को क्रिस गेल के बल्ले की मार से बचना होगा साथ ही गेंदबाज़ी में सुनील नारायण की जादुई फिरकी से बचना होगा. अब अगर टवेंटी-टवेंटी का इतना अधिक असर क्रिकेट खिलाड़ियों पर है तो ऐसे में यह सिरीज़ भी बल्लेबाज़ों के नाम रहे तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए. |
| DATE: 2013-11-21 |
| LABEL: sports |
| [682] TITLE: 'सचिन का मुरीद हूँ, लेकिन पृथ्वी बनना चाहता हूँ' |
| CONTENT: कुछ दिन पहले ही सचिन तेंदुलकर के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद ये सवाल उठने लगे हैं कि सचिन की विरासत कौन संभालेगाक्या सचिन जैसा दूसरा खिलाड़ी आ पाएगा ये सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब इतने आसान नहीं. क्योंकि सचिन जैसा खिलाड़ी एक दिन में नहीं बनता. वर्षों की साधना और क्रिकेट के मैदान पर प्रतिभा दिखाने के बाद कोई सचिन बनता है. मगर भारत में घरेलू स्तर पर कई खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है. आगे चलकर उन्हें सचिन जैसा मौक़ा और सुविधा मिल पाएगी या नहीं ये बहस का विषय हो सकता है. लेकिन सचिन के रिटायरमेंट के कुछ ही दिन बाद हैरिस शील्ड प्रतियोगिता में रिकॉर्डतोड़ 546 रन बनाकर 15 साल के पृथ्वी शॉ ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है. रिज़वी स्प्रिंगफ़ील्ड के कप्तान पृथ्वी शॉ ने सेंट फ़्रांसिस डी असीसी के ख़िलाफ़ 330 गेंदों पर 546 रन बनाकर अरमान जाफ़र के 498 रनों का रिकॉर्ड तोड़ दिया. बीबीसी हिंदी के साथ विशेष बातचीत में पृथ्वी ने कहा कि उन्हें इसका अंदाज़ा नहीं था कि वे विश्व रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं. उन्होंने कहा मेरे लिए अच्छा मौक़ा था और विकेट भी काफ़ी अच्छा था. मैं संयम से खेल रहा था. मुझे मेरे कोच ने कहा था कि सिंगल्स पर ध्यान दो और मैंने वैसा ही किया. हालाँकि अपनी पारी में पृथ्वी ने 85 चौके और पाँच छक्के लगाए. पृथ्वी के आदर्श भी सचिन तेंदुलकर हैं. वे मानते हैं कि सचिन से उन्होंने काफ़ी कुछ सीखा है. उन्होंने कहा मैं भारत के लिए क्रिकेट खेलना चाहता हूँ लेकिन अभी सोचा नहीं है कुछ. क्योंकि अभी यह मेरी शुरुआत है. मैं अभी काफ़ी छोटा हूँ और मुझे आगे अभी बहुत खेलना है. पृथ्वी की प्रतिभा पहचानने वाले कुछ लोगों में इंग्लैंड के काउंटी क्रिकेटर रहे जुलियन वुड भी हैं जिन्होंने पृथ्वी को क्रिकेट खेलने के लिए इंग्लैंड भी बुलाया. बीबीसी के साथ बातचीत में पृथ्वी ने स्वीकार किया कि इंग्लैंड में क्रिकेट खेलने का उनका अनुभव काफ़ी अच्छा रहा था. उन्होंने कहा वो एक अलग दुनिया थी. मेरा वहाँ का अनुभव बहुत अच्छा था. लेकिन भारत में भी उभरते हुए क्रिकेटरों के लिए अच्छी सुविधा है. भारत ने इस मोर्चे पर काफ़ी सुधार किया है. पृथ्वी सचिन के ज़बरदस्त प्रशंसक हैं. वे कहते हैं कि सचिन की ईमानदारी और नम्रता से वे काफ़ी प्रभावित हैं लेकिन वे ख़ुद पृथ्वी बनना चाहते हैं. अपनी बल्लेबाज़ी की शैली के बारे में पृथ्वी कहते हैं कि वे टीम की ज़रूरत के हिसाब से खेलते हैं. पृथ्वी के पिता पंकज शॉ अपने बेटे के प्रदर्शन से गदगद हैं. वे चाहते हैं कि उनका बेटा अच्छा खेलता रहे. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा पृथ्वी ने पाँच साल की उम्र से ही क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था. हमने शुरू से ही उसे हरसंभव सुविधा प्रदान की. उन्होंने स्वीकार किया कि हैरिसशील्ड में विश्व रिकॉर्ड बनाने के बाद वे मीडिया की सुर्ख़ियों में आ गए हैं लेकिन इससे उन पर दबाव नहीं होगा बल्कि उनके बेटे को अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास होगा. पृथ्वी के पिता रेडीमेड गारमेंट्स के सेल्समैन हैं और अपने बेटे को लेकर उनके काफ़ी अरमान हैं. वे चाहते हैं कि नौवीं क्लास में पढ़ रहा उनका बेटा क्रिकेट के साथ-साथ पढ़ाई में भी अच्छा करे. |
| DATE: 2013-11-20 |
| LABEL: sports |
| [683] TITLE: नहीं चल पाई ऑनलाइन शतरंज की बाज़ी |
| CONTENT: विश्व चैंपियनशिप से जुड़े लाखों प्रशंसकों की वजह से शतरंज पिछले कई सालों में अपनी लोकप्रियता के शिखर पर है. लेकिन इस लोकप्रियता को भुनाने के इरादे से शुरू किए गए नार्वे बनाम शेष विश्व के बीच एक ऑनलाइन मुक़ाबले को इंटरनेट पर हुई छेड़छाड़ की वजह से बीच में ही रोक देना पड़ा. इस मुकाबले का आयोजन किया था नार्वे के अख़बार ऐफ़्टेनपोस्टेन ने. इस अख़बार के प्रबंध संपादक किआइटल कोलसर्ड को लगता है कि नार्वे और शेष विश्व के बीच होने वाला ऑनलाइन मैच लोगों का ध्यान आकर्षित करेगा और कुछ हद तक यह मजेदार भी होगा. लेकिन वैसा नहीं जैसा अब हो गया है. कोलसर्ड कहते हैं कि चैट रूम के शरारती लोगों से भर जाने में बहुत अधिक समय नहीं लगा. इस ऑनलाइन मैच में नार्वे और शेष दुनिया के लोगों को एक चाल चुनने के लिए एक घंटे का समय दिया गया था. हर घंटे बाद सबसे मशहूर रहने वाली चाल को चला जाना था. इस मुकाबले में नार्वे का आईपी एड्रेस रखने वाला हर व्यक्ति नार्वे की टीम के लिए और नार्वे के बाहर का आईपी एड्रेस रखने वाला व्यक्ति शेष दुनिया की टीम के लिए खेल सकता था. यह ऑनलाइन मैच चेन्नई में विश्वनाथन आनंद और नार्वे के मैग्नस कार्लसन के बीच होने वाले विश्व चैंपियनशिप मैच के साथ-साथ होना था. यह मैच सोमवार को नार्वे के समय के मुताबिक़ सुबह दस बजे शुरू हो गया. इसके अगले चार दिन तक चलने की उम्मीद की जा रही थी. हैशटैग एपीएसजेएकेक का इस्तेमाल कर नार्वे के लोग इसे ट्विटर पर बढ़ावा दे रहे थे. शेष दुनिया के लोग इसके लिए हैशटैग एपीसीएचईएसएस का इस्तेमाल कर रहे थे. लेकिन खेल शुरू होने के कुछ देर बाद ही ऑफ़्टेनपोस्टेन की टीम ने शेष दुनिया के लोगों को संदेहास्पद चालें चलते हुए देखा. इसके 12 घंटे बाद उन्होंने दुरुपयोग का हवाला देते हुए खेल को पूरी तरह बंद कर दिया. कोलसर्ड कहते हैं कि इसे एक विशिष्ट ऑनलाइन फ़ोरम ने भड़काने का काम किया जिसे अब हटा दिया गया है. ट्विटर पर लिखे संदेशों में कहा गया है कि नार्वे के लोगों ने प्राक्सी सर्वर का उपयोग कर विपक्षी टीम की ओर से जान-बूझकर ग़लत चालें चलीं. इस पर यह कहा गया कि जिन खातों से ये ट्विट किए गए वो इसके पहले बहुत कम प्रयोग किए गए थे. इसलिए कहा जा रहा है कि वे असली खाते नहीं हो सकते हैं. इसके लिए असंतुष्ट भारतीय प्रशंसकों पर भी आरोप लगाया जा सकता है जो कि विश्व चैंपियनशिप में विश्वनाथन आनंद के पीछे रहने से इसे बंद कराना चाहते हों. इस तरह का खेल आम बात है गैरी कॉस्परोव भी शेष दुनिया की टीम के साथ खेलकर जीत चुके हैं. लेकिन इस तरह की छेड़छाड़ एकदम नई है. विश्व चैंपियनशिप में कमेंट्री कर रहे चार अधिकारियों में से एक और दुनिया की पहली महिला ग्रैड मास्टर सुसान पोलगर कहती हैं खेल को प्रोत्साहित करने के लिए इस तरह के मैच बेहतरीन तरीका हैं. आमतौर पर ये बहुत सफल भी हुए हैं. |
| DATE: 2013-11-20 |
| LABEL: sports |
| [684] TITLE: सैम्युअल-शिलिंगफोर्ड की गेंदबाज़ी संदेह के घेरे में |
| CONTENT: भारत के ख़िलाफ़ दूसरे टैस्ट मैच में अपनी गेंदबाज़ी के तरी़क़े की वजह से वेस्टइंडीज़ के दो गेंदबाज़ मार्लोन सैम्युअल और शेन शिलिंगफ़ोर्ड संदेह के घेरे में आ गए हैं. मुंबई में दूसरे दिन के मैच के दौरान शुक्रवार को फ़ील्ड और टीवी एम्पायरों को इन दोनों गेंदबाज़ों का गेंद करने का तरीक़ा संदिग्ध प्रतीत हुआ. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद आईसीसी की ओर से जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि शनिवार को टैस्ट मैच ख़त्म होने के बाद वेस्टइंडीज़ टीम के प्रबंधक को इस सिलसिले में अम्पायर्स रिपोर्ट सौंपी गई है. इस रिपोर्ट में सैम्युअल और शिलिंगफ़ोर्ड की गेंदबाज़ी के तरीक़े पर चिंता जताई गई है और दोनों ही गेंदबाज़ों को अब 21 दिन के भीतर अपनी गेंदबाज़ी की जांच करानी होगी. इस जांच के अगले 14 दिन के भीतर जांच रिपोर्ट आईसीसी के पास जमा करानी होती है. ग़लत तरीक़े से गेंदबाज़ी करने के दोषी पाए जाने पर ये खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मैचों में गेंदबाज़ी नहीं कर पाएंगे. ये पहला अवसर नहीं है जब सैम्युअल और शिलिंगफोर्ड की गेंदबाज़ी संदेह के घेरे में आई है. इससे पहले भी दोनों को ग़लत गेंदबाज़ी की वजह से मैदान से बाहर किया जा चुका है. लेकिन सुधार की बात कहकर ये गेंदबाज़ के तौर पर दोबारा टीम में जगह बनाने में क़ामयाब हो गए थे. |
| DATE: 2013-11-17 |
| LABEL: sports |
| [685] TITLE: कार्लसन के झांसे में आनंद ने गंवाई बाज़ी |
| CONTENT: चैन्नई में विश्व शतरंज चैम्पियनशिप में सफ़ेद मोहरों से खेल रहे भारत के विश्वनाथन आनंद को नॉर्वे के मैग्नस कार्लसन के हाथों छठी बाज़ी में शनिवार को एक बार फिर हार का सामना करना पड़ा है. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि पांचवी बाज़ी में शिक़स्त के बाद विश्वनाथन आनंद इस बार वापसी के लिए तैयार हैं लेकिन कार्लसन ने एक बार फिर अपने मोहरे ऐसे बिछाए कि आनंद की एक नहीं चली और उन्हें हार माननी पड़ी. विश्व चैम्पियन आनंद के लिए इस मैच में अब करो या मरो की स्थिति होगी और दोनों खिलाड़ियों के बीच अगली बाज़ी निर्णायक साबित होगी. छह बाज़ियों के बाद कार्लसन आनंद पर 4-2 से बढ़त बनाए हुए हैं. कार्लसन इस बात से सहमति जताते हैं कि इस मुक़ाबले में मोहरे जिस तरह जमे थे बाज़ी हार-जीत के नतीजे के बिना ख़त्म हो सकती थी लेकिन आनंद उनके एक जरा से झांसे में आ गए. कार्लसन को मैच में स्वाभाविक बढ़त मिली है जहां अभी दोनों के बीच छह और बाज़ियां बाकी हैं. मुक़ाबले के दौरान कार्लसन धीरे-धीरे अपनी स्थिति मज़बूत करते जा रहे थे और ऐसा लग रहा था कि आनंद अपना धैर्य खो रहे हैं. 38वीं चाल में आनंद ने अपना एक मोहरा ख़ुशी से खोया और ड्रॉ के इरादे से 44वें दांव में एक ओर मोहर गंवा दिया. इस समय मोहरे बिल्कुल उस स्थिति में थे जिसमें बाज़ी अक्सर बिना नतीजे के ख़त्म होती है. लेकिन कार्लसन ने आनंद के इरादों पर पानी फेरकर उन्हें शिकस्त दे ही दी. विश्व चैम्पियन बनने के लिए कार्लसन को बाक़ी छह बाज़ियों से केवल 2-5 अंक बनाना है. आनंद ने इस हार को अपने लिए एक बड़ा झटका बताया है. आनंद ने कहा बाज़ी शुरू होने के बाद मैं अपने मोहरों को मज़बूत जगहों पर बैठाना चाहता था लेकिन एक ग़लती के बाद दूसरी ग़लती होती गई. वहीं कार्लसन ने कहा आज मैंने शुरुआत से ही बढ़त बना ली थी. मैं उन पर थोड़ा दबाव बनाना चाहता था मेरे लिए वाकई ज़्यादा ख़तरा नहीं था. थोड़ी क़िस्मत भी मुझ पर मेहरबान रही और मैं जीत गया. |
| DATE: 2013-11-17 |
| LABEL: sports |
| [686] TITLE: आखिरी सिरीज़ में जीत, विदा हुए सचिन |
| CONTENT: मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में खेले गए भारत-वेस्ट इंडीज़ सिरीज़ के दूसरे टेस्ट में भारत ने वेस्ट इंडीज़ को एक पारी और 126 रन से हराकर सिरीज़ पर 2-0 से क़ब्ज़ा कर लिया है. इस तरह सचिन तेंदुलकर की आख़िरी सिरीज़ भारत की जीत के सात ख़त्म हो गई. भारतीय टीम ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए मैच के तीसरे दिन लंच से पहले ही जीत हासिल कर ली. भारत की तरफ़ से शानदार प्रदर्शन किया गेंदबाज़ प्रज्ञान ओझा ने. प्रज्ञान ओझा ने दोनों पारियों में पांच-पांच विकेट लेकर पूरे मैच में 89 रन देकर 10 विकेट लिए. उनके इस प्रदर्शन के लिए ओझा को मैन ऑफ़ द मैच चुना गया. ओझा ने इसे सचिन को समर्पित किया. वेस्ट इंडीज़ को पारी की हार से बचने के लिए 313 रनों की ज़रूरत थी लेकिन दूसरी पारी में उनकी पूरी टीम केवल 187 रनों पर सिमट गई और इस तरह भारत को एक पारी और 126 रन से विजय हासिल हुई है. वेस्ट इंडीज़ की तरफ़ से रामदीन ने सबसे अधिक 53 रन बनाए जबकि शिवनारायण चंद्रपॉल ने 41 रन बनाए. रामदीन शमी अहमद की गेंद पर बोल्ड हो गए जबकि चंद्रपॉल को अश्विन ने एलबीडब्लू आउट किया. इससे पहले शनिवार को मैच के तीसरे दिन वेस्ट इंडीज़ ने तीन विकेट के नुक़सान पर 45 रन से आगे खेलना शुरू किया. भारत ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाज़ी करने का फ़ैसला किया था. धोनी का फ़ैसला उस वक़्त और भी सही साबित हो गया जब वेस्ट इंडीज़ की पूरी टीम पहले ही दिन केवल 182 रन बनाकर आउट हो गई. भारत ने अपनी पहली पारी में सचिन के 74 और रोहित शर्मा और पुजारा के शतक की बदौलत 495 रन बनाए थे. इस तरह पहली पारी के आधार पर भारत को 313 रनों की लीड हासिल थी. वेस्ट इंडीज़ की टीम दूसरी पारी में भी लड़खड़ाती रही और पूरी टीम केवल 187 रनों पर सिमट गई. कोलकाता में खेले गए सिरीज़ के पहले मैच में भी भारत ने वेस्ट इंडीज़ को पारी के अंतर से हराया था. वो मैच भी भारत केवल तीन दिनों में ही जीत गया था. रोहित शर्मा को दोनों टेस्ट मैचों में शानदार प्रदर्शन के लिए मैन ऑफ़ द सिरीज़ चुना गया. |
| DATE: 2013-11-16 |
| LABEL: sports |
| [687] TITLE: ग्राफ़िक्स: सचिन 'रिकॉर्ड' तेंदुलकर |
| CONTENT: शनिवार यानी 16 नवंबर को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट जीवन को अलविदा कह दिया. ये उनका आखिरी मैच था जिसमें टीम इंडिया ने वेस्ट इंडीज पर जीत दर्ज करके सचिन को शानदार विदाई दी. सचिन तेंदुलकर ने 24 साल के लंबे क्रिकेट करियर में 34 हज़ार से ज्यादा रन बनाए हैं. इस रिकॉर्डतोड़ सफ़र में सचिन ने टेस्ट और वनडे दोनों प्रारूप में नियमित तौर पर शानदार प्रदर्शन किया है. वे टेस्ट और वनडे दोनों प्रारूप में सबसे ज़्यादा मैच खेलने और सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले क्रिकेटर हैं. हालांकि उन्होंने भारत की ओर से सिर्फ़ एक टी-20 मैच खेला है. सचिन तेंदुलकर ने भारत की ओर से अपने करियर की शुरुआत साल 1989 में महज 16 साल की उम्र में की थी. उनके नाम क्रिकेट के तमाम रिकॉर्ड दर्ज हैं. इनमें सबसे प्रसिद्ध रिकॉर्ड उन्होंने मार्च 2012 में ढाका में तब बनाया जब उन्होंने बांग्लादेश के ख़िलाफ़ 114 रन बनाते हुए अपना सौवां अंतर्राष्ट्रीय शतक ठोका. दूसरे नंबर पर ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ रिकी पॉन्टिंग हैं जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में 71 शतक बनाए हैं. कई खिलाड़ियों और कमेंटेटरों का मानना है कि सचिन के शतकों का रिकॉर्ड शायद ही टूटे. हालांकि सचिन को अपना सौवां शतक बनाने के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ा. करियर के 99वें शतक के बाद उन्हें अपने सौवें शतक के लिए 12 वनडे मैच और 11 टेस्ट मैच तक इंतज़ार करना पड़ा था. नवंबर 2011 में मुंबई में वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ 94 रन तक सचिन पहुंचे जरूर लेकिन अपना सौवां शतक नहीं बना सके थे. अगर इससे पिछली 20 पारियों में सचिन के प्रदर्शन की तुलना करे तो उन्होंने सात शतक बनाए थे जिसमें तीन वनडे मैच में थे जबकि चार टेस्ट मैचों में. तेंदुलकर अपने करियर में 680 बार आउट हुए हैं इनमें 60 फ़ीसदी बार वे कैच आउट हुए. |
| DATE: 2013-11-16 |
| LABEL: sports |
| [688] TITLE: मैं उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहता: कांबली |
| CONTENT: सचिन तेंदुलकर को उनके करियर के आख़िरी 200वें टेस्ट में विदाई देने उनके सारे घनिष्ठ साथी वानखेड़े स्टेडियम पर पहुंचे सिवाए एक के. वह थे एक ज़माने में उनके सबसे क़रीबी रहे विनोद कांबली. विनोद कांबली इस समय एक न्यूज़ टीवी चैनल के लिए एक्सपर्ट की भूमिका में हैं. वह मुंबई से हज़ारों मील दूर नोएडा में बैठकर अपने बचपन के सखा के आख़िरी मैच का विश्लेषण कर रहे हैं. बचपन के दोस्त से लंबे समय से उनकी बातचीत नहीं हुई. यहां तक की क्रिकेट से संन्यास लेने की घोषणा के बाद भी दोनों के बीच किसी तरह के कोई संवाद का आदान प्रदान नहीं हुआ. कांबली कहते हैं मैं उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहता. हालांकि मैं जानता हूं कि क्रिकेट को विदा कहते हुए उन्हें बहुत दर्द हुआ होगा. वह कहते हैं सचिन ने पिछले 30 सालों से केवल क्रिकेट खेली है उन्होंने तो इसके अलावा कुछ सीखा ही नहीं. संन्यास का फ़ैसला लेना उनके लिए क़त्तई आसान नहीं रहा होगा. ग़ौरतलब है कि कांबली और सचिन की दोस्ती उस उम्र से है जब दोनों 10 साल के थे और मुंबई के शारदाश्रम स्कूल में कक्षा सात के छात्र थे. दोनों की पहली मुलाक़ात रमाकांत आचरेकर की क्रिकेट कोचिंग में हुई थी. वर्ष 1988 में दोनों ने शारदाश्रम विद्यामंदिर स्कूल के लिए हैरिस शील्ड प्रतियोगिता में सेंट ज़ेवियर स्कूल के ख़िलाफ़ साथ खेलते हुए 664 रनों की रिकॉर्ड साझीदारी की थी. उस मैच में जब दोनों शतक बना चुके थे तब स्कूल कोच उन्हें पारी घोषित करने के लिए लगातार बाहर आने का इशारा कर रहे थे लेकिन दोनों ने उनके इशारों को अनदेखा करते हुए खेलना जारी रखा और एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया जिसने दोनों को देश में प्रसिद्ध कर दिया. सचिन और कांबली के रिश्तों में तब ख़ालीपन आ गया जब कांबली ने एक टीवी रियल्टी शो में कहा कि उन्हें लगता है कि सचिन ने करियर में उनकी बहुत ज्यादा मदद नहीं की. बाद में कांबली ने इसे लेकर काफ़ी सफ़ाई भी दी लेकिन ये माना गया कि उनकी इस टिप्पणी को सचिन ने पसंद नहीं किया. लेकिन अब कांबली इस बारे में कुछ नहीं बोलते. वह एक क्रिकेटर के रूप में सचिन की तारीफ़ करते नहीं थकते. कांबली का कहना है कि सचिन में बचपन से ही रनों की ज़बरदस्त भूख रही है जो उन्हें क्रिकेट में इतने आगे ले गई. मैदान में वह हमेशा अलग तरह के क्रिकेटर हो जाते हैं. कांबली ने सचिन के थोड़े समय बाद ही इंटरनेशनल क्रिकेट में अपनी पारी की शुरुआत की लेकिन वह हमेशा टीम से अंदर-बाहर होते रहे. वह सचिन की 24 साल लंबे और सफल करियर की वजह उनका संयम मानते हैं. वह कहते हैं कि ये गुण उनमें हमेशा से रहा है जिसने उन्हें हर परिस्थिति में ढलना सिखाया. |
| DATE: 2013-11-16 |
| LABEL: sports |
| [689] TITLE: सीधे चार साल के लिए मैदान से बाहर करेगा वाडा |
| CONTENT: डोपिंग में दोषी पाए जाने के बाद साइकिलिंग स्टार आर्मस्ट्रांग का करियर पंचर हो चुका है. वर्ल्ड एंटी डोपिंग एजेंसी वाडा ने प्रतिबंधित शक्तिवर्धक दवाओं का इस्तेमाल करने वाले खिलाड़ियों पर प्रतिबंध की अवधि दो वर्ष से बढ़ाकर चार वर्ष कर दी है. अभी तक ये व्यवस्था थी कि इस तरह के पहले मामले में खिलाड़ी पर दो वर्ष का प्रतिबंध लगाया जाता था और दोबारा उल्लंघन करने पर उस खिलाड़ी पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया जाता था. अगले वर्ष एक जनवरी से प्रभावी होने वाले नए नियम के तहत पकड़ में आने वाले खिलाड़ी पर सीधे चार वर्ष का प्रतिबंध लगेगा जिससे वो कम से कम एक ओलंपिक खेल में हिस्सा नहीं ले पाएगा. वाडा ने अपने नए नियम में उन खिलाड़ियों को सज़ा में नर्मी बरतने का फ़ैसला किया है जिन्होंने प्रतिबंधित दवाओं का सेवन अनजाने में कर लिया था. वाडा उन खिलाड़ियों को भी राहत देगा जो डोपिंग मामलों की जांच में सहयोग करेंगे. ब्रिटेन की खेल संस्थाओं ने वाडा के नए नियमों का स्वागत किया है. वाडा ने ये भी पुष्टि कर दी है कि ब्रिटेन के सर क्रेग रीडाइ अगले वर्ष एक जनवरी से उसके नए अध्यक्ष होंगे. ब्रिटिश ओलंपिक एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष क्रेग जॉन फ़ाहे की जगह लेंगे जो बीते छह वर्ष से वाडा के अध्यक्ष हैं. समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़ इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एथेलेटिक्स फेडेरेशन आईएएएफ़ ने वाडा के नए नियमों की ये कहते हुए आलोचना की है कि इसमें प्रतिबंधित दवा का सेवन करने वाले खिलाड़ी के पास बच निकलने के कई रास्ते होंगे. |
| DATE: 2013-11-15 |
| LABEL: sports |
| [690] TITLE: पांचवीं बाजी में हारे आनंद, कार्लसन को बढ़त |
| CONTENT: पांच बार के विश्व चैंपियन भारत के विश्वनाथन आनंद के लिए चेन्नई में खेली जा रही विश्व शतरंज चैंपियनशिप की पांचवीं बाजी निराशाजनक रही. उन्हें पांचवीं बाजी में नॉर्वे के मैग्नस कार्लसन ने मात दी. इसके साथ ही अब कार्लसन के तीन अंक हो गए हैं जबकि विश्वनाथन आनंद के दो ही अंक हैं. उल्लेखनीय है कि इससे पहले दोनों खिलाड़ियों के बीच खेली गई चारों बाजियां ड्रॉ रही थीं. पांचवीं बाजी में 39वीं चाल के दौरान आनंद ने छोटी-छोटी गलतियां कीं जिसका ख़ामियाज़ा उन्हें बाजी हार भुगतना पड़ा. इससे पहले हालांकि चारों बाजियां ड्रॉ रही थीं लेकिन आनंद के पास नॉर्वे के खिलाड़ी के ऊपर मनोवैज्ञानिक बढ़त थी. इससे पहले बुधवार को खेली गई चौथी बाजी में मैच कड़ा रहा और 51 चालों के बाद बेनतीजा ख़त्म हुआ. चौथी बाजी के बाद कार्लसन ने कहा था कि मैच के दौरान वह डर गए थे. उन्हें लगा था कि वह ख़तरे में पड़ गए हैं. कार्लसन ने कहा मैं बुरे हाल में था और मैंने हालात को ख़ुद ही और ख़राब कर दिया. मध्य खेल में कुछ आसान चालों पर मैं भटक गया. बेशक कुछ ख़तरनाक नहीं हुआ लेकिन डर तो मैं गया ही था. एक दिन के विश्राम के बाद जब शुक्रवार को दोनों खिलाड़ी आमने-सामने हुए तब कार्लसन मनोवैज्ञानिक रूप से तरो-ताजा होकर अपने मोहरों का इस्तेमाल कर रहे थे और वैसे भी शतरंज में जो खिलाड़ी सफेद मोहरों से खेलता है उसे लाभ मिलने की संभावनाएं ज़्यादा रहती हैं. अब अगर शतरंज के इस गणित को देखा जाए तो आने वाली छठी और सातवीं बाजी आनंद के लिए फायदेमंद हो सकती हैं क्योंकि दोनों में ही आनंद सफेद मोहरों से खेलेंगे. लेकिन शुक्रवार को खेली गई पांचवीं बाजी में कार्लसन ने आनंद को मात दे दी और एक महत्वपू्र्ण अंक हासिल किया. अब कार्लसन के कुल तीन अंक हो गए हैं जबकि आनंद के दो ही अंक हैं. इन दोनों खिलाड़ियों को इस चैंपियनशिप में कुल मिलाकर बारह बाजियां खेलने का मौका मिलेगा. जिस खिलाड़ी के खाते में सबसे पहले 6-5 अंक होंगे उसे विजेता घोषित कर दिया जाएगा. ये एक ऐसा अवसर है जब कोई भी रूसी खिलाड़ी इसमें शामिल नहीं है जिसकी वजह से दुनिया भर के शतरंज प्रेमियों की निगाहें इस चैंपियनशिप पर टिकी हुई हैं. |
| DATE: 2013-11-15 |
| LABEL: sports |
| [691] TITLE: सचिन दुनिया के 29वें महान बल्लेबाज़? |
| CONTENT: सचिन तेंदुलकर जब वानखेड़े स्टेडियम में आख़िरी बार मैदान से बाहर निकलेंगे तो अपने क्रिकेट करियर पर पूर्ण विराम लगा देंगे. सचिन को भारत में क्रिकेट के कारण भगवान जैसा रुतबा हासिल है. लेकिन जब हम उनकी तुलना विश्व के शीर्ष बल्लेबाज़ों से करते हैं तो सचिन की बैटिंग के आँकड़े क्या कहते हैं मुंबई टेस्ट से पहले तक सचिन रमेश तेंदुलकर के बल्ले से 199 टेस्टों में 15847 रन बनाए हैं जो किसी भी अन्य क्रिकेटर के क़रीब 2500 रन अधिक हैं. अब सचिन की तुलना उन चार खिलाड़ियों से की जाए जिनका नाम पिछले 20 सालों से सुर्ख़ियों में रहा है और जिनकी गिनती महान बल्लेबाजों में होती है. उनके नाम क्रमशः रिकी पोंटिंग ऑस्ट्रेलिया जैक कैलिस दक्षिण अफ्रीका ब्रायन लारा वेस्ट इंडीज और कुमार संगकारा श्रीलंका हैं. सचिन के 15847 रनों की तुलना में पोंटिंग ने अपने पूरे टेस्ट करियर में 13378 रन बनाए जबकि लारा ने 12000 रन से थोड़ा कम रन बनाए. दो खिलाड़ी जो अभी भी खेल रहे हैं उनमें कैलिस ने 13140 और संगकारा ने 10468 रन बनाए हैं. कुल रन संख्या के हिसाब से सचिन का दबदबा बरकरार है. लेकिन सचिन ने बाक़ी खिलाड़ियों की तुलना में अधिक मैच भी खेले हैं. सचिन का आख़िरी टेस्ट उनका 200वां टेस्ट है जो पोंटिंग के कुल टेस्टों की संख्या से 32 अधिक है और लारा के कुल टेस्टों की तुलना में 68 अधिक है. कैलिस उनसे 36 मैच पीछे हैं और संगकारा सचिन से पूरे 83 टेस्ट पीछे चल रहे हैं. शायद इसलिए खिलाड़ियों की तुलना का निष्पक्ष तरीका उनके औसत आँकड़ों पर नज़र डालना होगाइससे दशकों पहले खेलने वाले खिलाड़ी भी तस्वीर में आ जाते हैं. पहले की पीढ़ियों में क्रिकेट खिलाड़ी बहुत कम मैच खेलते थे इसलिए 1950 के पहले क्रिकेट करियर ख़त्म करने वाले किसी भी खिलाड़ी का नाम टेस्ट मैच में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले शीर्ष 35 खिलाड़ियों में शामिल नहीं है. लेकिन जब आप औसत पर नज़र डालते हैं तो शीर्ष पर जो खिलाड़ी दिखाई देते है वो हैं ऑस्ट्रेलिया के डोनाल्ड ब्रैडमैन. उन्होंने 1928 से 1948 के बीच 20 साल तक क्रिकेट खेली. अविश्वसनीय रूप से ब्रैडमैन ने अपना क्रिकेट करियर 99-94 के औसत के साथ समाप्त किया. कोई भी बल्लेबाज़ उनके औसत के करीब नहीं पहुंच सका है. कम से कम 20 टेस्ट खेलने वाले खिलाड़ियों के साथ तुलना करने पर सचिन 53-71 के औसत के साथ 15वें नंबर पर आते हैं. इस सूची में पोंटिंग 24वें और लारा 18वें स्थान पर हैं जबकि कैलिस को 14वीं रैंक हासिल है. संगकारा 56-98 के औसत के साथ 10वें नंबर पर हैं. यानी सचिन औसत में पोंटि़ंग और लारा से बेहतर हैं लेकिन कैलिस और संगकारा से पीछे हैं. लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि सचिन ने पिछले 18 सालों से लगातार 50 से ज़्यादा का औसत बरक़रार रखा है. महान बल्लेबाज़ों की तरह सचिन का औसत भी करियर के आख़िरी दिनों में नीचे गिरा है. किसी खिलाड़ी की महानता को मापने के लिए उसके सर्वोच्च प्रदर्शन वाले दौर को देखना एक बेहतर तरीक़ा हो सकता है. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद आईसीसी के खिलाड़ियों की रेंटिंग से आप देख सकते हैं कि मैच की विभिन्न परिस्थितियों में खिलाड़ी का प्रदर्शन कैसा रहा है. इसमें खिलाड़ी के प्रदर्शन और विपक्षी टीम के स्तर को भी देखा जाता है. आईसीसी ने सचिन को 2002 में जिम्बाब्वे के ख़िलाफ़ टेस्ट के बाद 898 रेटिंग अंक दिए थे जो उनके करियर की उच्चतम रेटिंग थी. लेकिन सर्वकालीन सूची में यह 29वीं सर्वश्रेष्ठ रेटिंग है. ब्रैडमैन को 1948 में करियर के अंतिम दौर में भारत के ख़िलाफ़ टेस्ट के बाद 961 रेटिंग अंक मिले थे जो कि एक रिकॉर्ड है. पोंटिंग संगकारा कैलिस और लारा भी 900 से अधिक रेटिंग अंक हासिल कर चुके हैं. आईसीसी के अनुसार 900 से अधिक की रेटिंग विश्व स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले बल्लेबाज़ो को दी जाती है. पोंटिंग को 1996 में 942 रेटिंग अंक मिले थे और वह इस सूची में संयुक्त तीसरे स्थान पर हैं जबकि संगकारा को साल 2007 में 938 रेटिंग अंक मिले थे. वह संयुक्त छठे स्थान पर हैं. कैलिस को 2007 में 935 रेटिंग अंक मिले थे और इस सूची में संयुक्त 10वें स्थान पर हैं. इसी तरह लारा को 2004 में 911 रेटिंग अंक मिले थे और सूची में उनका 23वां स्थान है. इस रेटिंग से पता चलता है कि अपने करियर के शिखर पर सचिन अन्य खिलाड़ियों जितने प्रभावशाली नहीं थे. वह अपने करियर में पाँच बार आईसीसी टेस्ट रैंकिंग के शीर्ष पर पहुंचे. सचिन पहली बार 1994 में और आख़िरी बार 2010 में इस मुक़ाम पर पहुंचे थे. इससे पता चलता है कि कितने लंबे समय तक सचिन ने लगातार अच्छी क्रिकेट खेली है. एक बल्लेबाज़ के करियर को मापने के अलग मापदंड भी हैं. क्रिकेट के कुछ शुद्धतावादी विश्लेषक आँकड़ों से अलग कौशल शैली और दबदबे को ज़्यादा महत्व देते हैं. मास्टरली बैटिंग 100 ग्रेट टेस्ट सेंचुरीज पुस्तक के लेखक पैट्रिक फेर्रिडे और डेविड विल्सन ने रन परिस्थिति गेंदबाज़ी के स्तर अवसर गति सिरीज़ के प्रभाव मैच के प्रभाव आदि मानकों को आधार बनाकर खिलाड़ियों की सूची बनाई. इस सूची में सचिन की 1998 में चेन्नई में ऑस्ट्रलिया के ख़िलाफ़ खेली गई नाबाद 155 रन की पारी को 100वां स्थान दिया गया है. अपने टेस्ट करियर में 51 शतक बनाने वाले खिलाड़ी के लिए यह बहुत सामान्य सी बात लगती है. इस सूची में लारा के पाँच शतक शामिल हैं. इनमें से उनके तीन शतक शीर्ष 20 पारियों में शुमार हैं. किताब के सह-लेखक पैट्रिक फेर्रिडे कहते हैं सचिन तेंदुलकर की शोहरत का आधार उनका लंबा करियर और खेल में निरंतरता है. सबसे ख़ास तथ्य यह है कि उन्होंने पूरे करियर में भारत के आइकन खिलाड़ी के दबाव के साथ खेला है. वो आगे कहते हैं लेकिन मुझे नहीं लगता है कि लारा की तरह उन्होंने शानदार पारियां खेली हैं. लारा की अधिकांश पारियों ने मैच को बचाने या जिताने में अपनी भूमिका निभाई है. सचिन अक्सर अपनी टीम के साथी खिलाड़ियों के बीच छिप से जाते थे. किसी खिलाड़ी के महत्व को मापने के लिए 2010 में एक और तरीक़ा बनाया गया था. इसमें किसी खिलाड़ी के प्रदर्शन की उसी मैच में दूसरे खिलाड़ी के प्रदर्शन से तुलना की जाती है. इस अवधारणा को पेश करने वाले जयदीप वर्मा भारतीय क्रिकेट में राहुल द्रविड़ के योगदान को सचिन से बड़ा मानते हैं. उन्होंने कहा द्रविड़ ने सचिन से कम मैच खेले हैं लेकिन उनसे ज़्यादा सिरीज़ों में निर्णायक भूमिका निभाई है. द्रविड़ ने आठ बार सिरीज़ में निर्णायक पारी खेली थी जबकि सचिन के खाते में ऐसी छह पारियां हैं. उन्होंने कहा सचिन ने अपने करियर में कभी भी बड़े मैचों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है. देश के क्रिकेट इतिहास को बदलने में द्रविड़ की भूमिका सचिन से ज़्यादा है. |
| DATE: 2013-11-15 |
| LABEL: sports |
| [692] TITLE: सचिन 74 रन बनाकर आउट |
| CONTENT: मुंबई के वानखेड़े में अपने करियर का आख़िरी टेस्ट मैच खेल रहे सचिन तेंदुलकर शतक लगाने से चूक गए हैं. वह 74 रन बना कर आउट हो गए. वेस्टइंडीज़ के नरसिंह देवनारायन की गेंद पर डैरेन सैमी ने पहली स्लिप पर सचिन का कैच लिया. उनके आउट होते ही मानो पूरे स्टेडियम में सन्नाटा छा गया. इससे पहले उन्होंने गुरुवार के अपने 38 रन के स्कोर से आगे खेलना शुरू किया. शुक्रवार को भी उन्होंने कुछ शानदार शॉट्स लगाए जिसे देखकर दर्शक मंत्र मुग्ध हो गए. सचिन ने 118 गेंदों पर 12 चौकों की मदद से 74 रन बनाए. सचिन का आखिर मैच देखने के लिए स्टेडियम खचाखच भरा हुआ है. हज़ारों की संख्या में दर्शक स्टेडियम के बाहर खड़े हैं. आज सुबह जब उन्होंने बल्लेबाजी शुरू की तो सभी को लग रहा था कि वो अंतिम मैच में शतक लगाकर विदा होंगे. उन्होंने कुछ शानदार स्ट्रोक भी लगाए. इससे दर्शकों में ज़बर्दस्त जोश देखा गया. सचिन के आउट होने के वक़्त भारत का स्कोर तीन विकेट पर 221 रन था. उन्होंने तीसरे विकेट के लिए चेतेश्वर पुजारा के साथ 144 रनों की साझेदारी की. इससे पहले मुरली विजय 43 और शिखर धवन 33 रन बनाकर गुरुवार को आउट हुए थे. |
| DATE: 2013-11-15 |
| LABEL: sports |
| [693] TITLE: नींद में चलकर बल्ला ढूंढ़ने वाला सचिन |
| CONTENT: सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट से बहुत अधिक लगाव रहा है. ज्यादातर क्रिकेट खिलाड़ियों को एक मैच खेलने के बाद शाम को ब्रेक की जरूरत पड़ती है. लेकिन सचिन के साथ ऐसा नहीं है. सचिन क्रिकेट खेलने से उसके बारे में बात करने से कभी थकते नहीं हैं. निजी जिंदगी में भी सचिन क्रिकेट से जुड़े रहते हैं. घर-बाहर दोस्तों के साथ हर जगह वो क्रिकेट से जुड़े रहते हैं. इसी समर्पण और अनुशासन की वजह से सचिन इतने महान क्रिकेट खिलाड़ी बन गए हैं. तेंदुलकर निजी जिंदगी में अपने परिवार के बहुत करीब हैं. वे अपनी मां भाई और बच्चों के साथ समय बिताना पसंद करते हैं. उन्हें हिंदी फिल्मी गाने सुनने का बड़ा शौक है. और भी शौक हैं उनके लेकिन सबसे बड़ा शौक क्रिकेट ही है. गावस्कर और ब्रैडमैन के मैच के वीडियो देखना उन्हें अच्छा लगता है. ये उनका पसंदीदा काम है. सचिन को तेज गाड़ी चलाना भी पसंद है. लेकिन मुंबई के ट्रैफ़िक और अपनी शख्सियत को ध्यान में रखते हुए वे ऐसा नहीं कर पाते हैं. सचिन अक्सर रात के बारह बजे सिद्धि विनायक मंदिर जाते हैं क्योंकि दिन में उनके लिए वहां जा पाना मुमकिन नहीं होता. सी-फूड उन्हें बड़ा पसंद है. निजी जिंदगी में सचिन बड़े सरल इंसान हैं. जहां तक संन्यास की बात है तो सचिन हर सीरीज के बाद इस बारे में सोचते रहे हैं कि क्या ये सही समय होगा या नहीं. लेकिन इसके बाद भी वो हर सीरीज़ का लुत्फ उठाते रहे हैं. सचिन इस युग के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी हैं ये तो जगजाहिर है लेकन क्रिकेट के प्रति उनका प्यार किस हद तक जा सकता है ये बात बहुत से लोगों को पता नहीं है. एक बार ऐसा भी हुआ जब सचिन एक फेस्टिवल मैच खेल रहे थे और उन्हें बुखार था लेकिन फिर भी वो बल्लेबाजी के लिए मैदान में उतरे और उन्होंने नब्बे रन बनाए. सचिन चौबीस घंटे क्रिकेट खेल सकते हैं. कई बार तो ऐसा भी हुआ कि सचिन रात में नींद में चलकर अपना बल्ला खोजते रहे. एक बार ऐसा भी हुआ कि अंडर-15 टीम के मैनेजर को रात के दो बजे किसी के क्रिकेट खेलने की आवाज़ आई. उन्होंने छत पर देखा कि सचिन अभ्यास कर रहे थे. सचिन की उम्र तब 13-14 साल रही होगी. भारत में क्रिकेट खेलने वाला हर बच्चा सचिन तेंदुलकर बनना चाहता है. सचिन एक पूरी पीढ़ी के नायक बन गए हैं. ये उनकी एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. |
| DATE: 2013-11-13 |
| LABEL: sports |
| [694] TITLE: सचिन महानतम क्रिकेटरः ब्रायन लारा |
| CONTENT: क्रिकेट इतिहास के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ों में से एक वेस्टइंडीज़ के ब्रायन लारा का मानना है कि सचिन तेंदुलकर को महानतम क्रिकेटर के रूप में याद किया जाना चाहिए. 40 वर्षीय सचिन गुरुवार को मुंबई के वानखेडे स्टेडियम में अपना 200वां और आख़िरी टेस्ट खेलने उतरेंगे. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे अधिक रन बनाने का कारनामा करने वाले सचिन ने 199 टेस्ट मैचों में 15847 और 463 एकदिवसीय मुकाबलों में 18426 रन बनाए हैं. लारा ने कहा जितने भी खिलाड़ियों ने अब तक क्रिकेट खेली है उनमें सचिन का करियर सबसे बेहतरीन रहा है. 44 वर्षीय लारा और सचिन का करियर एक जैसा रहा है. कुल 131 टेस्टों में लारा का औसत क़रीब 53 का है जबकि सचिन का औसत इससे मामूली अधिक है. वैसे लारा से 69 मैच अधिक खेलने के बाद सचिन टेस्ट क्रिकेट से विदा ले रहे हैं. टेस्ट क्रिकेट में 11953 रन बनाने वाले लारा ने कहा कि सचिन का क्रिकेट उनके देश और दुनिया पर प्रभाव शानदार रहा. सचिन ने 16 साल की उम्र में नवंबर 1989 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा था. पिछले साल वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतकों का शतक लगाने वाले दुनिया के पहले खिलाड़ी बने थे. लारा ने कहा कि सचिन की उपलब्धियां ही उनकी महानता का परिचय देती हैं. उन्होंने कहा मुझे नहीं लगता कि 16 साल की उम्र में करियर की शुरुआत करने वाले और 40 की उम्र में इससे विदा लेने वाले किसी खिलाड़ी का करियर इतना शानदार होगा. टेस्ट क्रिकेट में 400 रन की रिकॉर्ड पारी खेलने वाले लारा ने कहा वह क्रिकेट के मोहम्मद अली और माइकल जार्डन हैं. आप महान मुक्केबाज़ों और बास्केटबॉल खिलाड़ियों के बारे में सोचते हैं लेकिन जब आप क्रिकेट के बारे में बात करेंगे तो आपको सचिन के बारे में बात करनी होगी. |
| DATE: 2013-11-13 |
| LABEL: sports |
| [695] TITLE: आख़िरी टेस्ट में कैसा रहेगा सचिन का प्रदर्शन? |
| CONTENT: दुनिया के महानतम बल्लेबाज़ों में से एक सचिन रमेश तेंदुलकर मुंबई के वानखेडे स्टेडियम में अपना आख़िरी टेस्ट खेलने के लिए गुरूवार को जब मैदान में उतरेंगे तो सबकी निगाहें इस बात पर टिकी होंगी कि वह दोनों पारियों में कितने रन बनाते हैं. सचिन को क्रिकेट का भगवान कहा जाता है और उनके क्रिकेट भक्तों की पूरी दुनिया में कोई कमी नहीं है. सचिन की तुलना अक्सर वेस्टइंडीज़ के ब्रायन लारा और ऑस्ट्रेलिया के रिकी पोंटिग से की जाती रही. सचिन ने टेस्ट क्रिकेट में इतने रिकॉर्ड बनाए हैं कि एक बार तो यह भी कहा जाता था कि उनके रिकॉर्ड कौन तोड़ेगा-पोंटिग या लारा. लेकिन इन दोनों बल्लेबाज़ों ने सचिन से पहले ही क्रिकेट को अलविदा कह दिया. वैसे सचिन के लिए सबसे बड़े सम्मान का पल उस समय आया जब क्रिकेट के महानतम बल्लेबाज़ माने जाने वाले ऑस्ट्रेलिया के सर डोनाल्ड ब्रैडमैन ने कहा कि सचिन उसी स्टाइल या शैली में बल्लेबाज़ी करते है जैसे वह करते थे. अब कुछ ऐसे बल्लेबाज़ों की बात की जाए जिन्होंने पूरी दुनिया में नाम कमाया लेकिन आख़िरी टेस्ट में उनका प्रदर्शन कैसा रहा. अगर ब्रैडमैन की बात की जाए तो उन्होंने अपना आख़िरी टेस्ट इंग्लैंड के ख़िलाफ़ ओवल में खेला था. उन्हें 100 का अद्भुत औसत पाने के लिए मात्र चार रन की ज़रूरत थी. इंग्लैंड की पहली पारी केवल 52 रनों पर सिमट गई. इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने 389 रन बनाए लेकिन ब्रैडमैन जब तीसरे नंबर पर बल्लेबाज़ी करने आए. ब्रैडमैन लेग स्पिनर एरिक होलीस की दूसरी ही गेंद पर बोल्ड हो गए और अपना खाता भी नहीं खोल सके. वैसे उस मैच में कुल मिलाकर नौ बल्लेबाज़ शून्य पर आउट हुए थे. आज सचिन के नाम टेस्ट क्रिकेट में 51 शतक हैं. लेकिन कभी डॉन ब्रेडमैन के 29 शतकों का रिकॉर्ड तोडने वाले भारत के महान सलामी बल्लेबाज़ सुनील गावस्कर ने अपने अंतिम टेस्ट में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ बंगलौर में पहली पारी में 21 और दूसरी पारी में 96 रन बनाए थे. भारत वह मैच 16 रन से हार गया था लेकिन गावस्कर की उस पारी को क्रिकेट समीक्षक आज भी बेहतरीन बल्लेबाज़ी का नमूना मानते हैं. ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान पोंटिग ने अपने आख़िरी टेस्ट मैच में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ पर्थ में पहली पारी में चार और दूसरी पारी में आठ रन बनाए. दीवार के नाम से मशहूर और भारत के सबसे बेहतरीन बल्लेबाज़ो में से एक राहुल द्रविड ने अपने आख़िरी टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एडिलेड में पहली पारी में एक और दूसरी पारी में 25 रन बनाए. वेस्टइंडीज़ के महान बल्लेबाज़ लारा ने सचिन के कहा है कि वह अपने अंतिम टेस्ट में बेफ़िक़्र होकर बल्लेबाज़ी करें और 400 रन बनाने की कोशिश करें. अब यह बात अलग है कि 400 रनों का जादुई आंकडा सिर्फ लारा के नाम है लेकिन अपने अंतिम टेस्ट मैच में वह पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कराची में पहली पारी में शून्य और दूसरी पारी में 49 रन बनाकर आउट हुए. वेस्टइंडीज़ के एक और महान बल्लेबाज़ सर विवियन रिचर्ड्स अपने आख़िरी टेस्ट में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ ओवल में पहली पारी में दो और दूसरी पारी में 60 रन बनाकर आउट हुए. कभी एशिया का ब्रैडमैन कहे जाने वाले पाकिस्तान के ज़हीर अब्बास ने अपना आख़िरी टेस्ट श्रीलंका के ख़िलाफ़ सियालकोट में खेला और पहली पारी में चार रन बना सके. पाकिस्तान के एक और महान बल्लेबाज़ जावेद मियांदाद ने अपने आख़िरी टेस्ट मैच में ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ लाहौर में 31 रन बनाए. कभी भारत के लिए सकंटमोचक कहे जाने वाले गुंडप्पा विश्वनाथ अपने आख़िरी टेस्ट मैच में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कराची में 10 रन ही बना सके. वैसे क्रिकेट के मैदान में अपने पहले और आ़खिरी टेस्ट मैच में शतक बनाने वाले खिलाडी भी है. इनमें ऑस्ट्रेलिया के आर ए डफ ने अपने पहले टेस्ट मैच में इंग्लैंड के खिलाफ ओवल में 32 और 104 और आख़िरी टेस्ट मैच में इंग्लैंड के ही खिलाफ 146 रन बनाए. कुछ ऐसा ही कारनामा ऑस्ट्रेलिया के दो और बल्लेबाज़ों डब्लयू एच पोंसफोर्ड और ग्रेग चैपल ने किया. पोंसफोर्ड ने तो आखिरी टेस्ट मैच की पहली पारी में 266 रन बनाए. इनके अलावा भारत के मोहम्मद अज़हरूद्दीन ने भी इंग्लैड के ख़िलाफ़ अपने पहले और दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ अपने आख़िरी टेस्ट में शतक जमाए. अब रिकॉर्डों के बादशाह सचिन के बल्ले से मुंबई में कितने रन निकलते है इसका सबको इंतज़ार है. |
| DATE: 2013-11-13 |
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| [696] TITLE: चौथी बाज़ी भी ड्रॉ, कार्लसन डरे थे आनंद से |
| CONTENT: शतरंज के अब तक चैंपियन विश्वनाथन चैंपियन विश्वनाथन आनंद ने विश्व शतरंज चैंपियनशिप की तीसरी बाज़ी में चैलेंजर नार्वे के मैग्नस कार्लसन को अपनी चालों से डरा ही दिया था. हालांकि यह मैच भी पहले दो मैचों की तरह ही ड्रॉ हुआ. आनंद ने जिस तरह मध्य खेल में चालें चलीं उसे कार्लसन नहीं समझ पाए और फंसते चले गए. ग़नीमत बस इतनी थी कि दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी कार्लसन ने बाद में बचने का रास्ता खोज लिया. काले मोहरों से खेल रहे आनंद ने इस बाज़ी के साथ विरोधी दिग्गज पर मनोवैज्ञानिक बढ़त ज़रूर हासिल कर ली है. मैच कड़ा रहा और 51 चालों के बाद बेनतीजा ख़त्म हुआ. मैच के बाद कॉन्फ्रेंस में कार्लसन ने कहा कि मैच के दौरान वह डर गए थे. उन्हें लगा था कि वह ख़तरे में पड़ गए हैं. कार्लसन ने कहा मैं बुरे हाल में था और मैंने हालात को ख़ुद ही और ख़राब कर दिया. मध्य खेल में कुछ आसान चालों पर मैं भटक गया. बेशक कुछ ख़तरनाक नहीं हुआ लेकिन डर तो मैं गया ही था. चेन्नई के हयात होटल में मंगलवार को साफ़ दिखा कि शतरंज का युद्ध अब आकार लेने लगा है. तीसरे मैच के बाद दोनों खिलाड़ियों के 12 अंक थे. शतरंज में सफ़ेद मोहरे से खेलने वालों के बारे में माना जाता है कि वे बढ़त लिए हुए हैं. ऐसे में बुधवार को होने वाले चौथे गेम में आनंद को सफ़ेद मोहरों से खेलने का फ़ायदा मिल सकता है. |
| DATE: 2013-11-12 |
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| [697] TITLE: ईशांत वन-डे सीरीज़ की टीम से बाहर |
| CONTENT: वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ तीन एकदिवसीय मैचों की सीरीज़ में ईशांत शर्मा को जगह नहीं मिल पाई है. तीन वन-डे मैचों की सीरीज़ के लिए 14 सदस्यीय भारतीय क्रिकेट टीम की घोषणा मंगलवार को मुंबई में की गई. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की वरिष्ठ चयन समिति ने टीम का चयन किया. इस टीम में मौजूदा टेस्ट सीरीज़ में खेल रहे पांच अन्य खिलाड़ियों को भी नहीं रखा गया है. जिन खिलाड़ियों को शामिल नहीं किया गया है उनमें प्रज्ञान ओझा चेतेश्वर पुजारा अजिंक्य रहाणे मुरली विजय और उमेश यादव शामिल हैं. वहीं युवराज सिंह और अंबाती रायडु की टीम में वापसी हुई है. वेस्टइंडीज़ ने इस सीरीज़ के लिए अपनी वन-डे टीम पहले ही घोषित कर दी है. इस टीम के कप्तान ड्वेन ब्रावो हैं. इस सीरीज़ का पहला मैच 21 नवंबर को कोच्चि में खेला जाएगा जबकि विशाखापट्टनम में 24 नवंबर को दूसरा एक दिवसीय मैच होगा. तीसरा मैच कानपुर में 27 नवंबर को होगा. कानपुर में लंबे समय बाद कोई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच आयोजित किया जा रहा है. टीम में शामिल किए गए धवल कुलकर्णी और मोहित शर्मा नए खिलाड़ी हैं. |
| DATE: 2013-11-12 |
| LABEL: sports |
| [698] TITLE: एजेंसियां चाहें तो सट्टेबाजी को क़ानूनी बना दें: द्रविड़ |
| CONTENT: पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान राहुल द्रविड़ क्रिकेट में भ्रष्टाचार और सट्टेबाज़ी से चिंतित हैं. राहुल द्रविड़ का कहना है अगर एजेंसियों को लगता है कि सट्टेबाजी को क़ानूनी जामा पहनाने की ज़रूरत है तो ऐसा किया जाना चाहिए. द्रविड़ दिल्ली में सीबीआई और राज्य की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा द्वारा आयोजित इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन इवॉल्विंग कॉंमन स्ट्रैटजीज़ टु कॉम्बैट करप्शन एंड क्राइम में बोल रहे थे. द्रविड़ ने कहा स्पोर्ट्स में करप्शन से मुझे बुरा लगता है और साथ में ग़ुस्सा भी आता है. जो भी ऐसा करता है वह सबको नीचे गिराता है. एक बार जब विश्वास टूटता है तो बहुत मुश्किल से वापस आता है. क्रिकेट के सामने बढ़ती चुनौतियों के बारे में द्रविड़ ने कहा खेलों में भ्रष्टाचार जैसी चुनौती कई रूपों में है और ये चुनौतियां खेल के भविष्य के लिए ज्यादा बड़ी हैं. इसलिए हमें खेलों को बचाने के लिए ज़्यादा बड़ी लड़ाई लड़ने की ज़रूरत है. अगर सभी लोग मिलकर लड़ें तो यह लड़ाई जीत सकते हैं. खेलों से संबंधित मामलों के लिए कानून की ज़रूरत पर जोर देते हुए द्रविड़ बोले खेलों में अपराध के लिए एक अलग क़ानून की ज़रूरत है. इन क़ानूनों में खेलों में अपराध को सही तरीक़े से परिभाषित किए जाने की ज़रूरत है. क़ानूनी सुधार होने चाहिए. खेलों में आपराधिक मामलों की जाँच पारदर्शी और तेज़ होनी चाहिए. द्रविड़ ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि क्रिकेट से जुड़े आपराधिक मामलों की जाँच में ईमानदार खिलाड़ियों पर आँच नहीं आनी चाहिए. द्रविड़ ने कहा ईमानदार खिलाड़ियों की रक्षा की जाए और दोषी खिलाड़ियों को जल्द से जल्द जाँच करके जेल भेजा जाए. जब दोषी खिलाड़ी जेल जाएंगे तो एक अलग तरह का संदेश जाएगा जो इस समय बहुत ज़रूरी हो गया है. द्रविड़ ने तो ज़रूरत पड़ने पर पॉलीग्राफ़ टेस्ट की भी वक़ालत की. नए खिलाड़ियों के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में ध्यान दिलाते हुए द्रविड़ ने कहा खेल में ज़्यादा कॉम्पीटिशन है दबाव भी ज़्यादा है. उनके सामने असुरक्षा भी ज़्यादा होती है. यह असुरक्षा आर्थिक पहलुओं से भी जुड़ी होती है. इसीलिए अक्सर नए खिलाड़ी प्रलोभनों में आ जाते हैं. द्रविड़ ने क्रिकेट में दूसरे कई खेलों की तरह डोप टेस्ट पर भी सहमति जताई. इस मामले पर द्रविड़ ने कहा संभव है कि ड्रग टेस्ट की प्रक्रिया से ईमानदार खिलाड़ियों को दिक़्क़त हो लेकिन खेल के व्यापक हित में यह दिक़्क़त उठानी चाहिए. दूसरे खेलों में भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने के लिए द्रविड़ ने खेल संस्थाओं की आंतरिक संरचना मज़बूत करने की बात कही. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि खेल संस्थाएं इतनी सक्षम नहीं हैं कि वो इन चुनौतियों से ख़ुद भरपूर ढंग से लड़ पाएं. लिहाज़ा उन्हें बाहरी मदद की भी ज़रूरत होगी. द्रविड़ ने खिलाड़ियों की उम्र को लेकर हो रहे भ्रष्टाचार पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा हमारे देश में सबसे बड़ी समस्या तब शुरू होती है जब शुरुआत में ही उम्रदराज़ खिलाड़ी अपनी उम्र छिपाकर जूनियर टीमों में शिरकत करते हैं. यह नैतिकता से जुड़ी समस्या भी है. |
| DATE: 2013-11-12 |
| LABEL: sports |
| [699] TITLE: सचिन को सही मायनों में हीरो माना गया |
| CONTENT: मुझे लगता है कि भारत में खेलों में ब्रांड की शुरुआत ही सचिन तेंदुलकर से होती है. एक ब्रांड के लिहाज़ से सचिन में सब कुछ था. सचिन क्रिकेट के पर्याय थे उनका अंदाज़ पेशेवर और वे समर्पण के प्रतीक भी थे. उनकी सही मायनों में हीरो की छवि थी जिन्होंने हमें गौरव का अहसास कराया. सचिन की लोकप्रियता ज़बर्दस्त रही है. उनके चाहने वालों की गिनती नहीं की जा सकती. एक ब्रांड के तौर पर सभी सचिन की तलाश करते थे. सचिन की वजह से ही लोगों में क्रिकेट लिए जुनून बढ़ा. ब्रांड के तौर पर सहवाग युवराज विराट धोनी बहुत बाद में आए. ये भी एक हक़ीक़त है कि ब्रांड के तौर पर सचिन महंगे होते गए और सबकी पहुंच में नहीं रहे. क्रिकेट के मैदान से सचिन की विदाई एक युग समाप्त होने जैसा है. सचिन ने क्रिकेट को एक नए स्तर पर पहुंचाया है. वे अपने पीछे एक विरासत छोड़ रहे हैं. आज की तारीख में क्रिकेट खेल रहे हर लड़के की आंख में सचिन बनने का ही सपना तैर रहा होगा. सचिन बड़े ही विनम्र इंसान है. उनमें गंभीरता भी गज़ब की है. मुझे लगता है कि भारत में सचिन तेंदुलकर ऐसे व्यक्ति हैं जो वो कहते हैं उस पर सब भरोसा करते हैं. सचिन के बारे में इससे अधिक और क्या कहा जा सकता है. सचिन खिलाड़ियों की उस श्रेणी में आते हैं जिसमें टाइगर वूड्स और माइकर शूमाकर जैसे लोगों का नाम आता है. उनका जादू भारत तक सीमित नहीं है. |
| DATE: 2013-11-12 |
| LABEL: sports |
| [700] TITLE: दर्द तो है लेकिन ख़ुश हैं सचिन |
| CONTENT: एक व्यक्ति और खिलाड़ी के तौर पर सचिन तेंदुलकर में कोई फ़र्क नहीं है. निजी ज़िंदगी और खेल के मैदान दोनों ही जगह सचिन प्रतिबद्धता के पक्के हैं. दोनों जगह उनमें ईमानदारी और एकाग्रता है. जो भी काम करते हैं बहुत सूझबूझ और लगन के साथ करते हैं. भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों में मैदान के भीतर वक्त की पाबंदी है लेकिन मैदान से बाहर वक्त की यही पाबंदी उन पर लागू नहीं होती. लेकिन सचिन तेंदुलकर दोनों मोर्चों पर पाबंद हैं. सचिन के साथ ये मेरा निजी अनुभव है. मैंने ख़ुद देखा है कि जब बच्चें उन्हें घेर लेते हैं और उनका ऑटोग्राफ मांगते हैं तो वे इत्मीनान से उन्हें ऑटोग्राफ देते हैं और उनसे बात भी करते जाते हैं. इसमें 15-20 मिनट भी लग जाएं तब भी उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती. इस स्तर के खिलाड़ी के लिए यूं सामान्य तरीके से ज़िंदगी बिताना मुश्किल होता है लेकिन सचिन इसी तरह जीते हैं. आप पर दिन-रात मीडिया की नज़र बनी रही तो सामान्य ज़िंदगी जीना मुश्किल हो जाता है. सचिन के बेटे अर्जुन जब खेलते हैं तब भी मीडिया इसी तरह नज़र गड़ा देता है. मुझे लगता है कि इस मामले में सचिन और उनके बेटे अर्जुन दोनों के साथ ग़लत हो जाता है. सचिन ये सब बीते 20-25 साल से झेल रहे हैं मुझे नहीं लगता कि ये सब झेलना इतना आसान होता है. कोई भी खिलाड़ी जब अपने करियर की चरम सीमा पर पहुंचता है तो लगता है कि अब उसे खेल को अलविदा कह देना चाहिए. मगर जो चीज़ आपके साथ 25 साल तक जुड़ी रही उसे अलविदा कहना बड़ा मुश्किल हो जाता है. साल 2011 के विश्व कप के बाद सचिन के दिमाग में क्रिकेट को अलविदा कहने की बात आई ज़रूर होगी लेकिन टैस्ट क्रिकेट से उनका लगाव हमेशा रहा. तभी उन्होंने पहले एकदिवसीय क्रिकेट को अलविदा कहा और टेस्ट क्रिकेट खेलते रहे. फॉर्म थोड़ा गड़बड़ाया थोड़ा दबाव तो रहा ही होगा. जब टेस्ट क्रिकेट में 198 मैच खेल लिए तो उनके दिमाग में कही ना कहीं ये बात रही होगी कि अब 200 मैच पूरे हो जाएं. कह सकते हैं कि इतने मैच खेलना भी उनका एक ड्रीम रहा होगा. जो हुआ अच्छा हुआ. सचिन ख़ुश हैं बोर्ड ख़ुश है लोग भी ख़ुश हैं. मुझे लगता है कि उनके संन्यास लेने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. |
| DATE: 2013-11-12 |
| LABEL: sports |
| [701] TITLE: सचिन बायां जूता पहले क्यों पहनते हैं? |
| CONTENT: जिस मैच के ज़रिए सचिन ने टैस्ट मैच में अपना पदार्पण किया था वही मेरा भी पहला टैस्ट मैच था. तब सचिन की उम्र महज़ सोलह साल थी. हम दोनों ही बच्चे थे. उम्मीदें ज्यादा थी और दौरा मुश्किल क्योंकि पाकिस्तान जाकर पाकिस्तानियों के विरुद्ध खेलना कोई आसान काम नहीं था. दोनों देशों के लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई थीं. पाकिस्तान की तरफ़ से वक़ार गेंदबाज़ के तौर पर पहली बार मैदान में उतर रहे थे. पाकिस्तान के पास इमरान ख़ान और वसीम अक़रम जैसे गेंदबाज़ थे. पाकिस्तान टीम के खिलाड़ियों को लग रहा था कि ये बच्चा क्या कर पाएगा लेकिन वसीम भाई कह रहे थे कि ये बच्चा कोई आम बच्चा नहीं है और आगे जाकर भारत के लिए लम्बी पारी खेलेगा. सचिन तब मुंबई की ओर से और मैं महाराष्ट्र की तरफ़ से मैदान में उतरता था. भारतीय टीम में उस समय कपिल देव नवजोत सिंह सिद्धू मोहम्मद अज़हरुद्दीन कृष्णामचारी श्रीकांत जैसे दिग्गज खिलाड़ी थे. सबको अहसास था कि ये लड़का आगे चलकर भारत के लिए बहुत ख़ूब क्रिकेट खेलेगा. सचिन की उम्र सोलह साल भले ही थी लेकिन वो पचास साल के आदमी की तरह सोचते थे. उनमें क्रिकेट के प्रति गजब की प्रतिबद्धता थी. सचिन ने पाकिस्तान दौरे में अब्दुल क़ादिर की गेंदों पर जमकर छक्के जड़े थे. हुआ ये था कि अब्दुल भाई ने कहा था कि मैं इसका विकेट चटका दूंगा. मेरा अंदाज़ ग़लत नहीं है तो उनके एक ओवर में सचिन ने तीन छक्के लगाए थे. एक छक्का तो इतना ज़ोरदार था कि गेंद ड्रेसिंग रूम के अंदर आकर गिरी थी. क़ादिर के लिए वो ओवर बड़ा ही महंगा साबित हुआ था. ये एक बड़ी विडम्बना रही कि सचिन और मैंने एक साथ टैस्ट मैच में पदार्पण किया लेकिन वही मैच मेरे लिए पहला और आख़िरी टैस्ट मैच साबित हुआ जबकि सचिन ने इसे यादगार बना दिया और अगले 25 साल तक जमकर क्रिकेट खेला. मुझे दो साल के लिए फिटनेस की समस्या हो गई थी. मुंबई का मैच सचिन का आख़िरी मैच भले ही हो लेकिन उन्हें किसी ना किसी रूप में क्रिकेट से जुड़े रहना चाहिए क्योंकि क्रिकेट के इतिहास में दोबारा कोई सचिन तेंदुलकर होगा ऐसा मुझे नहीं लगता. सचिन को युवा क्रिकेट खिलाड़ियों के साथ अपने अनुभव साझा करना चाहिए. बहुत कम लोग ये बात जानते हैं कि सचिन नींद में भी क्रिकेट की बात करते थे. सोते-जागते खाते-पीते हर वक्त उनके दिमाग में बस क्रिकेट ही होता था. सचिन हमेशा पहले बाईं जुराब और बायां जूता पहनते हैं. इस मामले में सचिन में एक तरह का अंधविश्वास शुरू से ही रहा है. |
| DATE: 2013-11-12 |
| LABEL: sports |
| [702] TITLE: पुरानी शराब की तरह हैं सचिन तेंदुलकर |
| CONTENT: भारतीय टीम आगे जब भी क्रिकेट मैच खेलने मैदान पर उतरेगी तो सचिन तेंदुलकर टीम का हिस्सा नहीं होंगे. लगभग 24 साल हो गए हैं और हमें सचिन को मैदान पर देखने की आदत पड़ चुकी है. वो जब भी मैदान में उतरे हमने हर बार उनसे उम्मीद लगाई और वे भी हर बार हमारी उम्मीदों पर खरे उतरे. उन्होंने क्रिकेट के ज़रिए जितना मनोरंजन खेल-प्रेमियों का किया है उतना शायद ही किसी और देश के खिलाड़ी ने किया होगा. सचिन की कमी हमेशा महसूस की जाएगी. सचिन के जाने के बाद टीम में उनकी कमी हमेशा रहेगी. भारतीय टीम में और भी खिलाड़ी हैं जो क्रिकेट प्रेमियों का मनोरंजन करते रहेंगे लेकिन सचिन की भरपाई कोई खिलाड़ी नहीं कर पाएगा. एक खिलाड़ी के तौर पर सचिन की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि वो पंद्रह साल की उम्र में ही क्रिकेट के हिसाब से काफी परिपक्व हो गए थे. ये बात रणजी ट्रॉफी में उनके पहले सीज़न की है. मैच खेलने दिल्ली की टीम मुंबई गई जहां दोनों पारियों में उन्होंने अर्धशतक जड़े थे. मैं गेंदबाज़ी और सचिन बल्लेबाजी कर रहे थे. सचिन ने जब बल्लेबाजी की तो ऐसा लगा मानो ये खिलाड़ी पिछले पंद्रह सालों से प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेल रहा है. ये परिपक्वता धीरे-धीरे और बढ़ती चली गई. शराब के लिए कहते हैं कि जितनी पुरानी हो उतनी ही अच्छी होती है कुछ वैसी ही बात सचिन के साथ रही. उनकी परिपक्वता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि वो अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में 24 साल तक लगातार दबावों के बीच खेलते रहे. क्रिकेट के प्रति उनके जुनून का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि सचिन से यदि कहा जाए कि मैच के बाद आप यहीं मैदान में सो जाइए और सुबह फिर यहीं खेलना है तो वो इसके लिए भी राजी हो जाएं. अपने इसी जुनून की वजह से वो इतने साल तक क्रिकेट खेलते रहे. 24 साल अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट और उसके पहले भी पांच-छह साल क्रिकेट वो खेल चुके थे. यानी कुल 30 साल तक एक जैसे जुनून के साथ क्रिकेट खेलते रहना कोई आसान बात नहीं है. सचिन आज भी उतने ही विनम्र है जितने 15 साल पहले थे. इतनी उपलब्धियों के बावजूद किसी इंसान के पांव धरती पर ही रहें इससे बड़ी भला और क्या खासियत हो सकती है. कमेंट्री के दौरान हमने देखा कि लोग सचिन के साथ तस्वीरें खिंचवाने के लिए लालायित रहते हैं. सचिन लोगों से कहते थे कि मुझे छूना मत मैं बस की तरफ धीरे धीरे चलूंगा बस मेरे बिना जाएगी नहीं और जितनी चाहे तस्वीरें खींच लेना. सचिन ने यहां भी अपने चाहने वालों को निराश नहीं किया. साल 1989 के पाकिस्तान दौरे पर सचिन ने पहले टैस्ट मैच में शायद कुछ खास रन नहीं बनाए थे. सचिन नेट में लेग-स्पिन गेंदबाजी कर रहे थे और गेंद को अच्छा टर्न दे रहे थे. मैंने सचिन से कहा कि बल्लेबाज के तौर पर यदि आप अच्छा नहीं कर पाते हैं तो एक अच्छे लेग-स्पिनर भी बन सकते हैं. आज मुझे अपनी इस बात पर हंसी आती है कि मैं उस सचिन को ये सलाह दे रहा था जिसे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सौ शतक लगाने थे. युवा खिलाड़ियों में विराट कोहली ने सचिन तेंदुलकर से बहुत कुछ सीखा है. विराट कोहली अंडर-19 से इंटरनेशनल क्रिकेट में आने पर कुछ भटक गए थे. लेकिन उन्होंने सचिन के साथ रहकर बहुत कुछ सीखा जो आपको चोटी का खिलाड़ी बनाने में मददगार साबित होता है. वहीं सुरेश रैना सचिन के साथ खेलकर भी नहीं सीख पाए. युवराज भी टैस्ट मैच में खेलने के गुर नहीं सीख पाए. सचिन नेट प्रैक्टिस भी ऐसे करते थे जैसे मैच खेल रहे हों. युवा खिलाड़ियों को सचिन से ये सब बातें सीखना चाहिए. |
| DATE: 2013-11-12 |
| LABEL: sports |
| [703] TITLE: जब क़ादिर की गेंद सचिन के बल्ले से टकराई |
| CONTENT: ये महज इत्तेफाक की बात है कि सचिन तेंदुलकर ने कराची के नेशनल स्टेडियम में जब पहला टैस्ट मैच खेला उस मैच को मैंने कवर किया. बड़ा ही ज़बर्दस्त माहौल था क्योंकि भारत की उस टीम में एक से बढ़कर एक खिलाड़ी थे. कपिल सिद्धू संजय मांजरेकर जैसे खिलाड़ियों में सचिन को एक नौजवान खिलाड़ी के तौर पर शामिल किया गया था. तब सचिन को किसी ने इतनी खास तवज्जो नहीं दी थी. सबको बस इतना पता था कि सचिन भारत की घरेलू श्रृंखला में खेलकर आए हैं. तब सुनील गावस्कर ये कह चुके थे आने वाले समय में सचिन क्रिकेट की दुनिया पर राज करेंगे. सचिन जब आए थे तब पाकिस्तान की टीम में इमरान ख़ान वसीम अकरम वकार यूनुस और अब्दुल क़ादिर जैसे गजब के गेंदबाज़ थे. बाद में सचिन ने एक साक्षात्कार में भी कहा था कि उन्होंने पाकिस्तान दौरे में इन चार गेंदबाजों को झेला था. बाद में उन्होंने क़ादिर की गेंद पर छक्के भी जड़े. सचिन टैस्ट क्रिकेट में पहली बार वकार यूनुस के हाथों आउट हुए थे. बाद में वकार यूनुस ने भी माना कि एक पारी में सचिन ने जो दो चौके जड़े थे वो बड़े ही क्लासिक थे जो उन्हें आज भी याद हैं. बाद की पारियों से भी सचिन ने जता दिया था वो अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में राज करेंगे. दूसरा इत्तेफाक ये रहा कि सचिन ने एकदिवसीय मैचों में अपना पहला शतक ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ कोलम्बो में जड़ा था. मैं उस मैच का भी गवाह हूं. हालांकि वहां उन्होंने शतक बनाने में थोड़ा ज्यादा वक्त लगाया था लेकिन शतक के बाद वो रुके नहीं थे और फिर उन्होंने दुनिया के हर गेंदबाज को छकाया. सचिन ने क्रिकेट को अपनी शर्तों पर खेला है. कराची में जिस मैच में सचिन ने क़ादिर की गेंद पर छक्के जड़े थे. ये अलग बात है कि वो आधिकारिक मैच होने की बजाए एक्ज़ीबिशन मैच में तब्दील हो गया था. मैदान पर दोनों के बीच क्या कहा-सुनी हुई पता नहीं लेकिन क़ादिर ने ज़रूर ये सोचा होगा कि वो सचिन को आसानी से आउट कर देंगे. लेकिन वो शायद भूल गए थे कि अगर उनके पास गेंद थी तो सचिन के पास भी बल्ला था. लेकिन तब पाकिस्तान के मीडिया ने सचिन को उतनी तरजीह नहीं दी थी क्योंकि तब भारतीय टीम में और भी सितारे जगमगाते थे. उस वक़्त पाकिस्तान के कुछ अखबारों ने ये घोषणा कर दी थी कि सचिन इसी तरह मेहनत करते रहे तो उनका मुस्तकबिल बड़ा ही रौशन होगा. ये भी बड़ी हैरानी की बात रही कि जिस उम्र में बच्चे स्कूल का बैग लेकर चलते हैं उस उम्र में सचिन क्रिकेट का किट लेकर चलते थे और इसके बाद उन्होंने फिर कभी पलटकर नहीं देखा. |
| DATE: 2013-11-12 |
| LABEL: sports |
| [704] TITLE: नडाल को हरा जोकोविच का अंतिम एटीपी टूर्नामेंट पर क़ब्ज़ा |
| CONTENT: गत चैंपियन सर्बिया के नोवाक जोकोविच ने दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी स्पेन के राफ़ेल नडाल को 6-3 और 6-4 से हराकर सत्र के अंतिम टूर्नामेंट एटीपी वर्ल्ड टूर फ़ाइनल्स में अपना ख़िताब बरक़रार रखा है. दुनिया के दो शीर्ष खिलाड़ियों के बीच सोमवार को खेले गए फ़ाइनल में कड़े मुक़ाबले की उम्मीद की जा रही थी लेकिन जोकोविच ने लगातार सेटों में जीत दर्ज की. जोकोविच ने तीसरी बार यह टूर्नामेंट जीता है जबकि नडाल अभी तक एक भी बार यह ख़िताब नहीं जीत पाए हैं. इस साल अमरीकी ओपन के फ़ाइनल में नडाल से हारने के बाद जोकोविच ने अपने प्रदर्शन में काफ़ी सुधार किया है और यह उनकी लगातार 22वीं जीत थी. इस जीत के बाद जोकोविच ने कहा सबसे अच्छी बात यह रही कि नडाल से कुछ बड़े मुक़ाबले विशेषकर रोलैंड गैरस अमरीकी ओपन के फ़ाइनल और विंबल्डन के फ़ाइनल में हारने के बावजूद मैंने जीत हासिल की. जोकोविच ने एक बार फिर इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट को जीतने की नडाल की हसरत पर पानी फेर दिया हैं. शानदार फ़ॉर्म में चल रहे नडाल इस हार से एक बार फिर चारों ग्रैंड स्लैम ओलंपिक में गोल्ड डेविस कप और साल के अंतिम टूर्नामेंट को जीतने का कारनामा नहीं कर पाए. इनसे पहले केवल आंद्रे अगासी के नाम यह उपलब्धि दर्ज है. हार के बाद नडाल ने कहा आज की जीत-हार से मेरा करियर नहीं बदलने जा रहा. मैं बहुत निराश नहीं हूं. मुझे पता है कि आज मेरा दिन नहीं था. सोमवार को मिली यह हार नडाल के लिए एक बड़ा झटका है क्योंकि पिछले माह ही उन्होंने डोकोविच को नंबर-1 से बेदख़ल किया था. अब इन दोनों दिग्गजों के बीच अगले साल ऑस्ट्रेलियन ओपन में एक बार फिर मुक़ाबले देखने को मिलेंगे. पिछले 19 फ़ाइनल मुक़ाबलों में जोकोविच ने 10 बार नडाल को हराया है और सितंबर में अमरीकी ओपन के बाद से वह लगातार जीतते आ रहे हैं. जोकोविच ने कहा अमरीकी ओपन के बाद निश्चित तौर पर यह देखने की ज़रूरत थी कि मुझसे कहां ग़लती हो रही है विशेषकर नडाल के ख़िलाफ़ मुक़ाबलों में. मुझे लगता है पिछले ढाई माह में किए गए मेहनत का नतीजा दिखने लगा है. |
| DATE: 2013-11-12 |
| LABEL: sports |
| [705] TITLE: अंतरिक्ष सैर से धरती पर लौटी ओलंपिक मशाल |
| CONTENT: चार दिन की यात्रा के बाद ओलंपिक मशाल धरती पर वापस आ गई है. मशाल सोमवार सुबह कज़ाखस्तान में उतरी. सोयूज़ अंतरिक्ष यान तीन अंतरिक्ष यात्रियों के साथ मशाल लेकर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से वापस लौटा. तीनों अंतरिक्ष यात्री कज़ाखस्तान के समयानुसार सुबह 8. 49 बजे बेहद ठंडे मौसम में पैराशूट से एक घास के मैदान पर उतरे. उन्हें स्पेस स्टेशन से धरती पर आने में करीब साढ़े तीन घंटे का समय लगा. जिसका सीधा प्रसारण रूसी और नासा टीवी पर किया गया. जब मशाल को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर ले जाया गया था तब इसकी लौ बुझा दी गई थी. दो रूसी अंतरिक्ष यात्रियों ओलेग कोतोव और सर्गेई रियाझांस्की ने ओलंपिक मशाल को अंतरिक्ष की सैर कराई. मशाल के साथ सोयूज़ कैप्सूल से रूस के फ़्योदोर युरचिखिन अमरीका के केरेन नीबर्ग और इटली के लूका पर्मितानो वापस धरती पर आए. 2014 में रूस में विंटर ओलंपिक होने हैं और मशाल को अंतरिक्ष की सैर कराना इसी तैयारी की हिस्सा है. इतिहास में पहली बार ओलंपिक मशाल को अंतरिक्ष में सैर कराई गई. शनिवार को ओलंपिक मशाल कज़ाखस्तान के बायकानूर अंतरिक्ष स्टेशन से इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन तक ले जाई गई थी. ओलंपिक मशाल को पहले भी दो बार अंतरिक्ष में ले जाया गया है -1996 और 2000 में लेकिन तब उसे अंतरिक्ष यान से बाहर नहीं निकाला गया था. इस मशाल का इस्तेमाल शीतकालीन ओलंपिक समारोह के दौरान किया जाएगा. |
| DATE: 2013-11-11 |
| LABEL: sports |
| [706] TITLE: जंगली सुअरों ने खोद डाला फ़ुटबॉल का मैदान |
| CONTENT: इंग्लैंड में जंगली सुअरों ने नॉन-लीग फ़ुटबॉल क्लब के होम ग्राउंड की पिच को एक हफ़्ते में दो बार खोदकर मुश्किल खड़ी कर दी है. ग्लूसेस्टर नॉर्दर्न सीनियर लीग साइड साउडली एएफ़सी डीन जंगल के किनारे पर है. क्लब के अनुसार उसे 1000 पौंड क़रीब एक लाख रुपए के नुक़सान का अनुमान है. अब तक सुअर तीन बार सुअर का नुक़सान कर चुके हैं. क्लब के चेयरमैन इयान मारफ़ेल कहते हैं हमारे मैदानकर्मियों के अनुसार क्रिसमस से पहले तक पिच ठीक नहीं हो पाएगी. वे बताते हैं हमारे स्थानीय मैदानकर्मियों ने हमें फ़ोन करके इस बारे में बताया और सोमवार को हम मैदान देखने गए. पिच बहुत ख़राब स्थिति में थी. यह बहुत ख़राब हुआ. उसके बाद हमने पिच को दुरुस्त करने के लिए काम करवाया लेकिन वो फिर घुस आए. जंगल से लगे मैदान को घेरने वाली बाड़ में से ये सुअर मैदान में घुस रहे हैं. पांच साल पहले भी क्लब को इसी दिक़्क़त से दो-चार होना पड़ा था लेकिन तब मामला इतना गंभीर नहीं था. मार्फ़ेल ने बीबीसी स्पोर्ट्स को बताया अगले दिन वहां एक सुअर विशेषज्ञ को भी ले जाया गया और उसने बताया कि यह जानवर आदतन ऐसा कर रहे हैं. क्योंकि यह एक तराशा हुआ मैदान है इसलिए यहां खोदने पर उन्हें कीड़े जैसा खाना आसानी से मिल जाता है. वह तो बस यहां जल्दी से घुसकर खाने की तलाश में खोदने लगते हैं. क्लब के खिलाड़ी हर हफ़्ते खेलने के लिए पांच पौंड क़रीब पांच सौ रुपए देते हैं. मार्फ़ेल के अनुसार वह जानते हैं कि जंगल से घिरे होने का क्या मतलब होता है. उन्होंने बताया यहां किसी भी क्लब के साथ ऐसा हो सकता था लेकिन हम ही बदक़िस्मत थे. अब खिलाड़ी जाकर देखेंगे कि वह इसे दुरुस्त करने के लिए क्या कर सकते हैं. पिछले दस सालों से इसे डीन जंगल में सबसे शानदार पिचों में से एक माना जाता था. इसलिए इसे इस हालत में देखकर थोड़ी तकलीफ़ तो होती है. पिछले साल फ़रवरी 2012 में एक बिल्ली एनफ़ील्ड पिच पर घुस आई थी. तब लिवरपूल ने टॉटेनहैम के ख़िलाफ़ गोलविहीन मैच खेला था जो ड्रॉ हो गया था. |
| DATE: 2013-11-10 |
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| [707] TITLE: विश्व शतरंज चैंपियनशिपः दूसरी बाज़ी भी ड्रॉ |
| CONTENT: भारत के विश्वनाथन आनंद और नॉर्वे के मैग्नस कार्लसन के बीच चल रहे विश्व शतरंज चैंपियनशिप के मैच के दौरान दूसरी बाज़ी भी ड्रॉ रही. रविवार को चेन्नई में खेले गए मैच में सिर्फ़ 25 चालें ही चली गईं जिनमें दोहराव देखने को मिला. मौजूदा चैंपियन आनंद ने बाज़ी की शुरुआत राजा के सामने वाले प्यादे को चौथे खाने पर रखने से की और जवाब में कार्लसन ने कारो-कैन चाल के साथ बचाव किया. इसे थोड़ा अचरज भरा माना जा रहा है क्योंकि कार्लसन कारो-कैन चाल विरले ही चलते हैं. पिछली बार उन्होंने इसका इस्तेमाल 2011 में किया था. हालांकि आनंद को इसका ताज़ा अनुभव है क्योंकि वह ग्रैंडमास्टर डिंग लिरेन के ख़िलाफ़ मैच जीते थे लेकिन 14वीं चाल में उन्होंने राह बदली और 14-0 के साथ तेज़ हमला किया. दोनों ने एक दूसरे का एक-एक घोड़ा लिया और फिर कार्लसन ने अपने वज़ीर को डी5 पर रखकर एक और प्रस्ताव रखा. कमेंटेटर्स और दर्शकों को आश्चर्यचकित करते हुए कार्लसन 18. क्यूजी4 पर आगे बढ़कर दबाव डालने के बजाय इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. नतीजा ये हुआ कि दोनों के बराबर मोहरे बचे थे. आनंद ने अपने हाथियों को राजा के साथ रखकर विपक्षी की पैदल सेना पर निगरानी बनाए रखी और इसके चलते चालों का दोहराव हुआ. इससे पहले शनिवार को आनंद और कार्लसन के बीच पहली बाजी भी ड्रॉ रही थी. खेल के दौरान सिर्फ़ 16 चालें ही चली गई थीं. विश्व चैंपियनशिप 12 बाज़ियों तक चलेगी. विजेता को इसमें क़रीब 14 करोड़ रुपए की इनामी राशि दी जाएगी. 43 साल के आनंद सातवीं बार विश्व शतरंज चैंपियनशिप के मुक़ाबले में हिस्सा ले रहे हैं और उन्होंने 2007 से अब तक पांच बार ख़िताबी जीत हासिल की है. कार्लसन पहली बार विश्व मुक़ाबले में उतरे हैं लेकिन उन्हें ख़िताब का मज़बूत दावेदार माना जा रहा है. वह 22 साल की उम्र में ही दुनिया के ऐसे ख़िलाड़ी बन चुके हैं जिन्होंने शतरंज में सबसे ज़्यादा अंक हासिल किए हैं. |
| DATE: 2013-11-10 |
| LABEL: sports |
| [708] TITLE: आनंद-कार्लसन के बीच पहली बाज़ी ड्रॉ |
| CONTENT: चेन्नई में भारत के विश्वनाथन आनंद और नॉर्वे के कार्लसन मैग्नस के बीच चल रही बहुचर्चित विश्व शतरंज चैंपियनशिप की पहली बाज़ी ड्रॉ रही. खेल के दौरान सिर्फ़ 16 चालें ही चली गईं. विश्वनाथन आनंद ने काले मोहरों के साथ खेल की शुरुआत की. विश्वनाथन आनंद वैसे तो ज़ोरदार शुरुआत करने के लिए जाने जाते हैं लेकिन कार्लसन के सामने उन्हें भी सोच-समझकर चालें चलनी पड़ीं. उल्लेखनीय है कि जहां विश्वनाथन आनंद शतरंज की बिसात पर ख़ुद को माहिर बनाने के लिए कंप्यूटर से भी मुक़ाबला करते रहते हैं वहीं दूसरी तरफ़ कार्लसन नई तकनीक से दूर ही रहना पसंद करते हैं. 43 साल के आनंद सातवीं बार विश्व शतरंज चैंपियनशिप के मुक़ाबले में हिस्सा ले रहे हैं और उन्होंने 2007 से अब तक पांच बार ख़िताबी जीत हासिल की है. दूसरी तरफ़ कार्लसन पहली बार विश्व मुक़ाबले में उतरे हैं. मगर कार्लसन 22 साल की उम्र में ही दुनिया के ऐसे ख़िलाड़ी हैं जिन्होंने शतरंज में सबसे ज़्यादा अंक हासिल किए हैं. उन्होंने गैरी कास्पारोव का रिकॉर्ड तोड़ा था. उन्हें खेल के जानकार शतरंज का मोज़ार्ट भी कहते हैं. उनकी रेटिंग 2872 तक पहुंच गई थी. जो शतरंज के इतिहास में सबसे ज़्यादा रही है. कई साल तक शतरंज में रूस का वर्चस्व रहा. स्पास्की अनातोली कार्पोव और फिर गैरी कास्पारोव के बाद भी रूसी मास्टर्स ने राज किया. इसके बाद आनंद ने इस ख़िताब पर क़ब्ज़ा किया. विश्व चैंपियनशिप 12 बाज़ियों तक चलेगी. विजेता को इसमें क़रीब 14 करोड़ रुपए की इनामी राशि दी जाएगी. |
| DATE: 2013-11-09 |
| LABEL: sports |
| [709] TITLE: कहीं खतरे में तो नहीं आनंद का खिताब? |
| CONTENT: चेन्नई में शनिवार से शतरंज की बिसात पर दुनिया के दो धुरंधर आमने-सामने होंगे. एक तरफ होंगे पांच बार के विश्व चैंपियन भारत के विश्वनाथन आनंद तो दूसरी तरफ होंगे नॉर्वे के मैग्नस कार्लसन. शतरंज के ये माहिर खिलाड़ी विश्व चैंपियनशिप में एक दूसरे को मात देने के लिए 12 बाजी क्लासिक प्रणाली के तहत खेलेंगे. सबसे पहले जो खिलाड़ी 6-5 अंक हासिल कर लेगा वही चैंपियन बनेगा और अगर ऐसा 12 बाज़ियों से पहले हो जाता है तो फिर बाकी बाज़ियां नहीं होंगी. अब शह और मात के इस खेल में कौन चैंपियन बनता है यह बाद में पता चलेगा लेकिन पूरी दुनिया में इस मुक़ाबले का बेसब्री से इंतज़ार किया जा रहा है. आखिरकार क्या है इसकी ख़ास वजह. जाने माने खेल विश्लेषक वी कृष्णास्वामी कहते हैं आज से 18 साल पहले जब 1995 में न्यूयॉर्क में पीसीए विश्व चैंपियनशिप के लिए गैरी कास्पारोव के साथ मुक़ाबला था तब कहा जा रहा था कि आनंद अभी उभरते सितारे हैं लेकिन आने वाले समय में विश्व चैंपियन बनेंगे. उसके बाद आनंद साल 2000 2007 2008 2010 और 2012 में यानी पांच बार विश्व चैंपियन बने. अब जब चेन्नई में उनके सामने 22 साल के मैग्नस कार्लसन बैठेंगे तो शायद आनंद को वही वक्त फिर याद आएगा. 44 साल के आनंद और 22 साल के कार्लसन को लेकर इसीलिए पूरे शतरंज जगत ही नहीं बल्कि समस्त खेल जगत में उत्सुक्ता बढ़ गई है. इसके अलावा इस मुक़ाबले की तुलना साल 1972 में बॉबी फ़िशर और बोरिस स्पास्की के बीच हुए मुक़ाबले से भी की जा रही है. कृष्णास्वामी इसकी वजह बताते हुए कहते हैं उस समय रूस और अमरीका के बीच शीतयुद्ध जैसी स्थिति थी. उस समय राजनीतिक मतभेद भी बहुत थे. आज खेलों के साथ राजनीति पैसा और पब्लिसिटी के अलावा पूरे विश्व में इस तरह के मुक़ाबले को इसलिए भी विशेष रूप से देखा जा रहा है क्योंकि कास्पारोव के बाद यह दोनों पहली बार इस तरह के खिलाड़ी हैं जिनकी शतरंज की समझ सबसे अलग और विलक्षण है और सबको लुभाती भी है. इस मुक़ाबले में आनंद अपने खेल की शुरूआत काले मोहरे से करेंगे जिसके फ़ायदे के बारे में कृष्णास्वामी कहते हैं अगर पहले गेम में किसी खिलाड़ी के पास काले मोहरे हों और अगर वह ड्रॉ कर ले तो उसे थोड़ा शुरूआती फायदा होता है. कृष्णास्वामी आगे बताते हैं हर खिलाड़ी की यही चाहत होती है कि अगर उसे शुरूआत में फायदा हो तो बाद में उसका अधिक लाभ मिलने की संभावना अधिक रहती है. इसके अलावा जिस खिलाड़ी को पहले काले मोहरे मिलते हैं उसी खिलाड़ी को छठे और सातवें गेम में सफेद मोहरे मिलते हैं और वह खिलाड़ी होंगे आनंद. कृष्णास्वामी आगे कहते हैं लगातार दो सफेद मोहरे मिलने से आनंद को आक्रामक रुख अपनाने का मौक़ा मिल जाता है. दूसरी तरफ जिसे शुरूआत में सफेद मोहरों से खेलने का अवसर मिलता है उसे 12वें गेम में फिर सफेद मोहरे से खेलने का अवसर मिलता है और वह मौक़ा होगा कार्लसन के पास. अगले तीन हफ्ते में दोनों खिलाड़ी 12 बार एक-दूसरे से टक्कर लेंगे. हर जीत के बाद एक-एक अंक और हर ड्रॉ के लिए आधा-आधा अंक मिलेगा. आनंद और कार्लसन के बीच जीत की संभावना को लेकर कृष्णास्वामी कहते हैं अनुभव के आधार पर आनंद का पलड़ा थोड़ा भारी है लेकिन दोनो में अंतर केवल 51-49 का है. आनंद के पास 7 विश्व चैंपियशिप खेलने का अनुभव है जबकि कार्लसन के पास यह पहला अवसर आया है. कार्लसन की रेटिंग आनंद के मुक़ाबले 80 या 90 अंक ज़्यादा है लेकिन इस तरह के मुक़ाबलों में अनुभव का भी विशेष महत्व है. कृष्णास्वामी कहते हैं आनंद की शुरूआत बेहद ज़बरदस्त होती है और बाद में वह सोची समझी रणनीति से खेलते हैं. दूसरी तरफ कार्लसन अपनी सोच के अनुसार खेलते हैं पूर्वानुमान के साथ खेलते हैं. कार्लसन के बारे में कहा जा सकता है कि शतरंज के बोर्ड पर उनकी समझ बेजोड़ है. तो 14 करोड़ रुपए की इनामी राशि वाली शतरंज की बिसात बिछ चुकी है लेकिन कौन होगा चैंपियन यह जानने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा. |
| DATE: 2013-11-09 |
| LABEL: sports |
| [710] TITLE: पुरुष हॉकी विश्वकप की मेजबानी करेगा भारत |
| CONTENT: भारत को एक बार फिर 2018 में पुरुष हॉकी विश्व कप की मेजबानी का मौका मिला है. भारत तीन साल पहले हॉकी विश्व कप की सफल मेजबानी कर चुका है और इस तरह आठ साल में दूसरी बार भारत में हॉकी विश्व कप का आयोजन किया जाएगा. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक 2018 में आयोजित होने वाले पुरुष और महिला विश्व कप मुकाबलों में कुल 16 टीमें एक दूसरे के आमने-सामने होंगी. 2018 में महिला हॉकी विश्व कप का आयोजन इंग्लैंड में किया जाएगा. पीटीआई की खबर में बताया गया है कि महिला टूर्नामेंट का आयोजन सात से 21 जुलाई के बीच होगा जबकि पुरुष विश्व कप का आयोजन एक से 16 दिसंबर के दौरान किया जाएगा. भारत ने इससे पहले 2010 में नई दिल्ली में विश्व कप की मेजबानी की थी जबकि अगले विश्व कप का आयोजन नीदरलैंड के हेग में जून 2014 के पहले दो सप्ताह के दौरान किया जाएगा. अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ एफआईएच ने गुरुवार रात एक बयान में कहा अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ सहर्ष घोषणा करता है कि 2018 में इंग्लैंड और भारत हॉकी विश्व कप की मेजबानी करेंगे. महिला आयोजन के लिए इंग्लैंड हॉकी ने सफलतापूर्वक बोली लगाई है जबकि पुरुषों की प्रतिस्पर्धा में हॉकी इंडिया को कामयाबी मिली है. एफआईएच के अध्यक्ष लिएंड्रो नेग्रे ने स्विट्जरलैंड के लॉज़ेन में एक विशेष कार्यक्रम के दौरान इसकी घोषणा की. लिएंड्रो नेग्रे ने कहा हॉकी विश्व कप 2018 की सफल बोली लगाने के लिए मैं इंग्लैंड हॉकी और हॉकी इंडिया को हार्दिक बधाई देता हूं. उन्होंने कहा कि दोनों बोलियां वास्तव में असाधारण थीं. हॉकी विश्व कप का आयोजन चार साल में एक बार किया जाता है और इसे दुनिया का सबसे चुनौतीपूर्ण और रोमांचक हॉकी मुकाबला माना जाता है. |
| DATE: 2013-11-08 |
| LABEL: sports |
| [711] TITLE: शतरंज के हैरी पॉटर हैं कार्लसन' |
| CONTENT: पांच बार के विश्व चैंपियन भारत के विश्वनाथन आनंद को चुनौती देने वाले नार्वे के युवा खिलाड़ी मैग्नस कार्लसन बेबाकी से अपनी दो कमज़ोरियों को स्वीकार करते हैं . पहली यह कि वह अच्छे विजेता नहीं हैं और दूसरी कि उन्हें हार पसंद नहीं है. 64 ख़ानों के इस खेल के महानतम खिलाडियों में से एक रूस के गैरी कास्परोव दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी कार्लसन को हैरी पॉटर टाइप का सुपर टैलेंट मानते हैं. साल 2010 में कार्लसन विश्व शतरंज महासंघ की शीर्ष खिलाड़ियों की सूची में टॉप पर पहुंचे थे और उनका स्कोर अपने कोच कास्परोव से भी ज़्यादा था. 22 साल के कार्लसन ने पिछले महीने ओस्लो में संवाददाताओं से कहा था आप दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी होने के साथ हार को आसानी से पचाने वाले खिलाड़ी नहीं हो सकते. लेकिन मैं साथ ही अच्छा विजेता भी नहीं हूं. उन्होंने कहा मैं जीतने वाले खिलाड़ी के साथ मुस्कराते हुए फ़ोटो नहीं खिंचा सकते. खासकर जबकि वे जीत के हक़दार न हों. शतरंज से मिली फुर्सत में कार्लसन फ़ैशन मॉडल हैं. प्रतिष्ठित अमरीकी पत्रिका टाइम ने उन्हें 2013 में दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शुमार किया है. यह तब है जबकि उन्होंने विश्व चैंपियनशिप में आनंद के ख़िलाफ़ एक बाजी भी नहीं खेली है. कार्लसन अगर आनंद को हरा देते हैं तो वह 22 साल की उम्र में विश्व ख़िताब जीतने के कास्परोव के रिकॉर्ड की बराबरी कर लेंगे. हालांकि कास्परोव ने जब यह ख़िताब जीता था तो उनकी उम्र कार्लसन से कुछ महीने कम थी. पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं और कार्लसन पर यह जुमला फिट बैठता है. वह विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. दो साल की उम्र में ही उन्हें सभी कार ब्रांड्स का नाम याद हो गया और बाद में उन्होंने नार्वे के नगर निगमों उनके झंडों और प्रशासनिक केन्द्रों की सूची भी याद कर ली. उनका शतरंज से परिचय उनके पिता ने कराया था. बड़ी बहन से साथ प्रतिद्वंद्विता से कार्लसन की दिलचस्पी शतरंज में बढ़ी और आठ साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला टूर्नामेंट खेला. कार्लसन 2004 में उस समय सुर्खियों में आए जब उन्होंने पूर्व विश्व चैंपियन अनातोली कार्पोव को शिकस्त दी कास्परोव को ड्रा के लिए विवश किया और ग्रैंडमास्टर बन गए. इस शानदार उपलब्धि पर वाशिंगटन पोस्ट ने उन्हें शतरंज का मोज़ार्ट कहा. लेकिन अस्त व्यस्त और गंभीर दिखने वाला यह बच्चा यही रुकने वाला नहीं था. अगले कुछ सालों में उन्होंने तेज़ी से कामयाबी की सीढ़ियां चढीं. कास्परोव ने बिज़नेस इनसाइडर में अपने ताज़ा लेख में लिखा है कार्लसन रॉकेट की रफ़्तार से रेटिंग लिस्ट में शीर्ष पर पहुंचे. इतनी कम उम्र में यह निरंतरता और दृढ़ता दुर्लभ ही देखने को मिलती है. रूसी दिग्गज ने 2009 में कार्लसन को कोचिंग दी थी. उन्होंने कहा मैं कोई डम्बलडोर नहीं हूं लेकिन मैं कार्लसन में हैरी पॉटर वाली खूबियां देखता हूं. वह बेहद प्रतिभाशाली हैं और इस प्राचीन खेल के महानतम खिलाड़ियों में शामिल होने के लिए अग्रसर हैं. लेकिन अपने खेल के बारे में कार्लसन का कहना है मेरे खेल में अभी सुधार के गुंजाइश है. हर बाजी में मुझे लगता है कि मैं गलतियां करता हूं. इसमें कोई शक नहीं कि मुझमें प्रतिभा है लेकिन मुझे नहीं कि वह क्या है. कार्लसन की उपलब्धियों के ताज में केवल विश्व ख़िताब की कमी है और वह जानते हैं कि इस बार वह जानते हैं कि इस बार उन्हें जीत का प्रबल दावेदार माना जा रहा है. अगस्त में कार्पोव ने नार्वे की समाचार एजेंसी एनटीबी से कहा था सबकुछ कार्लसन के हाथ में है. वह आज़ जिस मुकाम पर हैं वहां वह किसी को भी हरा सकते हैं विश्व चैंपियन को भी. कार्लसन और 2007 से विश्व ख़िताब पर कब्जा जमाए आनंद के बीच मुक़ाबला शनिवार से चेन्नई में शुरू होगा जिसमें 12 बाजियां खेली जाएंगी. |
| DATE: 2013-11-08 |
| LABEL: sports |
| [712] TITLE: अपने पहले ही टेस्ट में रोहित का शतक, भारत 354/6 |
| CONTENT: भारत और वेस्टइंडीज़ के बीच कोलकाता में खेले जा रहे टेस्ट मैच में रोहित शर्मा और आर अश्विन की शानदार पारियों की मदद से भारत ने 120 रनों की बढ़त बना ली है. टेस्ट में दूसरे दिन भारत ने 37 रन से आगे खेलना शुरू किया और अपनी पहली पारी में छह विकेट गंवा कर कुल 354 रन बनाए. बुधवार को पहले बैटिंग करने वाली वेस्टइंडीज टीम पहली पारी में 234 रनों पर ही सिमट गई थी. भारत के स्कोर में सबसे बड़ा योगदान रोहित शर्मा नाबाद 127 रन और आर अश्विन नाबाद 92 रन का है. अपना पहला टेस्ट खेल रहे रोहित शर्मा ने शानदार शतक लगाया जबकि आर अश्विन शतक से 8 रन दूर हैं. रोहित शर्मा ने 114 गेंदों पर अपना शतक पूरा किया और इस दौरान उन्होंने 13 चौके और एक छक्का लगाया. उन्होंने ने दूसरे दिन कुल 16 चौके लगाए. रोहित शर्मा अपने पहले ही टेस्ट मैच में शतक लगाने वाले 14वें भारतीय बल्लेबाज़ बन गए हैं. रोहित शानदार फॉर्म में हैं. इससे पहले ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सिरीज़ के आखिरी वनडे मैच में उन्होंने दोहरा शतक लगाया था. इससे पहले मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर अपनी विदाई सिरीज़ के पहले टेस्ट की पहली पारी में गुरुवार को मात्र दस रन बनाकर आउट हो गए. अपना 199वां टेस्ट खेल रहे सचिन को शेन शिलिंगफोर्ड ने पगबाधा किया. उन्होंने 24 गेंदों का सामना किया और इस दौरान दो चौके लगाए. ऑफ़ स्पिनर ने सचिन को दूसरा गेंद से आउट किया. सचिन ने इस गेंद पर रक्षात्मक खेलने की कोशिश की लेकिन गेंद उनके पिछले पैड से जा टकराई. वेस्टइंडीज के खिलाड़ियों ने जोरदार अपील की जिस पर इंग्लैंड के अंपायर नाइजेल लॉंग ने सचिन को आउट क़रार दिया. हालांकि टेलीविज़न रिप्ले में ऐसा लग रहा है कि गेंद की ऊंचाई ज्यादा थी. सचिन को दूसरा खेलने में पहले भी परेशानी रही है. कोलकाता के ईडन गार्डन में सचिन जब आउट होकर मैदान से बाहर आ रहे थे तो दर्शकों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया लेकिन मास्टर ब्लास्टर सिर झुकाए चुपचाप ड्रेसिंग रूम की तरफ बढ़ गए. भारत ने दूसरे दिन अपनी पारी को बिना किसी नुकसान के खेल 37 रन से आगे शुरू किया. भारतीय पारी की शुरुआत शिखर धवन और मुरली विजय ने की और सुबह उनके विकेट सबसे पहले गिरे. धवन 23 और विजय 26 रन ही बना सके. ये दोनों विकेट शिलिंगफोर्ड के खाते में गए. चेतेश्वर पुजारा के रूप में भारत का तीसरा विकेट गिरा. वह 17 रन बनाकर शेल्डन कॉट्रेल का शिकार बने. उनका विकेट 79 के स्कोर पर गिरा. भारत के स्कोर में अभी तीन रन ही जुड़े थे कि शिलिंगफोर्ड ने सचिन को आउट करके भारत को चौथा झटका दे दिया. शिलिंगफ़ोर्ड का विकेट इससे पहले सचिन ने ही लिया था. विराट कोहली भी तीन रन बनाकर चलते बने. उन्हें भी शिलिंगफोर्ड ने आउट किया. इस तरह भारत की पारी में गिरे पांच विकेटों में चार शिलिंगफोर्ड ने चटकाए हैं. इसके बाद रोहित शर्मा ने कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के साथ मिलकर कुल 73 रनों की साझेदारी की. धोनी ने अभी 42 रन ही बनाया था कि उन्हें टीनो बेस्ट ने आउट कर दिया. उसके बाद आर अश्विन के साथ मिलकर दिन के समापन तक रोहित शर्मा क्रीज पर बने रहे. |
| DATE: 2013-11-07 |
| LABEL: sports |
| [713] TITLE: अंतरिक्ष में चहलक़दमी करेगी ओलंपिक मशाल |
| CONTENT: रूस में अगले साल सोच्चि में होने वाले शीतकालीन ओलंपिक खेलों की मशाल को लेकर सोयूज़ रॉकेट ने गुरुवार को अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरी. ओलंपिक मशाल और तीन अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर सोयूज़ रॉकेट ने कजाक़स्तान के बैकानूर से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र आईएसएस के लिए अपनी यात्रा शुरू की. यह पहला मौक़ा होगा जब ओलंपिक मशाल के साथ दो अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में चहलकदमी करेंगे. सुरक्षा कारणों से इस मशाल की ज्योति को प्रज्ज्वलित नहीं किया गया है. यह रूस के लिए राहत की बात हो सकती है क्योंकि पिछले महीने शुरू हुई रिले के दौरान यह कई बार बुझ गई थी. रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन इस आयोजन को भव्य बनाना चाहते हैं ताकि दुनिया के समक्ष रूस की आधुनिक तस्वीर पेश की जा सके. शनिवार को रुस के दो अंतरिक्ष यात्री मशाल को लेकर खुले अंतरिक्ष में विचरण करेंगे. इससे पहले साल 1996 और 2000 में भी ओलंपिक मशाल को अंतरिक्ष में ले जाया गया था लेकिन तब इसे अंतरिक्ष यान तक ही सीमित रखा गया था. सोयूज़ रॉकेट को सोच्चि ओलंपिक के नीले रंग से रंगा गया है और इसे एक ट्रेन से प्रक्षेपण स्थल पर लाया गया. यान रुस के मिखाइल ताइयूरिन अमरीका के रिक मस्त्राशियो और जापान के कोइची वताका को लेकर आईएसएस जाएगा. ताइयूरिन फिर ओलंपिक मशाल को आईएसएस पर मौजूद अपने देश के दो अंतरिक्ष यात्रियों ओलेग कोतोव और सर्गेई रयाजनस्की को सौपेंगे जो इसे लेकर अंतरिक्ष में विचरण करेंगे. कोतोव ने कहा हम इस पूरे आयोजन को भव्य बनाना चाहते हैं. हम अंतरिक्ष में ओलंपिक मशाल का प्रदर्शन करना चाहते हैं. उन्होंने कहा हम अपने काम को शानदार ढंग से करना चाहते हैं क्योंकि दुनियाभर में लाखों लोग इसका सीधा प्रसारण देखेंगे. रूस के फ्योदोर यूरचीखिन अमरीका के कैरन नाइबर्ग और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के लूका पारमितानो 11 नवंबर को इस मशाल को वापस धरती पर लाएंगे. धरती पर पहुंचने के बाद मशाल फिर अपने 65000 किलोमीटर के सफ़र को पूरा करने के अभियान पर निकल जाएगी. इस मशाल को परमाणु ऊर्जा से चलने वाले आइस ब्रेकर पर उत्तरी ध्रुव ले जाया गया था और अब इसे यूरोप की सबसे ऊंची चोटी माउंट एल्ब्रस और साइबेरिया में बैकाल झील की गहराइयों में ले जाया जाएगा. अगले साल फ़रवरी में इस मशाल से सोच्चि में ओलंपिक ज्योति को प्रज्ज्वलित किया जाएगा. |
| DATE: 2013-11-07 |
| LABEL: sports |
| [714] TITLE: 'जर्सी का सम्मान करने वाले खिलाड़ियों की चाहत' |
| CONTENT: रोनाल्डो ब्राज़ील के स्टार फुलबॉल खिलाड़ी थे जो 1994 और 2002 की विजेता ब्राज़ीलियाई टीम के सदस्य थे. अगले साल जून में फ़ुटबॉल का विश्वकप ब्राज़ील में खेला जाना है. 12 जून से 13 जुलाई तक होनेवाले विश्व कप में 32 टीमें हिस्सा लेंगी. मेक्सिको इटली फ्रांस और जर्मनी के बाद ब्राज़ील दूसरा ऐसा देश है जहां दूसरी बार विश्व कप का आयोजन हो रहा है. ब्राज़ील के स्टार खिलाड़ी रहे रोनाल्डो 1994 और 2002 में विश्वकप जीतने वाली ब्राजीलियन टीम के सदस्य थे. बीबीसी ब्राज़ील सेवा के डैनियल गैलास ने विश्व कप को लेकर उनसे ख़ास बातचीत की. उसी बातचीत के कुछ अंश. डिएगो कोस्टा एक महान खिलाड़ी हैं इसमें कोई संदेह नहीं. पूरे सीज़न उनके प्रदर्शन से ये साबित होता रहा है कि वो एक महान स्ट्राइकर हैं. लेकिन ब्राज़ील एक बड़ा देश है जहां कई महान खिलाड़ी हुए हैं. मुझे लगता है कि हमें स्पेन के लिए खेलने के उनके फ़ैसले का सम्मान करना चाहिए. लेकिन ब्राज़ीलियाई हमेशा ऐसे खिलाड़ी चाहते हैं जो हमारी जर्सी का सम्मान करे और उस जर्सी को पहनने को सपने देखे. अब ज़रूरत इस बात की है कि हम डिएगो कोस्टा को भूल कर उनके बारे में सोचें जो ब्राज़ील की टीम के लिए उपलब्ध हैं और उन्हें प्रोत्साहित करें. ब्राज़ील में विश्व कप की तैयारियां ज़ोरशोर से चल रही हैं. अभी से लेकर विश्वकप तक मुझे नहीं लगता कि ज़्यादा परिवर्तन होंगे. मुझे लगता है कि फ्रेड लियोनार्डो डैमियो और शायद जो - ऐसे स्ट्राइकर हैं जो स्कोलैरी और नेमार का साथ निभाएंगे. आपने विश्वकप को लेकर अख़बार में एक बेहद आशावादी लेख लिखा था. लेकिन आपको नहीं लगता कि ब्राज़ील की टीम इस वक्त थोड़ी और अच्छी होनी चाहिए थी विश्व कप के लिए हम काफ़ी प्रयास करते हैं काफ़ी निवेश करते हैं. न केवल स्टेडियम्स पर बल्कि आधारभूत ढांचे शहरी सुविधाएं और एयरपोर्ट पर भी. ब्राज़ील के लिए ये ज़रूरी निवेश हैं. आपके लेख से ऐसा लगता है कि आप सोचते हैं कि विश्वकप को लेकर ब्राज़ील के लोगों की दृष्टि आलोचनात्मक है. ब्राज़ील के कई लोग विश्व कप को लेकर लंदन के लोगों की तरह उत्साहित नज़र नहीं आते क्या आप इससे निराश हैं. नहीं कई लोग ऐसे नहीं हैं. कुछ ही लोग हैं जो विश्व कप के ख़िलाफ़ हैं. एक पोल के नतीजों से पता चला है कि 90 फ़ीसदी ब्राज़ीलियाई विश्व कप के समर्थन में हैं. 70 फ़ीसदी तो ये सोचते हैं कि हमारे देश के विकास के लिए विश्व कप बेहद महत्वपूर्ण है. मुझे लगता है कि हमें आमलोगों का समर्थन हासिल है. |
| DATE: 2013-11-07 |
| LABEL: sports |
| [715] TITLE: पहली पारी में शमी चमके, वेस्टइंडीज़ 234 पर ऑलआउट |
| CONTENT: भारत और वेस्टइंडीज़ के बीच कोलकाता में खेले जा रहे पहले टेस्ट के पहले दिन का खेल खत्म होने तक भारत ने बिना किसी विकेट के नुकसान के 37 रन बना लिए हैं. भारतीय पारी की शुरूआत शिखर धवन और मुरली विजय ने की. इससे पहले वेस्टइंडीज़ की टीम सस्ते में निपट गई. मेहमान टीम सिर्फ़ 78 ओवरों में 234 रन बनाकर ऑलआउट हो गई थी. भारत के मध्यम गति के गेंदबाज़ मोहम्मद शमी ने चार विकेट लेकर वेस्टइंडीज़ की कमर तोड़ दी. आर अश्विन ने दो विकेट लिए. भुवनेश्वर कुमार प्रज्ञान ओझा और सचिन तेंदुलकर ने एक-एक विकेट लिया. वेस्टइंडीज़ के सलामी बल्लेबाज़ ड्वेन ब्रावो रन आउट हुए. टीम इंडिया को वेस्टइंडीज़ के खिलाफ विकेट दिलाने का सिलसिला शमी ने ही शुरू किया. उन्होंने पहले विकेट के तौर पर पॉवेल को पवेलियन लौटाया. उन्होंने ऑफ़ स्टंप से बाहर बाउंसर फेंका जिसे पॉवेल ने पुल करने की कोशिश की. गेंद बल्ले के छोर से लगकर हवा में मिडऑफ की ओर गई जहां भुवनेश्वर कुमार ने इसे कैच कर लिया. पॉवेल ने 40 गेंदों पर खेली 28 रनों की पारी में पांच चौके और एक छक्का लगाया. शमी ने सैमुअल्स को तब आउट किया जब वह वेस्टइंडीज की पारी को पटरी पर लाने की कोशिश में लगे थे. शमी की गेंद तेज़ी से अंदर आई. सैमुअल्स उसे समझ नहीं पाए. गेंद बैट और पैड के बीच से अंदर विकेट्स में जा लगी. सैमुअल्स ने 65 रन बनाए. 98 गेंदों पर 11 चौके लगाने के साथ दो जोरदार छक्के उड़ाए. शमी ने तुरंत बाद रामदीन को चार रन पर चलता कर दिया. रामदीन भी बोल्ड हुए. इससे पहले दिग्गज बल्लेबाज गेल को भुवनेश्वर की गुडलेंग्थ गेंद पर कैच किए गए. गेल ने 32 गेंदों पर 18 रन बनाए. उन्होंने चार चौके लगाए. ब्रावो 23 रन बनाने के बाद रनआउट हुए. छठा विकेट सैमी के रूप में गिरा जिन्हें प्रज्ञान ओझा की गेंद पर 16 रनों पर कैच किया गया. सातवां विकेट सचिन तेंदुलकर को मिला. जिन्होंने शिलांगफोर्ड को पगबाधा आउट किया. इसके बाद मैच का 68वां ओवर फेंक रहे अश्विन ने आखिरी गेंद पर वी परमॉल को खुद ही कैच कर उन्हें पेवेलियन भेज दिया. परमॉल ने 14 रन बनाए. मैच के 77वें ओवर में अश्विन को दूसरी सफलता मिली जब उन्होंने एक बार फिर ओवर की आखिरी गेंद में चंद्रपॉल को बोल्ड किया. उन्होंने 36 रन बनाए. वेस्टइंडीज़ को आखिरी झटका भी मोहम्मद शमी ने ही दिया. उन्होंने 78वें ओवर की आखिरी गेंद पर कॉर्टेल की ऑफ़ स्टंप उड़ाकर वेस्टइंडीज़ की पहली पारी का अंत कर दिया. इससे पहले वेस्टइंडीज़ ने टॉस जीता और पहले बल्लेबाज़ी का फ़ैसला किया. इस मैच में सबका ध्यान महान बल्लेबाज़ सचिन तेंदुलकर पर है. ये उनका 199वां टेस्ट हैं. इसके बाद 200वें टेस्ट मैच में वह टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले रहे हैं. बड़ी संख्या में दर्शक केवल सचिन को आख़िरी बार यहां खेलते देखने के लिए पहुंचे हैं. सचिन के सम्मान के लिए यहां कई प्रोग्राम भी आयोजित किए जा रहे हैं. |
| DATE: 2013-11-06 |
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| [716] TITLE: दो दशक से भी पुराना है सचिन का ईडेन से रिश्ता |
| CONTENT: भारत में क्रिकेट का मक्का कहे जाने वाले ईडन गार्डन और क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर का दो दशक से भी पुराना नाता है. सचिन ने इस ऐतिहासिक मैदान पर अपना पहला अंतरराष्ट्रीय मैच 17 साल की उम्र में चार जनवरी 1991 को खेला था और अब वह अपनी विदाई सिरीज़ का पहला टेस्ट इसी मैदान पर खेल रहे हैं. सचिन और ईडन के इस दशकों पुराने नाते की दुहाई देते हुए बंगाल क्रिकेट संघ कैब ने मास्टर ब्लास्टर के विदाई टेस्ट की मेज़बानी मांगी थी लेकिन भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने सचिन की इच्छा का सम्मान करते हुए यह मौक़ा उनके घरेलू मैदान वानखेड़े को दिया. कोलकाता के क्रिकेटप्रेमियों के दिलोदिमाग़ पर 1993 के हीरो कप के सेमीफ़ाइनल और 1999 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ टेस्ट की यादें हमेशा के लिए चस्पा हैं. हीरो कप से सेमीफ़ाइनल में दक्षिण अफ़्रीक़ा को अंतिम ओवर में जीत के लिए मात्र छह रन की दरकार थी. कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन ने गेंद सचिन को थमाई. सचिन ने इस ओवर में मात्र तीन रन देकर भारत को दो रन से ऐतिहासिक जीत दिलाई थी. साल 1999 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ टेस्ट के दौरान सचिन के दुर्भाग्यपूर्ण तरीक़े से रन आउट होने के बाद कोलकाता के दर्शक आपे से बाहर हो गए. उन्हें शांत करने के लिए ख़ुद सचिन ने मैदान का चक्कर लगाया. तब कहीं जाकर मैच पूरा हो पाया. सचिन ने इस मैदान पर सर्वाधिक 12 टेस्ट खेले हैं जिसमें उन्होंने दो शतक और छह अर्द्धशतक लगाए हैं. सचिन को ईडन पर अपना पहला शतक बनाने के लिए 11 साल इंतज़ार करना पड़ा था. मास्टर ब्लास्टर ने 2002 में ईडन पर वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ 176 रन बनाए थे. सचिन ने इस मैदान पर 12 टेस्टों में 47-88 के औसत से 862 रन बनाए हैं. सचिन वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ खेलने के लिए ईडन में उतरेंगे तो उनके नाम किसी एक मैदान पर सर्वाधिक मैच खेलने का भारतीय रिकॉर्ड दर्ज हो जाएगा. बल्लेबाज़ी के कई रिकॉर्ड अपने नाम रखने वाले सचिन ने अभी तक किसी भी मैदान पर 1000 रन नहीं बना पाए हैं. लेकिन इस सिरीज़ में उनके पास यह उपलब्धि हासिल करने का भी मौका रहेगा. क्रिकेट के भगवान को अंतिम बार ईडन में खेलते देखने के लिए कोलकाता के खेलप्रेमियों में ग़ज़ब का उत्साह है. हर कोई इस पल का गवाह बनना चाहता है. |
| DATE: 2013-11-06 |
| LABEL: sports |
| [717] TITLE: सचिन के बुखार से तप रहा है सट्टा बाज़ार |
| CONTENT: कोलकाता के ईडन गार्डेंस में बुधवार से भारत और वेस्टइंडीज के बीच होने वाले पहले टेस्ट पर सिर्फ क्रिकेट प्रेमियों की निगाहें ही नहीं लगी हैं सट्टेबाज़ भी बड़ी बेसब्री से इसका इंतजार कर रहे हैं. इन दोनों की वजह हैं सचिन रमेश तेंदुलकर. ईडन पर सचिन की आखिरी पारी देखने के लिए जहाँ उनके प्रशंसक बेताब हैं वहीं सट्टेबाज़ भी यह सुनहरा मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते. इसलिए मैच में सचिन से जुड़ी हर बात पर सट्टा लग रहा है. कोलकाता के सट्टेबाज़ों के मुताबिक इस मैच पर अब तक आठ सौ करोड़ रुपए का सट्टा लग चुका है लेकिन अगले दो-तीन दिनों में इसके बढ़ कर हज़ार करोड़ का आंकड़ा पार करने की उम्मीद है. देश में पिछले विश्वकप के बाद किसी मैच और वह भी टेस्ट मैच पर कभी इतनी बड़ी रकम दांव पर नहीं लगी है. जब कोलकाता में इस मैच के आयोजन का फ़ैसला किया गया था तब सट्टेबाज़ों का अनुमान था कि इस मैच पर पाँच से छह सौ करोड़ रुपए का सट्टा लगेगा लेकिन नवंबर का महीना चढ़ने के साथ कोलकाता समेत पूरा बंगाल जिस तरह अचानक सचिन के बुखार में तपने लगा है उससे सट्टेबाज़ों की पौ-बारह हो गई है. महानगर के उल्टाडांगा इलाके के एक सट्टेबाज़ ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि अपने करियर के आखिरी रणजी मैच में सचिन की मैचजिताऊ पारी के बाद सट्टे के भाव चढ़े हैं. सट्टेबाज़ों समेत आमलोगों ने भी मान लिया है कि ईडन में इस बार सचिन का प्रदर्शन बेहतर रहेगा. ईडन टेस्ट में सचिन से जुड़ी हर बात पर सट्टा लग रहा है. मसलन वह बल्लेबाजी करने किस दिन मैदान में उतरेंगे कितने रन बनाएंगे रन बनाने की शुरूआत एक रन लेकर करेंगे या चौके से उनको आउट कौन करेगा और वे क्षेत्ररक्षण कहां करेंगे. पिछले दो दिनों के दौरान तो सट्टे का धंधा इतना तेज हुआ है कि सट्टेबाज़ों को दम मारने तक की फुर्सत नहीं है. महानगर के एक इलाके में आठ गुणा दस फीट के एक कमरे में अपने लैपटॉप आईपॉड और स्मार्टफोनों से चिपके छह सट्टेबाज़ लगातार बुकिंग में जुटे हैं. उनमें से एक विकी बदला हुआ नाम ने बताया दीवाली के दिन से ही हमें फुर्सत नहीं है. सट्टे का भाव मुंबई से खुला था और अब लगभग हर घंटे इसमें उतार-चढ़ाव हो रहा है. महानगर में सचिन को लेकर जो ज्वार आया है उसने हमारी व्यस्तता बढ़ा दी है. सचिन अगर ईडन टेस्ट की दोनों पारियों में कम से कम 25-25 रन बनाते हैं तो उनके स्कोर पर एक रुपए लगाने वाले को 12 पैसे का फायदा होगा. अर्धशतक लगाने पर यह मुनाफा बढ़ कर 18 पैसे हो जाएगा और शतक की स्थिति में सीधे दोगुना यानी दो रुपए. अगर कहीं उन्होंने यहां किसी पारी में दोहरा शतक ठोक दिया तो हर एक रुपए पर आठ गुना मुनाफ़ा होगा. वैसे मैच शुरू होने के बाद इसके भाव तेजी से बदलेंगे. इस बात पर भी सट्टा लग रहा है कि सचिन का विकेट कौन सा गेंदबाज़ लेगा और वे कैसे आउट होंगे. दूसरी ओर कोलकाता पुलिस को भी इस सट्टेबाज़ी की जानकारी है. पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं हम इस मामले नज़र रख रहे हैं. ठोस सूचना मिलते ही ऐसे लोगों के ठिकानों पर छापे मारे जाएंगे. ईडन में होने वाले सचिन के इस आखिरी मैच का वैध टर्नओवर चाहे जो भी हो अवैध टर्नओवर के हज़ार करोड़ का आंकड़ा पार करने में कोई संदेह नहीं है. मैच के दूसरे-तीसरे दिन यह रकम और बढ़ सकती है. एक सट्टेबाज़ का कहना था कि अगर सचिन यहां बेहतर प्रदर्शन करते हैं तो मुंबई में होने वाले आखिरी मैच में यह आंकड़ा लगभग डेढ़ गुना बढ़ जाएगा. |
| DATE: 2013-11-06 |
| LABEL: sports |
| [718] TITLE: कोलकाता में सचिन का 199वां टेस्ट |
| CONTENT: भारत और वेस्ट इंडीज़ के बीच बुधवार से दो टेस्ट मैचों की सिरीज़ का पहला मैच कोलकाता में शुरू होने जा रहा है. दो टेस्ट मैचों की सिरीज़ का ऐतिहासिक महत्व हो गया है क्योंकि क्रिकेट दुनिया के सबसे महान बल्लेबाज़ों में से एक भारत के सचिन रमेश तेंदुलकर इस सिरीज़ के बाद क्रिकेट को अलविदा कह देंगे. सचिन एकदिवसीय और ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट पहले ही छोड़ चुके है. इसके अलावा घरेलू स्तर पर उन्होंने अपना आखिरी रणजी ट्रॉफी मुक़ाबला भी पिछले ही दिनों हरियाणा के ख़िलाफ खेला था. अगर लार्डस को क्रिकेट का मक्का कहा जाता है तो कोलकाता के ईडन गार्डंस को भी भारतीय क्रिकेट के लिए मक्का ही माना जाता है. सचिन जब वहाँ बुधवार को खेलने के लिए उतरेंगे तो वह उनके टेस्ट करियर का 199वाँ मैच होगा. इत्तेफाक़ की बात है कि नवंबर में ही अपने टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत करने वाले सचिन तेंदुलकर नवंबर में ही अपने टेस्ट क्रिकेट की आखिरी पारी मुंबई में खेलेंगे. सचिन ने 15 नवंबर 1989 को कराची में पाकिस्तान के ख़िलाफ अपना पहला टेस्ट मैच खेला था और 14 नवंबर को वे मुंबई में अपना 200वाँ और आखिरी टेस्ट मैच खेलेंगे. वैसे तो सचिन तेंदुलकर ने टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक रन सर्वाधिक शतक सर्वाधिक टेस्ट और ना जाने कितने सारे रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं लेकिन अब 200 टेस्ट मैचों के बाद सचिन का सफ़र थम जाएगा. दो टेस्ट मैचों की इस सिरीज़ में आकर्षण का केंद्र अब सिर्फ और सिर्फ सचिन तेंदुलकर ही हैं लेकिन क्रिस गेल शिवनारायण चंद्रपॉल किरेन पावेल मार्लोन सैमुअल्स डेरेन ब्रावो और डेरेन सैमी जैसे जाने माने खिलाड़ियों के होते वेस्ट इंडीज़ की टीम भी कोई कमज़ोर टीम नहीं है. वेस्ट इंडीज़ की ये टीम पिछली कुछ टीमों से बेहद मज़बूत है. इस टीम के कुछ खिलाड़ियों ने आईपीएल में अपना जादू जमकर दिखाया है. पिछले कुछ वक्त से टेस्ट क्रिकेट में दर्शकों की संख्या भले ही अधिक नहीं रही हो लेकिन अब आने वाले दिनों में एक-एक सीट के लिए मारामारी होगी. सचिन की वजह से यह सिरीज़ शायद क्रिकेट से बढ़कर हो गई है. सचिन को विदाई देने के लिए कोलकाता में ही कई तरह से इंतज़ाम किए गए हैं. क्या इससे दूसरे खिलाड़ियों के मनोबल पर कोई असर पड़़ेगाइस सवाल के जवाब में भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज़ आकाश चोपड़़ा कहते हैं इस भारतीय टीम के सभी खिलाड़ी बेहद परिपक्व हैं और ऐसा नहीं लगता कि उनकी तैयारी या मैच को लेकर उनकी प्रतिबद्धता पर कोई असर पड़़ेगा. दूसरी तरफ पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह कहते हैं सचिन तेंदुलकर को तो हर तरह का दबाव सहने की आदत है लेकिन दूसरे खिलाड़ियों को थोड़ा सावधान रहना होगा. उनकी एकाग्रता पर ज़रूर कुछ असर पड़ सकता है. कोलकाता टेस्ट मैच में भारतीय गेंदबाज़ी की बात चलने पर आकाश चोपड़़ा कहते हैं भारतीय पिचों पर तेज़ गेंदबाज़ों के लिए पहले भी बहुत कुछ नहीं था लिहाज़ा अब भी कुछ खास नहीं होगा. इसके बावजूद उमेश यादव से ज़रूर उम्मीदें रहेंगी. स्पिनर की भूमिका पहले की तरह अहम रहेगी. सचिन को लेकर आकाश चोपड़़ा ने कहा जब तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी की आखिरी सिरीज़ हो तो उसे लेकर भव्य आयोजन तो होने ही थे. अब चाहे यह सिरीज़ भारत में है या फिर दक्षिण अफ्रीका में होती. यहाँ चर्चा सिर्फ सचिन की होगी बाकी बातों की नहीं. इस टेस्ट सिरीज़ को लेकर पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह का मानना है भारतीय टीम वेस्ट इंडीज़ के मुक़ाबले मज़बूत है लेकिन वेस्ट इंडीज़ को भी कम नहीं आंकना चाहिए. वेस्ट इंडीज की टीम का ग्राफ अब ऊपर की तरफ जा रहा है. इसके अलावा एक बात तय है कि वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया जैसी पिचें नहीं दी जाएगी उनके मुक़ाबले कुछ बेहतर होगी. वेस्ट इंडीज़ की बल्लेबाज़ी गेंदबाज़ी के मुक़ाबले मज़बूत है. सचिन के सन्यास के साये में एक अच्छी सिरीज़ होनी चाहिए. |
| DATE: 2013-11-06 |
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| [719] TITLE: सचिन के ख़ुमार में डूबा फ़ुटबाल का मक्का |
| CONTENT: दीवाली के साथ पूरे देश में त्योहारों का सीज़न भले ख़त्म हो गया हो लेकिन सिटी आफ़ ज्वॉय कहे जाने वाले कोलकाता शहर में तो मानो यह दीवाली के बाद ही शुरू हुआ है. बुधवार को वेस्ट इंडीज़ के साथ शुरू होने वाले पहले टेस्ट मैच के दौरान सचिन तेंदुलकर यहाँ ईडन गार्डेन में आख़िरी बार मैदान पर उतरेंगे. इसलिए अबकी यहाँ दीवाली एक सप्ताह लंबी खिंच रही है. यह कहना ज़्यादा सही होगा कि फ़ुटबाल का मक्का कहा जाने वाला कोलकाता फ़िलहाल क्रिकेट के ज्वार में डूबा है. बंगाल क्रिकेट संघ सीएबी के संयुक्त सचिव सुबीर गांगुली कहते हैं यह सचिन का उत्सव है जो पूरे हफ्ते तक चलेगा. यहाँ सचिन के 199वें टेस्ट को लेकर शुरू से ही जो माहौल तैयार किया जा रहा है वह अब जुनून की हद तक पहुंच गया है. इसकी वजह से जहाँ बरसों बाद ईडन में किसी टेस्ट मैच के दौरान सभी सीटें भरी नज़र आएंगीं वहीं हफ्ते भर तक इस महानगर में आम जनजीवन ठप होने का भी अंदेशा है. अख़बारों से लेकर टीवी चैनलों और गली-मोहल्ले-चौराहे की चाय-पान की दुकानों तक बस सचिन और उनके 199वें मैच की ही चर्चा है. सचिन को लेकर मची इस दीवानगी ने स्थानीय हीरो और महाराज कहे जाने वाले सौरव गांगुली को बहुत पीछे छोड़ दिया है. कुछ साल पहले सौरव ने जब संन्यास का एलान किया था तब यहाँ ऐसा कुछ नज़र नहीं आया था. सचिन के ज्वार में फ़िलहाल यहाँ कोई सौरव का ज़िक्र तक नहीं कर रहा है. इस स्टेडियम में लगभग 68 हज़ार सीटें हैं लेकिन आम लोगों के लिए पांच हज़ार से कुछ ही ज़्यादा सीटें उपलब्ध हैं. टिकट नहीं मिलने से सचिन के प्रशंसकों में भारी निराशा है. मैच के टिकट की तलाश में कोई डेढ़ सौ किलोमीटर का सफ़र तय कर ईडन पहुंचे सौरभ भट्टाचार्य कहते हैं आम दर्शकों के लिए कम से कम 10-12 हज़ार टिकटें तो होनी ही चाहिए थीं. काफ़ी कोशिश करने और मोटी रक़म चुकाने के बाद एक टिकट हासिल करने वाले बारासात के दीपंकर माइती कहते हैं क्रिकेट के देवता को आमने-सामने देखने का मौक़ा जीवन में बार-बार नहीं मिलता. वैसे जिनको टिकट नहीं मिल सके हैं उनको निराश होने की कोई ज़रूरत नहीं है. बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने पूरे राज्य में 200 विशालकाय स्क्रीन लगाने का फ़ैसला किया है ताकि अधिक से अधिक लोग ईडन में सचिन के आख़िरी मैच के गवाह बन सकें. सीएबी ने सचिन के स्वागत के लिए भव्य तैयारियां की हैं. यह पहला मौक़ा है जब किसी मैच के दौरान उसकी टिकटों पर किसी खिलाड़ी की तस्वीर छपी नज़र आएगी. ईडन में टेस्ट मैच के पांचों दिन टिकटों पर सचिन की अलग-अलग मुद्राओं वाली तस्वीर होगी. कोलकाता में रविवार से ही सचिन के सम्मान में आयोजन शुरू हो गए हैं. सीएबी के कोषाध्यक्ष विश्वरूप डे कहते हैं सचिन को देखने के लिए 65-70 हज़ार लोगों के ईडन पहुंचने की उम्मीद है. पहले दिन लोगों को सचिन का मास्क दिया जाएगा और फिर दूसरे दिन उन्हें सचिन के सम्मान में बैनर और पोस्टर दिए जाएंगे. मैच के तीसरे दिन सचिन के मैदान में उतरते समय ईडन के आसमान में ग़ुब्बारों के 199 गुच्छे छोड़े जाएंगे. इन ग़ुब्बारों पर सचिन की तस्वीर होगी और स्लोगन लिखे होंगे. चौथे दिन सचिन को समर्पित मशहूर लोगों के लेख वाली एक पुस्तक का लोकार्पण किया जाएगा. पांचवें दिन सचिन के सम्मान में हेलिकॉप्टर के ज़रिए आसमान से 199 किलो गुलाब की पंखुड़ियां बरसाई जाएंगी. तेंदुलकर को पांच पौंड का संदेश केक भेंट किया जाएगा ताकि वह इस मैदान की मीठी यादों को अपने साथ ले जा सकें. सचिन की तस्वीर वाले सोने के सिक्के से ही इस मैच में टॉस होगा. सीएबी ने सचिन की मां और उनके परिजनों को भी न्योता देने का फ़ैसला किया है. इसके अलावा शेन वार्न सर विवियन रिचर्ड्स ग्लेन मैक्ग्रा और ब्रायन लारा समेत कई दिग्गज खिलाड़यों को भी मैच देखने का न्योता भेजा गया है. रविवार यानी दीवाली की रात को सचिन जब कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतराराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर उतरे तो उनके प्रशंसकों की दीवाली मानो और ज़्यादा रोशन हो गई. हज़ारों प्रशंसक उनकी एक झलक पाने के लिए एयरपोर्ट पर मौजूद थे. वहां सीएबी की ओर से गुलाब के 199 फूल देकर उनकी अगवानी की गई. सोमवार को सचिन जब अभ्यास के लिए ईडन पहुंचे तो वहां सबसे पहले उनकी मुलाक़ात अपने हमशक्ल से हुई. जी हां इस मौक़े पर ईडन में मोम से बना सचिन का एक पुतला लगाया गया है. सचिन ने अपने पुतले के साथ खड़े होकर तस्वीरें भी खिंचवाई. मैच का आख़िरी दिन यानी 10 नवंबर सबसे शानदार होगा. इस दिन कोलकाता फ़िल्मोत्सव के उद्घाटन के सिलसिले में सुपस्टार अमिताभ बच्चन और शाहरूख़ ख़ान भी कोलकाता में मौजूद होंगे. यह दोनों अभिनेता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ स्टेडियम में जाकर सचिन का सम्मान करेंगे. और तो और राजनेताओं पर भी यह दीवानगी सिर चढ़ कर बोल रही है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो मैच देखने के लिए ईडन में जाएंगी हीं. सीपीएम के प्रदेश अध्यक्ष विमान बसु ने भी बहती गंगा में हाथ धोते हुए सचिन को शुभकामनाएँ दे डालीं. सचिन को एक महान बल्लेबाज़ बताते हुए बसु ने उम्मीद जताई कि इस मैदान पर आख़िरी बार उनका बल्ला चलेगा. लेकिन कोलकाता में कई लोग इस अतिरेक से नाराज़ हैं. एक स्कूल शिक्षक मनोहर दासगुप्ता कहते हैं आख़िर खिलाड़ी तो आते-जाते ही रहते हैं. लेकिन इस बार इतना शोर क्यों है सचिन से पहले भी न जाने कितने महान खिलाड़ियों ने क्रिकेट को अलविदा कहा है. तब तो ऐसा शोर नहीं हुआ था. उत्तर कोलकाता की एक गृहिणी सावित्री बर्मन तो इसके लिए सीधे-सीधे ख़ासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया को ज़िम्मेदार ठहराती हैं. वह कहती हैं दरअसल यह सब टीवी वालों की वजह से हुआ है. उनलोगों ने विज्ञापनों से होने वाली कमाई के लालच में सचिन की विदाई को लेकर एक हाइप पैदा कर दिया है. इससे ऐसे लोग भी इसमें दिलचस्पी लेने लगे हैं जिनको क्रिकेट की ए बी सी डी भी समझ में नहीं आती. सरकारी नौकरी से पांच साल पहले रिटायर होने वाले डॉक्टर वीरेन भादुड़ी को तो याद भी नहीं है कि कभी ईस्ट बंगाल-मोहन बागान मैच को लेकर भी यहाँ ऐसा माहौल बना हो. वह कहते हैं फ़ुटबाल का मक्का कहा जाना वाला यह महानगर अब क्रिकेट के मदीना में तब्दील हो गया है. किसी चीज़ के प्रति इस कदर दीवानगी सही नहीं है. लेकिन इन आलोचनाओं को दरकिनार पूरा महानगर क्रिकेट के खुमार में गले तक डूब चुका है. |
| DATE: 2013-11-06 |
| LABEL: sports |
| [720] TITLE: सचिनमय हुआ कोलकाता |
| CONTENT: पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में आजकल मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर का खुमार छाया हुआ है. क्रिकेट में भगवान के दर्जा रखने वाले सचिन बुधवार से ऐतिहासिक ईडन गार्डन में अपना 199वां टेस्ट खेलने उतरेंगे. भारत में क्रिकेट का मक्का कहलाने वाला यह मैदान सचिन की कई ऐतिहासिक पारियों का गवाह रहा है. इस टेस्ट को यादगार बनाने के लिए बंगाल क्रिकेट संघ कैब ने व्यापक तैयारियां की हैं. सचिन के लिए एक खास तरह का संगीत तैयार किया जा रहा है. सचिन के करियर से जुड़ी हर याद को तस्वीरों के जरिए सहेज कर स्टेडियम के चारों सजाया गया है. कैब ने सचिन के लिए की गई तैयारियों को सैल्यूट सचिन नाम दिया है. सचिन के सम्मान में एक फ़ोटो गैलरी बनाई गई है. इसमें सौरभ गांगुली ब्रेट ली और दुनिया के कई दिग्गज क्रिकेटरों के साथ सचिन की तस्वीरें हैं. सचिन के 70000 मुखौटे भी दर्शकों को बांटे जाएंगे. कोलकाता टेस्ट के तीसरे दिन 199 गुब्बारे छोड़े जाएंगे जिन पर सचिन की फ़ोटो अंकित होगी. चौथे दिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सचिन को सम्मानित करने के लिए ईडन गार्डन पहुंच सकती हैं. लेकिन इस इंतज़ामों से बेख़बर सचिन जमकर तैयारियों में जुटे हैं. उन्होंने रात्रिभोज के कैब के निमंत्रण को भी ठुकरा दिया है. सोमवार को सचिन अभ्यास सत्र में बेहद शांत दिखाई दे रहे थे. उन्होंने नेट्स पर क़रीब 52 मिनट तक बल्लेबाज़ी का अभ्यास किया. इससे पहले जब सचिन ईडन गार्डन पहुंचे तो उन पर पुष्प वर्षा की गई. सचिन ने ईडन गार्डन पर सर्वाधिक 12 टेस्ट खेले हैं. इस मैदान पर उनका सर्वाधिक स्कोर 176 रहा है जो उन्होंने वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ बनाया था. सचिन ने ईडन पर वनडे में सर्वाधिक 496 रन बनाए हैं. 2001 में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ इस मैदान पर मिली ऐतिहासिक जीत में सचिन ने तीन विकेट लिए थे. 1993 में हीरो कप के सेमीफ़ाइनल में सचिन ने दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ आख़िरी ओवर में कसी हुई गेंदबाज़ी करते हुए भारत को दो रन से जीत दिलाई थी. सचिन यहां विराट कोहली के साथ दिख रहे हैं. सचिन ने एक बार कहा था कि विराट और रोहित शर्मा में उनके वनडे रिकॉर्ड तोड़ने की क्षमता है. सचिन ने वनडे में 49 शतक लगाए हैं जबकि विराट अब तक 17 शतक लगा चुके हैं. सचिन के नाम टेस्ट और वनडे में सर्वाधिक मैचों रनों और शतकों का रिकॉर्ड है. क़रीब ढाई दशक के अपने करियर में सचिन में बल्लेबाज़ी के कई रिकॉर्ड कायम किए हैं. इस तस्वीर में सचिन कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी और कोच डंकन फ्लेचर के साथ दिखाई दे रहे हैं. सचिन ने अपने खेल से दूसरी टीमों के खिलाड़ियों को भी अपना मुरीद बनाया है. ऑस्ट्रेलिया के पूर्व ओपनर मैथ्यू हेडन ने एक बार कहा था मैंने भगवान को देखा है. वो भारत के लिए चौथे नंबर पर बल्लेबाज़ी करते हैं. सचिन भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में लोकप्रिय हैं. लंदन में मैडम तुसाद म्यूज़ियम में उनका मोम का बुत बनाया गया है. कैब ने ईडन गार्डन में ड्रेसिंग रूम के प्रवेश द्वार के क़रीब सचिन की मोम की आदमकद को लगाया है. सचिन मुंबई में अपना 200वां टेस्ट खेलने उतरेंगे जो उनका विदाई टेस्ट होगा. |
| DATE: 2013-11-05 |
| LABEL: sports |
| [721] TITLE: विराट नंबर 1 बनकर छा गए |
| CONTENT: विराट कोहली ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ संपन्न एकदिवसीय सिरी़ज़ में अपने दमदार प्रदर्शन की बदौलत आईसीसी वनडे रैंकिंग में नंबर वन बल्लेबाज़ बन गए हैं. विराट ने इस सिरीज़ में दो शतकों सहित कुल 344 रन बनाए और अपने करियर में पहली बार दुनिया के नंबर एक वनडे बल्लेबाज़ बन गए. पांच नवंबर को 25 साल के होने जा रहे विराट आईसीसी वनडे रैंकिंग में नंबर एक बल्लेबाज़ बनने वाले तीसरे भारतीय खिलाड़ी हैं. उनसे पहले सचिन तेंदुलकर और महेन्द्र सिंह धोनी यह मुकाम हासिल कर चुके हैं. विराट ने दक्षिण अफ्रीका के हाशिम अमला को पछाड़कर नंबर एक पोजीशन हासिल की है. अमला नवंबर 2010 से नंबर एक वनडे बल्लेबाज़ बने हुए थे. भारत से शिखर धवन भी पहली बार टॉप 20 बल्लेबाज़ों में शामिल हो गए हैं. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ 56-8 के औसत से 284 रन बनाने वाले शिखर 12 स्थान की छलांग के साथ 11वें स्थान पर पहुंच गए हैं. इस सिरीज़ में सर्वाधिक रन बनाने वाले शिखर के ओपनिंग पार्टनर रोहित शर्मा भी 25 स्थान के सुधार के साथ 15वें स्थान पर पहुंच गए हैं. कप्तान धोनी को ताज़ा रैंकिंग में छठा स्थान मिला है. इस तरह भारत के पांच बल्लेबाज़ विराट धोनी शिखर रोहित और सुरेश रैना 19 टॉप 20 बल्लेबाज़ों की सूची में शामिल हैं. गेंदबाज़ी रैंकिंग में रवीन्द्र जडेजा दो स्थान फिसलकर संयुक्त तीसरे स्थान पर पहुंच गए हैं. पाकिस्तान के स्पिनर सईद अजमल ने एक बार फिर टॉप पर पहुंच गए हैं. भारत ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ सात मैचों की वनडे सिरीज़ 3-2 से जीतकर टीम रैंकिंग में अपनी नंबर एक पोजीशन मजबूत कर ली है. सिरीज़ के दो मैच बारिश के कारण रद्द रहे थे. |
| DATE: 2013-11-04 |
| LABEL: sports |
| [722] TITLE: 'सोचा भी नहीं था दोहरा शतक बनाऊंगा' |
| CONTENT: सात वनडे मैचों की सिरीज़ के अंतिम मैच में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को हराकर सिरीज़ अपने नाम कर ली. भारत के सलामी बल्लेबाज़ रोहित शर्मा अंतिम मैच में न सिर्फ़ मैन ऑफ द मैच रहे बल्कि उन्हें मैन ऑफ द सिरीज़ भी चुना गया. बेंगलुरु में खेले गए मैच में रोहित शर्मा ने वनडे क्रिकेट इतिहास का तीसरा दोहरा शतक लगाया. इससे पहले यह कारनामा भारत के ही सचिन तेंदुलकर 200 और वीरेंद्र सहवाग 219 ने किया है. अपने वनडे क्रिकेट करियर का पहला दोहरा शतक लगाने के बाद रोहित शर्मा ने कहा वनडे मैच में दोहरा शतक लगाना एक अद्भुत अहसास है. जब मैं बल्लेबाजी करने उतरा तब मैंने सोचा भी नहीं था कि मैं दोहरा शतक बनाऊंगा. मैं बस विकेट पर टिके रहना चाहता था. हम जानते थे कि यह एक छोटा ग्राउंड है और यहाँ पिच पर टिके रहकर रन बनाना आसान है. मैं सिर्फ़ विकेट पर टिके रहकर बाद में इसका फ़ायदा उठाना चाहता था. रोहित ने यह भी माना कि यह उनके करियर की अब तक की सबसे शानदार पारी है. 158 गेंदों में 209 रनों की इस ऐतिहासिक पारी में रोहित शर्मा ने ऑस्ट्रेलियाई धुरंधर बल्लेबाज़ शेन वॉटसन के एक पारी में सबसे ज़्यादा 15 छक्के लगाने के रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया. रोहित ने अपनी पारी में कुल 16 छक्के जड़े. कवर और मिड विकेट के क्षेत्र में खेलना रोहित शर्मा का मजबूत पक्ष है और अपनी इस पारी में उन्होंने कवर और मिड विकेट क्षेत्र में ही सबसे ज़्यादा रन बनाए. उनकी बल्लेबाजी देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वो अपनी इस कला का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे हों. 30 अप्रैल 1987 को जन्मे रोहित शर्मा ने इससे पहले 107 वनडे मैच खेलकर कुल 2840 रन बनाए थे. उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर 141 रन था. रोहित शर्मा पहले विकेट पर जमे और फिर ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ों की जमकर धुनाई की. विराट कोहली के रन आउट होने के बाद रोहित ने ऑस्ट्रेलियाई स्पिन गेंदबाजों की धुनाई शुरू कर दी. उन्होंने अपना शतक 114 गेंदों में पूरा किया लेकिन 100 रनों से 200 रनों तक पहुँचने में उन्होंने सिर्फ़ 42 गेंदों का इस्तेमाल किया. कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के साथ ने रोहित शर्मा का हौसला और बढ़ा दिया. तीन साल पहले विराट कोहली जब ज़ीरो पर रन आउट हुए थे तब रोहित शर्मा ने अपना पहला वन डे शतक लगाया था. तीन साल बाद एक बार फ़िर विराट कोहली ज़ीरो के स्कोर पर रनआउट हुए और इस बार रोहित शर्मा ने अपना पहला दोहरा शतक बनाया. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ सात मैचों की इस सिरीज़ में रोहित शर्मा ने कुल 499 रन बनाए और वे सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज़ भी रहे. |
| DATE: 2013-11-02 |
| LABEL: sports |
| [723] TITLE: फॉकनर का शतक, रोमांचक मोड़ पर बैंगलोर वनडे |
| CONTENT: बैंगलोर में निर्णायक वनडे में ऑस्ट्रेलिया ने भारत के 384 रन के विशाल लक्ष्य के जवाब में शानदार वापसी की है. फॉकनर के तूफ़ानी शतक की बदौलत मैच रोमांचक मोड़ पर पहुंच गया है. आठ विकेट के नुकसान के बावजूद ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ फॉकनर साथी खिलाड़ी मैके के साथ क्रीज़ पर डटे हुए हैं. मैच बेहद रोमांचक होता जा रहा है. इससे पहले भारत के रोहित शर्मा के धमाकेदार दोहरे शतक की बदौलत टीम इंडिया ने 383 रन बनाए. रोहित ने 158 गेंदों पर 16 छक्कों और 12 चौकों की मदद से 209 रन बनाए. एकदिवसीय मैच में दोहरा शतक जमाने वाले वो तीसरे बल्लेबाज़ बन गए. इससे पहले भारत के ही वीरेंद्र सहवाग ने 219 रन और सचिन तेंदुलकर ने नाबाद 200 रन बनाए थे. इसके अलावा छक्कों की बरसात करते हुए रोहित शर्मा ने कई नए रिकॉर्ड्स बना डाले. उन्होंने कुल 16 छक्के लगाए जो एकदिवसीय मैच की एक पारी में किसी भी बल्लेबाज़ द्वारा मारे गए सबसे ज़्यादा छक्के हैं. रोहित ने अपना शतक 114 गेंदो पर चार चौकों और छह छक्कों की मदद से पूरा किया. शतक पूरे होते ही वो ख़ासतौर पर आक्रमक हो गए. बाक़ी के 109 रन उन्होंने सिर्फ़ 44 गेंदों पर 10 छक्कों और आठ चौकों की मदद से बना डाले. उनकी धमाकेदार पारी की बदौलत भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 384 रन का लक्ष्य दिया है. रोहित शर्मा के अलावा भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने 38 गेंदों पर 62 और शिखर धवन ने 57 गेंदों पर 60 रन बनाए. रोहित शर्मा और महेंद्र सिंह धोनी की आतिशी पारी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत ने आख़िरी के 10 ओवरों में 141 रन और आख़िर के पांच ओवरों में 100 रन ठोक डाले. सात मैचों की सीरिज़ में बंगलौर में खेला जा रहा मैच आख़िरी मैच है. इससे पहले दोनों टीमों ने दो-दो मैच जीते हैं जबकि दो मैच बारिश की नज़र चढ़ गए थे. बंगलौर मैच के फ़ैसले पर ही सिरीज़ का फ़ैसला होगा. |
| DATE: 2013-11-02 |
| LABEL: sports |
| [724] TITLE: सचिन की आख़िरी सिरीज़ में न ज़हीर होंगे और न सहवाग |
| CONTENT: वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ दो टेस्ट मैचों की सिरीज़ के लिए भारतीय टीम की घोषणा कर दी गई है. मुंबई में राष्ट्रीय चयनसमिति की बैठक में 15 सदस्यीय टीम की घोषणा की गई. रणजी ट्रॉफ़ी मैच में मुंबई का नेतृत्व करने वाले ज़हीर ख़ान को टीम में जगह नहीं मिली है. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ वनडे सिरीज़ में भारतीय गेंदबाज़ी पर काफ़ी सवाल उठे थे. लेकिन चयनकर्ताओं ने भुवनेश्वर कुमार उमेश यादव ईशांत शर्मा और मोहम्मद सामी पर ही भरोसा जताया है. जबकि स्पिन गेंदबाज़ी के लिए आर अश्विन के साथ-साथ अमित मिश्रा और प्रज्ञान ओझा को भी टीम में जगह दी गई है. वीरेंदर सहवाग और गौतम गंभीर भी टीम में स्थान बना पाने में नाकाम रहे. सलामी बल्लेबाज़ के रूप में मुरली विजय और चेतेश्वर पुजारा को टीम में शामिल किया गया है. उनके अलावा अजिंक्य रहाणे को भी टीम में जगह मिली है. रवींद्र जडेजा को कंधे की चोट के कारण टीम से अलग रखा गया है. टीम के फ़िजियो ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ वनडे सिरीज़ के बाद उन्हें दो हफ़्ते आराम की सलाह दी है. ये टेस्ट सिरीज़ सचिन तेंदुलकर की आख़िरी टेस्ट सिरीज़ हैं. मुंबई में होने वाला दूसरा टेस्ट मैच सचिन तेंदुलकर का 200वाँ टेस्ट होगा जिसके साथ ही वे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह देंगे. |
| DATE: 2013-10-31 |
| LABEL: sports |
| [725] TITLE: क्या सचिन से बेहतर हैं विराट? |
| CONTENT: मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर अगले महीने क्रिकेट को पूरी तरह अलविदा कहने वाले हैं और माना जा रहा है कि टीम इंडिया में उनकी भरपाई करना किसी भी खिलाड़ी के लिए आसान नहीं होगा. लेकिन जहां तक वनडे क्रिकेट में भारत को एक ऐसा चमकीला सितारा मिल गया है जिसे विश्लेषक भविष्य का सचिन कहने लगे हैं. यह सितारा और कोई नहीं विराट कोहली हैं. क्रिकेट पंडितों का मानना है कि दिल्ली का यह युवा बल्लेबाज़ अगर इसी तरह खेलता रहा तो सचिन के कई रिकॉर्डों को पार कर सकता है. खुद सचिन भी मानते हैं कि विराट उनका शतकों का रिकॉर्ड तोड़ सकते हैं. विराट ने 118 मैचों में 52-32 के प्रभावशाली औसत से 4919 रन बनाए हैं जिनमें 17 शतक और 26 अर्द्धशतक शामिल हैं. अपने इस शुरुआती करियर में ही विराट कई रिकॉर्ड ध्वस्त कर चुके हैं. टीम इंडिया की रन मशीन विराट ने जिन 17 मैचों में शतक बनाए हैं उनमें से भारत ने 16 में जीत दर्ज की है. विराट ने 11 शतक लक्ष्य का पीछा करते हुए बनाए हैं और वह शानदार फिनिशर बनकर उभरे हैं. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ चल रही सिरीज़ में भारत ने दो बार 350 से अधिक रन का लक्ष्य हासिल किया है और दोनों बार विराट के बल्ले से शतक निकले हैं. भारत ने छह बार 300 से अधिक रन के लक्ष्य को हासिल किया है जिनमें से पांच में विराट ने शतक ठोंके हैं. लिटिल मास्टर के नाम से मशहूर सुनील गावस्कर का कहना है विराट शानदार खिलाड़ी हैं. अगर आप 115 मैचों के बाद सचिन और विराट के आंकड़ों पर नजर डालें तो विराट सचिन से कहीं आगे हैं. सचिन को पहला शतक बनाने के लिए 80 मैचों तक इंतजार करना पड़ा था वहीं विराट ने 14वें वनडे में ही यह कमाल कर दिया था. विराट ने नागपुर वनडे में नाबाद 115 रन बनाने के साथ ही लगातार तीसरी बार एक सत्र में 1000 रन भी पूरे कर लिए. गावस्कर ने कहा विराट को शुरुआती वर्षों में सचिन वीरेन्द्र सहवाग राहुल द्रविड और वी वी एस लक्ष्मण जैसे दिग्गज खिलाड़ियों के साथ खेलने का मौका मिला और यह अनुभव उनकी क्रिकेट समझ को बढ़ाने में काम आया है. वह परिस्थितियों को समझते हैं और विपक्षी टीम की रणनीति भी समझ लेते हैं. जहां तक आंकड़ों का सवाल है तो विराट सबसे तेज़ 15 शतक बनाने वाले अंतरराष्ट्रीय बल्लेबाज़ हैं और सबसे तेज़ी से 4000 रन बनाने वाले भारतीय बल्लेबाज़ हैं. भारत को अंडर-19 विश्वकप का विजेता बनाने वाले विराट को वनडे के महानतम बल्लेबाज़ माने जाने वाले वेस्टइंडीज के विवियन रिचर्ड्स के सबसे तेज़ 5000 रन बनाने के रिकॉर्ड ध्वस्त करने के लिए अगले वनडे में 81 रन की ज़रूरत है. सचिन जब 25 साल के हुए तो उनके खाते में 15 वनडे शतक थे जबकि अगले सप्ताह 25 साल के होने जा रहे विराट 17 वनडे शतक लगा चुके हैं. टीम इंडिया ने जिन मैचों में लक्ष्य का सफलतापूर्वक पीछा किया है उनमें विराट का औसत 86-53 है. गावस्कर ने कहा रिकॉर्ड तो टूटने के लिए ही बनते हैं. लेकिन सचिन के कुछ रिकॉर्ड तोड़ना आसान नहीं हैं. मुझे नहीं लगता है कि कोई 200 टेस्ट खेल पाएगा या 51 टेस्ट शतक लगा पाएगा. लेकिन विराट जिस तरह से खेल रहे हैं उससे लगता है कि सचिन के 49 वनडे शतकों का रिकॉर्ड ख़तरे में है. ऑस्ट्रेलिया के पूर्व बल्लेबाज़ डीन जोंस का भी मानना है कि विराट सचिन को पीछे छोड़ देंगे. उन्होंने कहा विराट जिस तरह से खेल रहे हैं उससे मुझे लगता है कि वह सचिन से आगे निकल जाएंगे. क्रिकेट में भगवान का दर्जा रखने वाले सचिन के नाम कई रिकॉर्ड दर्ज हैं और उन तक पहुंचना किसी भी बल्लेबाज़ के लिए आसान नहीं होगा. लेकिन विराट जिस तरह से खेल रहे हैं उससे यह कहा जा सकता है कि वह सचिन के रास्ते पर जा रहे हैं. |
| DATE: 2013-10-31 |
| LABEL: sports |
| [726] TITLE: भारत ने नागपुर वनडे जीता, विराट चमके |
| CONTENT: नागपुर में बेहद रोमांचक छठे वनडे में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को छह विकेट से हरा दिया है. इस जीत के साथ ही सिरीज़ में भारत और ऑस्ट्रेलिया 2-2 की बराबरी पर पहुंच गए हैं. ऑस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए भारत के सामने जीत के लिए 351 रन का लक्ष्य रखा था जिसे भारतीय टीम ने तीन गेंद रहते बनाकर सिरीज़ बराबर कर ली. भारत की जीत में बल्लेबाज़ शिखर धवन और विराट कोहली का अहम योगदान रहा. शिखर धवन ने जहां 100 रन की शानदार पारी खेली वहीं विराट कोहली ने सिर्फ़ 66 गेंद में 115 रन बनाए और वो आखिर तक आउट नहीं हुए. कोहली का मैन ऑफ़ द मैच घोषित किया गया. रोहित शर्मा ने भी भारत की जीत में 79 रनों की शानदार पारी का योगदान दिया. रोहित शर्मा और शिखर धवन ने 178 रन की साझेदारी की. इससे पहले भारत ने टॉस जीतकर ऑस्ट्रेलिया को पहले बल्लेबाजी का न्योता दिया. ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज़ों ने निर्धारित 50 ओवरों में 350 रन का शानदार लक्ष्य भारत के सामने रखा. ऑस्ट्रेलिया की तरफ से वॉटसन ने 102 और कप्तान बेली ने 156 रन की पारी खेली. लेकिन भारतीय बल्लेबाज़ों ने शुरुआत से ही विशाल लक्ष्य का पीछा बेहद आक्रामक ढंग से किया और मुश्किल लग रहे लक्ष्य को बेहद रोमांचक मुकाबले में आसान बना दिया. इससे पहले सात मैचों की सिरीज़ में ऑस्ट्रेलिया 2-1 से आगे चल रहा था. रांची में खेला गया चौथा वनडे और कटक में होनेवाला पांचवां वनडे बारिश की भेंट चढ़ गया था और रद्द हो गया था. अब सिरीज़ में दोनों ही टीमें 2-2 की बराबरी पर हैं. सिरीज़ का आखिरी मैच बंगलौर में 2 नवंबर को खेला जाएगा और इसी मैच से सिरीज़ जीत-हार का फ़ैसला होगा. |
| DATE: 2013-10-30 |
| LABEL: sports |
| [727] TITLE: बेकम खरीदेंगे मियामी फ़ुटबॉल फ्रेंचाइज़ी |
| CONTENT: फ़ुटबॉल स्टार डेविड बेकम अब तक दुनिया के जाने-माने फुटबॉल स्टार थे लेकिन अब वह अमरीकी मेजर लीग सॉकर एमएलएस में मियामी टीम के मालिक बन सकते हैं. बीबीसी खेल संवाददाता के अनुसार बेकम ने एमएलएस के लिए मियामी पर नजरें गड़ा दी हैं. हालांकि डील को अंतिम रूप लेना अभी बाकी है. माना जा रहा है कि बेकम एमएलसी में मियामी फ्रेंचाइजी 25 मिलियन डॉलर में ख़रीद सकते हैं. माना जा रहा है कि वर्ष 2007 में बेकम का लॉस एंजेलेस गैलेक्सी से खेलना इसी कवायद का एक हिस्सा था. उन्हें गैलेक्सी से करार करने की एवज़ में बहुत मोटा वित्तीय पैकेज मिला था. बेकम की अगुवाई में लॉस एंजेलेस गैलेक्सी ने दो खिताब जीते थे. कहा जा रहा है कि दुनिया के 12 बड़े वित्तीय संगठन बेकम के संपर्क में हैं क्योंकि नए अभियान और खिलाड़ियों को वेतन देने के लिए उन्हें फ़ंड जुटाने की ज़रूरत होगी. मेनचेस्टर यूनाइटेड रियाल मैड्रिड और एसी मिलान के पूर्व स्टार को फ़ंड के रूप में कई सौ मिलियन डॉलर जुटाने होंगे. एक लंबे करियर के बाद इंग्लैंड टीम के पूर्व कप्तान बेकम ने इस साल मई में फ़्रांस की टीम पेरिस सेंट जर्मेन की ओर से खेलकर संन्यास ले लिया था. फ़िलहाल अमरीकी मेजर लीग सॉकर में 19 टीमें हैं. वर्ष 2020 तक लीग में टीमों की संख्या बढ़ाकर 24 किए जाने की संभावना है. मैनचेस्टर सिटी और बेसबॉल टीम न्यूयॉर्क यंकीज मिलकर वर्ष 2015 में न्यूयॉर्क एफ़सी के नाम से नई टीम लांच करने वाले हैं जो एमएलसी की 20वीं टीम होगी. एएफ़पी न्यूज़ एजेंसी के अनुसार मियामी ही बेकम की पहली पसंद होगा. ये डील दिसंबर तक तय होनी है. जून में बेकम ने मियामी के कई स्टेडियमों का दौरा किया था जिसमें मियामी डॉल्फिन क्लब का सन लाइफ स्टेडियम और फ़्लोरिडा इंटरनेशऩल यूनिवर्सिटी स्टेडियम शामिल थे. इसी दौरे में वह मियामी के मेयर कार्लोस गिमनेज से मिले. साथ ही ब्राइटस्टार कम्यूनिकेशंस के अरबपति बोलिवियाई मालिक मार्सेलो क्लाउर से बातचीत की. क्लाउर ने वर्ष 2009 में मियामी में एमएलएस टीम ख़रीदने की नाकाम कोशिश की थी. अब वह एमएलसी वेंचर में बेकम के पार्टनर बन सकते हैं. मियामी के एक अख़बार मियामी हेराल्ड ने इस महिने के शुरू में रिपोर्ट छापी थी कि बेकम और क्लाउर साथ मिलकर काम कर रहे हैं. उनकी बातचीत आशाजनक ढंग से प्रगति पर है लेकिन कुछ फ़ाइनल नहीं हुआ है. हेरल्ड ने ये भी छापा कि बेकम को इस फ़्रेंचाइजी को खरीदने में इतालवी फाइनेंसर अलेक्सांद्रो बुटीनी से चुनौती मिल सकती है. बुटीनी ने मियामी एमएलएस फ्रेंचाइजी की नीलामी के मद्देनजर एक वेबसाइट एमआईए4एमएलएस डॉट कॉम बनाई हुई है ताकि वो खेल प्रशंसकों की दिलचस्पी जगा सकें. उन्होंने युनिवर्सिटी ऑफ मियामी स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर को क्लब के नए स्टेडियम के डिज़ाइन बनाने का ज़िम्मा भी सौंपा है. बेकम के क्लब खरीदने की चर्चाओं के बीच मियामी के मेयर गिमनेज ने मंगलवार को एक बयान जारी किया. उन्होंने कहा अभी हमारे पास कोई आधिकारिक सूचना नहीं है कि बेकम ने मियामी को नई एमएलएस फ़्रेंचाइजी के लिए चुना है. वैसे मियामी की टीम द फ़्यूजन कभी एमएलएस में हिस्सा रही है लेकिन चार सीजन बाद ही उसने बिस्तर बोरिया बांध लिया. |
| DATE: 2013-10-30 |
| LABEL: sports |
| [728] TITLE: जीत के साथ विदा हुए सचिन |
| CONTENT: सचिन तेंदुलकर ने 79 रनों पर नॉट आउट रहते हुए अपने अंतिम रणजी ट्रॉफ़ी मैच में मुंबई को जीत दिला दी है. हरियाणा में हो रहे मैच में स्थानीय टीम के विरुद्ध मुंबई को मैच के अंतिम दिन 39 रनों की ज़रूरत थी जो उसने बिना कोई और विकेट गँवाए हासिल कर लिया. तीसरे दिन स्टंप के समय दूसरी पारी में मुंबई का स्कोर 6 विकेट खोकर 201 रन था. सचिन 55 रन बनाकर नॉट आउट थे और चौथे दिन उन्होंने वहाँ से आगे बढ़ते हुए 79 रनों की पारी खेली. उनका साथ दे रहे धवल कुलकर्णी 16 रन बनाकर नॉट आउट रहे. इससे पहले मेज़बान हरियाणा की पहली पारी 241 रनों पर सिमटी थी. दूसरी पारी में मुंबई की शुरूआत बेहद खराब रही जब अनुभवी बल्लेबाज़ वसीम जाफर केवल एक रन बनाकर हर्षल पटेल का शिकार बने. उसके बाद अजिंक्य रहाणे और कौस्तुभ पवार के बीच 86 रनों की साझेदारी हुई. अजिंक्य रहाणे 40 रन बनाकर जयंत यादव की गेंद पर बोल्ड हो गए. जीत के बाद मुंबई के खिलाड़ियों ने सचिन को कंधे पर उठाकर सम्मानजनक विदाई दी. सचिन ने कहा लाहली के विकेट पर बल्लेबाज़ी करना चुनौतीपूर्ण था. आउटफील्ड धीमा होने की वजह से 240 भी बड़ा लक्ष्य था. मुझे वेस्टइंडीज़ के खिलाफ सीरीज़ की तैयारी के लिए इसी तरह के विकेट की तलाश थी. मैं इस सीरीज़ में खेलने के लिए काफी उत्साहित हूं. इस मैच को अच्छी तरह कराने के लिए मैं हरियाणा क्रिकेट संघ को धन्यवाद देना चाहता हूं. साथ ही लाहली के लोगों का धन्यवाद करता हूं जिन्होंने मेरा आखिरी घरेलू मैच इतना यादगार बनाया. क्रिकेट सितारों से भरे इस मैच में गेंदबाज़ बल्लेबाज़ों पर किस कदर हावी रहे हैं इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि एक तरफ मुंबई की पहली पारी जहाँ केवल 134 रनों पर सिमटी तो हरियाणा की पहली पारी भी महज़ 136 रनों पर सिमट गई. सबकी नज़रे जहाँ सचिन पर थीं वहीं हरियाणा के कप्तान अजय जडेजा की भी काफी दिनों बाद मैदान पर वापसी हो रही थी. जडेजा पहली पारी में केवल 14 रन बना पाए तो दूसरी पारी में उनका खाता भी नहीं खुला. इस मैच में ज़हीर खान पर भी सबकी निगाहें थीं. दूसरी पारी में उनके हाथ चार विकेट लगे जबकि पहली पारी में उन्होंने एक विकेट लिया था. वैसे पिच जैसी भी हो सचिन के लिए वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ टेस्ट श्रृंखला शुरू होने से पहले अभ्यास के लिए तो बेहतर ही साबित हुई. |
| DATE: 2013-10-30 |
| LABEL: sports |
| [729] TITLE: सचिन ने दर्शकों को निराश नहीं किया |
| CONTENT: रोहतक के लाहली मैदान पर अपना अंतिम रणजी ट्रॉफी मुक़ाबला खेल रहे सचिन तेंदुलकर ने आखिरकार मैच के तीसरे दिन अपने चाहने वालों को निराश नहीं किया. एक ऐसा विकेट जिस पर तीन दिन में 36 विकेट गिर चुके हों वहँ सचिन 55 रन बनाकर नाबाद रहे. उनका साथ दे रहे हैं धवल कुलकर्णी 6 रन बनाकर. स्टंप के समय दूसरी पारी में मुंबई का स्कोर 6 विकेट खोकर 201 रन था और जीत के लिए उसे अभी भी 39 रनों की ज़रूरत है. इससे पहले मेज़बान हरियाणा की पहली पारी 241 रनों पर सिमटी. दूसरी पारी में मुंबई की शुरूआत बेहद खराब रही जब अनुभवी बल्लेबाज़ वसीम जाफर केवल 1 रन बनाकर हर्षल पटेल का शिकार बने. उसके बाद अजिंक्य रहाणे और कौस्तुभ पवार के बीच 86 रनों की साझेदारी हुई. अजिंक्य रहाणे 40 रन बनाकर जयंत यादव की गेंद पर बोल्ड हो गए. इसके बाद मोर्चा संभाला सचिन तेंदुलकर ने और वह 122 गेंदों का सामना करने के बाद 4 चौक्को की मदद से 55 रन बनाकर खेल रहे हैं. मुंबई की जीत की तमाम उम्मीदें अब सचिन पर टिकी हैं. क्रिकेट सितारों से भरे इस मैच में गेंदबाज़ बल्लेबाज़ों पर किस कदर हावी रहे हैं इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि एक तरफ मुंबई की पहली पारी जहाँ केवल 134 रनों पर सिमटी तो हरियाणा की पहली पारी भी महज़ 136 रनों पर सिमट गई. सबकी नज़रे जहाँ सचिन पर थीं वहीं हरियाणा के कप्तान अजय जडेजा की भी काफी दिनों बाद मैदान पर वापसी हो रही थी. जडेजा पहली पारी में केवल 14 रन बना पाए तो दूसरी पारी में उनका खाता भी नहीं खुला. इस मैच में ज़हीर खान पर भी सबकी निगाहें थीं. दूसरी पारी में उनके हाथ चार विकेट लगे जबकि पहली पारी में उन्होंने एक विकेट लिया था. अब मुंबई की आस सचिन पर लगी है कि वह बुधवार को बल्लेबाज़ों के लिए कब्रगाह जैसी विकेट पर कैसे उनकी जीत की नैय्या पार लगाते हैं. वैसे पिच जैसी भी हो सचिन के लिए वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ टेस्ट श्रृंखला शुरू होने से पहले अभ्यास के लिए तो बेहतर ही साबित हुई. |
| DATE: 2013-10-30 |
| LABEL: sports |
| [730] TITLE: सिरीज़ जीतनी है तो नागपुर फ़तह करना होगा |
| CONTENT: भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच नागपुर में बुधवार को छठा एकदिवसीय अंतराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेला जाएगा. सिरीज़ जीतने के लिए भारत को ना केवल नागपुर का मैच जीतना होगा बल्कि इसके बाद शनिवार को बंगलौर में होने वाला सातवां और आखिरी एकदिवसीय मैच भी जीतना होगा. सात एकदिवसीय मैचों की श्रृंखला में ऑस्ट्रेलिया पहले ही 2-1 की बढ़त बनाए हुए है. नागपुर में मौसम साफ़ रहने की उम्मीद है. इससे पहले रांची और कटक वनडे बारिश के चलते रद्द हो गए थे. रांची में तो कम से कम ऑस्ट्रेलिया को बल्लेबाज़ी करने का अवसर मिला था लेकिन कटक में तो एक भी गेंद नहीं की जा सकी थी. इस श्रृंखला के शुरू होने से पहले ऑस्ट्रेलियाई टीम को अनुभवहीन माना जा रहा था. यहाँ तक कि ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान इयन चैपल ने कहा कि सिर्फ पैसे के लिए ये सिरीज़ खेली जा रही है. अगर ऑस्ट्रेलिया सिरीज़ हारा तो इंग्लैंड के ख़िलाफ होने वाली आगामी एशेज़ श्रृंखला से पहले ऑस्ट्रेलियाई टीम के मनोबल पर नकारात्मक असर पड़ेगा. हालंकि भारत में ऑस्ट्रेलियाई टीम छुपी रूस्तम साबित हुई है. इस ऑस्ट्रेलियाई टीम के हौसले कितने बुलंद हैं इस बात का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके स्पिनर ज़ेवियर डोहर्टी का कहना है कि उनकी टीम नागपुर में ही मैच जीतकर श्रृंखला अपने नाम करना चाहेगी. वहीं भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी सोच रहे होंगे कि किन गेंदबाज़ों को लेकर नागपुर में उतरें. नागपुर का विकेट बल्लेबाज़ों के लिए जाना जाता है. ऑस्ट्रेलियाई टीम के शुरुआती बल्लेबाज़ों की बात छोड़िए उनके आलराउंडर तक भारतीय गेंदबाज़ों के लिए हव्वा साबित हो रहे हैं. लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि यह वही ऑस्ट्रेलियाई टीम है जो इसी साल भारत में बुरी तरह टेस्ट श्रृंखला हार चुकी है. वहीं मौजूदा भारतीय गेंदबाज़ी का यह आलम है कि रविंद्र जडेजा को छोड़कर कप्तान धोनी किसी दूसरे गेंदबाज़ से पूरे दस ओवर भी नहीं करवा पा रहे हैं तो ऐसे में क्या भुवनेश्वर कुमार की टीम में वापसी हो पाएगीऔर क्या गेंदबाज़ी में अपने तरकश के सभी तीर इस्तेमाल करने के बावजूद ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों के निशाने पर रहे स्पिनर आर अश्विन टीम में बने रहेंगे शायद वो अब भी कप्तान धोनी के लिए ब्रहमास्त्र हैं. ये भी देखना होगा कि नागपुर में जीतो या श्रृंखला हारो वाले मैच में अमित मिश्रा को मौक़ा मिल पाता है या नहीं. निश्चित रूप से दबाव टीम इंडिया और ख़ासकर उसके गेंदबाज़ों पर होगा. |
| DATE: 2013-10-30 |
| LABEL: sports |
| [731] TITLE: सचिन की विदाई शानदार हो: द्रविड़ |
| CONTENT: भारत के पूर्व क्रिकेट कप्तान राहुल द्रविड़ ने कहा है कि इससे फ़र्क नहीं पड़ेगा कि सचिन अपनी आख़िरी टेस्ट सिरीज़ में रन बनाते हैं या नहीं उन्हें शानदार विदाई दी जानी चाहिए. सचिन तेंदुलकर अगले महीने मुंबई में अपना 200वां टेस्ट खेलकर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने वाले हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक द्रविड़ ने कहा मैं सिर्फ़ यही उम्मीद करता हूं कि वो अपने आख़िरी दो टेस्ट के मज़े उठाएंगे. यह मायने नहीं रखता कि वह बड़ा स्कोर बनाएंगे या नहीं. मैं उन्हें शुभकामनाएं देना चाहता हूं और बीते 24 साल में उन्होंने भारतीय क्रिकेट के लिए जो किया है उसके लिए धन्यवाद देना चाहता हूं. द्रविड़ का कहना है सचिन ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने कभी अपना स्तर नहीं गिरने दिया. उन्होंने कहा कि वह चाहेंगे कि सचिन अपने आखिरी दो टेस्ट में शानदार प्रदर्शन करें. द्रवि़ड़ ने मुंबई में एक कार्यक्रम में कहा सचिन का परिवार भी यह दो टेस्ट देखने आएगा इसलिए ये बड़ी घटनाएं हैं. उन्होंने सालों तक कड़ी मेहनत की है इसलिए उन्हें अच्छी विदाई मिलनी चाहिए. खुद द्रविड़ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में एक बेहद सम्मानित खिलाड़ी रहे हैं उनका कहना है कि किसी के भी लिए तेंदुलकर की उपलब्धियों के नज़दीक आना मुश्किल होगा. उन्होंने कहा मैंने सचिन के साथ काफ़ी क्रिकेट खेला है. मैं उन्हें बचपन से देखता आ रहा हूं. उनके आंकड़े उनके प्रदर्शन को दोहराना मुश्किल होगा. जब द्रविड़ से ये पूछा गया कि उन्हें कौन सा खिलाड़ी ऐसा लगता है जो सचिन की जगह ले सके तो उन्होंने कहा कि किसी भी युवा खिलाड़ी के साथ ये ज़्यादती होगी कि उससे ये उम्मीद लगाई जाए कि तुरंत सचिन की जगह ले. द्रविड़ ने कहा अभी कुछ अच्छे प्रतिभाशाली खिलाड़ी हैं. विराट ने भी वनडे और टेस्ट क्रिकेट में असाधारण खेल दिखाया है. लेकिन सचिन की जगह लेना आसान नहीं होगा. अभी टीम में कोहली है रोहित शर्मा हैं रहाणे हैं रैना हैं इतने युवा खिलाड़ी हैं जो जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि इनमें से कौन एक स्थायी जगह बना पाता है. विश्व कप में भारत की कप्तानी कर चुके द्रविड़ ने कहा कि वो उम्मीद कर रहे हैं कि वो सचिन को आख़िरी बार खेलते हुए देखें. उन्होंने ये भी कहा कि सचिन के संन्यास लेने से उन्हें हैरत नहीं हुई. उन्होंने कहा मैं उम्मीद कर रहा हूं कि मैं तब मुंबई में रहूंगा. जब कोई 40 साल का हो और इतना क्रिकेट खेल चुका हो तो संन्यास लेने पर हैरत नहीं होती. ये खेल और ज़िंदगी की हकीक़त है. लेकिन द्रविड़ का मानना है कि सचिन की कोई एक यादगार पारी चुनना मुश्किल होगा. वो कहते हैं अगर किसी ने 100 शतक लगाए हों तो सिर्फ़ एक पारी चुनना मुश्किल होगा. आप 150 में से एक पारी नहीं चुन सकते और मैं यह नहीं करूंगा क्योंकि मैं उनका पूरा टेस्ट करियर याद रखना चाहूंगा. |
| DATE: 2013-10-29 |
| LABEL: sports |
| [732] TITLE: 'रनों से कहीं ज़्यादा है सचिन का योगदान' |
| CONTENT: क्रिकेट प्रेमियों को मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के 200वें और आख़िरी टेस्ट का बेसब्री से इंतज़ार है. इससे पहले हरियाणा में रोहतक के लाहली में सचिन रविवार को अपना आख़िरी रणजी मैच खेलने के लिए मैदान में उतरे. जहां वह महज़ पांच रन बनाकर तेज़ गेंदबाज़ मोहित शर्मा की गेंद पर बोल्ड हो गए. सचिन के अपने आख़िरी रणजी मैच में सस्ते में आउट हो जाने से उनके प्रशंसक भले ही निराश हों लेकिन भारत के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ अतुल वासन सचिन जैसे दिग्गज खिलाड़ी की मौजूदगी को बहुत बड़ी प्रेरणा बताते हैं. अतुल वासन कहते हैं आज हरियाणा और मुंबई का जो भी खिलाड़ी सचिन के साथ खेल रहा है वह कल अपने बच्चों को बताएगा कि मैंने सचिन के साथ क्रिकेट खेला है चाहे वह प्रथम श्रेणी ही क्यों न हो. वासन के मुताबिक़ कई युवा खिलाड़ियों को सचिन ने दुनिया भर में अपनी पहचान के साथ खेलना सिखाया है. उनका यह योगदान भारतीय क्रिकेट में उनके रनों से ज़्यादा है. इतनी बड़ी शख़्सियत होने के बावजूद उन्होंने कभी छोटे-मोटे फ़ायदों के लिए कोई समझौता नहीं किया और न किसी विवाद में पड़े. सचिन के साथ खेल रहे कई क्रिकेटर तो ऐसे हैं जो सचिन के करियर शुरू करते वक़्त बच्चे ही थे. इन दिनों भारतीय क्रिकेट टीम में पूर्व महान बल्लेबाज़ राहुल द्रविड़ का विकल्प माने जा रहे चेतेश्वर पुजारा इन्हीं में से एक हैं. पुजारा कहते हैं बचपन से ही एक सपना था कि मैं भी दुनिया के महानतम बल्लेबाज़ सचिन तेंदुलकर के साथ खेलूं. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मुझे भारत के लिए खेलने का अवसर मिला था तब मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा. मुझे अब भी उनके साथ खेलने का अवसर मिल रहा है तो उम्मीद है कि और भी बहुत कुछ सीखने को मिलेगा. वैसे सचिन पर क्रिकेट से संन्यास लेने का दबाव तो पिछले साल से ही बनने लगा था जब इंग्लैंड की टीम भारत में 4 टेस्ट मैचों की सिरीज़ खेलने के लिए भारत आई थी. भारत के पूर्व कप्तान और कोच रहे अजित वाडेकर का कहना है कि सचिन के पास खेलने की महान क्षमता है. उनकी प्रतिभा दूसरों से अलग है. हालांकि इन दिनों उनके शॉट के चयन में कमी आई है लेकिन खराब फ़ॉर्म तो खिलाड़ी की ज़िंदगी में आता-जाता रहता है. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ खेले गए अपने पहले ही टेस्ट मैच में 187 रनों की रिकॉर्ड पारी खेलकर रातों-रात चर्चा में आए और इन दिनों अपनी मूंछों के साथ-साथ अपने बल्ले से भी विरोधी गेंदबाज़ों पर रौब जमाने वाले सलामी बल्लेबाज़ शिखर धवन भी सचिन के साथ बिताए लम्हे बेहद यादगार मानते हैं. शिखर धवन मुंबई इंडियंस के लिए भी आईपीएल खेल चुके हैं. सचिन को लेकर शिखर कहते हैं मैं ख़ुद को भाग्यशाली समझता हूं कि मैंने उनके साथ आईपीएल में ओपनिंग की. उनके साथ पूरा सत्र बिताया. वह जब भी साथ में बल्लेबाज़ी करते थे हमेशा बताते थे कि कब किस स्थिति में कैसी बल्लेबाज़ी करनी है. दिमाग़ी रूप से एक खिलाड़ी कैसे मज़बूत बने यह सब उन्हीं से सीखने को मिला. इन दिनों मुंबई के लिए हरियाणा के ख़िलाफ़ सचिन के साथ खेल रहे युवा बल्लेबाज़ अजिंक्य रहाणे भी तीन साल तक मुंबई इंडियंस के लिए आईपीएल खेल चुके हैं. वे कहते हैं सचिन से एक क्रिकेटर के तौर पर उभरने में मुझे बहुत मदद मिली. बचपन से अगर किसी क्रिकेटर का अनुसरण किया है तो वे सचिन ही हैं. ज़ाहिर है सचिन जब टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके होंगे तो न सिर्फ़ उनके प्रशंसकों बल्कि उनके साथ खेल रहे क्रिकेटरों को भी उनकी कमी खलेगी. |
| DATE: 2013-10-28 |
| LABEL: sports |
| [733] TITLE: रणजी में अच्छा प्रदर्शन भारतीय टीम की गारंटी नहीं: सचिन तेंदुलकर |
| CONTENT: दुनिया के महानतम बल्लेबाज़ों में से एक सचिन तेंदुलकर ने भले ही अपने घरेलू क्रिकेट करियर की शुरुआत रणजी ट्रॉफ़ी से की थी लेकिन उनका मानना है कि इस टूर्नामेंट में बढ़िया प्रदर्शन भारतीय टीम में शामिल किए जाने की गारंटी नहीं है. ये बात सचिन ने अपने अंतिम रणजी मैच से पहले भारतीय क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआईकी आधिकारिक वेबसाइट को दिए एक इंटरव्यू में कही. सचिन ने कहा रणजी ट्रॉफ़ी में अच्छे प्रदर्शन से चयनकर्ताओं की नज़र में आने में मदद मिलती है. लेकिन इससे ये पक्का नहीं होता कि आपको भारतीय क्रिकेट टीम में जगह मिल ही जाएगी क्योंकि आपको राष्ट्रीय टीम की संरचना भी देखनी होती है और ये भी कि क्या आप चयनकर्ताओं और कप्तान के हिसाब से टीम के लिए सही हैं या नहीं. सचिन टेस्ट क्रिकेट से संन्यास की घोषणा कर चुके हैं. वे नवंबर में वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़ मुंबई में अपना 200वां और आखिरी टेस्ट मैच खेलेंगे. इससे पहले वो वनडे और ट्वेन्टी-20 से भी संन्यास ले चुके हैं. वैसे रविवार को अपने आखिरी रणजी मैच की पहली पारी में सचिन तेंदुलकर सिर्फ़ पांच रन बनाकर ही आउट हो गए. हरियाणा के ख़िलाफ़ लाहली में खेले जा रहे मैच के पहले दिन मुंबई की पहली पारी में सचिन तेंदुलकर आठ मिनट क्रीज़ पर रहे जिस दौरान उन्होंने सात गेंदों का सामना किया और एक चौक्का मारा. लेकिन वे ज़्यादा देर तक नहीं टिक पाए और मोहित शर्मा की गेंद पर आउट हो गए. सचिन तेंदुलकर ने दिसंबर 1988 में 15 साल और 230 दिन की उम्र में गुजरात के ख़िलाफ़ अपना पहला रणजी मैच खेला था. इस मैच में उन्होंने नाबाद शतक बनाया था. इसके साथ ही अपने पहले ही फर्स्ट क्लास मैच में शतक लगाने वाले वह सबसे कम उम्र के भारतीय बन गए थे. रविवार के मैच से पहले मुंबई की ओर से सचिन 37 बार रणजी ट्रॉफ़ी में खेले हैं. ऐसे बल्लेबाज़ जिन्होंने इस टूर्नामेंट में 50 पारियां खेली हैं उनमें सचिन का 87-43 का बल्लेबाज़ी औसत सबसे ज़्यादा है. सचिन का मानना है रणजी टूर्नामेंट में बेहतरीन खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं और इस टूर्नामेंट के स्तर को बेहतर बनाने के लिए लगातार कोशिश की जानी चाहिए. सचिन ने बीसीसीआई इंटरव्यू में कहा रणजी में कड़ा मुक़ाबला होता है और ऐसा होना भी चाहिए. खेलने के लिए बढ़िया ट्रैक और अच्छी विपक्षी टीम होनी चाहिए इस सबसे खेल का स्तर बढ़ता है. उन्होंने आगे कहा अगर कोई अच्छी टीम के ख़िलाफ़ बढ़िया प्रदर्शन करता है तो उसके प्रदर्शन को मान्यता मिलनी चाहिए और मुझे यक़ीन है कि चयनकर्ता ज़्यादातर मैच देखने की कोशिश करते हैं. इस टूर्नामेंट में शीर्ष खिलाड़ियों का खेलना एक बोनस है. सचिन तेंदुलकर जब भी रणजी ट्रॉफ़ी में खेले हैं मुंबई कभी भी वो मैच नहीं हारी है. सचिन तेंदुलकर ने रविवार से पहले रणजी ट्रॉफ़ी के 37 मैचों में 4197 रन बनाए जिनमें 18 शतक और 18 अर्धशतक शामिल हैं. |
| DATE: 2013-10-27 |
| LABEL: sports |
| [734] TITLE: सेबेस्टियन वेटल ने जीती इंडियन ग्रां प्री, चौथा विश्व ख़िताब |
| CONTENT: रेड बुल टीम के सेबेस्टियन वेटल ने 2013 इंडियन ग्रां प्री फॉर्मूला वन खिताब जीत लिया है. इसके साथ ही वेटल ने लगातार चौथा विश्व ख़िताब भी अपने नाम कर लिया. रविवार को नोएडा के पास बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट पर मर्सिडीज़ टीम के निको रोज़बर्ग दूसरे और लोटस के रोमेन ग्रोसियन तीसरे स्थान पर रहे. साल 2011 में शुरु हुई इंडियन ग्रां प्री में ये वेटल की लगातार तीसरी जीत है. इस सीज़न में उनकी ये लगातार छठी और कुल मिलाकर 10वीं जीत है. फ़ॉर्मूला वन के इतिहास में चार विश्व ख़िताब जीतने वाले 26 साल के वेटल चौथे लेकिन सबसे कम उम्र के ड्राइवर बन गए हैं. इससे पहले जुआन मैन्युल फ़ागियो ऐलन प्रोस्ट और माइकल शुमाकर ने चार बार विश्व ख़िताब जीता है. विश्व ख़िताब की दौड़ में वेटल के निकटतम प्रतिद्ंवद्वी फ़रारी टीम के फ़र्नांडो अलोंसो थे लेकिन ख़िताब पर कब्ज़ा करने के लिए वेटल को सिर्फ़ शीर्ष पांच में जगह बनानी थी फिर चाहे अलोंसो का नतीजा कुछ भी रहता. अलोंसो इस रेस में 11वें नंबर पर रहे. जीत के बाद वेटल वहां मौजूद लोगों का धन्यवाद करते हुए वेटल ने कहा सबसे पहले मैं यहां मौजूद लोगों को शुक्रिया कहना चाहूंगा. मुझे शब्द नहीं मिल रहे और जब मैंने लाइन जीत की रेखा पार की उस वक्त मैं कुछ नहीं सोच रहा था. मुझे क्या कहना चाहिए ये सोचने में मैंने बहुत समय लगाया ऐसे वक्त पर आप बहुत कुछ कहना चाहते हैं. वेटल ने आगे कहा ये अब तक की मेरी ज़िंदगी का सबसे बेहतरीन दिन है. फ़ोर्स इंडिया टीम के पॉल डी रेस्टा आठवें और एड्रियन सुटिल नौवें स्थान पर रहे. शनिवार को क्वालिफ़ाइंग रेस में वेटेल को पोल पोज़िशन मिली थी स्टार्टिंग ग्रिड पर सबसे आगे जबकि मर्सडीज़ के निको रोज़बर्ग को दूसरा स्थान हासिल हुआ था. |
| DATE: 2013-10-27 |
| LABEL: sports |
| [735] TITLE: पुणे वॉरियर्स की आईपीएल से छुट्टी |
| CONTENT: भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने आईपीएल की टीम पुणे वॉरियर्स की फ्रेंचाइजी रद्द कर दी है. बीसीसीआई कार्यकारी समिति की शनिवार को चेन्नई में हुई मीटिंग में ये फैसला किया गया. पुणे वारियर्स पर ये कार्रवाई बैंक गारंटी के तौर अगले साल के लिए फ्रेंचाइजी फीस नहीं देने पर की गई. फ्रेंचाइजी को बैंक गारंटी के तौर पर अगले साल के लिए 170-2 करोड़ रुपए देने थे. वैसे पुणे फ्रेंचाइजी के मालिक सहारा ग्रुप ने इस साल मई में ही आईपीएल से हाथ खींचने की घोषणा कर औपचारिक सूचना बीसीसीआई को दे दी थी. हांलाकि बीसीसीआई का कहना है कि उसने गारंटी मनी के लिए सहारा ग्रुप को कई बार याद दिलाया. पुणे वॉरियर्स को सहारा ग्रुप ने 370 मिलियन अमरीकी डॉलर करीब 1702 करोड़ रुपए में वर्ष 2010 में खरीदा था. आईपीएल में खरीदी गई ये सबसे मंहगी फ्रेंचाइजी थी. उसकी सदस्यता रद्द होने से बीसीसीआई को खासा आर्थिक नुकसान उठाना होगा. पुणे वॉरियर्स के निकलने के बाद आईपीएल में टीमों की संख्या फिर आठ रह गई है. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि आईपीएल के अगले सत्र में टीमों की संख्या आठ ही रहेगी या बीसीसीआई एक नई फ्रेंचाइजी के लिए नीलामी प्रक्रिया पूरा करेगी. बीसीसीआई के अध्यक्ष पद पर एन श्रीनिवासन के फिर से कार्यभार संभालने के बाद ये बोर्ड कार्यकारी समिति की पहली बैठक थी. |
| DATE: 2013-10-26 |
| LABEL: sports |
| [736] TITLE: बारिश ने किया कटक वन-डे को भी बोल्ड |
| CONTENT: भारत और आस्ट्रेलिया के बीच कटक में खेला जाने वाला पांचवां वन-डे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच रद्द हो गया है. लगातार बारिश के बाद मैच को रद्द कर दिया गया. सुबह अंपायरों ने मैदान का निरीक्षण किया और मैच रद्द किए जाने की घोषणा की. ओडिशा क्रिकेट संघ ने एक दिन पहले ही मौसम के मद्देनजर मैच की उम्मीदें छोड़ दी थीं. आंध्र-तेलंगाना क्षेत्र में कम दबाव की स्थिति बनने से कटक में पिछले पांच दिनों से लगातार बारिश हो रही है. सुबह 11 बजे जब सूरज आसमान पर नज़र आया तब अंपायरों निगेल लांग एस रवि और सी शम्सुद्दीन ने मैदान का निरीक्षण किया. आउटफील्ड ऐसी नहीं थी कि मैच कराया जा सके. मैदान कई जगहों पर न केवल दलदली बन गया बल्कि इसमें जगह-जगह गीलापन दिखा. इसके बाद अंपायरों ने मैच को आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिया. ओडिशा क्रिकट संघ के सचिव आर्शीवाद बेहेरा ने कहा निरीक्षण के बाद अंपायरों ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि आउटफ़ील्ड इस हालत में नहीं है कि खेल कराया जा सके. टीमों को पहले से इसका अंदाज था. इसीलिए ओडिशा की राजधानी भुवनेश्नर में ठहरी हुई टीमें मैच स्थल के लिए रवाना ही नहीं हुईं. कोई दर्शक भी यहां नहीं दिखा जबकि 45000 क्षमता वाले इस स्टेडियम के टिकट पहले ही बेचे जा चुके थे. ओडिशा क्रिकेट संघ ने टिकटों की वापसी की तारीख घोषित कर दी है. मौजूदा वन-डे सिरीज़ में ये लगातार दूसरा मैच है जिसे बारिश के कारण रद्द करना पड़ा है. मोहाली में हुए तीसरे वन-डे मैच आस्ट्रेलिया ने भारत को चार विकेट से हराया था. इस मैच में भारत के क्षेत्ररक्षकों ने लचर प्रदर्शन करते हुए छह कैच गिराए थे साथ ही टीम इंडिया की गेंदबाजी पर फिर ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज हावी नज़र आए थे. आस्ट्रेलिया सात वन-डे मैचों की इस सिरीज़ में 2-1 से आगे है. अब इस सिरीज में केवल दो मैच बचे हैं जिसके चलते भारत के लिए अब सिरीज़ जीतना आसान नहीं होगा. अगला वन-डे मैच नागपुर में 30 अक्तूबर को खेला जाएगा जबकि आखिरी और सातवां एक दिवसीय मैच 02 नवंबर को बेंगलुरु में होगा. |
| DATE: 2013-10-26 |
| LABEL: sports |
| [737] TITLE: कटक वनडे पर भी बारिश का साया |
| CONTENT: भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच कटक में पांचवें एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच पर खराब मौसम के चलते संकट के बादल मंडरा रहे हैं. इससे पहले बुधवार को भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के अपने घरेलू मैदान रांची में खेला गया चौथा मैच बारिश की भेंट चढ़ गया था. मेहमान ऑस्ट्रेलियाई टीम सात मैचों की सिरीज़ में 2-1 से बढ़त बनाए हुए है. इस सिरीज़ से पहले ऑस्ट्रेलिया के कप्तान जॉर्ज बेली ने कहा था कि एकदिवसीय क्रिकेट में दोबारा नम्बर एक बनने के लिए भारत को इस सिरीज़ में 6-1 के अंतर से हराना नामुमकिन है. अब अगर ऑस्ट्रेलिया सिरीज़ के बाकि बचे तीनों मैच जीत भी ले तो भी वह नम्बर दो पर ही रहेगा. वैसे कटक से भी समाचार कोई बहुत अच्छा नहीं है क्योंकि वहां पिछले कई दिनों से लगातार बारिश हो रही है. मैदान की हालत भी कोई बहुत बेहतर नहीं है. ऐसे में कटक में भी क्रिकेट प्रेमियों के हाथ निराशा लग सकती है. अब अगर दोनों टीमों के प्रदर्शन की बात की जाए तो रांची में भारतीय बल्लेबाज़ों को अपने हाथ दिखाने का अधिक अवसर नहीं मिला. इससे पहले ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ी रांची में भी जमकर चली. भले ही शुरूआती जोड़ी एरोन फिंच और फिल हयूज़ के साथ-साथ शेन वॉटसन टीम में वापसी कर रहे शमी अहमद का जल्दी ही शिकार बन गए लेकिन कप्तान जॉर्ज बेली और ग्लेन मैक्सवेल का बल्ला भारतीय गेंदबाज़ों पर खूब चला. दोनों बल्लेबाज़ शतक ज़रूर चूके लेकिन उन्होंने भारतीय गेंदबाज़ी की कलई फिर खोल दी और साबित कर दिया कि इस गेंदबाज़ी में कोई दम नहीं है. एक समय 200 रन तक भी नहीं पहुंचती दिखाई देने वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम ने आखिरकार 8 विकेट पर 295 रन बना लिये. भारत के कई हिस्सों में इन दिनों शाम को ओस गिरती है और दूसरी पारी में गेंदबाज़ी और क्षेत्ररक्षण करने में दिक्कत आती है. लेकिन भारत की फील्डिंग का स्तर इतना गिर जाएगा यह भी किसी ने नहीं सोचा था. विराट कोहली सुरेश रैना और युवराज सिंह जैसे शानदार क्षेत्ररक्षकों ने कैच छोड़े तो ख़ुद कप्तान धोनी से भी एक आसान कैच छूटा. वैसे कुल मिलाकर भारतीय खिलाडियों ने छह कैच छोड़े. यानी अब खराब फील्डिंग धोनी का नया सिरदर्द है. अंतिम ओवर में रन लुटाने का सिलसिला अब भी जारी है. यहां तक कि जेम्स फॉक्नर और मिचेल जानसन ने भी अपने हाथ खोलते हुए जमकर रन बनाए. अब रन तो खैर भारतीय बल्लेबाज़ भी बना रहे हैं लेकिन गेंदबाज़ी को लेकर कप्तान धोनी क्या करें. जैसे-तैसे कड़ी आलोचनाओं के बाद धोनी ने ईशांत शर्मा की जगह मोहम्मद शमी को टीम में शामिल किया लेकिन बहुत से लोग सवाल उठा रहे हैं कि भुवनेश्वर कुमार का क्या कसूर था. इसके अलावा सवाल ये भी है क्या लेग स्पिनर अमित मिश्रा केवल टूरिस्ट बन कर रह जाएंगे इससे पहले भी वह इंगलैंड में खेली गई चैंपियंस ट्रॉफी और वेस्ट इंडीज़ में खेली गई त्रिकोणीय सिरीज़ में भारतीय दल का महज हिस्सा बनकर रह गए थे. इससे पहले भी आर अश्विन और सुरेश रैना के चयन पर कई बार सवाल उठते रहे हैं. अपने अजीबोग़रीब फैसले लेने के लिए मशहूर धोनी जब तक टीम को जीत दिलाते रहते हैं तब तक सब ठीक-ठाक रहता है और जैसे ही टीम हारती है उनके फैसलों पर उँगलियाँ उठनी शुरू हो जाती हैं. ऐसे में अब पहले तो उम्मीद करनी चाहिए कि कटक में मौसम ठीक हो जाए. उसके बाद भारतीय टीम दुआ करेगी कि गेंदबाज़ी की गाड़ी पटरी पर आ जाए. इसके अलावा ये देखना भी दिलचस्प होगा कि क्या भारत इस सिरीज़ को ऑस्ट्रेलिया से जीत भी पाएगा या नहीं क्योंकि अगर कटक में बादल बरसते रहे तो बाकी बचे दोनों मैच भारत को जीतने पडेंगे. |
| DATE: 2013-10-26 |
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| [738] TITLE: बॉल टेम्परिंग के लिए दक्षिण अफ्रीका पर जुर्माना |
| CONTENT: पाकिस्तान के ख़िलाफ़ दुबई में खेले जा रहे दूसरे टेस्ट के तीसरे दिन बॉल टेम्परिंग यानी गेंद से छेड़छाड़ के लिए दक्षिण अफ़्रीका पर पाँच रन का जुर्माना लगाया गया है. अंपायर इयन गोल्ड और रॉड टकर ने चायकाल के बाद गेंद में बदलाव को देखते हुए जुर्माने की मंज़ूरी दी. टीवी रीप्ले में दिखाया गया है कि दक्षिण अफ्रीकी क्षेत्ररक्षक फ़फ़ डू प्लेसी गेंद को अपनी पैंट की ज़िप पर रगड़ रहे हैं. अंपायरों ने 30वें ओवर के खेल के बाद दक्षिण अफ़्रीका के कप्तान ग्रैम स्मिथ को बुलाया और गेंद बदल दी. गोल्ड ने पाकिस्तान के स्कोर में पाँच रन अतिरिक्त के रूप में जोड़ दिए. उस समय पाकिस्तान का स्कोर तीन विकेट के नुक़सान पर 67 रन था. वह पारी की हार से बचने के लिए 418 रन बनाने का प्रयास कर रहा था. साल 2006 में ओवल में खेले गए टेस्ट मैच में पाकिस्तान पर भी पाँच रन का जुर्माना लगा था. उस समय गेंद से छेड़छाड़ के लिए जुर्माने का सामना करने वाली वह अकेली टीम थी. उस समय पाकिस्तान के कप्तान रहे इंज़माम उल हक़ ने कड़ा विरोध जताते हुए टेस्ट मैच में आगे खेलने से मना कर दिया था. इसके बाद ऑस्ट्रेलियाई अंपायर डैरेल हेयर ने मैच में इंग्लैंड के पक्ष में फ़ैसला सुनाया था. टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद आईसीसी ने इस महीने गेंद की स्थिति को लेकर बने नियमों में बदलाव करते हुए कहा था अगर इसके लिए ज़िम्मेदार गेंदबाज़ की पहचान होती है तो गेंद बदल दी जाएगी पांच रन का जुर्माना लगाया जाएगा और ज़िम्मेदार खिलाड़ी के ख़िलाफ़ शिकायत की जाएगी. उम्मीद की जा रही है कि दिन के खेल की समाप्ति के बाद अंपायर मैच के रेफ़री डेविड बून के सामने डू प्लेसी पर आरोप लगाएंगे. इस मामले की सुनवाई शुक्रवार देर रात होगी. |
| DATE: 2013-10-25 |
| LABEL: sports |
| [739] TITLE: भारत की उम्मीद पर राँची में बरस गए बादल |
| CONTENT: भारत और ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध चौथा वनडे बारिश के चलते पूरा नहीं हो सका. ऑस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 295 रन बनाए थे मगर भारतीय पारी बारिश में धुल गई. भारत ने जब चार ओवर और एक गेंद ही खेली थी कि बारिश आ गई और मैच रोकना पड़ा. उस समय भारत ने बिना किसी नुक़सान के 27 रन बनाए थे. रोहित शर्मा नौ और शिखर धवन 14 रन बनाकर क्रीज़ पर थे. इस तरह ऑस्ट्रेलिया अब भी सिरीज़ में 2-1 से आगे है. महेंद्र सिंह धोनी के शहर राँची में खेले जा रहे इस मैच में धोनी ने ही टॉस जीता मगर पहले फ़ील्डिंग का फ़ैसला किया. इस मैच में ऑस्ट्रेलिया की शुरुआत उतनी दमदार नहीं रही मगर कप्तान जॉर्ज बेली और ग्लेन मैक्सवेल ने मध्य क्रम में टीम को सँभाला और मज़बूत स्कोर तक पहुँचाया. पिछले मैच में एक ओवर में 30 रन पिटवाने वाले भारतीय गेंदबाज़ इशांत शर्मा को इस मैच में खेलने का मौक़ा नहीं मिला. इसी तरह इस मैच में भुवनेश्वर कुमार भी टीम में नहीं हैं. इन दोनों गेंदबाज़ों की जगह जयदेव उनादकट और मोहम्मद शमी को शामिल किया गया. ऑस्ट्रेलिया ने महज़ 71 रनों पर चार विकेट गँवा दिए थे. सलामी बल्लेबाज़ ऐरॉन फ़िंच सिर्फ़ पाँच रनों के निजी स्कोर पर शमी की गेंद पर बोल्ड हो गए. इसके बाद अगला विकेट दूसरे ओपनर फ़िल ह्यूज़ का गिरा. ह्यूज़ का विकेट भी शमी को ही मिला. उन्हें 11 रनों के निजी स्कोर पर विकेट के पीछे कप्तान धोनी ने लपका. टीम का स्कोर जब 32 रन था तब तीसरे विकेट के रूप में वॉटसन आउट हुए. एक बार फिर सफलता मोहम्मद शमी को ही मिली. उन्होंने 14 रनों के निजी स्कोर पर वॉटसन को बोल्ड किया. एडम वोजेज़ ने कप्तान बेली के साथ मिलकर पारी को सँभालने की कोशिश की मगर वोजेज़ 71 रनों के स्कोर पर आर अश्विन की गेंद पर एलबीडब्ल्यू क़रार दिए गए. इसके बाद पाँचवें विकेट के लिए 153 रनों की साझेदारी कप्तान बेली और मैक्सवेल के बीच हुई. चार विकेट गिरने के बाद लगा था कि ऑस्ट्रेलियाई पारी लड़खड़ा रही है मगर बेली ने एक बार फिर कप्तानी पारी खेली. उन्होंने 94 गेंदों में सात चौकों और तीन छक्कों की मदद से 98 रन बनाए. 38वें ओवर में गेंद थी विनय कुमार के पास. बेली के बल्ले का ऊपरी किनारा लेकर गेंद गई डीप मिडविकेट पर खड़े रोहित शर्मा के पास. इस तरह शतक से सिर्फ़ दो रन दूर बेली आउट हो गए. अगले तीन विकेट जल्दी-जल्दी गिरे. बेली के बाद ब्रैड हैडिन और ग्लेन मैक्सवेल भी जल्दी ही आउट हो गए. मैक्सवेल का विकेट भी विनय कुमार ने ही लिया. मैक्सवेल 92 रन बनाकर आउट हुए. जेम्स फ़ॉकनर और मिचेल जॉनसन ने एक बार फिर टीम को सँभाला और इस तरह ऑस्ट्रेलियाई टीम 295 रन तक पहुँची. भारतीय गेंदबाज़ों में शमी ने आठ ओवरों में 42 रन देकर तीन विकेट लिए. विनय कुमार को 52 रनों पर दो विकेट हासिल हुए. अश्विन को भी दो विकेट मिले. उन्होंने नौ ओवरों में 57 रन दिए. रवींद्र जडेजा ने 10 ओवरों में 56 रन देकर एक विकेट लिया. युवराज के एक ओवर में 12 रन गए जबकि सुरेश रैना ने आठ ओवरों में 38 रन दिए. इन दोनों को विकेट हासिल नहीं हुए. ऑस्ट्रेलिया ने इस सिरीज़ में पहला और तीसरा वनडे जीता है. भारत ने अभी तक दूसरा वनडे ऐतिहासिक मैच में जीता था. |
| DATE: 2013-10-23 |
| LABEL: sports |
| [740] TITLE: धोनी के शहर में भारत-ऑस्ट्रेलिया की टक्कर |
| CONTENT: भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेली जा रही सात वनडे मैचों मैचों की सिरीज़ का चौथा मैच बुधवार को भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के अपने शहर रांची में ही खेला जाएगा. ऑस्ट्रेलियाई टीम फिलहाल 2-1 से बढ़त लिए हुए है. संदीप पाटिल की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने भारतीय टीम में कोई बदलाव नहीं किया है. मोहाली में खेले गए तीसरे एकदिवसीय मैच में भारतीय गेंदबाज़ी विशेष रूप से तेज़ गेंदबाज़ी किसी क्लब स्तर की नज़र आई थी. कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि गौतम गंभीर वीरेंद्र सहवाग और ज़हीर खान जैसे वरिष्ठ और अनुभवी खिलाड़ियों को टेस्ट और एकदिवसीय क्रिकेट से बाहर दिखाने का साहसिक कदम उठाने वाली यही चयन समिति किस आधार पर टीम का चयन कर रही है. भारत दौरे पर आने से पहले जिस ऑस्ट्रेलियाई टीम को नौसिखिया माना जा रहा था आज उसके सभी खिलाड़ियों ने भारत के छ्क्के छुड़ा रखे हैं. यहाँ तक कि कप्तान महेंद्र सिंह धोनी भी खुले शब्दों में कह चुके हैं कि भारतीय तेज़ गेंदबाज़ी अंतिम ओवरों में बद से बदतर होती जा रही है और कोई भी गेंदबाज़ यॉर्कर फेंकने की क्षमता नहीं रखता. अगर ईशांत शर्मा और आर विनय कुमार की गेंदबाज़ी पर उन्हें भरोसा नहीं है तो फिर किस आधार पर उन्हें लगातार खिलाया जा रहा है ईशांत शर्मा अभी तक तीन मैचों में 189 रन दे चुके हैं. इससे पहले खेले गए टवेंटी-टवेंटी मैंच में भी उन्होंने केवल 4 ओवर में 52 रन दिए थे. आर विनय कुमार भी 3 मैचों में 191 रन दे चुके है हांलाकि उन्हें 5 विकेट भी मिले हैं. भुवनेश्वर कुमार ने उनसे कुछ कम 145 रन दिए हैं लेकिन उनके हाथ केवल एक विकेट लगा है. लगभग यही हाल स्पिनरों का है. आर अश्विन और रविंद्र जडेजा मैच जिताऊ गेंदबाज़ी करना तो बहुत दूर विकेट लेने की क्षमता भी नहीं दिखा पा रहे हैं. पिछले दिनों ज़िमबाब्वे दौर पर शानदार गेंदबाज़ी करने वाले मोहम्मद शमी और लैग स्पिनर अमित मिश्रा के साथ-साथ जयदेव उनादकट भी ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ मौक़े का इंतज़ार कर रहे हैं. सवाल ये भी उठ रहा है कि इस तरह के विकेट पर खेलकर भारत क्या साबित करना चाहता है. वैसे गेंदबाज़ी में हाल तो बुरा ऑस्ट्रेलिया का भी है. अगर भारत जीतेगा तो उसकी खराब गेंदबाज़ी की चर्चा जीत में दब जाएगी और अगर ऑस्ट्रेलिया जीतेगा तो उनके साथ भी ऐसा ही होगा. हाल के मैच देखकर ऐसा लग रहा है कि भारत के विकेटों पर क्रिकेट बेसबाल बन गया है जहाँ एक तरफ बल्लेबाज़ है तो दूसरी तरफ क़ायदे-क़ानूनो में जकड़ा निरीह गेंदबाज़. अब देखना ये है कि चयनकर्ताओं के अभयदान का ईशांत शर्मा और विनय कुमार तथा दूसरे गेंदबाज़ रांची में कितना फायदा उठाते है . वहीं आंकडों में दिलचस्पी रखने वालों के लिए यह जानना ज़रूरी होगा कि अभी तक दोनों टीमें पिछले तीन मैचों में 1870 रन बना चुकी है और इससे पहले इकलौते टवेंटी-टवेंटी में 403 रन बने थे. |
| DATE: 2013-10-23 |
| LABEL: sports |
| [741] TITLE: भारतीय गेंदबाज़ी की हालत पतली क्यों ? |
| CONTENT: मोहाली में भारत के तेज़ गेंदबाज ईशांत शर्मा ने पारी के 48वें ओवर में 30 रन क्या लुटाए कि वह पूरे भारतवर्ष के क्रिकेट प्रेमियों की नज़र में मानो खलनायक बन गए. ईशांत शर्मा पर चारों तरफ़ से हो रही आलोचनाओं की मार के बीच उनके कोच श्रवण कुमार का कहना है कि अभ्यास में कमी के कारण उनके आत्मविश्वास पर फर्क पड़ा है. कोच के मुताबिक ईशांत की तन्मयता में भी कमी आई है. उनकी गेंदबाज़ी एक्शन में थोडा परिवर्तन हुआ है. टेक्निकल रूप से देखे तो ईशांत इन दिनों ओपन चेस्ट गेंदबाज़ी कर रहे हैं यानि गेंदबाज़ी करते समय उनका सीना बल्लेबाज़ के सामने होता है. इस वजह से उनकी कलाई भी थोडा घूम जाती है. श्रवण कुमार कहते हैं कि इसका नुकसान उन्हें यह हुआ है कि गेंद सीम यानि सिलाई से पिच नहीं हो रही है और घूमती हुई जा रही है. मोहाली में अपने बल्ले से धुंआधार 139 रन बनाकर वहाँ शतक बनाने वाले पहले भारतीय बल्लेबाज़ बनने वाले भारत के महेंद्र सिंह धोनी की कप्तान की पारी भी गेंदबाज़ो की नाकामी के नीचे दबकर रह गई थी. उन्होंने बाद में शिकायती लहज़े में कहा था कि हमारे गेंदबाज़ो के पास यॉर्कर फेंकने का हुनर नहीं है. इसे लेकर श्रवण कुमार कहते हैं कि ईशांत शर्मा को यॉर्कर करने के लिए अपने गेंदबाज़ी रनअप की रफ़्तार को थोडा कम करना पड़ेगा. ईशांत के कोच का मानना है ऐसा करने से उन्हें यह सोचने का समय भी मिलेगा कि वह बल्लेबाज़ को कहाँ गेंद फ़ेंके. बहुत ज़्यादा तेज़ भागने से शरीर का कंट्रोल समाप्त हो जाता है. इससे पहले भी ईशांत शर्मा को ऐसी ही समस्या थी और पाकिस्तान के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ इमरान खान से लेकर भारत के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ मनोज प्रभाकर ने तब कहा था कि इन्हें अपने कोच के पास जाना चाहिए. तब हमने इनके गेंदबाज़ी एक्शन को सुधारा था. दूसरी तरफ श्रवण कुमार यह भी कहते हैं कि हाल तो सभी गेंदबाज़ो का ही ऐसा है ऑस्ट्रेलिया के आलराउंडर जेम्स फॉक्नर ने जिस तरह से उनकी गेंदों की बघिया उधेडी उसे लेकर क्रिकेट विशेषज्ञ भी हैरान है. ऐसा नहीं है कि ईशांत शर्मा दुनिया के ऐसे पहले गेंदबाज़ है जिनके एक ओवर में इतने रन बने दरअसल जिस तरह से उनकी लाइन और लैंथ थी उसने सबको हैरान किया. भारत दौरे पर आई इस ऑस्ट्रेलियाई टीम ने बड़े ही निष्पक्ष रूप से क्या तेज़ क्या स्पिन यानि ईशांत शर्मा आर विनय कुमार भुवनेश्वर कुमार आर अश्विन रविंद्र जडेजा और कभी कभार गेंदबाज़ी में हाथ खोलने वाले विराट कोहली की गेंदो पर जमकर रन बनाए है. भारतीय गेंदबाज़ी को लेकर पूर्व तेज़ गेंदबाज़ करसन घावरी कहते हैं कि यह सब टवेंटी-टवेंटी का असर है. करसन घावरी कहते हैं गेंदबाज़ो को सोचना होगा कि वहाँ उन्हें सिर्फ चार ओवर गेंदबाज़ी करनी होती है जबकि पचास ओवर के मैच में 10 ओवर करने होते है. अगर भारतीय गेंदबाज़ 300 से अधिक रनों का बचाव भी नहीं कर सकते तो बल्लेबाज़ भी क्या करेंगे. भारतीय टीम में गेंदबाज़ी कोच की बात चलने पर ईशांत शर्मा के कोच श्रवण कुमार का विचार है कि जितने कोच उतनी सलाह. वे मानते हैं कि शुरूआती कोच तो फैमिली डॉक्टर की तरह होता है सही सलाह वही दे सकता है. भुवनेश्वर कुमार को लेकर श्रवण कुमार कहते है कि उनकी गेंद शुरूआत में थोडी स्विंग होती है जिसे ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ संभलकर खेलते है बाद में वह भी महंगे साबित हो रहे है. भारत के पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह का भी मानना है कि बल्लेबाज़ों के लिए इतने शानदार विकेट पर गेंदबाज़ो के लिए किफायती गेंदबाज़ी करना आसान नहीं है. मनिंदर सिंह कहते हैं कि टवेंटी-टवेंटी का असर भी है और बल्लेबाज़ आजकल रन देखकर अपना लक्ष्य निर्धारित करते है. इसके बावजूद करसन घावरी कहते है कि बल्लेबाज़ों को अगर सही जगह गेंद की जाए और यह जो क्रिकेट के नए नियम है गेंदबाज़ भी उसके अनुरूप अपनी गेंदबाज़ी को ढाल ले तो ऐसा नहीं है कि अच्छी गेंदबाज़ी नही की जा सकती. अब देखना है कि पिछले तीनो मैचों से सबक़ लेकर भारतीय गेंदबाज़ कैसी गेंदबाज़ी बाकी बचे हुए मैचो में करते है. वह तो भला हो विराट कोहली और महेंद्र सिंह धोनी का जिन्होंने दो बार ऑस्ट्रेलिया के शिकंजे से भारत को निकाला यानि ख़तरे की घंटी दोनो तरफ़ बज रही है थोडी बल्लेबाज़ी में ज़्यादा गेंदबाज़ी में. |
| DATE: 2013-10-22 |
| LABEL: sports |
| [742] TITLE: शिव थापा विश्व चैम्पियनशिप के क्वार्टर फ़ाइनल में |
| CONTENT: भारत के शिव थापा कज़ाख़स्तान में चल रही विश्व मुक्केबाज़ी चैम्पियनशिप के क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बना ली है. 56 किलोग्राम वर्ग में थापा ने अर्जेंटीना के अल्बर्टो मेलियन को 2-1 से मात दी. अब क्वार्टर फ़ाइनल में शिव थापा का मुक़ाबला अज़रबैजान के जाविड चालावियेव से होगा. अगर शिव थापा क्वार्टर फ़ाइनल में जीत जाते हैं तो उन्हें कम से कम कांस्य पदक ज़रूर मिलेगा. मैच के बाद शिव थापा ने समाचार एजेंसी पीटीआई के साथ बातचीत में कहा ये बेहत कड़ा मुक़ाबला था और मैंने काफ़ी मेहनत किया और आख़िरकार मुझे जीत मिली. शिव थापा 2010 के यूथ ओलंपिक में रजत पदक जीत चुके हैं लेकिन पिछले साल के लंदन ओलंपिक में वे कोई पदक नहीं जीत पाए थे. शिव ने कहा मैंने पहले दौर में आराम से खेलने की कोशिश की. लेकिन उसमें कोई भी जीत सकता था क्योंकि हमारा स्टाइल एक जैसा है. और वे जीत गए. लेकिन अगले दोनों दौर में मैंने तेज़ी दिखाई. राष्ट्रीय मुक्केबाज़ी कोच गुरबख़्श सिंह संधू ने शिव थापा की सराहाना करते हुए कहा कि उन्होंने जो अभी तक सर्वश्रेष्ठ मुक़ाबले देखे हैं ये उनमें से एक था. उन्होंने कहा ये काफ़ी क़रीबी और बेहतरीन मुक़ाबला भी था. दोनों एक-दूसरे को पंच मारने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन शिव थापा ने तीसरे दौर में शानदार खेल दिखाया और फिर जीत हासिल की. |
| DATE: 2013-10-21 |
| LABEL: sports |
| [743] TITLE: ईशांत शर्मा को ड्रॉप करना क्यों है मुश्किल ? |
| CONTENT: पूर्व भारतीय टेस्ट क्रिकेटर मनिंदर सिंह मानते हैं कि तेज़ गेंदबाज़़ ईशांत शर्मा के प्रदर्शन में कभी स्थायित्व नहीं रहा. उनके साथ फ़िटनेस की भी दिक्कतें हैं. गौरतलब है कि मोहाली के तीसरे वन-डे मैच में ईशांत शर्मा के आठवें ओवर में 30 रन बनने के बाद ये मुकाबला भारत के हाथ से निकल गया. वह काफ़ी ख़र्चीले गेंदबाज़ भी साबित हुए. टीम मैच में चार विकेट से हार गई. मनिंदर ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि ईशांत के साथ कुछ समस्या जरूर है जिसके कारण वह मैचों में अपना सौ फीसदी प्रदर्शन नहीं कर पाते. बकौल उनके भारतीय टीम को दक्षिण अफ्रीका और न्यूज़ीलैंड का दौरा करना है इसके बाद टीम इंग्लैंड जाएगी जहां के विकेट्स उनके लिए मददगार होंगे फिर उन पर इतना इनवेस्ट किया जा चुका है कि ड्रॉप नहीं कर सकते. इसके लिए तीनों देशों का दौरे का इंतजार किया जाएगा. मौजूदा भारत-आस्ट्रेलिया सिरीज में दोनों ही टीमों के गेंदबाज़़ों का बुरा हाल है मनिंदर कहते हैं गेंदबाज़ों की हालत इसलिए ख़राब है क्योंकि भारत में बैटिंग विकेट हैं जिनपर गेंदबाज़ों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं. गेंदबाज़ों के ज्यादा रन देने के पीछे वह एक और वजह देखते हैं. उनके अनुसार वन-डे के नए नियम से मुश्किलें बढी हैं. इसमें पांच क्षेत्ररक्षकों को घेरे में रखना होता है केवल चार ही बाहर रखे जा सकते हैं ऐसे में समझ में नहीं आता कि क्षेत्ररक्षकों को कहां लगाएं औऱ कहां नहीं. वह कहते हैं कि टी20 का प्रभाव भी वन-डे में आ रहा है. टी20 क्रिकेट के आने के बाद बॉलर्स का हश्र और भी बुरा होने लगा है. ख़ासतौर पर भारत सरीखे बैटिंग विकेट्स पर. मौजूदा सीरीज के बाकी बचे चार वन-डे मैचों के लिए टीम में बदलाव नहीं किये जाने पर उन्होंने कहा मुझे लग रहा था कि बदलाव नहीं होंगे अगर होंगे तो केवल प्लेइंग इलेवन में होंगे. ये बेहतरीन खिलाड़ी हैं हिन्दुस्तान के जिन्हें भारतीय चयनकर्ताओं ने चुना है. उन्हें लगता है कि चयनकर्ताओं की ये सही रणनीति है क्योंकि इससे खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ता है. उन्हें लगता है कि वो देश के अच्छे खिलाड़ी हैं. |
| DATE: 2013-10-21 |
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| [744] TITLE: डोपिंग प्रतिबंध के बाद जेसी राइडर फिर मैदान में |
| CONTENT: डोपिंग के कारण प्रतिबंधित किए गए न्यूजीलैंड के बल्लेबाज़ जेसी राइडर अगले सप्ताह प्रथम श्रेणी क्रिकेट में वापसी करेंगे. 29 साल के राइडर पर मार्च में क्राइस्टचर्च में एक बार के बाहर हमला हुआ था जिसके बाद वह कोमा में चले गए थे. राइडर जब स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे कि उसी दौरान उन्हें बताया गया कि दो शक्तिवर्द्धक दवाओँ के लिए उनका परीक्षण पॉजिटिव पाया गया है. उन्हें छह महीने के लिए क्रिकेट गतिविधियों से प्रतिबंधित कर दिया गया. राइडर ने न्यूजीलैंड के लिए 18 टेस्ट और 39 वनडे खेले हैं. वह प्रथम श्रेणी में ओटागो के लिए वेलिंगटन के ख़िलाफ़ खेलेंगे. उन्होंने एक बयान में कहा इस साल के गुजरने के बाद आप कह सकते हैं कि मेरे करियर का सबसे बुरा दौर गुजर चुका है. राइडर ने कहा मैं इसे इस नजरिए से नहीं देखूंगा जैसे कि मुझे दूसरा जीवन मिला हो. मुझे लगता है कि मैं भाग्यशाली हूँ. राइडर ने फरवरी 2012 से देश के लिए कोई मैच नहीं खेला है लेकिन वह कीवी टीम में वापसी चाहते हैं. उन्होंने कहा मेरा लक्ष्य फिर से न्यूजीलैंड के लिए खेलना है. अगर सबकुछ ठीकठाक रहा तो मैं दिसंबर में होने वाले वेस्टइंडीज दौरे के लिए टीम में वापसी की उम्मीद करता हूं. राइडर ने कहा अगर वेस्टइंडीज दौरे के लिए मुझे टीम में नहीं चुना जाता है तो मैं जनवरी में होने वाले भारत दौरे के लिए पूरा जोर लगाउंगा. |
| DATE: 2013-10-21 |
| LABEL: sports |
| [745] TITLE: मोहाली वनडे में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को हराया |
| CONTENT: मोहाली में खेले गए तीसरे वनडे में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को चार विकेट से हरा दिया है. भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 304 रन की चुनौती दी थी जो ऑस्ट्रेलिया ने तीन गेंद रहते हासिल कर ली. ऑस्ट्रेलिया की जीत के हीरो जेम्स फॉकनर रहे जिन्होंने 29 गेंदों पर नाबाद 64 रन बनाए. उन्होंने इशांत शर्मा के एक ओवर में चार छक्के और एक चौका लगाया और तीस रन बटोरे. इस तरह उन्होंने मैच का पलड़ा ऑस्ट्रेलिया के पक्ष में झुका दिया. इससे पहले ऑस्ट्रेलिया ने 40 ओवर में अपने पांच विकेट खो दिए थे और उस वक्त उसका स्कोर 208 रन था. जीत भारत के खाते में आती दिख रही थी लेकिन फिर ऑस्ट्रेलियाई टीम ने मैच में वापसी की. खास कर फॉकनर ने अपनी आतिशी पारी से मैच का रुख ही बदल दिया. उनका बखूबी साथ दिया वॉग्स ने जिन्होंने 88 गेंदों पर 76 रन बनाए जिसमें उनके सात चौके शामिल थे. इसके अलावा एरोन फिंच ने भी 38 रनों की उपयोगी पारी खेली. इससे पहले ऑस्ट्रेलिया ने टॉस जीतकर भारत को पहले बल्लेबाजी के लिए बुलाया. भारत ने नौ विकेट खोकर 303 रन का स्कोर खड़ा किया. वैसे भारतीय टीम की शुरुआत अच्छी नहीं रही और सिर्फ 14 रन के कुल योग पर सलामी बल्लेबाज शिखर धवन आठ रन के निजी स्कोर पर आउट हो गए. इसके बाद रोहित शर्मा भी 11 रन बनाकर पैवेलियन लौट गए. भारत का दूसरा विकेट 37 रन के योग पर गिरा. सुरेश रैना 17 रन बनाकर जबकि युवराज सिंह बगैर खाता खोले पैवेलियन लौट गए. भारत का तीसरा और चौथा विकेट 76 रन के कुल स्कोर पर गिर गया. विराट कोहली ने एक बार शानदार बल्लेबाजी का प्रदर्शन करते हुए 68 रन बनाए. इसके बाद धोनी ने कप्तान की ज़िम्मेदारी निभाते हुए 107 गेंदों पर शतक जमा दिया. उन्होंने कुल 121 गेंदों पर 139 रन बनाए और नाबाद रहे. इससे पहले कोई भी बल्लेबाज मोहाली में वनडे क्रिकेट में शतक नहीं लगा सका था. शतकों के इस सूखे को धोनी ने दूर कर दिया. |
| DATE: 2013-10-19 |
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| [746] TITLE: धोनी ने ऑस्ट्रेलिया को दिया 304 रनों का विराट लक्ष्य |
| CONTENT: टॉस जीतकर ऑस्ट्रेलिया ने पहले गेंदबाज़ी करने का फ़ैसला किया तो उसे यकीन रहा होगा कि भारतीय बल्लेबाज़ों को जमने नहीं देगा. कुछ हद तक यह रणनीति ग़लत भी नहीं रही क्योंकि कोहली और धोनी को छोड़कर कोई बल्लेबाज़ 50 का आंकड़ा तक नहीं छू पाया. चार बल्लेबाज़ दहाई तक भी नहीं पहुंचे तो दो शून्य पर पैवेलियन लौट गए. तीसरे नंबर पर सबसे बड़ा स्कोर 28 रन था तो चौथे नंबर पर सबसे ज़्यादा 20 रन ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ों ने दिए- यानि कि ये एक्स्ट्रा रन थे. भारतीय टीम की शुरुआत अच्छी नहीं रही और सिर्फ 14 रन के कुल योग पर सलामी बल्लेबाज शिखर धवन आठ रन के निजी स्कोर पर आउट हो गए. इसके बाद रोहित शर्मा भी 11 रन बनाकर पैवेलियन लौट गए. भारत का दूसरा विकेट 37 रन के योग पर गिरा. सुरेश रैना 17 रन बनाकर जबकि युवराज सिंह बगैर खाता खोले पैवेलियन लौट गए. भारत का तीसरा और चौथा विकेट 76 रन के कुल स्कोर पर गिर गया. विराट कोहली ने एक बार शानदार बल्लेबाजी का प्रदर्शन करते हुए 68 रन बनाए. इसके बाद धोनी ने कप्तान की ज़िम्मेदारी निभाते हुए 107 गेंदों पर शतक जमा दिया. उन्होंने कुल 121 गेंदों पर 139 रन बनाए और नाबाद रहे. |
| DATE: 2013-10-19 |
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| [747] TITLE: भारत-ऑस्ट्रेलिया मैच: मोहाली में भी बल्लेबाज़ों के भरोसे धोनी |
| CONTENT: भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच शनिवार को मोहाली में एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों की सीरीज़ की तीसरा मैच खेला जाएगा. भारतीय गेंदबाज इस वक्त दरियादिली के मूड में लगते हैं क्योंकि ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एक टवेंटी-टवेंटी और दो एकदिवसीय मैचों में वो 864 रन दे चुके हैं. अगर जयपुर में भी भारत के गेंदबाज़ फ़ॉर्म में नहीं आते तो भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की रंगत कायम रहना मुश्किल हो सकता है. इस वक्त उनके सामने अहम सवाल यही होगा कि सिर्फ़ बल्लेबाज़ों के दम पर वो मैच कब तक जीत सकते हैं. भारतीय गेंदबाज़ों में से कोई भी ऑस्ट्रेलियन बल्लेबाज़ो पर असर छोड़ने में कामयाब नहीं लग रहा है. ईशांत शर्मा आर विनय कुमार और भुवनेश्वर कुमार की तेज़ गेंदबाज़ी असरहीन दिख रही है तो स्पिन में आर अश्विन ख़ास नही कर पा रहे. वैसे भी जब से दोनों छोर से नई गेंद का इस्तेमाल शुरू हुआ है तब से उनकी गेंदों को घुमाव नहीं मिल पा रहा. और फ्लाइट देने में तो वह पहले से ही कंजूसी करते हैं. रविंद्र जडेजा भी अभी तक प्रभावहीन साबित हुए हैं. हालत तो यह है कि ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों ने एक समान भाव से सभी भारतीय गेंदबाज़ों की धुनाई की है. लेकिन शायद धोनी की कामयाबी का बड़ा मंत्र है- जीत है तो सब ठीक है. वैसे भारतीय गेंदबाज़ों और जयपुर में ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ों की धुनाई ने भारतीय विकेटों की भी पोल खोल दी है. ऐसे विकेट केवल बल्लेबाज़ों की मदद करते है. आईपीएल ने तो क्रिकेट को सिर्फ बल्लेबाज़ों का खेल बनाकर रख दिया है. भारत में न तो क्रिकेट के दीवानों की कमी है और न ही जानकारों की. इसलिए जब हर मैच में गेंदबाज़ों का यही हाल होगा तो उनकी आलोचना भी होगी. ऐसे में बीसीसीआई की पिच कमेटी पर भी सवाल उठ सकते हैं. वह भारतीय कप्तान के मनमुताबिक़ सपाट पिच बनाएगी या फिर बल्लेबाज़ों के लिए स्वर्ग कही जाने वाली पाटा विकेट का निर्माण करने वाले क्यूरेटरों को रखेगी. मोहाली में अभी तक भारत ने 12 एकदिवसीय मैच खेले हैं लेकिन वहा आज तक कोई भारतीय बल्लेबाज़ शतक नहीं बना सका है. अगर मोहाली में भी ऑस्ट्रेलिया ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए बड़ा स्कोर खड़ा किया तो भारतीय बल्लेबाज़ी पर एक बार फिर दबाव आ जाएगा. वैसे भारतीय टीम में अमित मिश्रा के चयन की मांग भी होने लगी है. पिछले दिनों उन्होंने ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ 18 विकेट लिए थे. पूर्व क्रिकेटर अतुल वासन आर अश्विन के खराब फ़ॉर्म के बावजूद टीम में रहने पर कहते हैं किसी खिलाड़ी का ये मानना कि वो जैसा भी खेले टीम में तो रहेगा ही- उसी की प्रतिभा के लिए नुक्सानदायक है. ऐसे में अमित मिश्रा को मौक़ा मिलना चाहिए. ज़िम्बाब्वे के खिलाफ़ तो वो बेहतर प्रदर्शन कर ही चुके हैं अब एक मजबूत टीम के खिलाफ़ भी उन्हें आजमाना जाना चाहिए. दूसरी तरफ कमज़ोर मानी जाने वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम ने जिस अंदाज़ में भारत में अभी तक प्रदर्शन किया है उसे लेकर क्रिकेट प्रेमी उत्साहित हैं और उन्हें आगे और अच्छे मैचों की उम्मीद है. अब देखना है कि मोहाली में भारतीय बल्लेबाज़ो के शतक का सूखा टूटता है या नहीं और क्या भारतीय टीम केवल बल्लेबाज़ों के दम पर जीत की राह पर बढ़ती रहेगी. |
| DATE: 2013-10-19 |
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| [748] TITLE: मेरा ईगो किसी से कम नहीं है: ज्वाला गुट्टा |
| CONTENT: विवादों में घिरने का शौक शायद ही किसी खिलाड़ी को होता हो. लेकिन पिछले कुछ समय से बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा किसी न किसी विवाद में पड़ती ही जा रही हैं. हाल ही में बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया बीएआई की अनुशासन समिति ने ज्वाला गुट्टा पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की सिफ़ारिश की. हालांकि दिल्ली हाई कोर्ट ने इस प्रतिबंध पर फिलहाल रोक लगा दी है. ज्वाला पर इंडियन बैडमिंटन लीग के दौरान अपनी टीम डेल्ही स्मैशर्स के खिलाड़ियों को बंगा बीट्स टीम के ख़िलाफ़ मैच न खेलने के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया था. ज्वाला हाई कोर्ट के फैसले से काफी खुश हैं. वो कहती हैं हाई कोर्ट का मेरे पक्ष में फैसला देना सिर्फ़ मेरी ही नहीं सभी खिलाड़ियों की जीत है. हम जैसे खिलाड़ी यहां तक पहुंचने के लिए बहुत मेहनत करते हैं. कोई हमारी मेहनत पर पानी नहीं फेर सकता. ज्वाला कहती हैं एसोसिएशन खिलाड़ियों के भले के लिए होती है लेकिन अगर वो ही हमारे रास्ते में रोड़े अटकाएगी तो हम चुप नहीं बैठेंगे. मैं उम्मीद करती हूं कि मेरी ये लड़ाई बाकी खिलाड़ियों के लिए एक प्रेरणा बने. वो यह भी कहने से नहीं हिचकिचाती कि बंगा बीट्स टीम के कोच ने भी एक पत्र लिख कर उन पर बैन लगाए जाने की सिफ़ारिश पर आपत्ति जताई है. वो कहती हैं मुझे लगता है कि मुझ पर निजी हमला हो रहा है. मुद्दा कोई है ही नहीं. किसी खिलाड़ी पर आजीवन प्रतिबंध तब लगाया जाता जब उसने मैच फिक्सिंग की हो या फिर डोप किया हो. डोपिंग में भी एक या दो साल का बैन लगता है. मुझ पर इस तरह का प्रतिबंध लगाने की बात कर एसोसिएशन पता नहीं क्या साबित करना चाहती है. बीएआई का ये रवैया बहुत ही बचकाना है. ज्वाला कहती हैं कि एक बैडमिंटन खिलाड़ी की सफलता में बैडमिंटन एसोसिएशन की भूमिका न के बराबर होती है. वो कहती हैं एसोसिएशन कुछ भी नहीं करती. बीसीसीआई की तरह बीआईए हमें कोई वेतन नहीं देती. हमने कोई कॉन्ट्रैक्ट साइन नहीं किया है. एसोसिएशन सिर्फ हमारा नाम प्रतियोगिताओं के लिए देती है. बस इतना ही है उसका काम. हमारे नाम से एसोसिएशन को सरकार से मदद मिलती है. ज्वाला कहती हैं खास कुछ न करते हुए भी अगर बीआईए श्रेय लेना चाहती है तो ले. लेकिन अगर वो ये कहेगी कि जैसा हम बोलते हैं वैसा ही करो तो ये तो संभव नहीं है. अगर मेरे साथ एसोसिएशन ये सब कर सकती है तो जो नए खिलाड़ी हैं उनके साथ क्या नहीं कर सकती. बीबीसी ने ज्वाला से ये भी जानने की कोशिश की कि क्या पूरी की पूरी एसोसिएशन उनके खिलाफ़ है इस सवाल के जवाब में ज्वाला कहती हैं पूरी एसोसिएशन मेरे खिलाफ नहीं है. ज़्यादातर लोगों से मेरी बहुत अच्छी बातचीत है. वो मुझे बचपन से जानते हैं. बीएआई के बहुत सदस्य मेरी इस बात पर भी तारीफ करते हैं कि मैं कभी अन्याय नहीं सहती. मुझे लगता है कि ये सिर्फ़ एक या दो लोगों का काम है. वो सोचते हैं कि उनके हाथ में सत्ता है तो वो कुछ भी कर सकते हैं. ज्वाला ये भी कहती हैं कि जब भी किसी के हाथ में सत्ता होती है तो उसके अहम पर भी चोट बहुत जल्दी लग जाती है. वो कहती हैं उन्हें ये लगता है कि ज्वाला क्यों बोलती है. उनसे डरती क्यों नहीं. मुझे किसी से डरने की क्या ज़रूरत है. बैडमिंटन में मैंने खुद अपनी जगह बनाई है. मैंने आज तक किसी से कोई मदद नहीं ली. मैंने कभी किसी की चापलूसी नहीं की. अगर वो लोग सोचते हैं कि उनका अहंम बहुत बड़ा है तो मैं साफ कर दूं कि मेरा अहंम उनसे भी बड़ा है. चलते-चलते ज्वाला ये भी कहती हैं कि इस बार वो बीएआई के साथ अपनी इस लडाई को वो बीच में नहीं छोड़ेगी अंजाम तक पहुंचा कर ही रहेंगी. |
| DATE: 2013-10-17 |
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| [749] TITLE: भारत को विराट जीत के शिखर पर पहुंचाया रोहित ने |
| CONTENT: रोहित शर्मा विराट कोहली और शिखर धवन का बल्ला जयपुर में कुछ यूँ चला कि ऑस्ट्रेलियाई टीम चारों खाने चित नज़र आई. इस तरह 360 रनों का बड़ा लक्ष्य भी बौना साबित हुआ और भारत ने सिरीज़ के दूसरे वनडे में ऑस्ट्रेलिया को नौ विकेट से हरा दिया. भारत ने ये स्कोर 43 ओवरों और तीन गेंदों में ही पूरा कर लिया. जब ऑस्ट्रेलियाई पारी समाप्त हुई थी और स्कोर बोर्ड पर पाँच विकेट पर 359 रन दिख रहे थे तो लगा था कि सिरीज़ में ऑस्ट्रेलिया 2-0 की बढ़त लेने वाली है. टीम के सभी शुरुआती पाँच बल्लेबाज़ों ने अर्द्धशतक जमाए थे. कप्तान जॉर्ज बेली ने नाबाद 92 रनों की पारी खेली. मगर वे सारी पारियाँ भारतीय पारी के सामने बौनी साबित हो गईं. सलामी बल्लेबाज़ शिखर धवन सिर्फ़ पाँच रनों से शतक चूक गए वरना तीनों बल्लेबाज़ों के शतक होते. दूसरे सलामी बल्लेबाज़ रोहित शर्मा 141 रन बनाकर नॉट आउट रहे. रोहित ने जहाँ टिककर बल्लेबाज़ी की तो वहीं विराट कोहली ने ताबड़तोड़ रन जुटाए. उन्होंने सिर्फ़ 52 गेंदों में 100 रन ठोंक दिए. इसमें सात छक्के और आठ चौके शामिल थे. ये किसी भी भारतीय का वनडे में सबसे तेज़ शतक है. रोहित शर्मा ने 123 गेदों की अपनी पारी में 17 चौके और चार छक्के जमाए. धवन भले ही शतक न मार पाए हों मगर उन्होंने 86 गेंदों में ही 95 रन बनाए थे. उसमें 14 चौके शामिल थे. ऑस्ट्रेलिया को सिर्फ़ उन्हीं का विकेट हाथ लगा. उन्हें जेम्स फ़ॉकनर की गेंद पर विकेट के पीछे ब्रैड हैडिन ने लपका. वैसे हैडिन ने इससे पहले अपने आपको काफ़ी कोसा भी होगा क्योंकि धवन जब सिर्फ़ 18 रनों के निजी स्कोर पर थे तो उनका कैच हैडिन से छूट गया था. धवन और रोहित शर्मा ने मिलकर पहले विकेट के लिए 176 रन जोड़े. मैच में टॉस जीतकर आस्ट्रेलियाई कप्तान जॉर्ज बेली ने पहले बल्लेबाजी का निर्णय लिया. शीर्ष क्रम में सवाई मान सिंह स्टेडियम के मैदान पर उतरे ओपेनर बल्लेबाज एरॉन फिंच और फिलिप ह्यूज़ ने भारतीय गेंदबाजों की जमकर धुनाई की. फिंच ने सात चौकों और एक छक्के की मदद से 50 रन बनाए और सुरेश रैना के हाथों रन आउट हो गए. फिंच को 10वें ओवर में तब जीवन दान मिला जब युवराज सिंह ने उनका एक आसान कैच टपका दिया. पिछले कुछ मैचों से अपने बल्ले से की करिश्मा न दिखा पाने वाले शेन वॉटसन इस मैच में फॉर्म में दिखे. तीन छक्के और छह चौकों की मदद से उन्होंने 53 गेंदों में 59 रन बना डाला. विनय कुमार की गेंद पर वह ईशांत शर्मा के हाथों कैच आउट होकर पैवेलियन लौटे गए. पांचवे नंबर पर बल्लेबाजी के लिए उतरे ग्लेन मैक्सवेल ने भारतीय गेंदबाजी और क्षेत्र रक्षण की जमकर बखिया उधेड़ी. उन्होंने सात चौकों और एक छक्के की मदद से महज 32 गेंदों पर 53 रनों की धुआंधार पारी खेली. लेकिन जल्दबादी में विकेट दे दिया. रैना ने उन्हें 46वें ओवर में कैच आउट कर दिया. फिलिप ह्यूज़ ने भी धुआंधार बल्लेबाजी करते हुए 8 चौकों और एक छक्के की मदद से 103 गेंदों में 83 रन बनाए. वे अश्विन की गेंद पर धोनी के हाथों कैच आउट होकर पवेलियन लौटे. ऑस्ट्रेलियाई कप्तान ज़ार्ज बेली ने आठ चौके और पांच छक्के की मदद से नाबाद 92 रन बनाए. एडम वोजेज़ 11 रन को विनय कुमार की गेंद पर बी कुमार ने कैच आउट किया. छठे क्रम पर आए ब्रैड हैडिन नाबाद 1 रहे. भारतीय गेंदबाजों ने इस पारी में कुल 10 अतिरिक्त रन दिये. इससे पहले पुणे में खेले गए पहले वनडे में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को 72 रन से हराया था. |
| DATE: 2013-10-16 |
| LABEL: sports |
| [750] TITLE: दूसरा वनडे: बराबरी कर पाएगा भारत? |
| CONTENT: वनडे सिरीज़ के पहले मैच में मात खाने के बाद टीम इंडिया बुधवार को जयपुर में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मैदान में उतरेगी. पुणे में खेले गए पहले मैच में भारत को 72 रन से हराकर ऑस्ट्रेलिया की टीम ने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया है. दरअसल कई आलोचनाओं से घिरी कंगारू टीम से कम ही लोगों को इस तरह के प्रदर्शन की उम्मीद थी. दूसरे मैच में भी ऑस्ट्रेलिया अब भारत पर जीत के बाद बने दबाव का कम नही होने देना चाहेगा जबकि भारत सिरीज़ में जीत का खाता खोलने के लिए उतरेगा. भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की चिंता तेज़ गेंदबाज़ी को लेकर है. अनुभवी ईशांत शर्मा अपनी गेंदबाज़ी से ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों पर प्रभाव छोडने में नाकाम रहे. यहां तक कि वह इससे पहले खेले गए टवेंटी-20 मैच में भी ख़ासे महंगे साबित हुए थे. उनके अलावा दूसरे तेज़ गेंदबाज़ आर विनय कुमार ने भी दिशाहीन गेंदबाज़ी की और स्पिन में आर अश्विन भी अपनी छाप नहीं छोड सके. बल्लेबाज़ी में जहां ऑस्ट्रेलिया की सलामी जोड़ी फिल ह्यूज़ और एरोन फिंच ने पहले मैच में पहले विकेट के लिए 110 रनों की साझेदारी कर मज़बूत शुरूआत की वही भारत को अपनी सर्वश्रेष्ठ फॉर्म के बावजूद शिखर धवन ऐसी शुरूआत देने में नाकाम रहे. रोहित शर्मा विराट कोहली और सुरेश रैना ने बल्लेबाज़ी तो अच्छी की लेकिन कोई भी विकेट पर टिककर एक छोर नही संभाल सका. लगातार गिरते विकेटों के बीच रन बनाने की रफ्तार भी कम हो गई नतीजा ऑस्ट्रेलिया ने एक आसान जीत हासिल की और भारतीय टीम की विजयी लय को भी तोड़ दिया. पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह कहते हैं यह ऑस्ट्रेलियाई टीम युवाओं से भरी है और इनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है. शायद यही बात इनके लिए इनकी ताक़त भी बन गई है. ऑस्ट्रेलियन लड़ाकू खिलाड़ी है और भारत में शानदार प्रदर्शन कर चयनकर्ताओं को प्रभावित करना चाहते है. कुछ सीनियर ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी अभी घायल है और यह युवा खिलाड़ी उनकी जगह तभी ले सकेंगे जब अच्छा खेलेंगे. मनिंदर सिंह का यह भी कहना है कि जब सलामी बल्लेबाज़ और गेंदबाज दोनों अपना काम बख़ूबी करे तो टीम का हौसला भी बढ़ता है. जब कप्तानी की तुलना हुई तो मनिंदर का कहना था कि जॉर्ज बेली बेहद शांत खिलाड़ी हैं बिलकुल धोनी की तरह. बल्लेबाज़ तो अच्छे हैं ही इसीलिए उन्हें कप्तान भी बनाया गया क्योंकि माइकल क्लार्क घायल है. भारतीय गेंदबाज़ी को लेकर मनिंदर सिंह साफ-साफ कहते है कि ईशांत शर्मा एक दो मैच में अच्छी गेंदबाज़ी करने के बाद पांच-छह मैचों में फिर साधारण लगने लगते है तो आर विनय कुमार विदेशी पिचों पर तो शायद कुछ कर जाएं लेकिन भारतीय पिचों पर वह विशेष कर पाएंगे ऐसा लगता नही है. पहले तो टवेंटी-20 में हार के बावजूद ऑस्ट्रेलियाई टीम की सराहना हुई और उसके बाद एकदिवसीय श्रृंखला में जीत के साथ हुई शुरुआत उनके खेमे का उत्साह बढ़ाने के लिए काफी है. ये भी सच है कि भारत की ताक़त उसकी बल्लेबाज़ी रही है. शिखर धवन रोहित शर्मा विराट कोहली सुरेश रैना युवराज सिंह और महेंद्र सिंह धोनी का बल्ला बोलेगा तो भारत भी जीतेगा जैसा पिछले दिनों देखने को भी मिला. इन सबके बीच रविंद्र जडेजा की भूमिका भी अहम रहेगी. वैसे अभी श्रृंखला की शुरूआत है लेकिन गुलाबी नगरी जयपुर में ऑस्ट्रेलिया की जीत जहां उसकी टीम की रंगत को और निखार देगी तो वही भारत भी जयपुर में ही 1-1 से बराबरी हासिल करने में कोई कसर नही छोड़ना चाहेगा. |
| DATE: 2013-10-16 |
| LABEL: sports |
| [751] TITLE: वर्ल्ड टूर्नामेंट से भारत में लोकप्रिय होगा स्नूकरः पंकज आडवाणी |
| CONTENT: नई दिल्ली में हो रहे इंडियन ओपन वर्ल्ड रैंकिंग स्नूकर टूर्नामेंट में भाग ले रहे दुनिया के 70वीं वरीयता प्राप्त खिलाड़ी पंकज आडवाणी ने कहा है कि इससे भारत में इस खेल की लोकप्रियता बढ़ेगी. उन्होंने कहा कि युवाओं के लिए इस टूर्नामेंट में शीर्ष स्नूकर खिलाड़ियों को खेलते हुए देखने का यह एक सुनहरा मौका है. इसमें जॉन हिगिंस नील रॉबर्टसन मार्क सेल्वी जैसे कई ख्यातिप्राप्त खिलाड़ी भाग ले रहे हैं. स्नूकर मैचों के टेलीविज़न पर प्रसारण से इसकी लोकप्रियता बढ़ेगी. इस टूर्नामेंट में ईनामी राशि को देखते हुए कहा जा सकता है कि युवा इस खेल में करियर बना सकते हैं. करीब तीन करोड़ रुपए तीन लाख पाउंड की ईनामी राशि वाले इस टूर्नामेंट में विजेता को 50 लाख रुपये 50 हज़ार पाउंड मिलेंगे. बाकी पैसे समानुपात में टूर्नामेंट के अन्य खिलाड़ियों के बीच बांट दिए जाएंगे. आडवाणी ने कहा कि दुनिया में स्नूकर की 10 रैंकिंग प्रतियोगिताएं होती है. इंडियन ओपन उनमें से एक है. 14 अक्टूबर से शुरू यह टूर्नामेंट 18 अक्टूबर तक दिल्ली के मेरेडियन होटल में खेला जाएगा. 28 वर्षीय पंकज ने एक सवाल पर कहा कि वह इस टूर्नामेंट के लिए फ़ेवरेट खिलाड़ी नहीं हैं. उन्होंने कहा यह प्रोफेशनल स्नूकर है और इस खेल में इंग्लैंड के खिलाड़ियों का वर्चस्व है. जब आप विजेताओं की सूची देखेंगे तो उनमें अधिक्तर खिलाड़ी ब्रिटेन के होंगे. उन्होंने कहा कि एशियाइयों के लिए अपनी पहचान बनाना काफ़ी मुश्किल है. क्योंकि इसके लिए आपको साल के 6-7 महीनों तक इंग्लैंड में रखना होगा और वहां की परिस्थिति में बेहतरीन खिलाड़ियों के साथ खेलते हुए अपने खेल के स्तर को सुधारना होगा. उन्होंने कहा यह सही है कि मैंने और आदित्य ने पिछले कुछ सालों में बेहतरीन काम किया है लेकिन यह केवल एक शुरुआत है. इस प्रतियोगिता से देश के युवाओं में स्नूकर को लेकर रूचि बढ़ेगी. इससे हमारे जैसे खिलाड़ियों में भी आत्मविश्वास जगेगा. पंकज ने कहा कि उन्होंने बिलियर्ड्स से स्नूकर की तरफ़ ध्यान बदला है. उन्होंने कहा मैं बिलियर्ड्स हमेशा खेलते रहूंगा. लेकिन अभी मुझे लगता है कि स्नूकर को मेरी अधिक जरूरत है. मैंने पिछले कुछ महीनों में स्नूकर में अच्छा प्रदर्शन किया है. पंकज ने इस खेल को भारत में लोकप्रिय बनाने के लिए स्कूलों और कॉलेजों पर ध्यान देने की ज़रूरत बताई. इसके लिए स्कूलों और कॉलेजों में स्नूकर टेबल मुहैया कराने की ज़रूरत है. काफी लड़के-लड़कियां इस खेल को खेलना चाहते हैं. इससे यह खेल हर किसी के पास तक पहुंच जाएगा. साथ ही इसे लोकप्रिय बनाने के लिए टेलीविज़न कवरेज ज़रूरी है. उन्होंने कहा इस खेल के ब्रांड एम्बेसडर होने के नाते मैं प्रोमोशनल गतिविधियों में भाग लेता हूं लेकिन बिलियर्ड्स और स्नूकर फेडरेशन की ओर से ऐसा करने की ज़रूरत है. उन्होंने कहा कि स्नूकर में मैच फिक्सिंग में कुछ शीर्ष खिलाड़ियों का नाम आना दुखद है लेकिन इस खेल की अंतरराष्ट्रीय संस्था इसे बिल्कुल बर्दास्त नहीं करती. उन्होंने कहा कि दोषी खिलाड़ियों के खिलाफ़ कड़ी से कड़ी कार्रवाई कर इसे खत्म किया जा सकता है. स्नूकर में अपने लिए कोई लक्ष्य तय करने के बारे में उन्होंने कहा सही मायने में मेरा कोई लक्ष्य नहीं है. इस पर कई लोग आश्चर्य करते हैं लेकिन मेरा मानना है कि लक्ष्य आपको सीमित कर देता है उन्होंने कहा कि एक बार जब जीवन और खेल में लय और गति आ जाती है तो चीजें अपने आप होने लगती है. जहां तक जीवन में प्यार का सवाल है तो यह एक पल में हो भी सकता है और इसमें सालों लग सकते हैं. कहने का मतलब है कि चीज़ें बदलती रहती हैं. |
| DATE: 2013-10-15 |
| LABEL: sports |
| [752] TITLE: सचिन तेंदुलकर: हीरो जो बना उभरते भारत का प्रतीक |
| CONTENT: कुछ देर के लिए क्रिकेट को भूल जाइये. सचिन तेंदुलकर का ऐतिहासिक महत्व क्या था तेंदुलकर के करियर के दौरान ही भारत एक विश्व शक्ति और आर्थिक ताक़त बना. इसलिए इतिहास के एक मोड़ से लिटिल मास्टर सचिन तेंदुलकर पिछले 24 सालों से भारत के उदय का प्रतीक थे. शायद उनकी भूमिका इससे भी ज़्यादा था उन्होंने भारत के उदय को प्रेरित किया. खेल जगत में 24 साल एक लंबा वक़्त हैं. अगर आप यह अंदाज़ा लगाना चाहते हैं कि यह कितना लंबा वक्त है तो सचिन के शुरुआती करियर की वीडियो फुटेज देखिए. 1990 में इंग्लैड में लगाया गया उनका पहला शतक इस बात को साबित कर देता है. माइकल एथर्टन को उस वक़्त अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में आए एक साल हुआ था. उस मैच में वे सचिन को कुछ हल्की लेग स्पिन गेंदें कर रहे हैं. एथर्टन ने 100 टेस्ट मैच खेले और उन्हें रिटायर हुए 12 साल हो गए हैं. वे अब पत्रकारिता और ब्रॉडकास्टिंग की दुनिया में अपनी दूसरी पारी खेल रहे हैं. स्लिप घेरे से देखने पर डेविड गॉवर झुके हुए से नज़र आ रहे हैं. जिस गेंदबाज़ की गेंद पर तीन रन लेकर सचिन ने अपना यह पहला शतक पूरा किया था उनका नाम एंगस फ्रेज़र था. इन गर्मियों में मैंने उनके साथ एक मैच खेला. पिछले 24 साल में उनका रन अप एक या दो यार्ड कम हो गया है. सचिन के करियर की लंबाई का एक पैमाना यह है कि 1989 में सचिन जिन वरिष्ठ क्रिकेटरों के ख़िलाफ़ मैदान में उतरे वे आज उनके युवा प्रतिद्वंदियों से 40 साल ज़्यादा बड़े हैं. लेंब और बॉथम का स्थान बेयरस्टो और रूट ने लिया. लेकिन इस दौरान सचिन तेंदुलकर अपना खेल खेलते रहे. सचिन के करियर में भारत में आए बदलाव भी कोई कम नहीं है. 1989 में भारतीय अर्थव्यवस्था संरक्षणवाद और अंतर्मुखता में निस्तेज थी. बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ या तो भारत को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर रही थीं या फिर कोशिशें करके नाकाम हो रही थी. उदाहरण के तौर पर कोका कोला 1977 में भारत से पूरी तरह गायब हो गई थी. इस कंपनी ने 1993 में भारत में दोबारा दस्तक दी. हम तो भूल ही गए हैं कि पिछले बीस सालों के दौरान भारत कितना बदला है. जब मैंने 1990 के दशक में क्रिकेट खेलना शुरु किया था तब वहाँ के एयरपोर्टों की हालत ख़स्ता थी. और अब दुनिया के सबसे अच्छे एयरपोर्टों में से कुछ भारत में हैं. जिस वक़्त भारत की अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा था उसी वक़्त दुनिया सचिन की प्रतिभा को पहचान रही थी. खाड़ी विश्व युद्ध के बाद बढ़ी तेल की कीमतों के कारण दीवालिया हुए भारत को 1991 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से आपात राहत पैकेज लेना पड़ा था. निरादर ने पुनर्जागरण का शंखनाद किया. तत्कालीन वित्त मंत्री मनोहन सिंह को अर्थव्यवस्था सुधारने की ज़िम्मेदारी दी गई थी और उन्होंने विदेशी निवेश के लिए भारत के दरवाज़े खोल दिए. भारत की आर्थिक क्रांति का वक़्त आते देख मनमोहन सिंह ने विक्टर ह्यूगो के शब्दों में कहा था धरती पर मौजूद कोई शक्ति उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका वक़्त आ गया हो. ये सचिन के करियर की शुरुआत की पृष्ठभूमि थी. सचिन ने अपने लिए यह भूमिका तय की या नहीं लेकिन उभरते हुए भारत के लिए वे एक प्रेरणास्त्रोत बन गए. क्रिकेट ने भारत को विश्व पटल पर खुद को साबित करने का मौका दिया. वास्तव में क्रिकेट के इतिहास में कभी भी एक मुल़्क के पास एक साथ वे तीन उपलब्धियाँ नहीं रहीं जो आज भारत के पास हैं. क्रिकेट विश्व कप की ट्रॉफी सबसे आकर्षक घरेलू लीग और खेल के अंतरराष्ट्रीय प्रशासन में सबसे बड़ी राजनीतिक भूमिका. यहाँ तक की एमसीसी के नायकत्व के दौरान इंग्लिश क्रिकेट के पास भी इनमें से दो ही उपलब्धियाँ थीं. क्रिकेट घरेलू विकास का एक इंजन भी बन गया है. क्रिकेट के बिना भारत में इतने आकर्षक और जटिल टीवी नेटवर्कों का विकसित होना संभव नहीं था. जैसा की जेम्स एस्टिल अपनी किताब द ग्रेट तमाशा में बताते हैं कि क्रिकेट ही वो चीज़ है जिसे देखने के भारतीय पैसे देते हैं. साल 2011 में भारतीय विज्ञापनदाताओं ने क्रिकेट कार्यकर्मों के दौरान विज्ञापनों पर तीन अरब डॉलर खर्च लिए. क्रिकेट न सिर्फ भारत के आधुनिकीकरण की झलक दिखाता है बल्कि वास्तव में यह इसका एक बड़ा कारण भी है. खेलों की दुनिया में महानता सिर्फ प्रतिभा और उपलब्धियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह प्रासंगित भी है. 24 सालों तक सचिन एक अरब लोगों की भावनाओं और तर्कहीन उम्मीदों को लेकर चलते रहे. भारत ने जब 2011 में विश्व कप जीता तो विराट कोहली ने एक गहरे सच को बयाँ करते हुए कहा उन्होंने हमारे देश की उम्मीदों के बोझ को पिछले 21 सालों से अपने कंधों पर उठाया है. अब वक़्त आ गया है कि हम उन्हें अपने कंधों पर उठाए. जोख़िम से दूर रहने वाला तेंदुलकर का व्यक्तित्व भी उन पर डाली गई अपार उम्मीदों के जवाब में ही विकसित हुआ. वे आश्वस्त रूढ़िवादी चुपचाप रहने वाले मध्यमवर्गीय और न्यून दर्शित होने के साथ साथ लगातार शानदार बने रहे. पिछले साल इतिहासकार और क्रिकेट समीक्षक रामचंद्र गुहा गांधी के बाद के महानतम भारतीय को तय करने वाली समिति में शामिल हुए. चयन प्रक्रिया के दो पहलू थे. पहला विशेषज्ञ जूरी का मत और दूसरा ऑनलाइन पोल. जूरी ने सचिन तेंदुलकर को दस शीर्ष भारतीयों में शामिल किया. लेकिन ऑनलाइन पोल इससे भी आगे निकल गया और सचिन को नेहरू से भी महान बता दिया. पीछे मुड़कर देखें तो कामयाबी भी अनिवार्य सी दिखती है. इतनी प्रतिभा के बावजूद तेंदुलकर महानता हासिल किए बिना कैसे रह सकते थे अथाह सांस्कृतिक समर्थन उनका देश के प्रति निष्ठावान बने रहना निश्चित था. इस तथ्य के बाद भारत की आर्थिक सफ़लताएं भी भ्रामक रूप से पूर्व निर्धारित लगती हैं. अपने मानव संसाधनों और प्राकृतिक संसाधनों के दम पर भारत का आर्थिक महाशक्ति बनना भी निश्चित था लेकिन इतिहास ने हमें इसका एक विपरित उदाहरण भी दिया है. सचिन तेंदुलकर की तरह जो अपने भाग्य को पूरा नहीं कर सका. उसका नाम है विनोद कांबली. वे कांबली ही थे जिनके साथ सचिन ने आजाद मैदान पर 1988 में 664 रन की नाबाद पारी खेली थी. अपने पहले सात टेस्ट मैचों में कांबली ने चार शतक लगाए थे जिनमें दो दोहरे शतक भी शामिल थे. सचिन और कांबली को स्कूली दिनों के दौरान कोचिंग देने वाले रमाकांत आचरेकर का मानना था कि कांबली ज़्यादा प्रतिभाशाली थे. कांबली के गायब हो जाने के कारण सचिन के लिए दमदार पूरक हो जाते हैं. कांबली कभी भी अपनी दोहरी कमज़ोरियों पर विजय प्राप्त नहीं कर पाए. ये थीं वर्ल्ड क्लास तेज़ गेंदबाज़ों के ख़िलाफ़ कमज़ोरी और अच्छे जीवन के लिए समान रूप से समस्याग्रस्त कमजोरी. 23 साल की उम्र में ही कांबली को टेस्ट क्रिकेट ने नकार दिया और वे कभी वापसी नहीं कर सके. और तेंदुलकर अब संन्यास ले रहे हैं. महानता हमेशा पूर्व निर्धारित नहीं होती. इसे हासिल भी करना पड़ता है. कामयाबी के लिए भूखे एक राष्ट्र के नायक के रूप में सचिन ने जितना दवाब झेला है शायद ही इतिसाह में कभी किसी खिलाडी़ ने झेला हो. और वे हमेशा इस पर ख़रे उतरते रहे पूरी निश्चिंतता और सम्मान के साथ. और इस दौरान उन्होंने हमेशा हर रूप की क्रिकेट में भारत के लिए खेलते हुए सौ अंतरराष्ट्रीय शतक भी जमाए. |
| DATE: 2013-10-15 |
| LABEL: sports |
| [753] TITLE: अच्छे और बुरे राष्ट्रमंडल खेल |
| CONTENT: अगले साल जुलाई में स्कॉटलैंड तीसरी बार राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी करेगा. इससे पहले वहां दो बार इन खेलों का आयोजन एडिनबरा में हुआ था और ये दोनों ही आयोजन एक-दूसरे से काफी अलग रहे. साल 1970 में एडिनबरा में हुए राष्ट्रमंडल खेलों को बेहद सफल माना गया था क्योंकि उस वक़्त बहुत सी बातें पहली दफ़ा हुई थीं. तब पहली बार फ़ोटो फ़िनिश इस्तेमाल किया गया था और पहली बार ही साम्राज्यवादी मापों की जगह मीट्रिक यानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मापों का इस्तेमाल किया गया. यही नहीं तभी पहली बार इन्हें ब्रितानी या साम्राज्यी खेलों की बजाय राष्ट्रमंडल खेल कहा गया. काउंसलर एरिक मिलिगन साल 1970 में कम उम्र के थे और उन्होंने एडिनबरा राष्ट्रमंडल खेलों को देखा था और जब इस शहर में दोबारा साल 1986 में इन खेलों का आयोजन हुआ तो वे स्थानीय परिषद के नेता थे. मिलिगन बताते हैं मैं समझता हूं कि साल 1970 में ग़ज़ब का माहौल था जिसमें एडिनबरा नई कामयाबियां हासिल कर रहा था और हर तरफ चहल-पहल थी. उनके अनुसार हर कोई देखना चाहता था कि हमारे खिलाड़ियों को कितने पदक मिल पाएंगे. मैं सोचता हूं कि हर तरफ उत्साह का माहौल था जो गर्व में बदला. वे कहते हैं इससे कहीं न कहीं स्कॉटलैंड की राजधानी के तौर पर एडिनबरा की छवि मज़बूत हुई और निश्चित रूप से एडिनबरा का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव भी बढ़ा. साल 1970 के एडिनबरा खेलों में स्कॉटलैंड के लिए पदक जीतने वालों में लैची स्टुअर्ट भी थे. कांटेदार मुक़ाबले में स्टुअर्ट ने ऑस्ट्रेलिया के रॉन क्लार्क को पछाड़ा और 10 हजार मीटर स्पर्धा में स्वर्ण पदक हासिल किया. लैची बताते हैं स्कॉटलैंड में होना ओलंपिक में होने जैसा था. वैसे इन खेलों के लिए स्टुअर्ट की तैयारी का क़िस्सा भी कम दिलचस्प नहीं. उस समय वे दांतों के एक अस्पताल में काम करते थे. वो कहते हैं मैं अपने काम पर दौड़कर जाता था और दौड़कर ही वापस आता था. मैंने मार्च में सब शुरू किया था और जुलाई-अगस्त में खेलों का आयोजन होना था लेकिन ज़्यादातर लोगों को लगता था कि मैं वर्षों से अभ्यास कर रहा था. इन खेलों में स्कॉटलैंट को खासी संख्या में पदक मिले थे. कुल 40 देशों ने 1970 के एडिनबरा राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लिया था और पदक तालिका में स्कॉटलैंड चौथे स्थान पर रहा. एडिनबरा में दूसरी बार राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन 1986 में हुआ. उस वक़्त बहुत उम्मीदें थी कि एक बार फिर बेहद सफल खेलों का आयोजन होगा लेकिन दूसरे आयोजन की कहानी अलग रही. तब इनकी अहम बात यह थी कि लोगों ने डंडी लिज़ मैककोलगान को 10 हजार मीटर स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतते देखा. पत्रकार डेरेक डगलस उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं मैंने वो स्पर्धा नहीं देखी थी. मैं स्टेडियम के पास ही एक पब में था लेकिन स्टेडियम में मौजूद लोगों के शोर को आसानी से सुन पा रहा था. बहुत ही ज़बर्दस्त माहौल था. डेरेक डगलस 1986 के एडिनबरा राष्ट्रमंडल खेलों पर अनफ्रेंडली गेम्स नाम से किताब भी लिख चुके हैं. इन खेलों के बारे में डेरेक कहते हैं 1970 में जब एडिनबरा ने राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन किया था तो उन्हें बीयर और सैंडविच के लिए राशि जुटानी थी. 1986 आते-आते खेलों का आयोजन काफी महंगा हो चुका था लेकिन समस्या यह थी कि थैचर सरकार ने खेलों के लिए और पैसा देने से इनकार कर दिया था. 1986 के खेलों की मुख्य समस्या यह भी थी कि आधे से ज़्यादा देशों ने रंगभेद पर ब्रितानी सरकार के रुख़ के चलते इनका बहिष्कार किया था. इसके कारण प्रसारण अधिकार से मिलने वाली रक़म और प्रायोजक भी कम रह गए. ऐसे में इन खेलों में कम ही खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया और उनके समर्थकों की तादाद भी कम ही रही. 1986 के राष्ट्रमंडल खेलों की वजह से स्थानीय अर्थव्यवस्था को काफ़ी धक्का लगा. इसकी वजह से होने वाले करोड़ों पाउंड के कर्ज़ से उबरने में भी काफ़ी समय लगा. डगलस कहते हैं 1986 में सारा माहौल ही बदल गया. मैदान पर खेल सफल थे किसी तरह के सवाल नहीं उठे लेकिन सारे सवाल पर्दे के पीछे थे और धन की दिक़्क़त से जुड़े थे. बेशक 1970 और 1986 के राष्ट्रमंडल खेलों से अच्छे और बुरे दोनों ही तरह के सबक मिले हैं- और अब हर कोई यही चाहता है कि 2014 के ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल अच्छी वजहों के लिए याद रखे जाएं. |
| DATE: 2013-10-14 |
| LABEL: sports |
| [754] TITLE: क्रिकेट: रिकॉर्ड ऑस्ट्रेलिया के साथ, जोश भारत के |
| CONTENT: भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रविवार से सात एक दिवसीय अंतराष्ट्रीय मैचों की श्रृंखला रविवार से शुरू होने रही है. इसका पहला मैच पुणे में खेला जाएगा. भारत में वैसे तो इन दिनों गर्मी है लेकिन फिर भी रात को मैदान में ओस गिरती है. इसे देखते हुए निर्णय लिया गया है कि इस बार मैच पहले के मुक़ाबले एक घंटा पहले डेढ़ बजे शुरू होंगे. इससे पहले भारत ने मेहमान ऑस्ट्रेलिया को राजकोट में खेले गए एकमात्र ट्वेंटी-ट्वेंटी मैच में 6 विकेट से हराया था. ट्वेंटी-ट्वेंटी में ऑस्ट्रेलिया ने निर्धारित 20 ओवर में 7 विकेट खोकर 201 रनों का विशाल स्कोर खड़ा किया था. एरोन फिंच के 89 रनो की पारी युवराज सिंह के नाबाद 77 रनो के तूफान में उड गई. भारत ने 2 गेंद शेष रहते जीत हासिल की. युवराज सिंह ने 35 गेंदों पर 8 चौक्के और 5 छक्के जडे. अब ऑस्ट्रेलियाई कप्तान जॉर्ज बेली की चिंताए भी बढ़ गई होंगी क्योंकि शिखर धवन ने भी 32 रन बनाकर ठीक-ठाक शुरूआत की. उनके जोड़ीदार रोहित शर्मा तेज़ी से रन बनाने की कोशिश में जल्दी ही पैवेलियन लौट गए लेकिन पिछले दिनों समाप्त हुई चैंपियंस लीग ट्वेंटी-ट्वेंटी चैंपियनशिप में वह कामयाब बल्लेबाज़ बनकर उभरे हैं. कप्तान महेंन्द्र सिंह धोनी तो मैच फ़िनिशर के रूप में अपनी एक विशेष पहचान बना ही चुके हैं. मध्यमक्रम में विराट कोहली के रूप में भी भारत के पास बेहतरीन बल्लेबाज़ है. ऐसे में कप्तान धोनी की चिंता सिर्फ गेंदबाज़ी को लेकर होगी. पिछले ट्वेंट-ट्वेंटी मैच में तेज़ गेंदबाज़ ईशांत शर्मा और स्पिनर आर अश्विन ख़ासे महंगे साबित हुए. वैसे अब खेल अलग तरह का होगा. 20 के बजाय 50 ओवर के मैच होंगे. ऑस्ट्रेलिया के पास अनुभव के नाम पर शेन वॉटसन है. उनका जलवा आईपीएल और चैंपियंस लीग टवेंटी-टवेंटी में तो दिखा अब एकदिवसीय में वह कैसा खेल दिखाते है देखना होगा. नज़रें तो उन पर भारत में हुई टेस्ट सिरीज़ में भी थीं जहां उन्होंने बेहद निराश किया था. ऑस्ट्रेलियाई तेज़ गेंदबाज़ी में मिचेल जॉनसन के रूप में अनुभवी गेंदबाज़ है जो पिछले लम्बे समय से भारत में मुंबई इंडियंस के लिए खेल रहे हैं. उनके अलावा जेम्स फ़ॉकनर ग्लेन मैक्सवेल और नाथन कॉल्टर नील के पास भी भारत में खेलने का अनुभव है. इसके बावजूद भारतीय टीम अपनी ही ज़मीन पर ऑस्ट्रेलिया के मुक़ाबले बीस ही है क्योंकि इस ऑस्ट्रेलियाई टीम में कुछ अनुभवहीन खिलाडी भी हैं. वैसे ऑस्ट्रेलिया को एक बात राहत दे सकती है- और वह है उसका भारत में एकदिवसीय सिरीज़ में पिछला बेहतरीन रिकार्ड. ऑस्ट्रेलिया ने इससे पहले भारत में दो बार 7 एकदिवसिय मैचों की सिरीज़ खेली है और दोनों बार जीत का सेहरा उसके सिर बंधा है. साल 2007-08 में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को 7 मैचों की सिरीज़ में 4-2 से और उसके बाद साल 2009-10 में भी इसी अंतर से मात दी थी. साल 2009-10 की सिरीज़ में ऑस्ट्रेलिया ने शॉन मार्श के 112 और शेन वाटसन के 93 रनों की मदद से 50 ओवर में 4 विकेट पर 350 रन बनाए थे. जवाब में सचिन तेंडुलकर के 175 रनों की मदद से भारत ने 347 रन बनाए थे और केवल 3 रन से हारा था. भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की सेना के पास अब अनुभव भी है और युवा जोश भी जिसके दम पर भारत पुराना हिसाब बराबर करने की क्षमता रखता है. |
| DATE: 2013-10-13 |
| LABEL: sports |
| [755] TITLE: कॉमनवेल्थ बेटन: फीकी रही दिल्ली, ताज की सैर |
| CONTENT: साल 2010 की बात है जब दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स हुए थे और क्वींस बेटन का भारत में वाघा बॉर्डर पर स्वागत हुआ था और 30 सितंबर को ये दिल्ली पहुँची थी. उस समय राष्ट्रमंडल खेलों की कवरेज के दौरान बेटन को देखना का मौका मिला था. आज करीब तीन साल बाद क्वींस बेटन एक बार फिर भारत में है. दरअसल इस बार के राष्ट्रमंडल खेल स्कॉटलैंड के ग्लास्गो शहर में होने है और पिछले मेज़बान देश होने के नाते वहाँ से क्वींस बेटन सबसे पहले भारत लाई गई है. बकिंघम पैलेस से लॉन्च होने के बाद स्टॉकलैंड से होते हुए क्वींस बैटन भारत पहुँच चुकी है. आगर में ताज महल से होते हुए इसे दिल्ली लाया गया जहाँ कृष्णा पूनिया और अमित कुमार जैसे खिलाड़ी मौजूद थे. ताज महल में कुछ घंटे बिताने के बाद अगला मुख्य पड़ाव रहा दिल्ली का नेश्लन स्टेडियम और इंडिया गेट जहाँ कॉमनवेल्थ गेम्स के कुछ भारतीय एथलीट विशेष मेहमान के तौर पर मौजूद रहे. इसके बाद 13 अक्तूबर को दोपहर में बेटन को क़ुतुब मिनार भी ले जाया जाएगा. वैसे तो बेटन रिले का आयोजन काफ़ी भव्य रहता है लेकिन ये बैटन रिले थोड़ी फ़ीकी रहीउम्मीद जताई जा रही थी कि सुशील कुमार समेत कई बड़े खिलाड़ी बेटन रिले में शामिल रहेंगे लेकिन दिल्ली के राष्ट्रीय स्टेडियम में चंद खिलाड़ी ही नज़र आए जिसमें कृष्णा पूनिया और अमित कुमार शामिल थे. बीबीसी से बातचीत में कृष्णा पूनिया ने कहा इस बेटन के बहाने हमारी पुरानी यादें ताज़ा हो गईं जब दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल हुए थे. अगले खेलों के लिए भी हमारी तैयारी बहुत अच्छी है. हम उम्मीद करेंगे उम्मीद नहीं बल्कि अपना 100 फ़ीसदी देंगे कि हमारा प्रदर्शन दिल्ली खेलों जैसा अच्छा रहे. वहीं वर्ल्ड चैंपियनशिप में पदक जीतने वाले युवा पहलवान अमित कुमार ने कहा मैं बहुत ही उत्साहित हूँ. बहुत ख़ुशी हो रही है ये सोचकर कि हम भी राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लेंगे. खेलों की तैयारियाँ ज़ोरों से चल रही हैं. प्रेक्टिस में सुशील कुमार जैसे सीनियर भी हमारी मदद कर रहे हैं. दरअसल भारत में इस समय त्यौहारों का मौसम है दुर्गा पूजा नवरात्र और दशहरा होने के कारण प्रशासन ने बेटन रिले के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के लिए पर्याप्त पुलिसकर्मी उपलब्ध कराने में असमर्थता जताई थी. भारत के बाद 14 अक्तूबर को हवाई जहाज़ के ज़रिए बेटन बांग्लादेश ले जाई जाएगी जहाँ से ये पाकिस्तान और श्रीलंका का सफ़र तय करेगी. महारानी एलिज़ाबेथ ने क्वींस बेटन को लॉन्च करते वक़्त बेटन में अपना भाषण डाल दिया है और बेटन ख़ास डिज़ाइन से तैयार की गई है ताकि ये संदेश दिखता रहा. ये बेटन सील रहेगी और विभिन्न देशों से होते हुए 190000 किलोमीटर की यात्रा तय करेगी जिसमें करीब 288 दिन का समय लगेगा. क्वींस बेटन रिले पहली बार 1958 में आयोजित की गई थी जब खेल कार्डिफ़ में हुए थे. लेकिन तब रिले बेटन केवल इंग्लैंड और मेज़बान देश में ही जाती थी. बताया जा रहा है कि डिज़ाइनरों को हिदायत ये दी गई थी कि बेटन ऐसी हो कि आसानी से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को सौंपी जा सके इसका वज़न दो किलोग्राम से ज़्यादा न हो और हर तरह के मौसम में इसे इस्तेमाल किया जा सके. जानकारी के मुताबिक इसका हैंडल लकड़ी से बना हुआ है और इसके ऊपर ग्रेनाइट का जेमस्टोन जड़ा हुआ है जिसे निकाला जा सकता है. जिस देश में ये बैटन जाएगी उसे देश को ये नगीना बतौर तोहफ़े में दिया जाएगा. अगले राष्ट्रमंडल खेल 23 जुलाई 2014 को शुरु होंगे जिसमें 17 खेलों में 11 दिनों तक खिलाड़ी हिस्सा लेंगे. कुल 54 राष्ट्रमंडल देश हैं लेकिन खेलों में 70 देश हिस्सा लेंगे क्योंकि विदेशों में ब्रिटेन के कई ऐसे इलाक़े हैं जो अपने झंडे तले हिस्सा लेते हैं. बेटन चार मई 2014 को यूरोप लौटेगी जब ये साइपरस माल्टा जाएगी. |
| DATE: 2013-10-12 |
| LABEL: sports |
| [756] TITLE: 'मेरे जीवन की दो लाइफ़लाइन हैं: बेल्ट और सचिन' |
| CONTENT: सचिन की 23 साल पहले क्रिकेट से शादी हुई थी और उसी दिन भारतीय क्रिकेट प्रेमियों का उनसे नाता बन गया था. 18 नवंबर को यह नाता ख़त्म हो जाएगा. मैं हमेशा कहता रहा हूँ कि भारतीय परिवार के हर सदस्य में एक और शख़्स है वो शख़्स हैं सचिन तेंदुलकर. लोग मज़ाक़ करते हैं कि भारत में लोग दो ही लोगों को बिना शर्त प्यार करते हैं एक तो हमारे माता-पिता और दूसरे सचिन तेंदुलकर. वो जितने बड़े क्रिकेटर हैं उससे बहुत बड़े और बेहतर इंसान हैं. जब सचिन को क्रिकेट में सफलता मिलनी शुरू ही हुई थी तो उनके पिता ने उनसे कहा था- देख सचिन तू क्रिकेट अच्छा खेलने के बजाए अच्छा इंसान बन. क्रिकेट तो तुम बीस साल खेलोगे अगर तुम अच्छे इंसान बने तो लोग तुम्हें क्रिकेट खेलने के बाद भी याद रखेंगे. हम सचिन को पुणे में ब्लांइड स्कूल के बच्चों से मिलाने ले गए थे. एक बच्चे ने उनसे पूछा कि 1998 में शारजाह में आपने जब शेन वॉर्न की पिटाई की थी तो उन्होंने कहा था कि सपनों में भी मुझे सचिन दिखते हैं. सचिन ने उस बच्चे को पास लाकर कहा दोस्त मेरे मुझे तो समझ नहीं आता कि इतनी पिटाई के बाद भी शेन वॉर्न को नींद कैसे आती थी. उनका यह जवाब सुनकर सब लोग हँसने लगे. बाद में सचिन ने कहा मज़ाक़ अपनी जगह है. सच यह है कि शेन वॉर्न के लिए मेरे दिल में बहुत सम्मान है वो बहुत ही बेहतरीन गेंदबाज़ हैं. सचिन की यही ख़ूबी है कि वो एक तरफ़ तो अपने प्रतिद्वंदियों का बहुत सम्मान करते हैं लेकिन जब वो लक्ष्मण रेखा लांघते हैं तो उन्हें सज़ा देने में भी पीछे नहीं हटते. ज़्यादातर लोग पूछते हैं कि सचिन के सौ शतकों में आपको कौन सा पसंद है लेकिन मुझे उनकी 2003 में दक्षिण अफ़्रीक़ा में हुए भारत बनाम पाकिस्तान मैच की पारी याद आती है. भले ही वे उस मैच में शतक न बना सके हों लेकिन मैं उसे उनकी सबसे अच्छी पारी मानता हूँ. पाकिस्तान की टीम में वसीम अकरम वक़ार युनूस शोएब अख़्तर सक़लैन मुश्ताक़ सभी थे. उस पारी में उन्होंने जो करिश्मा करके दिखाया वो मुझे कभी नहीं भूलेगा. क्रिकेट से अलग मैं एक घटना याद करना चाहूँगा. मोहाली में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ मैच था. सेना के एक शहीद अफ़सर का बच्चा उनसे मिलना चाहता था. उस बच्चे की रीढ़ की हड्डी बिल्कुल ख़राब हो गई थी. वह हिल-डुल भी नहीं सकता था. उसे एक बेल्ट पहनाई गई थी जिसकी वजह से वे बच्चा ज़िंदा था. मैंने सचिन से कहा कि एक शहीद सैनिक अफ़सर का बच्चा उनसे मिलना चाहता है तो वे तुरंत तैयार हो गए. सचिन उससे बहुत प्यार से मिले. उस बच्चे के साथ सचिन ने काफ़ी पी और ऑटोग्रॉफ़ दिया. फ़तह नामक उस बच्चे ने उनसे कहा कि मेरे जीवन की दो लाइफ़लाइन हैं-एक यह बेल्ट और दूसरा सचिन तेंदुलकर. मुझे आपका ऑटोग्रॉफ़ इस बेल्ट पर चाहिए तो सचिन की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने कांपते हाथों से उसके बेल्ट पर ऑटोग्रॉफ़ दिया और उसे एक बार फिर से गले लगा लिया. मुझे यह घटना कभी नहीं भूलती. |
| DATE: 2013-10-11 |
| LABEL: sports |
| [757] TITLE: राष्ट्रमंडल खेलः राजनीति के खेल में हारे खिलाड़ी |
| CONTENT: राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन स्कॉटलैंड के ग्लास्गो शहर में अगले साल 23 जुलाई से तीन अगस्त तक होगा. इससे पहले इन खेलों को साल 2010 में दिल्ली में आयोजित किया गया था. भारत के दिल्ली शहर में राष्ट्रमंडल खेलों को यादगार बनाने के लिए क्या कुछ नहीं किया गया. पुराने स्टेडियमों का नया रूप दिया गया तो कुछ नए स्टेडियम भी बने. खेलों के दौरान और उसके बाद इसके आयोजन से जुड़े मुद्दे एक बड़े विवाद के रूप में उभरे और सरकार को मजबूर होकर तत्कालीन भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी और महासचिव ललित भनोट के ख़िलाफ मुक़दमा चलाना पड़ा. फिलहाल लगभग एक साल जेल में बिताने के बाद दोनों ज़मानत पर रिहा है. इन सबका असर भारतीय खेलों की छवि पर बहुत गहरा पड़ा. कलमाड़ी और भनोट पर लगाए गए आरोप राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय खिलाड़ियों के जीते गए रिकॉर्ड 101 पदकों पर भारी पड़े. लेकिन इसके बाद भी भारतीय ओलंपिक संघ के पदाधिकारियों ने कोई सबक़ नहीं सीखा और भारतीय ओलंपिक संघ के चुनावों में अभय सिंह चौटाला को अध्यक्ष और ललित भनोट को महासचिव के रूप में निर्वाचित करवा दिया. इसे आधार बना कर अंतराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने भारत को ओलंपिक संघ से बाहर कर दिया. अब हालत यह है कि भारतीय एथलीट किसी भी अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारतीय तिरंगे के नीचे प्रदर्शन नहीं कर सकते. भारतीय ओलंपिक संघ पर पदाधिकारियों के चुनाव में धांधली के आरोप में निलंबित भारतीय ओलंपिक संघ की हालत अब ऐसी हो गई है कि उससे न तो उगलते बन रहा है न ही निगलते. इसका सीधा-सीधा असर भारतीय खिलाड़ियों के मनोबल और तैयारियों पर पड़ रहा है. भारतीय ओलंपिक संघ के अलावा इन दिनों संघ के पदाधिकारियों के चुनावों में धांधली के आरोप में भारतीय मुक्केबाज़ी संघ भी निलंबित है. ऐसे में जबकि ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों की क्वींस बेटन दिल्ली पहुंच रही है तो उसे लेकर खिलाड़ियों में बहुत अधिक जोश नहीं है. भारतीय ओलंपिक संघ का कामकाज देख रहे कार्यवाहक अध्यक्ष विजय कुमार मल्होत्रा भी पहले ही अंतराष्ट्रीय राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति से इसके सीमित स्वागत कार्यक्रम की घोषणा कर चुके हैं. तिरंगे के बिना किसी भी चैंपियनशिप में उतरने को लेकर मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीत चुके मुक्केबाज़ अखिल कुमार कहते हैं यह बिलकुल ऐसा अहसास है जैसे किसी बच्चे के मां-बाप का पता ना हो. अब दशहरा और दुर्गा पूजा जैसे जोश भरे त्योहारो को देखते हुए राष्ट्रमंडल खेलों की बेटन को लेकर दिल्ली में एथलीटो के दौड़ने के दृश्य देखने को नहीं मिलेंगे अगर कुछ हुआ भी तो वह संकेतात्मक अधिक होगा. अखिल कुमार ख़ुद व्यक्तिगत रूप से बेटन के साथ दौड़ने से अधिक महत्वपूर्ण पदक जीतना मानते हैं. दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पूनिया कहती हैं खिलाड़ियों के जोश पर कल क्या होगा इस बात का तनाव अधिक है. किसी भी एथलीट के लिए इससे पह बहुत सम्मान का पल होता है जब उसके प्रदर्शन के बाद देश का राष्ट्रगान बजता है और तिरंगा लहराता है. अब ऐसा नहीं हो पा रहा है इससे ज़्यादा दुख की बात भारतीय एथलीटों के लिए क्या होगी. ग्लास्गो क्वींस बेटन को लेकर भारत के फीके स्वागत को भी वह शर्मनाक ही मानती है. दरअसल बेटन रिले के माध्यम से किसी भी देश में राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों का पता भी चलता है और खिलाड़ी भी मानसिक रूप से अपना जुडाव महसूस करते हैं. कृष्णा पूनिया कहती हैं दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों की ज़बरदस्त तैयारी का असर चीन में हुए एशियाई खेलों में नजर आया जहां भारत ने शानदार प्रदर्शन किया और उसके बाद लंदन ओलंपिक में भी भारत पहली बार अधिक पदक जीतने में कामयाब रहा. अब वैसी तैयारियां नहीं है जिसका असर भविष्य में साफ-साफ दिखेगा. दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को स्वर्ण पदक दिला चुके पहलवान सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त के गुरू पहलवान द्रोणाचार्य सतपाल जो खुद 1982 के एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता रह चुके हैं पांच बार मशाल लेकर दौड़ चुके हैं. पिछली बार राष्ट्रमंडल खेलों की बेटन पकडने वाले आखिरी खिलाड़ी के भी वही थे. उसके बाद बेटन को दिल्ली की मुख्यमंत्री को सौंपा गया था. भारतीय ओलंपिक संघ के निलंबन को लेकर उन्होंने कहा जल्दी से जल्दी इस मामले का हल निकलना चाहिए. अंतराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के झंडे के नीचे अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारतीय खिलाड़ी कब तक खेलेंगेभारतीय खिलाड़ी ऐसी स्थिति में फंस गए हैं कि वो न तो खुलकर कुछ बोल सकते हैं और न ही अपनी जीत पर गर्व कर सकते हैं. राष्ट्रमंडल और एशियाई खेल नज़दीक आ रहे हैं और भारत का खेल मंत्रालय अब भी सिर्फ सारे हालात पर नज़र रख रहा है और खिलाड़ियों की उम्मीद भरी नज़रें उसे देख रही हैं. |
| DATE: 2013-10-11 |
| LABEL: sports |
| [758] TITLE: युवराज की बेहतरीन पारी से भारत जीता |
| CONTENT: ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ ट्वेन्टी-20 मैच में युवराज सिंह की बेहतरीन पारी की बदौलत भारत ने जीत हासिल की है. सूरत में हुए इस मैच में भारत ने छह विकेट से जीत हासिल की. युवराज सिंह ने सिर्फ़ 35 गेंदों पर 77 रन बनाए. युवराज ने अपनी पारी में आठ चौके और पाँच छक्के लगाए. महेंद्र सिंह धोनी 24 रन बनाकर नाबाद रहे. ऑस्ट्रेलिया ने भारत को 202 रनों का लक्ष्य दिया था. भारत की शुरुआत अच्छी नहीं रही और सलामी बल्लेबाज़ के रूप में मैदान पर उतरे रोहित शर्मा सिर्फ़ आठ रन ही बना पाए. इसके बाद शिखर धवन और सुरेश रैना ने दूसरे विकेट के लिए 38 रन जोड़े. सुरेश रैना 19 रन बनाकर आउट हुए. शिखर धवन अच्छा खेल रहे थे लेकिन 32 रन के निजी स्कोर पर वे आउट हो गए. उन्होंने सिर्फ़ 19 गेंदों का सामना किया. विराट कोहली ने भी 29 रनों का योगदान दिया. इससे पहले एरॉन फ़िंच की धमाकेदार पारी की बदौलत ऑस्ट्रेलिया ने 20 ओवर में सात विकेट पर 201 रन बनाए. फ़िंच ने 52 गेंद पर 89 रन बनाए. अपनी पारी में फिंच ने 15 चौके और एक छक्का भी लगाया. फ़िंच और निक मैडिन्सन ने 4-1 ओवर में 50 रन बना डाले. मैडिन्सन ने 16 गेंदों पर 34 रनों की पारी खेली. ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों ने शुरू से ही अच्छी बल्लेबाज़ी की लेकिन बीच-बीच में उनके विकेट गिरते रहे. शेन वॉटसन सिर्फ़ छह रन बना पाए जबकि कप्तान जॉर्ज बेली अपना खाता भी नहीं खोल पाए. लेकिन ग्लेन मैक्सवेल ने 27 रन बनाए. भारत के विनय कुमार और भुवनेश्वर कुमार ने शानदार गेंदबाज़ी करके ऑस्ट्रेलिया की गति धीमी की अन्यथा ऑस्ट्रेलिया और ज़्यादा रन बना सकता था. दोनों ने तीन-तीन विकेट लिए. रवींद्र जडेजा ने भी बेहतरीन गेंदबाज़ी की और चार ओवर में सिर्फ़ 23 रन देकर एक विकेट लिया. दूसरी ओर आर अश्विन और ईशांत शर्मा की जमकर पिटाई हुई. ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों ने इन्हें ख़ास तौर पर निशाना बनाया. |
| DATE: 2013-10-11 |
| LABEL: sports |
| [759] TITLE: ज्वाला गुट्टा को हाई कोर्ट से राहत |
| CONTENT: दिल्ली हाईकोर्ट ने बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा को राहत देते हुए बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया बीएआई को उन्हें अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने की मंज़ूरी देने के लिए कहा है. हाई कोर्ट ने कहा है कि ज्वाला गुट्टा पर बीएआई की अनुशासन समिति का अंतिम फ़ैसला आने तक उन्हें मैच खेलने की इजाज़त दी जानी चाहिए. जस्टिस वीके जैन ने कहा मेरी राय यह है कि बीएआई को ज्वाला गुट्टा को मैच खेलने की अनुमति दे देनी चाहिए. ज्वाला के वकील गोपाल जैन ने कोर्ट में कहा एक महिला खिलाड़ी के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाना चाहिए. बीएआई की ओर से कोर्ट में पेश हुए अधिवक्ता शांति भूषण ने कहा कि पिछले कुछ सालों से गुट्टा का प्रदर्शन ख़राब रहा है और बीएआई के फ़ैसले में कुछ भी ग़लत नहीं है. उन्होंने कहा कि यदि गुट्टा माफ़ी माँग लेती हैं तो उन्हें खेलने की अनुमति दी जा सकती है. हालाँकि हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद भी ज्वाला गुट्टा डेनमार्क ओपन में हिस्सा नहीं ले पाएंगी. इस टूर्नामेंट के लिए जारी की गई खिलाड़ियों की सूची में उनका नाम शामिल नहीं किया गया है. डेनमार्क ओपन में ज्वाला गुट्टा और उनकी साथी अश्विनी पोनप्पा को चीन के जियोली वांग और यैंग यू के ख़िलाफ़ मैच खेलना था. लेकिन बीएआई द्वारा नाम न भेजे जाने के कारण अब चीन की टीम को वॉक ओवर दे दिया गया है. डेनमार्क ओपन 15 से 20 अक्टूबर तक चलेगा और फ्रैंच ओपन 22 से 27 अक्टूबर के बीच खेला जाएगा. बीएआई ने डेनमार्क और फ्रैंच ओपन के लिए खिलाड़ियों की घोषणा की है और इसमें ज्वाला और अश्विनी का नाम शामिल नहीं है. बीएआई की अनुसाशन समिति ने ज्वाला गुट्टा पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की सिफ़ारिश की थी. ज्वाला पर इंडियन बैडमिंटन लीग के दौरान अपनी टीम देल्ही स्मैशर्स के खिलाड़ियों को बांगा बीट्स टीम के ख़िलाफ़ मैच न खेलने के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया था. बीएआई के अध्यक्ष अखिलेश दास ने सात अक्टूबर को अनुशासन समिति की सिफ़ारिश पर विचार करने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था. ये समिति एक महीने के भीतर ज्वाला गुट्टा पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध पर अपनी राय देगी. बीएआई ने समिति का फ़ैसला आने तक ज्वाला को किसी भी टूर्नामेंट में शामिल न करने का निर्णय लिया था. बीएआई के फ़ैसले के ख़िलाफ़ ज्वाला गुट्टा ने बुधवार को हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. |
| DATE: 2013-10-10 |
| LABEL: sports |
| [760] TITLE: 'सचिन को अंदाज़ा हो गया था' |
| CONTENT: भारत के पूर्व क्रिकेटरों का मानना है कि सचिन जैसा दूसरा कोई खिलाड़ी शायद ही कभी हो. मनिंदर सिंह का कहना है कि सचिन को कहीं न कहीं लगा होगा कि उन्हें रिटायर हो जाना चाहिए. वहीं सैयद किरमानी मानते हैं कि सचिन ने क्रिकेट को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है. एक न एक दिन सभी रिटायर होते हैं लेकिन सचिन ने जिस तरह का क्रिकेट खेला है मुझे नहीं लगता कि क्रिकेट के इतिहास में ऐसा कोई दूसरा खिलाड़ी पैदा होगा. हमें तो शुरू में पता नहीं था कि वो लीजेंड बनने वाला है लेकिन एक अंदेशा था कि ये खिलाड़ी कहीं न कहीं पहुँचने वाला है. वो क्रिकेट को बहुत ऊँचाई पर लेकर गए हैं. 200 टेस्ट खेलना बहुत गौरव की बात है. मैं नहीं समझता कि किसी चयनकर्ता ने सचिन को कहा होगा कि आप रिटायर हो जाओ या आपको रिटायर होना चाहिए. हर चयनकर्ता उन्हें अपनी टीम में बरकरार रखना चाहता है. सचिन अपने पूरे करियर में एक बहुत अच्छे रोल मॉडल रहे हैं. किसी खिलाड़ी के लिए ऊँचाई पर पहुँचना आसान होता है लेकिन उस ऊँचाई पर अपने को बरकरार रखना बहुत मुश्किल हो जाता है. सचिन ने हमेशा अपने को अनुशासित रखा. उनके चरित्र उनकी विनम्रता ने उनके लिए बहुत सम्मान अर्जित किया है. यह सोचना बहुत कठिन है कि सचिन भारतीय टीम में नहीं होंगे. वो 24 साल से हमारे जीवन का हिस्सा बन गए थे. क्रिकेट हमारे देश में एक धर्म की तरह है और वो इतने लंबे समय तक भारतीय टीम के अंग थे. उन्होंने देश-विदेश में हर जगह अपने प्रशंसक बनाए. उनके बारे में कुछ कहना सूरज को दिया दिखाने जैसा है. उनकी किसी ने कितनी भी आलोचना की हो लेकिन सचिन ने उसका अपने मुँह से जवाब नहीं दिया है. उन्होंने अपने आलोचकों को हमेशा अपने बल्ले से जवाब दिया है. सचिन ने इतनी ज़्यादा यादगार पारियाँ खेली हैं कि एक-दो का नाम लेना मुश्किल है लेकिन अगर नाम लेना ही हो तो उनका दोहरा शतक और शारजाह में उन्होंने जो लगातार दो मैचों में शतक बनाए थे जिसके बाद शेन वार्न ने कहा था कि उनके सपने में सचिन आते हैं वो पारियां मुझे अक्सर याद आती हैं. इतने बड़े खिलाड़ी बनने के बाद भी वो जितने विनम्र बने रहे वो उनकी बेहद ख़ास बात है. ये दिन ज़्यादा दूर लग नहीं रहे थे. हमने चैंपियन लीग में भी देखा था कि उनके बैट पर बॉल ठीक से नहीं आ रही थी. शायद ये अंदाज़ा उन्हें हो गया था कि अब वक़्त हो गया है मुझे चले जाना चाहिए. एक वजह यह भी है कि वेस्टइंडीज़ दौरे के बाद भारत को अफ़्रीका न्यूज़ीलैंड फिर इंग्लैंड जाना है. ऐसे में जब आपके बैट पर बॉल न आ रही हो आपके रिफ्लेक्सेस स्लो हो रहे हों तो आप ऐसे दौरे नहीं करना चाहते हैं जहाँ समझ ही नहीं आता है कि बॉल के साथ क्या हो रहा है. हर कोई तो नहीं लेकिन संदीप पाटिल का ऐसा रुतबा है कि वो खिलाड़ियों से बात कर सकें लेकिन मुझे नहीं लगता कि सचिन के मामले में ऐसा हुआ होगा. सचिन तेंदुलकर 24 साल अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल चुके हैं. तो उन्हें कहीं-कहीं लगा होगा कि मुझे रिटायर हो जाना चाहिए. वो मुंबई के खिलाड़ी रहे हैं. वहाँ उन्होंने बचपन से क्रिकेट खेला है और आगे बढ़े हैं. 200 मैच खेलना बहुत बड़ा अवसर है तो अगर रोटेशन के अनुसार उनके होम ग्राउंड की बारी न भी आती हो तो उनका 200वां मैच उनके होम ग्राउंड पर होना चाहिए. सचिन के योगदान को याद करने की ज़रूरत ही नहीं है वह तो हर हिंदुस्तानी के दिल पर गढ़ा हुआ है लिखा हुआ है. अगर मुझे उनके बारे में कहना हो तो यह कहना चाहूँगा कि इतना बड़ा खिलाड़ी होने के बावजूद वो हमेशा विनम्र बने रहे. वो एक ऐसे वृक्ष की तरह हैं जिस पर जितना अधिक फल आता है वो उतना ही झुका रहता है. जितनी नम्रता से वो मेरे साथ टेस्ट खेलते वक़्त बात करते थे आज भी उसी तरह पेश आते हैं. सचिन तेंदुलकर इस खेल को ख़ुदा की देन है. उसने जिस तरह क्रिकेट खेला है उसकी जो स्टाइल है वो अल्लाह की देन है. उनमें क्रिकेट की सारी खूबियाँ कुदरतन थी. वो एक परिपूर्ण बल्लेबाज थे. भारत में बहुत से अच्छे खिलाड़ी हुए हैं लेकिन सचिन की किसी खिलाड़ी से तुलना करना संभव नहीं है. उसने जिस तरह से अपने को संभाला वो जिस तरह से क्रिकेट को समर्पित रहे हैं उसके लिए मेरे पास अल्फाज नहीं है. उन्होंने क्रिकेट को अपने धर्म की तरह अपनाया था. वो दुनिया में जहाँ भी गए वहाँ अपनी काबिलियत का प्रदर्शन किया. उन्होंने जितने रिकॉर्ड बनाया है उनका वर्णन संभव नहीं. अपने खेल की बदौलत वो यूथ आइकन बन गए. उनकी कई पारियाँ यादगार रही हैं. इंग्लैंड में उन्होंने एक बार 195 रन बनाए थे. मुझे वो पारी बहुत पसंद आई थी. |
| DATE: 2013-10-10 |
| LABEL: sports |
| [761] TITLE: सेंचुरियन में सचिन की वह इनिंग. |
| CONTENT: मैं उस दिन सेंचुरियन मैदान सुबह आठ बजे ही पहुँच गया था. भारत और पाकिस्तान विश्व कप के सुपर सिक्स में पहुँचने के लिए महत्वपूर्ण मैच खेल रहे थे. स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था. पाकिस्तान ने टॉस जीतकर पहले खेलने का फ़ैसला किया था. सईद अनवर ने जिस तरह बुलेट ट्रेन वाली पारी खेली थी पवेलियन में मौजूद भारतीय दर्शकों की बॉडी लेंग्वेज बिगड़ गई थी. राज सिंह डूँगरपुर कह रहे थे लड़के थके हुए नज़र आ रहे हैं. पाकिस्तान ने 273 रन बनाए थे और ज़्यादातर विशेषज्ञ कह रहे थे कि मैच भारत के हाथ से निकल चुका था. सचिन तेंदुलकर और वीरेंद्र सहवाग क्रीज़ पर उतरे. आम तौर से सहवाग पहली गेंद खेलते हैं. उस दिन सचिन ने पहले स्टॉन्स लिया. वसीम अकरम की तीसरी गेंद पर उन्होंने चौका लगाया. दूसरे ओवर में शोएब अख़्तर गेंद फेंकने आए. शोएब के ओवर की चौथी गेंद ऑफ़ स्टंप से दो फ़ुट बाहर थी लेकिन उसकी गति थी 151 किलोमीटर प्रति घंटा सचिन अगर उस गेंद को छोड़ देते तो शर्तिया वाइड होती. लेकिन उन्हें शोएब से अपना हिसाब चुकता करना था. उन्होंने पूरी ताक़त से उसपर अपर कट लगाया और गेंद छह रनों के लिए डीप बैक्वर्ड प्वाएंट बाउंड्री पर जा उड़ी. शोएब ने अपने मील भर लंबे रन अप से बेन जॉन्सन के अंदाज़ में दौड़ना शुरू किया. इस बार गति थी उससे भी तेज़ 154 किलोमीटर प्रति घंटा सचिन ने इस बार गेंद को स्कवायर लेग बाउंड्री की तरफ़ ढ़केला. इस शॉट ने शोएब को इतना हतोत्साहित कर दिया कि लगा कि वह अपने बॉलिंग मार्क पर ही नहीं पहुंचना चाह रहे. लेकिन अभी कहानी ख़त्म नहीं हुई थी. शोएब की अंतिम गेंद को सचिन ने ऑफ़ स्टंप पर शफल करते हुए महज़ ब्लॉक भर किया. कोई बैक लिफ़्ट नहीं कोई फ़ौलो थ्रू नहीं. किसी की शायद ज़रूरत भी नहीं थी. कोई अपनी जगह से हिल भी पाता इससे पहले गेंद मिड ऑन बाउंड्री के रस्से को छू रही थी. अब तक दर्शक पागल हो चुके थे. शोएब अख़्तर के जले पर नमक छिड़का उन्हीं के कप्सान वकार यूनुस ने जब उन्होंने अगले ही ओवर में शोएब को गेंदबाजी से हटा लिया. हाँलाकि अंतत शोएब ने थके हुए रनर के सहारे खेल रहे सचिन तेंदुलकर को एक शॉर्ट पिच गेंद से आउट किया लेकिन तब तक सचिन 75 गेंदों पर 98 रन बना चुके थे और भारत जीत की ओर बढ़ रहा था. शोएब अख़्तर ने दस ओवरों में 72 रन दिए थे जो उनका एक दिवसीय क्रिकेट में अब तक का सबसे कीमती स्पेल था. 32 के स्कोर पर जब सचिन का एक मुश्किल कैच अब्दुल रज़्ज़ाक ने मिस किया तो मैदान पर ही चिल्ला कर वसीम अकरम ने उनसे कहा था जानता है किसका कैच तूने छोड़ा है. जब सचिन लंगड़ाते हुए पवेलियन लौटे तो स्टेडियम का एक एक आदमी अपने स्थान पर खड़ा था. मैं भी उनमें से एक था. मेरे ख़्याल से उसी दिन चेतन शर्मा की आख़िरी गेंद पर जावेद मियाँदाद द्वारा लगाए गए छक्के का बदला ले लिया गया था. |
| DATE: 2013-10-10 |
| LABEL: sports |
| [762] TITLE: राजकोट में कंगारुओं से भिड़ेंगे भारतीय शेर |
| CONTENT: भारत के दौरे पर आई ऑस्ट्रेलियाई टीम गुरुवार को एकमात्र टी-20 मुकाबले में उतरेगी. राजकोट में होने वाले इस मुकाबले से ऑस्ट्रेलिया टीम अपने इस दौरे की शुरुआत कर रही है जिसमें 13 अक्टूबर से सात एकदिवसीय मैचों की सिरीज़ भी शामिल है. वैसे ऑस्ट्रेलियाई टीम में वे पांच कंगारू खिलाड़ी भी मौजूद हैं जो रविवार को ही खत्म हुई चैंपियंस लीग में खेल रहे थे. भारत पहले ही इस सिरीज़ के लिए अपनी टीम का एलान कर चुका है जिसकी कप्तानी महेंद्र सिंह धोनी के कंधों पर होगी. इंग्लैंड में खेली गई चैंपियंस ट्रॉफी और उसके बाद वेस्ट इंडीज़ में खेली गई त्रिकोणीय एकदिवसीय सिरीज़ में उन्होंने अपने बल्ले और अपनी कप्तानी का दम दिखाते हुए भारत को ख़िताबी जीत दिलाई. इसके बाद उन्होंने ज़िम्बाब्वे सिरीज़ से अपने आपको दूर रखा और उनकी अनुपस्थिति में युवा विराट कोहली के नेतृत्व में भारत ने सिरीज़ 5-0 से अपने नाम की. भारतीय टीम में युवराज सिंह की वापसी हुई है जिन्होंने पिछले दिनों वेस्टइंडीज़ ए के ख़िलाफ तीन एकदिवसीय मैचों की अनधिकृत सिरीज़ में अपनी फॉर्म और फिटनेस का परिचय देते हुए एक शतक और एक अर्धशतक जमाया. उनके आने से भारतीय टीम के मध्यक्रम को मज़बूती मिल सकती है. सलामी जोड़ी के रूप में शिखर धवन और रोहित शर्मा भारतीय टीम की नई ताकत कहे जा सकते हैं. वहीं गेंदबाज़ी में अब ईशांत शर्मा ने अपनी फिटनेस पर अधिक ध्यान दिया है जिससे उन्हें लगातार टीम में बने रहने के अवसर मिल रहे है. इसी बीच तेज़ गेंदबाज़ उमेश यादव अपनी लय खो बैठे जिसका फायदा जयदेव उनादकट को मिला और वह उमेश की जगह टीम में आ गये. वैसे जिस खिलाड़ी ने सही मायने में टीम में कमबैक किया वह खिलाड़ी है लैग स्पिनर अमित मिश्रा. ज़िम्बाब्वे दौरे पर उन्होने 18 विकेट झटके थे जिसका ईनाम उन्हे टीम में जगह के रूप में मिला. अब यह बात अलग है कि आर अश्विन के होते उन्हे अंतिम ग्यारह में जगह मिलना थोडा मुशकिल लगता है. यानी कुल मिलाकर भारतीय टीम अपनी ही ज़मीन पर ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ मज़बूत नज़र आती है. ऑस्ट्रेलियाई टीम को वैसे भी भारत आने से पहले ही सबसे बडा झटका तब लगा जब उसके नियमित कप्तान माइकल क्लार्क कमर की चोट के कारण पूरी सिरीज़ से बाहर हो गए. उनकी जगह टीम की कमान जॉर्ज बेली को सौंपी गई है. ऐसे में टीम का दारोमदार काफी हद तक अनुभवी ऑलराउंडर शेन वाटसन पर होगा. उन्होंने पहले तो आईपीएल और उसके बाद चैंपियंस ट्रॉफी में राजस्थान रायल्स के लिए खेलते हुए गेंद और बल्ले से धमाकेदार प्रदर्शन किया. भारत के पूर्व विकेटकीपर बल्लेबाज़ नयन मोंगिया कहते है ऑस्ट्रेलिया दुनिया की नंबर दो एकदिवसीय टीम है जबकि भारत नंबर एक. ऐसे में अगर ऑस्ट्रेलियाई टीम माइकल क्लार्क के बिना भी भारत आ रही है तो उसे कमज़ोर नही मानना चाहिए. चैंपियंस लीग में उनके खिलाड़ी खेले है उसका फायदा उन्हें मिलेगा. अब वन साइड क्रिकेट कोई भी देखना नही चाहता लेकिन पलड़ा भारत का ही भारी लगता है. कुछ ऐसा ही मानना भारत के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ अतुल वासन का है. वासन मानते है कि माइकल क्लार्क के पूरी सिरीज़ से बाहर होने का फायदा भारत को मिलेगा. इसके बावजूद वह चेतावनी भी देते है कि ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी आसानी से हार नही मानते और पलटवार करने की उनकी आदत से भारतीय क्रिकेट टीम को सावधान रहना होगा. वासन ये भी कहते हैं गर्मी का असर भी ऑस्ट्रेलियाई टीम पर पड़ेगा और आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी और दूसरे टूर्नामेंट जीतने से भारतीय टीम के हौसले बुलंद है लिहाज़ा ऑस्ट्रेलिया के लिए भारत को हराना आसान नही होगा. |
| DATE: 2013-10-10 |
| LABEL: sports |
| [763] TITLE: कॉमनवेल्थ खेल: क्वींस बैटन रिले शुरू |
| CONTENT: स्कॉटलैंड के ग्लासगो में अगले साल होने वाले कॉमनवेल्थ खेलों के लिए क्वींस बैटन रिले शुरू हो गई है. बुधवार को बकिंघम पैलेस में हुए कार्यक्रम में रिले की शुरुआत हुई. इस बैटन में पूरे राष्ट्रमंडल के लिए ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ का हाथ से लिखा संदेश है. अगले 288 दिनों तक ये बैटन राष्ट्रमंडल के 70 देशों में घूमेगी. गुरुवार को ये बैटन स्कॉटलैंड जाएगी और उसके बाद भारत के लिए रवाना होगी. इस बैटन का सफ़र 23 जुलाई 2014 को ग्लासगो में राष्ट्रमंडल खेलों के उद्घाटन समारोह में ख़त्म होगा जहां महारानी एलिज़ाबेथ संदेश पढ़ेंगी. खाली बैटन को साइकलिस्ट सर क्रिस हॉय बकिंघम पैलेस लेकर पहुंचे थे क्रिस हॉय छह बार के ओलंपिक गोल्ड विजेता हैं और उन्होंने दो बार कॉमनवेल्थ खेलों में भी गोल्ड मेडल जीता है. बैटन रिले शुरू करने के कार्यक्रम में कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के अध्यक्ष मलेशिया के राजकुमार इमरान ने कहा कि इस रिले में ताकत है और इसके मायने हैं. राजकुमार इमरान ने कहा ये रिले कॉमनवेल्थ के दो अरब नागरिकों को खेल विभिन्नता और शांति के उत्सव के लिए एकजुट करती है. ये कॉमनवेल्थ के 70 देशों और क्षेत्रों के लोगों को भी साथ लाएगी. केविन के लॉर्ड स्मिथ ने कहा जब ये बैटन एक हाथ से दूसरे हाथ में पहुंचेगी तब जो दोस्ती की भावना दिखाई देगी वो उस स्वागत को दिखाती है जिसकी कॉमनवेल्थ के देशों और क्षेत्रों को अगली गर्मियों में स्कॉटलैंड और ग्लासगो आने पर उम्मीद करनी चाहिए. इन भाषणों के बाद महारानी एलिज़ाबेथ ने बैटन के अंदर अपने हाथ से लिखा संदेश रखा. इसके बाद इसे 1 लाख 90 हज़ार किलोमीटर की यात्रा के लिए सील कर दिया गया. बैटन का सफ़र एशिया ओसिएनिया अफ़्रीका उत्तर और दक्षिण अमरीका और कैरिबियन में होगा. बैटन को सबसे पहले ऐलन वेल्स ने उठाया वेल्स स्कॉटलैंड के एथलीट हैं जिन्होंने 1980 के मॉस्को ओलंपिक में 100 मीटर की दौड़ में गोल्ड जीता था. अपने अंतरराष्ट्रीय सफ़र में बैटन हर देश में औसतन एक से चार दिन बिताएगी वेल्स में बैटन सात दिन रहेगी इंग्लैंड में दो हफ़्ते और स्कॉटलैंड में 40 दिन. हालांकि बैटन गांबिया में नहीं रुकेगी गांबिया ने पिछले हफ़्ते कॉमनवेल्थ ये कहते हुए छोड़ दिया था कि वो कभी किसी नव-औपनिवेशिक संस्था का सदस्य नहीं बनेगा. |
| DATE: 2013-10-10 |
| LABEL: sports |
| [764] TITLE: गेंद से छेड़छाड़ होने पर कप्तान होंगे ज़िम्मेदार |
| CONTENT: अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद आईसीसी के नए नियमों के मुताबिक़ अगर किसी अंतरराष्ट्रीय मैच के दौरान अंपायर को गेंद से छेड़छाड़ का पता चलता है तो इसके लिए टीम के कप्तान को ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा. हालाँकि उन्हें दोषी नहीं माना जाएगा. आईसीसी की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि अगर कोई अंपायर मैच के दौरान गेंद से छेड़छाड़ को पकड़ता है तो वो पहली और आख़िरी चेतावनी कप्तान को देगा और गेंद बदल दी जाएगी. अगर गेंद से फिर छेड़छाड़ होती है तो गेंदबाज़ी टीम के ख़िलाफ़ पाँच पेनल्टी रन दिए जाएँगे. इसके अलावा अंपायर न सिर्फ़ गेंद बदल देंगे बल्कि इसके लिए टीम के कप्तान को ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा. डीआरएस यानी अंपायर के फ़ैसले की समीक्षा वाली व्यवस्था में भी छह महीने के लिेए थोड़े बदलाव किए गए हैं. इसे अगले साल अप्रैल तक आज़माया जाएगा. इसके मुताबिक़ अब टीमें टेस्ट मैच की एक पारी में 80 ओवर पूरे होने के बाद भी दो बार अंपायर के फ़ैसले की समीक्षा की मांग कर सकती हैं. इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच ऐशेज़ सिरीज़ के दौरान कई विवादास्पद फ़ैसले के बाद डीआरएस की समीक्षा की मांग उठी थी. नए नियम बुधवार से बांग्लादेश और न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ चटगाँव में शुरू हुए टेस्ट मैच से लागू हो गए हैं. इसके अलावा आईसीसी ने कहा है कि अगर एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच किन्हीं कारणों से घटाकर 25 ओवरों या उससे कम का कर दिया जाता है तो हर पारी में सिर्फ़ एक ही गेंद का इस्तेमाल होगा. 50 ओवरों के मैच में हर पारी के दौरान दो गेंदों का दोनों छोरों से इस्तेमाल होता है. |
| DATE: 2013-10-09 |
| LABEL: sports |
| [765] TITLE: तिलकरत्ने दिलशान का टेस्ट से संन्यास |
| CONTENT: श्रीलंका के पूर्व कप्तान तिलकरत्ने दिलशान ने टेस्ट क्रिकेट से सन्यास का निर्णय लिया है. हालांकि वो क्रिकेट के एक दिवसीय और टी-20 प्रारूपों में खेलना जारी रखेंगे. बुधवार को श्रीलंकाई क्रिकेट बोर्ड ने एक विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि इस संबंध में बृहस्पतिवार को एक संवाददाता सम्मेलन में वह आधिकारिक घोषणा करेंगे. समाचार एजेंसी रायटर के अनुसार दिलशान ने कहा मैंने यह निर्णय इसलिए लिया ताकि श्रीलंकाई क्रिकेट में नए खिलाड़ियों को मौका मिल सके. इस तूफ़ानी क्रिकेटर ने कहा राष्ट्रीय चयनकर्ताओं के साथ मैं मशविरा करूंगा और यदि उन्हें मेरी जरूरत होगी तो मैं 2015 के वर्ल्ड कप तक खेलूंगा. जिम्बाब्वे में अक्टूबर से शुरू होने वाली एक टेस्ट सिरीज़ के बाद वह सन्यास लेने वाले थे लेकिन यह सिरीज़ स्थगित हो गई. दिलशान ने अपना हालिया टेस्ट मैच गत मार्च में बांग्लादेश के खिलाफ कोलंबो में खेला था. यहां दो पारियों में उन्होंने 57 रन बनाए. इसमें एक पारी में वह शून्य पर आउट हो गए थे. दाएं हाथ के ओपनर बल्लेबाज़ दिलशान ने अपने क्रिकेट करियर में कुल 87 टेस्ट मैच खेले और 145 पारियों में 40-98 के औसत से कुल 5492 रन बनाए. इस दौरान उन्होंने 16 शतक और 23 अर्द्ध शतक बनाए. टेस्ट में उनका सबसे सर्वोत्तम स्कोर 193 रहा है जो उन्होंने 2011 में इंग्लैंड के खिलाफ लार्ड्स के मैदान में कप्तान रहते बनाए. दिलशान ने अपने टेस्ट करियर की शुरुआत जिम्बाब्वे के खिलाफ बुलावायो में 1999 में की थी. अपने 14 साल के क्रिकेट करियर में उन्होंने 267 एक दिवसीय मैच खेले हैं. गेंदबाजी में भी उनका प्रदर्शन अच्छा रहा है. उन्होंने अपने टेस्ट कैरियर में कुल 39 विकेट चटकाए. सबसे सर्वोत्तम प्रदर्शन 10 रन पर 4 विकेट रहा है. एक दिवसीय मैचों में उनके नाम कुल 76 विकेट हैं. |
| DATE: 2013-10-09 |
| LABEL: sports |
| [766] TITLE: कॉमनवेल्थ खेल: भारत में फीका होगा क्वींस बेटन का स्वागत? |
| CONTENT: स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में अगले साल होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों की बेटन बुधवार से 71 देशों के सफ़र पर निकलेगी हालांकि इन खेलों के पिछले मेज़बान भारत में त्यौहारों के कारण इसका स्वागत फीका रह सकता है. बकिंघम पैलेस से राष्ट्रमंडल खेलों की बेटन एक लाख 90 हज़ार किलोमीटर के सफ़र पर निकलेगी. ग्लासगो में अगले साल 23 जुलाई से तीन अगस्त के बीच इन खेलों का आयोजन होगा. ओलंपिक मशाल की तरह राष्ट्रमंडल खेलों में भी क्वीन्स बेटन रिले की परंपरा है जिसकी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और ये 11 अक्तूबर को दिल्ली पहुंचेगी. वैसे राष्ट्रमंडल खेलों की बात चलते ही भारतीयों के मन में खिलाडियों के जीते गए पदकों की जगह 2010 में दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े कथित घोटालों और विवादों की यादें ताज़ा हो जाती है. दिल्ली के बाद अब इन खेलों का आयोजन स्कॉटलैंड के सबसे बड़े शहर ग्लास्गो में होगा. राष्ट्रमंडल खेलों की बेटन एशिया अफ़्रीक़ा उत्तरी और दक्षिणी अमरीका और कैरेबियन क्षेत्र के 71 देशों में जाएगी और जून 2014 में वो वापस ग्लास्गो पहुंचेगी. बेटन रिले का यह सफ़र 288 दिनों का है. बकिंघम पैलेस में होने वाले समारोह में स्कॉटलैंड की ओर से राष्ट्रमंडल और ओलंपिक खेलों के महान एथलीट एलन वेल्स और सर क्रिस होय भी मौजूद रहेंगे. एलन वेल्स महारानी से बेटन ग्रहण करेंगे और इसी के साथ बेटन अपनी यात्रा पर निकल जाएगी. पिछले राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन 2010 में भारत में हुआ था इसलिए परंपरा के अनुसार बेटन रिले की यात्रा का पहला पड़ाव भारत ही होगा. यह बेटन रिले जिन-जिन देशों से गुज़रती है वहां इसके आयोजन के भव्य इंतज़ाम होते है लेकिन भारत में ये आयोजन बेहद फीका हो सकता है. बेटन 11 अक्तूबर को दिल्ली पहुंचेगी लेकिन 12 अक्तूबर को दुर्गा पूजा और 13 अक्तूबर को दशहरा है ऐसे में प्रशासन बेटन रिले के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के लिए पर्याप्त संख्या में पुलिसकर्मी उपलब्ध कराने में असमर्थता जता रहा है. हालांकि निलंबित भारतीय ओलंपिक संघ ने कुछ दिन पूर्व सारी स्थिति अंतराष्ट्रीय राष्ट्रमंडल समिति को बता दी थी और कार्यक्रम को आगे खिसकाने का आग्रह भी किया था लेकिन अंतराष्ट्रीय व्यस्तताओं को देखते हुए इसे नही माना गया. इसके बाद निलंबित भारतीय ओलंपिक संघ ने दो सदस्यीय समिति गठित की जिसमें भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष जीएस मंडेर भी शामिल है. उनके अनुसार बेटन 11 तारीख़ की शाम को लंदन से दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचेगी. उसके स्वागत के लिए भारतीय ओलंपिक संघ के पदाधिकारी लंदन ओलंपिक और राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले कुछ जाने माने एथलीट और खेल मंत्रालय के कुछ अधिकारी मौजूद रहेंगे. मंडेर के अनुसार 12 अक्तूबर को बेटन ताजमहल आगरा के लिए रवाना हो जाएगी. इस यात्रा में भारतीय ओलंपिक संघ के कुछ पदाधिकारी और एथलीट भी शामिल होंगे लेकिन आगरा में स्वागत की ज़िम्मेदारी उत्तर प्रदेश ओलंपिक संघ की होगी. इस समारोह में उत्तर प्रदेश के खेल मंत्री के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के जाने-माने खिलाड़ी भी मौजूद रहेंगे. आगरा में ही ताजमहल में फ़ोटोशूट होगा. इसके बाद शाम को ब्रिटिश हाई कमीशन में रिसेप्सन होगा. मंडेर के अनुसार 13 अक्तूबर को दशहरा होने के कारण सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए विशाल और भव्य कार्यक्रम के स्थान पर सीमित कार्यक्रम रखा है. इंडिया गेट और क़ुतुबमीनार पुरात्तव महत्व के दृष्टिकोण से दो महत्वपूर्ण स्थल है इसलिए वहां बेटन रिले जाएगी. मंडेर बताते हैं कि दिल्ली के राष्ट्रीय स्टेडियम में भी बेटन रिले होगी जहां पहले एशियाई खेलों का आयोजन हुआ था. इसके अलावा उनका कुछ कार्यक्रम यूनिसेफ़ के साथ भी है. इसके बाद 14 अक्तूबर को बेटन अपने अगले पड़ाव बांग्लादेश की राजधानी ढाका के लिए रवाना हो जाएगी. |
| DATE: 2013-10-09 |
| LABEL: sports |
| [767] TITLE: श्रीनिवासन बीसीसीआई में वापस मगर जांच से रहेंगे दूर |
| CONTENT: सुप्रीम कोर्ट ने एन श्रीनिवासन को बीसीसीआई अध्यक्ष का कामकाज संभालने की इजाज़त दे दी है लेकिन साथ ही निर्देश दिए हैं कि वो स्पॉट फ़िक्सिंग मामले की जांच से दूर रहें. कोर्ट ने आईपीएल में स्पॉट फ़िक्सिंग की जांच के लिए एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया है जिसकी अध्यक्षता एक पूर्व जज कर रहे हैं. इससे पहले कोर्ट ने 27 सितंबर को कोर्ट ने कहा था कि श्रीनिवासन अध्यक्ष पद का चुनाव तो लड़ सकते हैं लेकिन पद नहीं संभाल सकते. चेन्नई में 29 सितंबर को हुई बीसीसीआई की बैठक में श्रीनिवासन दोबारा अध्यक्ष चुने गए थे. पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस मुकुल मुद्गल की अध्यक्षता में मैच फ़िक्सिंग मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई गई है. कोर्ट ने इस समिति से चार महीने में रिपोर्ट सौंपने को कहा है. बीसीसीआई के एक वकील ने बताया कि कोर्ट का ये फ़ैसला तब आया जब श्रीनिवासन ने जांच में दखल न देने का आश्वासन दिया. मुद्गल समिति श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन और आईपीएल टीम राजस्थान रॉयल्स के मालिकों की भूमिका की जांच करेगी. समिति की जांच पुलिस की जांच से अलग चलेगी जिसने कई सटोरियों खिलाड़ियों और अधिकारियों के ख़िलाफ़ केस दर्ज किए हैं. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल कमेटी से जांच करवाने के बीसीसीआई के सुझाव को ख़ारिज कर दिया था. श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन उन तमाम अधिकारियों खिलाड़ियों और सट्टेबाज़ों में शामिल हैं जिनके खिलाफ़ आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग के धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोप हैं. आईपीएल में इस कांड के उज़ागर होने के बाद देश भर में सनसनी फैल गई थी. मयप्पन के ख़िलाफ़ जब फिक्सिंग के आरोप लगे थे तब वह चेन्नई सुपर किंग्स फ्रेंचाइजी के टीम प्रिंसिपल थे. चेन्नई सुपरकिंग्स की मालिक श्रीनिवासन की कंपनी इंडियन सीमेंट्स है. मयप्पन का नाम सामने आने के बाद एन श्रीनिवासन को अध्यक्ष के रूप में नियमित कामकाज से अलग होना पड़ा था. इस दौरान उनकी जगह जगमोहन डालमिया बोर्ड देख रहे थे. हालांकि श्रीनिवासन का कहना है कि कथित फिक्सिंग कांड के लिए उन पर आरोप नहीं लगाया जा सकता. बीसीसीआई के बनाए जांच पैनल के सदस्यों हाईकोर्ट जज टी जयराम छोटा और आर बालासुब्रह्मण्यम की रिपोर्ट में श्रीनिवासन को क्लीन चिट देते हुए कहा गया था कि उन्होंने कुछ ग़लत नहीं किया. इसके बाद क्रिकेट एसोसिएशऩ ऑफ बिहार ने सुप्रीम कोर्ट में श्रीनिवासन के ख़िलाफ़ याचिका दायर की थी. हालांकि क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ बिहार को बीसीसीआई से मान्यता हासिल नहीं है. |
| DATE: 2013-10-08 |
| LABEL: sports |
| [768] TITLE: भारत लौटने पर मेरी जान को ख़तरा: ललित मोदी |
| CONTENT: आईपीएल के कमिश्नर रहे ललित मोदी ने आरोप लगाया है कि भारत लौटने पर उनकी जान को ख़तरा हो सकता है. ललित मोदी लंबे समय से लंदन में हैं. ललित मोदी ने बीबीसी के कार्यक्रम हार्डटॉक में कहा मेरे लिए जान क़ीमती है. कई बार मेरी हत्या की कोशिश हुई है. मैं भारत तब जाऊंगा जब मैं सुरक्षित महसूस करूंगा. मैं नहीं जानता कि आपको सुपारी के बारे में पता है या नहीं अगर कोई आपको मार देता है तो उसको इनाम मिलता है. मेरे ऊपर सुपारी रखी गई है. उन्होंने कहा कि उन्हें सुरक्षा मिली थी जो राजनीतिक इशारों पर वापस ले ली गई. भारत सरकार ने उनके दक्षिण अफ़्रीक़ी और इसराइली सुरक्षाकर्मियों को हथियार भी नहीं रखने दिए. ये पूछे जाने पर कि वो भारत वापस कब जाएंगे मोदी ने कहा उम्मीद है कि एक साल से ज़्यादा नहीं लगेगा शायद मैं अगले साल मार्च या अप्रैल में भारत वापस जाऊंगा. ललित मोदी ने इस ओर भी इशारा किया है कि सत्ताधारी पार्टी के कुछ लोग उनके ख़िलाफ़ हैं. उन्होंने कहा कुछ ताक़तवर लोग मेरे ख़िलाफ़ हैं लेकिन वो हमेशा ताक़तवर नहीं रहने वाले. अगर अभी सत्ताधारी दल के लोग मेरे ख़िलाफ़ हैं तो ज़रूरी नहीं कि भविष्य में जो पार्टी सत्ता में आएगी उसके सदस्य भी मेरे ख़िलाफ़ होंगे. मेरे लिए सुरक्षा बहुत ज़रूरी है. ललित मोदी ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय क्रिकेट को चला रहे लोग सट्टेबाज़ों और संगठित अपराधियों से मिले हुए हैं. उन्होंने कहा मैं फ़िक्सिंग को लेकर बहुत कठोर था. मैंने ये कोशिश की थी कि ऐसी कोई चीज़ नहीं हो. आज आप देखिए कि आईपीएल में मेरे विरोधी लोग फ़िक्सर और माफ़िया से मिले हुए हैं. ललित मोदी ने ख़ुद पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर कहा जो जांच हो रही है वो पहले से तय जांच है. उन्होंने सबूतों को पढ़ा भी नहीं और न ही मुझे आरोपों की जांच कर रही कमेटी के सामने पेश होने दिया गया. भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे ललित मोदी को पिछले दिनों बीसीसीआई ने निष्कासित कर दिया था. बीसीसीआई ने ललित मोदी पर भविष्य में कोई भी पद हासिल करने पर भी रोक लगा दी थी. ललित मोदी ने आईपीएल की शुरुआत की थी और पहले तीन सीज़न में इसके कमिश्नर रहे. लीग के संचालन में वित्तीय अनियमितताओं और दो नई टीमों की नीलामी के दौरान ग़लत तरीक़े अपनाने के लिए आईपीएल 2010 के आयोजन के बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था. |
| DATE: 2013-10-08 |
| LABEL: sports |
| [769] TITLE: फ़िक्सिंग की जांच नए पैनल से कराएं-सुप्रीम कोर्ट |
| CONTENT: सुप्रीम कोर्ट ने आईपीएल स्पॉट फ़िक्सिंग केस में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के स्पेशल कमेटी गठित करने का सुझाव ख़ारिज कर दिया है. कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मुकुल मुदगल की अगुवाई में तीन सदस्यीय नया जांच पैनल बनाने का प्रस्ताव दिया है. जस्टिस एके पटनायक और जेएस केहर की बैंच ने इस पैनल के लिए वरिष्ठ वकील और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन नागेश्वर राव और आसाम क्रिकेट संघ के सदस्य निलय दत्ता के नाम का प्रस्ताव दिया. कोर्ट ने बीसीसीआई काउंसिल और क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ बिहार कैब से पूछा कि वो बताएं कि ताज़ा फ़िक्सिंग जांच के कमजोर पहलू क्या हैं जिस पर प्रस्तावित पैनल को निर्देश दिए जाने चाहिए. इस मामले की सुनवाई मंगलवार को भी होगी तभी कोर्ट औपचारिक आदेश पास करेगी. बैंच ने बीसीसीआई का वह प्रस्ताव ख़ारिज कर दिया कि फ़िक्सिंग मामले की जांच के लिए वरिष्ठ राजनीतिज्ञ अरुण जेटली और निलय दत्ता को लेकर स्पेशल कमेटी बनाई जाए. उसने बीसीसीआई की वह अपील भी ख़ारिज कर दी कि मुंबई पुलिस द्वारा दाख़िल चार्जशीट के बाद अगर नई जांच की ज़रूरत हो तभी प्रस्तावित पैनल बने. ग़ौरतलब है कि बीसीसीआई के जांच पैनल के सदस्यों हाईकोर्ट जज टी जयराम छोटा और आर बालासुब्रह्मण्यम की रिपोर्ट में श्रीनिवासन को क्लीन चिट देते हुए कहा गया था कि उन्होंने कुछ ग़लत नहीं किया. श्रीनिवासन को जून में तब अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारियों से खुद को अलग करना पड़ा था जब उनके दामाद गुरुनाथ मयप्पन का नाम फ़िक्सिंग मामले में आया था. बिहार एसोसिएशन ने कोर्ट में तर्क दिया था किस तरह बीसीसीआई के आंतरिक जांच पैनल ने श्रीनिवासन मयप्पन इंडिया सीमेंट्स और आईपीएल के दूसरे अधिकारियों को पुलिस रिपोर्ट आने से पहले ही दोषमुक्त कर दिया था. पूर्व आस्ट्रेलियाई क्रिकेटर माइक हसी ने हाल ही में श्रीनिवासन का वह स्पष्टीकरण ख़ारिज कर दिया था कि मयप्पन तो महज क्रिकेट उत्साही हैं. हसी ने अपनी नई आत्मकथा में कहा है कि असल में मयप्पन ही चेन्नई सुपर किंग्स को चला रहे थे. हसी ने साल 2008 में आईपीएल के पहले सत्र में चेन्नई सुपर किंग्स टीम की ओर से शिरकत की थी. |
| DATE: 2013-10-07 |
| LABEL: sports |
| [770] TITLE: मुंबई इंडियन्स ने जीता चैंपियन्स लीग का खिताब |
| CONTENT: मुंबई इंडियन्स ने राजस्थान रॉयल्स की टीम को फिरोजशाह कोटला मैदान में 33 रन से हराकर न सिर्फ चैंपियन्स लीग खिताब जीत लिया है बल्कि टीम के वरिष्ठ खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को विजयी विदायी का तोहफा भी दे दिया. मुंबई ने पहले छह विकेट पर 202 रन का विशाल स्कोर खड़ा किया और उसके बाद राजस्थान की टीम को उन्नीसवें ओवर में महज 169 रन पर थाम लिया. मुंबई ने इसके साथ ही तीन वर्षों में दूसरी बार चैंपियन्स लीग का खिताब जीत लिया. मुंबई ने एक ही सत्र में आईपीएल और चैंपियन्स लीग जीतने का कारनामा भी कर दिखाया है. मुंबई इंडियन्स की जीत के हीरो रहे हरभजन सिंह जिन्होंने पारी के 17वें ओवर में अजिंक्या रहाणे स्टुअर्ट बिन्नी और केवोन कूपर के विकेट झटके. इसके अलावा हरभजन ने खतरनाक आलराउंडर शेन वाटसन को भी पवेलियन भेजा. राजस्थान की पारी का आखिरी विकेट गिरते ही मुंबई के खिलाड़ी खुशी से उछल पड़े और टीम के डग आउट में बैठे खिलाड़ी मैदान में दौड़कर बाकी खिलाड़ियों को गले लगा लिया. विजयी खिलाड़ियों ने सचिन तेंदुलकर को अपने कंधों पर उठा लिया. सचिन के हाथों में मुंबई इंडियन्स का झंडा था. सचिन ने इस साल आईपीएल छह जीतने के बाद आईपीएल को अलविदा कहा था और अब चैंपियन्स लीग जीतने के बाद खेल के सबसे छोटे प्रारूप को भी अलविदा कह दिया. राजस्थान के कप्तान राहुल द्रविड़ के लिए यह थोड़ा दुखद रहा कि वह ट्वंटी20 से विजयी विदायी नहीं ले पाए. उनकी टीम खिताबी मुकाबले में पराजित हो गई और वह खुद भी सिर्फ एक रन ही बना सके. फिर भी द्रविड़ ने पवेलियन लौटते समय अपना बल्ला उठाकर दर्शकों का अभिवादन स्वीकार किया. इससे पहले सलामी बल्लेबाज ड्वेन स्मिथ ग्लेन मैकसवेल और कप्तान रोहित शर्मा की विस्फोटक पारियों से आईपीएल चैंपियन मुंबई इंडियन्स ने राजस्थान रायल्स के सामने 202 रन का विशाल स्कोर बनाया. स्मिथ ने 39 गेंदों पर 44 रन में पांच चौके और एक छक्का लगाया जबकि रोहित ने सिर्फ 14 गेंदों पर 33 रन में तीन चौके और दो छक्के जड़े. |
| DATE: 2013-10-07 |
| LABEL: sports |
| [771] TITLE: वर्ल्ड कप में एशियाई टीमों को हराना कठिन: सचिन |
| CONTENT: अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले सचिन तेंदुलकर मानते हैं कि वर्ष 2015 में आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में होने वाले विश्व कप में भारतीय उपमहाद्वीप की टीमों को हराना कठिन होगा. घर की जमीन पर भारत को वर्ष 2011 में जीत दिलाने में मददगार सचिन तेंदुलकर 18426 रन बनाने के बाद पिछले साल एक दिवसीय क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं. टूर्नामेंट शुरू होने से पहले बचे 500 दिनों के अवसर पर हुए एक समारोह में 40 वर्षीय क्रिकेटर ने कहा भारत के साथ पाकिस्तान और श्रीलंका की टीमें भी अच्छी हैं. भारत एक दिवसीय रैंकिंग में टॉप पर है तो श्रीलंका चौथे और पाकिस्तान छठे नंबर पर. 198 टेस्ट मैचों में 15837 रन बना चुके तेंदुलकर अकेले ऐसे शख्स हैं जिन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट में सौ शतक बनाए हैं. वह वर्ल्ड कप के 45 मैचों में 2278 रन बनाकर इस प्रतियोगिता में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज भी हैं. वह मानते हैं कि भारत सफलतापूर्वक खिताब को बरकरार रखकर ये कारनामा करने वाला तीसरा देश बनने में सक्षम है. गौरतलब है कि 1975 और 1979 में पहले दो विश्व कप जहां वेस्टइंडीज ने जीते वहीं आस्ट्रेलिया वर्ष 1999 से 2007 तक लगातार तीन बार चैंपियन बना. पाकिस्तान के जावेद मियांदाद की तरह छह विश्व कप में खेल चुके इस महान बल्लेबाज ने कहा मैं सोचता हूं कि हमारे तमाम खिलाड़ी वहां के हालात और अपेक्षाओं से परिचित हैं वो वहां खेल चुके हैं. उन्होंने कहा वर्ल्ड कप में जीत पूरे देश को बेइंतहा ख़ुशी देगी. सौ करोड़ से ज्यादा लोगों के साथ मैं भी चाहूंगा कि हम फिर विजेता बनकर लौटें. तेंदुलकर ने स्वीकार किया कि न्यूजीलैंड की स्थितियों के साथ तालमेल बिठाना जरूर भारतीय खिलाड़ियों के लिए मुश्किल होगा हालांकि भारत ने मार्च 2009 में आखिरी बार खेली गई सिरीज़ में उन पर 3-1 से जीत दर्ज की थी. वर्ष 1992 के विश्व कप में न्यूजीलैंड के हाथों मिली चार विकेट से शिकस्त के बारे में उन्होंने कहा मुझे याद है हमारा वो मैच ड्यूनेडिन में था जहां जबरदस्त ठंड थी और बर्फीली हवाएं चल रही थीं. हवा का सामना करते जब बल्लेबाज गेंद को हिट कर रहे थे तो ये बमुश्किल 10 गज भी नहीं जा पा रही थी. इंग्लैंड तीन बार विश्व कप में उप विजेता रह चुका है आखिरी बार वो आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में खेले गए 1992 के वर्ल्ड कप में फ़ाइनल में पहुँचा था. इस वर्ल्ड कप में इंग्लैंड मेजबान देशों के साथ पूल ए में है इस पूल में श्रीलंका बांग्लादेश और दो क्वालिफाइंग टीमें हैं. समारोह में कुक ने कहा इस साल चैंपियंस ट्रॉफी में हम पहली बार 50 ओवर के आईसीसी इवेंट में जीत के करीब थे और उपविजेता रहे. हम आने वाले महीनों कड़ी मेहनत कर सुनिश्चित करेंगे कि 2015 के अवसर का बेहतरीन उपयोग कर एक कदम और आगे बढाएं. उन्होंने कहा आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में खेलने का अनुभव हमेशा शानदार रहा है और मुझे कोई शक नहीं कि ये हमारी टीम और समर्थकों के लिए शानदार अवसर होगा. विश्व कप 14 फरवरी 2015 से शुरू हो रहा है पहले दिन क्राइस्टचर्च में न्यूजीलैंड की टीम श्रीलंका से भिड़ेगी और मेलबर्न में इंग्लैंड का सामना आस्ट्रेलिया से होगा. सचिन ने कहा 2014 में भारतीय टीम को न्यूजीलैंड जाना है. इससे उन्हें वहां की स्थितियों से बखूबी परिचित हो जाना चाहिए. |
| DATE: 2013-10-03 |
| LABEL: sports |
| [772] TITLE: भारत दौरे पर नहीं आएँगे माइकल क्लार्क |
| CONTENT: ऑस्ट्रेलिया के कप्तान माइकल क्लार्क पीठ दर्द के चलते इस महीने होने वाले भारत दौरे से बाहर हो गए हैं. क्लार्क के स्थान पर जॉर्ज बेली टीम की कप्तानी संभालेंगे जबकि विकेटकीपर ब्रैड हैडिन उपकप्तान होंगे. ऑस्ट्रेलिया को भारत में एक ट्वेन्टी-20 और सात वनडे खेलने हैं. क्लार्क की जगह मध्यक्रम के बल्लेबाज़ कैलम फर्ग्यूसन को टीम में शामिल किया गया है. क्लार्क का इस सिरीज़ में खेलना पहले से ही संदिग्ध माना जा रहा था. क्लार्क का करियर चोटों से बुरी तरह प्रभावित रहा है और उनकी टीम उम्मीद कर रही है वह नवंबर में शुरू हो रही घरेलू एशेज सिरीज़ के लिए पूरी तरह फिट हो जाएंगे. टीम के फिजियो एलेक्स कूंटोरिस ने कहा कि इंग्लैंड से स्वदेश वापसी के बाद क्लार्क की चोट पर इलाज का खास असर नहीं हो रहा है. उन्होंने कहा क्लार्क लंबे समय से इस समस्या से जूझ रहे हैं. इंग्लैंड में वनडे सिरीज़ के दौरान उनकी चोट गहरा गई थी और उनकी हालत में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है. फिजियो ने कहा क्लार्क भारत में वनडे सिरीज़ खेलने के लिए उपलब्ध नहीं रहेंगे और प्रतिस्पर्द्धी क्रिकेट में वापसी करने के लिए उन्हें व्यापक रिहैबिलिटेशन की जरूरत होगी. इस बीच राष्ट्रीय चयनकर्ता जॉन इनवेरारिटी ने कहा कि क्लार्क भारत दौरे पर जाने के लिए बेताब थे लेकिन दुर्भाग्य से वह चयन के लिए समय पर फिट नहीं हो पाए. क्लार्क की जगह टीम में शामिल किए गए फर्ग्यूसन ने ऑस्ट्रेलिया के लिए 30 वनडे में 41-43 के औसत से 663 रन बनाए हैं. भारत दौरे के लिए ऑस्ट्रेलियाई टीम इस प्रकार है ट्वेन्टी-20 टीम जॉर्ज बेली कप्तान नाथन कोल्टर नाइल जेवियर डोहर्ती जेम्स फॉकनर आरोन फिंच ब्रैड हैडिन मोइसेस हेनरिक्स मिचेल जॉनसन निक मैडिनसन ग्लैन मैक्सवेल क्लाएंट मैके एडम वोग्स और शेन वाटसन. वनडे टीम जॉर्ज बैली कप्तान नाथन कोल्टर नाइल जेवियर डोहर्ती जेम्स फॉकनर कैलम फर्ग्यूसन आरोन फिंच ब्रैड हैडिन मोइसेस हेनरिक्स फिल ह्यूजेज मिचेल जॉनसन ग्लैन मैक्सवेल क्लाएंट मैके एडम वोग्स और शेन वाटसन. |
| DATE: 2013-10-01 |
| LABEL: sports |
| [773] TITLE: 'कमबैक किंग' हैं युवराज |
| CONTENT: अपने 13 साल के करियर में युवराज सिंह ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं. इस दौरान कई बार वह टीम से बाहर हुए लेकिन हर बार उन्होंने असली चैंपियन की तरह दमदार वापसी की. दोस्तों में युवी के नाम से मशहूर युवराज ने साल 2000 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया और अपने दूसरे ही वनडे ऑस्ट्रेलिया जैसी शक्तिशाली टीम के ख़िलाफ़ जोरदार पारी खेलकर अपनी काबिलियत का सबूत दे दिया. निरंतर शानदार प्रदर्शन के दम पर युवराज ने टीम इंडिया में अपनी जगह पक्की कर ली. इस मैच विजेता खिलाड़ी ने इस दौरान टीम को कई यादगार जीत दिलाई. साल 2007 में इंग्लैंड में पहले ट्वंटी-20 विश्वकप में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत को चैंपियन बनाया था. इस टूर्नामेंट में उन्होंने स्टुअर्ट ब्रॉड के ओवर में छह छक्के मारने का रिकॉर्ड बनाया. खराब फॉर्म के चलते युवराज को पहली बार 2010 में टीम इंडिया से बाहर कर दिया गया था. लेकिन उन्होंने 2011 में विश्वकप के लिए टीम में वापसी की और अपने हरफनमौला प्रदर्शन से टीम को 28 साल बाद यह प्रतिष्ठित ख़िताब दिलाने में अहम भूमिका निभाई. युवराज ने विश्वकप में 362 रन बनाए और 15 विकेट लिए. इस दौरान उन्हें चार बार मैन ऑफ़ द मैच और प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट से नवाजा गया. इसके बाद आया उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तेहान. उनमें कैंसर पाया गया और अमरीका में उनका इलाज चला. भारत को क्रिकेट के मैदान में कई मैच जिताने वाले युवराज ने कैंसर की जंग जीतकर फिर से मैदान में वापसी की. लेकिन श्रीलंका में खेले गए ट्वंटी-20 विश्वकप और फिर पाकिस्तान और इंग्लैंड के ख़िलाफ़ घरेलू वनडे सिरीज़ में खराब प्रदर्शन के कारण उन्हें एक बार फिर टीम से बाहर कर दिया. युवराज ने हार नहीं मानी और फ्रांस में कड़ा शारीरिक अभ्यास करने के बाद वेस्टइंडीज-ए और फिर चैलेंजर ट्राफी में शानदार प्रदर्शन करते हुए फिर से टीम इंडिया में जगह बना ली. |
| DATE: 2013-10-01 |
| LABEL: sports |
| [774] TITLE: एन श्रीनिवासन: बोर्ड के 'बादशाह' |
| CONTENT: भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई अगर अपनी पूरी ताक़त और क्षमता के बावजूद किसी को कंट्रोल नही कर पा रहा है तो वो हैं ख़ुद उसके अध्यक्ष एन श्रीनिवासन. रविवार को चेन्नई में हुई बीसीसीआई की सालाना आम बैठक में उन्होंने साबित कर दिया कि शतरंज की बिसात के वे अकेले राजा हैं और बाकी सदस्य महज़ मोहरे. आईपीएल सिक्स में उनकी अपनी टीम चेन्नई सुपर किंग्स के टीम प्रिंसिपल और उनके दामाद गुरूनाथ मयप्पन के ख़िलाफ सट्टेबाज़ी और स्पॉट फिक्सिंग के लिए आरोप पत्र दाखिल होने के कारण उनकी योग्यता को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे. उन्होंने एक तीर से कई शिकार किए हैं. सबसे पहले तो उन्होंने आईपीएल विवाद में अपना और अपने दामाद का नाम सामने आने के बाद मीडिया से एक सोची समझी चुप्पी साधी. यहां तक कि उनकी टीम चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने भी उन दिनों इस मुद्दे से जुडे सवालों के जवाब देने से इनकार कर दिया था. श्रीनिवासन ने तीसरी बार बीसीसीआई अध्यक्ष बनने के बाद बीसीसीआई के उन सभी सदस्यों और पदाधिकारियों को पुरस्कार में बड़े-बड़े पद दिए हैं जिन्होंने पिछले दिनों उन पर छाई संकट की घड़ी में उनका साथ दिया था. इस खेल में सबसे ज़्यादा फायदा हुआ है मुंबई क्रिकेट संघ के अध्यक्ष रवि सावंत को. बीसीसीआई की बैठक में श्रीनिवासन को अध्यक्ष पद के विरोध में कोई चुनौती दे सकता था तो वह थे पूर्व अध्यक्ष शरद पवार. रवि सावंत ने मुंबई क्रिकेट संघ के चुनावों को जानबूझकर अक्तूबर के तीसरे हफ्ते तक खिसकाया ताकि शरद पवार श्रीनिवासन के रास्ते का रोड़ा न बन सकें. फिलहाल रवि सावंत को श्रीनिवासन ने उपाध्यक्ष का पद सौंपा है. अरूण जेटली ने भी श्रीनिवासन के मामले में चुप्पी साधे रखी. दरअसल बीसीसीआई का अध्यक्ष बनने के लिए इस बार दक्षिण क्षेत्र की बारी थी और अगला अध्यक्ष उत्तर क्षेत्र से होगा. अरूण जेटली ने यही सोचकर इस मसले से ख़ुद को दूर रखा कि अभी राष्ट्रीय राजनीति में उनकी ज़रूरत ज़्यादा है और अगले साल जब उनका अध्यक्ष बनना लगभग तय ही है तो क्यों पचड़े में पड़ा जाए. तो क्या अब जो बीसीसीआई में हो रहा है वह सही है बिलकुल नहीं ऐसा कहते हैं जाने माने क्रिकेट समीक्षक प्रदीप मैगज़ीन. प्रदीप मैगज़ीन का मानना है कि श्रीनिवासन को लगता है कि अगर वह अभी हट जाते हैं तो कहीं उनका हाल भी जगमोहन डालमिया जैसा न हो. जगमोहन डालमिया भी जब बीसीसीआई के अध्यक्ष थे तब भी ऐसा लगता था कि उन्हें हटाना नामुमकिन है लेकिन जैसे ही वो हटे उनकी ताक़त भी समाप्त हो गई. आज सभी जानते हैं कि पूर्व अध्यक्ष शरद पवार भी कितने पावरफुल रह गए हैं. अब श्रीनिवासन ने सोचा समझा जुआ खेला है. अगर उच्चतम न्यायालय उन्हें उनके पद से हटाने का आदेश दे देता है तो उन्हें जाना ही पड़ेगा अन्यथा अगर ऐसी ही स्थिति रहती है तो श्रीनिवासन को लगता है कि वह बच जाएंगे. प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं वैसे भी पूरा बोर्ड ही समझौते पर चल रहा है. शरद पवार के वक्त भी बोर्ड ऐसे ही काम करता था जैसे आज कर रहा है. महत्वपूर्ण पदों की रेवड़ियां पहले भी अपनों को दी जाती थी और अब भी अपनों को बांटी गई है. अब तो यह भी कह सकते हैं कि पूरे मसले में सिर्फ श्रीनिवासन को दोष क्यों दें हर वह सदस्य जिसने उनका साथ दिया है वह भी उतना ही ज़िम्मेदार है जितने श्रीनिवासन. एन श्रीनिवासन ने एक तरफ जहां अपने शुभचिंतकों को उनकी और अपनी मनपसंद कुर्सी दी वहीं निरंजन शाह जैसे अनुभवी बोर्ड अधिकारी को किनारे लगा दिया. प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं ऐसा तो होना ही था. जब किसी व्यक्ति की हां में हां हर समय मिलाई जाए और उसका बिलकुल भी विरोध ना किया जाए तो श्रीनिवासन को किसी भी बात से डर कहां लगेगा और वह ऐसा ही करेंगे. अब रही बात बीसीसीआई की दुनिया में साख की. प्रदीप मैगज़ीन कहते है कि पैसे की ताक़त के कारण आईसीसी भी बीसीसीआई के सामने पानी भरती है. दक्षिण अफ्रीकी दौरे को लेकर जो अटकलें है वहां आईसीसी को दूसरे देशों के साथ मिलकर बोलना चाहिए था कि बीसीसीआई अपनी जगह ग़लत है. भारत कैसे फ्यूचर टूर प्रोग्राम को मना कर सकता है लेकिन आईसीसी को लगता है कि सारा पैसा तो भारत से आता है तो वह क्यों बोले. पैसे का खेल है जिसमें सब शामिल है. |
| DATE: 2013-10-01 |
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| [775] TITLE: श्रीनिवासन चुनाव लड़ सकते हैं, पदभार नहीं संभाल सकते: सुप्रीम कोर्ट |
| CONTENT: सुप्रीम कोर्ट ने एन. श्रीनिवासन से साफ कर दिया कि वे बीसीसीआई के अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ सकते हैं लेकिन अगर वे जीत भी जाएँगे तो भी तुरंत पदभार ग्रहण नहीं कर सकेंगे. क्रिकेट एसोसिएशऩ ऑफ बिहार ने सुप्रीम कोर्ट में श्रीनिवासन के ख़िलाफ़ याचिका दायर की थी क्योंकि उनके दामाद गुरुनाथ मयप्पन के ख़िलाफ़ कथित तौर पर आईपीएल में फिक्सिंग करने का मामला है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा चुनाव हो सकते हैं लेकिन वह कार्यभार ग्रहण नहीं कर सकते जब तक कि मामले का फ़ैसला नहीं हो जाता. श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन उन तमाम अधिकारियों खिलाड़ियों और बुकीज़ में शामिल हैं जिनके खिलाफ़ आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग के धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोप हैं. बीसीसीआई द्वारा संचालित आईपीएल में इस कांड के उज़ागर होने के बाद देशभर में सनसनी फैल गई थी. तब श्रीनिवासन ने अस्थायी तौर पर खुद को बीसीसीआई अध्यक्ष पद से अलग कर लिया था और जगमोहन डालमिया काम संभाल रहे थे. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार इस व्यवस्था के बावजूद पर्दे के पीछे श्रीनिवासन ने बोर्ड की सत्ता की डोर कमोवेश अपने हाथ में रखनी जारी रखी. 68 वर्षीय श्रीनिवासन वर्ष 2011 में बीसीसीआई के प्रमुख बने थे. श्रीनिवासन का कहना है कि कथित फिक्सिंग कांड के लिए उन पर आरोप नहीं लगाया जा सकता. मयप्पन के ख़िलाफ़ जब फिक्सिंग के आरोप लगे थे तब वह चेन्नई सुपर किंग्स फ्रेंचाइजी के टीम प्रिंसिपल थे जिसकी मालिक श्रीनिवासन द्वारा चलाई जाने वाली इंडियन सीमेंट्स कंपनी है. बिहार एसोसिएशन जो बीसीसीआई का हिस्सा नहीं है श्रीनिवासन की दोबारा वापसी का विरोध कर रही है. वर्ल्ड क्रिकेट के राजस्व में 70 फीसदी का हिस्सा होने के कारण बीसीसीआई दुनिया का सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड है और उसके अध्यक्ष को सबसे ताकतवर माना जाता है. वर्ल्ड क्रिकेट के तमाम फैसले बिना उसकी मर्जी के नहीं लिये नहीं जा सकते. |
| DATE: 2013-09-27 |
| LABEL: sports |
| [776] TITLE: भारत के अंतिम 11 में किसकी जगह पक्की? |
| CONTENT: इन दिनों भारत में क्रिकेट की बहार आई हुई है. एक तरफ जहां चैंपियंस लीग टवेंटी-टवेंटी के मुक़ाबले प्रगति पर है तो दूसरी तरफ गुरुवार से एनकेपी साल्वे चैलेंजर ट्रॉफी के मैच भी शुरू हो गए. इसके साथ ही भारत के क्रिकेट का घरेलू सत्र भी शुरू हो गया. इसके अलावा भारत ए और वेस्टइंडीज़ ए के बीच भी चार दिवसीय मैचों की सिरीज़ खेली जा रही है. इसके तहत दोनों टीमें तीन मैच खेलेंगी. एनकेपी चैलेंजर ट्रॉफी का फ़ाइनल 29 तारीख़ को खेला जाएगा. इसमें दिल्ली इंडिया ब्लू और इंडिया रेड यानि तीन टीमें भाग ले रही हैं. जब इतने सारे मैच खेले जाएंगे तो ज़ाहिर है कि एक ही समय में लगभग सारे खिलाड़ी मैदान में नज़र आएंगे और ऐसा ही हो भी रहा है. चैंपियंस लीग में महेन्द्र सिंह धोनी रोहित शर्मा शिखर धवन इशांत शर्मा आर अश्विन मुरली विजय सुरेश रैना जैसे धुरंधर अपनी अपनी टीमों को चैंपियन बनाने के लिए संधर्ष कर रहे है. वहीं एनकेपी साल्वे चैलेंजर ट्रॉफी में विराट कोहली विरेंद्र सहवाग परविंदर अवाना युवराज सिंह रोबिन उथप्पा अभिषेक नायर भुवनेश्वर कुमार आर विनय कुमार युसुफ पठान उमेश यादव खेल रहे है. इन सभी खिलाड़ियों का एकमात्र उद्देश्य चयनकर्ताओं का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करना है जो 30 सितंबर को भारत दौरे पर आने वाली ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम के ख़िलाफ भारतीय टीम का चयन करेंगे. उल्लेखनीय है कि ऑस्ट्रेलियाई टीम भारत में सात एकदिवसीय मैचो की सिरीज़ खेलेगी. अब शिखर धवन ने तो चैंपियंस लीग के शुरूआती मैचों में अपनी फॉर्म और फिटनेस साबित कर दी है तो युवराज सिंह ने भी वेस्टइंडीज़ ए के खिलाफ मिले अवसरो का पूरा लाभ उठाते हुए तीन एकदिवसीय मैचो की अनधिकृत सिरीज़ में एक शतक और एक अर्धशतक जमाया. इसके साथ ही उन्होने टीम में वापसी का अपना दावा भी मज़बूती से पेश कर दिया है. वैसे सबकी नज़रे विरेंद्र सहवाग और युसूफ पठान जैसे खिलाडियों पर भी है. युसूफ पठान वेस्टइंडिज़ ए के ख़िलाफ तो कुछ अधिक नही चमके लेकिन अभी भी उनके पास चैलेंजर ट्रॉफी में कुछ कर दिखाने के अवसर है. दूसरी तरफ विरेंद्र सहवाग दिल्ली के लिए खेलते हुए इंडिया ब्लू के खिलाफ गुरूवार को अर्धशतक जमाने में तो कामयाब रहे लेकिन बल्लेबाज़ी क्रम में वो चार नम्वर पर उतरे. इस मैच में उनकी टीम को 18 रनों से हार का सामना भी करना पड़ा. अब सहवाग के मिडिल ऑर्डर में उतरने से यह बहस भी रोचक हो जाएगी कि अगर चैलेंजर ट्रॉफी में अगले मैचो में भी वह बतौर ओपनर नही खेले और रन बनाने में कामयाब हुए तो चयनकर्ता उन्हे टीम के किस नम्बर पर जगह दे. वैसे भी टीम में जब अधिकतर खिलाडियों की जगह लगभग पक्की हो तो दो-तीन खिलाडियों के लिए ही रोमांचक संधर्ष है. देखना है कि 29 तारीख तक यह खिलाड़ी अपनी फार्म और फ़िटनेस कैसी दिखाते है और 30 तारीख को जब भारतीय टीम घोषित होगी तो उसमें किसे जगह मिलती है. |
| DATE: 2013-09-27 |
| LABEL: sports |
| [777] TITLE: नेत्रहीन की हर वज़ीर और प्यादे पर नज़र |
| CONTENT: वर्ल्ड इन्डीविज़वल ब्लाइंड चेस चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने के बाद अपनी इस कामयाबी पर बेहद खुश हैं दर्पण ईरानी. बडौदा के रहने वाले दर्पण भले ही नेत्रहीन हों लेकिन उन्होंने अपना भविष्य साफ़ दिख रहा है. भविष्य की ओर देखते हुए दर्पण कहते हैं कि उनका सपना है कि वो शतरंज में बड़े बड़े ख़िताब तो अपने नाम करें ही साथ ही वो ग्रैंडमास्टर के दर्जे तक भी पहुचें. वो कहते हैं अगर मैं ऐसा कर लेता हूं तो इस मुक़ाम पर पहुंचने वाला मैं पहला नेत्रहीन खिलाड़ी बनूंगा. आज भले ही दर्पण की उम्र 19 साल हो लेकिन छोटी उम्र से ही उन्होंने चेस खेलाना शुरु कर दिया था. भारत में शतरंज कोई आम खेल नहीं है. तो क्या दर्पण के पास थी कोई ख़ास वजह इसी खेल को चुनने की. बीबीसी को इस सवाल का जवाब देते हुए दर्पण कहते हैं शतरंज ही एक ऐसा खेल है जहां एक नेत्रहीन खिलाड़ी एक देख सकने वाले खिलाड़ी के साथ खेल सकता है. इतना ही नहीं वो उसे हरा भी सकता है. ऐसा बराबरी का मुक़ाबला किसी और खेल में संभव ही नहीं है. तो दर्पण किस खिलाड़ी के साथ खेलने की सबसे ज्यादा इच्छा रखते हैं इस सवाल के जवाब में दर्पण कहते हैं जिस खिलाड़ी के साथ खेलने की तमन्ना मेरे मन में सबसे प्रबल है वो हैं विश्वनाथन आनंद. सौभाग्य से मैं उनके साथ खेल भी चुका हूं. अपनी बात को पूरा करते हुए दर्पण कहते हैं मैं विश्वनाथन आनंद से 2010 में मिला और उनके साथ खेलना का मौका भी मुझे मिला. एक खिलाड़ी होने के नाते आप हमेशा चाहते हैं कि आप अच्छे खिलाड़ियों के साथ खेलें. अगर आप न भी जीतें तो भी आपको सीखने को बहुत कुछ मिल जाता है. विश्वनाथन आनंद तो ठीक हैं लेकिन क्या अपने समकालीन शतरंज खिलाड़ी परिमार्जन नेगी को भी मानते हैं दर्पण एक प्रतिद्वंदीदर्पण कहते हैं इस बात में कोई शक नहीं है कि परिमार्जन नेगी भारत के जाने माने शतरंज खिलाड़ियों में से एक हैं. आज की तारीख में मैं उनसे प्रतिस्पर्धा की सोच भी नहीं सकता. वैसे भी परिमार्जन भारत में बहुत कम खेलते हैं. प्रतिस्पर्धा और हार-जीत तो अपनी जगह है लेकिन एक नेत्रहीन खिलाड़ी कैसे खेलता है चेस. क्या कोई अलग तरीका होता है बीबीसी के इस उत्सुक सवाल के जवाब में दर्पण कहते हैं ब्लाइंड चेस और साइटड चेस में कोई फर्क नहीं होता. नेत्रहीन खिलाड़ी जिस चेस बोर्ड पर खेलते हैं या तो वो लकड़ी का होता है या फिर एक्रेलिक का. उस बोर्ड में छेद होते हैं. जो गोटियां होती हैं जैसे हाथी या फिर घोड़ा उनके नीचे एक किल्ली होती है जो बोर्ड में अटक जाती है. तो एक नेत्रहीन खिलाड़ी जब इन्हें छूता है तो वो गिरती नहीं हैं. अपनी बात को पूरा करते हुए दर्पण कहते हैं जहाँ तक बात रंग की है तो जो काले रंग की गोटी होती है वो ऊपर से नोकीली होती है. सफ़ेद गोटी ऊपर से सपाट होती है. बस यही फर्क होता है. जब दर्पण से बातों का सिलसिला चल ही रहा है तो क्यों न उनसे ये भी पूछ लिया जाए कि वो अपनी प्रेरणा किसे मानते हैं. दर्पण कहते हैं कि जहां तक इस खेल की बात है तो विश्वनाथन आनंद हैं उनकी प्रेरणा. दर्पण आगे कहते हैं स्टीफन हाकिंग और आमिर खान से भी मैं प्रेरणा लेता हूं. आमिर खान साल में एक फ़िल्म करते हैं और उस फ़िल्म में हर बारीकी का ध्यान रखते हैं. उनके परफेक्शन से मैं प्रेरणा लेता हूं. दर्पण शतरंज खेलने के साथ साथ चार्टेड एकाउन्टेंसी की पढ़ाई भी कर रहे हैं. |
| DATE: 2013-09-24 |
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| [778] TITLE: स्पॉट फिक्सिंगः क्या श्रीनिवासन की वापसी हो पाएगी? |
| CONTENT: 29 सितंबर को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई की सालाना बैठक होने जा रही है. अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बैठक में फिक्सिंग का मुद्दा अहम रहेगा. आईपीएल स्पॉट फ़िक्सिंग मामला सामने आने के बाद से एन श्रीनिवासन दबाव में भले रहे हों लेकिन वे वापसी की उम्मीद बिल्कुल नहीं छोड़ रहे. वे आईपीएल की चेन्नई सुपर किंग्स टीम के मालिक हैं. बीसीसीआई अध्यक्ष पद से कुछ समय के लिए निष्कासित श्रीनिवासन ने मयप्पन से अब पूरी तरह दूरी बना ली है. मैच फिक्सिंग मामले में गुरुनाथ मयप्पन पर ग्यारह हज़ार से ज़्यादा पन्नों की चार्जशीट दायर की गई थी. फिलहाल श्रीनिवासन बीसीसीआई से बाहर जाने के मूड में नहीं दिख रहे हैं. एक ओर बीसीसीआई के कई सदस्य श्रीनिवासन के खिलाफ हैं मगर दूसरी ओर उन्हें बाहर से समर्थन देने वालों की भी कमी नहीं है. इस मामले पर अपनी राय रखते हुए पूर्व क्रिकेटर मनिंदर सिंह कहते हैं उनकी कुछ बातों से मैं सहमत हूं. उनका कहना है कि मैंने कुछ गलत नहीं किया है. और वाकई उन्होंने गलती नहीं की है. श्रीनिवासन साहब से एक ही गलती हुई कि उन्होंने दो दिन मयप्पन को अपने फार्म हाउस में छिपाकर रखा. लेकिन दामाद की गलतियों के कारण उन्हें कठघरे में क्यों खड़ा किया जा रहा है उम्मीद है कि 29 सितंबर को होने वाली सलाना बैठक में स्पॉट फिक्सिंग का आरोप झेल रहे अजीत चांडिला पर अहम फैसला लिया जाएगा. श्रीसंत और अंकित च्वहाण पर पहले ही आजीवन पाबंदी लग चुकी है. वहीं अमित सिंह पर बीसीसीआई पांच साल का प्रतिबंध लगा चुकी है. माना रहा है कि मयप्पन पर लगे गंभीर आरोपों से नाखुश बीसीसीआई के कुछ सदस्य इस बैठक में चेन्नई सुपरकिंग्स की फ्रेंचाइज़ी रद्द करने की मांग कर सकते हैं. आईपीएल फ्रेंचाइज़ी के साथ किए करार के मुताबिक बीसीसीआई के संविधान में कहा गया है कि किसी भी टीम के मालिक या उससे जुड़े सदस्य आईपीएल की छवि खराब करने वाली किसी गतिविधि में यदि लिप्त पाए जाते हैं तो उस टीम की फ्रेंचाइज़ी तुरंत रद्द कर दी जाएगी. स्पॉट फिक्सिंग का मामला सामने आने से पहले तक मयप्पन चेन्नई सुपरकिंग्स में टीम प्रिंसिपल के पद पर थे. लेकिन इस खबर के तुरंत बाद उनका पद घटा दिया गया था. इतना ही नहीं बीसीसीआई की अंदरुनी जांच में उन्हें क्लीन चिट मिलने पर भी कई सवाल खड़े हुए थे. भाई-भतीजावाद के चलते मयप्पन बीसीसीआई की जांच कमिटी से साफ बच निकले थे. अब सवाल है कि क्या वे अपने खिलाफ दायर चार्जशीट से बच पाएंग |
| DATE: 2013-09-23 |
| LABEL: sports |
| [779] TITLE: सट्टेबाज़ी: गुरुनाथ मयप्पन के खिलाफ चार्जशीट |
| CONTENT: मुंबई पुलिस ने बहुचर्चित आईपीएल सट्टेबाज़ी मामले में चेन्नई सुपरकिंग्स के पूर्व मालिक गुरुनाथ मयप्पन समेत 22 लोगों के खिलाफ सत्र न्यायालय में चार्जशीट दायर कर दी है. साढ़े ग्यारह हजार पन्नों की इस चार्जशीट में एक पाकिस्तान एंपायर और 15 सट्टेबाजों के नाम भी शामिल हैं. चार्जशीट में बॉलीवुड एक्टर विंदू दारा सिंह को भी अभियुक्त बनाया गया है. सरकारी वकील किरण बेण्डेभर के अनुसार इस मामले में कुल 221 गवाहों के बयान दर्ज गए हैं. इस मामले में कुल 22 अभियुक्त हैं जिनमें से तीन रमेश जैसवाल टिंकू और ज्यूपिटर फिलहाल दिल्ली पुलिस की हिरासत में है. बेण्डेभर ने बताया पाकिस्तानी अंपायर असद रउफ और 15 पाकिस्तानी सट्टेबाजों को भी अभियुक्त बनाया गया है. उन्होंने बताया इन बुकियों पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी कागजात के आधार पर मोबाइल के सिम कार्ड हासिल किए जिनका फिक्सिंग में उपयोग किया गया था. अम्पायर असद रउफ पवन जयपुर संजय जयपुर और 15 पाकिस्तानी सट्टेबाजों को वांछित अभियुक्त बनाया गया है. लेकिन इस आरोपपत्र में स्पॉट फिक्सिंग का कोई जिक्र नहीं है. आईपीएल के 2013 संस्करण में स्पॉट फिक्सिंग के आरोपों और एस श्रीसंत समेत दो अन्य खिलाड़ियों के गिरफ्तारी से पूरा टूर्नामेंट विवादों के घेरे में आ गया था. दिल्ली पुलिस ने 16 मई को राजस्थान रॉयल्स के एस श्रीसंथ अजित चंडीला और अंकित चव्हाण और 11 सट्टेबाजों को मैच फिक्सिंग के आरोप में गिरफ्तार किया था. इस मामले में बीसीसीआई के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन भी शक के घेरे में आए थे उन्हें भी इस मामले में अभियुक्त बनाया गया है. गुरुनाथ मयप्पन सट्टेबाजी की बात तो स्वीकार कर चुके हैं लेकिन वो फिक्सिंग से इनकार करते हैं. दिल्ली पुलिस के अनुसार इन तीन खिलड़ियो ने सट्टबाजों के साथ मिलकर तीन मैचों में फिक्सिंग की थी जिनमें 5 मई को पुणे वारियर्स 9 मई को किंग्स इलेवन पंजाब और 15 मई को मुम्बई इंडियंस के खिलाफ खेले गए मैच शामिल थे. मामले की अगली सुनवाई 21 नवम्बर को है. |
| DATE: 2013-09-21 |
| LABEL: sports |
| [780] TITLE: सिक्स पैक बनाएँ पर ज़रा ध्यान से. |
| CONTENT: इन दिनों फ़िल्मों में पुराने ज़माने के दिलीप कुमार देव आनंद राजकपूर जितेंद्र राजेंद्र कुमार जैसे हीरो कम ही दिखते है और ना ही उनकी मदद करने के लिए कोई ताक़तवर साइड हीरो होता है. आमिर खान सलमान खान और शाहरूख खान जैसे आज के सितारे चॉकलेटी इमेज से बहुत आगे निकल चुके है और उनके सिक्स पैक एब चर्चा का केंद्र अधिक रहते है. गजनी बॉडीगार्ड और ओम शांति ओम में यह सब अपने डोले-शोले दिखा चुके है. अब इसे नए ज़माने का चलन कहिए या स्वास्थय के प्रति बढती जागरूकता कि आज बहुत सारे युवा वास्तविक ज़िदंगी में कुछ-कुछ ऐसा ही दिखने चाहते हैं. जहाँ देखो यहाँ-वहाँ गली-मोहल्ले व्यस्त सड़को के किनारे मॉलगॉव-कस्बों शहरों में हैल्थ सेंटर से लेकर जिमनेज़ियम नज़र आते हैं. वहाँ युवा लड़के-लड़कियों के अलावा अधेड़ उम्र के लोग भी ट्रेड मिल पर दौड़ते दिख जाएंगे. जो मज़बूत लोहे का वेट नहीं उठा सकते वो आराम से खड़े हो कर फिर फ़ोम के आरामदायक गद्दे जैसा अहसास देती मशीनों पर लेटकर भी वेट एक्सरसाइज़ कर सकते हैं. आम तौर पर जिमनेज़ियम एक ट्रेनर होता है जो बताता है कि किस तरह की कसरत की जाए कैसे जल्दी से जल्दी आजकल के हीरो जैसा बना जाए. बस इस तरह की जगहों पर पैसा ज़रा ज़्यादा लगता है. जिनके पास अधिक पैसा नहीं है वो आज भी किसी पुराने ज़माने के वेटलिफ्टिंग सेंटर में जो सकते है लेकिन वहाँ पसीना अधिक बहाना पड़ेगा. ऐसा नहीं है कि जिमनेज़ियम में सिर्फ कसरत करने से सिक्स पैक एब बन जाएंगे. आज कल कई जगहों पर सिक्स पैक एब बनाने के लिए सप्लीमेंट लेने की सलाह भी दी जाती है. ये सप्लीमेंट छोटे-बड़े पैकेट से लेकर पाँच-दस किलो के डिब्बों में तरह-तरह के नामों से आते है. पर ये सप्लीमेंट नुकसानदायक हो सकते हैं चाहे लो किसी की सलाह से लिए गए हों. अमरीका में स्पोर्टस मैडिसीन में डब्लयूएचओ विश्व स्वास्थय संस्था से फ़ैलोशिप कर चुके डॉक्टर जवाहर लाल जैन कहते हैं न्यूट्रिशन सपलीमैंट फिज़िशियन की निगरानी में ही लिया जाना चाहिए. न्यूट्रिशन सपलीमैंट लेना बुरा नहीं है लेकिन सबसे बड़ी समस्या है कि न्यूट्रिशन सपलीमैंट की इंडस्ट्री नियामक नहीं है. बहुत सारी आयुर्वेदिक दवाइयां हैं लेकिन बिना सलाह से या फिर अपने मन से सपलीमैंट लेने से नुकसान भी हो सकता है. डॉक्टर जवाहर लाल जैन बताते हैं पिछले दिनों जितना भी शोध हुआ उसके आधार पर सरकार ने भारतीय खेल प्राधिकरण से भी कहा है कि वह अपने क्षेत्रिय ट्रेनिंग सैंटर में न्यूट्रीशन सप्लीमेंट की जगह सूखे मेवे जैसे काजू बादाम किशमिश दे. जैन चेतावनी देते हैं कि अगर सप्लीमेंट में क्षमता बढाने वाली दवाइंया मिली हों तो किसी भी खिलाड़ी का खेल जीवन डोप के आरोप में समाप्त हो सकता है. जैम कहते है सप्लीमेंट के डिब्बो में कई बार स्टेरॉयड्स मिले हुए होते हैं. एथलीट ये बात समझते हैं कि एक चम्मच खाने से प्रदर्शन 10 गुना और 6 चम्मच खाने से 60 गुना बढ़ जाएगा. डाक्टर जवाहर लाल कहते हैं विदेश से आने वाले डिब्बों की जाँच से पता चलता है कि कई डिब्बों में नैंड्रोलोन नामक सॉल्ट मिला हुआ था. इसके अधिक सेवन से ख़ासकर पुरूषों के स्तन बहुत बढ जाते है आवाज़ भारी हो जाती है गुस्सा अधिक आता है चिड़चिड़ापन बढ जाता है हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है लीवर कैंसर हो सकता है. महिलाओं के चेहरे पर बाल आ जाते है. कुछ एथलीट गंजे हो जाते है. बांझपन हो जाता है और कुछ को अन्य तरह की गंभीर बीमारिया घेर लेती है. ऐसा नहीं है कि सब लोग दवाइयों के सहारे ही सिक्स पैक एब बनाते हों. अगर दिनेश सिंह ओसवाल की बात की जाए तो वह कई बार बॉडी बिल्डिंग चैंपियनशिप के विजेता रह चुके है. वह कई बार मिस्टर इंडिया भी रह चुके है. उनका कहना है इसके लिए बड़ी मेहनत की ज़रूरत है. नियमित व्यायाम अच्छी डाइट न्यूट्रिशन भी ज़रूरी है. क्वालिफाइड ट्रेनर का होना आवश्यक है. अब तो कोचों के लिए सर्टिफिकेट कोर्स भी चलाए जा रहे हैं. अगर आप जिम में जाएँ तो सुनिश्चित करें कि डाइटिशियनफिज़ियो और ट्रेनर प्रशिक्षित हों. तो शरीर की देखभाल करना या फिर कसरत करना बुरा नही है पर ज़रा सभंलकर. |
| DATE: 2013-09-21 |
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| [781] TITLE: बोर्ड के 'बेबाक' पूर्व सचिव लेले का निधन |
| CONTENT: भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई के पूर्व सचिव जयवंत लेले का गुरूवार रात दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. गुजरात के रहने वाले 75 वर्षीय जयवंत लेले का निधन उनके अपने शहर वड़ोदरा में हुआ. अपने करियर में वर्षों तक बीसीसीआई के सहायक सचिव रहने के बाद लेले ने सचिव पद की कमान 1996 में संभाली जब जगमोहन डालमिया अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष चुने गए. वड़ोदरा के ही रहने वाले भारत के पूर्व विकेटकीपर नयन मोंगिया ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि जयवंत लेले ने 13 सितंबर को ही अपना 75वाँ जन्मदिन मनाया था. उन्होंने कहा ये बहुद दुखद है. मेरे लिए वो पिता समान ही थे. 12 वर्ष की आयु से ही उन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया था और मैं उनसे कई मसलों पर सलाह लेता था. अपने क्रिकेट प्रशासन करियर पर किताब लिखने वाले जयवंत लेले के परिवारजनों के अनुसार पिछले कुछ दिनों से उनकी तबीयत ठीक नहीं थी. जयवंत लेले का बीसीसीआई में कार्यकाल सुर्ख़ियों में रहा था क्योंकि उनके सचिव रहते ही वर्ष 2000 में कई नामचीन खिलाडियों पर मैच-फिक्सिंग के आरोप लगे थे. उनके कार्यकाल के दौरान ही पूर्व भारतीय कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन और अजय शर्मा के क्रिकेट खेलने पर आजीवन प्रतिबंध लगा था जबकि अजय जडेजा और मनोज प्रभाकर पर पांच साल का बैन लगा था. बीसीसीआई में सचिव के तौर पर अपनी साख बनाने के पहले जयवंत लेले ने क्लब स्तर पर क्रिकेट भी खेला था और अंपायर होने का प्रशिक्षण भी लिया था. उनके कार्यकाल के दौरान ही बीसीसीआई ने मैच-फ़िक्सिंग आरोपों की जांच के लिए जस्टिस चंद्रचूड कमीशन का गठन किया था. इसके बाद बीसीसीआई ने सीबीआई से पूर्व दक्षिण अफ़्रीकी कप्तान हैंसी क्रोनिए के खिलाफ़ लगे मैच-फ़िक्सिंग आरोपों की जांच करने के लिए निवेदन किया था. बीसीसीआई सचिव रहते हुए जयवंत लेले अपने बेबाक बयानों के लिए चर्चा में लगातार बने रहे. कपिल देव जब भारतीय क्रिकेट टीम के कोच थे तब भी लेले की एक टिपण्णी पर ख़ासा कोहराम मचा था. |
| DATE: 2013-09-20 |
| LABEL: sports |
| [782] TITLE: फिर अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ेंगे श्रीनिवासन |
| CONTENT: विवादों में घिरे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई के मौजूदा अध्यक्ष एन श्रीनिवासन ने कहा है कि वे इस महीने होने वाले बोर्ड चुनाव में एक बार फिर अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ेंगे. 29 सितंबर को चेन्नई में बोर्ड के चुनाव होने वाले हैं. बीसीसीआई की मार्केटिंग कमेटी की बैठक के बाद पत्रकारों से बात करते हुए श्रीनिवासन ने कहा मैं अध्यक्ष पद के लिए फिर चुनाव लड़ूँगा. आप प्रेस वाले हो. आप लोग समर्थकों और विरोधियों की संख्या के बारे में बता रहे हो. आईपीएल में स्पॉट फ़िक्सिंग मामला सामने आने के बाद से ही एन श्रीनिवासन दबाव में हैं. आईपीएल की चेन्नई सुपर किंग्स टीम के मालिक श्रीनिवासन हैं और उनके दामाद गुरुनाथ मेयप्पन को भी मुंबई पुलिस ने इस मामले की जाँच के क्रम में गिरफ़्तार किया था. मेयप्पन का नाम सामने आने के बाद एन श्रीनिवासन ने अध्यक्ष के रूप में नियमित कामकाज से अपने को अलग कर लिया है. उनकी जगह ये कामकाज जगमोहन डालमिया देख रहे हैं. हालाँकि पिछले दिनों दिल्ली में हुई बीसीसीआई की अनुशासनात्मक समिति की बैठक की उन्होंने अध्यक्षता की जिसमें रीसंत और अंकित चव्हाण पर आजीवन पाबंदी लगाने का फ़ैसला हुआ था. बीसीसीआई की मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक़ अध्यक्ष का नाम प्रस्तावित और उसका समर्थन करने की बारी दक्षिणी क्षेत्र की है. लेकिन जिस उम्मीदवार का वे समर्थन कर रहे हैं वो उम्मीदवार उस क्षेत्र के बाहर का भी हो सकता है. समाचार एजेंसी पीटीआई ने श्रीनिवासन के समर्थकों ने उम्मीद जताई है कि उनके पास संख्या बल मौजूद है. बीसीसीआई के अध्यक्ष के रूप में श्रीनिवासन का कार्यकाल समाप्त हो रहा है. वे दो साल के लिए अध्यक्ष चुने गए थे. लेकिन अपना कार्यकाल एक साल और बढ़ाने के लिए चुनाव लड़ सकते हैं. |
| DATE: 2013-09-19 |
| LABEL: sports |
| [783] TITLE: सिंगापुरः फ़ुटबॉल में फ़िक्सिंग, 14 गिरफ़्तार |
| CONTENT: सिंगापुर पुलिस ने फ़ुटबॉल मैच फिक्सिंग का दुनिया भर में जाल फैलाए एक अंतरराष्ट्रीय रैकेट के मास्टरमाइंड समेत 14 लोगों को गिरफ़्तार किया है. स्थानीय मीडिया में रैकेट के मास्टरमाइंड को सिंगापुर का एक व्यवसायी बताया गया है लेकिन पुलिस ने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है. अधिकारियों ने बताया कि 2008 से लेकर 2011 के बीच आयोजित 680 मैचों पर फिक्सिंग का साया होने का संदेह था जिनमें 380 मैच अकेले यूरोप से हैं. इनमें फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप क्वालीफॉयर और यूरोपियन चैंपियनशिप लीग के मैच शामिल हैं. यूरोपीय खेल अधिकारियों ने कहा था कि सिंगापुर के एक ऐसे सट्टेबाज़ रैकेट ने फ़ुटबॉल मैचों में फिक्सिंग की थी जिसके तार खिलाड़ियों से लेकर रेफरी और पूरी दुनिया के फ़ुटबॉल अधिकारियों तक फैले हैं. गिरफ़्तार किए गए 12 पुरुषों और दो महिलाओं की पहचान को सार्वजनिक नहीं किया गया है. पुलिस के अनुसार मास्टरमाइंड समेत पांच लोगों को आगे की पूछताछ के लिए रोक लिया है जबकि बाकियों को रिहा कर दिया जाएगा. संदिग्ध मैचों में फिक्सिंग की जांच में यूरोप की क़ानून लागू करने वाली संस्था यूरोपोल के साथ ही इंटरपोल भी मदद कर रहा है. बुधवार को सिंगापुर की पुलिस एजेंसियों ने एक संयुक्त बयान में गिरफ़्तारी की पुष्टि की है. बयान में कहा गया है कि गिरफ़्तार व्यक्तियों से मैच फिक्सिंग अपराध के लिए भ्रष्टाचार विरोधी अधिनियम के तहत पूछताछ की जा रही है और ये जानने की कोशिश हो रही है कि इस संगठित अपराध में उनकी क्या भूमिका है. बैंकाक से बीबीसी के जोनाह फिशर के अनुसार पूरी दुनिया भर में फ़ुटबॉल मैचों की फिक्सिंग से डैन टैन का नाम कई सालों से जोड़ा जाता रहा है. इटली के अदालती दस्तावेजों के अनुसार डैन टैन जिसका औपचारिक नाम टैन सी एंग है इस नेटवर्क का मास्टर माइंड है. कहा जाता है कि टैन सिंगापुर से ही फिक्सिंग का अंतरराष्ट्रीय रैकेट चलाता है और उसके तार यूरोपीय फिक्सरों से जुड़े हुए हैं. आरोप है कि उन्होंने ही परिणाम प्रभावित करने के लिए इतालवी फ़ुटबॉल के निचले क्रम के खिलाड़ियों को रिश्वत दी थी. टैन को गिरफ़्तार करने के लिए इटली और इंटरपोल के लगातार आग्रहों के बावजूद सिंगापुर के अधिकारियों ने कोई कार्रवाई करने से इनकार कर दिया था. इटली से प्रत्यर्पण संधि न होने के कारण सिंगापुर के अधिकारी कहते रहे हैं कि वे गिरफ़्तारी तभी करेंगे जब उनके यहां कोई अपराध होगा. |
| DATE: 2013-09-19 |
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| [784] TITLE: सचिन को संन्यास लेने के लिए नहीं कहाः पाटिल |
| CONTENT: मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के क्रिकेट से संन्यास को लेकर चल रही अटकलों पर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को स्पष्टीकरण देनी पड़ी है. बीसीसीआई ने इन खबरों का खंडन किया है कि मुख्य चयनकर्ता संदीप पाटिल ने सचिन तेंदुलकर से मिल कर कहा कि वो 200वें टेस्ट मैच के बाद अपने भविष्य पर विचार करें. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार बीसीसीआई के वरिष्ठ अधिकारी राजीव शुक्ला ने बुधवार को कहा इन ख़बरों में कोई सच्चाई नहीं है. हमने तेंदुलकर और पाटिल दोनों से बात की है. उनके बीच ऐसी कोई बात नहीं हुई. इससे पहले मीडिया रिपोर्ट में कहा गया था कि संदीप पाटिल ने सचिन तेंदुलकर से कहा है कि नवंबर में वेस्ट इंडीज़ के साथ होने वाले दो टेस्ट मैचों की सिरीज़ में अपना 200वां टेस्ट मैच पूरे होने के बाद वह अपने भविष्य के बारे में सोचें. लेकिन पाटिल ने भी इन खबरों को निराधार बताया है. अटकलें लग रही हैं कि वेस्ट इंडीज़ सिरीज़ के बाद तेंदुलकर संन्यास ले सकते हैं. पीटीआई के अनुसार पाटिल ने कहा सचिन से मिलना हमेशा ही अच्छा लगता है लेकिन मैं उनसे पिछले 10 महीने से नहीं मिला हूं. मैंने उन्हें फ़ोन नहीं किया है न ही उन्होंने मुझे फ़ोन किया है. हमने कोई चर्चा नहीं की है यह सब बकवास है. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वेस्ट इंडीज़ के साथ दो टेस्ट और तीन एक दिवसीय मैचों की सिरीज़ के तय होने के बाद पाटिल तेंदुलकर से मिले थे. रिपोर्ट में यह भी संकेत थे कि पाटिल ने तेंदुलकर से कहा है कि नवंबर में उनके बहुप्रतीक्षित 200वें टेस्ट के बाद ही चयनकर्ता उनके भविष्य पर फ़ैसला करेंगे. क्रिकेट के इतिहास में तेंदुलकर सबसे ज़्यादा 198 टेस्ट खेलने वाले खिलाड़ी हैं. उनके नाम टेस्ट मैचों में 51 शतक बनाने का भी रिकॉर्ड है. एक दिवसीय मैचों से रिटायर हो चुके तेंदुलकर ने 49 वनडे शतक लगाए हैं. टेस्ट और एक दिवसीय मैच मिलाकर वह शतकों का शतक लगा चुके हैं. इसके अलावा वह अब तक टेस्ट मैचों में 16000 रन भी बना चुके हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों से उनका प्रदर्शन अपने स्तर के अनुरूप नहीं रहा है. भारत में खेले गए पिछले 10 मैचों में उन्होंने सिर्फ़ दो हाफ़ सेंचुरी बनाई हैं. पिछला शतक उन्होंने 2011 में साउथ अफ़्रीका के ख़िलाफ़ केप टाउन में लगाया था. फ़िलहाल वह टी20 चैंपियंस लीग में 21 सितंबर को मुंबई इंडियंस की ओर से मेज़बान राजस्थान रॉयल्स के ख़िलाफ़ होने वाले मैच में खेलने की तैयारी कर रहे हैं. |
| DATE: 2013-09-18 |
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| [785] TITLE: बजरंग ने कुश्ती में भारत को दिलाया दूसरा पदक |
| CONTENT: पहलवान बजरंग ने हंगरी के बुडापेस्ट में चल रही विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में भारत को दूसरा पदक दिलाया है. भारतीय पहलवान ने फ्रीस्टाइल मुक़ाबलों के 60 किग्रा वर्ग में रेपेचेज में मंगोलिया के पहलवान नियाम ओचिर एनखासेखान को 9-2 से हराकर कांस्य पदक जीता. इससे पहले अमित कुमार ने 55 किग्रा वर्ग में रजत पदक जीता था. भारत का विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के इतिहास में यह कुल नौवां पदक है. चोट से जूझ रहे ओलंपिक कांस्य पदक विजेता योगेश्वर दत्त की जगह बजरंग को भारतीय टीम में शामिल किया गया था. हालाँकि वह अपने पहले ही मुक़ाबले में बुल्गारिया के व्लादीमीर दुबोव से 0-7 से हार गए थे लेकिन बुल्गारियाई पहलवान के फ़ाइनल में पहुँचने के चलते बजरंग को रेपेचेज में खेलने का मौक़ा मिल गया. बजरंग को रेपेचेज के पहले राउंड में जापान के चोटिल पहलवान शोगो माइदा के ख़िलाफ़ वॉकओवर मिला. दूसरे दौर में बजरंग ने रोमानिया के इवान गाइडिया को 10-3 से मात देकर कांस्य पदक के मुक़ाबले में जगह बनाई. लेकिन 84 किग्रा वर्ग में पवन कुमार और 120 किग्रा वर्ग में हितेंदर शुरुआती राउंड में ही हार गए. |
| DATE: 2013-09-18 |
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| [786] TITLE: भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार साइना |
| CONTENT: भारत की स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल जापान ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट में नहीं हिस्सा ले रही हैं. साइना का कहना है कि इंडियन बैडमिंटन लीग में काफी ज़्यादा मैच हो गए थे मुक़ाबले भी कड़े थे. इसलिये थकान के कारण जापान ओपन नही खेल रही हूँ. उन्होंने बताया आने वाले समय में मेरा कार्यक्रम बेहद व्यस्त है. डेनमार्क ओपन और फ्रांस ओपन भी आने वाले हैं तो लगातार खेलना मुश्किल हो जाएगा. मैं इस महीने ट्रेनिंग करना चाहती हूँ ताकि आने वाले दो-तीन महीनो तक फिट रहूं. साइना के अलावा पुरूष वर्ग में भारत के पी कश्यप भी थकान और चोट के कारण जापान ओपन में भाग नही लेंगे. इनकी अनुपस्थिति में भारत की चुनौती युवा खिलाड़ी पीवी सिंधु के कंधों पर रहेगी. अगर इंडियन बैडमिंटन लीग की बात की जाए तो साइना नेहवाल के नेतृत्व में हैदराबाद हॉटशाट्स ने ख़िताब जीता. साइना नेहवाल ने पूरे टूर्नामेंट में अपना दबदबा दिखाते हुए सभी एकल मैच जीतेहैदराबाद हॉटशाट्स की इस आइकन खिलाड़ी की मौजूदगी ने पूरी टीम के हौसले को बनाए रखा. जीत का श्रेय पूरी टीम को देते हुए साइना नेहवाल कहती हैं मुझे बडी ख़ुशी है कि मैं इंडियन बैडमिंटन लीग में अच्छा खेली और पहला ही टूर्नामेंट जीतना तो एक सपने के साकार होने जैसा रहा. मैने ही नही पूरी टीम ने बहुत मेहनत की. सभी खिलाड़ियो ने पूरे टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन किया. हमारी टीम के स्पोर्टिंग स्टाफ खासकर कोच राजेंद्रा जिन्होने सभी खिलाड़ियों का खेल निखारने में बहुत मदद की. हैदराबाद हॉटशाटस के लिए इससे बेहतर शुरूआत नही हो सकती थी. मै उम्मीद करती हूँ कि आने वाले साल में हम और मेहनत करेंगे. साइना नेहवाल ने विशेष रूप से अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हुए कहामैने अपने समर्थकों के सामने सात मैच लगातार जीते मुझे वास्तव में बेहद आनंद आया. भारत की नबंर एक खिलाड़ी होने के नाते दबाव की बात चलने पर साइना नेहवाल का मानना है कि जो खिलाड़ी अच्छा करता है उस पर दबाव तो रहेगा ही. दरअसल अपने खेल को सुधारने और उसमें लय लाने में थोडा समय लग जाता है. मुझे साल की शुरुआत में ही एड़ी की चोट से जूझना पडा. अंगूठे में भी फ्रैक्चर हुआ. उसके बाद लय में आने में काफी समय लगा. उसके बाद आईबीएल में मुझे लगा कि मैं अच्छा खेल सकती हूँ और सभी मैच आसानी से निकल भी गए. इसके बावजूद मेरा कहना है कि ऐसी शानदार फार्म में रहना आसान नही है ख़ासकर टॉप पर रहना क्योंकि यह सब थोड़े समय के लिए होता है. भारत की युवा बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु जापान ओपन में शामिल हो रही हैं. साइना नेहवाल भारत के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियो को मिलने वाली मेडिकल सुविधाओं को लेकर कहती हैं कि खिलाड़ियों को पर्याप्त सुविधा नहीं मिल रही है. हमारे पास अधिक से अधिक एक या दो फिजियो है जो हमारा ध्यान रख रहे है. भारतीय बैडमिंटन को सुधारने के लिए और ज़्यादा एकेडमी ट्रेनिंग सैंटर और कोच होने ज़रूरी है. अगर हम चाहते है कि भारत में अधिक संख्या में बैडमिंटन खिलाड़ी हो तो इन सब सुविधाओं का होना बहुत ज़रुरी है. साइना नेहवाल उन दर्शको का धन्यवाद करना नहीं भूलीं जिन्होने आधी-आधी रात तक स्टेडियम में खिलाड़ियो का हौसला बढाया. साइना ने उन खास दर्शको का भी शुक्रिया किया जिनमें सचिन तेंदुलकर सुनील गावस्कर राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण जैसे जाने-माने क्रिकेटर भी शामिल थे. अब भले ही साइना नेहवाल जापान ओपन में ना खेलकर आराम करना चाहती है ताकि आने वाले समय में पूरी तैयारी के साथ भविष्य की चुनौतियों का सामना कर सके तो इसमें बुरा क्या है बैडमिंटन प्रेमियों को इसे साइना नेहवाल की दूरदर्शिता ही समझना चाहिए क्योंकि उन्होने दिखा दिया है कि पूरी तरह फिट साइना नेहवाल बैडमिंटन के कोर्ट पर क्या कर सकती है. |
| DATE: 2013-09-17 |
| LABEL: sports |
| [787] TITLE: विश्व कुश्ती चैंपियनशिप: कौन कौन दिखाएंगे दम |
| CONTENT: हंगरी में सोमवार से शुरू हो रही विश्व कुश्ती चैंपियनशिप भारतीय पहलवानों के लिए अपना दमखम दिखाने का एक बढ़िया मौका है. ये बात अलग है कि सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त जैसे भारत के स्टार पहलवान चोटिल होने की वजह से इस चैंपियनशिप में हिस्सा नहीं ले रहे हैं. वैसे ख़ुद सुशील कुमार का कहना है कि अगर टीम के डॉक्टरों ने अनुमति दे दी तो वो दो-दो हाथ कर सकते है. सुशील कुमार ने पिछले साल लंदन ओलंपिक में रजत पदक जीता था. उनके साथी योगेश्वर दत्त ने भी वहां कांस्य पदक जीता था. अब दोनों ही चोटिल है और उसके बाद से उन्होंने किसी टूर्नामेंट में हिस्सा नही लिया है. ऐसा नही है कि इस बार भारतीय दल में एक भी ऐसा पहलवान नहीं है जिससे पदक की उम्मीद हो. इस दल में वैसे तो कुल मिलाकर भारत के 22 महिला और पुरूष पहलवान ताल ठोकने के लिए तैयार हैं. द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित कोच यशवीर सिंह का कहना है कि सबसे ज़्यादा उम्मीद फ्रीस्टाइल वर्ग में 55 किलो भार वर्ग में अमित कुमार 60 किलो भार वर्ग में बजरंग और 74 किलो भार वर्ग में उतरने वाले नरसिंह पंचम यादव से है. महिला वर्ग में भारत का दारोमदार गीता और अनुभवी गीतिका जाखड़ पर रहेगा. वैसे भारतीय महिलाओं ने कनाडा में हुई पिछली विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में दो कांस्य पदक जीते थे. यह कामयाबी गीता फोगाट और बबीता कुमारी ने दिलाई थी. इनके अलावा अलका तोमर भी भारत को कांस्य पदक दिला चुकी है. अलका तोमर भारत की पहली महिला पहलवान हैं जिन्होंने साल 2006 में चीन के ग्वांग्ज़ू शहर में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता. विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में सुशील कुमार के अलावा भारत के केवल दो पहलवान ही पदक जीत सके है. भारत को सबसे पहली कामयाबी उदय चंद ने साल 1961 में जापान के योकोहामा में कांस्य पदक जीतकर दिलाई. उनके अलावा बिशम्बर सिंह ने साल 1967 में दिल्ली में हुई विश्व कुश्ती चैंपियनशिप मे रजत पदक जीता. ये कामयाबी साबित करती है कि कुश्ती में सफलता भारत को बहुत पहले से मिलती रही है लेकिन उसमें निरंतरता का अभाव रहा है. अब कुश्ती ओलंपिक में भी बनी रहेगी लेकिन भारतीय खेल प्रेमियों को इंतज़ार है कि सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त की कमी कौन पूरी करेगा. इस लिहाज से विश्व कुश्ती चैंपियनशिप का महत्व बढ़ जाता है. भारतीय खेमे का हौसला बढ़ाने के लिए सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त भी हंगरी में ही मौजूद है. |
| DATE: 2013-09-16 |
| LABEL: sports |
| [788] TITLE: युवराज सिंह भारतीय टीम में वापसी की ओर |
| CONTENT: ऐसा लगता है कि युवराज सिंह को भारतीय टीम में वापसी के लिए लंबा इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा. वेस्टइंडीज़-ए के खिलाफ बंगलौर में खेले गए मैच में युवराज सिंह ने 89 गेंदों में 123 रन ठोककर भारत-ए का स्कोर 42 ओवरों में चार विकेट पर 312 रनों तक पहुँचा दिया. युवराज सिंह पिछले कुछ दिनों में ज़हीर खाँ के साथ फ़्रांस के छोटे से शहर में अपनी फ़िटनेस बेहतर करने के प्रयासों में लगे हुए थे. इसका असर इतनी जल्दी दिखाई देगा इसकी उम्मीद शायद उनको भी नहीं थी. युवराज के पहले पचास रन 60 गेंदों में आए. लेकिन दूसरे पचास रन पूरे करने के लिए उन्हें सिर्फ़ 20 गेंदों की ज़रूरत पड़ी. एशले नर्स और निकिता मिलर को युवराज और यूसुफ़ पठान ने मिलकर बुरी तरह से पीटा. दोनों ने मिलकर 10 से भी कम ओवरों में चौथे विकेट के लिए 125 रन जोड़े. युवराज का अनुकरण करते हुए यूसुफ़ ने नर्स के एक ओवर में 28 रन निकाले. युवराज ने शतक लगाकर अपना शतक पूरा किया लेकिन वो एक फ़ुलटॉस गेंस पर लोफ़्टेड शॉट मारने के चक्कर में आउट हो गए. वेस्टइंडीज़-ए की पारी में देवनारायण ही अकेले बल्लेबाज़ थे जिन्होंने अपनी शुरुआत को अर्धशतक में बदला. जब उन्होंने सिर्फ़ 58 रनों पर अपना तीसरा विकेट दिया तो किसी को भी मैच के परिणाम के बारे में कोई संदेह नहीं रह गया था. एशले नर्स ने 57 रन बनाकर हार को थोड़ी देर तक टालने की कोशिश की लेकिन वो सफल नहीं हो पाए. इस श्रंखला के बाकी दो मैच भी बंगलौर में ही खेले जाएंगे. |
| DATE: 2013-09-15 |
| LABEL: sports |
| [789] TITLE: खिलाड़ियों पर लगा प्रतिबंध, लेकिन अधिकारी बचे |
| CONTENT: शुक्रवार को जहां एक तरफ राजनीतिक गलियारों में गहमागहमी थी वहीं भारत के क्रिकेट जानकारों में इस बात को लेकर चर्चा चल रही थी कि आईपीएल-6 में मैच फिक्सिंग के आरोपों का सामना कर रहे खिलाड़ियों का क्या होगावैसे जिस तरह का फ़ैसला बीसीसीआई के अधिकारियों ने किया उसका अनुमान काफी हद तक सबको था. आख़िरकार शाम होते-होते बीसीसीआई ने अपने निर्णय में पूर्व टेस्ट तेज़ गेंदबाज़ एस श्रीसंत और स्पिनर अंकित चव्हाण पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया. इसके साथ ही राजस्थान रॉयल्स के अमित सिंह को पांच साल और सिद्धार्थ त्रिवेदी को एक साल के लिए निलंबित किया गया है. युवा स्पिनर हरमीत सिंह को सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया. बीसीसीआई के इस फैसले पर जाने-माने खेल पत्रकार और क्रिकेट समीक्षक प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं किसी भी खिलाड़ी पर अगर मैच फिक्सिंग के आरोप के आधार पर प्रतिबंध लगाया जाए तो दुख तो होता है लेकिन अभी इस मामले में पुलिस की जांच चल रही है बोर्ड के एक बड़े अधिकारी के रिश्तेदार जो ख़ुद आईपीएल में एक फ्रैंचाइज़ी के अधिकारी है और एक फ्रैंचाइज़ी के मालिक के खिलाफ़ भी केस चल रहे हैं. ऐसे में अगर सिर्फ खिलाड़ियों के ख़िलाफ कार्रवाई हो तो ऐसा लगता है कि बोर्ड अपने आप को बचाने के लिए झुंझलाहट और जल्दबाजी में कदम उठा रहा है. दूसरी तरफ एक अन्य खेल समीक्षक विजय लोकपल्ली कहते हैं इन खिलाड़ियों के ख़िलाफ सख्त कार्रवाई होगी ऐसा अंदेशा तो पहले से ही था. पहले भी क्रिकेट मैच फिक्सिंग जैसे मामलों से उबरकर सामने आया है. आईपीएल में जो कुछ भी हुआ वह बड़े पैमाने पर हुआ. इसमें कई खिलाड़ी शामिल थे. बीसीसीआई ने जो कदम उठाए वे सही थे और इस खेल के लिए ज़रूरी भी थे. बीसीसीआई ने यह कदम सिर्फ खिलाड़ियों के खिलाफ़ ही क्यों उठाया राजस्थान रॉयल्स के मालिक राज कुंद्रा और चेन्नई सुपर किंग्स से जुडे गुरुनाथ मय्यपन कैसे अभी तक कार्रवाई से बचे हुए हैं इस सवाल पर विजय लोकपल्ली कहते हैं यह तो एक पुलिस केस है. इनके ख़िलाफ पुलिस जांच चल रही है. पुलिस ने ख़िलाड़ियों के फोन कॉल्स की जांच की और उनसे गहन पूछताछ भी की. उन्होंने कहा रवि सवानी जाने-माने जांचकर्ता है. इससे पहले भी मैच फिक्सिंग के मामलों की उन्होंने जांच की है. बीसीसीआई ने अपने तौर पर जो जांच की थी उसके आधार पर उसने निर्णय लिया है. अब रही बात फ्रैंचाइज़ी के मालिकों की तो इस मामले में सब कुछ पुलिस जांच पर निर्भर करेगा कि वह कितनी अच्छी तरह अपने काम को अंज़ाम देती है. दूसरी तरफ प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं अगर खिलाड़ी इसमें शामिल हैं तो उन्हें ज़रूर सज़ा मिलनी चाहिए लेकिन क्या पुलिस ने जो सबूत टीम मालिकों के ख़िलाफ़ इक्कठे किए क्या बोर्ड ने वो सबूत उनसे लिए. उनके लिए इंतज़ार किया जा सकता है लेकिन खिलाड़ियों के लिए नहीं. दरअसल यह जल्दबाज़ी इसलिए दिखाई जा रही है क्योंकि यही मुद्दा उनकी तरफ भी आ रहा है. उन्होंने कहा सब लोग बस इस बात में उलझ जाएं कि देखों कितना अच्छा किया खिलाड़ियों को सज़ा दे दी और सबका ध्यान उनसे हट जाए. एक तरफ यह साफ-सुथरा आईपीएल चलाने की बात करते है लेकिन अगर ऐसे ही चलता रहा तो सफाई कहां से होगी क्योंकि खिलाड़ी भी तो उन्हीं अधिकारियों के प्रभाव में आएंगे जैसा अधिकारी चलाना चाहेंगे. वहीं बीसीसीआई द्वारा इन दिनों दक्षिण अफ्रीका पर बनाए जा रहे दबाव को लेकर प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं मुझे समझ में नहीं आता कि क्यों उसे भारत का दौरा छोटा रखने के लिए मजबूर किया जा रहा है. आखिरकार क्यों सचिन के 200वें मैच का इतना ज़िक्र हो रहा है. इससे अधिक महत्वपूर्ण था कि भारत दक्षिण अफ्रीका से कहता कि आप एक बड़ी सिरीज़ रखिए क्योंकि उसमें दिलचस्पी अधिक थी. उन्होंने कहा अब इसमें किसकी दिलचस्पी होगी कि वेस्टइंडीज जैसी कमज़ोर टीम भारत आकर खेले. अगर सचिन दक्षिण अफ्रीका में अपना 200वां मैच खेलते तो अच्छा होता. बीसीसीआई दक्षिण अफ्रीका के बोर्ड को समझाना चाहता है कि हारून लोगार्ट को आपने अपना मुख्य कार्यकारी क्यों बनाया अब हम आपको बताएंगे कि कैसे यह दौरा आपके अनुसार होगा जो सरासर गलत है इससे उसकी अपनी छवि खराब हुई है. |
| DATE: 2013-09-14 |
| LABEL: sports |
| [790] TITLE: फ़ीफ़ा वर्ल्ड कपः मेज़बानी छोड़ने पर क़तर राज़ी नहीं |
| CONTENT: गर्मी से बचने के लिए फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप-2022 स्थल को किसी और देश में स्थानांतरित किए जाने के फ़ीफ़ा के प्रस्ताव को क़तर वर्ल्ड कप आयोजन के मुखिया ने ख़ारिज कर दिया है. ग्रीष्म काल में पड़ने वाले इस वर्ल्ड कप को लेकर फ़ीफ़ा का कहना है कि क़तर की तपती गर्मी के कारण आयोजन में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. फ़ीफ़ा के अलावा फ़ुटबॉल एसोसिएशन और यूरोपियन क्लब एसोसिएशन भी स्थान बदलने की मांग कर रहे हैं. हालांकि प्रीमियर लीग ने तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार ही आयोजन किए जाने का समर्थन किया है. फ़ुटबॉल एसोसिएशन के चेयरमैन ग्रेग डाइक ने कहा है कि क़तर में खेल के लिए अनुकूल समय पर सहमति नहीं बनी तो टूर्नामेंट का स्थान बदलना पड़ सकता है. लेकिन क़तर 2022 वर्ल्ड कप के मुखिया हसन अल-थवादी कहना है कि क़तर से मेज़बानी छीनने का कोई कारण नहीं है जबकि यह पहले ही तय हो चुका है. उन्होंने बीबीसी को बताया कि दावेदारी को पुख्ता करने के लिए हमने बहुत मेहनत की है. क़तर में गर्मियों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है इसलिए फ़ीफ़ा अध्यक्ष सेप ब्लैटर 2022 वर्ल्ड कप को शरद ऋतु में ले जाने पर अड़े हुए हैं. ब्लैटर ने स्वीकार किया है कि टूर्नामेंट को क़तर में गर्मियों में आयोजित करने की सहमति देने में फ़ीफ़ा के प्रशासनिक निकाय द्वारा ग़लती हुई हो सकती है. क़तर 2022 सुप्रीम कमेटी के महासचिव अल थवादी ने कहा कि क़तर उत्तम जगह है मध्यपूर्व उत्तम जगह है. उन्होंने कहा कि हम मध्य पूर्व का प्रतिनिधत्व कर रहे हैं यह मध्य पूर्व वर्ल्ड कप है इसलिए यह सही जगह है. मध्य पूर्व एक बड़े टूर्नामेंट की मेज़बानी करने का अधिकारी है. बीबीसी से बातचीत में ग्रेग डाइक ने अगस्त में ही कहा था कि क़तर में ग्रीस्मकालीन वर्ल्ड कप असंभव है. दिसंबर 2010 में क़तर ने दक्षिण कोरिया जापान ऑस्ट्रेलिया और अमरीका को दौड़ में पछाड़ कर मेज़बानी हासिल की थी. |
| DATE: 2013-09-14 |
| LABEL: sports |
| [791] TITLE: स्पॉट फिक्सिंगः श्रीसंत और अंकित पर आजीवन पाबंदी |
| CONTENT: भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई ने इंडियन प्रीमीयर लीग आईपीएल में फ़िक्सिंग मामले में श्रीसंत और अंकित चव्हाण पर आजीवन पाबंदी लगाने का फ़ैसला किया है. दिल्ली में बीसीसीआई की अनुशासन समिति की बैठक में यह फ़ैसला किया गया. इस समिति में एन श्रीनिवासन अरुण जेटली और निरंजन शाह शामिल हैं. बैठक के बाद बीसीसीआई की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि अंकित चव्हाण और श्रीसंत पर आजीवन पाबंदी लगाई जा रही है. अमित सिंह पर पाँच साल की पाबंदी लगाई गई है जबकि सिद्धार्थ त्रिवेदी पर एक साल की पाबंदी लगाई गई है. सबूतों के अभाव में हरमीत सिंह के ख़िलाफ़ मामला बंद कर दिया गया है. बीसीसीआई की भ्रष्टाचार निरोधी इकाई के प्रमुख रवि सवानी ने इस मामले की जाँच की थी. बीसीसीआई की बैठक में सभी सबूतों और खिलाड़ियों की गवाही पर चर्चा करने के बाद ये फ़ैसला किया है. श्रीसंत अंकित चव्हाण और अजीत चंडीला को गत 16 मई को 16 सटोरियों समेत दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था. उन पर 420 और 120बी के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया गया था. आईपीएल-6 के दौरान स्पॉट फ़िक्सिंग का मामला उस समय सामने आया था जब राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों श्रीसंत अंकित चव्हाण और अजीत चंडीला को दिल्ली पुलिस ने गिरफ़्तार किया. उनके साथ-साथ कई सटोरियों को भी पुलिस ने गिरफ़्तार किया. इसके बाद मुंबई पुलिस ने चेन्नई सुपर किंग्स से जुड़े गुरुनाथ मेयप्पन और फिल्म कलाकार विंदू दारा सिंह को गिरफ़्तार किया. मेयप्पन बीसीसीआई प्रमुख एन श्रीनिवासन के दामाद हैं. फिर दिल्ली पुलिस ने राजस्थान रॉयल्स के मालिक राज कुंद्रा का भी नाम लिया. इस मामले में तीन खिलाड़ियों के साथ-साथ गिरफ़्तार किए गए गुरुनाथ मेयप्पन और विंदू दारा सिंह भी जेल से बाहर हैं. |
| DATE: 2013-09-13 |
| LABEL: sports |
| [792] TITLE: बीसीसीआई के पीछे भागना बंद करे पीसीबी: शोएब |
| CONTENT: पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर ने कहा है कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को भारत के साथ क्रिकेट संबंध सामान्य बनाने के लिए बीसीसीआई के पीछे दौड़ना छोड़ राष्ट्रीय टीम को विश्वस्तरीय बनाने पर ध्यान देना चाहिए. भारत सरकार ने चैंपियन लीग टी 20 टूर्नामेंट में भाग लेने जा रहे फ़ैसलाबाद वुल्फ़ के खिलाड़ियों के वीज़ा आवेदन को खारिज कर दिया था. उन्होंने कहा मैं इस बात पर हैरान नहीं हूँ कि भारत ने चैंपियंस लीग में खेलने के लिए फ़ैसलाबाद वुल्फ़ के खिलाड़ियों को वीजा नहीं दिया. वास्तव में जब तक सरकार से सरकार के स्तर पर हमारे सामान्य और दोस्ताना संबंध नहीं होंगे तब तक हम भारतीय क्रिकेट बोर्ड से सहयोग की उम्मीद कैसे कर सकते हैं. अख़्तर ने कहा मैंने हमेशा कहा है कि हमें हमेशा भारत के पीछे दौड़ने की जरूरत नहीं है और अलग-अलग मुद्दों पर भीख मांगना बंद कर देना चाहिए चाहे वह द्विपक्षीय क्रिकेट संबंधों की बहाली का मामला हो या अपने खिलाड़ियों को आईपीएल में खेलने देने का मामला हो या चैंपियन लीग में टीम भेजने का मामला. इस पूर्व तेज गेंदबाज ने कहा कि जब पाकिस्तान का मामला आता है तो आम तौर पर बीसीसीआई अपने सरकार की नीतियों का पालन करता है. शोएब ने एक टीवी चैनल से कहा हमे उनसे फैसलाबाद की टीम के लिए वीज़ा जारी करने की उम्मीद कभी नहीं करना चाहिए. जब उन्होंने हमें पहली बार आमंत्रित किया हमें कड़ा रुख अख्तियार कर धन्यवाद कहना चाहिए था. हम भारत की ओर कब एक बोर्ड या देश के रूप में अपने रूख में कुछ आत्मसम्मान और गौरव दिखाएंगे. अख्तर ने कहा कि यह वह समय है जब पीसीबी को राष्ट्रीय टीम को मजबूत बनाने के लिए प्रयास करने शुरु कर देने चाहिए. उन्होंने कहा हमें कितना घाटा होगा कुछ सौ या हज़ार डॉलर. लेकिन इस समय हमें भारत के पीछे भागना बंद कर देना चाहिए. हमें अपने बोर्ड को संवारने और अपने घरेलू क्रिकेट के बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने की जरूरत है. शोएब ने कहा हमें अपने क्रिकेट के ढांचे के निर्माण पर ध्यान देने और विश्वस्तरीय टीम बनाने की जरूरत है. जब हमारी टीम विश्वस्तरीय होगी तो हर कोई न केवल हमारे खिलाफ खेलना चाहेगा बल्कि हमारी शर्तों पर खेलेगा. |
| DATE: 2013-09-12 |
| LABEL: sports |
| [793] TITLE: सैफ़ कप: अफ़ग़ानिस्तान ने भारत को हराया |
| CONTENT: नेपाल में खेले गए सैफ़ फ़ुटबाल टूर्नामेंट के फ़ाइनल में अफ़ग़ानिस्तान ने गत चैंपियन भारत को 2-0 से हराकर ख़िताब अपने नाम कर लिया है. अफ़ग़ानिस्तान ने इस फ़ाइनल में मध्यांतर तक 1-0 की बढ़त बना ली थी. भारतीय टीम इस मैच में अपनी पूरी ताक़त के साथ मैदान में उतरी थी क्योंकि उसका हौसला बढ़ाने के लिए कप्तान सुनील क्षेत्री भी थे. इससे पहले मालदीव के साथ खेले गए सेमीफ़ाइनल में वह नहीं खेल सके थे क्योंकि वह दो पीले कार्ड देख चुके थे. अफ़ग़ानिस्तान की विश्व फ़ुटबाल रैंकिग 139वीं है जबकि भारत की फ़ीफ़ा रैंकिग 145वीं है. इस फ़ाइनल मुक़ाबले में अफ़ग़ानिस्तान की रक्षा पंक्ति ने शानदार खेल दिखाया दूसरी तरफ़ भारत के खिलाडियों ने गोल करने के अनेक सुनहरे अवसर गँवाए. यहां तक कि खेल के 60वें और 61वें मिनट में भारत ने दो मिनट में ही गोल करने के दो मौक़े खो दिए. सुनील क्षेत्री को पेनाल्टी एरिया में एक बेहतरीन पास मिला लेकिन उनकी कमज़ोर किक को अफ़ग़ानिस्तान के गोलकीपर ने आसानी से रोका जबकि इससे पहले किए गए हमले को भी गोलकीपर ने बख़ूबी बचाया. आक्रामक पंक्ति के भारतीय खिलाड़ी लगातार आगे बढ़कर खेल रहे थे जिसका फ़ायदा उठाते हुए अफ़ग़ानिस्तान ने एक कांउटर अटैक किया और अगले ही मिनट यानी कि 62वें मिनट में संजर एम अहमदी की मदद से गोल दाग़ दिया और 2-0 की महत्वपूर्ण बढ़त हासिल कर ली. इसके साथ ही अफ़ग़ानिस्तान ने पिछले सैफ़ कप फ़ाइनल में भारत से मिली हार का बदला भी चुका दिया. उल्लेखनीय है कि भारत ने अफ़ग़ानिस्तान को 4-0 से हराकर ख़िताब अपने नाम किया था. अफ़ग़ानिस्तान के लिए यह जीत बेहद महत्वपूर्ण रही क्योंकि उसने पहली बार चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया है. इस टूर्नामेंट में भारत का खेल किस क़दर निराशाजनक रहा इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उसने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ 1-0 से जीत हासिल की लेकिन इस जीत में भारत के किसी खिलाड़ी का योगदान नहीं था. दरअसल पाकिस्तानी खिलाड़ी ने ग़लती से अपनी ही टीम पर आत्मघाती गोल कर दिया था. इसके बाद भारत ने अपना अगला मैच बांग्लादेश से 1-1 से बराबरी पर समाप्त किया. मेज़बान नेपाल ने इसके बाद भारत को 2-1 से मात दी. किसी तरह से भारत सैफ़ कप के सेमीफ़ाइनल में पहुंचा तो ज़रुर लेकिन मालदीव से वह बमुश्किल 1-0 से जीत हासिल कर सका. इस टूर्नामेंट में अफ़ग़ानिस्तान नेपाल भारत बांग्लादेश पाकिस्तान मालदीव भूटान और श्रीलंका समेत आठ देशों ने भाग लिया. भारत का दबदबा इस टूर्नामेंट में अभी तक कितना रहा है इसका सबूत इस बात से मिलता है कि भारत ने इसे सबसे ज़्यादा छह बार जीता है. भारत 1993 1997 1999 2005 2009 और 2011 में चैंपियन रहा है. |
| DATE: 2013-09-12 |
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| [794] TITLE: भीड़ घेर लेती है, अच्छा लगता हैः शिखर धवन |
| CONTENT: दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में मंगलवार की शाम खास थी. तमाम खेल पत्रकार बेसब्री से भारत के इन दिनों सबसे कामयाब बल्लेबाज़ शिखर धवन के इंतज़ार में थे. इंतज़ार ख़त्म हुआ तो शिखर ने अपने ही अंदाज़ में सवालों के जवाब सहजता से देकर दिखा दिया कि पिच पर रनों का अंबार खड़ा करने वाला यह बल्लेबाज़ मीडिया के बाउंसर भी आसानी से खेल सकता है. शिखर से कहा गया कि पहले आपके लिए इतने खेल पत्रकार जमा नहीं होते थे. शिखर का जवाब था बेहद फ़र्क आया है. अब मैं जहां भी जाता हूं भीड़ लग जाती है. पहले मैं थोड़ा सहज रहता था कम लोग पहचानते थे. मैं चैन से खा-पी लेता था. एक ठहाका और फिर मूंछों पर ताव. जब छोटा था तब यही सोचता था कि काश ऐसा दिन मेरे लिए भी आए अब बहुत अच्छा लग रहा है. जब कोई बेहतरीन क्रिकेट खेलता है तो सोचता है कि उसे भी सम्मान मिले. मैं बहुत शुक्रगुज़ार हूं अपने चाहने वालों का जो मुझसे मिलकर मेरे लिए दुआंए देते हैं. इन दिनों अपने शरीर पर बने टैटू और अपनी मूंछों को लेकर उनका कहना है कि टैटू उन्हें पहले से पसंद है. शिखर कहते हैं मैदान पर मैं जिस मस्ती से खेलता हूं शायद उसे देखकर मेरे साथी मुझे गब्बर कहते हैं. एक और सवाल- श्रीलंका के कुमार संगकारा आईपीएल में हैदराबाद सनराइज़र्स के कप्तान थे और शिखर धवन टीम के खिलाड़ी. अब चैंपियंस लीग में संगकारा के ख़िलाफ़ खेलना उन्हें कैसा लगेगाशिखर कहते हैं हम अब उन्हें जल्दी आउट करने की कोशिश करेंगे. एक बार फिर हल्की सी हंसी. शिखर आगे कहते हैं इस बात में कोई शक नहीं कि संगकारा दुनिया के सबसे अच्छे बल्लेबाज़ों में से एक हैं तो उनकी कमी तो खलेगी ही. भारत को अब विदेशी पिचों पर अधिक खेलना है जिसमें दक्षिण अफ्रीकी दौरा तो है ही साथ ही इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड सीरीज़ भी है. विदेशी पिचों को लेकर शिखर का कहना था कि भारतीय क्रिकेट टीम ने पिछले दिनों चैंपियंस ट्रॉफी जीती. उसके बाद वेस्टइंडीज़ में त्रिकोणीय एकदिवसीय सीरीज़ और फिर ज़िम्बाब्वे को भी एकतरफा हराया. इससे भारतीय टीम का मनोबल बढ़ा है और यह संदेश भी गया कि यह टीम अब विदेशों में भी बेहतर करने की क्षमता रखती है. वैसे भी इन दिनों भारतीय टीम ने बल्लेबाज़ी फील्डिंग और यहां तक कि गेंदबाज़ी में भी शानदार प्रदर्शन किया है. जब टीम बाहर जीतकर घर आती है तो एक अलग अहसास होता है. विदेशों में अच्छा खेलने की बात करना और वाकई जीतने में काफी फ़र्क है. हँसी-हँसी में ही शिखर से सवाल हुआ कि आप महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली में किसे बेहतर कप्तान मानते हैं इस सवाल पर शिखर थोड़ा चकराते दिखे लेकिन फिर कहा धोनी भाई तो इतने साल से कामयाब कप्तान हैं. उन्होंने इतनी सारी ट्रॉफी जीती हैं. वह तो दुनिया के सबसे अच्छे कप्तानों में से एक है. विराट कोहली अभी एक युवा कप्तान है धोनी से उनकी तुलना ठीक नहीं है लेकिन विराट भी अपने स्तर पर अच्छे कप्तान हैं. अब एकदिवसीय मैच में क्या कोई बल्लेबाज़ तिहरा शतक भी बना सकता है अब ऐसा सवाल उठा तो कोई अचरज नहीं हुआ क्योंकि शिखर ने पिछले दिनों दक्षिण अफ्रीका ए के खिलाफ 248 रनों की पारी खेली थी. इसके जवाब में शिखर कहते हैं अगर तीन सौ रन बनाने का सपना देखेंगे तो ज़रूर संभव है. मैंने ख़ुद कभी अपने लिए सपना देखा था कि मैं वन-डे में 200 रन बना सकता हूं क्योंकि मेरे पास ऐसे शॉट्स हैं. मेरा खेल ऐसा है. मैंने 200 रन ज़रूर बनाए लेकिन ऐसा नहीं सोचा था कि 248 रन बना पाऊंगा. सब मालिक की मेहर है. |
| DATE: 2013-09-11 |
| LABEL: sports |
| [795] TITLE: थॉमस बाक आईओसी के नए अध्यक्ष बनाए गए |
| CONTENT: अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के अध्यक्ष पद के लिए कुल छह उम्मीदवार दौड़ में थे लेकिन जर्मनी के थॉमस बाक उनमें सबसे ज़्यादा लोकप्रिय साबित हुए. मौजूदा अध्यक्ष 71 वर्षीय जैक्स रोग 12 साल के बाद आईओसी के अध्यक्ष पद से हट रहे हैं. बाक आठ साल तक के लिए आईओसी के अध्यक्ष बनाए गए हैं और उसके बाद उन्हें चार साल तक के लिए दोबारा अध्यक्ष बनाया जा सकता है. अध्यक्ष चुने जाने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में बाक ने उन्हें वोट देने वाले सभी लोगों का शुक्रिया अदा करते हुए कहा ये मुझ पर भरोसा करने का एक ज़बर्दस्त मिसाल है. मुझे आईओसी के अध्यक्ष होने की ज़िम्मेदारी का पूरा एहसास है. बाक ने आगे कहा कि वे अनेकता में एकता के अपने सिद्धांत के सहारे इस संस्था की अगुवाई करना चाहेंगे और इस बात का पूरा ध्यान रखेंगे कि ओलंपिक आंदोलन से जुड़े सभी भागीदारियों के हितों का ख़्याल रखा जाए. आईओसी के 119 साल के इतिहास में बाक नौवें अध्यक्ष हैं. बाक साल 2006 से अब तक आईओसी कार्यकारिणी बोर्ड के उपाध्यक्ष रहे हैं. इससे पहले वो 2000 से 2004 तक भी बोर्ड के उपाध्यक्ष रहे थे. पहली बार 1996 में वो आईओसी कार्यकारिणी बोर्ड के सदस्य चुने गए थे. इस पद की दौड़ में सिंगापुर के सेर मियांग ताइवान के वु चिंग कु प्युर्टो रिको के रिचर्ड कैरियन यूक्रेन सर्गे बुब्का स्विट्ज़रलैंड के डेनिस ऑसवाल्ड शामिल थे. अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग संघ के अध्यक्ष वु चिंग पहले ही दौर में बाहर हो गए थे इस तरह फ़ाइनल राउंड में केवल पांच ही दावेदार रह गए थे. वोट डाले जाने से पहले बाक ने कहा था कि अगर वे आईओसी के अध्यक्ष चुन लिए जाते हैं तो उनकी पहली प्राथमिकता 2014 विंटर गेम्स को सुचारू रूप से करवाना होगा क्योंकि ये आयोजन देरी बढ़ते बजट और वहां के मौसम को लेकर जताई जा रही चिंताओं का शिकार रहा है. |
| DATE: 2013-09-10 |
| LABEL: sports |
| [796] TITLE: अब पुजारा की कप्तानी में खेलेंगे सहवाग-गंभीर |
| CONTENT: इस समय राष्ट्रीय टीम में आने के लिए हाथ-पाँव मार रहे एक समय के धाकड़ सलामी बल्लेबाज़ वीरेंदर सहवाग और गौतम गंभीर को वेस्टइंडीज़ ए के ख़िलाफ़ चार दिवसीय मैचों के लिए भारत ए टीम में जगह दी गई है. लेकिन इन दोनों वरिष्ठ खिलाड़ियों को कप्तानी के लायक नहीं समझा गया है. टीम की कमान अपेक्षाकृत कम अनुभवी खिलाड़ी चेतेश्वर पुजारा को सौंपी गई है. टीम में एक भारतीय टीम की तेज़ गेंदबाज़ी का नेतृत्व करने वाले खिलाड़ी ज़हीर ख़ान भी हैं. वीरेंदर सहवाग और गौतम गंभीर को भारत ए की टीम में दूसरे और तीसरे चार दिवसीय मैच के लिए जगह मिली है. वीरेंदर सहवाग ने इस साल मार्च में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ टेस्ट खेला था लेकिन उसके बाद उन्हें टीम में जगह मिली. जबकि इसी साल जनवरी में उन्होंने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कोलकाता में वनडे खेला था और फिर वे कोई वनडे मैच नहीं खेल पाए हैं. गौतम गंभीर ने तो आख़िरी टेस्ट पिछले साल दिसंबर में खेला था जबकि जनवरी में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ धर्मशाला में हुए वनडे के बाद से वे कोई वनडे नहीं खेल पाए हैं. जबकि वेस्टइंडीज़ ए के ख़िलाफ़ एक दिवसीय मैचों के लिए भारत ए की कप्तानी युवराज सिंह को सौंपी गई है. युवराज को भी लंबे समय से भारतीय टीम में जगह नहीं मिल पाई है. विशाखापट्टनम में चयन समिति की बैठक में वेस्टइंडीज़ ए के ख़िलाफ़ एक दिवसीय ट्वेन्टी-20 और चार दिवसीय मैचों के लिए टीम का ऐलान किया गया है. साथ ही एनकेपी साल्वे चैलेंजर ट्रॉफ़ी के लिए इंडिया रेड और इंडिया ब्लू टीम का भी ऐलान किया गया है. चैलेंजर ट्रॉफ़ी के लिए इंडिया रेड की कमान इरफ़ान पठान के पास रहेगी जबकि इंडिया ब्लू की कप्तानी युवराज सिंह करेंगे. |
| DATE: 2013-09-10 |
| LABEL: sports |
| [797] TITLE: नडाल ने दूसरी बार जीता यूएस ओपन |
| CONTENT: स्पेन के राफ़ेल नडाल ने दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी नोवाक जोकोविच को हराकर दूसरी बार यूएस ओपन का ख़िताब जीत लिया है. विश्व के दूसरे नंबर के खिलाड़ी नडाल ने सर्बिया के जोकोविच को 6-2 3-6 6-4 और 6-1 से हराकर अपना 13वां ग्रैंड स्लैम जीता. नडाल सर्वाधिक ग्रैंड स्लैम जीतने के मामले में स्विटजरलैंड के रॉजर फेडरर 17 और अमरीका के पीट सम्प्रास 13 के बाद तीसरे नंबर पर हैं. ऑस्ट्रेलियन ओपन चैंपियन जोकोविच ने पहला सेट हारने के बाद दूसरा सेट जीतकर 1-1 से बराबरी की लेकिन फिर वो अगले दोनों सेट हार गए. नडाल ने तीन घंटे 41 मिनट में मुकाबला निपटा दिया. स्पेनी खिलाड़ी ने इससे पहले 2010 में यूएस ओपन ख़िताब जीता था लेकिन 2011 में वह फ़ाइनल में जोकोविच से हार गए थे. नडाल का इस सत्र में यह दूसरा ग्रैंड स्लैम है. इससे पहले उन्होंने जून में रिकॉर्ड आठवीं बार फ्रेंच ओपन जीता था. वह घुटने की चोट के कारण क़रीब सात महीने टेनिस कोर्ट से बाहर रहे थे लेकिन गत फरवरी में वापसी करने के बाद से ही वह जबर्दस्त फॉर्म में खेल रहे हैं. नडाल ने इस सत्र में 60 मैच जीते हैं जबकि केवल तीन हारे हैं. उन्होंने इस सत्र में कुल दस ख़िताब जीते हैं. इस जीत के साथ ही उन्होंने फिर से दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी बनने के लिए जोकोविच से दूरी कम कर ली है. 27 साल के नडाल को इस जीत से 36 लाख डॉलर की इनामी राशि मिली. नडाल और जोकोविच के बीच यह 37वां मैच था. इनमें से नडाल को 22 में जीत मिली है जबकि 15 जोकोविच ने जीते हैं. जोकोविच लगातार चौथी बार यूएस ओपन के फ़ाइनल में पहुंचे थे. इस साल जोकोविच ने चौथी बार ऑस्ट्रेलियन ओपन जीता था लेकिन फिर उन्हें फ्रेंच ओपन के सेमीफ़ाइनल में नडाल के हाथों और फिर विंबलडन के फ़ाइनल में एंडी मरे के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा था. |
| DATE: 2013-09-10 |
| LABEL: sports |
| [798] TITLE: आख़िर टोकियो ने कैसे मारी बाज़ी? |
| CONTENT: टोकियो ने आख़िरकार इस्तानबुल को आसानी के पछाड़ते हुए 2020 ओलंपिक की मेजबानी हासिल कर ली. जापान की राजधानी को दूसरे दौर में 60 वोट मिले जबकि इस्तानबुल 36 वोट ही ले पाया. लेकिन चार साल पहले मामला बिल्कुल अलग था. तब टोकियो ने 2016 ओलंपिक की मेजबानी के लिए अपना दावा पेश किया था मगर उसे दूसरे दौर में महज 20 वोट मिले थे और वह ब्राज़ील को शहर रियो डी जनेरो से हार गया था. टोकियो ने पिछले अनुभव से सबक लेते हुए इस बार पूरी तैयारी के साथ अपना दावा पेश किया. उसकी समझ में आ गया था कि तकनीकी रूप से सुदृढ़ बोली लगाना ही काफी नहीं है बल्कि आपको दूसरों को प्रेरित भी करना होता है. शनिवार रात टोकियो की प्रस्तुति अपने इस मकसद को पूरा किया. इसमें न केवल आर्थिक और राजनीतिक ताक़त पर ज़ोर दिया गया था बल्कि खेलों के लिए एक व्यापक योजना का भी उल्लेख किया गया था. जापान के राजकुमार हिसाको की म़ौजूदगी ने अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के सदस्यों को प्रेरित किया लेकिन टोकियो की जीत से असली नायक रहे प्रधानमंत्री शिंजो आबे. फुकुशिमा परमाणु संयंत्र से रेडियोधर्मी जल के रिसाव का मुद्दा टोकियो की राह को रोड़ा बन सकता था लेकिन आबे ने अपनी गरिमामयी भाषण से आईओसी के सदस्यों को मंत्रमुग्ध कर दिया. उन्होंने कहा कि फुकुशिमा में स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है. उनके इस ऐलान ने टोकियो पर से संदेह के बादलों को हटा दिया. इसमें कोई संदेह नहीं है कि सॉची और रियो के अनुभवों को देखते हुए आईओसी कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थी. आईओसी के मूल्यांकन आयोग द्वारा जून में किए गए तकनीकी आकलन में टोकियो की दावेदारी को नंबर वन रखा गया था. जापान के स्थापित स्पोर्ट्स और मीडिया मार्केट ने भी टोकियो के पक्ष में काम किया और इससे इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि टोकियो कैसे सबसे पसंदीदा विकल्प बना. कुवैत के शाही घराने से ताल्लुक रखने वाले शेख अहमद अल फहद अल सबाह का समर्थन भी टोकियो के काम आया. अल सबाह 1992 से आईओसी का सदस्य होने के साथ-साथ शक्तिशाली एसोसिएशन ऑफ़ नेशनल ओलंपिक कमेटीज़ और एशिया ओलंपिक परिषद के अध्यक्ष हैं. माना जा रहा है कि आईओसी में उनका रुतबा लगातार बढ़ता जा रहा है और उनके समर्थन के कारण ही जर्मनी के थॉमस बाख को मंगलवार को होने वाले आईओसी अध्यक्ष चुनाव में जीत का दावेदार माना जा रहा है. अल सबाह टोकियो की जीत की खुशी में ब्यूनस आयर्स के शेरेटन होटल में हुई पार्टी में शामिल थे. टोकियो की जीत का एक कारण मेड्रिड की नाकामी भी रही. मेड्रिड आईओसी सदस्यों को यह समझाने में नाकाम रहा कि स्पेन की अर्थव्यवस्था ओलंपिक का खर्च वहन करने की स्थिति में है. यूरोजोन संकट के कारण स्पेन पर भारी क़र्ज चढ़ा हुआ है. मेड्रिड ने ओलंपिक का बजट घटाकर दो अरब डॉलर कर दिया था लेकिन यह शहर आईओसी को नहीं लुभा पाया. मेड्रिड को इस बात का भी नुकसान हुआ क्योंकि 2024 ओलंपिक के लिए यूरोप के कई शहर मेजबानी पाने की होड़ में हैं. इनमें पेरिस और रोम सबसे आगे हैं. ऐसे में यूरोप से आने वाले कई सदस्यों ने अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए मेड्रिड से किनारा कर लिया. जहां तक तुर्की के शहर इस्तानबुल का सवाल है तो हाल के दिनों में हुए विरोध प्रदर्शनों और डोपिंग के कारण उसकी दावेदारी को झटका लगा. तु्र्की की दलील थी कि उसे ओलंपिक की मेजबानी मिलने से दो महाद्वीपों यूरोप और एशिया का मिलन होगा. लेकिन उसे दोनों तरफ का पर्याप्त समर्थन नहीं मिला. |
| DATE: 2013-09-10 |
| LABEL: sports |
| [799] TITLE: पापा का फ़ोन आया कि अभी और ग्रैंड स्लैम जीतने हैं: पेस |
| CONTENT: भारतीय टेनिस खलाड़ी लिएंडर पेस और चेक गणराज्य के राडेक स्टेपानेक की जोड़ी ने रविवार रात यूएस ओपन के मेंस डबल्स का ख़िताब अपने नाम कर लिया. पेस का यह डबल्स का आठवाँ ग्रैंड स्लैम ख़िताब था. इसके साथ ही वे 40 साल की उम्र में पुरुष डबल्स का ख़िताब जीतने वाले पहले खिलाड़ी बन गए. इस जीत के बाद उन्होंने बीबीसी से बातचीत की. आर्थर एश स्टेडियम में बहुत से भारतीयों के बीच फ़ाइनल मैच कैसा रहाआर्थर एश स्टेडियम का माहौल बहुत ही बढ़िया था. न्यूयॉर्क में बहुत से भारतीय रहते हैं. हमारा मैच देखने के लिए और हमारे समर्थन के लिए सब आए हुए थे. इसके लिए मैं सबका धन्यवाद करता हूँ. यह मेरा 31 वहाँ ग्रैंड स्लैम फ़ाइनल था और 14वीं बार मैं जीता हूं. इसके लिए मैं अपने पार्टनर राडेक स्टेपानेक को भी धन्यवाद कहना चाहता हूँ. उसने पूरे हफ़्ते काफ़ी मेहनत की. उसने हर दिन डबल्स की रणनीति पर ध्यान दिया. वह आज बहुत अच्छा खेले. सेमीफ़ाइनल में ब्रायन ब्रदर को हराने के बाद फ़ाइनल खेलने जब आप कोर्ट पर गए तो आपको कैसा महसूस हो रहा था सच बताऊं तो मुझे और राडेक स्टेपानेक को पता था कि सेमीफ़ाइनल ही हमारे लिए फ़ाइनल था. सेमीफ़ाइनल से पहले हमने ड्रॉ देखा था. उसके बाद हमें लगा था कि हममें और ब्रायन ब्रदर्स में से जो जीतेगा वह फ़ाइनल जीत जाएगा. हमारे खेल में जीत-हार का अंतर काफी कम होता है. कभी-कभी एक प्वाइंट तो कभी-कभी एक शॉट. इसलिए हम दावे से तो कुछ नहीं कह सकते. मगर ब्रायन ब्रदर्स को हराकर हमें लग गया था कि फ़ाइनल के लिए हम फेवरेट हैं. सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल के बीच में दो दिन का अंतर था. इस दौरान हमने अच्छी तैयारी की. आज सुबह जब मैं उठा तो लगा कि आज का दिन अच्छा होगा. स्कोर बोर्ड से भी यह पता चलता है. हमने मैच 6-1 6-3 से जीता है. हम जिनके ख़िलाफ़ खेले वे बहुत अच्छे और मशहूर खिलाड़ी हैं. मुझे एलेक्ज़ैंडर पेया को पीठ में लगी चोट का थोड़ा दुख तो है लेकिन यह हमारे प्रोफ़ेशन की आम बात है. हमें अपने शरीर पर काफ़ी मेहनत करनी पड़ती है. 40 साल की उम्र में शरीर और एकाग्रता बनाए रखने के लिए काफ़ी मेहनत करनी पड़ती है. इस जीत से मैं काफ़ी ख़ुश हूँ. कहा जाता है कि डबल्स ख़ासकर पुरुष डबल्स में आपका जादू चलता है. इसकी शुरुआत कैसे हुईइसकी शुरुआत कलकत्ता के एक छोटे से घर से हुई. हमारे माता-पिता ने बचपन से अब तक मेरी पर्सनेलिटी निखारने में काफ़ी मेहनत की. मेरी दो बड़ी बहनों ने भी काफ़ी मेहनत की. इसके लिए मैं उन दोनों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं. मेरा परिवार मेरे पीछे है. वे मुझे बहुत सपोर्ट करते हैं प्यार करते हैं. इसी समर्थन और प्यार के साथ मैं दुनिया भर में अपने देश और झंडे के लिए खेलता हूँ. यह सबसे बड़ी बात है. ओलंपिक में काफी कठिन समय था. जो भी हुआ वह मुझे अच्छा नहीं लगा. आज का दिन हमारे लिए काफी अच्छा रहा. उम्मीद करता हूं कि आने वाले सालों में मैं और कड़ी मेहनत करूंगा और और ग्रैंड स्लैम जीतूंगा. चालीस साल की उम्र में डबल्स का खिताब जीतने वाला पहला खिलाड़ी बनने के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई. आगे खेलने के लिए आपकी क्या योजनाएं हैं यह अलग तरह का अनुभव होगा जिसकी मिसाल पहले नहीं मिलती है आज ही मेरे पिता जी ने टेलीफ़ोन कर ग्रैंड स्लैम जीतने की बधाई दी है. उन्होंने कहा है कि कल से ही मेहनत शुरू कर दो. यह सुनकर राडेक स्टेपानेक ने कहा कि पापा आपके बेटे ने अभी आज ही ग्रैंड स्लैम जीता है. 31 ग्रैंड स्लैम के फ़ाइनल में पहुँच चुका है. इसे कम से कम एक दिन का तो आराम दे दें. इस पर पिता जी ने कहा कि नहीं उसे और ग्रैंड स्लैम जीतना है. मेरा परिवार मुझे बहुत सहयोग करता है. मुझे हमेशा ट्रैक पर रखता है. यह बहुत अच्छी बात है. मैं अपनी बेटी अयाना को भी सिखाता हूं कि जीवन में जो भी काम करो पूरा दिल लगा कर करो. पूरे पैशन के साथ करो. मेरे पिता जी ने मुझे यही सिखाया है और मैं अपनी बेटी को भी यही सिखाता हूँ. |
| DATE: 2013-09-09 |
| LABEL: sports |
| [800] TITLE: सरीना ने पांचवीं बार जीता यूएस ओपन |
| CONTENT: दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी अमरीका की सरीना विलियम्स ने बेलारूस की विक्टोरिया अज़ारेंका को हराकर पांचवीं बार यूएस ओपन का ख़िताब जीत लिया है. इकत्तीस साल की सरीना ने दूसरी सीड अज़ारेंका की कड़ी चुनौती और तेज़ हवाओं पर दो घंटे 45 मिनट में काबू पाते हुए 7-5 6-7 6-8 6-1 से जीत दर्ज की. सरीना का यह 17वां ग्रैंड स्लैम ख़िताब है और वह मार्टिना नवरातिलोवा और क्रिस एवर्ट के रिकॉर्ड की बराबरी से सिर्फ़ एक कदम दूर हैं. सरीना ने पहला सेट जीतने के बाद दूसरे सेट में दो बार अज़ारेंका की सर्विस तोड़ी लेकिन बेलारूसी खिलाड़ी इसे टाईब्रेक में जीतकर 1-1 से बराबर करने में सफल रहीं. आखिरकार निर्णायक सेट में सरीना ने अज़ारेंका को हावी होने का कोई मौक़ा नहीं दिया और केवल एक गेम ही जीतने दिया. चौबीस साल की अज़ारेंका को पिछली बार भी फ़ाइनल में सरीना के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा था. उन्होंने इस सत्र में दो बार सरीना को हराया था और उन्हें विश्वास था कि इस बार वह पिछले साल की पुनरावृत्ति नहीं होने देंगी. मगर सरीना ने इस बार भी अज़ारेंका की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. अमरीकी खिलाड़ी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए पहले ही गेम में क्रॉस कोर्ट शॉट लगाकर अज़ारेंका की सर्विस भंग कर दी लेकिन इसके बाद उन्होंने कुछ गलतियां कीं और लाभ की स्थिति गंवा दी. अज़ारेंका ने आर्थर ऐश स्टेडियम में बह रही तेज़ हवाओं में सहज खेल दिखाया और ज़ोरदार सर्विस की. दूसरी तरफ सरीना को संघर्ष करना पड़ा और उनकी स्कर्ट भी ऐसी परिस्थितियों के लिए नहीं बनी थी. सरीना जब 4-5 के स्कोर पर सर्विस कर रहीं थीं तो उन्होंने डबल फ़ॉल्ट किया और फिर फ़ुट फ़ॉल्ट भी कर बैठीं. मगर उन्होंने अपने विशाल अनुभव का फ़ायदा उठाते हुए पहला सेट 58 मिनट में अपने नाम कर दिया. अमरीकी खिलाड़ी ने फिर दूसरे सेट में दो बार अज़ारेंका की सर्विस तोड़कर 4-1 की बढ़त बनाई लेकिन फिर उन्होंने ग़लती पर ग़लती करते हुए इसे टाईब्रेक में गंवा दिया. निर्णायक सेट में सरीना ने ग़ज़ब का खेल दिखाते हुए अज़ारेंका को ध्वस्त कर दिया. सरीना ने मैच में सातवीं बार अज़ारेंका की सर्विस भंग करने के बाद फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. पहले मैच अंक पर सरीना गेंद को नेट पर खेल बैठीं लेकिन फिर जैसे ही अज़ारेंका का बैकहैंड शॉट बेसलाइन से बाहर जाकर गिरा सरीना जीत की खुशी से उछल पड़ीं. |
| DATE: 2013-09-09 |
| LABEL: sports |
| [801] TITLE: लिएंडर पेस ने फिर जीता यूएस ओपन युगल ख़िताब |
| CONTENT: भारतीय टेनिस खलाड़ी लिएंडर पेस और राडेक स्टेपानेक की जोड़ी ने यूएस ओपन ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिता का युगल खिताब जीत लिया है. फ़ाइनल मुक़ाबले में चौथी वरीयता प्राप्त पेस-स्टेपानेक की जोड़ी ने प्रतियोगिता में दूसरे नंबर की युगल जोड़ी ऐलेक्ज़ांडर पेया और ब्रूनो सोआरेस को सीधे सेटों में 6-1 6-3 से मात दी. रविवार को आर्थर ऐश स्टेडियम में पहले सेट में ही डबल्स के अनुभवी खिलाड़ी लिएंडर पेस और उनके जोड़ीदार ने दो बार सर्विस ब्रेक के साथ 5-0 की बढ़त ले ली और एक गेम गंवाने के बाद सेट 6-1 से जीत लिया. पेस और राडेक स्टेपानेक की जोड़ी ने दूसरे सेट में भी अच्छी शुरूआत करते हुए पहले गेम में ही सर्विस ब्रेक कर 3-1 से बढ़त बनाई. दूसरे सेट में अलेक्ज़ेंडर पेया को चोट लगने के कारण थोड़ी देर तक कोर्ट पर ही चिकित्सा दी गई. जब खेल फिर शुरू हुआ तो पेया ने ही सर्विस जारी ऱखी और गेम जीता लेकिन पेस और स्टेपानेक 3-2 से बढ़त लिए हुए थे. फिर पेस ने सर्विस होल्ड की और स्कोर 4-2 कर लिया. इस मौके पर मैच का रूख साफ़ तौर पर पेस और स्टेपानेक के हक में जाता दिख रहा था. जहां पेस और स्टेपानेक अच्छे खेल का प्रदर्शन कर रहे थे वहीं ब्रूनो सोआरेस ने अपनी सर्विस के दौरान सात डबल फ़ॉल्ट्स किए. करीब एक घंटा 10 मिनट चले मैच में पेस और स्टेपानेक की जोड़ी ने 6-3 से दूसरा सेट जीत कर मैंच अपने नाम किया. अपने करियर का 20वां यूएस ओपन खेलते हुए पेस ने धुंआधार सर्विस के साथ साथ ओवरबेड और नेट्स पर भी अच्छे शॉट्स लगाए. मिक्सड डबल्स में लिएंडर पेस की पूर्व जोड़ीदार मार्टिना नवरातिलोवा ने ट्विटर पर लिएंडर पेस को बधाई दी है. नवरातिलोवा ने लिखा है यूएस ओपन जीतने के लिए मेरे दोस्त लिएंडर पेस को बधाई. वहीं स्टेडियम में मौजूद कई भारतीय दर्शकों ने अपनी खुशी का इज़हार किया. एक दर्शक ने कहा हम बहुत ही खुश हैं पेस की जीत पर. पेस को देखकर ऐसा लगता है कि यह टेनिस के सचिन तेंदुलकर हैं. और हम सब इनके लिए दुआ कर रहे थे. पेस हमारे देश का गौरव हैं. एक अन्य दर्शक ने कहा यहां अमरीका में हमारे भारत का कोई खिलाड़ी जीता है हमें तो बहुत गर्व हो रहा है. हम तो भारत का तिरंगा झंडा वगैरह सब लाए थे लेकिन स्टेडियम में लाने नहीं दिया गया. हम तो पेस की शानदार जीत से बेहद खुश हैं. लिएंडर पेस ने यूएस ओपन में पुरूषों के डबल्स मुकाबले में तीसरी बार खिताब जीता है. इससे पहले पेस और स्टेपानेक की जोड़ी ने 2012 में ऑस्ट्रेलियन ओपन का खिताब भी जीता था. लिएंडर पेस ने अब तक अपने करियर में आठ डबल्स और छह मिक्सड डबल्स ग्रैंड स्लैम खिताब जीत लिए हैं. |
| DATE: 2013-09-09 |
| LABEL: sports |
| [802] TITLE: 2020 ओलंपिक में बरक़रार कुश्ती का खेल |
| CONTENT: 2020 ओलंपिक खेलों में कुश्ती का खेल बरकरार रहेगा. रविवार को ब्यूनस आयरस में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति यानि आईओसी के सदस्यों ने गुप्त मतदान में बेसबॉलसॉफ्टबॉल और स्क्वॉश से पहले कुश्ती को चुना. हालांकि पहले कुश्ती 2020 खेलों की सूची में थी लेकिन इस साल फ़रवरी में आईओसी द्वारा सभी 26 ओलंपिक खेलों की समीक्षा के बाद इसे 2020 ओलंपिक शेड्यूल से हटा दिया गया था. इस साल के शुरु में आईओसी के फैसले से 2016 रियो खेलों के बाद इसका ओलंपिक सफर ख़त्म हो रहा था. फरवरी में ओलंपिक सूची से हटाए जाने के बाद कुश्ती की अंतरराष्ट्रीय संस्था ने इसमें कई बदलाव किए. अंतरराष्ट्रीय कुश्ती संघ फिला के अध्यक्ष नेनाद लालोविच के नेतृत्व में खेल के नियमों प्रबंधन संयोजन में बड़े सुधार किए गए. 2020 ओलंपिक में नए खेल को शामिल करने के लिए हुए मतदान में कुश्ती को पहले ही दौर में बहुमत मिल गया. कुश्ती को आइओसी सदस्यों के 95 में से 49 वोट मिले जबकि बेसबॉलसॉफ्टबॉल के हिस्से में 24 और स्क्वॉश के हिस्से में 22 वोट आए. मतदान के बाद नेनाद लालोविच ने कहा कि आईओसी को अपने फैसले पर अफ़सोस नहीं होगा. उन्होंने कहा इस वोट से आपने दिखा दिया है कि अपने खेल को सुधारने के लिए हमने जो कदम उठाए उनसे फर्क पड़ा है. कुश्ती का खेल प्राचीन ओलंपिक खेलों का हिस्सा था. एथेंस में 1896 में पहले आधुनिक ओलंपिक खेलों में भी ये खेल शामिल किया गया था. साल 1900 में पेरिस के अलावा कुश्ती ओलंपिक खेलों के हर संस्करण का हिस्सा रहा. लंदन 2012 में कुश्ती में 11 मेडलों के लिए 344 खिलाड़ियों ने भाग लिया. भारत के लिए कुश्ती में सबसे पहले 1952 हेलसिंकी ओलंपिक में खशाब जाधव ने कांस्य पदक जीता था. इसके बाद सुशील कुमार ने 2008 बीजिंग ओलंपिक में कांस्य और 2012 में रजत जीता और 2012 में ही योगेश्वर दत्त ने कांस्य पदक जीता. समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में सुशील कुमार ने इस फैसले को कुश्ती के लिए बेहतरीन ख़बर बताया. सुशील ने कहा इस फैसले से युवा कुश्ती खेलने के लिए प्रेरित होंगे. इससे भारतीय पहलवानों का भविष्य भी सुरक्षित हुआ है जिनका मकसद ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करना है. भविष्य में हमें ओलंपिक में ज़रूर कई पदक मिलेंगे. बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में योगेश्वर दत्त ने अपनी ख़ुशी ज़ाहिर की और कहा कि भारतीय पहलवान 2020 में पदक जीतने की पूरी तैयारी करेंगे. आईओसी के फ़ैसले पर योगेश्वर दत्त ने कहा हमें पूरी उम्मीद थी कि कुश्ती रहेगा क्योंकि कुश्ती इतना पुराना खेल है और इसे इतने सारे देश खेलते हैं इसलिए कुश्ती के निकलने का सवाल ही नहीं था. लेकिन फिर भी कहीं थोड़ा सा डर भी था कि अगर कुछ ग़लत हो गया तो क्या होगा. वह ये भी मानते हैं कि खेल में हाल में किए गए सुधारों और 2020 खेलों की मेज़बानी टोकियो को मिलने का भी फायदा कुश्ती को मिला क्योंकि जापान को कुश्ती में काफ़ी पदक मिलते हैं. वहीं सुशील कुमार के गुरु और एशियन गेम्स के पदक विजेता गुरु सतपाल ने आईओसी के फैसले को कुश्ती के बड़ी जीत बताया है. वे कहते हैं कि जैसे ही टोकियो को ओलंपिक मेज़बानी मिलने की बात पता चली तभी हौसला बढ़ गया था कि कुश्ती को शामिल किया गया है. उन्होंने कहा भारत के लिए ये बहुत बड़ी कामयाबी है क्योंकि कुश्ती ही अकेला खेल है जिसमें भारत को चार व्यक्तिगत पदक मिले हैं इसलिए कुश्ती का ओलंपिक में रहना बहुत ज़रूरी था. हालांकि नियमों में बदलाव से भारत को नुकसान होगा लेकिन फिर भी हमारे पहलवान पदक जीतने के लिए पूरी तैयारी करेंगे. भारत के पूर्व खेल मंत्री और कांग्रेस महासचिव अजय माकन ने ट्विटर पर लिखा है कुश्ती को ओलंपिक खेलों का हिस्सा होना ही था. भारत में कुश्ती के प्रतिभाशाली खिलाड़ी हैं. इससे हमें फायदा होगा. |
| DATE: 2013-09-08 |
| LABEL: sports |
| [803] TITLE: पाकिस्तान की ओलंपिक सदस्यता निलंबित करने की सिफारिश |
| CONTENT: अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के कार्यकारी बोर्ड ने पाकिस्तान की आलंपिक सदस्यता को निलंबित करने की सिफारिश की है और अपने मुख्यालय से कहा है कि वो इस मामले पर सभी कानूनी पहलुओं का जायजा लेने के बाद तुरंत फैसला करे. कार्यकारी बोर्ड की सिफारिश के बाद आने वाले दिन पाकिस्तान के बहुत अहम समझे जा रहे हैं. बताया जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति आईओसी पाकिस्तान में ओलंपिक चार्टर के बार बार हो रहे उल्लंघन को देखते हुए पाकिस्तान की सदस्यता को निलंबित कर सकती है. इससे पहले आईओसी ने भारतीय ओलंपिक संघ के चुनावों में कथित गड़बड़ी के बाद भारत की सदस्यता को निलंबित कर दिया था. अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में एक बैठक के दौरान आईओसी ने पाकिस्तान में ओलंपिक हाउस पर पुलिस के कब्जे और पाकिस्तान ओलंपिक संघ पीओए के खाते सील किए जाने की आलोचना की है. ओलंपिक कार्यकारी बोर्ड का कहना है कि पीओए के खातों में रकम आईओसी और ओलंपिक परिषद एशिया की तरफ से आती है लिहाजा किसी दूसरे को ये बैंक खाते इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है. आईओसी लेफ्जिनेंट जनरल रिटायर्ड आरिफ हसन की अध्यक्षता में बने पाकिस्तान ओलंपिक संघ को पाकिस्तान का प्रतिनिधि मानती है. लेकिन कथित सरकारी हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप मेजर जनरल रिटायर्ड अकरम साही की अध्यक्षता में पाकिस्तान ओलंपिक संघ के गठन और राष्ट्रीय खेलों के मामले में उनकी ओर से अपना प्रभाव इस्तेमाल करने के कारण पाकिस्तान में खेल संबंधी मामले खींचतान का शिकार हैं. आईओसी ने कई बार कहा है कि वो अकरम साही की अध्यक्षता वाले संघ को मान्यता नहीं देती है और इस बारे में उनकी तरफ से जो भी किया गया है वो ओलंपिक चार्टर का उल्लंघन है. |
| DATE: 2013-09-08 |
| LABEL: sports |
| [804] TITLE: यूएस ओपन: फ़ाइनल में भिड़ेंगे ज़ोकोविच और नडाल |
| CONTENT: यूएस ओपन के दूसरे सेमीफ़ाइनल में दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी नोवाक ज़ोकोविच ने दसवीं वरीयता प्राप्त स्टेनिस्लास वावरिंका को पांच सेटों तक चले मुक़ाबले में 2-6 7-574 3-6 6-36-4 से हरा दिया. सोमवार को होने वाले फ़ाइनल में 26 साल के इस सर्बियाई खिलाड़ी का मुक़ाबला दूसरी वरीयता प्राप्त और 12 बार के ग्रैंड स्लैम विजेता राफ़ेल नडाल से होगा. नडाल ने सेमीफ़ाइनल में नौंवी वरीयता प्राप्त फ़्रांस के रिचर्ड गैसक्वेट को 6-4 7-67-1 6-2 से हराया. नडाल 2010 के बाद चौथी बार यूएस ओपन के फ़ाइनल में पहुँचे हैं. वो 2012 में घुटनों में चोट की वजह से नहीं खेल पाए थे. शनिवार को आर्थर ऐश स्टेडियम में चार घंटे नौ मिनट तक चला सेमीफ़ाइनल मुक़ाबला जीतने के बाद उन्होंने कहा स्टान ने बहुत ही आक्रामक खेला. उसने अच्छी टेनिस खेली. यह हम दोनों के लिए कड़ा मुक़ाबला था. मुझे अपनी लय पाने के लिए काफ़ी दौड़ना पड़ा. नडाल का कहना था यह ऐसा मैच था जिसके लिए हम जीते हैं अंत तक कठिन संघर्ष के लिए मैं अपने प्रतिद्वदी को बधाई देता हूं. यह बुहत ही अच्छा मैच था. ज़ोकोविच ने 12वीं बार किसी ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिता के फ़ाइनल में जगह बनाई है. वे लगातार चौथी बार यूएस ओपन के फ़ाइनल में पहुँचे हैं. स्टेनिस्लास वावरिंका पहली बार किसी ग्रैंड स्लैम के सेमीफ़ाइनल में पहुँचे थे. मैच ख़त्म होने पर उन्होंने कहा कि यह उनके लिए एक महान प्रतियोगिता थी. एक कठिन मुक़ाबला मैं हार गया. मैंने अपना सब कुछ दिया. मैं अंत तक लड़ता रहा. मैंने प्रयास किया. यह एक अद्भुत अनुभव था. क्वार्टर फ़ाइनल में स्टेनिस्लास वावरिंका ने निवर्तमान चैंपियन एंडी मरे को 4-6 3-6 2-6 से हराया था. वहीं रविवार को होने वाले पुरुषों के डबल्स के फ़ाइनल में भारत के लिएंडर पेस और चेक गणराज्य के राडेक स्टेपानेक की जोड़ी का मुक़ाबला ऑस्ट्रिया के अलेक्ज़ेंडर पेया और ब्राज़ील के ब्रुनो सुआरेज़ की जोड़ी से होगासेमीफ़ाइनल में पेस और स्टेपानेक ने अमरीका के माइक ब्रायन और बॉब ब्रायन की शीर्ष वरीयता प्राप्त जोड़ी को 6-32-64-6 से हराया था. पेस अपने करियर का 20वां यूएस ओपन खेल रहे हैं. |
| DATE: 2013-09-08 |
| LABEL: sports |
| [805] TITLE: टोकियो करेगा 2020 ओलंपिक खेलों की मेज़बानी |
| CONTENT: टोकियो साल 2020 के ओलंपिक और पैरालिंपक खेलों की मेज़बानी करेगा. आर्जन्टिना की राजधानी ब्यूनेस आयरस में शनिवार को अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति आईओसी की बैठक में मेज़बान शहर का चुनाव गुप्त मतदान से हुआ. दूसरे दौर में मुकाबला टोकियो और इस्तांबुल के बीच था जिसे टोकियो ने 60-36 से जीता. मैड्रिड पहले दौर की वोटिंग में ही बाहर हो गया था. ये दूसरा मौका है जब टोकियो ओलंपिक खेलों की मेज़बानी करेगा. इससे पहले वहां साल 1964 में खेल आयोजित किए गए थे. टोकियो पहला एशियाई शहर है जिसे दूसरी बार ओलंपिक खेल आयोजित करने का मौका मिला है. हालांकि इससे पहले टोकियो को साल 1940 में भी खेलों की मेज़बानी मिली थी लेकिन वो खेल दूसरे विश्व युद्ध की वजह से रद्द हो गए थे. आईओसी के अध्यक्ष ज़ाक रोग के टोकियो का नाम घोषित करते ही जापानी प्रतिनिधि मंडल में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. सदस्यों ने घोषणा का स्वागत राष्ट्रीय ध्वज फहरा कर किया और कुछ सदस्य अपने आंसुओं पर काबू नहीं रख पाए. टोकियो की दावेदारी पेश करते हुए जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने कहा था कि राजधानी से 150 मील दूर स्थित फ़ुकुशिमा परमाणु संयंत्र से टोकियो में खेलों के आयोजन पर कोई असर नहीं पड़ेगा. साल 2011 में आए भूकंप और सुनामी से प्रभावित इस संयंत्र से रिसाव हो रहा था जिसके चलते टोकियो की सुरक्षा के बारे में चिंताएं थीं. आईओसी की आशंकाओं को दूर करते हुए आबे ने कहा इस संयंत्र से अब तक टोकियो को कोई नुकसान नहीं हुआ है और न ही आगे ऐसा होगा. इससे पहले ओलंपिक खेलों के आयोजन की दौड़ में शामिल तीनों शहर-इस्तांबुल मैड्रिड और टोकियो ने अपनी-अपनी दावेदारी पेश की थी. सबसे पहले तुर्की के शहर इस्तानबुल ने अपनी पेशकश रखी. इसके बाद टोकियो ने अपनी प्रस्तुति रखी और आखिर में मैड्रिड ने. पिछले 20 साल में ये पांचवी बार था जब इस्तानबुल ओलंपिक खेल की मेज़बानी ने दावेदारी पेश की. इसे तुर्की के प्रधानमंत्री रेजेब तैयप एरदोआन ने पेश किया. प्रस्तुति में तुर्की की मज़बूत अर्थव्यवस्था भविष्य के खिलाड़ियों को प्रेरित करने की महत्वकांक्षा और इन खेलों के ज़रिए इस क्षेत्र में शांति लाने की बात कही गई. साथ ही प्रस्तुति में बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया गया कि डोपिंग को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. वहीं टोकियो की दावेदारी रखते हुए जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने ज़ोर देकर कहा कि खेलों की मेज़बानी के लिए टोकियो एक सुरक्षित शहर है. साल 2011 में देश के उत्तर पूर्व में आए भूकंप और सुनामी के बाद से फ़ुकुशिमा परमाणु संयंत्र के बारे में कहा गया है कि ये असुरक्षित है. ये संयंत्र टोकियो से 150 मील की दूरी पर है. साथ ही प्रस्तुति में ये भी बताया गया कि किसी भी ओलंपिक या पैरालिंपक खेल में आज तक कोई जापानी खिलाड़ी ड्रग टेस्ट में फेल नहीं हुआ है. इस्तांबुल में इस साल गर्मी में राजनीतिक विरोध प्रदर्शन हुए जिनमें से कुछ उन जगहों पर भी हुए जहां ओलंपिक स्टेडियम बनाने की योजना है. इसके अलावा देश के कई खिलाड़ियों का डोपिंग मामले में भी उछला. मैड्रिड की दावेदारी पर स्पेन की चरमराती अर्थव्यवस्था बढ़ती बेरोज़गारी और कामगारों की कम होती तनख्वाह का साया है. इसके जवाब में मैड्रिड कम खर्च वाले ओलंपिक खेलों पर फोकस करेगा जिसमें पहले से मौजूद स्टेडियमों का इस्तेमाल और 2012 लंदन ओलंपिक खेलों से लगभग एक चौथाई कम खर्च की बात की गई है. आईओसी के सदस्य रविवार को ये तय करेंगे कि स्क्वॉश बेसबॉलसॉफ़्टबॉल संयुक्त दावेदारी या कुश्ती में से किस खेल को 2020 ओलंपिक खेलों में शामिल किया जाएगा. इस वर्ष फ़रवरी में कुश्ती को ओलंपिक खेलों की सूची से हटा दिया गया था लेकिन बाद में इसे फिर से अप्लाई करने की अनुमति दी गई. साथ ही आईओसी के नए अध्यक्ष का भी चुनाव होगा जो निवर्तमान अध्यक्ष ज़ाक रोग की जगह लेंगे. नए अध्यक्ष के लिए छह उम्मीदवार मैदान में हैं और चुनाव मंगलवार को गुप्त मतदान होगा. आईओसी के नए अध्यक्ष को कुछ कठिन मुद्दों का सामना करना होगा. इनमें अगले साल रूस के शहर सोची में होने वाले विंटर ओलंपिक खेलों से पहले रूस के नए समलैंगिक विरोधी क़ानून और 2016 में रियो ओलंपिक खेलों के निर्माण कार्य में हो रही देरी जैसे मुद्दे शामिल हैं. |
| DATE: 2013-09-08 |
| LABEL: sports |
| [806] TITLE: किसे मिलेगी 2020 ओलंपिक की दावेदारी? |
| CONTENT: अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में शनिवार को अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की बैठक होने जा रही है. इस महत्वपूर्ण बैठक में यह भी तय हो जाएगा कि साल 2020 में होने वाले ओलंपिक और पैरालंपिक खेल कहां होंगे. इन खेलों की मेज़बानी की दौड में जापान का टोक्यो तुर्की का इस्तांबुल और स्पेन का मैड्रिड शहर शामिल है. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के सामने अपना पक्ष रखने वाले जापानी प्रतिनिधिमंडल के अध्यक्ष टी सुरेकाज़ू ताकेदा का कहना है कि टोक्यो शहर का ओलंपिक खेलों की मेज़बानी के प्रति दीवानापन ही उसका सबसे मज़बूत पहलू है. आम लोगो में अभी से ही यह सोचकर रोमांच की अनुभूति का अहसास है कि टोक्यो में 2020 के ओलंपिक हो सकते है. इसके अलावा उनका यह भी कहना है जापान के लोग खेलों से सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं. इतना ही नहीं ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों के दौरान जापानी टेलिविज़न रेटिंग सबसे ज़्यादा होती है. जापान इससे पहले साल 1964 में टोक्यो में ही ओलंपिक खेलो की कामयाब मेज़बानी कर चुका है. टोक्यो की सबसे बड़ी ताक़त उसका आर्थिक रूप से मज़बूत होना है. इतना ही नहीं वह सुचारू और संगठित रूप से हर आयोजन स्थल पर खेलों को सम्पूर्ण करने की क्षमता भी रखता है. जापान की सबसे बड़ी चिंता फुकुशिमा न्यूक्लियर के रिसाव को लेकर थी जिसके बारे में सुरेकाज़ू का कहना है कि अब परिस्थितयां नियंत्रण में हैं. फिलहाल टोक्यो निवासी सामान्य हालात में रह रहे हैं. उधर तुर्की के प्रतिनिधिमंडल प्रमुख हसन अरात का कहना है तुर्की का खेलों का पुराना इतिहास उसे 2020 के ओलंपिक खेलों की मेज़बानी दिलाने में सहायक हो सकता है. यह बात अलग है कि इन दिनों तुर्की में राजनीतिक अनिश्चितता का माहौल है. इसका फ़ायदा दूसरे देशों को मिल सकता है. अब रहा स्पेन का मैड्रिड शहर. स्पेन इन दिनों आर्थिक मंदी की चपेट में है. यहां तक कि उसकी आबादी का एक बड़ा हिस्सा बेरोज़गारी का शिकार है. इसके बावजूद स्पेन प्रतिनिधिमंडल के चेयरमैन अलेजांद्रो ब्रावो का मानना है अगर मैड्रिड को ओलंपिक खेलों की मेज़बानी मिली तो उससे वहां बहुत बड़ा बदलाव आएगा. इससे पहले मैड्रिड की ओलंपिक खेलों की मेज़बानी की कोशिशें तीन बार नाकाम हो चुकी हैं. यहां तक कि साल 2016 में रियो द जनेरियो में होने वाले ओलंपिक खेलों की मेज़बानी वह पाते-पाते रह गया था और उस दौड़ में दूसरे स्थान पर था. शनिवार को अंतराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की बैठक में यह भी तय होगा कि इन तीन देशों में कौन 2020 में होने वाले ओलंपिक खेलों की मेज़बानी हासिल करता है. इसके साथ ही इसी बैठक में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति को नया अध्यक्ष भी मिल जाएगा. इतना ही नहीं इसी बैठक में यह भी तय होगा कि 2020 के ओलंपिक खेलो में कुश्ती बनी रहेगी या नहीं. इस बैठक में दरअसल बेसबॅाल सॉफ्टबॉल कुश्ती और स्क्वैश में से तय होगा कि कौन-सा खेल 2020 के खेलों में जगह पाएगा. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की इस बैठक में उसके 104 सदस्य ओलंपिक अभियान के भविष्य पर भी विचार करेंगे. |
| DATE: 2013-09-07 |
| LABEL: sports |
| [807] TITLE: सचिन इतनी जल्दी क्रिकेट नहीं छोड़ेंगे: रवि शास्त्री |
| CONTENT: मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के संन्यास को लेकर ख़बरों का बाज़ार भले ही गर्म हो लेकिन एक ज़माने में उनके साथ खेल चुके रवि शास्त्री को लगता है कि सचिन अभी संन्यास लेने से दूर हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार रवि शास्त्री को लगता है कि सचिन तेंदुलकर शायद अगले वर्ष इंग्लैंड से होने वाली टेस्ट श्रंखला में भाग ले सकते हैं. उन्होंने कहा जैसा की आप सब को लगता रहा है सचिन अभी क्रिकेट को अलविदा नहीं कहेंगे और खेलते रहेंगे. आप सब उन्हें अगले वर्ष लॉर्ड्स के मैदान पर होने वाले टेस्ट मैच में खेलते देखेंगे. मुंबई शहर के बॉम्बे जिमखाना में दिलीप सरदेसाई मेमोरियल लेक्चर देते वक़्त 51 वर्षीय रवि शास्त्री ने सचिन के बारे में अपनी बेबाक राय रखी. पिछले कुछ महीनों में निरंतर कयास लगते रहे हैं कि 40 वर्ष के सचिन तेंदुलकर जो अपने 200 वें टेस्ट मैच से मात्र दो टेस्ट दूर हैं ये कीर्तिमान हासिल करते ही क्रिकेट से संन्यास ले सकतें हैं. हालांकि कुछ क्रिकेट समीक्षकों का मत है कि रवि शास्त्री सचिन तेंदुलकर के बेहद करीबी लोगों में से एक हैं और उनके इस तरह के बयान के पीछे कोई वजह या सच्चाई ज़रूर हो सकती है. इससे पहले भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने वेस्टइंडीज़ के खिलाफ़ भारत में ही दो टेस्ट मैचों की श्रंखला आयोजित करने की घोषणा की थी. माना जा रहा था कि एकदिवसीय क्रिकेट से पहले ही संन्यास ले चुके सचिन तेंदुलकर 200 टेस्ट मैचों काकीर्तिमान पूरा करने के बाद शायद संन्यास लेंगे. वैसे इसी वर्ष के नवंबर महीने में भारतीय टीम का दक्षिण अफ़्रीकी दौरा पहले ही तय चुका था लेकिन वेस्टइंडीज़ के साथ श्रंखला के फ़ैसले के बाद हो सकता है उसे दिसंबर तक के लिए बढ़ाना पड़ जाए. रवि शास्त्री ने आगामी दौरों पर बात करते हुए इस बात के संकेत दिए कि हो सकता है दोनों दौरे ही संभव हों. उन्होंने कहा आपस में बातचीत की शायद थोड़ी कमी थी लेकिन दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय टीम कुछ तो क्रिकेट खेलेगी ही. बहराल जब भारत ने साल 2010-2011 में दक्षिण अफ्रीका का दौरा किया था तब सचिन तेंदुलकर ने अपने टेस्ट करियर का 50वां और 51वां शतक लगाया था. यही नहीं सचिन ने अपना आखिरी शतक 2 जनवरी 2011 को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ केपटाउन में जमाया था और उसके बाद वह 21 टेस्ट मैच खेल चुके है लेकिन शतक नही जमा पाए है. |
| DATE: 2013-09-07 |
| LABEL: sports |
| [808] TITLE: ब्रायन बंधुओं को हराकर बहुत खुश हूँ : पेस |
| CONTENT: भारत के लिएंडर पेस और चेक गणराज्य के राडेक स्टेपानेक की जोड़ी यूएस ओपन के पुरुषों के डबल्स मुक़ाबले के फ़ाइनल में पहुंच गई है. सेमी फ़ाइनल में उन्होंने अमरीका के माइक ब्रायन और बॉब ब्रायन की शीर्ष वरीयता प्राप्त जोड़ी को मात दी. मैच में जीत के बारे में पूछने पर पेस ने कहा कि मेरे जोड़ीदार राडेक और मैंने अच्छा खेल खेला और रणनीति के हिसाब से हमने अपने खेल को जारी रखा और कामयाब हुए. ब्रायन बंधुओं को हराकर हम बहुत खुश हैं क्योंकि पिछले साल ब्रायन बंधुओं ने हमें फ़ाइनल में हराया था. पेस कहते हैं कि हमारे लिये पहला सैट काफी मुश्किल रहा क्योंकि पहले सैट में ब्रायन बंधुओं ने शानदार खेल दिखाया लेकिन दूसरे और तीसरे सैट में हमने काफी मेहनत की और वापसी कर जीत दर्ज की. आर्थर ऐश स्टेडियम में हज़ारों दर्शकों के सामने खेलते हुए कैसा लग रहा था इस सवाल पर पेस का कहना था कि मैदान पर माहौल बहुत अच्छा था. दर्शकों में काफी जोश था. राडेक के साथ अपनी कामयाब जोड़ी के बारे में पेस बताते हैं कि हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं और हम एक-दूसरे का बहुत आदर करते हैं. खेल के सिलसिले में हम अपने ट्रेनर और पूरी टीम के साथ दुनिया भर में घूमते हैं. हम एक-दूसरे को बहुत अच्छे से समझते हैं. तीन दिन बाद होने वाले फाइनल मैच की तैयारी के बारे में पेस का कहना है कि फाइनल मैच की तैयारियां शुरु हो चुकी हैं कभी- कभी खेल के तरीके से ज्यादा मैच की रणनीति महत्वपूर्ण होती है. |
| DATE: 2013-09-06 |
| LABEL: sports |
| [809] TITLE: यूएस ओपन: फ़ाइनल में पेस, सानिया हारीं |
| CONTENT: भारत के लिएंडर पेस और चेक गणराज्य के राडेक स्टेपानेक की जोड़ी यूएस ओपन के पुरुषों के डबल्स मुक़ाबले के फ़ाइनल में पहुंच गई है. सेमी फ़ाइनल में उन्होंने अमरीका के माइक ब्रायन और बॉब ब्रायन की शीर्ष वरीयता प्राप्त जोड़ी को मात दी. लेकिन भारत की एक और उम्मीद सानिया मिर्ज़ा अपनी जोड़ीदार चीन की जी जेंद के साथ सेमी फ़ाइनल मैच हार गईं. सेमी फ़ाइनल में उन्हें ऐशले बार्टी और केज़ी डेलाक्वा की ऑस्ट्रेलियाई जोड़ी ने सीधे सेटों में 6-2 और 6-2 से मात दी. गुरुवार को आर्थर ऐश स्टेडियम में हज़ारों दर्शकों के सामने सेमी फ़ाइनल मैच में चौथी वरीयता प्राप्त पेस और स्टेपानेक की जोड़ी ने टॉप सीड और पिछले साल के चैंपियन माइक और बॉब ब्रायन की अमरीकी जोड़ी को तीन सेटों के मैच में 3-6 6-3 6-4 से पराजित किया. मैच के बाद बीबीसी हिंदी से ख़ास बातचीत करते हुए लिएंडर पेस ने खुशी जताते हुए कहा हमें बहुत ख़ुशी है ख़ासकर ब्रायन बंधुओं को हराकर क्योंकि पिछले साल ब्रायन बंधुओं ने हमें फ़ाइनल में हराया था. मेरे जोड़ीदार राडेक और मैंने अच्छा खेल खेला और रणनीति के हिसाब से हमने अपने खेल को जारी रखा और कामयाब हुए. पेस ने मैच के दौरान अच्छे प्रदर्शन के लिए अपने जोड़ीदार राडेक स्टेपानेक की बहुत तारीफ़ की. करीब दो घंटे चले मैच में पेस और स्टेपानेक की जोड़ी ने ब्रायन बंधुओं से पहले सेट में 3-6 से शिकस्त के बाद दूसरे सेट में सर्विस ब्रेक कर 6-3 से बराबरी हासिल की. अपने करियर का 20वां यूएस ओपन खेलते हुए पेस ने धुंआधार सर्विस के साथ-साथ कुछ अच्छे रिटर्नस भी मारे. अनुभवी खिलाड़ी पेस और स्टेपानेक ने तीसरे और निर्णायक सेट में तीसरे और पांचवे गेम में सर्विस ब्रेक कर 4-1 की बढ़त बना ली. इस मौके पर ब्रायन बंधुओं के हाथ से मैच निकलता दिखा. तीसरे सेट का छठा गेम और सर्विस कर रहे थे स्टेपानिक तीन अंक लगातार हारने के बाद पेस और स्टेपानेक ने वापसी की और 5-1 से बढ़त हासिल कर ली. फिर 5-2 की बढ़त के साथ पेस ने सर्विस संभाली लेकिन ब्रायन बंधुओं ने सर्विस ब्रेक कर स्कोर 5-4 कर लिया. लेकिन अगले गेम में पेस और स्टेपानिक ने बेहतरीन खेल के साथ 6-4 से सेट जीतकर मैच अपने नाम कर लिया. बॉब औ माइक ब्रायन ने पिछले कई सालों से यूएस ओपन के पुरूषों के डबल्स खिताब पर कबज़ा किया हुआ था. बॉब ब्रायन ने हार के बाद अपने प्रतिद्वंदियों की तारीफ़ करते हुए कहा एक प्रतियोगी की हैसियत से मुझे हारना तो बहुत बुरा लगता है. हार से हमें मायूसी तो हुई है. लेकिन हम लोग लिएंडर जैसे लीजेंड खिलाड़ी से हारे हैं. लिएंडर और राडेक ने बहुत अच्छे खेल का प्रदर्शन किया. अब यूएस ओपन फ़ाइनल में लिएंडर पेस और राडेक स्टेपानिक की जोड़ी का ख़िताबी मुकाबला ऑस्ट्रिया के अलेक्ज़ेंडर पेया और ब्राज़ील के ब्रुनो सुआरेज़ की जोड़ी से होगा. |
| DATE: 2013-09-06 |
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| [810] TITLE: विंबलडन चैम्पियन मरे यूएस ओपन में पिटे |
| CONTENT: इस साल विंबलडन जीतकर अपना सपना सच करने वाले ब्रिटेन के एंडी मरे के लिए यूएस ओपन उतना भाग्यशाली साबित नहीं हुआ. पिछले साल के चैम्पियन एंडी मरे को साल के आख़िरी ग्रैंड स्लैम में हार का मुँह देखना पड़ा है. क्वार्टर फ़ाइनल में एंडी मरे को स्विट्ज़रलैंड के नौवीं वरीयता प्राप्त खिलाड़ी स्टैनिसलास वावरिंका ने सीधे सेटों में 6-4 6-3 और 6-2 से हरा दिया. आर्थर ऐश स्टेडियम में हुए इस मैच में तीसरी वरीयता प्राप्त एंडी मरे पूरे मैच में एक भी ब्रेक प्वाइंट हासिल नहीं कर पाए. दो महीने पहले विंबलडन में ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाले एंडी मरे का प्रदर्शन कुछ दिनों से अच्छा नहीं चल रहा है. उनकी हताशा इससे भी साबित होती है कि मैदान में उन्हें व्यवहार के कारण चेतावनी भी दी गई. इस मैच में वावरिंका ने आक्रामक टेनिस का प्रदर्शन किया जिसका उन्हें काफ़ी लाभ मिला. पहला सेट 6-4 से जीतने के बाद वावरिंका रुके नहीं और दूसरे सेट में 6-3 से जीत हासिल की. तीसरा सेट उनके लिए और आसान साबित हुआ क्योंकि इस सेट में एंडी मरे की हताशा चरम पर थी. मरे की हताशा का फ़ायदा उठाते हुए वावरिंका ने तीसरा सेट 6-2 से जीतकर सेमी फ़ाइनल में जगह बना ली. 28 वर्षीय वावरिंका पहली बार किसी ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिता के सेमी फ़ाइनल में पहुँचे हैं. मरे से पहले एक और बड़े खिलाड़ी रोजर फेडरर चौथे दौर में ही हार गए थे. |
| DATE: 2013-09-06 |
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| [811] TITLE: क्या है सानिया मिर्ज़ा की ख़्वाहिश? |
| CONTENT: भारत की टेनिस स्टार सानिया मिर्ज़ा ने पहली बार यूएस ओपन टेनिस में महिलाओं के डबल्स मुक़ाबले के सेमी फ़ाइनल में जगह बनाई है. सानिया मिर्ज़ा ने वरिष्ठ पत्रकार सलीम रिज़वी को क्वार्टर फ़ाइनल के मुकाबले और भविष्य की योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया. आपका मैच कैसा था क्वार्टर फ़ाइनल में काफी अच्छी टीमें होती हैं. लेकिन सेमी फ़ाइनल में जगह बनाने का अनुभव कैसा था हम विंबलडन चैंपियन से खेल रहे थे. ये एशियन टेनिस के लिए बहुत बड़ी बात थी कि चार एशियन क्वार्टर फ़ाइनल में खेल रही थीं. हम सभी को कड़े मुकाबले का पहले से अंदाज़ा था. बहुत तेज़ हवा चल रही थी. परिस्थितियाँ हमारे लिए आसान नहीं थीं लेकिन हमें ख़ुशी है कि हमने अपना मैच जीता. जी ज़ेंग के साथ आपकी पार्टनरशिप कैसी रहीमैं ज़ेंग को बहत समय से जानती हूं. हमने एक-दूसरे के साथ अच्छे मैच खेले हैं. हमने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ भी खेला है. एशियन गेम्स फ़ाइनल में जब मुझे सिल्वर मिला था उसे गोल्ड मिला था. तीन सेटों के कड़े मुकाबले में मैं हार गई थी. मैं उसे सालों से जानती हूं. वह एक बहुत अच्छी लड़की है. मैं उसके पति और कोच से भी परिचित हूं. हम एक दूसरे को काफी पसंद करते हैं और अच्छी दोस्त हैं. इसलिए हमारे लिए टेनिस कोर्ट पर तालमेल करने में आसानी होती है. यूएस ओपन में पहली बार सेमी फ़ाइनल खेल रही हैं. कैसा महसूस कर रही है ज़ाहिर सी बात है हम टेनिस खिलाड़ियों के लिए ग्रैंड स्लैम में खेलना और बेहतर प्रदर्शन करना एक बड़ा सपना होता है. अब तक मैं क्वार्टर फ़ाइनल से आगे नहीं बढ़ पा रही थी. मैं ख़ुशकिस्मत हूँ और मुझे ख़ुशी है कि मैं अब ऐसा कर पा रही हूँ. आपके घुटनों में तकलीफ़ रही है और सर्जरी भी हो चुकी है. अभी कोई तकलीफ़ तो नहीं है मुझे पिछले कुछ हफ़्तों से घुटने में थोड़ा दर्द हो रहा है. उसका ट्रीटमेंट भी चल रहा है. दर्द तो होता रहता है. ऐसे कभी मुझे तो याद नहीं कि पिछले छह-सात साल में उठी और शरीर में किसी जगह पर कोई दर्द नहीं होता. टेनिस मे लंबे समय से आप बड़े स्तर पर खेल रही हैं. बॉडी को ट्रेन करने के लिए किस तरह की ट्रेनिंग होती है हम दिन में पाँच-छह घंटे ट्रेनिंग में लगाते हैं. उसमें उपचार भी होता है रिकवरी भी होती है और अभ्यास भी. ये हमारे लिए नौ से पाँच बजे की नौकरी की तरह है. प्रोफेशनल एथलीट के लिए टेनिस दुनिया का सबसे कठिन खेल माना जाता है. ज़ाहिर सी बात है कि आपको शारीरिक फिटनेस पर काफ़ी ध्यान देना पड़ता है. क्या अब आपने सिंगल्स खेलना छोड़ दिया है मुझे सिंगल्स मैच खेले हुए एक साल से ज़्यादा हो गया है. कभी-कभार मेरा दिल होता है कि वापसी करूं. लेकिन कोई चोट लग जाती है जिसके कारण वापसी का इरादा छोड़ना पड़ता है. जैसी अभी घुटने में दर्द हो रहा है. तो मेरे लिए सिंगल्स खेलना मुश्किल है. इसलिए मैनें सिंगल्स खेलना छोड़ दिया है. डबल्स अब काफी कठिन हो गया है. पहले जैसा नहीं रहा. अब प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है. सिंगल्स के बेहतर खिलाड़ी इसमें भाग लेते हैं. डबल्स मुक़ाबले के लिए किस तरह की तैयारी करनी पड़ती है डबल्स मुकाबले के लिए भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ती है. लेकिन खेलते समय आप कुछ दूसरी चीज़ें भी करने की कोशिश करते हैं जैसे वॉली पर ज़्यादा काम करते हैं टीम के साथी के साथ तालमेल पर काफी ध्यान देते हैं. आप रिटर्न अलग तरीके से करते हैं. इस तरह से सिंगल्स के मुकाबले डबल्स की तैयारी अलग तरीके से होती है. आपकी एकैडमी कैसी चल रही है हाँ एकैडमी अच्छी चल रही है. इसकी शुरुआत हुए तीन महीने हुए हैं. अभी हमारे पास करीब पचास बच्चे हैं. उम्मीद करते हैं कि इससे टेनिस में देश को ज़्यादा खिलाड़ी मिलेंगे. आप लंबे समय से टेनिस खेल रही हैं. लेकिन महिला टेनिस में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की कोई नई खिलाड़ी नहीं दिख रही है दुर्भाग्य से अभी कोई महिला खिलाड़ी बड़े स्तर पर सामने नहीं आई है. इसी वज़ह से मैं अपने तरीके से देश और टेनिस को कुछ वापस देना चाहती हूं ताकि एकैडमी से अच्छे खिलाड़ी निकलें और बड़े स्तर पर खेलें. |
| DATE: 2013-09-05 |
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| [812] TITLE: ओलंपिक में वापसी की राह नहीं आसान |
| CONTENT: अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक महासंघ ने भारत के दागी खेल अधिकारियों के ओलंपिक मूवमेंट में वापस आने पर एक बार फिर रोक लगा दी है. लेकिन ये कहना मुश्किल है कि कितनी जल्दी भारतीय खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय खेल स्पर्द्धाओं में तिरंगे तले हिस्सा ले सकेंगे. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक महासंघ के कार्यकारी बोर्ड ने महासंघ के अर्जेंटीना में चल रहे अधिवेशन में बुधवार को अपना फैसला दे दिया. फैसले में बोर्ड ने कहा कि ऐसे अधिकारी जिनके खिलाफ चार्जशीट दायर है वो भारतीय ओलंपिक संघ के चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकेंगे और ना ही ओलंपिक मूवमेंट का हिस्सा ही बन सकेंगे. उधर भारतीय ओलंपिक संघ का कहना था कि जब भारत में लोकसभा के चुनाव में भी आरोपों का सामना कर रहे लोगों को चुनाव लड़ने पर कानूनन कोई रोक नहीं है तो फिर ओलंपिक संघ मे ऐसा क्यों नहीं हो सकता. इसका सीधा-सीधा असर ललित भनोट और अभय चौटाला पर पड़ेगा जिन के ऊपर चार्जशीट दायर हैं. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक महासंघ के कार्यकारी बोर्ड ने कहा है कि जब तक भारतीय ओलंपिक संघ अपने संविधान में पारदर्शिता पूर्ण कामकाज का प्रावधान शामिल करके दागी अधिकारियों को बाहर नहीं रखेगा तब तक संघ के चुनाव की मान्यता नहीं होगी. भारतीय ओलंपिक संघ को पिछले साल दिसंबर महीने में निलंबित करने के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक महासंघ उसकी कार्य प्रणाली में सुधार करने की कोशिश कर रहा था. संघ की जनरल असेम्बली के लिए उसने अपने दो प्रतिनिधि भी भेजे थे. लेकिन भारतीय ओलंपिक संघ और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक महासंघ में एक विषय पर मतभेद था और ये वो ही चार्जशीट वाला मुद्दा था. अब स्थिति ये है कि भारतीय ओलंपिक संघ के ऊपर लगी रोक को हटाने के लिए सिर्फ एक ही रास्ता बचा है. इसके लिए भारतीय ओलंपिक संघ अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक महासंघ की बात मान कर अपने संविधान में संशोधन करे और भनोट और चौटाला जैसे अधिकारियों को बाहर कर दे. अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारताय ओलंपिक संघ पर लगी रोक जारी रहेगी. लेकिन मामला सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. एक और स्थिति भी पैदा हो सकती है भले ही वो और भी खराब हो. भारतीय ओलंपिक संघ मे दरार पड़ती नज़र आ रही है शायद इसलिए संघ की जनरल एसेम्बली चौटाला और भनोट की कुर्बानी देकर और चार्जशीट के प्रावधान को संविधान में शामिल करके अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक महासंघ से प्रतिबंध हटवाने की बात कर सकते हैं. लेकिन अगर चौटाला और भनोट कोर्ट जाकर चुनाव के खिलाफ स्टे ऑर्डर ले आए तो बात वैसी की वैसी ही रहेगी. भारत में कोर्ट के सामने समस्या ये होगी कि अगर आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तिओं को लोकसभा का चुनाव लड़ने पर कोई रोक नहीं है तो भारतीय ओलंपिक संघ का चुनाव किस बिना पर लड़ने से मना करेगा. भारतीय ओलंपिक संघ भारत में एक रजिस्टर्ड संस्था होने के कारण भारत के कानून का सहारा लेगी जिसको अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक महासंघ किसी भी हालत मे नहीं मानेगा. |
| DATE: 2013-09-05 |
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| [813] TITLE: ओलंपिक में भारत की वापसी का इंतजार बढ़ा |
| CONTENT: आइओसी अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति द्वारा आइओए भारतीय ओलंपिक संघ का समझौता प्रस्ताव स्वीकार न किए जाने से ओलंपिक में भारत की वापसी का रास्ता और कठिन हो गया है. पिछले महीने आईओसी की विशेष रूप से बुलाई गई आम सभा की बैठक में आइओए ने प्रस्ताव दिया था कि आरोपित अधिकारियों को संगठन के चुनाव से प्रतिबंधित कर दिया जाए. इस प्रस्ताव के अनुसार यह प्रतिबंध केवल उन्हीं अधिकारियों पर लागू होगा जो दोषी पाए गए हैं और जिन्हें दो वर्ष से अधिक जेल की सजा हुई है. लेकिन आगामी 125वें ओलंपिक खेलों को लेकर गत बुधवार को हुई एक्जीक्युटिव बोर्ड की बैठक में आइओसी दागी अधिकारियों पर पूरी तरह रोक लगाए जाने की अपनी अवस्थिति पर कायम रहा. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार आईओसी ने कहा है चुनाव से पहले आइओए उसकी सभी मांगों को पूरी तरह स्वीकार करे. आइओसी ने अपनी वेबसाइट पर जारी एक बयान में कहा है 2012 में आइओए के निलंबन के समय से ही वह मामले का समाधान खोजने की कोशिश कर रहा है कि राष्ट्रीय ओलंपिक समिति में स्वच्छ प्रशासन की स्थितियां कैसे सुधरें. बयान में कहा गया है कि आइओसी ने आइओए को एक समाधान सुझाया था और गत 25 अगस्त को हुई आइओए की आम सभा में अपने प्रेक्षक भी भेजे थे. एक्जीक्युटिव बोर्ड को प्रेक्षकों ने बताया कि आइओसी के सुझाए अधिकांश संशोधनों को आइओए ने अपने संविधान में स्वीकार कर लिया लेकिन एक विशेष धारा को स्वीकार नहीं किया गया. यह धारा सदस्यों की योग्यता से संबंधित है और राष्ट्रीय ओलंपिक समिति में स्वस्छ प्रशासन का केंद्रीय तत्व है. इस धारा को पूरी तरह स्वीकार किए जाने के बाद ही चुनाव में आइओए के प्रवेश का रास्ता खुल सकता है. गौरतलब है कि 2010 के राष्ट्रमण्डल खेलों में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे ललित भनोट को आइओए का महासचिव चुने जाने के बाद पिछले साल दिसंबर में आईओसी ने भारत को निलंबित कर दिया था. आइओसी ने आइओए को अपने संविधान में संशोधन कर आपराधिक और भ्रष्टाचार के मामलों का सामना कर रहे अधिकारियों को संघ से दूर रखने को कहा था. इस बीच भारत के शीर्ष एथलीटों ने आइओए को भ्रष्टाचार मुक्त किए जाने के लिए दबाव बढ़ा दिया है. बीजिंग ओलंपिक में एकमात्र स्वर्ण पदक विजेता रहे अभिनव बिंद्रा ने आइओए को साफ सुथरा बनाए जाने पर खुलकर अपनी बात रखी है. रॉयटर के साथ एक साक्षात्कार में बिंद्रा ने कहा कि काफी हद तक आईओए ने भारत को असफल बना डाला है. बिंद्रा के अलावा बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक प्राप्त सुशील कुमार और टेनिस स्टार महेश भूपति भी भारतीय ओलंपिक संघ को भ्रष्टाचार मुक्त बनाए जाने के बारे में खुल कर सामने आ गए हैं. |
| DATE: 2013-09-05 |
| LABEL: sports |
| [814] TITLE: यूएस ओपन: सानिया भी सेमी फ़ाइनल में |
| CONTENT: भारत की सानिया मिर्ज़ा और चीन की जी जेंग ने यूएस ओपन टेनिस में महिलाओं के डबल्स मुक़ाबले के सेमी फ़ाइनल में जगह बना ली है. भारत के टेनिस प्रशंसकों के लिए ये ख़बर दोहरी ख़ुशी लेकर आई है क्योंकि एक दिन पहले ही भारत के लिएंडर पेस ने अपने जोड़ीदार राडेक स्टेपानेक के साथ पुरुषों के डबल्स के सेमी फ़ाइनल में जगह बनाई है. महिलाओं के डबल्स के क्वार्टर फ़ाइनल में 10वीं वरीयता प्राप्त सानिया और जी जेंग की जोड़ी ने चौथी वरीयता प्राप्त चीन की शुअई पेंग और ताइवान की शू वे शिय को सीधे सेटों में 6-4 और 7-6 से मात दी. सानिया और जी जेंग ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अपने प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों पर पहले सेट से ही दबाव बनाए रखा. सानिया और जी जेंग ने पहला सेट 6-4 से जीता. हालाँकि इस सेट में उन्हें कड़ी टक्कर तो मिली लेकिन संयम से खेलते हुए सर्विस ब्रेक की और फिर सेट भी जीत लिया. ये सेट 45 मिनट तक चला और सानिया और जी ने कई ग़लतियाँ भी की लेकिन ब्रेक प्वाइंट्स हासिल करने में उन्होंने बाज़ी मारी और जीत हासिल कर ली. दूसरे सेट में मुक़ाबला कड़ा रहा और कोई भी जोड़ी हार मानने को तैयार नहीं लग रही थी. गेम जीतने और सर्विस बचाने का सिलसिला ऐसा चला कि मुक़ाबला टाई ब्रेकर में गया. लेकिन कई प्रतियोगिताओं में अच्छा प्रदर्शन करने वाली सानिया और जी जेंग की जोड़ी ने टाई ब्रेकर में कमाल दिखाया. टाई ब्रेकर में उन्होंने 7-5 से जीत हासिल की और फिर ये मैच जीत लिया. इसके साथ ही उन्होंने सेमी फ़ाइनल में जगह बना ली. |
| DATE: 2013-09-05 |
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| [815] TITLE: यूएस ओपनः ज़ोकोविच और मरे क्वार्टरफ़ाइनल में |
| CONTENT: दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी नोवाक ज़ोकोविच और पिछले चैंपियन एंडी मरे ने साल के आख़िरी ग्रैंड स्लैम यूएस ओपन के क्वार्टरफ़ाइनल में जगह बना ली है. महिला वर्ग में पिछली चैंपियन अमरीका की सरीना विलियम्स और चीन की ली ना सेमीफ़ाइनल में पहुंच गईं हैं. 2011 के चैंपियन और टॉप सीड सर्बिया के ज़ोकोविच ने स्पेन के मार्सेल ग्रेनोलर्स को महज 79 मिनट में 6-3 6-0 6-0 से हराकर लगातार 18 वीं बार ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट के क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बनाई. तीसरी सीड मरे को दुनिया के 64वें नंबर के खिलाड़ी उज़बेकिस्तान के डेनिस इस्तोमिन को हराने के लिए चार सेटों तक जूझना पड़ा. मरे ने पहला सेट हारने के बाद शानदार वापसी की और मुक़ाबला 6-7 5-7 6-1 6-4 6-4 से जीतकर अंतिम आठ में जगह बनाई. ज़ोकोविच और मरे के अलावा रूस के मिखाइल यूज़नी और स्विटरजरलैंड के स्टेनिस्लास वावरिंका भी क्वार्टरफ़ाइनल में पहुंचने में सफल रहे. क्वार्टरफ़ाइनल में जोकोविच का मुक़ाबला यूज़नी से होगा जबकि मरे के सामने वावरिंका की चुनौती रहेगी. महिला वर्ग में सरीना ने स्पेन की कार्ला सुआरेज़ नवारो को 6-0 6-0 से हराया जबकि ली ना ने रूस की एकातेरिना मकारोवा की चुनौती पर 6-4 6-7 6-2 से काबू पाया. गत उपविजेता बेलारूस की विक्टोरिया अज़ारेंका ने चौथे दौर में सर्बिया की एना इवानोविच को 4-6 6-3 6-4 से हराकर क्वार्टरफ़ाइनल में जगह बनाई. |
| DATE: 2013-09-04 |
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| [816] TITLE: 50 साल बाद इंग्लैंड में पांच टेस्ट मैच खेलेगा भारत |
| CONTENT: पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच हुई ऐशेज़ सिरीज़ कई कारणों से चर्चा में रही. विवादों को छोड़ दें तो पांचों टेस्ट मैच रोमांच से भरपूर रहे. उन्हें देखने दर्शकों की संख्या भी ख़ासी रही. इसे टेस्ट क्रिकेट का जादू कहा जा सकता है. हालांकि दुनिया के जाने-माने क्रिकेटर इसके वजूद को लेकर चिंतित भी हैं. ऐसे में यह समाचार आना कि इंग्लैंड पचास साल बाद अपनी ही धरती पर भारत के ख़िलाफ़ पांच टेस्ट मैचों की सिरीज़ खेलने को सहमत हो गया है टेस्ट क्रिकेट प्रेमियों में ख़ुशी का संचार कर गया. वैसे भारत ने अपने टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत भी इंग्लैंड के ख़िलाफ़ ही साल 1932 में की थी लेकिन तब केवल एक ही टेस्ट मैच खेला गया था. क्रिकेट का मक्का कहे जाने वाले लॉर्ड्स में तब आज की तरह वह पांच दिन नहीं बल्कि तीन दिन का मैच था. उस मैच को इंग्लैंड नें 158 रनों से अपने नाम किया था. भारत ने पहली बार पांच टेस्ट मैचों की सिरीज़ साल 1947-48 में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ उसी की धरती पर खेली जिसे ऑस्ट्रेलिया ने 4-0 से अपने नाम किया. उल्लेखनीय है कि तब ऑस्ट्रेलिया में छह दिवसीय टेस्ट मैच खेले जाते थे. उस सिरीज़ में टेस्ट मैचों में एक दिन विश्राम का भी था. भारत ने अपनी ही ज़मीन पर पांच टेस्ट मैचों की सिरीज़ की मेज़बानी पहली बार साल 1948-49 में की जिसे वेस्टइंडीज़ ने 1-0 से अपने नाम किया. इसमे पांचों दिन लगातार मैच हुए. इंग्लैंड ने पांच टेस्ट मैचों की सिरीज़ भारत में पहली बार साल 1951-52 में खेली जो 1-1 से ड्रा रही. अब इसे संयोग कहें या कुछ और कि दुनिया भर में टेस्ट क्रिकेट में सुनील गॉवस्कर गुंडप्पा विश्वनाथ विजय मांजरेकर कर्नल सीके नायडू दिलीप वैंगसरकर सचिन तेंदुलकर राहुल द्रविड़ वीवीएस लक्ष्मण संजय मांजरेकर जैसे एक से बढ़कर एक धुरंधर बल्लेबाज़ों और बिशन सिंह बेदी चंद्रशेखर प्रसन्ना वेंकटराघवन जैसी मशहूर स्पिन चौकडी और उसके बाद कपिल देव अनिल कुंबले जैसे गेंदबाज़ों के देश भारत ने साल 1986-87 के बाद से अपनी ही धरती पर कोई भी पांच टेस्ट मैचों की सिरीज़ की मेज़बानी नहीं की है. उस सिरीज़ को पाकिस्तान ने 1-0 से अपने नाम किया था. जहां तक इंग्लैंड की बात है तो उसके ख़िलाफ़ भारत ने पांच टेस्ट मैचों की सिरीज़ की मेज़बानी आख़िरी बार 1984-85 में की थी जिसे इंग्लैंड ने 2-1 से जीता था. वैसे ख़ुद भारत ने विदेशी धरती पर पांच टेस्ट मैचों की सिरीज़ आख़िरी बार साल 2002 में वेस्टइंडीज़ में खेली थी और उसे 1-0 से अपने नाम किया था. एक दिलचस्प बात यह भी है कि भारत ने अपनी ही धरती पर पांच बार छह टेस्ट मैचों की सिरीज़ की मेज़बानी भी की है. क्रिकेट की दुनिया में नज़दीकी पड़ोसी होते हुए भी भारत और श्रीलंका में आज तक कभी भी पांच मैचों की एक भी टेस्ट सिरीज़ नहीं हुई है. उल्लेखनीय है कि श्रीलंका को जब टेस्ट क्रिकेट खेलने का हक़ मिला तो उसने पहला अधिकृत टेस्ट मैच भारत के ख़िलाफ़ साल 1981-82 में भारत में ही खेला था. इंग्लैंड में भारत ने पिछली बार पांच मैचों की सिरीज़ 1959 में खेली थी जिसे इंग्लैंड ने एकतरफ़ा रूप से 5-0 से अपने नाम किया. भारत और दक्षिण अफ़्रीक़ा के बीच आगामी दौरे में टेस्ट मैचों की संख्या को लेकर अभी भी तनातनी बनी हुई है. भारत चाहता है कि वहां दो टेस्ट मैच हों जबकि तय कार्यक्रम के अनुसार तीन टेस्ट मैच होने थे. भारत और दक्षिण अफ़्रीक़ा के बीच भी आज तक कभी पांच मैचों की टेस्ट सिरीज़ नहीं खेली गई. भारत ने जब पहली बार साल 1992-93 में दक्षिण अफ़्रीक़ा का दौरा किया तब चार टेस्ट मैच खेले गए थे और दक्षिण अफ़्रीक़ा 1-0 से विजयी रहा था. हद तो यह कि अब टेस्ट सिरीज़ सिमटकर दो टेस्ट मैचों तक भी जा पहुंची है और ऐसी एकाध नहीं बल्कि ढेरों सिरीज़ हैं जिनमें भारत-ऑस्ट्रेलिया भारत-दक्षिण अफ़्रीक़ा भारत-न्यूज़ीलैंड सिरीज़ भी शामिल है. अब अगर टेस्ट मैचों की गिनती ऐसे ही गिनी-चुनी सिरीज़ में पांच टेस्ट मैचों की रही तो उसकी लोकप्रियता तो अपने आप ही कम हो जाएगी. |
| DATE: 2013-09-04 |
| LABEL: sports |
| [817] TITLE: यूएस ओपन टेनिस: सेमी फ़ाइनल में पहुँचे पेस |
| CONTENT: भारत के लिएंडर पेस और चेक गणराज्य के राडेक स्टेपानेक की जोड़ी साल के आख़िरी ग्रैंड स्लैम यूएस ओपन टेनिस के सेमी फ़ाइनल में पहुँच गई है. पुरुष डबल्स के क्वार्टर फ़ाइनल में पेस और स्टेपानेक ने पाकिस्तान के एसाम-उल-हक़ कुरैशी और नीदरलैंड्स के जॉ जुलियन रोजर को 6-1 6-7 और 6-4 से हरा दिया. पेस और स्टेपानेक ने मैच की शुरुआत बेहतरीन अंदाज़ में की. पहले सेट में लगा ही नहीं कि कब दोनों ने जीत हासिल कर ली. इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि दोनों ने पहला सेट 6-1 से जीत लिया. एसाम और जुलियन रोजर की जोड़ी सिर्फ़ एक गेम ही जीत पाई. पेस और स्टेपानेक ने एक के बाद एक उनकी सर्विस ब्रेक की और प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी देखते रह गए. लेकिन दूसरे सेट में स्थिति कुछ अलग रही. मुक़ाबला काफ़ी काँटे का रहा. एसाम और जुलियन रोजर की जोड़ी एकाएक फ़ॉर्म में दिखती नज़र आई और उन्होंने पेस और स्टेपानेक को कड़ी टक्कर दी. मुक़ाबला टाई ब्रेकर तक गया और टाई ब्रेकर में एसाम और रोजर ने जीत हासिल करते हुए सेट 1-1 से बराबर कर दिया. तीसरे सेट में भी मुक़ाबला टक्कर का हुआ लेकिन ऐन मौक़े पर पेस और स्टेपानेक ने सर्विस ब्रेक करके सेट में जीत हासिल की और सेमी फ़ाइनल में जगह बना ली. |
| DATE: 2013-09-04 |
| LABEL: sports |
| [818] TITLE: यूएस ओपन से भी बाहर हुए फ़ेडरर |
| CONTENT: यूएस ओपन टेनिस का ख़िताब छठी बार जीतने का रोजर फ़ेडरर का सपना चकनाचूर हो गया है. चौथे दौर में स्पेन के टॉमी रोब्रैडो ने उन्हें सीधे सेटों में 7-6 7-3 6-3 6-4 से हरा दिया. दो महीने पहले फ़ेडरर विंबलडन के दूसरे दौर में ही हार गए थे. रोब्रैडो के ख़िलाफ़ मैच में फ़ेडरर का प्रदर्शन काफ़ी खराब रहा. दो घंटे और 24 मिनट तक चले मैच में फ़ेडरर ने पहले ही सेट में कुछ संघर्ष किया लेकिन बाद के दो सेटों में मुक़ाबला पूरी तरह एकतरफ़ा रहा. साल 2004 से 2008 तक लगातार पांच बार यह ख़िताब जीतने वाले फ़ेडरर को 16 ब्रेक प्वाइंट्स मिले जिनमें से उन्होंने सिर्फ़ दो पर ही जीत हासिल की. इस जीत के साथ ही रोब्रैडो ने क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बना ली है. स्विटजरलैंड के फ़ेडरर और रोब्रैडो के बीच मैच बारिश के कारण भी प्रभावित रहा और इसे आर्थर ऐश स्टेडियम के सेंटर कोर्ट से पास के लुई आर्मस्टांग कोर्ट शिफ्ट किया गया. साल 2006 के बाद यह पहला मौक़ा था जब फ़ेडरर इस कोर्ट पर खेल रहे थे. इस तरह 32 साल के फ़ेडरर इस सत्र में कोई भी ग्रैंड स्लैम जीतने में नाकाम रहे. फ्रेंच ओपन में वह क्वार्टर फ़ाइनल में हारे थे जबकि ऑस्ट्रेलियन ओपन में उनका सफ़र सेमीफ़ाइनल में थमा था. दर्शक क्वार्टर फ़ाइनल में फ़ेडरर और राफेल नडाल की भिडंत की उम्मीद कर रहे थे लेकिन स्विस खिलाड़ी की हार से उनकी उम्मीदें टूट गईं. फ़ेडरर और नडाल यूएस ओपन में कभी नहीं भिड़े हैं. नडाल को जर्मनी के फिलिप कोलश्राइबर को हराने के लिए चार सेटों तक संघर्ष करना पड़ा. उन्होंने पहला सेट गंवाने के बाद शानदार वापसी की और 6-7 7-4 6-4 6-3 6-1 से जीत दर्ज की. 12 ग्रैंड स्लैम ख़िताबों के विजेता नडाल का क्वार्टर फ़ाइनल में हमवतन रौब्रेडो से मुक़ाबला होगा. यानि स्पेन के एक खिलाड़ी का सेमाफ़ाइनल में जाना तय है. चौथी सीड स्पेन के डेविड फेरर और फ्रांस के रिचर्ड गास्के भी अंतिम आठ का टिकट कटाने में सफल रहे. महिला वर्ग में इटली की रॉबर्टा विंसी और फ्लेविया पैनेटा तथा स्लोवाकिया की डेनियला हंतुकोवा क्वार्टर फ़ाइनल में पहुंच गई हैं. लेकिन बेलारूस की विक्टोरिया अज़ारेंका और सर्बिया का एना इवानोविच के बीच मुक़ाबले को खराब मौसम के कारण एक दिन आगे खिसका दिया गया. |
| DATE: 2013-09-03 |
| LABEL: sports |
| [819] TITLE: क्या थमने वाला है सचिन का बल्ला? |
| CONTENT: इन दिनों भारत में इस ख़बर का बाज़ार गर्म है कि दुनिया के महान बल्लेबाज़ सचिन तेंदुलकर अपना 200वां टेस्ट मैच खेलने के बाद अंतराष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट को भी अलविदा कह सकते है. इससे पहले सचिन टवेंटी-टवेंटी एकदिवसीय और इंडियन प्रीमियर लीग से सन्यास की घोषणा पहले ही कर चुके है. इतना ही नही सचिन इस साल मुंबई इंडियन की तरफ से आखिरी बार चैंपियंस लीग खेलने के लिए मैदान में उतरेंगे. सचिन तेंदुलकर अभी तक 198 टेस्ट मैच खेल चुके है. उनके बल्ले से 51 शतकों सहित 15837 रन निकले हैं. दक्षिण अफ्रीका दौरे पर सचिन तेंदुलकर की भारतीय टीम में मौजूदगी बहुत अहम है. माना जा रहा है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की कोशिश है कि मास्टर ब्लास्टर भारत में अपना 200वां टेस्ट मैच भारत में ही खेलें. ये देखते हुए बीसीसीआई वेस्टइंडीज को भारत में दो टेस्ट मैच और एकदिवसीय सिरीज खेलने के लिए भारत में बुलाना चाहती हैं. इसे लेकर भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज़ आकाश चोपड़ा कहते हैं मुझे लगता है कि यह योजना सिर्फ सचिन तेंदुलकर के 200वें टेस्ट मैच को लेकर नहीं है बल्कि बीसीसीआई का एक मार्केटिंग निर्णय भी है. वो कहते हैं भारत में पिछले कुछ समय से टेस्ट मैच नही हुए हैं और अगले साल भी लम्बे समय तक भारत में कोई टेस्ट सिरीज़ नही है. इसीलिए बीसीसीआई चाहता है कि भारतीय क्रिकेट टीम जब दक्षिण अफ्रीका का आगामी दौरा करे तो उससे पहले भारत वेस्टइंडीज़ से दो टेस्ट मैचों की सिरीज़ भारत में खेले. अगर वेस्ट इंडीज की टीम भारत का ये प्रस्तावित दौरा स्वीकार नहीं करती हैं तो सचिन अपना रिकार्ड 200वां टेस्ट मैच दक्षिण अफ्रीका की धरती पर खेलेंगे. इससे पहले कोई भी टीम टेस्ट सिरीज़ के लिए भारत नहीं आ रही है. भारत में पिछली टेस्ट सिरीज़ ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ इस साल फरवरी और मार्च मे खेली गई थी. जब भारत ने साल 2010-2011 में दक्षिण अफ्रीका का दौरा किया था तब सचिन ने अपने टेस्ट करियर का 50वां और 51वां शतक लगाया था. यही नहीं सचिन ने अपना आखिरी शतक 2 जनवरी 2011 को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ केपटाउन में जमाया था और उसके बाद वह 21 टेस्ट मैच खेल चुके है लेकिन शतक नही जमा पाए है. ऐसे में क्या बीसीसीआई को यह भी चिंता है कि जिस तरह भारत के महान बल्लेबाज़ राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण ने मैदान में उतरे बिना ही संन्यास का एलान कर दिया तो कहीं सचिन भी वैसा ना करें और अगर करें तो कम से कम भारत में अपने करोड़ों चाहने वालो के बीच करें. उनके चाहने वालों का सचिन पर इतना हक़ तो है ही कि जब वह टेस्ट क्रिकेट को भी अलविदा कहें तो दर्शक उनके सम्मान में स्टेडियम से खड़े होकर उनका अभिवादन करें और तालियों के साथ उन्हें विदाई दें. अब यह बात अलग है कि द्रविड़ और लक्ष्मण ने टेस्ट टीम में चुने जाने के बावजूद संन्यास का निर्णय लिया था. सचिन तेंदुलकर के 200वें टेस्ट मैच को लेकर आकाश चोपड़ा कहते है कि सचिन अगर भारत में इस सम्मान को हासिल करते हैं तो इससे अच्छा कुछ भी नहीं हो सकता. यह सम्मान उन्हें कोलकाता या मुंबई में भी मिल सकता है लेकिन अगर मुंबई में मिले तो कहना ही क्या. वही सचिन तेंदुलकर के सन्यास के निर्णय को लेकर आकाश चोपड़ा मानते है कि सचिन ने पिछले दिनों कहा है कि वह इस बारे में सोच ही नहीं रहे हैं. वह एक-एक टेस्ट मैच को लेकर रणनीति बनाते हैं. वैसे भी जिस खिलाड़ी ने पिछले दिनों पूरे साल क्रिकेट खेली हो उसे ज़रूर आगे भी खेलना चाहिए. भारत को अगले साल दक्षिण अफ्रीका न्यूज़ीलैंड और इंग्लैंड जैसे देशों में खेलना है जहां सचिन का अनुभव भारत के बेहद काम आ सकता है. तो रिकॉर्ड के बादशाह सचिन तेंदुलकर अब कहां अपना 200वां टेस्ट मैच खेलते है इसके लिए थोडा इंतजार करना होगा क्योंकि भारत दौरे के लिए अभी वेस्टइंडीज़ की सहमति ज़रूरी है जो शायद सहमत भी हो जाए लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो अभी दक्षिण अफ्रीका दौर पर खेले जाने वाले मैचों की सहमति को लेकर है. अभी बीसीसीआई और दक्षिण अफ्रीका बोर्ड के बीच असहमति है. |
| DATE: 2013-09-02 |
| LABEL: sports |
| [820] TITLE: सेरेना और ली ना क्वार्टर फ़ाइनल में |
| CONTENT: दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी सर्बिया के नोवाक ज़ोकोविच और पिछले चैंपियन ब्रिटेन के एंडी मरे साल के आख़िरी ग्रैंड स्लैम यूएस ओपन के चौथे दौर में पहुंच गए हैं. महिला एकल में गत चैंपियन अमरीका की सरीना विलियम्स और चीन की ली ना ने क्वार्टर फ़ाइनल में अपनी जगह बना ली है लेकिन तीसरी सीड पोलैंड की एग्निस्जका रदवांस्का की चुनौती चौथे दौर में ही टूट गई. जोकोविच ने रविवार को तीसरे दौर में पुर्तगाल के जोआओ सौसा को लगातार सेटों में 6-0 6-2 6-2 से शिकस्त दी जबकि एंडी मरे ने जर्मनी के फ़्लोरियन मेयर को 7-6 6-2 6-2 से हराया. मरे और ज़ोकोविच के अलावा पूर्व चैंपियन ऑस्ट्रेलिया के लेटन हैविट पांचवीं सीड टॉमस बेर्दिच स्टेनिस्लास वावरिंका भी चौथे दौर में पहुंचने में सफल रहे लेकिन 12वीं सीड टॉमी हास उलटफेर के शिकार हो गए. महिला वर्ग में सरीना ने चौथे दौर में हमवतन स्लोएन स्टीफंस को 6-4 6-1 से हराकर अपने अभियान को क्वार्टर फ़ाइनल में पहुंचा दिया. स्लोएन ने इस साल सरीना को ऑस्ट्रेलियन ओपन के क्वार्टर फ़ाइनल में हराकर तहलका मचाया था लेकिन इस बार वह लगातार सेटों में हार गईं. साल 2011 की फ्रेंच ओपन विजेता ली ना ने नौवीं सीड सर्बिया की येलेना यांकोविच को 6-3 6-0 से हराकर अंतिम आठ में जगह बनाई. लेकिन रदवांस्का और आठवीं सीड जर्मनी की एंगलिक करबर को चौथे दौर में उलटफेर का शिकार हो गईं. रदवांस्का को रूस की एकातेरिना मकारोवा ने और करबर को स्पेन की कार्ला सुआरेज़ नवारो ने हराया. |
| DATE: 2013-09-02 |
| LABEL: sports |
| [821] TITLE: बेल के लिए रियल मैड्रिड ने चुकाए साढ़े आठ अरब |
| CONTENT: रियल मैड्रिड ने टोटेनहैम के फॉरवर्ड गैरेथ बेल को 8-53 करोड़ पाउंड यानी क़रीब 8-6 अरब रुपए में अनुबंधित कर नया ट्रांसफ़र रिकॉर्ड बनाया है. यह अनुबंध छह साल के लिए किया गया है और इसके मुताबिक़ वेल्स के स्टार बेल को हर सप्ताह तीन लाख पाउंड यानी क़रीब तीन करोड़ रुपए मिलेंगे. इससे पहले यह रिकॉर्ड पुर्तगाल के करिश्माई खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो के नाम था जिनके ट्रांसफ़र के लिए रियाल ने 2009 में मैनचेस्टर यूनाइटेड को आठ करोड़ पाउंड यानी क़रीब 8-1 अरब रुपए की भारी भरकम राशि अदा की थी. इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए 24 साल बेल ने कहा है टोटेनहैम में मेरे लिए छह साल बहुत अच्छे रहे लेकिन यह इस क्लब को अलविदा कहने का सही समय है. उन्होंने कहा कई खिलाड़ियों का सपना अपने पसंदीदा क्लब से जुड़ने का होता है और वे दिन-रात इसका सपना देखते हैं. ईमानदारी से कहूं तो मेरा सपना पूरा हो गया है. बेल ने कहा टोटेनहैम हमेशा मेरे दिल में बसा रहेगा और मुझे पूरी उम्मीद है कि उनके लिए यह सत्र सफल होगा. अब मेरा ध्यान रियल मैड्रिड के लिए खेलने पर केंद्रित हो गया है. बेल को टोटेनहैम ने 2007 में साउथैंप्टन से एक करोड़ पाउंड में खरीदा था. पिछले सत्र में उन्होंने 26 गोल किए थे. प्रोफ़ेशनल फुटबॉलर्स एसोसिएशन और फुटबाल राइटर्स ने उन्हें प्लेयर ऑफ़ द ईयर चुना था. |
| DATE: 2013-09-02 |
| LABEL: sports |
| [822] TITLE: यूएस ओपन: सानिया और पेस क्वार्टर फ़ाइनल में |
| CONTENT: साल के आख़िरी ग्रैंड स्लैम यूएस ओपन में भारत के लिए रविवार का दिन काफ़ी अच्छा रहा. पुरुषों के डबल्स मुक़ाबले में जहाँ भारत के लिएंडर पेस और राडेक स्टेपानेक की जोड़ी ने क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बना ली वहीँ भारत की सानिया मिर्ज़ा और चीन की जी जेंग ने भी महिलाओं के डबल्स मुक़ाबले में क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बना ली. लिएंडर पेस और स्टेपानेक की जोड़ी को तीसरे दौर में जीत हासिल करने के लिए दो घंटे और 12 मिनट तक मुक़ाबला करना पड़ा. आख़िरकार पेस और स्टेपानेक ने फ़्रांसीसी जोड़ी माइकल लोड्रा और निकोलस माहूत को तीन सेटों के मैच में 7-5 4-6 और 6-3 से मात दी. पहला सेट 7-5 से जीतने के बाद पेस और स्टेपानेक को दूसरे सेट में हार का सामना करना पड़ा. 14वीं वरीयता प्राप्त लोड्रा और माहूत की जोड़ी ने दोनों को अच्छी टक्कर दी और दूसरा सेट 6-4 से जीतकर मैच में वापसी की. लेकिन अनुभवी पेस और स्टेपानेक ने तीसरे और निर्णायक सेट में संयम से खेलते हुए जीत हासिल कर ली. तीसरे सेट का स्कोर रहा 6-3. दूसरी ओर महिलाओं के डबल्स मुक़ाबले में भारत की सानिया मिर्ज़ा और चीन की जी जेंग के सामने थीं छठी वरीयता प्राप्त जर्मनी की एना लेना ग्रोएनफेल्ड और चेक गणराज्य की क्वेटा पेश्के की जोड़ी. लेकिन 10वीं वरीयता प्राप्त सानिया और जी जेंग की जोड़ी ने दोनों को संभलने तक का मौक़ा नहीं दिया. इस एकतरफ़ा मुक़ाबले में सानिया और जी जेंग ने सीधे सेटों में जीत हासिल की. उन्होंने 6-2 और 6-3 से जीत हासिल करते हुए क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बनाई. |
| DATE: 2013-09-02 |
| LABEL: sports |
| [823] TITLE: एशिया कप के फाइनल में भारत हारा |
| CONTENT: मलेशिया में खेले गए एशिया कप हॉकी टूर्नामेंट के फाइनल में दक्षिण कोरिया ने भारत को 4-3 से हरा दिया. इसके साथ ही कोरियाई टीम ने दिखा दिया कि भले ही उसे अगले साल होने वाले विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट में पहले ही जगह मिल चुकी है लेकिन उसके जज़्बे में कोई कमी नहीं आई है. रविवार को खेले गए फाइनल मुकाबले में दक्षिण कोरिया ने खेल की शुरुआत तेज़ तर्रार अंदाज में की और ज़्यादातर समय भारतीय गोल पोस्ट पर आक्रमण बनाए रखने की रणनीति को अपनाया. दक्षिण कोरिया के लगातार हमलों की वजह से भारतीय आक्रामक पंक्ति को भी रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ा जिसकी वजह से भारतीय कप्तान सरदार सिंह वी रघुनाथ और युवा खिलाड़ी मालक सिंह को आक्रमण करने का मौका नहीं मिला. दूसरी तरफ कोरियाई टीम को लगातार हमले करने का फायदा मिलता रहा और खेल के 28वें मिनट में जब उसे पेनल्टी कॉर्नर मिला तो योंग ने उसे गोल में तब्दील कर दिया. इससे पहले कि भारतीय टीम संभल पाती कोरिया के यू हियो सिक ने दूसरा गोल भी दाग दिया. मध्यांतर तक कोरिया 2-0 की बढ़त बना चुका था. इसके बाद भारत ने भी आक्रमण करने की योजना बनाई. आखिरकार खेल के 48वें मिनट में रुपिंदर पाल सिंह ने पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदला और स्कोर 2-1 हो गया. इसके बाद भारतीय टीम ने 2-2 की बराबरी भी की लेकिन कोरिया ने एक बार फिर जवाबी तेवर दिखाते हुए भारतीय टीम पर तीसरा गोल दाग दिया. भारतीय टीम ने इसके बावजूद हिम्मत नहीं हारी और स्कोर को एक बार फिर 3-3 से बराबर किया. लेकिन इस कड़े मुकाबले का अंत कोरिया के पक्ष में तब हो गया जब खेल समाप्त होने से लगभग दो मिनट पहले उसने एक गोल और दाग दिया. इस हार के साथ ही भारतीय हॉकी टीम के अगले साल विश्व कप में जगह बनाने को लेकर फिर अनिश्चित्ता पैदा गई हैं जिसके लिए भारत को नवंबर तक अतरराष्ट्रीय हॉकी संघ के फैसले का इंतजार करना पड़ सकता है. एशिया कप हॉकी टूर्नामेंट में भारत के प्रदर्शन पर पूर्व कप्तान ज़फर इकबाल कहते हैं मैंने पिछले कुछ वर्षों में इतनी फिट भारतीय हॉकी टीम कभी नहीं देखी. ये कहा जाता है कि कोरियाई खिलाड़ी कमांडो ट्रेनिंग करते हैं जिसकी वजह से वो दुनिया में सबसे फिट खिलाड़ी हैं लेकिन मुझे लगता है कि जैसे भारतीय टीम के खिलाड़ियों को भी कमांडो ट्रेनिंग दी गई. उन्होंने कहा कि हार और जीत दोनों ही खेल के पहलू हैं लेकिन इस भारतीय टीम ने दिखाया कि वो किसी भी टीम का सामना कर सकती है. लेकिन वो चेतावनी भी देते हैं कि अगर भारतीय टीम को बने रहना है तो उसे और कड़ी मेहनत करनी होगी. साथ ही उन्होंने पाकिस्तान के अगले विश्व कप में जगह न बनाए जाने पर निराशा जताई और कहा कि जिस देश ने दुनिया को विश्व कप जैसा नायाब टूर्नामट दिया और जो चार बार उसका चैंपियन रहा उसका बाहर होना एशियाई हॉकी के लिए भी निराशाजनक है. |
| DATE: 2013-09-01 |
| LABEL: sports |
| [824] TITLE: किसने 'चुराए' ओलंपिक पदक? |
| CONTENT: ब्रिटेन की ओलंपिक चैंपियन तैराक रैबेका एडलिंग्टन ने कहा है कि चोरों ने उनके घर में घुसकर उनके पदक चुरा लिए. साल 2008 में बीजिंग में हुए ओलंपिक खेलों में दो स्वर्ण जीतने वाली एडलिंग्टन ने ट्विटर पर कहा कि पदक चोरी होने से वो बुरी तरह टूट गई थीं. हालांकि चोरी के कुछ ही घंटों बाद पदक बरामद हो गए लेकिन एडलिंग्टन के पार्टनर की एक कार अभी तक नहीं मिली है. एडलिंग्टन ने बीजिंग ओलंपिक में 400 मीटर और 800 मीटर फ्रीस्टाइल में स्वर्ण पदक जीते थे और पिछले साल उन्होंने लंदन में इन दोनों स्पर्द्धाओं में कांस्य पदक जीते थे. उन्होंने कहा कि उन्हें अपने पदक बहुत प्रिय हैं और कोई भी उनकी जगह नहीं ले सकता है. ट्विटर पर एक यूजर ने जब एडलिंग्टन का मज़ाक उड़ाया तो इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा जो मेरे ट्वीट का मज़ाक उड़ा रहे हैं उनके लिए मैं कहना चाहता हूं कि उन्होंने कभी कड़ी मेहनत करके कुछ ऐसा नहीं किया है कि कोई उनके घर में चोरी करे. एडलिंग्टन उस समय पश्चिमी लंदन के टापस रेस्त्रां में थीं जब उन्हें घर में सेंधमारी की ख़बर मिली. पुलिस जब मामले की तहकीकात कर रही थी तभी एडलिंग्टन ने ट्वीट किया कि उनके पदक मिल गए हैं. हालांकि पदक कैसे मिले इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. एडलिंग्टन ने कहा कि उनके पार्टनर और तैराक हैरी नीड्स की कार अब भी नहीं मिली है. लेकिन उन्होंने ट्वीट किया पदक मिल गए हैं. मैं राहत महसूस कर रही हूं. एडलिंग्टन ने चार ओलंपिक पदकों के अलावा विश्व चैंपियनशिप में दो स्वर्ण राष्ट्रमंडल खेलों में दो ख़िताब एक यूरोपियन गोल्ड और 13 राष्ट्रीय पदक जीते हैं. कुल मिलाकर उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 35 पदक जीते हैं. चौबीस साल की एडलिंग्टन ने लंदन ओलंपिक के छह महीने बाद अपने संन्यास की घोषणा की थी. |
| DATE: 2013-09-01 |
| LABEL: sports |
| [825] TITLE: आईबीएल फाइनलः साइना ने सिंधु को हराया |
| CONTENT: इंडियन बैडमिंटन लीग के फाइनल में साइना नेहवाल ने पी वी सिंधु को हराकर खिताब जीत लिया है. साइना ने सीधे सेटों में सिंधु को 21-15 21-7 से हराया. साइना की इस जीत से हैदराबाद हॉटशॉट्स ने पहली इंडियन बैडमिंटन लीग यानी आईबीएल का खिताब जीत लिया है. साइना की ये लगातार सातवीं जीत है. शनिवार को हैदराबाद हॉटशाट्स और अवध वॉरियर्स के बीच खेले गए मैच में सबकी निगाहें इस पर थीं कि साइना और सिंधु में आखिरकार जीतेगा कौन. इस तरह साइना ने लीग के फाइनल में अवध वॉरियर्स के ख़िलाफ अपनी टीम को 1-1 से बराबरी दिला दी. इससे पहलेके श्रीकांत ने थाईलैंड के एस तेनोंगसेक को हराकर वारियर्स को 1-0 से आगे कर दिया था. मैच के दौरान साइना बेहद आत्मविश्वास से भरी हुई थीं वहीं सिंधु ने मैच के दौरान कई गलतियाँ कीं और खेल पर ध्यान नहीं लगा सकीं. जीत के बाद साइना ने अपने प्रशंसकों को धन्यवाद दिया और कहा कि उनकी वजह से ही उन्हें ये जीत हासिल हुई है. हैदराबाद की टीम बुधवार को ही पुणे पिस्टंस को हराकर फाइनल में पहुंच चुकी थीं जबकि अवध वॉरियर्स ने गुरुवार को मुंबई मास्टर्स को 3-2 से हराकर दमदार खेल दिखाया था. अवध वॉरियर्स की जीत में उसकी आइकन खिलाड़ी पीवी सिंधु ने अपनी टीम को तब बराबरी दिलाई जब वे मुंबई मास्टर्स से पहला मैच हारकर पिछड़ रही थीं. पीवी सिंधु ने मुंबई की टाइनी बोन को हराया. इससे पहले भी जब सिंधु का सामना टाइनी बोन से हुआ था तब भी बाज़ी सिंधु के हाथ ही लगी थी. फाइनल में हैदराबाद की साइना नेहवाल उसकी सबसे बड़ी ताक़त थीं. उन्होंने अपने पहले मैच में पीवी सिंधु को तब हराया था जब सभी का अनुमान था कि वह साइना नेहवाल पर भारी पड़ सकती हैं. इससे पहले साइना नेहवाल विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप के क्वॉर्टर फाइनल में हार गई थी जबकि पीवी सिंधु कांस्य पदक जीतने में कामयाब रही थी. पीवी सिंधु ने इंडियन बैडमिंटन लीग के आखिरी दौर में आखिरकार अपनी लय हासिल कर ली और उसके बाद पीछे मुड़कर नही देखा. पीवी सिंधु ने इससे पहले दिल्ली में हुए मुक़ाबले में जब साइना नेहवाल का सामना किया था तो वह दोनों खिलाड़ियों के बीच हुआ पहला मैच था. |
| DATE: 2013-08-31 |
| LABEL: sports |
| [826] TITLE: आईबीएल फाइनलः साइना और सिंधू की टीमें आमने सामने |
| CONTENT: इंडियन बैडमिंटन लीग का फाइनल शनिवार को हैदराबाद हॉटशाटस और अवध वॉरियर्स के बीच खेला जा रहा है. हैदराबाद की टीम बुधवार को ही पुणे पिस्टंस को हराकर फाइनल में पहुंच चुकी थी जबकि अवध वॉरियर्स ने गुरुवार को मुंबई मास्टर्स को 3-2 से हराकर दमदार खेल दिखाया था. अवध वॉरियर्स की जीत में उसकी आइकन खिलाड़ी पीवी सिंधु ने अपनी टीम को तब बराबरी दिलाई जब वे मुंबई मास्टर्स से पहला मैच हारकर पिछड़ रही थीं. पीवी सिंधु ने मुंबई की टाइनी बोन को 21-16 और 21-13 से हराया. इससे पहले भी जब सिंधु का सामना टाइनी बोन से हुआ था तब भी बाज़ी सिंधु के हाथ ही लगी थी. मुंबई मास्टर्स को पहले मैच में उसके आइकन खिलाड़ी और दुनिया के नम्बर एक मलेशिया के ली चोंग वेई ने अवध वॉरियर्स के गुरू साई दत्त को 21-15 और 21-7 से आसानी से हराया. इसके अलावा मुंबई मास्टर्स के व्लादीमिर इवानोव ने के श्रीकांत को हराया. पीवी सिंधु के अलावा अवध वॉरियर्स के लिए पुरूष युगल में मारकिस किडो और मैथायस बोए ने और मिश्रित युगल में मारकिस किडो और पिया बर्नाडैट ने जीत हासिल की. फाइनल में हैदराबाद की साइना नेहवाल उसकी सबसे बड़ी ताक़त हैं. साइना ने अभी तक अपने सभी मैच जीते हैं और उनकी फिटनेस पर कोई सवाल नही है. उन्होंने अपने पहले मैच में पीवी सिंधु को तब हराया था जब सभी का अनुमान था कि वह साइना नेहवाल पर भारी पड़ सकती हैं. इससे पहले साइना नेहवाल विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप के क्वॉर्टर फाइनल में हार गई थी जबकि पीवी सिंधु कांस्य पदक जीतने में कामयाब रही थी. पीवी सिंधु ने इंडियन बैडमिंटन लीग के आखिरी दौर में आखिरकार अपनी लय हासिल कर ली और उसके बाद पीछे मुड़कर नही देखा. पीवी सिंधु ने इससे पहले दिल्ली में हुए मुक़ाबले में जब साइना नेहवाल का सामना किया था तो वह दोनों खिलाड़ियों के बीच हुआ पहला मैच था. जैसे ही दोनों खिलाड़ी बैडमिंटन कोर्ट पर उतरीं दर्शको की भारी भीड़ ने ज़बरदस्त शोर और तालियां बजाकर उनका स्वागत किया. इसके बाद मैच शुरू होते ही सिंधु ने शुरुआती बढ़त लेकर साइना पर दबाव बना लिया. साइना नेहवाल एक बार तो बहुत परेशान दिखीं लेकिन जैसे ही सिंधु कुछ रक्षात्मक हुईं साइना ने उसके बाद उन्हें जमने का अवसर ही नहीं दिया. इस जीत से साइना ने अपना खोया हुआ आत्मविशवास भी पा लिया और अभी तक वह इस लीग में वे अजेय रही हैं. अब फाइनल में अवध और हैदराबाद में मुंबई के दर्शकों के सामने ख़िताब की जंग हो रही है तो हैदराबाद को अवध की पुरुष युगल जोड़ी से बचकर रहना होगा. लेकिन सबके आकर्षण का केंद्र तो यकीनन साइना नेहवाल और पीवी सिंधु के बीच हो रहा मैच है. |
| DATE: 2013-08-31 |
| LABEL: sports |
| [827] TITLE: अंतिम शॉट तक हार नहीं मानताः रोंजन |
| CONTENT: निशानेबाज़ रोंजन सोढ़ी को राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार के लिए चुना गया है. ये पुरस्कार उन्हें शनिवार को राष्ट्रपति भवन में एक समारोह में दिया गया. राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार भारत का सर्वोच्च खेल पुरस्कार माना जाता है. पहले वर्ल्ड चैंपियन और अब खेल रत्न पुरस्कार. निशानेबाज़ी में शून्य से शिखर तक पहुंचने के अपने सफर के बारे में रोंजन सोढ़ी ने बीबीसी संवाददाता दीप्ति कार्की से बातचीत की. रोंजन सोढ़ी ने जब निशानेबाज़ी की शुरुआत की तो शुरु-शुरु में उन्हें काफ़ी बाधाएं आईं. मगर वे मानते हैं कि तब से अब चीज़ें बहुत बदल गई हैं. वे बताते हैं कि निशानेबाज़ी के लिए पहले जो उपकरण इस्तेमाल होते थे वे भारत के नहीं बल्कि इटली के बने होते थे. रोंजन बताते हैं पहले निशानेबाज़ी के उपकरण तथा बंदूकें आसानी से उपलब्ध नहीं थीं मगर अब ऐसा नहीं है. अब सरकार से बहुत मदद मिलती है. कई कैंप लगाए जा रहे हैं. किसी चीज़ की कमी नहीं होती. रोंजन सोढ़ी को अब तक कई पुरस्कार मिले. खिलाड़ी को एक तरफ़ सराहना मिलती है तो कई बार उसे आलोचनाओं का भी शिकार होना पड़ता है. जब खेल रत्न के लिए उनके नाम की सिफ़ारिश की गई तो कुछ लोगों ने इसकी आलोचना की थी. रोंजन इस तरह की आलोचनाओं को गंभीरता से नहीं लेते. कृष्णा पुनिया ने भी रोंजन को यह पुरस्कार दिए जाने पर सवाल उठाए थे. रोंजन सोढ़ी कहते हैं मुझे यह पुरस्कार शेयर करने में कोई दिक्क़त नहीं थी. पहले भी दो लोगों को पुरस्कार मिला है तीन लोगों को भी मिला है. लेकिन यह फ़ैसला कमेटी का था. रोंजन को विश्वस्तर का निशानेबाज़ माना जाता है. विश्वस्तर का निशानेबाज़ बनने के लिए कौन से गुण होने चाहिए इस बारे में रोंजन का कहना है कि सबसे ज़रूरी है कि खिलाड़ी का सोच सकारात्मक हो. वह अंत तक हार ना माने. भारत में निशानेबाज़ी को आम खेल नहीं माना जाता. यदि खेलों का चुनाव करना हो तो कोई बच्चा सबसे पहले क्रिकेट को ही चुनता है. इस सोच में बदलाव आ रहा है. रोंजन ने शूटिंग ही करने का फ़ैसला क्यों लिया. रोंजन कहते हैं शूटिंग मैंने शौक़िया शुरू किया था. कभी सोचा नहीं था कि इसे अपना पेशा बनाऊंगा. कॉमनवेल्थ एशियन ओलंपिक खेलों में जब एक के बाद एक बहुत सारे मेडल मिलने लगे तो लगा कि मैं इसमें कुछ कर सकता हूं. साल 2004 में रोंजन ने तय कर लिया कि अब शूटिंग को ही अपना करियर बनाना है. एक निशानेबाज़ का जीवन काफ़ी व्यस्त होता है. रोंजन के भी सुबह से शाम तक प्रैक्टिस सेशन चलते रहते हैं. उनकी ट्रेनिंग ज्यादातर इटली में ही होती है. रोंजन मानते हैं कि निशानेबाज़ी 80 फ़ीसदी दिमाग़ का खेल है इसलिए ज़रूरी है कि खिलाड़ी की मनोवैज्ञानिक ट्रेनिंग हो. रोंजन को बचपन से निशानेबाज़ी का शौक़ था. खिलौने में उन्हें बंदूक़ ही पसंद था. बचपन में जब रोंजन के माता पिता ने उनका झुकाव खेलों की ओर देखा तो उन्होंने उनसे पहले पढ़ाई पूरी करने की सलाह दी. इसलिए उन्होंने पहले पढ़ाई पूरी की. फिर एमबीए भी किया. खेल में सफलता हासिल करने के लिए वे माता पिता का साथ ज़रूरी मानते हैं. वे बताते हैं कि एमबीए करते वक़्त वे निशानेबाज़ी का अभ्यास नहीं कर पा रहे थे. उस समय उनके माता पिता ने आगे आकर कहा अगर पेशेवर तरीक़े से शूटिंग करना चाहते हो तो बेशक नौकरी छोड़ दो. अगर माता-पिता का साथ नहीं मिलता तो इस मुक़ाम पर पहुंचना मुश्किल होता. वे कहते हैं अगर माता पिता की तरफ़ से छूट न मिले तो खेल में करियर बनाना बहुत मुश्किल है ख़ासकर भारत में. रोंजन सोढ़ी ने एमबीए करने के बाद एलजी कंपनी में एक महीने काम भी किया है. जब इसे छोड़ने का फ़ैसला लिया तो उन्हें काफ़ी दुविधा महसूस हुई. वे बताते हैं उस समय एमबीए छोड़कर शूटिंग में आना जुआ खेलने जैसा ही था. क्या पता था कि बाद में इतने मेडल मिलेंगे. और मैं इसे करियर बना लूंगा. रोंजनअगर निशानेबाज़ नहीं होते तो एमबीए करके कॉरपोरेट की दुनिया में कुछ अलग कर रहे होते. शूटिंग के अलावा उनके कई शौक़ हैं. फ़िल्में देखना म्यूज़िक सुनना आउटडोर स्पोर्ट्स खेलना आदि. इटली में जब रोंजन ट्रेनिंग करते हैं तो वे भारतीय खानों की कमी सबसे ज्यादा महसूस करते हैं. उन्हें इंडियन फ़ूड बहुत पसंद हैं. शूटिंग के बारे में आम धारणा है कि यह कुलीन वर्ग का खेल है. रोंजन मानते हैं कि इस सोच में बदलाव लाने के लिए ज़मीनी स्तर के प्रयास करने की ज़रूरत है. वे मानते हैं कि यह बदलाव तभी आएगा जब छोटे-छोटे शहरों में शूटिंग रेंज खुलेंगी. तब ज्यादा से ज्यादा लोगों को पता चलेगा इसके बारे में. वे कहते हैं आज की तारीख़ में शूटिंग रेंज ज्यादातर बड़े शहरों में ही हैं. इसे भारत के कोने-कोने में पहुंचाने के लिए छोटे-छोटे शहरों में भी रेंज खोलने पड़ेंगे. ओलंपिक में वे गोल्ड मेडल नहीं जीत पाए थे मगर वे कहते हैं कि लंदन में जो ग़लतियां हुई हैं उसे रिओ में सुधारनी हैं. क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों के प्रति इतना पक्षपात भरा रवैया क्यों है. देश के सबसे मशहूर खेल और सबसे कम मशहूर खेल के प्रति इतना पूर्वाग्रह क्यों है. इस बारे में रोंजन सोढ़ी का मानना है कि पहले से बहुत फ़र्क़ आया है. जब कॉमनवेल्थ गेम दिल्ली में हुए तो बहुत लोगों को तब पता चला कि निशानेबाज़ी में क्या क्या इवेंट होते हैं आर्चरी में क्या-क्या होता है. |
| DATE: 2013-08-31 |
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| [828] TITLE: भारत एशिया कप के फ़ाइनल में पहुँचा |
| CONTENT: भारत ने मलेशिया को 2-0 से हराकर एशिया कप हॉकी के फ़ाइनल में जगह बना ली है. फ़ाइनल में उसका मुक़ाबला कोरिया से होगा. फ़ाइनल रविवार को खेला जाएगा. पहले सेमी फ़ाइनल में दक्षिण कोरिया ने पाकिस्तान को 2-1 से हरा दिया. इसके साथ ही विश्व कप के इतिहास में पहली बार ऐसा होगा कि पाकिस्तान की टीम इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले पाएगी. दूसरे सेमी फ़ाइनल में भारत को जीत की आवश्यकता थी ताकि वो विश्व कप में जगह बना सके. भारत ने मैच की शुरुआत अच्छी की और जल्द ही उन्हें सफलता भी मिली. आठवें मिनट में वीआर रघुनाथ ने भारत की ओर से गोल करके भारत को 1-0 की बढ़त दिला दी. भारत को पहले हाफ़ में गोल करने के कई मौक़े मिले लेकिन भारत को सफलता नहीं मिल पाई. पहले हाफ़ की समाप्ति पर भारत 1-0 से आगे थे. दूसरे हाफ़ में मलेशिया ने गोल उतारने की कई कोशिशें की. लेकिन एक बार फिर भारत को ही सफलता मिली जब 60वें मिनट में रमनदीप के बेहतरीन पास पर मनदीप सिंह ने गोल करके स्कोर 2-0 कर दिया. |
| DATE: 2013-08-30 |
| LABEL: sports |
| [829] TITLE: यूएस ओपन में भूपति की चुनौती ख़त्म |
| CONTENT: भारत के जाने माने खिलाड़ी महेश भूपति की यूएस ओपन के पुरूष डबल्स मुक़ाबले में चुनौती ख़त्म हो गई है. अपने आख़िरी यूएस ओपन के पहले दौर में वह हार कर बाहर हो गए हैं. भारत के लिए यूएस ओपन में गुरूवार को मिला जुला दिन रहा. जहां सानिया मिर्ज़ा लिएंडर पेस और दिविज शरण ने अपने पहले दौर के मैच जीत लिए वहीं पुरूषों के डबल्स मुक़ाबले में महेश भूपति पहले ही दौर में हार गए हैं. महेश भूपति और जर्मनी के फ़िलिप पेशनर की जोड़ी को केनेडा के डेनियल नेस्टर और वासेक पेसपिसिल की जोड़ी ने 6-3 7-6 से हरा दिया. मैच के बाद बीबीसी हिंदी से बात करते हुए महेश भूपति ने निराशा जताते हुए कहा मुश्किल मैच था हमारे मुक़ाबले में डेनिएल नेस्टर थे जो बहुत अनुभवी खिलाड़ी हैं और दो बार यूएस ओपन जीत चुके हैं. इसके अलावा मेरे जोड़ीदार पेशनर कंधे की चोट से भी परेशान थे फिर भी परेशानियों के साथ हमने अच्छी फ़ाईट दी. बदक़िस्मती से हम हार गए. महेश भूपति ने कहा कि यह उनका आख़िरी यूएस ओपन टूर्नामेंट है. महेश भूपति ने अपने डबल्स के करियर में 50 से अधिक ख़िताब जीते इनमें विंबल्डन यूएस ओपन फ़्रेंच ओपन ग्रैंड स्लैम भी शामिल हैं. ग्रैंड स्लैम में पूरूषों के डबल्स का उनका करियर यूएस ओपन में हार के बाद ख़त्म हो गया है. अभी वह यूएस ओपन में मिक्सड डबल्स के मुक़ाबले में भी खेलेंगे जिसमें उनकी जोड़ीदार मार्टीना हिंगिस होंगी. लेकिन भारत के युवा उभरते खिलाड़ी दिविज शरण ने यू एस ओपन में अपना खाता खोल दिया है. अपने पहले यूएस ओपन के डबल्स मुक़ाबले में पहले दौर के मैच में शरण ने जीत दर्ज करके दूसरे राउंड में प्रवेश कर लिया है. गुरूवार को क़रीब एक घंटे तक चले मैच में भारत के दिविज शरण और ताईपे के येन सुन लू की जोड़ी ने हॉलैंड के रोबिन हास और इगोर सिसलिंग की जोड़ी को सीधे सेटों में 6-1 7-5 से पराजित कर अगले राउंड में प्रवेश किया. पहली बार यू एस ओपन के पुरूषों के डबल्स मैच में जीत के बाद दिविज शरण ने खुशी जताते हुए कहा मुझे बहुत अच्छा लग रहा है. और पहले ग्रैंड स्लैम मैच की जीत से मैं बहुत खुश हूं. यहां मैं 9 साल पहले जूनियर्स खेलने आया था और अब पुरूषों के डबल्स में पहले राउंड की जीत से बहुत खुश हूं. शरण ने बताया की वह अपने जोड़ीदार सुन लू के साथ पहली बार खेल रहे थे लेकिन उन दोंनो का तालमेल बहुत अच्छा रहा. दिल्ली के रहने वाले दिविज शरण जब दिल्ली में रहते हैं तो सिरी फ़ोर्ट में टेनिस प्रैक्टिस और फ़िटनेस ट्रेनिंग करते हैं. शरण कहते हैं कि भारत के मशहूर खिलाड़ी लिएंडर पेस और महेश भूपति उनके आईडल हैं. और वह इन अनुभवी खिलाड़ियों के साथ खेलकर प्रोत्साहित होते हैं. अब यू एस ओपन के दूसरे राउंड में शरण और लू का मुकाबला इसराइल के जोनथन एलरिच और एंडी राम की जोड़ी से होगा. पूरूषो के डबल्स के अन्य मैच में लिएंडर पेस ने अपना पहले दौर का मैच जीत लिया. चौथी वरियता प्राप्त पेस और राडेक स्टेपनिक की जोड़ी ने नीमेनेन औऱ सुरनोव की जोड़ी को 6-4 7-6 से हराकर दूसरे दौर में प्रवेश कर लिया है. अब उनका मुक़ाबला जर्मनी के डेनिएल ब्रैंड और ऑस्ट्रिया के फिलिप ओसवालड की जोड़ी से होगा. महिला वर्ग में 10वीं वरियता प्राप्त भारत की सानिया मिर्ज़ा और चीन की जी झेंग की जोड़ी ने आसानी से अपना पहला दौर का मैच सीधे सेटों से जीतकर दूसरे राउंड में प्रवेश कर लिया है. अब उनका मुक़ाबला पंगरी की केटलीन मलोसी और अमरीका की मेगन लेवी की जोडी से होगा. |
| DATE: 2013-08-30 |
| LABEL: sports |
| [830] TITLE: भारत और मलेशिया का अहम मुक़ाबला |
| CONTENT: भारतीय हॉकी टीम ने मलेशिया में खेले जा रहे एशिया कप के सेमीफ़ाइनल में अपनी जगह बनाने के बाद अगले साल होने वाले विश्वकप हॉकी टूर्नामेंट की तरफ़ एक और क़दम बढ़ा दिया है. सेमीफ़ाइनल में भारत का सामना मेज़बान मलेशिया से होगा. दूसरा सेमीफ़ाइनल पाकिस्तान और पहले ही विश्वकप का टिकट हासिल कर चुकी दक्षिण कोरिया से होगा. दोनों सेमीफ़ाइनल मैच शुक्रवार को खेले जाएंगे. उल्लेखनीय है कि भारत के सामने अगले साल हॉलैंड में होने वाले विश्वकप हॉकी टूर्नामेंट में जगह बनाने की चुनौती है और उसे हर हाल में यह टूर्नामेंट जीतना होगा. पाकिस्तान के साथ भी मामला कुछ ऐसा ही है. एशियाई हॉकी के दो महारथी आज इस हालत में पहुँच चुके हैं कि उन्हें विश्व कप टूर्नामेंट में जगह बनाने के लिए नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं. भारत ने सेमीफाइनल में पहुंचने से पहले ओमान को 8-0 पूर्व विजेता दक्षिण कोरिया को 2-0 और बांग्लादेश को 9-1 से हराया. भारतीय हॉकी टीम जब कुछ सीनियर खिलाड़ियों की ग़ैरमौजूदगी में मलेशिया पहुंची थी तब शायद ही टीम पर किसी को इतना भरोसा रहा होगा. लेकिन जैसे ही भारत ने दक्षिण कोरिया को मात दी लोगों का भरोसा टीम पर जमने लगा. भारतीय टीम ने अभी तक केवल एक गोल खाया है. इसमें यकीनन टीम के गोलरक्षक और उपकप्तान पीआर श्रीजेश की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही है क्योंकि उन्होंने कई अवसरों पर शानदार बचाव किए. सेमीफाइनल तक की राह में भारत को विशेष कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा. भारतीय टीम के लिए सबसे अच्छी बात यह रही कि उसके युवा खिलाड़ी पहली परीक्षा में कामयाब रहे. मालक सिंह पिछले दिनों हॉकी इंडिया लीग में उभरकर सामने आए थे और उन्हें इसके बाद सुल्तान अज़लान शाह कप हॉकी टूर्नामेंट में खेलने का अवसर भी मिला था. उस टूर्नामेंट में भारतीय टीम की कप्तानी का भार दानिश मुज्तबा के कंधों पर था. तब चयनकर्ताओं की सोच यही थी कि इनके साथ-साथ कुछ और खिलाड़ियों को मलेशिया का अनुभव मिल सके. हालांकि यह बात और है कि एशिया कप शुरू होने से पहले ही दानिश मुज्तबा एसवी सुनील गुरविंदर सिंह चांदी और आकाशदीप घायल हो गए जिसकी वजह से टीम की आक्रामक पंक्ति बेहद कमज़ोर हो गई. ऐसे नाज़ुक समय में भारतीय टीम की समस्या तब और बढ़ गई जब मलेशिया पहुंचते-पहुंचते टीम के कप्तान सरदार सिंह भी बीमार हो गए और वह पहला मैच खेलने मैदान पर नहीं उतर पाए. भारतीय टीम ने उस वक्त राहत की सांस ली जब अगले मैचों में वे फिट होकर मैदान पर उतरे और उन्हें पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ रुपिंदर पाल सिंह और अनुभवी वीआर रघुनाथ का साथ मिला जिन्होंने बांग्लादेश के खिलाफ गोल करने का कोई भी अवसर नहीं गंवाया. लेकिन अब मुक़ाबला मेज़बान मलेशिया से है जो अपने घरेलू मैदान पर अपने ही लोगों के सामने जीत हासिल करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहेगी. मलेशिया के सामने भी विश्वकप में जगह बनाने का दबाव है इसलिए इस मुक़ाबले में दोनों टीमों के बीच ज़ोरदार संघर्ष होगा. वहीं दूसरे सेमीफाइनल में कोरिया और पाकिस्तान आमने-सामने होंगे जहाँ पाकिस्तान के लिए भी बहुत कुछ दांव पर है. इसके बाद ही पता चलेगा कि एक सितंबर को होने वाले फाइनल में कौन सी दो टीमें जगह बना पाती हैं. |
| DATE: 2013-08-30 |
| LABEL: sports |
| [831] TITLE: ध्यानचंद और केएल सहगल की वो मीठी तकरार |
| CONTENT: लोग उन्हें हॉकी का जादूगर कहते थे. किसी खिलाड़ी की महानता को नापने का सबसे बड़ा पैमाना है कि उसके साथ कितनी किवदंतियाँ जुड़ी हैं. उस हिसाब से तो मेजर ध्यानचंद का कोई जवाब नहीं है. हॉलैंड में लोगों ने उनकी हॉकी स्टिक तुड़वा कर देखी कि कहीं उसमें चुंबक तो नहीं लगा है. जापान के लोगों को अंदेशा था कि उन्होंने अपनी स्टिक में गोंद लगा रखी है. हो सकता है कि इनमें से कुछ बातें बढ़ा-चढ़ा कर कही गई हों लेकिन अपने ज़माने में इस खिलाड़ी ने किस हद तक अपना लोहा मनवाया होगा इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि विएना के स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक मूर्ति लगाई गई है जिसमें उनके चार हाथ और उनमें चार स्टिकें दिखाई गई हैं. मानो वो कोई देवी हों. 1936 के बर्लिन ओलंपिक में उनके साथ खेले और बाद में पाकिस्तान के कप्तान बने आईएनएस दारा ने वर्ल्ड हॉकी मैगज़ीन के एक अंक में लिखा था ध्यान के पास कभी भी तेज़ गति नहीं थी बल्कि वो धीमा ही दौड़ते थे. लेकिन उनके पास गैप को पहचानने की गज़ब की क्षमता थी. बाएं फ्लैंक में उनके भाई रूप सिंह और दाएं फ़्लैंक में मुझे उनके बॉल डिस्ट्रीब्यूशन का बहुत फ़ायदा मिला. डी में घुसने के बाद वो इतनी तेज़ी और ताकत से शॉट लगाते थे कि दुनिया के बेहतरीन से बेहतरीन गोलकीपर के लिए भी कोई मौका नहीं रहता था. दो बार के ओलंपिक चैंपियन केशव दत्त ने हमें बताया कि बहुत से लोग उनकी मज़बूत कलाइयों ओर ड्रिब्लिंग के कायल थे लेकिन उनकी असली प्रतिभा उनके दिमाग़ में थी. वो उस ढंग से हॉकी के मैदान को देख सकते थे जैसे शतरंज का खिलाड़ी चेस बोर्ड को देखता है. उनको बिना देखे ही पता होता था कि मैदान के किस हिस्से में उनकी टीम के खिलाड़ी और प्रतिद्वंद्वी मूव कर रहे हैं. याद कीजिए 1986 के विश्व कप फुटबॉल का फ़ाइनल. माराडोना ने बिल्कुल ब्लाइंड एंगिल से बिना आगे देखे तीस गज़ लंबा पास दिया था जिस पर बुरुचागा ने विजयी गोल दागा था. किसी खिलाड़ी की संपूर्णता का अंदाज़ा इसी बात से होता है कि वो आँखों पर पट्टी बाँध कर भी मैदान की ज्योमेट्री पर महारत हासिल कर पाए. केशव दत्त कहते हैं जब हर कोई सोचता था कि ध्यानचंद शॉट लेने जा रहे हैं वो गेंद को पास कर देते थे. इसलिए नहीं कि वो स्वार्थी नहीं थे जो कि वो नहीं थे बल्कि इसलिए कि विरोधी उनके इस मूव पर हतप्रभ रह जाएं. जब वो इस तरह का पास आपको देते थे तो ज़ाहिर है आप उसे हर हाल में गोल में डालना चाहते थे. 1947 के पूर्वी अफ़्रीका के दौरे के दौरान उन्होंने केडी सिंह बाबू को गेंद पास करने के बाद अपने ही गोल की तरफ़ अपना मुंह मोड़ लिया और बाबू की तरफ़ देखा तक नहीं. जब उनसे बाद में उनकी इस अजीब सी हरकत का कारण पूछा गया तो उनका जवाब था अगर उस पास पर भी बाबू गोल नहीं मार पाते तो उन्हें मेरी टीम में रहने का कोई हक़ नहीं था. 1968 में भारतीय ओलंपिक टीम के कप्तान रहे गुरुबख़्श सिंह ने मुझे बताया कि 1959 में भी जब ध्यानचंद 54 साल के हो चले थे भारतीय हॉकी टीम का कोई भी खिलाड़ी बुली में उनसे गेंद नहीं छीन सकता था. 1936 के ओलंपिक खेल शुरू होने से पहले एक अभ्यास मैच में भारतीय टीम जर्मनी से 4-1 से हार गई. ध्यान चंद अपनी आत्मकथा गोल में लिखते हैं मैं जब तक जीवित रहूँगा इस हार को कभी नहीं भूलूंगा. इस हार ने हमें इतना हिला कर रख दिया कि हम पूरी रात सो नहीं पाए. हमने तय किया कि इनसाइड राइट पर खेलने के लिए आईएनएस दारा को तुरंत भारत से हवाई जहाज़ से बर्लिन बुलाया जाए. दारा सेमीफ़ाइनल मैच तक ही बर्लिन पहुँच पाए. जर्मनी के ख़िलाफ फाइनल मैच 14 अगस्त 1936 को खेला जाना था. लेकिन उस दिन बहुत बारिश हो गई. इसलिए मैच अगले दिन यानी 15 अगस्त को खेला गया. मैच से पहले मैनेजर पंकज गुप्ता ने अचानक कांग्रेस का झंडा निकाला. उसे सभी खिलाड़ियों ने सेल्यूट किया उस समय तक भारत का अपना कोई झंडा नहीं था. वो गुलाम देश था इसलिए यूनियन जैक के तले ओलंपिक खेलों में भाग ले रहा था. बर्लिन के हॉकी स्टेडियम में उस दिन 40 हज़ार लोग फ़ाइनल देखने के लिए मौजूद थे. देखने वालों में बड़ौदा के महाराजा और भोपाल की बेगम के साथ साथ जर्मन नेतृत्व के चोटी के लोग मौजूद थे. ताज्जुब ये था कि जर्मन खिलाड़ियों ने भारत की तरह छोटे छोटे पासों से खेलने की तकनीक अपना रखी थी. हाफ़ टाइम तक भारत सिर्फ़ एक गोल से आगे था. इसके बाद ध्यान चंद ने अपने स्पाइक वाले जूते और मोज़े उतारे और नंगे पांव खेलने लगे. इसके बाद तो गोलों की झड़ी लग गई. दारा ने बाद में लिखा छह गोल खाने के बाद जर्मन रफ़ हॉकी खेलने लगे. उनके गोलकीपर की हॉकी ध्यान चंद के मुँह पर इतनी ज़ोर से लगी कि उनका दांत टूट गया. उपचार के बाद मैदान में वापस आने के बाद ध्यान चंद ने खिलाड़ियों को निर्देश दिए कि अब कोई गोल न मारा जाए. सिर्फ़ जर्मन खिलाड़ियों को ये दिखाया जाए कि गेंद पर नियंत्रण कैसे किया जाता है. इसके बाद हम बार-बार गेंद को जर्मन डी में ले कर जाते और फिर गेंद को बैक पास कर देते. जर्मन खिलाड़ियों की समझ में ही नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है. भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराया और इसमें तीन गोल ध्यान चंद ने किए. एक अख़बार मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा बर्लिन लंबे समय तक भारतीय टीम को याद रखेगा. भारतीय टीम ने इस तरह की हॉकी खेली मानो वो स्केटिंग रिंक पर दौड़ रहे हों. उनके स्टिक वर्क ने जर्मन टीम को अभिभूत कर दिया. भारत लौटने के बाद ध्यानचंद के साथ एक मज़ेदार घटना हुई. फ़िल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ध्यानचंद के फ़ैन थे. एक बार मुंबई में हो रहे एक मैच में वो अपने साथ नामी गायक कुंदन लाल सहगल को ले आए. हाफ़ टाइम तक कोई गोल नहीं हो पाया. सहगल ने कहा कि उन्होंने दोनों भाइयों का बहुत नाम सुना है. मुझे ताज्जुब है कि आप में से कोई आधे समय तक एक गोल भी नहीं कर पाया. रूप सिंह ने तब सहगल से पूछा कि क्या हम जितने गोल मारें उतने गाने हमें आप सुनाएंगे सहगल राज़ी हो गए. दूसरे हाफ़ में दोनों भाइयों ने मिल कर 12 गोल दागे. लेकिन फ़ाइनल विसिल बजने से पहले सहगल स्टेडियम छोड़ कर जा चुके थे. अगले दिन सहगल ने अपने स्टूडियो तक आने के लिए ध्यान चंद के पास अपनी कार भेजी. लेकिन जब ध्यान चंद वहाँ पहुंचे तो सहगल ने कहा कि गाना गाने का उनका मूड उखड़ चुका है. ध्यान चंद बहुत निराश हुए कि सहगल ने नाहक ही उनका समय ख़राब किया. लेकिन अगले दिन सहगल खुद अपनी कार में उस जगह पहुँचे जहाँ उनकी टीम ठहरी हुई थी और उन्होंने उनके लिए 14 गाने गाए. न सिर्फ़ गाने बल्कि उन्होंने हर खिलाड़ी को एक एक घड़ी भी भेंट क |
| DATE: 2013-08-29 |
| LABEL: sports |
| [832] TITLE: आईबीएलः अब फाइनल में जाने की जंग |
| CONTENT: इंडियन बैडमिंटन लीग का पहला सेमीफाइनल बुधवार को हैदराबाद हॉटशाटस और पुणे पिस्टंस के बीच खेला जाएगा जबकि दूसरा सेमीफाइनल गुरूवार को अवध वॉरियर्स और मुंबई मास्टर्स के बीच होगा. फाइनल रविवार को मुंबई में होगा. सेमीफाइनल में पहुंचने से पहले अगर सभी टीमों के प्रदर्शन की बात की जाए तो हैदराबाद ने अपनी आइकन खिलाड़ी साइना नेहवाल की अगुवाई में पांच में से तीन मैच जीते और 17 अंको के साथ पहले स्थान पर रही. अवध वॉरियर्स ने पीवी सिंधू की अगुवाई में पांच में से तीन मैच जीते जबकि पुणे पिस्टंस ने भी अश्विनी पोनप्पा के नेतृत्व में पांच में से तीन जीत और दो हार के साथ एक समान 16-16 अंको के साथ सेमीफाइनल में जगह बनाई. चौथी टीम मुंबई मास्टर्स ने दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी मलेशिया के ली चोंग वेई की अगुवाई में दो जीत और तीन हार के साथ 15 अंकों से अंतिम चार में जगह बनाई. पहला सेमीफाइनल हैदराबाद में होने की वजह से मेज़बान टीम को स्थानीय दर्शकों का समर्थन तो मिलेगा ही और साइना नेहवाल तो उसकी स्टार खिलाड़ी है ही. उन्होंने अपने पहले ही मैच में विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक लेकर वापस लौटीं और आत्मविश्वास से लबालब अवध वॉरियर्स की पीवी सिंधू को हराकर दिखा दिया कि अनुभव को भी आसानी में नज़रअंदाज़ नही किया जा सकता. अब यह बात अलग है कि हैदराबाद को जिस टीम से चुनौती मिलने जा रही है उसकी आइकन खिलाड़ी अश्विनी पोनप्पा की भी भारतीय बैडमिंटन में अपनी एक विशेष पहचान है. हैदराबाद की टीम में साइना के अलावा पूर्व विश्व चैंपियन तौफीक हिदायत और अजय जयराम जैसे खिलाड़ी भी हैं. पुणे पिस्टंस के पास महिला एकल वर्ग में विश्व की तीसरी वरीयता हासिल खिलाड़ी जूलियन शेंक भी हैं. पुणे के पास पुरूष युगल के बेहतरीन खिलाड़ियो के रूप में सनावे थॉमस और रुपेश कुमार भी हैं. वहीं दूसरे सेमीफाइनल के लिए मुंबई मास्टर्स और अवध वॉरियर्स के पास भी स्टार खिलाड़ी है. अवध के पास पीवी सिंधू गुरू साई दत्त और के श्रीकांत जैसे जाने पहचाने चेहरे है. वहीं मुंबई के पास ली चोंग वेई जैसा दुनिया का सबसे बेहतरीन पुरूष एकल खिलाड़ी है तो महिला वर्ग में पी तुलसी और टिने बाउन है. इंडियन बैडमिंटन लीग के दर्शकों में केवल बैडमिंटन प्रेमी नही थे बल्कि मुंबई में दुनिया के महान क्रिकेटर सुनील गावस्कर बंगलौर में क्रिकेटर राहुल द्रविण मुंबई में ही सचिन तेंदूलकर और उनकी पत्नि अंजलि तेंदूलकर हैदराबाद में प्रज्ञान ओझा ने भी मैचों का लुत्फ लिया. इस लीग में थोडा बहुत हो-हल्ला खिलाड़ियों को मिलने वाले पैसे को लेकर भी हुआ जिसमें ज्वाला गुट्टा अश्विनी पोनप्पा और बाद में तो तौफीक हिदायत भी इस विवाद में कूदे लेकिन अब मामला शांत है. आयोजन स्थल पर आम सुविधाओं को लेकर भी शिकायतें सुनने को मिलीं लेकिन जैसे-तैसे इसका पहला संस्करण तो पूरा होता नज़र आ रहा है अब यह बात अलग है कि जितने धूमधडाके की उम्मीद की जा रही थी उतना तो नही है. |
| DATE: 2013-08-28 |
| LABEL: sports |
| [833] TITLE: यूएस ओपनः फेडरर और जोकोविच दूसरे दौर में |
| CONTENT: दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी नोवाक जोकोविच और पांच बार के चैम्पियन रोजर फेडरर यूएस ओपन के दूसरे दौर में पहुंच गए हैं. सर्बिया के जोकोविच ने पहले दौर में विश्व के 112वें नंबर के खिलाड़ी लिथुआनिया के रिकार्ड्स बेरानकिस को लगातार सेटों में 6-1 6-2 6-2 से शिकस्त दी. रिकॉर्ड 17 ग्रैंड स्लेम ख़िताबों के विजेता और टूर्नामेंट में सातवीं सीड स्विट्जरलैंड के फेडरर ने स्लोवेनिया के ग्रेगा ज़ेम्लजा को 93 मिनट में 6-3 6-2 7-5 के हराया. फेडरर का मैच सोमवार को होना था लेकिन बारिश के कारण इस मैच को एक दिन आगे खिसका दिया गया था. जोकोविच और फेडरर के अलावा पांचवीं सीड चेक गणराज्य के टॉमस बर्डिच और अमरीका के जॉन इस्नर भी दूसरे दौर में पहुंच गए. महिला वर्ग में गत उपविजेता और ऑस्ट्रेलियन ओपन चैम्पियन बेलारूस की विक्टोरिया अज़ारेंका आसान जीत के साथ दूसरे दौर में पहुंच गईं. ख़िताब की प्रबल दावेदार मानी जा रहीं दूसरी सीड अज़ारेंका ने जर्मनी की दीना फ़ाइज़ेनमेयर को 6-0 6-0 से हराया. इटली की सारा ईरानी विश्व की पूर्व नंबर एक खिलाड़ी डेनमार्क की कैरोलीन वोज्नियाकी पूर्व विंबलडन चैम्पियन और अना इवानोविच ने भी दूसरे दौर में जगह बना ली. लेकिन टूर्नामेंट का सबसे बड़ा उलटफेर किया अमरीकी क्वालिफ़ायर विक्टोरिया डूवल ने. सत्रह साल की विक्टोरिया ने पूर्व चैम्पियन ऑस्ट्रेलिया की सामंता स्टोज़र को तीन सेटों तक चले मैराथन मुक़ाबले में 5-7 6-4 6-4 से हराया. डूवल जब सात साल की थीं तो हैती में लुटेरों ने उन्हें बंधक बना लिया था. इस घटना के बाद उनके डॉक्टर माता-पिता ने वापस अमरीका जाने का फ़ैसला किया. स्टोज़र ने भी डूवल के खेल की सराहना करते हुए कहा कि वह जीत की हक़दार थीं. |
| DATE: 2013-08-28 |
| LABEL: sports |
| [834] TITLE: यूएस ओपनः सरीना और नडाल दूसरे दौर में |
| CONTENT: सरीना विलियम्स और रफ़ाएल नडाल यूएस ओपन टेनिस मुक़ाबले के दूसरे दौर में पहुँच गए हैं. अमरीका की सरीना ने इटली की अपनी प्रतिद्वंदी फ्रैंसेस्का शियावोने को मात्र एक घंटो में 6-0 6-1 से आसानी से हरा दिया. मुक़ाबला जीतने के बाद सरीना ने कहा मैं जानती थी कि पहले ही दौर में ग्रैंड स्लैम विजेता से खेलना काफ़ी मुश्किल मुक़ाबला होता है इसीलिए मैंने तय कर लिया था कि इस मुक़ाबले को मैं पूरी गंभीरता से लूँगी. दूसरी वरीयता प्राप्त रफ़ाएल नडाल ने अमरीका के रियान हैरिसन को 6-4 6-2 6-2 से हरा दिया. स्पेन के लिए खेलने वाले नडाल 2010 में यूएस ओपन के विजेता रह चुके हैं. साल 2013 का आख़िरी ग्रैंड स्लैम यूएस ओपन सोमवार को शुरू हुआ. नडाल 2011 में यूएस ओपन के फ़ाइनल में नोवाक जोकोविच से हारने के बाद पहली बार यूएस ओपन में खेल रहे हैं. नडाल घुटने में चोट लगने के कारण 2012 यूएस ओपन में नहीं खेल पाए थे. अमरीकी खिलाड़ी वीनस विलियम्स ने बेल्जियम की कर्सटन फ्लिपकेंस को 6-1 6-2 से हरा दिया. वीनस साल 2000 और 2001 में यूएस ओपन जीत चुकी हैं. पिछले साल यूएस ओपन की विजता रही 31 वर्षीय सरीना ने 33 वर्षीय शियावोने को खेल के हर विभाग में मात दी. उनके बीच का मुक़ाबला पूरी तरह एकतरफ़ा रहा. शियावोने ने 2010 में फ्रेंच ओपन का ख़िताब जीता था. यूएस ओपन में पाँच बार विजेता रह चुके स्विस खिलाड़ी रोजर फ़ेडरर का मुक़ाबला स्लोवेनिया के ग्रेगा ज़ेमजा से था. यह मुक़ाबला बारिश के कारण स्थगित हो गया. पांचवी वरीयता प्राप्त चीन की खिलाड़ी ली ना ने बेलारूस की ओल्गा गोवोर्तसोवा को 6-2 6-2 से हरा दिया. ली ना 2011 में फ्रेंच ओपन जीत चुकी हैं. 26 अगस्त से अमरीका के न्यूयॉर्क में शुरू हुआ यूएस ओपन नौ सितम्बर तक चलेगा. |
| DATE: 2013-08-27 |
| LABEL: sports |
| [835] TITLE: भारत एशिया कप हॉकी सेमीफाइनल में |
| CONTENT: एशिया कप हॉकी टूर्नामेंट में ग्रुप-बी के एक अहम मुकाबले में भारत ने दक्षिण कोरिया को 2-0 से हराकर सेमीफाइनल में जगह बना ली है. मलेशिया के इपोह के अज़लान शाह स्टेडियम में रविवार को खेले गए इस मैच में भारतीय टीम ने मैच के छठे मिनट में गोल कर शुरुआती बढ़त हासिल कर ली. एशिया कप में दक्षिण कोरिया के ख़िलाफ़ भारत का प्रदर्शन हमेशा से ही बेहतर रहा है. इन दोनों टीमों के बीच अब तक नौ मैच खेले गए हैं जिनमें से भारत ने छह में जीत दर्ज की है. एक मैच बराबरी पर छूटा है जबकि दो मैच में भारत की हार हुई है. वैसे अब तक इन दोनों टीमों के बीच 69 मुकाबले हुए हैं जिनमें से 27 में भारत की जीत हुई है. 12 मुकाबले ड्रॉ हुए हैं जबकि 30 में उसे हार का सामना करना पड़ा है. रविवार को दोनों टीमों के बीच कांटे का मुकाबला हुआ. वैसे आमतौर पर दोनों टीमों के बीच इसी तरह के मैच होते हैं. मैच शुरू होने के छठे मिनट में वी आर रघुनाथ ने पहले पेनाल्टी कॉर्नर को गोल में तब्दील कर भारत को शुरुआती बढ़त दिलाई. इसके बाद दोनों टीमों ने शानदार खेल का प्रदर्शन किया. वैसे मध्यांतर तक के खेल में भारतीय खिलाड़ी प्रतिद्वंद्वियों पर हावी रहे. मध्यांतर के बाद दोनों टीमों के खिलाड़ियों ने अपनी रफ्तार कम कर दी और संभलकर खेलने लगे. लंबे समय बाद मैदान पर लौटे भारतीय टीम के कप्तान सरदारा सिंह ने मिडफील्ड में शानदार खेल दिखाया. खेल के 65वें मिनट में भारतीय खिलाड़ी मनदीप सिंह ने दो कोरियाई खिलाड़ियों को छकाते हुए शानदार गोल किया. इस गोल से साथ भारत ने इस मैच में करीब-करीब अजेय बढ़त हासिल कर ली. इस टूर्नामेंट में मनदीप का यह चौथा गोल था. भारतीय गोलकीपर पी आर श्रीजेश को मैन ऑफ द मैच घोषित किया गया. |
| DATE: 2013-08-26 |
| LABEL: sports |
| [836] TITLE: अमरीकी ओपन में दिग्गज खिलाड़ियों की भिड़ंत |
| CONTENT: टेनिस की दुनिया में साल 2013 का आखिरी ग्रैंड स्लैम यूएस ओपन यानी अमरीकी ओपन सोमवार से शुरू हो रहा है जिसमें दुनिया भर के दिग्गज अपना ज़ोर लगाएंगे. इस टूर्नामेंट में पुरुष वर्ग में मौजूदा चैंपियन ब्रिटेन के एंडी मरे और महिला वर्ग में अमरीका की सेरेना विलियम्स अपना ख़िताब बचाने की कोशिश करेंगे. इस टूर्नामेंट में हैरतअंगेज़ रूप से स्विटज़रलैंड के रोजर फ़ेडरर को 7वीं वरीयता दी गई है क्योंकि पिछले एक साल में उनके प्रदर्शन में बेहद गिरावट आई है. इससे पहले रोजर फ़ेडरर साल 2002 अक्तूबर में अपनी विश्व रैंकिग में इतनी कमज़ोर स्थति में थे जब उन्हें आठवीं वरीयता मिली थी. इतना ही नहीं पिछले 11 साल में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी ग्रैंड स्लैम में उन्हे शीर्ष तीन में भी जगह नही मिली है. रोजर फ़ेडरर का दबदबा अमरीकी ओपन में कितना रहा है इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होने साल 2004 2005 2006 2007 2008 में उन्होंने इसे अपने नाम किया. यूएस ओपन में 2009 में अर्जेंटीना के मार्टिन डेल पोत्रो चैंपियन बने तो 2010 में स्पेन के राफेल नडाल 2011 में सर्बिया के नोवाक जोकोविच ओर 2012 में ब्रिटेन के एंडी मरे ने ख़िताब अपने नाम किया. इस बार अमरीकी ओपन में पुरूष वर्ग में रफ़ाएल नडाल नोवाक जोकोविच और एंडी मरे चैंपियन बनने की दौड़ में सबसे आगे हैं. रफ़ाएल नडाल ने पिछले दिनों अपनी फिटनेस पर काफी ध्यान दिया और ख़ासकर विंबलडन में शुरूआती दौर में ही बाहर होने से उन्हें जो झटका लगा उसके बाद उन्होंने पिछले हफ़्ते ही वेस्टर्न एंड सदर्न ओपन जीतकर एक तरह से अपने विरोधियों को सीधे-सीधे संदेश दे दिया है कि उनसे बचकर रहें. उनके अलावा ब्रिटेन के एंडी मरे ने पिछले साल विम्बलडन के फाइनल में हारने के बाद जिस तरह अमरीकी ओपन जीता और इस साल विम्बलडन जीतकर ना सिर्फ अपनी बल्कि अपने देशवासियों की हसरत को भी पूरा किया जिसके लिए वह लम्बे समय से इंतज़ार कर रहे थे. महिला वर्ग में अमरीका की सेरेना विलियम्स इस साल भी ख़िताब की प्रबल दावेदार हैं. उन्होंने पिछले हफ़्ते वेस्टर्न एंड सदर्न ओपन के फाइनल में जगह बनाई जहां वह विक्टोरिया अजारेंका से हार गई लेकिन इससे पहले वह लगातार 14 मैच जीती जिससे पता चलता है कि वो किस फॉर्म में हैं. वैसे इस साल टेनिस प्रेमियों को विश्व वरियता में तीसरे नंबर की खिलाड़ी रूस की मारिया शारापोवा नज़र नही आएंगी क्योंकि उन्होने कंधे की चोट के कारण अपना नाम वापस ले लिया है. शारापोवा भी 2006 में अमरीकी ओपन अपने नाम कर चुकी है. महिला वर्ग में विक्टोरिया अज़ारेंका और चीन की ली ना पर भी सबकी नज़रे रहेंगी. इस टूर्नामेंट में भारतीय चुनौती की बात करें तो पुरूषो के एकल वर्ग में सोमदेव देव वर्मन मुख्य दौर में अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे है. वह पहले दौर में स्लोवाकिया के लुकास लैंको से भिडेंगे. सोमदेव की विश्व वरीयता 113वीं है जबकि लैंको 85वें नंबर पर हैं यानी पहले ही दौर से उन्हें कठिन चुनौती का सामना करना पड़ेगा. वहीं महिला युगल वर्ग में भारत की सानिया मिर्ज़ा और उनकी जोड़ीदार चीन की झेंग झेई ने दो दिन पहले ही न्यू हेवन टूर्नामेंट में महिला युगल का ख़िताब जीतकर उम्मीदें जगाई हैं. वहीं पुरूषों के युगल वर्ग में भारत के लिएंडर पेस अपने जोड़ीदार चेक खिलाड़ी राडेक स्टेपनेक अपनी चुनौती पेश करेंगे. इनके अलावा महेश भूपति और रोहन बोपन्ना का सफर भी कहा तक पहुंचता है अभी कहना मुशकिल है. |
| DATE: 2013-08-26 |
| LABEL: sports |
| [837] TITLE: ऐशेज सिरीज़ का नाटकीय अंत |
| CONTENT: इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच ऐशेज़ सिरीज का अंत बेहद नाटकीय रहा और मेजबान इंग्लैंड के हाथों से 4-0 की ऐतिहासिक जीत हासिल करने का मौका निकल गया. सिरीज के पांचवें और अंतिम टेस्ट में इंग्लैंड की जीत के लिए 24 गेंदों में 21 रन बनाने थे लेकिन खराब रोशनी के कारण खेल रोक दिया गया. इससे नाराज दर्शकों ने अंपायरों और ऑस्ट्रेलिया के कप्तान माइकल क्लार्क का मज़ाक उड़ाया. इंग्लैंड ने 3-0 से सिरीज़ जीती. 1977-78 के बाद यह पहला मौका है जब इंग्लिश टीम ने जब उसने लगातार तीन बार ऐशेज़ ट्राफी पर कब्जा किया है. दोनों टीमें इस मैच को जीतने के लिए आतुर दिखीं और यही वजह है कि ऐशेज़ सिरीज़ के अंतिम दिन 447 रन बने और 17 विकेट गिरे. ऑस्ट्रेलिया ने पहली पारी में 115 रन की बढ़त हासिल करने के बाद अपनी दूसरी पारी छह विकेट पर 111 रन बनाकर समाप्त घोषित की और इंग्लैंड को 44 ओवर में 227 रन का लक्ष्य दिया. कप्तान एलेस्टर कुक 34 और जोनाथन ट्रॉट 59 ने दूसरे विकेट के लिए 64 रन की साझेदारी और केविन पीटरसन ने 55 गेंदों में 62 रन ठोककर इंग्लैंड की उम्मीदों को परवान चढ़ाया. ट्रॉट और पीटरसन के आउट होने के बाद क्रिस वोक्स और इयान बेल ने रन गति को बनाए रखा. लेकिन इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने रोशनी कम होने की शिकायत की. बेल के 17 रन के निजी स्कोर पर आउट होने के बाद अंपायरों ने रोशनी की स्थिति का जायजा लिया और मैच समाप्त करने का अनचाहा फ़ैसला किया. आतिशबाज़ी के बीच इंग्लैंड के कप्तान कुक ने विजेता ट्राफी उठाई. इंग्लिश टीम की ऐशेज़ में यह 1978-79 के बाद सबसे बड़ी जीत है. तब उसने 5-1 से ऑस्ट्रेलिया को हराया था. साथ ही इंग्लैंड की 1977 के बाद यह घर में सबसे बड़ी जीत है. तब टीम 3-0 से जीती थी. इस जीत से इंग्लैंड आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में भारत को पछाड़कर दूसरे नंबर पर पहुंच गया है जबकि ऑस्ट्रेलिया पांचवें स्थान पर फिसल गया है. |
| DATE: 2013-08-26 |
| LABEL: sports |
| [838] TITLE: आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में इंग्लैंड ने भारत को पछाड़ा |
| CONTENT: ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच बहुचर्चित ऐशेज़ सिरीज़ की समाप्ति के बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद आईसीसी की टेस्ट रैंकिंग में इंग्लैंड एक स्थान ऊपर चढ़कर दूसरे नंबर पर पहुँच गया है. इंग्लैंड ने ऐशेज़ 3-0 से जीत ली है. ओवल में हुआ पाँचवाँ और आख़िरी टेस्ट ड्रॉ समाप्त हुआ. इंग्लैंड के एक पायदान ऊपर चढ़ने का नुक़सान भारत को उठाना पड़ा है. भारत इस रैंकिंग में एक स्थान नीचे गिरकर तीसरे नंबर पर पहुँच गया है. लेकिन सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ है ऑस्ट्रेलिया की टीम को जो अगस्त 2011 के बाद पहली बार टेस्ट रैंकिंग में पाँचवें नंबर पर आ गई है. ऐशेज़ शुरू होने से पहले टेस्ट रैंकिंग में इंग्लैंड दक्षिण अफ़्रीका और भारत के बाद तीसरे नंबर पर था. लेकिन 3-0 से जीतने के बाद उसने भारत को नीचे धकेल दिया. रैंकिंग में दूसरा स्थान हासिल करने के लिए इंग्लैंड को ओवल टेस्ट में ड्रॉ या फिर जीत की आवश्यकता थी. हालाँकि भारत और इंग्लैंड दोनों के रेटिंग प्वाइंट्स 116 ही हैं लेकिन दशमलव में अंकों के आकलन में इंग्लैंड को भारत पर बढ़त हासिल है. अगर ओवल टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया को जीत हासिल हुई होती तो भारत का दूसरा स्थान पक्का रहता लेकिन ऑस्ट्रेलिया की रैंकिंग गिरनी तय थी. ऐशेज़ में मिली हार के कारण ऑस्ट्रेलिया ने रैंकिंग में चार प्वाइंट्स गँवाए हैं. अब वो पाकिस्तान के भी नीचे पाँचवें नंबर पर है. छठे नंबर पर वेस्टइंडीज़ की टीम है और ऑस्ट्रेलिया वेस्टइंडीज़ से मात्र दो अंक आगे है. |
| DATE: 2013-08-26 |
| LABEL: sports |
| [839] TITLE: आईओए ने दागियो को बचाने की बिसात बिछाई |
| CONTENT: दागी पदाधिकारियों और अन्य अनियमिताओं के कारण अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक परिषद् की सम्बद्धता खो बैठे भारतीय ओलंपिक संघ ने एक आपात बैठक में ऐसे प्रस्ताव पास किये हैं जो अगर मान लिए गए तो दागी पदाधिकारियों के लिए रास्ता खुला रखेंगे. रविवार शाम एक बैठक में भारतीय ओलंपिक संघ ने कहा वो उन पदाधिकारियों को नहीं हाटाना चाहते जिन पर आरोप साबित नहीं हुए हैं. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक परिषद को अपनी बहाली के लिए भेजे गए एक प्रस्ताव में भारतीय संघ ने कहा की वो उन लोगों को संघ में सदस्य या पदाधिकारी नहीं बनने देंगे जिन्हें दो साल की सज़ा हो चुकी हो. यदि यह प्रस्ताव मान लिया जाता है तो राष्ट्रमंडल खेलों में घोटालों के आरोप में नौ महीने जेल में बिता चुके ललित भनोट राहत की सांस ले सकेंगें क्योंकि उनपर अभी तक केवल आरोप पत्र दायर है. उल्लेखनीय है कि ललित भनोट के अलावा संघ के पूर्व पदाधिकारी सुरेश कलमाड़ी और वीके वर्मा भी इस घोटाले में जेल जा चुके हैं और फ़िलहाल तीनों ज़मानत पर रिहा हैं. निलंबित भारतीय ओलंपिक संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष तरलोचन सिंह ने सभा समाप्त होने के बाद कहा आरोप लगने से दोषी करार नहीं दिया जा सकता- भारत में बहुत से लोगों पर आरोप लगते रहे हैं- संसद में भी ऐसे लोग हैं जिन पर आरोप लगे हुए हैं. जब तक दोषी साबित नहीं होता तब तक वह अपराधी घोषित नहीं किए जा सकते. इसके अलावा उन्होंने ये भी कहा कि ज्यादातर पदाधिकारी राजनेता हैं जिनके खिलाफ़ बेहद आसानी से आरोप पत्र दाखिल किए जा सकते हैं और ऐसे तो पूरा संघ ही जेल जा सकता है. तरलोचन सिंह ने कहा छोटी-मोटी दुर्घटना होने चेक बाउंस होने और यहां तक कि धरना-प्रदर्शन करने पर भी किसी के खिलाफ़ आरोप पत्र दाखिल किया जा सकता है. हमने अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति द्वारा पदों पर बने रहने की तय सीमा को मान लिया है. हम उम्र संबंधी संशोधन को भी मानने को तैयार हैं लेकिन ये सब बातें भारतीय ओलंपिक संघ पर लागू होंगी न कि दूसरे खेल संघों पर. भनोट पिछले चुनाव 4 दिसंबर में महासचिव चुने गए थे. वह फिर चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र हैं. नए चुनाव अगले महीने 29 तारीख को है. इस बैठक में आईओसी के पर्यवेक्षक फ्रांसिस्को जे एलज़ादे मौजूद थे. वह इस बारे में अपनी रिपोर्ट आईओसी को सौंपेंगे उसके बाद आईओसी को तय करना है कि निलंबित भारतीय ओलंपिक संघ के भविष्य को लेकर क्या कदम उठाए. इस बैठक में निलंबित भारतीय ओलंपिक संघ के कार्यवाहक अध्यक्ष विजय कुमार मल्होत्रा मौजूद नहीं थे लेकिन निलंबित आईओए के अध्यक्ष अभय चौटाला महासचिव ललित भनोट पूरे समय सभा में मौजूद रहे. इनके अलावा आईओसी में एकमात्र भारतीय प्रतिनिधि रणधीर सिंह मौजूद थे. कुल मिलाकर 182 में से 161 सदस्य बैठक में मौजूद थे. इसके अलावा निलंबित भारतीय ओलंपिक संघ ने आरोप पत्र दाखिल सदस्यों के संबंध में फैसले के लिए एक नैतिक आयोग एथिक्स कमीशन बनाया है जिसके तीन जज हैं. खेल प्रशासक के खिलाफ़ आरोप लगने पर नैतिक आयोग जांच करेगा और 60 दिन में अपनी रिपोर्ट कार्यकारी परिषद को देगा. आईओसी ने 15 अगस्त को आईओए को एक पत्र लिखकर कई संशोधन करने को कहा था. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के प्रतिनिधि मंडल के सदस्य फ्रांसिस्को ने कहा भारत बड़ा लोकतंत्र है. निलंबित समिति के 161 सदस्यों ने हिस्सा लिया. मैं इतनी बड़ी बैठक में पहली बार शामिल हुआ हूं. बैठक में जो कुछ हुआ मैं उससे संतुष्ट हूं. अगले महीने मैं फिर वापस आऊंगा इलेक्शन के लिए गारंटी नहीं कि निलंबन हट जाएगा. अब देखना है कि निलंबित भारतीय ओलंपिक समिति के इस कदम पर अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति क्या कदम उठाती है. |
| DATE: 2013-08-25 |
| LABEL: sports |
| [840] TITLE: अंडर-23 क्रिकेट: पाकिस्तान को हराकर भारत बना चैंपियन |
| CONTENT: पिछले साल अंडर-19 वर्ल्ड कप में भारत की विजेता टीम के स्टार उन्मुक्त चंद ने इस मैच में चौके के साथ शुरूवात की लेकिन जल्द ही आउट हो गए. सिंगापुर में खेले गए अंडर-23 एशियन क्रिकेट काउंसिल इमर्जिंग टीम्स एसीसीईटी कप के फ़ाइनल मुकाबले में भारत ने पाकिस्तान को नौ विकेट से हराकर खिताब जीत लिया. टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए पाकिस्तान ने 47 ओवर में 159 रन बनाए. इसके जवाब में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत ने एक विकेट खोकर 33-4 ओवर में 160 रन बनाकर मैच जीत लिया. भारत की ओर से लोकेश राहुल ने नाबाद 93 और मनप्रीत जुनेजा ने नाबाद 51 रन बनाएं. राहुल को मैन ऑफ़ द मैच जबकि सिरीज़ में दो शतक लगाने वाले संयुक्त अरब अमीरात के शैमन अनवर को मैन ऑफ द सिरीज़ का खिताब दिया गया. सिंगापुर के कालांग मैदान पर खेले गए इस मैच में भारत की धारदार गेंदबाजी के आगे पाकिस्तान का कोई बल्लेबाज़ टिक नहीं सका. पाकिस्तान की ओर से उमर वहीद ने नाबाद रहते हुए सबसे अधिक 41 रन बनाए. 32 रन के कुल योग पर पहला विकेट गंवाने वाले पाकिस्तान को 34 रन के योग पर दूसरा झटका लगा. इसके बाद हालांकि टीम ने संभलने की कोशिश की लेकिन 28वें ओवर में उसमान सलाउद्दीन के आउट होने के बाद निश्चित अंतराल पर विकेट गिरते रहे. इस तरह 47 ओवर में पूरी टीम आउट हो गई. भारत के लिए बाबा अपराजिता ने 7 ओवर में 28 रन देकर सबसे अधिक तीन विकेट झटके. संदीप शर्मा और सूर्य कुमार यादव को दो-दो विकेट मिले. इसके बाद एकदिवसीय क्रिकेट के हिसाब से एक आसान लक्ष्य को हासिल करने के लिए मैदान पर उतरी भारतीय टीम को 28 रन के कुल स्कोर पर पहला झटका लगा. छठे ओवर में 15 रन बनाकर उन्मुक्त चंद आउट हो गए. इसके बाद राहुल और जुनेजा ने शतकीय साझेदारी 128 रन निभाते हुए भारत को नौ विकेट से जीत दिलाई. पाकिस्तान की गेंदबाजी बेहद खराब रही. उसका कोई भी गेंदबाज प्रभावी साबित नहीं हुआ. उन्मुक्त को राज़ा हसन ने आउट किया. |
| DATE: 2013-08-25 |
| LABEL: sports |
| [841] TITLE: मैं मरने के कगार पर हूं: माइक टायसन |
| CONTENT: मशहूर बॉक्सर माइ्क टायसन ने शराब और ड्रग्स नहीं लेने की बात कही है. अपने ज़माने के दुनिया के सबसे सफल बॉक्सर माइक टायसन का कहना है कि ड्रग और शराब की लत ने उनकी जिंदगी तबाह कर दी है. टायसन ने स्वीकार किया है कि बीते सालों में उनका व्यवहार खराब रहा है लेकिन उन्होंने इस समस्या से उबरने की आशा जताई है. टेलीविजन चैनल ईएसपीएन के कार्यक्रम फ्राइडे नाइट फाइट्स में 47 वर्षीय टायसन ने कहा मैं एक सादा जीवन जीना चाहता हूं. मैं मरना नहीं चाहता. मैं मरने के कगार पर हूं क्योंकि मैं एक शराबी हूं. उन्होंने कहा मैं कभी कभी एक खराब इंसान बन जाता हूं. मैंने कई खराब काम किए लेकिन मैं इन्हें भूल जाना चाहता हूं. सन 1987 में टायसन 20 साल की उम्र में डब्ल्यूबीसी डब्ल्यूबीए और आईडब्ल्यूएफ का खिताब जितने वाले सबसे युवा बॉक्सर बने थे. लेकिन पांच साल बाद टायसन को बलात्कार के एक मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद छह साल की कैद की सजा सुनाई गई. इसके बाद हालांकि वह रिंग में लौटे लेकिन 2006 में उन्होंने इस खेल से संन्यास ले लिया. 2007 में उन्हें नशीले पदार्थ रखने और नशे की हालत में गाड़ी चालने के लिए 24 घंटे की जेल के अलावा 360 घंटे सामुदायिक सेवा करनी पड़ी थी. अमरीका के ब्रूकलिन में जन्मे टायसन ने कहा मैं आशा करता हूं कि वे मुझे भूल जाएंगे. मैं अपना जीवन बदलना चाहता हूं. मैं अब एक बदली हुई जिंदगी जीना चाहता हूं. मैंने पिछले छह दिनों से न तो शराब पी है और न ही ड्रग्स ली है और मेरे लिए यह एक आश्चर्य है. टायसन ने कहा जो लोग सोचते थे कि मैं एक अच्छा इंसान हूं उन सभी लोगों से मैं झूठ बोल रहा था. यह मेरा छठा दिन है. मैं अब कभी भी ड्रग और शराब का सेवन नहीं करूंगा. |
| DATE: 2013-08-25 |
| LABEL: sports |
| [842] TITLE: एशिया कप में जीत पहुंचाएगी विश्व कप में |
| CONTENT: भारतीय हॉकी टीम के कप्तान सरदार सिंह का कहना है कि टीम एशिया कप में बेहतरीन प्रदर्शन करने की कोशिश करेगी और उम्मीद है कि भारत टूर्नामेंट में जीत हासिल करेगा. एशिया कप हॉकी टूर्नामेंट 24 अगस्त से मलेशिया के इपोह शहर में शुरु हुआ है और एक सितंबर तक चलेगा. मलेशिया के लिए रवाना होने से पहले बीबीसी के साथ बातचीत में भारतीय टीम के कप्तान सरदार सिंह ने कहा यक़ीनन यह बेहद दबाव वाला टूर्नामेंट है. हम हर रोज़ तीन ट्रेनिंग सत्र में अभ्यास कर रहे है और जूनियर खिलाड़ियों के खेल में भी सुधार हुआ है. हम वीडियो सत्र में भी अपनी कमियों को देख रहे है. एशिया कप में हम अपना सर्वोत्तम देने की कोशिश करेंगे और उम्मीद है कि जीत जाएंगे. एशिया कप जीतने वाली टीम को अगले साल नीदरलैंड्स में होने वाले विश्व कप में सीधे जगह मिलेगी. और इसलिए पूर्व विश्व चैंपियन रही भारतीय टीम के पास अगले विश्व कप के लिए क्वालीफ़ाई करने का ये आख़िरी मौक़ा है. वैसे एशिया कप में भारत ने अपने अभियान की शानदार शुरूआत की है. अपने पहले मैच में भारत ने ओमान को 8-0 से हराया और जबकि अन्य मैच में पाकिस्तान ने जापान को 7-0 से मात दी. टीम के मुख्य कोच रोलेंट औल्टमेंट लाल टोपी में का कहना है कि वह छह हफ्ते से खिलाड़ियों से कड़ी मेहनत करवा रहे हैं. भारत पूल बी में कोरिया बांग्लादेश और ओमान के साथ है जबकि पूल ए में पाकिस्तान मेज़बान मलेशिया जापान और चीनी ताइपे हैं. जहां कोरिया पहले ही विश्व कप में पहुंच चुका है वहीं एशिया कप जीतने वाली टीम एशिया से क्वालीफ़ाई करने वाली दूसरी और आख़िरी टीम होगी. इसलिए अब ज़्यादा दबाव भारत और पाकिस्तान पर है. अगर समीकरणों पर नज़र डालें तो फाइनल में अगर कोरिया का सामना भारत या पाकिस्तान से होता है और कोरिया जीत भी जाता है तब भी हारने वाली टीम विश्व कप में पहुंच जाएगी. लेकिन अगर फ़ाइनल भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ तो उस हालत में केवल विजेता टीम ही विश्व कप के लिए क्वालीफ़ाई कर पाएगी. भारत की बात करें तो उस पर सिर्फ़ एशिया कप जीतने का दबाव ही नहीं है बल्कि टीम के सामने खिलाड़ियों की फ़िटनेस की समस्या भी है. दानिश मुज्तबा एस वी सुनील गुरविंदर सिंह चांदी और आकाशदीप सिंह चोट के कारण टीम से बाहर हैं. ऐसे में अनुभव की कमी भारत को महंगी पड सकती है. अनुभवी खिलाड़ियो के नाम पर टीम में वी आर रघुनाथ बीरेंद्र लाकडा और गोलकीपर उपकप्तान पीआर श्रीजेश हैं. लेकिन टीम में पांच अनुभवहीन खिलाड़ियों के होने से टीम के हाई पर्फ़ॉर्मेंस निदेशक और अंतरिम कोच रोलैंट ओल्टमैंस ज़्यादा परेशान नहीं हैं. ओल्टमैंस कहते हैं कि इसका अर्थ यह नहीं है कि यह खिलाड़ी ख़राब हैं. वहीं टीम के सहायक कोच एस के कौशिक कहते है अगर आप दूसरी नज़र से देखें तो अब इन खिलाड़ियों के पास अपने हुनर को दिखाने का बेहतरीन मौक़ा है. अगले साल होने वाले विश्वकप के लिए क्वालीफ़ाई करने के लिए भारत का एशिया कप जीतना ज़रूरी है. कभी भारत और पाकिस्तान का दबदबा विश्व हॉकी जगत में था. भारत ने आठ बार ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता है. इसके अलावा भारत और पाकिस्तान विश्व चैंपियन भी रह चुके हैं. पाकिस्तान ने विश्व कप सबसे ज़्यादा चार बार जीता है जबकि हॉलैंड ने तीन बार जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया ने दो-दो बार और भारत ने एक बार साल 1975 में जीता था. उल्लेखनीय है कि भारत ने मलेशिया में ही आयोजित विश्व कप के फ़ाइनल में पाकिस्तान को 2-1 से हराकर चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया था. इसके अलावा भारत को 1973 में रजत पदक और 1971 में कांस्य पदक भी मिला. लेकिन पिछले कुछ सालों में भारतीय हॉकी टीम का प्रदर्शन ख़राब रहा है. यहां तक कि भारतीय टीम साल 2008 में पहली बार ओलंपिक के लिए क्वालीफ़ाई भी नहीं कर पाई थी. और अब एक बार फिर वैसे ही हालात बन गए हैं क्योंकि अगर भारत एशिया कप नहीं जीत पाता तो विश्व कप के इतिहास में पहली बार ऐसा होगा कि भारत इस टूर्नामेंट में नहीं खेलेगा. ऐसे में भारतीय टीम के हाई पर्फॉरमेंस निदेशक और अंतरिम चीफ़ कोच रोलैंट ओल्टमैंस कहते हैं मैं वास्तविकता में भरोसा करता हूं. मुझे पता है कि यह कितना महत्वपूर्ण टूर्नामेंट है. मैं पिछले छह सप्ताह से इन खिलाड़ियों को कड़ा अभ्यास करवा रहा हूं और टीम भी एशिया कप के लिए बेहद मेहनत कर रही है. मेरे हाथ में तो यही सब कुछ है. वहीं गोलकीपर-उपकप्तान श्रीजेश कहते हैं अगर हम दबाव की ही बात करते रहेंगे तो एक भी मैच खेलना मुश्किल हो जाएगा. हम एशिया कप जीतने का लक्ष्य लेकर जा रहे हैं. तो देखना होगा कि एशिया कप जीत कर कौन सी टीम विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट में जगह बनाती है. |
| DATE: 2013-08-24 |
| LABEL: sports |
| [843] TITLE: क्यों हैं ज्वाला और साइना आमने सामने? |
| CONTENT: इंडोनेशिया के दिग्गज बैडमिंटन खिलाड़ी तौफीक़ हिदायत को लेकर देश की स्टार साइना नेहवाल और ज्वाला गुट्टा के बीच ठन गई है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ इंडियन बैडमिंटन लीग आईबीएल में हैदराबाद हॉटशॉट्स की तरफ से खेल रहे हिदायत ने लीग में विदेशी खिलाड़ियों के साथ भेदभाव की शिकायत की थी. पूर्व ओलंपिक और विश्व चैंपियन हिदायत को हैदराबाद की टीम ने 15000 डॉलर में खरीदा था लेकिन उनका मानना है कि ये कीमत उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं है. लेकिन हैदराबाद हॉटशॉट्स में हिदायत की टीम साथी साइना ने कहा कि हिदायत एक रिटायर्ड खिलाड़ी हैं और उन्हें इस सच्चाई को समझना चाहिए कि उन्हें ऊंची कीमत नहीं मिल सकती. साइना की ये टिप्पणी देश की दिग्गज युगल खिलाड़ी ज्वाला को नागवार गुजरी. उन्होंने ट्विटर पर लिखा तौफीक़ हिदायत महान खिलाड़ियों में से एक हैं और मुझे नहीं लगता कि आप उनके दृष्टिकोण को सिर्फ इसलिए ख़ारिज कर दें कि वह एक रिटायर्ड खिलाड़ी हैं. आईबीएल में दिल्ली की टीम की तरफ़ से खेल रही ज्वाला ने कहा मैं नहीं जानती कि उन्हें और उनके रुतबे को सम्मान दिए बिना कोई कैसे उनके बारे में ऐसी बात कर सकता है. यह सच में दुखद है. हालांकि ज्वाला ने ट्विटर में अपनी प्रतिक्रिया में साइना का नाम नहीं लिया है लेकिन उनके संदर्भ में बात करते हुए कहा है कि उन्हें हिदायत की चिंताओं को समझना चाहिए. ज्वाला ने कहा आप चाहे कितनी भी बड़ी खिलाड़ी बन गईं लेकिन आपको साथी खिलाड़ियों की भावनाओं को समझना चाहिए और उस पर विचार करना चाहिए. उन्होंने कहा कोई भी उनसे उनकी उपलब्धियों को सिर्फ इसलिए नहीं छीन सकता है वह रिटायर हो गए हैं. वह सबसे महान बैडमिंटन खिलाड़ी हैं और हमेशा रहेंगे. यह पैसों का मामला नहीं है बल्कि सम्मान का मामला है. हालांकि साइना ने इस मामले में अपना स्पष्टीकरण देते हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया से कहा मुझे पता नहीं है कि यह मामला अख़बारों में कैसे आ गया. मैं स्पष्ट करना चाहती हूं कि तौफीक़ मेरे लिए परिवार की तरह हैं. उनके जैसा कोई नहीं हो सकता. साइना से जब ज्वाला के बयान के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा मुझे पता नहीं यह विवाद कहां से शुरू हुआ. मुझे तौफीक़ से कोई परेशानी नहीं है और मैं उन्हें बहुत सम्मान देती हूं. |
| DATE: 2013-08-22 |
| LABEL: sports |
| [844] TITLE: राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार या तिरस्कार |
| CONTENT: भारत में खेलों के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रदर्शन के लिए खिलाड़ियों को दिए जाने वाले राजीव गांधी खेल रत्न द्रोणाचार्य और अर्जुन पुरस्कार इन दिनों विवादों के घेरे में है. ऐसा नहीं है कि ये पुरस्कार पहली बार चर्चा का केन्द्र बने हैं बल्कि इससे पहले भी कई बार इन्हें लेकर शोर मचता रहा है. फ़िलहाल ताज़ा विवाद जाने-माने ट्रैप निशानेबाज़ रोंजन सोढ़ी और महिला डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पुनिया के बीच राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार को लेकर है. दिल्ली में हुए 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर रातों रात स्टार बनने वाली डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पुनिया ऐसा कारनामा करने वाली भारत की पहली महिला खिलाड़ी बनीं. अब कामयाबी तो कामयाबी है भले ही उनके आलोचक यह कहें कि उस स्पर्धा में दुनिया की दूसरी शीर्ष महिला डिस्कस थ्रोअरों ने हिस्सा नहीं लिया था तो दूसरी तरफ़ रोंजन सोढी ने भी दो रजत पदक जीते हैं. अगर सफलता के पैमाने की बात करें तो इसके अलावा कृष्णा पुनिया के पास एशियाई खेलों के दो कांस्य पदक भी हैं तो रोंजन सोढ़ी पिछले एशियाई खेलों में निशानेबाज़ी की स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले इकलौते निशानेबाज़ हैं. इसके अलावा उन्होंने एक कांस्य पदक भी जीता था. डबल ट्रैप शूटिंग में वह दो बार विश्व कप विजेता तो बने ही साथ ही उनका बचाव करते हुए वह विश्व चैंपियन भी बने. कृष्णा पुनिया के कोच पति द्रोणाचार्य सम्मान पा चुके वीरेंद्र पुनिया का कहना है कि कृष्णा पुनिया के नाम पर अवॉर्ड समिति की सहमति पहले ही बन चुकी थी. लेकिन जैसे ही महिला निशानेबाज़ और ख़ुद राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी महिला निशानेबाज़ अंजलि आर. भागवत पुरस्कार समिति की सदस्य बनीं तभी से कृष्णा पुनिया के नाम की जगह रोंजन सोढ़ी का नाम चलने लगा और कृष्णा का नाम पुरस्कार सूची से काट दिया गया. कृष्णा पुनिया ने कहा कि अगर उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है तो उनके खेल में आने का क्या फ़ायदा और ऐसे ही हालात रहे तो वह एथलेटिक्स को अलविदा भी कह सकती हैं. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए वीरेंद्र पुनिया ने कहा कि वह खेल-मंत्री से मिलने की कोशिश कर रहे हैं और कृष्णा खेलना जारी रखेंगी. वीरेंद्र पुनिया के अनुसार अगर कृष्णा का नाम पहले प्रस्तावित नहीं होता तो उन्हें इतना दुख नहीं होता. राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार की शुरूआत साल 1991-92 से हुई और पहली बार इसे पाने का श्रेय शतंरज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद और बिलियर्डस खिलाड़ी गीत सेठी को मिला. उसके बाद सिडनी ओंलपिक की कांस्य पदक विजेता महिला भारोत्तोलक कर्णम मल्लेश्वरी और क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर और महेंद्र सिंह धोनी के अलावा टेनिस में लिएंडर पेस और बैडमिंटन में सायना नेहवाल और पुलेला गोपीचंद को भी मिल चुका है. उन सबके अलावा और भी बहुत से खिलाड़ी इसे हासिल कर चुके है. इसी बीच कई बार ऐसे खिलाड़ियों के नाम भी सामने आए जो चौंकाने वाले रहे. साल 2001 में निशानेबाज़ी में अचानक से अभिनव बिंद्रा का नाम राजीव गांधी पुरस्कार के लिए प्रस्तावित हुआ और उन्हें मिला भी लेकिन तब तक उन्होंने कोई बहुत बड़ी उप्लब्धि हासिल की हो ऐसा भी नहीं था. इसके बाद अगले ही साल 2002 में महिला एथलीट एम बीनामोल का नाम राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार के लिए चुना गया लेकिन तब महिला निशानेबाज़ अजंलि भागवत का नाम भी साथ में विवाद के रूप में जुड़ गया. इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि आख़िरकार बीनामोल और अंजलि को संयुक्त रूप से सम्मानित किया गया. इसके बाद कुछ वर्ष शांति से बीते लेकिन साल 2009 में महिला मुक्केबाज़ और तब तक पांच बार विश्व चैंपियन बनने का गौरव हासिल कर चुकी एमसी मैरीकॉम का नाम इस सर्वोच्च पुरस्कार के लिए चुना गया लेकिन 2008 के बीजिंग ओलंपिक के कांस्य पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार और मुक्केबाज़ विजेंद्र सिंह ने विरोध की आवाज़ उठाई और आख़िरकार तीनों खिलाड़ियो को राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार दिया गया. इसके बाद विरोध का बिगुल बजाया गगन नारंग ने कि उन्हें इस पुरस्कार के लिए नज़रअंदाज़ किया जा रहा है तब उन्होंने भी निशानेबाज़ी छोड़ने की बात कही थी. उन्हें आश्वस्त किया गया कि अगली बारी आपकी है और गगन नारंग को साल 2011 में यह पुरस्कार मिला. वैसे अगर उपलब्धियों की बात की जाए तो निशानेबाज़ शमरेश जंग ने साल 2006 के मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों में पांच स्वर्ण एक रजत और एक कांस्य पदक के अलावा 2002 के राष्ट्रमंडल खेलों में भी दो स्वर्ण और तीन रजत पदक जीते हैं. उनके अलावा समरेश जंग मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों के सर्वश्रेष्ठ एथलीट भी धोषित किए गए थे. उनके अलावा एक और निशानेबाज़ जसपाल राणा ने 2006 के दोहा एशियाई खेलों में तीन स्वर्ण पदक जीतकर तहलका मचा दिया था जिनमें दो स्वर्ण पदक तो व्यक्तिगत थे. जसपाल राणा और शमरेश जंग ने शायद ही कभी इन पुरस्कारों को लेकर अपनी आवाज़ उठाई हो लेकिन अब तो ऐसा लगता है जैसे इन्हें पाने के लिए शोर मचाना भी ज़रूरी है वर्ना जिसे यह मिले उसके लिए पुरस्कार और जिसे नहीं मिले उसका तिरस्कार जैसा क्यों लगता है खिलाड़ियो को आजक |
| DATE: 2013-08-22 |
| LABEL: sports |
| [845] TITLE: 'मुलाकात सचिन से, लेकिन क्रिकेट क्या बला है' |
| CONTENT: सचिन तेंदुलकर दुनिया के किसी कोने में खड़े हो जाएं तो उनको पहचानने वाले मिल ही जाएंगे. लेकिन कई बार ये भी हो सकता है कि सचिन तेंदुलकर से मिलने वाला ये नहीं जानता हो कि सचिन कौन सा खेल खेलते हैं. आप चौंकिए नहीं क्योंकि सचिन तेंदुलकर के साथ ऐसा हुआ और वो भी उनके अपने ही शहर मुंबई में. और इतना ही नहीं सचिन तेंदुलकर से मिलने वाले शख़्स अपने खेल में दुनिया भर में लीजेंड के तौर पर मशहूर है. हम बात कर रहे हैं बैडमिंटन में वर्ल्ड नंबर एक खिलाड़ी मलेशियाई खिलाड़ी ली चॉंग वेई की. वेई इन दिनों इंडियन बैडमिंटन लीग में हिस्सा लेने के लिए भारत में हैं. मुंबई मास्टर्स की ओर से टूर्नामेंट में अपना पहला मैच खेल रहे वेई को देखने के लिए क्रिकेट की दुनिया के लीजेंड सचिन तेंदुलकर भी बैडमिंटन कोर्ट पहुंचे. दो बार ओलिंपिक खेलों में सिल्वर मेडल जीत चुके वेई ने अपना मैच तो आसानी से जीत लिया. उन्होंने दिल्ली की टीम की ओर से खेल रहे दारेन लुई को 21-12 21-16 से हराया. लेकिन इस मुक़ाबले से ज़्यादा चर्चा सचिन तेंदुलकर और ली चॉंग वेई की मुलाकात की हुई. अपना मैच पूरा करने के बाद वेई सचिन तेंदुलकर से मिले. इस मुलाक़ात में वेई ने सचिन से वादा किया है वो एक दिन क्रिकेट मैच ज़रूर देखेंगे. वेई ने अपनी इस मुलाकात पर मीडिया से कहा मेरी सचिन तेंदुलकर से बात हुई. ये पहला मौका है जब मैं उनसे मिला हूं. मुझे इस बात की ख़ुशी है कि वे मेरा मैच देखने के लिए आए और मैं उम्मीद करता हूं कि मैं एक दिन क्रिकेट मैच देखने जाऊंगा. मैं ने पहले कभी क्रिकेट मैच नहीं देखा है. सचिन तेंदुलकर भले लीज़ेंड क्रिकेटर हों लेकिन उनकी दिलचस्पी दूसरे खेलों में रही है. वे टेनिस का मैच देखने के लिए विंबलडन पहुंचते रहे हैं तो कभी फ़ार्मूला वन रेस देखने के लिए समय निकालते रहे हैं. इस बार मुंबई में उन्होंने वर्ल्ड नंबर एक बैडमिंटन के खिलाड़ी का जादू देखा. ये भी जीनियस सचिन की ख़ासियत है. वे दूसरे खेलों के जीनियस का सम्मान करना बख़ूबी जानते हैं. |
| DATE: 2013-08-21 |
| LABEL: sports |
| [846] TITLE: इंडियन बैडमिंटन लीग: क्या फाइनल तक रहेगा उत्साह |
| CONTENT: देखिए मुझे तो लगता है कि इस लीग में अब हर मुक़ाबले का परिणाम ऐसा ही आने वाला है. कोई भी मैच आसान साबित होने वाला नहीं है. दुनिया भर के सभी टॉप बैडमिंटन खिलाड़ी यहां खेल रहे हैं. यह कहना है भारत की स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल का जो इस बात से खुश हैं कि उन्होंने हैदराबाद हॉटशॉट्स के लिए खेलते हुए विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने वाली पीवी सिंधु को मात दी जो लखनऊ वॉरियर्स की आइकन खिलाड़ी हैं. इस मुक़ाबले में हैदराबाद हॉटशॉट्स ने लखनऊ वॉरियर्स को 3-2 से मात दी. आईबीएल में हो रहे दमदार मुकबलों में जीत के लिए खिलाड़ियों को एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना पड़ रहा है और अभी तक दर्शकों का समर्थन भी इस लीग को मिला है. दिल्ली में 14 अगस्त को इस बैडमिंटन लीग का उद्घाटन हुआ. 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस होने के बावजूद क़रीब तीन साढ़े तीन हज़ार दर्शक सिरी फोर्ट स्टेडियम में मौजूद थे. इन दर्शकों का उत्साह तब देखने लायक था जब साइना नेहवाल और पीवी सिंधु महिला एकल मैच में आमने-सामने हुईं. वैसे किसी भी मैच में आमने-सामने होने का यह दोनों खिलाड़ियों के लिए पहला अवसर था. पीवी सिंधु ने हाल ही में विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता है. जैसे ही दोनों खिलाड़ी बैडमिंटन कोर्ट पर उतरीं दर्शकों ने शोर मचाकर दोनों का स्वागत किया. एक तरफ हॉटशॉट साइना का शोर गूंज रहा था तो दूसरी तरफ सिंधु-सिंधु जैसे नारे लग रहे थे. पहला गेम जीतने के लिए साइना को पसीना बहाना पड़ा और वह 21-19 से बमुश्किल जीतीं. हालांकि दूसरा गेम महज़ औपचारिकता साबित हुआ. अब इस मैच को लेकर इन खिलाड़ियों पर कितना दबाव था इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मैच जीतने के बाद साइना ने कहा मीडिया ने तो मुझे मैच के दौरान ही हारा हुआ मान लिया था. एक तरफ लीग में देसी-विदेशी स्टार खिलाड़ियों की भरमार है. हालांकि इसमें चीनी खिलाड़ी शामिल नहीं हैं. लेकिन इस लीग में सब कुछ उजला-ही-उजला है ऐसा भी नहीं है. इस लीग के बाकी बचे मुक़ाबलों की बात करें तो केवल 22 तारीख को दो मुक़ाबले खेले जाएंगे जबकि फाइनल 31 अगस्त को होगा. चैंपियनशिप के मुकाबले रात बजे के बाद खेले जाने को लेकर भारतीय दर्शक थोड़े परेशान हैं. पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और अब इस चैंपियनशिप के लाइव प्रसारण के दौरान कमेंट्री कर रहीं मधुमिता बिष्ट कहती हैं दरअसल विदेशी खिलाड़ियों के होने से इसका समय ऐसा रखा गया है ताकि विदेशों में भी इसे दर्शक मिल सकें. इसके अलावा लगातार मैचों से खिलाड़ियों की फिटनेस क्या इस चैंपियनशिप की समाप्ति तक बनी रहेगी इसे लेकर भी बड़े सवाल हैं. दिल्ली स्मैशर्स की आइकन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा चोट की वजह से अभी तक केवल एक ही मैच खेल सकी हैं. अभी तो हालत यह हो गई है कि शनिवार को दिल्ली स्मैशर्स की आइकन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा हैदराबाद के खिलाफ कोर्ट पर ही नहीं उतरीं. दूसरी तरफ कुछ और खिलाड़ी भी चोटिल हैं जिनमें पिछले दिनों विश्व चैपियनशिप के फाइनल में पहुंचने वाले दुनिया के नम्बर एक खिलाड़ी मलेशिया के ली चोंग वेई भी शामिल हैं. ली इस बैडमिंटन लीग के सबसे महंगे खिलाड़ी भी हैं जिन्हें 135000 अमरीकी डॉलर में मुंबई मास्टर्स ने खरीदा था. वो भी तीसरे मुकाबले में अपनी टीम के लिए उपलब्ध हो सके. अब कुछ ख़बरें ऐसी भी हैं कि पी कश्यप भी पूरी तरह फिट नहीं हैं. वैसे अभी तक आम लोगों की मौजूदगी से तो खिलाड़ी और कोच खुश हैं जिनमें भारत के कोच और पूर्व आल इंग्लैंड चैंपियन पी गोपीचंद भी शामिल हैं. उनका कहना है कि वह अत्यंत उत्साहित हैं. इसके अलावा मुंबई में खेले गए मैचों में सचिन तेंदुल्कर उनकी पत्नी अंजलि और सुनील गावस्कर की मौजूदगी ने भी आम दर्शकों के जोश को बढ़ाया. अब देखना सिर्फ इतना है कि कुछ खिलाड़ियों को कम पैसे मिलने पर मचे हो-हल्ले के बाद बिना किसी दूसरे विवाद के बाद आखिरकार भारत में क्रिकेट और हॉकी के बाद बैडमिंटन की चिड़िया ने भी जब उड़ान भर ही ली है तो क्या पी कश्यप साइना नेहवाल पीवी सिंधु ली चोंग वेई ज्वाला गुट्टा और कुछ दूसरे नाम के सहारे इसमें इसके समर्थकों का चहचहाना भी क्या फाइनल तक जारी रहेगा. |
| DATE: 2013-08-21 |
| LABEL: sports |
| [847] TITLE: तीस साल बाद भिड़े पाकिस्तान और अफगानिस्तान |
| CONTENT: अफ़गानिस्तान ने पाकिस्तान को एक दोस्ताना फ़ुटबॉल मैच में 3-0 से हरा दिया. ये मैच इसलिए ख़ास था कि क्योंकि करीब एक दशक के अंतराल पर अफ़गानिस्तान में कोई अंतरराष्ट्रीय मैच खेला गया. इतना ही नहीं दोनों पड़ोसी देशों के बीच तीस साल में पहली बार कोई फ़ुटबॉल मैच खेला गया. इस मैच से इस बात के संकेत भी मिले हैं कि कई दशकों से संघर्ष झेल रहे अफ़गानिस्तान में जनजीवन अब पटरी पर लौट रहा है. इस फ़ुटबॉल मैच के दौरान दोनों देशों के लोग राष्ट्रीय जज़्बे से भरे थे. टीवी पर मैच का सीधा प्रसारण होने के चलते इसे लाखों लोगों ने घर बैठे हुए भी देखा. काबुल स्थित बीबीसी संवाददाता केरेन एलन के मुताबिक इस दोस्ताना मैच को अफ़गानिस्तान में बदलाव का बड़े संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. काबुल के गाज़ी स्टेडियम का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस था. इस गर्मी में भी हज़ारों लोग फ़ुटबॉल मैच देखने पहुंचे थे. ये दर्शक अपनी अपनी टीमों का उत्साह बढ़ा रहे थे. टीम के खिलाड़ियों ने पोलियो उन्मूलन अभियान के लोगो वाली टीशर्ट पहनी हुई थीं. कई स्थानीय दर्शकों ने अपने चेहरे को अफ़गानिस्तान के झंडे के अंदाज़ में रंग लिया था. पूरी तरह से पैक होने के बाद भी स्टेडियम में दर्शक काफी अनुशासित दिखे. इन दर्शकों में अधिकांश की राय में दोनों देशों के बीच आपसी संबंधों को बेहतर बनाने के लिए खेल अहम भूमिका निभा सकता है. काबुल के रेस्टोरेंट और कॉफी शॉप में भी हज़ारों फैंस ने टीवी सेट पर बैठ कर मैच देखा. इसमें दुकानदार छात्र और कामकाजी लोगों की जमात शामिल थी. अफ़गानिस्तान की ओर से तीसरा गोल होने के बाद टीवी कमेंटेटर भी अपने जोश पर काबू नहीं रख सके और कमेंट्री के दौरान कहा काश मेरे पंख होते तो मैं मैदान के ऊपर उड़ान भर आता. मुझे एक अफ़गान होने पर गर्व है. अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के राजनीतिक नेता अगले सप्ताह बेहद अहम शांति वार्ता के सिलसिले में मिल रहे हैं. अफ़गानिस्तान फ़ुटबॉल फ़ेडरेशन के महासचिव जेनरल सैयद अगाज़ादा ने फ़ीफ़ा डॉट कॉम से कहा है यह बताता है कि हम लोग काफी मुश्किल समय से सामान्य जन जीवन की ओर बढ़ रहे हैं. अगाजाद ने कहा फ़ुटबॉल के नज़रिए से अफ़गानिस्तान में संस्थागत और आधारभूत ढांचे विकसित हुआ है और हम मानते हैं कि यह खेल हमारे देश में कहीं बड़ी भूमिका निभा सकता है. वहीं पाकिस्तान फ़ुटबॉल फेडरेशन के महासचिव जनरल अहमद यार ख़ान लोधी ने उम्मीद जताई है कि फ़ुटबॉल के जरिए दोनों देशों के बीच रिश्ते सहज होंगे. पाकिस्तान के प्रमुख कोच जाविसा मिलोसावलजेव ने बीबीसी से बताया कि उनका उद्देश्य अपने खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय अनुभव दिलाना था. उन्होंने बीबीसी से कहा पाकिस्तान में भी मुश्किल का दौर है. हमने पाकिस्तान में एक भी मैच नहीं खेला है. 1996 से 2001 के तालिबानी शासन के दौरान अफ़गानिस्तान में फ़ुटबॉल पर पाबंदी नहीं थी लेकिन तालिबानी गाजी स्टेडियम का इस्तेमाल लोगों को सजाएं देने और पत्थर मारकर मौत देने जैसी घटनाओं के लिए करते थे. अफ़गानिस्तान की विश्व रैंकिंग 139 है और इससे पहले 2003 में तुर्केमेनिस्तान के ख़िलाफ़ उसने अपना अंतिम मैच खेला था. पाकिस्तान की रैंकिंग अफ़गानिस्तान से भी 28 स्थान नीचे है और इसने 1977 के बाद पहली बार काबुल में मैच में हिस्सा लिया है. |
| DATE: 2013-08-20 |
| LABEL: sports |
| [848] TITLE: धोनी बोले, नहीं बनाएंगे ऑलटाइम ग्रेट टीम |
| CONTENT: भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान धोनी इन दिनों क्रिकेट के मैदान से थोड़ा ब्रेक लेकर अपनी फिटनेस पर ध्यान दे रहे हैं. लेकिन सोमवार को वह दिल्ली के एक पांचसितारा होटल में खेल पत्रकारों से रूबरू थे और कई मुद्दों पर उन्होंने अपनी राय रखी. काले रंग की टी-शर्ट और जींस पहने महेंन्द्र सिंह धोनी पहले के मुक़ाबले ज़्यादा चुस्त दुरस्त लग रहे थे बल्कि एक साथी खेल पत्रकार ने तो ध्यान दिलाया कि अब धोनी के कानों के पास पिछले दिनों साफ चमकते सफेद बालों का रंग भी बदल गया है. खचाखच भरे हॉल में धोनी ने अपनी फिटनेस को लेकर कहा कि वह बहुत बड़े जिम फैन नहीं हैं और ना ही बहुत ज़्यादा भार उठाते हैं. उनके लिए थकान से मुक्ति पाना पहला लक्ष्य था. अभी उनके पास एक महीना है और उसके बाद वह चैंपियंस लीग में व्यस्त हो जाएंगे लेकिन तब टीम के फिटनेस ट्रेनर उनके साथ होंगे. जब किसी ने चुटकी ली कि आप पहले से पतले लग रहे हैं तो उन्होंने हँसते हुए कहा शायद यह कम खाना खाने का असर है. इसके बाद उन्होने कहा कि वह इन दिनों बैडमिंटन खेल रहे हैं. वैसे फुटबॉल तो उनका पसंदीदा खेल है. टीम के चयन के बारे में धोनी का कहना है जब चयनकर्ता टीम का चयन करते है तब प्रतिभाशाली खिलाड़ी को वरीयता दी जाती है ख़ासकर ऐसे खिलाड़ी को जिसके बारे में कहा जाता है कि वो भविष्य में टीम के लिए बहुत रन बनाएगा. अगर वह एक बार शानदार प्रदर्शन करना शुरू कर देता है तो आत्मविश्वास हासिल करने के बाद और भी परिपक्व हो जाता है. धोनी के अनुसार उस खिलाड़ी को अपनी प्रतिभा साबित पड़ती है और चयनकर्ताओं की उम्मीदों पर खरा उतरना पड़ता है. इससे पहले सचिन तेंदुलकर ने कहा था किसी भी खिलाड़ी के चयन में चयनकर्ता उस खिलाड़ी के पुराने रिकॉर्ड की जगह उसकी दबाव सहने की क्षमता देखें. सचिन के बयान पर पूछे जाने पर धोनी ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी. इस धोनी ने अपने ही अंदाज़ में कहा मेरा मानना है कि क्रिकेट का हर फॉर्मेट महत्वपूर्ण है और उसमें उनका अपना जादू है. किसी भी खिलाड़ी के हाथ में नही है कि वह क्रिकेट का कोई एक रूप चुने. दरअसल वह जैसा प्रदर्शन करता है उसके आधार पर चयनकर्ता निर्धारित करते हैं कि उसे किस फॉर्मेट में टीम मे जगह मिले. उन्होंने कहा इस बात का कोई पैमाना नही बनाया जा सकता कि पहले कोई टेस्ट मैच खेले और उसके बाद वनडे. अगर आप भारतीय टीम में जगह बनाने वाले ज़्यादातर खिलाड़ियों की बात करें तो हम सब अलग रास्ते से टीम में आते है. धोनी मानते हैं अगर आपको वनडे में खेलने का मौक़ा पहले मिलता है तो आप अंतराष्ट्रीय स्तर पर लगातार शानदार प्रदर्शन करने के बाद टेस्ट टीम में अपनी जगह बनाते हैं इसलिए यह खिलाड़ियों के हाथ में नहीं है कि वह क्या पसंद करे. धोनी ने यह भी कहा कि मुझे लगता है कि युवा खिलाड़ी हर फॉर्मेट को प्रमुखता दे. चाहे वह टेस्ट क्रिकेट हो वनडे या टवेंटी-20. तीनो फॉर्मेट एक दूसरे से जुड़े हैं और किसी एक में बदलाव करना दूसरे फॉर्मेट को प्रभावित कर सकता है. इन दिनों क्रिकेट में बहुत से खिलाड़ी अपनी ऑलटाइम ग्रेट टीम भी चुन रहे हैं और इनमें पूर्व कप्तान सौरव गांगुली भी शामिल हैं. उनकी ड्रीम ऑलटाइम वनडे टीम के कप्तान धोनी हैं जबकि टेस्ट टीम में धोनी नहीं हैं. इसे लेकर भी धोनी ने दार्शनिक अंदाज़ में जवाब दिया. उन्होंने कहा मेरे लिए इस तरह की टीम बनाना संभव नहीं है क्योंकि हर युग में हर टीम में हर स्थान के लिए अलग-अलग 11 खिलाड़ी होते हैं. कैसे आप 11 खिलाड़ियो की जगह भरेंगे. उन्होंने कहा कि अब अगर बाइक का उदाहरण देकर कहूँ तो पहले दो स्ट्रोक की बाइक आती थी अब चार स्ट्रोक की आती है. दोनों के पार्ट्स मिलाकर इधर-उधर करने की कोशिश करेंगे तो परिणाम अच्छे नही होंगे. धोनी ने कहा इसलिए मुझे लगता है कि इस मुद्दे को छोड़कर हमें हर उस खिलाड़ी का सम्मान करना चाहिए जिसने भारत के लिए टेस्ट और वनडे क्रिकेट खेला है. भले उन्होंने हज़ारों रन बनाए हो या नहीं बनाए हों या फिर उसने सौ से ज़्यादा वनडे खेले हों सबकी एक समान इज़्ज़त करनी चाहिए. धोनी ने यह भी कहा कि वो अपनी ज़िंदगी में तो इस तरह की कोई टीम नहीं बनाएंगे. धोनी ने ये भी एलान कर दिया है कि अभी वह क्रिकेट के किसी भी फॉर्मेट को अलविदा नहीं कहने जा रहे हैं. क्रिकेट में उम्र को लेकर उन्होंने कहा कि इस खेल में उम्र कोई बहुत मायने नहीं रखती महत्वपूर्ण यह है कि खेल की ज़रूरत के अनुरूप कोई कितना फिट है चाहे वह गेंदबाज़ हो या बल्लेबाज़. महेन्द्र सिंह धोनी पिछले दिनों क्रिकेटर विराट कोहली में आए परिवर्तन से भी खुश हैं. वह कहते हैं पिछले एक साल में विराट की ना सिर्फ बल्लेबाज़ी में निखार आया है बल्कि वह जिस तरह से हर मैच में अपने आपको पेश कर रहे हैं वह तारीफ के क़ाबिल है. बहरहाल अब धोनी की नज़र ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ होने वाली टेस्ट सिरीज़ पर है. वैसे वो दक्षिण अफ्रीका में भारतीय क्रिकेट टीम के प्रदर्शन की सराहना करना भी नहीं भूले. |
| DATE: 2013-08-20 |
| LABEL: sports |
| [849] TITLE: यूसैन बोल्ट सोने के शिखर पर |
| CONTENT: मॉस्को में चल रही वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में रविवार को जमैका के यूसैन बोल्ट ने आठवां स्वर्ण पदक जीत लिया. बोल्ट को आठवां स्वर्ण पदक 4X100 स्पर्धा में मिला. अब वो इस टूर्नामेंट के सबसे कामयाब धावक बन गए हैं. 100 मीटर और 200 मीटर स्पर्धाओं मे स्वर्ण वो पहले ही जीत चुके हैं. इस तरह उन्होंने अपने करियर में अब तक वर्ल्ड चैंपियनशिप में आठ स्वर्ण पदक समेत 10 पदक जीत लिए हैं. बोल्ट ने महान धावक कार्ल लुइस और एलीसन फेलिक्स की बराबर कर ली है. हालांकि कार्ल लुइस के पास आठ स्वर्ण एक रजत और एक कांस्य पदक हैं जबकि बोल्ट के पास आठ स्वर्ण और दो रजत पदक हैं. जमैका ने रविवार को 37-36 सेंकड का समय लेकर 4X100 स्पर्धा में स्वर्ण अपने नाम किया जबकि इस दौड़ में अमरीकी धावकों को दूसरा और कनाडा को तीसरा स्थान मिला. हालांकि रेस में ब्रितानी धावक तीसरे स्थान पर थे लेकिन तकनीकी आधार पर हुई अपील के बाद उन्हें अपना कांस्य पदक गंवाना पड़ा. मॉस्को में वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में तीसरा स्वर्ण हासिल करने के बाद बोल्ट ने कहा ये बहुत ही जबरदस्त है. महान अमरीकी धावकों से तुलना किए जाने पर उन्होंने कहा मैं दबदबा बनाए रखूंगा. मैं मेहनत करता रहूंगा. मेरी कोशिश है कि महान चीज़ों का हिस्सा बनता रहूं. अमरीकी धावक माइकल जॉन्सन एलीसन फेलिक्स और लुइस ने आठ विश्व खिताब जीते थे. |
| DATE: 2013-08-19 |
| LABEL: sports |
| [850] TITLE: खराब प्रदर्शन के बावजूद बोल्ट ने जीता स्वर्ण |
| CONTENT: रूस की राजधानी मॉस्को में चल रही विश्व चैम्पियनशिप में ओलंपिक चैम्पियन यूसैन बोल्ट ने 200 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर इस टूर्नामेंट का अपना सातवां स्वर्ण पदक जीत लिया है. जमैका के इस एथलीट ने 19-66 सेकंड में 200 मीटर की दूरी तयकर लगातार तीसरी बार इस खिताब पर कब्ज़ा किया. इस मुकाबले में वारेन वेयर ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 19-79 सेकंड का समय लिया और रजत पदक जीता. अमरीका के कर्टिस मिशेल ने 20-04 सेकंड का समय लेते हुए कांस्य पदक जीता. हालांकि बोल्ट ने इस बार अपने ही विश्व रिकॉर्ड से ज़्यादा समय लिया. बर्लिन में उन्होंने इस दूरी को 19-19 सेकंड में तयकर विश्व रिकॉर्ड बनाया था. इस मुकाबले में स्वर्ण पदक जीतने के बावजूद रफ्तार के मामले में बोल्ट का प्रदर्शन बेहद खराब रहा. उन्होंने अब तक 200 मीटर के जिन मुकाबलों में स्वर्ण पदक जीता है उन मुकाबलों में बोल्ट की रफ्तार इस बार के प्रदर्शन से बेहतर रही है. वैसे प्रतिद्वंद्वी टायसन गे के मुकाबले में शामिल न होने और योहान ब्लेक के ज़ख़्मी होने की वजह से बोल्ट को खिताब बचाने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं थी. यूसैन बोल्ट रविवार को होने वाली 4 गुना 100 मीटर रिले दौड़ के फाइनल में जीत हासिल कर लेते हैं तो वे विश्व चैम्पियनशिप में सबसे ज़्यादा स्वर्ण पदक जीतने वाले अमरीकियों में शामिल हो जाएंगे. अब तक कार्ल लेविस मिशेल जॉनसन और एलीसन फेलिक्स ने आठ-आठ स्वर्ण पदक जीते हैं. उन्होंने दो सिल्वर मेडल भी जीते हैं और इसका मतलब होगा कि वो कुल 10 पदक जीतने वाले लेविस और फेलिक्स की बराबरी पर आ जाएंगे. बुधवार को बोल्ट का 27वां जन्मदिन है और इस जन्मदिन पर वो ख़ुद को ये बेहतरीन तोहफा ज़रूर देना चाहेंगे. |
| DATE: 2013-08-18 |
| LABEL: sports |
| [851] TITLE: भारतीय ओलंपिक संघ पर कसता शिकंजा |
| CONTENT: भारतीय ओलंपिक संघ और अंतराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के बीच चल रहा विवाद एक बार फिर गर्मा गया है. अब एक बार फिर अंतराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी यानी आईओसी ने पहल करते हुए भारतीय ओलंपिक संघ यानी आईओए को सुझाव दिया है कि वह अपने संविधान में संशोधन करे. अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी ने भारतीय ओलंपिक संघ को ये सलाह दी है कि वो इस बात का ध्यान रखे कि कोई भी व्यक्ति जो भ्रष्टाचार या अपराध से जुड़ा हो वो उसका सदस्य न बने. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी के मुताबिक भारतीय ओलंपिक संघ का सदस्य बनने के लिए ज़रूरी होगा कि वह व्यक्ति भारत का नागरिक हो उसके पास नागरिक अधिकार हों किसी भी अदालत में उसके खिलाफ़ आरोप न तय किए गए हों और उसे किसी भी आपराधिक या भ्रष्टाचार के मामले में दोषी न पाया गया हो. भारतीय ओलंपिक संघ चुनाव में धांधली के आरोप की वजह से अब भी निलंबित है. सुरेश कलमाडी को राष्ट्रमंडल खेलों में घोटाले के कारण भारतीय ओलंपिक संघ के अघ्यक्ष पद से हटना पडा था और उनके बाद ललित भनोट को पिछले साल पांच दिसंबर को हुए चुनावों में महासचिव चुन लिया गया था. ये चुनाव अंतराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी के भारतीय ओलंपिक संघ पर प्रतिबंध लगाने के एक दिन बाद हुए थे. इन चुनावों को भी बाद में अमान्य घोषित कर दिया गया. जाने-माने खेल पत्रकार जी राजारमन अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी के भ्रष्टाचार से जुड़े सुझावों को सही नहीं मानते लेकिन वो ये भी कहते हैं कि भारतीय ओलंपिक संघ के पास इन सुझावों को मानने के अलावा कोई चारा नहीं है. राजारमन कहते हैं केवल अदालत में आरोप तय हो जाने की वजह से अगर किसी व्यक्ति को बाहर रखा जाएगा तो फिर सरकारी पदों पर मौजूद आधे से ज़्यादा लोग कहीं न कहीं परेशान हो जाएंगे और मुझे नहीं लगता कि ये सही है. जी राजारमन का मानना है कि इसके बावजूद भारतीय ओलंपिक संघ के पास इसे मानने के अलावा कोई चारा नही है. ऐसे लोग जिन लोगों पर आपराधिक या भ्रष्टाचार के आरोप लगे है उनका चुनाव में भाग लेना मुश्किल हो जाएगा. राजारमन ये भी कहते हैं कि अभी इस मामले में बहुत कुछ होना बाकी है. वे कहते हैं वैसे मुझे नही लगता कि संघ इन सारे सुझावों को मानेगा. अभी जो संविधान बनेगा उसमें काफी बदलाव होंगे और देखना है कि ये मीटिंग में क्या करते हैं. आखिरकार भारतीय ओलंपिक संघ एक स्वतंत्र संस्था है हालांकि उसे अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति से मान्यता लेनी होती है. भारतीय ओलंपिक संघ की आम बैठक 25 अगस्त को होगी. इसके अलावा अंतराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने भारतीय ओलंपिक संघ पर ये फैसला छोड़ दिया है कि वो अपने संविधान में पदाधिकारियों की उम्र और कार्यकाल की सीमा को निश्चित करना चाहता है या नहीं. भारत के खेल मंत्रालय का कहना है कि खेल संघों के पदाधिकारियों को उम्र के दायरे में आना होगा और एक निश्चित अवधि तक ही वे अपने पदों पर रह सकेंगे. इस पहलू को लेकर एक और जाने माने खेल-पत्रकार हरपाल सिंह बेदी कहते है ये एक विरोधाभास है. एक तरफ़ तो अंतराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने ख़ुद निर्धारित कर लिया कि जिनके खिलाफ आरोपपत्र हैं वह चुनाव न लड़ें. लेकिन उम्र और पद पर बने रहने की सीमा का फैसला भारतीय ओलंपिक संघ पर क्यों छोड़ा है हरपाल सिंह बेदी का कहना है क्या अब ये सरकार उनका फैसला मानेगी जिसने साफ़ कहा है कि 70 साल से ज़्यादा उम्र का आदमी किसी भी संघ में ना हो और न ही तीन बार से ज़्यादा कोई भी अधिकारी किसी भी पद पर रह सकता है. वहीं भारतीय ओलंपिक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष विजय कुमार मल्होत्रा उम्र और कार्यकाल से जु़ड़े सरकार के विधेयक को ग़लत मानते हैं. वे कहते हैं ये विधेयक ग़लत है. दुनिया में कहीं भी ऐसा बिल नहीं लाया गया है. अगर सरकार इस विधेयक को वापस ले ले तो भारतीय ओलंपिक संघ पर लगा प्रतिबंध ख़त्म हो जाएगा और आईओए फिर से काम करने लग जाएगा लेकिन सरकार इस बात पर अड़ी हुई है. विजय कुमार मल्होत्रा आगे कहते हैं एक तरफ़ भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 80-81 साल के हैं या राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी 76 साल के है और दूसरी तरफ़ ये कह रहे हैं कि खेलों के अंदर सुशासन के लिए कोई 70 साल के बाद रह ही नहीं सकता. लेकिन बात सिर्फ़ खेलों पर लादना सही नहीं है. अब हालत यह है कि अंतराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी ने गेंद भारतीय ओलंपिक संघ के पाले में डाल दी है जिसका जवाब उसे देना है. लेकिन ये जवाब क्या होगा ये कहना मुश्किल है. |
| DATE: 2013-08-17 |
| LABEL: sports |
| [852] TITLE: लम्बी दूरी की दौड़ में मो. फरह ने रचा इतिहास |
| CONTENT: लंबी दूरी के ब्रितानी धावक मोहम्मद फरह ने मॉस्को में चल रही विश्व एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में पुरुषों की 5000 मीटर दौड़ में भी स्वर्ण पदक जीत कर इतिहास रच दिया है. फरह पहले ही इस प्रतियोगिता में 10000 मीटर दूरी की दौड़ जीत चुके हैं. अपनी इस जीत के बाद 30 वर्षीय मोहम्मद फरह ओलंपिक और विश्व चैम्पियनशिप दोनों में 5000 मीटर और 10000 मीटर का स्वर्ण जीतने वाले ब्रिटेन के पहले और दुनिया के दूसरे एथलीट बन गए हैं. उनसे पहले यह करानामा केवल इथियोपिया के कीनियनीसा बीकीली ने किया था. बीकीली ने 2008 बीजिंग ओलंपिक और फिर बर्लिन विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप दोनों दौड़ों में स्वर्ण पदक जीता था. शुक्रवार को 5000 मीटर दौड़ में फरह ने निर्धारित दूरी 13 मिनट और 26-99 सेकंड में तय की. फरह ने बीबीसी स्पोर्ट्स से बात करते हुए कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वो अपने करियर में ऐसा कुछ कर पाएंगे. यह बहुत मुश्किल था और फैसला अंतिम दो राउंड में हुआ. फरह ने कहा कि उन पर बहुत अधिक दबाव था लेकिन उन्हें मजा भी आ रहा था. सोमाली मूल के ब्रिटिश नागरिक फरह ने एक साल पहले लंदन ओलंपिक में 10000 और 5000 मीटर दोनों ही दोड़ें जीती थीं जबकि 2011 विश्व एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं में उन्होंने 5000 मीटर दौड़ में स्वर्ण और 10000 मीटर दौड़ में रजत पदक हासिल किया था. |
| DATE: 2013-08-17 |
| LABEL: sports |
| [853] TITLE: विंबलडन चैम्पियन बारतोली ने लिया संन्यास |
| CONTENT: वर्तमान महिला विंबलडन चैंपियन मारियन बारतोली ने अपनी जीत के महज़ 40 दिन के भीतर ही खेल से संन्यास की घोषणा कर दी है. विंबलडन 2013 उनके करियर का एकमात्र ग्रैंड स्लैम ख़िताब है. दुनिया की सातवें नंबर की इस फ्रेंच खिलाड़ी ने एक प्रेस कांफ्रेस के दौरान कहा कि उनकी लगातार बरक़रार चोटों की वजह से उन्हें ये फ़ैसला लेना पड़ रहा है. बारतोली ने सिनसिनाटी ओपन में सिमोना हैलेप के हाथों मिली हार के बाद प्रेस के सामने बेहद भावुक होकर कहा यही वक्त है जब मुझे संन्यास लेना होगा और इसे अपना करियर मानना होगा. मुझे लगता है मेरी विदाई का समय आ चुका है. बारतोली ने कहा ये फ़ैसला बेहद मुश्किल है. मैं लंबे समय से टेनिस खेल रही हूं और मुझे अपना सबसे बड़ा सपना सच करने का मौक़ा मिला है. सब लोग मेरी वो जीत याद रखेंगे न कि ये आख़िरी मैच. मैने ख़्वाब को सच्चाई में बदला है और ये मेरे साथ हमेशा रहेगा. लेकिन अब मेरा शरीर हर चीज़ सहने के लिए तैयार नहीं है. महिला टेनिस संघ की अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी स्टेसी एलेस्टर ने बारतोली की तारीफ़ करते हुए कहा वो एक प्रेरणादायक चैंपियन और महिला टेनिस की महान प्रतिनिधि हैं जिन्होने खेल को अपना जीवन समर्पित किया. मुझे उन पर उनके मूल्यों और विंबलडन जीत को संभव बनाने पर गर्व है. जुलाई में विंबलडन फ़ाइनल मुक़ाबले में जर्मनी की सबीन लिज़ीकी को हराकर ख़िताब अपने नाम करने वाली बारतोली ने कहा कि वो जब खेलती हैं तो उन्हें लगातार कंधेपीठ और ऐड़ी के ऊपर दर्द रहता है. उन्होने कहा कि ये हमेशा से मुश्किल रहा है. मैं इससे ज़्यादा नहीं खेल सकती. विंबलडन जीत विंबलडन में 6-1 6-4 की अपनी फा़इनल जीत के बाद ही बारतोली ने इस बात का संकेत किया था कि खेल में लगने वाली मेहनत उनकी सेहत पर बुरा असर डाल रही है. 2007 में विंबलडन उप-विजेता रही बारतोली के हाथ कोई ग्रैंड स्लैम का ख़िताब 47वें प्रयास में लगा. वो इतना लंबा इंतज़ार करनी वाली पहली महिला टेनिस खिलाड़ी हैं. फ़िलहाल सिनसिनाटी ओपन खेलने टोरंटो पहुंची इस खिलाड़ी को पहले राउंड में बाय मिला था जबकि दूसरा राउंड हारने के बाद ही उन्होने ये फ़ैसला ले लिया. |
| DATE: 2013-08-15 |
| LABEL: sports |
| [854] TITLE: इंडियन बैडमिंटन का आगाज़, सितारों पर नज़र |
| CONTENT: बुधवार से शुरू हो रही इंडियन बैडमिंटन लीग के बारे में यह कहना अभी मुश्किल है कि यह कितनी कामयाब होगी लेकिन पूर्व खिलाड़ी मानते हैं कि एकदम सही समय पर इसकी शुरुआत हो रही है. खासकर विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में भारतीय खिलाड़ियों के बढ़िया प्रदर्शन के बाद इस टूर्नामेंट को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई है. विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में भारत की पीवी सिंधू ने कांस्य पदक जीता है जबकि साइना नेहवाल और पी कश्यप क्वॉर्टर फाइनल तक पहुंचे है. ऐसे में भारत के पूर्व बैडमिंटन खिलाड़ी और एशिया कप चैंपियन रह चुके दिनेश खन्ना मानते हैं कि ये टूर्नामेंट सही समय पर हो रहा है. भारत में क्रिकेट की आईपीएल और हॉकी की हॉकी इंडिया लीग की तर्ज पर पहली इंडियन बैडमिंटन लीग का पहला मैच दिल्ली में खेला जाएगा. इस लीग में कुल छह टीमें शामिल है जिनमें देसी-विदेशी खिलाड़ी शामिल है. बंगा बीट्स में पी कश्यप हैदराबाद हॉटशॉटस में साइना नेहवाल दिल्ली स्मैशर्स में ज्वाला गुट्टा लखनऊ वारियर्स में पीवी सिंधू मुंबई मास्टर्स में मलेशिया के ली चोंग वेई और पुणे पिस्टन में अश्विनी पोन्नप्पा स्टार खिलाड़ी के रूप में अपनी चुनौती पेश करेंगे. दस लाख अमरीकी डॉलर की इनामी राशि वाली इस लीग के शुरू होने से पहले मंगलवार को दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में ये सभी खिलाड़ी मौजूद थे. इस मौके पर ज्वाला गुट्टा ने कहा हम सभी चारों तरफ से मिल रहे सहयोग से बेहद उत्साहित है और बेसब्री से इसके शुरू होने का इंतज़ार कर रहे है और ये इंतजार अब बस समाप्त होने वाला है. वहीं साइना नेहवाल ने कहा कि यह वाकई एक बहुत अच्छी खबर है. वो कहती हैं यह इस साल का सबसे बड़ी पुरस्कार राशि वाला टूर्नामेंट भी है. मुझे खुशी है कि दुनिया भर के सभी टॉप खिलाड़ी इसमें खेल रहे है. इससे पता चलता है कि भारत बैडमिंटन में सबसे ज़्यादा उभरता हुआ देश है और लीग के माध्यम में भारत में इस खेल की लोकप्रियता और भी बढ़ती जाएगी. वहीं पिछले दिनों विश्व बैडमिंटन चैपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर रातों-रात स्टार बनने वाली पीवी सिंधू कहती है कि साइना नेहवाल एक महान खिलाड़ी है और उनके ख़िलाफ खेलकर जीतने की कोशिश करना उनका मुख्य उद्देश्य है. पी कश्यप भी इस लीग को लेकर कहते है कि अभी तो शुरूआत है और इस लीग की पुरस्कार राशि युवा खिलाड़ियो को बैडमिंटन में आने के लिए प्रेरित करेगी. |
| DATE: 2013-08-14 |
| LABEL: sports |
| [855] TITLE: बांग्लादेश: फ़िक्सिंग मामले में नौ पर आरोप तय |
| CONTENT: इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल और बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने कहा है कि बांग्लादेश प्रीमियर लीग में मैच फिक्सिंग और स्पॉट फ़िक्सिंग को लेकर नौ लोगों पर आरोप तय कर दिए हैं. आईसीसी और बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड का कहना है कि आरोपों की जांच आईसीसी की एंटी करप्शन एंड सिक्योरिटी यूनिट ने की थी. ये पूरा मामला बांग्लादेश प्रीमियर लीग की ढाका ग्लैडिएटर टीम के मैच फिक्सिंग और स्पॉट फिक्सिंग में शामिल होने की कथित अंदरूनी साज़िश से जुड़ा है. इन सभी नौ अभियुक्तों को आरोप बता दिए गए हैं लेकिन आईसीसी और बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड का कहना है कि ये सभी लोग दोषी सिद्ध होने तक बेकसूर माने जाएंगे. बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के भ्रष्टाचार विरोधी नियमों के मुताबिक इन सभी लोगों की पहचान तब तक नहीं ज़ाहिर की जा सकती जब तक कि अनुशासनात्मक कार्यवाही पूरी नहीं हो जाती. नौ में से सात लोगों पर फिक्सिंग से जुड़े आरोप हैं और दो लोगों पर इस की जानकारी बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड को न दिए जाने का आरोप है. जिन पर फिक्सिंग के गंभीर आरोप हैं उन्हें अस्थायी तौर पर निलंबित कर दिया गया है और वो अनुशासनात्मक कार्यवाही पूरी होने तक आईसीसी बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड या किसी अन्य बोर्ड की किसी भी गतिविधि में हिस्सा नहीं ले सकेंगे. सभी अभियुक्तों को ये बताने के लिए 14 दिन का समय दिया गया है कि वो आरोप स्वीकार करते हैं या आरोपों को नकारते हैं. जो लोग फ़िक्सिंग के आरोपों को स्वीकार कर लेंगे या बाद में दोषी पाए जाएंगे उन्हें पांच साल से लेकर आजीवन पाबंदी झेलनी पड़ेगी. फ़िक्सिंग के बारे में जानकारी न देने के दोषी पाए जाने पर एक से पांच साल तक की पाबंदी झेलनी पड़ सकती है. आईसीसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डेविड रिचर्डसन का कहना है जांच के दौरान एंटी करप्शन एंड सिक्योरिटी यूनिट ने बांग्लादेश प्रीमियर लीग 2013 में शामिल कई लोगों से बात की और अहम सबूत जुटाए जिनके आधार पर आरोप लगाए गए हैं. वहीं बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष नज़मुल हसन ने कहा है कि जो भी बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के भ्रष्टाचार विरोधी नियमों का उल्लंघन करते हुए पाए जाएंगे उनसे सख़्ती से निपटा जाएगा. |
| DATE: 2013-08-13 |
| LABEL: sports |
| [856] TITLE: यूसैन बोल्ट की बादशाहत कायम, जीता विश्व खिताब |
| CONTENT: 100 मीटर फर्राटा दौड़ के ओलंपिक चैंपियन जमैका के यूसैन बोल्ट ने मॉस्को में चल रही विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप का खिताब जीत लिया. इस जीत के साथ ही बोल्ट ने एक बार फिर साबित कर दिया कि 100 मीटर फर्राटा दौड़ में उनके मुकाबले में कोई नहीं है. साल 2011 में दाएगु में बोल्ट गलत शुरुआत के कारण अयोग्य करार दिए गए थे और तब उनके हमवतन योहान ब्लैक ने सोना जीता था. लेकिन इस बार बोल्ट ने कोई गलती नहीं की और 2009 का इतिहास दोहराते हुए दूसरी बार इस चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल किया. इस बार बोल्ट के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी अमरीका के जस्टिन गैटलिन थे. फ़ाइनल रेस में गैटलिन ने बोल्ट को कड़ी चुनौती दी और आधे समय तक वो आगे भी रहे. लेकिन हमेशा की तरह फ़िनिशिंग लाइन के करीब पहुंचने से पहले बोल्ट ने तेज़ रफ्तार भरी और गैटलिन को पछाड़कर चैंपियन बन गए. बीजिंग ओलंपिक और लंदन ओलंपिक के चैंपियन बोल्ट ने इस दौड़ को पूरा करने में महज़ 9-77 सेकंड का समय लिया जो इस सत्र में उनका सर्वश्रेष्ठ समय है. गैटलिन ने 9-85 सेकंड का समय निकाला और उनका बोल्ट को पछाड़ने का सपना अधूरा रह गया. जमैका के ही नेस्टा कार्टर ने 9-95 सेकंड का समय लेते हुए तीसरा स्थान हासिल किया. दिलचस्प बात यह है कि प्रतियोगिता में शीर्ष पांच एथलीटों में चार जमैका के ही रहे. चौथे स्थान पर जमैका के केमर बैले कोले और पांचवें स्थान पर निकेल शमेदे रहे. |
| DATE: 2013-08-12 |
| LABEL: sports |
| [857] TITLE: फाइनल में पहुँचने से चूकी सिंधु, मिला कांस्य पदक |
| CONTENT: भारत की उभरती हुई बैटमिंटन स्टार खिलाड़ी पीवी सिंधु को विश्व चैम्पियनशिप के सेमीफाइनल मुकाबले में कांस्य पदक मिला है. अस्सी के दशक के बाद पहली बार किसी भारतीय खिलाड़ी ने इस प्रतियोगिता में पदक जीता है. शनिवार को हुए एक महत्वपूर्ण मुकाबले में पीवी सिंधु के सामने दुनिया की नंबर तीन खिलाड़ी थाईलैंड की रचनोक इंथैनन थीं. रचनोक ने सिंधु को सीधे मुकाबले में 21-10 और 21-13 के अंतर से हराया. दुनिया की 12 नंबर की खिलाड़ी पीवी सिंधु अपना पहला बैडमिंटन विश्व चैम्पियनशिप खेल रही थीं. सेमिफाइनल में पहुँचने के लिए सिंधु ने इस प्रतिस्पर्द्धा में कई बड़े उलट फेर किए. वे अभी तक वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप में जाइंट किलर साबित हुई थीं. उन्होने प्री क्वार्टर फाइनल में दूसरी वरीयता प्राप्त चीन की यिहान वांग को हराया था और क्वार्टर फाइनल में चीन की ही शिजियान को शिकस्त दी थी. लेकिन सेमीफाइनल मुकाबले में सिंधु रचनोक के सामने लगभग बेबस ही हो गईं. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक 36 मिनट तक चले महिलाओं के इस एकल मुकाबले में रचनोक ने कोर्ट के हर छोर पर अपने शॉट्स खुलकर खेले. इसके ठीक उलट सिंधु संघर्ष करती हुई दिख रही थीं. उन्होंने कुछ ऐसी गलतियाँ कर दीं जिससे उनकी विरोधी रचनोक को खेल की शुरुआत में बढ़त मिल गई. रचनोक ने कुछ ललचाने वाले शाट्स खेले जिसने सिंधु को उलझाकर रख दिया और इस चक्कर में वे मैदान पर संघर्ष करती हुई दिख रहीं थीं. सिंधु को थाईलैंड की इस खिलाड़ी का खेल समझने में मुश्किल पेश आ रही थी और इसका नतीजा यह निकला कि रचनोक को 19-10 की बढ़त मिल गई. पहले दौर की 10 अंकों की बढ़त के बाद रचनोक का खेल खत्म होने तक दबदबा बरकरार रहा. सिंधु भले ही हार गईं लेकिन विश्व बै़डमिंटन चैंपियनशिप के एकल वर्ग में पदक जीतने वाली वे पहली भारतीय महिला बन गई हैं. भारत की साइना नेहवाल तीन बार इस चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल तक पहुंची थीं और इत्तेफ़ाक से इस बार चौथी मर्तबा भी उनका सफर क्वार्टर फाइनल में ही टूट गया. साइना नेहवाल क्वार्टर फाइनल में अपने से कहीं नीचे की वरीयता हासिल कोरिया की यिओन जू बेई से 21-1921-17 से हार गईं. साइना नेहवाल को इस टूर्नामेंट में तीसरी वरीयता दी गई थी जबकी जू बेई को तेरहवी वरीयता हासिल थी. इसके साथ ही विश्व चैंपियनशिप में कोई पदक जीतने का सपना एक बार फिर साइना नेहवाल के लिए सपना ही साबित हुआ. |
| DATE: 2013-08-10 |
| LABEL: sports |
| [858] TITLE: पीवी सिंधुः नई बैडमिंटन स्टार खिलाड़ी |
| CONTENT: पीवी सिंधु अभी तक वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप में जाइंट किलर साबित हुई है. उन्होने प्री क्वार्टर फाइनल में दूसरी वरीयता हासिल चीन की यिहान वांग को हराया और क्वार्टर फाइनल में चीन की ही शिजियान को हराया है. पूर्व बैडमिंटन खिलाड़ी दिनेश खन्ना का कहना है कि उनके प्रदर्शन से पता चलता है कि उनके खेल में पिछले दो सालों में काफी सुधार हुआ है. और भारत के लिए वाकई यह एक बेहद अच्छा समाचार है. सिंधु ने क्वार्टर फाइनल में चीन की सातवीं वरीयता प्राप्त खिलाड़ी शिजियान वांग को 21-1821-17 से हराया. इसके साथ ही इस चैंपियनशिप में भारत का कम से कम एक पदक भी पक्का हो गया है. पीवी सिंधु के खेल की ख़ासियत का ज़िक्र करते हुए दिनेश खन्ना कहते है कि उन्होने अपनी लंबाई का पूरा फायदा उठाया और उनके स्ट्रोक्स बेहद शार्प है जिनका रिटर्न करना आसान नही होता. विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में महिलाओ के एकल वर्ग के सेमीफाइनल में पहुंचने वाली पीवी सिंधु भारत की पहली महिला खिलाडी हैं. सिंधु ने यह भी दिखाया कि अपने से बेहतर रैकिंग वाली खिलाडी के सामने भी बिना किसी दबाव के खेला जा सकता है. महिला वर्ग में इससे पहले भारत को केवल एक कामयाबी विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में मिली है जब युगल वर्ग में ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोन्नप्पा की जोड़ी ने कांस्य पदक जीता था. दिनेश खन्ना कहते हैं कि विश्व बैडमिंटन जगत में अगर साइना नेहवाल और कुछ हद तक अपर्णा पोपट की बात की जाए तो कोई और महिला खिलाडी एकल वर्ग में इतना उभरकर सामने नही आई. दिन में साइना नेहवाल और पी कश्यप की हार से मायूस हुए भारतीय बैडमिंटन प्रेमियो को शाम होते होते पीवी सिंधु ने एक ख़ुशी का समाचार दिया बस अब देखना है कि उन्हे मिलने वाले पदक का रंग कैसा होता है भारत की साइना नेहवाल तीन बार इस चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल तक पहुंची हैं और इत्तेफ़ाक से इस बार चौथी मर्तबा भी उनका सफर क्वार्टर फाइनल में ही टूट गया. साइना नेहवाल क्वार्टर फाइनल में अपने से कहीं नीचे की वरीयता हासिल कोरिया की यिओन जू बेई से 21-1921-17 से हार गईं. साइना नेहवाल को इस टूर्नामेंट में तीसरी वरीयता दी गई थी जबकी जू बेई को तेरहवी वरीयता हासिल थी. इसके साथ ही विश्व चैंपियनशिप में कोई पदक जीतने का सपना एक बार फिर साइना नेहवाल के लिए सपना ही साबित हुआ. |
| DATE: 2013-08-10 |
| LABEL: sports |
| [859] TITLE: वर्ल्ड चैंपियनशिप के सेमीफाइनल में पहुँची सिंधु, पदक पक्का |
| CONTENT: चीन के ग्वांजो में चल रही वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत की खिलाड़ी पीवी सिंधु सेमीफ़ाइनल में पहुँच गई हैं. इस तरह उन्होंने भारत के लिए पदक पक्का कर दिया है. सिंधु ने क्वार्टर फाइनल में चीन की शिजियान वांग को सीधे सेटों में हराया. इस चैंपियनशिप में एकल वर्ग में पदक जीतने वाली वे पहली भारतीय महिला होंगी. इससे पहले एकल क्वार्टर फाइनल मुकाबले में भारत की महिला बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल हार गई. नेहवाल को दक्षिण कोरिया की येओन जू बाए ने सीधे सेटों में 21-23 और 9-21 से हराया. साइना नेहवाल का तिहाने इंडोर स्टेडियम में ये मुकाबला करीब 40 मिनट तक चला. इस टूर्नामेंट के क्वार्टर फाइनल मुकाबले में साइना की यह लगातार चौथी हार है. लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली साइना ने खेल की शुरुआत आक्रामक अंदाज में की. पहले सेट में वह एक समय 11-7 से आगे थीं लेकिन वह इस शुरुआती बढ़त को कायम रखने में सफल नहीं हो सकीं. साइना के साथ ही वाले कोर्ट पर खेल रहे कश्यप ने भी शानदार शुरुआत की लेकिन वह भी दुनिया के तीसरी वरियता प्राप्त खिलाड़ी पेंग्यू से पार नहीं पा सके. पहले सेट में जीत हासिल करने के बाद वह बाद के दो सेट हार गए. एक घंटे और 15 मिनट तक चले इस मुकाबले में चीनी खिलाड़ी ने उन्हें 21-16 20-22 और 15-21 से हराया. |
| DATE: 2013-08-09 |
| LABEL: sports |
| [860] TITLE: वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप में सिंधु का उलटफ़ेर |
| CONTENT: भारत की उभरती स्टार पी वी सिंधु ने चीन के ग्वांगझू में चल रही विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में गत चैंपियन चीन की वांग यिहान को हराकर टूर्नामेंट का सबसे बड़ा उलटफेर किया है. दुनिया की 12वें नंबर की खिलाड़ी सिंधु ने दूसरी सीड और लंदन ओलंपिक की रजत पदक विजेता वांग को तीसरे दौर में 21-18 23-21 से हराकर अपने करियर की सबसे बड़ी जीत दर्ज की. 55 मिनट तक चले इस मैच के पहले गेम में दोनों खिलाड़ी एक समय 8-8 से बराबरी पर थीं लेकिन सिंधु ने इसके बाद 12-9 की बढ़त बना ली. चीनी खिलाड़ी भी हार मानने वाली नहीं थीं. उन्होंने 16-16 पर सिंधु को जा पकड़ा. दसवीं सीड सिंधु ने फिर लगातार दो अंक जुटाते हुए स्कोर 18-16 किया और फिर पहला गेम 21-18 से अपने नाम कर लिया. दूसरे गेम में दोनों के बीच बराबर की टक्कर हुई और एक समय स्कोर 6-6 था. सिंधु ने इसके बाद अंक दर अंक जुटाते हुए 13-7 की बढ़त बनी ली और फिर इसे 20-17 कर दिया. लेकिन चीनी खिलाड़ी ने अपने विशाल अनुभव और घरेलू सर्मथन के दम पर 20-20 की बराबरी हासिल कर ली और फिर एक अंक जुटाकर 21-20 की बढ़त बना ली. हैदराबाद की सिंधु ने मैच के इस अहम पड़ाव पर संयम दिखाते हुए लगातार तीन अंक जुटाए और क्वार्टरफ़ाइनल का टिकट पा लिया. सिंधु का क्वार्टरफ़ाइनल में विश्व की आठवें नंबर की खिलाड़ी चीन की वांग शिजियान से मुक़ाबला होगा. सिंधु के अलावा भारत की स्टार खिलाड़ी सायना नेहवाल और परुपल्ली कश्यप भी अंतिम आठ में पहुंचने में कामयाब हुए. ये भारतीय बैडमिंटन के इतिहास में पहला मौका है जब भारत के तीन-तीन खिलाड़ी वर्ल्ड चैंपियनशिप के सिंगल्स इवेंट में क्वार्टर फ़ाइनल में जगह पाने में कामयाब हुए. |
| DATE: 2013-08-09 |
| LABEL: sports |
| [861] TITLE: बेटे मोंटी थोड़ी तमीज़ से रहो: बेदी |
| CONTENT: पूर्व भारतीय टेस्ट क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी ने इंग्लैंड के क्रिकेटर मोंटी पनेसर को अपने व्यवहार पर ध्यान देने की सलाह दी है. ससेक्स काउंटी क्रिकेट क्लब के लिए खेलने वाले मोंटी पनेसर पर सोमवार सुबह शूश क्लब के बाहर शराब पीकर हंगामा करने के लिए जुर्माना लगाया गया है. बिशन सिंह बेदी ने ट्वीट किया है कि बहुत नटखट मोंटी मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम इतने दुस्साहसी हो. मैं ख़ुद की दोबारा खोज करने की तुम्हारी पहली कोशिश माफ कर दूंगा. लेकिन बेटे अब थोड़ी तमीज़ से रहो. मोंटी पनेसर जब 2007 में पहली बार भारत के दौरे पर आए थे तब उन्हें बिशन सिंह बेदी ने स्पिन गेंदबाज़ी के गुर सिखाए थे. उस वक्त बिशन सिंह बेदी ने कहा था कि मोंटी पनेसर खेल के एक बेहतरीन छात्र हैं. हालांकि समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक मोंटी पनेसर ने सोमवार की घटना के लिए खुलकर माफी मांगी है. मोंटी पनेसर इंग्लैंड की 14 सदस्यीय क्रिकेट टीम में शामिल थे. इंग्लैंड ने ओल्ड ट्रैफ़र्ड में ऐशेज़ जीत ली लेकिन इस मैच में मोंटी पनेसर नहीं खेले थे. मोंटी को शुक्रवार से डरहम में शुरू हो रहे अगले ऐशेज़ टेस्ट के लिए भी टीम में शामिल नहीं किया गया है. बाएं हाथ के स्पिन गेंदबाज़ मोंटी पनेसर ने टेस्ट मैचों में इंग्लैंड के लिए 164 विकेट लिए हैं. |
| DATE: 2013-08-08 |
| LABEL: sports |
| [862] TITLE: उगते सूरज को तो सब सलाम करते हैं. |
| CONTENT: चढ़ते सूरज को सभी सलाम करते हैं लेकिन जब टीम खराब प्रदर्शन करती है तो कोई दिलासा नहीं देता. अब जब मेडल आया है तो राज्य सरकारों को पुरस्कार की घोषणा करनी चाहिए. इसके साथ-साथ निचले स्तर पर खेल रहे खिलाड़ियों की मदद करनी चाहिए. वह आर्थिक रूप से बेहद कमज़ोर होते हैं. न जाने कैसे-कैसे हालात से निकलकर आते हैं. गांव के लोगों के लिए यहां तक का सफ़र आसान नही है. ये कहना है पिछले दिनों जर्मनी में हुए जूनियर विश्वकप हॉकी टूर्नामेंट में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय महिला हॉकी टीम की तेज़-तर्रार फॉरवर्ड रानी रामपाल का जिन्हे प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट भी घोषित किया गया. रानी रामपाल और भारतीय हॉकी टीम की सभी सदस्यों को बुधवार को दिल्ली में एक पांच सितारा होटल में हॉकी इंडिया की तरफ़ से सम्मानित किया गया और उन्हें एक-एक लाख रुपए भी दिए गए. इस मौके पर टीम की कप्तान सुशीला चानू भी बेहद ख़ुश नज़र आ रही थीं. वैसे तो भारत ने आठ बार ओलंपिक में हॉकी का स्वर्ण पदक जीता है लेकिन विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट में इससे पहले केवल एक बार 1975 में कप्तान अजीतपाल सिंह की कप्तानी में स्वर्ण पदक जीता था. पुरुष वर्ग में भारत विश्वकप में इसके अलावा और भी कई पदक जीतने में कामयाब रहा है लेकिन महिला वर्ग में चाहे वह जूनियर हो या सीनियर यह उसका पहला पदक है. सुशीला चानू ने बताया न्यूज़ीलैंड की टीम को हराने के बाद हमें लगा कि हम भी पदक जीत सकते हैं. इंग्लैंड के ख़िलाफ कांस्य पदक के लिए खेले गए मैच में जीतना आसान नहीं था क्योंकि पेनल्टी शूटआउट में कुछ भी हो सकता था. रानी रामपाल हरियाणा के एक छोटे से शहर शाहबाद से आती हैं जहां हॉकी को लेकर बेहद जुनून है क्योंकि वहां द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित हॉकी कोच बलदेव सिंह हॉकी अकादमी चलाते हैं. मगर मणिपुर से आने वाली सुशीला चानू बताती हैं कि वहां हॉकी को लेकर कोई सुविधा नहीं है. उनके कोच ख़ुद सारा खर्च उठाते हैं. अगर मणिपुर में हॉकी की सुविधाएं हों तो वहां भी हॉकी का स्तर ऊंचा उठ सकता है. अब हर कोई इस भारतीय हॉकी के खिलाड़ियों से मिलना चाहता है. वहीं टीम के सदस्य अपने घर वालों से कितना मिल पाते हैं इस बारे में सुशीला चानू ने बताया बहुत कम मिल पाते हैं. पहले ग्वालियर में ट्रेनिंग के दौरान चार साल में हर साल सिर्फ़ कुछ दिन घर जाना होता था दस-पंद्रह दिनों के लिए. घर को बहुत मिस करते हैं. जब वापस आते हैं तो मम्मी-पापा भाई-बहन सब रोते हैं. अब जूनियर टीम ने ही सही आखिरकार भारत को विश्वकप हॉकी टूर्नामेंट में कांस्य पदक दिला दिया है. अब देखनेवाली बात ये होगी कि इस क़ामयाबी से प्रेरणा लेकर अब भारत की सीनियर महिला और पुरुष हॉकी टीम क्या करती है जिनके सामने पहली चुनौती तो फिलहाल विश्वकप के लिए क्वालीफ़ाई करना है. |
| DATE: 2013-08-08 |
| LABEL: sports |
| [863] TITLE: धोखेबाज़ी के आरोपों से गुस्साए पीटरसन |
| CONTENT: इंग्लैंड के बल्लेबाज केविन पीटरसन ने आस्ट्रेलियाई मीडिया की उन रिपोर्टों को सिरे से ख़ारिज किया है जिनमें कहा गया है कि वो आउट होने से बचने के लिए अपने बल्ले पर विशेष टेप का इस्तेमाल करते हैं. रिपोर्टों में कहा गया था कि आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बल्लेबाजों की इस सिलसिले में जाँच की जा सकती है. हालाँकि सिर्फ केविन पीटरसन का नाम ही रिपोर्टों में लिया गया था. 33 वर्षीय पीटरसन ने ट्वीटर पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा अगर मैं निक गेंद का बल्ले को छूकर फील्डर के हाथ में जाना करूँगा तो मैं खुद ही क्रीज छोड़ दूँगा. उन्होंने कहा ऐसा कहना कि मैं अपने बल्ले पर सिलीकॉन लगाकर हॉट स्पॉट सिस्टम से बचने के लिए धोखा देता हूं मुझे गुस्सा दिलाता है. यह बहुत ही ख़राब झूठ है. उन्होंने आगे कहा मैं निक को छुपाकर जो वास्तव में मुझे एलबीडब्ल्यू अपील से बचा सकती है कितना बेवकूफ लगूंगा. पहली पारी में ही एलबीडब्ल्यू अपील पर हॉट स्पॉट ने बताया था कि मैंने निक किया है. बल्लेबाजों द्वारा बल्ले पर सिलिकॉन के इस्तेमाल की खबरें आस्ट्रेलिया के चैनल नाईन पर शुरू हुईं थी. चैनल ने एक रिपोर्ट में कहा ऐसा समझा जा रहा है कि बल्ले की एज पर सिलिकॉन लगाया जा रहा है. इस तरह की चिंताएं दूसरी इनिंग के दौरान मेनचेस्टर में केविन पीटरसन के आउट होने पर केंद्रित हैं. लेकिन सिर्फ इंग्लैंड के बल्लेबाजों ही जाँच के दायरे में नहीं है. नाइन न्यूज समझता है कि आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज भी इस तरीके का इस्तेमाल कर रहे हैं. गौरतलब है कि हॉट स्पॉट तकनीक गेंद के बल्ले या पैड को छूने को पकड़ती है. गेंद के बल्ले या पैड को छूने से जो गरमी पैदा होती है उसे इंफ्रा रेड कैमरा पकड़ लेते हैं. इंग्लैंड के तेज गेंदबाज़ ग्राहम ओनियंस ने कहा कि जब मैं ड्रैसिंग रूम में गया तब पहली बार इस तरह के आरोपों के बारे में सुना. डरहम में शुरु होने जा रहे चौथे टेस्ट मैच में ग्राहम टीम शामिल हो सकते हैं. उन्होंने कहा ऐसा लग रहा है इसे कुछ ज्यादा ही तूल दिया जा रहा है. मैं जानता हूँ कि इंग्लैंड के बल्लेबाज अपने बल्लों पर कुछ नहीं लगाएंगे. यह सोचना भी मूर्खता है कि खिलाड़ी फ़ैसलों को प्रभावित करने के लिए अपने बल्लों पर कोई चीज़ लगा रहे हैं. हॉट स्पॉट तकनीक के अविष्कारक वॉरेन ब्रैनन का कहना है कि वे और उनकी कंपनी बीबीजी स्पोर्ट्स आईसीसी द्वारा मामले की जाँच किए जाने तक कोई टिप्पणी नहीं करेंगे. आईसीसी के महाप्रबंधक जॉफ एलरडाइस डरहम में इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों से मुलाक़ात करेंगे और निर्णय समीक्षा प्रणाली से उपजी चिंताओं पर बात करेंगे. आईसीसी ने पूरे विवाद पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है लेकिन माना जा रहा है कि सिलिकॉन टेप जो अभी तक प्रतिबंधित नहीं है के मुद्दे पर चर्चा हो सकती है. ऐशेज श्रंखला के दौरान कई बार एज को न पकड़ पाने पाने के कारण हॉट स्पॉट तकनीक की आलोचना हो रही है. इंग्लैंड के विकेट कीपर मैट प्रॉयर ने टेलीग्रॉफ से कहा मुझे नहीं लगता है कि हम हॉट स्पॉट पर अब भी विश्वास करते हैं. कितनी बार एज को पकड़ने में इससे चूक हुई है. गौरतलब है कि केविन पीटरसन ओल्ड ट्रेफोर्ड में खेले गए तीसरे टेस्ट मैच की दूसरी पारी में विकेट कीपर द्वारा लपक लिए गए थे. उन्होंने फैसले को चुनौती दी थी. हॉट स्पॉट तकनीक ने गेंद के बल्ले को छूने को कोई प्रमाण नहीं दिया था लेकिन टीवी अंपायर कुमार धर्मसेना ने टीवी रिप्ले में आवाज़ सुनने के आधार पर आउट दिए जाने के फैसले को बरकरार रखा था. |
| DATE: 2013-08-08 |
| LABEL: sports |
| [864] TITLE: क्रिकेटर मोंटी पनेसर ने बाउंसरों पर पेशाब किया |
| CONTENT: इंग्लैंड के क्रिकेट स्टार मोंटी पनेसर को पुलिस ने ब्राइटन में नाइट क्लब के बाउंसरों पर पेशाब करते हुए पकड़ा है. उन पर जुर्माना लगाया गया है. ससेक्स काउंटी क्रिकेट क्लब के लिए खेलने वाले स्पिन गेंदबाज़ पर सोमवार सुबह शूश क्लब के बाहर शराब पीकर हंगामा करने के लिए जुर्माना लगाया गया. ससेक्स की पुलिस ने बताया कि 31 वर्षीय मोंटी पनेसर को जुर्माने का नोटिस भेज दिया गया है. ससेक्स काउंटी क्रिकेट क्लब का कहना है कि वह मामले की जांच कर रहा है. क्रिकेट क्लब के बयान में कहा गया है ससेक्स काउंटी क्रिकेट क्लब यह पुष्टि करता है कि पाँच अगस्त यानी सोमवार की सुबह मोंटी पनेसर से संबंधित एक घटना हुई थी. बयान में यह भी कहा गया है कि. मामले की जांच की जा रही है. इस समय क्लब की तरफ से कोई और टिप्पणी नहीं दी जाएगी. ये दूसरी बार है कि मौजूदा ऐशेज़ में खेलने वाले किसी खिलाड़ी का नाम शराब से संबंधित मामले में आया है. जून में बर्मिंघम में एक नाइट क्लब के बाहर भी एक ऐसा मामला सामने आया था. वहां ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज़ डेविड वॉर्नर ने इंग्लैंड के सलामी बल्लेबाज़ जो रूट के मुंह पर चोट पहंचाई थी. इसके लिए डेविड को सज़ा भी मिली थी. डेविड वॉर्नर ऐशेज़ में इंग्लैंड के साथ पहले दो मैचों में नहीं खेल पाए थे. ओल्ड टैफ़र्ड में खेले गए टेस्ट मैच में वह नज़र आए . मोंटी पनेसर इंग्लैंड की 14 सदस्यीय क्रिकेट टीम में शामिल थे. इंग्लैंड की टीम ने ओल्ड ट्रैफ़र्ड में ऐशेज़ जीत ली. इस मैच में मोंटी पनेसर नहीं खेले थे. बाएं हाथ के स्पिन गेंदबाज़ मोंटी पनेसर ने टेस्ट मैचों में इंग्लैंड के लिए 164 विकेट लिए हैं. इन्हें शुक्रवार से डरहम में शुरू हो रहे के अगले ऐशेज़ टेस्ट में शामिल नहीं किया गया है. |
| DATE: 2013-08-07 |
| LABEL: sports |
| [865] TITLE: कमाई में सबसे आगे शारापोवा |
| CONTENT: दुनिया की सबसे ज़्यादा कमाने वाली 10 महिला एथलीटों में टेनिस खिलाड़ी शीर्ष पर हैं. मंगलवार को जारी फ़ोर्ब्स मैग़्ज़ीन ने इस सूची में अधिकांश खेलों में महिला और पुरुष खिलाड़ियों की कमाई के फ़र्क की भी तुलना की गई है. फ़ोर्ब्स डॉट कॉम पर जारी सूची में रूस की टेनिस खिलाड़ी मारिया शारापोवा शीर्ष पर हैं. जून 2012 से 2013 तक उन्होंने 2-90 करोड़ डॉलर 1-76 अरब रुपये कमाए हैं. टेनिस खिलाड़ी कमाई वाले पहले चारों स्थानों पर काबिज हैं. विश्व टेनिस की नंबर एक खिलाड़ी सेरीना विलियम्स 2-50 करोड़ डॉलर 1-24 अरब रुपये के साथ दूसरे चीन की ली ना 1-82 करोड़ डॉलर 1-10 अरब रुपये के साथ तीसरे और बेलारूस की विक्टोरिया एज़ारेंका 1-57 करोड़ डॉलर 95-42 करोड़ रुपये के साथ तीसरे स्थान पर हैं. डेनमार्क की केरोलीन वोज़नियाकी 1-36 करोड़ डॉलर 82-66 करोड़ रुपये के साथ सातवें पोलैंड की अग्नीज़का राडवान्स्का 74 लाख डॉलर 44-97 करोड़ रुपये के साथ आठवें और सर्बिया की अना इवानोविच 70 लाख डॉलर 42-54 करोड़ रुपये के साथ नवें स्थान पर हैं. अमरीकी नासकार ड्राइवर डानिका पैट्रिक 1-50 करोड़ डॉलर 91-17 करोड़ रुपये के साथ पांचवें स्थान दक्षिण कोरिया की फ़िगर स्केटर किम युना 1-40 करोड़ डॉलर 85-09 करोड़ रुपये के साथ छठे स्थान पर और अमरीकी गोल्फ़र पॉला क्रीमर पचपन लाख डॉलर 33-42 करोड़ रुपये के साथ दसवें स्थान पर हैं. शीर्ष दस खिलाड़ियों में यही तीन गैर टेनिस खिलाड़ी हैं. लेकिन इस व्यापारिक मैग्ज़ीन के अनुसार खेलों में कमाई के संबंध में महिला और पुरुष खिलाड़ियों में भेद अब भी कायम है. उदाहरण के लिए दुनिया के शीर्ष गोल्फ़र टाइगर वुड्स दुनिया के सबसे ज़्यादा कमाई करने वाले एथलीट रहे. पहली जून 2012 से लेकर पहली जून 2013 तक उन्होंने 7-80 करोड़ डॉलर 4-74 अरब रुपये कमाए. लॉस एंजिल्स लेकर्स के बास्केटबॉल स्टार कोब ब्रयान्ट अगले सीज़न के लिए 3-05 करोड़ डॉलर 1-85 अरब रुपये पाएंगे जबकि एनबीए में महिलाओं की शीर्ष खिलाड़ी को सिर्फ़ 107000 डॉलर 65-03 लाख रुपये ही मिलेंगे. मैगज़ीन के अनुसार महिलाओं का अमरीकी ओपन खिताब जीतने वाली दक्षिण कोरिया की पार्क इनबी को 585000 डॉलर 3-55 करोड़ रुपये मिले जबकि पुरुषों का खिताब जीतने वाले जस्टिन रॉस को 10-4 लाख डॉलर 8-50 करोड़ रुपये प्राप्त हुए. फ़ोर्ब्स का कहना है कि हालिया सालों में टेनिस में इनाम की राशि को बराबर रखने की कोशिश की जा रही है. लेकिन ग्रैंड स्लैम जीतने के बाद मिलने वाले विज्ञापन अधिकतर खिलाड़ियों की आय का मुख्य साधन हैं. जैसे कि 2012 में शारापोवा के फ्रैंच ओपन खिताब जीतने के बाद हुई कमाई ने ज़्यादातर खिलाड़ियों की इनामी राशि को बहुत पीछे छोड़ दिया था. उदाहरण के लिए इस 26 वर्षीय खिलाड़ी ने खेल के सामान के उत्पादकों हेड और नाइकी के विज्ञापनों से 2-30 करोड़ डॉलर 1-39 अरब रुपये की कमाई की. इसके साथ ही उन्होंने टॉफ़ी का अपना ब्रांड शुगरपोवा भी लॉंच किया था. फ़ोर्ब्स की दुनिया के सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली एथलीटों की सूची में कई ग्रैंड स्लैम जीतने वाले स्विट्ज़रलैंड के रोजर फ़ेडरर दूसरे स्थान पर हैं. उन्होंने 7-15 करोड़ डॉलर 4-34 अरब रुपये की कमाई की. शारापोवा 100 लोगों की सूची में 22वें स्थान पर हैं. उन्होंने 2-69 करोड़ डॉलर 1-63 अरब रुपये कमाने वाले पुरुषों के शीर्ष टेनिस खिलाड़ी सर्बिया के नोवाक जोकोविच और 2-64 करोड़ डॉलर 1-60 अरब रुपये कमाने वाले स्पेन के राफ़ेल नडाल को पीछे छोड़ दिया है. सेरीना विलियम्स शीर्ष 100 में 68वें स्थान पर हैं तो ली ना 85वें पर. सिर्फ़ इतना ही नहीं इस सूची में यही तीन महिलाएं हैं. |
| DATE: 2013-08-07 |
| LABEL: sports |
| [866] TITLE: तो ये है यूसैन बोल्ट की रफ़्तार का रहस्य! |
| CONTENT: यूसैन ने 2009 की बर्लिन विश्व चैंपियशिप में 100 मीटर की दूरी 9-58 सेकेंड में पूरी करने का रिकॉर्ड बनाया. वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि जमैका के धावक यूसैन बोल्ट की अतुलनीय रफ़्तार का रहस्य अब समझा जा सकता है. इसके लिए वैज्ञानिकों ने एक गणितीय मॉडल विकसित किया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यूसैन बोल्ट के शरीर की पांच फ़ुट छह इंच की लंबाई और उनकी शक्ति और ऊर्जा का समन्वय उनको सबसे तेज़ रफ़्तार वाला बेजोड़ धावक बनाता है. यूसैन बोल्ट ने 2009 की बर्लिन विश्व चैंपियशिप में 100 मीटर की दूरी 9-58 सेकेंड में पूरा करने का रिकॉर्ड बनाया था जिसे आज तक कोई धावक नहीं तोड़ पाया. द यूरोपियन जर्नल ऑफ फिजिक्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार एक ख़ास मॉडल के सहारे यूसैन की तेज़ रफ़्तार का रहस्य खोजा जा सकता है. इसके अनुसार बोल्ट ने 9-58 सेकेंड में 100 मीटर का लक्ष्य अपनी रफ़्तार को 12-2 मीटर प्रति सेकेंड तक पहुंचाकर हासिल किया. यानी बोल्ट 27 मील प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रहे थे. बोल्ट की रफ़्तार का विश्लेषण करने वाली टीम ने पाया कि बोल्ट में सर्वाधिक शक्ति तब पैदा हुई जब वह दौड़ में आधी रफ़्तार पर एक मीटर की दूरी सेकेंड से भी कम समय में तय कर रहे थे. इस प्रदर्शन से रफ़्तार में आने वाली बाधा का तात्कालिक प्रभाव देखा जा सकता है जहां हवा का प्रतिरोध गतिशील वस्तुओं की रफ़्तार को धीमा कर देता है. यूसैन बोल्ट की रफ़्तार का लोहा पूरी दुनिया मानती है. वैज्ञानिकों के मुताबिक़ यूसैन बोल्ट के दौड़ने के दौरान मांसपेशियों से पैदा होने वाली ऊर्जा का केवल आठ फ़ीसद इस्तेमाल हो रहा था. बाकी ऊर्जा हवा द्वारा उत्पन्न प्रतिरोध में ख़त्म हो रही थी. नेशनल ऑटोनामस यूनिर्वसिटी के जार्ज हेरनांदेज़ कहते हैं कि हमारी गणना से बोल्ट की विशिष्ट प्रतिभा का पता चलता है. एयरोडायनेमिक यानी वायुगतिकीय रूप से उनसे ज्यादा क्षमता वाले मनुष्य हो सकते हैं. इस क्षमता विरोध के बावजूद बोल्ट ने कई रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं. 2009 में बोल्ट ने असाधारण क्षमता का प्रदर्शन करते हुए रिकॉर्ड बनाया था. जार्ज हेरनांदेज़ कहते हैं आजकल रिकॉर्ड तोड़ना काफी कठिन हो गया है. यहां तक कि सेकेंड के सौवें हिस्से से भी रिकॉर्ड तोड़ना बहुत बड़ी बात है. धावक की बढ़ती रफ़्तार के साथ विपरीत दिशा से लगने वाले अवरोध में तेज़ी से बढ़ोत्तरी होती है. इस कारण धावकों को रिकॉर्ड बनाने या तोड़ने के लिए अवरोध से निपटने में सारी ताकत झोंकनी पड़ती है. ऐसा पृथ्वी के वातावरण की भौतिक बाधाओं के कारण होता है. अगर बोल्ट किसी कम घने वातावरण वाले ग्रह पर दौड़ रहे होते तो उनके रिकॉर्ड तुलनात्मक रूप से काफी बेहतर होते. बोल्ट की स्थिति के सटीक अध्ययन और दौड़ के दौरान उनकी गति ने धावकों पर अवरोध के असर का अध्ययन करने का शानदार मौका दिया है. हेरनांदेज़ कहते हैं कि अगर भविष्य में और आंकड़े उपलब्ध होते हैं तो देखना दिलचस्प होगा कि एक एथलीट की कौन सी बात बाकियों से विशिष्ट बनाती है. इलेक्ट्रॉनिक टाइमिंग का इस्तेमाल 1968 से हो रहा है. बर्लिन में जब बोल्ट दौड़े और जो समय दर्ज हुआ वो 1968 से लेकर तब तक के रिकॉर्ड में सबसे बड़ा सुधार था. वैज्ञानिक कहते हैं कि बोल्ट प्रदर्शन में सुधार से अपना भी रिकॉर्ड तोड़ सकते हैं. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के जॉन बारो कहते हैं कि रेस शुरू करने के लिए दागी गई गोली पर बोल्ट का प्रतिक्रिया काल धीमा होता है. अगर वे तेज़ शुरुआत करें तो लंबे डग भरने की वजह से उनकी रफ़्तार और बढ़ सकती है. जॉन बताते हैं कि बोल्ट की मांसपेशियां काफी मज़बूत और तेज़ी से हरकत में आने वाली हैं. वे लंबे डग भरने के कारण दौड़ को बेहद जल्दी पूरा कर सकते हैं. वे कहते हैं कि बोल्ट अगर तेज़ शुरुआत करते हैं अनुकूल हवा में पूरा ज़ोर लगाते हैं और ऊंचे डग भरते हुए दौड़ते हैं तो वे खुद अपना रिकॉर्ड तोड़ सकते हैं. जॉन के मुताबिक़ बोल्ट का बर्लिन रिकॉर्ड 0-9 मीटर प्रति सेकेंड की रफ़्तार से बहने वाली अनुकूल हवा में बना था. इतनी रफ़्तार वाली हवा से विशेष लाभ नहीं मिलता. प्रोफेसर जॉन बारो बताते हैं कि अगर हवा की रफ़्तार दो मीटर प्रति सेकेंड से ज़्यादा न हो तो रिकॉर्ड दर्ज किया जाता है. इस कारण से बोल्ट के पास अपनी रफ़्तार बढ़ाए बिना सुधार करने की काफी गुंजाइश है. |
| DATE: 2013-08-07 |
| LABEL: sports |
| [867] TITLE: 'सौरव गांगुली ने बनाया टीम इंडिया को जुझारू' |
| CONTENT: चीन में जब हमने एक पार्क में घूम रही लड़की को क्रिकेट का बल्ला दिखाकर पूछा कि क्या वो इस चीज को पहचान सकती है लड़की ने कहा ये नाव का चप्पू है है नापार्क में घूम रहे दूसरे लोग भी इस बल्ले को देखकर चकित थे. लेकिन कुछ लोग इसे पहचान भी रहे थे. एक लड़के ने बताया कि उसने अपने स्कूल में कुछ लोगों को क्रिकेट की कोचिंग लेते हुए देखा है. हम अपना ये अवैज्ञानिक प्रयोग चीन के उत्तर-पूर्वी शहर शेनयांग में कर रहे थे. शेनयांग को चीन की क्रिकेट राजधानी कहा जाता है. इस बच्चे के जवाब से हमारे सामने इस बात की पुष्टि भी हो गई. चीन के महिला और पुरुष दोनों वर्गों में शेनयांग में स्थित खेल विश्वविद्यालयों की ही टीमें राष्ट्रीय चैंपियन हैं. जब हम चीन के चैंपियन क्रिकेट खिलाड़ियों से मिलने गए तो देखा कि वो एस्ट्रोटर्फ पर अभ्यास कर रहे हैं. कुछ निजी क्लबों और अंतरराष्ट्रीय स्कूलों को छोड़ दिया जाए तो पूरे चीन में घास का सिर्फ एक क्रिकेट मैदान है. और यह मैदान भी सुदूर दक्षिणी शहर ग्वांज़ो में है. यह मैदान 2010 के एशियाई खेलों के लिए बनाया गया था. चीन के खिलाड़ियों में उत्साह और लगन की कमी नहीं है. खेल विश्वविद्यालय की महिला टीम काफी सुसंगठित नज़र आ रही थी. उनकी फील्डिंग भी अच्छी थी. उनकी विकेट-कीपर ने मुझे ख़ास तौर पर प्रभावित किया. यह विकेट-कीपर चीन की राष्ट्रीय टीम के लिए भी खेलती हैं. चीन की महिला टीम मात्र सात सालों में एशियाई महिला क्रिकेट के दूसरे स्तर में करीब-करीब शीर्ष पर पहुँच गई है. मुझे चीन के पुरुष क्रिकेट खिलाड़ियों को देखना का भी अवसर मिला. सुन ली नामक एक खिलाड़ी को मैंने एक ऐसा कैच लेते देखा जिसे लेकर कोई भी टेस्ट-क्रिकेटर गर्व महसूस करेगा. सुन ली ने सीमा-रेखा की तरफ दौड़ते हुए काफी ऊँचा कैच लपका था. हालाँकि चीन के पुरुष क्रिकेट महिला क्रिकेट से पीछे है. शुयाओ नामक एक और पुरुष खिलाड़ी से हमने पूछा कि उन्हें क्रिकेट में क्या अच्छा लगता है. शुयाओ का कहना था यह खेल परिवार में रहने के समान है. शुयाओ अमीर परिवार से नहीं आते. वो कई बार अपने जेबख़र्च के लिए मोजे भी बेचते हैं. हालाँकि उन्होंने 2012 की गर्मियों में इतने पैसे बचा लिए थे कि वो इंग्लैंड में क्लीथ्रोप क्रिकेट क्लब में जाकर खेल सकें. इंग्लैंड क्लब क्रिकेट में उनका अधिकतम स्कोर 98 रहा था. अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और क्रिकेट के स्थानीय प्रशंसक चीन में क्रिकेट का विकास करना चाहते हैं. लेकिन उनके सामने कई मुश्किलें भी हैं. चीन में क्रिकेट की कोई परंपरा नहीं है. साजो-सामान की भी कमी है और शहरों में शॉपिंग मॉल और गगनचुंबी रिहायशी इमारतों के बनने से शहरों में बड़े मैदानों के लिए जगह कम पड़ती जा रही है. मुझसे कई लोगों ने कहा कि चीनी टीम गेम में ज़्यादा रुचि नहीं लेते. प्राइमरी स्कूलों में बच्चे क्रिकेट खेलते हैं लेकिन पढ़ाई-लिखाई और अभिभावकों के दबाव के कारण वो भविष्य में इसे जारी नहीं रख पाते. स्कूल के बाद सीधे विश्वविद्यालय में उन्हें क्रिकेट खेलने की फुरसत मिल पाती है. चीन में खेलों का भविष्य सरकार की नीतियों पर निर्भर होता है. चीन के कुछ प्राइमरी स्कूलों में क्रिकेट को एक वैकल्पिक खेल के रूप में शामिल किया गया है. इसका क्या फायदा होगा पता नहीं लेकिन चीन की जनसंख्या को देखते हुए कहा जा सकता है कि अगर चीन में क्रिकेट लोकप्रिय हुआ तो चीन के पास लाखों की संख्या में क्रिकेट खिलाड़ी होंगे. चीन में क्रिकेट का भविष्य बहुत हद तक इस बात पर भी निर्भर है कि क्रिकेट को ओलंपिक में शामिल किया जाता है या नहीं. चीन के खेल मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार यदि क्रिकेट को ओलंपिक में शामिल किया जाता है तो मंत्रालय पदक लाने के लिए पूरी ताकत लगा देगा. फिर दूसरे खेलों की तरह क्रिकेट के लिए भी कम उम्र में ही संभावना वावे क्रिकेटर के रूप में लड़के-लड़कियों का चयन किया जाने लगेगा. दुनिया के बेहतरीन कोचों को बुलाया जाने लगेगा. चीन की राष्ट्रीय टीम की वर्ल्ड रैंकिंग रातों-रात बढ़ जाएगी. बहरहाल ओलंपिक में केवल टी-20 क्रिकेट के ही शामिल होने की संभावना है. खेल मंत्रालय के अधिकार से जब हमने पूछा कि क्या उन्होंने कभी टेस्ट क्रिकेट देखा है तो वो बोले नहीं नहीं टेस्ट क्रिकेट देखना तो एक त्रासदी होगी. |
| DATE: 2013-08-07 |
| LABEL: sports |
| [868] TITLE: क्रिकेट का भी सुपरपावर बनेगा चीन! |
| CONTENT: चीन में जब हमने एक पार्क में घूम रही लड़की को क्रिकेट का बल्ला दिखाकर पूछा कि क्या वो इस चीज को पहचान सकती है लड़की ने कहा ये नाव का चप्पू है है नापार्क में घूम रहे दूसरे लोग भी इस बल्ले को देखकर चकित थे. लेकिन कुछ लोग इसे पहचान भी रहे थे. एक लड़के ने बताया कि उसने अपने स्कूल में कुछ लोगों को क्रिकेट की कोचिंग लेते हुए देखा है. हम अपना ये अवैज्ञानिक प्रयोग चीन के उत्तर-पूर्वी शहर शेनयांग में कर रहे थे. शेनयांग को चीन की क्रिकेट राजधानी कहा जाता है. इस बच्चे के जवाब से हमारे सामने इस बात की पुष्टि भी हो गई. चीन के महिला और पुरुष दोनों वर्गों में शेनयांग में स्थित खेल विश्वविद्यालयों की ही टीमें राष्ट्रीय चैंपियन हैं. जब हम चीन के चैंपियन क्रिकेट खिलाड़ियों से मिलने गए तो देखा कि वो एस्ट्रोटर्फ पर अभ्यास कर रहे हैं. कुछ निजी क्लबों और अंतरराष्ट्रीय स्कूलों को छोड़ दिया जाए तो पूरे चीन में घास का सिर्फ एक क्रिकेट मैदान है. और यह मैदान भी सुदूर दक्षिणी शहर ग्वांज़ो में है. यह मैदान 2010 के एशियाई खेलों के लिए बनाया गया था. चीन के खिलाड़ियों में उत्साह और लगन की कमी नहीं है. खेल विश्वविद्यालय की महिला टीम काफी सुसंगठित नज़र आ रही थी. उनकी फील्डिंग भी अच्छी थी. उनकी विकेट-कीपर ने मुझे ख़ास तौर पर प्रभावित किया. यह विकेट-कीपर चीन की राष्ट्रीय टीम के लिए भी खेलती हैं. चीन की महिला टीम मात्र सात सालों में एशियाई महिला क्रिकेट के दूसरे स्तर में करीब-करीब शीर्ष पर पहुँच गई है. मुझे चीन के पुरुष क्रिकेट खिलाड़ियों को देखना का भी अवसर मिला. सुन ली नामक एक खिलाड़ी को मैंने एक ऐसा कैच लेते देखा जिसे लेकर कोई भी टेस्ट-क्रिकेटर गर्व महसूस करेगा. सुन ली ने सीमा-रेखा की तरफ दौड़ते हुए काफी ऊँचा कैच लपका था. हालाँकि चीन के पुरुष क्रिकेट महिला क्रिकेट से पीछे है. शुयाओ नामक एक और पुरुष खिलाड़ी से हमने पूछा कि उन्हें क्रिकेट में क्या अच्छा लगता है. शुयाओ का कहना था यह खेल परिवार में रहने के समान है. शुयाओ अमीर परिवार से नहीं आते. वो कई बार अपने जेबख़र्च के लिए मोजे भी बेचते हैं. हालाँकि उन्होंने 2012 की गर्मियों में इतने पैसे बचा लिए थे कि वो इंग्लैंड में क्लीथ्रोप क्रिकेट क्लब में जाकर खेल सकें. इंग्लैंड क्लब क्रिकेट में उनका अधिकतम स्कोर 98 रहा था. अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और क्रिकेट के स्थानीय प्रशंसक चीन में क्रिकेट का विकास करना चाहते हैं. लेकिन उनके सामने कई मुश्किलें भी हैं. चीन में क्रिकेट की कोई परंपरा नहीं है. साजो-सामान की भी कमी है और शहरों में शॉपिंग मॉल और गगनचुंबी रिहायशी इमारतों के बनने से शहरों में बड़े मैदानों के लिए जगह कम पड़ती जा रही है. मुझसे कई लोगों ने कहा कि चीनी टीम गेम में ज़्यादा रुचि नहीं लेते. प्राइमरी स्कूलों में बच्चे क्रिकेट खेलते हैं लेकिन पढ़ाई-लिखाई और अभिभावकों के दबाव के कारण वो भविष्य में इसे जारी नहीं रख पाते. स्कूल के बाद सीधे विश्वविद्यालय में उन्हें क्रिकेट खेलने की फुरसत मिल पाती है. चीन में खेलों का भविष्य सरकार की नीतियों पर निर्भर होता है. चीन के कुछ प्राइमरी स्कूलों में क्रिकेट को एक वैकल्पिक खेल के रूप में शामिल किया गया है. इसका क्या फायदा होगा पता नहीं लेकिन चीन की जनसंख्या को देखते हुए कहा जा सकता है कि अगर चीन में क्रिकेट लोकप्रिय हुआ तो चीन के पास लाखों की संख्या में क्रिकेट खिलाड़ी होंगे. चीन में क्रिकेट का भविष्य बहुत हद तक इस बात पर भी निर्भर है कि क्रिकेट को ओलंपिक में शामिल किया जाता है या नहीं. चीन के खेल मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार यदि क्रिकेट को ओलंपिक में शामिल किया जाता है तो मंत्रालय पदक लाने के लिए पूरी ताकत लगा देगा. फिर दूसरे खेलों की तरह क्रिकेट के लिए भी कम उम्र में ही संभावना वावे क्रिकेटर के रूप में लड़के-लड़कियों का चयन किया जाने लगेगा. दुनिया के बेहतरीन कोचों को बुलाया जाने लगेगा. चीन की राष्ट्रीय टीम की वर्ल्ड रैंकिंग रातों-रात बढ़ जाएगी. बहरहाल ओलंपिक में केवल टी-20 क्रिकेट के ही शामिल होने की संभावना है. खेल मंत्रालय के अधिकार से जब हमने पूछा कि क्या उन्होंने कभी टेस्ट क्रिकेट देखा है तो वो बोले नहीं नहीं टेस्ट क्रिकेट देखना तो एक त्रासदी होगी. |
| DATE: 2013-08-06 |
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| [869] TITLE: क्या वर्ल्ड चैंपियनशिप में दिखेगा साइना का दम? |
| CONTENT: भारत की स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल ने इस साल अभी तक कोई खिताब नहीं जीता है. ऐसे में चीन के ग्वांगझू शहर में चल रही विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में उन पर खास तौर से नजरें टिकी हैं. लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली साइना नेहवाल इस साल अपने से नीची रैंकिंग वाली कई खिलाडियों से पराजित हुई है. इसलिए उनकी फिटनेस पर भी सवाल उठते रहे है. कई बैडमिंटन जानकारों का कहना है कि अधूरी फिटनेस के साथ मैदान में उरतने से उन्हें ज़्यादा नुकसान हुआ है. सोमवार से शुरू हुई विश्व चैंपियनशिप में उन्हें मेज़बान चीनी खिलाडियों से तो चुनौती मिलेगी ही साथ ही थाइलैंड जापान और चीनी ताइपे के खिलाडी भी किसी से कम साबित नही होंगे. इस विश्व चैंपियनशिप में मेज़बान चीन की ज़ूईरूईली को महिला वर्ग में शीर्ष वरीयता दी गई है जबकि चीन की ही यिहान वांग को दूसरी वरीयता दी गई है. भारत की साइना नेहवाल को तीसरी वरीयता दी गई है. पहले दौर में साइना नेहवाल को बाई मिली है इसलिए दूसरे दौर में वह मंगलवार को बैडमिंटन कोर्ट पर उतरेंगी. साइना नेहवाल के अलावा महिला एकल वर्ग में भारत की चुनौती पीवी सिंधू पर रहेगी. 10वीं वरीयता के साथ खेल रही सिंधू से भले ही पदक की उम्मीद ना हो लेकिन वह उल्टफेर करने की क्षमता रखती है. महिला युगल वर्ग में अश्विनी पोन्नप्पा और प्रदन्या गडरे तथा अपर्णा बालन और एन सिकीरेड्डी की जोड़ी बैडमिंटन कोर्ट में उतरी लेकिन ये जोड़ियां पहले ही दौर में हार कर बाहर हो गईं. वैसे अश्विनी पोन्नप्पा और ज्वाला गुट्टा ने साल 2011 में महिला युगल में पहली बार भारत को कांस्य पदक दिलाया था लेकिन फिलहाल ज्वाला गुट्टा इस चैंपियनशिप में भाग नही ले रही है. वैसे भी इनकी जोड़ी पिछले दिनों टूट चुकी है. लंदन ओलंपिक में क्वॉर्टर फाइनल तक पहुंचने वाले पी कश्यप पुरूष एकल वर्ग में भारत की उम्मीदों का केंद्र होंगे. उनके खेल में भी पिछले दिनों काफी उतार-चढाव देखने को मिला. इस चैंपियनशिप में उन्हें 13वीं वरीयता दी गई है और पहले दौर में उनका सामना मज़बूत खिलाडी से नहीं है. उनके अलावा अजय जरराम भी पुरूष एकल वर्ग में उतरे जहां उन्होंने पहले दौर की बाधा पार कर ली है. 2010 के राष्ट्रमंडल खेलो में चमकने वाले भारतीय बैडमिंटन खिलाडियों ने 2011 और 2012 में कुछ बडे उल्टफेर किए और साइना नेहवाल और पी कश्यप नें भविष्य की उम्मीदे भी पैदा की लेकिन प्रदर्शन में निरंतरता की कमी और फिटनेस की समस्या ने इन्हे लेकर कई सवाल खडे कर दिए जिनके जवाब अब ख़ुद इनका प्रदर्शन ही विश्व चैंपियनशिप में देगा. |
| DATE: 2013-08-06 |
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| [870] TITLE: 'वरना क्रिकेटरों की इज़्ज़त घट जाएगी' |
| CONTENT: पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान राहुल द्रविड़ ने आईपीएल स्पॉट फ़िक्सिंग विवाद और इसके नतीजों पर गहरी नाराज़गी जताई है. उनका कहना है कि क्रिकेट की साख को फिर से स्थापित करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है वरना प्रशंसकों की नज़र में क्रिकेटरों की इज़्ज़त घट जाएगी. बीसीसीआई पिछले कुछ समय से स्पॉट फ़िक्सिंग और सट्टेबाज़ी के विवाद के कारण विश्वसनीयता का संकट झेल रहा है. ये विवाद छठे आईपीएल के आयोजन के दौरान उपजा था. इस मामले के उजागर होने के बाद बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन को अपने पद से हटना पड़ा था. मामले की जांच के लिए दो सदस्यीय पैनल का गठन भी किया गया था. द्रविड़ ने एक वेबसाइट पर कहा है ऐसी चीज़ों से कोई मदद नहीं मिलती जब हम अख़बारों के पिछले नहीं बल्कि पहले पन्नों पर होते हैं. उन्होने कहा बहुत से ऐसे प्रशंसक हैं और बहुत से लोग इस खेल को लेकर काफ़ी चिंतित हैं और इन्हीं प्रशंसकों की बदौलत हम वो हैं जो हम क्रिकेटरों को होना चाहिए. प्रशासक इन्हीं प्रशंसकों और क्रिकेटरों की वजह से हैं और इसलिए इस खेल या बोर्ड की साख यहां तक कि सरकार की साख बहुत अहम है चाहे आप जो करें. अगर आप सार्वजनिक जीवन में हैं तो यह बहुत ज़रूरी है. बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन पिछले दिनों एक विवाद में फंस गए थे जब उनके दामाद गुरुनाथ मैयप्पन और राजस्थान रॉयल्स टीम के सह मालिक राज कुंद्रा पर सट्टेबाज़ी के आरोप लगे थे. राहुल द्रविड़ के नेतृत्व वाली टीम राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों को स्पॉट फ़िक्सिंग के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. द्रविड़ के मुताबिक़ क्रिकेटरों के लिए सम्मान और प्यार कुछ न कुछ कम ज़रूर हुआ है और मुझे लगता है कि इस देश में क्रिकेट के साथ अगर ऐसा होता है तो यह बहुत ही दुखदायी है. पूर्व क्रिकेटर संजय मांजरेकर का कहना है कि क्रिकेट बोर्ड के प्रशासक ऐसे संकट के वक़्त सही ढंग से नहीं निपटते जबकि वो जानते हैं कि चाहे जो हुआ हो प्रशंसकों ने कभी भी उनसे मुंह नहीं मोड़ा. हालांकि उनका कहना है कि खेल के नए प्रशंसक आज भारतीय क्रिकेट से कुछ ज़्यादा उम्मीद रखते हैं. |
| DATE: 2013-08-06 |
| LABEL: sports |
| [871] TITLE: मुफ़लिसी ने सिखाई हॉकी की जादूगरी |
| CONTENT: जूनियर विश्व कप हॉकी में कॉस्य पदक जीतने के बाद रानी राजपाल बीच में साथियों के साथ झूम उठीं. विश्व कप हॉकी प्रतिस्पर्धा में 38 साल बाद भारत की झोली में कोई मेडल आया है. इस सपने को हकीकत बनाने का काम किया है देश की जूनियर महिला हॉकी टीम ने और इस जीत का सेहरा रानी राजपाल और नवनीत कौर के सिर बंधा है. ये दोनों खिलाड़ी कुरुक्षेत्र ज़िले के एक छोटे से कस्बे शाहापुर मकरंडा की रहने वाली हैं. इनकी मुफलिसी ने इनके भीतर संघर्ष के जिस जज़्बे को भरा उसके आगे टिक पाना किसी भी खिलाड़ी के लिए मुश्किल है. वर्ल्ड कप में तीसरे स्थान के लिए इंग्लैंड के खिलाफ खेले गए में भारत को शुरुआती बढ़त दिलाने के साथ ही दो गोल दागने वाली रानी रामपाल की ज़िंदगी गरीबी और अभाव में बीती है. इसके बावजूद वह अपने संघर्ष के बलबूते आज भारतीय हॉकी की रानी बन चुकी हैं. कुरुक्षेत्र के शाहबाद मरकंडा की रहने वाली रानी के पिता तांगा चलाकर अपने परिवार का गुजर-बसर करते हैं. रानी ने इससे पहले क्वार्टर फाइनल में स्पेन पर जीत दर्ज करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. रानी के खेल की खासियत उनकी तेज दौड़ और उससे कदम-ताल करते हुए प्रतिपक्षी टीम पर हमले बोलने की काबिलियत है. गेंद पर उनका नियंत्रण गजब का है. वह आमतौर पर सेंटर फॉरवर्ड पर खेलती हैं लेकिन टीम की जरूरत के मुताबिक कहीं भी खेल सकती हैं. रानी को रॉजारियो अर्जेंटीना में महिला हॉकी वर्ल्ड कप में सात गोल कर सर्वश्रेष्ठ यंग फॉरवर्ड का अवॉर्ड मिल चुका है. उन्होंने 2009 में एशिया कप के दौरान भारत को रजत पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई. वह 2010 के राष्ट्रमंडल खेल और 2010 के एशियाई खेल के दौरान भारतीय टीम का हिस्सा थीं. इस मैच में निर्णायक गोल करने वाली नवनीत कौर के बारे में उनके प्रशंसक कहते हैं कि मैदान में उनकी फुर्ती देखकर लगता है कि जैसे वो कोई रोबोट हों. जीवन के 16 बसंत देख चुकी नवनीत जब पाँच साल की थी तभी उन्होंने हॉकी को थाम लिया था और उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने हाकी प्रशिक्षण शाहाबाद में हॉकी के जानेमाने कोच बलदेव सिंह से लिया. नवनीत ने जूनियर विश्व कप के लिए जर्मनी जाने से पहले कहा था कि वह सबसे ज्यादा गोल करेंगी. विश्व कप के दौरान शानदार प्रदर्शन और अपने निर्णायक गोल से टीम को जीत दिलाकर उन्होंने अपने वादे को पूरा किया है. नवनीत फारवर्ड हॉकी खिलाड़ी हैं और उनके खेल में हॉकी की कलात्मकता का भरपूर समावेश है. अगर उन्हें मैदान पर डी के पास गेंद मिल जाए तो उसे गोल में तब्दील होने से रोकना विरोधी टीम के लिए काफी मुश्किल है. रानी रामपाल और नवनीत कौर दोनों से भारतीय हॉकी को काफी उम्मीदें हैं. |
| DATE: 2013-08-05 |
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| [872] TITLE: भारत ने महिला जूनियर हॉकी विश्वकप में जीता पहला पदक |
| CONTENT: भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम ने इंग्लैंड को पेनल्टी शूट आउट में 3-2 के हराकर पहली बार विश्वकप में कांस्य पदक जीतने की उपलब्धि हासिल की है. जर्मनी के मोंशेंग्लाबाख़ में रविवार को खेले गए कांस्य पदक मुकाबले में दोनों टीमें निर्धारित समय तक 1-1 से बराबरी पर थी जिसके बाद मैच का फ़ैसला पेनल्टी शूट आउट से हुआ. भारत की तरफ से 18 साल की रानी ने पेनल्टी पर पहला शॉट लिया और इसे गोल में तब्दील कर दिया लेकिन नवनीत कौर अपना शॉट चूक गई. रानी दूसरी पेनल्टी को भी गोल में बदलने में कामयाब रहीं लेकिन दोनों बार इंग्लैंड की एमिली डेफ्रोएंड ने अपनी टीम को बराबरी दिला दी. नवनीत ने फिर भारत को 3-2 से आगे किया और एन्ना टोमैन का शॉट मिस होते ही भारत ने ऐतिहासिक जीत हासिल कर ली. इससे पहले निर्धारित समय में रानी ने 13वें मिनट में शानदार गोल करके भारत को बढ़त दिलाई. भारतीय टीम आधे समय तक अपनी इस बढ़त को बरकरार रखने में सफल रहीं. लेकिन दूसरे हाफ में 55वें मिनट में एन्ना टोमैन ने गोल करके अपनी टीम को बराबरी पर ला दिया. इसके बाद दोनों टीमों ने गोल करने का भरसक प्रयास किया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली और मैच पेनल्टी शूट आउट में खिंच गया. शूट आउट में 14 में से पांच शॉट ही अपना लक्ष्य भेद पाए. शूट आउट में भारत की तरफ से रानी ने दो और नवनीत कौर ने एक गोल किया जबकि इंग्लैंड के दोनों गोल डेफ्रोएंड ने किए. |
| DATE: 2013-08-05 |
| LABEL: sports |
| [873] TITLE: 'सर' जडेजा बुलंदी पर, मिली शीर्ष आईसीसी रैंकिंग |
| CONTENT: भारत के ऑलराउंडर रवींद्र जडेजा आईसीसी एकदिवसीय रैंकिंग में वेस्टइंडीज़ के स्पिनर सुनील नारायण के साथ नम्बर एक पर पहुंच गए हैं. पिछले दिनों भारत ने युवा विराट कोहली की कप्तानी में मेज़बान ज़िम्बाब्वे को एकदिवसीय सिरीज़ में एकतरफा रूप से 5-0 से मात देकर जीत का जश्न मनाने के लिए वतन वापस पहुँचते ही रवींद्र जडेजा के नंबर एक गेंदबाज बनने की खबर आई. आईसीसी की एकदिवसीय रैंकिंग में कोई भारतीय गेंदबाज़ लम्बे समय बाद नम्बर एक पर पहुंचा है. इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जडेजा से पहले साल 1996 में पूर्व कप्तान और फिरकी गेंदबाज अनिल कुम्बले नम्बर एक पर पहुंचे थे. इनके अलावा केवल कपिल देव और फिरकी गेंदबाज़ मनिंदर सिंह ही भारत की ओर से आईसीसी की एकदिवसीय गेंदबाजी रैंकिंग में नम्बर एक पर पहुंचे थे. रवींद्र जडेजा ने हाल ही में समाप्त हुई ज़िम्बाब्वे सिरीज़ में खेले गए पांच मैच में छह विकेट लिए जबकि इस साल उन्होंने 22 एकदिवसीय मैच खेले हैं जिनमें 18-86 की औसत से 38 विकेट अपने नाम किए. रवींद्र जडेजा के नम्बर एक बनने पर पूर्व तेज़ गेंदबाज़ अतुल वासन कहते हैं किसी भी खिलाड़ी के लिए यह एक बेहद सम्मान की बात है. रवींद्र जडेजा ने एक ऑलराउंडर के तौर पर हर अवसर का पूरा लाभ उठाया और भारतीय क्रिकेट टीम की जीत में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई. जडेजा के क्रिकेट जीवन के टर्निग प्वॉयंट की बात पर अतुल वासन कहते हैं जब आईपीएल के अजीबोगरीब नियमों के कारण उन्हें एक साल नहीं खिलाया गया और उन्होंने सबसे मँहगे खिलाड़ी के तौर पर चेन्नई सुपर किंग्स में वापसी की. वास्तव में आईपीएल से बाहर होना उनके लिए एक बहुत बडा झटका था. इसके बाद जिस तरह से उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ टेस्ट सिरीज़ में एक गेंदबाज़ की भूमिका निभाई उससे उनकी जगह भारतीय टीम में पक्की हो गई. रवींद्र जडेजा अभी तक अपने एकदिवसीय करियर में 80 मैच खेलकर 95 विकेट ले चुके हैं. हालांकि शुरुआत में लगता नही था कि वे इतने कामयाब होंगे. वैसे रवींद्र जडेजा अपना पहला एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच याद करना नही चाहेंगे जब साल 2008-09 में उन्हें कोलम्बो में श्रीलंका के खिलाफ एकदिवसीय सिरीज़ का पाँचवाँ और आखिरी मैच खेलने का मौक़ा मिला था. इस मैच में उन्होंने छह ओवर में 40 रन दिए थे लेकिन कोई विकेट नही ले पाए लेकिन उन्होंने नाबाद 60 रन बनाकर एक अच्छे बल्लेबाज़ के लक्षण दिखा दिए थे. इसका सबूत उन्होंने अपने एकदिवसीय करीयर में 1242 रन बनाकर दे भी दिया है. क्रिकेट प्रेमी इस बात पर नज़र रखेंगे कि रवींद्र जडेजा जब एकदिवसीय रैंकिंग में नम्बर एक पर पहुँचे हैं तो वहाँ कितने दिनों तक ठहर पाते हैं. |
| DATE: 2013-08-05 |
| LABEL: sports |
| [874] TITLE: विराट ने सफल कप्तानी का श्रेय धोनी को दिया |
| CONTENT: एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रकेट में पहली बार विदेशी ज़मीन पर भारत को 5 -0 से जीत दिलाने वाले कप्तान विराट कोहली ने अपनी सफल कप्तानी का श्रेय भारतीय टीम के नियमित कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को दिया है. ज़िम्बाब्वे दौरे पर शनिवार को बुलावायो के क्वीन्स स्पोर्ट्स क्लब के मैदान पर भारत ने मेज़बान टीम पर यह निर्णायक जीत दर्ज की. विराट कोहली ने कहा मैं सफल कप्तानी के गुर स्वयं धोनी से सीख रहा हूँ. धोनी की अनुपस्थिति में भारत की कप्तानी करने वाले कोहली ने कहा यह बहुत प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की टीम है. बतौर कप्तान इन्हें प्रोत्साहित करना मुश्किल नहीं है. उन्होंने कहा यह सिरीज़ बहुत अच्छी रही है इस टीम का हिस्सा बनकर और फिर इसकी कप्तानी करके मुझे बहुत अच्छा लग रहा है. भारत ने बुलावायो में आख़िरी एकदिवसीय अंतराष्ट्रीय क्रिकेट मैच सात विकेट से जीता. रहाणे ने अर्धशतक लगाया तो जडेजा 48 पर नाबाद रहे. भारत ने टॉस जीत कर पहले क्षेत्ररक्षण का फैसला किया. भारतीय गेंदबाज़ों ने ज़िम्बाब्वे की टीम को 39-5 ओवरों में 163 रन पर समेट दिया. लेग स्पिनर अमित मिश्रा ने अपना शानदार प्रदर्शन जारी रखते हुए छह विकेट चटखाए और वे मैन ऑफ द मैच बने. हारने के बाद कप्तान ब्रैंडन ने भारतीय टीम को बहुत अच्छी टीम बताया. ज़िम्बाब्वे की शुरुआत ख़राब रही. सलामी बल्लेबाज़ सिबंदा केवल 5 रन बनाकर ही आउट हो गए. वहीं कप्तान ब्रैंडन टेलर मोहित शर्मा की गेंद पर सुरेश रैना के हाथों कैचआउट हुए. वो 11 गेंद खेल कर एक भी रन नहीं बना सके. शॉन विलियम्स ने 51 रन बनाकर ज़िम्बाब्वे की पारी को संभालने की कोशिश की लेकिन वे अमित मिश्रा की गेंद पर मोहित शर्मा के हाथों कैच आउट हो गए. इसके बाद ज़िम्बाब्वे की पारी लड़खड़ा गई. मेल्कॉम वॉल्टर आठ चिगुंबरा 17 और ब्रायन विटोरी चार रन बना कर आउट हो गए. इस आखिरी मैच में बल्लेबाज़ी करते हुए भारत को भी शुरूआती झटका लगा. सलामी बल्लेबाज़ चेतेश्वेर पुजारा बिना कोई रन बनाए पवेलियन लौट गए. इसके बाद शिखर धवन ने 41 और अजिंक्य रहाणे ने अर्धशतक बनाकर भारत को मज़बूत स्तिथि में ला खड़ा किया. रविन्द्र जडेजा और दिनेश कार्तिक नाबाद रहे. बाएं हाथ के बल्लेबाज़ जडेजा ने 48 रन बनाए. उन्होंने मेल्कॉम के गेंद पर छक्का लगाकर उन्होंने पारी की समाप्ति की. भारत ने ज़िम्बाब्वे का दिया लक्ष्य महज़ 34 ओवर में सात विकेट पर ही हासिल कर लिया. भारत इस श्रृंखला के शुरूआती चारों मैच पहले ही जीत चुका था. विराट कोहली की कप्तानी में भारत ने ज़िम्बाब्वे को पूरी तरह से क्लीन स्वीप कर दिया है. जीत के बाद कप्तान विराट कोहली ने कहा सच बताऊँ तो ज़िम्बाब्वे के साथ पहले दो मैच तो कठिन रहे थे लेकिन बाकी तीन आसान रहे. |
| DATE: 2013-08-04 |
| LABEL: sports |
| [875] TITLE: रसूल को टीम में न खिलाने पर उमर अब्दुल्लाह नाराज़ |
| CONTENT: जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने भारतीय क्रिकेट टीम के लिए चुने जाने वाले कश्मीर के युवा खिलाड़ी परवेज़ रसूल को ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ होने वाली पांच वनडे की श्रृंखला के एक भी मैच में मौक़ा नहीं दिए जाने पर कड़ी नाराज़गी का इज़हार किया है. उमर ने अपने ट्विटर एकाउंट पर लिखा ज़िम्बाब्बे में परवेज़ रसूल को मौका न देने से मैं निराश हूँ. इस युवक को ख़ुद को साबित करने का एक मौका तो दो. उसका हौसला इस तरह पस्त करने के लिए इतनी दूर ज़िम्बाब्बे ले जाने की क्या ज़रूरत थी. घर में ऐसा करना सस्ता नहीं रहता केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने भी रसूल को न लिए जाने पर हताशा जताई है. उन्होंने ट्विटर पर कहा है कि परवेज़ के न खेलने से वे निराश हुए हैं और आसानी से जडेजा की जगह रसूल को लिया जा सकता था. रसूल के अलावा मुंबई के अजिंक्या रहाणे को भी इस सिरीज़ में खेलने का मौका नहीं मिला था लेकिन अंतिम मैच में आख़िरकर उन्हें शामिल कर लिया गया. सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर काफ़ी हलचल है. हालांकि कई लोग ट्विटर पर लिख रहे हैं कि ये टीम प्रबंधन पर छोड़ दिया जाना चाहिए. वरिष्ठ पत्रकार अयाज़ मेमन ने ट्विट किया है- मैं भी चाहता था कि आज रसूल खेले. रसूल को न लेने का फैसला बहुत कड़ा प्रतीत होता है. लेकिन टीम चयन का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए. ये प्रबंधन का फैसला होना चाहिए. ग़ौरतलब है कि चौबीस साल के परवेज़ रसूल को ज़िम्बाब्वे दौरे के लिए भारतीय टीम में शामिल किया गया था. इस चयन के बाद वे भारतीय टीम में जगह बनाने वाले घाटी के पहले क्रिकेटर बन गए थे और उसके बाद घाटी में काफ़ी खुशियां मनाईं गईं थी. भारत ने ज़िम्मबाब्वे से लगातार चार मैच जीतकर श्रृंखला पर क़ब्ज़ा कर चुकी है इसलिए बहुत से समीक्षक उम्मीद लगाए हुए थे कि नए खिलाड़ी परवेज़ को कम से कम आख़िरी मैच में ज़रूर मौक़ा मिलेगा. ये वही परवेज़ रसूल हैं जिनसे चार साल पहले बैंगलोर के चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर सिलसिलेवार बम विस्फ़ोटों के मामले में पूछताछ की गई थी हालांकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया था. अपने चयन के बाद परवेज़ ने कहा था कि वह यह साबित करना चाहते हैं कि वह एकक्रिकेटर हैं आतंकवादी नहीं. उनके प्रशंसकों का कहना है कि परवेज़ के चुने जाने से घाटी के युवाओं में संदेश जाएगा कि वह भी अपने देश का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं. उस समय पीटीआई से बातचीत के दौरान परवेज़ रसूल ने कहा था मैं बहुत ख़ुश हूं कि मेरा नाम भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल कर लिया गया है. इस सीज़न में मैंने बहुत मेहनत की है. घरेलू क्रिकेट में मैंने 33 विकेट लिए हैं और 594 रन बनाए हैं. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ भी मैंने अच्छा खेला था. इसलिए मुझे ज़िंबाब्वे दौरे के लिए चुने जाने की उम्मीद थी. फ़रवरी में 45 रन देकर ऑस्ट्रेलिया के सात विकेट लेने वाले परवेज़ का कहना था मेरा काम क्रिकेट खेलना और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना है. अल्लाह ने पूरी घाटी को प्यार और इज्ज़त बख़्शी है. घाटी के क्रिकेट प्रशंसको के विश्वास को तो मैंने क़ायम रखा है. अब मुझे उम्मीद है कि पूरे देश की उम्मीदों को भी क़ायम रख पाऊंगा. परवेज़ ने अब तक 17 प्रथम श्रेणी क्रिकेट मैचों में 38-57 के औसत से 1003 रन बनाए हैं और 46 विकेट लिए हैं. परवेज़ घाटी के पहले क्रिकेटर थे जिन्हें आईपीएल में खेलने का मौक़ा मिला था. आईपीएल छह में उन्हें पुणे वारियर्स टीम में शामिल किया गया था. |
| DATE: 2013-08-03 |
| LABEL: sports |
| [876] TITLE: ज़िम्बाब्वे बनाम भारत: अब सवाल क्लीन स्वीप का? |
| CONTENT: बुलावायो में भारत और मेज़बान ज़िम्बाब्वे के बीच शनिवार को पांचवां और आखिरी एकदिवसीय अंतराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेला जाएगा. भारत पहले ही इस मौजूदा श्रृंखला के शुरूआती चारो मैच पहले ही जीत चुका है और भारत के कप्तान विराट कोहली की तमन्ना पांचवा मैच भी भारत के नाम करके ज़िम्बाब्वे को पूरी तरह से क्लीन स्वीप करने की होगी. अब तक खेले गए चारों मैचों में भारत के लेग स्पिनर अमित मिश्रा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 12 विकेट हासिल किए है. अगर यह कहा जाए कि इस दौरे का सबसे ज़्यादा फ़ायदा अमित मिश्रा ने उठाया है तो ग़लत नहीं होगा. अमित मिश्रा के अलावा मोहित शर्मा को भी पिछले मैच में खेलने का मौक़ा मिला और उन्होंने पूरे 10 ओवर करते हुए केवल 26 रन देकर 2 विकेट लिए. बल्लेबाज़ी में इन दिनों सलामी बल्लेबाज़ के नए अवतार में मैदान में उतरने वाले रोहित शर्मा ने चौथे मैच में नाबाद 64 रन बनाकर पिछले 3 मैचो की नाकामी को धो डाला. उनके बल्ले से पहले मैच में 20 दूसरे में 1 और तीसरे मैच में केवल 14 रन ही निकले थे. रोहित शर्मा के अलावा सुरेश रैना ने भी ज़िम्बाब्वे की कमज़ोर गेंदबाज़ी का पूरा लाभ उठाते हुए नाबाद 65 रन बनाए. इससे पहले उनका बल्ला भी थोड़ा खामोश था. भारत के इस दौरे से पहले क्रिकेट प्रेमियो को ज़िम्बाब्वे में एक बेहतरीन सीरीज़ देखने की उम्मीद थी क्योंकि अपनी ही धरती पर ज़िम्बाब्वे ने हमेशा ही शानदार प्रदर्शन किया है. लेकिन इस बार ज़िम्बाब्वे टीम भारत के सामने कही भी टिक नहीं सकी. ज़िम्बाब्वे की टीम न तो किसी मैच में अच्छी बल्लेबाज़ी कर सकी और न ही उसके गेंदबाज़ भारतीय बल्लेबाज़ो को किसी भी मैच में कोई विशेष चुनौती पेश कर सके. पिछले मैच में तो ज़िम्बाब्वे की टीम केवल 144 रन पर ही ढेर हो गई. इस सीरीज़ से पहले महेंद्र सिंह धोनी ईशांत शर्मा उमेश यादव भुवनेश्वर कुमार और आर अश्विन को चयनकर्ताओं ने आराम देने का फैसला किया था. उस समय एक बार तो ऐसा लगा कि कहीं यह निर्णय ग़लत साबित न हो जाए. ख़ुद ज़िम्बाब्वे ने अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में ज़्यादा म़ौके मिलने के सुनहरे अवसर को खो दिया. अब पांचवें और आखिरी मैच में बस इतनी दिलचस्पी बची है कि क्या अजिंक्य रहाणे और परवेज़ रसूल को भी खेलने का अवसर मिलता है या नहीं क्योंकि बाकी सभी खिलाड़ियों को अपने हाथ दिखाने का म़ौका मिल चुका है. अब एक बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता कि महेंद्र सिंह धोनी के बाद भारत के विराट कोहली के रूप में एक ऐसा कप्तान मिला है जो अपने कंधों पर टीम का भार उठा सकता है. इसके अलावा इस श्रृंखला से यह भी पता चल गया कि भारत के पास दूसरी पंक्ति की तेज़ लाइन अप नहीं है और मज़बूत टीमों के ख़िलाफ भारत को ईशांत शर्मा भुवनेश्वर कुमार और उमेश यादव की ज़रूरत ज़रूर पडेगी. |
| DATE: 2013-08-03 |
| LABEL: sports |
| [877] TITLE: फिक्सिंगः अब सुप्रीम कोर्ट जाएगी बीसीसीआई |
| CONTENT: बीसीसीआई आईपीएल फिक्सिंग स्कैंडल की जाँच करने वाले पैनल पर बांबे हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी. सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक जगमोहन डालमिया ही अध्यक्ष का कामकाज संभालते रहेंगे. शुक्रवार को दिल्ली में हुई आईपीएल गवर्निंग काउंसिल की बैठक में ये फैसले लिए गए. गौरतलब है कि न बांबे हाई कोर्ट ने आईपीएल में कथित सट्टेबाज़ी की जांच के लिए गठित बीसीसीआई के पैनल को असंवैधानिक बताते हुए नया पैनल बनाने को कहा था. बैठक में बोंबे हाईकोर्ट के आदेश के बाद उपजे सवालों पर भी चर्चा की गई. बांबे हाईकोर्ट ने बीसीसीआई द्वारा इंडिया सीमेंट्स लिमिटेड जयपुर आईपीएल क्रिकेट प्राइवेट लिमिटेड गुरुनाथ मेयप्पन और राज कुंद्रा के ख़िलाफ़ की गई शिकायतों की जाँच करने के लिए बनाए गई जाँच पैनल को अवैध करार दिया था. बीसीसीआई की ओर से जारी की गई एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि गवर्निंग काउंसिल मानती है कि जाँच पैनल का गठन आईपीएल के नियमों के अनुरूप ही किया था और हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी. इस फैसले के बाद एन श्रीनिवासन भी गवर्निंग काउंसिल की बैठक में शामिल हुए और सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक जगमोहन डालमिया के ही बीसीसीआई अध्यक्ष का कामकाम संभालने के लिए कहा. इससे पहले कयास लगाए जा रहे थे कि एन श्रीनिवासन जाँच पैनल से क्लीन चिट मिलने के बाद दोबारा अध्यक्ष पद का कामकाज अपने हाथ में ले लेंगे. कुंद्रा और मेयप्पन के ख़िलाफ़ पुलिस जाँच अभी पूरी नहीं हुई है लेकिन बीसीसीआई के पैनल ने इन दोनों को क्लीन चिट दे दी. बीसीसीआई के जाँच दल में पूर्व न्यायाधीश टी जयराम चोउटा और आर बालासुब्रमण्यम शामिल थे. इस पैनल ने 27 जुलाई को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. मेयप्पन का नाम आने के बाद श्रीनिवासन ने जाँच पूरी होने तक खुद को बोर्ड अध्यक्ष के नियमित कामकाज से अलग कर लिया था और जगमोहन डालमिया को अंतरिम अध्यक्ष बनाया था. |
| DATE: 2013-08-02 |
| LABEL: sports |
| [878] TITLE: ऐशेज़ की टक्कर में ऑस्ट्रेलियाई पीएम भी कूदे |
| CONTENT: ऐशेज़ सिरीज़ में ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड की प्रतिद्वंद्विता जग ज़ाहिर है. इस बार ऑस्ट्रेलिया की टीम भारी दबाव में है और सिरीज़ के दो टेस्ट मैच हार चुकी है. इस सिरीज़ में एक ओर जहाँ ऑस्ट्रेलिया के ख़राब प्रदर्शन की चर्चा हो रही है वहीं अंपायरिंग को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं. साथ ही अंपायरों के फ़ैसलों की समीक्षा यानी डीआरएस को लेकर भी विवाद रहा है. मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफ़र्ड मैदान में चल रहे तीसरे टेस्ट के पहले दिन ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ उस्मान ख़्वाजा को आउट दिए जाने को लेकर भी काफ़ी विवाद हुआ. ख़्वाजा के आउट दिए जाने की आलोचना करने वालों में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री केविन रड भी शामिल हो गए. उन्होंने ट्वीट किया मैंने अभी तक जो देखा है उसमें ये सबसे बुरे अंपायरिंग फ़ैसलों में से एक था. पूर्व क्रिकेटर शेन वॉर्न ने भी इस फ़ैसले पर आश्चर्य व्यक्त किया और लिखा कि ये चकित करने वाला फ़ैसला है. तीसरे टेस्ट के पहले दिन लंच से ठीक पहले मैदान पर मौजूद अंपायर टोनी हिल ने ख़्वाजा को विकेटकीपर के हाथों कैच आउट करार दिया. ख़्वाजा इस फ़ैसले से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने डीआरएस के तहत अंपायर के फ़ैसले की समीक्षा की मांग की. हॉट स्पॉट तकनीक से ऐसा लगा कि ख़्वाजा आउट नहीं थे लेकिन तीसरे अंपायर धर्मसेना ने ख़्वाजा को आउट करार दिया. पूर्व इंग्लिश क्रिकेटर ज्योफ़ बॉयकॉट ने भी इस फ़ैसले की आलोचना की है. बीबीसी के टेस्ट मैच स्पेशल में उन्होंने कहा कि इन अंपायरों को ये सिखाना चाहिए कि आप टेलीविज़न का अपने फ़ायदे के लिए कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि ये तकनीक का दोष नहीं है. |
| DATE: 2013-08-02 |
| LABEL: sports |
| [879] TITLE: जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप में भारतीय लड़कियों का कमाल |
| CONTENT: भारत ने जूनियर महिला विश्व कप हॉकी चैम्पियनशिप के सेमी फ़ाइनल में जगह बना ली है. ऐसा पहली बार हुआ कि इस प्रतियोगिता के सेमी फ़ाइनल में भारतीय लड़कियों ने जगह बनाई है. जर्मनी में खेली जा रही इस प्रतियोगिता के क्वार्टर फ़ाइनल में भारत ने स्पेन को 4-2 से मात दी. हाफ़ टाइम तक दोनों टीमें 2-2 से बराबर थी. भारतीय टीम के कोच नील हॉगुड ने लड़कियों के खेल की जम कर तारीफ़ की और कहा कि उन्होंने मैच के दौरान अपना दमख़म दिखा दिया है. स्पेन ने पहले हाफ़ के सातवें मिनट में ही गोल करके भारत पर बढ़त हासिल कर ली थी. लेकिन 10वें मिनट में भारत ने मोनिका के गोल की मदद से स्कोर बराबर कर दिया. मैच के 30वें मिनट में स्पेन ने गोल करके स्कोर 2-1 कर दिया. लेकिन हाफ़ टाइम के ठीक पहले नवनीत कौर ने गोल करके एक बार फिर स्कोर बराबर कर दिया. दूसरे हाफ़ में भारतीय लड़कियों ने बेहतर प्रदर्शन किया. 41वें मिनट में पेनल्टी कॉर्नर पर वंदना कटारिया ने गोल करके भारत को 3-2 से बढ़त दिला दी. सात मिनट बाद रानी ने गोल करके स्कोर 4-2 कर दिया. बाद में भारत ने अच्छा रक्षात्मक खेल भी दिखाया और स्पेन को गोल नहीं करने दिया. रानी ने कहा कि ये भारतीय हॉकी के लिए बड़ा दिन है. दूसरी ओर भारतीय टीम की कप्तान और गोलकीपर सुशीला चानू पुखरंबम ने कहा कि अब लड़कियाँ फ़ाइनल में जगह बनाना चाहती हैं. |
| DATE: 2013-08-02 |
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| [880] TITLE: भारत ने चौथा मैच भी जीता |
| CONTENT: भारत ने चौथे वनडे में ज़िम्बाब्वे को नौ विकेट से हरा दिया है. इस जीत के साथ भारत सिरीज़ में 4-0 से आगे हो गया है. भारत ने 19-1 ओवर बाकी रहते हुए शानदार जीत हासिल की. अपना पहला मैच खेल रहे मोहित शर्मा मैन ऑफ द मैच बने हैं. मोहित शर्मा ने 26 रन देकर दो विकेट लिए. भारत के लिए सुरेश रैना ने सबसे ज़्यादा नाबाद 65 रन बनाए जबकि रोहित शर्मा ने नाबाद 64 रन बनाए. चेतेश्वर पुजारा सिर्फ 13 रन बनाकर बोल्ड हो गए. ज़िम्बाब्वे ने भारत के सामने 145 रन का लक्ष्य रखा था जो भारत ने सिर्फ 30-1 ओवर में हासिल कर लिया. इससे पहले ज़िम्बाब्वे की शुरुआत बेहद ख़राब रही. ज़िम्बाब्वे ने सिर्फ़ 47 रन पर पांच विकेट खो दिए थे. लेकिन वॉलर और चिगुम्बुरा ने छठे विकेट के लिए 80 रन की साझेदारी की. जब ज़िम्बाब्वे का स्कोर 127 था तभी वॉलर आउट हो गए और फिर ज़िम्बाब्वे ने बाकी बचे सभी विकेट सिर्फ 17 रन में गंवा दिए. चिगुम्बुरा 50 रन बनाकर नाबाद रहे. भारत की ओर से अमित मिश्रा ने 25 रन देकर 3 विकेट और मोहित शर्मा ने 26 रन देकर 2 विकेट लिए. भारत की शुरुआत अच्छी नहीं रही और अपना पहला मैच खेल रहे चेतेश्वर पुजारा सिर्फ़ 13 रन बनाकर आउट हो गए लेकिन रैना और रोहित शर्मा ने ज़िम्बाब्वे के गेंदबाज़ों को कोई मौका नहीं दिया. सिरीज़ का आखिरी मैच 3 अगस्त को बुलावायो में खेला जाएगा. |
| DATE: 2013-08-01 |
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| [881] TITLE: मिल्खा के अलावा और भी हैं स्टार एथलीट |
| CONTENT: मिल्खा सिंह की ज़िंदगी पर बनी फ़िल्म भाग मिल्खा भाग बाकी फ़िल्मों की ही तरह किसी को बहुत अच्छी लगी तो किसी को ठीक ठाक. लेकिन इस बात से कोई नहीं इनकार कर सकता कि इस फ़िल्म ने उस खेल को आम जनता तक पहुंचा दिया जिसने भारत को मिल्खा के अलावा और कई स्टार दिए लेकिन वे लोगों के दिलों तक नहीं पहुंच सके. आइए हम नज़र डालते हैं ऐसे ही कुछ खिलाड़ियों और उनके योगदान पर. बहुत लोगों को यह पता ही नहीं कि गुरबचन सिंह रंधावा ने भी रोम ओलंपिक में हिस्सा लिया था. उन्होंने रफेर जॉनसन और सी के यंग जैसे दिग्गज एथलीटों के साथ डेकेथलन मे भाग लिया था. वह बहुत प्रतिभावान थे और एक साथ जैवलिन हाइ जंप लॉन्ग जंप और हर्डल्स के राष्ट्रीय चैंपियन थे. जब 1964 के खेलों में उन्होंने 110 मीटर हर्डल में पाँचवाँ स्थान हासिल किया तो दुनिया के बड़े-बड़े कोचों ने उनके प्रदर्शन को सराहा था. सीआरपीएफ से डीआईजी के ओहदे से रिटायर होकर आजकल वह कोचिंग कर रहे हैं. टोकियो में दो बार उन्होंने 14 सेकेंड का समय निकाला था जो आज भी भारतीय एथलीटों के लिए चुनौती है. मिल्खा और रंधावा 60 के दशक के हीरो थे तो 70 का दशक श्रीराम सिंह के नाम था. श्रीराम 1970 के बैंकाक एशियाई खेलों में 800 मीटर का रजत पदक और 1974 में तेहरान में स्वर्ण लेकर वह 1976 के मॉन्ट्रियल ओलंपिक के लिए तैयार थे. मॉन्ट्रियाल से पहले उन्होंने कभी टार्टेन ट्रैक पर पाँव भी नहीं रखा था लेकिन वह फाइनल में पहुँचे और 145. 77 का समय निकाल कर सातवें स्थान पर रहे. उसी रेस में नया विश्व रिकॉर्ड बना जिसका श्रेय रेस जीतने वेल आलबर्टू जुआंटोरना ने श्रीराम सिंह को दिया. आज भी क्यूबा के जुआंटोरना श्रीराम को याद करते हैं. मज़े की बात यह है कि 14577 के समय से श्रीराम आज भी वर्ष 2013 की रैंकिंग में दुनिया में 57 नंबर पर हैं. यह बड़ी बात है. उनका यह एशियाई रिकॉर्ड 32 साल तक कायम रहा और भारत का राष्ट्रीय रिकॉर्ड तो अब भी है. ऐसे मे श्रीराम सिंह क्या किसी अन्य भारतीय एथलीट से कम हैं सेना से रिटायरमेंट लेकर श्रीराम एनआइएस बने और वहां से भी रिटायर होकर अब जयपुर में रहते हैं. मॉस्को ओलंपिक में 800 मीटर का गोल्ड जीतने वेल स्टीव ओवेट के कोच हैरी विल्सन का मानना था कि अगर श्रीराम मॉन्ट्रियल से कुछ महीने पहले इंग्लैंड में उनके पास या भारत के बाहर कहीं और ट्रेनिंग कर लेते तो मॉन्ट्रियल में गोल्ड भी जीत सकते थे. श्रीराम की ही तरह सेना के एक और एथलीट थे शिवनाथ सिंह. उन्होंने मॉन्ट्रियल खेलों मे हिस्सा लिया. शिवनाथ सिंह मॉन्ट्रियल में मैराथन में 2 घंटे 16 मिनट और 22 सेकंड का समय निकालकर 11वें स्थान पर रहे. रेस में 60 एथलीटों ने हिस्सा लिया था और शिवनाथ ने न्यूज़ीलैंड के जाने-माने धावक जेक फॉस्टर को भी पछाड़ दिया था. श्रीराम की तरह मॉन्ट्रियल जाने से एक हफ़्ते पहले शिवनाथ भी दिल्ली में भागने के लिए ठीक जगह ढूंढ रहे थे जबकि दुनिया के बाकी खिलाड़ी एक महीने पहले मॉन्ट्रियल के मैराथन रूट का जायज़ा ले रहे थे. ऐसे में शिवनाथ का प्रदर्शन हर हाल में विश्वस्तरीय था. लेकिन जब दुनिया के बाकी एथलीट यूरोप और अमरीका में प्रतियोगिताओं में भाग लेने की तैयारी कर रहे थे श्रीराम सिंह जुलाई की भरी बारिश के बीच दिल्ली के नेशनल स्टेडियम के बाहर पानी से भरे घास के मैदान पर प्रैक्टिस कर रहे थे. सेना छोड़कर वह टिस्को में शामिल हो गए थे लेकिन कुछ साल पहले उनकी मृत्यु हो गई. भारतीय एथलेटिक्स के लिए 80 का दशक अहम रहा. दिल्ली में 1982 में आयोजित एशियाई खेल में एम डी वालसम्मा ने महिलाओं की 400 मीटर बाधा दौड़ का स्वर्ण पदक जीता. वालसम्मा कमलजीत संधु के बाद एशियाई खेलों में गोल्ड जीतने वाली दूसरी भारतीय महिला थीं. ख़ास बात यह है कि वालसम्मा को देख कर ही पी टी उषा ने हर्डल्स में हिस्सा लेने का मन बनाया. वालसम्मा ने लॉस एंजेलेस ओलंपिक में भारत की 4x400 रिले को सातवाँ स्थान दिलवाने में अहम् भूमिका निभाई. अर्जुन अवॉर्ड और पद्मश्री से नवाज़े जाने के बाद वालसम्मा रेलवे में सीनियर कॉंमर्शियल ऑफ़िसर के रूप में काम कर रही हैं. हालांकि उनके बाद पी टी उषा ने काफी नाम कमाया लेकिन सही मायनों में भारतीय महिला एथलीटों की प्रेरणा वालसम्मा ही थीं. पी टी उषा और शाइनी का नाम 80 के दशक में साथ लिया जाता था. दोनों केरल की थीं और दोनों का ही एशिया में दबदबा था. लेकिन शाइनी की बदकिस्मती ही कही जा सकती थीं कि उन्हें लंबे समय तक कोई ठीक कोच ही नहीं मिला. 1984 में 800 मीटर की रेस के सेमी फाइनल में पहुंचना किसी भारतीय खिलाड़ी के लिए बड़ी बात थी. वह रिले टीम का भी हमेशा हिस्सा रहीं लेकिन उषा के साथ होने से ज़्यादा नाम उषा का ही हुआ. शाइनी ने 1995 में 15985 का समय निकाला था. अपने उस प्रदर्शन से वह उस साल की विश्व रैंकिंग में 21 स्थान पर थीं. ऐसे में शाइनी को विश्वस्तरीय खिलाड़ी कहना और भारत के महान एथलीटों मे गिनना गलत नहीं होगा. शाइनी आजकल फूड कॉर्पोरेशन में जनरल मैनेजर के पद पर हैं. ठंडे दिमाग से सोचा जाए तो अंजू बॉबी जॉर्ज का प्रदर्शन किसी भी भारतीय एथलीट से थोड़ा ज़्यादा ही होगा. पेरिस विश्व चैंपियनशिप में काँस्य पदक वर्ल्ड फाइनल में रजत पदक कॉमनवेल्थ खेलों मे काँस्य पदक दोहा एशियाई खेलों में स्वर्ण और एथेंस ओलंपिक में छठा स्थान. ये सब ऐसे खिताब हैं जिन्हें अंजू के अलावा किसी भारतीय एथलीट ने नहीं जीता है लेकिन एथलेटिक्स में विडंबना यह है कि ट्रैक के इवेंट को ज़्यादा भाव दिया जाता है क्योंकि वह लोगों को दिखता है. लॉन्ग जंप में जब तक बोर्ड पर अंतिम परिणाम न दिखे लोगों को मज़ा नहीं आता. वरना अंजू- मिल्खा रंधावा या उषा से किसी भी बात मे कम नहीं हैं. माँ बनने के बाद अंजू ने हाल ही में एथलेटिक्स छोड़ा है और बैंगलूर में कस्टम ऑफिसर हैं. इन सितारों के साथ-साथ भारतीय महिला रिले टीम भी किसी से कम नहीं है. रिले टीम का सिलसिला शुरू हुआ था लॉस एंजेलेस ओलंपिक खेलों से जहाँ वंदना राव शाइनी विलसन वालसम्मा और पी टी उषा ने फाइनल मे पहुँचकर सबको चौंका दिया था. हालाँकि फाइनल में टीम आठवें स्थान पर रही लेकिन 33249 का समय एशियाई रिकॉर्ड था. उसके बाद इसी टीम ने सोल एशियाई गेम में स्वर्ण पदक जीता. एशियाई स्तर पर तो भारतीय टीम ने हमेशा अच्छा प्रदर्शन किया है और विश्व रैंकिंग में रही है. और अब बात एथलेटिक्स के उस सितारे की जिसने मिल्खा सिंह से बहुत पहले बॉलीवुड और टीवी की दुनिया में कदम रखा. प्रवीण कुमार की शिकायत यह है कि उन्हें लोग एथलेटिक्स के लिए नहीं बल्कि महाभारत धारावाहिक में भीम के उनके किरदार के लिए जानते हैं. प्रवीण कुमार डिस्कस थ्रो में कई साल नेशनल चैंपियन रहे एशियाई चैंपियन रहे और मैक्सिको ओलंपिक भी गए लेकिन उनका कहना है कि उन्हें भीम के नाम से ज़्यादा लोग जानते हैं. वैसे भी खेल अधिकारियों से वो इतना तंग आए कि मैक्सिको से लौटते ही उन्होंने अपना ओलंपिक का ब्लेज़र सूटकेस में रख दिया और आज तक दोबारा नहीं पहना. ऐसे में अगर लोग भारतीय एथलीटों को भूल जाएं तो अफसोस की बात तो है ही. |
| DATE: 2013-07-31 |
| LABEL: sports |
| [882] TITLE: अदालत ने ख़ारिज की बीसीसीआई की जांच |
| CONTENT: बंबई उच्च न्यायालय ने आईपीएल में कथित सट्टेबाज़ी की जांच के लिए गठित बीसीसीआई के पैनल को असंवैधानिक बताते हुए नया पैनल बनाने को कहा है. ग़ौरतलब है कि बीसीसीआई के पैनल ने राज कुंद्रा और गुरुनाथ मेयप्पन को कथित रूप से क्लीन चिट दी थी. बंबई उच्च न्यायालय ने बिहार एवं झारखंड क्रिकेट संघों की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये आदेश दिया है. न्यायालय ने बीसीसीआई के पैनल को अवैध और असंवैधानिक क़रार देते हुए पूछा कि बोर्ड ख़ुद कैसे इस मामले की जांच कर सकता है अदालत के इस फ़ैसले से बीसीसीआई को एक बड़ा झटका लगा है. रिपोर्टों के मुताबिक़ बीसीसीआई अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है. यहां पर ये भी बताना ज़रूरी है कि मैच फ़िक्सिंग के मामले में दिल्ली पुलिस मंगलवार को ही अदालत में चार्जशीट दायर करने वाली है. आईपीएल के छठे संस्करण में बीसीसीआई के अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन के दामाद और चेन्नई सुपरकिंग्स के शीर्ष अधिकारी मेयप्पन और राजस्थान रॉयल्स के सह मालिक कुंद्रा पर सट्टेबाज़ी के आरोप लगे थे. कुंद्रा और मेयप्पन के ख़िलाफ़ पुलिस जांच अभी पूरी नहीं हुई है लेकिन बीसीसीआई के पैनल ने इन दोनों को क्लीन चिट दे दी है. बीसीसीआई के जांच दल में पूर्व न्यायाधीश टी जयराम चोउटा और आर बालासुब्रमण्यम शामिल थे. इस पैनल ने 27 जुलाई को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. मेयप्पन का नाम आने के बाद श्रीनिवासन ने जांच पूरी होने तक खुद को बोर्ड अध्यक्ष के नियमित कामकाज से अलग कर लिया था और जगमोहन डालमिया को अंतरिम अध्यक्ष बनाया जा रहा था. जांच दल में तीन सदस्य थे लेकिन बीसीसीआई के सचिव संजय जगदाले ने खुद को इससे अलग कर लिया था. |
| DATE: 2013-07-30 |
| LABEL: sports |
| [883] TITLE: विश्व कप में भारत का पहला मुक़ाबला पाकिस्तान से |
| CONTENT: साल 2015 में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की संयुक्त मेजबानी में होने वाले आईसीसी क्रिकेट विश्वकप में चैंपियन भारत अपने ख़िताब बचाओ अभियान की शुरुआत पाकिस्तान के ख़िलाफ़ करेगा. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद आईसीसी ने मंगलवार को विश्व कप के कार्यक्रम की घोषणा की. इसके मुताबिक़ टीम इंडिया अपना पहला मुक़ाबला 15 फरवरी को एडिलेड में पाकिस्तान के साथ खेलेगी. भारत ने साल 2011 में फ़ाइनल में श्रीलंका को हराकर 28 साल बाद विश्वकप ख़िताब जीता था. पूल-बी में भारत और पाकिस्तान के अलावा दक्षिण अफ्रीका वेस्टइंडीज जिम्बाब्वे आयरलैंड और एक क्वालिफायर को रखा गया है. पूल-ए में मेजबानों ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ इंग्लैंड श्रीलंका बांग्लादेश और दो क्वालिफायर टीमें होंगी. टूर्नामेंट का पहला मैच 14 फरवरी को न्यूजीलैंड और श्रीलंका के बीच क्राइस्टचर्च में खेला जाएगा जबकि इसी दिन शाम को चार बार के चैंपियन ऑस्ट्रेलिया का मुक़ाबला मेलबर्न में इंग्लैंड से होगा. विश्व कप का फ़ाइनल 29 मार्च को मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर खेला जाएगा. भारत 22 फरवरी को मेलबर्न में दक्षिण अफ्रीका से 28 फरवरी को पर्थ में क्वालिफायर से छह मार्च को पर्थ में ही वेस्टइंडीज से और दस मार्च को हेमिल्टन में आयरलैंड से खेलेगा. टीम इंडिया अपना अंतिम ग्रुप मैच 14 मार्च को ऑकलैंड में जिम्बाब्वे के ख़िलाफ खेलेगी. भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी ने कहा कि उन्हें इस टूर्नामेंट का बेसब्री से इंतजार है. उन्होंने कहा ऐसा लगता है कि 2011 में आईसीसी विश्व कप जीतना जैसे कल की ही बात है. धोनी ने कहा विश्व कप किसी भी क्रिकेटर के लिए अहम टूर्नामेंट होता है क्योंकि ये चार साल में एक बार होता है. हम 2011 में इसे जीतने में सफल रहे थे और अब हमारी कोशिश इसे अपने पास बरकरार रखने की होगी. उन्होंने कहा मुझे इस टूर्नामेंट का बेसब्री से इंतजार है और पूरी उम्मीद है कि हम अच्छा प्रदर्शन करेंगे. हाल में आईसीसी चैंपियंस ट्राफी में जीत से टीम का आत्मविश्वास बढ़ा है और मुझे आशा है कि ये अनुभव विश्व कप की तैयारियों में हमारे काम आएगा. 44 दिन तक चलने वाले विश्व कप में कुल 49 मैच 14 स्थलों पर खेले जाएंगे. ऑस्ट्रेलिया में 26 मैच एडिलेड ब्रिसबेन कैनबरा होबार्ट मेलबर्न पर्थ और सिडनी में खेले जाएंगे. न्यूजीलैंड को 23 मैचों की मेजबानी मिली है जो ऑकलैंड क्राइस्टचर्च डुनेडिन हेमिल्टन नेपियर नेल्सन और वेलिंगटन में आयोजित होंगे. 31 दिसंबर 2012 की आईसीसी वनडे रैंकिंग के आधार पर 14 टीमों को दो ग्रुपों में बांटा गया है. इनमें आईसीसी के दस पूर्ण सदस्य और चार क्वालिफायर शामिल हैं. हर पूल से शीर्ष चार टीमें क्वार्टरफ़ाइनल में पहुंचेंगी. हर नॉकआउट मैच के लिए एक रिज़र्व डे रखा गया है. ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को 1992 के बाद पहली बार विश्व कप की मेजबानी मिली है. टूर्नामेंट के कार्यक्रम की वेलिंगटन और मेलबर्न में एक साथ घोषणा की गई. |
| DATE: 2013-07-30 |
| LABEL: sports |
| [884] TITLE: इंडियन फॉर्मूला वन ग्रां प्री 2014 संकट में |
| CONTENT: भारत में अगले साल फ़ॉर्मूला वन रेस पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने फ़ॉर्मूला वन के प्रमुख बर्नी एकलस्टन के हवाले से कहा है कि भारत में अगले साल ये फ़र्राटा रेस होने की संभावना नहीं है. बर्नी एक्केलेस्टोन ने हंगरी ग्रां प्री के दौरान कहा क्या भारत में इसके आयोजन की संभावना है शायद नहीं. वहीं रूस में फ़ॉर्मूला वन रेस के आयोजन की तैयारियां हो रही हैं. जब 82 साल के ब्रितानी अरबपति एकलस्टन से पूछा गया कि नई दिल्ली के पास ग्रेटर नोएडा में इस रेस के आयोजन में क्या दिक्कतें पेश आ रही हैं तो उन्होंने कहा इसके कारण राजनीतिक हैं. दशकों से फ़ॉर्मूला वन रेस का आयोजन कर रहे बर्नी एकलस्टन ही इस रेस का कैलेण्डर तैयार करते है और वो आम तौर पर इसे सितंबर में इंटरनेशनल ऑटोमोबाइल फ़ेडरेशन के सामने औपचारिक मंज़ूरी के लिए पेश करते हैं. फ़ॉर्मूला वन रेस के लिए 22 जगहों के आवेदन हैं जबकि इस रेस में हिस्सा लेने वाली टीम चाहती हैं कि 20 से ज़्यादा रेस न हों. रूस में 2014 के अंत में सोची के ब्लैक सी रिजार्ट में पहली फ़ॉर्मूला वन रेस का आयोजन होने वाला है. न्यू जर्सी में भी पहली बार फर्राटा रेस होगी. ऑस्ट्रिया भी 11 साल के बाद इस रेस में वापसी कर रहा है. भारत ने पहले ग्रां प्री का आयोजन 2011 में किया. इस साल भारत में 27 अक्टूबर को ग्रां प्री रेस होगी. 19 रेसों वाली इस रेस का 19वां राउंड भारत में होगा. भारत में अब तक दो रेस हुई हैं और दोनों ही रेड बुल टीम के सेबेस्टिन फेटेल ने जीती हैं जो तीन बार फ़ॉर्मूला वन का खिताब जीत चुके हैं. इस तरह के आयोजनों में कई तरह नौकरशाही वाली अड़चनें होती हैं. वित्तीय मामलों के अलावा फ़ॉर्मूला वन के लिए स्थानीय कर भी कई बार समस्या बनते हैं. भारत में फ़ॉर्मूला वन के आयोजक जेपी स्पोर्टस इंटरनेशनल ने अगले साल होने वाली रेस पर मीडिया की अटकलों को पूरी तरह निराधार और दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए पिछले महीने एक बयान जारी किया था. जेपी स्पोर्टस के प्रवक्ता असकरी जैदी ने अपने बयान में कहा फ़ॉर्मूला वन प्रबंधन के साथ बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट में एफ-1 रेस के आयोजन का जो समझौता हुआ उसकी अवधि 2015 तक की है. और हम इस समझौते के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं. बयान में आगे कहा गया है फ़ॉर्मूला वन रेस के आयोजन से पीछे हटने का कोई कारण नहीं है. भारत में अगले साल होने वाला इंडियन ग्रां प्री हंगरी में चर्चा का विषय रहा. टीमों ने माना कि भारत में फ़ॉर्मूला वन रेस को लेकर कई तरह दिक्कतें हैं लेकिन उन्हें उम्मीद है कि इन्हें सुलझा लिया जाएगा. फ़ॉर्मूला वन टीम सौबर एफ1 की भारत मूल की प्रमुख मुनिशा कलटेनबर्न ने कहा यदि इन टैक्स कारणों के चलते हम वहां नहीं जा पाए तो तो यह बेहद अफसोस की बात है. कलटेनबर्न ने आगे कहाफ़ॉर्मूला वन में पहले से मौजूद भागीदारों के लिए भारत एक महत्वपूर्ण बाजार है और उनके लिए भी जो इस रेस में सफल होने वाले हैं. यदि हमने इन समस्याओं को सुलझाया नहीं तो यह बेहद अफसोस की बात होगी. |
| DATE: 2013-07-29 |
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| [885] TITLE: तीसरा वनडे जीत भारत ने हासिल की अजेय बढ़त |
| CONTENT: भारत की कप्तनी कर रहे विराट कोहली ने इस मैच में 68 रन बनाए. भारत ने हरारे में खेले गए तीसरे एकदिवसीय मैच में मेज़बान ज़िम्बाब्वे को सात विकेट से हराकर कर पांच मैचों की इस सिरीज़ में 3-0 की अजेय बढ़त ले ली है. तीसरे मुक़ाबले में भारत के कप्तान के विराट कोहली ने टॉस जीता और पहले फ़ील्डिंग करने का फैसला किया. भारत के गेंदबाज़ों ने उनके फ़ैसले को सही साबित करते हुए ज़िम्बाब्वे की पूरी टीम को 46 ओवर में ही 183 रनों पर समेट दिया. भारत की ओर से अमित मिश्रा ने 47 रन देकर चार विकेट लिए. जवाब में जीत का लक्ष्य भारत ने 35-3 ओवर में ही केवल तीन विकेट खोकर हासिल कर लिया. विराट कोहली और रैना ने चौथे विकेट के लिए नाबाद 56 रनों की साझेदारी की. रैना ने 28 रन बनाए. कप्तान विराट कोहली 68 और सुरेश रैना 28 रन बना कर नाबाद रहे. सिरीज़ के बाकी बचे दोनों मैच बुलावायो में खेले जाएंगे. दोनों टीमों का चौथा मुक़ालबा एक अगस्त गुरुवार को खेल जाएगा. वैसे इस मुक़ाबले में अनुभवी गेंदबाज़ विनय कुमार से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही थी लेकिन पिछले दोनों मैचों की तरह इस मुकाबले में भी जिम्बाब्वे के बल्लेबाज़ों ने उनका सामना आत्मविश्वास से किया. विनय कुमार के हाथ 32 रन देकर केवल एक विकट लगा. दूसरी तरफ़ जयदेव उनादकट और मोहम्मद समी ने कम अनुभव होने के बावजूद गेंदबाज़ी में ज़्यादा पैनापन दिखाया. मोहम्मद समी ने नौ ओवर में केवल 25 रन देकर दो विकेट झटके. जिम्बाब्वे की ओर से मसाकात्ज़ा और विलियम्स ने ही कुछ देर विकेट पर टिकने का जज़्बा दिखाया. मसाकात्ज़ा ने 38 और विलियम्स ने 45 रन बनाए. इनके आउट होते ही जिम्बाब्वे की पूरी पारी बिखर गई. दूसरी तरफ भारतीय बल्लेबाज़ी में इस दौरे पर रोहित शर्मा की लगातार नाकामी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. अब ये बात अलग है कि भारतीय टीम जीत के रथ पर सवार है. ऐसे में कप्तान विराट कोहली अपने पहले मौके के इंतजार में बेंच पर बैठे चेतेश्वर पुजारा और परवेज रसूल को अगले मैच में मौक़ा दे सकते हैं. |
| DATE: 2013-07-28 |
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| [886] TITLE: हरारे में हो सकता है हार-जीत का फैसला |
| CONTENT: भारत और ज़िम्बाब्वे के बीच पांच वनडे मैचों की सिरीज़ का तीसरा मैच रविवार को हरारे में खेला जाएगा. मैच भारतीय समय के मुताबिक साढ़े बारह बजे शुरू होगा. सिरीज़ के बाकी दोनों मैच बुलावायो में खेले जाएंगे. अभी भारत सिरीज़ में 2-0 से आगे हैं और भारत की कोशिश यही होगी कि वह हरारे में ही ज़िम्बाब्वे को तीसरे मैच में भी हराकर सिरीज़ में 3-0 से अजेय बढ़त हासिल कर ले. ज़िम्बाब्वे ने भारत को टक्कर देने की कोशिश की है लेकिन वो कभी भी मैच जीतने की स्थिति में नज़र नहीं आया. इसलिए ज़िम्बाब्वे भी ये मैच जीतकर सिरीज़ को एकतरफा होने से बचाने की कोशिश करेगा. ऐसे में अगर भारत तीसरा मैच जीत ले तो इसे कप्तान विराट कोहली के लिए उपलब्धि माना जाएगा क्योंकि इस टीम में महेंद्र सिंह धोनी जैसे सितारे नहीं हैं और न ही ईशांत उमेश यादव और भुवनेश्वर कुमार जैसे तेज़ गेंदबाज़ हैं. यही नहीं टीम में ऑफ स्पिनर आर अश्विन भी शामिल नहीं हैं. हालांकि इन खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी का फायदा लेग स्पिनर अमित मिश्रा और जयदेव उनादकट ने उठाया है. अमित मिश्रा ने पहले मैच में 43 रन देकर दो विकेट लिए तो दूसरे मैच में 46 रन देकर दो विकेट झटके. पहले मैच में युवा तेज़ गेंदबाज़ उनादकट को सिर्फ एक विकेट मिला लेकिन दूसरे मैच में उन्होंने 41 रन देकर चार विकेट हासिल किए. उनके मुक़ाबले आर विनय कुमार और मोहम्मद शमी थोड़े फीके रहे हैं. विनय कुमार को पहले मैच में 57 रन देकर एक विकेट मिला तो दूसरे मैच में उन्होंने 49 रन खर्च किए लेकिन उन्हें कोई विकेट नहीं मिला यानी विनय कुमार भी महंगे साबित हुए. बल्लेबाज़ी भारत का मज़बूत पक्ष रहा है. पहले वनडे में कप्तान विराट कोहली ने तो दूसरे में शिखर धवन ने शतक जमाकर भारत की पारी को संभाला. इनके अलावा अंबाटी रायडू और दिनेश कार्तिक भी अर्धशतक जमा चुके हैं. हालांकि भारतीय खेमा ये उम्मीद कर रहा होगा कि सुरेश रैना और रोहित शर्मा इस मैच में ज़रूर रन बनाएंगे. दूसरी ओर ज़िम्बाब्वे के बल्लेबाज़ों ने पहले मैच में सात विकेट पर 228 रन और दूसरे मैच में नौ विकेट पर 236 रन बनाकर दिखा दिया है कि भले ही उनकी बल्लेबाज़ी में बहुत गहराई न हो लेकिन वो नौसिखिये नहीं हैं और भारतीय टीम कम नहीं आंक सकती. असल में ज़िम्बाब्वे के बल्लेबाज़ तेज़ी से रन नही बना पा रहे हैं और उनकी फील्डिंग में भी गिरावट आई है. ऐसे में देखना ये है कि इस सिरीज़ में हार-जीत का फैसला हरारे में ही होता है या बात बुलावायो तक जाएगी. |
| DATE: 2013-07-28 |
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| [887] TITLE: धवन का फिर मूँछों पर ताव, भारत जीता |
| CONTENT: सलामी बल्लेबाज़ शिखर धवन के टिककर लगाए गए शतक की मदद से भारत ने ज़िम्बाब्वे को 58 रनों से हरा दिया है. भारत ने ज़िम्बाब्वे के सामने जीत के लिए 295 रनों का लक्ष्य रखा था मगर उसके जवाब में पूरी टीम सिर्फ़ 236 रनों पर सिमट गई. ज़िम्बाब्वे ने सधी हुई शुरुआत की थी और सलामी जोड़ी ने 45 रन जोड़े भी. सिबंदा और सिकंदर रज़ा की इस जोड़ी में से रज़ा 20 रन बनाकर आउट हुए. सिबंदा ही ज़िम्बाब्वे की ओर से सर्वाधिक स्कोर करने वाले खिलाड़ी साबित हुए. 55 रनों के निजी स्कोर पर उनादकट ने मिश्रा के हाथों लपकवाया. उनके अलावा चिगुंबरा ने 46 और उत्सेया ने 52 रन बनाकर ज़िम्बाब्वे को 236 के स्कोर तक पहुँचाया. चिगुंबरा और उत्सेया के बीच सातवें विकेट के लिए 88 रनों की साझेदारी हुई. मगर ये साझेदारी भी हार नहीं टाल सकी. इससे पहले ज़िम्बाब्वे ने टॉस जीता और पहले फ़ील्डिंग करने का फ़ैसला किया. भारत ने दूसरे सलामी बल्लेबाज़ रोहित शर्मा का विकेट सिर्फ़ एक रन पर गँवा दिया और एक समय भारत ने सिर्फ़ 65 रनों पर चार विकेट खो दिए थे. मगर पाँचवें विकेट के लिए शिखर धवन और दिनेश कार्तिक के बीच हुई 167 रनों की साझेदारी ने भारत को 294 रनों का बड़ा स्कोर खड़ा करने में मदद की. पिछले मैच में शतक जड़ने वाले कप्तान विराट कोहली भी इस मैच में देर तक नहीं रुके और 14 रन बनाकर आउट हो गए. इसके बाद अंबाती रायडू और सुरेश रैना क्रमशः पाँच और चार रन बनाकर पवेलियन लौट गए. दिनेश कार्तिक ने शिखर धवन का साथ बख़ूबी निभाया और 69 रन जोड़े. इस दौरान उन्होंने छह चौके जड़े. रवींद्र जडेजा ने 15 रन बनाए और अमित मिश्रा नौ रन बनाकर रन आउट हुए. विनय कुमार ने तेज़ी से 12 गेंदों में 27 बनाए. उसमें दो चौके और दो छक्के थे. पहले वनडे में भारत को छह विकेट से जीत मिली थी. |
| DATE: 2013-07-26 |
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| [888] TITLE: हद होती है हर बात की: ज्वाला गुट्टा |
| CONTENT: आईपीएल की तर्ज पर शुरू होने वाला इंडियन बैटमिंटन लीग यानी आईबीएल नीलामी प्रक्रिया के बाद से ही विवाद में आ गया है. इसमें आइकन प्लेयर करार दी गईं भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा बेहद गुस्से में हैं. ज्वाला का गुस्सा इस बात से है कि उन्हें बिना सूचित किए नीलामी के वक़्त उनकी बेस प्राइस 50 हज़ार डॉलर से घटाकर 25 हज़ार डॉलर कर दी गई. फोन पर अपने गृहनगर हैदराबाद से बात करते हुए ज्वाला कहती हैं हमें बिना सूचना दिए हमारी बेस प्राइस कम कर दी गई. मैं बेहद सदमे में हूँ. ऐसे कई खिलाड़ी जिनसे मेरा रिकॉर्ड कहीं ज़्यादा बेहतर है उनकी बेस प्राइस मेरी बेस प्राइस की तीन गुना है. वह कहती हैं मुझे बैडमिंटन लीग के हर प्रमोशन में इस्तेमाल किया गया. मुझे आइकन प्लेयर का दर्जा दिया गया. उसके बाद ऐसा बर्ताव बहुत हिला देने वाला है. ज्वाला को इस बात का भी मलाल है कि इस लीग से महिला युगल मुक़ाबले हटा दिए गए हैं. ज्वाला गुट्टा के साथ-साथ डबल्स में उनकी पार्टनर रह चुकीं अश्विनी पोनप्पा का भी बेस प्राइस ऐन मौके पर 50 हज़ार डॉलर से कम करके 25 हज़ार डॉलर कर दी गई थी. बाद में ज्वाला को 31 हज़ार डॉलर में दिल्ली स्मैशर्स और अश्विनी को 25 हज़ार डॉलर में पुणे पिस्टन ने ख़रीदा. ख़बर है कि इंडियन बैडमिंटन लीग के आयोजकों ने दोनों ही खिलाड़ियों को आश्वस्त किया है कि उनकी बेस प्राइस में जो कमी की गई है उसकी भरपाई वो कर देंगे. इस पर ज्वाला ने तेज़ आवाज़ में जवाब दिया ये तो वही बात हो गई कि पैसे लो और चुप बैठो. क्या हमारे जैसे बैडमिंटन खिलाड़ियों के साथ बर्ताव करने का यही तरीका है. इससे देश में बैडमिंटन को लेकर कितना ख़राब संदेश गया है. वैसे भी मेरी आपत्ति पैसों को लेकर उतनी नहीं है. सवाल ये है कि मुझे ये बात मीडिया से क्यों पता लगी बेस प्राइस कम करने का फैसला क्या एकदम आख़िर में लिया गयाक्या इस घटना के बाद साएना नेहवाल समेत दूसरे बैडमिंटन खिलाड़ियों ने उन्हें सपोर्ट किया या बात की. ज्वाला बोलीं हम किसी से समर्थन की उम्मीद नहीं करते. यहां सब समस्या होने पर आपसे दूर भागते हैं. इस फील्ड में कोई एकता नहीं है. लेकिन मैं दूसरों जैसी नहीं हूं. अगर किसी को आगे कोई मुश्किल आती है तो मैं हमेशा उसके लिए खड़ी रहूंगी. ज्वाला ने हालांकि इस बात से इनकार किया कि वह लीग का बहिष्कार करेंगी. उन्होंने कहा कोई और होता तो वो कोर्ट चला जाता. लेकिन मुझे सिर्फ बैडमिंटन खेलना आता है और मैं अपना जवाब कोर्ट नहीं बल्कि बैडमिंटन कोर्ट में ही दूंगी. |
| DATE: 2013-07-25 |
| LABEL: sports |
| [889] TITLE: 'वर्ल्ड चैंपियन एथलीट हूं,पर प्रायोजक नहीं' |
| CONTENT: कभी बचपन में घास-फूंस और साधारण लकड़ी से बना जैवलिन लेकर अभ्यास किया करता था. मेरी कामयाबी में मेरे परिवार का बहुत बडा योगदान है. मैं अपने माता-पिता का आभारी हूं जिन्होंने मुझे तब पैरा स्पोर्ट्स में जाने की अनुमति दी जब किसी पैरा-खिलाड़ी को मैदान में जाने तक नहीं दिया जाता था. उस समय उन्होंने मुझे प्रेरणा दी. आज भी उनका सहयोग मुझे मिल रहा है. मेरे दो बडे भाई है और मेरे परिवार में मेरी पत्नी और ढाई साल की बेटी जिया है. फ्रांस में आयोजित छठी आईपीएल एथलेटिक्स विश्व चैंम्पियनशिप की भाला फेंक स्पर्धा में एफ 46 वर्ग में 57-04 मीटर की दूरी तक जैवलिन थ्रो कर विश्व रिकार्ड पैरालम्पिक रिकॉर्ड और विश्व चैम्पियनशिप रिकॉर्ड के साथ विश्व रैंकिग में नंबर एक स्थान हासिल करने की काफी ख़ुशी हो रही है. ख़ासकर इस कामयाबी तक पहुंचने वाला पहला भारतीय होने की ज़्यादा ख़ुशी है. इसके लिए मैंने भारत में ही पूरी तैयारी की थी और जर्मनी में आयोजित हुई विश्व क्वालिफाइंग चैंम्पियनशिप में भी पहला स्थान हासिल किया था जिससे साबित होता है कि मैं विश्व चैंम्पियनशिप में स्वर्ण पदक पाने का भी हक़दार था. विश्व चैंपियनशिप में चीनी खिलाड़ी के 55-50 मीटर के रिकॉर्ड को जब मैंने तोडा तब मेरे पास जैवलिन थ्रो करने का सिर्फ आखिरी अवसर था यानी जिस थ्रो पर रिकार्ड बना वह आखिरी थ्रो ही था. हालांकि मेरे पहले पांच थ्रो पर ही स्वर्ण पदक पक्का हो चुका था लेकिन विश्व रिकार्ड बनाने के उद्देश्य से मैंने छठा और आखिरी थ्रो किया और इस आखिरी थ्रो ने मेरी ज़िंदगी का नया अध्याय लिख दिया. मेरी कामयाबी में वहां के मौसम का भी योगदान रहा. उस समय वहां लगभग 31 डिग्री तापमान था और ऐसी गर्मी में एक रूसी एथलीट अपने सिर पर बर्फ रखकर बार-बार कह रहा था वैरी हॉट डे-वैरी हॉट डे. लेकिन मैं राजस्थान के चुरू ज़िले के निवासी हूं तो मुझे गर्मी से कोई परेशानी नहीं हुई. 2004 के एथेंस पैरा-ओलंपिक का अनुभव का लाभ भी मिला. वहां मैंने गोल्ड जीता था. 1998 के बुसान एशियाड में पहली बार मैं ने पैरा-स्पोर्ट्स में भाग लिया और स्वर्ण पदक जीता. ये आयोजन आज भी याद आता है क्योंकि पैरा एशियाई खेलों का आयोजन एशियाई खेलों के लगभग 15 दिनो बाद होना था और हम दिल्ली में ही थे जहां मेरी मुलाक़ात वहां से लौटने वाले डिस्कस थ्रोअर्स से हुई तो उन्होंने बताया कि बुसान में इस समय काफी ठंड पड रही है जिसकी वजह से ग्रिप बनाने में बेहद मुश्किल होती है. इसका पता चलने से यह मदद मिली कि मैने उसी परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए अभ्यास किया और स्वर्ण पदक जीता और उसी पदक ने मुझमें भविष्य का हौसला भरा. मैं एक कामयाब एथलीट हूं और इतने मेडल भी जीते हैं लेकिन आज भी मेरे पास प्रायोजक नही हैं और अपना जैवलिन मुझे ख़ुद खरीदना पड़ता है. यही एक बड़ी वजह है जिसके चलते विश्व पैरा स्पोर्टस में भारत इतनी तरक्की नहीं कर रहा है जितनी हो सकती है. |
| DATE: 2013-07-25 |
| LABEL: sports |
| [890] TITLE: कोहली का शतक, भारत की फ़तह |
| CONTENT: विराट कोहली की कप्तानी पारी की मदद से भारत ने ज़िम्बाब्वे को पाँच वनडे मैचों की शृंखला के पहले मैच में छह विकेट से हरा दिया है. ज़िम्बाब्वे के सात विकेट पर 228 रनों के जवाब में भारत ने चार विकेट खोकर 44 ओवर और पाँच गेंदों में 230 रन बना दिए. कोहली ने इस मैच में बेहतरीन 115 रनों की पारी खेली जबकि इस मैच के ज़रिए वनडे क्रिकेट में पदार्पण करने वाले अंबाती रायडू 63 रन बनाकर नाबाद रहे. इस मैच में कोहली और रायडू के बीच तीसरे विकेट के लिए 115 रनों की साझेदारी हुई. कोहली का वनडे मैचों में ये 15वाँ शतक था. भारत की ओर से सलामी बल्लेबाज़ के तौर पर उतरे शिखर धवन ने 17 और रोहित शर्मा ने 20 रन बनाए. कोहली ने 108 गेंदों की अपनी पारी में 13 चौके और एक छक्का लगाया. इससे पहले भारत ने टॉस जीतकर पहले फील्डिंग का फ़ैसला किया. ज़िम्बाब्वे के लिए सिकंदर रज़ा ने 82 रन बनाए. रज़ा को अमित मिश्रा ने बोल्ड किया. 38वें ओवर तक ज़िम्बाब्वे की पारी काफी मज़बूत नज़र आ रही थी लेकिन इसके बाद ज़िम्बाब्वे ने कुछ ही ओवर में अहम विकेट खो दिए. ज़िम्बाब्वे के लिए चिगुमबरा ने नाबाद 43 रन बनाए. भारत के लिए अमित मिश्रा ने सबसे ज़्यादा तीन विकेट लिए. विनय कुमार मोहम्मद शमी जयदेव उनादकट और सुरेश रैना को 1-1 विकेट मिले. भारत के लिए अंबाती रायडू और उनादकट अपना पहला वनडे खेल रहे थे. दोनों देशों के बीच अगला मैच शुक्रवार को हरारे में खेला जाएगा. |
| DATE: 2013-07-24 |
| LABEL: sports |
| [891] TITLE: पहला वनडे: तीन साल बाद भिड़ेंगे भारत और ज़िम्बाब्वे |
| CONTENT: भारत और ज़िम्बाब्वे के बीच बुधवार को पांच एकदिवसीय मैचों की सिरीज़ का पहला मैच हरारे में खेला जाएगा. भारतीय टीम की कमान पहली बार स्वतंत्र रूप से विराट कोहली संभालेंगें जबकि ज़िम्बाब्वे के कप्तान ब्रैंडन टेलर है. भारतीय टीम में भरोसेमंद बल्लेबाज़ विराट कोहली के अलावा हाल में इंग्लैंड में आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी और उसके बाद वेस्टइंडीज़ में हुई त्रिकोणीय एकदिवसीय सिरीज़ में रोहित शर्मा और शिखर धवन के रुप में उभरी नई सलामी जोडी भी है जो महेंद्र सिंह धोनी की खोज कही जा सकती है. रोहित शर्मा जब से भारतीय टीम में आए है तब से ही उन्हें बेहद प्रतिभाशाली बल्लेबाज़ माना जाता है लेकिन वह अपनी प्रतिभा को मैदान पर दिखा नही पा रहे थे. लेकिन जैसे ही उन्हे धोनी ने मध्यमक्रम की जगह सलामी बल्लेबाज़ की भूमिका दी उनका बल्ला चल निकला. इस बात को स्वंय रोहित शर्मा ने भी स्वीकार किया है. भारतीय टीम में सुरेश रैना दिनेश कार्तिक अजिंक्य रहाणे और रवींद्र जडेजा जैसे बल्लेबाज़ भी है जिनके पास अनुभव की कोई कमी नही है. सुरेश रैना तो 2010 में एक कप्तान के रूप में भी ज़िम्बाब्वे का दौरा कर चुके है लेकिन तब खेली गई त्रिकोणीय एकदिवसीय सिरीज़ में भारत फाइनल में नही पहुंच सका था. तब तीसरी टीम श्रीलंका थी. उसके बाद भारत ने ज़िम्बाब्वे से दो टवेंटी-20 मैच ज़रूर जीते थे. फिलहाल इस एकदिवसिय सिरीज़ में भारत की कप्तानी करने वाले विराट कोहली ने अपना पहला टवेंटी-टवेंटी मुक़ाबला भी तब ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ ही खेला था. बुधवार से शुरू होने जा रही एकदिवसीय सिरीज़ से पहले ज़िम्बाब्वे के कोच एंडी वॉलर ने कहा है कि उनकी टीम अपने प्रदर्शन से भारत को हैरान कर सकती है. वैसे हैरान तो ज़िम्बाब्वे ने पिछले दौरे में भी किया था जब त्रिकोणीय सिरीज़ में उसने भारत को पहले तो 5 विकेट पर 285 रन बनाने के बावजूद केवल 4 विकेट पर 289 रन बनाकर लीग मैच जीता और उसके बाद दूसरे मैच में भी भारत को 7 विकेट से पटखनी दी. उस मैच में भारतीय टीम 9 विकेट खोकर 194 रन ही बना सकी थी. विराट कोहली तब पहले मैच में शून्य और दूसरे मैच में 18 रन बनाकर आउट हुए लेकिन तब पहले मैच में रोहित शर्मा ने 114 रनो की शतकीय पारी खेली थी. इसके दो दिन बाद ही उन्होने श्रीलंका के ख़िलाफ नाबाद 101 रन बनाए थे. अब यह बात अलग है कि इसके बाद रोहित शर्मा के बल्ले से शतक नही निकला. उसके बाद भारत और ज़िम्बाब्वे के बीच कोई एकदिवसीय मैच भी नही खेला गया. बुधवार को दोनो देश लगभग तीन साल बाद एक दूसरे का सामना करेंगे. वैसे दोनो टीमों के बीच अभी तक 51 एकदिवसीय मैच खेले गए है जिनमें से भारत ने 39 जीते है 10 हारे है 2 टाई रहे है. 1983 के विश्व कप में वह ज़िम्बाब्वे ही था जिसने भारत के ख़िलाफ खेलते हुए अपने दूसरे ही मैच में एक समय भारत के 8 विकेट केवल 140 रन पर चटखा दिए थे लेकिन उसके बाद कपिल देव ने 175 रनों की नाबाद पारी खेलकर भारत को हार के मुंह से निकाला और बाद में भारत विश्व चैंपियन भी बना. ऐसे हैरतअंगेज़ मैच खेलने वाले ज़िम्बाब्वे के पास कभी एंडी फ्लावर ग्रांट फ्लावर मरे गुडविन एलिस्टर कैम्पबेल हीथ स्ट्रीक क्रेग इवांस फ्लेचर जॉन ट्राइकोस स्टुअर्ट कार्लाइल ततेंदा ताइबू जैसे घर-घर पहचाने जाने वाले ख़िलाड़ी थे. अब पैसे के अभाव में ज़िम्बाब्वे की टीम में ना तो पहले जैसे ख़िलाड़ी है और ना ही दूसरे देशो से उनकी क्रिकेट सिरीज़ लगातार हो रही है जिसका खामियाज़ा ज़िम्बाब्वे की क्रिकेट को भुगतना पड रहा है. ऐसे में जहां विराट कोहली की कप्तानी की नई पारी का इम्तिहान है वही ज़िम्बाब्वे के पास भी अवसर है कि वह भारत को कड़ी चुनौती देकर क्रिकेट दुनिया को दिखाए कि वह पूरी तरह से चुका नही है. ये सिरीज़ पहली बार भारत के लिए एकदिवसीय क्रिकेट खेल रहे चेतेश्वर पुजारा जयदेव उनाडकट परवेज रसूल और लेग स्पिनर अमित मिश्रा के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है जो उनके लिए भविष्य के दरवाज़े खोल सकती है. |
| DATE: 2013-07-24 |
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| [892] TITLE: एशेज़: क्या अगले कुछ साल ऑस्ट्रेलिया के लिए बुरे ही रहेंगे? |
| CONTENT: पहले टेस्ट में सिर्फ 14 रन से जीतने वाली इंग्लैंड की टीम ने दूसरा टेस्ट 347 रन से जीत लिया है. इसके साथ इंग्लैंड न सिर्फ सीरिज़ जीतने के क़रीब है बल्कि ऑस्ट्रेलिया पर उसकी बादशाहत लंबी खिंच सकती है. लॉर्ड्स की चमकीली शाम में जीत का जश्न मनाने वाले इंग्लैंड के प्रशंसकों के लिए ये वाकई उत्तेजित करने वाला दिन और हैरान करने वाले आंकड़े हैं. अपने घरेलू मैदान पर इंग्लैंड ने 1890 के बाद से कभी भी एशेज़ के पहले 2 मैच नहीं जीते. घरेलू मैदान पर इंग्लैंड की ये एशेज़ में सबसे बड़ी जीत है और विदेशी धरती पर भी इससे ज़्यादा रनों से सिर्फ एक बार ही जीत हाथ लगी है. इसलिए क्रिकेट का मक्का कहे जाने वाले लॉर्ड्स पर ऐसी जीत किसी सपने जैसी प्रतीत हो रही है. लॉर्ड्स में ऑस्ट्रेलिया एक सदी से ज्यादा वक्त में सिर्फ 2 बार हारा है. पिछली एशेज़ सीरीज़ में मेलबर्न में पारी की हार की ओर बढ़ते हुए इंग्लैंड के कुछ प्रशंसक ऑस्ट्रेलिया पर एक पुराने फुटबॉल नारे लगाते हुए ताने कस रहे थे. लेकिन अब ये कहना ऑस्ट्रेलिया से ज़्यादा बांग्लादेश के लिए अपमानजनक होगा कि क्या ये बांग्लादेश के भेष में खेल रही टीम हैसात दिन पहले ऑस्ट्रेलिया ब्रैड हैडिन के कुछ चौकों की मदद से सीरिज़ में 1-0 की बढ़त बनाने के करीब था लेकिन अब ये बहुत दूर की बात लगती है. तब मुकाबला रोमांचक लग रहा था लेकिन अब ताबूत में आख़िरी कील ठोकी जा रही है. सिर्फ एक बार ही ऑस्ट्रेलिया 2-0 से पिछड़ने के बाद एशेज़ जीतने में कामयाब हुई है लेकिन ये 80 साल पहले हुआ था. तब डॉन ब्रैडमैन टीम का हिस्सा थे. अब जो बल्लेबाज़ हैं वो 1980 की एसेक्स टीम के खिलाड़ी डॉन टॉपल जितने ही अच्छे हैं. तब वो वक्त की परवाह किए बगैर खेलते थे और अब पांच दिन भी नहीं खेल पाते. खेलों का एक और गाना है जो ऐसी बुरी हारों के बाद अक्सर इस्तेमाल होता है. ऑस्ट्रेलिया के लिए बुरी ख़बर ये है कि इंग्लैंड से हर हफ्ते उनकी टक्कर हो रही है. 5-0 का स्कोर अब इस सीरिज़ में उकसावा नहीं बल्कि काफी हद तक संभव नज़र आ रहा है. अगर ये बात तर्कसंगत न लगे कि ऐसा रिकॉर्डतोड़ बदला संभव है तो भी दोनों टीमों में फासला इतना बड़ा है कि आने वाली सीरिज़ के लिए पहले ही कितना नुकसान हो चुका है. ऑस्ट्रेलिया को टीम में शामिल खिलाड़ियों से परेशानी है और उन खिलाड़ियों से भी परेशानी है जो टीम में नहीं हैं. उनका नया कोच उनके खेल में सुधार नहीं कर सकता और पुराना कोच उनसे हर्जाना मांग रहा है. जहां तक नज़र जाती है वहां तक मुसीबतें दिक्कतें और नाकामी ही नज़र आती है. युवा स्पिनर एश्टन एगर ने सीरिज़ के दो मैचों में स्पिनरों की मददगार पिच पर भी खास प्रदर्शन नहीं किया है. लॉर्ड्स टेस्ट में 142 रन देकर खाली हाथ रहने वाले और पूरी सीरिज़ में 248 रन देकर 2 विकेट लेने वाले एगर ने न तो अपने कप्तान को खेल पर नियंत्रण दिया और न ही कोई असर छोड़ पाए. एगर ने नैथन लियोन की जगह ली है जिनकी गेंदबाज़ी और आत्मविश्वास दोनों कमज़ोर हैं. लियोन को टीम से 19 साल के एगर के लिए हटा दिया गया जो हेनले क्रिकेट क्लब के लिए खेल रहे थे. टॉप ऑर्डर के शेन वॉटसन बेहद जल्दी एलबीडब्ल्यू हो जाते हैं. रविवार को इस सीरीज़ में तीसरी बार वो एलबीडब्ल्यू आउट हुए. एशेज़ में आधे से ज्यादा बार वो एलबीडब्ल्यू हुए हैं. उनके साथ ओपनिंग करने वाले क्रिस रॉजर्स काउंटी खिलाड़ी ज़्यादा हैं जिन्हें अपने दूसरे टेस्ट के लिए 35 साल की उम्र तक इंतज़ार करना पड़ा. पिछले 10 टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के टॉप 3 बल्लेबाज़ों में से किसी ने शतक नहीं बनाया. ऑस्ट्रेलिया की इस बुरी हालत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि ऐसा आखिरी बार 1899 से 1902 के बीच हुआ था. चौथे नंबर पर आने वाले फिल ह्यूज स्लेट पर पानी की तरह क्रीज़ पर टिकते हैं. छठे नंबर पर आने वाले स्टीव स्मिथ बैटिंग ऑर्डर में कम से कम एक पायदान ऊपर हैं. इस मोड़ पर उम्मीद की जाती है कि कोई टीम उन खिलाड़ियों पर ध्यान देगी जो नहीं खेल रहे. लेकिन वो दिन लद गए जब ऑस्ट्रेलिया के पास माइकल बेवन और स्टुअर्ट लॉ जैसे खिलाड़ी होते थे जो मौका मिलने का इंतज़ार करते थे. साइमन कैटिच काउंटी क्रिकेट में रन बना रहे हैं लेकिन वो 37 साल के हैं और चयन समिति के चेयरमैन ने उन्हें कह दिया है कि वो दोबारा टीम में कभी नहीं चुने जाएंगे. रिकी पॉन्टिंग पॉन्टिंग रिटायर हो चुके हैं और शायद ऑस्ट्रेलिया ये भी उम्मीद करे कि शेन वॉर्न और मैक्ग्राथ दोबारा खेलेंगे. इंग्लैंड के दौरे पर आई टीम में सिर्फ डेविड वॉर्नर दमदार हैं जो टैक्सी ड्यूटी के बजाय मोटर स्पोर्ट डेमोलिशन डर्बी के ज्यादा काबिल नजर आते हैं. लेकिन पिछले महीने जो रूट को अपने मुक्के से सीरिज से बाहर करने में नाकाम रहने के बाद वो ज़िम्बाब्वे में भी रन बनाने में नाकाम रहे हैं. रविवार को डेविड वॉर्नर को क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के ज़रिए एक बयान जारी करना पड़ा जिसमें उन्होंने अपने भाई स्टीवन के अपमानजनक ट्वीट के लिए माफी मांगनी पड़ी. स्टीवन ने अपने ट्वीट में न सिर्फ वॉटसन को भला-बुरा कहा था बल्कि मिकी ऑर्थर को बलि का बकरा बताकर एक नई खेल संस्कृति भी शुरू की थी. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने भले ही शिकायत की हो लेकिन वो खुद एक दिन पहले गलती से हुए ट्वीट के लिए माफी मांगने में व्यस्त था. इसे अव्यवस्था कहना थोड़ी दया दिखाने जैसा होगा. वहीं इंग्लैंड की टीम अपनी मुश्किलों में भी कुछ उम्मीद की बात ढूंढ सकती है. इंग्लैंड के चार सबसे भरोसेमंद बल्लेबाजों ने अब तक कोई बड़ा स्कोर नहीं बनाया है और इसके बावजूद वो 2-0 से आगे हैं. कप्तान एलेस्टर कुक का सीरिज़ में औसत 83 रहा है केविन पीटरसन का 85 जॉनाथन ट्रॉट का सिर्फ 26 और साल में सबसे बढ़िया प्रदर्शन करने वाले मैट प्रॉयर का सिर्फ 13. इसलिए अगर पीटरसन तीसरे टेस्ट में नहीं भी खेल पाते तब भी ये उतना बड़ा झटका नहीं होगा जितना हो सकता था. बाकी तीन बल्लेबाज निश्चित तौर पर खेल में सुधार करेंगे. और ये ऑस्ट्रेलिया के बच्चों को डराकर सुलाने के लिए काफी है. इंग्लैंड की गेंदबाजी में भी नॉटिंघम के मुकाबले लंदन में सुधार हुआ है. टिम ब्रेज्नन की सधी हुई और किफायती गेंदबाजी में स्टीवन फिन के मुकाबले सुधार हुआ है. ग्रीम स्वान को इसी तरह स्पिन के लिए मददगार पिचें मिलती रहेंगी और वो उनका ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाएंगे. जहां एगर ने हर 252 गेंदों पर 124 के औसत से एक विकेट लिया है वहीं स्वान ने औसतन 50 गेंदों पर 1 विकेट लिया है 22 के औसत से. इंग्लैंड की टीम और उसके समर्थक कभी भी पसंदीदा रहने के आदी नहीं रहे हैं उन्हें हमेशा अंडरडॉग माना गया लेकिन अब उन्हें शायद इसकी आदत डालनी होगी. |
| DATE: 2013-07-22 |
| LABEL: sports |
| [893] TITLE: आईबीएल: साइना पर लगा 71 लाख का दांव |
| CONTENT: पहली इंडियन बैडमिंटन लीग के लिए हुई खिलाड़ियों की नीलामी में भारत की स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल को हैदराबाद हॉटशाट्स ने 71 लाख 29 हज़ार रुपए में खरीद लिया है. दुनिया के नम्बर एक पुरुष खिलाड़ी ली चांग वी को मुम्बई फ्रेंचाइज़ी ने 80 लाख 20 हज़ार रुपए में खरीदा है. साइना आईबीएल के उन छह आइकॉन खिलाड़ियों में थीं जिनका न्यूनतम मूल्य 29 लाख 70 हज़ार रुपए तय किया गया था. साइना ने कहा था कि वो या तो लखनऊ या फिर हैदराबाद की तरफ से खेलना पसंद करेंगी. हालांकि उनका झुकाव अपनी घरेलू टीम की तरफ ज़्यादा था. हैदरबाद फ्रेंचाइजी द्वारा खरीदे जाने के बाद सायना की यह इच्छा पूरी हो गई. राष्ट्रमण्डल खेलों में कांस्य पदक विजेता पी कश्यप भी आइकॉन खिलाड़ियों में शामिल थे. उन्हें बंगा बीट्स ने 44 लाख 55 हज़ार रुपए में खरीदा. अश्विनी पोनप्पा को पुणे पिस्टन्स ने 14 लाख 85 हज़ार रुपए में खरीदा. स्टार खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा को दिल्ली स्मैशर्स ने 18 लाख 41 हज़ार रुपए में खरीदा. ज्वाला का न्यूनतम मूल्य 14 लाख 85 हज़ार रुपए तय था. जर्मनी की खिलाड़ी जूलियन सेंक को तिरपन लाख छियालीस हज़ार रुपए में पुणे पिस्टन्स ने खरीदा. जूलियन इस समय दुनिया की चौथे नम्बर की महिला खिलाड़ी हैं. साइना नेहवाल चांग वी पीवी सिंधू और पी कश्यप के अलावा ज्वाला गुट्टा अश्वीनी पोनप्पा भी आईबीएल के छह शीर्ष खिलाड़ियों में शामिल हैं. नीलामी के दौरान सबसे ज़्यादा रस्साकशी मलेशियाई चैंपियन ली चांग वी को लेकर हुई. उन्हें लेकर खरीदारों में काफी उत्साह था. मुम्बई मास्टर्स और दिल्ली स्मैशर्स के बीच उन्हें खरीदने को लेकर बोली लगाने की जंग सी छिड़ गई थी. और अंत में मुम्बई मास्टर्स उन्हें खरीदने में सफल रही. मुम्बई मास्टर्स के मालिकों में क्रिकेट खिलाड़ी सुनील गावस्कर भी एक हैं. उभरती हुई बैडमिंटन स्टार पी वी सिंधू को लखनऊ वॉरियर ने 47 लाख 52 हज़ार रुपए में खरीदा. आईबीएल के दौरान ही चीन में राष्ट्रीय चैंपियनशिप भी चल रही होगी इसके बावजूद दो चानी खिलाड़ी बाओ शुनलाई एकल के लिए और झेंग बो युगल मैंचो के लिए उपलब्ध रहेंगे. दुनिया के शीर्ष 30 खिलाड़ियों में से आईबीएल में बिक्री के लिए उपलप्ध खिलाड़ियों में थाइलैंड के बूनसाक और हांगकांग के हू यून भी शामिल हैं. इन खिलाड़ियों का न्यूनतम मूल्य भी 29 लाख 70 हज़ार रुपए तय था. दुनिया के शीर्ष दस खिलाड़ियों में शामिल इंडोनेशिया के सोनी द्ववी कुनकोरो जापान के नीची तागो और विएतनाम के तीएन मिन्ह नगुएन भी आईबीएल में बिक्री के लिए उपलब्ध रहेंगे. इन खिलाड़ियों का न्यूतम मूल्य 14 लाख 85 हज़ार रुपए है. आईबीएल में बिक्री के उपलब्ध खिलाड़ियों में विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक के पूर्व विजेता तौफीक हिदायत शामिल हैं. तौफीक का न्यूनतम मूल्य आठ लाख इक्यानबे हज़ार रुपए तय है. तौफीक अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों से सन्यास ले चुके हैं. आईबीएल-2013 में कुल छह टीमें आपस में मुकाबला करेंगी. ये टीमें हैं हैदराबाद हॉटशाट्स कर्नाटक किंग्स लखनऊ वॉरियर्स मुम्बई मास्टर्स पुणे पिस्टन्स और राजधानी स्मैशर्स. यह लीग भारत के छह शहरों हैदराबाद बंगलूरु लखनऊ मुम्बई पुणे और दिल्ली में आयोजित की जाएगी. आईबीएल का पहला मैच 14 अगस्त को होगा और फाइनल 31 अगस्त को खेला जाएगा. आईबीएल में इनाम की राशि पाँच करोड़ 94 लाख रुपए है. इसे विश्व में सबसे ज़्यादा पुरस्कार राशि वाला बैडमिंटन टूर्नामेंट माना जा रहा है. |
| DATE: 2013-07-22 |
| LABEL: sports |
| [894] TITLE: वनडे शृंखला में कप्तान विराट कोहली का 'टेस्ट' |
| CONTENT: भारतीय क्रिकेट टीम पांच एकदिवसीय मैचों की शृंखला खेलने के लिए जिम्बाब्वे रवाना हो गई है. टीम की कमान युवा बल्लेबाज विराट कोहली को सौंपी गई है. इस टीम के बारे में विराट कोहली के कोच और पूर्व क्रिकेटर राजकुमार शर्मा कहते हैं यह एक युवा टीम है और इसके पास अपनी क्षमता दिखाने का बेहतरीन अवसर है. इसी के साथ विराट कोहली के पास भी एक कप्तान के रूप में अपनी योग्यता दिखाने का अच्छा मौक़ा है. भारतीय क्रिकेट टीम ज़िम्बाब्वे में पांच एकदिवसीय मैच खेलेगी. शृंखला का पहला मैच 24 जुलाई को हरारे में और उसके बाद हरारे में ही 26 जुलाई को दूसरा और 28 जुलाई को तीसरा मैच खेला जाएगा. चौथा मैच 31 जुलाई और पांचवा और अंतिम एकदिवसीय मैच तीन अगस्त को बुलावायो में होगा. ज़िम्बाब्वे दौरे के लिए चयनकर्ताओं ने महेंद्र सिंह धोनी तेज़ गेंदबाज़ ईशांत शर्मा भुवनेश्वर कुमार और उमेश यादव के साथ स्पिनर रामचंद्रन अश्विन को आराम दिया है. टीम में युवा ऑफ स्पिनर परवेज रसूल टेस्ट क्रिकेट में अपनी तकनीक का लोहा मनवा चुके चेतेश्वर पुजारा आईपीएल के बीते संस्करण में चमकने वाले तेज़ गेंदबाज़ मोहित शर्मा और जयदेव उनाडकट को पहली बार भारतीय एकदिवसीय टीम में जगह बनाने का अवसर मिला है. वैसे टीम में विराट कोहली के अलावा अनुभवी सुरेश रैना रोहित शर्मा शिखर धवन अजिंक्य रहाणे रवींद्र जडेजा और विनय कुमार जैसे खिलाड़ी भी शामिल है. टीम के चयन को लेकर राजकुमार शर्मा मानते है कि धोनी सहित सीनियर खिलाड़ियों को आराम देकर बोर्ड ने अच्छा कदम उठाया है. वो कहते हैं भारतीय टीम में एक समय ऐसा लगा कि जैसे दस तेज़ गेंदबाज़ों का पूल है तो कभी ऐसा लगा कि टीम घायल गेंदबाज़ों के साथ ही खेल रही है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि खिलाड़ियों को आराम नही मिला अब जबकि भारत के पास युवा खिलाड़ियों की अच्छी पौध है तो उन्हें अवसर दिया जा सकता है. वास्तव में ज़िम्बाब्वे की टीम भले ही दूसरे देशो में अच्छा प्रदर्शन करने में नाकाम रही हो लेकिन अपनी ही धरती पर वह भारत को टक्कर देने की क्षमता रखती है. इसके बाद भारत का अगला दौरा दक्षिण अफ्रीका का होगा जिसका क्रिकेट प्रेमियों को बेसब्री से इंतज़ार है क्योंकि वहीं भारत की कड़ी परीक्षा होगी. यकीनन दक्षिण अफ्रीका तेज़ पिचें देगा लेकिन हो सकता है ज़िम्बाब्वे दौरे से कुछ अच्छे खिलाड़ी भारत को मिल जाए. विराट कोहली के कंधो पर कप्तानी के भार की बात चलने पर राजकुमार शर्मा कहते है कि जब-जब उन्हें दिल्ली की रणजी टीम की कप्तानी करने का अवसर मिला है तब-तब उन्होंने दिखाया है कि वह ज़िम्मेदारी निभा सकते है. राजकुमार शर्मा कहते हैं विराट कप्तानी की क्षमता का परिचय आईपीएल-6 में दिखा चुके है जब वह रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर के कप्तान थे. इतना ही नहीं वह अपनी कप्तानी में भारत को अंडर-19 का विश्व कप भी जिता चुके है लिहाज़ा चयनकर्ताओं ने उन पर भरोसा दिखा कर ठीक किया है. |
| DATE: 2013-07-22 |
| LABEL: sports |
| [895] TITLE: ऐशेज़: इंग्लैंड ने दूसरे टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया को रौंदा |
| CONTENT: इंग्लैंड ने ऑस्ट्रेलिया को दूसरे क्रिकेट टेस्ट मैच में 347 रन से हराकर ऐशेज़ शृंखला में 2-0 से बढ़त ले ली है. लॉर्ड्स में खेले जा रहे टेस्ट में रविवार को चौथे दिन जीत के लिए 583 रन के लक्ष्य का पीछा कर रही ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी 235 रन पर सिमट गई. इससे पहले इंग्लैंड ने अपनी दूसरी पारी 349 रन पर घोषित कर दी थी. उसके सात विकेट आउट हुए थे. मेज़बान टीम के लिए युवा क्रिकेटर जो रूट ने सबसे ज़्यादा 180 रन बनाए. रनों के आधार पर ये इंग्लैंड की तीसरी सबसे बड़ी जीत है. चौथे दिन के खेल की शुरुआत इंग्लैंड ने दूसरी पारी में पांच विकेट के नुक़सान पर 333 रन से की. उस वक्त जो रूट 178 और जॉनी बेयरस्टो एक रन पर थे. पहली पारी के आधार पर इंग्लैंड के पास 466 रन की बढ़त थी और वो पारी घोषित कर सकता था. लेकिन जो रूट को डबल सेंचुरी बनाने का मौका देने की मंशा से टीम ने बल्लेबाज़ी जारी रखने का फ़ैसला किया. लेकिन रूट दोहरे शतक से चूक गए और रयान हैरिस की गेंद पर स्टीवन स्मिथ ने उनका कैच लपक कर उन्हें पवेलियन वापस लौटा दिया. इससे पहले हैरिस ने बेयरस्टो का विकेट भी लिया. इंग्लैंड ने 349 रन पर दूसरी पारी घोषित कर दी. जीत के लिए ऑस्ट्रेलिया के सामने 583 रन का विशालकाय लक्ष्य था. पहली पारी की ही तरह ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी की शुरुआत भी अच्छी नहीं रही. 36 के कुल स्कोर पर उसके तीन बल्लेबाज़ आउट हो चुके थे. कप्तान माइकल क्लार्क और उस्मान ख्वाजा ने मिलकर पारी को कुछ हद तक संभाला और चौथे विकेट के लिए 98 रन जोड़े. क्लार्क ने 51 और ख्वाजा ने 54 रन बनाए. लेकिन माइकल क्लार्क के आउट होने के बाद ऑस्ट्रेलिया के अगले पांच विकेट जल्दी-जल्दी आउट हो गए. उस समय स्कोर नौ विकेट के नुक्सान पर 192 रन था. रयान हैरिस और डेरेन पैटिंसन ने जीत के लिए इंग्लैंड को थोड़ा और इंतज़ार कराया. दोंनो ने आखिरी विकेट के लिए 43 जोड़े लेकिन ग्रैम स्वान की गेंद पर पैटिंसन के पगबाधा आउट होते ही इंग्लैंड ने मौजूदा शृंखला में लगातार दूसरी जीत दर्ज कर ली. इंग्लैंड के लिए सबसे सफल गेंदबाज़ ग्रैम स्वान रहे जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी में चार विकेट लिए. जेम्स एंडरसन टिम ब्रेसनैन और जो रूट को दो-दो विकेट मिले. जो रूट मैन ऑफ़ द मैच बने. इंग्लैंड ने पहली पारी में 361 और ऑस्ट्रेलिया ने 128 रन बनाए थे. ऐशज़ शृंखला का तीसरा टेस्ट एक अगस्त से ओल्ड ट्रैफ़र्ड में शुरू होगा. |
| DATE: 2013-07-22 |
| LABEL: sports |
| [896] TITLE: क्या हॉकी का जादूगर बन पाएगा भारत रत्न? |
| CONTENT: भारत के खेल मंत्रालय ने हॉकी का जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद का नाम देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न के पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया है. इस ख़बर पर मेजर ध्यानचंद के बेटे पूर्व ओलम्पिक खिलाड़ी अशोक कुमार ने ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहा यह सही मायने में हमारे परिवार के लिए अच्छी ख़बर है लेकिन यह हॉकी के उन दीवानों के लिए भी शुभ समाचार है जो ध्यानचंद को हॉकी के जादूगर के तौर पर जानते हैं. यह पुरस्कार उन लोगो को समर्पित है जिन्होंने हॉकी से लगाव रखा. अशोक कुमार ने साल 1975 में विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट के फ़ाइनल में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ एकमात्र तथा निर्णायक गोल दाग़ कर भारत को विजेता बनाया था. उन्हें इस बात की बेहद ख़ुशी है कि आख़िरकार लम्बे समय बाद ही सही भारत के खेल मंत्रालय ने ध्यानचंद के नाम को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान के लिए प्रस्तावित किया है. पिछले कुछ सालों से खेल जगत में इस बात को लेकर बहस चल रही थी कि खेलों के क्षेत्र में भारत के लिए उल्लेखनीय प्रदर्शन के लिए सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न के लिए पहला नाम किसका हो इससे पहले साल 2011 में सांसदों ने मेजर ध्यानचंद के नाम को खेल रत्न के लिए प्रस्तावित किया था लेकिन तब सरकार ने मंज़ूरी नही दी थी. भारत के खेल प्रेमियों में कई बार इस बात को लेकर दिलचस्प चर्चा रही है कि भारत रत्न ध्यानचंद सचिन तेंदुलकर पर्वतारोही तेनसिंह नोर्गे और बीजिंग ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले अभिनव बिंद्रा को मिले. लेकिन आख़िरकार मेजर ध्यानचंद का नाम प्रस्तावित हुआ. उल्लेखनीय है कि मेजर ध्यानचंद ने 1928 में एम्सटर्डम 1932 में लॉस एंजीलिस और 1936 में बर्लिन में हुए ओलम्पिक खेलों में भारत को स्वर्ण पदक जीताने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. बर्लिन ओलम्पिक में तो जर्मनी के शासक हिटलर ने ध्यानचंद के खेल से खुश होकर उन्हें अपनी सेना में सर्वोच्च पद देने की पेशकश की थी जिसे उन्होंने यह कहकर विनम्रता से ठुकरा दिया कि मुझे मेरा देश भारत सबसे अच्छा लगता है. मुझे कुछ नही चाहिए. इसके अलावा बर्लिन ही वह जगह थी जहाँ ओलम्पिक के दौरान कई बार उनकी हॉकी स्टिक यह कहकर बदली गई कि कहीं इसमें चुम्बक तो नही लगी है. वैसे तो मेजर ध्यानचंद के बारे में अनेक क़िस्से मशहूर हैं लेकिन उनके बारे में बेहद सम्मान के साथ पुराने हॉकी खिलाड़ी कहते हैं कि ग़ुलाम भारत में कभी उसकी पहचान हॉकी गांधी और ध्यानचंद की वजह से ही थी. अगर खेलों के इतिहास में सबसे मशहूर खिलाड़ियों की बात की जाए तो फ़ुटबॉल में पेले और मुक्केबाज़ी में मोहम्मद अली की तरह ही उनका नाम सम्मान से लिया जाता था. हालांकि मेजर ध्यानचंद हमारे बीच नही हैं लेकिन अगर मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न पुरस्कार मिल जाता हो तो फिर दूसरे खिलाड़ियों को भी उनसे प्रेरणा मिलेगी. |
| DATE: 2013-07-20 |
| LABEL: sports |
| [897] TITLE: क्या 60 हज़ार रुपए में खरीदेंगे फुटबॉल मैच का टिकट? |
| CONTENT: अगले साल ब्राज़ील में होने वाले फ़ुटबॉल विश्व कप में अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए टिकट के दामों की घोषणा हो गई है. ग्रुप मैचों में टिकट 90 डॉलर या लगभग 5350 रुपए से शुरु होंगे. फ़ुटबॉल का प्रबंधन करने वाली संस्था फीफ़ा ने कहा है कि 13 जुलाई को होने वाले फ़ाइनल मैच का सबसे सस्ता टिकट 440 डॉलर या 26130 रुपए और सबसे मंहगा टिकट 990 डॉलर या लगभग 58800 रुपए का होगा. विश्व कप अगले साल 12 जून से शुरू होगा और पहला मैच साओ पाउलो में खेला जाएगा. टिकटों की बिक्री इस साल 20 अगस्त से शुरू हो जाएगी. फ़ुटबॉल प्रेमी 10 अक्तूबर तक टिकट के लिए आवेदन दे सकते हैं और फिर मतदान के ज़रिए ये तय किया जाएगा कि किसे टिकट बेचा जाए. इसके बाद ही पहले आओ पहले पाओ के आधार पर टिकटों की बिक्री होगी. कुल मिलाकर फ़ैन्स के लिए 30 लाख टिकट उपलब्ध होंगे. ब्राज़ील के नागरिकों के लिए सबसे सस्ते टिकटों की कीमत मात्र 15 डॉलर से शुरु होगी. लेकिन ये टिकट सिर्फ़ छात्रों 60 साल से बड़ी उम्र के लोगों और सरकारी सहायता पाने वाले लोगों के लिए होंगे. बाकी ब्राज़ीलियाई लोगों को न्यूनतम 30 डॉलर खर्च करना पड़ेगा. दक्षिण अफ़्रीका में साल 2010 विश्व कप में सबसे सस्ता टिकट 20 डॉलर का था. वो टिकट भी विशेष वर्ग के स्थानीय लोगों के लिए शुरुआती ग्रुप स्टेज के मैचों के थे. इससे पहले फ़ीफ़ा ने कहा था कि ब्राज़ील में विश्व कप के टिकट अब तक के सबसे सस्ते टिकट होंगे. फ़ीफ़ा की टिकट वेबसाइट में स्टेडियम का नक्शा भी बना होगा जिसमें अलग-अलग क़ीमत वाले टिकटों की जगह दिखाई गई होगी. संस्था के मार्केटिंग निदेशक थियरे वेल का कहना था कि इस तरह से दर्शकों को पहले से ही पता होगा कि वो कहां बैठेंगे. दर्शक हर मैच के लिए अधिकतम चार टिकट और ज़्यादा से ज़्यादा सात मैचों के लिए टिकट ख़रीद सकते हैं. थियरे वेल ने ये भी बताया जो लोग टिकट ख़रीद कर किसी वजह से मैच के लिए नहीं आ सकते ऐसे में फ़ीफ़ा ने टिकटों की दोबारा बिक्री का भी इंतज़ाम किया है. ब्राज़ील के लोगों के लिए कम से कम चार लाख टिकट अलग से रखे गए हैं. इनमें से 50 हज़ार टिकट मैदानों का निर्माण कार्य करने वाले लोगों के लिए होंगे. |
| DATE: 2013-07-20 |
| LABEL: sports |
| [898] TITLE: नाकामियों से बहुत सीखा है मैंनेः शिखर धवन |
| CONTENT: दुख तो ज़रूर होता है कि कभी चयन नही होता तो कभी टीम में जगह नही मिलती लेकिन मैं इससे निराश नही हूँ क्योंकि इन्हीं बातों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है. मैं बहुत खुश हूं. अपनी ग़लतियों से सीख-सीख कर परिपक्व हुआ हूँ. ये शब्द थे भारत के कामयाब सलामी बल्लेबाज़ और भरोसे की नई पहचान बन चुके शिखर धवन के कुछ समय पहले जब वे भारतीय टीम का हिस्सा नहीं बने थे. मौक़ा था दिल्ली के फिरोज़शाह कोटला मैदान में जनवरी की कड़कती ठंड में इंग्लैंड टीम के ख़िलाफ़ डे-नाइट दोस्ताना मैच. इस मैच में शिखर धवन ने धुंआधार बल्लेबाज़ी करते हुए कप्तान की पारी खेली और 110 रन बनाकर दिल्ली की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जबकि दिल्ली के सामने जीत के लिए 295 रनो का विशाल लक्ष्य था. शिखर धवन की इस पारी ने क्रिकेट प्रेमियों के मन में यह उम्मीद पैदा कर दी थी कि हो ना हो अब भारतीय टीम में उन्हें आने से रोक पाना चयनकर्ताओं के लिए बेहद मुश्किल होगा. भले ही क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की पाबंदियों के कारण अब खिलाड़ियों से बातचीत करना कठिन होता है लेकिन जब भी शिखर धवन से बातचीत की तो उनके आत्मविश्वास में कभी कोई कमी महसूस नही की. आख़िरकार धवन का धैर्य रंग लाया और मौक़ा मिलते ही उन्होने शिखर को चूम लिया. इंग्लैंड के ख़िलाफ़ तो शिखर को मौक़ा नही मिला लेकिन भारत दौरे पर आई ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध उन्हे तीसरे टेस्ट मैच में टीम में जगह मिली. इस मैच में उन्होने 187 रन बनाते हुए पहले ही टेस्ट में सर्वाधिक रन बनाने का भारतीय रिकार्ड भी बना दिया. इसी टेस्ट मैच के दौरान उनके हाथ में चोट लगी और वह दिल्ली में खेला गया अगला टेस्ट मैच नही खेल सके. इसके बाद उनका बल्ला इंग्लैंड में आख़िरी बार आयोजित की गई आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफ़ी में भी जमकर बरसा और उन्होने दक्षिण अफ़्रीक़ा के ख़िलाफ़ 114 वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़ नाबाद 102 पाकिस्तान के ख़िलाफ़ 48 श्रीलंका के ख़िलाफ़ सेमीफाइनल में 68 और फ़ाइनल में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ 31 रन बनाकर चयनकर्ताओं के भरोसे को सही साबित किया. इसके बाद वेस्टइंडीज़ में खेली गई त्रिकोणीय एक दिवसीय सीरीज़ में भी उन्होंने पाँच मैचों में संतोषजनक प्रदर्शन करते हुए 135 रन बनाए. शिखर धवन हॉलाकि इससे पहले भारत के लिए पॉच एक दिवसीय मैच खेल चुके थे लेकिन इनमें याद रखने योग्य केवल एक पारी थी जब उन्होने पोर्ट ऑफ़ स्पेन में वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़ साल 2011 में 51 रन बनाए थे. शिखर बल्लेबाज़ी के अलावा अपने शरीर पर बने बड़े-बड़े टैटू और क़रीब-क़रीब 10 लाख रुपए से ज्यादा की अपनी पसंदीदा विदेशी मोटरसाइकिल के लिए भी जाने जाते हैं. यह बाइक फ़िल्म धूम में जॉन अब्राहम की भी विशेष पहचान थी. पिछले दिनो शतक बनाने के बाद अपनी मूँछों पर ताव देने के शिखर धवन का अलग ही तेवर सबके मन को भा गया. साथी खिलाड़ियों में वो प्यार से गब्बर के नाम से जाने जाते हैं. वैसे शिखर धवन की कामयाबी में उनके साथी खिला़ड़ी विरेन्दर सहवाग और मुंबई इंडियन्स के लिए आईपीएल में खेलने के दौरान सचिन तेंदुलकर की सलाह का बेहद योगदान रहा लेकिन उनके कोच मदन शर्मा को भी कम श्रेय नही जाता. मदन शर्मा शिखर के बारे में बताते हैं कि उन्हें अपनी माँ के हा़थ के बने दाल-चावल सबसे ज्यादा पसंद है. शिखर धवन फ़िलहाल बैंगलोर में टीम के ट्रेनिंग कैम्प में हैं और ज़िम्बाब्वे दौरे के लिए तैयारी कर रहे हैं. वहाँ भारतीय क्रिकेट टीम पाँच एक दिवसीय मैच खेलेगी. शिखर को इन दिनों मिल रही कामयाबी को देखकर यही कहा जा सकता है कि देर आए दुरुस्त आए क्योंकि वो उन खिलाड़ियों में शामिल हैं जो साल 2004 के अंडर-19 विश्व कप खेल चुके हैं. इसमें उन्होने सबसे ज्यादा 505 रन बनाए थे जिसमें तीन शतक भी शामिल थे. उम्मीद है कि आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफ़ी में गोल्डन बैट से सम्मानित होने वाले शिखर धवन अब लम्बे समय तक भारतीय क्रिकेट टीम में सलामी बल्लेबाज़ के रुप में एक छोर संभाले रखेंगे. |
| DATE: 2013-07-19 |
| LABEL: sports |
| [899] TITLE: जब क्रिकेटर ने विमान का दरवाज़ा खोलना चाहा |
| CONTENT: हवाई यात्रा के दौरान विमान का दरवाज़ा खोलने की कोशिश करने के लिए श्रीलंका के क्रिकेट बोर्ड ने एक युवा क्रिकेटर रमित रंबुकवेला पर जुर्माना लगाया है और चेतावनी दी है. ये वाकया तब हुआ जब श्रीलंका की ए टीम पिछले महीने वेस्टइंडीज़ के दौरे से वापस लौट रही थी. रंबुकवेला उस टीम के सदस्य थे और उन्होंने सेंट लूसिया से लंदन की उड़ान के दौरान ब्रिटिश एयरवेज़ के विमान में दरवाज़े को खींचा. कोलंबो में बीबीसी संवाददाता चार्ल्स हैविलैंड के मुताबिक 21 साल के रमित रंबुकवेला का कहना था कि उन्होंने ग़लती से केबिन दरवाज़े को शौचालय का दरवाज़ा समझ लिया. रंबुकवेला ने ये जताया कि ये ग़लती इसलिए हुई क्योंकि वह नींद में थे. लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक रंबुकवेला नशे में लग रहे थे और वह लगभग दो मिनट तक काफ़ी ज़ोर से दरवाज़ा खींचते रहे जब तक कि परिचालकों ने आकर उन्हें शांत नहीं किया. ब्रिटेन के डेली मेल अख़बार ने ब्रिटिश एयरवेज़ के कर्मचारियों के हवाले से कहा है कि हालांकि उड़ान के दौरान दरवाज़ा खोलना मुमकिन नहीं होता लेकिन एक प्रत्यक्षदर्शी ने उस घटना को काफ़ी डराने वाला बताया. रमित रंबुकवेला श्रीलंका के एक मंत्री और सरकार के प्रवक्ता केहेलिया रंबुकवेला के बेटे हैं. श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड द्वारा जारी एक वक्तव्य में कहा गया है कि बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने रंबुकवेला पर दौरे की कुल फीस का 50 प्रतिशत जुर्माना लगाया और उन्हें कड़ी चेतावनी दी. इस साल मार्च में बांग्लादेश के खिलाफ़ एक ट्वेन्टी-20 मैच के लिए राष्ट्रीय टीम में रमित रंबुकवेला के चयन की श्रीलंकाई मीडिया के कुछ वर्गों में निंदा हुई थी. कहा गया था कि उनका चयन राजनीतिक कारणों से हुआ है. लेकिन मुख्य चयनकर्ता पूर्व क्रिकेटर और सांसद सनत जयसूर्या ने इस फ़ैसला का ये कहते हुए बचाव किया था कि टीम में मध्यम क्रम के बल्लेबाज़ और ऑफ़ स्पिन गेंदबाज़ की ज़रूरत के चलते रंबुकवेला को चुना गया. अंत में रमित रंबुकवेला उस मैच में नहीं खेले थे. |
| DATE: 2013-07-19 |
| LABEL: sports |
| [900] TITLE: ऐशेज़ 2013: कड़े फ़ैसले लेने को तैयार इंग्लैंड |
| CONTENT: इंग्लैंड के कप्तान एलिएस्टर कुक ने कहा कि उनकी टीम ऐशेज़ सीरीज़ के दूसरे टेस्ट से ठीक पहले कड़े फ़ैसले ले सकती है. गुरूवार से इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ ऐशेज़ का दूसरा टेस्ट लॉर्ड्स में शुरू हो रहा है. ट्रैंटब्रिज में खेले गए बेहद रोमांचक पहले टेस्ट में मेज़बान इंग्लैंड ने 14 रनों से जीत हासिल की थी. दूसरे टेस्ट में तेज़ गेंदबाज़ स्टीवन फिन के टीम में जगह बनाने पर संशय है. पहले टेस्ट में फिन काफ़ी संघर्ष करते नज़र आए थे. उन्होंने दोनों पारियों में 25 ओवर्स किए थे और 117 रन देकर महज़ दो विकेट हासिल कर पाए थे. छह फ़ीट सात इंच लंबे फिन ख़ासतौर पर आख़िरी दिन बेहद ख़र्चीले साबित हुए थे. जब बेहद नज़दीकी मुक़ाबला चल रहा था तो ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों ने उनके दो ओवर्स में 24 रन ठोक डाले और इंग्लैंड हार के कगार पर पहुंच गया था. लेकिन बाद में तेज़ गेंदबाज़ जेम्स एंडरसन ने इंग्लैंड की वापसी करा दी. एलिस्टर कुक ने कहा आप वही टीम चुनते हो जिस पर आपको विश्वास हो कि वो मैच जीत सकती है. हालांकि लॉर्ड्स फिन का घरेलू मैदान है और इस पर उनका प्रदर्शन अब तक शानदार रहा है. लॉर्ड्स में स्टीवन फिन ने अब तक पांच टेस्ट में 20-65 के औसत से 29 विकेट हासिल किए. पहले टेस्ट के हीरो जेम्स एंडरसन के अनफिट होने की खबरों के बावजूद उनके टीम में रहने की पूरी उम्मीद है. एंडरसन ने ट्रैंटब्रिज टेस्ट में 10 विकेट लेकर इंग्लैंड को बेहद क़रीबी जीत दिलाई थी. उनकी फिटनेस के बारे में कुक ने बीबीसी रेडियो 5 से कहा एंडरसन मैच ख़त्म होने के बाद काफी थके हुए थे लेकिन वो अब बिलकुल ठीक हैं. हमारे पास शानदार मेडिकल टीम है जिसने कुक को पूरी तरह दुरुस्त कर दिया. एड़ी की चोट से जूझ रहे विकेटकीपर मैट प्रायर के भी लॉर्ड्स टेस्ट खेलने की पूरी संभावना है. वहीं टीम में अंदरूरनी तकरार की ख़बरों के बीच ऑस्ट्रेलिया की टीम भी लॉर्ड्स के लिए पूरी तरह तैयार है. दरअसल टीम में फूट की ख़बरें उस वक़्त ज़ोरों से उड़ीं जब पूर्व कोच मिकी आर्थर का एक कोर्ट को सौंपा गया गोपनीय दस्तावेज़ लीक हो गया. ऑस्ट्रेलिया के सेवन नेटवर्क ने दावा किया कि इस दस्तावेज़ में कप्तान माइकल क्लार्क और ऑल राउंडर शेन वॉटसन के बीच तकरार का उल्लेख था. बीबीसी रेडियो 5 से बात करते हुए ऑस्ट्रेलियाई कप्तान माइकल क्लार्क ने दावा किया कि उनकी टीम इ सारी रिपोर्ट्स से अप्रभावित है. क्लार्क ने कहा हमारी टीम बिलकुल सकारात्मक सोच के साथ मैदान में उतरने को तैयार है. टीम के अंदर ज़बरदस्त माहौल है. क्लार्क ने दावा किया कि उनकी टीम बीती बातों पर ध्यान देकर सिर्फ़ लॉर्ड्स टेस्ट पर फ़ोकस कर रही है. हमारा पूरा ध्यान इस टेस्ट मैच पर है. हमें भूतकाल की परवाह नहीं है. |
| DATE: 2013-07-18 |
| LABEL: sports |
| [901] TITLE: जीत के बाद भी राष्ट्रगान ना बजने का दुख: शिव थापा |
| CONTENT: एशियाई मुक्केबाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाले सबसे युवा भारतीय बॉक्सर हैं शिव थापा. उन्होंने 65 किलोग्राम वर्ग में ये उपलब्धि हासिल की. जीत के बाद जब बीबीसी ने शिव से मुलाक़ात की तो पाया की उनके चेहरे पर स्वर्ण पदक की चमक तो थी लेकिन साथ ही उनकी आँखों में एक दुःख भी था. शिव कहते हैं जब मैंने स्वर्ण पदक जीता तो सबसे पहले मेरे मन में आया कि जन गण मन बजता तो कितना अच्छा होता. लेकिन राष्ट्रगान नहीं बजा और मुझे इस बात का बहुत दुःख हुआ. उम्मीद करता हूं कि जल्द ही सब ठीक हो जाए. दरअसल विश्व मुक्केबाज़ी संघ ने भारतीय मुक्केबाज़ी संघ को निलंबित कर रखा है. आरोप है अपने पदाधिकारियों के चुनाव में धांधली का. इसी वजह से भारतीय मुक्केबाज़ो को अंतराष्ट्रीय मुक्केबाज़ी संघ के झंडे तले एशियाई मुक्केबाज़ी चैंपियनशिप में उतरना पडा. शिव ने स्वर्ण पदक की राह में पहले तो चीनी ताईपे और उसके बाद क्वार्टर फाइनल में कज़ाकिस्तान सेमीफाइनल में किर्गिस्तान और फिर फाइनल में जोर्डन के ओबादा अल्काबेह को हराया. अब शिव थापा का अगला लक्ष्य कज़ाखिस्तान के अलमाटी शहर में 11 से 27 अक्तूबर तक होने वाली विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतना है. शिव को उम्मीद है कि कम से कम इस प्रतियोगिता से पहले तो भारत अंतराष्ट्रीय ओलिंपिक संघ द्वारा लगाए गए तमाम तरह के प्रतिबंधो से आज़ाद हो जाएगा. और उन्हें के भारत के झंडे तले एक बार फिर अंतराष्ट्रीय मुक़ाबलो में उतरने की खुशी हासिल होगी. |
| DATE: 2013-07-16 |
| LABEL: sports |
| [902] TITLE: वनडे मैच के छह बेहतरीन गेंदबाज़ी प्रदर्शन |
| CONTENT: वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ शानदार प्रदर्शन करके अपनी टीम को जीत दिलाने वाले पाकिस्तान के शाहिद अफ़रीदी ने वनडे क्रिकेट में गेंदबाज़ी का दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. उन्होंने न सिर्फ़ बल्लेबाज़ी अच्छी की बल्कि गेंदबाज़ी में भी अपना कमाल दिखाया. आइए जानते हैं वनडे मैच में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले छह शीर्ष गेंदबाज़ कौन-कौन से हैं और भारत की ओर से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किसके नाम है. चमिंडा वास ने आठ दिसंबर 2001 को ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ कोलंबो में हुए मैच में 19 रन देकर आठ विकेट लिए थे. ये एक वनडे मैच में किसी गेंदबाज़ का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. चमिंडा वास ने आठ ओवर फेंके थे जिनमें से तीन मेडन थे. 14 जुलाई 2013 को पाकिस्तान और वेस्टइंडीज़ के बीच मुक़ाबला हुआ. ये मुक़ाबला टीम के ऑल राउंडर शाहिद अफ़रीदी के शानदार प्रदर्शन के लिए याद किया जाएगा. अफ़रीदी ने सिर्फ़ 12 रन देकर सात विकेट लिए. अफ़रीदी ने नौ ओवर किए और तीन मेडेन भी फेंके. विश्व कप 2003 में 27 फरवरी को ऑस्ट्रेलिया का एक मैच नामीबिया से भी हुआ था. उस साल की विश्व चैम्पियन टीम के सामने नामीबिया की क्या चलती. मैकग्रॉ उस समय अपने प्रदर्शन के बेहतरीन दौर में थे. उन्होंने सात ओवर में 15 रन देकर सात विकेट लिए थे. 2003 के विश्व कप के दौरान ही दो मार्च को इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की टीमें आमने-सामने थी. इस बार बारी थी एंडी बिकेल की जिन्होंने इंग्लिश बल्लेबज़ों की कमर तोड़ दी. दक्षिण अफ़्रीका के पोर्ट एलिज़ाबेथ में हुए इस मैच में बिकेल ने 20 रन देकर सात विकेट लिए थे. एक समय ऐसा था जब शारजाह में कई वनडे प्रतियोगिताओं का आयोजन होता था. 27 अक्तूबर 2000 को शारजाह में श्रीलंका और भारत का मुक़ाबला हुआ. इस मैच में मुथैया मुरलीधरन ने बेहतरीन गेंदबाज़ी की. उन्होंने 10 ओवर में 30 रन देकर सात विकेट लिए. 17 जून 2001 को लीड्स में पाकिस्तान और इंग्लैंड की टीमें आमने-सामने थी. उस समय वक़ार यूनुस की तेज़ गेंदबाज़ी का ख़ौफ़ हर टीम पर रहता था. वक़ार ने उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन किया और इंग्लैंड को काफ़ी परेशान किया. वक़ार ने 36 रन देकर सात विकेट लिए. इस सूची में अनिल कुंबले नौवें स्थान पर हैं. लेकिन यहाँ उनका ज़िक्र इसलिए है ताकि पता चले कि एक वनडे मैच में भारत की ओर से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का रिकॉर्ड किसके नाम है. ये रिकॉर्ड भारत के अनिल कुंबले के नाम है. कुंबले ने 1993 में कोलकाता में वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ मैच में 12 रन देकर छह विकेट लिए थे. |
| DATE: 2013-07-15 |
| LABEL: sports |
| [903] TITLE: महेंद्र सिंह धोनी के पास आखिर कौन सी जादू की छड़ी है? |
| CONTENT: पिछले दिनो इंग्लैंड में आखिरी बार आयोजित की गई आईसीसी चैम्पियंस ट्रॉफी और वेस्टइंडीज़ में खेली गई त्रिकोणीय एकदिवसीय क्रिकेट सीरीज़ जीतने के बाद भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्यों ने वतन वापस लौटना शुरू कर दिया है. ख़बर यह भी है कि भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी अभी इंग्लैंड में ही हैं और कुछ दिनों की छुट्टियाँ बिताकर वे स्वदेश लौटेगे. वैसे भी उन्हें छुट्टियाँ मनाने का पूरा हक़ है क्योंकि वह ज़िम्बाबवे का दौरा करने वाली भारतीय टीम में शामिल नहीं किए गए हैं. भारत जिम्बाबवे में पाँच एकदिवसीय क्रिकेट मैच खेलेगा जिसकी शुरूआत हरारे में 24 जुलाई को होने वाले पहले मैच से होगी जबकि सीरीज़ का पाँचवा और आखिरी एकदिवसीय मैच बुलावायो में तीन अगस्त को खेला जाएगा. इसी दौरान भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की चर्चा चारों तरफ है. कुछ समय पहले जब इंग्लैंड ने भारत को टेस्ट सीरीज़ में मात दी थी तब तमाम क्रिकेट पंडितो ने विकेट को लेकर उनकी ज़िद और मनमाने आधार पर लिए गऐ फ़ैसलों की जमकर आलोचना की थी. यहाँ तक कि उन्हें कप्तानी से हटाए जाने की मांग भी की गई लेकिन अब आखिरकार धोनी की कप्तानी में ऐसा क्या परिवर्तन आ गया कि सभी उनके मुरीद हो गए है धोनी ने चैम्पियंस ट्रॉफी और वेस्टइंडीज़ में क्या कुछ ख़ास किया जो उन्हे दूसरे कप्तानों से अलग करता है इस सवाल के जवाब में भारत के पूर्व फिरकी गेंदबाज मनिंदर सिंह कहते हैं धोनी भाग्य के तो धनी हैं ही लेकिन उनमें गुण भी बहुत है. वो बेफ़िक्र होकर बल्लेबाज़ी विकेटकीपिंग और कप्तानी भी करते हैं और कुछ ऐसे फ़ैसले लेते है जो लोगो को चौंकाते है. उनकी सोच है कि जब तक मैं सौ प्रतिशत दे रहा हूँ तब तक चाहे कोई भी मेरी कितनी ही आलोचना करे मुझे कोई डर नही है. जब किसी खिलाड़ी का रवैया इस तरह का हो जाए तो परिणाम भी सकारात्मक या फिर मनमुताबिक़ आने शुरु हो जाते है. उन्होंने कहा वही कुछ हो रहा है और सबसे अच्छी बात है कि युवा खिलाड़ियों को जिस अंदाज़ में वह साथ लेकर चलते है या मैदान में उनका उपयोग करते हैं. वह एक क़ाबिले तारीफ बात है क्योंकि युवा खिलाड़ियों को एक ऐसा कप्तान चाहिए जो उन पर भरोसा कर सके उन पर दबाव न आने दे और जब कप्तान निडर होगा तो टीम भी वैसी ही होगी जैसी इस समय भारतीय टीम दिख रही है. इसके अलावा जब भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट मैचों में हार रही थी तब उनकी उंगलियों में चोट थी. ऐसे में कोई और होता तो शायद वह आराम का बहाना लेकर टीम से बाहर बैठ जाता. अभी पिछले दिनों वेस्टइंडीज़ में वो चोटिल हो गए थे लेकिन उसके बाद फ़ाइनल खेल कर अपने दम पर उन्होंने भारत को जिताया. सबसे बडी बात ये है कि पहले मैच में घायल होने के बाद भी वो वेस्टइंडीज़ में ही टिके रहे जबकि उनकी जगह अंबाती रायडू को वहाँ भेजा जा चुका था. जब कोई हार या जीत की परवाह किये बिना हर परिस्थिति का सामना करता है तो फिर ऊपर वाला भी उस पर मेहरबान होना शुरू हो जाता है. वहीं दूसरी तरफ भारत के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ अतुल वासन कहते हैं इन दिनो धोनी ने अपने खेल और कप्तानी में निरंतरता दिखाई है. पहले तो ऑस्ट्रेलिया को टेस्ट सीरीज़ में भारत में ही मात दी. उसके बाद चैम्पियंस ट्रॉफी में दुनिया की बडी-बडी टीमों को हराया. हालांकि इंग्लैंड पहुंचने से पहले कोई भारतीय टीम को भाव नही दे रहा था फिर वेस्टइंडीज़ में त्रिकोणीय सीरीज़ में जो कुछ उन्होने किया वह सभी ने देखा ही है. उन्होंने कहा इस समय भारतीय क्रिकेट टीम का अच्छा समय चल रहा है लेकिन पूरे विश्व में हम सबसे अच्छे और बेहतर है अभी कहना जल्दबाज़ी होगी. भारतीय क्रिकेट टीम को अभी दक्षिण अफ्रीका का दौरा करना है जहॉ दूध का दूध और पानी का पानी होगा लेकिन फ़िलहाल तो धोनी का कोई जवाब नही है. |
| DATE: 2013-07-15 |
| LABEL: sports |
| [904] TITLE: ओलंपिक धावक गे और पावेल डोप टेस्ट में फेल |
| CONTENT: दुनिया के सबसे तेज़ धावकों में शामिल अमरीका के टायसन गे और जमैका के असाफ़ा पावेल डोप टेस्ट में प्रतिबंधित पदार्थ के लिए पॉज़िटिव पाए गए हैं. टायसन गे 100 मीटर दौड़ में दुनिया के दूसरे सबसे तेज़ धावक हैं. उन्होंने कहा है कि वे अगले महीने मॉस्को में होने वाली एथलेटिक्स की विश्व चैंपियनशिप से हट रहे हैं. दूसरी ओर 100 मीटर में पूर्व विश्व रिकॉर्ड धारक असाफ़ा पावेल ने जानबूझ कर नियम तोड़ने वाली दवाओं के सेवन से इंकार किया है. टायसन गे को अमरीका की एंटी डोपिंग एजेंसी ने शुक्रवार को सूचित किया कि मई में लिया गया उनका ए नमूना मादक द्रव्यों के लिए पॉज़िटिव आया है. ये नमूना किसी प्रतियोगिता के दौरान नहीं लिया गया था. वहीं असाफ़ा पावेल इस साल जून में जमैका में प्रतियोगिता के दौरान एक प्रतिबंधित दवाई के लिए पॉज़िटिव पाए गए. जमैका के एक और खिलाड़ी शिरॉन सिंपसन भी ड्रग टेस्ट में फेल हो गए. सिंपसन पिछले साल लंदन ओलंपिक में 4x400 मीटर रेस में रजत पदक जीतने वाली जमैका की टीम का हिस्सा थे. उनके और पावेल दोंनो के ही नमूनों में ऑक्सीलोफ़्रीन पाया गया. एक महीने पहले ही जमैका की एक और खिलाड़ी ओलंपिक चैंपियन वेरोनिका कैंपबैल-ब्राउन के नमूने में एक प्रतिबंधित डायूरेटिक पाया गया था. साल 2008 में जमैका के ही यूसेन बोल्ट के 100 मीटर दौड़ में नया रिकॉर्ड बनाने से पहले ये रिकॉर्ड असाफ़ा पावेल के नाम था. वे आज भी इस दूरी में दुनिया के चार सबसे तेज़ धावकों में शुमार हैं. वे 2008 बीजिंग ओलंपिक में 400 मीटर रीले रेस का स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा थे. इस साल उन्होंने 100 मीटर रेस में 9-88 सेकंड का समय निकाला लेकिन वे अगले महीने होने वाली विश्व चैंपियनशिप के लिए जमैका की टीम में शामिल होने में असफल रहे. एक बयान में पावेल ने कहा मैं अपने परिवार दोस्तों और ख़ासकर दुनिया भर में अपने फैन्स से साफ़ कहना चाहता हूं कि मैं कभी भी जानबूझ कर प्रतिबंधित पदार्थ या सप्लीमेंट्स नहीं लिए हैं. मैंने न ही आज और न ही इससे पहले कभी बेईमानी की है. साल 2013 के दुनिया के सबसे तेज़ इंसान टायसन गे अपने बी नमूने के नतीजों का इंतज़ार कर रहे हैं. लेकिन उन्होंने विश्व चैंपियनशिप से अपना नाम वापस ले लिया है. गे का कहना था मैंने किसी पर विश्वास किया और उसने मुझे धोखा दिया. मुझे पता है कि क्या हुआ लेकिन मैं फिलहाल उसके बारे में बात नहीं कर सकता. उन्होंने आगे कहा मैं उम्मीद करता हूं कि मैं भविष्य में फिर से दौड़ सकूंगा लेकिन मुझे जो भी सज़ा मिलेगी मैं उसे स्वीकार करूंगा. टायसन गे के वक्तव्य पर प्रतिक्रिया देते हुए अमरीकी डोपिंग रोधी संस्था यूएसएडीए द्वारा जारी वक्तव्य में कहा गया है जिस तरह से टायसन गे ने इस स्थिति को संभाला है और अपने टेस्ट के नतीजों की पूरी तरह जांच होने तक खुद प्रतियोगिता से हटने के फैसला किया है हम उसकी कद्र करते हैं. साल 2011 में एक ऑपरेशन के बाद टायसन गे लगभग एक साल तक नहीं दौड़े थे. लेकिन इस साल अब तक उनका प्रर्दशन शानदार रहा है. मई में जमैका इंविटेशनल एथलेटिक्स प्रतियोगिता में उन्होंने 100 मीटर रेस 9-86 सेकंड में जीती और उसके अगले महीने अमरीका के विश्व चैंपियनशिप ट्रायल्स में उन्होंने 9-75 सेकंड का समय निकाला. इसके बाद लॉसेन में डायमंड लीग प्रतियोगिता में उन्होंने 100 मीटर रेस 9-79 सेकंड में जीती. |
| DATE: 2013-07-15 |
| LABEL: sports |
| [905] TITLE: मैच जिताने में धुरंधर महेंद्र सिंह धोनी |
| CONTENT: धोनी ने 2011 के विश्वकप में भी भारत को मुश्किल स्थिति में जीत दिलाई थी. महेंद्र सिंह धोनी हारे हुए मैच को जिताने वाले सबसे उम्दा खिलाड़ियों में गिने जाने लगे हैं. इस मामले में उनकी तुलना आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों माइकल बेवन और एडम गिलक्रिस्ट से की जा सकती है. धोनी निश्चित ही क्रिकेट इतिहास के सबसे बड़े फ़िनिशरों में गिने जाएँगे. फ़िनिशर यानी मैच को विपरीत परिस्थितियों से निकालकर अपनी टीम के पक्ष में अपने दम पर ले जाने वाला खिलाड़ी और धोनी से बेहतर फ़िलहाल कौन है. 2011 के विश्व कप का फाइनल हर भारतीय क्रिकेट प्रशंसक को याद होगा. वहाँ भी धोनी ने ऐसे ही मुश्किल मौक़े पर मैच जिताने वाली पारी खेली थी. वानखेड़े स्टेडियम में धोनी का वो शानदार छक्का लोगों के जेहन में आज भी बसा हुआ है. धोनी खेल को खेल की तरह लेते हैं. धोनी जैसे खिलाड़ी किसी मैच को जीवन-मरण का सवाल नहीं बनाते. ऐसे में उनके ऊपर दबाव कम होता है. उन्हें यह एहसास रहता है कि इस अकेले मैच के साथ ही उनकी दुनिया ख़त्म नहीं हो जाएगी लेकिन उन्हें यह एहसास जरूर रहता होगा कि यह उनकी मानसिक दृढ़ता और प्रतिभा की परीक्षा की तरह है. ज़्यादातर बड़े अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दबाव को एक अवसर के रूप में देखते हैं. उन्हें लगता है कि यही मौका है कि जब वे अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर सकते हैं. जब सौरभ गांगुली ने अप्रैल 2005 में विशाखापट्टनम में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मैच में धोनी को अचानक से नंबर तीन पर उतारा तो वह टीम के लिए नए खिलाड़ी थे. धोनी ने ख़ुद भी कहा था उस मैच में जब सौरभ ने उन्हें तीसरे नंबर पर बल्लेबाज़ी करने के लिए जाने के लिए कहा तो उन्हें यक़ीन ही नहीं हुआ. धोनी ने उस मैच में 148 रन बनाए थे. मुझे लगता है कि उस मैच ने धोनी को मैच जिताऊ खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया. जब आपको सफलता मिल रही होती है आप जो करते हैं उसमें सफलता मिलती जाती है आप जो करने जा रहे हैं यदि आप वैसा ही प्रदर्शन पहले ही कर चुके होते हैं तो आपको लगता है कि मैं एक बार फिर से कर सकता हूँ. लेकिन जब आप विफल होने लगते हैं तो वापसी करने में आपकी असल परीक्षा होती है. एकदिवसीय मैचों में धोनी को अभी विफलता का सामना नहीं करना पड़ा है. टेस्ट मैच में उन्होंने वापसी करके दिखाया है. इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के टेस्ट दौरे में उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था. उस समय उनकी कप्तानी की भी काफ़ी आलोचना हुई थी लेकिन जब उसके बाद ऑस्ट्रेलियाई टीम भारत आई तो धोनी ने टेस्ट मैच में जबरदस्त वापसी की थी. अब तो धोनी का स्वर्णिम काल चल रहा है. अगर धोनी का बुरा दौर आया और फिर वे उससे निकलकर वापसी कर लेते हैं तो वह दुनिया के महान खिलाड़ियों में शामिल हो जाएँगे. |
| DATE: 2013-07-12 |
| LABEL: sports |
| [906] TITLE: धोनी का एक और धमाका, भारत की ख़िताबी जीत |
| CONTENT: भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी त्रिकोणीय क्रिकेट शृंखला के फ़ाइनल में लौटे और कुछ इस अंदाज़ में लौटे कि बस छा गए. श्रीलंका के 201 रनों का पीछा करते हुए भारतीय टीम ने उतार-चढ़ाव भरे मैच में अंतिम ओवर में दो गेंदें बाक़ी रहते जीत हासिल की. भारत के लिए लक्ष्य बहुत बड़ा नहीं था मगर एक समय 167 रनों पर आठ विकेट गिर चुके थे और वहाँ से धोनी ने संयम रखते हुए टीम को इस जीत तक पहुँचाया. मैच का सबसे रोमांचक मौक़ा रहा अंतिम ओवर जबकि भारत को जीत के लिए 15 रनों की ज़रूरत थी और सिर्फ़ एक विकेट बचा था. क्रीज़ पर थे धोनी और इशांत शर्मा. गेंद थी शमिंडा एरेंगा के हाथों में और सामने थे भारतीय कप्तान. एरेंगा ने पहली गेंद ऑफ़ साइड पर विकेट से कुछ दूर फेंकी धोनी ने बल्ला काफ़ी ज़ोर से घुमाया मगर गेंद और बल्ले का कोई मिलन नहीं हो सका. इस तरह अब भारत को पाँच गेंदों पर 15 रन चाहिए थे. भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों और ड्रेसिंग रूम में बैठे खिलाड़ियों के चेहरे पर तनाव साफ़ दिख रहा था. एरेंगा ने अगली गेंद विकेट के पास डाली और इसके पहले कि वह कुछ समझ पाते धोनी ने बेहद ज़ोरदार छक्का जड़ दिया. छक्का इतना दमदार था कि गेंद बोलिंग एंड पर कमेंटेटर बॉक्स की छत तक जा पहुँची. धोनी का आत्मविश्वास चेहरे पर साफ़ दमक रहा था और लोग अब तक सीट से खड़े हो चुके थे. भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों को लग रहा था कि दो और ऐसे शॉट्स और टूर्नामेंट उनकी झोली में जबकि श्रीलंकाई क्रिकेट प्रशंसकों के हिसाब से एक विकेट और ख़िताब उनके पास. छक्का लगने के बाद कप्तान एंजेलो मैथ्यूज़ और विकेट कीपर कुमार संगकारा ने एरेंगा से बात की उन्हें सांत्वना भी दी. लगा कि अगली गेंद में एरेंगा जान उड़ेलने जा रहे हैं. मगर प्वॉइंट के ऊपर से घुमाकर धोनी ने अगली गेंद पर चौका लगा दिया. अब बची थीं तीन गेंदें और जीत के लिए चाहिए थे पाँच रन. संतोष रखने वाले भारतीय प्रशंसक यही चाह रहे थे कि बस एक चौका लग जाए तो कम से कम स्कोर तो बराबर हो फिर एक रन तो आ ही जाएगा. मगर धोनी शायद इसमें यक़ीन नहीं रखते. एरेंगा की अगली गेंद को उन्होंने एक्स्ट्रा कवर के ऊपर से सीधे बाउंड्री लाइन के बाहर पहुँचा दिया. जब तक गेंद ने सीमा रेखा पार नहीं की धोनी थोड़ा झुककर घात लगाए शेर की तरह उस गेंद को देखते रहे और जैसे ही भारत की जीत हुई उनका चेहरा मुस्कुराहट से खिल उठा. दूसरे छोर पर किसी तरह उनका साथ दे रहे इशांत शर्मा ने धोनी को गोद में उठा लिया और इस तरह भारत ने रोमांचक अंतिम ओवर में जीत हासिल कर ली. धोनी 45 रन बनाकर नॉट आउट रहे. टॉस जीतने के बाद धोनी ने श्रीलंका को पहले बल्लेबाज़ी करने के लिए कहा. संगकारा ने लहिरू तिरिमाने के साथ मिलकर 122 रनों की साझेदारी की और टीम को एक अच्छे स्कोर की ओर बढ़ाने की कोशिश की थी. मगर एक बार जब 71 रनों के निजी स्कोर पर संगकारा आउट हुए तब 174 रनों पर चार विकेट के स्कोर से पूरी टीम अगले 27 रनों में ही निबट गई. तिरिमाने ने 46 रन जोड़े. रवींद्र जडेजा ने चार विकेट लिए. भारत की ओर से एक बार फिर रोहित शर्मा ने टिककर बल्लेबाज़ी और उन्होंने 58 रन जोड़े. उनके सलामी जोड़ीदार शिखर धवन पहले विकेट के रूप में आउट होकर पवेलियन लौटे थे. धवन ने 15 रन जोड़े और वह एरेंगा का शिकार हुए. इसके बाद धोनी की अनुपस्थिति में अब तक कप्तानी सँभाल रहे विराट कोहली ने दो रन बनाए थे कि उन्हें भी एरेंगा ने आउट कर दिया. दिनेश कार्तिक 23 रन बनाकर रंगना हेरात का शिकार बने. हेरात ने इसके बाद रोहित शर्मा को पवेलियन पहुँचाया. फिर तेज़ी से रन बनाने की कोशिश में सुरेश रैना भी 32 रनों के निजी स्कोर पर आउट हो गए. जिस समय रैना का विकेट गिरा स्कोर था पाँच विकेट पर 145 रन. तब तक भारत के लिए जीत बेहद आसान लग रही थी. मगर पासा अचानक पलटा. हेरात ने जडेजा को महज़ पाँच रनों के स्कोर पर एलबीडब्ल्यू आउट किया और फिर अगली ही गेंद पर रविचंद्रन अश्विन भी एलबीडब्ल्यू ही आउट हुए. इसके बाद भुवनेश्वर कुमार के लिए लसित मलिंगा की गेंद समझना काफ़ी मुश्किल रहा और वह भी बिना खाता खोले वापस हो लिए. उस समय भारत का स्कोर आठ विकेट पर 167 रन था. विनय कुमार ने कुछ सँभलकर खेलने की कोशिश की हालाँकि विनय कुमार और इशांत शर्मा के दूसरे छोर पर रहते हुए धोनी ने स्ट्राइक अपने ही पास रखी और टीम को जीत के इस लक्ष्य तक पहुँचाया. जीत के बाद धोनी ने कहा मेरे सौभाग्य से मेरे पास अच्छा क्रिकेट सेंस है. अंतिम ओवर में विपक्षी गेंदबाज़ उतने अनुभवी नहीं थे मलिंगा की तरह. इसलिए मैंने सोचा कि मैं चांस लेकर देखता हूँ. मैंने उस ओवर के लिए भारी बल्ला लिया और तेज़ी से रन बनाने के लिए वह बिल्कुल सही रहा. धोनी को मैन ऑफ़ द मैच जबकि भुवनेश्वर कुमार को मैन ऑफ़ द सिरीज़ का ख़िताब दिया गया. |
| DATE: 2013-07-12 |
| LABEL: sports |
| [907] TITLE: कैसी थी ऑस्ट्रेलिया की पहली क्रिकेट टीम? |
| CONTENT: ट्रेंट ब्रिज में बुधवार से शुरू हो रहे पहले ऐशेज टेस्ट की तैयारी के लिए ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के क्रिकेटरों को अच्छी ट्रेनिंग और फिजियोथेरेपी से लेकर ऐशो आराम की सारी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं. लेकिन इंग्लैंड का दौरा करने वाली ऑस्ट्रेलिया की पहली टीम की स्थिति इससे पूरी तरह अलग थी. माइकल क्लार्क और उनकी टीम ऐशेज के लिए अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में लगे हैं तो क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया भी प्रतिष्ठित ऐशेज़ कप को फिर से हासिल करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहता है. ऑस्ट्रेलियाई टीम पहला ऐशेज टेस्ट शुरू होने से क़रीब सात हफ्ते पहले इंग्लैंड पहुंच गई थी. इस दौरे का कार्यक्रम इस तरह से बनाया गया है कि हर मैच शुरू होने से पहले खिलाडी की फिटनेस का स्तर बेहतर हो और मैच के बाद वो फिर से तरोताज़ा हो सकें. लेकिन इंग्लैंड का दौरा करने वाली पहली ऑस्ट्रेलियाई टीम की परिस्थितियां पूरी तरह भिन्न थीं. साल 1868 में इंग्लैंड से ऑस्ट्रेलिया गए पूर्व प्रथम श्रेणी क्रिकेटर चार्ल्स लॉरेंस विक्टोरिया से 13 खिलाड़ियों की टीम लेकर ब्रिटेन पहुंचे. इस टीम में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी शामिल थे. लॉरेंस का मकसद 1859 में आई चार्ल्स डार्विन की किताब ऑन द ऑरिजिन ऑफ़ स्पिसीज़ में उल्लेखित आकर्षक नस्लों से लोगों में पैदा हुई जिज्ञासा को भुनाना था. विक्टोरिया में मूल निवासियों के संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्था ने इस दौरे का कड़ा विरोध किया था. संस्था को डर था कि ये खिलाड़ी इंग्लैंड के विपरीत मौसम के अनुरूप खुद को नहीं ढाल पाएंगे. लेकिन इस दौरान इंग्लैंड में अच्छी गर्मी पड़ी और ये दौरा अक्तूबर तक चला. इससे एक साल पहले ही सिडनी दौरे के दौरान और उसके तुरंत बाद चार खिलाड़ियों की मौत ने भी चिंता को बढ़ा दिया था. इनमें से कम से कम दो खिलाड़ियों की मौत निमोनिया से हुई थी. इस कारण सिडनी दौरा बीच में ही रद्द करना पड़ा था. यही कारण है कि लॉरेंस छिपाकर खिलाड़ियों को विक्टोरिया से सिडनी लाए. फिर उन्हें एक ऐसे जहाज में सवार किया गया जिस पर ऊन लदा हुआ था. ये जहाज आठ फरवरी 1868 को ब्रिटेन के लिए रवाना हुआ. इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया के पूर्व टेस्ट क्रिकेटर और उस दौरे पर लॉर्ड्स ड्रीमिंग नाम की किताब लिखने वाले एशले मैलेट का मानना है कि खिलाड़ियों के साथ जबरदस्ती नहीं की गई थी. उन्होंने कहा खिलाड़ियों को ब्रिटेन में जो सम्मान मिला उससे वे खुश हुए होंगे. ऑस्ट्रेलिया में उस समय मूल निवासियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था. नस्लवाद चरम पर था. तीन महीने से अधिक समय समुद्र में गुजारने के बाद टीम आखिर 13 मई को ग्रेवसैंड पहुंची. ये अवधि 2013 के पूरी ऐशेज दौरे से अधिक थी. ब्रिटेन के लोगों के लिए इन खिलाड़ियों का नाम पुकारना आसान नहीं था और यही वजह थी कि हर खिलाड़ी को सहूलियत वाले नाम दिए गए थे. टाउन मॉलिंग में इन खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया. अगले दिन स्पोर्टिंग लाइफ ने लिखा इन खिलाड़ियों ने आलोचक दर्शकों की मंडली को संतुष्ट कर दिया. रिपोर्ट में कहा गया था वे एक अच्छे अभियान पर आए ऑस्ट्रेलिया के पहले मूल निवासी हैं लेकिन इसका ये मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि वे असभ्य हैं. ऑस्ट्रेलियाई टीम ने अपना पहला मैच 25 मई 1868 को सरे के ख़िलाफ़ ओवल में खेला था. पहले दिन के खेल को देखने 7000 दर्शक जुटे थे. ऑस्ट्रेलियाई टीम इस दौरे पर अपने पहले पांच मैच हार गई लेकिन कई खिलाड़ियों ने अपने खेल से विश्लेषकों को काफी प्रभावित किया. जॉनी मुलैग नैसर्गिक प्रतिभा के आलराउंडर थे तो जॉनी कजंस ख़तरनाक तेज़ गेंदबाज़. टीम के दूसरे सदस्य क्रिकेट में तो माहिर नहीं थे लेकिन उन्हें दूसरे तरीकों से अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला. अधिकांश मैचों में पहले दो दिन क्रिकेट खेली जाती थी और तीसरे दिन अन्य खेल होते थे. ब्रिटिश क्रिकेट जगत के कंजरवेटिव सदस्यों ने भी इस दौरे का विरोध किया लेकिन लॉरेंस इस टीम को लॉर्ड्स में खिलाने को बेकरार थे क्योंकि वे जानते थे कि एमसीसी की मंजूरी मिलने के बाद दूसरे क्लबों से भी उन्हें आकर्षक प्रस्ताव मिलने लगेंगे. एमसीसी के 1868 के ब्योरे के मुताबिक कमेटी लॉर्ड्स में किसी संभावित मैच के बाद मूल निवासियों के प्रदर्शन के पक्ष में नहीं थी. आखिरकार मैच पर सहमति बनी और 11-12 जून को मैच खेला गया. ऑस्ट्रेलियाई टीम मैच हार गई लेकिन उसने अपने खेल और व्यवहार से सबको प्रभावित किया. एमसीसी की आशंका के बावजूद दूसरे दिन के खेल की समाप्ति के बाद अन्य खेल आयोजित किए गए. इसके बाद एमसीसी कमेटी में तीखी नोकझोंक हुई. हालांकि कोषाध्यक्ष ने कहा कि अन्य खेलों के आयोजन से लोग संतुष्ट दिखाई दिए और अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो लोगों को निराशा होती. लॉरेंस का आकलन सही निकला और लॉर्ड्स के मैच की सफलता के बाद प्रस्तावों की झड़ी लग गई. लेकिन खिलाड़ियों को थकान से बचाने पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. देश के अलग-अलग हिस्सों में एक के बाद एक लगातार मैच आयोजित किए गए. टीम ने कुल 126 दिनों में से 99 दिन मैदान में गुजारे. मूल निवासियों में घर से दूर मरना अच्छा नहीं माना जाता है. मैलेट को संदेह था कि लॉरेंस ने किंग कोल की मौत के बारे में कुछ समय तक टीम को नहीं बताया था. उन्होंने कहा मूल निवासियों की संस्कृति में किसी के मरने पर उसके दोस्त और रिश्तेदार कई दिनों तक शोक मनाते हैं और इससे दौरे में व्यवधान पैदा हो सकता था. किंग कोल की मौत के बाद टीम के दो सदस्य जिम क्रो और सनडाउन भी बीमार हो गए और दौरा समाप्त होने से एक महीने पहले सितंबर में सिडनी लौट आए. इस दौरे में टीम ने 14 मैच जीते इतने ही हारे और 19 ड्रा खेले. मैलेट ने कहा कि आर्थिक रूप से ये दौरा सफल साबित हुआ और कुल 2176 पाउंड का मुनाफा हुआ. लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि ऑस्ट्रेलियाई टीम के किसी खिलाड़ी को कोई भुगतान किया गया. 1869 में मूल निवासियों के संरक्षण के लिए कानून बनाए जाने के बाद भविष्य में ऐसा कोई दौरा संभव नहीं हो पाया. 1988 में मूल निवासियों की एक टीम ने ब्रिटेन का दौरा किया. जैसन गिलेस्पी ऑस्ट्रेलिया की टेस्ट टीम में जगह पाने वाले पहले मूल निवासी थे. इस दौरे के बीच में एक दुखद घटना हो गई. टीम से सबसे शानदार क्षेत्ररक्षक किंग कोल लॉर्ड्स मैच के बाद बीमार पड़ गए. उनकी हालत तेज़ी से बिगड़ती गई और 24 जून 1868 को उनकी मौत हो गई. संभवतः उन्हें क्षय रोग और निमोनिया हुआ था. |
| DATE: 2013-07-10 |
| LABEL: sports |
| [908] TITLE: कैसे पहुँची भारतीय टीम फ़ाइनल में |
| CONTENT: वेस्टइंडीज़ में जब त्रिकोणीय प्रतियोगिता शुरू हुई तो भारतीय टीम का उत्साह देखने लायक था. टीम चैम्पियंस ट्रॉफ़ी जीतकर वेस्टइंडीज़ पहुँची थी. लेकिन एकाएक सब भारतीय टीम के ख़िलाफ़ जाने लगा और एक समय ऐसा लगा कि भारतीय टीम जल्द ही प्रतियोगिता से बाहर हो जाएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं और अब भारतीय टीम प्रतियोगिता के फ़ाइनल में है. आइए नज़र डालते हैं इस प्रतियोगिता में भारत के अब तक के सफ़र पर. वेस्टइंडीज़ ने टॉस जीता और भारत को बल्लेबाज़ी का न्यौता दिया. भारत ने काफ़ी धीमी गति से रन बनाया और विकेट भी लगातार गिरते रहे. रोहित शर्मा ने सर्वाधिक 60 रन बनाए लेकिन चैम्पियंस ट्रॉफ़ी के हीरो रहे शिखर धवन नाकाम रहे और सिर्फ़ 11 रन ही बना पाए. सुरेश रैना ने 44 रन बनाए. भारत की टीम 50 ओवर में सात विकेट पर 229 रन ही बना पाई. वेस्टइंडीज़ को जीत के लिए 230 रनों का लक्ष्य मिला. क्रिस गेल के सस्ते में आउट होने के बाद भारत ने दबाव बनाया और एक समय वेस्टइंडीज़ का स्कोर था तीन विकेट पर 26 रन. लेकिन जॉनसन चार्ल्स और डेरेन ब्रैवो ने न सिर्फ़ वेस्टइंडीज़ की पारी संभाली बल्कि टीम को जीत की स्थिति में पहुँचाया. लेकिन दोनों के आउट होते ही एक बार फिर स्थिति पलट गई. लेकिन आख़िरकार वेस्टइंडीज़ एक विकेट से मैच जीतने में सफल रहा. भारत एक मैच हार चुका था. नियमित कप्तान महेंद्र सिंह धोनी घायल थे और भारत का मनोबल कमज़ोर था. इस स्थिति का श्रीलंका ने अच्छा फ़ायदा उठाया. भारत ने टॉस जीतकर गेंदबाज़ी चुनी. लेकिन महेला जयवर्धने और उपुल थरंगा ने भारतीय गेंदबाज़ों की ऐसी धुलाई की कि पूछिए मत. भारतीय बल्लेबाज़ एक-एक विकेट को तरसते रहे. उपुल थरंगा और जयवर्धने ने शतक लगाया. अश्विन को एकमात्र विकेट मिला. श्रीलंका ने 50 ओवर में एक विकेट पर 348 रन बनाए. भारत के सामने 349 रनों का लक्ष्य पूरा करने की कठिन चुनौती थी. वही हुआ जो इतने बड़े लक्ष्य के दबाव में होता है. भारतीय टीम दबाव में बिखर गई और लगातार विकेट गिरते रहे. कोई भी बल्लेबाज़ टिक कर खेल नहीं पा रहा था. भारत की पूरी टीम 45वें ओवर में 187 रन बनाकर आउट हो गई. भारत की टीम 161 रन के बड़े अंतर से हारी. भारत की ओर से रवींद्र जडेजा ने सर्वाधिक 49 रन बनाए. मेज़बान वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ भारत का ये मैच काफ़ी अहम था. प्रतियोगिता में बने रहने के लिए भारत को ये मैच जीतना ज़रूरी था. धोनी की ग़ैर मौजूदगी में कप्तान विराट कोहली पर काफ़ी दबाव था. लेकिन उनके और भारतीय टीम के लिए ये मैच आदर्श साबित हुआ. टीम ने अच्छी शुरुआत की. रोहित शर्मा और शिखर धवन ने बेहतरीन बल्लेबाज़ी की. लेकिन स्टार रहे विराट कोहली जिन्होंने शानदार शतक लगाया. भारत ने 50 ओवर में सात विकेट पर 311 रन बनाए. वेस्टइंडीज़ के सामने बड़ा लक्ष्य था. दवाब में टीम बिखरी और पाँच विकेट सिर्फ़ 69 रनों पर गिर गए. बारिश के कारण मैच में बाधा आई. बारिश से प्रभावित मैच में डकवर्थ लुइस नियम के तहत 39 ओवर में जीत के लिए 274 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए वेस्टइंडीज़ की टीम 34 ओवर में 171 रन ही बना पाई. भारत की टीम 102 रनों से जीती. उमेश यादव और भुवनेश्वर कुमार ने तीन-तीन विकेट लिए. त्रिकोणीय सिरीज़ के फ़ाइनल में पहुँचने के लिए भारत को ये मैच जीतना ज़रूरी था. श्रीलंका ने टॉस जीतकर भारत को बल्लेबाज़ी का न्यौता दिया. भारत ने संभल कर खेलना शुरू किया. लेकिन रन गति काफ़ी धीमी रही. धवन नहीं चले और कप्तान कोहली भी 31 रन बनाकर आउट हो गए. भारत ने 29 ओवर में 119 रन बनाए थे तभी बारिश आ गई. बारिश के कारण डकवर्थ लुइस नियम के हिसाब से जीत के लिए श्रीलंका के सामने 26 ओवरों में 178 रन बनाने की चुनौती मिली. लेकिन श्रीलंका की पूरी टीम 24-4 ओवरों में केवल 96 रन बनाकर आउट हो गई. श्रीलंका की ओर से चांडिमल ने सबसे अधिक 26 रन बनाए. भारत की ओर से भुवनेश्वर कुमार ने शानदार गेंदबाज़ी करते हुए छह ओवर में केवल आठ रन देकर श्रीलंका के चार बल्लेबाज़ों को पवेलियन भेजा. भारत ने श्रीलंका को 81 रनों से हराकर वेस्टइंडीज़ में खेली जा रही त्रिकोणीय एकदिवसीय क्रिकेट श्रृंखला के फ़ाइनल में जगह बनाई. गुरूवार को खेले जाने वाले मैच में भारत और श्रीलंका एक बार फिर आमने-सामने होंगे क्योंकि रन रेट के आधार पर वेस्टइंडीज़ टूर्नामेंट से बाहर हो गई है. |
| DATE: 2013-07-10 |
| LABEL: sports |
| [909] TITLE: हार जाता तो शायद उबर ना पाता: मरे |
| CONTENT: मैंने जब विंबलडन की ट्रॉफ़ी देखी तो मुझे लगा कि उस पर मेरा नाम नहीं है. मैं समझ नहीं पाया कि ये क्या हो रहा है. सेंटर कोर्ट पर उस ऐतिहासिक ट्रॉफ़ी को उठाना एक अद्भुत अहसास था लेकिन जब मैं विजेताओं की सूची देख रहा था तो उसमें मेरा नाम कहीं नहीं दिखा. ऐसा लगता है कि इतने सालों में विजेताओं के नाम लिखते-लिखते जगह ही नहीं बची है. मेरा नाम सबसे आख़िर में लिखा गया है लेकिन ये तो तय है कि मेरा नाम वहाँ पर है. चैंपियंस डिनर के बाद मुझे सोने के लिए सिर्फ़ डेढ़ घंटा नसीब हुआ लेकिन सुबह उठकर उस विंबलडन ट्रॉफ़ी के बगल में बैठकर नाश्ता करना यथार्थ से परे जैसा एक अनुभव था. इस प्रतियोगिता का इतना वृहद इतिहास रहा है जिसे मैं बचपन में समझ नहीं पाता था. विंबलडन जीतने की चाहत ज़रूर थी लेकिन ये पता नहीं था कि इतने सालों में यहां पर क्या-क्या हुआ है. जब आप सेंटर कोर्ट की तरफ़ जाते हैं तो तकरीबन 1920 से लेकर अब तक के सभी विजेताओं की तस्वीरें लगी हुई हैं और हर उस मैच को याद करना एक दबाव पैदा करता है. अब ये सोच कर बहुत अच्छा लगता है कि मैं भी उनमें से एक हूं. यक़ीन जानिए विंबलडन प्रतियोगिता से एक हफ़्ते पहले ही मैं अपनी टीम से विंबलडन म्यूज़ियम के बारे में बात कर रहा था. उन्होंने कहा कि वो मुझे ले जाएंगे क्योंकि वो काफ़ी अच्छा है. मैंने ट्रॉफ़ी हाथ में लेकर फ्रेडी पेरी के साथ तस्वीर भी खिंचवाई. वो एक महत्वपूर्ण पल था. हम सभी जानते हैं कि वह टेनिस की दुनिया की कितनी बड़ी शख़्सियत हैं और मेरे पूरे टेनिस करियर में मुझे उनकी याद दिलाई जाती रही है. पेरी निश्चित तौर पर एक महान खिलाड़ी थे लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि हमें नया चैंपियन मिलने में अब उतना वक्त नहीं लगेगा. फ़ाइनल मुक़ाबला मानसिक तौर पर मेरे लिए अब तक का सबसे ज़्यादा मुश्किल मैच था. मेरे दिमाग़ में बस यही चल रहा था कि यही वो जगह है जहाँ मैं पहले सर्व पर पहला प्वाइंट लूँगा. ये बात मैं बहुत अच्छी तरह से समझता हूं कि आँकड़ों पर उसका क्या असर होता है जब आप सर्व पर पहला प्वाइंट जीतते हैं. मैं सिर्फ़ उसी पर ध्यान लगा रहा था. जब स्कोर 40-30 पर पहुंचा तब मैं वाकई नर्वस महसूस कर रहा था. ख़ासकर जब नोवाक ने ब्रेक प्वाइंट बनाया तो वो डरावना था. मैं ये ज़रूर कहना चाहूंगा कि अगर मैं हार जाता तो पता नहीं उबर पाता या नहीं. उससे बाहर निकलना राहत की बात थी और कह नहीं सकता कि मैं दोबारा कभी उस तरह का दबाव महसूस करूंगा या नहीं. मैं जब से विंबलडन के लिए आने लगा हूं तब से बहुत कुछ बदल चुका है. ज़ाहिर है अपेक्षाएं और दिलचस्पी भी बहुत ज़्यादा बढ़ गई है. इन बातों से निपटना थोड़ा मुश्किल है. जब मैं छोटा था तो ग़ुस्सा आता था क्योंकि उतनी परिपक्वता नहीं थी कि उन बातों को समझ सकूं. ये बात वाकई परेशान करती है जब अनजाने लोग आपकी बुराई करते हैं. लोग जब आपके परिवार के बारे में और आपके आस-पास के लोगों के बारे में बातें करते हैं तो ये मानसिक तौर पर चुनौतीपूर्ण होता है. कई बार आप ख़ुद पर शक़ करने लग जाते हैं. क्या मैं सही लोगों के साथ काम कर रहा हूं क्या मैं सही जगह से ट्रेनिंग ले रहा हूं क्या मेरा कोच सही है ये सब आसान नहीं होता. हालांकि अच्छी बात ये है कि शायद अब मैं अपनी इस टीम के साथ करियर के अंत तक काम कर पाऊंगा. इस सबके बीच में मुझे एक बात का अहसास और हुआ है कि परिवार बहुत मायने रखता है. जब आप 35 या 40 साल की उम्र के लोगों के साथ काम करते हैं तो वो 40 हफ़्ते तक अपने परिवार से दूर रहना नहीं चाहते. मैंने अपने कोच मार्क पेची के साथ काम करना शुरू किया तो हमारे बीच एक अच्छा तालमेल बना. वह बहुत अच्छे इंसान हैं और मेरा उनके साथ अच्छा रिश्ता बन गया है. जब मैं लंदन में था तो उनके ही परिवार के साथ रहा और हमने साथ में यात्राएं की लेकिन बाद में वह अपने परिवार के साथ रहना चाहते थे. मुझे ये समझ आ गया कि जब मेरे साथ के लोगों के बच्चे होते हैं तो वो 40 हफ्ते के लिए बाहर रहना नहीं चाहते. पहले लोगों को लगता था कि मैं अपने आस-पास लोगों की टीम क्यों रखता हूं लेकिन अब बाक़ी खिलाड़ी भी ऐसा ही कर रहे हैं. उम्मीद है हम साथ में मिल कर कुछ और ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीत पाएंगे मगर कितने ये नहीं कह सकता. अगर मैं नंबर एक रैंकिंग हासिल कर पाता हूं तो वो बहुत अच्छा होगा लेकिन मेरी नज़र अब ग्रैंड स्लैम जीतने पर ही टिकी है. मैं बड़े मुकाबले जीतने की कोशिश करूंगा. रैंकिंग अगर आनी होगी तो आ जाएगी. मैं समझता हूं कि दबाव बहुत ज़्यादा होगा लेकिन शायद पिछले सालों के मुकाबले ये कुछ भी नहीं है. पूरी उम्मीद है कि दर्शक मुझे वैसा ही हौसला देंगे जैसा उस रविवार को दिया था जब मैने विंबलडन का सबसे बेहतर क्षण महसूस किया. मैं हमेशा से कहता आया हूं कि दर्शकों के हौसले से बहुत मदद मिलती है. मैं सबको धन्यवाद देना चाहता हूं. उम्मीद है कि अगले साल भी हम इसे दोहरा पाएंगे लेकिन उस सबसे पहले फ़िलहाल वक्त है कुछ आराम करने का है. |
| DATE: 2013-07-10 |
| LABEL: sports |
| [910] TITLE: क्रिकेटः भारत और श्रीलंका के बीच निर्णायक भिड़ंत |
| CONTENT: वेस्टइंडीज़ में खेली जा रही त्रिकोणीय एकदिवसीय क्रिकेट श्रृंखला में मगंलवार को भारत और श्रीलंका आमने-सामने हैं. भारत पहले बल्लेबाज़ी कर रहा है. इसी मैच का नतीजा तय करेगा कि गुरूवार को फ़ाइनल में कौन सी दो टीमें खेलेंगी. इससे पहले सोमवार को श्रीलंका ने मेज़बान वेस्टइंडीज़ को डकवर्थ लुईस नियम के आधार पर 39 रनों से हरा दिया. हालांकि इस नतीजे को आने में भी दो दिन लग गए. दरअसल यह मुक़ाबला रविवार को तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार शुरू हुआ था लेकिन जब श्रीलंका का स्कोर 19 ओवर के खेल के बाद तीन विकेटों के नुकसान पर 60 रन था तभी भारी बारिश के कारण मैच रोक दिया गया. सोमवार को रिज़र्व डे रखा गया था और उस दिन यह मैच फिर वही से शुरू किया गया जहां ये रुका था. हालांकि सोमवार को भी यह मैच बारिश की वजह से पूरा नहीं खेला जा सका. लेकिन इसका नतीजा निकल ही गया. इस मैच में श्रीलंका ने बारिश के बाद 41 ओवर में आठ विकेट खोकर 219 रन बनाए थे. जवाब में वेस्टइंडीज़ की टीम डकवर्थ लुईस नियम के आधार पर 41 ओवर में जीत के लिए 230 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए नौ विकेट खोकर केवल 190 रन ही बना सकी और 39 रनों से हार गई. अब अंक तालिका में वेस्टइंडीज़ और श्रीलंका के नौ-नौ अंक है जबकि भारत के पाँच ही अंक हैं. अगर रन औसत की बात की जाए तो श्रीलंका का नेट रन रेट 1-019 और वेस्टइंडीज़ का 0-383 है जबकि भारत का 0-524 है. इस स्थिति में श्रीलंका की टीम अगर मंगलवार का मैच जीत जाती है तो वह सीधे-सीधे फाइनल में पहुँच जाएगी और फिर वहां उसका सामना मेज़बान वेस्टइंडीज़ से होगा. ऐसे में भारत को अगर फाइनल में पहुँचना है तो उसे मंगलवार को श्रीलंका को हर हाल में हराना होगा. इसके साथ-साथ भारत का रन औसत भी वेस्टइंडीज़ से बेहतर होना चाहिए. दूसरी तरफ अपने बेहतर रन औसत के कारण श्रीलंका भारत से हार कर भी फाइनल में पहुँच जाएगा बशर्ते भारत उसे बुरी तरह न हरा दे और उसका रन औसत वेस्ट इंडीज से नीचे चला जाए. वैसे मंगलवार को भी पोर्ट ऑफ स्पेन में बारिश का संभावना जताई जा रही है. ऐसे में अगर मैच के लिए निर्धारित रिज़र्व डे में भी बारिश से धुल गया तो भारत अपने आप ही फाइनल की दौड़ से बाहर हो जाएगा. इस हालत में भारतीय टीम का सारा दारोमदार एक बार फिर सलामी जोड़ी रोहित शर्मा और विराट कोहली पर है क्योंकि इससे पहले उन्होंने पहले विकेट के लिए जब भी अच्छी साझीदारी की है तब-तब भारत ने विशाल स्कोर खडा किया है. पिछले मैच में कार्यवाहक कप्तान विराट कोहली ने भी शतक जमाकर दिखा दिया कि वह दबाव में भी शानदार बल्लेबाज़ी कर सकते है. भारतीय गेंदबाज़ों को भी अपना दमख़म दिखाना होगा जो श्रीलंका के ख़िलाफ पिछले मुक़ाबले में बिलकुल बेअसर रहे थे. उसके बाद श्रीलंका के गेंदबाज़ों ने भी भारतीय टीम को सस्ते में पैवेलियन भेज दिया था. उस मैच में मिली 161 रनों की करारी हार को भूलकर देखना है कि भारतीय टीम श्रीलंका के ख़िलाफ़ कैसा खेलती है जहाँ जीत के साथ-साथ रनों का अंतर भी फ़ाइनल में पहुंचने के लिए ज़रूरी है. |
| DATE: 2013-07-09 |
| LABEL: sports |
| [911] TITLE: हॉकी: आख़िर कब तक बच पाते कोच नॉब्स |
| CONTENT: भारतीय हॉकी टीम के कोच माइकल नॉब्स को हटा दिया गया है हालांकि उनका कार्यकाल अभी बाकी था. पिछले दो वर्षों से भारतीय टीम का प्रदर्शन ख़राब रहा है. इस तरह कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाए जाने वाले नॉब्स भारत के पहले विदेशी हॉकी कोच नहीं है. इससे पहले भी तीन विदेशी कोच इसी तरह हटाए गए थे. ऑस्ट्रेलियाई नागरिक माइकल नॉब्स 2011 में भारतीय हॉकी टीम के कोच बने थे लेकिन दो साल में ही वे हटा दिए गए. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक हॉकी इंडिया के महासचिव नरिंदर बत्रा ने कहा है कि नोब्स का कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म कर दिया गया है और फ़िलहाल वो एक महीने के नोटिस पर हैं. पीटीआई ने बत्रा के हवाले से ये भी लिखा है कि पद छोड़ने का फ़ैसला ख़ुद माइकल नॉब्स का था. नए कोच की नियुक्ति तक रोलैंट ओल्टमैन्स को ये जिम्मेदारी सौंपी गई है. वे टीम के हाई परफ़ॉरमेंस मैनेजर हैं. नरिंदर बत्रा ने पीटीआई से बातचीत में कहा नॉब्स ने ख़ुद पद छोड़ने की पेशकश की थी. उनके कोचिंग स्टाइल को लेकर कुछ मतभेद थे. ओल्टमैन्स को लग रहा था कि भारतीय टीम कुछ विभागों में कमज़ोर है और नॉब्स उन कमज़ोरियों को ठीक नहीं कर पा रहे. इसलिए हमने स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया को बता दिया है कि हमें उनकी सेवाएँ नहीं चाहिए. नए कोच की नियुक्त में दो-तीन महीने लग सकते हैं. जब नॉब्स कोच बने थे तो उनसे काफ़ी उम्मीदें थीं कि वो भारतीय हॉकी टीम का कायाकल्प कर देंगे. उनके रहते भारत ने लंदन ओलंपिक के लिए क्वॉलिफा़ई किया. इससे पहले भारत 2008 बीजिंग ओलंपिक खेलों में प्रवेश भी नहीं कर पाया था. अपने दो साल के कार्यकाल में नॉब्स इससे ज़्यादा कुछ ख़ास हासिल नहीं कर पाए. लंदन ओलंपिक में भी भारत का प्रदर्शन ख़राब रहा था. उसके बाद सबकी नज़रें पिछले महीने रॉटरडैम में हुई वर्ल्ड लीग प्रतियोगिता पर थी. उम्मीद थी कि यहाँ अच्छे प्रदर्शन से भारत अगले साल के वर्ल्ड कप के लिए जगह पक्की कर लेगा. लेकिन यहाँ भी भारत आठ टीमों में से छठे स्थान पर रहा. नरिंदर बत्रा ने बताया है कि नॉब्स फिलहाल ऑस्ट्रेलिया में हैं और वे 14 जुलाई को वापस आएँगे. माइकल नॉब्स ऑस्ट्रेलियाई ओलंपिक टीम के सदस्य रह चुके हैं. भारत पहले भी हॉकी टीम के लिए कई विदेशी कोच रखा चुका है जिसमें स्पेन के होसे बार्सा ऑस्ट्रेलिया के रिक चार्ल्सवर्थ शामिल हैं लेकिन उन्हें भी किसी न किसी मुद्दे को लेकर पद छोड़ना पड़ा था. |
| DATE: 2013-07-09 |
| LABEL: sports |
| [912] TITLE: राजनीतिक सवाल और 'परवेज़ रसूल का क्रिकेट' |
| CONTENT: परवेज़ रसूल भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल होने वाले भारत प्रशासित कश्मीर के पहले मुसलमान क्रिकेटर हैं. उन्हें 26 जुलाई से शुरू हो रहे जिम्बाब्वे के वनडे दौरे के लिए टीम इंडिया में शामिल किया गया है. 24 साल के स्पिनर ऑलराउंडर रसूल भारतीय टीम में चयन के बाद से ही अपना मोबाइल अक्सर बंद रखते हैं क्योंकि लोग उनसे फ़ोन करके उनके राजनीतिक विश्वास विचारधारा और भारत के लिए खेलने के बारे में सवाल पूछते हैं. उन्होंने कहा जब लोग मुझसे राजनीतिक सवाल पूछते हैं तो मेरे लिए जवाब देना मुश्किल हो जाता है. इन सवालों का मेरे क्रिकेट से कोई लेना-देना नहीं है. कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान दोनों दावा करते हैं और यहां 1989 से भारतीय शासन के ख़िलाफ़ सशस्त्र संघर्ष चल रहा है. भारत प्रशासित कश्मीर में केवल दो अंतरराष्ट्रीय मैच हुए हैं. 1983 में वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ दूसरे मैच के दौरान कुछ गुस्साए स्थानीय लोगों ने पिच खोद डाली थी. अलगाववादियों के समर्थकों ने भारतीय टीम के ख़िलाफ़ नारेबाजी की थी और टीम इंडिया वह मैच हार गई थी. मुसलमान बहुल कश्मीर घाटी के क्रिकेट प्रशंसक भारत के ख़िलाफ़ खेलने वाली टीम का समर्थन करते हैं. श्रीनगर से क़रीब 44 किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित रसूल के गांव बिजबेहड़ा के एक दुकानदार तारिक़ कहते हैं हम चाहते हैं कि रसूल अच्छा खेले लेकिन उनकी टीम हार जाए खासकर पाकिस्तान के साथ मैच में. 1983 के उस मैच में भारतीय टीम के कप्तान रहे कपिल देव का मानना है कि राष्ट्रीय टीम में रसूल के चयन से कश्मीर में क्रिकेट को बढ़ावा मिल सकता है. उन्होंने बीबीसी से कहा पिछले 20 सालों में कश्मीर को बहुत कुछ सहना पड़ा है और उम्मीद है कि रसूल की कहानी आने वाले सुनहरे भविष्य की शुरुआत है. उन्होंने कहा छोटे शहरों से आए क्रिकेटर पिछले एक दशक से भारतीय क्रिकेट में छाए हुए हैं. जैसे महेंद्र सिंह धोनी राष्ट्रीय टीम में खेलने और कप्तानी संभालने वाले रांची के पहले खिलाड़ी हैं. मुझे उम्मीद है कि रसूल जम्मू कश्मीर के लिए यही उपलब्धि दोहराएंगे. रसूल पहले ही अपनी पहचान बना चुके हैं. 2012-13 के घरेलू सत्र में उन्होंने 33 विकेट लिए और दो शतकों के साथ 549 रन बनाए. वो जम्मू कश्मीर की तरफ से सबसे ज़्यादा विकेट लेने और रन बनाने वाले खिलाड़ी थे. रसूल पिछले सीज़न में सर्वाधिक विकेट लेने वाले स्पिन गेंदबाज़ो की सूची में तीसरे थे. उन्होंने फरवरी में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ एक अभ्यास मैच में सात विकेट लिए थे. वो आईपीएल में खेलने वाले पहले कश्मीरी मुसलमान थे और इस साल पुणे वारियर्स की टीम में शामिल थे. 67 टेस्टों में 266 लेने वाले दिग्गज स्पिनर बिशन सिंह बेदी कहते हैं ऑर्थोडॉक्स ऑफ़ स्पिन करने की उनकी क्षमता ही उनकी असली ताक़त है. वो अच्छे ऑलराउंडर हैं. उन्होंने जिम्बाब्वे दौरे पर अपनी प्रतिभा दिखाने का अच्छा मौका मिला है. लेकिन राष्ट्रीय टीम में चयन तक का उनका सफर आसान नहीं रहा. इस साल की शुरुआत में जब उन्हें भारत ए टीम में चुना गया था तो कुछ मीडिया रिपोर्टों में आरोप लगाया गया था कि कश्मीरियों को भारत के क़रीब लाने की राजनीतिक मंशा से ऐसा किया गया है. भारत प्रशासित कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इसके जवाब में ट्विटर पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसी रिपोर्ट परवेज़ और उनके संघर्ष की बेइज्जती है. साथ ही उन्होंने कहा कि इस तरह की रिपोर्ट कश्मीर के लोगों की भी तौहीन है जिन्हें जबरदस्ती थोपे गए आइकंस की ज़रूरत नहीं है. साल 2009 में अंडर-22 टीम के साथ यात्रा करते हुए उन्हें बंगलौर हवाई अड्डे पर हिरासत में लिया गया था. उन पर आरोप था कि वो अपने किटबैग में विस्फोटक ले जा रहे थे. टीम के कोच अब्दुल क़यूम बागो ने कहा कि रसूल और टीम के एक दूसरे खिलाड़ी ने खो़जी कुत्तों के उनके किट की जांच करने पर आपत्ति जताई थी. उन्होंने कहा कि दोनों खिलाड़ी अपने बैग में पवित्र क़ुरान ले जा रहे थे. पूछताछ के बाद उन्हें छोड़ दिया गया. बागो का कहना है कि 11 साल की उम्र में रसूल बल्लेबाज़ और विकेटकीपर बनना चाहते थे. उन्होंने कहा उन्होंने गेंदबाज़ी करते देखने के बाद मैंने उन्हें स्पिनर बनने की सलाह दी थी. उनके बारे में सबसे अच्छी बात ये है कि वो हमेशा दूसरों की सलाह को ध्यान से सुनते हैं. सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके रसूल के पिता ग़ुलाम रसूल कहते हैं कि उन्होंने कभा नहीं सोचा था कि उनका बेटा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर बनेगा. वो अपने बेटे को कश्मीर घाटी की हिंसक राजनीति से दूर रखना चाहते हैं. उन्होंने कहा मैं राजनीति पर बात नहीं करना चाहता हूं. कुछ लोग राजनीति करते हैं कुछ लोग क़िताबें पढ़ते हैं और कुछ खेलों में हिस्सा लेते हैं. मेरा बेटा क्रिकेटर है कोई राजनेता नहीं. मैं चाहता हूं कि लोग इस बात को समझें. रसूल का कहना है कि वो टीम इंडिया में अपनी जगह पक्की करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं. उन्होंने कहा भारत के लिए खेलना मेरे लिए गर्व की बात है. |
| DATE: 2013-07-09 |
| LABEL: sports |
| [913] TITLE: मरे को अंतिम गेम याद ही नहीं: हेनमैन |
| CONTENT: एंडी मरे ने आख़िरकार विंबलडन जीतकर ब्रिटेन के लोगों का 77 साल का लंबा इंतजार समाप्त कर दिया. मरे ने फ़ाइनल में दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी सर्बिया के नोवाक जोकोविच को लगातार सेटों में हराकर सेंटर कोर्ट में बैठे 15000 दर्शकों और देश भर के लाखों टेनिस प्रेमियों को जश्न मनाने का मौक़ा दे दिया. 26 साल के मरे का ये दूसरा ग्रैंड स्लैम है. इससे पहले उन्होंने पिछले साल यूएस ओपन का ख़िताब और ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता था. बीबीसी के कमेंटेटर और चार बार विंबलडन से सेमीफ़ाइनल में पहुंचे टिम हेनमैन लॉकर रूम में मरे की जीत के जश्न में शामिल हुए. उन्होंने कहा मुझे मैच के तुरंत बाद लॉकर रूम में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. एंडी को अपनी जीत पर विश्वास नहीं हो रहा था. मैंने उन्हें गले लगाया और उनसे कहा मैं नहीं जानता आपने ऐसा कैसे किया इस पर उनका जवाब था मैं भी नहीं जानता. हेनमैन ने कहा ये एक अविश्वसनीय उपलब्धि है और इसका ख़ुमार अब भी चढ़ा हुआ है. एंडी टेनिस के ऐसे छात्र हैं जिन्हें जूनियर स्तर से लेकर अब तक के सभी परिणाम याद हैं. उन्हें अपने सभी मैच और शॉट याद हैं लेकिन उन्हें इस फ़ाइनल के अंतिम गेम के बारे में कुछ भी याद नहीं है. इस गेम की उनकी यादें धुंधला गई हैं. उन्होंने कहा मैंने लॉकर रूम में एंडी की टीम के सभी सदस्यों से बात की. वहां शैंपेन उड़ाई जा रही थी. मैं तो जैसे-तैसे बच गया लेकिन एंडी पूरी तरह शैंपेन में नहा गए. वह शराब नहीं पीते हैं लेकिन उन्हें एक घूंट पीनी पड़ी. जैसे ही शैंपेन उनके हलक से उतरी उनके मुंह से निकला बहुत ख़राब. हेनमैन ने बताया पिछली बार उन्होंने शैंपेन तब ली थी जब वो यूएस ओपन जीतकर घर वापस आ रहे थे. उस समय उन्होंने विमान में टूथपेस्ट के बजाय फेस क्रीम इस्तेमाल कर लिया था. तब उन्होंने शैंपेन का ली थी. उन्होंने कहा एंडी के लिए ये शानदार दिन है. टेनिस टेनिस प्रेमियों और ब्रिटेन के खेलों के लिए भी ये एक शानदार दिन है. उन्हें इस साल बीबीसी स्पोर्ट्स पर्सनेलिटी ऑफ़ द ईयर अवार्ड मिलना ही चाहिए. हेनमैन ने कहा इसमें अब कोई शक नहीं है कि उन्होंने ब्रिटेन की जनता का दिल जीत लिया है. इससे पहले चंद लोगों को उनकी काबिलियत पर संदेह था. पिछले 12 महीने में लोगों ने उनका अलग रंग देखा है. उन्होंने कहा पिछले साल विंबलडन के फ़ाइनल में हारना एंडी के लिए बेहद अहम साबित हुआ. उसके बाद उन्होंने ओलंपिक स्वर्ण जीता और बीबीसी की एक डॉक्यूमेंट्री से भी दुनिया को ये समझने में मदद मिली कि वह कितने महान खिलाड़ी हैं. इसे आप इस बात से महसूस कर सकते हैं कि उनके लिए समर्थन लगातार बढ़ता गया है और आज फ़ाइनल का माहौल अद्भुत था. हेनमैन के अनुसार मुझे हमेशा से लगता था कि ये क्षण आएगा. उनकी प्रतिभा को मैं उसी समय पहचान गया था जब वह डेविस कप में ऑरेंज ब्वॉय या वॉटर ब्वॉय हुआ करते थे. मैंने उनके साथ स्पेन में क्ले कोर्ट पर हाथ आजमाए थे जहां वह बतौर जूनियर प्रशिक्षण ले रहे थे. उन्होंने कहा छोटी उम्र में भी वह काफी समय बॉल के साथ गुजारते थे और यही बात उन्हें दूसरे खिलाड़ियों से अलग करती है. |
| DATE: 2013-07-08 |
| LABEL: sports |
| [914] TITLE: विंबलडन में एंडी मरे ने रचा इतिहास |
| CONTENT: दुनिया के दूसरे नंबर के खिलाड़ी ब्रिटेन के एंडी मरे ने दुनिया के नंबर एक और शीर्ष वरीय सर्बिया के नोवाक जोकोविच को सीधे सेटों में 6-4 7-5 6-4 से हराकर विंबलडन पुरूष एकल ख़िताब जीत लिया है. मरे और जोकोविच के बीच तीन घंटे 10 मिनट तक चले मुका़बले के दौरान तीनों सेटों में बेहतरीन खेल देखने को मिला. ख़ासकर दूसरे सेट में दोनों के बीच लंबा संघर्ष हुआ लेकिन बाज़ी मरे के हाथ लगी जब उन्होंने 7-5 से दूसरा सेट जीता. मरे ने आख़िरकार तीसरा सेट 6-4 के अंतर से जीत कर विंबलडन पुरूष एकल का ताज अपने नाम कर लिया. खेल विशेषज्ञों का कहना है कि रविवार को खेले गए फ़ाइनल मैच में जोकोविच अपने रंग में बिल्कुल भी नहीं दिख रहे थे. यहां तक की जोकोविच के कई रिटर्न्स सीधे नेट में जा टकराए जहां पर उन्हें आसानी से अंक मिल सकते थे. दूसरी तरफ़ एंडी मरे ने बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया. उनकी कोट कवरेज बहुत ही शानदार थी. कई मौक़ों पर तो मरे ने अविश्नीय खेल का प्रदर्शन किया. ख़ासकर उनके दोनों हाथों से लगाए गए बैकहैंड रिटर्न्स का जोकोविच के पास कोई जवाब नहीं था. 1966 फ़ुटबॉल विश्व कप जीत के बाद ब्रिटेन के खेल इतिहास का सबसे बड़ा दिन. रविवार को मरे ने अपना सांतवा ग्रैंडस्लैम फ़ाइनल मैच खेला जबकि जोकोविच के साथ ग्रैंडस्लैम में यह उनका चौथा मुक़ाबला था. रविवार का दिन 1966 में फ़ुटबॉल विश्व कप जीतने के बाद ब्रिटेन के खेल इतिहास का शायद ये सबसे बड़ा दिन था. 77 साल बाद ब्रिटेन का कोई पुरूष खिलाड़ी विंबलडन एकल ख़िताब जीतने में सफल हुआ. इससे पहले 1936 में ब्रिटेन के फ़्रेड पेरी ने विंबलडन पुरूष एकल ख़िताब जीता था. साल 2012 में भी मरे विंबलडन के फ़ाइनल में पहुंचे थे लेकिन तब उन्हें फ़ेडरर से हार का सामना करना पड़ा था. एंडी मरे का ये दूसरा ग्रैंडस्लैम ख़िताब है इससे पहले वो साल 2012 में अमरीकी ओपन भी जीत चुके हैं. 2013 के विंबलडन फ़ाइनल का एक भारतीय पक्ष भी था. मैच के शुरू में भारत से लंदन पहुंची एक छोटी सी लड़की की मुस्कान ने स्टेडियम में बैठे 15 हज़ार लोगों का मन मोह लिया. 11 वर्षीय पिंकी सोनकर जब पैदा हुई थीं तो उसका होंठ कटा हुआ था. स्माइल ट्रेन नाम की एक अंतरराष्ट्रीय चैरिटी संस्था ने 2007 में उसका सफल ऑपरेशन कराकर उसे एक मनोहारी मुस्कान दी है. इसका ज़िक्र ऑस्कर विजेता शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री स्माइल पिंकी में भी किया गया था. इसी संस्था की ओर से पिंकी को रविवार को सेंटर कोर्ट में लाया गया था जहां पिंकी ने सिक्का उछाल कर टॉस किया जिसके बाद से मैच शुरू हुआ. इससे पहले सेमीफ़ाइनल में मरे ने पोलैंड के 24वीं वरीयता प्राप्त जेर्जी जानोविज को लगभग तीन घंटों तक चले छत विवाद वाले मैच में 6-7 6-4 6-4 6-3 से हरा कर विंबलडन टेनिस ग्रैंडस्लैम के पुरुष एकल के फाइनल में जगह बनाई थी. जबकि नोवाक जोकोविच ने शुक्रवार को इतिहास में विंबलडन के सबसे लंबे सेमीफ़ाइनल में जुआन डेल पोत्रो को 7-5 4-6 7-6 6-7 6-3 से हराकर 11वीं बार ग्रैंडस्लैम फ़ाइनल में जगह बनाई थी. |
| DATE: 2013-07-07 |
| LABEL: sports |
| [915] TITLE: विंबलडन: महिला एकल वर्ग में बारतोली विजयी |
| CONTENT: विंबलडन में महिला एकल वर्ग को एक नई विजेता मिल गईं हैं. शनिवार को फ्रांस की मैरियोन बारतोली ने जर्मनी की सबीना लिसिकी को हराकर महिला वर्ग का एकल ख़िताब जीत लिया. बारतोली ने सीधे सेटों में 6-1 6-4 से लिसिकी को हराकर अपना पहला ग्रैंडस्लैम ख़िताब जीता. बारतोली ने केवल 30 मिनट में ही पहला सेट जीत लिया. पहले सेट में उन्होंने लगातार छह गेम जीते जबकि दूसरे सेट में लगातार पांच गेम अपने नाम किए. लिसिकी के मैच में वापसी के तमाम प्रयास नाकाम रहे. 15वीं वरीयता प्राप्त बारतोली के सामने 23वीं वरीयता वाली सबीना लिसिकी टिक नहीं सकीं. अगर सबीना लिसिकी की जीत होने पर यह उनका भी पहला ग्रैंड स्लैम होता. वर्ष 2007 में वीनस विलियम से हार कर मैरियोन बारतोली ने ग्रैंड स्लैम जीतने का मौक़ा गवां दिया था लेकिन इस बार एकतरफ़ा मुक़ाबले में उन्होंने यह जीत हासिल की. बारतोली को रोकने में नाकाम रहने पर दूसरे सेट में 23 साल की लिसिकी रो पड़ीं. वहीं जीत के बाद बारतोली भी ख़ुशी में भावुक हो गईं. बारतोली ने अपनी ख़ुशी अपनी मेंटर और 2006 की विंबलडन विजेता एमिली मोरेस्मो के साथ गले लगकर बांटी. उन्होंने अपने पिता और पूर्व कोच वॉल्टर को भी गले लगाया. इससे पहले एमिली मोरेस्मो आख़िरी फ़्रांसिसी महिला थीं जिन्होंने विंबलडन जीता था. पूरे टूर्नामेंट के दौरान बारतोली ने अपना दबदबा बनाए रखा. इस जीत के बाद वह विंबलडन ओपन में बिना कोई सेट गवांए जीतने वाली छठी महिला बन गईं हैं. बारतोली का कहना था मुझे विशवास नहीं हो रहा बचपन से ये दिन मेरा सपना था. लेकिन ऐस के साथ खेल ख़त्म करने की तो मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी. विंबलडन में ये उनका 47वाँ मैच था. लिसिकी से पाँच साल वरिष्ट बारतोली ने कहा मैं 2007 में विंबलडन नहीं जीत पाई मैं जानती हूँ कैसा महसूस होता है. मुझे विश्वास है कि लिसिकी एक बार फिर यहाँ पहुंचेगी. जर्मनी की मशहूर टेनिस खिलाड़ी लिसिकी की दमदार सर्विस को बारतोली ने आसानी से खेला. छटे खेल में लिसिकी के दोबारा डबल-फॉल्ट ने विंबलडन का ख़िताब आसानी से बारतोली को थमाने में पूरी मदद की. लिसिकी के पास दूसरे सेट के दूसरे मैच में बाज़ी अपनी ओर करने के मौक़े आए लेकिन बारतोली मैदान में मज़बूती से टिकी रहीं. फ़ाइनल तक के रास्ते में लिसिकी ने चौथे दौर में पांच बार की चैंपियन सरीना विलियम्स को हराया और सेमीफ़ाइनल में चौथी वरीयता प्राप्त अग्नियेस्का रदवांस्का को हराया था. |
| DATE: 2013-07-07 |
| LABEL: sports |
| [916] TITLE: बैडमिंटन लीग: अंतरराष्ट्रीय सितारे नदारद ? |
| CONTENT: अब से चंद महीनों पहले बड़े ज़ोर शोर से इंडियन बैडमिंटन लीग यानी आईबीएल का ऐलान किया गया था लेकिन इसको लेकर अब तक संशय की स्थिति बनी हुई है. एक तो बैडमिंटन के जानकारों से लेकर आइकन खिलाड़ियों जैसे ज्वाला गुट्टा पी कश्यप अश्विनी पोनप्पा तक को इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है. दूसरे बैडमिंटन के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की इसमें कोई दिलचस्पी ही नज़र नहीं आ रही है और कई टॉप स्टार्स ने अब तक इसमें खेलने के लिए हामी नहीं भरी है. इस लीग का आयोजन इसी साल 20 जनवरी से 11 फरवरी तक होना था लेकिन भारतीय बैडमिंटन संघ की यह योजना कामयाब नही हो सकी. इसके बाद इस लीग के 24 जून से शुरू करने की घोषणा की गई लेकिन तब भी बात सिर्फ घोषणा तक ही रह गई. अब कहा जा रहा है कि आईबीएल यानी इंडियन बैडमिंटन लीग 14 से 31 अगस्त तक आयोजित की जाएगी. आईपीएल की तर्ज पर प्रस्तावित इस लीग में हैदराबाद हॉटशाट्स कर्नाटक किंग्स लखनऊ वॉरियर्स मुम्बई मास्टर्स पुणे विजेता और राजधानी स्मैशर्स जैसी टीमें होंगी. आईबीएल को विश्व में सबसे ज़्यादा पुरस्कार राशि वाला बैडमिंटन टूर्नामेंट माना जा रहा है. यह लीग भारत के छह शहरो मे आयोजित की जाएगी. हैदराबाद बेंगलूर लखनऊ मुम्बई पुणे और दिल्ली इन शहरो में शामिल है. भारत की स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल अश्विनी पोनप्पा पी कश्यप ज्वाला गुट्टा पीवी सिंधू आइकन खिलाड़ी होंगे जबकि एक विदेशी खिलाड़ी छठा आइकन खिलाड़ी होगा. इन आइकन खिलाड़ियों का बेस प्राइस 50000 डॉलर होगा जिसके लिए फ्रेंचाइजी ड्रॉ में से बोली लगाएंगी. प्रत्येक फ्रेंचाइजी 11 खिलाड़ी रख सकते है जिसमें चार विदेशी और एक अंडर-19 खिलाडी होगा. छह टीमें 66 स्थानों के लिए 150 से ज़्यादा बैडमिंटन खिलाड़ियों की बोली लगाएंगी. खिलाड़ियो की नीलामी 19 जुलाई को होगी. आइकन खिलाड़ी को टीम के सर्वाधिक बोली लगे खिलाड़ी से 10 प्रतिशत ज़्यादा राशि मिलेगी. इस लीग में हॉन्गकॉन्ग जापान दक्षिण कोरिया मलेशिया और चीन के साथ-साथ अन्य देशो को खिलाड़ी भाग लेंगे. अब ये बात अलग है कि पिछले दिनों समाचार आया कि आईबीएल में दुनिया के चोटी के खिलाडी भाग नहीं लेंगे. इस मसले को लेकर बीजिंग ओलम्पिक में क्वॉर्टर फाइनल में पहुंचने वाले भारत के पी कश्यप का कहना है भले ही कुछ टॉप चीनी खिलाडी इस लीग में नहीं आए लेकिन शीर्ष 7 खिलाडियों में अपनी जगह बनाने वाले खिला़ड़ी तो आएंगे ही और उससे लीग का आकर्षण बढ़ेगा. वैसे कश्यप पहली बार भारतीय खिलाड़ियों को मिलने वाली इतनी बड़ी धनराशि को लेकर खासे उत्साहित है तो थोडी चिंता उन्हे इसकी कामयाबी को लेकर भी है. टीम में आइकन खिलाड़ी होने के नाते बाकी खिलाड़ियों के चयन में अपनी भूमिका को लेकर पी कश्यप उनका कहना है अभी तो स्थिति स्पष्ट नहीं है. जब सभी विदेशी खिलाड़ियों की स्थिति साफ हो जाएगी तभी कुछ कह सकूंगा. आईबीएल अगर इस बार अपनी तयशुदा तिथि को शुरू होती है तो इससे भारतीय खिलाड़ियो को तो यकीनन लाभ होगा ऐसा मानना है साइना नेहवाल ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा का. खबर ये भी है कि एक फ्रेंचाइजी दुनिया के सबसे बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर भी ले सकते है. अब लाख टके का सवाल यह है कि आइकन खिलाड़ियों के साथ-साथ बैडमिंटन के जानकारो के पास भी अभी तक आईबीएल को लेकर कोई पुख्ता जानकारी नही है जो शायद टॉप विदेशी खिलाड़ियो के दूर रहने का कारण हो सकती है. इसके अलावा लगातार बदलती आयोजन तिथियों से शायद फ्रेंचाइजी के मालिकों के मन में भी कुछ संदेह हो. ऐसे में आईबीएल क्रिकेट की इंडियन प्रीमियर लीग और हॉकी की इंडियन हॉकी लीग की तरह कामयाब होगी या नही. और इसकी पहली कोशिश क्या रंग लाती है इसके लिए कम से कम 19 जुलाई तक इंतज़ार करना होगा. इसके बाद ही पता चलेगा कि दुनिया के कितने खिलाड़ी इसमे भाग ले रहे है और फ्रेंचाइजियों में कितना दम है. अगर बार-बार तिथियाँ बदलती रही तो आईबीएल की साख पर शुरू होने से पहले संदेह तो रहेगा ही. उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत में क्रिकेट और हॉकी के बाद अब बैडमिंटन की दुनिया भी गुलज़ार होगी. |
| DATE: 2013-07-06 |
| LABEL: sports |
| [917] TITLE: बारतोली या लिसिकी, कौन बनेगी विंबलडन की मलिका |
| CONTENT: विंबलडन को शनिवार को नई चैंपियन मिलने वाली है. महिला एकल फाइनल में आमने-सामने हैं जर्मनी की सबाइन लिसिकी और फ्रांस की मेरियन बारतोली. मैच भारतीय समयानुसार शाम 6-30 बजे शुरू होगा. लिसिकी 23वीं वरीयता प्राप्त हैं. ये उनका पहला ग्रैंड स्लेम फाइनल है. फाइनल तक के रास्ते में उन्होंने चौथे दौर में पांच बार की चैंपियन सरीना विलियम्स को हराया और सेमीफाइनल में चौथी वरीयता प्राप्त अग्नियेस्का रदवांस्का को हराया. 15वीं वरीयता प्राप्त बारतोली इससे पहले 2007 में विंबल़डन फाइनल में पहुंच चुकी हैं लेकिन तब उन्हें वीनस विलियम्स ने हरा दिया था. 23 साल की लिसिकी और बारतोली चार बार भिड़ चुकी हैं जिसमें लिसिकी को तीन बार जीत हासिल हुई है. लिसिकी 1999 में सात बार की विजेता स्टेफी ग्राफ के फाइनल में पहुंचने के बाद विंबलडन फाइनल में पहुंचने वाली पहली जर्मन महिला हैं. लिसिकी ने कहा स्टेफी ग्राफ ने सेमीफाइनल से पहले मुझे शुभकामनाएं दी थीं. उन्होंने मुझसे कहा जाओ और कर दिखाओ. मैं इस बात से बेहद खुश हूं. लिसिकी की ताकत है उनका जोरदार खेल और विंबलडन का ग्रास कोर्ट इसके लिए उपयुक्त है. वैसे भी आमतौर पर जर्मन खिलाड़ियों का विंबलडन में अब तक काफी अच्छा प्रदर्शन रहा है. लिसिकी कहती हैं कि वो विंबलडन चैंपियन बनने का सपना बचपन से देख रही हैं. वो कहती हैं ये मेरे करियर का पहला फाइनल है. और इसके लिए विंबलडन से बेहतर कोई जगह हो ही नहीं सकती थी. मुझसे मैच का इंतज़ार ही नहीं हो पा रहा है. दूसरी ओर 28 साल की बारतोली अपने पिछले फाइनल को याद करते हुए कहती हैं मैं 2007 में बिलकुल नई थी. उस वक्त किसी को भी मुझसे ज़्यादा उम्मीदें नहीं थीं. लेकिन इस बार मामला बिलकुल उलटा है. टूर्नामेंट में अपने अब तक के खेल के बारे में वो कहती हैं मुझे लगता है मैंने दबाव में अच्छा खेल दिखाया. और मैच दर मैच मेरे खेल में निखार आता चला गया. सेंटर कोर्ट पर उनका उत्साह बढ़ाने के लिए उनके पिता भी मौजूद होंगे जो पहले उनके कोच थे. विंबलडन से पहले बारतोली कठिन दौर से गुज़र रही थीं. वो फॉर्म में नहीं चल रही थीं और एड़ी की चोट से भी परेशान थीं. फिर उन्हें वायरल से भी जूझना पड़ा था. बारतोली मैच के दौरान बेहद उत्साही अंदाज़ में अपने प्वाइंट्स की खुशी मनाने के लिए दर्शकों के बीच मशहूर हैं. उनके कोर्ट में नाचने और कूदने की अदा ने दर्शकों के बीच उन्हें खासा लोकप्रिय बना दिया है. वो अपने इस अंदाज़ पर कहती हैं जब मैं छह या सात साल की थी तब से ऐसी ही हूं. ऐसा करके मेरा मकसद अपने प्रतिद्वंद्वी को नाराज़ करना कतई नहीं होता. नाचना कूदना ये मेरी फितरत है. मैं ऐसी ही रहूंगी. |
| DATE: 2013-07-06 |
| LABEL: sports |
| [918] TITLE: आख़िरकार जीत ही गया भारत |
| CONTENT: विराट कोहली ने धुआंधार बल्लेबाज़ी करते हुए शतक बनाया. कप्तान विराट कोहली के शतक और गेंदबाज़ों के शानदार प्रर्दशन की बदौलत भारत ने त्रिकोणीय क्रिकेट श्रृंखला में वेस्टइंडीज़ को 102 रन से हरा दिया है. बारिश से प्रभावित मैच में डकवर्थ लुइस नियम के तहत 39 ओवर में जीत के लिए 274 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए वेस्टइंडीज़ की टीम 34 ओवर में 171 रन ही बना पाई. भारत ने निर्धारित 50 ओवर में सात विकेट के नुकसान पर 311 रन का विशालकाय स्कोर खड़ा किया. टूर्नामेंट में ये भारत की पहली जीत है. इससे पहले भारत वेस्टइंडीज़ और श्रीलंका के साथ मैच में हार गया था. त्रिनिदाद में खेले गए मैच में मेज़बान वेस्टइंडीज़ ने टॉस जीतकर फ़ील्डिंग करने का फैसला किया. भारत के चोटी के तीनों बल्लेबाज़ों ने शानदार प्रदर्शन किया और टीम को मज़बूत शुरुआत दी. सलामी बल्लेबाज़ रोहित शर्मा ने 46 और शिखर धवन ने 69 रन बनाए. दोनो ने पहले विकेट के लिए 123 रन की साझेदारी की. भारत के लिए सबसे ज़्यादा रन कप्तान कोहली ने बनाए. धुआंधार बल्लेबाज़ी करते हुए उन्होंने 83 गेंदों में 13 चौक्कों और दो छक्कों की मदद से 102 रन बनाए. वे भारतीय पारी की आखिरी गेंद पर में आउट हुए. कोहली और आर अश्विन ने सातवें विकेट के लिए 90 रन जोड़े. कोहली मैन ऑफ़ द मैच बने. भारत की जीत में उसके गेंदबाज़ों की भी अहम भूमिका रही. भारत के विशाल स्कोर के दबाव में वेस्टइंडीज़ शुरु से ही दबाव में आ गया जिसका पूरा फ़ायदा भारतीय गेंदबाज़ों ने उठाया. मेज़बान टीम के सलामी बल्लेबाज़ क्रिस गेल मात्र 10 रन ही बना पाए और तीसरे ओवर में भुवनेश्वर कुमार का शिकार बने. ड्वेन ब्रावो का दूसरा विकेट भी भुवनेश्वर कुमार ने ही झटका. वेस्टइंडीज़ की पारी के 10वें ओवर के बाद बारिश की वजह से मैच लगभग डेढ़ घंटा रोकना पड़ा. बारिश के बाद वेस्टइंडीज़ को 39 ओवर में 274 रन का संशोधित लक्ष्य मिला. मैच दोबारा शुरु होते ही वेस्टइंडीज़ के तीन विकेट महज़ पांच रन के अंतर पर आउट हो गए और टीम दबाव में आ गई. हालांकि सुनील नरेन और केमार रोच ने पारी संभालने की कोशिश की और नवें विकेट के लिए 58 रन की साझेदारी की लेकिन भारतीय गेंदबाज़ों के सामने वे टिक नहीं पाए और पूरी टीम 34 ओवर में 171 रन बनाकर आउट हो गई. भारत के लिए भुवनेश्वर कुमार और उमेश यादव ने तीन-तीन और इशांत शर्मा और रविंद्र जडेजा ने दो-दो विकेट लिए. जीत के साथ ही भारत की फ़ाइनल में पहुंचने की उम्मीदें बरक़रार हैं. श्रृखंला में तीसरी टीम श्रीलंका है. भारत और श्रीलंका दोनो के ही अब पांच-पांच अंक हैं लेकिन श्रीलंका का रन रेट भारत से बेहतर है. वेस्टइंडीज़ अंक तालिका में सबसे ऊपर है. |
| DATE: 2013-07-06 |
| LABEL: sports |
| [919] TITLE: विंबलडन: जोकोविच और मरे के बीच होगा फ़ाइनल |
| CONTENT: ब्रिटेन के एंडी मर्रे पर खिताब जीतने का काफ़ी दबाव रहेगा. विंबलडन टूर्नामेंट के पुरुष एकल फ़ाइनल में ब्रिटेन के एंडी मरे का मुक़ाबला सर्बिया के नोवाक जोकोविच से होगा. शुक्रवार को खेले गए दोंनो सेमीफ़ाइनल मुक़ाबले काफ़ी संघर्षपूर्ण रहे. एंडी मरे लगातार दूसरी बार विंबलडन फ़ाइनल में पहुंचे हैं. पिछले साल फ़ाइनल में वे रॉजर फ़ेडरर से हार गए थे. अगर वे रविवार को होने वाले फ़ाइनल में जीत जाते हैं तो 77 साल में ये खिताब जीतने वाले वो पहले ब्रितानी पुरुष खिलाड़ी बन जाएंगे. साल 1936 में फ्रेड पेरी विंबलडन एकल खिताब जीतने वाले आखिरी ब्रितानी थे. एंडी मरे और यानोविच का सेमीफ़ाइनल मैच तीसरे सेट के बाद रोशनी कम होने की वजह से कुछ देर रोकना पड़ा और सेंटर कोर्ट की छत बंद करनी पड़ी. हालांकि मरे को इस बात से शिकायत की लेकिन फिर शानदार खेल का प्रर्दशन करते हुए उन्होंने मैच अपने नाम कर लिया. जीत के बाद मरे ने बीबीसी स्पोर्ट से कहा ये एक बहुत मुश्किल मैच था और विंबलडन में मैंने इस साल जितने भी मैच खेले उन सब से बिल्कुल अलग था. नोवाक ज्योकोविच साल 2011 में विंबलडन खिताब जीत चुके हैं. वहीं शीर्ष वरीयता प्राप्त नोवाक जोकोविच का ये लगातार 13वां ग्रैंड स्लैम सेमीफ़ाइनल था. रविवार को अगर वे जीतने में क़ामयाब होते हैं तो ये उनका सातवां ग्रैंड स्लैम और दूसरा विंबलडन खिताब होगा. शीर्ष वरीयता प्राप्त नोवाक जोकोविच और आठवीं वरीयता प्राप्त डेल पोट्रो के बीच मैच विंबलडन के इतिहास का सबसे लंबा पुरुष सेमीफ़ाइनल है. ये मैच चार घंटे 44 मिनट तक चला. इससे पहले साल 1989 में बोरिस बेकर और इवान लेंडल के बीच सबसे लंबा सेमीफ़ाइनल मुक़ाबला हुआ था जिसे बेकर ने जीता था. मैच जीतने के बाद जोकोविच ने कहा ये मेरे अब तक के सबसे शानदार मैचों में से एक था. पहला सेमीफ़ाइनल लंबा खिंचने की वजह से मरे और यानोविच के बीच दूसरा मैच भी देर से शुरु हुआ. |
| DATE: 2013-07-06 |
| LABEL: sports |
| [920] TITLE: करो या मरो जैसे मुकाबले में भारत भिड़ेगा वेस्टइंडीज से |
| CONTENT: वेस्टइंडीज़ में खेली जा रही त्रिकोणीय एकदिवसीय सिरीज़ में शुक्रवार को भारत एक बेहद अहम मुक़ाबले में मेज़बान वेस्टइंडीज़ का सामना करेगा. यह मैच भारत के लिए फाइनल की दौड़ में बने रहने के लिए लगभग करो या मरो जैसा है. अपनी इस हालत के लिए भारत ख़ुद ज़िम्मेदार है क्योंकि पहले तो उसे वेस्टइंडीज़ ने एक विकेट से हराया और उसके बाद श्रीलंका ने भी 161 रनो से करारी मात दी. श्रीलंका के ख़िलाफ पिछले 10 में से सात मैच जीतने वाले भारत से इतने खराब प्रदर्शन की शायद ही किसी ने कल्पना की हो. पहले तो भारत के गेंदबाज़ो ने 348 रन लुटाये और उसके बाद सारी टीम महज़ 187 रनो पर सिमट गई. इतना ही नही श्रीलंका एक बोनस अंक भी लेने में कामयाब रहा. अब अंक तालिका में वेस्टइंडीज़ नौ अंको के साथ पहले और श्रीलंका पाँच अंको के साथ दूसरे स्थान पर है जबकि भारत को अभी भी जीत और अंक का खाता खोलना है. अब हालत ये है कि भारत को हर हाल में पहले तो वेस्टइंडीज़ और उसके बाद मंगलवार को श्रीलंका से होने वाले मैच में भी जीत हासिल करनी होगी और इसके साथ-साथ यह दुआ भी करनी होगी कि श्रीलंका भारत और वेस्टइंडीज़ से होने वाले अपने दोनो मैच हार जाए. यकीनन ये एक ऐसी उम्मीद है जिसपर पूरा उतर पाना अब भारतीय टीम के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है. चैंपियंस ट्रॉफी में अपनी शानदार बल्लेबाज़ी और गेंदबाज़ी के दम पर सभी टीमो को मात देने वाली भारतीय क्रिकेट टीम वेस्टइंडीज़ पहुंचते ही अपनी लय खो बैठी. शिखर धवन विराट कोहली और दिनेश कार्तिक का बल्ला नही चला तो मुरली विजय रोहित शर्मा रविन्द्र जडेजा और सुरेश रैना अच्छी शुरूआत को बड़े स्कोर में बदलने में नाकाम रहे. गेंदबाज़ी में युवा तेज़ गेंदबाज़ मोहम्मद शमी अपनी छाप छोड़ने में नाकाम रहे तो अनुभवी इशांत शर्मा भी बेअसर रहे. खासकर श्रीलंका के बल्लेबाज़ो ने भारतीय गेंदबाज़ी को जैसे आईना दिखा दिया. महेंद्र सिंह धोनी का चोटिल होकर टीम से बाहर होना भारत को महंगा पडा. विराट कोहली को अभी दोष नही दिया जा सकता क्योंकि कप्तानी का भार संभालने के लिए उनके पास धोनी जैसा अनुभव नही है. इस त्रिकोणीय सिरीज़ में भारत की फिल्डिंग का स्तर भी उतना अच्छा नही दिखा जितना चैंपियंस ट्रॉफी में था. आखिरकार भारतीय टीम कैसे अचानक अर्श से फर्श पर आ गई यह सवाल कई क्रिकेट पंडितो को कचोट रहा होगा. भारतीय गेंदबाज़ी श्रीलंका के ख़िलाफ इतनी असहाय दिखी कि उपुल थरंगा और महेला जयवर्धने ने पहले विकेट के लिए 213 रन जोडे और केवल एक विकेट के नुकसान पर 348 रन बनाकर नया रिकार्ड भी बना दिया. इससे पहले एकदिवसीय क्रिकेट में केवल एक विकेट खोकर सबसे ज़्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड ऑस्ट्रेलिया के नाम था जब उसने साल 2006 में ब्रिस्बेन में श्रीलंका के ख़िलाफ एक विकेट खोकर 267 रन बनाए थे. इसके साथ ही भारत के नाम एक और नया रिकार्ड बना जब टॉस जीतकर पहले फिल्डिंग करते हुए वह 161 रनो के विशाल अंतर से हारा. इससे पहले भारत साल 2002 में विजयवाड़ा में वेस्टइंडीज़ से 135 रनो से हारा था. अब भारत वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ कैसा खेलता है यह तो मैच के बाद ही पता चलेगा लेकिन वेस्टइंडीज़ क्रिस गेल सैमी पोलार्ड और सलामी बल्लेबाज़ जॉनसन चार्लस के साथ-साथ डैरेन ब्रावो जैसे दमदार खिलाडियो के दम पर कही से भी कमज़ोर टीम नही लगती. गेंदबाज़ी में वेस्टइंडीज़ के पास सुनील नारायण जैसा तुरूप का इक्का है जो अपनी स्पिन से कभी भी मैच में बदलाव ला सकता है. वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ भारत भुवनेश्वर कुमार को टीम से जगह दे सकता है जो श्रीलंका के ख़िलाफ नही खेले थे. अब इस त्रिकोणीय सिरीज़ के बचे हुए सारे बाकि मैच पोर्ट ऑफ स्पेन में होंगे जबकि अब तक हुए मैच किंग्स्टन में खेले गए थे. हो सकता है मैदान बदलने से भारत का भाग्य भी बदल जाए जिसकी क्रिकेट में खेल के बाद सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है. |
| DATE: 2013-07-05 |
| LABEL: sports |
| [921] TITLE: विबलडन 2013: पेस, बोपन्ना हारे, सानिया मिक्स्ड डबल्स से बाहर |
| CONTENT: विंबलडन प्रतियोगिता में भारत के लिए ये एक बुरा दिन साबित हुआ. लिएंडर पेस रोहन बोपन्ना और सानिया मिर्ज़ा अपने-अपने मैच हार गए. पेस और बोपन्ना सेमीफाइनल में पुरूष डबल्स में हार गए जबकि सानिया मिर्ज़ा और रोमानिया के होरिया टेकाउ की जोड़ी मिक्स्ड डबल्स में एक क्वार्टरफाइनल मुकाबले में हार गई. इस तरह साल के तीसरे ग्रैंड स्लैम विंबलडन में भारतीय चुनौती ख़त्म हो गई है. विबंलडन टेनिस प्रतियोगिता का महिला फ़ाइनल जर्मनी की सबीन लिज़िकी और फ्रांस की मारियन बार्टोली के बीच खेला जाएगा. दोंनो ने इससे पहले कभी विंबलडन नहीं जीता है. गुरुवार को खेले गए पहले सेमीफ़ाइनल में मारियन बार्टोली ने 20वीं वरीयता वाली बेल्जियम की कर्स्टन फ़्लिपकन्स को आसानी से सीधे सेटों में 6-1 6-2 से हराया. लेकिन सबीन लिज़िकी की राह इतनी आसान नहीं थी. उन्होंने चौथी वरियता प्राप्त पोलैंड की एग्नियेश्का रादवांस्का को रोमांचक मुक़ाबले में 6-4 2-6 9-7 से हराकर फानइल में जगह बनाई. ये लिज़िकी का पहला और बार्टोली का दूसरा विंबलडन फ़ाइनल है. छह साल पहले साल 2007 में बार्टोली को विंबलडन फ़ाइनल में वीनस विलियम्स ने हराया था. लिज़िकी 14 साल में पहली जर्मन खिलाड़ी हैं जो विंबलडन के महिला फ़ाइनल में पहुंची है. इससे पहले साल 1999 में स्टेफ़ी ग्राफ़ फ़ाइनल खेलने वाली आखिरी जर्मन खिलाड़ी थीं. इससे पहले लिज़िकी साल 2011 में विंबलडन सेमीफ़ाइनल में पहुंची थीं. इस बार उन्होंने चौथे दौर में बड़ा उलट-फेर कर गत विजेता सरीना विलियम्स को हराया था. सेमीफ़ाइनल मैच जीतने के बाद 23वीं वरीयता प्राप्त लिज़िकी ने बीबीसी स्पोर्ट को बताया ये अविश्वसनीय मैच था आखिरी के कुछ गेम बहुत ही रोमांचक थे. मैं नहीं जानती थी कि मैच का नतीजा क्या होगा. मैं पूरी मेहनत के साथ खेली लेकिन मुझे यक़ीन था कि स्कोर कुछ भी हो मैं जीत सकती हूं. गुरुवार को मुक़ाबले में उतरे सभी भारतीय खिलाड़ी अपने-अपने मैच हार गए. पुरुषों के पहले डबल्स सेमीफ़ाइनल में शीर्ष जोड़ी ब्रायन बंधुओं ने भारत के रोहन बोपन्ना और फ्रांस के ई. रोजर-वासेलिन को 6-7 6-4 6-3 5-7 6-3 से हराया. दूसरे सेमीफ़ाइनल में भारत के लिएंडर पेस और चेक गणराज्य के राडेक स्टेपानेक की जोड़ी 6-3 4-6 1-6 6-3 6-3 से डोडिग और मेलो की जोड़ी से हार गई. वहीं भारत की सानिया मिर्ज़ा और रोमानिया के हाउरी टेकाउ अपना मिक्सड डबल्स क्वार्टरफ़ाइनल मुक़ाबला सीधे सेटों में हार गए. |
| DATE: 2013-07-05 |
| LABEL: sports |
| [922] TITLE: मरे की जीत से ब्रिटेन की उम्मीदें बरक़रार |
| CONTENT: दुनिया के दूसरे नंबर के टेनिस खिलाड़ी एंडी मरे के विंबलडन के सेमीफ़ाइनल में पहुंचने के साथ ब्रिटेन में ख़िताब जीतने की उम्मीद फिर से ताज़ा हो गई है. ब्रिटेन ने ये ख़िताब पिछली बार 1936 यानी 77 साल पहले जीता था. गत उपविजेता मरे ने क्वार्टरफ़ाइनल में स्पेन के फर्नांडो वर्दास्को के ख़िलाफ दो सेट से पिछड़ने के बाद शानदार वापसी की और 4-6 3-6 6-1 6-4 7-5 से जीत दर्ज कर अपने लिए सेमीफाइनल में जगह बना ली है. सेंटर कोर्ट पर खेले गए इस मैच में मरे जब पहले दो सेट हार गए थे तो स्टेडियम में 15000 दर्शकों की मौजूदगी के बावजूद सन्नाटा पसर गया. लेकिन उनके मैच जीतने के बाद स्टेडियम जश्न में डूब गया. मरे लगातार पांचवीं बार इस टूर्नामेंट से सेमीफ़ाइनल में पहुंचे हैं जहां उनका मुक़ाबला 24वीं वरीयता प्राप्त पोलैंड से येर्जी यानोविक्ज़ से होगा. यानोविक्ज़ ने क्वार्टरफ़ाइनल में हमवतन लुकास कुबोट को 7-5 6-4 7-6 से शिकस्त दी. दूसरे सेमीफ़ाइनल में दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी सर्बिया के नोवाक जोकोविच का सामना आठवीं सीड अर्जेंटीना के जुआन मार्टिन डेल पोत्रो से होगा. जोकोविच ने क्वार्टरफ़ाइनल में सातवीं वरीयता प्राप्त चेक गणराज्य के टॉमस बेर्दिच को 7-6 6-4 6-3 से हराया. सर्बियाई खिलाड़ी ने टूर्नामेंट में एक भी सेट नहीं गंवाया है और वो लगातार 13वीं बार ग्रैंड स्लेम के सेमीफ़ाइनल में पहुंचे हैं. पूर्व यू एस ओपन चैंपियन डेल पोत्रो ने चौथी सीड और फ्रेंच ओपन उपविजेता स्पेन के डेविड फेरर को 6-2 6-4 7-6 से शिकस्त देकर अंतिम चार में जगह बनाई है. |
| DATE: 2013-07-04 |
| LABEL: sports |
| [923] TITLE: विंबलडन को मिलेगी नई मलिका |
| CONTENT: बेल्जियम की कर्स्टन फ्लिपकैंस ने पहली बार किसी ग्रैंड स्लेम टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में जगह बनाई है. साल 2007 के बाद ये पहला मौका है जब बेल्जियम की कोई खिलाड़ी विंबलडन के सेमीफाइनल में पहुंची है. पूर्व चैंपियन और आठवीं वरीयता प्राप्त चेक गणराज्य की पेत्रा क्वितोवा को 20वीं वरीयता प्राप्त फ्लिपकैंस ने कड़े मुकाबले में 4-6 6-3 6-4 से हराकर टूर्नामेंट से बाहर कर दिया. क्वितोवा की हार के साथ ही साल के तीसरे ग्रैंड स्लेम में कोई भी पूर्व चैंपियन खिताब की होड़ में नहीं बचा है. 15वीं वरीयता प्राप्त फ्रांस की मेरियन बारतोली दूसरी बार विंबलडन के सेमीफाइनल में पहुंची हैं. इससे पहले उन्होंने 2007 में फाइनल तक का सफर तय किया था लेकिन ख़िताबी मुक़ाबले में अमरीका की सरीना विलियम्स से हार गई थीं. चौथे दौर में सर्वोच्च वरीयता प्राप्त और पांच बार की चैंपियन सरीना विलियम्स की चुनौती को ध्वस्त करने वाली जर्मनी की सबाइन लिसिकी भी दूसरी बार अंतिम चार में पहुंची हैं. उन्होंने इस बार एस्तोनिया की कैया कनेपी को 6-3 6-3 से शिकस्त दी. एशिया की पहली ग्रैंड स्लेम चैंपियन चीन की ली ना को कड़े संघर्ष में पोलैंड की एग्निस्जका रदवांस्का के हाथों 6-7 6-4 2-6 से हार का सामना करना पड़ा. ली ना की हार के साथ ही महिला एकल में एशिया की चुनौती समाप्त हो गई. पिछले साल की उपविजेता और चौथी वरीयता प्राप्त रदवांस्का ख़िताब की होड़ में शामिल सबसे ऊंची वरीयता वाली खिलाड़ी हैं. तीन टॉप खिलाड़ी सरीना बेलारूस की विक्टोरिया अजारेंका और रूस की मारिया शारापोवा टूर्नामेंट से बाहर हो चुकी हैं. कनेपी ने चौथे दौर में ब्रिटेन की लॉरा रॉब्सन को हराया था लेकिन वो लिसिकी के सामने कोई ख़ास चुनौती पेश नहीं कर सकीं और उन्होंने लगातार सेटों में हार स्वीकार कर ली. स्लोएन स्टीफंस की हार के साथ ही महिला एकल में अमरीका की चुनौती भी खत्म हो गई. पुरुष एकल में भी अमरीका का कोई खिलाड़ी ख़िताब की होड़ में नहीं है. |
| DATE: 2013-07-03 |
| LABEL: sports |
| [924] TITLE: क्रिकेटः वेस्टइंडीज़ के बाद अब श्रीलंका ने भारत को धोया |
| CONTENT: वेस्टइंडीज़ के किंग्स्टन में खेली जा रही त्रिकोणीय एकदिवसीय क्रिकेट सिरीज़ में एक मैच में श्रीलंका ने भारत को 161 रन से हरा दिया है. 349 रन के विशाल लक्ष्य का पीछा करने उतरी टीम इंडिया के विकेट लगातार गिरते रहे और पूरी टीम 44 ओवर 5 गेंद पर 187 रन पर ही आउट हो गई. भारतीय पारी की शुरुआत खराब रही. सलामी बल्लेबाज़ रोहित शर्मा सिर्फ 5 रन बनाकर ही पवेलियन लौट गए. इसके बाद मुरली विजय और शिखर धवन की जोड़ी ने संभल कर खेलना शुरु किया पर 52 रनों के स्कोर पर शिखर धवन आउट हो गए. उन्होंने 24 रन बनाए. कप्तान विराट कोहली बल्ले से कोई कमाल नहीं दिखा पाए और सिर्फ दो रन ही बना सके. भारत की ओर से सबसे ज़्यादा रन 49 रन जडेजा ने बनाए. नंबर दो पर रहे सुरेश रैना 33 रन बनाए. इससे पहले भारत ने टॉस जीता और पहले गेंदबाज़ी करने का फैसला किया. श्रीलंकाई पारी की शुरुआत थरंगा और जयवर्धने ने की. हांलाकि दोनों बल्लेबाज़ों ने धीमी शुरुआत की लेकिन वो क्रीज़ पर इस तरह से डटे कि भारतीय गेंदबाज़ विकेट के सिए तरसते रहे. दोनों ने पहले विकेट के लिए डेढ़ सौ से ज्यादा रनों की साझेदारी कर डाली. सलामी बल्लेबाज़ महेला जयवर्धने के 107 और उपल थरंगा के नाबाद 174 रन की बदौलत श्रीलंका ने त्रिकोणीय वनडे सीरीज के दूसरे मैच में भारत के सामने 349 रन का विशाल लक्ष्य दिया. महेला जयवर्धने शानदार 107 रन बनाकर आउट हुए. उसके बाद उपल थरंगा ने उनका साथ देते हुए नाबाद 174 रन बनाए. कप्तान एंजेलो मैथ्यूज ने 44 रनों का योगदान दिया. श्रीलंका के ख़िलाफ भारत के गेंदबाज़ों को कोई खास सफलता नहीं मिली. एक मात्र विकेट अश्विन को मिला. इस मैच में भारत की कमान धोनी की जगह विराट कोहली ने कप्तानी संभाली. धोनी की जगह विकेट कीपिंग के लिए मुरली विजय को रखा गया जबकि भुवनेश्वर की जगह शमी अहमद को मौका दिया गया है. त्रिकोणीय सीरीज में भारत और श्रीलंका दोनों ही मेजबान वेस्टइंडीज से अपना पहला मुकाबला हार चुके है. |
| DATE: 2013-07-03 |
| LABEL: sports |
| [925] TITLE: क्रिकेटः भारत और श्रीलंका पर हार के बाद जीत का दबाव |
| CONTENT: वेस्टइंडीज़ में खेली जा रही त्रिकोणीय एकदिवसीय क्रिकेट सिरीज़ में मंगलवार को भारत और श्रीलंका आमने-सामने होंगे. किंग्स्टन में होने वाला ये मुक़ाबला दोनों ही टीमों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों ही टीमें मेज़बान वेस्टइंडीज़ से अपना-अपना पहला मैच हार चुकी हैं. मंगलवार को हारने वाली टीम के लिए फाइनल की राह मुश्किल हो जाएगी. इसके बाद भारत और श्रीलंका के पास दो दो मैच होंगे. इससे पहले वेस्टइंडीज़ ने न सिर्फ श्रीलंका को मात तो दी ही बल्कि उसे जल्दी हराकर एक बोनस अंक भी बटोरा. अब वेस्टइंडीज़ के नौ अंक हैं जबकि श्रीलंका और भारत को अभी अंकों और जीत का खाता खोलना है. आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी जीतने के बाद भारतीय क्रिकेट टीम आत्मविश्वास और जोश के साथ वेस्टइंडीज़ पहुंची थी लेकिन एक बेहद नज़दीकी और कश्मकश से भरे मैच में वह मेजबान टीम से एक विकेट से हार गई. इतना ही नहीं भारत को कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के अनफिट होने का खामियाजा भी भुगतना पड़ा और अब समाचार ये भी है कि धोनी श्रीलंका के ख़िलाफ़ ही नहीं बल्कि पूरे टूर्नामेंट में ही मुश्किल से ही खेल सकेंगे. उनकी मांसपेशियों में खिंचाव है. इससे भारतीय टीम की मुश्किलें बढ़ गईं हैं. उनकी जगह अम्बाती रायडू को टीम में जगह दी गई है. धोनी वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ बल्लेबाज़ी करने के लिए तो मैदान में उतरे लेकिन विकेटकीपिंग करने के लिए नही. उनकी जगह विराट कोहली ने भारत की कप्तानी की और मैच के बाद इस बात को भी ईमानदारी से स्वीकार किया किया कि मैदान में उनकी कमी खली. अब विराट कोहली के लिए भी यह परीक्षा की घड़ी है कि वो इस टूर्नामेंट में किस तरह से भारतीय टीम को संभालते हैं. भविष्य के कप्तान के रूप में देखे जा रहे विराट कोहली में टीम को संभालने की कितनी काबलियत है इस बात का अंदाज़ा भी इस टूर्नामेंट से हो जाएगा. वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ हार के साथ ही चैंपियंस ट्रॉफी में भारत के लगातार मैच जीतते रहने का सिलसिला था वह भी टूट गया. चैंपियंस ट्रॉफी में भारत ने दो अभ्यास मैचों के अलावा दक्षिण अफ्रीका वेस्टइंडीज़ और पाकिस्तान के खिलाफ ग्रुप मैच जीतने के बाद सेमीफाइनल में श्रीलंका और फाइनल में इंग्लैंड को हराया था. चैंपियंस ट्रॉफी में भारत ने सेमीफाइनल में बेहद आसानी से श्रीलंका को हराया था. इससे पहले भी भारत श्रीलंका पर भारी पड़ता आया है लेकिन इसके बावजूद श्रीलंका को कमज़ोर नही माना जा सकता. खासकर यह देखते हुए कि अभी पिछले कुछ मैचों में भारतीय टीम की जीत में सलामी जोड़ी रोहित शर्मा और शिखर धवन का ही ज़्यादा योगदान रहा है. इस जोडी के अलावा थोड़ा बहुत योगदान विराट कोहली और कप्तान धोनी का भी रहा. हालांकि भारत के मध्यम क्रम के बल्लेबाज़ों की पूरी तरह से परीक्षा अभी तक नही हो सकी है. वेस्टइंडीज़ के साथ खेले गए मैच में यही हुआ. जैसे ही शिखर धवन और विराट कोहली सस्ते में आउट होकर पैवेलियन लौटे वैसे ही पूरी भारतीय टीम दबाव में आ गई. हलांकि सुरेश रैना ने 44 रन ज़रूर बनाए लेकिन रोहित शर्मा को छोडकर किसी ने भी विकेट पर टिकने का दमख़म नही दिखाया. भारत के लिए तसल्ली की बात यह रही कि उसके गेंदबाज़ो ने एक समय कम स्कोर वाले मैच में भी वेस्टइंडीज को लगभग हार के कगार पर पहुंचा दिया था लेकिन मेज़बान टीम की अंतिम जोडी ने आखिरी विकेट के लिए 10 रन जोडकर जीत हासिल कर ली. श्रीलंका के ख़िलाफ़ भारत के गेंदबाज़ों को महिला जयवर्धने कुमार संगकारा उपुल थरंगा और एंजलो मैथ्यूज़ जैसे बल्लेबाज़ों को काबू में रखना होगा जो एक बार चल निकलने पर बड़ा स्कोर खडा करने में माहिर हैं. दूसरी तरफ भारतीय टीम में भी इतनी तो क्षमता है ही कि वो श्रीलंकाई गेंदबाज़ी का बखूबी सामना कर सके. अब देखना है कि जीत के दबाव मे दोनों टीमें कैसा प्रदर्शन करती हैं क्योंकि मंगलवार की हार उन्हें फाइनल की दौड़ से बाहर कर सकती है या फिर उस दौड़ को मुश्किल बना सकती है. |
| DATE: 2013-07-02 |
| LABEL: sports |
| [926] TITLE: विंबलडन: उलटफेर जारी, अब सरीना भी हारीं |
| CONTENT: विंबलडन में गत विजेता सरीना विलियम्स को जर्मनी की सबीन लिसिकी ने चौथे दौर में 6-2 1-6 6-4 से हरा दिया है. सरीना को प्रतियोगिता में शीर्ष वरीयता दी गई थी जबकि लिसिकी 23वीं वरीयता प्राप्त हैं. लिसिकी 2011 में विंबलडन के सेमीफ़ाइनल में पहुँची थीं. इस तरह इस साल के विंबलडन से शीर्ष वरीयता प्राप्त खिलाड़ियों के बाहर होने का सिलसिला जारी है. पुरुषों के वर्ग में रफ़ाएल नडाल जहाँ पहले ही दौर में बाहर हो गए थे तो वहीं गत विजेता रोजर फ़ेडरर को दूसरे दौर में हार का सामना करना पड़ा. महिलाओं के वर्ग में मारिया शरापोवा भी इस बार दूसरे दौर में टूर्नामेंट से बाहर हो गईं. सरीना इससे पहले पाँच बार विंबलडन का ख़िताब जीत चुकी हैं और इस बार वो छठी बार चैंपियन बनने की कोशिश में थीं. उनके बाहर होने का मतलब है कि पुरुष और महिला दोनों वर्गों से गत विजेता इस बार क्वॉर्टर फ़ाइनल से पहले ही हारकर बाहर हो चुके हैं. पहला सेट 2-6 से हारने के बाद सरीना ने दूसरे सेट में आराम से 6-1 से जीत हासिल की. तीसरे सेट में उन्होंने दो बार लिसिकी की सर्विस तोड़ी भी मगर लिसिकी ने हार नहीं मानी. उन्होंने न सिर्फ़ दोनों बार ज़बरदस्त वापसी की बल्कि सरीना की सर्विस तोड़कर 5-4 की बढ़त भी ले ली. इसके बाद उन्होंने दूसरे मैच पॉइंट पर एक बेहतरीन फ़ोरहैंड शॉट लगाया और जीत अपने नाम कर ली. जीत के बाद लिसिकी ने कहा मैं अब भी काँप रही हूँ. मैं बेहद ख़ुश हूँ. सरीना ने पूरा मैच बहुत अच्छा खेला. वह काफ़ी कड़ी प्रतिद्वन्द्वी हैं. ये मैच जीतकर बहुत अच्छा लग रहा है. लिसिकी पूरे मैच में काफ़ी शांत और स्थिर भाव से खेलीं. ये मैच दो घंटे चार मिनट तक चला. लिसिकी का अब क्वॉर्टर फ़ाइनल में मुक़ाबला एस्तोनिया की काइया केनेपी से होगा. बीबीसी से बातचीत में लिसिकी ने कहा कि अभी वह उस मैच के बारे में सोच भी नहीं रही हैं. उनका कहना था मुझे बहुत मज़ा आया. उन्होंने ज़बरदस्त खेल दिखाया मगर मैंने हर अंक के लिए संघर्ष किया. मुझे तो यक़ीन ही नहीं हो रहा है. जब उनसे ये पूछा गया कि क्या वह जीत का जश्न मनाएँगी तो उन्होंने कहा कि अभी नहीं क्योंकि टूर्नामेंट अभी ख़त्म नहीं हुआ है. |
| DATE: 2013-07-01 |
| LABEL: sports |
| [927] TITLE: क्रिकेट: रोमांचक मुकाबले में भारत की हार |
| CONTENT: किंग्सटन में भारत और वेस्टइंडीज के बीच खेले गए त्रिकोणीय श्रंख्ला के दूसरे एकदिवसीय क्रिकेट मैच में वेस्टइंडीज ने भारत को एक विकेट से हरा दिया है. पहले बल्लेबाज़ी करते हुए भारत ने वेस्टइंडीज के सामने जीत के लिए 230 रनों का लक्ष्य रखा था जिसे वेस्टइंडीज ने नौ विकेट के नुकसान पर और 16 गेंद शेष रहते ही पा लिया. वेस्टइंडीज ने रविवार को त्रिकोणीय सीरीज के दूसरे मैच में टॉस जीतकर भारत को बल्लेबाजी का न्यौता दिया था. भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए पचास ओवरों में सात विकेट के नुकसान पर 229 रन बनाए. रोहित शर्मा ने शानदार बल्लेबाजी करते हुए 60 रनों का योगदान दिया. सुरेश रैना ने 44 दिनेश कार्तिक ने 23 और महेंद्र सिंह धोनी ने 27 रनों का योगदान दिया. वहीं वेस्टइंडीज की ओर से रोच बेस्ट और सामी ने दो-दो विकेट लिए. वेस्टइंडीज के नियमित कप्तान ड्वेन ब्रावो ग्रोइन चोट के कारण इस मैच में नहीं खेल सके. उनकी जगह किरोन पोलार्ड कप्तानी कर रहे हैं. वेस्टइंडीज की ओर से रवि रामपाल भी टखने की मांसपेशियों में खिंचाव के कारण अंतिम एकादश में शामिल नहीं हो पाए. इन दो चोटिल खिलाड़ियों की जगह टिनो बेस्ट और डेवन स्मिथ को टीम में शामिल किया गया. वहीं भारत ने अंतिम एकादश में कोई बदलाव नहीं किया है. |
| DATE: 2013-07-01 |
| LABEL: sports |
| [928] TITLE: वेस्टइंडीज़ से भिड़ेगा भारत, गेल को झेल पाएँगे भारतीय गेंदबाज़? |
| CONTENT: भारत ने इंग्लैंड को हराकर आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफी अपने नाम कर ली है. अब भारतीय क्रिकेट टीम वेस्ट इंडीज में त्रिकोणीय एक दिवसीय क्रिकेट सीरीज खेल रही है. आज मुकाबला भारत और वेस्टइंडीज़ के बीच है. वेस्टइंडीज़ ने अपने पहले मुकाबले में श्रीलंका को छह विकेट से हरा दिया है. क्रिस गेल ने 100 गेंदों में 109 रन जड़े हैं. भारतीय टीम ने चैंपियंस ट्रॉफी जीत कर ना सिर्फ क्रिकेट की दुनिया में अपना लोहा मनवाया है बल्कि वो यह संदेश देने में भी कामयाब रही कि उसमें किसी भी हालात में किसी भी टीम का सामना करने का दम है. भारत के बारे में माना जाता रहा है कि वो विदेशी पिचों पर अच्छा नहीं करती. ऐसे में त्रिकोणीय सीरीज में भारत के सामने विदेशी पिचों पर शानदार प्रदर्शन करने का दबाव होगा. चैंपियंस ट्रॉफी में भारतीय गेंदबाजों ने सधा हुआ प्रदर्शन किया है लेकिन क्रिस गेल जैसे तूफानी बल्लेबाज को हल्के में नहीं लिया जा सकता है. त्रिकोणीय एकदिवसीय क्रिकेट सीरीज का फाइनल 11 जुलाई को खेला जाएगा. फाइनल से पहले तीनो टीमें आपस में दो-दो मैच खेलेंगी. वैसे तो भारत ने आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफी में बेहद आसानी से ग्रुप मैच में वेस्टइंडीज़ को और उसके बाद सेमीफाइनल में श्रीलंका को भी मात दी थी. लेकिन क्रिकेट जानकारों और पूर्व क्रिकेट खिलाडियों की मानें तो पूरा भरोसा पाने के लिए भारत के सामने कड़ी परीक्षा की असली घड़ी अब आई है. भारत के पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह कहते है कि वाकई अब इस टीम के लिए एसिड टेस्ट जैसी स्थिति है. अब उस पर अच्छा खासा दबाव भी होगा. क्योंकि इन्होंने इतना शानदार प्रदर्शन किया है. मनिंदर सिंह के अनुसार भारत के क्रिकेट प्रेमी हमेशा टीम से इसी तरह की खुशियाँ देने की उम्मीद करते रहते हैं. ऐसा हमेशा कर पाना किसी भी टीम के लिए संभव नही है और ना ही ऐसा हर समय होता है. मनिंदर मानते हैं कि अब क्रिकेट जानकारों और प्रशंसको को चाहिए कि वह इन खिलाडियों के साथ तब भी धैर्य दिखाएं जब वह अच्छा ना खेल सकें क्योंकि इस टीम में ज़्यादातर ऐसे खिलाडी हैं जो 2015 के विश्वकप क्रिकेट टूर्नामेंट में नज़र आएंगे. लेकिन यह बात भी सही है कि अब वक्त आया है कि खिलाड़ी दिखाएं कि उनमें कितना दमख़म है. उदाहरण के लिए शिखर धवन ने अपने पहले टेस्ट मैच में 187 रन बनाए और उसके बाद चैंम्पियंस ट्रॉफी में भी दो शतक के साथ मैन ऑफ द सिरीज़ रहे. अब शिखर पर उम्मीदों का दबाव होगा. वह एक-दो बार नाकाम भी होंगे और तब पता चलेगा कि उनमें वास्तव में कितनी प्रतिभा है. जहॉ तक त्रिकोणीय सीरीज की बात है तो वो तो अच्छी ही होगी. वेस्टइंडीज़ की पिचें भी भारत और श्रीलंका जैसी ही है. अपनी ही घरेलू पिचों से वेस्टइंडीज़ अच्छी तरह वाकिफ होगा और आम दर्शकों और क्रिकेट प्रेमियों को भी आनंद आएगा क्योंकि एक टीम तो विश्वकप और चैंम्पियंस ट्रॉफी की चैंम्पियन टीम है तो दूसरी विश्वकप फाइनल खेलने वाली टीम. वहीं भारत के पूर्व विकेटकीपर बल्लेबाज़ नयन मोंगिया मानते है कि इस टीम ने जिस तरह का खेल दिखाया उससे किसी को भी पुराने खिलाडियों की याद तक नही आई. यह बडा ही सकारात्मक बदलाव है. नयन मोंगिया के अनुसार जिस खिलाड़ी को जैसा भी मौक़ा मिला उसने उसका भरपूर फायदा उठाया. लगातार पॉच मैच उन्होने बेहद आसानी से जीते यह बहुत बड़ी बात है और जहाँ तक कप्तान की बात है तो वह उतना ही अच्छा होता है जितनी अच्छी टीम होती है. बीच में उन्होंने कुछ सही निर्णय नही लिए लेकिन अब चयन में उनकी चलती है और वह खिलाड़ियों को पूरा समर्थन देते है और जब ऐसा होता है तो खिलाडी का आत्मविश्वास भी बढ़ता है. चैंम्पियंस ट्रॉफी जीतने से टीम जोश में है लम्बे समय बाद गेंदबाज़ी में भी दम दिखा है. भारतीय प्रशंसकों को उम्मीद है कि भारत वेस्टइंडीज़ में होने वाली त्रिकोणीय सीरीज भी जीतेगा. |
| DATE: 2013-06-30 |
| LABEL: sports |
| [929] TITLE: पहली विश्व टेस्ट क्रिकेट प्रतियोगिता 2017 में: आईसीसी |
| CONTENT: अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने घोषणा की है कि पहली विश्व टेस्ट क्रिकेट प्रतियोगिता इंग्लैंड और वेल्स में साल 2017 में खेली जाएगी. टेस्ट क्रिकेट की ये विश्व प्रतियोगिता चैंपियंस ट्रॉफ़ी की जगह लेगी. आईसीसी ने शनिवार को लंदन में हुए अपने वार्षिक सम्मेलन के बाद ये घोषणा की. साल 2015 से 2023 के बीच होने वाली कई अहम प्रतियोगिताओं की मेजबानी के लिए भारत को चुना गया है. साल 2016 में होने वाली विश्व ट्वेंटी-ट्वेंटी प्रतियोगिता के अलावा साल 2021 में होने वाली दूसरी टेस्ट क्रिकेट विश्व प्रतियोगिता और साल 2023 में होने वाली 50-ओवर विश्व कप प्रतियोगिता की मेजबानी भारत करेगा. आईसीसी के मुख्य कार्यकारी डेविड रिचर्डसन ने एक विज्ञप्ति में कहा हम वर्ष 2023 तक होने वाली रोचक प्रतियोगिताओं के कार्यक्रम की घोषणा करते हुए काफ़ी खुशी महसूस कर रहे हैं. दक्षिण अफ़्रीका के विकेट कीपर रह चुके डेविड रिचर्डसन ने आगे कहा इंग्लैंड और वेल्स में हाल ही में हुए चैंपियंस ट्रॉफ़ी की सभी लोगों ने तारीफ़ की लेकिन हर चार साल में क्रिकेट के सभी स्वरूपों की विश्व प्रतियोगिता की नीति काफ़ी अच्छी है. लिहाज़ा आईसीसी बोर्ड चैंपियंस ट्रॉफ़ी प्रतियोगिता के बदले विश्व टेस्ट क्रिकेट प्रतियोगिता खेले जाने पर सहमत हो गई है. उन्होंने आगे कहा अब जब विश्व टेस्ट क्रिकेट प्रतियोगिता तय हो गया है हम खेल के खेल की रूपरेखा और क्वालिफिकेशन पर काम करेंगे और आईसीसी बोर्ड के पास स्वीकृति के लिए भेजेंगे. आईसीसी ने इंग्लैंड में इसी साल चैंपियंस ट्रॉफी की जगह टेस्ट विश्व प्रतियोगिता आयोजित कराने की योजना बनाई थी लेकिन व्यापारिक बंधनों के कारण एक दिवसीय क्रिकेट प्रतियोगिता खेली गई. जो कि आखिरी चैंपियंस ट्रॉफ़ी साबित हुई. आईसीसी ने अफ़ग़ानिस्तान को अपना 37वां सदस्य देश बनाया है जिसका रैंक पहले दस टेस्ट क्रिकेट खेलने वाले देशों के बाद आता है. |
| DATE: 2013-06-30 |
| LABEL: sports |
| [930] TITLE: सलमान बट ने स्पॉट फ़िक्सिंग कबूली |
| CONTENT: पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेट कप्तान सलमान बट ने पहली बार स्पॉट फ़िक्सिंग में शामिल होने की बात स्वीकार की है और अपने देश और दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमियों से माफी मांगी है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार पूर्व कप्तान ने कहा कि उन्होंने क्रिकेट प्रेमियों के दिल को दुखाया और इस पर वो शर्मिंदा हैं. लाहौर में एक प्रेस कांफ्रेस में सलमान बट ने कहा मैं आज तमाम पाकिस्तानियों और पूरी दुनिया में मौजूद क्रिकेट प्रेमियों से अपनी गलती पर माफी मांगता हूं. 28 वर्षीय सलमान बट के साथ 21 वर्षीय मोहम्मद आमिर और 30 वर्षीय मोहम्मद आसिफ़ को 2010 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट मैच के दौरान जानबूझ कर नो बॉल करवाने पर जेल भेज दिया गया था. इस मामले में अदालत ने सलमान बट को ढाई साल मोहम्मद आसिफ को एक साल और मोहम्मद आमिर को छह महीने कैद की सजा सुनाई. सलमान बट ने कहा कि क्रिकेट खेलने वालों को स्पॉट फ़िक्सिंग से दूर रहना चाहिए ताकि उन्हें करियर में कभी परेशानी का सामना न करना पड़े. पूर्व कप्तान ने कहा कि उनकी सजा में दो साल अभी बाकी हैं और उन्होंने आईसीसी से आग्रह किया है कि उन्हें घरेलू क्रिकेट खेलने की अनुमति दी जानी चाहिए. स्पॉट फ़िक्सिंग के दोषी करार तीनों क्रिकेटरों ने कैद की सजाओं के खिलाफ अपीलें की थीं जिन्हें लंदन की अपीली कोर्ट ने खारिज करते हुए उनकी सजाएं बरकरार रखी थीं. इस मामले में एक कथित एजेंट मज़हर मजीद को भी सजा हुई थी. तीनों क्रिकेटर जेल से बाहर आ चुके हैं जबकि मजीद अब भी 32 महीने की सजा काट रहे हैं. |
| DATE: 2013-06-29 |
| LABEL: sports |
| [931] TITLE: भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों ने 'किया लॉयल्टी टेस्ट' |
| CONTENT: बीस साल से ज़्यादा वक्त पहले ब्रिटेन की कंज़र्वेटिव पार्टी के नेता नॉर्मन टेबिट ने बदनाम क्रिकेट टेस्ट का सुझाव दिया था. लॉस एंजेलेस टाइम्स में उन्होंने कहा कि दक्षिण एशियाई मूल के ब्रितानी नागरिकों से पूछा जाना चाहिए कि वह किस क्रिकेट टीम के समर्थक हैं. अगर वह इंग्लैंड के बजाय भारत या पाकिस्तान के प्रशंसक हैं तो यह समझा जाना चाहिए कि वह ब्रितानी समाज में घुलने-मिलने में सफल नहीं हो पाए हैं. एक कट्टर भारतीय प्रशंसक के रूप में बाकियों के साथ मुझे भी इस टिप्पणी पर गुस्सा आया था. वह यह समझने में नाकाम रहे थे कि हममें से बहुत से लोग जिनके मां-बाप दक्षिण एशिया से ब्रिटेन आए थे उनकी पहचान थोड़ी जटिल थी. हमें ब्रितानी होने पर गर्व था लेकिन इसके साथ ही अपने भारतीय मूल पर भी और क्रिकेट ऐसी जगह थी जहां हम अपनी उस पहचान को दिखा सकते थे. मुझे याद है कि मेरे पिताजी हर क्रिसमस पर हमें महारानी का भाषण सुनने पर मजबूर करते थे और कहते थे कि कोई भी मेरे परिवार को नहीं बताएगा कि किसका समर्थन करना है. तो यह देखना मज़ेदार होता कि रविवार को चैंपियंस ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल में दर्शकों को देखकर लॉर्ड टेबिट ने क्या निष्कर्ष निकाला होतास्टेडियम भारतीय प्रशंसकों से भरा हुआ था जिनमें से ज्यादातर युवा थे और उनका लहजा बर्मिंघम या लंदन का था. कइयों ने भारतीय झंडा लपेटा हुआ था और चिल्ला रहे थे इंडिया ज़िंदाबाद. बारिश के दौरान कुछ एक खेल खेलने लगे जिसका नाम था- इंग्लैंड के प्रशंसक को ढूंढो- क्योंकि दर्शकों में मेज़बान टीम के प्रशंसक आसानी से नहीं मिल रहे थे. लेकिन इस मैच से मुझे यह भी लगा कि शायद एक नया क्रिकेट टेस्ट तैयार हो रहा है. इसका पहला संकेत तब मिला जब इंग्लैंड के रवि बोपरा गेंदबाज़ी करने आए. जैसे ही बॉल करने के लिए दौड़े युवा भारतीयों के एक समूह ने चिल्लाना शुरू कर दिया गद्दार गद्दार गद्दार. फिर जब वह बैटिंग करने आए और आउट हो गए तो उनके ख़िलाफ़ नारे लगाने वाले कोने में ख़ुशियाँ मनाने की आवाज़ें आईं. जब मैं ड्रिंक लेने के लिए लाइन में लगा था तो इंग्लैंड के एक बुजुर्ग प्रशंसक मेरी ओर मुड़े और कहा तुम बोपारा के लिए इतनी दिक्कत क्यों पैदा कर रहे होइससे पहले कि मैं कुछ बोल पाता एक युवा भारतीय प्रशंसक ने जवाब दिया क्योंकि वह इंग्लैंड के लिए खेलता है वह एक कलंक है. मैंने इंग्लैंड के उस प्रशंसक को धीरे से कहा कि सभी भारतीय प्रशंसक ऐसा नहीं सोचते हैं. हममें से तो ज़्यादातर मानते हैं कि वह एक बढ़िया आदर्श है और ज़्यादा से ज़्यादा एशियाई खिलाड़ियों को इंग्लैंड की टीम में शामिल होना चाहिए. मैं वापस आया तो देखा कि इंग्लैंड का एक सिख क्रिकेट प्रशंसक कुछ ही पंक्ति आगे बैठा हुआ था लेकिन वह भारतीय झंडा लिए नहीं था उसने ब्रिटेन की टीशर्ट पहनी हुई थी और उस पर उसके प्रिय खिलाड़ी का नाम लिखा था- मॉन्टी पनेसर. जब भी इंग्लैंड विकेट लेता वह अपनी सीट पर ख़ुशी से उछल जाता. भारतीय प्रशंसकों को यह गवारा नहीं हुआ. करीब पांच लोग उसके पास पहुंच गए और चिल्लाने लगे बिके हुए को ढूंढ़ो. सिख प्रशंसक यह सुनकर आगबबूला हो गया और उन पर चिल्लाने लगा तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे बिका हुआ कहने की मुझे अपनी संस्कृति पर गर्व है और तुम्हें कोई हक नहीं है कि मुझ पर चिल्लाओं सिर्फ़ इसलिए कि मैं इंग्लैंड का समर्थन कर रहा हूं. ठीक उसी समय कुछ वेटरों ने आकर मामले को आगे बढ़ने से रोका. मैच ख़त्म होने के बाद भी उस सिख प्रशंसक का ग़ुस्सा ख़त्म नहीं हुआ था. मैंने उससे भारतीय प्रशंसकों के बर्ताव के लिए माफ़ी मांगी तो उसने कहा कि वे लोग भारतीय संस्कृति के बारे में कुछ नहीं जानते फिर भी मुझे बिका हुआ कह रहे हैं. इससे मुझे वह गुस्सा याद आ गया जो टेबिट के क्रिकेट टेस्ट के प्रस्ताव के बाद मुझे महसूस हुआ था. करीब 20 साल बाद भारतीय प्रशंसकों का एक छोटा सा समूह अपना ही एक टेस्ट ईजाद कर रहा है. अगर आप इंग्लैंड का समर्थन कर रहे हैं तो उनकी नज़रों में आपने अपनी संस्कृति और विरासत से मुंह मोड़ लिया है. मेरा उन लोगों के लिए जवाब एकदम सीधा है. बस क्रिकेट देखो यार. |
| DATE: 2013-06-28 |
| LABEL: sports |
| [932] TITLE: नडाल के बाद फ़ेडरर भी विंबलडन से बाहर |
| CONTENT: दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट विंबलडन में इस साल शुरू से ही बड़े उलटफेर हो रहे हैं. प्रतियोगिता के पहले ही दौर में मैच हारने वाले स्पेन के रफ़ाएल नडाल के बाद बारी आई स्विट्ज़रलैंड के रोजर फ़ेडरर की. दूसरे दौर के मैच में तीसरी वरीयता प्राप्त फ़ेडरर हार गए. सात बार विंबलडन चैम्पियन रह चुके फ़ेडरर को यूक्रेन के सर्जेई स्टाकोवस्की ने चार सेटों के मैच में 6-7 7-6 7-5 और 7-6 से मात दी. पिछले साल भी फ़ेडरर विंबलडन चैम्पियन बने थे और नडाल के हारने के बाद उन्हें ख़िताब का प्रबल दावेदार माना जा रहा था. लेकिन इस प्रतियोगिता में वे भी ज़्यादा नहीं टिक पाए. शुरू से ही स्टाकोवस्की ने उन्हें कड़ी चुनौती दी. हालाँकि फ़ेडरर पहला सेट टाई ब्रेकर में जीतने में सफल रहे. उसके बाद अगले तीनों सेट अपने नाम करके स्टाकोवस्की ने इतिहास रच दिया. पहला सेट 7-6 से जीतने के बाद फ़ेडरर को स्टाकोवस्की से कड़ी चुनौती मिली. दूसरा सेट टाई ब्रेकर में जीतने के बाद तीसरा सेट स्टाकोवस्की ने 7-5 से जीता. चौथे सेट में फ़ेडरर ने वापसी की ज़बरदस्त कोशिश की. लेकिन मुक़ाबला टाई ब्रेकर में गया और फिर फ़ेडरर ये सेट भी हार गए. जीत के बाद स्टाकोवस्की ने कहा कि ये जीत उनके लिए बहुत बड़ी जीत है. |
| DATE: 2013-06-27 |
| LABEL: sports |
| [933] TITLE: चोट के कारण सात खिलाड़ी विंबलडन से हटे |
| CONTENT: दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट विंबलडन के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि सात खिलाड़ियों को चोट लगने के कारण प्रतियोगिता के दूसरे दौर से ही हटना पड़ा है. इन खिलाड़ियों में महिलाओं के वर्ग में दूसरी वरीयता प्राप्त विक्टोरिया अज़ारेन्का और पुरुषों के वर्ग में छठी वरीयता प्राप्त जो विल्फ़्रेड सोंगा भी शामिल हैं. हालाँकि प्रतियोगिता के आयोजकों ने अज़ारेन्का के उस दावे को ख़ारिज कर दिया है कि कोर्ट काफ़ी ख़राब स्थिति में हैं. आयोजकों ने कोर्ट को शानदार कहा है. लेकिन दूसरे दौर में हारकर प्रतियोगिता से बाहर हुईं रूस की मारिया शरापोवा ने कोर्ट के सतह को ख़तरनाक करार दिया. इससे पहले स्पेन के रफ़ाएल नडाल को हराकर सनसनी फैलाने वाले बेल्जियम के स्टीव डारसिस ने कंधे की चोट के कारण प्रतियोगिता से अपने को हटा लिया. इनके अलावा मारिन सिलिच और जॉन आइज़नर भी घुटने की चोट के कारण प्रतियोगिता से हट गए. जबकि रादेक स्टेपनाक मांसपेशियों में खिंचाव के कारण विंबलडन से हट गए हैं. महिलाओं के वर्ग में योरोस्लाव श्वेडोवा भी दाएँ बाँह में चोट के कारण प्रतियोगिता से हट गई हैं. विंबलडन का आयोजन कराने वाले ऑल इंग्लैंड लॉन टेनिस एंड कॉर्केट क्लब ने एक बयान में कहा है कोर्ट की तैयारियों में कोई बदलाव नहीं किया गया है. और जहाँ तक हमें जानकारी है ग्रास कोर्ट शानदार स्थिति में हैं. दरअसल ये पिछले साल के मुक़ाबले ज़्यादा सूखे हुए हैं. दो बार विंबलडन के सेमी फ़ाइनल में स्थान बना चुकीं विक्टोरिया अज़ारेन्का अपने मैच के दौरान बुरी तरह गिर पड़ीं. हालाँकि उन्होंने मारिया जाओ कोहलर के ख़िलाफ़ मैच 6-1 6-2 से जीत लिया. लेकिन गिरने के बाद उन्हें अपना इलाज कराने में लंबा वक़्त लगा. बाद में अज़ारेन्का ने कहा कोर्ट अच्छी स्थिति में नहीं था. मेरी विरोधी खिलाड़ी भी दो बार गिरीं और मैं तो बुरी तरह गिर पड़ी. मैं नहीं जानती कि ऐसा कोर्ट के कारण हुआ या मौसम के कारण. मैंने कोई ग़लती नहीं की थी और मुझे विंबलडन से हटना पड़ रहा है. दूसरी ओर ऑल इंग्लैंड लॉन टेनिस एंड कॉर्केट क्लब का कहना है कि वैसे तो कई खिलाड़ी प्रतियोगिता से हटे हैं लेकिन सिर्फ़ एक ही ने इसके लिए कोर्ट पर गिरने को ज़िम्मेदार बताया है. पुरुषों के वर्ग में छठी वरीयता प्राप्त सोंगा भी घुटने की चोट के कारण प्रतियोगिता से हट गए हैं. नडाल को हराने वाले डारसिस तो मैच शुरू होने से पहले ही हट गए. उन्होंने बताया कि नडाल के ख़िलाफ़ मैच के दौरान ही वे गिर गए थे और उन्हें कंधे पर चोट लगी थी. |
| DATE: 2013-06-27 |
| LABEL: sports |
| [934] TITLE: क्रिकेट मैच देखने गए सिख को किसने दीं गालियाँ? |
| CONTENT: इंग्लैंड में पैदा हुए भारतीय मूल के भारत प्रशंसक लोगों और इंग्लैंड प्रशंसक लोगों के बीच तकरार होती ही रहती है. 20 साल पहले कंजरवेटिव नेता नोर्मन टैबिट ने क्रिकेट को लेकर एक अजीबोगरीब प्रस्ताव रखा था. उन्होंने लॉस एंजेलेस टाइम्स के दिए एक साक्षात्कार के दौरान सुझाव दिया था कि दक्षिण एशियाई मूल के ब्रिटिश नागरिकों से पूछना चाहिए कि वे किस क्रिकेट टीम का समर्थन करते हैं. यदि वे इंग्लैंड का समर्थन नहीं करते हैं और भारत या पाकिस्तान के प्रशंसक हैं तो उनके मुताबिक यह दर्शाता है कि वे ब्रिटिश समाज के साथ सामंजस्य बैठाने में असफल रहे हैं. एक कट्टर भारतीय प्रशंसक के रूप में मैं और मेरे जैसे कई दूसरे लोग उनकी इस टिप्पणी से काफी नाराज हुए. वह यह समझने में असफल रहे कि हमारे जैसे कई लोग जिनके माता-पिता दक्षिण एशिया से ब्रिटेन आए थे उनकी एक जटिल पहचान है. हमें एक ब्रिटिश होने पर गर्व था लेकिन साथ ही अपनी भारतीय जड़ों पर भी गर्व था. और क्रिकेट के जरिए हम अपनी पहचान के उस हिस्से को जगजाहिर कर सकते हैं. मुझे याद है कि मेरे पिता कहते थे कि मेरे परिवार से कोई यह नहीं पूछेगा कि वे किसका समर्थन करने जा रहे हैं. लेकिन साथ ही वह हर क्रिसमस पर महारानी का भाषण देखने के लिए भी सख्ती के साथ हम सभी से कहते थे. यह देखना रोचक होता है कि चैम्पियंस ट्रॉफी के फाइनल के दौरान रविवार को एजबेस्टन में उमड़ी भीड़ के बारे में लॉर्ड टैबिट क्या कहते. स्टेडियम भारतीय प्रशंसकों से भरा हुआ था उनमें से ज्यादातर युवा थे और हावभाव से बर्मिघम या लंदन के लग रहे थे. कई भारतीय झंड़े को लहरा रहे थे और इंडिया जिन्दाबाद के नारे लग रहे थे. घरेलू मैदान होने के बावजूद कुछ जगहों पर तो इंग्लैंड के प्रशंसकों को खोजना मुश्किल था. लेकिन इस मैच ने मुझे दिखाया कि एक नए तरह का क्रिकेट इम्तिहान सामने आ रहा है. इसका पहला संकेत उस समय मिला जब इंग्लैंड के रवि बोपारा गेंदबाजी के लिए आए. 28 वर्षीय बोपारा का जन्म लंदन में हुआ था. उनके पिता 1970 में भारत के पंजाब से यहाँ आकर बस गए थे. भीड़ में कुछ भारतीय प्रशंसकों के लिए इसका मतलब था कि उन्हें भारत के लिए खेलना चाहिए. इसलिए जब वह गेंद का पीछा करते तो एक युवा भारतीय प्रशंसकों का समूह चिल्लाना शुरू कर देता देशद्रोही देशद्रोही देशद्रोही. जब वह बल्लेबाजी के लिए आए तो प्रसंशकों का एक हिस्सा हूटिंग कर रहा था और जब वह आउट हुए तो मैदान पर जोरदार खुशियाँ देखने को मिलीं. जब मैं ड्रिंक लेने के लिए एक कतार में खड़ा था एक उम्रदराज इंग्लैंड प्रशंसक मुझसे बोला तुम बोपारा को इतना परेशान क्यों कर रहे होइससे पहले कि मैं जवाब देता एक युवा भारतीय प्रशंसक बोला हम उससे घृणा करते हैं क्योंकि वह इंग्लैंड के लिए खेल रहा है. वह अपमानजनक है. इतना कहकर वह तेजी से मैच देखने चला गया. मैंने इंग्लैंड के प्रसंशक को समझाने की कोशिश की कि सभी भारतीय प्रशंसक ऐसा नहीं सोचते हैं और वास्तव में हममें से ज्यादातर लोग सोचते हैं कि वह एक महान रोल मॉडल है और हम चाहते हैं कि अधिक संख्या मे ब्रिटिश एशियन इंग्लैंड के लिए खेलें. इंग्लैंड का प्रशंसक केवल मुस्कराया और अपनी सीट की ओर चला गया. जब मैं अपनी सीट पर पहुँचा तो मैंने देखा कि कुछ कतार आगे पगड़ी पहने हुए एक सिख खड़ा है. उसके हाथ में भारत का झंड़ा नहीं है. उसने पूरे गर्व के साथ एक इंग्लैंड की शर्ट पहन रखी है जिस पर उसके प्रिय खिलाड़ी मोंटी पनेसर का नाम पीछे की ओर लिखा था. जब भी इंग्लैंड कोई विकेट लेता था तो वह अपनी सीट से उछलकर खुशी मनाता था. कुछ भारतीय प्रशंसकों को यह पसंद नहीं आया. करीब पाँच लोग उसके कुछ करीब आ गए. एक ने चिल्लाकर कहा बिकाऊ आदमी को पहचानो. दूसरा उसे नारियल कहने लगा. यह एक अपमानजनक शब्द है जिसका अर्थ है कि तुम बाहर से साँवले हो लेकिन अंदर से सफेद. अपने खिलाफ नारेबाजी सुनकर सिख प्रशंसक भारतीय प्रशंसकों पर गुस्सा हो गया और उनसे लड़ने लगा. उनसे कहा मुझे बिकाऊ कहने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई. मुझे अपनी संस्कृति पर गर्व है और क्योंकि मैं इंग्लैंड का समर्थन कर रहा हूँ सिर्फ इसलिए तुम्हें मेरे साथ ऐसा व्यवहार करने का हक नहीं. इस बीच कुछ कर्मचारियों ने हस्तक्षेप करके हालात को काबू में किया. मैच के बाद मैं सिख प्रशंसक के पास गया और भारतीय प्रशंसकों के व्यवहार के लिए उससे माफी मांगी. वह अभी भी गुस्से में था. उसने कहा कि वे अपनी संस्कृति या भारत के बारे मे कुछ नहीं जानते हैं और इसके बावजूद वे मुझे बिका हुआ कह रहे थे. मुझे वह गुस्सा याद आ गया जो मैंने टैबिट के प्रस्ताव के बाद महसूस किया था. अब 20 साल से अधिक बीत चुके हैं भारतीय प्रशंसकों का एक छोटा हिस्सा खुद अपना इम्तिहान लेना चाह रहा है. यदि आप इंग्लैंड का समर्थन करते हैं तो इसका मतलब ये हुआ कि आपने अपनी संस्कृति और विरासत से मुंह मोड़ लिया है. उनके लिए मेरा जवाब सीधा है. केवल क्रिकेट देखिए. |
| DATE: 2013-06-26 |
| LABEL: sports |
| [935] TITLE: धोनी की अगली परीक्षा अब वेस्ट इंडीज में |
| CONTENT: भारत ने चैंपियंस ट्रॉफी जीतकर दिखाया कि चारों तरफ से पड़ने वाले दबाव का सामना कैसे किया जाए. भारत ने इंग्लैंड को हराकर आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफी अपने नाम कर ली है. टीम ने यह ट्रॉफी जीत कर ना सिर्फ क्रिकेट की दुनिया में अपना लोहा मनवाया बल्कि यह संदेश देने में भी कामयाब रही कि उसमें किसी भी हालात में किसी भी टीम का सामना करने का दम है. कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी और भारतीय टीम का आज सभी गुणगान कर रहे है और इस कहावत को भी सही साबित कर रहे है कि चढ़ते सूरज को सभी सलाम करते है. यह वही टीम है जिसके कप्तान पर आईपीएल के दौरान कई आरोप लगे. कप्तान धोनी की टीम चेन्नई सुपरकिंग्स के मालिक और बीसीसीआई के अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन भी सवालों के घेरे में रहे. वास्तव में उन सवालो के जवाब धोनी ने ना तो तब दिए थे और ना ही इंग्लैंड पहुँचने के बाद. अब ऐसा तो नही है कि भारत की इतनी बडी जीत से उस समय उठे सवालो का कोई महत्व नही रह जाएगा या उन सवालो के जवाब नही मिलने चाहिए. बस हुआ इतना है कि इस टीम ने दिखाया है कि चारों तरफ से पडने वाले दबाव का सामना किस तरह से किया जाना चाहिए. अब भारत के सामने विदेशी पिचों पर शानदार प्रदर्शन करने का दबाव होगा. फिलहाल उनके सामने पहली चुनौती वेस्टइंडीज़ में शुक्रवार से शुरु होने वाली त्रिकोणीय एकदिवसीय क्रिकेट सीरीज़ है. इसमें वेस्टइंडीज़ के अतिरिक्त भारत और श्रीलंका की टीमें भी भाग ले रही हैं. त्रिकोणीय एकदिवसीय क्रिकेट सीरीज़ का फाइनल 11 जुलाई को खेला जाएगा. फाइनल से पहले तीनो टीमें आपस में दो-दो मैच खेलेंगी. वैसे तो भारत ने आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफी में बेहद आसानी से ग्रुप मैच में वेस्टइंडीज़ को और उसके बाद सेमीफाइनल में श्रीलंका को भी मात दी. लेकिन क्रिकेट जानकारो और पूर्व क्रिकेट खिलाडियो की मानें तो पूरा भरोसा पाने के लिए भारत के सामने कडी परीक्षा की असली घड़ी अब आई है. भारत के पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह कहते है कि वाकई अब इस टीम के लिए एसिड टेस्ट जैसी स्थिति है. अब उस पर अच्छा खासा दबाव भी होगा. क्योंकि इन्होंने इतना शानदार प्रदर्शन किया है. मनिंदर सिंह के अनुसार भारत के क्रिकेट प्रशंसक हमेशा टीम से इसी तरह की खुशिया देने की उम्मीद करते रहते है. ऐसा हमेशा कर पाना किसी भी टीम के लिए संभव नही है और ना ही ऐसा हर समय होता है. मनिंदर मानते हैं कि अब क्रिकेट जानकारो और प्रशंसको को चाहिए कि वह इन खिलाडियो के साथ तब भी धैर्य दिखाये जब वह अच्छा ना खेल सके क्योंकि इस टीम में ज़्यादातर वे खिलाडी शामिल हैं जो 2015 के विश्वकप क्रिकेट टूर्नामेंट में नज़र आएंगे. लेकिन यह बात भी सही है कि अब वक्त आया है कि खिलाडी दिखाए कि उनमें कितना दमख़म है. उदाहरण के लिए शिखर धवन ने अपने पहले टेस्ट मैच में 187 रन बनाए और उसके बाद चैंम्पियंस ट्रॉफी में भी दो शतक के साथ मैन ऑफ द सिरीज़ रहे. अब शिखर पर उम्मीदों का दबाव होगा. वह एक-दो बार नाकाम भी होंगे और तब पता चलेगा कि उनमें वास्तव में कितनी प्रतिभा है. अगर टीम कामयाबी के रास्ते से थोडा सा फिसलती है तो धैर्य रखे. जहॉ तक त्रिकोणीय सीरीज़ की बात है तो वो तो अच्छी ही होगी. वेस्टइंडीज़ की पिचें भी भारत और श्रीलंका जैसी ही है. अपनी ही घरेलू पिचो से वेस्टइंडीज़ अच्छी तरह वाकिफ होगा और आम दर्शको और क्रिकेट प्रेमियो को भी आनंद आएगा क्योंकि एक टीम तो विश्वकप और चैंम्पियंस ट्रॉफी की चैंम्पियन टीम है तो दूसरी विश्वकप फाइनल खेलने वाली टीम. इसके अलावा वेस्टइंडीज़ की टीम में बड़े दिनों बाद क्रिस गेल अपनी ही ज़मीन पर खेलेंगे क्योंकि इससे पहले अनुबंध को लेकर उनका बोर्ड से तनाव चल रहा था. मनिंदर सिंह भारतीय क्रिकेट टीम की कामयाबी का श्रेय चयनकर्ताओं को भी देते हैं. वे मानते हैं कि उन्होंने बडा ही ज़बरदस्त कदम उठाते हुए वीरेंद्र सहवाग गौतम गंभीर ज़हीर खान हरभजन सिंह और युवराज सिंह को बाहर का रास्ता दिखाया और युवा खिलाड़ियों पर भरोसा किया. खिलाड़ियों ने भी अपनी ज़िम्मेदारी समझी. इसलिए पहली बधाई के हक़दार तो चयनकर्ता है. वहीं भारत के पूर्व विकेटकीपर बल्लेबाज़ नयन मोंगिया मानते है कि इस टीम ने जिस तरह का खेल दिखाया उससे किसी को भी पुराने खिलाडियों की याद तक नही आई. यह बडा ही सकारात्मक बदलाव है. नयन मोंगिया के अनुसार जिस खिलाडी को जैसा भी मौक़ा मिला उसने उसका भरपूर फायदा उठाया. लगातार पॉच मैच उन्होने बेहद आसानी से जीते यह बहुत बडी बात है और जहॉ तक कप्तान की बात है तो वह उतना ही अच्छा होता है जितनी अच्छी टीम होती है. बीच में उन्होने कुछ सही निर्णय नही लिए लेकिन अब चयन में उनकी चलती है और वह खिलाडियो को पूरा समर्थन देते है और जब ऐसा होता है तो खिलाडी का आत्मविश्वास भी बढ़ता है. चैंम्पियंस ट्रॉफी जीतने से टीम जोश में है लम्बे समय बाद गेंदबाज़ी में भी दम दिखा है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत वेस्टइंडीज़ में होने त्रिकोणीय सीरीज़ भी जीतेगा. |
| DATE: 2013-06-25 |
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| [936] TITLE: धवन, जडेजा .भारतीय क्रिकेट टीम की उम्मीद |
| CONTENT: इंग्लैंड में हुई चैंपियंस ट्रॉफ़ी जीतकर वर्ल्ड कप विजेता भारतीय टीम ने साबित कर दिया है कि वह चैंपियनों की भी चैंपियन है. कई सालों से भारतीय क्रिकेट की पहचान बन चुके कुछ चेहरे इस नई टीम में नहीं थे. ज़हीर खान गौतम गंभीर वीरेंद्र सहवाग जैसे अनुभवी खिलाड़ियों के बिना भी टीम अजेय रही. चैंपियंस ट्रॉफी से कई नए चेहरे छा गए और कई पुराने चेहरों को नई रौनक मिली. शिखर धवन को आज भारतीय बल्लेबाजी की रीढ़ कहा जा रहा है. उनकी बल्लेबाजी तकनीक के साथ-साथ पिच पर उनके रौब की भी खूब चर्चा हो रही है. नौ साल फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेलने के बाद शिखर धवन ने मार्च 2013 में अपना पहला टेस्ट मैच खेला. पहली ही टेस्ट पारी में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ शिखर ने 187 रन ठोंक डाले. शिखर धवन 2010 में अपनी पहली वनडे पारी में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ शून्य पर आउट होकर जल्द ही टीम से बाहर हो गए थे. दोबारा मौके के लिए शिखर को लंबा इंतजार करना पड़ा. लेकिन जब उन्हें मौका मिला तो वह एक स्टार के रूप में वापस आए. चैपियंस ट्रॉफ़ी के पहले दो मैचों में धवन ने लगातार दो शतक ठोंके और इसके बाद की तीन पारियों में भी शानदार फॉर्म बरकरार रखी. शिखर धवन के रूप में भारत को एक शानदार ओपनर मिल गया है. रवींद्र जडेजा को पहले नजरअंदाज किया गया फिर उन पर चुटकुले बने लेकिन वह लगातार खुद को साबित करने की कोशिश में लगे रहे और आज वह टीम का अभिन्न अंग बन गए हैं. 25 साल के जडेजा ने अब तक भारत के लिए पाँच टेस्ट 70 वनडे और 14 टी-टवेंटी मैच खेले हैं. इस लेफ्ट ऑर्म स्पिनर ने जब भी मौका मिला है बल्लेबाजी में भी प्रभावशाली प्रदर्शन किया है. चैपिंयस ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल में रविंद्र जडेजा अपने ऑलराउंड प्रदर्शन से मैन ऑफ द मैच बने. उन्होंने नाबाद 33 रन बनाए और दो विकेट लिए. युवा भुवनेश्वर कुमार भारतीय गेंदबाजी की नई उम्मीद बन गए हैं. 23 साल के भुवनेश्वर ने भारत के लिए अब तक चार टेस्ट 13 वनडे और दो टी-ट्वेंटी मैच खेले हैं. भुवनेश्वर कुमार ने चैपियंस ट्रॉफ़ी में भी शानदार प्रदर्शन किया. भुवनेश्वर ने अपनी पहली ही गेंद पर पाकिस्तान के नासिर जमशेद को आउट कर वनडे करियर का आगाज किया था. भुवनेश्वर कम गति की गेंदों को भी अपने नियंत्रण और स्विंग से घातक बना देते हैं. उनके अब तक के प्रदर्शन से लगता है कि वह टीम में एक भरोसेमंद गेंदबाज की कमी को पूरा कर सकते हैं. उमेश यादव ने भारत की गेंदबाजी की जान रहे जहीर ख़ान की कमी चैंपियंस ट्रॉफ़ी में खलने नहीं दी. 140 किलोमीटर प्रति घंटा से अधिक रफ्तार से गेंदबाजी करने वाले उमेश यादव ने भारतीय टीम में अपनी जगह मजबूत कर ली है. नौ टेस्ट 22 वनडे और एक टी-ट्वेंटी मैच खेल चुके उमेश यादव हर गुजरते मैच के साथ अपनी जगह और पक्की करते जा रहे हैं. साल 2007 में क्रिकेट करियर का आगाज़ करने वाले रोहित शर्मा पहला टी-टवेंटी वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम का हिस्सा थे. लेकिन वह लंबे वक्त तक टीम में जगह बरकार नहीं रख सके. वह 2011 में वर्ल्ड कप विजेता टीम का हिस्सा नहीं थे. बड़े खिलाड़ियों की खराब फॉर्म ने रोहित शर्मा को टीम में वापसी का मौका दिया और अब वह लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं. चैंपियंस ट्रॉफी की पांच पारियों में से तीन में उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया. मिडिल ऑर्डर में लड़खड़ाने वाले रोहित शर्मा ओपनिंग में जबरदस्त बल्लेबाजी कर रहे हैं. हाल ही में संपन्न हुए आईपीएल-6 में भी रोहित शर्मा ने अपनी शानदार बल्लेबाजी के दम पर मुंबई इंडियंस को ट्रॉफ़ी दिलाई. |
| DATE: 2013-06-25 |
| LABEL: sports |
| [937] TITLE: जब भारत पहली बार क्रिकेट विश्व चैम्पियन बना |
| CONTENT: 25 जून 1983. उस दिन शनिवार था. लॉर्ड्स के मैदान पर बादल छाए हुए थे. जैसे ही क्लाइव लॉयड और कपिल देव मैदान पर टॉस करने आए सूरज ने बादलों को पीछे ढकेला और दर्शकों ने ख़ुशी से तालियाँ बजाईं. कपिल टॉस हारे और लॉयड ने भारत से पहले बैटिंग करने के लिए कहा. एंडी रॉबर्ट्स ने बिग बर्ड जॉएल गार्नर के साथ गेंदबाज़ी की शुरुआत की. राबर्ट्स ने भारत को पहला झटका दिया जब दो के स्कोर पर दूजों ने सुनील गावसकर को कैच कर लिया. उनकी जगह आए मोहिंदर अमरनाथ ने एक छोर संभाल लिया. दूसरे छोर पर श्रीकांत तूफ़ानी मूड में थे. पहले उन्होंने गार्नर को 4 रनों के लिए स्लैश किया फिर उन्होंने रॉबर्ट्स की गेंद को मिड विकेट पर बाउंड्री के बाहर किया और छोड़ी देर बाद उन्हें 6 रन के लिए हुक कर दिया. श्रीकांत बैटिंग करते हुए काफी रिस्क ले रहे थे और उधर लॉर्ड्स की मशहूर बालकनी पर बैठे हुए भारतीय खिलाड़ियों की दिल की धड़कनें बढ़ रही थीं. लॉयड ने मार्शल को लगाया और आते ही उन्होंने श्रीकांत को चलता किया लेकिन श्रीकांत के बनाए गए 38 रन उस भारतीय पारी का सर्वाधिक स्कोर था. कुछ दिनों पहले जब मुझे उनसे बात करने का मौका मिला तो मैने उनसे पूछा कि जब आप क्रीज़ पर गए थे तो क्या सोच कर गए थेश्रीकांत ने जवाब दिया मेरी सोच यही थी कि वहाँ जा कर अपना स्वाभाविक खेल खेलो. अगर मार सकते हो तो मारो वर्ना वापस अंदर आओ. मोहिंदर और यशपाल शर्मा ने बहुत धीमे धीमे 31 रन जोड़े लेकिन वेस्ट इंडीज़ के गेंदबाज़ एक कंप्यूटराइज़्ड रॉकेट की तरह बार-बार आक्रमण करते रहे. रॉबर्ट्स जाते तो मार्शल आ जाते. गार्नर जाते तो होल्डिंग गेंदबाज़ी संभाल लेते. यशपाल शर्मा और मोहिंदर दोनो जल्दी जल्दी आउट हुए. होल्डिंग ने मोहिंदर का ऑफ़ स्टंप उड़ा दिया. स्थिति उस समय और बिगड़ गई जब कपिल देव को उनके 15 के स्कोर पर गोम्स की गेंद पर होल्डिंग ने कैच कर लिया. भारतीय खिलाड़ी यह तय करके आए थे कि वो गोम्स की गेंद पर अधिक से अधिक रन बनाएंगे लेकिन वो अपने उद्देश्य में कुछ हद तक ही सफल हो पाए. गोम्स ने ग्यारह ओवरों में 49 रन दिए लेकिन दो बहुमूल्य विकेट भी ले गए. भारत के 6 विकेट 111 रनों पर गिर गए थे. लॉर्ड्स में मैच देख रहे भारतीय मूल के दर्शकों के बीच सन्नाटा छाया हुआ था. उधर भारत में क्रिकेट प्रेमी झल्ला कर अपने रेडियो और टेलीविजन सेट बंद कर रहे थे. लेकिन भारत के आख़िरी चार विकेटों ने करो या मरो की भावना को चरितार्थ करते हुए 72 रन जोड़े. 11 नंबर पर खेलने आए बलविंदर संधू ने बहुत बहादुरी का परिचय दिया. मार्शल ने उन्हें विचलित करने के लिए एक बाउंसर फेंका जो उनके हेलमेट से टकराया. भारतीय टीम 183 रन बना कर आउट हुई और वेस्ट इंडीज़ की टीम इस तरह पवेलियन की तरफ भागी मानो विश्व कप उनकी झोली में हो. मैंने उस मैच में भारत की ओर से विकेटकीपिंग कर रहे सैयद किरमानी से पूछा कि जब भारत की टीम 183 पर आउट हो गई तो उन्होंने क्या सोचा कि मैच किस तरफ जाएगा. किरमानी ने जवाब दिया हम तो यही समझे कि ये तो हमें ओपनिंग स्टैंड में ही खा जाएंगे और विवियन रिचर्ड्स की तो बारी ही नहीं आएगी. लेकिन हमने ये भी सोचा कि अपना हौसला हारेंगे नहीं और सबके सब पॉज़ीटिव माइंड के साथ खेलेंगे. वेस्ट इंडीज़ की ओर से हेंस और ग्रीनिज बैटिंग करने के लिए उतरे. चौथे ओवर में बलविंदर संधू की एक गेंद पर ग्रीनिज ने ये सोच कर अपना बल्ला ऊपर उठा दिया कि गेंद बाहर जा रही है. गेंद सहसा अंदर आई और ग्रीनिज का ऑफ़ स्टंप ले उड़ी. बलविंदर संधू याद करते हैं गॉर्डन ग्रीनिज पहले भी दो बार मेरी इन स्विंग पर आउट हो चुके थे. मैंने तय किया कि मैं उन्हें इन स्विंग ही डालूँगा. पहले ओवर में मैंने जानबूझ कर इन स्विंग नहीं डाला. अगले ओवर में मेरा पहला इन स्विंग ही सही जगह पर गिरा. ग्रीनिज ने उसे छोड़ दिया और बोल्ड हो गए. विव रिचर्ड्स क्रीज़ पर उतरे और ताबड़तोड़ चौके लगाते हुए आनन फानन में 33 पर पहुँच गए. रिचर्ड्स ने मदन लाल की शॉर्ट गेंद पर बल्ला घुमाया और गेंद बाउंड्री की तरफ़ उड़ने लगी. शॉर्ट मिडविकेट पर खड़े कपिलदेव ने गेंद की उड़ान की दिशा में पीछे दौड़ना शुरू किया. बाउंड्री से 20 गज़ पहले कपिल को लगा कि गेंद उनके बांए कंधे की तरफ गिर रही है. वो थोड़ा धीमे हुए ओर उन्होंने गेंद को बिल्कुल अपनी उंगलियों के टिप पर कैच किया. भारतीय क्रिकेट बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष राज सिंह डूंगरपुर उस समय लॉर्ड्स पर ये मैच देख रहे थे. उनकी मौत से कुछ दिनों पहले हुई एक मुलाकात में मैंने उनसे पूछा कि क्या आपको रिचर्ड्स का आउट होना याद है इस पर उन्होंने कहा बहुत अच्छी तरह से याद है. मदनलाल नर्सरी एंड से बॉलिंग कर रहे थे. उन्होंने विव को एक शॉर्ट बॉल फेंकी. गेंद थोड़ा धीमे आई. जब उन्होंने उसे हुक किया तो टॉप एज लग गया और कपिल देव ने काफी पीछे दौड़ते हुए एक अद्वितीय कैच लिया ग्रैंड स्टैंड के सामने से. शायद भारतीय क्रिकेट के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण कैच था. अब भारतीय खिलाड़ियों के कदमों में तेज़ी आ गई थी. लॉयड ने बिन्नी को ड्राइव किया और शॉर्ट मिड ऑन पर खड़े कपिल देव के हाथों में करारा शॉट आ कर चिपक गया. इसके बाद गोम्स और बैकस दबाव के चलते आउट हुए लेकिन इसके बाद दूजों और मार्शल जम गए और उन्होंने सातवें विकेट के लिए 43 रन जोड़े. कपिल ने मोहिंदर को लगाया और दूजों ने उनकी दूसरी गेंद को विकेट पर खेल दिया. मोहिंदर इस सुस्त अंदाज़ में बॉलिंग किया करते थे मानो एक बुज़ुर्ग आदमी अपने जर्मन शेपहर्ड कुत्ते को शाम को चहलक़दमी कराने के लिए ले जा रहा हो. उस टीम के सदस्य कीर्ति आज़ाद कहते हैं उस जीत में मोहिंदर का बहुत बड़ा हाथ था. उन्होंने बैट और बॉल दोनों से बहुत अच्छा प्रदर्शन किया. वो मोहम्मद अली की तरह कम बैक करने वाले व्यक्ति हैं. न जाने कितनी बार उन्होंने भारतीय टीम में कम बैक किए हैं. उनकी लाइन बहुत अच्छी रहती है. वो ज़्यादा कुछ एक्सट्रा करने की कोशिश नहीं करते. उनकी जो लिमिटेशन है उसके अंदर ही गेंदबाज़ी करते हैं. वेस्ट इंडीज़ की अंतिम जोड़ी गार्नर और होल्डिंग स्कोर को 140 तक ले गई लेकिन मोहिंदर ने तय किया कि अब बहुत हो चुका. होल्डिंग के आउट होते ही विश्व कप भारत का था. लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर चारों तरफ़ दर्शक ही दर्शक थे. लॉर्ड्स की बालकनी पर कपिल ने शैम्पेन की बोतल खोली और नीचे नाच रहे दर्शकों को सराबोर कर दिया. ड्रेसिंग रूम के माहौल के बारे में मैंने स्वर्गीय राज सिंह डूंगरपुर से पूछा था. उनका जवाब था ऐसा लग रहा था कि कोई शादी हो रही हो. लेकिन शादी में एक दूल्हा होता है लेकिन उस दिन भारतीय ड्रेसिंग रूम में 11 दूल्हे थे. मैं ये कभी नहीं भूल सकता कि भारतीय टीम को बधाई देने उसके ड्रेसिंग रूम में पूरी वेस्ट इंडीज़ की टीम आई सिवाए उनके चार फ़स्ट बॉलर्स के. उन्हें दुख इस बात का था कि उन्होंने तो अपना काम कर दिया दिया था लेकिन धुरंधर बल्लेबाज़ों के होने के बावजूद वेस्ट इंडीज़ की टीम 184 रन भी नहीं बना पाई. भारतीय क्रिकेट के इतिहास का ये सबसे सुनहरा क्षण था. उस समय लॉर्ड्स के मैदान पर तिरंगे ही तिरंगे थे. कीर्ति आज़ाद याद करते हैं आप मुझसे विश्व कप की बात कर रहे हैं और वह दृश्य बिल्कुल मेरे सामने आ गया है. मेरे शरीर में सिहरन दौड़ रही है और मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं. वो एक ऐसा अनुभव था जो मैं अपने जीवन में शायद कभी भी नहीं पा सकूँगा. कोई भी इंसान किसी भी खेल को खेले वो चाहता है कि वो इसके शिखर तक पहुँचे. वो दृश्य अभी भी मेरे सामने है कि हज़ारों प्रवासी भारतीय तिरंगे झंडे ले कर सामने खड़े हैं. ये एक ऐसा अनुभव है जिसे मैं शब्दों में बता नहीं सकता महसूस ज़रूर कर सकता हूँ. |
| DATE: 2013-06-25 |
| LABEL: sports |
| [938] TITLE: विंबलडन के पहले दौर में ही हार गए नडाल |
| CONTENT: दो बार के विंबलडन चैम्पियन स्पेन के रफ़ाएल नडाल इस साल विंबलडन के पहले दौर में ही हारकर प्रतियोगिता से बाहर हो गए हैं. ये पहला मौक़ा है कि नडाल किसी ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिता के पहले दौर में ही हार गए हैं. बेल्जियम के स्टीव डारसिस ने उन्हें सीधे सेटों में 7-6 7-6 और 6-4 से मात दी. इस साल का फ़्रेंच ओपन जीतने के बाद नडाल के हौसले बुलंद थे. लेकिन वे पूरी तरह फ़िट नज़र नहीं आ रहे थे. एटीपी रैंकिंग में पाँचवें नंबर पर मौजूद नडाल ने पहले दो सेट में अच्छा संघर्ष किया और दोनों सेट टाई ब्रेकर तक गए. लेकिन शानदार सर्विस के मालिक कहे जाने वाले नडाल चूक गए. नडाल दोनों सेट टाई ब्रेकर में हार गए. तीसरे सेट में भी वापसी की उनकी कोशिश रंग नहीं ला पाई. तीसरे सेट में सर्विस ब्रेक होने के बाद एक बार नडाल को भी सर्विस ब्रेक करने का मौक़ा मिला. लेकिन डारसिस ने शानदार वापसी करते हुए सर्विस ब्रेक नहीं होने दिया और फिर तीसरा सेट जीतकर दूसरे दौर में जगह बनाई. मैच जीतने के बाद उन्हें भी भरोसा नहीं हो पा रहा था कि उन्होंने नडाल जैसे खिलाड़ी को मात दे दी है. उन्होंने कहा मुझे भी उतना ही आश्चर्य है. लेकिन मैं जानता था कि ग्रास कोर्ट पर पहला मैच आसान नहीं होता. वैसे नडाल अपना सर्वश्रेष्ठ टेनिस नहीं खेल पा रहे थे. नडाल अभी तक दो बार विंबलडन का ख़िताब जीत चुके हैं. पिछले साल भी वे दूसरे दौर में ही हारकर विंबलडन से बाहर हो गए थे. नडाल ने कुल 12 ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीते हैं. उन्होंने सबसे ज़्यादा आठ बार फ्रेंच ओपन का ख़िताब जीता है. उन्होंने दो बार विंबलडन एक बार यूएस ओपन और एक बार ऑस्ट्रेलियन ओपन का भी ख़िताब जीता है. |
| DATE: 2013-06-24 |
| LABEL: sports |
| [939] TITLE: ज़हीर, गंभीर.कहाँ गए वर्ल्ड कप विजेता टीम के सितारे |
| CONTENT: मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के बिना भारतीय टीम पहली बार किसी बड़े टूर्नामेंट में उतरी. लेकिन उनकी कमी युवा खिलाड़ियों ने बिलकुल भी महसूस नहीं होने दी. अनुभवी सचिन के बिना भी भारतीय टीम ने चैंपियंस ट्रॉफी में आसानी से जीत हासिल की. सचिन एकदिवसीय मैचों से संन्यास ले चुके हैं. भारत को तूफानी शुरुआत देने वाले वीरेंद्र सहवाग भी इस टूर्नामेंट में नहीं थे. लेकिन उनकी कमी भी ज़रा भी महसूस नहीं की गई. भारत के क्रिकेट प्रेमियों को सहवाग की आक्रमक बल्लेबाज़ी की याद शायद ही आई होगी क्योंकि रोहित शर्मा और शिखर धवन ने चैंपियंस ट्रॉफी के ज़्यादातर मैचों में भारत को शानदार शुरुआत दी. सहवाग के साथ भारत को कई मैचों में बेहतरीन शुरुआत देने वाले गौतम गंभीर भी टीम में नहीं थे. विश्व कप 2011 में गंभीर ने शानदार प्रदर्शन किया था और फाइनल मैच में शानदार 97 रन भी बनाए थे. लेकिन पिछले कई समय से फॉर्म में ना होने की वजह से वो चैंपियंस ट्रॉफी में जगह नहीं बना पाए थे. कभी भारतीय टीम का अहम हिस्सा होने वाले गौतम गंभीर की कमी शिखर धवन ने ज़रा भी महसूस नहीं होने दी. ज़्यादा दिन पुरानी बात नहीं है जब ज़हीर ख़ान को भारतीय तेज़ गेंदबाज़ी आक्रमण की रीढ़ समझा जाता था. और अब बिना ज़हीर के भी भारतीय तेज़ गेंदबाज़ अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं. भुवनेश्वर कुमार और ईशांत शर्मा ने चैंपियंस ट्रॉफी में बेहतरीन गेंदबाज़ी कर भारत को चैंपियन बनाने में अहम भूमिका निभाई. बाएँ हाथ के तूफानी बल्लेबाज़ और उपयोगी गेंदबाज़ युवराज सिंह भी टीम में नहीं थे. साल 2011 में हुए क्रिकेट विश्व कप में वो मैन ऑफ द टूर्नामेंट थे. 9 मैचों में 90-50 के औसत से उन्होंने 362 रन बनाए थे. कभी उनके बिना वनडे में भारतीय मध्यक्रम की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. लेकिन रवींद्र जडेजा जैसे उभरते सितारे ने इस कदर उनकी कमी को पूरा किया कि दर्शकों और क्रिकेट विशेषज्ञों ने युवराज सिंह की ग़ैर मौजूदगी पर चर्चा तक ना की. अनिल कुंबले के बाद भारतीय स्पिन गेंदबाज़ी के कर्णधार रहे हरभजन सिंह. टेस्ट मैचों में 400 से ज़्यादा विकेट और वनडे में 250 से ज़्यादा विकेट इनके खाते में हैं. लेकिन बुरे फॉर्म की वजह से टीम में जगह नहीं बना सके. आर अश्विन और रवींद्र जडेजा जैसे युवा स्पिन गेंदबाज़ों ने इस कदर फिरकी गेंदबाज़ी का मोर्चा संभाला कि हरभजन सिंह की कमी ज़रा भी महसूस नहीं हुई. विशेषज्ञों के मुताबिक़ युवा स्पिनरों के फॉर्म में होने की वजह से हरभजन के लिए अब टीम में जगह बनाना खासा मुश्किल हो गया है. |
| DATE: 2013-06-24 |
| LABEL: sports |
| [940] TITLE: शुगरपोवा स्वीट्स के ज़रिए जिंदगी में मिठास घोलेंगी शारापोवा |
| CONTENT: टेनिस कोर्ट पर दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली रूस की मारिया शारापोवा अब लोगों की जिंदगी में मिठास घोलने जा रही हैं. दरअसल दुनिया में सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली महिला खिलाड़ी शारापोवा ने शुगरपोवा स्वीट्स के नाम से नया बिज़नेस शुरू किया है जिसे ब्रिटेन में लॉन्च किया गया है. शारापोवा साल के तीसरे ग्रैंड स्लेम विंबलडन में सोमवार को अपने अभियान की शुरुआत करने जा रही हैं लेकिन वो खेल से ज़्यादा अपने बिज़नेस के बारे में बात कर रही हैं. रूसी बाला अपने इस महत्वाकांक्षी कदम को लेकर बेहद आशावान हैं और उनका कहना है कि ये दुनिया का बड़ा ब्रांड बनकर उभरेगा. साल 2004 में विंबलडन जीतकर सु्र्खियों में आई 26 साल की शारापोवा ने कहा बिज़नेस और खेल दोनों में बहुत कड़ी प्रतिस्पर्द्धा होती है और मैं दोनों में सर्वश्रेष्ठ बनना चाहती हूं. साइबेरियन सायरन के नाम से मशहूर शारापोवा ने कहा कि इस उत्पाद को पूरी तरह उनके पैसे से शुरू किया गया है और उनकी योजना टेनिस कोर्ट को अलविदा कहने के बाद अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने की है. शारापोवा ने कहा जब में चोटिल हुई थी तब मुझे टेनिस से बाहर अन्य विकल्पों के बारे में सोचने का मौका मिला था. वो 2008-09 के दौरान कंधे की चोट के कारण नौ महीने कोर्ट से बाहर रही थी. |
| DATE: 2013-06-24 |
| LABEL: sports |
| [941] TITLE: इंग्लैंड को हरा भारत ने अपने नाम की चैंपियंस ट्रॉफ़ी |
| CONTENT: भारत ने आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफ़ी टूर्नामेंट जीत लिया है. बर्मिंघम में खेले गए फ़ाइनल में भारत ने इंग्लैंड को पांच रन से हराकर खिताब अपने नाम किया. बार बार बारिश से बाधित फाइनल मुकाबला 50 ओवर के एकदिवसीय मैच की बजाय ट्वेन्टी 20 मैच बन कर रह गया. जीत के लिए 130 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए इंग्लैंड ने आठ विकेट के नुकसान पर 124 रन बनाए. इससे पहले भारत ने सात विकेट खोकर 129 रन का स्कोर खड़ा किया. शानदार ऑलराउंड प्रर्दशन के लिए रविंद्र जडेजा मैन ऑफ़ द मैच बने. उन्होंने नाबाद 33 रन बनाए और दो विकेट लिए. टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा विकेट लेने के लिए उन्हें गोल्डन बॉल पुरस्कार भी मिला. वहीं टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा रन बनाने के लिए भारत के शिखर धवन को गोल्डन बैट पुरस्कार मिला. रविवार को खिताबी जीत के बाद भारत के महेंद्र सिंह धोनी एकमात्र ऐसे कप्तान बन गए हैं जिन्होंने टी 20 विश्व कप 50 ओवर का विश्व कप और चैपियंस ट्रॉफ़ी जीती है. मैच का टॉस सही समय पर हुआ और मेज़बान इंग्लैंड ने टॉस जीतकर भारत को बल्लेबाज़ी करने का न्यौता दिया. लेकिन इसके बाद लगभग छह घंटे तक हुई बारिश की वजह से पहले मैच पहले 24-24 ओवर का और बाद में 20-20 ओवर का करने का फैसला किया गया. भारतीय टीम में कोई बदलाव नहीं था लेकिन इंग्लैंड ने स्टीव फिन की जगह टिम ब्रेसनन को टीम में जगह दी. इंग्लैंड की पारी की शुरुआत में ही भारतीय गेंदबाज़ों को सफलता मिली जब दूसरे ओवर की पांचवीं गेंद पर अश्विन ने उमेश यादव की गेंद पर कप्तान एलिस्टर कुक का कैच लपका. उस वक्त इंग्लैंड का स्कोर तीन रन ही था. इसके बाद जॉनाथन ट्रॉट ने इयन बैल के साथ मिलकर पारी संभालने की कोशिश की और दोंनो ने दूसरे विकेट के लिए 25 रन भी जोड़े. लेकिन छठे ओवर में अश्विन की गेंद पर धोनी ने ट्रॉट को स्टंप कर दिया. |
| DATE: 2013-06-24 |
| LABEL: sports |
| [942] TITLE: भारत-इंग्लैंड में फ़ाइनल भिड़ंत |
| CONTENT: इंग्लैंड में खेली जा रही आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफी अब अपने अंतिम मुकाम पर पहुँच चुकी है. रविवार को इसका फाइनल भारत और इंग्लैंड के बीच खेला जा रहा है. गुरूवार को खेले गए दूसरे सेमीफाइनल में भारत ने श्रीलंका को बेहद आसानी से आठ विकेट से मात दी थी. इससे पहले खेले गए पहले सेमीफाइनल में मेज़बान इंग्लैंड ने दक्षिण अफ्रीका को सात विकेट से हराया था. इत्तेफ़ाक़ से दोनों सेमीफाइनल एक जैसे परिणाम वाले ही साबित हुए. इंग्लैंड ने टॉस जीतकर पहले क्षेत्ररक्षण करते हुए पहले सेमीफाइनल में दक्षिण अफ्रीका को केवल 175 रनो पर समेट दिया था तो भारत ने भी ऐसा ही फैसला लेते हुए दूसरे सेमीफाइनल मे श्रीलंका का पुलिंदा महज़ 181 रनो पर बांधा था. इसके बाद आसानी से मिली जीत बताती है कि दोनो टीमें सेमीफाइनल कितने एकतरफा तरीके से पहुँचे. दक्षिण अफ्रीका जहाँ पहले सेमीफाइनल में केवल 39 ओवर बल्लेबाज़ी कर सका तो भारत ने भी मैच को निपटाने में केवल 35 ओवर का सहारा लिया. फाइनल मुकाबले को लेकर बर्मिंघम मे बड़े उत्साह का माहौल है क्योंकि वहाँ बड़ी तादाद में एशियाई आबादी रहती है. वैसे भी आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफी का आयोजन आखिरी बार किया जा रहा है इसलिए दोनों ही देशों की टीमें फाइनल जीतने के लिए जी-जान लगाएँगी. पूरे टूर्नामेंट में भारत ने बेहद शानदार खेल का प्रदर्शन करते हुए बड़ी आसानी के साथ फाइनल में अपनी जगह बनाई है. शिखर धवन ने श्रीलंका के खिलाफ भी 68 रन बनाकर दिखाया कि इस टूर्नामेंट में उनके दो शतक कोई तीर-तुक्का नही थे. इसके साथ-साथ रोहित शर्मा ने भी उनका बखूबी साथ देते हुए पहले विकेट के लिए अच्छी शुरूआत भारत को दी. हालांकि अभी तक खेले गए मैचों में भारत के सभी बल्लेबाज़ों को हाथ खोलने का मौक़ा नही मिला है लेकिन श्रीलंका के खिलाफ विराट कोहली ने नाबाद 58 रन बनाकर इंग्लैंड के खेमे में सीधे-सीधे संदेश भेज दिया है कि भारत का मध्यम क्रम भी किसी से कम नही है. दूसरी तरफ इंग्लैंड ने अपनी ही ज़मीन पर खेले जा रहे टूर्नामेंट की घरेलू परिस्तिथियों का पूरा लाभ उठाया है. खासकर एंडरसन फिन और ब्रॉड जैसे उसके गेंदबाज़ों ने आश्चर्यजनक रूप से कुकाबुरा बॉल से स्विंग कराई. क्रिकेट के माहिरों का कहना है कि तेज़ गेंदबाज़ों के लिए ऐसा कराना आसान नही होता है. इसके अलावा इंग्लैंड के स्पिन गेंदबाज़ जेम्स ट्रेडवेल का जलवा भी खूब देखने को मिला और उनकी फिरकी गेंदबाज़ी के सामने दक्षिण अफ्रीका और न्यूज़ीलैंड के बल्लेबाज़ बेबस नज़र आए. बल्लेबाज़ी में भी कप्तान कुक के अलावा जोनाथन ट्रॉट और इयान बेल के साथ-साथ जोए रूट ने समय-समय पर अपने खेल के जरिए टीम को बेहतरीन योगदान दिया. काग़ज़ पर दोनो टीमों की ताक़त को कम नही आंका जा सकता और ना ही किसी टीम को मज़बूत. लिहाज़ा सेमीफाइनल के नीरस और एकतरफा मुक़ाबलो की जगह एक संघर्षपूर्ण फाइनल की उम्मीद है. अब फाइनल को लेकर अगर विशेषज्ञों के अनुमानों का आकलन किया जाए तो पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह मानते हैं भारत ने अभी तक जिस आसानी से फाइनल तक का सफर तय किया है उसका असर उनकी बॉडी लैंग्वेज यानी हाव-भाव के रूप में नज़र आने लगा है. अब खिलाड़ी एक-दूसरे की कामयाबी में सहयोग दे रहे है और सफलता का आनंद भी ले रहे है. ऐसे में मनिंदर सिंह कहते है इंग्लैंड को भारत से कड़ी टक्कर मिलने वाली है और जिस तरह से टीम खेल रही है उसे हराना बेहद मुश्किल है. दोनों टीमों की खासियत को लेकर मनिंदर सिंह का मानना है कि इंग्लैंड की गेंदबाज़ी जानदार है लेकिन भारत की सलामी जोड़ी ने शानदार खेल दिखाया है. चाहे उसने पहले बल्लेबाज़ी की हो या फिर लक्ष्य का पीछा किया हो. इसके अलावा भारत के तेज़ गेंदबाज़ इशांत शर्मा और उमेश यादव की गेंदबाज़ी में लय नज़र नही आ रही थी पर उन्होंने श्रीलंका के खिलाफ इस कमी को भी दूर कर दिया तो फाइनल मुक़ाबला इंग्लैंड के गेंदबाज़ो और भारत के बल्लेबाज़ो के बीच होगा जो शानदार होने की उम्मीद है और उन्हें उसका बेसब्री से इंतज़ार है. फाइनल मुक़ाबले को ही लेकर भारत के पूर्व विकेटकीपर बल्लेबाज़ नयन मोंगिया मानते हैं भारत भले ही बेहतरीन खेल दिखा रहा है लेकिन इंग्लैंड के गेंदबाज़ो की भी तारीफ की जानी चाहिए जिन्हे मालूम है कि किस लेंग्थ पर गेंद करनी चाहिए. इसके अलावा उनके बल्लेबाज़ो ने भी दिखाया है कि अगर गेंदबाज़ो का शुरूआत में थोडा धैर्य के साथ सामना किया जाए तो फिर एक लम्बी पारी खेली जा सकती है. एलिस्टेर कुक ने जब से एकदिवसिय क्रिकेट में टीम की कप्तानी संभाली है तब से उन्होने टीम में काफी सुधार किया है. वैसे ऐसा दूसरी बार हुआ है जब इंग्लैंड आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफी के फाइनल में पहुँचा है. इससे पहले वह साल 2004 में भी अपनी ही ज़मीन पर खेले गए इस टूर्नामेंट के फाइनल में पहुँचा था लेकिन इस मुकाबले में वह वेस्टइंडिज़ से हार गया. वही भारत तीसरी बार इस टूर्नामेंट के फाइनल में पहुँचा है. पहली बार भारत 2000-01 में कीनिया में आयोजित इस टूर्नामेंट के फाइनल में न्यूज़ीलैंड से हारा तो दूसरी बार अगले ही साल 2002-03 में श्रीलंका में बारिश से बाधित फाइनल में श्रीलंका के साथ ही संयु्क्त रूप से विजेता रहा और अब तीसरी बार इंग्लैंड के साथ फाइनल खेलेगा. अब देखना है कि आखिरी बार आयोजित किए जा रहे आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफी क्रिकेट टूर्नामेंट को पहली बार पूरी तरह अपने नाम करने की कोशिश में जीत का ऊंट किस देश की करवट बैठता ह |
| DATE: 2013-06-23 |
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| [943] TITLE: चैंपियंस ट्रॉफी फ़ाइनल: भारत बनाम इंग्लैंड स्कोर कार्ड |
| CONTENT: आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी का फ़ाइनल मैच भारत और इंग्लैंड के बीच ऐजबेस्टन में खेला जा रहा है. भारत ने दूसरे सेमीफ़ाइनल में श्रीलंका को हरा कर फाइनल में प्रवेश किया था. भारत ने श्रीलंका को बेहद आसानी से आठ विकेट से मात दी थी. और इससे पहले खेले गए पहले सेमीफ़ाइनल में मेज़बान इंग्लैंड ने दक्षिण अफ्रीका को सात विकेट से हराया था. ऐसा दूसरी बार हुआ है जब इंग्लैंड आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफी के फाइनल में पहुँचा है. भारत तीसरी बार इस टूर्नामेंट के फाइनल में पहुँचा है. पहली बार भारत 2000-01 में कीनिया में आयोजित इस टूर्नामेंट के फाइनल में न्यूज़ीलैंड से हारा तो दूसरी बार अगले ही साल 2002-03 में श्रीलंका में बारिश से बाधित फाइनल में श्रीलंका के साथ ही संयु्क्त रूप से विजेता रहा और अब तीसरी बार इंग्लैंड के साथ फाइनल खेलेगा. |
| DATE: 2013-06-23 |
| LABEL: sports |
| [944] TITLE: बैकहम को देखने की होड़ में मची भगदड़ |
| CONTENT: चीन के एक विश्वविद्यालय में पहुंचे मशहूर फ़ुटबाल खिलाड़ी डेविड बैकहम को देखने के लिए मची होड़ में सात लोग घायल हो गए. प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि शंघाई तांगजी विश्वविद्यालय में पहुँचे डेविड बैकहम को देखने के लिए उनके क़रीब एक हज़ार प्रशंसक पहुंचे थे. वहाँ पहुंच कर बेकम ने उनका अभिवादन किया. चीन की सबसे बड़ी फ़ुटबाल प्रतियोगिता चाइनीज सुपर लीग के ब्रांड एंबेसडर बैकहम वहाँ विश्वविद्यालय की फ़ुटबाल टीम से मिलने आए थे. उनके प्रशंसकों ने पुलिस घेरे को तोड़ दिया. इससे छात्र पुलिस और विश्वविद्यालय के सुरक्षा गार्ड घायल हो गए. इस विश्वविद्यालय की टीम के एक खिलाड़ी चू डान ने इस स्थिति का वर्णन पागलपन की हद के रूप में किया है. उन्होंने कहायहाँ हम बैकहम के इतने अधिक प्रशंसकों के आने की उम्मीद नहीं कर रहे थे. इस घटना के बाद कार्यक्रम को रद्द कर दिया गया. पुलिस ने कहा है कि वह मामले की जाँच करेगी. चीनी भाषा की मशहूर सोशल मीडिया वेबसाइट वीबो पर लिखे एक पोस्ट में डेविड बैकहम ने इस घटना में घायल हुए लोगों के स्वास्थ्य लाभ की कामना की है और कार्यक्रम रद्द होने पर खेद जताया है. चीन की सबसे बड़ी फ़ुटबाल प्रतियोगिता का प्रचार-प्रसार करने के लिए डेविड बैकहम सात दिन की चीन यात्रा पर हैं. अपनी टीम पेरिस सेंट जर्मेन के फ्रेंच लीग का ख़िताब जीतने के बाद इस साल मई में डेविड बैकहम ने पेशेवर फ़ुटबाल से संन्यास लेने की घोषणा की थी. इसके बाद से उन्होंने इमेज एंबेसडर के रूप में नया करियर शुरू किया था. |
| DATE: 2013-06-21 |
| LABEL: sports |
| [945] TITLE: चैंपियंस ट्रॉफी: भारत फाइनल में पहुंचा |
| CONTENT: भारत आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफी के फाइनल में पहुंच गया है. कार्डिफ़ में खेले गए दूसरे सेमीफाइनल में भारत ने श्रीलंका को आठ विकेट से हराया. भारत ने 35 ओवर में दो विकेट के नुक्सान पर 182 रन का लक्ष्य हासिल कर लिया. भारत ने टॉस जीतकर क्षेत्ररक्षण करने का फैसला किया. श्रीलंका ने निर्धारित 50 ओवर में आठ विकेट के नुक्सान पर 181 रन बनाए थे. भारत के लिए पारी की शुरुआत रोहित शर्मा और शिखर धवन ने की. दोनों बल्लेबाज़ों ने सावधानी से खेलते हुए स्कोर 77 तक पहुंचा दिया. लेकिन 17वें ओवर में एंजेलो मैथ्यूज़ की गेंद रोहित शर्मा 33 के निजी स्कोर पर बोल्ड हो गए. इसके बाद शिखर धवन और विराट कोहली ने पारी संभाली और धवन ने अपना अर्धशतक पूरा किया. धवन 68 के निजी स्कोर पर आउट हुए और भारत का स्कोर 142 था. विराट कोहली ने भी बढ़िया बल्लेबाज़ी करते हुए 58 रन बनाए और वे अंत तक आउट नहीं हुए. सुरेश रैना ने चौका मार कर भारत को जीत दिलाई. वे सात रन बना कर नॉट आउट रहे. इससे पहले मैदान गीला होने के चलते मैच घंटे भर की देरी से शुरु हुआ. मैच शुरु होने के साथ ही भारत ने श्रीलंका के बल्लेबाज़ों पर लगाम कस दी. श्रीलंका की ओर से सलामी बल्लेबाज़ परेरा सिर्फ चार रन ही बना पाए. उनका विकेट लिया भुवनेश्वर कुमार ने. उऩके साथ खेलने उतरे दिलशान घायल हो कर पवैलियन वापस लौट गए हैं. उन्होंने 12 रन बनाए. कुमार संगकारा और तिरिमाने भी कोई कमाल नहीं दिखा सके. संगकारा ने 44 गेंदों का सामना किया लेकिन महज़ 17 रन ही बना सके. ईशांत शर्मा ने उनका विकेट लिया. तिरिमाने ने भी 31 गेंदें खेलीं लेकिन बल्ले से रन निकले सिर्फ सात. ईशांत का वो दूसरा शिकार बने. रैना ने शानदार फील्डिंग का प्रदर्शन किया और शुरुआत के तीनों बल्लेबाज़ों के कैच उन्होंने लिए. बीस ओवर तक श्रीलंका 43 रन ही बना सका था. चौथा विकेट जयवर्धने के रुप में गिरा. 38 रन बनाने के बाद जडेजा ने उन्हें बोल्ड किया. श्रीलंका की ओर से मैथ्यूज ने सर्वाधिक 51 रन बनाए. भारत की ओर से ईशांत शर्मा और अश्विन दोनों ने तीन तीन विकेट लिए. ईशांत शर्मा मैन ऑफ़ द मैच बने. चैंपियंस ट्रॉफ़ी का फ़ाइनल भारत और इंग्लैंड के बीच 23 जून को बर्मिंघम में खेला जाएगा. |
| DATE: 2013-06-20 |
| LABEL: sports |
| [946] TITLE: चैंपियंस ट्रॉफी: इंग्लैंड पहुंचा फ़ाइनल में |
| CONTENT: इंग्लैंड की क्रिकेट टीम ने बुधवार को केनिंग्टन ओवल मैदान पर खेले गए आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी के पहले सेमीफाइनल मुकाबले में दक्षिण अफ्रीका को सात विकेट हराकर फाइनल में जगह बना ली है. दूसरे सेमीफाइनल में गुरुवार को कार्डिफ में भारत का सामना श्रीलंका से होना है. इंग्लैंड के खिलाड़ियों ने प्रभावशाली गेंदबाजी और उम्दा क्षेत्ररक्षण के दम पर दक्षिण अफ्रीका को खेल के हर क्षेत्र में पीछे छोड़ दिया. टॉस जीतने के बाद इंग्लैंड ने मेहमान टीम को पहले 39 ओवरों में महज़ 175 रनों पर ढेर किया और फिर जोनाथन ट्रॉट और जोए रूट की उम्दा बल्लेबाजी की बदौलत ये लक्ष्य सिर्फ तीन विकेट के नुकसान पर 38वें ओवर में ही हासिल कर लिया. जोनाथन ट्रॉट ने नाबाद 82 और जोए रूट ने 48 रन बनाए. ट्रॉट ने अपनी पारी के दौरान 84 गेंदों पर 11 चौके लगाए जबकि रूट ने 71 गेंदों का सामना करते हुए सात चौके लगाए. इससे पहले जेम्स ट्रेडवेल स्टुअर्ट ब्रॉड और जेम्स एंडरसन की धारदार गेंदबाजी के दम पर इंग्लैंड ने एक समय 80 रन के कुल योग पर ही दक्षिण अफ्रीका के आठ विकेट झटक लिए थे. लेकिन इसके बाद डेविड मिलर के नाबाद 56 और क्लीनवेल्ट की 43 रनों की पारी ने नौवें विकेट के लिए 95 रन जोड़कर टीम को मुश्किल से निकाल लिया और इस तरह मेहमान टीम 175 रन बनाने में सफल रही. दक्षिण अफ्रीका के चार प्रमुख बल्लेबाजों सहित कुल सात बल्लेबाज दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू सके और सम्मिलित रूप से मात्र आठ रनों का योगदान दे सके. इंग्लैंड की ओर से ब्रॉड और ट्रेडवेल ने तीन-तीन विकेट चटकाए जबकि एंडरसन को दो विकेट और फिन एक विकेट मिला. |
| DATE: 2013-06-19 |
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| [947] TITLE: फ़ाइनल से एक कदम दूर है भारत |
| CONTENT: इंग्लैंड में खेली जा रही आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफी में आखिरकार यह तय हो गया कि टूर्नामेंट का दूसरा सेमीफाइनल गुरुवार को भारत और श्रीलंका के बीच खेला जाएगा. श्रीलंका ने ऑस्ट्रेलिया को 20 रनों से मात देते हुए सेमीफाइनल में अपनी जगह सुनिश्चित कर ली है. भारत पहले ही शानदार खेल का प्रदर्शन करते हुए दक्षिण अफ्रीका वेस्टइंडीज़ और पाकिस्तान को हराकर सेमीफाइनल में प्रवेश पा चुका है. सेमीफाइनल मैच को लेकर कई संभावनाए जताई जा रही हैं. कहा जा रहा है कि दोनों टीमों के बीच मुकाबला कड़ा रहने वाला है. दोनो टीमों के पास बेहतरीन बल्लेबाज़ो के साथ-साथ अच्छे गेंदबाज़ भी हैं. भारतीय टीम की नई सलामी जोडी शिखर धवन और रोहित शर्मा ने अपने बल्ले का खूब जलवा दिखाया. दिनेश कार्तिक भी इनसे पीछे नहीं रहे. मगर इन बल्लेबाजों के अलावा देखा जाए तो इस टूर्नामेंट में भारत के ज़्यादातर बल्लेबाज़ो की कडी परीक्षा नही हो सकी. वैसे शिखर धवन ने दक्षिण अफ्रीका और वेस्टइंडीज़ के खिलाफ शतक भी जडा. गेंदबाज़ी में एक ओर रविंद्र जडेजा की फिरकी का जादू खूब चला तो दूसरी ओर तेज़ गेंदबाज़ भुवनेश्वर कुमार ने भी प्रभावित किया. श्रीलंका क्रिकेट टीम की बात करें तो इसमें कुमार संगकारा तिल्करत्ने दिलशान महेला जयवर्धने जैसे धाकड़ बल्लेबाज़ हैं. तेज गेंदबाजी करने वालों में लसिथ मलिंगा नुवान कुलासेकरा जैसे अनुभवी गेंदबाज़ों का नाम उल्लेखनीय हैं. इन सबके अलावा श्रीलंका टीम में रंगना हैराथ और दिलशान जैसे उपयोगी स्पिनर भी हैं. सेमीफाइनल के बारे में भारत के पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह से पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि पलड़ा भारत का ही भारी है क्योंकि गेंदबाज़ी तो पाकिस्तान का भी शानदार थी. दरअसल पूरे टूर्नामेंट में जिस तरह का खेल भारतीय टीम ने दिखाया है वैसा खेल कोई भी और टीम नहीं दिखा सकी. भारतीय टीम ने दो अभ्यास मैच जीते. उसके बाद दूसरी टीमों को आसानी से हराते हुए उसने एक लय पकड ली. इसके अलावा भारत का मिडिल ऑर्डर बेहद मजबूत है. इन परिस्थितियों में अगर श्रीलंका के खिलाफ भारत की शुरूआती जोडी नाकाम भी रहती है तो उसमें इतनी क्षमता है कि वह श्रीलंका के गेंदबाज़ो का सामना कर सके. आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफी में भारत के प्रदर्शन से पूर्व तेज़ गेंदबाज़ करसन घावरी भी हैरान है. उनका मानना है कि पूरे टूर्नामेंट में आईपीएल से जुडे विवादो के बीच भारतीय क्रिकेट टीम ने काबिले तारीफ खेल दिखाया है. करसन घावरी यह भी मानते हैं कि भारतीय टीम में चैंम्पियंस ट्रॉफी जीतने का दमख़म है. मगर घावरी क्रिकेट में मैच फिक्सिंग स्पॉट फिक्सिंग जैसे विवादों से निराश हैं. वे मानते हैं कि अब वक्त आ गया है क्रिकेट को इन सबसे जूर रखा जाए. घावरी ने भारत की चयन समिति की भी इस बता के लिए तारीफ की कि इसने युवा टीम में अपना भरोसा दिखाया है. घावरी मानते हैं कि वेस्टइंडिज़ में होने वाली त्रिकोणीय सीरिज़ के लिए टीम में कोई फेरबदलाव नहीं किया जाना सही है. क्योंकि उन्हें विश्वास है कि इस युवा टीम में उम्मीदों पर खड़ा उतरने का दम है. घावरी मानते है कि इस समय भारत के पास भुवनेश्वर कुमार उमेश यादव और इशांत शर्मा जैसे सबसे तेज़ आक्रामक गेंदबाज हैं. रही बात श्रीलंका के खिलाफ सेमीफाइनल की तो वे मानते हैं कि जीत का सबसे प्रबल दावेदार भारत ही है. भारत के पूर्व विकेटकीपर बल्लेबाज़ नयन मोंगिया भी तेज़ गेंदबाज़ करसन घावरी की बात से सहमत हैं. उनके अनुसार भारतीय टीम ने पहले तो अभ्यास मैचों मे तीन सौ से ज़्यादा रन बनाए और उसके बाद दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ भी उसने इतने ही रन बना डाले. हालांकि इंग्लैंड के मैदान पर ऐसा करना इतना आसान नही था. इसके अलावा चैंपियंस ट्रॉफी के अब तक के लगभग सभी मुकाबले में भारतीय गेंदबाज़ों ने विरोधी टीम के बल्लेबाज़ों की नाक में दम कर रखा है. ऐसे में उम्मीद है कि जीत का सेहरा भारत के सर ही बंधेगा. |
| DATE: 2013-06-19 |
| LABEL: sports |
| [948] TITLE: इंग्लैंड चैंपियंस ट्रॉफी के सेमीफाइनल में |
| CONTENT: इंग्लैंड में खेली जा रही आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में हुए रोमांचक मैच में इंग्लैंड ने न्यूज़ीलैंड को हराकर सेमीफाइनल में जगह बना ली है. कार्डिफ़ में खेले गए बारिश प्रभावित मैच को 24 ओवर का कर दिया गया था. मैच पाँच घंटे देर से शुरु हुआ और इंग्लैंड ने 23-3 ओवरों में कुल 169 रन बनाए. यानी जीत के लिए 170 का लक्ष्य दिया. कुक ने 64 रन बनाए जबकि रूट ने 38. बाकी खिलाड़ी कुछ खास नहीं कर पाए. अपने आखिरी सात विकेट इंग्लैंड ने 28 रनों के अंतराल में गंवा दिए. लग रहा था कि न्यूज़ीलैंड जीत का लक्ष्य हासिल कर लेगा. लेकिन इंग्लैंड की टीम ने काफी अच्छी गेंदबाज़ी की. एक समय न्यूज़ीलैंड का स्कोर था पाँच विकेट पर 62 रन. न्यूज़ीलैंड की ओर से केन विलियमसन ने ज़रूर आखिरी में ताबड़तोड़ रन बनाकर टीम को जीताने की कोशिश की. उन्होंने 54 गेंदों में 67 रन बनाए. पर 22वें ओवर में वो स्टूयर्ट ब्रॉड की गेंद पर आउट हो गए. लेकिन कुछ लोगों का मानना था कि उस गेंद को नो बॉल करार दिया जाना चाहिए था. इंग्लैंड के गेंदबाज़ों ने न्यूज़ीलैंड को 24 ओवरों में आठ विकेट पर एक सौ उनसठ रन ही बनाने दिए. जेम्स एंडरसन ने तीन विकेट लिए. वहीं सोमवार को ऑस्ट्रेलिया का सामना श्रीलंका से होगा. इससे पहले भारत भी सेमीफाइनल में जगह बना चुका है. |
| DATE: 2013-06-17 |
| LABEL: sports |
| [949] TITLE: भारत ने पाकिस्तान को आठ विकेट से हराया |
| CONTENT: इंग्लैंड के ऐजबेस्टन में हुए चैंपियंस ट्रॉफ़ी मैच में भारत ने पाकिस्तान को आठ विकेट से हरा दिया है. बादलों की लुकाछुपी के बीच ये मैच बारिश से प्रभावित रहा और कई बार बारिश के कारण खेल को रोकना पड़ा. पाकिस्तान ने भारत को जीत के लिए 168 रनों का लक्ष्य दिया था. लेकिन बारिश प्रभावित मैच में डकवर्थ लुईस के तहत भारत को नया लक्ष्य दिया गया -157 रन. दोबारा बारिश के कारण जीत के लक्ष्य को घटाकर 22 ओवरों में 102 रन करना पड़ा. भारत ने ये लक्ष्य बड़ी आसानी से 17 गेंद रहते हासिल कर लिया. भारतीय गेंदबाज़ों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया. भुवनेश्वर कुमार ने 19 रन देकर दो विकेट लिए. बारिश के बीच भारतीय पारी की शुरुआत रोहित शर्म और शिखर धवन ने की. रोहित सईद अजमल की गेंद पर 18 रन बनाकर आउट हुए. इसके बाद शिखर धवन और विराट कोहली ने पारी को बढ़ाया लेकिन बारिश बाधा डालती रही. धवन 41 गेंदों में 48 रन बनाकर आउट हुए. लेकिन कोहली और कार्तिक भारत को जीत तक ले गए. इससे पहले चैंपियंस ट्रॉफ़ी के मैच में पाकिस्तान ने भारत को 168 रनों का लक्ष्य दिया था. बारिश से बाधित मैच में ओवरों की संख्या 50 से घटाकर 40 कर दी गई थी. लेकिन पाकिस्तान की पूरी टीम चालीस ओवर भी नहीं खेल सकी और 39-4 ओवर में ही 165 रन बनाकर ऑल आउट हो गई. पाकिस्तानी टीम के निर्धारित 40 ओवर से दो गेंदें पहले ही आउट होने की वजह से ही भारत के सामने जीत के लिए 168 रन का लक्ष्य रखा गया जिसे बाद में 157 कर दिया गया. बारिश के कारण इसे दोबारा घटाकर 22 ओवरों में 102 रन करना पड़ा. पाक टीम में एक भी खिलाड़ी 50 रन का आंकड़ा नहीं छू सका. सबसे ज़्यादा 41 रन असद शफ़ीक़ ने बनाए. तीन खिलाड़ी वहाब रियाज़ ज़ुनैद ख़ान तो अपना खाता भी नहीं खोल पाए. भारत ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाज़ी का फ़ैसला किया था. भारतीय टीम ने पाकिस्तान को शुरुआत में ही करारा झटका दिया जब तेज गेंदबाज भुवनेश्वर कुमार ने नासिर जमशेद को सिर्फ दो रन के निजी स्कोर पर सुरेश रैना के हाथों कैच करवा दिया. इसके बाद कामरान अकमल और मोहम्मद हफीज ने पाकिस्तान की पारी संभालने की कोशिश की. पाकिस्तान की पारी में 12 ओवर का खेल पूरा होने के बाद बारिश की वजह से मैच रोकना पड़ा. इस समय तक पाकिस्तान ने एक विकेट खोकर 50 रन बनाए थे. बारिश के बाद खेल दोबारा शुरू हुआ तो भुवनेश्वर कुमार ने मोहम्मद हफीज को 27 रन के निजी स्कोर पर धोनी के हाथों लपकवाकर पाक टीम को दूसरा झटका दिया. पाकिस्तान का दूसरा विकेट 50 रन के कुल योग पर गिरा. पाकिस्तान के स्कोर में अभी छह रन ही जुड़े थे कि अश्विन ने अकमल को 21 रन के निजी स्कोर पर कोहली के हाथों कैच करवाया. 19 ओवर के बाद बारिश के चलते मैच फिर से रोकना पड़ा और इसके बाद ओवरों की संख्या घटाकर 40 कर दी गई. दोबारा खेल शुरू होने के बाद पाकिस्तान ने तीन विकेट के नुकसान से आगे खेलता शुरू किया लेकिन रविंद्र जड़ेजा ने कप्तान मिस्बाह उल हक को बोल्ड कर पैवेलियन लौटा दिया. मिस्बाह अपने खाते में सिर्फ़ 22 रन ही जोड़ पाए थे. मैच के 31वें ओवर में ईशांत शर्मा ने असद शफ़ीक़ को धोनी के हाथों कैच करवाकर उन्हें भी पैवेलियन लौटा दिया. बत्तीसवें ओवर की आखरी बॉल में जडेजा ने शोएब मलिक को एलबीडब्ल्यू कर दिया. वह सिर्फ़ 17 रन ही बना पाए थे. तेतीसवां ओवर आर अश्विन ने किया और इसकी तीसरी गेंद में उन्होंने वहाब रियाज़ को बोल्ड कर दिया. वहाब रियाज़ अपना खाता भी नहीं खोल पाए थे. इसके बाद सईद अकमल 5 रन बनाकर ईशांत शर्मा का शिकार बने. जुनैद खान और मोहम्मद इरफ़ान दोनों रन आउट हुए और दोनों ही कोई रन नहीं बना सके. भारत की ओर से भुवेश्नर कुमार ईशांत शर्मा अश्विन और जडेजा ने दो-दो विकेट लिए. |
| DATE: 2013-06-16 |
| LABEL: sports |
| [950] TITLE: भारत-पाक मैच, इज़्ज़त का सवाल |
| CONTENT: चैंपियंस ट्रॉफी में शनिवार को खेले जा रहे भारत पाकिस्तान मुकाबले की वैसे तो कोई अहमियत नहीं लेकिन दोनों देशों के प्रशंसकों के लिए ये मैच रोमांच के लिहाज से बेहद अहम है. चैंपियंस ट्राफी में भारत अपने दोनों मैच जीतकर पहले ही सेमीफाइनल में जगह पक्की कर चुका है जबकि वेस्टइंडीज़ और दक्षिण अफ्रीका से हारकर पाकिस्तान इस दौड़ से बाहर हो चुका है. इस मैच को लेकर उत्साह इतना ज़्यादा है कि पिछले साल जैसे ही इस मुक़ाबले की टिकट खिड़की खुली तो केवल एक घंटे में ही सारे टिकट बिक गए. टिकट को लेकर इतनी मारामारी लेकिन मैच के नतीजे से ना तो भारत को कोई फर्क पड़ेगा और ना ही पाकिस्तान पर. इस बारे में पाकिस्तान के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ सरफ़राज़ नवाज़ मानते हैं अगर इस मैच के आधार पर सेमीफाइनल में जाने का दांव लगा रहा होता तो कुछ बात होती लेकिन पाकिस्तान तो पहले ही बाहर हो चुका है. पर यह सुनकर ता़ज्जुब हो रहा है कि बर्मिंघम में हो रहे इस मैच के टिकट कई लोगों ने महंगे में भी खरीदे हैं. दूसरी ओर भारत के पूर्व फिरकी गेंदबाज़ मनिंदर सिंह कहते हैं बर्मिंघम में और उसके आस-पास भारत और पाकिस्तान के लोग बडी संख्या में रहते हैं. जिसकी वजह से मैच भी वहीं रखा गया और दोनों देशों के बीच पिछले कुछ समय से ज़्यादा क्रिकेट खेली भी नहीं गई है. इस वजह से यहाँ के टिकट इतनी जल्दी बिक गए. वह कहते हैं जहाँ तक मैच की बात है तो दोनों परम्परागत प्रतिद्वंद्वी हैं इसलिए भले ही पाकिस्तान सेमीफाइनल की दौड़ से बाहर है और उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है लेकिन पाने के लिए बहुत कुछ है. अगर वह जीत जाते हैं तो उन्हें वापस जाकर इतनी परेशानी नहीं होगी लेकिन अगर हार जाते हैं तो फिर खोने के लिए बहुत कुछ है. मनिंदर ने कहा भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ी अपने-अपने मुल्क़ के लोगों को खुश करने के लिए हर हालत में जीतने की कोशिश करते हैं. इस वजह से भी दोनों देशों के क्रिकेट प्रेमियों में मैच को लेकर जोश कभी भी कम नही होता. मैच में दोनों टीमों के खेल को लेकर सरफराज़ नवाज़ कहते हैं पाकिस्तान ने पिछले दिनों भारत में बेहद शानदार खेल दिखाया जिसके बाद काँटे के मुक़ाबले की उम्मीद थी लेकिन अब तो टीम के कप्तान मिसबाह उल हक़ ख़ुद कह रहे हैं कि टीम में चार खिलाड़ी जिनमें शोएब मलिक कामरान अकमल और इमरान फरहत शामिल हैं जबरदस्ती गए है. यह टीम में जगह बनाने के क़ाबिल नहीं थे. बकौल सरफराज़ उनके इस बयान के बाद ऐसा लगता है जैसे टीम का तालमेल ही बिगड़ गया है. पाकिस्तान की गेंदबाज़ी तो अच्छी है लेकिन बल्लेबाज़ों ने टीम को नीचा दिखाया है. अगर भारत को देखें तो नम्बर छह तक उसके बल्लेबाज़ हैं गेंदबाज़ी भी बेहतर है. पाकिस्तान की टीम तो 170-180 रन बना रही है जबकि भारत के पास तो शिखर धवन रैना धोनी रोहित शर्मा कोहली जैसे बल्लेबाज़ है. मनिंदर सिंह पाकिस्तान की बल्लेबाज़ी को लेकर कहते है कि वो ज़रुरत से ज़्यादा आक्रामक है और उन्हें बहुत ज्यादा अनुभव भी नहीं है. पाकिस्तान में बाहर की टीमें खेलती नहीं हैं जिसका असर दिखा और ऐसा लगता है जैसे उनका पूरा बल्लेबाज़ी मिश्रण ही बिगड़ गया. उन्होंने कहा भारत ने दक्षिण अफ्रिका और वेस्टइंडीज़ को हराया है लेकिन पाकिस्तान का गेंदबाज़ी अटैक शानदार है और अगर भारत पाकिस्तान को भी हरा देता है तो उससे ना सिर्फ टीम का मनोबल बढ़ेगा बल्कि क्रिकेट आलोचकों की नज़रो में भी भारत का रुतबा बढ़ेगा. उधर पाकिस्तान के पूर्व विकेट कीपर वसीम बारी कहते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच हमेशा ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के मैचों से भी ज़्यादा दिलचस्पी होती है. इस टूर्नामेंट में पाकिस्तान के गेंदबाज़ों ने तो उम्मीद के अनुरूप गेंदबाज़ी की है लेकिन उसके शुरुआती बल्लेबाज़ नहीं चल सके जबकि भारत को रोहित शर्मा और शिखर धवन ने अच्छी शुरुआत दी. धवन तो दो शतक भी लगा चुके हैं. दरअसल 50 ओवर के क्रिकेट में पहले चार बल्लेबाज़ों का अच्छा खेलना ज़रुरी है जिससे बाद के बल्लेबाज़ खुलकर खेल सकें. ऐसे में क्या पाकिस्तान ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भारत के लिए बचाकर रखा ह |
| DATE: 2013-06-15 |
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| [951] TITLE: भारत ने टॉस जीता, गेंदबाज़ी का फैसला |
| CONTENT: आज चैंपियंस ट्रॉफी के मुकाबले में भारत और पाकिस्तान का बहुप्रतीक्षित मुकाबला एजबेस्टन में हो रहा है. भारत नेटॉस जीतकर पहले गेंदबाज़ी करने का फैसला किया है. यूं तो टूर्नामेंट के लिहाज से इस मैच का कोई खास मतलब नहीं है क्योंकि भारत पहले ही सेमीफाइनल में पहुंच चुका है और पाकिस्तान की टीम अपने पहले दो मैच हारकर टूर्नामेंट से बाहर हो चुकी है लेकिन दोनों ही टीमें इस मुकाबले को कतई हल्के में लेने के मूड में नहीं हैं. यहां तक कि पाकिस्तान के कप्तान मिसबाह उल हक़ तो इस औपचारिक मैच को फ़ाइनल की संज्ञा दे रहे हैं. मैच की पूर्व संध्या पर हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा ये हमारे लिए फ़ाइनल है. भारत विश्व चैंपियन टीम है. उन्हें हम अपने प्रशंसकों के वास्ते हराना चाहेंगे. भले ही हम टूर्नामेंट से बाहर हो गए हैं. लेकिन ये मैच हमारे लिए बेहद ख़ास है. उन्होंने माना कि भारतीय टीम ज़बरदस्त फॉर्म में है लेकिन साथ ही उम्मीद जताई कि उनकी टीम भारत को कड़ी टक्कर देगी. वहीं भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी मानते हैं कि पाकिस्तान का गेंदबाज़ी आक्रमण शानदार है. धोनी ने कहा पाकिस्तान के पास बेहतरीन गेंदबाज़ हैं. मुकाबला दिलचस्प होगा. लेकिन हम इस मैच के लिए कोई ख़ास रणनीति नहीं अपनाएंगेभारतीय टीम इस टूर्नामेंट में ज़बरदस्त फॉर्म में चल रही है और उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और वेस्ट इंडीज़ को आसानी से हरा दिया था. भारत के सलामी बल्लेबाज़ शिखर धवन ने दोनों ही मैचों में शानदार शतक बनाए. लेकिन पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर राशिद लतीफ धवन से ज़्यादा खतरनाक धोनी और विराट कोहली को मानते हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए लतीफ ने कहा मुझे लगता है धवन पाकिस्तान के तेज़ गेंदबाज़ों के सामने सहज नहीं हो पाएंगे. मुझे विराट कोहली और महेंद्र सिंह धोनी से ज़्यादा खतरा महसूस हो रहा है. वो उच्च स्तरीय बल्लेबाज़ हैं. वहीं एक और पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहसिन खान भी मानते हैं कि भले ही भारतीय बल्लेबाज़ फॉर्म में है पाकिस्तान के तेज़ गेंदबाज़ों जुनैद खान और मोहम्मद इरफान से निपटना भारतीय बल्लेबाजों के लिए आसान नहीं होगा. एजबेस्टन में होने वाले इस मैच को लेकर खासा उत्साह है. पूरे मैच के टिकट आधे घंटे के अंदर ही बिक गए. हालांकि मैच पर बारिश का साया है. कल भी वहां बारिश हो रही थी इसलिए दोनों ही टीमों को इनडोर में अभ्यास करने के लिए मजबूर होना पड़ा. |
| DATE: 2013-06-15 |
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| [952] TITLE: डेविड वार्नरः पहले एशेज टेस्ट तक निलंबित |
| CONTENT: डेविड वार्नर पर कथित तौर पर इंग्लैंड के बल्लेबाज जोए रूट के साथ हाथापाई करने का आरोप है. आस्ट्रेलिया के सलामी बल्लेबाज डेविड वार्नर एशेज श्रृंखला के पहले टेस्ट मैच तक के लिए निलंबित कर दिए गए हैं. उन पर कथित तौर पर एक पब में इंग्लैंड के बल्लेबाज जोए रूट के साथ हाथापाई करने का आरोप है. बर्मिंघम के एक पब में हुई इस हाथापाई की घटना के बाद 26 साल के वार्नर पर 7000 पाउण्ड का जु्र्माना लगाया गया है. इसका मतलब कि अब वे चैंपियंस ट्राफी के शेष मैचों में आस्ट्रेलिया की ओर से नहीं खेल पाएंगें. यही नहीं वार्नर समरसेट और वर्कशायर के खिलाफ होने वाले अभ्यास मैचों का हिस्सा नहीं रहेंगे. मगर वे 10 जुलाई से होनेवाले पहले एशेज टेस्ट के लिए उपलब्ध रहेंगेइंग्लैंड और आस्ट्रेलिया के कई खिलाड़ी उस समय वाल्कअबाउट पब में मौजूद थे जब सलामी बल्लेबाज वार्नर ने इंग्लैंड के बल्लेबाज रूट से कथित तौर पर हाथापाई की थी. बीबीसी रेडियो 5 लाईव के पैट मर्फी का कहना है मेरे हिसाब से बर्मिंघम के एक बार में यह घटना लगभग 02-00 बीएसटी बजे घटी थी. उन्होंने उस दिन की घटना के बारे में आगे बताया उस बार में एक निजी वीआईपी एरिया था. वहां आस्ट्रेलिया के कुछ खिलाड़ी मौजूद थे. उनसे कुछ दूर पर इंग्लैंड के तीन खिलाड़ी जोए रुट स्टुअर्ट ब्रॉड और क्रिस वोक्स खड़े थे. वे लोग आपस में मजाक कर रहे थे. उन्होंने कुछ अजीब किस्म के विग पहन रखे थे. पैट मर्फी ने कहा मैं समझ सकता हूं कि वार्नर को उनकी बातें सुनकर गुस्सा आ गया होगा. वे रुट की ओर लपके और उसकी ठोड़ी पर मुक्का जमा दिया. मर्फी ने कहा कि यह सब अचानक हुआ. ये देखकर ब्रॉड आगे आए और रूट के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा चलो अब होटल वापस चलते हैं. इंग्लैंड और वेल्स क्रिकेट बोर्ड ने अपने खिलाड़ियों को निर्दोष बताया है. वार्नर अब तक आस्ट्रेलिया की ओर से 19 टेस्ट मैच खेल चुके हैं. इस वाकये के बाद उन्हें बुधवार को चैंपियंस ट्रॉफी के लिए न्यूजीलैंड के खिलाफ होने वाले मैच से बाहर कर दिया गया. आस्ट्रेलिया टीम से उनको निलंबित कर दिए जाने का आशय यह लगाया जा रहा है कि ट्रेंट ब्रिज में होने वाले पांच दिवसीय एशेज सीरिज के शुरु होने तक वे किसी और मैच में खेल नहीं पाएंगे. आईपीएल में वार्नर दिल्ली डेयरडेविल्स की ओर से खेलने वाले खिलाड़ी रहे हैं. आईपीएल के मैचों और आस्ट्रेलिया के लिए एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों में खेलते हुए पिछले नौ पारियों में वे खराब फार्म में नजर आए. डेविड वार्नर के खिलाफ मामले की सुनवाई मेलबोर्न में टेलीकांफ्रेंस के जरिए की गई. वार्नर के मामले पर आस्ट्रेलिया क्रिकेट के अनुशासनात्मक मामलों के अधिकारी माननीय न्यायमूर्ति गार्डन लुईस ने कार्रवाई की. वार्नर पर इस तरह का यह पहला आरोप नहीं है. पिछले महीने उन पर तब जुर्माना लगाया गया था जब वे आस्ट्रेलियाई पत्रकार के साथ ट्विटर पर बातचीत के क्रम में कुछ बुरा भला बोल दिया था. तब उन पर 3700 पाउण्ड का जुर्माना लगाया गया था. इंग्लैंड और वेल्स क्रिकेट बोर्ड ने एक बयान में अपने खिलाड़ियों को किसी तरह के आरोप से दूर रखा है. ईएसबी ने एक बयान में कहा पूरी जांच पड़ताल के बाद इंग्लैंड की प्रबंधन टीम इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि इंग्लैंड के खिलाड़ी इस घटना के लिए किसी भी तरीके से जिम्मेदार नहीं हैं. उन्होंने न तो हमला किया था न ही जवाबी कार्रवाई की थी. इस सिलसिले में इंग्लैंड के गेंदबाज ब्रॉड ने स्काई स्पोर्टस से अपनी बात शेयर की. उन्होंने कहा हमने कुछ भी गलत नहीं किया. हम इस बात से पूरी तरह वाकिफ थे कि हम अपनी टीम के लिए खेलने आए हैं. |
| DATE: 2013-06-13 |
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| [953] TITLE: श्रीसंत को स्पॉट फ़िक्सिंग मामले में ज़मानत |
| CONTENT: आईपीएल में स्पॉट फ़िक्सिंग के आरोप झेल रहे क्रिकेट खिलाड़ी श्रींसंत और अंकित चव्हाण को दिल्ली की एक अदालत ने ज़मानत दे दी है. ये खिलाड़ी न्यायिक हिरासत में थे और तिहाड़ जेल में बंद थे. कुछ दिन पहले दिल्ली पुलिस ने इन खिलाड़ियों पर मकोका की धारा लगा दी थी. ये मामला पिछले महीने उस वक़्त शुरू हुआ जब दिल्ली पुलिस ने स्पॉट फ़िक्सिंग के आरोप में राजस्थान रॉयल्स के खिलाड़ियों श्रीसंत अंकित चव्हाण और अजीत चंडीला को गिरफ़्तार किया था. इन गिरफ्तारियों के बाद एक के बाद एक कई लोगों का नाम फिक्सिंग या सट्टेबाज़ी के सिलसिले में जुड़ने लगा. फिर कुछ दिन बाद हिंदी फिल्मों के कलाकार विंदू दारा सिंह को सट्टेबाज़ों से कथित संबंध के आरोप में मुंबई पुलिस ने गिरफ़्तार किया. विंदू दारा सिंह से पूछताछ के बाद मुंबई पुलिस ने गुरुनाथ मेयप्पन को भी गिरफ़्तार किया. हालांकि विंदू और मेयप्पन दोनों को ज़मानत मिल चुकी है. गुरुनाथ मेयप्पन बीसीसीआई प्रमुख एन श्रीनिवासन के दामाद हैं और आईपीएल की टीम चेन्नई सुपर किंग्स से जुड़े हुए हैं. बात यहाँ तक पहुँची कि बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के इस्तीफे की माँग उठने लगी. उन्होंने पद से इस्तीफा तो नहीं दिया लेकिन मामले की जाँच होने तक बीसीसीआई के काम से अलग ज़रूर हो गए हैं. इस पूरे मामले में अगला नाम जुड़ा राजस्थान रॉयल्स के सह मालिक राज कुंद्रा का. पिछले दिनों दिल्ली पुलिस ने कुंद्रा से कई घंटों तक पूछताछ की थी. पुलिस आयुक्त नीरज कुमार ने दावा किया था कुंद्रा ने पूछताछ में अपनी टीम पर सट्टा लगाने की बात कबूली है. बीसीसीआई ने राज कुंद्रा को क्रिकेट से जुड़ी गतिविधियों से निलंबित कर दिया है. |
| DATE: 2013-06-10 |
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| [954] TITLE: बीसीसीआई ने राज कुंद्रा को निलंबित किया |
| CONTENT: बीसीसीआई ने आईपीएल में सट्टेबाजी के आरोप में फंसे राजस्थान रॉयल्स के सह मालिक और अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा को क्रिकेट से जुड़ी गतिविधियों से निलंबित कर दिया है. बीसीसीआई वर्किंग कमेटी की सोमवार को हुई आपात बैठक में ये फ़ैसला किया गया. कुंद्रा को जांच पूरी होने तक सस्पेंड किया गया है. पिछले दिनों दिल्ली पुलिस ने कुंद्रा से कई घंटों तक पूछताछ की थी. पुलिस आयुक्त नीरज कुमार ने दावा किया था कुंद्रा ने पूछताछ में अपनी टीम पर सट्टा लगाने की बात कबूली है. पुलिस के अनुसार कुंद्रा अपने एक मित्र के जरिए अपनी टीम पर सट्टा लगाते थे. कुंद्रा का पासपोर्ट जब्त कर लिया गया था. आईपीएल फ्रेंचाइजी राजस्थान रॉयल्स ने खुद को कुंद्रा से पूरी तरह अलग कर लिया था. रॉयल्स ने एक बयान में कहा था कि कुंद्रा एक अल्पमत शेयरधारक हैं और यदि वह गुनाहगार साबित होते हैं तो उन्हें फ्रेंचाइजी से निलंबित कर दिया जाएगा और उनके शेयर जब्त कर लिए जाएंगे. राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों श्रीसंत अंकित चव्हाण और अजीत चंडिला को आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में पिछले दिनों गिरफ्तार किया था. इसके अलावा चेन्नई सुपरकिंग्स के आला अधिकारी गुरुनाथ मेयप्पन और फिल्मों में काम कर चुके विंदू दारा सिंह को भी गिरफ्तार किया गया था. हालांकि बाद में उन्हें जमानत मिल गई. अपने दामाद मेयप्पन का नाम आने के बाद बीसीसीआई के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन ने जांच पूरी होने तक खुद को बोर्ड के दैनिक कामकाज से अलग होने का फैसला किया था. उनकी जगह जगमोहन डालमिया कामकाज देख रहे हैं. |
| DATE: 2013-06-10 |
| LABEL: sports |
| [955] TITLE: चोट से उबरने के बाद नडाल ने रचा इतिहास |
| CONTENT: रफ़ाएल नडाल आठ बार फ्रेंच ओपन जीतने वाले अकेले खिलाड़ी हैं. स्पेन के रफ़ाएल नडाल का जादू फ़ैशन नगरी पेरिस में खूब चलता है अब यह बात और है कि उनका जलवा रैंप पर नही बल्कि रौलां गैरा की लाल बजरी पर बिखरता है. जहाँ उन्होने रविवार को ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए रिकॉर्ड आठवीं बार फ्रेंच ओपन टेनिस का ख़िताब अपने नाम किया. फ़ाइनल में उन्होंने अपने हमवतन चौथी वरीयता हॉसिल डेविड फेरर को 6-3 6-2 6-3 से मात दी. इसके साथ ही किसी भी खिलाड़ी द्वारा किसी एक ग्रैंड स्लैम को सबसे ज़्यादा बार जीतने वाले वह पहले खिलाडी भी बन गए. वैसे इस ख़िताब को जीतने के लिए उन्होंने अपने घुटने के दर्द को भी बर्दाश्त किया जिसकी वजह से वह सात महीने टेनिस कोर्ट से बाहर रहे. लेकिन इसके बाद शानदार वापसी करते हुए उन्होंने फ्रेंच ओपन से पहले छह ख़िताब अपने नाम किए. कोर्ट पर उनकी वापसी फ़रवरी में हुई थी. नडाल का फ्रेंच ओपन के फ़ाइनल में खेलना ऐसे ही था जैसे कोई उस काम को कर रहा हो जो उसके लिए बाएं हाथ का हो यानी बेहद आसान. वैसे भी लाल बजरी वाला कोर्ट उन्हें इतना रास आता है कि इस खब्बू खिलाड़ी के आगे सभी यहॉ बेहद साधारण नज़र आते हैं. नडाल ने सेमीफाइनल में दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी सर्बिया के नोवाक जोकोविच को 6-43-66-16-79-7 से हराया था और दिखाया था कि इस बार भी उनके दम-ख़म में कोई कमी नही है. नडाल का यह 17वां ग्रैंडस्लैम फ़ाइनल था और यह उनका 12वां ख़िताब रहा. फ्रेंचओपन के फ़ाइनल में नडाल ने फ़ेरर का सामना एक चैंम्पियन खिलाड़ी की तरह किया और पूरे मैच के दौरान कही भी नही लगा कि ख़िताब जीतने का दबाव उन पर हावी है. वैसे भी इससे पहले फ़ेरर के खिलाफ़ उनकी जीत का रिकॉर्ड 4-19 के रूप में बेहद दमदार था. इसी महीने की तीन तारीख़ को अपना 27वां जन्मदिन मनाने वाले नडाल के टेनिस जीवन का यह 57वां ख़िताब है. नडाल इससे पहले फ्रेंच ओपन 2005 2006 2007 2008 2010 2011 और 2012 में भी जीत चुके हैं. वैसे भी ग्रैंडस्लैम के रूप में नडाल ने सबसे पहला खिताब फ्रेंच ओपेन ही जीता था. यानी इस खिताब से उनका नाता सबसे पुराना है. नडाल इसके अलावा टेनिस की दुनिया के सबसे बड़े खिताब विम्बलडन को भी दो बार 2008 और 2010 अपने नाम कर चुके हैं. इसके अलावा नडाल ने 2010 में अमरीकी ओपन और 2009 में ऑस्ट्रेलियन ओपन भी जीता था. इतना ही नहीं नडाल की शानदार उपलब्धियों में ओलम्पिक का गोल्ड मेडल भी शामिल है जब उन्होंने 2008 में बीजिंग ओलम्पिक में ये कारनामा किया था. |
| DATE: 2013-06-09 |
| LABEL: sports |
| [956] TITLE: सरीना विलियम्स ने फ्रेंच ओपन जीता |
| CONTENT: अमरीका की सरीना विलियम्स ने महिला वर्ग का फ्रेंच ओपन खिताब जीत लिया है. उन्होंने फ़ाइनल में रूस की मारिया शरापोवा को 6-4 6-4 से हराया. सरीना जो की दुनिया की नंबर 1 महिला टेनिस खिलाड़ी हैं उन्होंने यह खिताब दूसरी बार जीता है. पिछली बार उन्होंने यह खिताब 11 साल पहले जीता था. दुनिया की नंबर दो रैंकिंग की खिलाड़ी रूस की मारिया शारापोवा को हराने में सरीना को एक घंटे 46 मिनट की समय लगा. 31 साल की सरीना के पास 16 ग्रैंड स्लैम खिताब हैं. मार्टिना नवरातिलोवा क्रिस एवर्ट उनसे आगे हैं. दोनों के पास 18 - 18 खिताब हैं. रूस की टेनिस खिलाड़ी मारिया शारापोवा जब शनिवार को मैदान में उतरी थीं तो उन्होंने कहा था कि वो सरीना को हारने के लिए कुछ अलग करेंगीं. मारिया सरीना से लगातार पिछले 12 मुकाबलों में हार चुकी हैं. हार का यह सिलसिला साल 2004 से चला आ रहा है. यूं तो मैदान में मौजूद 15000 दर्शकों ने मारिया शारापोवा की हौसला अफ़ज़ाई करने की भरपूर कोशिश की लेकिन उनके हाथ से मैच फिसला तो फिसलता ही चला गया. सरीना के पास मार्टिना नवरातिलोवा और क्रिस एवर्ट के खिताब की बराबरी करने के अभी और मौके हैं. जल्द ही उनकी सामने होगा विंबलडन. सरीना बेहद बढ़िया फॉर्म में चल रही हैं और लगातार अपने पिछले 31 मैच जीतते चली आ रही हैं. |
| DATE: 2013-06-08 |
| LABEL: sports |
| [957] TITLE: फ्रेंच ओपन: फाइनल में भिड़ेंगे नडाल और फ़ेरर |
| CONTENT: स्पेन के खिलाड़ी रफ़ाएल नडाल विश्व के नंबर एक खिलाड़ी नोवाक जोकोविच को सेमीफाइनल में हराकर आठवीं बार फ्रेंच ओपन के फ़ाइनल में पहुंच गए हैं. फाइनल में उनका मुकाबला स्पेन के ही डेविड फेरर से रविवार को होगा. सेमीफाइनल मुकाबले में सात बार फ्रेंच ओपन विजेता रहे 27 वर्षीय नडाल ने जोकोविच को 6-4 3-6 6-1 6-7 9-7 से हराया. चार घंटे और 37 मिनट तक चले लंबे और बेहद रोमांचक मैच में जोकोविच को हराने के बाद नडाल का फाइनल में मुकाबला स्पेन के ही डेविड फेरर के साथ रविवार को होगा. फ़ेरर ने सेमीफाइनल में फ्रांस के जो विलफ्राइड सॉन्गा को हराकर फाइनल में अपनी जगह बनाई है. विलफ्राइड को उन्होंने सीधे सेटों में हरा दिया. विश्व वरीयता में पहले नंबर के खिलाड़ी जोकोविच को पिछले साल रोलां गैरो में हराने के बाद से नडाल घुटने में चोट से परेशान थे और सात महीने से उन्होंने किसी ग्रैंड स्लैम में हिस्सा नहीं लिया था. जोकोविच और नडाल के बीच 2012 के ऑस्ट्रेलियन ओपन के फाइनल में पांच घंटे और 53 मिनट तक रोमांचक मुकाबला चला था. ये मुकाबला उतना लंबा तो नहीं था लेकिन खेल में रोमांच हर पल बरकरार था. जोकोविच को हराने के बाद नडाल ने कहा मेरे लिए ये जीत बेहद ख़ास है. मैं नोवाक को बधाई देना चाहता हूं. वो चैम्पियन खिलाड़ी हैं और मुझे यक़ीन है कि एक दिन वो रोलां गैरो में ज़रूर जीतेंगे. वहीं जोकोविच ने कहा ये एक अविश्वसनीय मैच था और इसका हिस्सा होना रोमांचक है. लेकिन मुझे निराशा हुई है. हालांकि मैं उन्हें बधाई देता हूं. शायद अपने खेल की वजह से ही वो चैम्पियन हैं. नडाल फ्रेंच ओपन में अपने 59 मैचों में से केवल एक मैच हारे हैं 2009 में. |
| DATE: 2013-06-08 |
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| [958] TITLE: नडाल, जोकोविच और बोल्ट से भी आगे धोनी |
| CONTENT: भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी सबसे ज़्यादा पैसे कमाने वाले खिलाड़ियों की फोर्ब्स पत्रिका की सूची में 16वें स्थान पर रखे गए हैं. उन्होंने कमाई में सचिन तेंदुलकर रेसर फ़र्नांडो अलोंसो टेनिस स्टार नोवाक जोकोविच और रफाएल नडाल धावक उसैन बोल्ट और फ़ुटबॉलर काका को भी पीछे छोड़ दिया है. अगर विज्ञापन से कमाई की बात करें तो धोनी की कमाई फ़ुटबॉलर मेसी और रोनाल्डो से भी ज़्यादा है. अपने कमाल के खेल के लिए दुनियाभर में मशहूर मेसी और रोनाल्डो की पिछले साल विज्ञापन से कमाई जहां 21 मिलियन डॉलर रही वहीं धोनी ने विभिन्न उत्पादों के विज्ञापन कर 28 मिलियन डॉलर कमाए. पत्रिका के मुताबिक पिछले साल धोनी की कमाई तीन करोड़ 15 लाख अमरीकी डॉलर रही. और तो और 100 खिलाड़ियों की इस सूची में सिर्फ़ दो ही क्रिकेटर हैं और ये दोनों भारत के हैं. धोनी 16वें स्थान पर हैं तो सचिन तेंदुलकर 51वें स्थान परइस सूची में गोल्फ खिलाड़ी टाइगर वुड्स पहले स्थान पर हैं. जबकि स्विट्ज़रलैंड के रोजर फ़ेडरर दूसरे नंबर पर हैं. फोर्ब्स पत्रिका का कहना है कि 31 वर्षीय धोनी सबसे धनी खिलाड़ियों की सूची में इस वर्ष 15 पायदान ऊपर चढ़ गए हैं. साल 2012 में उन्हें 31वें स्थान पर रखा गया था. प्रभावशाली कारोबारी पत्रिका फोर्ब्स के आकलन के मुताबिक धोनी ने पिछले साल पुरस्कारों और विज्ञापनों से तीन करोड़ 15 लाख डॉलर की कमाई की है. फोर्ब्स की सूची में पहले स्थान पर रहनेवाले 37 वर्षीय टाइगर वुड्स की कमाई पिछले साल सात करोड़ 81 लाख डॉलर थी जबकि इस सूची में दूसरा स्थान हासिल करने वाले टेनिस खिलाड़ी रॉजर फ़ेडरर की कमाई सात करोड़ 15 लाख डॉलर थी. अमरीकी पेशेवर बास्केटबॉल खिलाड़ी कोबे ब्रायंट छह करोड़ 19 लाख डॉलर की कमाई के साथ इस सूची में तीसरे स्थान पर रहे. साल 2012 में फेडरर इस सूची में पहले स्थान पर थे. इस साल के सौ सबसे ताकतवर खिलाड़ियों की फोर्ब्स की सूची में केवल तीन महिलाएं हैं जिनमें 22वें स्थान पर हैं टेनिस खिलाड़ी मारिया शारापोवा. पिछले साल पुरस्कार राशि और विज्ञापनों से उनकी कुल कमाई रही है दो करोड़ 90 लाख डॉलर. इस सूची में टेनिस खिलाड़ी सरीना विलियम्स 68वें स्थान पर हैं जिनकी कमाई है दो करोड़ पांच लाख डॉलर जबकि चीन की टेनिस खिलाड़ी ला नीना का स्थान 85वां है और उनकी कुल कमाई रही है एक करोड़ 82 लाख डॉलर. |
| DATE: 2013-06-07 |
| LABEL: sports |
| [959] TITLE: चैंपियंस ट्रॉफ़ी: जीत के साथ भारत की शुरुआत |
| CONTENT: क्रिकेट की चैंपियंस ट्राफी में भारत ने दक्षिण अफ्रीका को हराकर जीत के साथ अपनी शुरूआत की है. जीत के लिए 332 रनों का पीछा करते हुए दक्षिण अफ़्रीक़ा की टीम निर्धारित 50 ओवरों में 305 रन पर आउट हो गई. भारत की जीत में शिखर धवन के शतक रोहित शर्मा के अर्द्धशतक और रविंद्र जडेजा की बल्लेबाज़ी और गेंदबाज़ी का अहम योगदान रहा. दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाज़ों ने हालांकि समय-समय पर अच्छी साझेदारियां की लेकिन भारतीय गेंदबाज़ों के आगे वे टिक नहीं सके और लगातार अंतराल पर उसके विकेट गिरते रहे. इससे पहले बल्लेबाज़ी करते हुएभारतने निर्धारित 50 ओवरों में सात विकेट के नुक़सान पर 331 रन बनाए. दक्षिण अफ़्रीक़ा ने टॉस जीतकर भारत को पहले बल्लेबाज़ी करने की दावत दी. भारत की ओर से शिखर धवन और रोहित शर्मा ने पारी की शुरूआत की. दोनों ने पहले विकेट के लिए 127 रनों की साझेदारी की. उनकी शानदार साझेदारी तब टूटी जब रोहित शर्मा 65 रन के निजी स्कोर पर मैक्लारेन की गेंद पर पीटरसन के ज़रिए लपक लिए गए. उसके बाद विराट कोहली मैदान में उतरे. लेकिन वो कुछ ख़ास नही कर सके और 31 रन बनाकर आउट हो गए. शिखर धवन डटकर बल्लेबाज़ी करते रहे और केवल 81 गेंदों पर अपना शतक पूरा किया. लेकिन धवन 114 के निजी स्कोर पर जेपी डुमिनि की गेंद पर कैच आउट हो गए. उसके बाद कार्तिक 14 रैना नौ और धोनी 27 रन बनाकर आउट हो गए. लेकिन आख़िर में रवींदर जडेजा ने कुछ अच्छे शॉट्स लगाए और नाबाद 47 रन बनाए. उनकी ही बदौलत भारत ने आसानी से तीन सौ का आंकड़ा पार किया और आख़िर में दक्षिण अफ़्रीक़ा के सामने 332 रनों का विशाल लक्ष्य रखा. दक्षिण अफ़्रीक़ा की ओर से सबसे सफल गेंदबाज़ रहे मैक्लारेन जिन्होंने तीन विकेट लिए जबकि सोत्सोबे ने दो विकेट लिए. दक्षिण अफ़्रीका की ख़राब शुरूआत हुई. दोनों सलामी बल्लेबाज़ हाशिम आमला और कॉलिन इंग्रम जल्द ही पैवेलियन लौट गए. तीसरे ही ओवर में इंग्रम छह रन के निजी स्कोर पर भुवनेश्वर कुमार की गेंद पर रैना के हाथों लपक लिए गए. उस वक़्त दक्षिण अफ़्रीक़ा का स्कोर केवल 13 रन था. थोड़ी देर बाद आमला भी 22 के निजी स्कोर पर उमेश यादव की गेंद पर धोनी के हाथों कैच आउट हुए. हालांकि रॉबिन पीटरसन और एबी डीविलियर्स ने मिलकर पारी को संभाला और तीसरे विकेट के लिए 124 रन जोड़े. पीटरसन ने 68 और डिविलियर्स ने 70 रन बनाए. लेकिन फिर दक्षिण अफ्रीका मिडिल ऑर्डर चरमरा गया. मात्र छह रन में उसके तीन विकेट आउट हो गए. पीटरसन को रविंद्र जडेजा की गेंद पर धोनी ने रन आउट किया जिस वक्त कुल स्कोर 155 रन था. फिर जीपी डुमिनी 14 रन के निजी स्कोर पर जडेजा की गेंद पर एलबीडबल्यू हो गए. उस वक्त कुल स्कोर 182 था. और फिर 184 के स्कोर पर उमेश यादव की गेंद पर जडेजा ने एबी डिविलियर्स का कैच लपक उन्हें पवैलियन लौटा दिया. अगले ही ओवर में इशांत शर्मा की गेंद पर डेविड मिलर रन आउट हो गए. सातवें विकेट के लिए डु प्लेस और मैक्लारन ने 50 रन जोड़े लेकिन उसके बाद इशांत शर्मा ने उनका और क्लेनवेल्डट का विकेट झटक कर दक्षिण अफ्रीका की मुश्किलें और बढ़ा दीं. मैक्लैरन ने नाबाद 71 रन बनाए. उन्होंने मोर्ने मॉर्कल के साथ मिलकर अंतिम विकेट के लिए 48 रन भी जोड़े लेकिन फिर भी अपनी टीम को हारने से नहीं बचा पाए. भारत के लिए उमेश यादव रविंद्र जडेजा इशांत शर्मा और भुवनेश्वर कुमार ने दो-दो विकेट लिए. |
| DATE: 2013-06-06 |
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| [960] TITLE: सचिन के बिना बड़े टूर्नामेंट में उतरेगी टीम इंडिया |
| CONTENT: स्पॉट फ़िक्सिंग और भ्रष्टाचार मामलों के साए में भारतीय क्रिकेट टीम चैम्पियंस ट्रॉफ़ी में आज अपना अभियान शुरू कर रही है. आईसीसी के मुताबिक़ ये चैम्पियंस ट्रॉफ़ी की आख़िरी प्रतियोगिता है. अभ्यास मैचों में धमाकेदार प्रदर्शन के बाद टीम इंडिया दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ अपने अभियान की शुरुआत करेगी. भारत के साथ ग्रुप बी में पाकिस्तान दक्षिण अफ़्रीका और वेस्टइंडीज़ की टीम हैं. इस ग्रुप को ग्रुप ऑफ़ डेथ भी कहा जा रहा है. नॉक आउट मुक़ाबले में एक भी हार टीम को टूर्नामेंट की होड़ से बाहर कर सकती है. लिहाजा टीम इंडिया और दक्षिण अफ़्रीका दोनों का इरादा इस मुक़ाबले में जीत हासिल करने का होगा. भारत वनडे क्रिकेट में दुनिया की नंबर वन टीम है ऐसे में चैंपियंस ट्रॉफ़ी पर उसका दावा मज़बूत माना जा रहा है. लेकिन दूसरी तरफ एक हकीकत ये भी है कि टीम पहली बार वीरेंदर सहवाग युवराज सिंह सचिन तेंदुलकर और ज़हीर ख़ान जैसे सीनियर खिलाड़ियों की गैर मौजूदगी में किसी विश्वस्तरीय टूर्नामेंट में हिस्सा ले रही है. बावजूद इसके भारत ने अभ्यास मैचों में जिस तरह से श्रीलंका और ऑस्ट्रेलिया को हराया है उससे टीम इंडिया के बेहतर प्रदर्शन का भरोसा मज़बूत हुआ है. भारत ने श्रीलंका के खिलाफ 334 रनों के लक्ष्य का सफलतापूर्वक पीछा किया वहीं ऑस्ट्रेलिया को महज 65 रनों पर समेट दिया. टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को युवा खिलाड़ियों से काफी उम्मीदें हैं. उन्होंने मुक़ाबले से पहले कहा है टीम का हर खिलाड़ी पूरी तरह फ़िट है. सभी खिलाड़ियों ने आईपीएल से पहले और आईपीएल के दौरान अच्छा प्रदर्शन किया है. महेंद्र सिंह धोनी और दिनेश कार्तिक ने अभ्यास मैचों में का प्रदर्शन शानदार रहा. दोनों अभ्यास मैच में शतक जमाने वाले दिनेश कार्तिक का मैच में खेलना तय है माना जा रहा है कि उन्हें मिडिल ऑर्डर में खेलने का मौका मिलेगा. दिनेश कार्तिक ने मंगलवार को ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ शतक बनाने के बाद कहा था कि वे टीम के लिए किसी भी नंबर पर बल्लेबाज़ी करने को तैयार हैं. माना जा रहा है कि टीम इंडिया की ओर से मुरली विजय और शिखर धवन पारी की शुरुआत करेंगे. इन दोनों के अब तक टेस्ट मुकाबलों में बेहतर प्रदर्शन को देखते हुए टीम के कप्तान धोनी इन दोनों को ही आजमाना चाहेंगे. अभ्यास मैचों में नाकाम रहे रोहित शर्मा को बाहर बैठना पड़ सकता है. माना जा रहा है कि टीम इंडिया पांच गेंदबाज़ों के साथ मैदान में उतरेगी. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ अभ्यास मैच में शानदार गेंदबाज़ी करने वाले उमेश यादव और ईशांत शर्मा के अलावा भुवनेश्वर कुमार तेज गेंदबाज़ी का जिम्मा संभालेंगे. जबकि स्पिन गेंदबाजी में दारोमदार आर अश्विन और रवींद्र जडेजा पर होगा. दूसरी ओर दक्षिण अफ़्रीकी टीम का पलड़ा थोड़ा कमजोर दिख रहा है. दुनिया के नंबर एक गेंदबाज़ डेल स्टेन फ़िट नहीं हैं. इतन ही नहीं ग्रैम स्मिथ और ज़ाक कैलिस भी अनफ़िट होने के चलते इस मुक़ाबले में नहीं खेलेंगे. लेकिन हाशिम अमला एबी डी विलियर्स डू प्लेसी और जेपी ड्यूमिनी जैसे क्रिकेटर भारत के लिए मुश्किलें बढ़ा सकते हैं. वैसे चैंपियंस ट्रॉफ़ी में टीम इंडिया और दक्षिण अफ़्रीकी टीम के बीच अब तक दो बार भिड़ंत हुई है और दोनों बार बाजी टीम इंडिया के नाम लगी है. 18 दिनों तक चलने वाली इस टूर्नामेंट में दुनिया की आठ सर्वश्रेष्ठ टीमें हिस्सा ले रही हैं और हर टीम का इरादा खिताब जीतने का ही है. ग्रुप ए में इंग्लैंड के अलावा ऑस्ट्रेलिया न्यूज़ीलैंड और श्रीलंका की टीम शामिल है. |
| DATE: 2013-06-06 |
| LABEL: sports |
| [961] TITLE: बांग्लादेश क्रिकेट ने अशरफुल पर लगाई रोक |
| CONTENT: बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड बीसीबी के प्रमुख ने कहा है कि देश को प्रभावित करने वाले सबसे बड़े खेल घोटाले के केन्द्र में रहे ऑलराउंडर मोहम्मद अशरफुल को तब तक खेलने की इज़ाजत नहीं दी जाएगी जब तक कि मैच फिक्सिंग के आरोपों को लेकर पूरी रिपोर्ट नहीं आ जाती है. बीसीबी के अध्यक्ष नज़मुल हसन ने कहा है कि उन्हें टी-20 टूर्नामेंट बांग्लादेश प्रीमियर लीग में कथित भ्रष्टाचार पर पूरी रिपोर्ट एक सप्ताह में मिलने की उम्मीद है. रिपोर्ट के मिलने तक अशरफुल को किसी दर्जे के खेल में शामिल नहीं किया जाएगा. हसन ने हालांकि साफ किया है कि यह किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है. हसन ने कहा हम रिपोर्ट आने और सबूतों के अंतिम रूप से पुष्टि होने तक तक अशरफुल के ख़िलाफ किसी तरह का कदम नहीं उठाएंगे लेकिन चूंकि उन्होंने फिक्सिंग की बात कबूल की है इसलिए उन्हें तब तक क्रिकेट नहीं खेलना चाहिए. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की भ्रष्टाचार निरोधक और सुरक्षा इकाई एसीएसयू इस साल फरवरी और मार्च में आयोजित बीपीएल के दूसरे सत्र के दौरान संदिग्ध खेलों और व्यक्तिगत व्यवहार की जाँच कर रही है. नजमुल हसन ने कहा कि पिछले साल बीपीएल के पहले सत्र के दौरान भ्रष्टाचार के चौतरफा आरोपों के बाद बोर्ड ने एसीएसयू को बीपीएल-2 की निगरानी करने की जिम्मेदारी दी. हसन ने ढाका में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान कहा कि जाँचकर्ताओं ने बांग्लादेश और दूसरे स्थानों पर कई लोगों के साथ बातचीत की और उन्हें कई लोगों से बातचीत करना बाकी है. हसन ने कहा कि वह इस स्तर पर कोई खुलासा नहीं कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि रिपोर्ट मिलने पर वह पूरी रिपोर्ट को प्रकाशित करेंगे. हसन ने कहा हम उन लोगों का नाम उजागर नहीं करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं जो कथित रूप से भ्रष्टाचार में शामिल हो सकते हैं. हालांकि कई रिपोर्ट में बताया गया है कि एसीएसयू जाँच दल द्वारा पूछताछ के दौरान मोहम्मद अशरफुल ने स्पॉट-फिक्सिंग की बात कबूल की है. हसन ने संवाददाताओं को यह भी बताया कि अशरफुल ने एसीएसयू की पूछताछ को लेकर उन्हें भी सफाई देने की कोशिश की थी लेकिन उन्होंने सुनने से इनकार कर दिया. अशरफुल 2001 में उस समय चर्चा में आ गए थे जब वह टेस्ट मैच में शतक लगाने वाले पहले बांग्लादेशी खिलाड़ी बन गए थे. उन्होंने यह कारनामा केवल 17 साल की उम्र में कर दिखाया. वह 2007 से 2009 तक बांग्लादेश के कप्तान भी रहे लेकिन उनके खेल में लय का अभाव देखा गया. हसन ने कहा कि पूरा बांग्लादेश उत्सुकता के साथ यह जानने का इंतजार कर रहा है कि गड़बड़ कहाँ हुई थी और कौन ज़िम्मेदार था. |
| DATE: 2013-06-04 |
| LABEL: sports |
| [962] TITLE: चेल्सी में वापस लौटे जोज़े मोरिन्यू |
| CONTENT: जोज़े मोरिन्यू एक बार फिर इंग्लैंड के मशहूर फ़ुटबॉल क्लब चेल्सी के मैनेजर बनाए गए हैं. पचास साल के मोरिन्यू रफ़ाएल बेनिटेथ के स्थान लेंगे. बेनिटेथ अब रियल मैड्रिड का मैनेजर बन रहे हैं. जब पिछली बार मोरिन्यू चेल्सी की मैनेजर थे तो टीम ने दो बार लगातार इंग्लिश प्रीमियर लीग का ख़िताब जीता था. चेल्सी के मुख्य अधिकारी रॉन गूर्ले ने कहा वे इस क्लब में बहुत लोकप्रिय व्यक्ति रहे हैं. यहां सभी लोग उनके साथ काम करने का इंतज़ार कर रहे हैं. साल 2007 में चेल्सी छोड़ने के बाद पुर्तगाल में जन्में मोरिन्यू ने इटली में इंटर मिलान और स्पेन में रियल मैड्रिड के साथ काम किया है. उनकी अगुवाई में इन क्लबों ने तीन लीग चैंपियनशिप दो घरेलू ख़िताब एक चैंपियन्स लीग का ख़िताब जीता है. चेल्सी के खिलाड़ी फ़्रैंक लाम्पार्ड ने बीबीसी स्पोर्ट को बताया वे एक बढ़िया मैनेजर हैं. मैं लाखों बार ये कहकर लोगों को बोर कर चुका हूं. पहले भी उनके साथ काम करना ख़ुशकिस्मती रही है. लाम्पार्ड ने कहा कि मोरिन्यू ने उनके खेल को कई गुना बेहतर किया था और उनके व्यक्तित्व को भी संवारा. |
| DATE: 2013-06-03 |
| LABEL: sports |
| [963] TITLE: विंदू और मेयप्पन 14 जून तक न्यायिक हिरासत में |
| CONTENT: मुंबई की एक अदालत ने आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग मामले में गिरफ़्तार अभिनेता विंदू दारा सिंह और चेन्नई सुपर किंग्स से जुडे गुरुनाथ मेयप्पन को 14 जून तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया है. विंदू और मेयप्पन को पिछले महीने गिरफ्तार किया गया था और मुंबई पुलिस उनसे पूछताछ कर रही थी. गुरुनाथ मेयप्पन बीसीसीआई प्रमुख एन श्रीनिवासन के दामाद हैं. श्रीनिवासन ने घोषणा की है कि जब तक जाँच पूरी नहीं हो जाती तब तक वो बोर्ड अध्यक्ष से जुड़ी ज़िम्मेदारियाँ नहीं उठाएँगे. इस दौरान जगमोहन डालमिया को बीसीसीआई का काम देखेंगे. पुलिस सूत्रों का कहना है कि मेयप्पन अभिनेता विंदू के माध्यम से आईपीएल मैचों पर सट्टा लगाते थे जो सट्टेबाजों से सीधे संपर्क थे. पुलिस ने साथ ही दावा किया है कि उसके पास विंदू और मेयप्पन के बीच बातचीत के सबूत हैं जिनमें दोनों कूटभाषा में बात कर रहे हैं. इस बीच पुलिस ने इस मामले में चेन्नई के होटल व्यवसायी विक्रम अग्रवाल से भी पूछताछ की है. पुलिस के मुताबिक़ विक्रम अग्रवाल मेयप्पन के दोस्त रहे हैं. इससे पहले चेन्नई सुपरकिंग्स की मालिक कंपनी इंडिया सीमेंट्स ने बयान जारी करके स्पष्ट किया था कि मेयप्पन न टीम के मालिक हैं और न ही टीम प्रिंसिपल. बयान के मुताबिक़ मेयप्पन सिर्फ़ टीम के मानद सदस्य हैं और क्रिकेट प्रेम के कारण ही वो नियमित रूप से टीम के साथ दिखते थे. आईपीएल में स्पॉट फ़िक्सिंग मामले के गहराने के बाद इसके चेयरमैन राजीव शुक्ला ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. मेयप्पन का नाम आने के बाद राजीव शुक्ला ने श्रीनिवासन से पद छोड़ने की मांग की थी. लेकिन श्रीनिवासन के बार-बार इस्तीफा देने से इनकार करने के बाद शुक्रवार को बोर्ड के कोषाध्यक्ष अजय शिर्के और सचिव संजय जगदाले ने त्यागपत्र दे दिया था. आईपीएल में फ़िक्सिंग का मामला तब सामने आया जब दिल्ली पुलिस ने फ़ोन कॉल्स के आधार पर राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों शांतकुमारन श्रीसंत अंकित चव्हाण और अजीत चंदीला को गिरफ़्तार किया था. |
| DATE: 2013-06-03 |
| LABEL: sports |
| [964] TITLE: जाँच पूरी होने तक श्रीनिवासन बीसीसीआई का काम नहीं देखेंगे |
| CONTENT: आईपीएल मामले की जाँच पूरी होने तक एन श्रीनिवासन बीसीसीआई के अध्यक्ष पद से हट गए हैं. उनकी जगह जगमोहन डालमिया काम देखेंगे. आईपीएल विवाद के बाद से श्रीनिवासन पर इस्तीफ़े का दबाव था. रविवार को चेन्नई में बीसीसीआई की कार्य समिति की आपात बैठक बुलाई गई थी जिसमें ये फ़ैसला लिया गया. भाजपा नेता अरुण जेटली ने डामलिया के नाम का प्रस्ताव रखा. बताया जा रहा है कि अरुण जेटली राजीव शुक्ला और अनुराग ठाकुर ने वीडियो कान्फ्रेंस के ज़रिए बैठक में हिस्सा लिया. बैठक के बाद बेहद छोटी सी प्रेस रिलीज़ जारी की गई जिसमें कहा गया है एन श्रीनिवासन ने घोषणा की है कि जब तक जाँच पूरी नहीं हो जाती तब तक वो बोर्ड अध्यक्ष से जुड़ी ज़िम्मेदारियाँ नहीं उठाएँगे. तब तक जगमोहन डालमिया बोर्ड का कामकाज देखेंगे. समिति ने संजय जगदले और अजय शिर्के में पूर्ण विश्वास व्यक्त किया है और उनसे गुज़ारिश की है कि वो अपने इस्तीफ़े वापस ले लें. भारतीय मीडिया में इस तरह की ख़बरें रविवार सुबह से ही चल रहीं थी कि श्रीनिवासन इस्तीफ़ा देने के लिए तैयार हो गए हैं लेकिन उन्होंने इसके लिए अपनी कुछ शर्तें रखीं हैं. टीवी चैनल एनडीटीवी से विशेष बातचीत में एन श्रीनिवासन ने कहा बैठक में चर्चा हुई और मैने घोषणा की जाँच पूरी होने तक मैं कामकाज नहीं देखूँगा. बोर्ड का कामकाज देखने की ज़िम्मेदारी डालमिया को दी गई है. हम सबने अजय शिर्के और संजय जगदाले से अनुरोध किया कि वो बोर्ड में वापस आ जाएँ. उन्होंने कहा है कि वे कल तक बताएँगे. आईएस बिंद्रा ने बैठक में मुझसे इस्तीफ़ा नहीं माँगा. बैठक काफ़ी अच्छे माहौल में हुई. मैने सही क़दम उठाया है और माफ़ कीजिए मैने कुछ ग़लत नहीं किया है. इससे पहले शनिवार की शाम आईपीएल के चेयरमैन राजीव शुक्ला ने अपने पद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा की थी. राजीव शुक्ला ने अपना पद छोड़ने की घोषणा करते हुए कहा था कि पद छोड़ने का यही सही समय है. इससे पहले शुक्रवार को बीसीसीआई सचिव संजय जगदाले और कोषाध्यक्ष अजय शिर्के ने इस्तीफ़ा देकर सबको चौंका दिया था. आईपीएल विवाद में फँसे श्रीनिवासन के दामाद गुरूनाथ मयप्पन की गिरफ़्तारी के बाद से श्रीनिवासन पर इस्तीफ़े का दबाव बना हुआ था. मामले की शुरूआत तब हुई जब पिछले महीने आईपीएल-6 के मैचों के दोरान दिल्ली की स्पेशल सेल ने राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों--श्रीसंत अंकित चौहान और अजीत चंदेला को स्पॉट फ़िक्सिंग के आरोप में गिरफ़्तार किया था. हालांकि श्रीसंत समेत राजस्थान रॉयल्स के दूसरे खिलाड़ी खुद को बेक़सूर बता रहे है. इसके कुछ ही दिनों बाद मुंबई पुलिस ने अभिनेता विंदु दारा सिंह को स्पॉट फ़िक्सिंग और बेटिंग के आरोप में गिरफ़्तार किया. मुंबई पुलिस के अनुसार विंदु ने पूछताछ के दौरान कथित तौर पर चेन्नई सुपर किंग्स से जुड़े मेयप्पन का नाम लिया था. विंदु के बाद मुंबई पुलिस ने मेयप्पन को भी स्पॉट फ़िक्सिंग और बेटिंग के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया. |
| DATE: 2013-06-03 |
| LABEL: sports |
| [965] TITLE: पुराने खिलाड़ी हैं जगमोहन डालमिया |
| CONTENT: कुछ वर्षों पहले बीसीसीआई से निर्वासित होकर भ्रष्टाचार का मुक़दमा झेलने वाले जगमोहन डालमिया के हाथ में एक बार फिर बीसीसीआई की कमान है. जगमोहन डालमिया फ़िलहाल बीसीसीआई वर्किंग ग्रुप का कामकाज देखेंगे. इस फ़ैसले को डालमिया और बीसीसीआई के अध्यक्ष श्रीनिवासन की ताज़ा जुगलबंदी के रूप में देखा जा रहा है. श्रीनिवासन ने अपने पद से इस्तीफ़ा न देकर बीबीसीआई के दैनिक कामकाज की कमान डालमिया को सौंप दी है. कोलकाता में जन्में 73 वर्षीय डालमिया को उनके जन्मदिन से ठीक दो दिन बाद नई ज़िम्मेदारी मिली है. बीसीसीआई और आईसीसी के प्रमुख के रूप में अपनी पारी के दौरान डालमिया पर कई विवादों का साया भी पड़ा. शरद पवार के बीसीसीआई अध्यक्ष बनने के बाद 2006 में उन्हें हेराफेरी के मामले में गिरफ़्तार किया गया. उस समय डालमिया ने इन आरोपो को उनके प्रतिद्वंद्वियों के गेम प्लान का हिस्सा बताया हालांकि पवार ख़ेमे ने कहा कि यह कार्रवाई बदले की भावना से नहीं की गई है. इसके बाद 2010 में उनका वनवास उस समय ख़त्म हुआ जब बीसीसीआई ने उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार का मुक़दमा वापस लेते हुए उन पर लगा चार साल का प्रतिबंध भी ख़त्म कर दिया. यही वह समय था जब श्रीनिवासन को बोर्ड अध्यक्ष के रूप में नामित किया गया. इससे पहले आईसीसी के मैच रेफ़री माइक डेनिस के फ़ैसले को लेकर उठे विवाद के दौरान भी डालमिया चर्चा में रहे. डेनिस ने सचिन तेंदुलकर पर 2001 के पोर्ट एलिज़ाबेथ टेस्ट में गेंद से छेड़छाड़ करने का गंभीर आरोप लगाया था. इसके अलावा छह भारतीय खिलाड़ियों पर अत्यधिक अपील करने के लिए डेनिस ने प्रतिबंध लगा दिया था. डालमिया उस समय बीसीसीआई के अध्यक्ष थे और आईसीसी को अपना रुख़ बदलना पड़ा और माइक डेनिस को सार्वजनिक तौर पर इस पूरे मसले पर माफ़ी मांगनी पड़ी. वर्तमान में बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष डालमिया 1979 में बीसीसीआई में शामिल हुए और 1983 में उन्हें कोषाध्यक्ष की ज़िम्मेदारी मिल गई. डालमिया कई बार बीसीसीआई के अध्यक्ष रह चुके हैं और वह 1997 में आईसीसी के अध्यक्ष भी बने. |
| DATE: 2013-06-02 |
| LABEL: sports |
| [966] TITLE: नरेंद्र मोदी को बनाएँ बीसीसीआई अध्यक्ष: कीर्ति आज़ाद |
| CONTENT: जगमोहन डामलिया को बीसीसीआई का कामकाज सौंपने के फैसले पर अलग अलग प्रतिक्रियाएँ आई हैं. कीर्ति आज़ाद ने इसकी आलोचना करते हुए कहा है कि नरेंद्र मोदी साफ सुथरी छवि वाले नेता हैं और उन्हें अध्यक्ष बनाने के बारे में सोचना चाहिए. आईपीएल मामले की जाँच पूरी होने तक एन श्रीनिवासन बीसीसीआई के अध्यक्ष पद से हट गए हैं. उनकी जगह जगमोहन डालमिया कामकाज संभालेंगे. आईपीएल विवाद के बाद से श्रीनिवासन पर इस्तीफे का दबाव था. लेकिन 1983 में विश्व कप जीतने वाले पूर्व क्रिकेटर और राजनेता कीर्ति आज़ाद ने इसकी आलोचना की है. मीडिया से बातचीत में उन्होंने नरेंद्र मोदी के नाम की वकालत कर डाली. उन्होंने कहा हमारे प्रधानमंत्री कहाँ है क्या वो क्रिकेट का हाल देख रहे हैं. प्रधानमंत्री को कोई कदम उठाना चाहिए. अगर बीसीसीआई की राज्य इकाइयों से ही अध्यक्ष बनाना है तो क्यों न कोई ऐसा व्यक्ति चुनो जिसकी छवि साफ सुथरी हो जो कुशल प्रशासक हो यानी नरेंद्र मोदी. इन सब राजनेताओं में से वे सबसे कुशल व्यक्ति हैं. अगर बीसीसीआई को साफ करने की हिम्मत है तो मोदी को लेकर आएँ. फिलहाल जो लोग हैं उनके रहते प्रशासन को ठीक नहीं रखा जा सकता है. इन लोगों ने क्रिकेट और भारत का नाम बदनाम किया है. कीर्ति आज़ाद लंबे समय से बीसीसीआई के कामकाज की ओलचना करते आए हैं. कुछ दिन पहले उन्होंने कहा था बीसीसीआई के अंदर आईपीएल के माध्यम से जिस प्रकार का भ्रष्टाचार घुस गया है उसके इलाज के लिए तो अंग ही काटना पड़ेगा. लेकिन इस बीच आपस में ही लड़ाई शुरु हो चुकी है. कोई इधर भाग रहा है कोई उधर भाग रहा है. |
| DATE: 2013-06-02 |
| LABEL: sports |
| [967] TITLE: फ़ीफ़ा कार्यकारिणी में पहली बार महिला सदस्य |
| CONTENT: फ़ीफ़ा ने अपने 109 साल के इतिहास में पहली बार अपनी कार्यकारिणी समिति के लिए एक महिला सदस्य को चुना है. इतिहास रचने वाली ये महिला लीडिया सेकेरा बुरूंडी में फ़ुटबॉल संघ की अध्यक्ष भी हैं. फ़ीफ़ा कांग्रेस की मॉरीशस में हुई वोटिंग के दौरान चुनी गई 46 साल की सेकेरा चार साल तक के लिए इस शक्तिशाली समिति की सदस्य रहेंगी. उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के मोया डॉड और टर्कस एंड कैकॉस आइलैंड्स की सोनिया बिन- एमी को पछाड़ा और कुल 203 वोटों में से उन्हें 95 वोट मिले. सेकेरा का कहना था मैं महिलाओं को ये विश्वास करने के लिए प्रेरित करूंगी कि वे भी नेतृत्व कर सकती हैं और संघ में महिलाओं का समर्थन करुंगी. सेकेरा पिछले साल फ़ीफ़ा कार्यकारिणी समिति में को-ऑपटेड सदस्य के रूप में चुनी जाने वाली पहली महिला थीं. सेकेरा साल 2004 से बुरुंडी में फुटबॉल संघ की प्रमुख हैं. वे साल 2008 और 2012 में होने वाले ओलंपिक फ़ुटबॉल टूर्नामेंट के लिए फ़ीफ़ा आयोजन समिति की सदस्य थी. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमिटी की सदस्य सेकेरा फ़ीफ़ा के अंदर भ्रष्टाचार से निपटने के लिए 2011 में बनाई गई स्वतंत्र गवर्नेंस समिति में भी शामिल हैं. सेकेरा ने बीबीसी स्पोर्ट से बातचीत में कहा मैं फ़ीफा में पहली महिला चुनी गई हूं. इसकी मुझे बेहद ख़ुशी है. ये अफ़्रीक़ा के लिए बुरुंडी के लिए और महिलाओं के लिए अहम है. उनका कहना था कार्यकारिणी समिति में हम एक टीम के तौर पर काम करते हैं लेकिन निजी तौर पर ज़मीनी स्तर पर फ़ुटबॉल कोच के रूप में ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को लाने की दिशा में काम करती रहूंगी. सेकेरा का कहना था मैं कोशिश करुंगी कि और महिलाएं चुनी जाएं और अभिभावको से कहूंगीं कि वे अपनी बच्चियों को फुटबॉल खेलने दें. डॉड को 203 में से 70 वोट मिले और बिन-एमी ने 38 वोट हासिल किए. ये दोनों एक साल तक समिति की को-ऑपटेड सदस्य रहेंगीं. डॉड का कहना था फ़ुटबॉल के क्षेत्र में ये एक ऐतिहासिक और महिलाओं के लिए महान दिन है. |
| DATE: 2013-06-01 |
| LABEL: sports |
| [968] TITLE: एक फ़ोनकॉल ले डूबा स्पिन के जादूगर को |
| CONTENT: भारत के मशहूर स्पिन चौगड्डे से पहले और अनिल कुंबले के उदय से बहुत पहले भारतीय स्पिन का लोहा मनवाया था सुभाष गुप्ते की ज़बरदस्त कलाइयों ने. सुभाष के पास उच्च कोटि के लेग स्पिनर के सभी गुर थे लेकिन उनकी दो तरह की गुगली गेंदें इतनी ख़तरनाक होती थीं जिन्हें गैरी सोबर्स जैसे दिग्गज के लिए भी समझ पाना बहुत मुश्किल हुआ करता था. सोबर्स अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि गुप्ते से अच्छे लेग स्पिन गेंदबाज़ को उन्होंने नहीं खेला. वो कहते हैं कि बेशक शेन वॉर्न आज के युग के सबसे अच्छे लेग स्पिनर माने जाते हों लेकिन उन्होंने उनसे बेहतर गेंदबाज़ के खिलाफ क्रिकेट खेली है. गुप्ते के पास वॉर्न से कहीं ज़्यादा विविधता थी और उनकी गुगली को समझ पाना किसी के बूते की बात नहीं थी. वॉर्न गेंद को बहुत अधिक टर्न करते थे लेकिन स्पिन गेंदबाजी में टर्न ही सब कुछ नहीं होता. लेंथ और दिशा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है. वेस्ट इंडीज़ के तीन डब्लूज़ वॉरेल वॉल्कॉट और वीक्स ने उनके खिलाफ रन जरूर बनाए थे लेकिन सुभाष ने उन्हें कई बार मुश्किलों में भी डाला था. उस ज़माने में वेस्ट इंडीज़ के विकेट स्पिन गेंदबाज़ों को बिल्कुल भी मदद नहीं करते थे लेकिन इसके बावजूद 1952 की सिरीज़ में उन्होंने वहाँ 27 विकेट लिए थे. उस टीम के मैनेजर दलीप सिंहजी ने उनकी तुलना महानतम ऑस्ट्रेलियन लेग स्पिनर क्लेरी ग्रिमेट से की थी. इसके बाद पाकिस्तान सिरीज़ में भी उनके हाथ 21 विकेट लगे. न्यूज़ीलैंड के खिलाफ तो वह इतनी अच्छी फ़ॉर्म में थे कि उनको खेल पाना असंभव था. उन्होंने उस सिरीज़ में 34 विकेट लिए जो कई सालों तक भारत के रिकॉर्ड रहा जिसे बाद में चंद्रशेखर ने 1973 में इंग्लैंड के खिलाफ तोड़ा. पॉली उमरीगर के अनुसार सुभाष गुप्ते दो तरह की गुगली गेंद करते थे. एक जब वह अपने दाहिने कान के पास अपना हाथ ले जाते थे और दूसरा जब वह हाथ को कान से दूर रखते थे. कई बार बल्लेबाज़ उनकीं गेंद यह सोच कर छोड़ देते थे कि वह बाहर जा रही है और वही गेंद उनका मिडिल या लेग स्टंप ले उड़ती थी. भारत के एक और महान स्पिनर वीनू मानकड़ ने अपने बेटे अशोक मानकड़ को बताया था कि क्रिकेट में अगर कहीं जादू जैसी चीज़ है तो सुभाष गुप्ते जादूगर हैं. मानकड़ का मानना था कि अगर 1954 के पाकिस्तान दौरे में भारतीय फ़ील्डरों ने गुप्ते की गेंदों पर उठे कैच लपके होते तो भारत वह सिरीज़ जीत कर लौटता. अपने ज़माने के एक और बड़े सिपनर बापू नाडकर्णी कहते हैं कि उन्होंने किसी ऐसे गेंदबाज़ को नहीं देखा जिसका लाइन और लेंथ पर इतना ज़बरदस्त नियंत्रण हो. ये भारत का दुर्भाग्य था कि उस समय की भारतीय फील्डिंग माशा अल्लाह हुआ करती थी. नाडकर्णी के मुंह से इस तरह की तारीफ़ निकलना बड़ी बात है क्योंकि उनके बारे में भी मशहूर था कि वह 10 में से 10 बार गेंद को एक रुमाल पर डाल सकते थे. सुभाष गुप्ते के बारे में ये भी कहा जाता था कि वह शीशे पर भी गेंद को स्पिन करा सकते थे. उन्होंने भारत के लिए 36 टेस्ट खेले और 149 विकेट लिए. लेकिन उन्हें बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थतियों में क्रिकेट को अलविदा कहना पड़ा. 1964 के इंग्लैंड दौरे के दौरान भारतीय टीम दिल्ली के इंपीरियल होटल में ठहरी हुई थी. होटल की रिसेप्शिनिस्ट ने शिकायत की कि उसके साथ भारतीय टीम के एक खिलाड़ी ने फोन पर छेड़छाड़ की है. जिस कमरे से फ़ोन गया था वह कमरा सुभाष गुप्ते का था और उनके रूम-मेट एजी कृपाल सिंह थे. कृपाल सिंह ने रिसेपशनिस्ट को फ़ोन कर कहा था कि क्या वह उनके साथ बाहर घूमने जा सकती हैं. रिसेपशनिस्ट ने इसकी शिकायत भारतीय मैनेजर से कर दी. गुप्ते और कृपाल सिंह को इस शिकायत के आधार पर अगले दो टेस्ट मैचों के लिए भारतीय टीम से हटा दिया गया. कृपाल सिंह ने बाद में सुभाष के सामने अपनी गलती मानी. जब सुभाष ने यह बात बोर्ड के एक सदस्य को बताई तो उन्होंने कहा कि उन्होंने कृपाल को अपने कमरे का फ़ोन क्यों इस्तेमाल करने दिया. इस पर सुभाष ने कहा कि वह वयस्क और समझदार पुरुष हैं. मैं उनको कैसे रोक सकता थाउस टीम के कप्तान नारी कान्ट्रेक्टर ने कृपाल सिंह से इस बारे में पूछा तो न सिर्फ उन्होंने पूरी बात स्वीकार की बल्कि यह भी कहा कि वह बोर्ड प्रमुख चिदम्बरम से इस बारे में सब कुछ बता देंगे. मैच के अंतिम दिन चिदम्बरम ने नारी को बुला कर कहा कि इन दोनों का अगले टेस्ट के लिए नहीं चुना जाएगा. उन्होंने उन्हें समझाने की कोशिश भी की लेकिन यह साफ था कि कृपाल सिंह ने चिदम्बरम को कोई सफा़ई नहीं दी थी. इस तरह महज़ 34 साल की उम्र में एक महान खिलाड़ी के करियर का अंत हो गया. इसके बाद उन्होंने कोई क्रिकेट नहीं खेली और वो वेस्ट इंडीज़ चले गए. उन्होंने वहाँ शादी की और फिर वहीं बस गए. इसके बाद वह भारत नहीं लौटे. बाद में मिहिर बोस ने अपनी किताब द हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन क्रिकेट में लिखा भारत के पहले महान स्पिनर सुभाष गुप्ते का करियर इसलिए समाप्त हो गय़ा क्योंकि वो एक ऐसे शख़्स के साथ रूम शेयर कर रहे थे जो एक लड़की के साथ एक ड्रिंक्स पीना चाहता था. गुप्ते की जलाई मशाल को उनके बाद के भारतीय स्पिनरों ने भी जलाए रखा. 1958 में एक 12 साल के बच्चे ने इस महान स्पिनर के कारनामे की दास्तान वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ कानपुर टेस्ट की रेडियो कमेंट्री में सुनी. सुभाष ने इस पारी में 102 रन दे कर 9 विकेट लिए थे. उस बच्चे ने तय किया कि अब से वह भी स्पिन गेंदबाज़ी करेगा. बड़ा होकर वह बच्चा बिशन सिंह बेदी के नाम से मशहूर हुआ. |
| DATE: 2013-05-31 |
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| [969] TITLE: एक शहर जो फ़ुटबॉल के लिए मचलता है. |
| CONTENT: कोलकाता में क्रिकेट और फ़ुटबॉल के लिए मशहूर एक क्लब के मैदान पर नौजवान फ़ुटबॉल खिलाड़ी का मैच खेल रहे हैं. मैच का नज़ारा देख रहे दर्शक राजीनीतिक मामलों पर बहस भी कर रहे हैं और साथ ही गोल होने पर तालियाँ भी बजा रहे हैं. इन दर्शकों में औरत और मर्द दोनों ही शामिल हैं. कोलकाता में सियासत और फ़ुटबॉल पर एक ही सांस में बातें करना कोई अजीब बात नहीं. असाधारण बात ये होगी कि अगर यहाँ के नागरिक शहर के दो बड़े फ़ुटबॉल क्लब यानी मोहन बगान और ईस्ट बंगाल के समर्थक न हों. मैदान पर मौजूद नौजवान खिलाड़ियों के बीच एक उम्रदराज हो चुका खिलाड़ी जमशेद नसीरी भी मौजूद है. उनकी उम्र तकरीबन 56 वर्ष के करीब होगी. वे कोशिश कर रहे हैं कि लड़कों को छका कर बॉल गोल में दे मारे लेकिन लड़के हर बार उन पर हावी हो जाते हैं. एक वक्त था कि जब जमशेद खेल के मैदान में फ़ुटबॉल के माहिर खिलाड़ी माने जाते थे. पुराने दिनों में फ़ुटबॉल प्रेमियों के वे चेहते खिला़ड़ी हुआ करते थे. वे आज भी फ़ुटबॉल के दीवानों के बीच हीरो का दर्जा रखते हैं. ईरान के नागरिक जमशेद 1970 के दशक में फ़ुटबॉल खेलने कोलकाता आये थे और यहीं के होकर रह गये. वह कहते हैं कोलकाता ही अब मेरा घर है. मैंने यहीं शादी की और अब ईरान की अधिक याद भी नहीं आती. जमशेद के यहीं बस जाने की बड़ी वजह थी बंगाल के लोगों का फ़ुटबॉल से लगाव. कोलकाता के फ़ुटबॉल का इतिहास 150 साल पुराना है और यहाँ के फ़ुटबॉल के जादू ने कई विदेशी खिलाड़ियों को अपना लिया है. नाईजीरिया के चीमा ओकरी भी जमशेद नसीरी से दस साल बाद यहाँ फ़ुटबॉल खेलने आये थे और अब कोलकाता उनका दूसरा घर है. अपना किस्सा सुनाते हुए उन्होंने बताया मैं जब यहाँ आया केवल 15 वर्ष का था. इस शहर ने मुझे मेरी पढने का मौका दिया. मुझे पत्नी दी और मुझे एक लीजेंड का दर्जा दिया. कोलकाता के फ़ुटबॉल ने विदेशी खिलाडियों को हमेशा लुभाया है. इस सिलसिले में चीमा के बाद आये ब्राज़ील के होज़े रामिरेज़ बरेतो का उदाहरण लिया जा सकता है. वो कहते हैं मैंने 1999 में मोहन बगान के लिए खेलना शुरू किया तब मैं बहुत कम उम्र का था. अब मैं 36 साल का हूँ. यहाँ मुझे बहुत प्यार मिला है. मुझे नहीं मालूम कि मैं कोलकाता छोड़ सकूंगा या नहीं. लेकिन कम से कम कुछ सालों तक तो यहाँ जरूर हूँ. कभी अगर आप को फ़ुटबॉल में नाम और पैसा कमाना होता था तो आपको कोलकाता में अपना जलवा दिखाना ज़रूरी होता था. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. अब फ़ुटबॉल में पहले से अधिक पैसा है और कोलकाता से बाहर पुणे मुंबई और गोवा के क्लबों ने भी विदेशी खिलाडियों को लुभाना शुरू कर दिया है. बरेतो कहते हैं कोलकाता क्लब के पास पहले स्पॉन्सर्स थे. पैसे थे और फैन बेस भी. साथ ही एक सक्रिय मीडिया भी. अब गोवा और मुंबई के क्लब भी देश के बेहतरीन टैलेंट और विदेशी खिलाडियों को खरीद रहे हैं. आज कोलकाता के बाहर की टीमों के लिए विदेशी खिलाड़ी जापान ब्राज़ील लेबनान सूडान नाईजीरिया और पुर्तगाल जैसे मुल्कों से आकर खेल रहे हैं. ये विदेशी खिलाड़ी अपनी टीमों को भारी सफलता भी दिला रहे हैं. भारतीय क्लबों की प्रतियोगिता आई लीग की शुरुआत 2007 में हुई. अब तक कोलकाता के किसी क्लब ने ये प्रतियोगिता नहीं जीती है. हर साल जीतने वाली टीम गोवा से है. वरिष्ठ फ़ुटबॉल लेखक धीमन सरकार कहते हैं कोलकाता के क्लबों की मिसाल पुराने अख़बारों के पाठकों की तरह है. उनके विचार में कोलकाता फ़ुटबॉल के गिरते स्तर के लिए ज़िम्मेदार क्लबों के प्रशासक हैं. उन्होंने कहा कोलकाता के जिन तीन सब से बड़े क्लबों ने यहाँ के फ़ुटबॉल को नुकसान पहुँचाया है उनके पास ऐतिहासिक रूप से बड़े फैन बेस थे और पैसा भी. उन्होंने अपने फ़ैन बेस से जुड़ने की कभी कोशिश ही नहीं की. चीमा ओकरी भारतीय क्रिकेट की प्रशंसा करते हुए कहते हैं फ़ुटबॉल ने खुद की मार्केटिंग की ही नहीं जिस तरह से क्रिकेट ने की. ट्रेवर मॉर्गन तीन साल तक ईस्ट बंगाल के हेड कोच रहने के बाद पिछले हफ्ते अपने देश इंग्लैंड वापस लौट गये. अपने क्लब में सुविधाओं की कमी से परेशान रहे ट्रेवर मॉर्गन ने जाने से पहले बीबीसी से एक मुलाक़ात में कहा तीन साल पहले यहाँ कुछ भी नहीं था. हमारा ट्रेनिंग मैदान भी अपना नहीं था. जिम नहीं था. चेंजिंग रूम अच्छा नहीं था. अब कुछ सुविधाएँ हैं क्यूंकि हम ने इस की हमेशा मांग की. ऑस्ट्रेलिया के एंड्रू बरिसिक कहते हैं कि पश्चिमी देशों में फ़ुटबॉल एक आउटिंग है. उन्होंने कहा यहाँ साल्ट लेक स्टेडियम में आप अपने परिवार के साथ मैच देखने नहीं जा सकते. फ़ुटबॉल को आकर्षित बनाने के लिए कोलकाता के क्लब को सुविधाएँ बढाने के लिए काफी काम करना होगा. कोलकाता को इन सब कमियों के बावजूद फ़ुटबॉल से अब भी उतना ही प्यार है जितना डेढ़ सौ साल पहले था. और कोलकाता वासियों का विदेशी खिलाडियों से प्यार अब भी कम नहीं हुआ है. सचिन तेंदुलकर के मुंबई में फ़ुटबॉल का कोई नामी गिरामी खिलाड़ी नहीं. लेकिन सौरव गांगुली के कोलकाता में एक से बढ़ कर एक फ़ुटबॉल खिलाडी हैं जिन्हें घर घर में जाना और पहचाना जाता है. इसके इलावा दो साल पहले जब बार्सिलोना के लायनल मेसी कोलकाता आये थे तो उन्हें देखने जितनी बड़ी भीड़ जमा हुई थी उतनी बड़ी भीड़ कभी सौरव गांगुली को देखने नहीं आई. ऐसा लगता है इस क्रिकेट प्रेमी देश में अगर फ़ुटबॉल के लिए अब भी कोई मचलता है तो वो हैं कोलकाता शहर के लोग. |
| DATE: 2013-05-31 |
| LABEL: sports |
| [970] TITLE: 'गेंदबाज़ फिक्सिंग कर रहे थे, बल्लेबाज़ों का क्या?' |
| CONTENT: अगर गेंदबाज़ को सट्टेबाज़ों ने फिक्स किया हुआ था तो बल्लेबाज़ क्या कर रहा थाये सवाल उठाया दिल्ली की एक अदालत ने जहां स्पॉट फिक्सिंग के मामले में गिरफ्तार हुए खिलाड़ियों को गुरुवार को पेश किया गया था. खिलाड़ियों के वकीलों से सवाल करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायधीष विनय कुमार खन्ना ने कहा अगर गेंदबाज़ को सट्टेबाज़ों ने फिक्स किया हुआ था तो बल्लेबाज़ क्या कर रहा था ऐसा कैसे हो सकता है कि गेंदबाज़ 13 रन दे रहा था और बल्लेबाज़ भी उतने ही रन बना रहा था तब क्या होता अगर वो बल्लेबाज़ उतने रन नहीं बना पाताइसके बाद उन्होंने पूछा जब चव्हाण गेंदबाज़ी कर रहा था तो बल्लेबाज़ क्या कर रहा था कुछ तो बल्लेबाज़ के नियंत्रण में भी होगा क्योंकि रन तो उसने ही बनाए. ऐसा कैसे हो सकता है कि बल्लेबाज़ की भूमिका के बिना ही गेंदबाज़ निर्धारित रन दे दे. पिछली 16 मई को दिल्ली पुलिस ने श्रीसांत और राजस्थान रॉयल्स टीम के सदस्य अजीत चंडीला के साथ चव्हाण को आईपीएल में स्पॉट फ़िक्सिंग के आरोप में मुंबई से गिरफ़्तार किया था. राजस्थान रॉयल के क्रिकेटर अंकित चव्हाण की ज़मानत पर कोर्ट में चल रही बहस के दौरान न्यायधीष विनय कुमार ने ये टिप्पणी की. सरकारी वकील राजीव मोहन और दूसरे पुलिस अधिकारियों ने कोर्ट को बताया कि वे दूसरे खिलाड़ियों या बल्लेबाज़ों की भूमिका पर भी जांच कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि उनके पास इस बात के सबूत हैं कि चव्हाण फिक्सिंग में संलिप्त थे. चव्हाण की ज़मानत का विरोध करते हुए राजीव मोहन ने कहा कि कि उन्होंने 15 मई को मुंबई इंडियंस और राजस्थान रॉयल्स के बीच खेले गए मैच में 13 रन देने का वायदा किया था. उन्होंने अदालत को बताया कि उनके पास ऐसी फोन रिकॉर्डिंग है जिसमें बातचीत से पता चलता है कि अंकित 60 लाख रुपयों के लिए 13 रन देने को तैयार हैं. राजीव मोहन ने कहा जब अंकित ने निर्धारित ओवर में उतने रन दिए तो अजीत चंडीला ने एक फिक्सर को बधाई देते हुए फोन पर कहा कि अंकित ने अपना काम कर दिया है और अब उसे पैसे मिलने चाहिए. उनके इस दावे के बाद अदालत ने उनसे बल्लेबाज़ों की भूमिका के बारे में सवाल किए. सुनवाई के बाद क्रिकेटर अंकित चौहान को उनकी शादी के लिए छह जून तक के लिए ज़मानत दे दी है. |
| DATE: 2013-05-31 |
| LABEL: sports |
| [971] TITLE: स्पॉट फ़िक्सिंग मामले पर धोनी की चुप्पी |
| CONTENT: चैम्पियंस ट्रॉफ़ी के लिए इंग्लैंड रवाना हो रही भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने आईपीएल में स्पॉट फ़िक्सिंग के मामले में चुप्पी साध रखी है. इंग्लैंड रवाना होने से पहले प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पत्रकारों ने कई बार आईपीएल में स्पॉट फ़िक्सिंग को लेकर सवाल पूछे लेकिन महेंद्र सिंह धोनी ने कुछ नहीं कहा. बीसीसीआई के मीडिया प्रबंधन से जुड़े अधिकारी पत्रकारों को ये निर्देश दे रहे थे कि ये प्रेस कॉन्फ़्रेंस आईपीएल के बारे में नहीं है और न ही महेंद्र सिंह धोनी इस समय आईपीएल की चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान के रूप में यहाँ आए हैं. अधिकारियों ने कहा कि भारतीय टीम के लिए आचार संहिता है और धोनी से स्पॉट फ़िक्सिंग के बारे में कुछ भी न पूछा जाए. लेकिन धोनी ने आईपीएल फ़ाइनल से पहले प्रेस कॉन्फ़्रेंस में भी हिस्सा नहीं लिया था. फ़ाइनल में चेन्नई सुपर किंग्स की टीम मुंबई इंडियंस से हार गई थी. स्पॉट फ़िक्सिंग के आरोप में तीन क्रिकेटरों की गिरफ़्तारी के बाद आईपीएल-6 विवादों के घेरे में आ गया था. आईपीएल में राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ी एस श्रीसंत अंकित चव्हाण और अजीत चंडीला को दिल्ली पुलिस ने गिरफ़्तार किया था. हालाँकि श्रीसंत इन आरोपों से इनकार करते हैं. इसके बाद मुंबई पुलिस ने सट्टेबाज़ों से संबंध के आरोप में विंदू दारा सिंह को गिरफ़्तार किया. विंदू दारा सिंह से पूछताछ के बाद बीसीसीआई के प्रमुख एन श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मेयप्पन को भी मुंबई पुलिस ने गिरफ़्तार किया. विंदू दारा सिंह की पत्नी ने भी अपने पति पर लगे आरोपों को ख़ारिज किया है. हालाँकि इंडिया सीमेंट्स ने बयान जारी करके ये स्पष्ट किया कि गुरुनाथ मेयप्पन चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक नहीं हैं और न ही वे टीम प्रिंसिपल हैं वे सिर्फ़ टीम के मानद सदस्य हैं. |
| DATE: 2013-05-28 |
| LABEL: sports |
| [972] TITLE: बायर्न म्यूनिख ने जीता चैंपियंस लीग खिताब |
| CONTENT: जर्मन क्लब बायर्न म्यूनिख ने 2013 का चैंपियंस लीग फ़ुटबॉल खिताब जीत लिया है. लंदन के वेंबली स्टेडियम में शनिवार को रोमांचक फाइनल के आखिरी लम्हों में आर्येन रॉबेन के गोल की बदौलत बायर्न ने एक और जर्मन क्लब बोरुशिया डॉर्टमुंड को 2-1 से हरा दिया. ये पांचवा मौका है जब बायर्न यूरोपीय चैंपियन बना है. इसके साथ ही चैंपियंस लीग के इतिहास में इंग्लिश क्लब लिवरपूल के साथ बायर्न म्यूनिख तीसरी सबसे सफल टीम बन गई है. रियाल मैड्रिड ने नौ बार और एसी मिलान ने सात बार चैंपियनशिप जीती है. इंग्लिश क्लब लिवरपूल भी पांच बार खिताब जीत चुका है. खेल के पहले हाफ़ में दोनों टीमें कोई गोल नहीं कर सकीं. दूसरे हाफ़ में 60वें मिनट में बायर्न म्यूनिख के मारियो मांडजु़किच ने गोल कर अपनी टीम को बढ़त दिलाई. लेकिन 68वें मिनट में गुंडोगान के गोल के ज़रिए डॉर्टमुंड ने स्कोर बराबर कर लिया. एक समय लग रहा था कि मैच एक्ट्रा टाइम में जाएगा लेकिन 89वें मिनट में आर्येन रॉबेन ने गोल कर बायर्न म्यूनिख को जीत और पांचवी बार चैंपियंस लीग विजेता बना दिया. इससे पहले बायर्न म्यूनिख 2010 और 2012 में फ़ाइनल मुक़ाबले हार गया था. |
| DATE: 2013-05-26 |
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| [973] TITLE: खेल में बेईमानी के खिलाफ बनेगा नया कानून |
| CONTENT: कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि खेल की दुनिया में बेईमानी को रोकने के लिए सरकार जल्द ही नया कानून लेकर आएगी. इस बार की आईपीएल प्रतियोगिता कथित स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाज़ी को लेकर विवादों के घेरे में है. एस श्रीसंत समेत तीन खिलाड़ियों को आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद और गुरुनाथ मेयप्पन को भी आईपीएल में सट्टेबाज़ी के मामले में मुंबई पुलिस ने गिरफ़्तार किया था. कपिल सिब्बल ने पत्रकारों को बताया है कि एटॉर्नी जनरल ने सलाह दी है कि खेल में बेईमानी जैसे आरोपों से निपटने के लिए बेहतर होगा कि अलग से कानून बनाया जाए न कि आईपीसी में संशोधन किया जाए. उन्होंने कहा कि इस कानून के दायरे में क्रिकेट ही नहीं बल्कि अन्य खेल और विदेशी खिलाड़ी भी आएँगे. मंत्री ने बताया कि एटॉर्नी जनरल ने राय दी है कि राज्य सरकारों का कोई हक़ नहीं है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की घटनाओं पर कानून बनाए. इस सिलसिले में विपक्ष के नेता अरुण जेटली और बीसीसीआई के राजीव शुक्ला ने कपिल सिब्बल से मुलाकात भी की है. कपिल सिब्बल ने बताया कि विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार के साथ है. कपिल सिब्बल ने कहा कि कानून का ढाँचा तैयार कर खेल मंत्रालल को भेजा जाएगा जिसके बाद विचार विमर्श के बाद मसौदा तैयार किया जाएगा. हालांकि जब उनसे सीधे-सीधे बीसीसीआई के बारे में सवाल पूछे गए तो उन्होंने जवाब देने से मना कर दिया. कानून मंत्री के मुताबिक बेईमानी की परिभाषा में बुकी दर्शकों की कोई हरकत खिलाड़ी या ऐसा इशारा जो खेल के नतीजे को प्रभावित करता है सभी को लाया जाएगा. उन्होंने ये भी बताया कि इस तरह के कामों में नई तकनीक के इस्तेमाल को भी नए कानून में शामिल किया जाएगा. |
| DATE: 2013-05-25 |
| LABEL: sports |
| [974] TITLE: मुंबई ने राजस्थान को हराया, फ़ाइनल में पहुंची |
| CONTENT: दूसरे फ़ाइनलिस्ट के लिए खेले गए अहम प्ले ऑफ़ मुक़ाबले में मुंबई इंडियन्स ने राजस्थान रॉयल्स को चार विकेट से हरा दिया है. कोलकाता के ईडन गार्डेन मैदान पर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए राजस्थान रॉयल्स ने मुंबई के सामने जीत के लिए 166 रनों का लक्ष्य रखा जिससे मुंबई इंडियंस ने आखिरी ओवर में चार विकेट रहते हासिल कर लिया. टॉस जीतने के बाद पहले बल्लेबाजी करते हुए राजस्थान रॉयल ने कप्तान राहुल द्रविड़ के 43 रनों की बदौलत निर्धारित 20 ओवरों में 6 विकेट पर 165 रन बनाए. मुंबई इंडियंस की ओर से स्पिन गेंदबाज हरभजन सिंह ने 23 रन देकर तीन विकेट और केरोन पोलार्ड ने छह रन देकर दो विकेट लिए. इस जीत के साथ ही अब मुंबई इंडियन्स 26 मई को इसी मैदान पर होने वाले आईपीएल के मौजूदा सत्र के फाइनल मुकाबले में चेन्नई सुपर किंग्स का सामना करेगी. हालांकि ये स्कोर काफी चुनौतीपूर्ण था लेकिन मुंबई इंडियन्स ने शुरू से ही अच्छी शुरुआत की और तेज़ी से रन बनाए. लेकिन बाद में उसके बल्लेबाज़ जल्दी जल्दी आउट होने लगे. मुंबई इंडियन्स की ओर से ड्वेन स्मिथ और आदित्य तारे ने बहुत अच्छी शुरुआत की. स्मिथ ने 44 गेंदों में 62 रन बनाए जबकि आदित्य तारे ने 35 रनों का योगदान किया. मुंबई इंडियन्स की ओर से शानदार गेंदबाज़ी करने वाले हरभजन सिंह को मैन ऑफ़ द मैच चुना गया. |
| DATE: 2013-05-25 |
| LABEL: sports |
| [975] TITLE: तीन घंटे की पूछताछ के बाद मेयप्पन गिरफ़्तार |
| CONTENT: चेन्नई सुपर किंग्स के प्रिंसिपल गुरुनाथ मेयप्पन को आईपीएल में सट्टेबाज़ी के मामले में मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने तीन घंटे की पूछताछ के बाद गिरफ़्तार कर लिया. मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच के संयुक्त आयुक्त हिमांशु रॉय ने मेयप्पन की गिरफ्तारी की पुष्टि करते हुए बताया कि उन्हें शनिवार को अदालत के सामने पेश किया जाएगा. हिमांशु रॉय ने मीडिया से बात करते हुए कहा गुरुनाथ को मुंबई समन किया गया था. वो शुक्रवार शाम मुंबई पहुंचे. हमने उनसे पूछताछ की और उनकी स्पॉट फिक्सिंग मामले में संलिप्तता है - इस निष्कर्ष पर हम पहुंचे हैं और हमने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है. इससे पहले शुक्रवार शाम मेयप्पन मुंबई पहुंचे थे जहां क्राइम ब्रांच ने उनसे इस मामले में तीन घंटे तक पूछताछ की. वहीं स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में गिरफ्तार बिन्दु दारा सिंह को अदालत ने 28 मई तक पुलिस हिरासत में भेज दिया है. सट्टेबाजी में गुरुनाथ का नाम अभिनेता बिंदु दारा सिंह ने लिया है. मुंबई पुलिस ने स्पॉट-फिक्सिंग मामले में पूछत्ताछ के लिए गुरुनाथ के पेश होने के लिए शुक्रवार शाम पांच बजे की समय-सीमा तय की थी. बताया जा रहा है कि उनके साथ मद्रास उच्च न्यायालय के जाने-माने वकील पीएस रमन भी मुंबई आए हैं. इससे पहले शुक्रवार को दिन में मुंबई पुलिस ने गुरुनाथ के उस अनुरोध को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने आईपीएल के फाइनल मैच के बाद सोमवार को पुलिस के समक्ष पेश होने की मांग की थी. गुरुवार को मुंबई अपराध शाखा का चार सदस्यीय एक दल मेयप्पन से पूछताछ करने उनके घर गया था लेकिन उनके मौजूद नहीं होने की स्थिति में उन्हें सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे के बीच मुंबई में अपराध शाखा के सामने पेश होने के लिए समन देने देकर चला गया. मेयप्पन के घर में चूंकि कोई मौजूद नहीं था इसलिए समन की एक प्रति उनके घर पर चस्पा कर दी गई और एक प्रति चेन्नई सुपरकिंग्स के दफ्तर में दे दी गई थी. |
| DATE: 2013-05-25 |
| LABEL: sports |
| [976] TITLE: पाकिस्तानी अंपायर पर 'फ़िक्सिंग जाँच' की गाज? |
| CONTENT: अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी आईसीसी ने पाकिस्तान के अंपायर असद रऊफ़ को आगामी चैम्पियंस ट्रॉफ़ी क्रिकेट प्रतियोगिता से हटा लिया है. इंग्लैंड और वेल्स में ये प्रतियोगिता छह जून से शुरू होने वाली है. आईसीसी की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि ये फ़ैसला उन मीडिया रिपोर्ट्स के बाद किया गया है कि मुंबई पुलिस पाकिस्तान के अंपायर रऊफ़ के ख़िलाफ़ जाँच कर रही है. इस फ़ैसले के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए आईसीसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डेविड रिचर्ड्सन ने कहा रऊफ़ के ख़िलाफ़ मुंबई पुलिस की जाँच की रिपोर्ट्स को देखते हुए हम महसूस करते हैं कि ये असद रऊफ़ खेल और प्रतियोगिता के हित में है कि उन्हें चैम्पियंस ट्रॉफ़ी से हटा लिया जाए. असद रऊफ़ ने इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल के कई मैचों में अंपायरिंग की है. पिछले दिनों राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों की गिरफ़्तारी के बाद से ही आईपीएल में स्पॉट फ़िक्सिंग को लेकर नया विवाद उठ खड़ा हुआ है. श्रीसंत अंकित चव्हाण और अजीत चंडीला फ़िलहाल दिल्ली पुलिस की हिरासत में हैं. हालाँकि इन खिलाड़ियों के परिजन आरोपों से इनकार करते हैं. श्रीसंत ने भी अपने वकील के माध्यम से जारी बयान में अपने को निर्दोष बताया है. दिल्ली पुलिस और मुंबई पुलिस ने कई सट्टेबाज़ों को भी गिरफ़्तार किया है. मुंबई पुलिस ने अभिनेता और टीवी कलाकार विंदू दारा सिंह को भी सट्टेबाज़ों से संपर्क के आरोप में गिरफ़्तार किया है. दिल्ली पुलिस और मुंबई पुलिस का कहना है कि इस मामले में कार्रवाई चल रही है और कुछ और गिरफ़्तारियाँ हो सकती हैं. |
| DATE: 2013-05-23 |
| LABEL: sports |
| [977] TITLE: राजस्थान रॉयल्स की जीत, सनराइज़र्स बाहर |
| CONTENT: आईपीएल के एलिमिनेटर मुक़ाबले में राजस्थान रॉयल्स ने हैदराबाद सनराइज़र्स को चार विकेट से हरा दिया है. फाइनल में जगह बनाने के लिए अब राजस्थान की टीम का मुकाबला दूसरे क्वालीफायर में मुंबई इंडियंस के साथ होगा. बुधवार को दिल्ली के फ़िरोज़शाह कोटला मैदान में जीत के लिए 133 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए राजस्थान रॉयल्स ने 135 रन बनाए और फ़ाइनल में जगह बनाने के एक कदम और नज़दीक पहुंच गए. टॉस जीतकर मैदान पर बल्लेबाज़ी करने उतरी सनराइज़र्स की टीम निर्धारित 20 ओवर में सात विकेट के नुक्सान पर सिर्फ़ 132 रन ही बना पाई. हालांकि राजस्थान की टीम की अच्छी शुरुआत नहीं हुई और दस ओवर में उसके पांच विकेट सिर्फ़ 57 के कुल स्कोर पर पवैलियन लौट चुके थे. लेकिन इसके बाद मैदान पर उतरे ऑस्ट्रेलियाई ब्रैड हॉज की धुआंधार बल्लेबाज़ी ने रॉयल्स को जीत दिलाई. हॉज ने 29 गेंदों में दो चौक्कों और पांच छक्कों की मदद से नाबाद 54 रन बनाए. आखिरी ओवर में जीत के लिए राजस्थान रॉयल्स को 10 रन चाहिए थे. हॉज ने डैरन सैमी की पहली दो गेंदों पर छक्का मार कर आसानी से लक्ष्य हासिल कर लिया. अब 24 मई को कोलकाता के ईडन गार्डन में दूसरे क्वालीफ़ायर में मुंबई इंडियंस और राजस्थान रॉयल्स के बीच मुकाबला होगा. जीतने वाली टीम फ़ाइनल में दो बार के पूर्व चैंपियन चैन्नई सुपर किंग्स के साथ खेलेगी. पहले क्वालीफ़ायर में मुंबई को हराकर चैन्नई पांचवी बार फ़ाइनल में पहुंच चुका है. |
| DATE: 2013-05-23 |
| LABEL: sports |
| [978] TITLE: स्पॉट फ़िक्सिंग के साए तले प्लेऑफ़ मुक़ाबले |
| CONTENT: स्पॉट फ़िक्सिंग के आरोपों के साए तले मंगलवार से आईपीएल प्लेऑफ़ मुक़ाबले शुरू हो रहे हैं जिसमें मंगलवार को पहला मुकाबला चेन्नई सुपरकिंग्स और मुंबई इंडियंस के बीच दिल्ली के फ़िरोज़शाह कोटला मैदान में खेला जाएगा. आईपीएल के छठें संस्करण में जो चार टीमें सबसे ऊपर रही हैं वो हैं चेन्नई सुपरकिंग्स मुंबई इंडियंस राजस्थान रॉयल्स और सनराइज़र्स हैदराबाद. मंगलवार का प्लेऑफ़ जीतने वाली टीम सीधे फ़ाइनल में प्रवेश करेगी जबकि हारने वाली टीम की भिड़ंत दिल्ली में खेले जाने वाले एलिमिनेटर राउंड के विजेता से होगी. एलिमिनेटर राउंड में राजस्थान रॉयल्स और सनराइज़र्स के बीच मैच होगा. 24 मई को दूसरा क्वालिफ़ायर कोलकाता में खेला जाएगा जबकि फाइनल मैच कोलकाता में ही 26 मई को होगा. चेन्नई सुपर किंग्स और मुंबई इंडियंस टूर्नामेंट के सबसे बड़े दावेदार हैं. दोनो ही टीमों के पास विश्वास की कोई कमी नहीं है और उन्होंने 11-11 मैच जीते हैं. इन दोनो ही टीमों का रन-रेट भी काफ़ी अच्छा रहा है और इन दोनों ही में मैच-विजेता खिलाड़ी हैं. पूर्व टेस्ट खिलाड़ी मनिंदर सिंह दोनो ही टीमों को बराबर आंकते हैं हालाँकि वो याद दिलाते हैं कि मुंबई की टीम ने टूर्नामेंट में बाद के मैचों में बेहतर प्रदर्शन किया है. मनिंदर सिंह कहते हैं दिल्ली की पिच बैटिंग के लिए अच्छी नहीं रही है. मुझे लगता है कि मैच में गेंदबाज़ों का बड़ा रोल होने वाला है. जिस टीम के गेंदबाज़ अच्छा प्रदर्शन करेंगे वो टीम बेहतर खेलेगी. चेन्नई सुपर किंग्स में पाँच-छह ऐसे खिलाड़ी हैं जो अगले महीने होने वाली आईसीसी चैंपिंयंस ट्रॉफ़ी में खेलेंगे. खुद कप्तान धोनी मैच का नक्शा बदल सकते हैं. जिस तरह उन्होंने कुछ मैचों में आखिर तक खेलकर अपनी टीम को जिताया है उनकी बहुत तारीफ़ हुई है. मुंबई इंडियंस के लिए अच्छी बात ये कि सचिन तेंदुलकर अब पूरी तरह फ़िट हैं. मुंबई के लिए पोलार्ड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. कप्तान रोहित शर्मा खुद बहुत अच्छी फ़ॉर्म में हैं. लसित मलिंगा हरभजन सिंह जैसे गेंदबाज़ मुंबई की गेंदबाज़ी को नई धार देते हैं. सनराइज़र्स हैदराबाद और राजस्थान रॉयल्स के बीच एलिमिनेटर राउंड बुधवार को खेला जाएगा. मनिंदर सिंह के मुताबिक उन्हें सनराइज़र्स की स्थिति बेहतर दिख रही है क्योंकि दिल्ली की पिच ठीक उसी तरह ही धीमी है जैसी सनराइज़र्स हैदराबाद के घर के मैदान में थी. मनिंदर कहते हैं कि शिखर धवन की बढ़िया बल्लेबाज़ी और पार्थिव पटेल के फॉर्म में लौटने के बाद सनराइज़र्स की स्थिति मज़बूत दिखती है. मनिंदर तो यहाँ तक कहते हैं कि अगर सनराइज़र्स टूर्नामेंट जीत भी जाते हैं तो उन्हें हैरानी नहीं होगी. लेकिन क्या स्पॉट फ़िक्सिंग के आरोपों के बाद राजस्थान रॉयल्स के खेल पर असर होगामनिंदर इस पर बहुत कुछ नहीं बोलते लेकिन उनके मुताबिक राजस्थान टीम का संतुलन उनके लिए समस्या का विषय है और जब भी वो अपने घर के मैदान से बाहर गए हैं उन्हें परेशानी हुई है क्योंकि धीमी पिचों पर खेलने से उन्हें नुकसान हुआ है. |
| DATE: 2013-05-21 |
| LABEL: sports |
| [979] TITLE: क्रिकेट इस वक्त बुरी तरह से शर्मसार है |
| CONTENT: आईपीएल के मैचों में स्पॉट फिक्सिंग के आरोपों ने क्रिकेट प्रेमियों को हिला कर रख दिया है. इंडियन प्रीमियर लीग यानि आईपीएल जब अपने मुकाबले के आखिरी दौर में पहुंच रही थी और जिस वक्त ये मुकाबले हर लम्हें दिलचस्प होते जा रहे थे उसी वक्त दुनिया के इस शानदार खेल पर कयामत टूट पड़ी. किसी ने सोचा भी न था कि श्रीसंथ जैसा राष्ट्रीय खिलाड़ी पैसों की लालच में दर्शकों और अपने खेल के साथ दगा कर सकता है. मीडिया में प्रकाशित और प्रसारित वो तस्वीरें बहुत ही दुखदायी हैं जिनमें श्रीसंत और उनके दो साथी खिलाड़ियों को सामान्य अपराधियों की तरह चेहरे पर काला कपड़ा पहनाए अदालत ले जाते हुए दिखाया जा रहा था. यही खिलाड़ी कल तक अपने खेल के दम पर क्रिकेट प्रेमियों के दिलों पर राज कर रहे थे. पुलिस अब तक मुंबई दिल्ली अहमदाबाद चेन्नई और कोच्चि से 15 से ज्यादा सट्टेबाजों को गिरफ्तार कर चुकी है. खेलों में स्पॉट फिक्सिंग का ये मामला दूर तक फैला हुआ है और पुलिस आगे भी कई मैचों की पड़ताल कर रही है. क्रिकेट के खेल में कामयाब होना परियों की कहानियों की तरह लगता है. सफल क्रिकेट खिलाड़ी बहुत ही कम उम्र में न सिर्फ़ लोकप्रियता और सम्मान हासिल कर रहे हैं बल्कि बहुत से खिलाड़ी करोड़ों रुपए कमा रहे हैं. क्रिकेट शोहरत और दौलत का दूसरा नाम बन चुका है. क्रिकेट की मुख्यधारा में जमे रहने के लिए खिलाड़ियों को सख्त मुकाबले से गुजरना पड़ता है. एक वक्त था जब सिर्फ दो देशों के बीच मैच हुआ करते थे और सिर्फ एक ही राष्ट्रीय टीम हुआ करती थी लेकिन आईपीएल ने क्रिकेट की पूरी दुनिया ही बदल कर रख दी है. इसमें आठ से ज्यादा टीमें खेल रही हैं. आईपीएल ने क्रिकेट को लोकप्रियता और दौलत की नई ऊँचाईयों पर पहुंचा दिया है. फिल्मी सितारे और बड़े बड़े उद्योगपति क्रिकेट टीमों और खिलाड़ियों के मालिक बन गए हैं. दौलत के साथ-साथ इसमें ग्लैमर भी शामिल हो गया है. छोटे-छोटे दूर दराज के शहरों से आए हुए कामयाब खिलाड़ी जिनमें अभी कुछ तो युवावस्था से ही गुजर रहे हैं वे अचानक कोरोड़ों में खेलने लगे हैं. क्रिकेट का खेल अपनी जगह कायम रहा लेकिन अब वो सिर्फ दौलत हासिल करने का ज़रिया भर बनता चला गया. क्रिकेट कई हज़ार करोड़ रुपए का गेम बन गया है. अचानक और बेपनाह दौलत ने लालच को जन्म दिया. सैंकड़ों देशी और विदेशी सट्टेबाज भी इसी मौके की तलाश में थे. दौलत के लालच में कई खिलाड़ी इनके जाल में फंस गए. पुलिस का दावा है कि सट्टेबाज सिर्फ एक ओवर में खराब बॉलिंग के लिए 60-60 लाख रुपए तक दे रहे थे. सट्टे का कारोबार पूरे देश में फला हुआ है. खुद पुलिस का अंदाजा है कि आईपीएल के बड़े मैचों के दौरान चंद मिनटों में सट्टे से अरबों रुपए के वारे-न्यारे होते है. इसका मतलब ये है कि सट्टेबाजी में पूरे देश में गैर कानूनी तौर पर बहुत से लोग हिस्सा ले रहे हैं. आईसीसी की भ्रष्टाचार विरोधी शाखा के एक सदस्य ने आरोप लगाया है कि इतने बड़े पैमान पर चल रहे ये जुआ क्या पुलिस की जामकारी के बिना मुमकिन है सच्चाई जो भी हो क्रिकेट इस वक्त बुरी तरह शर्मसार हैं. बहुत से क्रिकेटर 1999 से भारतीय क्रिकेट बोर्ड को मैच फिक्सिंग और सट्टेबाजी के खतरों से खबरदार करते रहे हैं. लेकिन बोर्ड ने कभी भी इस मसले को गंभीरता से नहीं लिया. आज अगर कुछ खिलाड़ियों ने क्रिकेट और उसके चाहने वालों को शर्मिंदा किया है तो इस स्पॉट फिक्सिंग के इस खेल में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता है. |
| DATE: 2013-05-20 |
| LABEL: sports |
| [980] TITLE: ट्विटर पर अभद्र टिप्पणियों पर घिरे वार्नर |
| CONTENT: डेविड वार्नर आईपीएल में दिल्ली डेयरडेविल्स की ओर से खेल रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया के ओपनिंग बैट्समैन डेविड वार्नर से उनके ट्विटर एकाउंट पर पत्रकारों के प्रति अभद्र भाषा के इस्तेमाल के लिए सफ़ाई मांगी गई है. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया वार्नर के ट्विटर एकाउंट की टिप्पणियों की जांच कर रहा है. न्यूज़ लिमिटेड के रॉबर्ट क्रेडॉक के आईपीएल की आलोचना के बाद वार्नर के एकाउंट में की गई कुछ टिप्पणियों में अभद्र भाषा का इस्तेमाल है. ऑस्ट्रेलिया की टेस्ट टीम के ओपनर 26 वर्षीय वार्नर आईपीएल की टीम दिल्ली डेयरडेविल्स के लिए खेलते हैं. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि वह इस मामले की गहराई से जांच के बाद ही कोई टिप्पणी करेगा. ट्वीट्स में जिस दूसरे रिपोर्टर मेलकम कॉन का ज़िक्र किया गया है उन्होंने कहा है कि क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया को इस बारे में बताया है. कॉन का कहना है कि क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया दिल्ली में वार्नर से संपर्क करने की कोशिश कर रहा है. कॉन के अनुसार क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने उनसे कहा है वह सोशल मीडिया वेबसाइट पर इस्तेमाल की गई भाषा से दुखी है. उन्होंने कहा मैं भाषा की स्वतंत्रता के पक्ष में हूं. मैं इस मामले को ख़त्म करके ख़ुश रहूंगा. मुझे नहीं लगता कि अपनी राय ज़ाहिर करने में कोई बुराई है लेकिन मैं क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की स्थिति समझ सकता हूं. कॉन के अनुसार उन्हें क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया को अपनी छवि की काफ़ी चिंता है. यह बहुत ख़राब लगता है कि जब कोई अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी ख़राब भाषा का इस्तेमाल करता है. ख़ासतौर पर तब जब 189000 लोग उसे फॉलो कर रहे हों. हाल ही में एशेज़ टेस्ट सीरिज़ के लिए घोषित ऑस्ट्रेलिया की टीम में वार्नर का नाम भी है. यह टेस्ट सीरीज़ ट्रेंट ब्रिगेड में 10 जुलाई से शुरू हो रही है. वार्नर ने 19 टेस्ट में तीन शतक मारे हैं और उनका औसत 39-46 है. उन्हें कभी-कभी बॉलिंग का मौका भी दिया जाता है. टेस्ट में उन्होंने जो चार विकेट लिए हैं उनमें साउथ अफ्रीका के हाशिम अमला और वेस्ट इंडीज़ के डेरेन ब्रावो शामिल हैं. |
| DATE: 2013-05-18 |
| LABEL: sports |
| [981] TITLE: सनराइजर्स ने राजस्थान रॉयल्स को हराया |
| CONTENT: सनराइजर्स हैदराबाद टीम ने शुक्रवार को हैदराबाद के राजीव गांधी स्टेडिय में खेले गए आईपीएल के एक मैच में राजस्थान रॉयल्स को 23 रनों से हरा दिया. इस जीत के साथ सनराइजर्स की टीम नौ टीमों की तालिका में चौथे क्रम पर पहुंच गई है. साथ ही उनके प्लेऑफ के लिए क्वालीफाई करने संभावना भी काफी बढ़ गई है. सनराइजर्स ने पहले बल्लेबाजी करते हुए राजस्थान के सामने 137 रनों का लक्ष्य रखा. सनराइजर्स की टीम में मध्य क्रम के बिप्लब समंत्रय और डैरेन सामी ने बेहतरीन पारी खेली और टीम को संभाला जिसके चलते यह टीम निर्धारित 20 ओवरों में नौ विकेट पर 136 रन बनाने में कामयाब हो सकी. समंत्रय और सामी ने पांचवें विकेट के लिए 56 रनों की सबसे बड़ी साझेदारी की. समंत्रय ने 46 गेंदों में 56 रनों की अपनी पारी में छह चौके और एक छक्का लगाया और सामी ने 19 गेंदों का सामना कर एक चौका और एक छक्का लगाया. रॉयल्स के लिए फॉकनर ने चार के औसत से रन देते हुए सनराइजर्स के पांच बल्लेबाजों को आउट किया. हालांकि ये लक्ष्य काफी आसान दिख रहा था लेकिन सनराइजर्स के गेंदबाजों ने राजस्थान रॉयल्स की टीम को 20 ओवरों में नौ विकेट पर 113 रनों पर ही सीमित कर दिया. सनराइजर्स की ओर से थिसरा परेरा अमित मिश्रा डेल स्टेन और करण शर्मा ने दो-दो विकेट लिए. हालांकि राजस्थान की टीम ने उम्मीद के मुताबिक शुरुआत की और कप्तान राहुल द्रविड़ और अजिंक्य रहाणे ने पहले विकेट के लिए 39 रन जोड़े. राहुल द्रविड़ ने 25 रन और रहाणे ने 12 रन बनाए. लेकिन बाद के बल्लेबाज इस क्रम को बनाए रखने में नाकाम रहे और राजस्थान के विकेट जल्दी-जल्दी गिरते गए. |
| DATE: 2013-05-18 |
| LABEL: sports |
| [982] TITLE: क्यो सट्टेबाज़ी को मिले क़ानूनी मान्यता? |
| CONTENT: राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों की गिरफ्तारी के बाद ये बहस फिर से शुरू हो गई है कि क्या सट्टेबाज़ी को क़ानूनी मान्यता दे दी जानी चाहिए बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली ने इस सिलसिले में क़ानून के जानकारों और अन्य लोगों से बातचीत की. मेरे विचार में सट्टेबाज़ी को क़ानूनी मान्यता दी जानी चाहिए. इससे न सिर्फ खेल में भ्रष्टाचार पर क़ाबू हो सकेगा बल्कि सरकार की आमदनी का रास्ता भी खुलेगा. फिलहाल ये सारा पैसा काले धन के तौर पर कुछ लोगों की जेबें भर रहा है. साथ-ही-साथ खेल को लेकर भी कई तरह की अफ़वाहें उड़ती रहती हैं. लोगों का भरोसा खेल और खिलाड़ियों पर कम हो रहा है जो न तो खेल से जुड़े संगठनों बल्कि उन खिलाड़ियों के लिए भी अच्छा नहीं है जो इस तरह की गतिविधियों में शामिल नहीं हैं. मैं ये बिलकुल नहीं कर रहा कि इससे फिक्सिंग ख़त्म हो जाएगी लेकिन उस पर कम से कम कंट्रोल ज़रूर हो जाएगा. जो कुछ हो रहा है वो खिलाड़ियों को कम पैसे मिलने की वजह से नहीं है. भारत में आज रणजी टूर्नामेंट के स्तर के खिलाड़ियों को भी 10 से 12 लाख रूपए सालाना मिल रहे हैं. श्रीसंत को आईपीएल से ही दो करोड़ रूपए के क़रीब मिले हैं. ये देखा गया है कि जब भी किसी खेल में बहुत पैसा आ गया है वहां इस तरह की बातें शुरू हो गई हैं. और ये सिर्फ क्रिकेट तक ही सीमित नहीं है फुटबॉल में कुछ साल पहले जर्मन और इटली के लीग में फिक्सिंग की बात सामने आई थी. अस्सी-नब्बे साल पहले बेसबाल की लीग को इसी मामले पर तोड़ना पड़ा. ये बॉक्सिंग में भी हुआ है. टेनिस में कुछ साल पहले शीर्ष के दस में से एक खिलाड़ी के खिलाफ़ जांच हुई. इन खेलों से इन सभी घोटालों के कारण एक व्यवस्था स्थापित हुई जो अब इसपर काफ़ी बेहतर तरीक़े से क़ाबू रख पा रही है. अब तो तो मैच फिक्सिंग के बदले स्पॉट फिक्सिंग की जा रही है जिसे क़ाबू करना और मुश्किल है. क्रिकेट में भी ये मौक़ा है जब यहां इन चीज़ो पर निगाह रखने के लिए व्यवस्था बनाई जानी चाहिए. पहले भी ये मौक़ा आया था साल 2000 में जब मैच फिक्सिंग का मामला सामने आया था. लेकिन मुझे लगता है तब इसे उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया. ब्रिटेन में सलमान बट् वग़ैरह के मामले को वहां की क्रिकेट बोर्ड ने नहीं उठाया था. मीडिया ने स्टिंग ऑपरेशन किया और एक दर्शक ने ब्रितानी अदालत में मुक़दमा दायर कर दिया था कि उसने मैच के टिकट ख़रीदे थे और उसके साथ इस फिक्सिंग की वजह से धोखाधड़ी हुई है. वहां क़ानून ऐसा है कि इस मामले पर जांच हो गई और खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लग गया और सारी कार्रवाई हुई. पिछले साल जब आईपीएल के चार-पांच खिलाड़ी ये बात करते हुए पाए गए थे कि फिक्सिंग कैसे हो सकती है तो उसी वक़्त इस पर विचार किया जाना चाहिए था. लोग चाहें तो उस तरह की व्यवस्था से सीख ले सकते हैं जो अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबाल फेडेरेशन ने लिया है. वहां सट्टेबाज़ी पर निगाह रखने के लिए एक निगरानी एजेंसी तैयार की गई है जो इसमें बहुत अधिक उतार चढ़ाव होने पर उसका संज्ञान लेती है. पहली बात मैं ये कहना चाहता हूं कि हमें स्पॉट फिक्सिंग और बेटिंग या सट्टेबाज़ी को क़ानूनी मान्यता दे देने से इसके ख़त्म हो जाने के अंतर को समझना होगा. क्योंकि ब्रिटेन में गैम्बलिंग और सट्टेबाज़ी क़ानूनी है लेकिन फिर भी वहां साल 2010 में क्रिकेट के खेल में स्पॉट फिक्सिंग का मामला सामने आया. तो दोनों अलग-अलग चीज़ है. लेकिन हां जुआ या सट्टेबाज़ी को क़ानूनी मान्यता दे दी जानी चाहिए क्योंकि ऐसा नहीं है कि इसके ग़ैर-क़ानूनी रहने से फिलहाल लोग इसमें शामिल नहीं हो रहे हैं. ये अभी चोरी-छिपे तरीक़े हो रहा है. गैम्बलिंग को इजाज़त मिलने से सरकार को इससे राजस्व भी मिलेगा. अगर आप मैच पर सट्टा लगाने की इज़ाज़त देंगे तो स्पॉट फिक्सिंग में कमी आएगी. जुआ या सट्टेबाज़ी पर जो बहस है वो हमारे यहां क्रिकेट में ये मामला सामने आने के पहले से चल रहा है हमारे यहां 19वीं सदी का क़ानून है जो अभी भी चल रहा है. उसी के आधार पर हमारे यहां जुआख़ाने नहीं है उस मामले में उन्होंने एक ही अपवाद छोड़ा है वो घुड़दौड़ को लेकर है. ये भी एक तरह का पाखंड है क्योंकि घुड़दौड़ जुआ नहीं है तो क्या है हमारे समाज में जुए को लेकर जो पूर्वाग्रह है उसे ख़त्म करना होगा. हमारे पास पुराने उदाहरण हैं महाभारत में जुआ खेलने का ज़िक्र है. गुजरात में शराबबंदी है. उसका नतीजा क्या है वहां शराब की तस्करी हो रही है लोगों ने पीनी थोड़ी ही छोड़ दी है. क़ानूनी मान्यता दिए जाने से बाक़ी बातों के अलावा जुर्म में भी कमी आएगी. मुंबई का मामला ही ले लें जहां किसी ने सट्टे में लाखों गँवाए और बाद में फिरौती के चक्कर में एक बच्चे का क़त्ल कर दिया. क़ानूनी मान्यता मिलने के बाद जो इस काम में लगे होंगे उन्हें लाइसेंस लेना होगा सारा लेन-देन बैंक के माध्यम से करना ज़रूरी होगा इससे पारदर्शिता आएगी. कुछ लोग जो ये कहते हैं कि इससे ग़रीब बर्बाद हो जाएंगे या कुछ लोग अपना घर बार इसी के पीछे लगा देंगे तो वो तर्क सही नहीं है. शराब जहां बंद है वहां लोग शराब नहीं पी रहे बल्कि अक्सर ज़हरीली शराब पीकर मर जाते हैं. हमें सिर्फ नैतिकता की बात करने की बजाए चीज़ों को व्यवहारिक तौर पर देखने की आदत डालनी चाहिए. |
| DATE: 2013-05-17 |
| LABEL: sports |
| [983] TITLE: इन यादगार पलों ने डेविड बेकम को दी पहचान |
| CONTENT: मशहूर फ़ुटबॉल खिलाड़ी डेविड बेकम ने संन्यास लेने की घोषणा कर दी. डेविड बेकम ने मैनचेस्टर यूनाइटेड की तरफ से खेलते हुए विम्बलडन के खिलाफ मध्य रेखा से गोल दागकर फ़ुटबॉल की दुनिया में अपने आगाज की घोषणा कर दी थी. इस मैच में इंग्लैंड अर्जेंटीना से पेनल्टी शूटआउट में हार गया था. यह मैच दो कारणों से आज भी याद किया जाता है. इसी मैच में इंग्लैंड के माइकल ओवेन ने विश्व के सर्वश्रेष्ठ गोलों में से एक माने जाने वाले गोल से इंग्लैंड को 22 की बराबरी पर ला दिया था. उतारचढ़ाव भरे इस मैच में डेविड बेकम को डिएगो सिमेओने को धक्का मारने के कारण लाल कार्ड दिखाया गया था. इसके बाद इंग्लैंड टीम को मात्र दस खिलाड़ियों के साथ बाकी मैच खेलना पड़ा था. प्रीमियर लीग और एफए कप का खिताब जीतने के बाद बायर्न म्यूनिख के खिलाफ 2-1 की शानदार विजय हासिल कर मैनचेस्टर यूनाइटेड ने अपनी जीत की तिकड़ी पूरी की थी. यह मैच इंजरीटाइम में टेडी शेरींघम और ओले गनर द्वारा किए गए दो गोलों के लिए भी काफी चर्चित हुआ था. इन दोनों खिलाड़ियों को गोल दागने के लिए बेकम ने ही गेंद बढ़ाई थी. सन् 2000 में इंग्लैंड फ़ुटबॉल टीम के कार्यवाहक मैनेजर पीटर टेलर ने डेविड बेकम को टीम का कप्तान नियुक्त किया. पिछले मैनेजर केविन कीगन ने सोल कैम्पबेल की अनुपस्थिति में बेकम को टीम का उप कप्तान नियुक्त किया था. सन् 2001 में बेकम ने विश्वकप2002 के क्वालिफाइंग मुकाबलों में ग्रीस के खिलाफ जादुई फ्रीकिक लगाकर विश्वकप के लिए इंग्लैंड का टिकट पक्का कराया था. हालांकि 2002 विश्वकप में इंग्लैंड क्वार्टरफाइनल में ब्राज़ील से पराजित हो गया था. इंग्लैंड टीम के पूर्व मैनेजर स्वेनयोरान एरिक्सन ने 16 मई को बीबीसी स्पोर्टस को बताया ग्रीस के खिलाफ किया गया गोल मिडफील्डर के तौर पर बेकम के करियर के सबसे खास क्षणों में से एक था. उस दौरान बेकम ने कई फ्री किक मिस कर दी थी लेकिन वह मानसिक रूप से इतना मजबूत था कि बिल्कुल अंतिम क्षणों में भी वह इस चुनौती को स्वीकार कर सका और उसने गोल कर दिखाया. 2002 के विश्वकप में पेनल्टी शूटआउट में गोल दाग कर बेकम ने विश्वकप के प्राथमिक चरण में ही अर्जेंटीना को बाहर कर दिया. यह मैच इंग्लैंड 10 से जीता था. बेकम के इस गोल ने 1998 के विश्वकप में अर्जेंटीना से हारकर बाहर होने के इंग्लैंड के ग़म के लिए मरहम का काम किया था. मैनचेस्टर यूनाइटेड के बॉस सर एलेक्स फर्गुसन के साथ चेंजिगरूम में हुई बहस के बाद से बेकम के रिश्ते उनके संग तनावपूर्ण हो गए थे. 2003 की शुरुआत में बेकम ने उनसे सुलह करके खेल भावना की एक अच्छी मिसाल पेश की थी. 2003 में डेविड बेकम स्पेन के मशहूर क्लब रियाल मैड्रिड के लिए खेलने को तैयार हो गए. इसके लिए उन्हें दो करोड़ पैंतालिस लाख पाउंड मिले थे. छह सालों तक इंग्लैंड की कप्तानी करने के बाद जर्मनी में हुए विश्वकप में पुर्तगाल से हारकर विश्वकप से बाहर होने के बाद बेकम ने इंग्लैंड कप्तान छोड़ दी थी. डेविड बेकम रियाल मैड्रिड को छोड़कर एलए गैलेक्सी से जुड़ गए. 31 वर्षीय बेकम ने करीब बारह करोड़ अस्सी लाख पाउंड में पांच सालों के लिए यह करार किया था. 2012 के लंदन ओलंपिक के लोकार्पण समारोह में बेकम ने ओलंपिक मशाल के साथ स्टेडियम में दर्शनीय ढंग से प्रवेश किया था. बेकम स्टेडियम में एक स्पीड बोट में आए थे. एलए गैलेक्सी से करार समाप्त होने के बाद डेविड बेकम ने पांच महीने के लिए इस प्रसिद्ध क्लब से जुड़ने की घोषण की. बेकम ने बताया था कि वह इस क्लब के लिए मुफ्त में खेल रहे हैं. |
| DATE: 2013-05-17 |
| LABEL: sports |
| [984] TITLE: बेकम ने फ़ुटबॉल से संन्यास की घोषणा की |
| CONTENT: इंग्लैंड के पूर्व कप्तान और चर्चित फ़ुटबॉलर डेविड बेकम ने पेशेवर फ़ुटबॉल से संन्यास लेने की घोषणा की है. वे इस सत्र की समाप्ति के बाद रिटायर हो जाएँगे. 38 वर्षीय डेविड बेकम ने मैनचेस्टर यूनाइटेड की ओर से अपना करियर शुरू किया था और टीम के लिए कई ख़िताब भी जीते थे. मैनचेस्टर यूनाइटेड के बाद उन्होंने रियाल मैड्रिड एलए गैलेक्सी एसी मिलान और पेरिस सेंट जर्मेन की ओर से भी क्लब फ़ुटबॉल में हिस्सा लिया. जनवरी में उन्होंने फ्रांसीसी फ़ुटबॉल क्लब पेरिस सेंट जर्मेन के साथ पाँच महीने का करार किया था. वहाँ से कमाई की पूरी राशि उन्होंने चैरिटी को दान में दे दी थी. 14 साल की उम्र में डेविड बेकम मैनचेस्टर यूनाइटेड में शामिल हुए थे. मैनचेस्टर यूनाइटेड की ओर से बेकम ने 398 मैचों में हिस्सा लिया. उन्होंने मैनचेस्टर यूनाइटेड के लिए छह प्रीमियर लीग खिताब जीते और चैम्पियंस लीग का ख़िताब भी क्लब के नाम किया था. बेकम ने कहा मैं पीएसजी का आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे ये मौक़ा दिया. लेकिन मैं ये समझता हूँ कि अब अपना करियर ख़त्म करने का समय आ गया है. 20 साल के अपने पेशेवर फ़ुटबॉल करियर में बेकम ने 19 ख़िताब जीते. इनमें हाल ही में पीएसजी की ओर से लीग-1 का ख़िताब भी शामिल है. वे इंग्लैंड के एकमात्र खिलाड़ी हैं जिन्होंने चार देशों में चैम्पियनशिप जीती है. मैनचेस्टर यूनाइटेड के बाद डेविड बेकम 2003 में स्पैनिश क्लब रियाल मैड्रिड में शामिल हुए. वहाँ 2007 में उन्होंने ला लीगा ख़िताब जीता. इसके बाद वे अमरीका चले गए और एलए गैलेक्सी की ओर से खेलना शुरू किया. डेविड बेकम ने वर्ष 1996 में इंग्लैंड की ओर से पहला अंतरराष्ट्रीय मैच खेला था. वो मैच माल्डोवा के ख़िलाफ़ था. वर्ष 2000 से 2006 तक बेकम ने इंग्लैंड की कप्तानी की. वे आख़िरी बार इंग्लैंड की ओर से वर्ष 2009 में खेले थे. वो उनका 115वाँ अंतरराष्ट्रीय मैच था. बेलारूस के ख़िलाफ़ उस मैच में इंग्लैंड की टीम 3-0 से विजयी रही थी. |
| DATE: 2013-05-16 |
| LABEL: sports |
| [985] TITLE: क्या होती है 'स्पॉट फ़िक्सिंग'? |
| CONTENT: मैच फ़िक्सिंग किसी ख़ास मैच का परिणाम हार-जीत-ड्रा पहले से तय करने को कहते हैं. वहीं स्पॉट फ़िक्सिंग मैच के किसी एक चरण या हिस्से में किसी एक या ज़्यादा खिलाड़ियों के प्रदर्शन को पहले से तय करने को कहते हैं. पूरे मैच का परिणाम तय करने के बजाय स्पॉट फ़िक्सिंग में सट्टेबाज़ खेल के किसी एक ख़ास टुकड़े को पहले से तय करते हैं. यह एक बॉल भी हो सकती है. जैसे कि कोई ख़ास गेंद नो बॉल फेंकी जाएगी या वाइड. बाउंसर या यॉर्कर की भी स्पॉट फ़िक्सिंग की जा सकती है. यह भी तय किया जा सकता है किसी ख़ास गेंद पर या ओवर में बल्लेबाज़ कितने रन बनाएगा या गेंदबाज़ कितने रन देगा. स्पॉट फ़िक्सिंग इस पर भी केंद्रित हो सकती है कि कोई ख़ास बल्लेबाज़ एक गेंदबाज़ द्वारा उसे फेंकी गई गेंदों पर कितने रन बनाता है. बल्लेबाज़ के निश्चित रन बनाने बोल्ड कैच या रन आउट होने को भी पहले से तय किया जा सकता है. सिर्फ़ इतना ही नहीं स्पॉट फ़िक्सिंग मैच के टॉस टॉस के बाद बल्लेबाज़ी या गेंदबाज़ी के चयन बल्लेबाज़ी-गेंदबाज़ी के लिए खिलाड़ियों के क्रम और पिच की जानकारी जैसी चीज़ों पर भी की जाती है. |
| DATE: 2013-05-16 |
| LABEL: sports |
| [986] TITLE: ऐसा रिकॉर्ड जिसे यूसुफ़ पठान भूलना चाहेंगे. |
| CONTENT: आईपीएल-6 में एक नया रिकॉर्ड बना है. वैसे ये रिकॉर्ड ऐसा नहीं है जिस पर गर्व किया जा सके. आईपीएल में पहली बार किसी खिलाड़ी को क्षेत्ररक्षकों को बाधा पहुँचाने की कोशिश ऑब्सट्रक्टिंग द फ़ील्ड में आउट दिया गया है. ये रिकॉर्ड बना है कोलकाता नाइट राइडर्स के यूसुफ़ पठान के नाम. पुणे वॉरियर्स के ख़िलाफ़ मैच में रन लेने की कोशिश के क्रम में यूसुफ़ पठान ने गेंद को पैर से मारा जब क्षेत्ररक्षक गेंद को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे. अंपायर ने तीसरे अंपायर से सलाह ली और रीप्ले देखने के बाद यूसुफ़ पठान को आउट दे दिया गया. आख़िरकार ये मैच कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम हार गई और पुणे वॉरियर्स ने सात रन से जीत हासिल की. यूसुफ़ पठान का विकेट काफ़ी अहम था. पठान ने 44 गेंदों पर 72 रन बनाए थे. वैसे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कई बार खिलाड़ियों को ऑब्सट्रक्टिंग द फ़ील्ड आउट दिया गया है. टेस्ट क्रिकेट में इंग्लैंड के लेन हटन एकमात्र खिलाड़ी हैं जिन्हें ऑब्सट्रक्टिंग द फ़ील्ड आउट दिया गया है. वर्ष 1951 में ओवल में दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ टेस्ट मैच के दौरान ऐसा हुआ था. एक दिवसीय क्रिकेट में अभी तक चार खिलाड़ी ऑब्सट्रक्टिंग द फ़ील्ड आउट दिए गए हैं जिनमें से तीन पाकिस्तान के और एक भारत का है. रमीज़ राजा को इंग्लैंड के ख़िलाफ़ 20 नवंबर 1987 में हुए वनडे मैच के दौरान इस तरह आउट दिया गया था. जबकि मोहिंदर अमरनाथ को अक्तूबर 1989 में श्रीलंका के ख़िलाफ़ वनडे मैच में ऑब्सट्रक्टिंग द फ़ील्ड आउट दिया गया था. पेशावर में फरवरी 2006 में इंज़माम-उल-हक़ को ऑब्सट्रक्टिंग द फ़ील्ड आउट दिया गया था. ये मैच भारत के ख़िलाफ़ था. मार्च 2013 में दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ वनडे मैच में पाकिस्तान के ही मोहम्मद हफ़ीज़ ऑब्सट्रक्टिंग द फ़ील्ड आउट दिए गए थे. वहीं एक अन्य मैच में मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में मुंबई इंडियंस ने राजस्थान रॉयल्स को 14 रनों से हराकर अंक तालिका में एक बार फिर शीर्ष पर आ गई. मुंबई ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 166 रन बनाए और फिर राजस्थान को 152 के स्कोर पर रोक दिया. इसके साथ ही मुंबई ने वानखेड़े में अपने सभी आठ मैच जीत अपराजेय रहने के सिलसिले को बरकरार भी रखा. मुंबई के आदित्य तारे को उनकी अर्धशतकीय पारी के लिए मैन ऑफ द मैच चुना गया. पहला मैच खेल रहे आदित्य तारे ने सचिन की कमी को पूरा करते हुए शानदार अर्धशतक जड़ा. वहीं जीत के लिए जरूरी 167 रनों के लक्ष्य का पीछा कर रही राजस्थान की शुरुआत खराब रही. पहले ही ओवर में मिचेल जॉनसन ने राहुल द्रविड़ को पवेलियन भेज दिया. संजू सैमसन और रहाने भी बड़ी पारियां खेलने में असफल रहे और दोनों की चार-चार रन ही बना सके. पिछले मैच के हीरो शेन वॉटसन ने हालांकि मलिंगा की गेंद पर दो छक्के लगाकर अच्छी शुरुआत की लेकिन उन्हें केवल 19 के निजी स्कोर पर प्रज्ञान ओझा ने अपनी फिरकी में फंसा लिया. मुंबई ने पिछले मैच में दर्द से परेशान हुए सचिन को उनकी टीम ने आराम दिया था. उनकी जगह आदित्य तारे टीम में आए. |
| DATE: 2013-05-16 |
| LABEL: sports |
| [987] TITLE: पोलार्ड ने की छक्कों की बरसात, मुंबई जीता |
| CONTENT: सोमवार को खेले गए आईपीएल मैच में मुंबई इंडियंस की टीम हैदराबाद सनराइज़र्स को सात विकेट से हराकर अंक तालिका में पहले स्थान पर पहुँच गई है. हैदराबाद ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 20 ओवरों में 178 रनों का अच्छा स्कोर खड़ा किया. मुंबई की हालत एक समय खराब लग रही थी लेकिन पोलार्ड के ताबड़तोड़ नाबाद 66 रनों की बदौलत मुंबई तीन गेंद रहते ही जीत गई. पोलार्ड ने आठ छक्के और दो चौके लगाए. पारी की शुरुआत हैदराबाद की ओर से पार्थिव पटेल और शिखर धवन ने की. पटेल 26 रन बनाकर मलिंगा का शिकार हुए. धवन ने अच्छी बल्लेबाज़ी की और 41 गेंदों में 59 रन बनाकर जॉनसन की गेंद पर आउट हुए. उनके जाने के बाद भी हनुमा विहारी और कैमरून वाइट ने अच्छी बल्लेबाज़ी का क्रम जारी रखा. विहारी 19वें ओवर में मलिंगा की गेंद पर 41 रनों पर आउट हुए तो वाइट 43 पर नाबाद रहे. 20 ओवरों में हैदराबाद ने तीन विकेट गंवाकर 178 रन खड़े कर दिए. मुंबई की पारी की शुरुआत ड्वेन स्मिथ और सचिन तेंदुलकर ने की. स्मिथ चौथे ही ओवर में 21 रन बनाकर ईशांत शर्मा का शिकार हुए. इसके बाद सचिन तेंदुलकर और दिनेश कार्तिक की साझेदारी जमती हुई नज़र आ रही थी कि सचिन रिटायर हर्ट हो गए. वे उस समय 31 गेदों में 38 रन बना चुके थे. इसके बाद मुंबई का प्रदर्शन थोड़ा लचर ही रहा. अंबाती रायडू केवल दो रन ही बना सके. हैदराबाद का स्कोर 14वें ओवर में तीन विकेट के नुकसान पर 99 था. हैदराबाद की ओर से डेल स्टेन बेहद कसी हुई गेंदबाज़ी कर रहे थे. लेकिन पोलार्ड ने आकर जैसे मैच का कायापलट ही कर दिया. मुश्किल लक्ष्य को उन्होंने देखते ही देखते एकदम आसान बना दिया. आख़िरी चार ओवरों में जीतने के लिए मुंबई को 62 रन चाहिए. ऐसे में पोलार्ड ने छक्कों की बरसात लगा दी. 17वें ओवर में परेरा की गेदों पर पोलार्ड ने 29 रन पीट डाले. बची कुछी कसर अमित मिश्रा के 18वें ओवर में पूरी हो गई. इस ओवर में मुंबई ने 21 रन बटोर लिए और मैच का रुख़ मोड़ दिया. मैच के आखिरी 21 गेंदों में मुंबई ने 67 रन जमा किए. मुंबई ने तीन विकेट गंवाकर और तीन गेंद रहते ही जीत हासिल कर ली. पोलार्ड ने 27 गेंदों में नाबाद 66 रन बनाए. रोहित शर्मा भी 15 गेंदों में 20 रन बनाकर नाबाद रहे. पोलार्ड ने मैच में कुल आठ छक्के लगाए. प्लेऑफ में जगह बनाने के लिए हैदराबाद को अब अगले दोनों मैच जीतने होंगे. |
| DATE: 2013-05-14 |
| LABEL: sports |
| [988] TITLE: मोएज़ होंगे मैनचेस्टर यूनाइटेड के नए मैनेजर |
| CONTENT: इंग्लिश फ़ुटबॉल क्लब एवर्टन के मौजूदा मैनेजर डेविड मोएज़ मैनचेस्टर यूनाइटेड फ़ुटबॉल क्लब के नए मैनेजर होंगे. वे 26 वर्षों से दुनिया के सबसे चर्चित क्लबों में से एक मैनचेस्टर यूनाइटेड के सर एलेक्स फ़र्ग्यूसन की जगह लेंगे जिन्होंने बुधवार को संन्यास की घोषणा की थी. डेविड मोएज़ एक जुलाई से अपना कार्यभार संभालेंगे. उन्हें सर एलेक्स फ़र्ग्यूसन की सिफ़ारिश पर ही ये भूमिका दी गई है. मोएज़ पिछले 11 वर्षों से एवर्टन से जुड़े हुए हैं. 50 वर्षीय मोएज़ का एवर्टन के साथ अनुबंध इस सत्र के बाद समाप्त हो रहा था. सर एलेक्स फ़र्ग्यूसन ने बताया मोएज़ के नाम पर सर्वसम्मति थी. डेविड बहुत ईमानदार व्यक्ति हैं. मैं लंबे समय से उनके काम को पसंद करता रहा हूँ. मैंने 1998 में उन्हें सहायक मैनेजर का पद देने की पेशकश की थी. उनके पास वे सभी गुण हैं जो इस क्लब के मैनेजर के पास होने चाहिए. डेविड मोएज़ ने कहा है कि मैनचेस्टर यूनाइटेड का मैनेजर नियुक्त किया जाना उनके लिए बड़े गर्व की बात है. उन्होंने कहा मैं इससे काफ़ी ख़ुश हूँ कि सर एलेक्स ने मेरे नाम की सिफ़ारिश की. उन्होंने जो भी इस क्लब के लिए किया उसका मैं बहुत सम्मान करता हूँ. एवर्टन ने एक बयान जारी करके मैनेजर के रूप में डेविड मोएज़ के काम की सराहना की और उनका शुक्रिया भी अदा दिया. |
| DATE: 2013-05-09 |
| LABEL: sports |
| [989] TITLE: 'मिलर मैजिक' से हवा हुई बंगलौर की उम्मीद |
| CONTENT: वो कहते हैं न कि क्रिकेट में कुछ भी असंभव नहीं. जब तक आख़िरी गेंद न फेंकी जाए मैच का रुख़ पलट सकता है. आईपीएल-6 के एक मैच में किंग्स इलेवन पंजाब के ख़िलाफ़ रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए जब 190 रन बना डाले तो उन्होंने शायद सोचा नहीं होगा कि मोहाली की पिच पर ये स्कोर भी कम पड़ेगा. लेकिन मोहाली में वो सब कुछ हुआ जिसके लिए टी-20 क्रिकेट जाना जाता है. शुरू में बेहतरीन गेंदबाज़ी लगातार गिरते विकेट फिर धमाकेदार बल्लेबाज़ी और रनों की बारिश. किंग्स इलेवन पंजाब ने छह विकेट से मैच जीता वो भी सिर्फ़ 18 ओवर में. जीत के हीरो रहे डेविड मिलर. जिन्होंने सिर्फ़ 38 गेंदों पर 101 रन बना डाले. डेविड मिलर ने अपनी पारी में आठ चौके और सात छक्के मारे. आर सतीश के साथ पाँचवें विकेट के लिए उन्होंने सिर्फ़ 50 गेंदों पर 130 रन जोड़े. जीत के लिए 191 रन के बड़े स्कोर का पीछा कर रही किंग्स इलेवन पंजाब की टीम ने 64 रन पर चार विकेट गँवा दिए थे. उस समय तक शॉन मार्श मनदीप सिंह गुरकीरत सिंह और डेविड हसी पवेलियन लौट चुके थे. 41 रन के निजी स्कोर पर डेविड मिलर का कप्तान विराट कोहली ने कैच भी छोड़ दिया जो टीम के लिए भारी पड़ा. लेकिन उसके बाद डेविड मिलर और आर सतीश ने जो किया वो मोहाली के दर्शकों को जल्दी नहीं भूलेगा. आख़िरी पाँच ओवरों में दोनों ने 95 रन बनाए. इससे पहले किंग्स इलेवन पंजाब की टीम ने टॉस जीतकर पहले फ़ील्डिंग चुनी. रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर ने बेहतरीन शुरुआत की. चेतेश्वर पुजारा और क्रिस गेल ने पहले विकेट के लिए 102 रन जोड़े. गेल ने एक बार फिर आतिशी पारी खेली. उन्होंने 33 गेंदों पर 61 रन बनाए. पुजारा ने 51 रन बनाए जबकि एबी डी वेलियर्स 38 रन पर नाबाद रहे. कप्तान विराट कोहली सिर्फ़ 14 रन बना पाए. इस हार के बावजूद रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर की टीम अंक तालिका में दूसरे नंबर पर बनी हुई है जबकि पंजाब की टीम 10 अंकों के साथ छठे नंबर पर है. |
| DATE: 2013-05-07 |
| LABEL: sports |
| [990] TITLE: फुटबॉल क्लब ने क्यों छेड़ा 'तालिबान' अभियान |
| CONTENT: ब्राज़ील के शीर्ष फ़ुटबॉल क्लब फ़्लूमीनांसी ने अपने खिलाड़ियों और समर्थकों को कहा है कि वह तालिबान लड़ाकों की तरह खुद को दर्शाने और उसकी ऑनलाइन फोटो पोस्ट करने वाले प्रचार अभियान को बंद कर दें. यह अभियान तब शुरू हुआ जब क्लब दक्षिण अमरीकी टूर्नामेंट में मैच हार गया. इसके बाद कुछ समर्थकों ने ट्विटर पर खिलाड़ियों और अन्य समर्थकों से अपनी योद्धा वाली प्रवृत्ति दिखाने और प्रचार अभियान से जुड़ने को कहा. कई खिलाड़ियों ने टीम के रंगों वाले स्कार्फ़ से आंशिक रूप से अपना चेहरा ढके हुए फोटो पोस्ट भी कर दिए. इसमें ब्राज़ील के अंतरराष्ट्रीय स्ट्राईकर फ्रेड भी शामिल हैं. वर्तमान ब्राज़ील चैंपियन फ़्लूमीनांसी को उसके समर्थक योद्धाओं की टीम कहकर बुलाते हैं. क्लब के बयान में कहा गया है कि यह अभियान आतंकवाद को महिमामंडित करता है. इस बयान में कहा गया यह अभियान शुरू किया गया और उसे तालिबान की छवि से जोड़ दिया गया- जो अच्छे योद्धा नहीं बल्कि आतंकवादी हैं. इसलिए फ़ुटबॉल क्लब इसकी निंदा करता है. क्लब ने अभियान को हिंसा के लिए उकसाना करार दिया है. फ़्लूमीनांसी समर्थक रविवार को इक्वाडोर में अपनी टीम की हार से गुस्से में था. देर से मिली एक पेनल्टी की बदौलत स्थानीय टीम एमेलेक 2-1 से जीत गई. ब्राज़ील में फ़ुटबॉल के दौरान लगाए जाने वाले कई नारे बेहद आपत्तिजनक होते हैं. वहां वर्ग जाति लिंग और होमो सेक्शुएलिटी को लेकर नारे लगाए जाते हैं. कई प्रशंसक मैच के दौरान अपनी टीम के रंगों में अयातुल्लाह खुमैनी सद्दाम हुसैन और ओसामा बिन लादेन की तस्वीरों वाले झंडे लेकर पहुंचते हैं. ब्राज़ील को अगले साल फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप की मेज़बानी करनी है. कहा जा रहा है कि इसीलिए फ़ुटबॉल से जुड़े अधिकारी ज़्यादा जागरूक हो रहे हैं कि कहीं प्रशंसकों का बर्ताव देश की छवि को नुक्सान न पहुंचा दे. |
| DATE: 2013-05-06 |
| LABEL: sports |
| [991] TITLE: विंबलडन में मिलेगा 187 करोड़ का इनाम |
| CONTENT: विंबलडन के आयोजक ऑल इंग्लैंड क्लब ने घोषणा की है कि साल 2013 में खिलाड़ियों को दिए जाने वाली इनाम राशि में 40 फ़ीसदी की वृद्धी की जाएगी. आयोजकों ने इसके साथ ही साल 2019 तक विंबलडन के प्रतिष्ठित एक नंबर कोर्ट पर हटाई जा सकने वाली छत लगाने का भी फैसला किया है. इनाम की कुल राशि दो करोड़ 20 लाख पाउंड से ज़्यादा होगी यह 2012 में दी गई राशी से 65 लाख पाउंड ज़्यादा है. नए अनुमान से पुरुष और महिला एकल मुकाबलों के विजेताओं को 16-16 लाख पाउंड या 13- 13 करोड़ रुपए मिलेंगे. ऑल इंग्लैंड क्लब के अध्यक्ष फ़िलिप ब्रूक का दावा है कि यह फ़ैसला खिलाडियों के दबाव में नहीं लिया गया है. ब्रूक ने कहा हमने खिलाड़ियों की बातें सुनीं लेकिन हमने किसी खिलाड़ी या एटीपी या डब्ल्यूटीए के साथ किसी किस्म की कोई सौदेबाजी नहीं की. लेकिन बीबीसी के टेनिस संवाददाता जोनाथन ओवरएंड इस बात को नहीं मानते. ओवरएंड कहते हैं यह इनाम राशि में बेहद बड़ी बढ़ोतरी है और इससे साफ़ दिखता है पिछले कुछ सालों से बन रहे खिलाड़ियों का दबाव रंग लाया है. खिलाड़ी आयोजन से प्राप्त होने वाले पैसे का ज़्यादा बड़ा हिस्सा इनाम राशि में चाहते थे और वो उन्हें अब मिलेगा. हालांकि फ़िलिप ब्रूक का कहना है कि इनाम राशी में इज़ाफ़ा उन खिलाड़ियों की भलाई को ध्यान में रख कर किया गया है जो विश्व रैंकिंग में निछले पायदानों पर होते हैं. ब्रूक ने बीबीसी से बात करते हुए कहा पिछले साल जब हमने इनाम की घोषणा की थी तो हमने उन खिलाडियों को ध्यान में रखा था जो क्वालिफाइंग राउंड से या आरंभिक दौरों में बाहर हो जाते हैं. यूं तो यह खिलाड़ी 50 से 200 वीं पायदान तक के होते हैं लेकिन यह कोई करोड़पति नहीं होते. इस टूर्नामेंट में 88 फ़ीसदी एकल मुकाबलों के खिलाड़ी पहले तीन दौर के मुकाबलों में बाहर हो जाते हैं. इन खिलाडियों को मिलने वाली राशी में भी 60 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है. पिछले दो सालों में इन खिलाड़ियों को मिलने वाले पारितोषिक में लगभग 90 फ़ीसदी की वृद्धी हुई है. ब्रिटेन के पूर्व नंबर एक खिलाड़ी ग्रेग रूजेत्स्की ने बीबीसी स्पोर्ट से बात करते हुए इस निर्णय को सही बताया है. रूजेत्स्की कहते हैं इस निर्णय से उन खिलाड़ियों को मदद मिलेगी जो पहले चार में नहीं है. सोलह लाख पाउंड का पहला इनाम है पर यह बड़ी इनामी राशियां तो नोवाक जोकोविच रफ़ाएल नडाल एंडी मरे और रोज़र फ़ेडरर ले जायेंगे. रूजेत्स्की के अनुसार इन बड़े लोगों को पैसे से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकी अब यह लोग केवल ट्रॉफ़ी के लिए खेलते हैं लेकिन 60 से 100 वें पायदान पर खड़े खिलाड़ियों के लिए इनाम राशी में बढ़ोतरी उनके जीवन पर अच्छा फ़र्क डालेगी. वैसे इस साल ऑस्ट्रेलियन ओपन ने भी विजेताओं के लिए इनामी राशी को बढ़ा कर 16 लाख पाउंड या करीब 13 करोड़ रुपयों से ज़्यादा कर दिया गया है . फ्रेंच ओपन जो कि अगले महीने शुरू हो रहा है उसके विजेताओं को 12 लाख पाउंड से ज़्यादा या करीब 10 करोड़ रुपयों के बराबर का इनाम मिलेगा. यूएस ओपन जो की अगस्त में आयोजित किया जाएगा उसमे इनमे राशि करीब दो करोड़ पाउंड या 160 करोड़ रुपयों से ज़्यादा की होगी. |
| DATE: 2013-04-24 |
| LABEL: sports |
| [992] TITLE: क्रिस गेल अकेले ही पुणे पर भारी पड़ गए |
| CONTENT: रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर के क्रिस गेल की आँधी में आईपीएल के कई रिकॉर्ड टूट गए. उनके अकेले की पारी इतनी ज़बरदस्त थी कि बंगलौर की टीम ने पुणे वॉरियर्स इंडिया को 130 रनों के बड़े अंतर से हरा दिया है. पहले गेल ने ब्रैंडन मैक्कलम का सन् 2008 का सर्वाधिक निजी स्कोर का रिकॉर्ड तोड़ा और फिर उनकी मदद से बंगलौर ने आईपीएल का सबसे बड़ा स्कोर खड़ा किया. गेल ने पुणे वॉरियर्स इंडिया के गेंदबाज़ों की धज्जियाँ उड़ाते हुए 175 रन बनाए और वह अंत तक आउट नहीं हुए. उन्होंने ये रन सिर्फ़ 66 गेंदों में ही बनाए. गेल ने इस दौरान 13 चौके और 17 छक्के जड़े. उनकी इस पारी की मदद से बंगलौर ने पाँच विकेट पर 263 रनों का बड़ा स्कोर पुणे के सामने रख दिया. इसके बाद पुणे की टीम शुरू से ही डगमगाती नज़र आई और पूरी टीम सिर्फ़ 133 रनों पर सिमट गई. इससे पहले ब्रैंडन मैक्कलम के नाम 158 नॉट आउट का सर्वाधिक स्कोर का रिकॉर्ड था. मैक्कलम ने आईपीएल के पहले सीज़न के पहले मैच में बंगलौर की ही टीम के ख़िलाफ़ ये स्कोर खड़ा किया था. मैक्कलम उस समय कोलकाता नाइट राइडर्स टीम की ओर से खेल रहे थे. 18 अप्रैल 2008 को हुए मैच में मैक्कलम ने 73 गेंदों में 10 चौकों और 13 छक्कों के साथ वो स्कोर खड़ा किया था. गेल की इस तूफ़ानी पारी की मदद से बंगलौर की टीम ने भी सर्वाधिक रनों का रिकॉर्ड बनाया. उस मैच में कोलकाता की टीम ने तीन विकेट के नुक़सान पर 222 रन बनाए थे. वैसे आईपीएल में अब तक का सबसे बड़ा स्कोर 246 रनों का था. चेन्नई सुपर किंग्स ने राजस्थान रॉयल्स के विरुद्ध पाँच विकेट पर 246 रनों का स्कोर 2010 में खड़ा किया था. मगर इस मैच में आरसीबी ने वो स्कोर भी पीछे छोड़ दिया. ये स्कोर ट्वेन्टी-20 क्रिकेट का सबसे बड़ा स्कोर है और इतना ही नहीं गेल ने सिर्फ़ 30 गेंदों में शतक पूरा करके ट्वेन्टी-20 का सबसे तेज़ शतक भी बनाया. गेल ने इसके बाद पुणे वॉरियर्स की बल्लेबाज़ी का अंतिम ओवर भी डाला और उस ओवर में दो विकेट झटके. इससे पहले सिर्फ़ 34 गेंदों में एंड्रयू साइमंड्स ने 2004 में शतक पूरा किया था जबकि केंट का मुक़ाबला समरसेट की टीम से हो रहा था. |
| DATE: 2013-04-23 |
| LABEL: sports |
| [993] TITLE: जब फैन्स ने की खिलाड़ियों की पिटाई. |
| CONTENT: यह वाकया अर्जेंटीना का है जहां फुटबॉल के लिए लोगों की दीवानगी जुनून की हद तक कही जाती है. एक क्लब टीम टूर्नामेंट के एक मैच में 15-0 से हार गई और खेल प्रेमियों का गुस्सा इस कदर बढ़ गया कि उन्होंने ड्रेसिंग रूम में घुसकर खिलाड़ियों की धुनाई कर दी. अर्जेंटीना के फुटबॉल क्लब हुराकन को यकीनन इसका अंदाजा तक नहीं रहा होगा. दरअसल हुआ यूं कि ट्रेनिंग सत्र के बाद क्लब के ड्रेसिंग रूम में कई फैन्स घुस आए और उनके गुस्से का आलम यह था कि कुछ खिलाड़ियों की धुनाई तक कर दी गई. खबरों के मुताबिक फुटबॉल के इन दीवानों ने खिलाड़ियों के सामान तक चुरा लिए. सिर्फ इतना ही नहीं उपद्रवी खेल प्रेमियों ने ब्यूनस आयर्स में स्टेडियम के बाहर खड़ी कारों को भी नुकसान पहुंचाया. सबसे खास बात यह थी कि उपद्रव मचाते वक्त फैन्स ने मास्क पहन रखे थे. कहा जा रहा है कि फुटबॉल के एक टूर्नामेंट में हुराकन क्लब के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद खेल प्रेमियों ने क्लब के ड्रेसिंग रूम में यह हमला किया. हुराकन के कोच जोसे मारिया लोप ने घटना का ब्यौरा देते हुए कहा ट्रेनिंग सेशन के बाद हम लोग नहा रहे थे. ठीक उसी वक्त नाराज फैन्स ड्रेसिंग रूम में घुस आए और खिलाड़ियों को धमकाया. उन्होंने बताया नाराज फैन्स ने कुछ खिलाड़ियों की पिटाई भी की. जब हमने स्टेडियम छोड़ा तो पाया कि वहां खड़ी आठ कारों को नुकसान पहुंचाया गया है. क्लब के अध्यक्ष अलेज़ांड्रो नाडुर ने बताया फैन्स दो बसों में सवार होकर आए थे और स्टेडियम में प्रवेश कर गए. उन्होंने जो कुछ भी किया उसे सही नहीं ठहराया जा सकता है भले ही हम 15-0 से यह मैच गोडोय क्रूज़ क्लब से हार गए हों. |
| DATE: 2013-04-22 |
| LABEL: sports |
| [994] TITLE: अब होगा विजेंदर सिंह का डोप टेस्ट |
| CONTENT: बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाले विजेंदर सिंह का नाम हेरोइन स्कैंडल में आने के बाद खेल मंत्रालय ने राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी नाडा से कहा है कि वह विजेंदर सिंह का डोप टेस्ट करे. खेल मंत्रालय के दबाव के चलते विजेंदर सिंह डोप टेस्ट कराने के लिए तैयार हो गए हैं. अभी तक वह किसी भी परीक्षण से बचते रहे हैं. लेकिन अब वे अपने मूत्र और खून का सैंपल देने के लिए सहमत हो गए हैं लेकिन अब भी वे अपने बाल का सैंपल देने के लिए तैयार नहीं हैं. ड्रग स्कैंडल में विजेंदर सिंह का नाम आने के एक महीने बाद खेल मंत्रालय ने इस मामले में हस्तक्षेप करने का फैसला किया है. नाडा के निदेशक मुकुल चटर्जी को भेजे गए संदेश में खेल मंत्रालय ने कहा है कि विजेंदर सिंह के हेरोइन लेने के बारे में आ रही खबरें परेशान करने वाली हैं. इस लिए उनका जल्द से जल्द परीक्षण कराया जाए और इसके परिणाम मंत्रालय को सूचित कर दिए जाएं. विजेंदर सिंह इस बात का खंडन करते रहे हैं कि उन्होंने हेरोइन का सेवन किया है. पंजाब पुलिस ने रविवार को वक्तव्य जारी कर कहा था कि विजेंदर ने कथित ड्रग तस्करों से हेरोइन लेने के बाद 12 बार उसका सेवन किया था. इस मामले में पुलिस ने कनाडा में रहने वाले ड्रग डीलर अनूप सिंह कहलों उर्फ़ रूबी को 3 मार्च को गिरफ़्तार किया था और उनके पास से 26 किलो हेरोइन बरामद हुई थी जिसका मूल्य 130 करोड़ रुपए आँका गया था. पंजाब पुलिस के प्रवक्ता ने कहा था यह अब सिद्ध हो चुका है कि मुक्केबाज राम सिंह ओर विजेंदर सिंह ने दिसंबर 2012 और फ़रवरी 2013 के बीच निजी इस्तेमाल के लिए कहलों और उसके साथी रॉकी से हेरोइन ली थी. खेल मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा है कि अगर विजेंदर सिंह इस मामले में दोषी पाए जाते हैं तो उनको इसकी सज़ा दी जाएगी. संसद के बाहर पत्रकारों से बातचीत करते हुए जितेंद्र सिंह ने कहा कि इस समय पंजाब पुलिस पूरे मामले की जाँच कर रही है. जब जाँच पूरी हो जाएगी और किसी के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया जाएगा तो हम ज़रूर कार्रवाही करेगे. इस मामले में विजेंदर सिंह के साथी राम सिंह को नौकरी से बर्खास्त किया जा चुका है. |
| DATE: 2013-04-02 |
| LABEL: sports |
| [995] TITLE: शारापोवा पर भारी सेरेना |
| CONTENT: दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी सेरेना विलियम्स ने मारिया शारापोवा को हराकर रिकॉर्ड छठी बार मियामी मास्टर्स टेनिस टूर्नामेंट का ख़िताब जीत लिया है. सेरेना ने एक रोमांचक मुक़ाबले में मारिया शारापोवा को 4-6 6-3 6-0 से हराया. शारापोवा ने पहले सेट में सेरेना को हरा दिया लेकिन बाद के दो सेटों में वह सेरेना के तूफ़ान को नहीं थाम सकीं. सेरेना का ये 48वां डब्ल्यूटीए ख़िताब है. मियामी मास्टर्स की इस खिताबी जीत के साथ साथ सेरेना विलियम्स ने अपने रिकॉर्ड को कहीं ज्यादा बेहतर बना लिया है. 15 ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीत चुकी सेरेना विलियम्स महज चौथी ऐसी महिला खिलाड़ी हैं जो मियामी में छह बार चैंपियन बनीं हैं. उनसे पहले ये कारनामा क्रिस एवर्ट स्टेफी ग्राफ़ और मार्टिना नवरातिलोवा ये करिश्मा दिखा चुकी हैं. लेकिन सेरेना विलियम्स का रिकॉर्ड इन सबमें सबसे बेहतर इसलिए हो गया है कि क्योंकि सेरेना ने इस बार सबसे ज़्यादा उम्र में चैंपियन बनने का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया है. क्रिस एवर्ट ने 31 साल और दो महीने की उम्र में 1986 में मियामी मास्टर्स का ख़िताब जीता था लेकिन सेरेना विलियम्स ने 31 साल और छह महीने में ख़िताब जीत कर इस रिकॉर्ड को अपने नाम कर लिया. सेरेना इससे पहले यहां 2002 2003 2004 2007 और 2008 में चैंपियन रहीं थीं. इस जीत के साथ ही सेरेना ने एक बार फिर मारिया शारापोवा पर अपनी बादशाहत साबित कर दी है. ये लगातार ग्यारहवां मुकाबला है जब सेरेना विलियम्स ने मारिया शारापोवा को हराया है. वैसे कुल मुकाबलों में अब तक दोनों के बीच 14 मुक़ाबले हुए हैं जिसमें 12 बार बाजी सेरेना विलियम्स के नाम रही है जबकि दो बार मारिया शारापोवा सेरेना को हराने में कामयाब हुई हैं. 25 साल की मारिया शारापोवा पांचवीं बार मियामी मास्टर्स ओपन के फ़ाइनल में पहुंचने के बाद भी खिताब नहीं जीत सकी हैं. अब तक 28 डब्ल्यूटीए ख़िताब जीत चुकीं शारापोवा अब तक मियामी मास्टर्स का ख़िताब नहीं जीत पाई हैं. |
| DATE: 2013-03-30 |
| LABEL: sports |
| [996] TITLE: क्रिकेट सितारे जेसी राइडर कोमा में |
| CONTENT: न्यूज़ीलैंड के क्रिकेट खिलाड़ी जेसी राइडर की क्राइस्टचर्च के एक बार में पिटाई होने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है. बताया जा रहा है कि इस पिटाई में उनके सिर पर गंभीर चोट लगी है और वो कोमा में हैं. राइडर को गहन चिकित्सा में रखा गया है. 28 साल के जेसी राइडर इंडियन प्रीमियर लीग में खेलने के लिए दिल्ली की उड़ान भरने वाले थे. इस साल आईपीएल में उनका करार दिल्ली की टीम डेल्ही डेयरडेविल्स के साथ है. उन्हें लगभग 3 लाख डॉलर पर अनुबंधित किया गया है. इससे पहले वो रॉयल चैलेंजर्स बैंगलौर और पुणे वॉरियर्स की तरफ से आईपीएल में खेल चुके हैं. राइडर के दोस्त और साथी खिलाड़ियों उनके समर्थन में सोशल मीडिया पर संदेश भेज रहे हैं. रेडियो न्यूज़ीलैंड के मुताबिक राइडर कोमा में हैं और उनके सिर में फ्रैक्चर आई है फेफड़े में छेद हो गया है और उन्हें आंतरिक रक्तस्राव हुआ है. समाचार एजेंसी एपी ने प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से बताया कि बार के बाहर उनपर चार लोगों ने हमला किया उनपर घूंसे बरसाए गए और जब वो गिर गए तो भी उन्हें लगातार पीटा गया. न्यूज़ीलैंड की घरेलू टूर्नामेंट में खेलने के बाद राइडर उस शराबखाने में अपनी टीम के दूसरे खिलाड़ियों के साथ गए थे. बार के मैनेजर ने सिक्योरिटी कैमरों की फुटेज पुलिस को दे दी है. न्यूज़ीलैंड की क्रिकेट बोर्ड ने ट्वीट किया न्यूज़ीलैंड की पूरी टीम राइडर के साथ है और उनके बारे में चिंतित है. राइडर को एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज़ माना जाता है लेकिन शराब के कारण वो पहले भी खबरों में रहे हैं. शराब के अत्याधिक सेवन की वजह से राइडर टीम से कई बार अंदर बाहर हुए हैं. उन्हें न्यूज़ीलैंड क्रिकेट ने विशेषज्ञ की सलाह भी दिलवाई थी. जेसी राइडर ने अब तक 18 टेस्ट मैच खेले हैं जिनमें उन्होंने करीब 41 के औसत से 1269 रन बनाए हैं. उन्होंने तीन शतक बनाए हैं और उनका अधिकतम स्कोर 201 है. वहीं 39 वनडे मैचों में उन्होंने 34 की औसत से 1100 रन बनाए हैं. |
| DATE: 2013-03-28 |
| LABEL: sports |
| [997] TITLE: सर चढ़ बोल रहा जडेजा का जादू. |
| CONTENT: रविंदर जडेजा उन क्रिकेटरों में से हैं जो आलोचनाओं और विवादों के बावजूद भी अपनी जगह बना ही लेते हैं. उनके आलोचक भले ही इसका श्रेय उनकी किस्मत को दें लेकिन जडेजा ने भारतीय टीम में जगह बनाने में कम मेहनत नहीं की है. पहली बार ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ भारतीय टेस्ट टीम में शामिल हुए जडेजा का प्रदर्शन इतना अच्छा रहा कि चौथे टेस्ट में उन्हें मैन ऑफ द मैच मिला. लेकिन जडेजा का यह सफर इतना आसान भी नहीं रहा है. आईपीएल में शेन वार्न की खोज माने जाने वाले जडेजा ने राजस्थान की टीम से शुरुआत की थी. हालांकि वो पहले क्रिकेटर होंगे जिन्हें आईपीएल में एक सत्र के लिए प्रतिबंधित भी किया गया क्योंकि वो एक टीम में रहते हुए किसी दूसरी टीम के साथ बातचीत कर रहे थे पैसों की. एक सत्र में वो क्रिकेट नहीं खेल पाए जिसके बाद जब वो चेन्नई की टीम में शामिल हुए तो सबसे अधिक बोली के साथ. जी हां बोली लगी थी बीस लाख अमरीकी डॉलर. वर्ष 2009 में वनडे टीम में शामिल हुए जडेजा को काम का खिलाड़ी माना जाता है यानी उनसे जो चाहे करा लो. स्पिन गेंदबाज़ी और बैटिंग भी. लेकिन आलोचक कहते हैं कि न तो उनकी गेंदबाज़ी मारक है और न ही बल्लेबाज़ी में कोई ख़ास दम. लेकिन अगर उनका रिकार्ड देखा जाए तो कोई बुरा नहीं है. रणजी क्रिकेट में वो तीन तिहरे शतक लगा चुके हैं. जी हां तीन तिहरे शतक और शायद इसलिए ही उनको टेस्ट टीम में जगह मिली. ध्यान रहे कि रणजी में तीन तिहरे शतक किसी भारतीय बल्लेबाज़ ने नहीं लगाए हैं. इंग्लैंड के ख़िलाफ 2012 में जब उन्हें टीम में शामिल किया गया तो लोगों ने कहा कि चूंकि वो कप्तान धोनी की चेन्नई आईपीएल टीम में हैं इसलिए जगह मिली है लेकिन ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ उन्होंने अपनी उपयोगिता साबित कर ही दी. वनडे मैचों में देखा जाए तो जडेजा ने 65 मैचों में एक हज़ार से अधिक रन बनाए हैं जिसमें छह अर्धशतक हैं और सर्वाधिक स्कोर 78 रनों का है. वो भी तब जब जडेजा छठे या सातवें नंबर पर बल्लेबाज़ी करने आते हैं. उनका बैटिंग औसत 30-23 है जो बुरा नहीं माना जा सकता. गेंदबाज़ी की बात करें तो 65 वनडे मैचों में उन्होंने 70 विकेट लिए हैं और इकोनॉमी रेट 4-78. पांच टेस्ट मैचों में जडेजा ने 97 रन बनाए हैं और औसत है 19-40 का. गेंदबाज़ी की बात करें तो अब तक उन्होंने 27 विकेट लिए हैं. इकोनॉमी रेट 2-03 का रहा है. हो सकता है कि ये आकड़े कोई बड़ी बात न कह रहे हों लेकिन बताते चलें कि ऑस्ट्रेलिया के साथ सीरिज़ में जडेजा ने ऑस्ट्रेलिया के कप्तान और सबसे खतरनाक बल्लेबाज़ माइकल क्लार्क को पांच बार आउट किया है. ज़ाहिर है शेन वॉर्न ने कुछ सोचकर ही जडेजा को रॉकस्टार कहा होगा जब जडेजा वॉर्न के साथ राजस्थान के लिए खेलते थे आईपीएल में. वॉर्न के अनुसार जडेजा की सबसे ख़ास बात है खुद में विश्वास करना. और शायद यही कारण है कि आलोचनाओं और विवादों के बावजूद आज जडेजा लोगों की आंखों का तारा बन गए हैं अपने बेहतरीन प्रदर्शन से. |
| DATE: 2013-03-26 |
| LABEL: sports |
| [998] TITLE: भारतीय टीम अपनी गली की शेर पर बाहर ढेर? |
| CONTENT: ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ टेस्ट सिरीज़ में मिली 4-0 की जीत ने भारत को अपने घर के शेर होने का स्टेटस दोबारा हासिल करा दिया है. हालांकि ये तमगा देना थोड़ी जल्दबाज़ी होगी क्योंकि कुछ महीनों बाद भारत को दक्षिण अफ्रीका न्यूज़ीलैंड और ग्लैंड से भिड़ना है. इंग्लैंड और भारत के बीच खेले गए टेस्ट मैच से ये जाहिर हो चुका है कि अच्छे स्पिनर जैसे मोंटी पनेसर या ग्रेम स्वॉम के सामने भारतीय टीम टिक नहीं पाती है. अगर ऑस्ट्रेलिया के पास भी ऐसा ही एक और अच्छा स्पिनर होता तो शायद भारत के लिए जीत हासिल करना मुश्किल हो जाता. अज़हरूद्दीन और अजीत वाडेकर जैसे लोगों ने स्लो लो बॉउंस वाली विकेट तैयार करने का फार्मूला निकाला. उसका नतीजा ये हुआ कि भारतीय टीम अपने घर में मैच जीत रही थी लेकिन उसका उलटा असर ये हुआ कि भारत बाहर जाकर कोई मैच नहीं जीत पा रहे थी. वर्तमान टीम को भी यही खतरा है. अगर टीम इसी तरह से ही विकेट बनाती जाएंगी तो वो केवल अपने ही घर में मैच जीत पाएगी. जब गांगुली कप्तान बने तो इस बात पर विचार किया गया कि घर में मैच जीतने और बाहर मैच हारने से काम नहीं चलेगा. इसी दौरान टीम में अच्छे बल्लेबाज़ों का दौर आया. इस दौर में गांगुली के अलावा राहुल द्रविड वीवीएस लक्ष्मण और सचिन तेंदुलकर जैसे बल्लेबाज़ आए. ये भारत के इतिहास में शायद अंतरराष्ट्रीय स्तर के बल्लेबाज़ थे जिन्होंने बाहर जाकर भी रन बनाए. यहीं ज़माना था जब भारत नबंर वन टीम बन कर उभरी. भारतीय टीम की जो टलाएन एट होम एंड लैंब अबरोडट यानि घर में शेर और बाहर गीदड़ वाली जो छवि थी वो बदली और इंग्लैंड के साथ खेली गई टेस्ट सिरीज़ और ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेले गए टेस्ट मैच हमने जीते. लेकिन इसके बाद एक बदलाव का दौर आया और फिर आईपीएल भी आया. टेस्ट मैचों की अहमियत घटती गई फिर बल्लेबाज़ों की तकनीक भी बदलती चली गई. इन बल्लेबाज़ों का प्रदर्शन सीमित ओवर में अच्छा था. लेकिन इसका विपरीत परिणाम ये हुआ की भारत की खराब स्थिति और बदतर हो गई. भारत में ही टीम इंडिया इंग्लैंड से हार गई थी. हालांकि वेस्ट इंडिज़ से वो बहुत मुश्किल से जीती तो वहीं न्यूज़ीलैंड टीम ने भी भारतीय टीम को परेशान किया. ऐसी स्थिति में भारत में तेज़ गेंदबाज़ों को मदद करने वाली पिच भी बनाई जानी चाहिए वरना बल्लेबाज़ों को तेज़ गेंदबाज़ी की आदत नहीं रहेगी और इसका परिणाम ये होगा कि वो बाहर जाकर मैच हारने लगेंगे. हालांकि भारत अपने घर का शेर तो बन गया है लेकिन उसे दक्षिण अफ्रीका न्यूज़ीलैंड और इंग्लैंड सिरीज़ खेलने जाना है और अगर ऐसे में उसकी हार होती है तो ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ये जीत धरी की धरी रह जाएगी. |
| DATE: 2013-03-25 |
| LABEL: sports |
| [999] TITLE: अश्विन की फिरकी पर फिसले कंगारू |
| CONTENT: भारत ऑस्ट्रेलिया के बीच चल रहे चार मैचों की टेस्ट श्रृंखला के अंतिम मैच में फिरोजशाह कोटला के मैदान पर मेहमान टीम ने खेल के पहले दिन आठ विकेट गंवाकर 231 रन बना लिए हैं. सिडल और पैटिंसन की जोड़ी नौवें विकेट की साझीदारी में 42 रन बनाकर पिच पर टिके हुए हैं. सलामी बल्लेबाज एड कॉवन एक जीवनदान के बाद 38 के स्कोर पर पैवेलियन वापस लौट गए जबकि उनके साथ खेल की शुरुआत करने उतरे वार्नर अपना खाता भी नहीं खोल पाए. चाय के वक्त तक मेहमान टीम 7 विकेट पर 153 रन ही बना पाई थी लेकिन निचले क्रम के बल्लेबाजों ने मुश्किल वक्त में खेल संभाल लिया. पुछल्ले बल्लेबाज सिडल सबसे ज्यादा 47 के स्कोर पर नाबाद बने हुए हैं. कॉवन का विकेट लेने वाले दाहिने हाथ के ऑफ ब्रेक स्पिनर आर अश्विन ने चार विकेट लेकर मेहमान टीम की कमर ही तोड़ दी. अश्विन की फिरकी के कहर का यह आलम था कि उन्होंने 30 ओवर में 40 रन देकर कंगारुओं के चार विकेट झटक लिए. कॉवन स्मिथ वेड और जॉनसन खुद को इस ऑफ ब्रेक स्पिनर के कहर से बचा पाने में नाकाम रहे. स्मिथ ने 46 रन बनाए थे. मेहमान टीम के कप्तान शेन वॉटसन को मेजबान कप्तान धोनी ने स्टंप आउट कर दिया. तेज गति के गेंदबाज इशांत शर्मा ने डेविड वार्नर को शून्य और तीसरे नंबर पर खेलने आए फिलिप ह्यूग्स को 45 रनों पर पैवेलियन वापस लौटाया. हरफनमौला रवींद्र जाडेजा ने मैक्सवेल और मेहमान टीम के कप्तान वॉटसन का विकेट अपने खाते में जोड़ा. कोटला की पिच पर पुरानी गेंद खतरनाक तरीके से उछाल ले रही थी जबकि नई गेंद कुछ नीची रह रही थी. खेल की शुरुआत में गेंदबाज़ी का मोर्चा संभाल रहे इशांत और उनके नए साथी भुवनेश कुमार लय में दिख रहे थे. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि फिरोजशाह कोटला के क्यूरेटर वेंकट सुंदरम की तैयार की हुई पिच मैच के पहले सेशन की जान रही. मोहाली की दूसरी पारी में फॉर्म में दिख रहे ह्यूग्स ने कोटला के मैदान पर भी आक्रमक रुख अपनाया था. लेकिन कोटला की पिच उनके लिए बहुत मददगार नहीं रही. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक ह्यूग्स ने 59 गेंदों को सामना किया और 10 चौकों की मदद से 45 रन बनाए. बाएं हाथ के इस बल्लेबाज ने भुवनेश्वर और इशांत दोनो की गेंद पर कुछ अच्छे शॉट्स खेले लेकिन पिच के मिज़ाज ने ह्यूग्स को मैदान पर जमने नहीं दिया. पहले दिन के खेल में कुल 98 ओवर गेंदे फेंकी जा चुकी हैं. |
| DATE: 2013-03-22 |
| LABEL: sports |
| [1000] TITLE: कैंसर के बावजूद आक्रामक क्रिकेट बरकरार |
| CONTENT: क्रिकेट विश्व कप 2011 में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी रहे युवराज सिंह को विश्व कप के बाद कैंसर की बीमारी के बारे में पता चला था. इसके बाद युवराज सिंह ने अमरीका में अपना कैंसर का इलाज करवाया. पिछले साल जब कैंसर से लड़ने के बाद क्रिकेट के मैदान पर दोबारा वापसी की तो वो उसी रौ में दिखे और खेल में उनकी आक्रामकता कहीं से भी इतनी गंभीर बीमारी से प्रभावित नहीं दिखी. तीन टेस्ट मैचों में 25 के औसत से और आठ एकदिवसीय मैचों में बीस के औसत से युवराज ने रन बनाए हैं. हालांकि युवराज का ये औसत उनके पहले के प्रदर्शन से कुछ कम है लेकिन इससे उनके हौसले का पता चलता है. इससे पहले टेस्ट क्रिकेट में उनका औसत 34-57 रनों का था और एकदिवसीय मैचों में उन्होंने 36 के औसत से रन बनाए थे. युवराज ने कैंसर से उबरकर एक वर्ष बाद सितम्बर 2012 में न्यूजीलैंड के खिलाफ ट्वेंटी-20 मैच से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी की थी. इस मैच में उन्होंने 34 रन बनाए. युवराज सिंह ने 299 दिनों के लंबे अंतराल के बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी की थी. युवराज सिंह ने अभी तक कुल 280 एक दिवसीय मुक़ाबले खेले हैं जिनमें उन्होंने 8208 रन बनाए हैं. इस दौरान 139 रन उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर रहा है और उन्होंने 13 शतक लगाए हैं. साल 2011 में भारत में हुए एकदिवसीय क्रिकेट विश्व कप में युवराज सिंह ने शानदार प्रदर्शन किया था और मैन ऑफ द टूर्नामेंट बने थे. विश्व कप 2011 में उन्होंने नौ मैचों में कुल 362 रन बनाए थे और 15 विकेट भी लिए थे. युवराज सिंह ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत अक्टूबर 2000 में की थी और केन्या के खिलाफ उन्होंने पहला अंतरराष्ट्रीय वनडे मैच खेला. |
| DATE: 2013-03-19 |
| LABEL: sports |
| [1001] TITLE: वो ख़त.और दादा साहेब फाल्के की मौत |
| CONTENT: भारतीय सिनेमा के जनक कहे जाने वाले धुंडिराज गोविंद फाल्के यानी दादा साहेब फाल्के ने अंतिम बार फ़िल्म बनाने की इच्छा की थी साल 1944 में. वो फ़िल्म बनाने की इजाज़त नहीं मिली और इनकार के उस एक ख़त के बाद फाल्के जीवित नहीं रहे. दादा साहेब फाल्के के जन्मदिवस के मौक़े पर बीबीसी से विशेष बातचीत में फाल्के के नाती चंद्रशेखर पुसालकर ने ये बात साझा की. ये दादा साहेब फाल्के की 144वीं जयंती है. पुसालकर कहते हैं अंतिम बरसों में दादा साहेब अल्ज़ाइमर से जूझ रहे थे. लेकिन उनके बेटे प्रभाकर ने उनसे कहा कि चलिए नई तकनीक से कोई नई फ़िल्म बनाते हैं. उस समय ब्रिटिश राज था और फ़िल्म निर्माण के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था. जनवरी 1944 में दादा साहेब ने लाइसेंस के लिए चिट्ठी लिखी. 14 फ़रवरी 1946 को जवाब आया कि आपको फ़िल्म बनाने की इजाज़त नहीं मिल सकती. उस दिन उन्हें ऐसा सदमा लगा कि दो दिन के भीतर ही वो चल बसे. चंद्रशेखर कहते हैं कि आज जिस सिनेमा की इतनी धमक है उसके जन्मदाता की जब मौत हुई तो अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए भी चंद लोग ही थे और अख़बारों में भी ख़बर चंद लाइनों में सिमटी थी. बातचीत में चंद्रशेखर ने बताया कि उनके परिवार ने काफ़ी प्रयास किया कि दादा साहेब को भारत रत्न दिया जाए पर हुआ कुछ नहीं. वे बताते हैं कि साल 2000-2001 में मैने और कई और फ़िल्म संगठनों ने मिल कर सरकार के सामने ये मांग रखी थी कि दादा साहेब को भारत रत्न दिया जाए. उस प्रस्ताव की कॉपी आज भी मेरे पास है लेकिन उसका कुछ हुआ नहीं. अब भी देर नहीं हुई है. अगर सरकार चाहे तो उन्हें ये सम्मान दिया जा सकता है. चंद्रशेखर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि भारत रत्न उसी के लिए है ना जिसने भारत के लिए कुछ किया हो तो फिर उन्हें क्यों नहीं. ऐसा और क्या सुबूत चाहिए जिसके आधार पर उन्हें ये सम्मान दिया जाएगा. हम पैसे नहीं मांग रहे हैं बस उनके लिए थोड़ा सम्मान ही तो चाहते हैं. पुसालकर इस बात से भी दुःखी महसूस करते हैं कि फाल्के के नाम पर पुरस्कार दिया जाता है पर उनके परिवार को कभी बुलाया नहीं जाता. चंद्रेशेखर फाल्के ख़ानदान की तीसरी पीढ़ी से हैं और परिवार के संघर्ष की दास्तां साझा करते हुए कहते हैं कि दादा साहेब एक कलाकार थे और पैसे की तरफ़ उनका ध्यान कभी था ही नहीं. अंतिम दिनों में वो ख़ाली हाथ थे. चंद्रशेखर ने बताया हमारे परिवार में तो दूसरी पीढ़ी में ही पढ़ाई लिखाई को लेकर ही समस्या पैदा हो गई. कोई किसी पेशे में गया कोई किसी पेशे में. तीसरी पीढ़ी में जिसमें हम लोग हैं कोई भी फ़िल्मों में नहीं गया. शायद इस वजह से लोगों को पता ही नही है कि हम कौन हैं. फाल्के परिवार के प्रति फ़िल्म उद्योग के रवैये की बात छिड़ने पर चंद्रशेखर कहते हैं मैं ये नहीं कह सकता कि फ़िल्म उद्योग बेपरवाह रहा है. सुनील दत्त साहब ने हमारी काफ़ी मदद की. मेरी मां जब अल्ज़ाइमर और कैंसर से जूझ रही थी तो वो घर आए थे. आर्थिक मदद की. उनकी वजह से मां को तीन साल तक पेंशन भी मिली. ऐसा कौन करता है. यश चोपड़ा साहब ने मुझे अपने दफ़्तर बुलाकर चेक दिया था और कहा कि किसी से ना कहना. चंद्रशेखर कहते हैं कि आज दुनिया भर में हिंदी फ़िल्मों के जो चाहने वाले हैं वो सिर्फ़ फाल्के की वजह से ही है. दादा साहेब के लिए वो सिर्फ़ सम्मान चाहते हैं उनकी याद में उनकी प्रतिमा पर हर साल श्रद्धांजलि दी जाती रहे बस इतनी ही इच्छा है. चंद्रशेखर बताते हैं कि फाल्के लंदन से फ़िल्म बनाने की तकनीक तो सीख आए लेकिन पहली फ़ीचर फ़िल्म राजा हरिश्चंद्र बनाना अपने आप में एक बड़ा संघर्ष था. फाल्के की पत्नी सरस्वती बाई ने अपने गहने गिरवी रखकर पैसे जुटाने में मदद की. पुरूष अभिनेता भी मिल गए लेकिन तारामती का किरदार निभाने के लिए कोई अभिनेत्री नहीं मिल रही थी. चंद्रशेखर कहते हैं वो मुंबई के रेड लाइट एरिया में भी गए. वहां पर औरतों ने उनसे पूछा कि कितने पैसे मिलेंगे. उनका जवाब सुनकर उन्होंने कहा कि जितने आप दे रहे हो उतने तो हम एक रात में कमाते हैं. एक दिन वो होटल में चाय पी रहे थे तो वहां काम करने वाले एक गोरे-पतले लड़के को देखकर उन्होंने सोचा कि इसे लड़की का किरदार दिया जा सकता है. उसका नाम सालुंके था . फिर उसने तारामती का किरदार निभाया. हालांकि संघर्ष की ये दास्तां ख़त्म नहीं हुई. चंद्रशेखर बताते हैं कालिया-मर्दन लंका-दहन जैसी फ़िल्में काफ़ी सफल रही. पैसे तो आए लेकिन व्यावसायिक फ़ायदों की चाहत में फ़िल्मों में ऐसे लोग आते चले गए जिन्हें सिर्फ़ पैसे में दिलचस्पी थी कला में नहीं. फ़िल्मों में आवा़ज़ आने के साथ ही दादा साहेब की दिक्क़तें बढ़ती चली गईं. बीच में वो बनारस चले गए फिर वापिस आए भी थे लेकिन वो सफलता नहीं दोहरा पाए. अंतिम दिनों में एक रिपोर्टर ने फाल्के पर कुछ रिपोर्ट करने के लिए संपर्क किया तो उन्होने इनकार करते हुए कहा कि जब फ़िल्म उद्योग ने उन्हें भुला दिया तो इस सबकी क्या ज़रूरत है. |
| DATE: 2014-04-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1002] TITLE: रणवीर सिंह और प्रियंका चोपड़ा बनेंगे 'भाई बहन' |
| CONTENT: इस साल के ऑस्कर समारोह पर एलेन डीजेनरस के सेल्फ़ी ने रिकॉर्ड तोड़ रीट्वीट बटोरे लेकिन आईफ़ा समारोह के दौरान सेल्फ़ी की तर्ज़ पर एक और शब्द ने जन्म ले लिया. अमरीका में हुए आईफा अवॉर्ड्स में बॉलीवुड ने बेल्फ़ी का इजाद किया. बेल्फ़ी मतलब अपने फ़ोन से अपने बट यानी कूल्हों का फ़ोटो खींचना. मज़ाक के तौर पर आईफ़ा के आख़िरी दिन कई बेल्फ़ी खींचे गए. समारोह के संचालक फ़रहान और शाहिद ने गोविंदा रीतेश और जेनिलिया और बमन ईरानी के साथ बेल्फ़ी खिंचवाया. बॉक्स ऑफ़िस पर 100 करोड़ रुपए कमाने के बाद फिल्म गुंडे की जोड़ी प्रियंका चोपड़ा और रणवीर सिंह अब एक नए अवतार में नज़र आएंगे. पहले तो इस जोड़ी को ज़ोया अख्तर की फिल्म दिल धड़कने दो में भाई-बहन के रूप में देखा जाएगा जिसके बाद रणवीर-प्रियंका संजय लीला भंसाली की फ़िल्म में मियां-बीवी के रोल में नज़र आएंगे. चर्चा इस बात की भी है कि मुक्केबाज़ मेरी कॉम की ज़िंदगी पर बनी फ़िल्म में प्रियंका के काम से संजय लीला भंसाली बहुत प्रभावित हैं और इसीलिए उन्होंने प्रियंका को बाजीराव-मस्तानी का ऑफ़र दिया. चित्रांगदा सिंह और ज्योति रंधावा के अलग होने की अटकलों के बाद उनके तलाक की बातें भी मीडिया में आई हैं. ख़बरें ये भी हैं कि निजी ज़िंदगी की हलचल के अलावा चित्रांगदा का करियर भी कुछ मुश्किल में हैं. पिछली दो फिल्मों देसी बॉयज़ और आई मी और मैं में लीड हीरोइन बनने के बाद फ़िलहाल चित्रांगदा के पास सिर्फ एक ही फिल्म है. ये एक राजनीतिक फिल्म है जिसमें उनके साथ नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी होंगे. तलाक के बाद से चित्रांगदा ने अपने बेटे की जिम्मेदारी भी ले ली है जो अब उनके साथ ही रहेगा. |
| DATE: 2014-04-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1003] TITLE: बच्चों को लेकर शर्मनाक है हमारा रवैया: अमोल गुप्ते |
| CONTENT: बच्चों को लेकर बनाई गई आमिर ख़ान की बेहद चर्चित फ़िल्म तारे ज़मीन पर के क्रिएटिव डायरेक्टर और स्टेनली का डब्बा जैसी प्रशंसित फ़िल्म के निर्देशक अमोल गुप्ते फ़िल्म और टीवी जगत में बच्चों को लेकर लोगों के रवैये से बेहद नाराज़ हैं. बीबीसी से ख़ास बात करते हुए अमोल गुप्ते ने कहा सोचिए किसी रियलिटी टीवी शो में चार साल की बच्ची शीला की जवानी गाने पर नाच रही है और लोग तालियां बजा रहे हैं. कितना अशोभनीय दृश्य होता है लेकिन किसी को परवाह ही नहीं. बेचारे बच्चे अपने मां-बाप के सपनों का वज़न ढोए चले जा रहे हैं. अमोल के मुताबिक़ फ़िल्म और टीवी पर काम करने का लालच देकर बच्चों से उनका बचपन छीना जा रहा है. वो कहते हैं निर्माता बच्चों के मां-बाप को सुनहरे सपने दिखाते हैं कि तुम्हारे बच्चे को स्टार बना देंगे. और फिर उनसे जमकर काम लिया जाता है. पढ़ने और खेलने की उम्र में बेचारे 12-12 घंटे सेट पर काम करते हैं. अमोल ये भी कहते हैं कि फिर बच्चों को उनके कामयाब या नाकाम होने का भी अहसास दिलाया जाता है. ज़रा सोचिए बच्चों के कोमल मन में कितना दबाव पड़ता होगा. अमोल के मुताबिक़ भारत में फ़िल्मों में बच्चों के हितों को देखने वाली कोई संस्था ही नहीं है. उन्होंने कहा कि कई बार उन्होंने सरकार को इस संबध में दखल देने को कहा लेकिन सरकार की तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया. लेकिन अमोल ख़ुद भी तो बच्चों को लेकर बच्चों पर फ़िल्म बनाते हैं. क्या उनकी फ़िल्मों में चाइल्ड लेबर या बाल श्रम नहीं होताइसके जवाब में अमोल ने कहा हम सिर्फ़ शनिवार रविवार और छुट्टी के दिन शूटिंग करते हैं. और बच्चों से दिन में चार-पांच घंटे से ज़्यादा शूटिंग नहीं कराते. उन्होंने बताया कि वो वर्कशॉप लगाते हैं और बच्चों को शूटिंग संबंधी कोई निर्देश नहीं देते. बस बच्चों से स्वाभाविक रहने को कहते हैं और उसी को शूट कर लेते हैं. अमोल गुप्ते निर्देशित फ़िल्म हवा हवाई नौ मई को रिलीज़ हो रही है जिसमें उनके बेटे पार्थो गुप्ते ने अहम भूमिका निभाई है. पार्थो ने फ़िल्म में एक ऐसे लड़के की भूमिका अदा की है जो स्केटिंग का दीवाना है. और अपने सपनों को पूरा करना चाहता है. फ़िल्म में साक़िब सलीम ने पार्थो के कोच की भूमिका निभाई है. इससे पहले अमोल की ही फ़िल्म स्टेनली का डब्बा में भी पार्थो के अभिनय की ज़बरदस्त तारीफ़ हुई थी और उन्हें कई अवॉर्ड मिले थे. अमोल ने बताया स्टेनली का डब्बा के बाद पार्थो के पास कई फ़िल्मों के प्रस्ताव आए. लेकिन जब हम निर्माताओं से कहते कि ये बच्चा सिर्फ़ छुट्टी के दिन काम करेगा और चार-पांच घंटे से ज़्यादा काम नहीं करेगा तो वो भाग जाते. अमोल ने क्या किसी बड़े सितारे को हवा हवाई के लिए अप्रोच नहीं किया. जिसके जवाब में अमोल ने कहा हम अगर आमिर शाहरुख़ या सलमान को लेते तो फ़िल्म की कहानी से फ़ोकस हटकर वो उन स्टार्स पर केंद्रित हो जाती. फ़िल्म की कहानी की भीनी-भीनी प्राकृतिक ख़ुशबू वज़नदार सेंट में बदल जाती. जो हम नहीं चाहते थे. वैसे ख़ुद अमोल बतौर अभिनेता भी कुछ फ़िल्मों में नज़र आ चुके हैं और विशाल भारद्वाज की फ़िल्म कमीने में उनके अभिनय की तारीफ़ हुई थी. फ़िलहाल वो रोहित शेट्टी निर्देशित और अजय देवगन की मुख्य भूमिका वाली फ़िल्म सिंघम-2 में खलनायक की भूमिका में हैं और शूटिंग में व्यस्त हैं. |
| DATE: 2014-04-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1004] TITLE: जॉर्ज क्लूनी ने ब्रितानी गर्लफ्रेंड से सगाई की |
| CONTENT: हॉलीवुड अभिनेता जॉर्ज क्लूनी ने अपनी ब्रितानी गर्लफ्रेंड के साथ सगाई कर आख़िरकार घर बसाने का फ़ैसला कर लिया है. मीडिया ख़बरों के अनुसार हाल में आई फ़िल्म ग्रैविटी के स्टार क्लूनी ने ब्रितानी वकील अमाल अलामुद्दीन के साथ सगाई कर ली है. ख़बरों में कहा गया है कि जॉर्ज क्लूनी क्रॉफोर्ड और एडवर्ड नार्टन के साथ कैलिफोर्निया में एक रात्रिभोज के दौरान अलामुद्दीन एक बड़ी सी अंगूठी पहने दिखीं. 36 वर्षी अलामुद्दीन बेरुत में जन्मी हैं और मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय क़ानून में उनकी विशेषज्ञता है. वो विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज और यूक्रेन की पूर्व प्रधानमंत्री यूलिया तिमोशेंको के मुक़दमा लड़ रही हैं. 52 वर्षीय क्लूनी अलामुद्दीन के साथ न्यूयॉर्क तंजानिया और सेशेल्स में अक्सर एक साथ देखे जाते रहे हैं. फ़िल्म डिसेंडेंट्स स्टार क्लूनी ने इससे पहले अभिनेत्री तालिया बाल्सम से विवाह किया था और शादी टूटने के बाद कहा था कि वो कभी शादी नहीं करेंगे. लिज़ा स्नोडेन स्टेसी कीब्लर और एलिज़ाबेट कैनालिस समेत कई ख़ूबसूरत महिलाओं से क्लूनी का अफ़ेयर रहा है. लेकिन 2012 में उनकी बहन अडेलिया ज़ीड्लर ने कहा था शायद जॉर्ज शादी नहीं करेंगे. उन्होंने तय किया है कि वो अपने परिवार या पेशे में से किसी एक के साथ ही रह सकते हैं. |
| DATE: 2014-04-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1005] TITLE: लोकप्रियता को गंभीरता से नहीं लिया: राजीव खंडेलवाल |
| CONTENT: टेलीविज़न से बड़े पर्दे पर आए राजीव खंडेलवाल का कहना है कि उन्होंने कभी भी टीवी पर मिली अपनी लोकप्रियता को गंभीरता से नहीं लिया और कुछ हटकर काम करने की तलाश में फ़िल्मों का इंतज़ार करते रहे. अक्सर लीक से हटकर बनी फ़िल्मों में नज़र आने वाले राजीव खंडेलवाल इस बार एक और लीक से हटकर बनी फ़िल्म सम्राट एंड कंपनी में नज़र आए जो शुक्रवार को रिलीज़ हुई. इस फ़िल्म में राजीव किरदार निभा रहे हैं एक जासूस का जो हर वो केस सुलझाता है जो कुछ अलग होता है. आख़िर क्या है हर चीज़ में ये हटके वाली बात बीबीसी को बताया ख़ुद राजीव खंडेलवाल ने. उन्होंने कहा मैं भीड़ में गुम नहीं होना चाहता था इसलिए मुख्यधारा से अलग फ़िल्में करता हूं वर्ना मसाला फ़िल्मों के ढ़ेरो ऑफ़र मिलते हैं मुझे. राजीव ने बताया की इस तरह का सिनेमा करने की प्रेरणा उन्हें इंडस्ट्री के सीनियर कलाकारों से मिलती है. वो कहते हैं मुझे इंडस्ट्री के बड़े-बड़े कलाकारों ने कहा है कि जो काम तुम कर रहे हो वही करो ये तुम्हारे लिए अच्छा है और इसी से तुम्हें अलग पहचान मिलेगी. कम से कम तुम नकल तो नहीं कर रहे हो. राजीव से ये पूछे जाने पर कि बॉलीवुड में वो अपने साथी कलाकारों से कितना कॉम्पटीशन महसूस करते हैं इस पर उनका जवाब था मैं नहीं मानता कि यहां पर कोई कॉम्पटीशन है. मुक़ाबला रेस में होता है. यहां हम सब अपना अपना काम कर रहे हैं और हर किसी का काम अलग है. अपने आलोचकों के लिए अमिताभ बच्चन का उदाहरण देते हुए वो कहते हैं कई लोगों ने एक वक़्त में अमिताभ को भी चुका हुआ मान लिया था लेकिन वो आज सदी के महानायक हैं. तो किसी को भी चुका नहीं मानना चाहिए. अपने समकालीन कलाकारों में राजीव रणवीर सिंह को प्रतिभाशाली बताते हैं. ये पूछे जाने पर कि टीवी की पृष्ठभूमि से आने से क्या फ़िल्मों की राह आसान होती है राजीव ने कहा मेरे समय में ये मुश्किल था. निर्देशक टीवी कलाकारों को आसानी से रोल नहीं देते थे. मुझसे पहले सिर्फ़ शाहरुख़ ही एक बड़े टीवी कलाकार थे जो फ़िल्मों में चले. लेकिन अब ऐसा नहीं है. दोनों ही माध्यम एक दूसरे के लिए खुल गए हैं. राजीव ने माना कि आज भी टीवी के लिए उनका प्यार ज़िंदा है लेकिन फ़िलहाल वो अपना पूरा समय फ़िल्मों को देना चाहते हैं. राजीव हमेशा थ्रिलर या सस्पेंस फ़िल्में करना पसंद करते हैं. क्या उन्हें आम मसाला फ़िल्मों से परहेज है. इस पर राजीव हंसते हुए कहते हैं ऐसा नहीं है कि मैं किसी फ़िल्म से परहेज़ रखता हूं. बस मैं वो घिसा पिटा काम करना नहीं चाहता. मैं वो फ़िल्में चाहता हूं जिन्हें समझना पड़े. जो दर्शक को बांधे और सोचने पर मजबूर करे. जिसमें धैर्य की ज़रूरत हो. पहले ऐसी फ़िल्में कम बनती थी. अब ऐसी फ़िल्मों की तादाद भी अच्छी ख़ासी है. कुल मिलाकर अब विकल्प भी ज़्यादा हो गए हैं. तो क्या मसाला फ़िल्में वो कभी काम नहीं करेंगे. ये पूछने पर राजीव ने बात ख़त्म करते हुए कहा मैं जब तक अपनी फ़िल्में और रोल ख़ुद चुनने की हालत में हूं तब तक तो ऐसा ही करूंगा. लेकिन अगर कभी ऐसा हुआ कि हालात तंग हो गए या मजबूरी में आ गया तो आप मुझे भी फ़ार्मूला फ़िल्म करते पाएंगे. |
| DATE: 2014-04-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1006] TITLE: सोनम कपूर को कंगना का 'करारा जवाब' |
| CONTENT: अभिनेत्री कंगना रानाउत ने सोनम कपूर को उस बात के लिए करारा जवाब दिया है जो उन्होंने करण जौहर के चैट शो कॉफ़ी विद करण में कही थी. सोनम ने कहा था अगर आप अच्छे नहीं लगते हो साधारण लगते हो तो आपको अच्छा कलाकार मान लिया जाता है. लोगों को ये समझना चाहिए कि सिर्फ़ साधारण दिखना और ज़ोर-ज़ोर से बड़ी-बड़ी बातें करना का मतलब ये नहीं कि आप अच्छे एक्टर हो. कंगना रानाउत ने हालांकि सोनम कपूर वाला कॉफ़ी विद करण का ये एपिसोड देखा नहीं लेकिन फिर भी उन्होंने सोनम को जवाब देते हुए कथित तौर पर कहा मैंने सुना है कि सोनम कपूर ने कहा कि जो लोग अच्छी एक्टिंग करते हैं वो बदसूरत होते हैं. तो उनके हिसाब से मैं बॉलीवुड की सबसे बदसूरत अभिनेत्री होनी चाहिए. क्योंकि क्वीन के बाद मेरे अभिनय की ज़बरदस्त तारीफ़ हो रही है. तो अगर सोनम के हिसाब से मैं बदसूरत अभिनेत्री हूं तो मैं ये ख़िताब विनम्रता से स्वीकार करती हूं. कंगना के मुताबिक़ अब फ़िल्मों में असल चेहरों के दिखने का वक़्त आ गया है और सोनम कपूर को समझना चाहिए कि कलाकार का काम अभिनय करना होता है मॉडलिंग करना नहीं. रजनीकांत की आने वाली फ़िल्म में सोनाक्षी सिन्हा रेट्रो अवतार में दिखेंगी. इस फ़िल्म में रजनीकांत डबल रोल में होंगे. एक रोल में वो एक राजसी परिवार से ताल्लुक रखने वाले व्यक्ति का किरदार अदा करेंगे जो राजगद्दी संभालता है और दूसरा किरदार उसके पोते का है. फ़िल्म में सोनाक्षी सिन्हा के अलावा दक्षिण भारतीय फ़िल्मों की मशहूर अभिनेत्री अनुष्का शेट्टी भी होंगी. सोनाक्षी फ़िल्म में 40 के दशक की दक्षिण भारतीय सुंदरी का किरदार निभाएंगी. शेखर कपूर की बहुचर्चित फ़िल्म पानी की चर्चा कई सालों से हो रही है लेकिन अब तक इसके बारे में कोई पुख़्ता ख़बर नहीं मिल पाई है. अब ताज़ा अटकलें ये लग रही हैं कि इसमें हॉलीवुड स्टार जॉन ट्रवोल्टा हो सकते हैं. हाल ही में अमरीका के टैंपा बे में हुए आईफ़ा समारोह में जॉन ट्रवोल्टा भी शामिल हुए और उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में इस बात के साफ़ संकेत दिए कि वो पानी का हिस्सा बन सकते हैं. इस फ़िल्म में सुशांत सिंह राजपूत भी होंगे. |
| DATE: 2014-04-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1007] TITLE: 'जय हो' के साथ स्टार प्लस ने बनाया रिकॉर्ड |
| CONTENT: पिछले हफ़्ते स्टार प्लस ने काफ़ी अंतराल के बाद फिर से एक नया रिकॉर्ड बनाया. पिछले हफ़्ते स्टार प्लस ने 4-3 करोड़ जीवीएस यानी ग्रॉस टीवी व्यूअरशिप अंक प्राप्त किए और इसका श्रेय जाता है सलमान ख़ान की फ़िल्म जय हो को. यह पिछले साल बॉक्स ऑफिस पर कोई खास कमाल नहीं दिखा पाई थी लेकिन वही फ़िल्म जब स्टार प्लस चैनल पर दिखाई गई तो फिल्म को अच्छी व्यूअरशिप मिली. दिया और बाती हम शो ने भी पिछले हफ़्ते कमाल कर दिखाया और रहा पहले नंबर पर. आखिर संध्या राठी बन ही गईं आईपीएस ऑफिसर. 11 महीने के कठिन परिश्रम के बाद और बहुत सारी चुनौतियों को पीछे छोड़कर संध्या ने असंभव को संभव किया और बेस्ट कैडेट की ट्रॉफी भी जीती. अभी देखना ये है कि संध्या इसके साथ एक बहू और पुलिस अफसर की भूमिका कैसे निभाती हैं और अपनी भागो को वो कैसे खुश रख पाती हैं जोधा-अकबर इस हफ़्ते फिर से दूसरे स्थान पर रहा. हालांकि बताते हैं कि कैमरे के पीछे शो में बहुत सारी घटनाएं घट रही हैं. एक्ट्रेस परिधि शर्मा और डायरेक्टर संतराम वर्मा के बीच ज़बरदस्त अनबन चल रही है. आशा करते हैं इसका प्रभाव शो पर न पड़े. हालांकि रजत टोकस जो सम्राट अकबर का रोल निभा रहे हैं उनकी इस महीने अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड के साथ सगाई हो गई है. दोनों अगले साल शादी करेंगे. टीआरपी में तीसरे स्थान पर है साथ निभाना साथिया. कोकिला बेन की याददाश्त अभी तक वापस नहीं आई और उम्मीद यही करते हैं कि जल्दी वापस आएगी उनकी याददाश्त. फ़िलहाल गोपी और अहम की तैयारी भी जारी है. कपिल शर्मा और उनका परिवार इस हफ़्ते चौथे स्थान पर है. दूसरी तरफ़ सुनील ग्रोवर का सिग्नेचर शो मैड इन इंडिया ऑफ एयर जाने वाला है. इसके बाद क्या सुनील ग्रोवर यानी गुत्थी लौटेंगी कपिल के शो पर ये तो वक्त ही बताएगा. ऑन एयर आने के बाद पहली बार महाभारत शो के रेस में पांचवी पोज़ीशन पर आया और उसका पूरा श्रेय जाता है द्रौपदी के चीरहरण को. करीब एक महीने तक इस एपिसोड को शूट किया गया और इसमें बहुत सारे एक्ट्राज़ ने काम किया है. द्रौपदी के रोल को मॉडल और एक्ट्रेस पूजा शर्मा ने बहुत बेहतरीन तरीके से निभाया. महाभारत अगले हफ्ते भी अपना स्थान कायम रख पाएगी इसके लिए हमें इंतज़ार करना पड़ेगा. चैनल्स की जंग में स्टार प्लस नंबर एक पर रहा ज़ी रहा दूसरे नंबर पर और कलर्स रहा नंबर तीन पर. |
| DATE: 2014-04-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1008] TITLE: हम कलाकार थे, बॉडी बिल्डर नहीं: गोविंदा |
| CONTENT: अभिनेता गोविंदा हैरान हैं मौजूदा दौर के कलाकारों की कड़ी मेहनत से. अमरीका के टैंपा बे में हुए आइफ़ा समारोह में गोविंदा भी पहुंचे और मीडिया से मुख़ातिब होते हुए उन्होंने कहा अच्छा लगता है जब आज भी लोग मेरा काम पसंद करते हैं. लेकिन इस दौर के कलाकारों की बात करें तो मैं उन्हें बेहद मेहनती पाता हूं. उनमें से कई बहुत धनी परिवार से आए हैं लेकिन मेहनत करने में वो ज़रा भी कोताही नहीं बरतते. 50 वर्षीय गोविंदा क़रीब 180 फ़िल्मों में काम कर चुके हैं. वो मानते हैं कि जब उन्होंने करियर शुरू किया तो उस दौर में कलाकारों को सिर्फ़ अभिनय पर ही ध्यान देना होता था. रणवीर सिंह वरुण धवन और दूसरे युवा कलाकार कितनी मेहनत करते हैं. हमने कभी इतनी मेहनत नहीं की. हमारे दौर में हम सिर्फ़ कलाकार थे. बॉडी बिल्डर नहीं. लेकिन इस दौर के कलाकारों को देखिए. क्या कमाल का शरीर है. क्या फ़िटनेस है. गोविंदा ने कुली नंबर 1 हीरो नंबर 1 आंखे दुल्हे राजा समेत कई हिट कॉमेडी फ़िल्में दी हैं. मौजूदा दौर में क्या सुपरकूल हैं हम और ग्रैंड मस्ती जैसी सेक्स कॉमेडी पर उनकी क्या राय है क्या वो ख़ुद कभी ऐसी फ़िल्में करेंगे इसके जवाब में गोविंदा ने कहा मुझे अपनी पत्नी सुनीता से पूछना पड़ेगा. लेकिन मैं हर तरह की फ़िल्मों को लेकर खुला हूं. मेरा मक़सद है लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाना. कॉमेडी कॉमेडी होती है. गोविंदा ने 90 के दशक में कई सुपरहिट फ़िल्में दीं. वो काफी कामयाब हीरो रहे हैं लेकिन कभी उन्हें नंबर एक का दावेदार नहीं माना गया. इसके जवाब में वो कहते हैं मेरा नंबर गेम में कभी विश्वास ही नहीं रहा. एक कलाकार को हमेशा ईमानदारी से अपना काम करते रहना चाहिए. मैं इतने साल से इंडस्ट्री में हूं यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है. अब मेरी बेटी और बेटा भी फ़िल्मों में आने वाले हैं. उम्मीद करता हूं कि जो प्यार मुझे मिला वही उन्हें भी मिलेगा. |
| DATE: 2014-04-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1009] TITLE: बिना ग्लिसरीन के ही रो पड़ती थी : मौसमी चटर्जी |
| CONTENT: 16 साल में मौसम चटर्जी की अपने करियर की शुरुआत बांग्ला फ़िल्म बालिका बधु से और उसके बाद इन्होनें पहली हिंदी फिल्म की अनुराग साल 1972 में. मौसमी चटर्जी आज पूरे 66 साल की हो गई हैं. उनका जन्म कोलकाता में हुआ और वो वहीं पली बढ़ीं. उन्होंने कई बेहतरीन फ़िल्में की हैं जैसे अंगूर मंज़िल और रोटी कपड़ा और मकान. उन्होंने राजेश खन्ना शशि कपूर जीतेंद्र संजीव कुमार विनोद मेहरा और अमिताभ बच्चन जैसे बेहतरीन कलाकारों के साथ काम किया है. आजकल मौसमी चटर्जी कोलकाता में रह रहीं हैं. उनके जन्मदिन पर बीबीसी ने की उनसे ख़ास बातचीत. मौसमी चटर्जी के बारे में कहा जाता था कि वो रोने वाले दृश्य बड़े ही सरलता के साथ कर लेती थीं और इसके लिए उन्हें ग्लीसरीन की भी ज़रूरत नहीं पड़ती थी. जब हमने ये सवाल मौसमी से पुछा तो वो मुस्कुराती हुई बोलीं हां ये सच है. ये भी ऊपरवाले का दिया हुआ एक वरदान है. वो आगे कहती हैं जब किसी दृश्य में मुझे रोना होता था तो मैं सोचती थी कि ये मेरे साथ सच में हो रहा है और मैं रो पड़ती थी. मौसमी चटर्जी बहुत ही मशहूर अभिनेत्री थीं. फैंस इन्हें हर जगह घेरे रखते थे. पर जैसे आजकल कई फैंस अभिनेत्रियों के पीछा करते हैं उन्हें तंग करते हैं क्या ऐसा कोई वाक़या हुआ मौसमी चटर्जी के साथइस पर मौसमी ने कहानहीं मुझे कभी भी मेरे फैंस से कोई बुरा बर्ताव देखने को नहीं मिला. मैं जहां भी गई लोगों ने मुझे बहुत प्यार दिया मेरा बहुत सम्मान किया. वो आगे कहती हैं मैं समझती हूं कि मैंने जितने भी किरदार निभाए वो सब बड़े घरेलू थे और इसी वजह से मुझे लोगों से काफी प्यार मिलता था. सही बताऊं तो मैंने बहुत ज़ल्दी काफ़ी गंभीर किरदार निभाने शुरू कर दिए क्योंकि मुझे एक्सपोज़ करना पसंद नहीं था. मौसमी चटर्जी ने बिग बी अमिताभ बच्चन के साथ मंज़िल फ़िल्म में काम किया और उस वक़्त अमिताभ बच्चन अपने करियर के शुरुआती दौर में थे. पर क्या मौसमी को ये पता था कि अमिताभ बच्चन इतने बड़े सुपरस्टार बन जाएंगेइस सवाल के जवाब में मौसमी बोलींमैंने कभी सोचा नहीं था किसी के बारे में भी क्योंकि मैं ख़ुद भी काफ़ी मशग़ूल रहती थी. पर अमिताभ बच्चन ने काफी मेहनत की है बिग बी बनने के लिए. उन्हें बहुत सारा स्ट्रगल करना पड़ा उस जगह पर पुहंचने के लिए जहां वो आज हैं और ऐसे लोगों के परिवार वालों को भी काफ़ी स्ट्रगल से गुज़रना पड़ता है. वो कहती हैं मैं अमिताभ बच्चन की सफलता का श्रेय जया बच्चन को भी देना चाहूंगी क्योंकि वो भी फ़िल्म इंडस्ट्री में काम कर रही थीं. अमिताभ बच्चन एक पारिवारिक आदमी भी हैं और जया बच्चन ने उनके परिवार को काफ़ी अच्छे से संभाल रखा है. मौसमी चटर्जी आजकल बंगाली फ़िल्में कर रही हैं और वो बॉलीवुड फ़िल्म भी करने को तैयार हैं बशर्ते उनके पास एक अच्छी स्क्रिप्ट आए. |
| DATE: 2014-04-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1010] TITLE: फ़िल्म रिव्यू: 'कांची' का जादू चला या नहीं |
| CONTENT: मुक्ता आर्ट्स की कांची कहानी है एक ख़ूबसूरत लड़की कांची की जो उत्तराखंड के एक छोटे से गांव में रहती है. वो एक तेज तर्रार लेकिन दिल की सच्ची है और गांव के ही एक लड़के बिंदा से प्यार करती है. श्याम ककड़ा मिथुन चक्रवर्ती और झूमर ककड़ा ऋषि कपूर राजनेता हैं जो मुंबई में रहते हैं. उनकी नज़र कांची के गांव पर पड़ती है. वो वहां औद्योगिकरण करना चाहते हैं और इसके लिए वो उस गांव के निवासियों को वहां से विस्थापित करना चाहते हैं. श्याम ककड़ा अपने बेटे सुशांत ऋषभ सिन्हा को इसके लिए गांव भेजता है. ऋषभ कांची से दोस्ती कर लेता है. वो कांची से प्यार करने लगता है और उससे शादी करना चाहता है. लेकिन कांची को जब ये पता लगता है तो वो उससे दूर चली जाती है. जल्द ही कांची और बिंदा की शादी तय हो जाती है. लेकिन सुशांत बिंदा की हत्या कर देता है ताकि वो ख़ुद कांची को पा सके. उसके धनवान होने की वजह से पुलिस भी उससे मिल जाती है और बिंदा के हत्या के केस की फ़ाइल बंद कर दी जाती है. लेकिन कांची बिंदा के हत्यारों को किसी क़ीमत पर नहीं छोड़ना चाहती. वो ककड़ा परिवार से बदला लेने के लिए मुंबई रवाना हो जाती है. वो मुंबई में सिर्फ़ एक ही शख़्स को जानती है जिसका नाम है बगुला चंदन रॉय सान्याल. बगुला उसी के गांव का रहने वाला होता है और एक पुलिस अफ़सर होता है. लेकिन वो भी ककड़ा परिवार का एक तरह से ग़ुलाम होता है. आगे क्या होता है. क्या कांची अपने मक़सद में कामयाब होती है. बदला लेने के लिए उसे क्या करना पड़ता है. यही फ़िल्म की कहानी है. सुभाष घई की इस कहानी में कुछ नयापन नहीं है. उन्होंने वही पुराना फॉर्मूला इस्तेमाल किया है जिसमें धनी और ताकतवर लोग एक कमज़ोर लड़की को सताते हैं. स्क्रीनप्ले में भी कुछ मौलिक नहीं है लेकिन हां किरदारों का चरित्र चित्रण थोड़ा अलग तरीके से किया गया है. कांची और बिंदा की प्रेम कहानी प्यारी है और लोगों को वो पसंद आएगी. इस वजह से दर्शक कांची के किरदार से जुड़ाव महसूस करते हैं और चाहते हैं कि वो ककड़ा परिवार से बदला लेने में कामयाब हो. कई जगह ड्रामा बोझिल सा लगता है लेकिन कुल मिलाकर कहानी में गति बनी रहती है. फ़िल्म के कुछ दृश्य बड़े असरदार हैं. जैसे बिंदा की हत्या वाला सीन और कांची का गुस्से में अपने परिवार को छोड़कर मुंबई आने वाला सीन. साथ ही वो दृश्य जिसमें ककड़ा परिवार के गुंडे कांची का पीछा करते है. सुभाष घई के लिखे संवाद सरल हैं लेकिन युवाओं को अपील करेंगे. कांची के किरदार में मिश्टी ने बॉलीवुड करियर की शानदार शुरुआत की है. वो बहुत ख़ूबसूरत लगी हैं कैमरे के सामने आत्मविश्वास से भरी हुई लगती हैं और अभिनय भी अच्छा किया है. छोटे से रोल में कार्तिक आर्यन भी अच्छे हैं. सुशांत के किरदार को ऋषभ सिन्हा ने प्रभावी तरीके से निभाया है. ऋषि कपूर अपने रोल में जमे हैं. ख़ासतौर से इंटरवल के बाद वाले उनके कुछ सींस कमाल के हैं. मिथुन चक्रवर्ती ने भी अपने रोल में अपनी छाप छोड़ी है. बाकी कलाकार भी अच्छे हैं. सुभाष घई का निर्देशन ठीक है. कई जगह फ़िल्म दिलचस्प बन पड़ी है. हालांकि फ़िल्म का कोई भी गाना चार्टबस्टर नहीं बन पाया है जो कि फ़िल्म की एक बड़ी कमी है क्योंकि सुभाष घई की फ़िल्में बेहतरीन संगीत के लिए जानी जाती हैं. फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफ़ी बेहतरीन है. सुधीर के चौधरी ने नैनीताल और उत्तराखंड की ख़ूबसूरती को शानदार तरीके से कैमरे में क़ैद किया है. कुल मिलाकर कांची एक ठीक-ठाक फ़िल्म है लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर इसे बड़ा धीमा स्टार्ट मिला है जिसके आगे ठीक होने की कोई संभावना नहीं दिखती क्योंकि फ़िल्म में ना तो कोई बड़ा स्टार है ना ही फ़िल्म के गानों में दम है और ना ही फ़िल्म की कहानी मौलिक है. |
| DATE: 2014-04-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1011] TITLE: लग पाएगा 'रिवॉल्वर रानी' का निशाना? |
| CONTENT: पोंटी चड्ढा मूविंग पिक्चर्स तिग्मांशु धूलिया और क्राउचिंग टाइगर प्रोडक्शन की रिवॉल्वर रानी कहानी है एक तेज़ तर्रार और आपराधिक छवि वाली अलका सिंह कंगना रानाउत की जो चंबल इलाक़े में रहती है. वो अपने दुश्मनों को छोड़ती नहीं और बात-बात पर गोलियां चला देती है. परिवार के नाम पर उसके सिर्फ़ एक मामा पीयूष मिश्रा होते हैं. वो बेवफ़ाई की वजह से अपने पति की हत्या कर देती है. चंबल इलाक़े से एक भ्रष्ट राजनेता उदय भान सिंह ज़ाकिर हुसैन चुनाव जीत जाता है. अलका सिंह विपक्षी नेता होती है और वो उदय भान सिंह का भंडा फोड़ करना चाहती है. इस बीच अलका की मुलाक़ात रोहन कपूर वीर दास से होती है जो फ़िल्मों में हीरो बनने के लिए संघर्षरत है. वो रोहन से प्यार कर बैठती है और उसका साथ पाकर अपना अकेलापन भूलने लगती है. लेकिन रोहन सिर्फ़ उसके साथ इसलिए रहता है क्योंकि अलका उसके लिए एक फ़िल्म बनाने का वादा करती है. रोहन निशा डीना उप्पल नाम की एक दूसरी लड़की से प्यार करता है. हालांकि अलका को उस पर कई बार शक हो जाता है लेकिन वो किसी ना किसी तरीके से झूठ बोलकर बचता रहता है. फिर एक दफ़ा अलका के मामा की योजना से उदय भान सिंह की कारगुज़ारियां एक टीवी चैनल पर सामने आ जाती हैं जिसकी वजह से उसे इस्तीफ़ा देना पड़ता है. फिर से उपचुनाव की घोषणा हो जाती है और इस बार अलका के मामा को लगता है कि वो चुनाव जीत जाएगी. इन्हीं तैयारियों के बीच पता लगता है कि अलका गर्भवती है. अलका के मामा चाहते हैं कि वो गर्भपात करा ले क्योंकि अगर वो ऐसा नहीं करती तो उसके चुनाव जीतने की संभावनाएं ख़त्म हो जाएंगी. आगे क्या होता है क्या अलका अपने मामा की बात मान लेती है. क्या उसका और रोहन का मिलन हो पाता है. क्या वो चुनाव जीत पाती है. उदय भान सिंह आगे क्या गुल खिलाता है. यही फ़िल्म की कहानी है. एक तेज़ तर्रार आपराधिक लड़की को केंद्र बनाकर लिखी साई कबीर की ये कहानी अच्छी और काफ़ी हट कर है. लेकिन उन्हीं के लिखे स्क्रीनप्ले में वो बात नहीं है. इसमें स्थिरता और निरंतरता का अभाव है. हालांकि फ़िल्म के कुछ हिस्से मनोरंजक है लेकिन बाक़ी हिस्से बोर और खींचे गए लगते हैं. कहानी की सबसे बड़ी कमी ये है कि निर्देशक साई कबीर अलका और उसके मामा के बीच मतभेद की प्रभावशाली तरीक़े से नहीं दिखा पाए हैं. इंटरवल से पहले और बाद वाले हिस्से में कुछ अच्छे और मनोरंजक दृश्य हैं. लेकिन पूरी फ़िल्म के बारे में ये बात नहीं कही जा सकती. वीर दास के किरदार के ज़रिए फ़िल्म में हास्य उत्पन्न करने की अच्छी कोशिश है. दर्शकों को ये पसंद आएगा. टीवी न्यूज़ एंकर पायल परिहार मिश्का का ट्रैक बहुत मज़ेदार है. लोगों का इससे अच्छा मनोरंजन होगा. साई कबीर के लिखे संवाद फ़िल्म की कहानी के अनुरूप हैं और अच्छा प्रभाव छोड़ते हैं. कंगना रानाउत ने अलका सिंह के केंद्रीय पात्र में जान डाल दी है. उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ ये रोल निभाया है. इस फ़िल्म के बाद उनके और प्रशंसक बढ़ जाएंगे. कंगना के मामा की भूमिका में पीयूष मिश्रा ज़बरदस्त रहे हैं. अलका के मास्टरमाइंड की भूमिका उन्होंने इतने बेहतरीन तरीके से निभाई है कि दर्शकों में वो छा जाएंगे. उदय भान सिंह के किरदार में ज़ाकिर हुसैन भी बढ़िया रहे हैं. न्यूज़ एंकर के रोल में मिश्का ने अच्छा काम किया है. फ़िल्म में उनका हर न्यूज़ बुलेटिन ख़त्म करने का ख़ास अंदाज़ लोगों को भा जाएगा. बाक़ी कलाकार भी अच्छे हैं. साई कबीर ने ठीक-ठाक निर्देशन किया है. स्क्रीनप्ले में कमी होने के बावजूद उन्होंने कुछ अच्छे दृश्य रचे हैं जो दर्शकों का मनोरंजन करेंगे. लेकिन फ़िल्म में ज़बरदस्त हिंसा और ख़ून-ख़राबे की वजह से ये पूरे परिवार के साथ देखने योग्य फ़िल्म नहीं बन पाई है. महिला दर्शकों को शायद फ़िल्म उतनी पसंद ना आए. फ़िल्म का टाइटल ट्रैक मशहूर हो चुका है. कुल मिलाकर रिवॉल्वर रानी कुछ पार्ट्स में ही मनोरंजक बन पाई है. बॉक्स ऑफ़िस पर इसका चलना मुश्किल ही लग रहा है. |
| DATE: 2014-04-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1012] TITLE: सोशल मीडिया पर छाया रणवीर का कंडोम विज्ञापन |
| CONTENT: बॉलीवुड के इतिहास में शायद ही किसी लीडिंग हीरो ने कभी कंडोम का विज्ञापन किया हो लेकिन रणवीर सिंह ने इस परंपरा को तोड़ते हुए एक कंडोम का विज्ञापन किया. उनके इस विज्ञापन का वीडियो यूट्यूब पर जारी होते ही सोशल मीडिया पर इसकी ज़बरदस्त चर्चा होने लगी. कुछ ने इसे बेहतरीन बताया तो वहीं कुछ लोगों ने इसे बकवास क़रार दिया. हालांकि यूट्यूब पर इसे काफ़ी लोग देख रहे हैं और 24 घंटे के अंदर इसे एक लाख से ज़्यादा हिट्स मिल चुके हैं. रणवीर सिंह का कहना है कि सुरक्षित सेक्स के संदेश को बढ़ावा देने के लिए इस तरह के विज्ञापन करने ज़रूरी हैं. उन्होंने कहा कि वो भी हर वक़्त अपने पर्स में कंडोम रखते हैं. चुनाव आयोग के तमाम प्रयासों और संदेशों के बावजूद मुंबई में गुरुवार को हुए लोकसभा चुनाव में महज़ 53 फ़ीसदी मतदान हुआ. जहां अमिताभ बच्चन समेत उनके पूरे परिवार शाहरुख़ ख़ान रणबीर कपूर प्रीति ज़िंटा समेत कई कलाकारों ने मतदान किया तो वहीं कई दूसरे बड़े सितारे इस दिन ग़ैरहाज़िर रहे. तमाम टीवी चैनलों पर और दूसरे प्लेटफ़ॉर्म्स पर कई सामाजिक मुद्दों पर बेबाक़ी से अपनी राय रखने वाले गीतकार जावेद अख़्तर और उनकी पत्नी अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आज़मी ने भी वोट नहीं डाला. वो दो दिन पहले ही अमरीका के फ़्लोरिडा में हो रहे आईफ़ा समारोह की शोभा बढ़ाने पहुंच गए. इसके अलावा अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने भी मतदान नहीं किया और आईफ़ा पहुंच गई जबकि दीपिका ने पहले ऐलान किया था कि वो वोट डालने के बाद ही आईफ़ा जाएंगी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. इसके अलावा सलमान ख़ान अनिल कपूर सोनाक्षी सिन्हा सैफ़ अली ख़ान माधुरी दीक्षित और ऋतिक रोशन जैसे सितारे भी इस महत्तवपूर्ण दिन मुंबई से गैर हाज़िर रहे और उन्होंने वोट नहीं डाला. |
| DATE: 2014-04-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1013] TITLE: ये सभी नेता एक नंबर के जोकर और कार्टून हैं: कंगना |
| CONTENT: क्वीन की आपार सफलता के बाद फिर से कंगना रानाउत दिखेंगी एक बिल्कुल ही बोल्ड अवतार में. रिवॉल्वर रानी है कंगना रानाउत की नई फ़िल्म का नाम जो शुक्रवार को रिलीज़ हो रही है. फ़िल्म में कंगना एक राजनैतिक पार्टी की नेता बनीं हैं और उनके साथ दिखेंगे कॉमेडियन वीर दास लीड रोल में. फ़िल्म क्वीन के बाद अब कंगना के प्रशंसकों की उम्मीद उनसे बढ़ गई है. मीडिया से इस फ़िल्म के अलावा कंगना ने मौजूदा राजनीतिक दौर की और चुनावों की भी बातें कीं. रिवॉल्वर रानी में कंगना रानाउत का लुक और किरदार काफी चर्चा में हैं. उनके किरदार का नाम है अलका सिंह. पर ये फ़िल्म है क्या और इस किरदार अलका सिंह को खुद के कितना क़रीब पाती हैं कंगनाकंगना ने कहा देखिये ये फ़िल्म एक ट्रेजडी है. इसमें जो निर्देशक साई कबीर श्रीवास्तव की सोच है आधुनिक समाज को लेकर वो काफ़ी हास्यास्पद है. इस फ़िल्म में ये दिखाया गया है कि जिन नेताओं पर हम विश्वास करते हैं उन्हें चुनते हैं फिर उन्हें वो सारे संसाधन मिलते हैं और वो किस तरह उन सारे संसाधनों को निजी तौर पर इस्तेमाल करते हैं. वो आगे कहती हैं अलका एक फ़ैशनेबल नेता है और वो बिल्कुल वैसा ही बर्ताव करती है जैसा असल ज़िंदगी में कई नेता करते हैं. ये राजनेता सब एक नंबर के जोकर और कार्टून हैं और हमारी फ़िल्म इसी बात के इर्द-गिर्द बनी है. रिवॉल्वर रानी कंगना रानाउत की इस साल आने वाली दूसरी फ़िल्म है. इससे पहले कंगना की फ़िल्म आई क्वीन जिसे दर्शकों और समीक्षकों से ख़ूब वाहवाही मिली. तो क्या क्वीन की सफलता से फ़िल्म रिवॉल्वर रानी को कुछ मदद मिल पाएगीइस सवाल पर कंगना बोलीं जब क्वीन रिलीज़ होने वाली थी तब भी हमें कुछ नहीं पता था कि दर्शकों को ये पसंद आएगी या नहीं पर जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो लोगों को पसंद आई. एक बात जो हमें पहले से पता थी वो ये कि क्वीन एक बेहतरीन फ़िल्म है. वो आगे कहती हैं अगर लोगों को क्वीन पसंद न भी आती तब भी वो हमारे लिए एक बेहतरीन फ़िल्म रहती और यही बात मैं रिवॉल्वर रानी के लिए कहना चाहूंगी. लोगों को ये फिल्म पसंद आनी चाहिए. कंगना रानाउत अब तक मिली कामयाबी के बावजूद अपने आपको स्ट्रगलर मानती हैं. उन्होंने कहा मैं एक स्ट्रगलर हूं और मुझे लगता है कि हम सब ज़िंदगी के अलग अलग मुक़ाम पर स्ट्रगल करते हैं. फ़िल्म क्वीन के दौरान भी मैंने काफ़ी स्ट्रगल किया. मैंने ख़ुद अपने डायलॉग लिखे और वो भी मेरे लिए एक स्ट्रगल था क्योंकि आप अपनी सीमा नहीं जानते हैं. |
| DATE: 2014-04-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1014] TITLE: जब जीतेंद्र-हेमा के बीच आ गए धर्मेंद्र |
| CONTENT: आदित्य चोपड़ा और रानी मुखर्जी की शादी की ख़बर लोगों को यशराज बैनर और रानी मुखर्जी द्वारा जारी एक बयान से ही पता लगी. इटली में हुई इस गुपचुप शादी की मीडिया को भनक तक नहीं लगी. स्वभाव से शर्मीले आदित्य और रानी के बीच रोमांस की ख़बरें मीडिया में कई सालों से सुर्खियां बनती रहीं लेकिन दोनों ने कभी भी ये बात नहीं क़बूली. आख़िर इनकी शादी के बाद अब इन ख़बरों पर विराम लग गया. लेकिन ये बॉलीवुड में पहली बार नहीं हुआ है. लोगों और मीडिया की नज़रों से दूर बिना बैंड बाजा बारात के शादियां पहले भी होती रही हैं. वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार जयप्रकाश चौकसे ने ऐसी ही कुछ चुनिंदा शादियों के बारे में बीबीसी को बताया. शम्मी कपूर गीता बाली के प्रेम में आकंठ डूबे थे. शूटिंग ख़त्म होने के बाद दोनों हर शाम सड़क पर घंटो टहला करते थे. एक दिन अचानक दोनों ने शादी करने का फ़ैसला कर लिया. शम्मी ने इस बारे में अपने पिता पृथ्वीराज कपूर और बड़े भाई राज कपूर तक को नहीं बताया. दक्षिण मुंबई स्थित एक मंदिर में दोनों ने सुबह चार बजे ब्याह रचा लिया. पृथ्वीराज कपूर को बाद में राज कपूर ने फ़ोन पर शादी की जानकारी दी. मीडिया को जानकारी दी गीता बाली के सेक्रेट्री सुरेंदर कपूर ने जो बोनी कपूर और अनिल कपूर के पिता थे. सब जानते हैं कि देव आनंद और सुरैया का प्यार शादी के अंजाम तक नहीं पहुंच सका. बहरहाल बाद में देव आनंद ने शादी की तो इस अंदाज़ में कि सब हक्के बक्के रह गए. उन्होंने अपनी फ़िल्म टैक्सी ड्राइवर के सेट पर इसी फ़िल्म में काम कर रही अभिनेत्री कल्पना कार्तिक से शादी कर ली. शूटिंग पर जब लंच ब्रेक हुआ तो उन्होंने फ़ौरन पंडित को बुलाया और कल्पना कार्तिक के साथ सात फेरे ले लिए. इतना ही नहीं शादी होने के चंद घंटों बाद ही देव आनंद वापस शूटिंग करने पहुंच गए. उनकी इस तरह अचानक शादी की ख़बर सुनकर सब मीडिया और प्रशंसक हैरान रह गए. धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की शादी बड़े दिलचस्प अंदाज़ में हुई. दरअसल हेमा मालिनी को धर्मेंद्र के अलावा जीतेंद्र और संजीव कुमार भी बहुत पसंद करते थे और उनसे शादी करना चाहते थे. उस बीच ऐसी भी ख़बरें आ रही थीं कि जीतेंद्र और हेमा मालिनी ने शादी करने का फ़ैसला कर लिया और वो चेन्नई तत्कालीन मद्रास में हैं. उस वक़्त जीतेंद्र का अपनी वर्तमान पत्नी शोभा के साथ भी रोमांस चल रहा था. ये पता लगते ही धर्मेंद्र शोभा को लेकर मद्रास पहुंच गए और वहां शोभा ने कथित तौर पर हंगामा मचा दिया जिससे जीतेंद्र और हेमा की शादी नहीं हो पाई. बाद में धर्मेंद्र ने हेमा मालिनी से शादी की. इसके लिए उन्होंने इस्लाम धर्म अपनाया क्योंकि वो पहले से शादीशुदा थे और हिंदू होने के नाते दूसरी शादी नहीं कर सकते थे. नरगिस और सुनील दत्त की शादी की ख़बर तीन-चार महीने बाद लोगों को पता लगी. दरअसल ये दोनों ही कलाकार महबूब ख़ान की फ़िल्म मदर इंडिया में काम कर रहे थे और उसी के सेट पर दोनों के बीच प्रेम हो गया और उन्होंने शादी रचाने का फ़ैसला कर लिया. लेकिन फ़िल्म में नरगिस सुनील दत्त की मां का रोल निभा रही थीं. ऐसे में महबूब ख़ान ने उन्हें सलाह दी कि फ़िल्म की रिलीज़ के दो-तीन महीने बाद वो शादी करें क्योंकि उनका मानना था कि शादी की ख़बर पता लगने पर उसका फ़िल्म पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा. हालांकि नरगिस और सुनील दत्त ने शादी तो कर ली लेकिन ये बात छिपा के रखी और मदर इंडिया की रिलीज़ के कुछ महीनों बाद ही अपनी शादी को सार्वजनिक किया. इस शादी ने सबको चौंका दिया था. दरअसल श्रीदेवी जब बोनी कपूर की फ़िल्मों में काम करती थीं तो उस दौरान वो मुंबई के एक होटल में रहती थीं. तब बोनी कपूर की पत्नी मोना कपूर ने उन्हें अपने घर में रहने के लिए जगह दी. कुछ सालों बाद जब श्रीदेवी की मां की तबियत ख़राब हुई तो बोनी कपूर अपना सारा काम छोड़कर चेन्नई आए और उनकी मां की ख़ूब देखभाल की. श्रीदेवी की मां की मौत की वजह डॉक्टरों की कथित लापरवाही को बताया गया और तब बोनी ने इस सिलसिले में श्रीदेवी को केस लड़ने में भी बहुत मदद की. इससे श्रीदेवी बहुत प्रभावित हुईं और बाद में दोनों ने शादी करने का फ़ैसला कर लिया. आमिर ख़ान अपनी पहली ही फ़िल्म क़यामत से क़यामत तक से ही स्टार बन गए. उनकी कई महिला प्रशंसक बन गईं लेकिन उन्हें झटका तब लगा जब पता लगा कि आमिर पहले से ही शादीशुदा हैं. आमिर और रीना दत्ता मुंबई में आस-पास ही रहते थे और दोनों ने साल 1986 में ही गुपचुप तरीके से शादी कर ली थी. आमिर के परिवार को शादी से कोई एतराज़ नहीं था लेकिन रीना के परिवार वाले इसके लिए राज़ी ही नहीं थे. बड़ी मुश्किल से आमिर उन्हें मना पाने में सफल रहे. आमिर की शादी में उनके परिवार के अलावा बॉलीवुड से कोई भी शामिल नहीं हुआ. |
| DATE: 2014-04-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1015] TITLE: रणबीर ने अलग रहने के लिए ख़रीदा नया घर! |
| CONTENT: मुंबई के एक अख़बार में छपी ख़बर के मुताबिक़ अभिनेता रणबीर कपूर ने मुंबई के बांद्रा इलाक़े में नया घर ख़रीद लिया है. रणबीर ने अपने रहने के लिए पूरा एक फ़्लोर ख़रीदा है. दरअसल रणबीर के पिता ऋषि कपूर उनकी कटरीना कैफ़ से नज़दीकियों की वजह से कथित तौर पर नाराज़ हैं. इसी वजह से कटरीना के साथ अपनी प्राइवेसी के लिए रणबीर ने ये नया घर लिया है. अभी इस घर में इंटीरियर का काम चल रहा है और रणबीर बहुत जल्द इसमें शिफ़्ट होंगे. आदित्य चोपड़ा और रानी मुखर्जी की शादी के बाद उन्हें बधाई देने का सिलसिला जारी है. रानी के देवर और आदित्य के छोटे भाई उदय चोपड़ा ने ट्वीट किया हम रानी चोपड़ा का परिवार में स्वागत करते हैं. नवदंपत्ति को ढेर सारा प्यार. फ़िल्मकार करण जौहर ने लिखा और आख़िरकार दोनों श्रीमान और श्रीमति चोपड़ा बन ही गए. दोनों को प्यार. रानी मुखर्जी के साथ कई फ़िल्में कर चुके अभिनेता शाहरुख़ ख़ान ने ट्विटर पर लिखा अल्लाह मेरे मित्र रानी और आदि का भला करें. मेरे दोस्तों दुआ है कि तुम छोटी-छोटी बातों का आनंद उठाओ और वो बाद में बड़ी बन जाएं. मेरी तरफ से बहुत-बहुत प्यार. सोनाक्षी सिन्हा अपने फ़िल्मी करियर में मिले एक बेहद बड़े मौक़े को लेकर ज़बरदस्त रोमांचित हैं. सोनाक्षी दक्षिण भारतीय फ़िल्मों के सबसे बड़े स्टार रजनीकांत के साथ जल्द ही शूटिंग शुरू करने वाली हैं. दोनों एक तमिल फ़िल्म में साथ काम करेंगे. फ़िल्म की शूटिंग मई में शुरू होने की संभावना है. सोनाक्षी सिन्हा इस बारे में कहती हैं इंडस्ट्री में बहुत कम लोग इतने ख़ुशनसीब होते हैं कि उन्हें तलाइवा रजनीकांत के साथ काम करने का मौक़ा मिले. दक्षिण भारतीय फ़िल्मों में अगर मेरी शुरुआत हो तो वो ऐसी ही होनी चाहिए थी. मैं रजनी जी के साथ शूटिंग शुरू करने को लेकर बेताब हूं. फ़िल्म का निर्देशन वरिष्ठ फ़िल्मकार के एस रविकुमार करेंगे. |
| DATE: 2014-04-23 |
| LABEL: entertainment |
| [1016] TITLE: अमिताभ: पिक्चर अभी बाक़ी है मेरे दोस्त! |
| CONTENT: अमिताभ बच्चन इन दिनों अपनी फ़िल्म भूतनाथ रिटर्न्स के अच्छे प्रदर्शन का जश्न मना रहे हैं. पहले जहाँ अमिताभ बच्चन की साल में कई फ़िल्में रिलीज़ हो जाती थी लेकिन पिछले कुछ समय से वे कम फ़िल्मों में नज़र आ रहे हैं. क्या समय के साथ उन्होंने काम की रफ़्तार कुछ धीमी कर दी है हाल ही में लंदन से हुई एक वीडियो कॉंफ्रेंसिंग के ज़रिए पूछे गए मेरे इस सवाल का उन्होंने कुछ यूँ जवाब दिया पिछले कुछ समय में मेरी तीन बार सर्जरी हुई है. ठीक होने में मुझे थोड़ा वक़्त लगा. उसके बाद मैने सिर्फ़ टीवी सीरियल के लिए शूट किया. अब तो मैं कई फ़िल्में कर रहा हूँ. और इसके बाद उन्होंने अपनी आने वाली फ़िल्मों की झड़ी लगा दी और बताया भूतनाथ रिटर्न्स रिलीज़ हो गई है. इस महीने के आख़िर में आर बाल्कि की फ़िल्म शुरू कर रहा हूँ जिसमें धनुष भी हैं. इसके बाद शूजित सरकार के साथ काम करूंगा जिसमें दीपिका पादुकोण और इरफ़ान खान हैं. फ़रहान अख़्तर के साथ एक फ़िल्म है. फिर आप मुझे कौन बनेगा करोड़पति में देखेगें. टीवी सीरियल भी आएगा. मुझे लगता कि ये काफ़ी हो जाएगा. जवाब सुनकर ऐसा लगा मानो कह रहे हों कि पिक्चर अभी बाक़ी है मेरे दोस्त. अमिताभ बच्चन उन सितारों में शामिल हैं जिन्होंने फ़ेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के माध्यमों को अपनाया है और उससे पहले ब्लॉग को भी. संपर्क के इन माध्यमों पर वे कहते हैं मुझे ये आइडिया अच्छा लगता है कि मैं लोगों से सीधे बात कर सकता हूँ. पहले हमारे पास मौका नहीं होता था कि हम फैन्स के साथ इस तरह बात कर सकें. ये लोग मेरे काम के बारे में अपनी राय देते हैं. लेकिन सोशल मीडिया के दूसरे पहलू से भी अमिताभ वाकिफ़ हैं. वे कहते हैं आपको इस बात के लिए तैयार रहना पड़ेगा कि सोशल मीडिया पर असहज सवालों का सामना भी करना पड़ेगा. लोग आपकी आलोचना भी करेंगे अपशब्द भी कहेंगे आपको तैयार रहना पड़ेगा. ये पूरा अनुभव काफ़ी दिलचस्प है. ये लोग मेरे बड़े परिवार की तरह हैं. हिंदी फ़िल्मों के मौजूदा दौर को लेकर अमिताभ बच्चन काफ़ी आशावान हैं. उनका कहना है नई पीढ़ी के कलाकार बहुत हुनरमंद और मेहनती हैं. अपनी पहली ही फ़िल्म में वे कैमरे के सामने इतने नेचुरल होते हैं जबकि हमें इसके लिए कई साल लग गए आज भी सहज नहीं हो पाते हैं. मुझे जो काम अच्छा लगता है तो मैं उन्हें लिखता भी हूँ. अमिताभ बच्चन ने हाल ही में हॉलीवुड फ़िल्म द ग्रेट गैट्स्बी में छोटा सा रोल किया था. क्या वे हॉलीवुड में फिर से काम करना चाहेंगे. इस पर अमिताभ का कहना था बहुत से भारतीय कलाकार हॉलीवुड फ़िल्मों में काम करते आए हैं- इरफ़ान खान नसीरुद्दीन शाह ओम पुरी शबाना आज़मी. अगर कोई कहानी लेकर मेरे पास आते है तो मैं इस बारे में ज़रूर सोचूँगा. वैसे उनकी फ़िल्म भूतनाथ रिटर्न्स में उनके कुछ डायलॉग इन दिनों काफ़ी लोकप्रिय हो रहे हैं जिसका ज़िक्र उन्होंने अपने फ़ेबसुक अकाउंट पर भी किया है मसलन- तब बवाल क्यों नहीं मचता है जब ऐसे लोग इलेक्शन में खड़े होते हैं जिनके ऊपर करप्शन का आरोप है गुंडागर्दी का आरोप है मर्डर का आरोप है. मैं तो एक मामूली भूत हूँ. मेरे इलेक्शन में खड़े होने से इतना बवाल क्यों मच रहा है. जब पूरे देश में बात राजनीति और वोटिंग की हो रही है तो अमिताभ ने कहा कि हम सबको सिस्टम का हिस्सा बनकर इसमें सक्रियता से भाग लेना चाहिए. |
| DATE: 2014-04-23 |
| LABEL: entertainment |
| [1017] TITLE: अर्जुन को देखा तो बस देखती ही रह गई: आलिया |
| CONTENT: आलिया भट्ट और अर्जुन कपूर के अभिनय वाली फ़िल्म टू स्टेट्स को दर्शकों की अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है. फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक़ टू स्टेट्स ने चार दिनों में ही भारत में क़रीब 44 करोड़ रुपए कमा लिए. फ़िल्म के सितारों आलिया भट्ट और अर्जुन कपूर ने बीबीसी एशियन नेटवर्क के ख़ास कार्यक्रम लव बॉलीवुड में राज और पाब्लो से ख़ास बात करते हुए अपने फ़िल्म में काम करने के अनुभव को बांटा. अपनी पहली ही फ़िल्म स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर और फिर हाईवे से दर्शकों की वाहवाही पाने वाली आलिया भट्ट ने बताया कि वो जब फ़िल्म के सेट पर अर्जुन कपूर से मिलीं तो उन्हें देखते ही रह गईं. आलिया ने कहा मैं अर्जुन के व्यक्तित्व से प्रभावित हो गई. दरअसल जब मैंने टू स्टेट्स साइन की तब तक इशकज़ादे रिलीज़ हो चुकी थी और स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर रिलीज़ नहीं हुई थी. वो मुझे स्टार जैसे लगे. अर्जुन ने भी अपनी इस को-स्टार के प्रशंसा भरे शब्दों का जवाब उसी लहज़े में देकर हिसाब बराबर कर दिया. जब उनसे पूछा गया कि टू स्टेट्स की सबसे बड़ी ताक़त क्या है तो वो बोले आलिया भट्ट. फ़िल्म टू स्टेट्स एक दक्षिण भारतीय लड़की और पंजाबी लड़के की लव स्टोरी है. असल ज़िंदगी में क्या आलिया को अब तक किसी से प्यार हुआ है. इसके जवाब में आलिया ने कहा जैसे वो होता है ना कमिटेड रिलेशनशिप. उस तरह का प्यार मुझे आज तक नहीं हुआ है. अर्जुन कपूर को किससे प्यार हुआ है. उसके जवाब में वो कहते हैं मैं बचपन से ही सिनेमा का दीवाना हूं. मुझे याद है जब मैं बहुत छोटा था तब राज़माचचावल खाते हुए अपने चाचा अनिल कपूर की फ़िल्म राम-लखन देखा करता था. फ़िल्म में अमृता सिंह ने अर्जुन कपूर की मां का रोल किया है. उनके बारे में आलिया ने कहा वो कमाल की अदाकारा हैं. इतनी सीनियर होने के बावजूद वो हम जैसे युवा कलाकारों से सलाह लेती हैं. हर सीन को करने से पहले वो परेशान होती थीं कि कैसे कर पाऊंगी. लेकिन जैसे ही कैमरा चालू होता तो वो एक ही टेक में कमाल का सीन करतीं. टू स्टेट्स चेतन भगत के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है. अर्जुन कपूर की इसी साल इससे पहले फ़िल्म गुंडे रिलीज़ हुई थी जिसे बॉक्स ऑफ़िस पर मिश्रित प्रतिक्रिया मिली थी. |
| DATE: 2014-04-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1018] TITLE: हो गई रानी की शादी! |
| CONTENT: कथित तौर पर काफ़ी सालों प्रेमी प्रेमिका रहे अभिनेत्री रानी मुखर्जी और यशराज के आदित्य चोपड़ा अब पति पत्नी बन गए हैं. सोमवार को इटली में रानी और आदित्य चोपड़ा ने शादी कर ली. यशराज बैनर्स के एक बयान में रानी मुखर्जी ने कहा मैं अपने ज़िन्दगी का सबसे हसीन दिन अपने सारे फ़ैंस और चाहनेवालों के साथ बांटना चाहती हूं जिनका प्यार और जिनकी दुआएं मेरे साथ हर वक़्त रहा. मैं जानती हूँ की मेरे चाहने वालों को इस बात का बड़े लम्बे समय से बेसब्री से इंतज़ार था. उन्होनें कहा इटली में कुछ क़रीबी लोगों की मौजूदगी में मेरी और आदित्य की शादी हो गई. जिस शख्स को मैंने सबसे ज़्यादा मिस किया वो थे यश अंकल पर मैं जानती हूं कि वो हमारे साथ हर वक़्त हैं और मुझे और आदी को अपने आशीर्वाद दे रहे हैं. रानी ने कहा मैं हमेशा परियों की कहानियों में विश्वास रखती हूं और ऊपर वाले की कृपा से मेरी ज़िंदगी भी उनमें से एक कहानी की तरह बन गई है. और अब मैं अपनी ज़िंदगी के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से में क़दम रख रही हूं. सलमान ख़ान ने रील लाइफ़ में कई किरदार निभाए हैं पर हाल ही में उन्होंने रियल लाइफ़ में निभाया एक टीचर का किरदार. सलमान ख़ान ने हाल ही में मुंबई में सुभाष घई के एक्टिंग स्कूल में एक टीचर की भूमिका निभाई. उन्होनें विद्यार्थियों को एक्टिंग के बारे में तो बताया ही साथ ही उन्होंने एक स्टार और एक्टर के बीच में अंतर भी बताया. उन्होंने सभी विद्यार्थियों से बात की और उनके साथ जिम जाकर थोड़ी देर के लिए कसरत भी की. ग़ौरतलब है कि इस हफ़्ते सुभाष घई की फ़िल्म कांची रिलीज़ हो रही है. एक ज़माने में प्रेमी प्रेमिका रह चुके रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण की ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री को दर्शकों ने ये जवानी है दीवानी में बहुत सराहा. ये जोड़ी एक बार फिर से बॉक्स ऑफ़िस पर नज़र आएगी इम्तिआज़ अली की अगली फ़िल्म तमाशा में. रणबीर कपूर और दीपिका ने इससे पहले बचना ए हसीनों और ये जवानी है दीवानी में काम किया था. रणबीर कपूर ने इम्तिआज़ अली के साथ रॉकस्टार की थी जो काफ़ी सफल रही थी. दीपिका पादुकोण ने इम्तिआज़ अली के साथ लव आजकल में काम किया था जो बॉक्स ऑफ़िस पर काफ़ी चली थी. |
| DATE: 2014-04-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1019] TITLE: विवेक ओबेरॉय लौटे पुराने काम पर |
| CONTENT: पिछले साल चार फ़िल्मों में दिखने वाले विवेक ओबेरॉय ने एक बार फिर से वो काम किया जो वो कॉलेज के ज़माने में किया करते थे. ये काम था डबिंग आर्टिस्ट का. हांलाकि तब और अब में फ़र्क़ ये है कि इस बार उन्हें मौक़ा मिला जेमी फॉक्स जैसे मशहूर हॉलीवुड अभिनेता की आवाज़ को हिंदी में डब करने का. अमेज़िंग स्पाइडरमैन 2 फ़िल्म में फॉक्स एक विलेन का किरदार निभा रहे हैं जिसका नाम इलेक्ट्रो है. विवेक ने इसी किरदार के संवाद हिंदी में डब किए हैं. हाल ही में आई फ़िल्म रिओ 2 में इमरान ख़ान और सोनाक्षी सिन्हा की आवाज़े सुनाई दी थीं और अब विवेक ओबेरॉय की आवाज़ सुनाई देगी अमेज़िंग स्पाइडरमैन 2 में. डबिंग की दुनिया में अपना अनुभव बांटते हुए विवेक कहते हैं कि करियर की शुरूआत में मैने डबिंग की है. कई टीवी धारावाहिकों और सीरीज़ के लिए आवाज़ दी है लेकिन ये काफ़ी चुनौतीपूर्ण था. जेमी फॉक्स जैसे अभिनेता के बोलने के स्टाइल से मेल बैठाना बहुत चुनौतीपूर्ण था. विवेक कहते हैं कि भाषा को लेकर हम कभी फंस जाते थे. कुछ अंग्रेज़ी डायलॉग को हिंदी में कहने में दिक़्क़त होती थी कि इन शब्दों का हिंदी आख़िर कैसे हो सकता है लेकिन मज़ा बहुत आया. हालांकि शुरूआत में एक दो घंटे करने के बाद मैं बहुत परेशान होकर सोच रहा था कि आख़िर मैं ये कर ही क्यों रहा हूं. पर धीरे धीरे होता चला गया. विवेक बताते हैं कि सबसे ज़्यादा ध्यान इस बात का रखना होता है कि अंग्रेज़ी में कही गई बात से मिलता जुलता हिंदी वाक्य रखा जाए ताकि वो किरदार के होंठों के संचालन से अलग ना लगे. पिछले साल विवेक की चार फ़िल्में रिलीज़ हुई जिसमें से ग्रैंड मस्ती ने काफ़ी बॉक्स ऑफ़िस कलेक्शन किया लेकिन विवेक कहते हैं कि वो किसी भी भाषा में फ़िल्म करने को तैयार हैं बस वो दिलचस्पी पैदा करे. विवेक का कहना है कि फ़िल्म बॉलीवुड की होहॉलीवुड या टॉलीवुड रोल अगर अच्छा है तो मैं करने के लिए तैयार हूं. कुछ अलग हो कुछ चुनौती हो. जैसे ये फ़िल्म थी. ये काम अलग था तो मैने सोचा कि चलो करते हैं इसमें मज़ा आएगा. मेज़िग स्पाइडरमैन 2 की चर्चा करते हुए विवेक उसकी तुलना मनमोहन देसाई की फ़िल्मों से करते हुए कहते हैं कि सूपरहीरो फ़िल्में हर चीज़ होती है. उनमें ऐक्शन है स्पेशल इफ़ेक्ट्स हैं प्रेम कहानी है हास्य है. इसमें हर मसाला है. हालांकि विवेक कहते हैं कि वो फ़िलहाल सिर्फ़ हिंदी भाषा में ही डबिंग कर पाए हैं. तमिलतेलुगु वगैरह नहीं कर पाए क्योंकि वो सीखनी बाक़ी हैं. |
| DATE: 2014-04-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1020] TITLE: 'महाकमीने' बनने को तैयार शाहिद कपूर |
| CONTENT: ख़़बरों के मुताबिक़ अभिनेता शाहिद कपूर फ़िल्मकार विशाल भारद्वाज की फ़िल्म महाकमीने में नज़र आएंगे. यह फ़िल्म वर्ष 2009 में आई फ़िल्म कमीने का सीक्वल है. रिपोर्ट के मुताबिक़ सीक्वल में काम करने के लिए शाहिद ने हामी भर दी है. लेकिन फ़िल्म की शूटिंग हैदर के बाद शुरू होगी. विशाल भारद्वाज इस समय फिल्म हैदर की शूटिंग में व्यस्त हैं. इस फ़िल्म में शाहिद कपूर श्रद्धा कपूर इरफ़ान केके और तब्बू प्रमुख भूमिकाओं में दिखाई देंगे. विशाल लंबे समय से कमीने का सीक्वल बनाना चाहते थे. रणवीर सिंह का डांस तो आपने देखा है लेकिन अब वो बिलकुल तैयार हैं अपनी आवाज़ का जादू बिखेरने के लिए एक टीवी कमर्शियल में. 28 साल के रणवीर को कंडोम के एक ब्रांड के प्रचार के लिए चुना गया है जिसमें वो रैप भी करेंगे. यह 23 अप्रैल को जारी किया जाएगा. रणवीर का यह पहला टीवी विज्ञापन है. फ़िल्मों में सफलता पाने के बावजूद अभी तक उन्होंने किसी ब्रांड का प्रचार करने के लिए हामी नहीं भरी थी. रणवीर सिंह फिलहाल यशराज की फ़िल्म किल दिल में व्यस्त है. अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्धन फिल्म मिर्ज़ा साहिबा से अपना फ़िल्मी करियर की शुरू करने जा रहे हैं. फ़िल्म की शूटिंग सितंबर में शुरू होगी. फिल्म में हर्षवर्धन अलग-अलग समय के दो विभिन्न किरदारों में दिखाई देंगे. पहला किरदार उस दौर का है जब मिर्ज़ा साहिबा की प्रेम कहानी परवान चढ़ी और दूसरा किरदार आधुनिक है. हर्षवर्धन ने नसीरुद्दीन शाह के साथ काम करके अभिनय के गुर सीखे हैं. मिर्ज़ा साहिबा का निर्देशन राकेश ओमप्रकाश मेहरा करेंगे. पता चला है कि हर्षवर्धन अपने लुक के साथ-साथ अपनी बॉडी पर भी खूब मेहनत कर रहे हैं. |
| DATE: 2014-04-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1021] TITLE: अभिषेक ने ख़रीदी कबड्डी टीम तो क्या बोले बिग बी? |
| CONTENT: आईपीएल का सीज़न शुरू हो चुका है और खिलाड़ियों के साथ साथ कई फ़िल्मी सितारे भी इस प्रतियोगिता की शोभा बढ़ा रहे हैं. आईपीएल की सफलता को देखकर कई लोग अब ऐसी ही प्रतियोगिता अन्य खेलों में कराने की कोशिश कर रहे हैं. आईपीएल के तर्ज पर ही अब फुटबॉल और कबड्डी में भी इसी तरह की प्रतियोगिता देखने को मिलेगी. आईपीएल की तरह ही इसमें भी फ़िल्मी सितारों का दबदबा दिखेगा. कब्बडी लीग की हाल ही में टीमों की बिक्री हुई जिसमें से जयपुर की टीम को ख़रीदा अभिनेता अभिषेक बच्चन ने. कबड्डी लीग के संवाददाता सम्मलेन में बीबीसी ने उनसे बातचीत की. अभिषेक बच्चन बाइक चलाने के आलावा खेलों में भी अच्छी खासी रुचि रखते हैं. धूम फ्रैंचाइज़ी की सारी फ़िल्मों में अभिषेल बाइक चलते हुए दिखते हैं पर क्या वो एक निर्माता के तौर पर कोई खेल से जुड़ी कोई फ़िल्म बनाना चाहेंगेइस बात पर अभिषेक ने कहा जी बिल्कुल ये मेरा सपना है कि मैं एक ऐसी फ़िल्म बनाऊं जो खेलों से जुड़ी हो. मुझे लगता है कि ये काम अमरीका बहुत ही अच्छे और नायाब तरीके से करता है. वो फ़िल्मों के ज़रिए अपने खेलों को बढ़ावा देता है. वो आगे कहते हैं मैं ये मानता हूं कि हमनें अभी तक खेलों से सम्बंधित ज़्यादा फ़िल्में नहीं बनाई हैं और हम अभी तक उस स्तर पर नहीं पुहंचे हैं. ऐसी फ़िल्में सिर्फ़ खेलों के ही बारे में नहीं होती ये होती हैं इंसान के आत्मविश्वास के बारे में जिसे देखकर लोगों की दिलचस्पी उस खेल के प्रति बढ़ जाती है. उनके पिता अमिताभ बच्चन इस सबसे कितने ख़ुश हैं इस सवाल पर अभिषेक ने कहा जब मैंने उनसे कहा कि मैं कबड्डी टीम खरीदने वाला हूं तो वो बहुत ख़ुश हुए. उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और कहा कि मुझे तुम पर बहुत गर्व है. बॉलीवुड के अफवाहों के बाज़ार में सबसे ताज़ा ये अफ़वाह उड़ रही है कि अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन अब अपने पहले बच्चे अराध्या के बाद दूसरे बच्चे के बारे में सोच रहे हैं. इस पर जब हमने अभिषेक बच्चन की प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उन्होनें कहा मैं ऐसी खबरें नहीं पढ़ता. मेरे लिए सबसे ज़रूरी है मेरा काम और बस मैं वही करता हूं. मुझे बस अपने काम की फ़िक्र है और मुझे किसी और चीज़ से कोई लेना देना नहीं है. साजिद खान अपनी कॉमेडी फ़िल्म हाउसफुल का दूसरा सीक्वल बनाने की सोच रहे हैं और ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि उन्होंने इसके लिए अभिषेक बच्चन को साइन कर लिया है. अभिषेक बच्चन ने इस पर सफाई देते हुए कहा देखिए मैंने अभी सिर्फ़ हामी भरी है. वो लोग अभी फ़िल्म की कहानी लिखने में व्यस्त हैं और मैं उम्मीद करता हूं कि सब सही रहे. अभी मैं इस बारे में ज़्यादा नहीं बात कर सकता कोई फिल्म का कॉन्ट्रैक्ट और इस बनाने में कतना समय लगेगा इन सब पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है. |
| DATE: 2014-04-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1022] TITLE: जिसने रची 2013 की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म |
| CONTENT: सदियों पुराना एक जहाज़ जिसे एक देश से दूसरे देश लाया गया. कुछ समय बीतने पर उस जहाज़ के कुछ हिस्से गलने लगे तो उन्हें बदल दिया गया. धीरे धीरे उस जहाज़ के सभी हिस्सों को बदलना पड़ा लेकिन लोग उसे आज भी उसी पुराने नाम से पहचानते थे लेकिन क्या वो वही जहाज़ रहा यही फ़लसफ़ा है ग्रीक़ दार्शनिक प्लूटार्क के दर्शन शिप ऑफ़ थीसिस का जो मनुष्य के जीवन और इसे जीने के तरीके पर ही सवाल बन जाता है. हम कौन हैं इसी दर्शन के इर्द गिर्द बुनी गई फ़िल्म है शिप ऑफ़ थीसिस जिसे 61वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में साल 2013 की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म चुना गया है. फ़िल्म के निर्देशक आनंद गांधी की ये पहली फ़ीचर फ़िल्म है और अपने दोस्तों खुशबू रांका पंकज कुमार के साथ मिल कर उन्होंने ही इसे लिखा भी है. बीबीसी से हुई एक ख़ास बातचीत में उन्होने इस फ़िल्म से जुड़े कई पहलुओं पर बात की. आनंद से बात करने से पहले उनके बारे में जान लेना मुझे ठीक लगा तो मैंने उनके बारे में जानकारी ढूढ़नी शुरू की. मुझे मालूम था कि जिस शख़्स से हम बात करने वाले हैं वो बड़ी गहरी गंभीर सोच रखता है दर्शन में भरोसा रखता है जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझना चाहता है. लेकिन यक़ीन मानिए जब मैनें आनंद की तस्वीर देखी तो लगा कि ये ऐसा नहीं हो सकते. बढ़े हुए बाल बेतरतीब बिखरे हुए से और उस पर बढ़ी हुई दाढी - ये तो कोई आम लड़का है जो कॉलेज जाता होगा थोड़ा बहुत सुराबेसुरा गिटार बजाता होगा इंगलिश नॉवल पढ़ता होगा और लाइफ़ को लेकर कन्फ़यूज़ होगा. लेकिन हैरानी की बात ये है कि यही वो लड़का है जिसने जिंदगी के सुलझेअनसुलझे सवालों को बड़ी खूबसूरती से कैमरे में कैद किया है और वो फ़िल्म बनाई है जिसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला है. लेकिन जब बातचीत शुरु हुई तो मालूम चला कि इस बेतरतीब सी वेषभूषा के पीछे कहीं एक दार्शनिक छिपा बैठा है जिंदगी क्या है हमारा अस्तित्व क्या है आंनद ने यूं तो ऐसे गूढ़ दर्शन को लेकर फ़िल्म बनाई लेकिन दर्शन की बात करने में वो थोड़ा झिझक जाते हैं. वो एक लेखक रहे हैं और जितना बेहतरीन तरीके से वो अपनी बात को लिख पाते हैं उसी बात को ज़ुबानी समझाने में उन्हें थोड़ी तकलीफ़ पेश आती है. लेकिन कुछ देर बात करने के बाद वो सहज हुए और फिर उन्होंने बताया कि इस फ़िल्म की प्रेरणा कैसे आई मैं मेरी नानी के इलाज के लिए हॉस्पिटल में था. वो काफ़ी तकलीफ़ में थी और डॉक्टर जवाब दे चुके थे. मेरी हालत उस डूबती नाव पर सवार उस साधु के जैसी थी जिसने वेद पढ़े थे लेकिन तैरना नहीं सीखा था. सारी दुनिया की दवाएं उन्हें ठीक नहीं कर सकती थी और तब जीवन और मृत्यु के इस खेल को मैंने समझना शुरू किया. जीवन को लेकर अपनी समझ को अभी आनंद और बढ़ाना चाहते हैं. वो कहते हैं शिप ऑफ़ थीसिस मेरे प्रयासों कि एक छोटी सी कड़ी है जिसके आगे अभी बहुत सफ़र बाकी है. लेकिन ये सफ़र आसान नहीं है ऐसा मानना है आनंद का. आनंद संसाधनों की कमी की शिकायत भी करते है. राष्ट्रीय पुरस्कार तो मिल गया लेकिन इससे ज़्यादा जरूरी होता है फ़िल्म को बनाना और आज भी हमारे यहां फ़िल्म मेकर्स को इतने संसाधन नहीं मिल पाते कि वो अपनी फ़िल्म को बना सकें या उसे वितरित कर सकें. आनंद कहते हैं भारत में फ़िल्म रिलीज़ करने के लिए हम वितरक ढूंढ रहे थे और फ़िल्म से कोई बड़ा नाम न जुड़ा होने के कारण ये मुश्किल था. वो बताते हैं आज भी कुछ ही लोगों के हाथ में है कि वो अपनी फ़िल्म बना कर तुरंत रिलीज़ कर लें. ऐसे में किरण राव ने हमारी फ़िल्म को भारत में पेश किया. वो हमारा चेहरा थीं. जिनके बिना इतने बड़े स्तर पर रिलीज़ मुश्किल थी कभी किसी जमाने में कहानी घर घर की और क्योंकि सास भी कभी बहू थी सरीखे टेलीविज़न शोज़ के लिए संवाद लिखने वाले आनंद अब अर्थपूर्ण कला को आगे बढ़ाना चाहते हैं. टीवी पर वापसी पर वो बोले मैं शिप ऑफ़ थीसिस से शुरू हुए संवाद को जारी रखना चाहता हूं. टीवी के माध्यम के लिए भी कुछ जरूर करूंगा पर कुछ वक़्त बाद. |
| DATE: 2014-04-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1023] TITLE: फ़िल्म रिव्यूः देख तमाशा देख |
| CONTENT: देख तमाशा देख ए भारत के सामाजिक-राजनीतिक चरित्र पर एक तंज है. यह एक राजनेता के विशाल कटआउट के वज़न तले दबकर मर गए एक ग़रीब आदमी की धार्मिक पहचान ढूंढने के इर्द-गिर्द घूमती है. एक ग़रीब आदमी राजनेता मुथा सेठ सतीश कौशिक के विशाल कटआउट के नीचे दबकर मारा जाता है. कुछ मुसलमान उसके शव को दफ़नाने लगते हैं तो हिंदुओं का एक समूह आकर इस पर आपत्ति करता है और शव को उन्हें सौंप देने की मांग करता है. मुसलमान कहते हैं मृतक मुस्लिम था तो हिंदू दावा करते हैं कि वह उनमें से एक था. मामला पुलिस और फिर अदालत तक पहुंच जाता है. इस दौरान शव मुर्दाघर में रखा रहता है और मृतक के भाई लक्ष्मण हृदयनाथ राणे को भी नहीं सौंपा जाता. इस विवाद और क़ानूनी ड्रामे में राजनेताओं के शामिल होने से मामला भड़क जाता है और सांप्रदायिक दंगे भी शुरू हो जाते हैं. अदालत शव को मृतक के भाई लक्ष्मण को सौंपने का आदेश देती है. उधर मृतक की बीवी फ़ातिमा तन्वी आज़मी नहीं चाहती कि यह विवाद आगे बढ़े और उसे न तो शव के दाह संस्कार को लेकर कोई आपत्ति है न ही दफ़नाए जाने को लेकर. एक स्थानीय अख़बार दुर्घटना से हुई इस मौत से जुड़ी अफ़वाहों की रस लेकर रिपोर्टिंग करता रहता है जबकि नेता इस दुर्भाग्यजनक विवाद का फ़ायदा उठाते हैं. अंततः होता क्या है शफ़त ख़ान की कहानी देश के सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य पर व्यंग्य है और अपनी प्रवृत्ति के कारण बहुत व्यावसायिक नहीं है. उन्होंने एक ऐसा स्क्रीनप्ले लिखा है जो एक ख़ास तबक़े को ही पसंद आएगा और दर्शकों के बड़े वर्ग को बोरिंग और बेमतलब लगेगा. चूंकि पूरी कहानी एक मृत शरीर के इर्द-गिर्द घूमती है इसलिए पारंपरिक मनोरंजन चाहने वाले जल्द ही फ़िल्म से उकता जाएंगे. मनोरंजन के नाम पर फ़िल्म में सिर्फ़ व्यंग्य है और यह सिर्फ़ एक विशिष्ट वर्ग को ही समझ आएगा. शायद फ़िल्म का सबसे मनोरंजक भाग कोर्टरूम ड्रामा है जो कुछ ही मिनट चलता है. शफ़त ख़ान के डायलॉग विषय के अनुरूप हैं और फ़िल्म के मूड के साथ ठीक रहते हैं. सतीश कौशिक ने बढ़िया ढंग से अवसरवादी राजनेता की भूमिका निभाई है. तन्वी आज़मी मृतक की विधवा के रूप में ठीक हैं. विनय जैन पुलिस अधिकारी विश्वासराव के रूप में जमे हैं. पुलिस इंस्पेक्टर सावंत के रूप में गणेश यादव सहज हैं. हिंदू नेता बांडेकर के रोल में शरद पोंक्शे बढ़िया हैं. प्रोफ़ेसर शास्त्री के रूप में सतीश अलेकर प्रभावशाली हैं. शब्बो के रूप में अपूर्वा अरोड़ा और प्रशांत के रूप में आलोक राजवाड़े अपनी छाप छोड़ जाते हैं. मौलाना बने सुधीर पांडे का असर महसूस होता है. फ़िरोज़ अब्बास ख़ान का निर्देशन संवेदनशील है लेकिन स्क्रिप्ट की तरह एक ख़ास दर्शक वर्ग को ही पसंद आएगी. हेमंत चतुर्वेदी की सिनेमेटोग्राफ़ी अच्छी है. कौशल-मोज़ेज़ के एक्शन सीन ठीक बने हैं. खली का सेट असली सा है. स्रीकर प्रसाद की एडिटिंग अच्छी है. कुल मिलाकर देख तमाशा देख एक व्यंग्य है जिसमें व्यावसायिक तड़का नहीं है. |
| DATE: 2014-04-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1024] TITLE: फ़िल्म रिव्यू: टू स्टेट्स |
| CONTENT: नाडियाडवाला ग्रैंडसन एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड और धर्मा प्रोडक्शन्स प्राइवेट लिमिटेड की फ़िल्म टू स्टेट्स एक पंजाबी लड़के और एक तमिल लड़की की लव स्टोरी है. क्रिश मल्होत्रा अर्जुन कपूर बने हैं पंजाबी लड़के और अनन्या स्वामीनाथन आलिया भट्ट बनीं हैं एक तमिल ब्राह्मण लड़की. ये दोनों मिलते हैं अहमदाबाद के एक कॉलेज में जहाँ इन दोनों के बीच प्यार हो जाता है. उन्हें उन दिक़्क़तों का ज़रा सा भी इल्म नहीं होता जो उनके परिवारों के सामने आएगी जब उनकी शादी की बात की जाएगी. क्रिश के पिता का किरदार निभाया है रोनित रॉय ने और उनकी मां बनीं हैं अमृता सिंह. अनन्या के पिता का किरदार निभाया है शिव सुब्रमण्यम ने और मां बनीं हैं रेवती. कैसे मनाते है ये दोनों एक दूसरे के घरवालों को यही फ़िल्म की कहानी है. अर्जुन कपूर क्रिश के किरदार में काफ़ी ढीले से नज़र आते हैं. उनके हाव भाव पूरी फ़िल्म में लगभग एक से ही लगते हैं. पर वो दृश्य जो उन्होनें अपने पिता रोनित रॉय के साथ फ़िल्माए हैं उनमें वो काफ़ी अच्छे लगे हैं. आलिया भट्ट ने अपनी बॉडी लैंग्वेज और चेहरे के हाव भाव का पूरा फ़ायदा उठाकर बहुत ही कमाल का अभिनय किया है. वो बहुत ही चुलबुली और मासूम लगीं जो कि उस किरदार को और भी जीवंत बना देता है. रोनित रॉय ने क्रिश के बाप का किरदार बहुत ही अच्छे तरीके से निभाया है. हालांकि उनके दृश्य बहुत ही कम हैं लेकिन वो दर्शकों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं. अमृता सिंह ने अपनी आंखों का इस्तेमाल करके बहुत ही कमाल का अभिनय किया है. कविता मल्होत्रा के किरदार को उन्होंने बहुत ही बेहतरीन तरीक़े से निभाया है. शिव सुब्रमण्यम ने अनन्या के पिता का किरदार काफ़ी सहज रूप से निभाया है और रेवती ने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है. इंटरवल से पहले का हिस्सा बहुत ही आम सा है लेकिन बाद में कहानी काफ़ी दिलचस्प हो जाती है. फ़िल्म में गाने तो हैं पर ऐसे कोई गाना नहीं हैं जो कि सुपरहिट हो. इस फ़िल्म से अपने डेब्यू कर रहे निर्देशक अभिषेक वर्मन ने परिवारों के बीच फ़िल्माए दृश्यों में काफ़ी परिपक्वता का परिचय दिया है. युवा वर्ग वाले दृश्यों को वो और भी बेहतर बना सकते थे. संगीत में शंकर एहसान लॉय ने अच्छा संगीत दिया है पर बहुत अच्छा नहीं. टू स्टेट्स की पटकथा को लिखा है ख़ुद अभिषेक वर्मनने. यह काफ़ी मज़ेदार है. कहानी और भी रोमांचक हो जाती है जब दोनों परिवारों के बीच मतभेद खुल कर सामने आ जाते हैं. इस कहानी से हर एक इंसान राब्ता रखेगा. इसी बात का भरपूर फ़ायदा उठाया निर्देशक अभिषेक वर्मन ने. कुल मिलकर टू स्टेट्स लोगों को काफ़ी अच्छी लगेगी. ये एक ऐसी फ़िल्म है जिससे हर वर्ग का इंसान ख़ासतौर पर युवा पीढ़ी अपने आपको काफ़ी जुड़ा हुआ महसूस करेगी. इस फ़िल्म को अपनी लगभग 80 प्रतिशत लागत अपने राइट्स को बेचकर मिल ही जाएगी. बॉक्स ऑफिस पर भी इसके लिए पैसा कमाना बहुत ही आसान काम है. |
| DATE: 2014-04-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1025] TITLE: नहीं होगा आमिर-रणबीर का आमना-सामना |
| CONTENT: सांवरियां रणबीर कपूर की फ़िल्म बॉम्बे वेलवेट को नई रिलीज़ डेट मिल गई है. अब ये फ़िल्म आमिर ख़ान की फ़िल्म पीके के साथ 19 दिसंबर को रिलीज़ नहीं होगी. अनुराग कश्यप की बॉम्बे वेलवेट अब 28 नवंबर को रिलीज़ होगी. ज़ाहिर है इससे फ़िल्म की पूरी यूनिट ने राहत की सांस ली है. बॉम्बे वेलवेट की शूटिंग भी पूरी नहीं हुई थी और फ़िल्म के डायरेक्टर अनुराग कश्यप समेत इस फ़िल्म के हर सदस्य को इस फ़िल्म के घाटे में जाने का डर सताने लगा था. ये फ़िल्म 19 दिसंबर को रिलीज़ होना तय हुई थी ठीक उसी दिन आमिर ख़ान की फ़िल्म पीके भी रिलीज़ हो रही है. आमिर ख़ान की फ़िल्म को देखने दर्शक भारी तादाद में सिनेमाघरों में आते हैं इसका एक उदाहरण उनकी पिछली फ़िल्म धूम-3 रही थी. इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस के सभी रिकॉर्ड तोड़ते हुए ओवरसीज़ कलेक्शन को मिलाकर 500 करोड़ रुपए कमाए थे. इस डर को भांपते हुए अनुराग कश्यप ने अपनी फ़िल्म बॉम्बे वेलवेट की रिलीज़ पहले खिसकाकर 28 नवंबर करवा ली है. यूं तो एक्टर रणबीर कपूर कम चर्चित नहीं हैं लेकिन उनकी पिछली फ़िल्म बेशरम बॉक्स ऑफिस पर बिलकुल नहीं चली थी. इससे उनकी मार्केट इमेज को काफी धक्का लगा था. ज़ाहिर है अगली फ़िल्म को हिट कराने के लिए रणबीर भी जी जीन से जुटे हुए हैं. नई रिलीज़ डेट मिलने से रणबीर काफी खुश हैं. रणबीर कहते हैं मुझे लगता है कि ये डेट बिलकुल सही है इससे हम बॉम्बे वेलवेट को ज़्यादा से ज़्यादा थियेटर्स तक पहुंचा पाएंगे. हम अपनी फ़िल्म को किसी और फ़िल्म के साथ रिलीज़ करना नहीं चाहते क्योंकि इससे हमारी फ़िल्म के बिज़नेस पर असर पड़ेगा. ये बेहतरीन फ़िल्म है और हमें उम्मीद है कि दर्शकों को ये ज़रूर पसंद आएगी. बॉम्बे वेलवेट बॉम्बे के राजधानी बनने की कहानी है. इतिहासकार ज्ञान प्रकाश की किताब मुंबई फ़ेबल्स को बॉम्बे वेलवेट का आधार बनाया गया है. रणबीर बताते हैं कि निर्देशक अनुराग कश्यप पिछले नौ साल से इस फ़िल्म को बनाने की तैयारी कर रहे थे. अनुराग ने ये फ़िल्म बहुत मेहनत और प्यार से बनाई है. पिछले नौ साल से ये फ़िल्म अनुराग का सपना थी. हम उम्मीद करते हैं कि इस फ़िल्म को ज़्यादा दर्शक देखेंगे. ये फ़िल्म काफी मनोरंजक है. अनुराग कश्यप के साथ लीड एक्टर के तौर पर रणबीर की ये पहली फ़िल्म होगी. इससे पहले रणबीर अनुराग की फ़िल्म बॉम्बे टॉकीज़ में एक छोटी भूमिका निभा चुके हैं. फ़िल्म बॉम्बे वेलवेट में रणबीर की हीरोइन अनुष्का शर्मा हैं. |
| DATE: 2014-04-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1026] TITLE: सलमान बनाएंगे हजामत, तो मीका सिंह बेचेंगे चाय! |
| CONTENT: चुनाव ख़त्म होते ही आप बॉलीवुड के सुपरस्टार सलमान ख़ान को हजामत करते हुए नाई के अवतार में और रणबीर कपूर को वड़ा पाव बेचते हुए देखेंगे. सलमान और रणबीर समेत कई सेलेब्रिटीज़ टीवी पर आने वाले एक शो में आम आदमी की तरह अलग-अलग काम करते हुए नज़र आएंगे. ये शो मिशन सपने एक टीवी चैनल पर 27 अप्रैल से शो शुरू होगा जिसमें आप सेलेब्रिटीज को आम आदमी की तरह पाएंगे. इसमें क्रिकेटर हरभजन सिंह नमकीन तो सिंगर मीका सिंह कड़क चाय बेचेंगे. युवा अभिनेता वरुण धवन क़ुली का काम करेंगे और अभिनेता राम कपूर टैक्सी ड्राइवर बनकर पैसे कमाएंगे. निर्माता करण जौहर मुंबई के गेटवे ऑफ़ इंडिया पर फ़ोटोग्राफर बनकर वहां आने वाले पर्यटकों की फ़ोटो खींचेंगे. इनके अलावा इस शो में टीवी अभिनेत्री दृष्टि धामी रोनित रॉय और सिद्धार्थ मल्होत्रा भी नज़र आएंगे. अभिनेत्री सोनम कपूर ने आशिक़ी 2 की अभिनेत्री श्रद्धा कपूर के साथ किसी समस्या से इनकार कर दिया है. उन्होंने एक फ़ैशन कार्यक्रम के दौरान कथित तौर पर आशिक़ी 2 की अदाकारा को रेड कार्पेट पर नज़रअंदाज किया था. इसके बाद 28 वर्षीय सोनम ने ट्वीट कर साफ़ किया है कि श्रद्धा से वह क्यों नहीं मिल पाईं थी. सोनम ने ट्विटर पर लिखा श्रद्धा के साथ मुझे कोई परेशानी नहीं है. मुझे देर हो गई थी और मैं जल्दी में थी. मैं इसी वजह से श्रद्धा से नहीं मिल पाई. जेल में बंद अभिनेता संजय दत्त पर एक बायोपिक फ़िल्म बन सकती है. यानी उनकी ज़िंदगी को पर्दे पर उतारा जाएगा. ऐसी ख़बरें आ रहीं हैं कि इस फ़िल्म को निर्देशक राजकुमार हिरानी बनाएंगे और इसकी सह निर्माता होंगी संजय दत्त की पत्नी मान्यता दत्त. राजकुमार हिरानी और संजय दत्त काफ़ी पुराने दोस्त हैं. राजकुमार हिरानी ने संजय दत्त के साथ मुन्नाभाई एमबीबीएस और लगे रहो मुन्नाभाई बनाई. |
| DATE: 2014-04-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1027] TITLE: लटके झटके से भरा है राखी का चुनाव प्रचार! |
| CONTENT: बॉलीवुड में आइटम नंबर से अपनी पहचान बनाने वाली राखी सावंत हमेशा से ही विवादों से घिरी रही हैं. कभी अपने आइटम सॉन्ग के लिए तो कभी मिका और उनके चुंबन को लेकर तो कभी अपने एक ज़माने में रहे बॉय फ्रेंड अभिषेक अवस्थी को लेकर. राखी सावंत ने टेलीविज़न पर बिग बॉस नच बलिये राखी का स्वयंवर का हिस्सा बन इन रियलिटी शो को ख़ूब टीआरपी दिलाई जिसकी वजह से मीडिया ने उन्हें नाम दिया ड्रामा क्वीन राखी सावंत. एक बार फिर राखी सावंत सुर्ख़ियों में हैं जिसकी वजह है राजनीति. राखी सावंत मुंबई के उत्तर पश्चिम इलाके से राष्ट्रीय आम पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ रही है और उनका चुनाव चिन्ह है हरी मिर्ची. मुझे बड़ी इच्छा हुई कि मैं ड्रामा क्वीन कही जाने वाली राखी सावंत की इस रैली को नज़दीक से देखूं और ये देख सकूं की क्या वाकई राखी सावंत समाज की सेवा करनी चाहती है या ये इनका नया पैतरा है सुर्ख़ियो में रहने काये जानने के लिए मैं घर से सुबह सुबह निकली और जा पहुंची अंधेरी में जहां राखी सावंत करने वाली थी अपनी पदयात्रा. मैं जैसे ही अँधेरी पहुंची तो मुझे ज़ोर ज़ोर से ढोल बजने की आवाज़ सुनाई दी. मैंने वहां खड़े कुछ लोगों से पूछा भैया रैली कहां हो रही है तभी एक साथ तीन लोग बोल पड़े राखी मिर्ची की रैली इस गली में हो रही है. वहां मैंने देखा लोग अपने घरों से बाहर खड़े थे एक नज़र राखी को देखने के लिए. बड़ों से ज़्यादा मुझे बच्चे ज़्यादा उत्साहित लगे राखी सावंत को देखने के लिए. ये बच्चे ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे थे आली रे आली राखी सावंत आली और मोहब्बत है मिर्ची मोहब्बत है मिर्ची जो कि राखी सावंत की फ़िल्म का गीत है. मैंने देखा कि काली सलवार काला कुरता और उसके ऊपर हरा कोट पहने राखी सावंत हाथ जोड़ कर वोट मांग रही है . चेहरे पर मेकअप होठों पर लिपस्टिक थी. एक हाथ में सफ़ेद मोतियों की माला और बालों को हरे रंग के कपडे से बाँध रखा था. उनके साथ एक पुलिस लेडी कांस्टेबल थी जो उनके साथ थी और बाकी के तीन पुलिसकर्मी उनके पीछे. राखी हर दरवाज़े पर जा जा कर मराठी में कह रही थी मला वोट दया मला विसरु नका जिसका मतलब है मुझे वोट देना मुझे भूलना मत. मैंने अपनी नज़रें राखी से हटाईं और उनकी तरफ़ ध्यान दिया जो राखी सावंत की रैली में नारे लगा रहे थे. मैंने देखा कि 7 से 8 लोग ही थे जो 18 वर्ष के ऊपर के थे. बाकी तो बच्चे ही थे कोई 9 साल का था तो कोई 15 साल का. इन बच्चों को देख मैंने उन बच्चो को पूछा बच्चो यहाँ क्या कर रहे होमेरा सवाल सुनने के बाद बच्चे शरमाते हुए बोले हमारी परीक्षा ख़त्म हो गई है घर पर बोर हो रहे थे तो मम्मी ने कहा चलो मेरे साथ रैली में और हम आ गए यहां हमें मज़ा आ रहा है. मैं आगे बढ़ी और राखी सावंत के पास पहुंच कर मैंने राखी से कहा क्या आप रैली के बाद अपना थोड़ा समय देंगी इंटरव्यू के लिएइस पर राखी तुनक कर बोलीं देखिए आप तो देख ही रहीं हैं मैं अभी समाज सेवा में लगी हूँ मेरे पास वक़्त नहीं है. ये कहते ही वो खुली जीप पर चढ़ गई और कहने लगी मुझे वोट देना न भूले. लोगों को कोई दुविधा न हो इसके लिए उन्होंने अपने हाथ में एक लम्बी हरी मिर्च पकड़ी हुई थी जिसे बार बार लोगों को दिखा कर वो कह रही थी न भूलें हरी मिर्च को. राखी की जीप के आगे बच्चे और बड़े नारे लगा रहे थे. हाथ में राखी का पोस्टर और परचा पकड़ा हुआ था. फिर मेरी बात कुछ महिलाओ से हुई. एक ने कहा मैडम जी सुबह से धूप में घुम रहे हैं अब तक सिर्फ 2 बार ही गिलास पानी नसीब हुआ है खाना भी नहीं मिला. फिर मैंने उन महिलाओ से पूछा कि क्या उन्हें पैसे मिलते हैं रैली में शामिल होने के लिएइस पर एक महिला बोली जी मैडम जी लेकिन ये लोग बहुत कम पैसे दे रहे है. 200 से 250 रुपए इतना कम पूरे दिन नारे लगाने और पद यात्रा में शामिल होने के लिए. लकिन आज शाम से लेकर रात तक की रैली है आज तो 400 रुपए बनेंगे. मैं कुछ और आगे गई तो एक और महिला अपने बच्चों के साथ खड़ी थी. मैंने उनसे पूछा क्या आप भी सुबह से आई हैं ये सुनते ही उन्होंने अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर करते हुए कहा मुझे तो बहुत ग़ुस्सा आ रहा है. न पानी न खाना कुछ भी नहीं और दे रहे है सिर्फ 200 रुपए इन 200 रुपए में से 40 से 50 रुपए तो रिक्शा में ही लग जाते हैं. इनकी दी हुई जगह पर पहुंचने के लिए बचता क्या है मैं तो कम्प्लेन करूंगी मैडम से. ये कहकर वो आगे बढ़ गईं. राखी सावंत के लिए नारे लगाने वालों की राय जानने के बाद मैंने उन स्थानीय लोगों की राय जाननी चाही जिनसे राखी वोटे मांग रही थी. उनके पास जाकर में उनसे पूछा क्या आप राखी को वोट देंगेइस पर एक व्यक्ति ने कहा नहीं. मैडम जी में अपना वोट बर्बाद नहीं करूंगा क्योंकि मुझे नहीं लगता कि ये कुछ कर पाएंगी. राजनीति में आना ऐसे लोगों का काम नहीं है इनके पीछे कोई बड़ा बैक ग्राउंड भी नहीं है. अगर होता तो शायद वोट डालते. टीवी हस्ती होने से कोई वोट नहीं देता वोट काम करने से देता है. एक और व्यक्ति बोला मुझे ये समझ नहीं आता कि मैं राखी सावंत को वोट क्यों दूं उन्हें कितना वक़्त हुआ है पॉलिटिक्स में आए मैं उन्हें वोट नहीं दूंगा. अब राखी सावंत लोगों का दिल जीतने में कामयाब होंगी या नहीं इसका फैसला 16 मई को ही होगा. |
| DATE: 2014-04-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1028] TITLE: वैम्प हुईं 64 साल की!! |
| CONTENT: 70 के दशक में बॉलीवुड की सबसे प्रसिद्ध वैम्प रहीं अभिनेत्री बिंदु का आज जन्मदिन है. वो आज पूरे 64 साल की हो गई हैं. बिंदु जी ने लगभग 150 फ़िल्मों में काम किया है और 1970 में आई फ़िल्म कटी पतंग में उनके किरदार शबनम को काफ़ी सराहा गया. इसी मौके पर बिंदु जी की बात हुई बीबीसी से जहां उन्होनें हमें बताया अपने उस गुज़रे ज़माने के बारे में. नकारात्मक छवि वाले किरदार में अभिनेत्री बिंदु ने अपनी एक अच्छी खासी पहचान बनाई है. उन्हें इसके लिए कई बार फ़िल्मफ़ेयर नॉमिनेशन भी मिला. पर इस सब की शुरुआत कहां से हुई इस सवाल पर बिंदु जी बोलीं मेरी पहली फ़िल्म थी कटी पतंग. शक्ति सामंत इस फिल्म के डायरेक्टर और प्रोडूसर थे. वो आगे कहती हैं उन्होंने इस फ़िल्म में मुझे कैबरे डांस करने के लिए कहा. ये सुनते ही मुझे झटका सा लगा क्योंकि मैंने कभी कैबरे नहीं किया था. उन्होंने मुझसे कहा था की अगर तुम कैबरे कर सकती हो तो इस फ़िल्म में काम मिलेगा. मैंने इसे चैलेंज समझ स्वीकार लिया. मैंने कटी पतंग का एक गीत मेरा नाम शबनम के लिए कैबरे किया जो बाद में बहुत प्रसिध्द हुआ. इसके बाद तो मुझे सभी डायरेक्टर और प्रोडूसर ने मुझे कैबरे डांसर ही बना दिया था. बिंदु जी ने वैम्प की वजह से काफी नाम तो कमाया ही पर अपने कैबरे डांस के लिए भी वो काफी जानी जाती थीं. पर क्या वो सिर्फ़ नाम के ही लिए डांस करती थीं या उनकी इनमें कुछ दिलचस्पी भी थी इस सवाल पर बिंदु ने कहा मेरी हर फ़िल्म में एक डांस तो रहता ही था क्योंकि प्रोड्यूसर और डायरेक्टर को डिस्ट्रीब्यूटर कहता था कि उसे बिन्दु जी का डांस चाहिए. वो आगे कहती हैं ऐसा नहीं है की मुझे डांस करना नापसंद था. मुझे बचपन से ही डांस का शौक था. ऐसा नहीं है कि मैंने सिर्फ वैम्प के ही किरदार निभाए कई फिल्मों में मैंने अलग अलग किरदार भी निभाए है लेकिन में मानती हूं की मैंने ज़्यादा तर रोले वैम्प के ही किए और वैम्प के रोल के लिए डांस करना हर फ़िल्म में ज़रूरी था. वैम्प की छवि का असर बिंदु के निजी जीवन पर भी पड़ा. उन्हें कई बार लोगों से अजीब प्रतिक्रिया मिलती थी उन्होनें अपनी निजी जीवन का एक किस्सा हमसे यूं बांटा. उन्होनें कहा मैंने फ़िल्मो में बुरी मां की कई भूमिका निभाई हैं. मेरी बहन के बच्चे जब भी मेरे साथ फ़िल्म देखने जाते थे तो वो फ़िल्म देखते वक़्त स्क्रीन में देखते थे फिर मेरी तरफ़ देखते थे और कहते थे बिन्दु आंटी आप हमारे साथ तो ऐसा नहीं करती फिर फ़िल्म में ऐसा क्यों करती होवो कहती हैं फ़िल्म अमर प्रेम में सौतेली मां बनी थीं और एक सीन था जब मुझे बच्चे को थपड़ मारना था. उस सीन के लिए मैंने आठ से नौ टेक लिए और फिर शक्ति समानता जी ने कहा बिन्दु अगर ऐसे ही करती रहोगी तो शाम हो जाएगी. मैंने अपने आपको बहुत समझाया और बच्चे को भी समझाया. बच्चे ने कहा बिंदु आंटी आप मारिये ना तब मैंने थपड़ मारा और बच्चा रोने लगा. वो सीन तो पूरा हो गया लेकिन उस सीन के बाद में रोने लगी. लोगों की प्रतिक्रिया को लेकर बिंदु जी ने कहा जो लोग मुझे जानते थे वो तो यही कहते थे कि तुम फ़िल्मों में अलग और असल ज़िदगी में एकदम अलग हो. थिएटर में जब फ़िल्म में मेरी एंट्री होती थी तो लोग चिल्लाते थे कि ये आई है तो कुछ न कुछ गड़बड़ तो ज़रूर करेगी. अंत में बिंदु जी कहती है कि मैं बहुत जल्द लोगों को फ़िल्मो में वापस अपनी एंट्री करके हैरान कर देंगी. |
| DATE: 2014-04-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1029] TITLE: शाहरुख़ ख़ान के हाथों हुआ विराट कोहली का स्वयंवर! |
| CONTENT: शाहरुख़ ख़ान अपने मज़ाकिया व्यवहार के लिए जाने जाते है. हाल ही में उनका निशाना बने भारतीय क्रिकेट टीम के उपकप्तान विराट कोहली. शाहरुख़ खान अबु धाबी में आईपीएल-7 के गाला डिनर को होस्ट कर रहे थे और तब उन्होंने विराट कोहली की कथित प्रमिका अनुष्का शर्मा को लेकर जमकर खिंचाई की और वहां विराट कोहली का स्वयंवर ही रच डाला. विराट कोहली को ट्विटर और अन्य नेटवर्किंग साइट से शादी के कई प्रस्ताव आ रहे हैं और इसको देखते हुए शाहरुख़ ख़ान ने स्टेज पर बनावटी स्वयंवर रच दिया. इसके बाद उन्होंने कहा विराट के लिए एक मैच फिक्स करना ही है. शाहरुख़ ने आठ लड़कियां विराट को चयन के लिए दीं और उन्होंने उसमें से अनुष्का शर्मा का चयन किया शरमाते हुए. इसके अलावा शाहरुख़ ख़ान ने टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और राजस्थान रॉयल्स के कप्तान ऑस्ट्रेलिया के शेन वाटसन को स्टेज पर बुलाकर दीपिका पादुकोण के साथ लुंगी डांस भी करवाया. बंगाल के जाने माने निर्देशक अग्निदेव चटर्जी दिवंगत अभिनेत्री परवीन बॉबी के स्टारडम पर फ़िल्म बनाना चाहते हैं. उनका कहना है परवीन बॉबी जी की व्यक्तिगत ज़िन्दगी के बारे में पहले भी चर्चा हुई है पर वो स्टार थी और उनके स्टारडम के बारे में कभी चर्चा ना ही कभी उनके सह कलाकारों ने की और ना ही मीडिया में हुई. उनका स्टारडम काफ़ी दिलचस्प है. अग्निदेव चटर्जी कहते है ये फिल्म बायोपिक नहीं होगी. इसमें उनकी ज़िन्दगी के सभी पहलू शामिल नहीं होंगे. हालांकि अग्निदेव चटर्जी ने फ़िल्म की रिसर्च के लिए किताबों और इंटरनेट का सहारा लिया है. उनकी इच्छा है की परवीन बॉबी का किरदार प्रियंका चोपड़ा निभाए. उन्होंने कहा प्रियंका अभी जितनी सफल है उतनी सफल परवीन बॉबी अपने ज़माने में थी. मैं चाहता हूं कि प्रियंका चोपड़ा यह किरदार निभाए. अब तक अक्षय कुमार की फ़िल्म दूसरे अभिनेता की फ़िल्म से टक्कर लेती आई है. लेकिन पहली बार बॉक्स ऑफ़िस पर आमने-सामने होंगी अक्षय कुमार की दो फ़िल्में. गणतंत्र दिवस पर संजय लीला भंसाली की गब्बर और नीरज पाण्डेय की अगली बेनाम फ़िल्म आने वाली हैं. हालांकि नीरज पाण्डेय की फ़िल्म की शूटिंग शुरू भी नहीं हुई है. गब्बर के सूत्र बताते हैं गब्बर एक सोशल पोलिटिकल रिफ़ॉर्म वाली फ़िल्म है और गणतंत्र दिवस इस फ़िल्म की रिलीज़ के लिए सही है. हमने रिलीज़ डेट तीन महीने पहले ही ब्लॉक कर दी थी. नीरज पाण्डेय की फ़िल्म पर नाराज़गी जताते हुए उन्होंने कहा फ़िल्म की शूटिंग भी शुरू नहीं हुई है और रिलीज़ डेट का चयन कर लिया. यह अनैतिक है हम किसी भी क़ीमत पर फ़िल्म की रिलीज़ डेट बदलेंगे नहीं. |
| DATE: 2014-04-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1030] TITLE: राजनीति से दूर ही अच्छी: लता मंगेशकर |
| CONTENT: लता मंगेशकर ने मुंबई में एक संवाददाता सम्मलेन में दीनानाथ मंगेशकर पुरस्कार के विजेताओं के नाम की घोषणा की. ये पुरस्कार 24 अप्रैल को मुंबई में ही दिए जाएंगे. संगीत के क्षेत्र में ये पुरस्कार मिलेगा तबला वादक ज़ाकिर हुसैन और गायक पंधारीनाथ कोल्हापुरे को कला और सिनेमा के क्षेत्र में अभिनेता ऋषि कपूर को और सामाजिक कार्यों के लिए सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे को. इस संवाददाता सम्मलेन में लता मंगेशकर ने राजनीति और गीतकार गुलज़ार पर भी बात की. गुलज़ार को इस वर्ष का दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिया गया है. भारत में चुनावी मौसम के मद्देनज़र जब लता से ये सवाल पूछा गया कि वो प्रधानमंत्री के तौर पर किस नेता को देखना चाहेंगी तो लता ने कहा कि उनकी नज़र में ऐसा कोई नाम नहीं है. हालांकि वोट डालने के सवाल पर लता मंगेशकर का कहना था वोट तो करना पड़ेगा. वो ज़रूरी है. करना ही चाहिए. सरकार में उसे ही आना चाहिए जो देश को संभाल सके और उसका सर ऊंचा कर सके. राजनीति पर अपनी समझ को कम बताते हुए लता ने कहा मेरी दिलचस्पी कम है राजनीति में इसलिए समझ भी उतनी नहीं है. मैं इससे दूर ही रहती हूं और कोई नज़र में भी नहीं है. जो भी आए बस वो अच्छा हो. गीतकार गुलज़ार को दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिलने के साथ ही इस बात की चर्चा होने लगी है कि फ़िल्म इंडस्ट्री का वो कौन सा दूसरा व्यक्ति है जिसे ये पुरस्कार मिलना चाहिए. लता मंगेशकर की राय में अमिताभ बच्चन को ये पुरस्कार मिलना चाहिए. लता मंगेशकर ने कहा गुलज़ार को दादा साहब फाल्के मिलने से मैं बहुत ख़ुश हूं. मैंने टीवी पर भी कहा है और उनको बहुत बधाई दी है. इंडस्ट्री में लोगों को पुरस्कार मिलना अच्छा है लेकिन मैं ये ज़रूर कहूंगी कि फाल्के अवॉर्ड अमिताभ बच्चन को भी मिलना चाहिए. कपिल शर्मा के शो में शिरक़त की ख़बरों पर विराम लगाते हुए लता मंगेशकर ने कहा कि मैं कपिल को बहुत पसंद करती हूं. उनका शो भी देखती हूं. उन्हें तोहफ़ा भी भेजा है. वो सब तो ठीक है पर इसका मतलब ये नहीं है कि मैं उनके शो पर चली जाऊँगी. कॉमेडियन कपिल शर्मा के जन्मदिन पर लता ने उन्हें तोहफ़ा भेजा जिसके बाद ये अटकलें लगने लगीं कि शायद वो उनके शो कॉमेडी नाइट्स विद कपिल पर मेहमान बनकर भी जाने वाली हैं. |
| DATE: 2014-04-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1031] TITLE: राष्ट्रीय पुरस्कार: शिप ऑफ थीसियस सर्वश्रेष्ठ फिल्म |
| CONTENT: भारत सरकार ने बुधवार को 61वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों की घोषणा की. आनंद गांधी निर्देशित फ़िल्म शिप ऑफ़ थीसियस को साल 2013 की सर्वेश्रेष्ठ फ़िल्म और हंसल मेहता को हिन्दी फ़िल्म शाहिद के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला है. शाहिद के लिए ही अभिनेता राजकुमार राव को सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिए संयुक्त रूप पुरस्कार दिया गया है. राजकुमार को सर्वेश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मलयाली अभिनेता सूरज वेंजारामूदू के साथ संयुक्त रूप से दिया गया है. राकेश ओमप्रकाश मेहरा निर्देशित भाग मिल्खा भाग को साल 2013 की सर्वश्रेष्ठ मनोरंजक फ़िल्म का पुरस्कार दिया गया है. जॉली एलएलबी में सौरभ शुक्ला को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार दिया गया है. सामाजिक मसलों पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मराठी फिल्म तुह्या धर्म कोंचा को दिया गया है जबकि सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म का पुरस्कार हिन्दी फ़िल्म काफल को मिला है. साल 2013 की सामाजिक मसलों पर सर्वश्रेष्ठ ग़ैर-फ़ीचर फ़िल्म का पुरस्कार हिन्दी फ़िल्म गुलाब गैंग को मिला है. |
| DATE: 2014-04-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1032] TITLE: 16 घंटे भूखी रहीं प्रियंका चोपड़ा! |
| CONTENT: कम समय होने के बावजूद काम को जल्दी पूरा कर लेना कोई बॉलीवुड अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा से सीखे. हाल ही में उन्होनें अपनी मैरी कॉम टीम के साथ 16 घंटे बिना कुछ खाए पीए धर्मशाला में शूट ख़त्म किया. उन्होनें अपने क्रू के साथ इस दौरान न तो लंच किया और न ही डिनर. अधिकारियों से सिर्फ़ एक दिन की इजाज़त और भारी बारिश ने फ़िल्म करें मैरी कॉम की पूरी टीम को ये दृश्य एक ही दिन में फ़िल्माने के लिए विवश कर दिया. मैरी कॉम पर बन रही इस फ़िल्म में प्रियंका चोपड़ा मैरी कॉम की ही भूमिका निभा रही हैं और वो इसके लिए काफ़ी डाइटिंग भी कर रही हैं. पीके और बॉम्बे वेलवेट को साल की दो सबसे बड़ी फ़िल्म्स माना जा रहा है. दोनों ही फ़िल्मों के निर्माता साल के अंत में दिसंबर की 25 तारीख़ को इन फ़िल्मों को रिलीज़ करना चाहते हैं. लेकिन दोनों ही बड़े बजट फ़िल्में हैं और इसी के चलते ऐसी ख़बरें आ रहीं हैं कि पीके के निर्माताओं ने अपनी फ़िल्म को बॉम्बे वेलवेट से एक हफ़्ता पहले रिलीज़ करने का फ़ैसला लिया है. पीके में मुख्य भूमिका में हैं अभिनेता आमिर ख़ान और बॉम्बे वेलवेट में दिखेंगे रणबीर कपूर. फैशन डिज़ाइनर कवि और फ़िल्ममेकर मुज़्ज़फ़र अली मशहूर कवि रूमी की कविताओं पर फ़िल्म बनाने की सोच रहे हैं. उन्होंने पहले फ़िल्म उमराव जान और गबन जैसी फ़िल्मों में निर्माता और निर्देशक की भूमिका निभाई है. उनके बेटे शाद अली भी एक फ़िल्म निर्देशक हैं और उन्होनें साथिया बंटी और बबली और झूम बराबर झूम जैसी फ़िल्मों का निर्देशन किया है. |
| DATE: 2014-04-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1033] TITLE: जिसने दी 'बेबी डॉल' सनी लियोनी को आवाज़ |
| CONTENT: फ़िल्म रागिनी एमएमएस-2 के एक गीत बेबी डॉल ने पिछले कुछ दिनों से भारत में धूम मचा रखी है. पर्दे की बेबी डॉल यानी सनी लियोनी को तो सब जानते हैं लेकिन हाल ही में मुझे मौका मिला उस आवाज़ की मालिक कनिका कपूर से मिलने का जिसने इस गीत को अपनी आवाज़ दी. और जब बात निकली तो दूर तलक गई. बेबी डॉल बॉलीवुड में मेरा पहला गाना है. मैं ब्रिटेन में कुछ समय से गा रही हूं. मैं इंतज़ार कर रही थी कि मेरा अगला गाना धमाकेधार होना चाहिए. इसी बीच एकता कपूर ने मुझसे संपर्क किया और कहा कि उन्हें मेरा अंदाज़ चाहिए. जब मैने बेबी डॉल गाया था तो करीब करीब 12 घंटे लगातार स्टूडियो में बीते थे. एक दिन में सब हो गया. लेकिन तब मुझे नहीं पता था कि सनी लियोनी कौन हैं. मुझसे कहा गया था कि इस गाने को कामुक अंदाज़ में गाना है. मैंने मेहनत की और नतीजा सबके सामने है. मैं लखनऊ में पैदा हुई वहीं स्कूल गई. पंडित गणेश प्रसाद मिश्रा जी से 12 साल तक शास्त्रीय संगीत सीखा है मैंने संगीत में मास्टर्स किया है. 17 साल की उम्र में मैं लंदन आ गई. पूरी तरह से गाना नहीं छोड़ा कभी. लेकिन ये सोचा नहीं था कि संगीत इस तरह मेरी ज़िंदगी में वापस आ जाएगा. मेरे परिवार और मेरे बच्चों ने मेरा बहुत साथ दिया. मैं बस इतना जानती हूँ कि चाहे कुछ भी हो जाए ज़िंदगी में अगर आप ख़ुद से मेहनत नहीं करेंगे तो कुछ नहीं हो सकता. शास्त्रीय संगीत की आपने बात की शास्त्रीय संगीत की समझ होना कितना फ़ायदेमंद है एक प्ले बैक सिंगर के लिए. मैं ख़ुशकिस्मत हूँ कि मुझे शास्त्रीय संगीत की ट्रेनिंग मिली है. आप अगर डॉक्टर बनना चाहते हैं तो ट्रेनिंग तो लेनी पड़ेगी न. बिना प्रशिक्षण के आप पॉपस्टार डिवा तो बन सकते हैं लेकिन सच्चे कलाकार नहीं. मैं आज भी रोज़ रियाज़ करती हूँ चाहे कुछ भी हो जाए. अपने घर में चलते फिरते भी गाती ही रहती हूँ. घर में एक छोटा सा स्टूडियोनुमा कमरा है. जैसे जैसे आप ज़िंदगी को क़रीब से देखते हैं तो ज़िंदगी का दर्द आपकी आवाज़ में समाने लगता है. सच बताऊँ तो एक दर्द ही है जो दूसरे इंसान को छू जाता है. अगर आपने उस दर्द को आवाज़ में समा लिया तो ये संगीत दूसरे इंसान को छू जाता है. मैं कटरीना दीपिका कई हीरोइनों के लिए गा रही हूँ बड़ी फ़िल्मों के लिए आने वाले दिनों में. ज़्यादा कुछ नहीं बोलना चाहूँगी अभी. ये सारे अलग मिजाज़ के गाने होंगे. हर महीने आप मेरा कोई न कोई गाना सुनेंगे. आईपीएल में शाहरुख़ के साथ परफॉर्म करूँगी. कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा होग |
| DATE: 2014-04-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1034] TITLE: 'क्वीन' की कहानी पर पहले भी बन चुकी है फिल्म! |
| CONTENT: दर्शकों और फ़िल्म आलोचकों से ज़बरदस्त तारीफ़ें और बॉक्स ऑफ़िस पर सफलता बटोरने वाली फ़िल्म क्वीन को लेकर एक नया विवाद सामने आया है. एक अंग्रेज़ी अख़बार में छपी ख़बर के मुताबिक़ क्वीन की कहानी अभिज्ञान झा नाम के एक शख़्स की है और इस पर पहले ही फ़िल्म बन चुकी है. रिपोर्ट के अनुसार इस कहानी पर फिर ज़िंदगी नाम की फ़िल्म बनी थी जिसमें मिलिंद सोमन और गुल पनाग ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं. अब नज़रें इस बात पर टिकी हैं क्या अभिज्ञान झा किसी तरह की क़ानूनी मदद लेते हैं या नहीं. फ़िल्म क्वीन का निर्देशन विकास बहल ने किया था और कंगना रानाउत को इस फ़िल्म से बहुत तारीफ़ मिली. अमिताभ बच्चन ने लोकप्रिय टीवी रिएलिटी शो कौन बनेगा करोड़पति सीरीज़ के आठवें संस्करण के लिए शूटिंग शुरू कर दी है. कौन बनेगा करोड़पति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय टीवी शो हू वांट्स टू बी ए मिलिअनेयर का भारतीय रूपांतरण है. अमिताभ केबीसी के छह संस्करणों की मेज़बानी कर चुके हैं. सिर्फ़ तीसरे संस्करण के मेजबान शाहरुख ख़ान रहे थे. अमिताभ ने अपने ब्लॉग पर रविवार को लिखा सुबह सुबह केबीसी के आठवें संस्करण का प्रोमो शूट पूरा किया. फ़िल्मकार सत्यजीत रे की बांग्ला क्लासिक महानगर 18 अप्रैल को भारत के चार महानगरों समेत बेंगलुरू अहमदाबाद और पुणे में रिलीज़ होगी. इस फ़िल्म को डिजिटल तकनीक की मदद से संरक्षित किया गया है. 1963 में आई यह फ़िल्म इस बार अंग्रज़ी सब-टाइटल के साथ प्रदर्शित की जाएगी. ब्रिटिश फ़िल्म संस्थान ने पिछले साल इस फ़िल्म की 50वीं सालगिरह के मौक़े पर इसके संरक्षित संस्करण को प्रदर्शित किया था. नरेंद्रनाथ मित्रा की कहानी पर आधारित महानगर ने 1964 में आयोजित बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में सिल्वर बियर पुरस्कार जीता था. |
| DATE: 2014-04-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1035] TITLE: रजनीकांत जोक्स पर क्या हंसती हैं उनकी बेटी |
| CONTENT: एक दफ़ा रजनीकांत का पर्स कहीं खो गया. उसके बाद पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी छा गई. एक बार रजनीकांत 11वें फ़्लोर से कूद गए लेकिन ज़मीन पर नहीं गिरे. जानते हैं क्यों क्योंकि वो रजनीकांत हैं. गुरुत्वाकर्षण का नियम मानने के लिए बाध्य नहीं हैं. वैज्ञानिकों ने जब पहली बार मोबाइल फ़ोन का आविष्कार किया और उसे ऑन किया तो स्क्रीन पर लिखा था- टू मिस्ड कॉल फ़्रॉम रजनीकांत. ऐसे तमाम जोक्स सालों से चले आ रहे है जिनका रजनीकांत के प्रशंसक जमकर लुत्फ़ उठाते हैं. लेकिन ख़ुद रजनीकांत का परिवार इन चुटकुलों को कैसे लेता है. रजनीकांत की बेटी सौंदर्या रजनीकांत अपने अप्पा पर बने इन जोक्स पर क्या प्रतिक्रिया देती हैं. मीडिया से बात करते हुए सौंदर्या ने कहा इन जोक्स के पीछे ये भावना होती है कि रजनीकांत कुछ भी कर सकते हैं. वो नामुमकिन काम भी कर सकते हैं. तो हमें इन चुटकुलों से कोई समस्या नहीं. हम सब इन जोक्स का भरपूर लुत्फ़ उठाते हैं. सौंदर्या रजनीकांत ने अपने पिता रजनीकांत को लेकर कोचेडियान नाम की फ़िल्म बनाई है. ये फ़िल्म मोशन कैप्चर तकनीक पर आधारित है जिसमें कलाकारों के शरीर को उनके हाव-भाव को स्कैन करके फिर उसे एनिमेशन से मिलाया जाता है. फ़िल्म में दीपिका पादुकोण भी लीड रोल में हैं. लंबे समय से बन रही इस फ़िल्म की रिलीज़ के बारे में सौंदर्या ने बताया कि फ़िल्म का पोस्ट प्रोडक्शन काम चल रहा है और ये चुनाव के बाद रिलीज़ होगी. सौंदर्या ने हालांकि फ़िल्मों में अपना करियर बतौर निर्देशक शुरू किया है लेकिन वो ख़ुद भी हीरोइन बनने की काबलियत रखती हैं तो ऐसे में क्या उन्हें कभी फ़िल्मों के प्रस्ताव नहीं मिले इसके जवाब में वो कहती हैं देखिए हर स्टार किड को फ़िल्मों के प्रस्ताव मिलते हैं इसमें कोई नई बात नहीं है. लेकिन मैंने तय कर लिया था कि मुझे क्या करना है. कैमरे के पीछे का काम मुझे हमेशा से ही आकर्षित करता रहा है. क्या उनके पिता रजनीकांत नहीं चाहते थे कि वो अभिनेत्री बने इसके जवाब में सौंदर्या ने कहा ये सच है कि मेरे पिता ने कभी मुझे अभिनेत्री बनने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया. लेकिन मैं अगर हीरोइन बनने की इच्छा ज़ाहिर करती तो वो मना भी नहीं करते. लेकिन मैं ख़ुद कभी अभिनेत्री नहीं बनना चाहती थी. उन्हें कब पता चला कि रजनीकांत इतने बड़े स्टार हैं और इसका उनकी निजी ज़िंदगी में क्या असर पड़ा. इसके जवाब में सौंदर्या बोलीं जब मैं पैदा हुई तभी अप्पा बहुत बड़े स्टार बन चुके थे. वो शूटिंग के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते थे. लेकिन हमारी मां ने मुझे और मेरी बहन ऐश्वर्या का लालन-पालन बहुत अच्छे तरीके से किया. उनकी दी गई सीख की वजह से ही हम दोनों रजनीकांत जैसे सुपरस्टार की बेटी होने की वजह से भी हम दोनों घमंड का शिकार नहीं हुए. अपने पिता के बारे में बात करते हुए सौंदर्या ने कहा उनका रवैया हर एक शख़्स के प्रति एक जैसा रहता है. चाहे वो किसी बेहद अमीर और प्रभावशाली व्यक्ति से मिलें या किसी साधारण इंसान से. वो सबको सम्मान देते हैं. पर्दे पर तो वो सुपरस्टार हैं हीं. लेकिन असल ज़िंदगी में भी वो जैसे हैं उसकी वजह से वो पूजे जाते हैं. सौंदर्या ने बताया कि बॉलीवुड में अमिताभ बच्चन जीतेंद्र और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे सितारे उनके पिता के बहुत अच्छे मित्र हैं और परिवार की तरह हैं. |
| DATE: 2014-04-14 |
| LABEL: entertainment |
| [1036] TITLE: 'पेज 3' पार्टी में शामिल होना चाहते हैं ? |
| CONTENT: शाम को साढ़े आठ बजे पार्टी पर पहुंचने का टाइम था. ये पार्टी डिज़ाइनर रोहित वर्मा की बहन स्वाति लूंबा के जन्मदिन की थी. रोहित बिग बॉस-3 में नज़र आए थे और उसके बाद से वो ज़्यादातर सिर्फ़ पेज 3 पार्टियों पर ही दिखे. मैं पहुंचा पार्टी पर रात 10 बजे. माहौल एकदम शांत संगीत के लिए डीजे था तो सही पर गाने शायद ख़ुद के लिए बजा रहा था. पार्टी में किसी ने मुझसे नहीं पूछा कि आप कौन हैं कहां से तशरीफ़ लाए हैं माहौल इतना शांत देखकर मैं वहाँ से निकलने का मन बनाने लगा. पर उसी वक्त मीडिया के कुछ लोग कैमरा लिए दिखे. रोहित वर्मा जिनकी ये पार्टी थी उनका इंटरव्यू लेने के लिए. जैसे ही इन पत्रकारों ने कैमरे पर ये औपचारिक इंटरव्यू ख़त्म किया तो मैंने एक से पूछा भाई पार्टी शुरु हुए दो घंटे हो गए लेकिन कोई रौनक ही नहीं है. वो बोला ऐसा ही होता है एक बार 12 बजने दो फिर तुम्हारा घर जाने का मन ही नहीं करेगा. धीरे-धीरे लोग आने शुरू हुए. कहने को ये सब सेलेब्रिटी थे पर मैंने आज तक किसी को देखा नहीं था. हर लड़की और लड़के ने पार्टी की थीम के हिसाब से ही कपड़े पहन कर रखे थे जिन्हें आम लोग जो पार्टी वगैरह ज़्यादा अटैंड करते नहीं बेढंगे पाएंगे. पार्टी में मेरी नज़र एक महिला पर पड़ी जो काफी हंस-हंस कर एक पत्रकार से बात कर रहीं थी. मैं भी वहां पहुंच गया. पता चला कि ये भारत की सबसे यंग मिस इंडिया हैं. जैसा उन्होंने बताया. थोड़ी देर में पता चला की ये तो फ़िल्म वीराना की हीरोइन साहिला चड्ढा हैं. वो कह रही थीं 80 के दशक में मैंने एक-एक कर 50 फ़िल्में की जैसे कि वीराना टार्ज़न सौ साल बाद. फिर जब मैंने अपनी दिलचस्पी उनके इस सफल करियर में और दिखाई तो पता चला कि ये शाहरुख़ खान और सलमान के साथ भी काम कर चुकी हैं. उन्होंने कहा आपने मुझे हम आपके हैं कौन में तो ज़रूर देखा होगा मैं वही हूं जो गीत दीदी तेरा देवर दीवाना में लड़का बनती है. मैंने पूछा आप यहाँ कैसे वो बोलीं मुझे पेज 3 पार्टियों पर बुलाया जाता है और अब मैं फ़िल्मो में कम बैक करने वाली हूं. मुझे आज भी लोग टार्ज़न की शीला के नाम से जानते हैं. इस पार्टी पर शेख़ी बघारने वालों की कमी नहीं थी. मेरी नज़र गई एक ऐसे इंसान पर जिसके साथ तीन बॉडी गार्ड चल रहे थे. मैंने सोचा यहां किसकी ज़िंदगी को ख़तरा है जो ऐसे बॉडी गार्ड लेकर चल रहा है. मैंने बॉडीगार्ड से पूछा कौन है ये साहब बॉडीगार्ड ने अपने सेठ की तारीफ की और कहा ये दुबई के अमीर व्यापारी हैं. हॉलीवुड की फ़िल्मों में पैसा लगाते हैं मुंबई सिर्फ पार्टी करने आते हैं. दिन में तीन-तीन बार कपड़े बदलते हैं. मैंने हिम्मत करके इस सेठ से बात करने की कोशिश कि जो सिर्फ 23 साल का लग रहा था. मैंने पूछा सर आप पार्टी में बॉडीगार्ड के साथ क्यों आए हो और कहां से आए होवो बोले मैं गुजरात से आया हूं रे ये पार्टी में रौब डालने के लिए चमचे रखने पड़ते हैं. मेरा बिज़नेस है वहां. आम तौर पर पेज 3 पार्टियों के बारे में कोई तब तक नहीं लिखता जब तक कोई ग्लैमर ना हो. पर यहां तो टीवी के कुछ ग्लैमरस चेहरे भी मौजूद थे. वो एक्टर-एक्ट्रेस जिनके पास एक समय पर काम और नाम तो था पर अब नहीं. खैर 12 बज गए और पार्टी में अब दम दिखने लगा. शोर बढ़ने लगा और केक काटने का वक़्त हो गया. |
| DATE: 2014-04-14 |
| LABEL: entertainment |
| [1037] TITLE: चंबल में जाकर उड़ गए ‘रिवॉल्वर रानी’ के होश |
| CONTENT: बॉलीवुड की क्वीन कंगना रानाउत आजकल अपनी नई फ़िल्म रिवॉल्वर रानी का प्रचार कर रही हैं. फ़िल्म में कंगना एक लेडी डॉन का किरदार निभा रही हैं जिसे फ़िल्म के ट्रेलर में कुछ यूं बयां किया गया है हम हैं अल्का सिंह आई लब फैशन फन और गन. फ़िल्म रिवॉल्वर रानी में कंगना ने जितने डॉयलॉग नहीं बोले उतनी गोलियां चलाई हैं और चलाएं भी क्यों न आखिर रिवॉल्वर रानी जो ठहरी. लेकिन रील लाइफ़ में दनादन गोलियां चलाने वाली कंगना के उस वक़्त होश ही उड़ गए जब उन्हें पता चला कि फ़िल्म के सेट पर आने वाले स्थानीय दूध वाले के पास भी गन है और वो भी असली. ये वाक़या कुछ यूं है कि फ़िल्म को वास्तविक लुक देने के लिए फ़िल्म के निर्देशक साई कबीर ने शूटिंग के लिए चंबल ज़िले के एक गांव को चुना. शूटिंग शुरू करने से पहले कंगना लोकेशन को लेकर काफी उत्साहित थी लेकिन शूटिंग के दौरान कंगना को मालूम चला कि इस गांव में बच्चे भी अपने पास बंदूक रखते हैं और यहां तक कि पास के गांव से यूनिट के लिए दूध लाने वाले के पास भी एक बंदूक रहती है. कंगना ने बताया कबीर फ़िल्म के निर्देशक ने फ़िल्म शुरू करने से पहले मुझे चंबल में शूटिंग के बारे में कुछ बताया नहीं था. मुझे बस कहा गया कि फ़िल्म को नेचुरल लुक के लिए हमें वहां ले जाया जा रहा है. वर्ना मैं वहां कभी नहीं जाती. वैसे फ़िल्म में कंगना की किरदार ग्रे शेड लिए हुए है और इस किरदार को करने की वजह से कंगना की उनकी बहन से काफ़ी बहस भी हो गई थी. कंगना ने बताया मेरी बहन को लगता था कि अभी अभी क्वीन से मेरी इमेज अलग तरह की हो गई है. रिवॉल्वर रानी में निगेटिव किरदार करने से मेरी लोकप्रियता घट सकती है. पर मैंने इस फ़िल्म को करने का मन बना लिया था. इस फ़िल्म में कंगना के अलावा कॉमेडियन वीर दास और पीयूष मिश्रा भी हैं लेकिन जैसा नाम से ज़ाहिर है फ़िल्म की मुख्य रूप से कंगना पर आधारित है. कंगना ने ये भी माना की क्वीन की सफलता के बाद इस फ़िल्म से उम्मीदें काफ़ी बढ़ गई हैं. वो कहती हैं मुझे मालूम है कि मेरी पिछली फ़िल्म के बाद दर्शकों की उम्मीद मुझसे ज़्यादा बढ़ गई हैं. मेरा बस चलता तो इन दोनों फ़िल्मों के बीच चार से पांच महीने का अंतराल रहता. लेकिन इन दोनों फ़िल्मों और इनके किरदारों की तुलना न करें. दोनों कहानियां किरदार उनके हालात बिल्कुल अलग हैं. कंगना की ये नई फ़िल्म अप्रैल 2014 के आख़िरी हफ़्ते में सिनेमाघरों में आ सकती है. |
| DATE: 2014-04-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1038] TITLE: पूजा की बोल्डनेस देती है प्रेरणा: आलिया भट्ट |
| CONTENT: मात्र 17 साल की उम्र में इन्हें मिल गई करन जौहर की स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर जिससे ये रातों रात एक उभरता हुआ सितारा बन गईं. फिर आई निर्देशक इम्तियाज़ अली के साथ हाईवे और इनका काम उस फ़िल्म में बहुत सराहा गया. ये हैं फ़िल्म निर्देशक और निर्माता महेश भट्ट की बेटी आलिया भट्ट जिनकी फ़िल्म टू स्टेट्स इस 18 अप्रैल को रिलीज़ है. फ़िल्म के प्रचार के दौरान बीबीसी ने की इनसे बातचीत जहां आलिया ने अपने पिता महेश भट्ट मां सोनी राज़दान और बड़ी बहन पूजा भट्ट के बारे में खुल कर बातें कीं. आलिया अब 21 साल की हैं. आलिया के पिता निर्देशक हैं और मां एक अभिनेत्री रह चुकी हैं. तो वो कौन सी चीज़ें हैं जो इन्होनें अपने माता-पिता से सीखीइस बात पर आलिया बोलीं मेरे पापा की इच्छा शक्ति बहुत मज़बूत है और मैंने उनसे यही सीखा है. अगर उन्हें कोई चीज़ नहीं खानी तो वो नहीं खाते और ये चीज़ मुझे पिज़्ज़ा जैसी चीज़ों से दूर रखने में काफी मदद करती है और मैं डाइट भी आराम से कर लेती हूं. मां के बारे में वो कहती हैं मेरी मां बहुत ही समझदार हैं और वो हर बात को बड़े आराम से सुनती हैं. वो दूसरों के बारे में पहले सोचती हैं और अपने बारे में बाद में. और एक और चीज़ जो मैं अपनी मां से सीखना चाहती हूं पर सीख नहीं पाई वो है उनकी कुकिंग. वो बहुत ग़ज़ब का खाना बनाती हैं और मैं तो अंडा भी नहीं बना पातीं. आलिया अपनी बड़ी बहन और निर्देशक और निर्माता पूजा भट्ट के भी काफ़ी क़रीब हैं. आलिया उनके बारे में कहती हैं पूजा बहुत ही बेबाक़ और साफ़ बोलती हैं. वो किसी की परवाह नहीं करतीं और वो शुरू से ही ऐसी हैं. बॉलीवुड में जहां लोग किसी विवाद में फंसने के डर से दिल की बात नहीं बोलते और डिप्लोमेटिक होते हैं वहीं पूजा पूरी तरह ईमानदारी के साथ सब कुछ बोल देती हैं. वो आगे कहती हैं पूजा ने जब अपना एक्टिंग करियर शुरू किया था तब भी वो अपने समय से काफ़ी आगे थीं. वो हमेशा अपने दिल की सुनती हैं और लोग क्या कहेंगे इस बात की परवाह नहीं करतीं. उनकी यही बात मुझे काफी प्रेरणा देती है. आलिया भट्ट ने अपने पिता महेश भट्ट की फ़िल्म के साथ करियर क्यों नहीं शुरू किया इस पर आलिया कहती हैं देखिए अगर मेरे पास 25 साल की उम्र तक किसी फ़िल्म का ऑफर नहीं आता तो मैं फिर अपने पिता से ही कहती कि वो मेरे लिए फ़िल्म बनाएं. लेकिन मैं शुक्रगुज़ार हूं करण जौहर की जिन्होंने सिर्फ़ 17 साल की उम्र में ही मुझे मौक़ा दे दिया. स्टूडेंट ऑफ द ईयर और हाइवे दोनों ही फिल्मों में आलिया के काम को सराहना मिली. ऐसे भी ख़बरें थीं कि आलिया भट्ट विशेष फिल्म्स की आशिक़ी 2 करने वाली थीं. इस बात पर सफ़ाई देते हुए आलिया ने कहा मैं उस वक़्त स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर में व्यस्त थीं और मैं बस इतना ही कहूंगी कि अगर मैं आशिक़ी 2 करती तो मैं हाईवे न कर पाती. आलिया भट्ट की फ़िल्म टू स्टेट्स 18 अप्रैल को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2014-04-12 |
| LABEL: entertainment |
| [1039] TITLE: फ़िल्म रिव्यू: 'भूतनाथ रिटर्न्स' |
| CONTENT: टी सीरीज़ और बी आर फ़िल्म्स की भूतनाथ रिटर्न्स साल 2008 की भूतनाथ का सीक्वल है. भूतनाथ अमिताभ बच्चन के उसके साथी भूत मज़ाक उड़ाते हैं क्योंकि वो किसी बच्चे को डरा नहीं पाता. वो भगवान से फिर एक मौक़ा मांगता है ताकि मनुष्य अवतार में वो धरती पर आए और किसी बच्चे को डरा पाए. धरती पर भूतनाथ आता है. उसे सिर्फ़ एक छोटा बच्चा अखरोट पार्थ भालेराव ही देख पाता है. जल्द ही अखरोट और भूतनाथ के बीच दोस्ती हो जाती है. भूतनाथ उसे और उसकी ग़रीब मां को ग़रीबी के चंगुल से निकालने की ठान लेता है. इस बीच चुनाव नज़दीक आ जाते हैं. स्थानीय भ्रष्ट नेता भाऊ बोमन ईरानी फिर से वोटरों को लुभाकर चुनाव जीतना चाहता है. अखरोट भूतनाथ को भाऊ के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने के लिए तैयार कर लेता है. पहले तो भाऊ उसे गंभीरता से नहीं लेता लेकिन जब भूतनाथ धीरे-धीरे लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगता है और उसे मीडिया का कवरेज मिलने लगता है तो भाऊ के होश फ़ाख़्ता हो जाते हैं. वो समझ जाता है कि भूतनाथ को रोका ना गया तो उसका चुनाव हारना तय है. तब भाऊ अखरोट को मारने का प्लान बनाता है और अपने आदमियों को उसकी हत्या करने के लिए भेजता है. उसे लगता है कि भूतनाथ अखरोट को बहुत प्यार करता है और उसकी मौत के बाद वो चुनाव से अपना नाम वापस ले लेगा. अखरोट एक बार तो बच जाता है लेकिन अगली बार वो भाऊ के गुंडों के हमले में बुरी तरह से घायल हो जाता है. उसे अस्पताल में भर्ती कराया जाता है. आगे क्या होता है क्या अखरोट की जान बच जाती है. चुनाव में भाऊ जीतता है या भूतनाथ यही फ़िल्म की कहानी है. भूत का चुनाव लड़ना वैसे तो ये ख़्याल ही बड़ा हास्यास्पद है लेकिन नीतेश तिवारी और पीयूष गुप्ता ने अपनी दमदार कहानी में बड़ी ख़ूबसूरती से इस प्लॉट को उभारा है. जिसकी वजह से फ़िल्म बड़ी मनोरंजक और मज़ेदार बन पड़ी है. फ़िल्म मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर एक कटाक्ष है. देश में व्याप्त भ्रष्टाचार सरकारी कर्मचारियों के ग़ैर ज़िम्मेदाराना बरताव और अपराधियों की राजनेताओं से सांठगांठ जैसे विषयों को फ़िल्म में बड़ी ख़ूबी से मनोरंजक अंदाज़ में दिखाया गया है जिससे फ़िल्म मज़ेदार भी लगती है और सोचने पर भी मजबूर करती है. ये ज़रूर है कि कई हिस्सों में फ़िल्म खींची गई लगती है. लेकिन अपने मौलिक विषय और हास्य की वजह से दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब रहती है. भूतनाथ पानी की कमी गंदगी खस्ताहाल सड़कों की वजह से लोगों को होने वाली परेशानियों जैसे मुद्दे उठाता है जिसकी वजह से आम दर्शक फ़िल्म से जुड़ाव महसूस करेंगे. देश में चुनावी माहौल चल रहा है ऐसे में इस फ़िल्म की अपील और ज़्यादा हो जाती है. फ़िल्म के कुछ दृश्य तो बेहतरीन बन पड़े हैं. जैसे जब भूतनाथ अखरोट की ग़रीबी दूर करने के लिए उसकी मदद करता है जिसके तहत अखरोट लोगों से भूत भगाने का दावा करता है. एक और सीन जिसमें भूतनाथ एक वकील के पास चुनाव लड़ने की सलाह मांगने जाता है. साथ ही वो दृश्य जब भाऊ को पता लगता है कि एक भूत उसके ख़िलाफ़ चुनाव में खड़ा होने वाला है. भूतनाथ की भाऊ से उसके टॉयलेट में मुलाक़ात वाला सीन भी बेहतरीन है. फ़िल्म में शाहरुख़ ख़ान और रणबीर कपूर अतिथि भूमिकाओं में हैं. दोनों के फ़िल्म में संक्षिप्त अपियरेंस को तालियां मिलेंगीं. फ़िल्म के संवाद शानदार हैं और लोगों को ख़ासे पसंद आएंगे. फ़िल्म के संवादों में ज़बर्दस्त हास्य है. अमिताभ बच्चन ने भूतनाथ के किरदार में जान डाल दी है और एक बार फिर बता दिया है कि वो कितने महान कलाकार हैं. उन्होंने बड़ी खूबी और सहजता से ये रोल निभाया है और ये कल्पना भी नहीं की जा सकती कि उनके अलावा और कौन ये रोल कर सकता था. उनकी कॉमिक टाइमिंग अब भी लाजवाब है और भावनात्मक दृश्यों में भी वो बेहतरीन रहे हैं. उनका डांस भी हमेशा की तरह गरिमापूर्ण रहा है. बोमन ईरानी ने भी एक बार फिर अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मना दिया है. वो कॉमिक सींस में बड़े मज़ेदार लगे हैं और साथ ही खलनायक के तौर पर ख़तरनाक भी लगे हैं. बाल कलाकार मास्टर पार्थ शंशाक भालेराव ने एक अवॉर्ड विनिंग परफ़ॉर्मेंस दी है. इस फ़िल्म के बाद उनके कई प्रशंसक बनने तय हैं ख़ास तौर से बच्चों के बीच वो बहुत मशहूर होने वाले हैं. उनकी संवाद अदायगी कमाल की है और अमिताभ बच्चन बोमन ईरानी जैसे दिग्गज कलाकारों के सामने उन्होंने जिस सहजता और आत्मविश्वास से कैमरे का सामना किया है वो क़ाबिले-तारीफ़ है. शाहरुख़ ख़ान रणबीर कपूर और अनुराग कश्यप अपनी अतिथि भूमिकाओं में अच्छे लगे हैं. संजय मिश्रा ने भी बड़ा स्वाभाविक अभिनय किया है और वो जब-जब पर्दे पर आए हैं अपनी छाप छोड़ी है. बाकी कलाकार भी अच्छे रहे हैं. नीतेश तिवारी का निर्देशन आला दर्जे का है. उन्होंने मौजूदा दौर के हिसाब से ये फ़िल्म बनाई है और इसमें स्वस्थ हास्य का बड़ी चतुराई से समावेश किया है. फ़िल्म के संगीत की बात करें तो पार्टी तो बनती है और पार्टी विद द भूतनाथ गाने पहले ही हिट हो चुके हैं. बाकी गीत साधारण हैं. फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफ़ी और सेट्स लाजवाब हैं. कुल मिलाकर भूतनाथ रिटर्न्स एक मनोरंजक फ़िल्म है. हालांकि कई जगह पर फ़िल्म ऊबाई भी है लेकिन फिर भी दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए इसमें पर्याप्त मसाला है. |
| DATE: 2014-04-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1040] TITLE: शर्लिन की जगह ली सनी लियोनी ने |
| CONTENT: अपनी फ़िल्म रागिनी एमएमएस-2 की कामयाबी के बाद अब अभिनेत्री सनी लियोनी ने छोटे पर्दे पर आने का फ़ैसला कर लिया है. वो रियलिटी टीवी शो स्पिलिट्सविला के सातवें संस्करण में मेज़बान की भूमिका में दिखेंगी. इससे पहले शो की मेज़बानी शर्लिन चोपड़ा करती थीं. सनी इससे पहले रियलिटी टीवी शो बिग बॉस-5 में भी नज़र आ चुकी हैं. हालांकि शो के लिए अभी सनी लियोनी ने अपनी डेट्स नहीं दी हैं क्योंकि वो अपनी आगामी फ़िल्मों की शूटिंग में व्यस्त हैं. जैसे ही फ़िल्मों से उन्हें फ़ुरसत मिलेगी वो एक साथ डेट्स इस शो को देंगी. सुजॉय घोष की फ़िल्म दुर्गा रानी सिंह से नाम वापस लेने के बाद अब विद्या बालन मोहित सूरी की फ़िल्म हमारी अधूरी कहानी से भी बाहर हो सकती हैं. कथित तौर पर स्वास्थ्य संबंधी वजहों से विद्या ये फ़ैसला ले सकती हैं. ख़बरों के मुताबिक़ अगर विद्या ऐसा करती हैं तो निर्देशक मोहित सूरी श्रद्धा कपूर को उनकी जगह पर ले सकती हैं. हमारी अधूरी कहानी में इमरान हाशमी और राजकुमार राव की भी अहम भूमिकाएं हैं. बॉलीवुड में शॉटगन के नाम से मशहूर शत्रुघ्न सिन्हा को 23 से 26 अप्रैल को होने वाले आइफ़ा समारोह में लाइफ़ टाइम अचीवमेंट सम्मान से नवाज़ा जाएगा. शत्रुघ्न सिन्हा को सिनेमा में आए 45 साल हो चुके हैं. शत्रुघ्न सिन्हा ने इस सम्मान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा मेरे लिए बड़े गौरव की बात है. मेरा करियर काफ़ी लंबा रहा है और इस सम्मान से साबित होता है कि मुझे लोगों का और बॉलीवुड परिवार से बहुत प्यार मिला. मैं इसके लिए सभी का शुक्रगुज़ार हूं. |
| DATE: 2014-04-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1041] TITLE: महमूद की 'बॉम्बे टू गोआ' फिर बड़े परदे पर |
| CONTENT: बस में नाचते-गाते अरुणा ईरानी से रोमांस फ़रमाते दुबले-पतले अमिताभ बच्चन याद हैं आपको. एक-दूसरे से लड़ते झगड़ते नोंक-झोंक करते ड्राइवर अनवर अली और कंडक्टर महमूद याद हैं आपको. हम बात कर रहे हैं 1972 की फ़िल्म बॉम्बे टू गोआ की जिसे महमूद ने बनाया था. फ़िल्म ने भले ही उस दौर में बॉक्स ऑफ़िस पर धमाकेदार व्यापार न किया हो लेकिन आने वाले कई सालों तक टीवी पर लोगों ने इसका लुत्फ़ उठाया. भले ही इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद भी अमिताभ बच्चन को स्टारडम पाने के लिए प्रकाश मेहरा की ज़ंजीर तक का इंतज़ार करना पड़ा हो लेकिन बॉम्बे टू गोआ से उन्हें एक पहचान ज़रूर मिली और ख़ुद अमिताभ को यह विश्वास कि वह लंबे होने के बावजूद डांस कर सकते हैं. अब उसी बॉम्बे टू गोआ को फिर से रिलीज़ करने की तैयारियां चल रही हैं और यह बीड़ा उठाया है महमूद के छोटे भाई अनवर अली और उनके परिवार ने. अनवर ने बॉम्बे टू गोआ में बस ड्राइवर की भूमिका निभाई थी. वह बतौर अभिनेता अमिताभ बच्चन की पहली फ़िल्म सात हिंदुस्तानी में भी थे. बीबीसी से बात करते हुए अनवर अली ने बताया कि इस साल महमूद की 10वीं बरसी है और उनको श्रद्धांजलि देने के लिए उनके परिवार ने बॉम्बे टू गोआ को रिलीज़ करने की योजना बनाई है जिसके लिए कुछ वितरकों से और सिनेमाहॉल मालिकों से बात चल रही है. अनवर अली ने बताया 12 अप्रैल को फ़िल्म की प्राइवेट स्क्रीनिंग रखी गई है. जिसमें फ़िल्म से जुड़े कलाकार जैसे अमिताभ बच्चन शत्रुघ्न सिन्हा और दूसरे कलाकार भी आएंगे. उन्होंने बताया कि अमिताभ बच्चन इस समारोह के मुख्य अतिथि होंगे. महमूद ने कई यादगार फ़िल्में दीं. भूत बंगला प्यार किए जा पड़ोसन सहित महमूद की कॉमेडी आज भी उनके प्रशंसक याद करते हैं. ऐसे में उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए बॉम्बे टू गोआ ही क्यों जो अपने ज़माने में ज़्यादा कामयाब भी नहीं थी. इसके जवाब में अनवर अली कहते हैं फ़िल्म महमूद भाईजान के बेहद क़रीब थी. यह एक कॉमेडी फ़िल्म थी. कॉमेडी सभी को पसंद आती है. इस फ़िल्म में आज के दर्शकों को पूरी तरह से 70 के दशक की छाप देखने को मिलेगी. वैसे भी यह फ़िल्म एक सफ़र के ज़रिए ज़िंदगी की कहानी बयां करती है. इसलिए हमने इस फ़िल्म को चुना. लेकिन क्या इस दौर के दर्शकों को यह फ़िल्म पसंद आएगी. इसके जवाब में अनवर अली बोले देखिए महमूद भाई ने हमेशा दिल से फ़िल्में बनाईं. उन्होंने कमाई की कभी परवाह नहीं कीं. लेकिन हां जो लोग बॉम्बे टू गोआ रिलीज़ करेंगे ज़ाहिर सी बात है वह इसके व्यावसायिक पहलू पर भी ध्यान देंगे. लेकिन मेरा दावा है कि फ़िल्म को अच्छी प्रतिक्रिया मिलेगी और यह सबके लिए मुनाफ़े का सौदा साबित होगी. अनवर अली ने फ़िल्म की शूटिंग के वक़्त को याद करते हुए बताया कि सेट पर पूरी तरह से पिकनिक का माहौल रहता था. उन्होंने कहा हालांकि मेरे और अमिताभ के लिए वह समय संघर्ष का दौर था लेकिन उस संघर्ष की भी बड़ी मीठी यादें हैं. हमने बहुत मज़े किए. अमिताभ के बारे में अनवर बोले पहले महमूद भाई हमारे लिए पिता समान थे. अब बच्चन साहब मेरे परिवार के सीनियर सदस्य की तरह हैं. उन्होंने हमारी इस पहल को पूरा समर्थन दिया है. अनवर अली ने बताया कि आईपीएल और चुनाव के बाद ही फ़िल्म को फिर से रिलीज़ किया जाएगा ताकि ज़्यादा से ज़्यादा दर्शक इसका लुत्फ़ उठा सकें. |
| DATE: 2014-04-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1042] TITLE: सानिया बोलीं, शोएब के साथ 'ऑल इज़ वेल' |
| CONTENT: भारतीय टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा ने अपने पति और पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक के साथ कथित मतभेद की ख़बर पर पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ी है. कई दिनों से मीडिया में दोनों के बीच मतभेद की ख़बर चल रही थी और ये तक लिखा गया कि सानिया और शोएब की शादी टूटने के कगार पर है. लेकिन अपनी एक निजी यात्रा के सिलसिले में पाकिस्तान के सियालकोट पहुंची सानिया मिर्ज़ा ने इन ख़बरों को ग़लत बताया. सानिया ने कहा हम दोनों ही खिलाड़ी हैं. इस सिलसिले में हमें लगातार दौरे करने पड़ते हैं. इस वजह से हमारे लिए शादी निभाना आम लोगों की तरह बिलकुल आसान भी नहीं है. हम दोनों अलग-अलग देशों से हैं इसलिए हमें मालूम था कि तनाव होगा लेकिन अब तक हम दोनों ने एक दूसरे का साथ अच्छी तरह से निभाया है. सानिया ने बताया कि वह टेनिस के आगामी टूर्नामेंटों से पहले अपने सास-ससुर और पति के साथ वक़्त बिताने सियालकोट आई हैं. अपनी फ़िल्म टू स्टेट्स के प्रमोशन में जुटे अर्जुन कपूर ने खुलकर लिव-इन रिलेशनशिप की वकालत की है. मीडिया से मुख़ातिब अर्जुन कपूर ने कहा हर किसी को अपनी-अपनी सोच के हिसाब से रिलेशनशिप तय करने का पूरा हक़ है लेकिन मेरी निगाह में लिव-इन बहुत उम्दा चीज़ है. मेरा इस पर पूरा यक़ीन है. उन्होंने कहा मेरे हिसाब से अगर आप अपने पार्टनर के प्रति गंभीर हो तो लिव इन रिलेशनशिप उसे समझने के लिए और उसके साथ ज़िंदगी बिताने के लिए अच्छा विकल्प है. मेरे ख़्याल से शादी से पहले लिव-इन रिलेशनशिप में रहना चाहिए ताकि आप अपने साथी को और वो आपको अच्छी तरह से समझ सके. निर्माता साजिद नाडियाडवाला ने अपनी हाउसफ़ुल सिरीज़ की तीसरी फ़िल्म हाउसफ़ुल-3 के लिए अक्षय कुमार और अभिषेक बच्चन को साइन कर लिया है. अक्षय पहली दोनों हाउसफ़ुल में थे लेकिन अभिषेक पहली बार इस सीरीज़ की किसी फ़िल्म में होंगे. इससे पहले अक्षय कुमार और अभिषेक बच्चन साल 2002 में आई हां मैंने भी प्यार किया में साथ दिखे थे. |
| DATE: 2014-04-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1043] TITLE: बॉलीवुड सितारे जो नहीं डालेंगे वोट! |
| CONTENT: भारत में चुनावी बुख़ार पूरे शबाब पर है और चुनाव आयोग सभी मतदाताओं से बढ़ चढ़कर मतदान करने की अपील कर रहा है. वोटरों को जागरुक बनाने के लिए आमिर ख़ान जैसे सितारे भी चुनाव आयोग की इस मुहिम का हिस्सा हैं. लेकिन तमाम कोशिशों और जागरुकता अभियान के बावजूद बॉलीवुड के कई कलाकार मुंबई में मतदान के दिन यानी 24 अप्रैल को नदारद रहेंगे और वोट नहीं डालेंगे. इसकी वजह है 23 से 26 अप्रैल तक अमरीका के फ़्लोरिडा में चलने वाला आइफ़ा समारोह और कई कलाकारों ने मतदान के बजाय इस समारोह में शिरक़त करना ज़्यादा मुनासिब समझा. हालांकि ऐसा नहीं है कि समूचा बॉलीवुड ही आइफ़ा जा रहा है. कई कलाकार मुंबई में ही रहकर वोट डालने का मन बना चुके हैं. जो कलाकार आइफ़ा जा रहे हैं उनसे जुड़े लोग वोटिंग ना करने के पीछे दलील ये दे रहे हैं कि आइफ़ा समारोह की तिथि चुनाव की घोषणा के बहुत पहले ही निश्चित की जा चुकी थी इस वजह से अब कुछ नहीं किया जा सकता. चलिए नज़र डालते हैं कि कौन-कौन से कलाकार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे और कौन-कौन नहीं. करीना कपूर ख़ान और उनके पति सैफ़ अली ख़ान दोनों ही इन दिनों किसी भी फ़िल्म की शूटिंग में व्यस्त नहीं है लेकिन फिर भी वो मतदान करने नहीं पहुंचेंगे क्योंकि ये दोनों फ़्लोरिडा में होने वाले आइफ़ा समारोह की शोभा बढ़ाएंगे. अक्षय कुमार हाल ही में अपनी फ़िल्म फ़गली के फ़र्स्ट लुक लॉन्च पर नज़र आए. जब उनसे पूछा गया कि क्या वो आइफ़ा के लिए तैयार हैं तो अक्षय कुमार बोले मैं कहीं नहीं जा रहा हूं. मैं 24 अप्रैल को मुंबई में रहूंगा और अपना वोट डालूंगामैं मुम्बई में ही रहूंगा और वोट दूंगा. आमिर ख़ान ने अपने शो सत्यमेव जयते के ज़रिए लोगों से अपील की है वोट के लिए और वो खुद भी काफी उत्साहित है वोट डालने के लिए. आमिर ख़ान 24 अप्रैल को मुंबई में ही रहेंगे और अपने घर के नज़दीक बांद्रा के मतदान केंद्र में जाकर वोट देंगे. अमिताभ बच्चन और उनका पूरा परिवार भी मुंबई में मतदान के दिन मौजूद रहेगा और मताधिकार का इस्तेमाल करेगा. अमिताभ बच्चन पिछले कई चुनावों से अपने मताधिकार का उपयोग करेंगे. प्रियंका चोपड़ा फ़िलहाल मनाली में मैरी कॉम की ज़िंदगी पर बन रही फ़िल्म की शूटिंग कर रही हैं. बहुत जल्द वो मुम्बई पहुंचेगीं लेकिन मुम्बई पहुंचने के बाद भी वोट नहीं डाल सकेगीं क्योंकि वो आते ही आईफ़ा के लिए रवाना हो जाएंगी. फ़रहान अख्तर हमेशा ही सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरुक रहने की बात करते रहते हैं. लेकिन इस बार मतदान जैसा अहम मुद्दा शायद उनकी व्यस्त डायरी में जगह नहीं पा सका है. फ़रहान अख़्तर शाहिद कपूर के साथ मिलकर आइफ़ा समारोह की मेज़बानी करेंगे और वो मतादन के दिन मुंबई से ग़ैरहाज़िर रहेंगे. इसी वजह से शाहिद कपूर भी वोट नहीं डाल पाएंगे. विवेक ओबरॉय के पास भले ही ज़्यादा फ़िल्में ना हों ज़्यादा विज्ञापन ना हों और बॉलीवुड के दूसरे व्यस्त कलाकारों कीा तुलना में काम भी कम हो लेकिन फिर भी वो वोट डालने के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं. विवेक की सास नंदिनी अल्वा बेंगलुरु सेंट्रल से जनता दल सेक्युलर के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं. विवेक के पास उनके प्रचार का तो समय है लेकिन मुंबई में मतदान वाले दिन वो फ़्लोरिडा में आइफ़ा अवॉर्ड्स की शोभा बढ़ा रहे होंगे. रणबीर कपूर इन दिनों श्रीलंका में व्यस्त हैं अपनी फ़िल्म बॉम्बे वेलवेट की शूटिंग में लेकिन उन्होंने दावा किया कि चुनाव से पहले वो मुंबई पहुंच जाएंगे और अपने मदतान के अधिकार का इस्तेमाल करेंगे. अनिल कपूर इस बार शायद ही वोट दे पाएंगे क्योंकि वो भी आइफ़ा समारोह में शामिल होने के लिए 23 अप्रैल को अमरीका रवाना हो जाएंगे. लेकिन उनकी बेटी सोनम कपूर मुंबई में ही रहेंगी और वो अपना वोट डालेंगी. दीपिका पादुकोण की 2013 की सभी फ़िल्मों ने अच्छा काम किया और कई अवार्ड्स अपने नाम किए. अब उम्मीद की जा रही है कि आईफ़ा में भी उन्हीं के नाम की धूम मचेगी. दीपिका ने भी चुनाव के बजाय आइफ़ा को तरज़ीह दी है. वो वोट डालने की जगह आइफ़ा समारोह में परफॉर्म करते दिखेंगी. दीपिका के साथ साथ परिणीति चोपड़ा माधुरी दीक्षित नेने दिया मिर्ज़ा बिपाशा बासु वाणी कपूर ऋतिक रोशन नील नितिन मुकेश और शिल्पा शेट्टी भी वोट नहीं डाल पाएंगे और आइफ़ा में हिस्सा लेने के लिए अमरीका में होंगे. |
| DATE: 2014-04-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1044] TITLE: शाहिद के सवाल पर आता है गुस्सा: सोनाक्षी |
| CONTENT: देश भर में चुनावी मौसम में ख़ासी गर्मी आ चुकी है तो बॉलीवुड में लिंक-अप की ख़बरें ज़ोर मार रही हैं. अर्जुन-आलिया वरुण-इलियाना और अब शाहिद कपूर-सोनाक्षी सिन्हा की कथित नज़दीकियों की बातें हो रही हैं. शाहिद कपूर का नाम कथित तौर पर प्रियंका चोपड़ा के साथ भी जुड़ चुका है. हाल ही में मीडिया से मुख़ातिब सोनाक्षी सिन्हा से जब यही सवाल पूछा गया तो सोनाक्षी इस पर लगभग बौखला गईं. सोनाक्षी से जब उनसे उनके आर राजकुमार के सह कलाकार शाहिद कपूर के साथ कथित लिंक-अप के बारे में पूछा गया तो वह बोलीं मैं जहां जाती हूं इसी सवाल का सामना करना पड़ता है. मैं सच में इससे बेहद परेशान हो गई हूं. उन्होंने कहा मुझे ख़ुद याद नहीं कि मैंने आख़िरी बार कब शाहिद कपूर से बात की थी या उससे मिली थी. जब भी मैं घर से बाहर निकलती हूँ अगले दिन ख़बरों में आ जाता है कि मैं शाहिद कपूर से मिलने गई थी. अब मुझे इन सब बातों पर बहुत ग़ुस्सा आने लगा है. सोनाक्षी को तो इन ख़बरों पर ग़ुस्सा आता है लेकिन उनके परिवार की क्या प्रतिक्रिया होती है. उनके पिता कैसे इनसे निपटते हैं. इस पर सोनाक्षी बोलीं उन्होंने इस बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. वह अब इस सबके आदी हो गए हैं. मेरा परिवार मुझे अच्छी तरह समझता है और अगर ऐसा कुछ भी होता तो उन्हें सबसे पहले पता चलता. देश में चुनाव का माहौल है और सोनाक्षी के पिता शत्रुघ्न सिन्हा भी पटना से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. क्या सोनाक्षी अपने पिता का प्रचार करने नहीं जाएंगी. सोनाक्षी इस पर कहती हैं मेरा राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है. मेरे पिताजी भी मुझसे ऐसी कोई उम्मीद नहीं रखते कि मैं उनके प्रचार अभियान का हिस्सा बनूं. उन्होंने आगे कहा वैसे भी शत्रुघ्न सिन्हा को मेरी ज़रूरत नहीं है. उनके चाहने वाले बहुत हैं उनकी लोकप्रियता बहुत है और वह अपने बूते पर चुनाव जीत सकते हैं. एक परिवार के तौर पर मैं हमेशा उनकी समर्थक रहूंगी पर मेरा काम है अभिनय करना प्रचार करना नहीं. इस शुक्रवार भारत में रिलीज़ होने वाली हॉलीवुड फ़िल्म रियो-2 के हिंदी संस्करण में सोनाक्षी सिन्हा ने डबिंग की है. इसके अलावा वह अक्षय कुमार के साथ फ़िल्म हॉलीडे में भी दिखेंगीं जो छह जून को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2014-04-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1045] TITLE: छह साल बाद मिली समंदर में खोई अंगूठी |
| CONTENT: न्यूज़ीलैंड का एक विवाहित जोड़ा छह साल पहले समुद्र में खो गई अपनी सगाई की अंगूठी को फिर से पाने की आस लगाए हुए है. विविनी और जेफ़ निनेस ने बताया कि 15 वर्ष पहले दोनों ने इसके मुख्य नग को बड़े एहतियात से चुनकर अंगूठी बनवाई था. लेकिन छह वर्ष पहले नार्थलैंड के समुद्र तट पर छुट्टियां मनाने गए इस जोड़े से अंगूठी खो गई थी. घटना तब घटी जब विवेनी अपने पति और बच्चों के साथ तट पर समुद्री लहरों से खेल रही थीं. न्यूज़ीलैंड हेराल्ड ने विविनी के हवाल से बताया मैंने अपनी सगाई और विवाह दोनों की अंगुठियां खो दी हैं इस बात का पता घर वापस लौटने के बाद चला. उन्होंने बताया हम इसके बाद सीधे तट पर आए और अंगूठी खोजने की कोशिश की. जब मुझे लगा कि दोनों अंगूठियां वाक़ई गुम हो चुकी हैं तो बहुत दुख हुआ. आख़िरकार सगाई की अंगूठी का तब पता चला जब अनुभवी तट पर खोज करने वाले 83 वर्षीय बर्नार्ड पैटर्सन अपने नए मेटल डिटेक्टर को चेक कर रहे थे. उन्होंने इस अंगूठी को पुलिस को सौंप दिया और पुलिस ने उस जौहरी को खोज निकाला जिसने इसे बनाया था. अंगूठी देखते ही जौहरी इसे पहचान गया. निनेस परिवार इस अंगूठी को बीमा कंपनी से वापस हासिल करने की कोशिश कर रहा है. क्योंकि मुआवज़ा मिलने के बाद इसका मालिकाना हक बदल दिया गया था. संभावना है कि यह पहले ही किसी दूसरे व्यक्ति को बेची जा चुकी हो. |
| DATE: 2014-04-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1046] TITLE: लाखों लोगों की धड़कन अल्टीमेट वॉरियर का निधन |
| CONTENT: अल्टीमेट वॉरियर के नाम से मशहूर पहलवान जेम्स ब्रायन हेलविग की मंगलवार को 54 वर्ष की उम्र में मौत हो गई. वो एक दिन पहले ही रेसलमैनिया 30 और मंडे नाइट रॉ कार्यक्रम में शामिल हुए थे. वर्ल्ड रेसलिंग एन्टर्नमेंट डब्ल्यूडब्ल्यूई इंक. ने उनकी मृत्यु की पुष्टि की है. संगठन ने बयान जारी कर गहरा शोक व्यक्त किया है. वॉरियर अपने पीछे पत्नी डाना और दो बेटियां छोड़ गए हैं. उनकी मृत्यु के कारणों के बारे में अभी तक कुछ पता नहीं चल सका है. ट्रिपल एच और डेनिस ब्रायन ने सोशल वेबसाइट ट्विटर पर शोक संदेश ट्वीट किया है. रेसलमैनिया के चौथे संस्करण में अल्टीमेट वॉरियर के हाथों परास्त होने वाले हल्क होगान ने भी शोक संवेदनाएं प्रकट की हैं. डेनियल ब्रायन ने कहा दुखद है. वॉरियर के परिजनों के प्रति सहानुभूति है. उन्होंने कहा बचपन से ही वो मेरे हीरो रहे थे और पिछले सप्ताहांत उनसे मुलाक़ात होना मेरी जिंदगी का सबसे पसंदीदा क्षण था. वो मेरे साथ बहुत अच्छे से पेश आए. डब्ल्यूडब्ल्यूई में उन्होंने ने 1987 में क़दम रखा था और जल्द ही वो काफ़ी मशहूर स्टार हो गए थे. डब्ल्यूडब्ल्यूई ने अपने बयान में कहा है हम इस बात के लिए खुद को ख़ुशनसीब समझते हैं कि कुछ दिन पहले ही वॉरियर डब्ल्यूडब्ल्यूई हॉल ऑफ़ फ़ेम में जगह बनाई थी और अपने प्रसंशकों को संबोधित करने के लिए रेसलमैनिया 30 और मंडे नाइट रॉ में शामिल हुए थे. |
| DATE: 2014-04-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1047] TITLE: शाहिद-विद्या बने पड़ोसी! |
| CONTENT: कथित तौर पर एक समय रिलेशनशिप में रहे विद्या बालन और शाहिद कपूर अब पड़ोसी बनने वाले हैं. हाल ही में शाहिद कपूर ने उसी हाउसिंग सोसायटी में एक फ़्लैट ख़रीदा है जहां विद्या बालन रहती हैं. इस फ़्लैट की कीमत 32 करोड़ रुपए बताई जा रही है. फ़िलहाल इस फ़्लैट की मरम्मत चल रही है. विद्या ने कॉफ़ी विद करण के पिछले संस्करण में शाहिद के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब देने से मना कर किया था. इस साल जून में फ़िल्म अभिनेत्री कंगना रानाउत अपनी पढ़ाई पूरी करने न्यूयॉर्क जाने वाली हैं. कंगना ने न्यूयॉर्क के एक फ़िल्म स्कूल में स्क्रीनप्ले यानी पटकथा लेखन के कोर्स में दाखिला लिया हुआ है. कंगना कहती हैं फ़िल्म तनु वेड्स मनु के सीक्वल से पहले मैं ये कोर्स ख़त्म करना चाहती हूं. कंगना का मानना है कि न्यूयॉर्क जैसे बड़े शहर में लोग बॉलीवुड सेलिब्रिटीज़ को नहीं जानते और वहां वो आम इंसान की तरह रह पाएंगी. डेविड धवन की फ़िल्म मैं तेरा हीरो को समीक्षकों से तो ज़्यादा तारीफ़ नहीं मिली लेकिन दर्शकों को ये फ़िल्म भा रही है. फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई कर फ़िल्म निर्माता एकता कपूर का दिल जीत लिया है. अब ऐसी ख़बरें आ रहीं हैं कि एकता का प्रोडक्शन हाउस बालाजी टेलीफिल्म्स वरुण धवन के साथ तीन फिल्मों की डील साइन करना चाहता है. बॉलीवुड में अभी तक सिर्फ़ यशराज प्रोडक्शन ही अपने कलाकारों के साथ ऐसी डील साइन करता था पर अब लगता है कि एकता भी इस लीग में शामिल होना चाहती हैं. |
| DATE: 2014-04-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1048] TITLE: स्कॉटलैंड से आए भारत में छाए |
| CONTENT: भारत में ऑर्केस्ट्रा के मायने हैं पियानो पर तेज़ पतली धुन जिस पर बजते ढोल और साथ में गाता एक गायक. यहाँ ज़्यादातर नाटक मंडलियों के साथ ऑर्केस्ट्रा फ़्री मिलता है. पर यूरोप में ऑर्केस्ट्रा की परिभाषा अलग है. कई सौ सालों पहले जन्मा ऑर्केस्ट्रा एक सहज और संजीदा माध्यम है लाइव संगीत का. ऑर्केस्ट्रा मतलब संगीतज्ञों का एक ऐसा समूह जिसमें 80-100 के बीच कलाकार अलग-अलग वाद्य यंत्रों को बजाकर संगीत प्रस्तुत करते हैं. हाल ही में भारत आया स्कॉटलैंड से बीबीसी का ऑर्केस्ट्रा ग्रुप बीबीसी स्कॉटिश सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा. इस ग्रुप ने भारत के तीन शहरों चेन्नई दिल्ली और मुंबई में अपने ऑर्केस्ट्रा के संगीत का जादू बिखेरा. अपने ऑर्केस्ट्रा के बारे में बताते हुए इस ग्रुप के परिचालक जेम्स मैकमिलन बताते हैं हमारा काफ़ी पुराना ऑर्केस्ट्रा ग्रुप है. आज के दौर में ऑर्केस्ट्रा चलाना बेहद ही मुश्किल काम है क्योंकि इसमें पैसा बहुत लगता है और लॉजिस्टिक्स की भी दिक़्क़त है. पर ऑर्केस्ट्रा ब्रितानी संस्कृति का अहम हिस्सा है और बीबीसी इसके लिए काफ़ी सोचता है. हर देश में ऑर्केस्ट्रा अलग-अलग रूप से विकसित हुआ है. आजकल के ऑर्केस्ट्रा के बारे में बताते हुए जेम्स कहते हैं जापान चीन सिंगापुर और यहाँ तक कि वेनेज़ुएला जैसे देशों में भी ऑर्केस्ट्रा आने लगा है. एक ऑर्केस्ट्रा लगभग 30 से 40 वायलिन 10 से 20 बांसुरी वादक 10 ब्रास बैंड और 10 तालवादक के समूह से बनता है. इन सभी वाद्य यंत्रों का संगीत अब कंप्यूटर पर भी बनाया जा सकता है पर क्यों लोग आज भी ऑर्केस्ट्रा देखने का चाव रखेंजेम्स बताते हैं कि हालाँकि तकनीक की वजह से जो संगीत ऑर्केस्ट्रा में होता हो वो कंप्यूटर पर प्रोग्राम किया जा सकता है. पर असली गहराई जोश और दर्शकों से जुड़ाव एक लाइव ऑर्केस्ट्रा ही कर सकता है. अपने इस दौरे के आख़िरी पड़ाव पर स्कॉटिश सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा ने एक अनोखी पहल की. मुंबई में इस ऑर्केस्ट्रा ग्रुप ने लगभग 600 स्कूली बच्चों को ऑर्केस्ट्रा से रूबरू कराया. इन छात्रों को ऑर्केस्ट्रा में इस्तेमाल होने वाले वाद्य यंत्रों के बारे में बताया गया और फिर एक फ़ैमिली कॉन्सर्ट भी आयोजित किया गया. मुंबई में ऑर्केस्ट्रा ग्रुप के साथ एक ख़ास परफॉरमेंस देने आईं निकोला बेंडेटी जो प्रख्यात वायलिन वादक हैं कहती हैं आजकल के पॉप कल्चर से घिरे युवाओं के लिए ऑर्केस्ट्रा को समझना एक पेचीदा सवाल है. उन्होंने कहा ये उनके लिए भारतीय क्लासिकल या वेस्टर्न क्लासिकल संगीत को समझने जैसा है. पर अहम बात ये है कि वे इस किस्म के संगीत से कितना जुड़ पाते हैं. अगर युवाओं को बचपन में ऐसा संगीत सुनने का मौक़ा मिले तो वे बड़े होकर अपने लिए एक बेहतर चयन कर पाएंगे. बीबीसी के साथ जुड़े सर मार्क टली भी इस ऑर्केस्ट्रा की परफॉरमेंस को देखने मुंबई पहुंचे. टली बताते हैं भारत में ऑर्केस्ट्रा और वेस्टर्न क्लासिकल संगीत का घर है कोलकाता. इस साल वहां के म्यूजिक स्कूल के 100 साल पूरे हो रहे हैं. पर सबसे गंभीर बात ये है कि वहां जितनी भी बड़ी कंपनियां थीं अब नहीं रहीं जिसके चलते अब इन संगीत समारोहों को प्रायोजक नहीं मिलते. जिसकी वजह से ऑर्केस्ट्रा परफॉरमेंस कम हो गई हैं. टली मानते हैं कि एक ऑर्केस्ट्रा परफ़ॉरमेंस बिजली से भी तेज़ शक्ति उत्पन्न करता है. इसे देखने का माहौल अपने आप में ही एक अनुभव है. भारत में ऑर्केस्ट्रा के बारे में बात करते हुए स्कॉटिश ऑर्केस्ट्रा के जेम्स का मानना है कि आने वाले समय में भारत भी काबिल ऑर्केस्ट्रा बना सकेगा. संगीतकार ए आर रहमान के संगीत स्कूल की ओर इशारा करते हुए जेम्स ने बताया उनका स्कूल एक विश्व विख्यात ऑर्केस्ट्रा बनने का दम रखता है. |
| DATE: 2014-04-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1049] TITLE: 'गोविंदा के थप्पड़ ने की ज़िंदगी बर्बाद' |
| CONTENT: सुप्रीम कोर्ट ने छह साल पहले के कथित थप्पड़ कांड के सिलसिले में अभिनेता गोविंदा से उनका जवाब मांगा है. दरअसल साल 2008 में गोविंदा के एक प्रशंसक ने उन पर थप्पड़ मारने का आरोप लगाया था. संतोष रे नाम के इस शख़्स ने कहा था कि फ़िल्म मनी है तो हनी है के सेट पर गोविंदा ने उन्हें कस के चांटा मारा. संतोष ने गोविंदा के ख़िलाफ़ बॉम्बे हाई कोर्ट में केस दायर किया लेकिन पिछले साल नवंबर में पर्याप्त सबूत न होने के कारण कोर्ट ने गोविंदा को इस मामले से बरी कर दिया. लेकिन संतोष ने अब इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया जिसके बाद कोर्ट ने गोविंदा से जवाब मांगा. संतोष कहते हैं मैं मुंबई अभिनेता बनने आया था उस थप्पड़ ने मेरी ज़िंदगी बर्बाद कर दी. मैं इस केस पर अब तक लाखों रुपए लगा चुका हूं. मीडिया में आ रही रिपोर्टों के अनुसार गोविंदा ने इस मामले पर कहा मुझे अभी तक कोई नोटिस ही नहीं आया. जब पहले ही हाई कोर्ट ने इस केस को ख़ारिज कर दिया है तो पता नहीं ये इंसान अब क्या चाहता है. मैं अगर चाहता तो इस पर मानहानि का दावा भी कर सकता था. करण जौहर के चैट शो कॉफ़ी विद करण में खुलेआम रणबीर कपूर से शादी की इच्छा ज़ाहिर करने के बाद आलिया भट्ट सफ़ाई देते घूम रही हैं. अपनी आने वाली फ़िल्म 2 स्टेट्स के प्रमोशन पर जब उनसे इस पर सवाल पूछा गया तो वो बोलीं कहाँ मेरी उम्र और कहाँ रणबीर की. मैं तो उनके आगे बहुत छोटी हूँ. वो तो मैंने बस एक प्रशंसक के तौर पर आहें भरते हुए बोल दिया था. वो कहती हैं मुझे रणबीर पसंद हैं उनसे मेरा शादी करने का कोई इरादा नहीं है. करण के शो पर मस्ती मज़ाक होता रहता है और इसीलिए आर्टिस्ट फंस जाते हैं. मैं भी करण के शो का शिकार हो गई. फ़िल्म भूतनाथ रिटर्न्स में एक के बाद एक कई अनोखी चीज़ें सामने आ रहीं है. पहले यो यो हनी सिंह के गाने के बाद अब फ़िल्म में शाहरुख़ और रणबीर की एंट्री भी बताई जा रही है. शाहरुख़ असल में पहली भूतनाथ में भी थे तो वो अपने उसी रोल को अदा करेंगे पर रणबीर इस फ़िल्म में असल ज़िंदगी के ही रणबीर कपूर बनेंगे. फ़िल्म में अमिताभ बच्चन एक भूत हैं जो भ्रष्ट नेता जिसे बोमन ईरानी निभा रहे हैं के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ते हैं. |
| DATE: 2014-04-08 |
| LABEL: entertainment |
| [1050] TITLE: मुझे नहीं पता गुरुदत्त ने क्यों की ख़ुदकुशी: वहीदा रहमान |
| CONTENT: मुंबई के सोफ़िटेल होटल में मैं इंतज़ार कर रही थी वहीदा रहमान का जो 50 और 60 के दशक में अपनी ख़ूबसूरती और लाजवाब अदाकारी के लिए जानी जाती थीं. वहीदा रहमान पर नसरीन मुन्नी कबीर ने एक किताब लिखी है. उसी के लॉन्च समारोह में मुझे बुलाया गया था. थोड़ी ही देर बाद मैंने एक महिला को अपनी ओर आते देखा. उन्होंने बेहद ख़ूबसूरत साड़ी पहन रखी थी और 70 साल की उम्र पार करने के बाद भी वो बेहद गरिमामय नज़र आ रही थीं. ये वहीदा रहमान थीं. मेरी नमस्कार का उन्होंने बेहद शालीन तरीके से जवाब दिया और फ़ौरन कहा चलिए इंटरव्यू शुरू करते हैं. सवाल आपके चाहने वालों को इस किताब में क्या दिलचस्प मिलने वाला है वहीदा मुझे नसरीन ने जो पूछा मैं बताती गई. बचपन से लेकर अब तक की सारी बातें हैं इस किताब में. जहां तक दिलचस्प यादों की बात करें तो वो मैं नहीं कह सकती. क्योंकि हो सकता है मुझे जो दिलचस्प लगता हो वो पाठकों को ना लगे या पाठक जिसे दिलचस्प समझे वो मेरी नज़र में उतना मज़ेदार ना हो. सवाल 1954 में आपने अपना करियर शुरू किया था. क्या आपको लगा था कि इतनी उपलब्धियां हासिल कर पाएंगींवहीदा मैंने कुछ नहीं सोचा था. इसके लिए मैं अपने आपको ख़ुशकिस्मत मानती हूं. मुझे जो काम मिला उसे मैंने पूरी ईमानदारी से किया. कोई तिकड़मबाज़ी नहीं की. सवाल आपकी बेहद क़रीबी दोस्त नंदा इस अहम मौक़े पर आपके साथ नहीं हैं. उनकी कमी कितनी खल रही है वहीदा वहीदा इसके जवाब में भावुक हो गईं मेरा और नंदा का रिश्ता बहुत गहरा है. 55 सालों की दोस्ती थी. उनकी याद तो हमेशा रहेगी. हम ये किताब पहले ही लॉन्च करने वाले थे लेकिन उसके ठीक दो दिन पहले ही नंदा हमें छोड़कर चली गईं. तब मैंने ये कार्यक्रम टाल दिया था. सवाल नंदा जी तो अब है नहीं लेकिन उनके अलावा भी आपका आशा पारिख साधना शम्मी जी वगैरह का दोस्तों का ग्रुप है. जब आप लोग मिलती हैं तो किस तरह की बातें होती हैं. क्या पुराने दौर की भी बातें होती हैं वहीदा हां होती हैं. लेकिन हर वक़्त गुज़रे ज़माने की बातें हम लोग नहीं करते रहते. इस दौर की बात करते हैं. नई फ़िल्मों की बातें होती हैं. खाने-पीने की बातें होतीं है. घूमने-फिरने की बातें होती हैं. सवाल कई कलाकार आपके प्रशंसक हैं. अमिताभ बच्चन जिनके साथ आपने कुछ फ़िल्में भी की हैं वो आपको हिंदी सिनेमा की सबसे ख़ूबसूरत अभिनेत्री मानते हैं. आप इस पर कैसे रिएक्ट करती हैं जवाब ये बच्चन जी की मेहरबानी है. ज़र्रानवाज़ी है. वो अक्सर मेरी तारीफ़ करते रहते हैं. मैं उनसे तारीफ़ सुनकर ख़ुश हो जाती हूं. और क्या कहूं सवाल कोई ऐसी फ़िल्म जो आपने हाल ही में देखी हो और आपको अच्छी लगी हो. जवाब मैंने कंगना रानाउत की क्वीन देखी और मुझे बहुत पसंद आई. वैसे भी वो लड़की मुझे बहुत प्यारी लगती है. इसके अलावा दीपिका पादुकोण विद्या बालन और सोनम भी मुझे पसंद हैं. सवाल और अभिनेताओं में कौन पसंद हैं वहीदा देखिए अभिनेताओं में तो ये चार ख़ान ही हैं. यही छाए रहते हैं. आमिर शाहरुख़ सलमान और सैफ़. सलमान तो मेरे पड़ोस में ही रहता है. बचपन से उसे देखा है. परिवार की तरह है वो. इस बीच समारोह के आयोजकों ने इंटरव्यू ख़त्म होने का इशारा कर दिया. मैं सोच ही रही थी कि अगला सवाल वहीदा रहमान से उनकी और गुरुदत्त के कथित रिश्ते पर सवाल पूछुं लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. इस बीच वहीदा के कुछ प्रशंसकों ने उन्हें घेर लिया. और फिर किसी ने वो सवाल पूछ ही लिया जो मैं नहीं पूछ पाई. किसी ने पूछ लिया कि क्या वाकई उनके और गुरु दत्त के बीच कोई रिश्ता था. इस पर वहीदा बोलीं ये मेरी निजी ज़िंदगी है. किसी को हक़ नहीं बनता कि उस पर कोई सवाल उठाए. फिर किसी ने पूछा कि गुरुदत्त की ख़ुदकुशी के पीछे क्या वजह थी. वहीदा रहमान बोलीं किसी को भी उनके ख़ुदकुशी करने की वजह नहीं पता. कुछ लोग कहते हैं कि काग़ज़ के फूल की नाकामयाबी की वजह से वो डिप्रेशन में थे. लेकिन मुझे नहीं लगता कि ये वजह रही होगी. क्योंकि इस फ़िल्म के बाद उन्होंने चौदहवीं का चांद बनाई जो सुपरहिट रही. वहीदा ने अपने करियर के शुरुआती दिनों का ज़िक्र करते हुए कहा मैंने करियर की शुरुआत में गुरुदत्त जी के साथ तीन साल का कॉन्ट्रेक्ट किया था. लेकिन मैंने शर्त रखी थी कि कपड़े अपनी मर्ज़ी के ही पहनूंगीं. कोई ड्रेस पसंद नहीं आया तो मुझे उसे पहनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकेगा. मैंने फ़िल्मों में कभी बिकनी नहीं पहली क्योंकि मुझे लगता है मेरा फ़िगर वैसा नहीं था. असल ज़िंदगी में भी मैंने कभी स्लीवलेस ब्लाउज़ नहीं पहना. बिकनी तो बहुत दूर की बात है. फ़िलहाल वहीदा रहमान अब आगे फ़िल्मों में काम करने की इच्छुक नहीं हैं. उन्होंने हाल ही में कमल हासन की फ़िल्म विश्वरूपम-2 की शूटिंग ख़त्म की. और अब वो अपना पूरा समय परिवार को देना चाहती हैं. |
| DATE: 2014-04-08 |
| LABEL: entertainment |
| [1051] TITLE: रणबीर से शादी करना चाहती हैं आलिया |
| CONTENT: आलिया भट्ट ने वरुण धवन को भले ही कई बार अपना नज़दीकी दोस्त माना हो लेकिन उन्होंने अपने दिल की पसंद साफ़ ज़ाहिर कर दी है. करण जौहर के चैट शो कॉफ़ी विद करण में आलिया भट्ट ने कहा कि वो रणबीर कपूर की दीवानी हैं. आलिया भट्ट ने कहा मैं रणबीर कपूर को बहुत पसंद करती हूं. उनकी दीवानी हूं. मैं तो उनसे शादी भी करना चाहती हूं. इसी एपिसोड में आलिया के साथ आई थीं अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा. परिणीति ने अपनी पसंद बताते हुए कहा मुझे सैफ़ अली ख़ान बहुत पसंद हैं. मैं उनके लिए कुछ भी कर सकती हूं. परिणीति ने ये भी बताया कि वो तो करीना कपूर से भी इस बात का ज़िक्र कर चुकी हैं कि उन्हें करीना के पति से प्यार है. इस पर करीना ने कहा इट्स ओके. इस साल भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादा साहब फालके के लिए मनोज कुमार जीतेंद्र माधवी मुखर्जी वहीदा रहमान और कमल हासन के नाम शॉर्टलिस्ट किए गए हैं. लेकिन लेखक सलीम ख़ान ने इसके लिए मनोज कुमार के नाम की वकालत की. सलीम ख़ान कहते हैं मनोज कुमार इस सम्मान के सबसे बड़े हक़दार हैं. देशप्रेम पर फ़िल्में बनाना आसान नहीं है. उन्होंने न सिर्फ़ ऐसी फ़िल्में बनाईं बल्कि वो बेहद कामयाब भी रहीं. उनकी फ़िल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले. संजय लीला भंसाली की सुपरहिट फ़िल्म गोलियों की रास लीला राम-लीला के बाद अब रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण की जोड़ी फिर से लौट रही है संजय लीला भंसाली की ही अगली फ़िल्म बाजीराव मस्तानी में. राम-लीला के बाद रणवीर और दीपिका की कथित नज़दीकियों के काफ़ी चर्चे हुए. दोनों ने खुले-आम एक दूसरे के प्रति अपनी चाहत ज़ाहिर तो नहीं की लेकिन ये ज़रूर कहा कि वो एक दूसरे को पसंद करते हैं. इनकी केमिस्ट्री को दर्शकों ने जो प्यार दिया उसी की वजह से भंसाली इस जोड़ी को रिपीट करना चाहते हैं. |
| DATE: 2014-04-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1052] TITLE: तो शायद ‘मैं तेरा हीरो' रिलीज़ नहीं होती: वरुण |
| CONTENT: इस हफ़्ते बॉक्स ऑफ़िस पर रिलीज़ हुई वरुण धवन नरगिस फ़ख़री और इलियाना डी क्रूज़ की फ़िल्म मैं तेरा हीरो. ये फ़िल्म वरुण धवन के लिए काफ़ी अहम है क्योंकि इसके निर्देशक हैं उनके पिता डेविड धवन. ऐसे में इस फ़िल्म का कामयाब होना पिता-पुत्र की इस जोड़ी के लिए ज़रूरी है. लेकिन एक समय हालात कुछ यूं भी बने थे कि शायद इस फ़िल्म को बंद करना पड़ता. मीडिया से एक मुलाक़ात के दौरान वरुण ने बताया हम बैंकॉक में फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे और अचानक पापा डेविड धवन गिर पड़े. उनकी तबीयत इतनी बिगड़ गई कि उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा. उनकी हालत काफी गंभीर थी और वहां के स्थानीय अख़बारों में भी ये ख़बर छपी थी. वरुण ने बताया कि ये पहला मौका था जब उन्होंने अपने परिवार से संबंधित किसी समस्या का सामना किया और वो भी तब जब वो अकेले थे. उन्होंने कहा इससे पहले ऐसे हालात का सामना मैंने कभी नहीं किया. पापा की तबीयत पहले भी ख़राब हुई थी पर वहां मम्मी हमारे साथ होती थीं. वही सब देखती थीं. लेकिन यहां मैं अकेला था और मैं काफी घबरा गया था. ये बताते हुए वरुण काफ़ी भावुक भी हो गए. इस घटना के बाद डेविड के बड़े बेटे रोहित धवन बैंकॉक पहुंचे और फिर डेविड से स्क्रिप्ट लेकर उन्होंने बाक़ी शूटिंग पूरी की. ये पहला मौक़ा नहीं है जब डेविड की तबीयत इस तरह बिगड़ी है. 2012 में भी बंटी वालिया के एक रिसेप्शन पर डेविड धवन की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी. डेविड धवन को आराम की सलाह दी गई है और शायद इसी कारण से फ़िल्म के प्रमोशन के लिए फ़िल्म की निर्माता एकता कपूर तो फ़िल्म की कास्ट के साथ दौरे कर रही हैं लेकिन निर्देशक डेविड धवन ग़ायब हैं. |
| DATE: 2014-04-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1053] TITLE: फ़िल्मी दुनिया में कैसे जुटता है चंदा? |
| CONTENT: मुंबई का आलीशान पांच सितारा होटल. एक-एक कर दरबान बड़ी-बड़ी गाड़ियों के दरवाज़े खोल रहे थे. कोई मर्सिडीज़ कोई ऑडी तो कोई बीएमडब्ल्यू. इन गाड़ियों में आने वाले लोग बॉलीवुड के जाने-माने चेहरे थे. ये सब एक होटल में आयोजित एक समारोह में शामिल होने जा रहे थे. होटल में घुसते ही मुझे एहसास हुआ कि सही में यहां कुछ बड़ा हो रहा है. असल में ये समारोह अभिनेत्री शबाना आज़मी ने आयोजित किया था. इस समारोह में उनके स्वर्गीय पिता शायर कैफ़ी आज़मी की ग़ैर सरकारी संस्था मिजवां वेलफ़ेयर सोसाइटी के लिए चंदा जुटाया जाना था. इस शाम का विशेष कार्यक्रम था यहां आयोजित फ़ैशन शो जिसे देखने न केवल बॉलीवुड बल्कि मुंबई के बड़े-बड़े उद्योगपति भी पहुंचे. शाम का रंग काउंटर पर मिलने वाली वाइन में दिख रहा था. चिली से आई इम्पोर्टेड रेड वाइन और व्हाइट वाइन साथ में चीज़ और ऑलिव ऐसा लग रहा था जैसे कि मैं फ्रांस में हूं. मेरे आस-पास लोगों के चूमने की आवाज़ें आ रही थी. शायद ही मैंने किसी को एक दूसरे से नमस्ते कहते सुना होगा. फ़ैशन शो मशहूर डिज़ाइनर मनीष मल्होत्रा का था. जिन्होंने शबाना के इस ग़ैर सरकारी संगठन एनजीओ मिजवां से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं के साथ काम किया है. उत्तर प्रदेश में काम करने वाली इस संस्था ने चिकनकारी के काम को मिजवां गाँव की महिलाओं तक पहुंचाया है जिसके चलते वो सूती कपड़े पर चिकनक़ारी करती हैं और पैसे कमाती हैं. मनीष मल्होत्रा ने मिजवां की औरतों के बनाए चिकनक़ारी के कपड़ों को फैशन शो में उतारा. लोग हॉल में जमा होने लगे तो मैंने अपना कैमरा निकल लिया. पूरे हॉल में बॉलीवुड़ से जुड़े लोग थे. एक बार फिर हवा में चूमने की आवाज़ें मेरे कानों में पड़ने लगी. थोड़ी देर में मैंने देखा कि जया बच्चन एक टेबल पर बैठीं हैं और साथ में नीतू सिंह हैं. नीतू सिंह ने जया से अभिषेक और ऐश्वर्या के बारे में पूछा कहां हैं अभिषेक और ऐश्वर्या जया ने जवाब दिया एक तो शूटिंग पर है और एक आराध्या के साथ घर में. इतनी देर में ये मेज़ एक किटी पार्टी में बदल गई. जया से मिलने सोनाली बेंद्रे अपने पति के साथ पहुंची. और नीतू सिंह से मिलने आईं सुष्मिता सेन. सुष्मिता नीतू सिंह से बोलीं मेरी बेटी तो रणबीर की दीवानी है जब भी रणबीर टीवी पर आता है तो वो बस उसे देखती रहती है. मैंने इन दोनों की तस्वीर इस बातचीत के दौरान ली. फिर मुझे दिखे प्रतीक बब्बर और जैकी भगनानी. जैकी ने प्रतीक से पूछाक्या तुमने मेरी नई फ़िल्म यंगिस्तान देखीप्रतीक ने कहा नहीं कब लगी मैं ज़रूर देखूंगा. इसके बाद शो शुरू हुआ. मैं जावेद अख़्तर के ठीक बगल में बैठा. जावेद साहब के एक ओर उनके मित्र थे और एक तरफ कैमरे के साथ मैं. स्टेज पर जैसे ही शो संचालक सोफ़ी चौधरी आईं तो जावेद बोले ये कौन लड़की है उनके मित्र ने जवाब दिया सोफ़ीशो शुरू हुआ एक-एक कर मॉडल्स ने मनीष मल्होत्रा के बेहतरीन काम का प्रदर्शन किया. फैशन शो के बीच में घोषणा हुई कि मिजवां के लिए अगर आप कुछ दान देना चाहते हैं तो आपके मेज़ पर एक फॉर्म है जिसे भर कर आप 6000 रुपए सालाना देकर एक लड़की की पढ़ाई का ख़र्च उठा सकते हैं. मेरे मन में ख़्याल आया कि इतना सब कुछ बॉलीवुड वाइन होटल फैशन शो क्या ये सिर्फ चंदा एकत्रित करने के लिए था अगर इतना ख़र्च न किया जाता तो क्या ये एनजीओ अपने आप ही मिजवां का बेड़ा न उठा लेता. शबाना के इस शो के लिए उन्हें ख़ूब सारे प्रायोजक मिले. चंदा मांगने वाले इस शो में अमिताभ बच्चन भी रैंप पर दिखे. अक्षय कुमार रणबीर कपूर सिद्धार्थ मल्होत्रा और फ़रहान अख़्तर. सबने इस फ़ैशन शो की शान बढ़ाई. जावेद साहब के साथ बैठ मैंने पूरा शो देखा और आख़िर में जाते-जाते उनको मैंने कहा जावेद साहब आज आपको क्यों नहीं चिकनक़ारी वाला कुर्ता मिला आज शाम की थीम तो वही थी जावेद साहब थोड़े हैरान हुए और बोले हां यार होना तो चाहिए था पर मुझे किसी ने दिया ही नहीं. शो के बाद कई महिलाओं ने जावेद अख़्तर को घेर लिया और फिर शुरू हुआ उनकी किस्सागोई का दौर. |
| DATE: 2014-04-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1054] TITLE: संध्या के 'दबंग' अवतार ने दर्शकों को लुभाया |
| CONTENT: इस सप्ताह दिया और बाती हम ने बाज़ी मारी और तमाम शोज़ को पछाड़ते हुए पहुंचा पहले नंबर पर. संध्या ने अपने लक्ष्य को हासिल कर लिया और पुलिस अफ़सर बन ही गई. दर्शकों को भी उसका ये दबंग अवतार बड़ा पसंद आ रहा है और वो शो का पूरा लुत्फ़ उठा रहे हैं. अब जल्द ही संध्या को उपद्रवी तत्वों से निपटने के लिए मिशन पर भेजा जाएगा. दूसरे नंबर पर है साथ निभाना साथिया. अहम अब भी अतीत को भूल नहीं पाया है इसलिए वो गोपी को माफ़ नहीं कर पाया है. अभी अहम राधा से शादी करना चाहता है. लेकिन जल्द ही मोदी परिवार को राधा की चाल समझ में आ जाएगी और अहम और गोपी के बीच की ग़लतफ़हमी दूर होगी. तीसरे नंबर पर है जोधा-अकबर. शो में जोधा बनी परिधि के शो छोड़ने की ख़बरें थीं. लेकिन फ़िलहाल ऐसा नहीं हुआ. लोगों को रजत अकबर और परिधि जोधा की केमेस्ट्री ख़ासी पसंद आ रही है जो शो की लोकप्रियता की मुख्य वजह है. कपिल शर्मा ने एक बेहतरीन कॉमेडियन के तौर पर अपने आपको स्थापित कर लिया है और वो अपने शो कॉमेडी नाइट्स विद कपिल से ख़ासे मशहूर हो चुके हैं. लता मंगेशकर जैसी हस्ती ने हाल ही में उन्हें दी जन्मदिन की मुबारक़बाद और अपनी फ़िल्म भूतनाथ रिटर्न्स का प्रमोशन करने अमिताभ बच्चन तक उनके सेट पर जा पहुंचे. जिससे साबित होता है कि कपिल का क़द कितना बढ़ चुका है. कपिल और अमिताभ की जुगलबंदी का धमाल दर्शकों को छह अप्रैल को टीवी पर देखने को मिलेगा. इसके अलावा शो पर शाहरुख़ ख़ान भी आईपीएल के प्रचार के लिए नज़र आएंगे. बहरहाल इस सप्ताह की बात करें तो कॉमेडी नाइट्स विद कपिल रहा चौथे नंबर पर. पांचवे नंबर पर रहा फ़ैमिली ड्रामा ये रिश्ता क्या कहलाता है. साथ ही महाभारत को भी अच्छे दर्शक मिले जिसमें आगामी सोमवार को द्रौपदी चीरहरण वाला एपिसोड होगा जिससे शायद इसकी लोकप्रियता में और इज़ाफ़़ा हो. डांस इंडिया डांस-लिटिल चैंप्स और ख़तरों के खिलाड़ी को दर्शकों से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिल रही हैं. इन दोनों ही शोज़ के रेटिंग्स अच्छे नहीं आए हैं. चैनलों की दौड़ में स्टार प्लस रहा नंबर वन पर ज़ी दूसरे स्थान पर और कलर्स रहा तीसरे नंबर पर. |
| DATE: 2014-04-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1055] TITLE: कैंसर ने ख़ुद की देखभाल सिखा दी: मनीषा कोइराला |
| CONTENT: मनीषा कोइराला को साल 2012 में गर्भाशय का कैंसर होने का पता लगा. उनके प्रशंसकों और परिवार वालों को ज़बरदस्त झटका लगा लेकिन मनीषा ने कैंसर को मात दी और अब वो ठीक होकर वापस अपने प्रशंसकों के सामने हैं. उन्होंने हाल ही में महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी एक पत्रिका के लिए फ़ोटोशूट भी कराया. इस मौक़े पर मनीषा कोइराला ने कैंसर के मरीज़ों को संदेश देते हुए कहा इस बीमारी में पॉज़िटिव रहना बहुत ज़रूरी है. हमेशा डर बना रहता है कि ये बीमारी कहीं फिर से न आ जाए. वे कहती हैं मुझे जिस तरह का कैंसर हुआ था वो कभी भी वापस आ सकता है. लेकिन हर क़ीमत पर हमें पॉजिटिव रहना होता है. तभी हम इस बीमारी को हरा पाएंगे. मनीषा ने ये भी बताया कि कैंसर ने उन्हें शरीर की देखभाल करना सिखा दिया. वो कहती हैं पहले मैं अपने शरीर की बिल्कुल भी परवाह नहीं करती थी. खाने-पीने में ज़रा भी अनुशासन नहीं था. उन्होंने बताया मैं बड़ी लापरवाह थी. लेकिन इस बीमारी ने मुझे अपने शरीर की अपने मन की अहमियत समझा दी है. अब मैं अपना ध्यान रखती हूं. मनीषा ने बताया कि बीमारी के दौरान उनके परिवार का उन्हें बड़ा सपोर्ट मिला जो इस बीमारी से निपटने के लिए बहुत ज़रूरी है. वो कहती हैं मेरे मां-बाप मेरा भाई सब मुझे हंसाते रहते थे. मेरा भाई मेरा मूड हल्का रखने के लिए ख़ूब जोक्स सुनाता मुझे फ़िल्में दिखाता था. इस बीमारी के बाद हम एक दूसरे के और क़रीब आ गए. मनीषा ने ये भी बताया कि तब्बू उनसे हमेशा संपर्क में रहीं और उनका हौसला बढ़ाया. इसके अलावा गुलशन ग्रोवर और शत्रुघ्न सिन्हा भी उनका हाल-चाल लेते रहे. उनके परिवार से संपर्क में रहे और उत्साह बढ़ाते रहे. मनीषा के मुताबिक़ वो अपने आपको कोई हीरो नहीं कहलवाना चाहतीं. उनकी ये तमन्ना क़तई नहीं है कि लोग बार-बार कहें कि इस बहादुर महिला ने कैंसर को मात दी. लेकिन वो इसके प्रति जागरुकता फैलाने की हर मुमकिन कोशिश करना चाहती हैं. मनीषा ने कहा अगर मैं पब्लिक फ़िगर हूं मुझे कोई प्लेटफॉर्म मिला है तो मैं इस बीमारी के प्रति लोगों में जागरुकता फैलाना चाहती हूं. ताकि लोग सावधान रहें. ज़िंदगी के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाएं. ख़ुश रहें और अपने शरीर का ध्यान रखें. साथ ही अपनी जीवन शैली में अनुशासन बनाए रखें. मनीषा कोइराला फ़िल्मों में कब वापसी करेंगीं. इसके जवाब में उन्होंने कहा मैं भी बड़े पर्दे पर दिखने के लिए बेताब हूं. लेकिन कोई मज़ेदार सा रोल मिले तो करूं. मेरे पास प्रस्ताव तो आ रहे हैं लेकिन वो रोल कोई महत्वपूर्ण रोल नहीं हैं. मैं दो या चार मिनट के लिए किसी फ़िल्म में काम नहीं करना चाहती. मनीषा ने बताया कि वो अपनी ज़िंदगी के इस दौर का भरपूर लुत्फ़ उठा रही हैं. वो जिम जाती हैं व्यायाम करती हैं. योग भी करती हैं पेंटिग करती हैं और साथ ही वो अपनी एक किताब भी लिख रही हैं. |
| DATE: 2014-04-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1056] TITLE: फ़िल्म रिव्यू: 'मैं तेरा हीरो' |
| CONTENT: बालाजी मोशन पिक्चर्स की मैं तेरा हीरो एक रोमांटिक कॉमेडी यानी रोमकॉम है. श्रीनाथ प्रसाद उर्फ़ सीनू वरुण धवन एक दिलफेंक किस्म का लड़का है जिसे पढ़ाई में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं है. उसे पढ़ाई के लिए बंगलौर भेज दिया जाता है. कॉलेज में उसकी मुलाक़ात सुनयना इलियाना डी क्रूज़ से होती है और वो उससे इश्क़ कर बैठता है. उधर सुनयना को अंगद नेगी अरुणोदय सिंह भी बहुत पसंद करता है और उससे शादी करना चाहता है. हालांकि सुनयना अंगद को बिलकुल पसंद नहीं करती लेकिन उसे डर है कि वो अंगद को अपने दिल की बात बताएगी तो वो उसके पिता के लिए मुश्किलें खड़ी कर देगा. इस बीच एक अंडरवर्ल्ड डॉन विक्रांत अनुपम खेर की बेटी आयशा नरगिस फ़ख़री को भी सीनू से प्यार हो जाता है. अपनी बेटी की इच्छा पूरी करने के लिए विक्रांत सुनयना का अपहरण कर लेता है ताकि आयशा और सीनू की शादी करवाई जा सके. अंगद भी विक्रांत का साथ देता है ताकि वो ख़ुद सुनयना से शादी कर सके. इस बीच सुनयना को विक्रांत के चंगुल से बचाने के लिए सीनू आयशा से प्यार का नाटक करता है. पहले तो सुनयना ये देखकर बेहद परेशान हो जाती है कि सीनू आयशा के साथ इनवॉल्व हो चुका है लेकिन जब उसे पता चलता है कि वो ये सब उसे बचाने के लिए कर रहा है तब वो राहत की सांस लेती है. आगे क्या होता है क्या सुनयना और सीनू मिल पाते हैं यही फ़िल्म की कहानी है. मैं तेरा हीरो सुपरहिट तेलुगू फ़िल्म कांदीरीगा का रीमेक है. तुषार हीरानंदानी का लिखा स्क्रीनप्ले दिलचस्प है और दर्शकों को बांधे रखता है. फ़िल्म में मनोरंजन का पुट है और आम मसाला हिंदी फ़िल्मों की तरह इसमें भी कई दृश्य तर्क से परे हैं. स्क्रीनप्ले में कई बेतुकी बातें ज़रूर हैं लेकिन वो दर्शकों का मनोरंजन करती हैं इसलिए दर्शक इस बेतुकेपन को माफ़ कर देंगे. जहां फ़िल्म में स्वस्थ हास्य है वहीं दूसरी ओर पर्याप्त मात्रा में मसखरापन भी है. ये मिश्रण हर प्रकार के दर्शक वर्ग को पसंद आएगा. इंटरवल से पहले का हिस्सा अच्छा है लेकिन इसमें कुछ नीरसता भी है. कुछ दृश्य कॉमिक नहीं बन पाए हैं और रफ़्तार भी धीमी है. लेकिन इंटरवल के बाद फ़िल्म अपनी पकड़ बना लेती है और दर्शकों का मनोरंजन करती है. फ़िल्म का आखिरी हिस्सा तो बड़ा मज़ेदार बन पड़ा है. वरुण धवन सीनू के रोल में बहुत जमे हैं. उन्होंने फ़िल्म में डांस रोमांसमार-धाड़ कॉमेडी सब कुछ किया है. वो कैमरे के सामने बड़े सहज रहे हैं. इस फ़िल्म के बाद उनकी महिला प्रशंसकों की संख्या में ज़रूर इज़ाफ़ा होगा. इलियाना डी क्रूज़ भी सुंदर लगी हैं और सहज अभिनय किया है. नरगिस फ़ाख़री भी ग्लैमरस लगी हैं और अपना रोल ठीक से निभाया है. अनुपम खेर ने अपने रोल में फिर से जान डाल दी है. उनके संवादों में डाला गया एको इफ़ेक्ट दर्शकों को पसंद आएगा. अरुणोदय सिंह को जो करना था वो उन्होंने ठीक से किया है. सौरभ शुक्ला फ़िल्म का मुख्य आकर्षण बनकर उभरेंगे. फिल्म के पहले हिस्से में तो वो विक्रांत अनुपम खेर के एक बेहद बातूनी सहायक बने हैं और बाद में व्हीलचेयर पर बैठे एक ऐसे मरीज़ की भूमिका में हैं जो बोल नहीं सकता. अपने इन दोनों अवतारों में सौरभ ने कमाल का अभिनय किया है. उन्होंने लोगों को खूब हंसाया. राजपाल यादव ने भी अपनी कॉमिक टाइमिंग से लोगों को हंसाया. वो भी अपने ज़बरदस्त फॉर्म में रहे. बाकी कलाकार भी ठीक हैं. साजिद-वाजिद का संगीत पहले ही हिट हो चुका है. गानों का फ़िल्मांकन भी अच्छा है. डेविड धवन का निर्देशन अच्छा है. इंटरवल के बाद वाले हिस्से में ख़ासतौर से फ़िल्म मनोरंजक बन पड़ी है. कुल मिलाकर मैं तेरा हीरो आम दर्शकों को पसंद आने वाली फ़िल्म है. फ़िल्म के निर्माताओं को लागत का अच्छा खासा हिस्सा क़रीब 55 फ़ीसदी इसके सैटेलाइट राइट्स बेचकर पहले ही मिल चुका है. बॉक्स ऑफ़िस से बाकी की लागत पूरा करने फ़िल्म के लिए ख़ास मुश्किल नहीं है. |
| DATE: 2014-04-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1057] TITLE: 'भगवान' की आवाज़ सलमान |
| CONTENT: निर्देशक डेविड धवन ने अपने पसंदीदा हीरो सलमान ख़ान को भगवान बना दिया. दरअसल डेविड की शुक्रवार को रिलीज़ हुई फ़िल्म मैं तेरा हीरो में उन्होंने सलमान ख़ान की आवाज़ का इस्तेमाल किया है. डेविड के बेटे वरुण धवन को लेकर बनाई गई इस फ़िल्म में जब-जब वो किसी दुविधा में होते हैं तो भगवान को याद करते हैं और भगवान की आावज़ में सलमान अपने भक्त की समस्याओं का उपाय बताते हैं. दरअसल डेविड धवन सलमान को अपना लकी चार्म मानते हैं. उन्होंने सलमान को लेकर बीवी नंबर वन दुल्हन हम ले जाएंगे जुड़वा और मुझसे शादी करोगे जैसी हिट फ़िल्में दीं. इसी वजह से वो अपने बेटे को लेकर बनाई गई इस फ़िल्म में सलमान की किसी तरह से एंट्री कराना चाहते थे. फ़िल्मकार महेश भट्ट 1984 के सिख विरोधी दंगों पर एक फ़िल्म बनाएंगे. भट्ट अपनी फ़िल्म की शुरुआत साल 2012 में कनाडा के एक गुरुद्वारे में सिखों पर हुए हमले से करेंगे और इसकी कहानी 1984 के सिख विरोधी दंगों तक ले जाएंगे. महेश भट्ट के मुताबिक़ अभी तक सिखों को इंसाफ़ नहीं मिला है. वो हमारे ही अपने हैं और उनकी कहानी बतानी ज़रूरी है. अपनी फ़िल्म क्वीन की कामयाबी के घोड़े पर सवार कंगना रानाउत ने आमिर ख़ान के पदचिन्हों पर चलने का फ़ैसला किया है. आमिर ख़ान किसी भी फ़िल्म अवॉर्ड समारोह में नहीं जाते हैं और अब कंगना ने भी तय कर लिया है कि वो भी इन समारोहों में शिरक़त नहीं करेंगीं. कंगना ने कहा जब मैं इंडस्ट्री में नई-नई आई थी तब मैंने इस तरह के समारोहों में हिस्सा लिया. लेकिन अब बहुत हुआ. अब मैं ऐसा नहीं करूंगी. वैसे भी इन समारोहों में हिस्सा लेकर आप अपने करियर में कुछ भी अतिरिक्त नहीं जोड़ पाते. कंगना जल्द ही फ़िल्म रिवॉल्वर रानी में दिखेंगीं. |
| DATE: 2014-04-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1058] TITLE: सितारों की सेहत का राज़ |
| CONTENT: 40 पार करने के बाद भी बेहद फ़िट और एथलेटिक शरीर के मालिक अक्षय कुमार उम्र का अर्धशतक पूरा करने से महज़ एक साल कम लेकिन अब भी किसी युवा की तरह नज़र आने वाले आमिर ख़ान या सीनियर सिटीज़न बनने की तरफ़ क़दम बढ़ाते पंजाबी पुत्तर सनी देओल हों. इन तमाम कलाकारों ने अपनी फ़िटनेस से अपनी उम्र के असर को शरीर पर हावी नहीं होने दिया है. आप इनके अभिनय के भले ही दीवाने ना हों लेकिन ये अपनी फ़िट शरीर के लिए हमारे रोल मॉडल बनने की क़ाबिलियत ज़रूर रखते हैं. सवाल ये उठता है कि अपनी फ़िटनेस बनाए रखने और अपने आपको स्वस्थ रखने के लिए ये सितारे क्या खाते हैं. कौन से व्यायाम करते हैं. आइए एक नज़र डाल लेते हैं. अक्षय कुमार अपनी फ़िटनेस का श्रेय अनुशासन को देते हैं. वो कहते हैं मेरे दिन की शुरुआत सुबह 4. 30 बजे ही हो जाती है. ये आदत बचपन से ही मेरे पिताजी ने मुझे लगवाई थी. मेरे लिए वर्कआउट करना भोजन और पूजा की तरह है. मैं बिना वर्कआउट किए नहीं रह सकता. अक्षय कुमार मानते हैं कि शरीर के साथ-साथ मानसिक रूप से स्वस्थ रहना भी बेहद ज़रूरी है. वो कहते हैं काम करने के लिहाज़ से मेरा दिन शाम 7-30 बजे ख़त्म हो जाता है. उसके बाद ना तो मैं काम करता हूं और ना ही कुछ खाता हूं. मैं व्यायाम के अलावा योग और ध्यान भी करता हूं. मार्शल आर्ट और किक बॉक्सिंग के दीवाने अक्षय कुमार मसल्स बनाने या मज़बूत दिखने के लिए किसी भी तरह के फ़ूड सप्लीमेंट या अप्राकृतिक खान-पान के सख़्त ख़िलाफ़ हैं. पंजाब से ताल्लुक रखने वाले अक्षय कुमार खाने-पीने के शौक़ीन हैं. वो कहते हैं मैं किसी भी तरह की डायटिंग में भरोसा नहीं करता. जम कर खाता हूं. घी तो जरूर खाता हूं. लेकिन ये बात मानता हूं कि अगर आप घी खा रहे हो तो खूब वर्कआउट करो. दौड़ो-भागो वर्ना घी आपके शरीर को नुकसान पहुंचाएगा. अक्षय कुमार लेट नाइट पार्टीज़ में नहीं जाते कहते हैं कि वो पार्टी का खाना तो बिलकुल भी नहीं खाते. वो कहते हैं मैं शराब चाय या कॉफ़ी कुछ भी नहीं पीता. शाकाहारी खाना ज़्यादा पसंद करता हूं सुबह जूस फल और दूध लेता हूं. दोपहर में हैवी लंच लेता हूं. रात में भरपूर नींद लेता हूं क्योंकि स्वस्थ रहने के लिए अच्छी नींद ज़रूरी है आमिर ख़ान कहते हैं कि स्वस्थ खान-पान व्यायाम और पर्याप्त आराम के मेल से ही अच्छी सेहत हासिल की जा सकती है. आमिर ख़ान कहते हैं मैं अपने खान-पान में कार्बोहाइड्रेट फ़ैट और प्रोटीन उचित मात्रा में लेता हूं. साथ ही मैं कहूंगा कि अगर आप कोई डायट फ़ॉलो करते हैं तो पहले अपना मेडिकल चेकअप करा लें ताकि आगे जाकर कोई समस्या ना हो. आमिर ये भी कहते हैं कि स्वस्थ और फ़िट रहने के लिए अपने आपको भूखा कतई नहीं रखना चाहिए. उनके मुताबिक़ मैं हर घंटे कुछ ना कुछ हल्का फुल्का खाता रहता हूं. पानी मेरी डायट का अहम हिस्सा है. दिन में चार से पांच लीटर पानी पीता हूं. फल ब्राउन ब्रेड और दूध भी पीता हूं. मैं पार्टी में नहीं खाता और ज़्यादा रात को भी कुछ नहीं खाता. आमिर ख़ान सुबह उठकर जॉगिंग करते हैं और टेनिस खेलते हैं. व्यायाम में वो पुश अप्स भी करते हैं. वो कहते हैं मैं कोशिश करता हूं कि आठ घंटे ज़रूर सोऊं. आराम भी स्वस्थ रहने के लिए बेहद ज़रूरी है. सनी देओल को सुबह छह बजे से ही पहले उठना पसंद है. वो भले ही 57 साल के हो गए हों लेकिन शरीर में अब भी वही पुराने सनी देओल वाली मज़बूती. इसका राज़ बताते हुए सनी कहते हैं मैंने शराब और सिगरेट को आज तक हाथ नहीं लगाया. सुबह की शुरुआत एक गिलास लस्सी मक्के की रोटी और मक्खन से करता हूं. मुझे गेंहू बेसन और बाजरे की रोटी भी पसंद है. एक पंजाबी होने के नाते खाने-पीने का शौकीन हूं लेकिन वर्जिश भी जमकर करता हूं. वो जिम भी जाते हैं. सनी के मुताबिक़ मेरा कोई डायट प्लान नहीं है. फ़िट रहने का एक ही मंत्र है कि सुबह जल्दी उठो और नशीली चीज़ों से दूर रहो. करीना कपूर को घी बहुत पसंद है लेकिन वो काफी वर्कआफट भी करती हैं. जहां बॉलीवुड में ज़्यादातर अभिनेत्रियां घी को मोटापे की वजह मानते हुए उससे दूर रहती हैं वहीं इसके उलट करीना कपूर मानती हैं कि घी की वजह से त्वचा में निखार आता है. वो कहती हैं मेरी दादी आज 85 साल से ज़्यादा की हैं. उन्होंने दो साल की उम्र से ही घी खाना शुरू कर दिया था. अब भी वो बड़ी तंदरुस्त और ख़ूबसूरत हैं. मैं भी उनकी उम्र तक उनके ही जैसे बने रहना चाहती हूं. करीना बताती हैं कि वो अपने दिन की शुरुआत एक कप कॉफ़ी और केले से करती हैं. करीना को ज़्यादातर घर का बना खाना ही पसंद है. करीना शाकाहारी खाना ज़्यादा पसंद करती हैं. वो कहती हैं मुझे दाल चावल सब्ज़ी और बहुत सारे घी के साथ रोटी खाना पसंद है. मैं जंक फ़ूड बिलकुल नहीं खाती. पहले करीना को चॉकलेट और केक बहुत पसंद थे लेकिन अब अपनी डायटिशियन की सलाह पर वो इनसे दूर हो गई हैं. करीना नियमित व्यायाम भी करती हैं. नवोदित इलियाना डी क्रूज़ कहती हैं कि उनके लिए फ़िट रहना चुनौतीपूर्ण है क्योंकि वो खाने की दीवानी हैं. अपनी फ़िटनेस का राज़ बताते हुए वो कहती हैं मैं जिम नहीं जाती. लेकिन नियमित तौर पर स्वीमिंग करती हूं. मैं रनिंग भी करती हूं जॉगिंग करने से शरीर तो स्वस्थ रहता ही है दिमाग में तनाव दूर होता है. मैं कैलोरी बर्न करने से ज़्यादा फ़िटनेस में यक़ीन करती हूं. इलियाना कहती हैं मैंने नियमित अंतराल में कम मात्रा में खाना खाती रहती हूं. मैं नाश्ते में फल जूस अंडे का पोर्च और ब्राउन ब्रेड खाती हूं. लंच में दो रोटी चिकन मछली पसंद है. दाल और गोभी भी खाती हूं. डिनर भी आमतौर पर लंच जैसा ही होता है. इलियाना के मुताबिक़ उन्हें पार्टियों में जाना पसंद नहीं और शराब भी नहीं पीतीं. |
| DATE: 2014-04-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1059] TITLE: फ़िल्म फ्रोज़न ने बॉक्स ऑफ़िस पर रचा इतिहास |
| CONTENT: डिज़नी स्टुडियो की एनिमेशन फ़िल्म फ्रोज़न ने सबसे ज़्यादा कमाई कर एनिमेशन फ़िल्मों का नया इतिहास रचा है. बॉक्सऑफ्सिमोजो डॉट कॉम के अनुसार गानों से भरपूर फ़िल्म फ्रोज़न ने लगभग 64 अरब रूपय की कमाई कर साल 2010 की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म टॉय स्टोरी3 का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. 29 नवंबर को पहली बार उत्तरी अमेरिका में बड़े पर्दे पर आई ये फ़िल्म प्रसिद्ध लेखक एवम् कवि हैंस क्रिश्चियन एंडरसन की परिकथा द स्नो क्वीन पर आधारित है. अकेले उत्तरी अमेरिका में फ़िल्म ने 39-84 अरब डॉलर की कमाई की है. अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में दस बेहतरीन फ़िल्मों की चार्ट में लगातार तीन महीने तक फ़िल्म फ्रोज़न ने अपनी जगह जमाई रखी. फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ्सि पर दस सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्मों के इतिहास में अपना नाम दर्ज़ कर लिया है. साल के शुरूआत में ही फ्रोज़न दो ऑस्कर झटकने में कामयाब रही. फ्रोज़न को सर्वश्रेष्ठ एनिमेशन और सर्वश्रेष्ठ मौलिक गीत का ऑस्कर मिला था. हालांकि हॉलिवुड़ रिपोर्टर नाम की वेबसाइट के अनुसार फ्रोज़न को एनिमेशन फ़िल्म द लीगो से जोरदार टक्कर मिल सकती है. वार्नर ब्रॉस और विलेज रोड़शो निर्मीत फ़िल्म द लीगो इस साल फरवरी में बड़े पर्दे पर आई थी. विश्व स्तर पर 40 करोड़ डॉलर कमाने वाली फ़िल्म द लीगो इस साल की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म है. यह तब है जब यह फ़िल्म बहुत सारे देशों में रिलीज़ भी नहीं हुई है. ऑस्ट्रेलिया में यह फ़िल्म गुरूवार को रिलीज़ होने वाली है. वहीं जर्मनी में यह आने वाले हफ़्ते में बड़े पर्दे पर आयेगी. बहरहाल फ़िल्म फ्रोज़न का साउंडट्रैक बहुत सफल हो रहा है. अमेरिका के बिलबोर्ड चार्ट में यह उपरी पायदान पर बना हुआ है. निलसेन साउंडस्कैन के मुताबिक पिछले हफ़्ते फ़िल्म के साउंडट्रैक की 2 लाख से ज़्यादा कॉपियों की बिक्री हुई थी. |
| DATE: 2014-04-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1060] TITLE: कॉमेडियन कपिल शर्मा के शो में ‘धोखाधड़ी'? |
| CONTENT: बेहद लोकप्रिय टीवी शो कॉमेडी नाइट्स विद कपिल को देखने के लिए लोग दूर-दूर से सेट्स पर पहुंचते हैं. लेकिन अब इस शो पर आरोप लग रहे हैं कि दर्शकों से 1000 से लेकर 8000 रुपए तक मांग कर उन्हें शो में एंट्री दी जा रही है. इन आरोपों के जवाब में कपिल ने अपने ट्विटर पर लिखा है मेरे शो पर आने के लिए कोई पैसा नहीं लिया जाता तो अगर आप किसी को पैसे देते हैं या कोई आपसे पैसे मांगता है तो दोनों ही ग़लत हैं. पिछले साल के कॉफ़ी विद करण के सीज़न में सोनम कपूर और दीपिका पादुकोण एक साथ शो पर आए थे. जहां दोनों ने हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री की और ख़ास तौर पर रणबीर कपूर की ख़ूब खिंचाई की. पर इस सीज़न में जब सोनम करण के शो पर पहुंची तो पता चला कि अब ये दोनों अभिनेत्रियाँ दोस्त नहीं हैं. शो पर जब करण ने सोनम से पुछा कि ऐसी कौन सी चीज़ है जो दीपिका के पास है और उनके पास नहीं तो सोनम बोलीं एक अच्छी पीआर कंपनी. दीपिका का प्रमोशन करने वाले लोग बहुत हो-हल्ला करते हैं. आगे जब करण ने सवाल पूछा कि बताओ एक अच्छी लड़की जो अब बुरी बन गयी हो तो सोनम ने फिर से दीपिका का नाम लिया. शायद किसी ने ठीक ही कहा है कि बॉलीवुड में दो हीरोइनें कभी दोस्त नहीं रह सकतीं. यूं तो करीना कपूर के पास काम की कमी नहीं है. पर एक बार संजय लीला भंसाली के साथ काम करने का मौका छोड़ने के बाद अब करीना संजय को इम्प्रेस करना चाहती हैं. करीना को संजय ने गोलियों की रासलीलारामलीला के लिए अप्रोच किया था जिसके लिए करीना ने मना कर दिया था. पर अब जब संजय को उनकी आने वाली फिल्म बाजीराव मस्तानी के लिए कोई चेहरा नहीं मिल रहा तो करीना संजय का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने की कोशिश कर रही हैं. हाल ही में करीना ने संजय लीला भंसाली की आने वाली फ़िल्म गब्बर के लिए एक आइटम सॉन्ग भी किया है. |
| DATE: 2014-04-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1061] TITLE: ‘अनपढ़’ राखी सावंत के पास 15 करोड़ |
| CONTENT: मुंबई के उत्तरी-पश्चिम इलाक़े से राष्ट्रीय आम पार्टी की इकलौती उम्मीदवार राखी सावंत ने मंगलवार को अपना नामांकन भरा. राखी ने इस नामांकन में 15 करोड़ रुपए की संपत्ति घोषित की. इस संपत्ति में राखी के मुंबई में दो घर दो दफ़्तर 3-5 करोड़ रूपए की चल संपत्ति शामिल है. इसके अलावा अपने नामांकन में राखी ने अपने आप को अनपढ़ बताया है. पर एक ख़ास बात जो राखी ने अपने नामांकन में लिखी वो थी उनके ख़र्चे की. राखी ने चुनाव प्रचार में इस्तेमाल होने वाली सामग्री गाड़िया पैसा पंडाल सब चीज़ों की घोषणा की. आमिर ख़ान के टीवी शो सत्यमेव जयते ने ख़ूब लोकप्रियता और चर्चाएं बटोरीं लेकिन वहीँ सलमान ख़ान के टेलीविज़न शो पांच का पंच को कोई भी चैनल लेने को तैयार नहीं है. ग़ौरतलब है कि सलमान ने अपने इस शो के बारे मीडिया को कई दिनों पहले बताया था और कहा था कि ये शो सामाजिक मुद्दों की बात करेगा और ये आमिर ख़ान के शो सत्यमेव जयते से बिलकुल अलग होगा. पर सलमान ख़ान के इस शो में अभी तक किसी प्रोडक्शन हाउस ने ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखायी है. हालांकि इस शो की विषयवस्तु को सबने बहुत सराहा है पर बजट ज़्य़ादा होने के चलते कई प्रोडक्शन हाउस इससे पल्ला झाड़ रहे हैं. बॉलीवुड अभिनेत्री सनी लियोनी अपनी आने वाली फ़िल्म टीना एंड लोलो में और भी ज़्यादा बोल्ड अवतार में नज़र आएंगी. जिस्म 2 जैकपॉट और रागिनी एमएमएस 2 में अभिनय करने वाली सनी लियोनी कहती हैं सेक्स एक ऐसी चीज़ है जो हर देश की जनता को अपनी और आकर्षित करती है. मैंने टीना एंड लोलो में कुछ ऐसे दृश्य फ़िल्मायें हैं जो मेरी पहली फ़िल्मों से बोल्ड हैं. वे कहती हैं बॉलीवुड में ऐसे बहुत ही कम निर्देशक और निर्माता हैं जिनपर मैं ऐसे दृश्यों के साथ भरोसा कर सकती हूं. पर निर्देशक देवांग ढोलकिया ने ये दृश्य शूट करते वक़्त वहाँ का माहौल काफी हल्का बना दिया था जिससे मुझे ऐसे दृश्य करने में ज़रा भी हिचकिचाहट नहीं हुई. हाल ही में रिलीज़ हुई सनी की फ़िल्म रागिनी एमएमएस-2 में भी कई बोल्ड दृश्य थे और फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाब भी हो गई. |
| DATE: 2014-04-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1062] TITLE: अंतरंग दृश्यों पर पापा को नहीं होगा एतराज़: आलिया भट्ट |
| CONTENT: आलिया भट्ट मानती हैं कि उनके पिता को पर्दे पर उनके अंतरंग दृश्यों से ज़रा भी एतराज़ नहीं होगा. आने वाली फ़िल्म टू स्टेट्स में उनके और अर्जुन कपूर के बीच कुछ अंतरंग दृश्य हैं साथ ही चुंबन दृश्य भी हैं. जब उनसे पूछा गया कि क्या उनके पिता महेश भट्ट इस बात पर नाराज़गी ज़ाहिर नहीं करेंगे तो आलिया ने कहा क्या आपने मेरे पिता की फ़िल्में नहीं देखीं. वो भी तो बोल्ड होती हैं. पर्दे पर मैं महेश भट्ट की बेटी नहीं बल्कि एक कलाकार हूं. मुझे नहीं लगता कि उन्हें कोई एतराज़ होगा. फ़िल्म के एक प्रमोशनल इवेंट में आलिया और अर्जुन दोनों ही काफ़ी मौज मस्ती के मूड में नज़र आए. जब दोनों से पूछा गया कि क्या दोनों की ये केमेस्ट्री रियल लाइफ़ में भी है या ये सिर्फ़ प्रमोशन के हथकंडे हैं. इस पर अर्जुन कपूर थोड़े नाराज़ होते हुए बोले हम कलाकार हैं लेकिन साथ ही इंसान भी हैं. कोई मशीन नहीं हैं कि हमारे कोई इमोशन नहीं होंगे. हम कोई स्विच ऑफ़ स्विच ऑन मोड में काम नहीं करते. आलिया और मैं बहुत अच्छे दोस्त हैं. हमने सेट पर काफ़ी मज़े में काम किया और हमारी वही दोस्ती यहां भी दिख रही है. टू स्टेट्स में आलिया ने एक दक्षिण भारतीय लड़की का किरदार निभाया है तो वहीं दूसरी ओर अर्जुन कपूर एक पंजाबी लड़के बने हैं. क्या अपने रोल के लिए उन्होंने किसी तरह की तैयारी कीक्या अपने किरदारों के लिए कोई उच्चारण की क्लास ली इसके जवाब में अर्जुन कपूर बोले हमारे निर्देशक अभिषेक बर्मन शुरुआत से ही चाहते थे कि हमारे किरदार कैरीकेचर की तरह ना लगें. हम फ़िल्म में बिलकुल आम लड़के लड़की की तरह बोल रहे हैं. जैसे दूसरी फ़िल्मों में दिखाते हैं ना कि दक्षिण भारतीय किरदार है तो वो ख़ास अंदाज़ में बोलेगा ऐसा इस फ़िल्म में नहीं है. फ़िल्म की शूटिंग के दौरान और प्रमोशन के दौरान कई बार मीडिया में अर्जुन और आलिया की कथित नज़दीकियों की ख़बरें सुर्खियां बनती रहीं. जब इस पर सवाल किए गए तो अर्जुन कपूर कई बार मीडिया पर नाराज़ हुए और बोले आप लोगों को बस चले तो कल हमारी सगाई करवा दीजिए और परसों शादी. टू स्टेट्स चेतन भगत के उपन्यास पर आधारित है. इसके निर्माता साजिद नाडियाडवाला और करण जौहर हैं और निर्देशक अभिषेक बर्मन हैं. फ़िल्म 18 अप्रैल को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2014-04-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1063] TITLE: अलग होने के बाद पहली बार साथ दिखे ऋतिक-सुज़ैन |
| CONTENT: पिछले साल के आख़िर में अलग हुए अभिनेता ऋतिक रोशन और सुज़ैन ख़ान अपने अलगाव के बाद पहली बार साथ नज़र आए. शनिवार को ऋतिक-सुज़ैन के बड़े बेटे रेहान का जन्मदिन था और इस मौक़े पर सुज़ैन के घर पर आयोजित पार्टी में ऋतिक और सुज़ैन ने मेज़बान की भूमिका अदा की और साथ-साथ मेहमानों का स्वागत किया. इससे पहले दोनों ही साथ दिखने से बचते रहे हैं. दिसंबर 2013 में ऋतिक और सुज़ैन ने अपनी 14 साल की शादी के बाद अलग होने का फ़ैसला किया था. इस जोड़े के दोनों बेटे अपनी मां सुज़ैन के साथ रहते हैं. बॉलीवुड कलाकारों को अच्छे अभिनय के साथ-साथ अब घटिया अभिनय के लिए भी अवॉर्ड देने का चलन बढ़ता जा रहा है. अभी कुछ दिनों पहले शाहरुख़ ख़ान को चेन्नई एक्सप्रेस में अभिनय के लिए घंटा अवॉर्ड्स देने वाली संस्था ने साल के सबसे घटिया अभिनेता के ख़िताब से नवाज़ा था. अब इसी तरह के एक और पुरस्कार गोल्डन केला अवॉर्ड्स में अजय देवगन को साजिद ख़ान की फ़िल्म हिम्मतवाला में अभिनय के लिए सबसे घटिया अभिनेता घोषित किया गया. सबसे घटिया निर्देशक का ख़िताब मिला संजय लीला भंसाली को गोलियों की रासलीला राम-लीला के लिए. फ़िल्म राजधानी एक्सप्रेस से बॉलीवुड में एंट्री मारने वाले टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस को सबसे घटिया डेब्यू कलाकार का ख़िताब मिला. फ़िल्म मैं तेरा हीरो के प्रमोशन छोड़कर अभिनेत्री नरगिस फ़ख़री अमरीका रवाना हो गईं और अब फ़िल्म के प्रमोशन का पूरा भार वरुण धवन और इलियाना डी क्रूज़ के कंधों पर आ गया है. दरअसल नरगिस एक हॉलीवुड फ़िल्म की शूटिंग के सिलसिले में अमरीका गईं हैं. नरगिस के इस तरह से फ़िल्म की रिलीज़ से ठीक पहले विदेश जाने से मैं तेरा हीरो की निर्माता एकता कपूर काफ़ी नाराज़ बताई जा रही हैं. मैं तेरा हीरो के निर्देशक डेविड धवन हैं और फ़िल्म चार अप्रैल को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2014-04-01 |
| LABEL: entertainment |
| [1064] TITLE: सुविधाओं के बिना हम कैसे जीतेंगे पदक: सलमान ख़ान |
| CONTENT: बॉलीवुड स्टार सलमान ख़ान का मानना है कि अगर ओलंपिक जैसी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में ज़्यादा से ज़्यादा पदक जीतने है तो खिलाड़ियों को दी जाने वाली सुविधाओं में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा करना होगा और नए खिलाड़ियों की ट्रेनिंग पर ज़्यादा ध्यान देना होगा. खेल पर आधारित एक फ़िल्म ख़्वाब के म्यूज़िक लॉन्च पर पहुंचे सलमान ख़ान ने कहा मैंने फ़ुटबॉल क्रिकेट हॉकी से लेकर सभी तरह के खेल खेले हैं. मुझे लगता है देश की सेहत के लिए खेलों को प्रमोट करना बहुत ज़रूरी है. उन्होंने कहा हमारे यहां ट्रेनिंग की पर्याप्त व्यवस्था ही नहीं है. फिर हम क्यों कहते हैं कि हमने मेडल नहीं जीते बेहतर प्रदर्शन नहीं किया. वगैरह-वगैरह. खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाने के लिए यहां कुछ है ही नहीं. मुझे लगता है कि पूरे देश को ही खिलाड़ियों का सपोर्ट करने की ज़रूरत है. फ़िल्म ख़्वाब की विषय वस्तु भी यही है. यह देश में एथलीटों को पेश आने वाली मुश्किलों पर आधारित फ़िल्म है. फ़िल्म बताती है कि खेल व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार कैसे खिलाड़ियों को उनके सपने साकार होने से रोक देता है. सलमान ख़ान ने कहा उपकरणों और कोचिंग पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है. साथ ही ग़रीब खिलाड़ियों के लिए अलग से कोटा होना चाहिए. इन छोटी-छोटी बातों से बड़े बदलाव आएंगे. साथ ही सलमान ने छोटी फ़िल्मों को अपना सपोर्ट देने की इच्छा जताई. उन्होंने कहा कई छोटे बजट की फ़िल्में बड़े पैशन से बनाई जाती हैं लेकिन पैसे की कमी की वजह से रिलीज़ भी नहीं हो पातीं. हमें ऐसी फ़िल्मों को सपोर्ट करने की ज़रूरत है. हालांकि हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म ओ तेरी जिसे सलमान ख़ान ने काफ़ी प्रमोट किया सुपरफ़्लॉप हो गई. फ़िल्म को सलमान ख़ान के जीजा अतुल अग्निहोत्री ने बनाया था. |
| DATE: 2014-04-01 |
| LABEL: entertainment |
| [1065] TITLE: 'फ़िल्मी सितारे सिखा सकते हैं सबक' |
| CONTENT: अभिनेता अनुपम खेर इन दिनों राजनैतिक रंग में रंगे हुए हैं. उनके पास वाजिब वजह भी है. आगामी लोकसभा चुनावों के लिए अनुपम खेर की पत्नी किरण खेर चंडीगढ़ से प्रत्याशी हैं और अनुपम खेर पूरे ज़ोर-शोर से पत्नी के समर्थन में आवाज़ बुलंद कर रहे हैं. अनुपम कहते हैं कि उनकी पत्नी को उनका पूरा समर्थन है और ये सब सोचना ग़लत है कि फ़िल्मों में काम करने वाले लोग राजनीति में नहीं आ सकते. फ़िल्मी कलाकारों के राजनीति में क़दम रखने की आलोचना पर प्रेस से बातचीत करते हुए अनुपम ने कहा ये ग़लतफ़हमी है कि फ़िल्मी सितारे राजनीति नहीं कर सकते या अगर राजनीति में आ भी जाएं तो उन्हें कुछ समझ नहीं आता. ये सब सही नहीं है. फ़िल्म इंडस्ट्री में ऐसे कई सितारे हैं जो नेताओं को सबक सिखा सकते हैं. 28 बरस से किरण खेर के साथ वैवाहिक जीवन बिता रहे किरण खेर कहते हैं कि पति के तौर पर और एक दोस्त के तौर पर वो उन्हें बेहद क़रीब से जानते हैं. हालांकि ख़ुद चुनाव लड़ने के सवाल पर अनुपम कहते हैं घर पर एक सदस्य ही काफ़ी है. मैं हर तरह से किरण के साथ हूं. मेरे जैसा शख़्स ही एक दबंग महिला को बेहतर समझ सकता है. अनुपम खेर कहते हैं कि उनकी पृष्ठभूमि इस तरह की है कि महिलाओं की तरफ़दारी करना उनके अंदर बस गया है. ये प्रवृत्ति उन्हें उनके घर से मिली है. किरण खेर का जन्म तो चंडीगढ़ में हुआ था लेकिन वो पिछले कईं बरस से मुंबई में बसी हुई हैं. उन्होने 2009 में बीजेपी का रूख़ किया था. |
| DATE: 2014-03-31 |
| LABEL: entertainment |
| [1066] TITLE: 'सेक्स वीडियो' पर मीरा के ख़िलाफ़ वॉरंट |
| CONTENT: साल 2004 में महेश भट्ट की फ़िल्म नज़र से अपना बॉलीवुड करियर शुरू करने वाली पाकिस्तानी अभिनेत्री मीरा एक नए विवाद में फंस गई हैं. इंटरनेट पर एक वीडियो लीक हुआ है जिसमें कथित तौर पर मीरा अपने पति के साथ अंतरंग अवस्था में नज़र आ रही हैं. अब इसके बाद एक पाकिस्तानी कोर्ट ने मीरा और उनके पति के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वॉरंट जारी कर दिया है और पुलिस से इन दोनों को दो अप्रैल तक कोर्ट में हाज़िर करने को कहा गया है. कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फ़ैसला सुनाया. याचिका में कहा गया था कि मीरा और उनके पति कैप्टन नावेद शहज़ाद का अंतरंग दृश्यों वाला ये वीडियो ग़ैर इस्लामिक है और दोनों समाज में अश्लीलता को बढ़ावा दे रहे हैं. हालांकि शहज़ाद का मानना है कि इस मामले को बेवजह तूल दिया जा रहा है और यह वीडियो कतई विवादित नहीं है क्योंकि वो दोनों शादीशुदा हैं. आमिर ख़ान की बहुप्रतीक्षित फ़िल्म पीके की वजह से रणबीर कपूर की फ़िल्म बॉम्बे वैलवेट की रिलीज़ टलने की ख़बरें हैं. दरअसल पहले पीके जून में रिलीज़ होने वाली थी लेकिन बाद में आमिर ख़ान के अपने शो सत्यमेव जयते में व्यस्त होने की वजह से फ़िल्म की रिलीज़ टाल दी गई और अब राजकुमार हीरानी निर्देशित यह फ़िल्म क्रिसमस पर रिलीज़ हो रही है. बॉम्बे वैलवेट के निर्माता-निर्देशक अनुराग कश्यप इस बात से नाराज़ भी हो गए थे क्योंकि बॉम्बे वैलवेट भी क्रिसमस पर ही रिलीज़ होनी थी. अब ताज़ा ख़बर यह है कि आमिर की फ़िल्म से टकराव टालने के लिए बॉम्बे वैलवेट की रिलीज़ आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया गया है. अभी नई तारीख़ की घोषणा नहीं हुई है. गत शुक्रवार को रिलीज़ हुई तीनों बॉलीवुड फ़िल्मों की बॉक्स ऑफ़िस पर दुर्दशा हो गई. ढिशक्यों यंगिस्तान और ओ तेरी नाम की तीन फ़िल्में 28 मार्च को रिलीज़ हुईं और तीनों ही बॉक्स ऑफ़िस पर धूल चाट गईं. फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक़ तीनों फ़िल्मों का बजट कुल मिलाकर क़रीब 75 करोड़ रुपए था लेकिन पहले दिन तीनों फ़िल्में कुल मिलाकर पांच करोड़ रुपए ही कमा पाईं. दर्शकों ने सिरे से तीनों फ़िल्मों को नकार दिया. |
| DATE: 2014-03-31 |
| LABEL: entertainment |
| [1067] TITLE: राजनीतिक फ़िल्मों से क्यों भागता है बॉलीवुड? |
| CONTENT: राजनेताओं के भाषण राजनेताओं के नखरे और राजनेताओं के मंसूबे ये सब बनाता है भारत की राजनीति को काफ़ी नाटकीय. पर कमाल की बात तो ये है कि इस नाटक को बड़े परदे पर लाने में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री कतराती है. ज़रा सोचिए अपनी पसंदीदा राजनीतिक फिल्म के बारे में. आई कोई यादजब भारत के चर्चित फ़िल्मकार श्याम बेनेगल से मैंने ये सवाल किया तो वो भी सोच में पड़ गए और फिर जवाब नहीं दे पाए. विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाए जाने के बाद भी भारत में क्यों नहीं है विकसित पॉलिटिकल सिनेमा. इस सवाल के साथ मैं निकला मुंबई की सड़कों पर खटखटाने कुछ फ़िल्मकारों के दरवाज़े. कई मुद्दों पर फ़िल्म बनाने वाले श्याम बेनेगल ने कई ऐसी फ़िल्में बनाईं हैं जिनमें उन्होंने पॉलिटिकल समस्या को छेड़ा तो पर व्यंग्य के साथ. राज्यसभा सदस्य रह चुके श्याम बेनेगल ने मुझे बताया हमारे देश में सेंसर काफ़ी संवेदनशील है. अगर हमने चाह कर एक राजनीतिक फ़िल्म बना भी ली तो सेंसर अपनी कैंची लिए खड़ा होगा. वो नहीं चाहते की किसी भी पार्टी या किसी भी समुदाय के मकसद और उनके दृष्टिकोण सिनेमा के परदे पर दिखा कर लोगों के विचारों को बदला जाए. फिर क्या तरीक़ा है पॉलिटिकल फ़िल्में बनाने का बेनेगल ने कहा देखो अगर ऐसी फ़िल्में बनानी ही हैं तो व्यंग्य और नौटंकी को साथ लेना पड़ेगा क्योकि यहां सीधे मुंह राजनीतिक सिनेमा बनाना और बेचना मुश्किल है. कोई भी प्रोड्यूसर ऐसे विषय पर पैसे डालने से पहले तीन बार सोचेगा और इसीलिए कोई यह जोखिम नहीं उठाता. ऐसा सिर्फ़ भारत में ही नहीं विश्व भर में है. आने वाले फ़िल्मकारों की बात करते हुए श्याम बेनेगल कहते हैं अगर किसी को पॉलिटिकल फ़िल्मों को बनाना है तो डाक्यूमेंट्री की तरह से बनाया जाए क्योंकि फ़ीचर फ़िल्म बनाने में ज़्यादा जोखिम है और डाक्यूमेंट्री बनाने से जिनको राजनीतिक सिनेमा के क्षेत्र में रुचि है वे देख पाएंगे. शिप ऑफ़ थीसियस बनाने वाले आनंद गाँधी आजकल एक पॉलिटिकल डाक्यूमेंट्री पर काम कर रहे है. इस डाक्यूमेंट्री में आम आदमी पार्टी की दिल्ली विधानसभा चुनावों में कामयाबी और भारत में पिछले एक साल की राजनीतिक उथल पुथल को फ़िल्माया गया है. आनंद गाँधी कहते हैं भारत में फ़िल्मकार का मतलब है जो आपका मनोरंजन करें नाच गाने वाली फ़िल्में बनाए. यह इंसान अपनी फ़िल्मों के ज़रिए कभी एक पार्टी या एक समाज की गतिविधियों पर टिप्पणी या राय नहीं दे सकता. कई सालों से फ़िल्मों का मतलब ही मनोरंजन करना है. फिर पॉलिटिकल सिनेमा को कैसे जगह मिलेवह कहते हैं कई भारतीय फ़िल्में पॉलिटिकल संवाद करने में सक्षम रहीं है. जैसे कई फ़िल्मों में बेरोज़गारी महंगाई भ्रष्टाचार आदि को दिखाया गया है. भारत में अगर कुछ सीखने का ज़रिया है तो वो है सिनेमा. पर मेरे ज़ेहन में ऐसी कोई पॉलिटिकल फ़िल्म नहीं है जो मुझे याद हो. मौजूदा चुनावी दौर में आने वाली फ़िल्म देख तमाशा देख के निर्देशक अपनी फ़िल्म को एक राजनीतिक व्यंग्य कहकर बुलाते हैं. फ़िरोज़ अब्बास ख़ान का कहना है सिनेमा देखने वालों का मकसद होता है कि वे अपनी वास्तविकता भूल कर एक सपनों की दुनिया में चले जाएं. वे अपनी ज़िन्दगी की मुश्किलों को सिनेमा पर नहीं देखना चाहते. इसीलिए पॉलिटिकल सिनेमा का कम चलन है. ख़ान से जब अपहरण और राजनीति जैसी फ़िल्में बनाने वाले प्रकाश झा की बात की गई तो वह बोले प्रकाश झा की ताज़ा फ़िल्मों में गहराई नहीं है. वो सब पुराना सा लगता है. उनकी फ़िल्मों की लपट तो पॉलिटिकल है पर अंदर की कहानी साधारण होती है शायद वह समझ गए हैं कि मार्केट यही मांगती है. राजनीतिक फ़िल्म बनाने का मौका भारत में बहुत कम लोगों को मिलता है. ख़ान कहते हैं कि एक फ़िल्म के साथ बहुत से लोग जुड़ते हैं और शायद उनमें से कुछ को इस शैली पर विश्वास नहीं है. राजनीतिक विषय पर लेख लिखना आसान है नाटक करना आसान है पर फ़िल्म बनाना. ये थोड़ा मुश्किल है. भारत में लगभग 80 करोड़ वोटर हैं और पॉलिटिकल फ़िल्में नाममात्र की ही बनती हैं. जब तक भारतीय सिनेमा पर से ये नाच गाने वाली फ़िल्मों की मोहर नहीं उठती और जब तक निर्माताओ की राजनीति जैसे अहम मुद्दे पर फ़िल्म बनाने की इच्छा नहीं होगी तब तक यह सवाल उठता रहेगा कि क्यों राजनीतिक फ़िल्मों से भागता है बॉलीवु |
| DATE: 2014-03-31 |
| LABEL: entertainment |
| [1068] TITLE: मैं राजनीति के लिए नहीं बना: सनी देओल |
| CONTENT: पूरे देश में इस वक़्त चुनावों की हलचल है और जो फ़िल्में इस दौरान रिलीज़ हो रहीं हैं उनके प्रमोशन के वक़्त भी फ़िल्म कलाकार चुनावों को लेकर अपनी राय दे रहे हैं. मुंबई में बीबीसी की बात हुई अभिनेता सनी देओल से फ़िल्म ढिशक्यों के प्रमोशन के वक़्त जहां उन्होंने बताया अपने सपनों के भारत के बारे में सत्यमेव जयते के बारे में और अपनी आने वाली फ़िल्मों के बारे में. फ़िल्म ढिशक्यों में लकवा का किरदार निभाने वाले सनी देओल से जब पूछा गया कि वो आने वाले चुनाव के बाद देश में क्या-क्या बदलाव देखना चाहेंगेइस पर सनी बोले बदलाव पहले हम सबको अपने अंदर लाना होगा. हमें हर चीज़ सही ढंग से करने की ज़रूरत है. अगर हम कोई काम करने जा रहे हैं और वह काम नहीं हो पा रहा है तो हमें उसके लिए रिश्वत नहीं देनी चाहिए. वो कहते हैं अगर किसी लाइन में आप लगे हों तो उस लाइन को न तोड़ें और इधर-उधर कचरा न फेंके. अगर हम यह सब करें और किसी की बुराई न करें तो देश में अपने आप ही बदलाव आ जाएगा. पर क्या सनी देओल का फिल्मों से राजनीति में आने का कोई मन है इस पर सनी ने साफ़ किया मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता क्योंकि कल क्या होगा कोई नहीं जानता. हाँ मैं इतना ज़रूर कह सकता हूं कि मैं उस ढंग का आदमी नहीं हूं और मैं राजनीति के लिए नहीं बना हूं. आजकल कई अभिनेता फ़िल्मों के साथ टेलीविज़न में भी अपनी कलाकारी दिखा रहे हैं. आमिर ख़ान सलमान ख़ान और अमिताभ बच्चन पहले से ही टेलीविज़न में काम कर रहे हैं. तो क्या सनी देओल भी टेलीविज़न में काम करना चाहेंगे सनी बोले अगर टेलीविज़न में मुझे कुछ ऐसा शो मिले जिसमें एक अच्छी कहानी हो और उसके पात्र अच्छे हों तो मैं उस कार्यक्रम को ज़रूर करना चाहूंगा. जब उनसे पूछा गया कि वह सत्यमेव जयते जैसे किसी प्रोग्राम का हिस्सा बनना चाहेंगे जहां सामाजिक मुद्दों पर चर्चा की जाती हैसनी बोले देखिए मैंने यह शो देखा नहीं है पर जैसा मैंने कहा कि अगर किसी शो में अच्छी कहानी होगी तो मैं उसे ज़रूर करना चाहूंगा. आजकल जितनी ज़रूरी फ़िल्म की कहानी होती है उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी फ़िल्म का प्रमोशन होता है. पर सनी देओल की सोच इससे बिल्कुल उलट है. वो कहते हैं देखिये पब्लिसिटी से ही फ़िल्में नहीं चलती. पब्लिसिटी आपको बस जागरूकता फैलाने के लिए करनी चाहिए. उसके बाद ही लोगों को आपके फ़िल्म के ट्रेलर अच्छे लगेंगे आपकी फ़िल्म का लुक अच्छा लगेगा तो वो देखने आएंगे. अब जनता का उस वक़्त क्या खाने का मन है वो आपको पता नहीं. वह कहते हैं आज जनता हेल्थ फ़ूड खाएगी कल चायनीज़ खाएगी कुछ पता नहीं. तो हमें सिर्फ़ उतनी ही पब्लिसिटी करनी चाहिए जिससे लोगों के बीच जागरूकता फैले. |
| DATE: 2014-03-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1069] TITLE: 'दिया और बाती' की संध्या रचाएंगी शादी |
| CONTENT: पिछले हफ़्ते हमने देखा कि टीवी धारावाहिक साथिया ने किस तरह छलांग लगाई और पहले स्थान पर पहुंच गया. इस दौड़ में इसने पीछे छोड़ा लोकप्रिया पारिवारिक कहानी दिया और बाती को. लेकिन इस हफ़्ते सूरत ज़रा बदल गई है. इन दोनों धारावाहिको की टक्कर तो बरक़रार है लेकिन दोनों ही नंबर एक पर हैं. साथिया में अहम और गोपी के बीच में दूरियां हैं और गोपी पूरी कोशिश कर रही है कि वो अहम के क़रीब आए. वहीं दिया और बाती में संध्या और सूरज के बीच है बेइंतेहा मोहब्बत. संध्या आईपीएस प्रशिक्षण के अंतिम पड़ाव पर है. ये सबसे मुश्किल पड़ाव होगा जहां संध्या की मुलाक़ात होगी एक चरमपंथी से और ये भूमिका निभाएंगे अखिलेन्द्र मिश्रा. दर्शकों को भी इंतज़ार है संध्या को खाकी वर्दी में देखना का. दिया और बाती के दर्शकों के लिए ख़ास ख़बर ये है कि संध्या इस शो के निर्देशक रोहित राज गोयल से शादी कर रही हैं. ये शादी मई के पहले हफ़्ते में होगी. एक कार्यक्रम के मुख्य कलाकारों को बदलना या शो छोड़कर चले जाना ये टीवी की दुनिया में एक आम बात है. कुछ समय से ये ख़बर आ रही है कि जोधा-अकबर की जोधा यानी परिधि शर्मा बहुत नाराज़ हैं अपने निर्देशक और साथी कलाकार रजत से. कहा जा रहा है कि नाराज़गी इस हद तक है कि परिधि ने शो छोड़ने का मन बना लिया है. अब देखना है कि जोधा यानी परिधि जाती हैं या शो में टिकती हैं फ़िलहाल जोधा-अकबर टिका हुआ है नंबर दो पर. कपिल शर्मा ने पिछले हफ़्ते सनी लियोनी को बनाया था अपनी पत्नी और साक्षी बनीं थी एकता कपूर कपिल के शो कॉमेडी नाइट्स विद कपिल पर. ज़ाहिर था कि उस एपिसोड का नतीजा अच्छा होगा और हुआ भी. कपिल ने जमकर फ़्लर्ट किया सनी के साथ लेकिन शो को इस हफ़्ते संतोष करना पड़ा तीसरे नंबर पर. रोहित शेट्टी ने अपनी टीम के साथ दक्षिण अफ्रीका में काफ़ी हलचल मचा डाली अपने शो . ख़तरों के खिलाड़ी. के साथ. स्टंट और ग्लैमर के इस खेल में अभी देखना ये है कि आगे क्या मोड़ आते हैं लेकिन शो के ख़तरनाक स्टंट और ज़बरदस्त दृश्यों को दर्शकों ने काफ़ी पसंद किया है. पहले ही हफ़्ते में शो ने लोकप्रियता की सीढ़ी पर छलांग मारकर चौथे पायदान पर क़ब्ज़ा जमा लिया है. अक्षरा और नैतिक की पारिवारिक दास्तां ये रिश्ता क्या कहलाता है भी नंबरों की दौड़ में बरक़रार है. इस हफ़्ते ये कार्यक्रम पांचवे नंबर पर टिका हुआ है. चैनलों की दौड़ में स्टार प्लस ने बाक़ी मनोरंजन चैनलों को पीछे छोड़ते हुए पहले स्थान पर क़ब्ज़ा किया है. दूसरे नंबर पर रहा ज़ी चैनल जबकि तीसरे स्थान पर है कलर्स. |
| DATE: 2014-03-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1070] TITLE: फ़िल्म रिव्यू : 'ओ तेरी' |
| CONTENT: रील लाइफ़ प्रोडक्शन प्राइवेट लिमिटेड की ओ तेरी कहानी है दो संघर्षरत युवा टीवी पत्रकारों की जिनकी बॉस उनसे हमेशा सनसनीखेज़ न्यूज़ लाने को कहती है. दोनों हर बार कोई ना कोई गड़बड़ कर देते हैं लेकिन एक दिन वो कुछ ऐसा कर गुज़रते हैं जो उन्हें पूरे देश का हीरो बना देता है. पीपी पुल्कित सम्राट और आनंद ईश्वरम देवदत्त सुब्रमण्यम यानी एड्स बिलाल अमरोही एक टीवी चैनल के लिए काम करते हैं और उनकी बॉस मॉनसून सारा जेन डियास हमेशा उन्हें डांटती फ़टकारती रहती है और कोई धमाकेदार न्यूज़ लाने को कहती है. एक दिन सीबीआई अफ़सर अविनाश त्रिपाठी कुलदीप सरीन की हत्या हो जाती है. इस क़त्ल के पीछे सत्ता पक्ष के सदस्य बिला ख़्वाजा अनुपम खेर और विपक्षी नेता भंवर सिंह किलोल विजय राज़ का हाथ है. दोनों ही एक दूसरे को फंसाने के चक्कर में कुछ ऐसा खेल रचते हैं कि त्रिपाठी की लाश पीपी और एड्स की गाड़ी में उनके गुर्गे रख देते हैं. और पुलिस उन दोनों के पीछे पड़ जाती है. दोनों ही बेहद डर जाते हैं लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि लाश एक सीबीआई अफ़सर की है तो उन्हें लगता है कि ये सुनहरा मौक़ा है अपनी बॉस को प्रभावित करने का सो वो लाश के साथ अपनी बॉस के पास पहुंच जाते हैं. लेकिन इससे पहले कि उनकी बॉस गाड़ी तक पहुंचकर लाश देख सके लाश रहस्यमय तरीक़े से ग़ायब हो जाती है. दोनों को लगता है कि अब उनकी नौकरी नहीं बचेगी. लेकिन अचानक एक ऐसी घटना होती है जिससे दोनों को पूरे देश में वाहवाही मिलती है और वो हीरो बन जाते हैं. वो क्या घटना थी. और क्या दोनों त्रिपाठी की हत्या के रहस्य को सबके सामने लाने में कामयाब हो पाते हैं यही फ़िल्म की कहानी है. उमेश बिष्ट और नीति पालटा की कहानी बचकानी है. फ़िल्म का स्क्रीनप्ले भी उतना ही बचकाना और मूर्खतापूर्ण है. दोनों ही मुख्य पात्रों की पर्दे पर की गीं बेवक़ूफ़ियां दर्शकों को ज़रा भी नहीं हंसा पातीं. फ़िल्म के बाक़ी किरदारों का भी यही हाल है. बड़े अनमे ढंग से किरदार रचे गए हैं जो पर्दे पर अजीबोग़रीब हरकते करते रहते हैं और दर्शकों को बोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ते. कहानी में इतने ज़्यादा मोड़ और घुमाव हैं कि दर्शकों को पता ही नहीं चल पाता कि आख़िर पर्दे पर चल क्या रहा है. पीपी और एड्स के किरदारों के साथ दर्शक जुड़ ही नहीं पाते और उनसे उन्हें सहानुभूति भी नहीं हो पाती. फ़िल्म के क्लाईमेक्स में भी बिलकुल नवीनता नहीं है और दर्शक इस तरह का क्लाईमेक्स कई दफ़ा देख चुके हैं. फ़िल्म के संवाद भी बेहद साधारण हैं. पुल्कित सम्राट देखने में स्मार्ट हैं लेकिन उनका अभिनय बहुत औसत दर्जे का है. नवोदित कलाकार बिलाल अमरोही दिखने में भले ही सामान्य हों लेकिन उन्होंने ठीक-ठाक अभिनय किया है. दोनों ही कलाकारों ने डांस अच्छा किया है. उमेश बिष्ट का निर्देशन बड़ा फीका है. फ़िल्म के प्लॉट में जिस हास्य की ज़रूरत थी वो उसे बिलकुल भी पूरा नहीं कर पाए. फ़िल्म का संगीत भी बड़ा साधारण है. कुल मिलाकर ओ तेरी बड़ी बोझिल फ़िल्म है. बॉक्स ऑफ़िस पर ये फ़िल्म के निर्माता के लिए बुरा सपना साबित होगी. |
| DATE: 2014-03-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1071] TITLE: इस यंगिस्तान में कितना है दम |
| CONTENT: भारत में होने वाले लोकसभा चुनावों की वजह से राजनीतिक तापमान बढ़ा हुआ है. ऐसे में राजनैतिक पृष्ठभूमि वाली यंगिस्तान इस माहौल को भुनाने की कोशिश में सफल हो जाएगी इसी पर नज़रें टिकी हैं लेकिन ये थोड़ा मुश्किल लग रहा है. फ़िल्म के निर्देशन कहानी और पटकथा में इतना दम नहीं है कि इस फ़िल्म को टिकाऊ बना सके. फ़िल्म की कहानी भारतीय प्रधानमंत्री के बेटे अभिमन्यु का किरदार निभा रहे जैकी भगनानी और अन्विता चौहान यानी नेहा शर्मा के प्यार की कहानी के राजनैतिक असर की है. पिता की मौत के बाद अभिमन्यु को प्रधानमंत्री बनना पड़ता है और अभिमन्यु की निजी ज़िंदगी की वजह से शुरू होता है दिक्कतों का सिलसिला. सैयद रज़ा अफ़ज़ाल रमीज़ इल्हाम ख़ान और मैत्रेय बाजपेयी ने जो कहानी लिखी है वो अलग है लेकिन पटकथा बहुत ज़्यादा लंबी और बनावटी लगती है. राजनीति और निजी जिंदगी के बीच की कशमकश के लिए जो वजहें तैयार की गई हैं वो दरअसल बेवजह और बेबुनियाद नज़र आती हैं. कहानी के मुख्य किरदारों की क्रिया-प्रतिक्रिया आपको चौंका देगी. फ़िल्म का पहला हिस्सा बोरियत भरा और धीमा है. इंटरवल के बाद भी फ़िल्म दर्शकों को बांध नहीं पाती. अंत से पहले कहानी में दिलचस्पी पैदा होती भी है तो लोग उस वक्त तक इतने बोर हो चुके होंगे कि उसका कोई असर नहीं पड़ेगा. सैयद अहमद अफ़ज़ाल का निर्देशन बहुत ज़्यादा प्रभावित नहीं करता. कहानी की मांग थी कि निर्देशन बेहद संवेदनशील हो लेकिन लेकिन अफ़ज़ाल का काम बचकाना है. डायलॉग्स अगर ठीक-ठाक बन भी पड़े हैं तब भी कहानी कहने का तरीक़ा फ़िल्म को एकदम बनावटी बनाता है. फ़िल्म का संगीत भी मिले जुले प्रभाव वाला है हालांकि सलीम-सुलेमान का पार्श्व संगीत अच्छा लगता है. जैकी भगनानी एक तरह से ही अपना किरदार निभाते हुए नज़र आएंगे. उनमें कोई उतार-चढ़ाव या कोई विविधता नज़र आती जबकि किरदार की ज़रूरत थी बहुआयामी अभिनय. नेहा शर्मा ख़ूबसूरत तो लगती हैं और काम भी अच्छा है लेकिन उनका किरदार इतनी चिढ़ पैदा करता है कि उन्हें दर्शकों का प्यार शायद ही मिल पाए. फ़ारूख़ शेख़ की यह अंतिम फ़िल्म थी लेकिन वो कमज़ोर किरदार के आगे कुछ नहीं कर सकते थे. वहीं बमन ईरानी के पास भी करने के लिए ज़्यादा कुछ है नहीं. मीता वशिष्ठ के पास निभाने के लिए ख़ास रोल नहीं था लेकिन फिर भी वो अच्छा काम करती दिखती हैं. बाक़ी किरदार अपनी जगह सामान्य हैं किसी की कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं है. |
| DATE: 2014-03-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1072] TITLE: 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' ने मांगी माफ़ी |
| CONTENT: ऋषि कपूर और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के बीच शब्दों की लड़ाई पर आधारित ख़बर छाप कर विवाद को जन्म देने वाले अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अपनी ग़लती के लिए माफ़ी मांगी है. 20 मार्च को बॉम्बे टाइम्स के दूसरे पन्ने पर यह लेख छपा था. रिपोर्टर ने एक फ़िल्मी पत्रिका में छपे ऋषि कपूर के इंटरव्यू में नवाज़ पर की गई टिप्पणी को उठा कर उसे नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी के साक्षात्कार के साथ जोड़ दिया था. अख़बार ने ऋषि कपूर से माफ़ी मांगते हुए लिखा है ऋषि और नवाज़ की सामान्य टिप्पणियों को एक दूसरे के साथ जोड़कर छापना ग़ैरज़रूरी था. भारतीय सिनेमा के जगत के इस सितारे को दुख पहुंचाने के लिए हम माफ़ी मांगते हैं. ऋषि कपूर ने अपने इंटरव्यू में कहा था पेड़ों के इर्द गिर्द नाचना बहुत ही मुश्किल काम है और नवाज़ुद्दीन जैसे नए सितारों के लिए यह समझ पाना मुश्किल है कि हम जैसे सितारों के लिए भी यह कितना मुश्किल था. सुपरस्टार रजनीकांत की फिल्म कोचादियाँ के तमिल ट्रेलर रिलीज़ के लिए शाहरुख़ ख़ान को चेन्नई एक प्राइवेट जेट में बुलाया गया. पर अब ख़बरें हैं कि इसी फ़िल्म के हिंदी ट्रेलर लांच के लिए रजनीकांत ख़ुद मुंबई आएंगे. पता चला है कि रजनीकांत की ताज़ा फिल्म कोचादियाँ के हिंदी ट्रेलर का लांच उनके ख़ास और पुराने मित्र अमिताभ बच्चन करेंगे. ग़ौरतलब हैं कि 30 मार्च को होने वाले इस समारोह से पहले अमिताभ बच्चन अपनी फिल्म भूतनाथ को भी प्रोमोट करते नज़र आएंगे. अभिनेत्री श्रीदेवी की बेटी जाह्नवी अब बॉलीवुड में क़दम रखने वालीं है. ख़बरों के मुताबिक़ निर्माता निर्देशक करण जौहर जाह्नवी को लेकर फ़िल्म बनाने वाले हैं. कहा तो ये भी जा रहा है कि जाह्नवी को दक्षिण भारत से भी लगातार फ़िल्मों के ऑफर आ रहें है पर अपनी पहली फ़िल्म के लिए उनकी नज़दीकी करण जौहर से ज़्यादा दिखाई देती है. जानकारों के मुताबिक़ करण एक बार फिर एक स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर जैसी युवाओं की फिल्म बनाना चाहते हैं. हालांकि इन सारी बातों पर श्रीदेवी की तरफ़ से किसी बयान का इंतज़ार अभी हो रहा है. |
| DATE: 2014-03-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1073] TITLE: 1983 की विश्वकप जीत बड़े पर्दे पर |
| CONTENT: 25 जून 1983 का दिन भारतीय खेल इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है. जब कपिल देव ने भारत के कप्तान की हैसियत से विश्व कप ट्रॉफ़ी लॉर्ड्स के मैदान में थामी थी. अब इस ऐतिहासिक जीत को बड़े पर्दे पर लाने की तैयारी हो रही हैं. और ये बीड़ा उठाया है निर्देशक संजय पूरन सिंह ने जो इससे पहले लाहौर जैसी फ़िल्म बना चुके हैं जिसे समीक्षकों की सराहना मिली थी. फ़िल्म के निर्माता हैं विष्णु वर्धन इंदुरी जो सेलेब्रिटी क्रिकेट लीग के संस्थापक हैं. बीबीसी से बात करते हुए संजय ने बताया जब विष्णु मेरे पास यह प्रस्ताव लेकर आए तो मैं इनकार नहीं कर पाया क्योंकि मैं ख़ुद क्रिकेट का ज़बरदस्त प्रशंसक हूं. सुनील गावस्कर और कपिल देव हमेशा से मेरे पसंदीदा खिलाड़ी रहे हैं. संजय ने बताया कि फ़िल्म की शूटिंग उसी ऐतिहासिक लॉर्ड्स के मैदान में होगी जहां साल 1983 के विश्व कप फ़ाइनल में भारतीय टीम ने वेस्ट इंडीज़ को हराया था. हालांकि स्टेडियम के आसपास की जगह और नज़ारा अब काफ़ी कुछ बदल गया है लेकिन संजय ने दावा किया कि उनकी टीम रिसर्च में लगी है और वो पूरी कोशिश करेंगे कि स्टेडियम को वही लुक दे सकें जैसा साल 1983 में था. संजय के मुताबिक़ 1983 की जीत भारतीय खेल इतिहास के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी. उस दौर में भारतीय टीम कमज़ोर समझी जाती थी और वेस्ट इंडीज़ जैसी ताक़तवर टीम को हराकर भारत ने विश्व क्रिकेट को संदेश दिया कि वह भविष्य में छा जाने के लिए तैयार है. संजय कहते हैं हमारे आज के ज़्यादातर क्रिकेट आइकॉन उस वक़्त या तो पैदा ही नहीं हुए थे या बहुत छोटे थे. सचिन तेंदुलकर भी उस वक़्त सिर्फ़ 10 साल के थे. आज की युवा पीढ़ी ने तो इस ऐतिहासिक क्षण को देखा ही नहीं और ना ही उन्हें पता है कि यह कितनी बड़ी जीत थी. इसलिए हमें लगा कि इसे पर्दे पर लाना ज़रूरी है. लेकिन फ़िल्म के लिए क्या उस टीम के सदस्य रहे खिलाड़ियों की अनुमति नहीं लेनी होगी. इस पर संजय ने बताया कि निर्माता सभी खिलाड़ियों के संपर्क में हैं. उन्होंने कहा हम कपिल देव सुनील गावस्कर मोहिंदर अमरनाथ बलविंदर सिंह संधू जैसे खिलाड़ियों के संपर्क में हैं. क्योंकि हम इस प्रोजेक्ट में किसी तरह की ग़लती या चूक नहीं करना चाहते. संजय ने कहा सब जानते हैं कि भारत की इस जीत में 14 खिलाड़ियो का योगदान था. तो हमारी फ़िल्म में भी किसी एक खिलाड़ी पर फ़ोकस नहीं किया जाएगा बल्कि पूरी भारतीय टीम को हीरो की तरह पेश किया जाएगा. कपिल सुनील और अमरनाथ जैसे खिलाड़ियों को पर्दे पर कौन निभाएगा. इसका संजय ने कोई साफ़-साफ़ जवाब नहीं दिया. वो कहते हैं अभी फ़िल्म की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है. पूरी कहानी के बाद ही कलाकारों का चयन होगा. वैसे भी फ़िल्में दो तरह की होती हैं. एक जो कलाकारों को ध्यान में रखकर लिखी जाती हैं और दूसरी जिनमें कहानी लिखने के बाद कलाकार चुने जाते हैं. यह दूसरे किस्म की फ़िल्म है. इस फ़िल्म कि शूटिंग इस साल के अंत तक शुरू हो जाएगी. |
| DATE: 2014-03-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1074] TITLE: लता मंगेशकर ने हार्ट अटैक की अफ़वाहों को बकवास बताया |
| CONTENT: सोशल मीडिया पर प्रख्यात गायिका लता मंगेशकर से संबंधित एक ग़लत ख़बर ने उनके प्रशंसकों के होश उड़ा दिए. दरअसल ट्विटर पर अचानक बुधवार को अफ़वाह फैल गई कि लता मंगेशकर को ज़बरदस्त दिल का दौरा पड़ा. और ये ख़बर आग की तरह सोशल मीडिया पर फैल गई. कई मीडिया संस्थानों में इस बात की जानकारी के लिए फ़ोन भी आने लगे. ख़ुद लता मंगेशकर इन ख़बरों से हैरान रह गईं और उन्होंने ट्विटर पर अपने चाहने वालों के लिए लिखा नमस्कार. मेरी तबियत के बारे में अफ़वाहें फैल रही हैं. लेकिन मैं बता दूं कि आप लोगों के प्यार और दुआओं से मैं बिलकुल ठीक हूं. लता मंगेशकर के परिवार के सदस्यों ने भी बताया कि लता बिलकुल ठीक हैं और अपने परिवार के साथ बड़े आराम से हंसी-मज़ाक कर रही हैं. जैकी भागनानी आने वाली फ़िल्म यंगिस्तान में एक युवा प्रधानमंत्री का रोल निभा रहे हैं. कहा जा रहा है कि उनका रोल राहुल गांधी के किरदार से प्रभावित है. जब बीबीसी ने इस फ़िल्म के बारे में उनसे बात की तो जैकी तपाक से बोले मुझे राजनीति के बारे में सब कुछ पता है. आप मुझसे सब कुछ पूछ सकते हो. ऐसा कहने के बाद जैकी ने राजनीति के बारे में अपने ज्ञान का परिचय देते हुए कहा देखिए राहुल गांधी असल ज़िंदगी में सबसे युवा प्रधानमंत्री हैं और मैं फ़िल्म में युवा प्रधानमंत्री बना हूं. इस नाते आपको ज़रूर मेरे किरदार की राहुल गांधी से समानता लग सकती है. जैकी की नज़रों में राहुल गांधी देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री हैं. राहुल गांधी भारत के प्रधानमंत्री कब बने इसका जवाब शायद जैकी भागनानी ही बेहतर तरीक़े से दे पाएं. मैच फ़िक्सिंग के आरोप में पाकिस्तान क्रिकेट टीम से निलंबित तेज़ गेंदबाज़ मोहम्मद आसिफ़ अब बॉलीवुड के चक्कर काट रहे हैं. उन्हें फ़िल्मों के प्रस्ताव मिलने भी लगे हैं और जल्द ही वो इंडिया में लाहौर नाम की एक हिंदी रोमांटिक कॉमेडी में नज़र आएंगे. आसिफ़ कहते हैं अभिनय मेरा दूसरा करियर है जहां मुझे लोगों से वैसा ही प्यार मिलेगा जैसा क्रिकेट में मिला. मोहम्मद आसिफ़ कुछ साल पहले पाकिस्तानी अभिनेत्री वीना मलिक के बॉयफ़्रेंड भी रह चुके हैं. |
| DATE: 2014-03-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1075] TITLE: अब भी चल रही है शेक्सपियर की नौटंकी |
| CONTENT: ज़िंदगी एक रंगमंच है और हम सब उसकी कठपुतलियां. पर कई लोगों के लिए रंगमंच ही उनकी ज़िंदगी है और उनका भगवान सिर्फ़ एक ही है- विलियम शेक्सपियर. 27 मार्च को वर्ल्ड थिएटर डे है और हमने यह जानने की कोशिश की कि भला क्यों आज के दौर में भी दर्शकों को क्यों लुभा रहे हैं शेक्सपियर के नाटक. विलियम शेक्सपियर के नाटकों को भारत लाने वाले अंग्रेज़ थे. यूरोपीय व्यापारियों के मनोरंजन के लिए शेक्सपियर के नाटकों का मंचन किया जाता था. फिर धीरे-धीरे ये नाटक हिंदी और कई भाषाओँ में अनुवाद किए गए. आज शेक्सपियर के जन्म के लगभग 500 साल बाद भी शेक्सपियर की छाप भारतीय नाटककारों पर साफ़ देखी जा सकती है. हाल में एनएसडी नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के सालाना नाटक समारोह में शेक्सपियर के जूलियस सीज़र का असमिया संस्करण और ऑथेलो के मलयाली अनुवाद यामादुथु का मंचन किया गया. पर आख़िर ऐसा क्या ख़ास है इन नाटकों में जो भारतीय नाटककारों को इतना लुभाते हैं शेक्सपियर के नाटकों की दो ख़ास बातें हैं. पहली यह कि उनके सारे नाटक पूरे विश्व में मशहूर हैं. इन सभी नाटकों में एक ऐसा भाव तो होता ही है जिससे हर इंसान राब्ता रखता है. शेक्सपियर के नाटकों की कहानी और उनका विषय समय और क्षेत्र तक सीमित नहीं है. साल 2012 में मुम्बई के प्रसिद्ध नाटककार सुनील शॉनबाघ ने शेक्सपियर के नाटक ऑल इज़ वेल देट एंड्स वेल को गुजराती में प्रस्तुत किया. इस नाटक मारो पियो गयो रंगूनसौ सारु जेनु छेवट सारु का मंचन मई 2012 लंदन के वर्ल्ड शेक्सपियर फेस्टिवल में किया गया. इस साल मई में एक बार फिर यह नाटक ग्लोब थिएटर में दिखाया जाएगा. नायिका मानसी पारेख गोहिल जो इस नाटक में हेली शेक्सपियर की हेलेना का किरदार निभाती हैं वह कहती हैं शेक्सपियर के इस गुजराती अनुवाद में मुख्य भूमिका निभाना मेरे लिए बड़ी गर्व की बात है. उन्होंने कहा ये नाटक संगीतमय होने के साथ-साथ काफी मज़ाकिया भी है. लंदन के ग्लोब थिएटर में जाकर इस नाटक का मंचन करना बहुत बड़ी बात है. सौ सारु जेनु छेवट सारु गुजराती भाषा में आनेवाले शेक्सपियर नाटकों के लिए नए मापदंड तय करता है. शेक्सपियर के नाटकों की दूसरी ख़ास बात है उनके पात्र. शेक्सपियर के नाटकों को ज़िंदा रखने का श्रेय उनके संजीदा और दिलचस्प पात्रों को जाता है. इन सभी किरदारों में एक ऐसी बुराई या अच्छाई है जो हमें आज भी अपने आस पास के लोगों में नज़र आ जाती हैं फिर चाहे वो मैकबेथ का महत्वकांक्षी स्वभाव हो या फिर ऑथेलो का ईर्ष्या भरा बरताव. थिएटर और फ़िल्म अभिनेता नमित दास जो निर्देशक अतुल कुमार के हैमलट द क्लाउन प्रिंस में पोलोनियस बने थे अपने अनुभव को कुछ इस तरह से बयान करते हैं कई बार ऐसा होता है कि हम अपने अंदर छुपे एक भाव को अच्छे तरीक़े से पहचानते है समझते हैं लेकिन फिर भी हम उसके बारे में कुछ कह नहीं सकते क्योंकि वह भाव या वह चीज़ समय के साथ लोगों के साथ बदलते रहते हैं. हम बस उस भाव को महसूस कर सकते हैं और किसी को इसके बारे में नहीं बता सकते और यही शेक्सपियर के पात्रों में नज़र आता है जो उन्हें काफ़ी दिलचस्प बना देता है. वह कहते हैं वो पात्र जो भी कहते हैं वो सिर्फ़ ऊपरी तौर पर कहते हैं पर उनके मन में कुछ और ही चल रहा होता है. अपनी इसी भावना को पहचान कर मैंने पोलोनियस का किरदार निभाया और बाक़ी काम शेक्सपियर की कहानी ने कर दिया जिसने हमारे किरदारों को एक दिशा दी. शायद इसी वजह से शेक्सपियर के नाटक दुनियाभर में पसंद किए जाते हैं और लोग उन्हें देखना आज भी पसंद करते हैं. शेक्सपियर ने अपनी कहानियों में इंसानी बातचीत और मनोभाव का तालमेल बहुत ही सटीक ढंग से लिखा है जो एक इंसान के अंतर्मन की व्यथा को बड़ी सरलता से लोगों के सामने ला देता है. यही वह चीज़ है जो हर रंगमंच का प्रेमी अनुभव करता है जब वह शेक्सपियर का कोई नाटक देखता है. |
| DATE: 2014-03-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1076] TITLE: 'विलेन होकर भी दिलीप कुमार के भक्त लग रहे हो' |
| CONTENT: अभिनेता अनुपम खेर हालिया रिलीज़ फ़िल्म गैंग ऑफ़ घोस्ट्स समेत 480 फ़िल्में कर चुके हैं. बॉलीवुड के इस बेहद अनुभवी और विविधतापूर्ण कलाकार ने अपने करियर की शुरुआत में ही दिलीप कुमार जैसे कद्दावर अभिनेता के सामने खलनायक का रोल निभाया था. फ़िल्म थी सुभाष घई की कर्मा. उसमें काम करने के अनुभव को अनुपम खेर ने बीबीसी के साथ बांटा देखिए जी जब मैं शूटिंग के लिए सेट पर पहुंचा तो दिलीप कुमार को देखता ही रह गया. उनके चलने का स्टाइल उनके बोलने का तरीक़ा बैठने का ढंग सब देखता रहा. उन्होंने कहा तब निर्देशक सुभाष घई मुझे कोने में ले जाकर बोले- ओए तुम फ़िल्म के खलनायक हो लेकिन यहां तो बिल्कुल दिलीप साहब के भक्त लग रहे हो. तब मैंने उनसे कहा कैमरे चालू होने दीजिए. विलेन लगने लगूंगा. अनुपम खेर मानते हैं कि दिलीप कुमार हर भारतीय कलाकार के लिए प्रेरणा हैं और उन जैसा बेमिसाल अभिनेता कोई नहीं. अनुपम अमिताभ बच्चन और बलराज साहनी जैसे कलाकारों के भी प्रशंसक हैं. अनुपम खेर ने जहां सारांश जैसी बेहद गंभीर और संवेदनशील फ़िल्म से अपना करियर शुरू किया तो वहीं बाद में कई फ़िल्मों में हास्य भूमिकाएं भी अदा कीं. उनकी कई फ़िल्मों को तो बेहद लाउड क़रार दिया गया और समीक्षकों ने उनके काम को फ़ूहड़ और ओवरएक्टिंग तक बताया. इसके जवाब में अनुपम खेर कहते हैं बुरा काम अच्छे काम के साथ ही चलता है. और मैं समीक्षकों के लिए नहीं बल्कि जनता के लिए काम करता हूं. वैसे मैं ख़ुद भी मानता हूं कि मेरी 480 में से 400 फ़िल्मों में मैंने भद्दी और ओवरएक्टिंग की है. अनुपम खेर अपनी कामयाबी का पूरा श्रेय कड़ी मेहनत और ईमानदारी को देते हैं. उनके मुताबिक़ उनके दादाजी ने उन्हें ये सबक़ दिया था जिस पर वो आज भी कायम हैं. अनुपम खेर बताते हैं कि महेश भट्ट ने उनसे वादा किया था कि वो उन्हें फ़िल्मों में चांस ज़रूर देंगे. लेकिन 80 के दशक में जब सारांश बनने वाली थी तो उन्हें शूटिंग से दस दिन पहले बताया गया कि वो नहीं बल्कि संजीव कुमार फ़िल्म में मुख्य भूमिका अदा करने वाले हैं. अनुपम बताते हैं मुझे यह सुनकर बहुत बुरा लगा. मुझे लगा मुंबई मेरे लिए नहीं है. मैंने महेश भट्ट से बात की और ग़ुस्से में अपनी झुंझलाहट उनके सामने रखी. उन्हें बहुत बुरा-भला कहा और रोने लगा. तब महेश भट्ट को लगा कि फ़िल्म का मुख्य रोल अगर कोई कर सकता है तो वो मैं ही हूं. इस तरह से फ़िल्म मुझे मिल गई. उन्होंने कहा 27 साल की उम्र में 65 साल के शख़्स का किरदार निभाने के बाद भी बाद की फ़िल्मों में मैं टाइपकास्ट नहीं हुआ. 30 साल लंबे करियर के बाद अब आगे क्या प्लान है. इसके जवाब में अनुपम खेर बोले अभी तो यह शुरुआत है दोस्त. आगे-आगे देखो होता है क्या. |
| DATE: 2014-03-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1077] TITLE: मनोज कुमार नहीं चुका पाए नंदा का वो उधार |
| CONTENT: फ़िल्म अभिनेत्री नंदा के निधन के बाद मनोज कुमार की पहली प्रतिक्रिया थी अच्छा होता अगर ना पता लगता. 60 और 70 के दशक की मशहूर अभिनेत्री नंदा का मंगलवार सुबह अपने मुंबई स्थित घर पर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. वो 75 साल की थीं. मनोज कुमार नंदा को याद करते हुए कहते हैं मैंने उनके साथ पहली फ़िल्म बेदाग़ की थी. वो मुझसे काफ़ी सीनियर थीं पर उन्होंने मुझे इस बात का एहसास भी नहीं होने दिया. कहते हैं कि औरत में एक हिस्सा ममता का भी होता है और नंदा जी में इसकी झलक साफ़ दिखती थी. वो आगे कहते हैं दूसरी फ़िल्म जो मैंने उनके साथ की वो थी गुमनाम जिसका थोड़ा बहुत हिस्सा मैंने लिखा था और निर्माताओं के कहने पर मैं उस फ़िल्म का निर्देशक भी बना और इस नाते मुझे नंदा जी जैसी बड़ी कलाकार को निर्देश भी देने थे. पर उन्होंने इतनी विनम्रता से मेरे साथ काम किया कि मैं उस दिन के बाद से उनका कायल हो गया. मनोज कुमार और नंदा की बेहद चर्चित फ़िल्म थी शोर. मनोज कुमार ने बताया कि इस फ़िल्म के लिए पहले वो शर्मिला टैगोर को लेने वाले थे लेकिन बात नहीं बन पाई. मनोज कुमार ने कहा फिर मैंने स्मिता पाटिल के पास इस किरदार को करने के लिए प्रस्ताव भेजा पर उन्होंने मना कर दिया. तब मेरी पत्नी शशि ने कहा कि आप नंदा को क्यों नहीं लेते मैंने कहा कि अच्छा नहीं लगता वो इतनी बड़ी स्टार हैं और जिस काम को औरों ने मना किया हो वो उसे क्यों करेंगी. वे बताते हैं फिर मैंने अपनी पत्नी के कहने पर उन्हें फ़ोन किया और नंदा जी ने मुझे अपने घर बुलाया और कहा कि मैं एक शर्त पर आपकी ये फ़िल्म करूँगी और वो शर्त ये है कि मैं इस फ़िल्म के लिए आपसे एक रुपया नहीं लूंगी. मनोज कुमार ने ये कहते हुए अपनी बात ख़त्म की. वो कहते हैं किसी के एहसान का बदला आप नहीं चुका सकते लेकिन फिर भी मैंने हर कोशिश की थी कि नंदा जी का एहसान उतार सकूं. लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाय |
| DATE: 2014-03-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1078] TITLE: फ़िल्म अभिनेत्री नंदा का निधन |
| CONTENT: 60 और 70 के दशक की मशहूर अभिनेत्री नंदा का मुंबई स्थित उनके घर पर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. वो 75 साल की थीं. उनकी नज़दीकी दोस्त वहीदा रहमान और आशा पारेख को जब बीबीसी ने फ़ोन किया तो उनके घर वालों ने इस ख़बर की पुष्टि की और बताया कि वहीदा और आशा नंदा के घर पहुंच चुकी हैं. वहीदा रहमान आशा पारेख नंदा और साधना जैसी अभिनेत्रियां गहरी मित्र थीं और शनिवार को वहीदा रहमान के घर पर हुई एक छोटी पार्टी में नंदा भी मौजूद थीं. वहीदा के घर वालों ने हमें बताया कि उस दौरान नंदा बिलकुल ठीक थीं. नंदा ने मंदिर और जग्गू जैसी फ़िल्मों में बतौर बाल कलाकार अपने करियर की शुरुआत की. उनके चाचा मशहूर फ़िल्मकार वी शांताराम थे. उन्होंने नंदा को साल 1956 में फ़िल्म तूफ़ान और दीया में हीरोइन के तौर पर मौक़ा दिया. नंदा ने 60 70 और 80 के दशक में देव आनंद शशि कपूर शम्मी कपूर समेत कई बड़े कलाकारों के साथ कई यादगार फ़िल्में दीं. उन्होंने देव आनंद के साथ काला बाज़ार हम दोनों तीन देवियां शशि कपूर के साथ नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे जब-जब फूल खिले राजेश खन्ना के साथ द ट्रेन समेत कई यादगार फ़िल्मों में काम किया. 80 के दशक में उन्होंने प्रेम रोग और मज़दूर जैसी कामयाब फ़िल्मों में चरित्र रोल निभाए. |
| DATE: 2014-03-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1079] TITLE: हरमन के अंतरंग दृश्यों से नाराज़ बिपाशा |
| CONTENT: बॉलीवुड में सितारे अक्सर अपने रोमांस की बातें छुपाते हैं लेकिन हरमन बावेजा और बिपाशा बासु खुलकर अपनी नज़दीकियों की बातें करते हैं. दोनों ने एक दूसरे के प्रति अपनी पसंद का इज़हार ट्विटर पर कर ही दिया है. अब ताज़ा ख़बर यह है कि बिपाशा को हरमन के दूसरी अभिनेत्रियों के साथ अंतरंग दृश्यों पर सख़्त ऐतराज़ है. दरअसल हाल ही में हरमन की आने वाली फ़िल्म ढिशक्यों की प्राइवेट स्क्रीनिंग रखी गई. इस फ़िल्म में हरमन के साथ नवोदित आएशा खन्ना हैं. फ़िल्म में हरमन के उनके साथ अंतरंग दृश्यों से बिपाशा का मूड उखड़ गया और उन्होंने इन दृश्यों को एडिट करने की मांग की. हालांकि बिपाशा की मांग मानी गई है या नहीं अभी ये पता नहीं चला है. ढिशक्यों में सनी देओल की भी अहम भूमिका है. इसकी निर्माता शिल्पा शेट्टी हैं. 22 मार्च को एक साथ चार फ़िल्में रिलीज़ हुईं लेकिन सनी लियोनी की रागिनी एमएमएस-2 ने बाक़ी तीन फ़िल्मों को कमाई के मामले में बहुत पीछे छोड़ दिया. रागिनी एमएमएस-2 ने पहले तीन दिनों में 24 करोड़ रुपए की कमाई कर ली जो इसके बजट के हिसाब से काफ़ी बेहतर आंकड़ा है. सतीश कौशिक निर्देशित गैंग ऑफ़ घोस्ट्स दर्शकों को न तो हंसा पाई और न डरा पाई. रजत कपूर की फ़िल्म आंखो देखी को भी बेहद धीमी शुरुआत मिली. हालांकि समीक्षकों ने फ़िल्म को काफ़ी सराहा और इसे लंबी रेस का घोड़ा करार दिया. नागेश कुकुनूर की लक्ष्मी भी कोई कमाल नहीं कर पाई. सिनेमाघर मालिकों के मुताबिक़ सनी लियोनी की वजह से रागिनी एमएमएस-2 देखने दर्शक बड़ी संख्या में आए. रविवार को कंगना रानाउत 27 साल की हो गईं और इस मौक़े पर उन्होंने एक पार्टी का आयोजन किया. कंगना की पार्टी में शरीक होने अमिताभ बच्चन और जया बच्चन के अलावा आमिर ख़ान विशाल भारद्वाज राकेश रोशन उनकी पत्नी पिंकी रोशन और अनुराग कश्यप जैसी हस्तियां आईं. इस महीने रिलीज़ हुई उनकी फ़िल्म क्वीन ने दर्शकों और समीक्षकों दोनों की ही तारीफ़ बटोरी. अमिताभ बच्चन ने भी फ़िल्म में कंगना के अभिनय की तारीफ़ की थी जिसे कंगना ने अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि भी बताया था. |
| DATE: 2014-03-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1080] TITLE: कपिल–सुनील मक्खी, राजू श्रीवास्तव गुड़ ! |
| CONTENT: वो मेरे पास आए कहने लगे शो तो आपको करना ही पड़ेगा मैं काफ़ी बिज़ी था तो मैंने अपने शेड्यूल के हिसाब से उनको समय दे दिया. वैसे भी अभी चुनावों के चलते मैं काफ़ी बिज़ी हूं ये कहना था राजू श्रीवास्तव का जब बीबीसी से एक ख़ास मुलाक़ात के दौरान जब हमने ये सवाल उन पर दागा कि आप इन दिनों कॉमेडी नाइट्स विद कपिल में सेकेंड लीड के तौर पर क्यों आ रहे हैं राजू श्रीवास्तव 1988 से स्टैंड अप कॉमेडी करते आ रहे हैं. उन्होंने 80 और 90 के दशक में तेज़ाब बाज़ीगर और मैंने प्यार किया जैसी फ़िल्मों में छोटी-मोटी भूमिकाएं कीं. 2005 में ग्रेट इंडियन लाफ़्टर चैलेंज में वो छठे स्थान पर रहे लेकिन फिर ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज चैंपियंस में उन्होने किंग ऑफ़ कॉमेडी का ख़िताब जीता. इसके बाद राजू श्रीवास्तव को घर-घर में जाना जाने लगा और वो हिंदी स्टैंड अप कॉमेडी का पर्याय बन गए. लेकिन फिर ऐसा क्या हो गया कि उन्हें सेकेंड लीड आर्टिस्ट के तौर पर छोटे पर्दे पर वापसी करनी पड़ी. वो भी कपिल शर्मा के शो पर जो उनसे अच्छे ख़ासे जूनियर हैं. राजू तपाक से जवाब देते हैं अब वह पहले वाली बात नहीं है कि आप सीनियर हो या जूनियर. अब गुरु-चेला नहीं दोस्त बनने का वक़्त है. ये सवाल तो आप पूछ रहे हैं लेकिन दर्शकों को इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन सीनियर है और कौन जूनियर. हमारा काम हंसाना है सो हम कर रहे हैं. लेकिन इस वापसी में एक पेंच और है. राजू अब कपिल शर्मा के शो पर नज़र आ रहे हैं और कहा जा रहा है कि यह उनके प्रतियोगी सुनील ग्रोवर को करारा जवाब है जो एक दूसरे चैनल पर अपना शो मैड इन इंडिया लेकर आ रहे हैं. एक कहावत है कि दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोई. राजू श्रीवास्तव ने कपिल के शो से छोटे पर्दे पर वापसी कर जाने-अनजाने सुनील ग्रोवर और कपिल शर्मा के बीच की जंग में खुद को जोड़ लिया है. ऐसे में राजू श्रीवास्तव यह बताना नहीं भूले कि उन्होने टेलीविज़न पर वापसी के लिए कपिल के शो का ही चुनाव क्यों कियाकपिल और सुनील मेरे छोटे भाई जैसे हैं. जब ये पहली बार मुंबई आए थे तो मुझसे आकर मिले थे बहुत प्यार करते हैं मुझसे. मैं इनके पास नहीं गया बल्कि इन दोनों ने बहुत पहले मुझे अपने शो में आने के लिए कहा था. मैंने दोनों को ही हां की थी. पर कपिल के शो पर पहले आने के कारण अब तक़नीकी कारणों से सुनील को वक़्त नहीं दे पा रहा हूं ये तक़नीकी कारण क्या हैं इस पर राजू ने मुस्कुराते हुए बस इतना भर कहा आप चैनलों की लड़ाई तो जानते ही हैं इसमें हम क्या कर सकते हैं. वैसे तो राजू ने अपने सेकेंड इन लीड भूमिका में आने के पीछे कई तर्क दिए जैसे चुनाव में भारी व्यस्तता कपिल का आग्रह बदलता समय लेकिन कुछ पलों बाद ही उन्होंने कहा. मुझे अभी तक ऐसा नहीं लग रहा है कि मैं सेकेंड इन लीड हूं. मुझसे आग्रह करके मुझे बुलाया गया है और अगर मुझे कभी भी ऐसा महसूस हुआ तो हो सकता है आप मुझे मेरे एक नए शो के साथ देखेंगे. कुछ चैनलों से मेरे पास ऑफ़र भी हैं. |
| DATE: 2014-03-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1081] TITLE: नरगिस फ़ख़री ने दिखाया अक्षय को ठेंगा |
| CONTENT: बॉलीवुड में सिर्फ़ दो फ़िल्म पुरानी नरगिस फ़ख़री ने अक्षय कुमार की आने वाली फ़िल्म शौकीन से ख़ुद को अलग कर लिया है. दरअसल नरगिस एक हॉलीवुड फ़िल्म में काम करने वाली हैं और इस वजह से उनके पास अक्षय के साथ काम करने के लिए डेट्स नहीं हैं. साल 2011 में रॉकस्टार से अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत करने वाली नरगिस जल्द ही वरुण धवन के साथ फ़िल्म मैं तेरा हीरो में दिखेंगीं. सूत्रों के मुताबिक़ नरगिस के इस फ़ैसले से अक्षय कुमार बेहद नाराज़ हैं. अब नरगिस जो रोल करने वाली थीं उसके लिए श्रद्धा कपूर से बात चल रही है. शौकीन 1982 में रिलीज़ हुई बासु चटर्जी की सुपरहिट फ़िल्म शौकीन का रीमेक है. ओरिजिनल फ़िल्म में अशोक कुमार उत्पल दत्त और एके हंगल के साथ मिथुन चक्रवर्ती और रति अग्निहोत्री ने अहम भूमिकाएं निभाई थीं. लगान और जोधा अकबर जैसी ऐतिहासिक फ़िल्में बनाने के बाद अब निर्देशक आशुतोष गोवारीकर पुरानी सभ्यता मोहन-जोदड़ो पर फ़िल्म बनाने की योजना बना रहे हैं लेकिन उन्हें इसके लिए अब तक कोई हीरोइन नहीं मिल पाई है. उनकी पहली पसंद दीपिका पादुकोण थीं लेकिन उन्होंने फ़िल्म का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया. इसके बाद आशुतोष कटरीना कैफ़ के पास गए पर उन्होंने भी फ़िल्म में काम करने से इनकार कर दिया. आलिया भट्ट ने ट्विटर पर अपने सभी प्रसंशकों को आगाह किया है कि उनके नाम पर बने सारे फ़ेसबुक पेज नकली हैं और उनमें दिए गए स्टेटस अपडेट्स पर वो कतई भरोसा न करें. दरअसल आलिया के एक ऐसे ही फ़ेसबुक पेज पर लिखा था कि वो इस पेज को मैनेज करने वाले प्रोडक्शन को धन्यवाद देती हैं जिसके बाद उनकी बड़ी बहन पूजा भट्ट ने इस बारे में उन्हें आगाह किया. तब आलिया ने इस बारे में अपने प्रशंसकों को बताया कि उनका अपना कोई फ़ेसबुक पेज नहीं है. |
| DATE: 2014-03-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1082] TITLE: मैं माँ बनना चाहती हूं: सनी लियोनी |
| CONTENT: जिस्म 2 और जैकपॉट जैसी फ़िल्मों में अभिनय के बाद अपनी बोल्ड और सेक्सी अदा से एक बार फिर दर्शकों को लुभा रही हैं बेबी डॉल सनी लियोनी अपनी नई फ़िल्म रागिनी एमएमएस 2 से. इस फ़िल्म में उन्होंने रागिनी का किरदार निभाया है और इसकी निर्माता हैं एकता कपूर. इसी सिलसिले में बीबीसी से ख़ास बातचीत में सनी लियोनी ने अपने फ़िल्मी सफ़र और अपनी कुछ ख़्वाहिशों का ज़िक्र किया. पेश है उनसे बातचीत के चुनिंदा अंश. बॉलीवुड में शायद ही कोई ऐसा होगा जो अभिनेता शाहरुख़ ख़ान के साथ काम नहीं करना चाहता हां सलमान ख़ान शायद इस बारे में दो बार सोचें. पर फ़िल्म जैकपॉट के प्रीमियर पर किंग ख़ान शाहरुख़ ख़ान ने सनी लियोनी के काम को बहुत सराहा और उनकी काफ़ी तारीफ़ की. अगर मौक़ा मिले तो क्या सनी उनके साथ काम करना चाहेंगीउत्साहित सनी लियोनी बोलीं अगर शाहरुख़ के साथ काम करने का मौका मिला तो मैं उनके साथ ज़रूर काम करना चाहूंगी. शाहरुख़ ख़ान जैसे दिग्गज अभिनेता के साथ काम करना हर अभिनेत्री का सपना है. वो एक अभिनेता होने के साथ-साथ काफ़ी अच्छे और प्यारे इंसान भी हैं. वो कहती हैं मैं अभी तो कुछ नहीं कह सकती कि मैं उनके साथ फ़िल्म में कब दिखूंगी पर जब भी उनके साथ काम करने का मौक़ा मिलेगा मैं ज़रूर करूंगी. सनी लियोनी आजकल बॉलीवुड में अपना करियर बनाने में लगी हैं जिनमें उनके पति डेनियल वेबर उनकी काफ़ी मदद कर रहे हैं. फ़िलहाल इस जोड़े की कोई संतान नहीं है. सनी लियोनी इस बारे में कहती हैं हां मैं माँ बनना चाहती हूं पर वो कब होगा यह मुझे नहीं पता. मैं अभी अपने करियर पर ज़्यादा ध्यान दे रहीं हूं और मुझे दोस्तों से भी मिलने की फ़ुरसत नहीं है. उन्होंने आगे कहा भविष्य में क्या होगा यह तो मैं नहीं कह सकती लेकिन हां अगर मेरी ज़िंदगी में एक बच्चा आ जाए तो मुझे अच्छा लगेगा. बॉलीवुड में एक धारणा है कि शादीशुदा अभिनेत्रियों के करियर ज़्यादा नहीं चल पाते. उन्हें उतनी फ़िल्में नहीं मिल पातीं जितनी उन्हें शादी से पहले मिला करती थीं. इस पर सनी लियोनी बोलीं देखिए मैंने तो हर काम उल्टा ही शुरू किया है क्योंकि बॉलीवुड में आने से पहले मेरी शादी हो चुकी थी. मैं एक कलाकार हूं और मुझे नहीं लगता कि किसी की उम्र या उसका शादीशुदा होना उसके करियर में रुकावट बन सकता है. वो कहती हैं देखिए कई लोगों के परिवार शादी के बाद उन्हें काम करने की इजाज़त नहीं देते पर इस मामले में मैं बहुत लकी हूं क्योंकि मेरा परिवार और मेरे पति दोनों ही मुझे काफ़ी सपोर्ट करते हैं. तो मुझे नहीं लगता कि शादीशुदा होने से कुछ ज़्यादा फ़र्क पड़ता है. |
| DATE: 2014-03-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1083] TITLE: मैं अपनी बॉडी को लेकर काफ़ी कॉन्शियस हूं: इलियाना डी क्रूज़ |
| CONTENT: 2012 में फ़िल्म बर्फी से हिंदी सिनेमा में अपने करियर की शुरुआत करने वाली इलियाना डी क्रूज़ अपनी तीसरी रिलीज़ के लिए तैयार हैं. वरुण धवन और नरगिस फ़ख़री के साथ उनकी फिल्म मैं तेरा हीरो चार अप्रैल को रिलीज़ हो रही है. हालांकि वो बॉलीवुड में अभिनय के लिए कम और अपनी ख़ूबसूरती के लिए ज़्यादा जानी जाती हैं. लेकिन अपनी ग्लैमरस छवि होने के बावजूद इलियाना ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि फ़िल्मों में वो बिकनी पहनने के लिए क़तई तैयार नहीं हैं. वो कहती हैं मैं अपनी बॉडी को लेकर काफ़ी कॉन्शियस हूं. जब लोग मेरी तारीफ़ करते हैं तो मैं शर्मा जाती हूं. फ़िल्म मैं तेरा हीरो में मैंने शॉर्ट्स पहने हैं क्योंकि मैं बिकनी पहनने में बिलकुल भी सहज नहीं थी. मुझे नहीं लगता कि बिकनी पहनने के लिए मैं फ़िट हूं. मैं तेरा हीरो के हीरो वरुण धवन के साथ उनकी अच्छी दोस्ती हो गई है ऐसा इलियाना मानती हैं. वो कहती हैं मैं और वरुण हम उम्र हैं. उनके साथ काम करने में मैं बड़ी सहज रही. हम काफी अच्छे दोस्त बन गए हैं. मैंने इससे पहले रणबीर कपूर और शाहिद कपूर के साथ भी काम किया है लेकिन सेट पर उनसे ज़्यादा बात नहीं होती थी. और वरुण के साथ तो बड़ा हंसी मज़ाक चलता रहता है. इलियाना फ़िल्म मैं तेरा हीरो के निर्देशक डेविड धवन के रवैये की कायल हैं. वो कहती हैं डेविड जी एक दोस्त की तरह हैं. वो काफी मज़ाक करते हैं. शूटिंग के दौरान उन्हें मेरे बारे में जानने का मौका मिला. मैं उनसे कोई भी बात कह देती थी. लोग समझते थे कि मैं काफी शर्मिली हूं लेकिन डेविड जी के साथ मैं बड़ी खुल गई थी. इसके बाद इलियाना सैफ़ अली ख़ान और गोविंदा के साथ फ़िल्मों में नज़र आएंगी. |
| DATE: 2014-03-23 |
| LABEL: entertainment |
| [1084] TITLE: 'साथिया' ने मारी बाज़ी |
| CONTENT: भारतीय टेलीविज़न पर शाम सात बजे का समय बड़ा चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि अमूमन इस वक़्त लोग टीवी से दूर ही रहना पसंद करते हैं. लेकिन साथिया ने इस चुनौती को क़ामयाबी से पार करते हुए दिया और बाती हम और जोधा-अकबर जैसे लोकप्रिय कार्यक्रमों को पीछे छोड़ते हुए इस सप्ताह पहले नंबर की कुर्सी पर क़ब्ज़ा जमाया. गोपी को अब तक अहम की मां कोकिलाबेन और दूसरे सदस्यों ने पूरी तरह से नहीं अपनाया है और गोपी पूरी कोशिश में है कि उसे फिर से मोदी परिवार अपना हिस्सा बना ले. इस सप्ताह साथिया ने अपने एक हज़ार एपिसोड्स भी पूरे कर लिए. दिया और बाती हम इस सप्ताह दूसरे नंबर पर रहा. राठी परिवार में बेटी की शादी है और पूरे परिवार में जश्न का माहौल है. संध्या भी अपनी आईपीएस ट्रेनिंग से छुट्टी लेकर शादी में शरीक होने आई है. जोधा-अकबर इस हफ़्ते तीसरे स्थान पर रहा. डांस इंडिया डांस-लिटिल मास्टर चौथे नंबर पर रहा. इस सप्ताह से ग्रैंड-मास्टर मिथुन चक्रवर्ती को भी एक नए अंदाज़ में दर्शक शो में देख पाएंगे. इस सप्ताह ये रिश्ता क्या कहलाता है और कॉमेडी नाइट्स विद कपिल के बीच टाई रहा और दोनों शो संयुक्त रूप से पांचवें नंबर पर थे. इस सप्ताह से चैनलों की जंग और रोमांचक होने वाली है. कलर्स पर शुरू होने वाला है ख़तरों के खिलाड़ी जिसमें रोहित शेट्टी दया शेट्टी निकेतन धीर कुशाल टंडन गौहर ख़ान वगैरह को अपने इशारों पर नचाएंगे और हैरतअंगेज़ स्टंट कराएंगे. |
| DATE: 2014-03-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1085] TITLE: फ़िल्म रिव्यू: 'आंखों देखी' |
| CONTENT: मिथ्या टॉकीज़ की आंखों देखी दिल्ली के एक मध्यम वर्गीय परिवार की कहानी है. राजा उर्फ़ बाऊजी संजय मिश्रा और ऋषि रजत कपूर दोनों भाई हैं और दिल्ली में एक छोटे से घर में रहते हैं. बाऊजी की पत्नी हैं पुष्पासीमा पाहवा उनकी बेटी रीटा माया साराओ और एक बेटा शम्मीचंद्रचूड़ राय. ऋषि की पत्नी हैं लता तरनजीत कौर और एक बेटा अशोक चैतन्य महावर. रीटा एक लड़के अज्जू नमित दास से प्यार करती है पर रीटा का परिवार इसके बिलकुल ख़िलाफ़ हैं क्योंकि लोग अज्जू के बारे में अच्छी राय नहीं रखते हैं. परिवार के बड़े रीटा को अज्जू से मिलने के लिए मना करते हैं और उससे दूर रहने के लिए कहते हैं पर रीटा के पिता बाऊजी सबको कहते हैं कि वो अज्जू के बारे में कही गई बातों पर यक़ीन न करें और आँखों देखी चीज़ों पर ही विश्वास करें. धीरे धीरे वो भी सिर्फ़ आंखों देखी चीज़ पर विश्वास करना शुरू कर देते हैं. उनके इस सोच से क्या क्या हलचल मचती है यही फ़िल्म की कहानी है. रजत कपूर की कहानी थोड़ी सी भटक जाती है क्योंकि वो अलग-अलग समय पर अलग अलग दिशाओं में चली जाती है. बाऊजी की आंखों देखी वाली सोच बीच में सांकेतिक भाषा में बदल जाती है. वो जुआ खेलना क्यों शुरू कर देते हैं और वो उसके लिए इतनी जल्दी मान कैसे जाते हैं ये थोड़ा अटपटा सा लगता है. पटकथा को रजत कपूर ने बहुत ही वास्तविक रखा है. फ़िल्म में कई हास्य के पल भी हैं और कहानी दिल को छू जाती है. पटकथा से ये साफ़ हो जाता है कि निर्देशक रजत कपूर ने मध्यम वर्गीय परिवार की बारीकियों पर बहुत अच्छे से समझा है क्योंकि उन्होंने एक मध्यम वर्गीय परिवार के रहन सहन उनकी डर और उनकी भावनाओं को बहुत अच्छे तरीक़े से दिखाया है. संवाद जो ख़ुद रजत कपूर ने लिखे हैं बेहद कमाल के हैं और फ़िल्म की कहानी और मूड के साथ बिलकुल फ़िट बैठते हैं. फ़िल्म में सभी कलाकारों ने अपने बेहतरीन प्रदर्शन किया है. संजय मिश्रा ने बाऊजी के किरदार में बहुत ही कमाल के लग रहे हैं. रजत कपूर ने अपने सादे अभिनय से ऋषि के किरदार को पूरी तरह जीवंत कर दिया है. कुल मिलकर हर एक कलाकार ने अपने स्वाभाविक अभिनय द्वारा एक मध्यम वर्गीय परिवार को अच्छी तरह दिखाया है. रजत कपूर ने निर्देशन में भी काफ़ी अच्छा काम किया है पर क्योंकि फ़िल्म की कहानी एक ही विचारधारा वाली है इसीलिए हो सकता है कि ये फ़िल्म समाज के किसी एक ही तबक़े को ज़्यादा लुभाए. कुल मिलाकर आंखों देखी को बहुत ही अच्छी तरह से बनाया गया है पर ये अपनी विचारधारा के चलते ज़्यादा दर्शक नहीं जुटा पायेगी. |
| DATE: 2014-03-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1086] TITLE: दर्शकों को कितनी पसंद आएगी 'रागिनी-एमएमएस-2'? |
| CONTENT: बालाजी मोशन पिक्चर्स और ऑल्ट एंटरटेनमेंट की रागिनी एमएमएस-2 एक हॉरर-सेक्स फ़िल्म है. ये साल 2011 में आई रागिनी एमएमएस का सीक्वल है. रॉक्स प्रवीण डबास रागिनी एमएमएस स्कैंडल पर फ़िल्म बनाना चाहता है. स्कैंडल कुछ ये था कि उदय और रागिनी एक सुनसान जगह पर स्थित महल में मौज मस्ती करने और एकांत में समय बिताने जाते हैं. इस महल में भूतों का साया होता है और वो उदय को मार डालते हैं लेकिनी रागिनी किसी तरह से बच निकलती है. रागिनी की मां की चेतावनी के बावजूद रॉक्स फ़िल्म की शूटिंग उसी महल में करने का फ़ैसला करता है जहां पर उदय और रागिनी के साथ ये हादसा होता है जिसमें उदय की जान चली जाती है. वो रागिनी का किरदार निभाने के लिए सनी सनी लियोनी को चुनता है. शूटिंग के दौरान एक दफ़ा रॉक्स सनी के साथ रात बिताने के लिए उसके कमरे में जाता है. उसे पता नहीं होता कि सनी के शरीर पर एक भूत का कब्ज़ा हो चुका है और वो रॉक्स को मार डालता है. उसके बाद क्या होता है. क्या सनी भूत के कब्ज़े से आज़ाद हो पाती है महल में मौजूद बाक़ी लोगों का क्या होता है रागिनी पर क्या बीतती है यही फ़िल्म की कहानी है. सुहानी कंवर और तनवीर बुकवाला ने अपने स्क्रीनप्ले में बड़ी चतुराई से फ़िल्म में हॉरर सेक्स और कॉमेडी का मिश्रण परोसा है. जिसकी वजह से दर्शक फ़िल्म से बंधे रहते हैं. सनी लियोनी के फ़िल्म में कई अंतरंग दृश्य हैं और उन्होंने खुलकर एक्सपोज़ किया है. इंटरवल से पहले के हिस्से में कुछ डरावने दृश्य हैं लेकिन इंटरवल के बाद कई ऐसे द्श्य हैं जो रोंगटे खड़े कर देते हैं. लेकिन ये भी कहना होगा कि इस हिस्से में कई जगह फ़िल्म के ड्रामे में दोहराव साफ़ नज़र आता है. फ़िल्म के रोमांटिक और अंतरंग दृश्य बहुत ही सटीक तरीक़े से फ़िल्माए गए हैं जो दर्शकों को रोमांचित कर देंगे. इशिता मित्रा के लिखे संवाद अच्छे हैं और युवा दर्शकों को बहुत पसंद आएंगे. लेकिन जिस तरह से सेंसर बोर्ड इस फ़िल्म को लेकर उदार रहा है वो बात काफ़ी हैरानी वाली है. फ़िल्म में ज़बरदस्त अंग प्रदर्शन है अंतरंग दृश्य हैं और एक ख़ास आपत्तिजनक शब्द कई बार बोला गया है. सनी लियोनी फ़िल्म में बहुत ग्लैमरस लगी हैं और जमकर अंग प्रदर्शन किया है. अभिनय भी उन्होंने ठीक-ठाक कर लिया है. बेबी डॉल गाने में उनका डांस आम दर्शकों को बहुत लुभायेगा. वैसे भी ये गाना ख़ासा लोकप्रिय हो ही चुका है. रॉक्स के रोल में प्रवीण डबास ने अच्छा काम किया है. सत्या के रोल में साहिल प्रेम ने भी बख़ूबी काम किया है. संध्या मृदुल ने ज़बरदस्त अभिनय किया है और बेहतरीन कॉमेडी की है. बाकी कलाकार भी ठीक रहे हैं. भूषण पटेल का निर्देशन शानदार रहा है. उन्होंने फ़िल्म पर अपनी पकड़ को एक मिनट के लिए भी ढीला नहीं होने दिया है. फ़िल्म का संगीत भी इसका एक मज़बूत पक्ष है. बेबी डॉल और वोदका गाने तो ख़ासे मशहूर हो चुके हैं. फ़िल्म की एडिटिंग तुषार शिवन भी बड़ी चुस्त है. कुल मिलाकर रागिनी एमएमएस-2 के बॉक्स ऑफ़िस पर चलने के अच्छे अवसर हैं. इसमें सभी दर्शक वर्ग को लुभाने का माद्दा है. |
| DATE: 2014-03-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1087] TITLE: जब किया गया स्मिता पाटिल के शव का मेकअप |
| CONTENT: दीपक सावंत ने स्मिता पाटिल की मौत के बाद उनके शव का मेकअप किया था और उन्हें सुहागन की सरह सजाया था. बड़े पर्दे पर ख़ूबसूरत दिखने वाले सितारे और उनकी चमक-धमक ग्लैमर से प्रभावित होते दर्शक. जब से भारत में फ़िल्मों की शुरुआत हुई है तब से लेकर अब तक ये समाज का अभिन्न हिस्सा रही हैं और लोगों पर अपना प्रभाव छोड़ती रही हैं. सिनेमा के शौक़ीन रुपहले पर्दे पर अपनी ख़ूबसूरती बिखेरते कलाकारों जैसे बनने की चाह लिए रहते हैं. लेकिन आज हम आपको मिलवाएंगे कुछ ऐसे लोगों से जो इन कलाकारों को ख़ूबसूरत बनाते हैं या यूं कहें कि इनकी ख़ूबसूरती निखारते हैं. इन लोगों को आप में से बहुतों ने पहले कभी नहीं देखा होगा इनके बारे में कभी जाना नहीं होगा लेकिन ये ही हैं वो लोग जिनकी मेहनत सितारों के चेहरों को चमकाती और दमकाती है. दीपक सावंत पिछले 40 सालों से अमिताभ बच्चन के मेकअप मैन हैं. दीपक सावंत पिछले 40 सालों से अमिताभ बच्चन के मेक-अप मैन हैं. 70 के दशक से लेकर आज तक वो सक्रिय हैं और अमिताभ के अलावा दिलीप कुमार स्मिता पाटिल जैसे कलाकारों तक का मेकअप उन्होंने किया. वो मानते हैं के मेक-अप के तौर तरीक़ों और तकनीक में पहले की तुलना में काफ़ी बदलाव आ गए हैं. दीपक सावंत कहते हैं पहले मेकअप बड़ा बेसिक हुआ करता था. सिर्फ़ एक एजेंडा होता था कि कलाकार को ख़ूबसूरत दिखाना है बस. फ़िल्म में हीरो या हीरोइन अमीर है या ग़रीब इसका कोई मतलब नहीं होता था. सभी कलाकारों का मेकअप एक जैसा किया जाता था. पैसे की बात चलने पर दीपक कहते हैं अब तो ठीक-ठाक पैसे मिलने लगे हैं. पुराने ज़माने में मेकअप आर्टिस्ट के पास ज़्यादा काम नहीं था. जिनके पास काम था भी उन्हें महज़ दो सौ रुपए महीने ही मिला करते थे. फिर धीरे-धीरे दो सौ से पांच सौ हुए फिर हज़ार फिर पांच हज़ार. इस तरह से पैसा धीरे-धीरे बढ़ने लगा. अब तो हर चेहरे के हिसाब से पैसे मिलते हैं. अमिताभ के परिवार से दीपक सावंत का बेहद नज़दीकी नाता है. दीपक सावंत बताते हैं कि जब 80 के दशक में अमिताभ बच्चन राजनीति में चले गए थे उस दौरान उन्होंने स्मिता पाटिल के साथ काम किया. तब स्मिता उनसे कहतीं दीपक जी आप नहीं होते तो मैं मसाला फ़िल्मों में कभी काम ही नहीं कर पाती. दीपक सावंत ने बताया स्मिता पाटिल की ख़्वाहिश थी कि मौत के बाद उन्हें एक शादीशुदा महिला की तरह सजाया जाए. जब स्मिता पाटिल की असमय मौत हो गई तो उनके शव को तीन दिनों तक बर्फ़ में रखा गया था क्योंकि स्मिता की बहन अमरीका में रहती थीं और उन्हें आने में वक़्त लगा. दीपक कहते हैं जब स्मिता की शवयात्रा निकली तो उसके पहले मैंने उनके शव का सुहागन की तरह मेकअप किया. वो बहुत ख़ूबसूरत लग रही थीं. आज से 10-12 साल पहले जब संगीता ने ये सफ़र शुरूर किया था तब लोग उन्हें महज़ ब्यूटीशियन के नाम से संबोधित करते थे लेकिन अब लोगों का नज़रिया बदल रहा है. संगीता मानती है कि मेकअप इंडस्ट्री में काफ़ी काम है और काफ़ी पैसा भी. लेकिन उनके मुताबिक़ भारतीय मेकअप आर्टिस्ट को सबसे बड़ा ख़तरा है विदेशी मेकअप आर्टिस्ट से. वो कहती हैं आजकल नया प्रचलन शुरू हो गया है कि निर्माता विदेशी मेकअप आर्टिस्ट को आसानी से काम दे देते हैं भले ही वो औसत दर्जे का काम करते हों और उन्हें वेतन भी भारतीय मेकअप आर्टिस्ट से ज़्यादा दिया जाता है. संगीता का ये भी मानना है कि बॉलीवुड की मेकअप की दुनिया पुरुष प्रधान है और उन्होंने अपना एक गुट बना लिया है. वो कहती हैं औरतों को सिर्फ़ हेयर स्टाइलिंग का काम ज़्यादा मिलता है. शायद इसकी वजह ये भी है कि काम का कोई नियत समय नहीं रहता और ना ही यातायात की सुविधा होती है इसलिए बहुत कम महिला मेकअप आर्टिस्ट बॉलीवुड में जाती हैं. महिला आर्टिस्ट को कोई प्रोत्साहन भी नहीं मिलता और ना ही एसोसिएशन की तरफ़ से कोई मदद. विपुल भगत 27 सालों से मेकअप इंडस्ट्री में हैं. विपुल भगत एक मध्यमवर्गीय परिवार से हैं. बॉलीवुड में 27 साल से काम करने वाले विपुल ने जब शुरुआत में इस क्षेत्र में आने की ठानी तो उनके मां-बाप ने इस पर बड़ी नाराज़गी दिखाई. लेकिन आज विपुल की कामयाबी से वो दोनों ख़ुश हैं. उन्होंने कई फ़ैशन शोज़ और फ़िल्में की हैं. मलाइका अरोरा ख़ान उनकी क़रीबी दोस्त हैं. विपुल बताते हैं कि बॉलीवुड में कई अभिनेत्रियां ऐसी हैं जो बिना मेकअप किए घर से बाहर क़दम नहीं रखतीं. मेकअप की तकनीक में बदलाव के बारे में विपुल ने बताया पहले मेकअप ख़ासा मोटा हुआ करता था. अब तो कॉस्मेटिक्स की दुनिया में बड़ा बदलाव आ गया है. कई बड़ी कंपनियां मेकअप का सामान बनाने लगी हैं. बाज़ार में सब कुछ आसानी से मिल जाता है. एक विज्ञापन की शूटिंग के लिए रणबीर कपूर का मेकअप करते विक्रम गायकवाड़. विक्रम गायकवाड भी फ़िल्मों का जाना-माना नाम है. वह इस वक़्त दिबाकर बनर्जी की ब्योमकेश बक्शी करण मल्होत्रा की शुद्धि और राकेश ओमप्रकाश मेहरा की एक फ़िल्म में काम कर रहे हैं. उन्हें द डर्टी पिक्चर में बेहतरीन काम के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है. विक्रम एक मज़ेदार वाकया याद करते हैं. फ़िल्म मेकिंग ऑफ़ महात्मा की शूटिंग दक्षिण अफ़्रीका में चल रही थी तब एक ब्रिटिश कलाकार को नकली मूंछ लगानी थी. वो जगह जोहानसबर्ग से चार सौ किलोमीटर दूर थी. समय पर मेकअप वैन ना पहुंचने की वजह से घोड़े की पूंछ का इस्तेमाल कर नकली मूंछ बनाई गई. विक्रम गायकवाड़ कहते हैं कि समय के साथ-साथ मेकअप आर्टिस्ट की इज़्ज़त भी बॉलीवुड में बढ़ती जा रही है. लेकिन विक्रम महिला और पुरुष मेकअप आर्टिस्ट के बीच के भेदभाव से बहुत ख़फ़ा हैं और चाहते हैं कि महिला मेकअप आर्टिस्ट को भी बराबरी के मौक़े मिलने चाहिए. |
| DATE: 2014-03-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1088] TITLE: हमें आमिर ख़ान की ज़रूरत क्यों पड़े: रजत कपूर |
| CONTENT: फ़िल्मकार रजत कपूर ने दिल चाहता है भेजा फ़्राई पप्पू कान्ट डांस साला और फंस गए रे ओबामा जैसी फ़िल्मों में हल्के फ़ुल्के कॉमिक रोल किए हैं लेकिन उनके अंदर कुछ बातों को लेकर गहरा असंतोष है. भारत में छाए स्टार कल्चर से वो ख़फ़ा रहते हैं. वो कहते हैं ये देश स्टार्स से ही चलता है. बड़े दुर्भाग्य की बात है कि फ़िल्में हों या राजनीतिक पार्टियां सबको स्टार की ही ज़रूरत पड़ती है. बिना उनके काम ही नहीं बनता. शुक्रवार को रिलीज़ हो रही फ़िल्म आंखों देखी के निर्देशक रजत अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं पिछले साल शिप ऑफ़ थीसियस जैसी बेहतरीन फ़िल्म आई. लेकिन उसे भी प्रमोशन के लिए आमिर ख़ान की ज़रूरत पड़ी. मानता हूं कि इससे फ़िल्म को मदद मिली. लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा ये ग़लत चलन है. पूरी फ़िल्म तो आपने बिना स्टार के बना ली लेकिन प्रमोशन के लिए स्टार का इस्तेमाल मेरे हिसाब से अफ़सोसजनक है. इसकी ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए. उन्होंने आंखो देखी के लिए फ़ंड जुटाने के पीछे का भी एक दिलचस्प किस्सा सुनाया. रजत ने बताया कि वह फ़िल्म की स्क्रिप्ट कई निर्माताओं के पास लेकर गए लेकिन कोई इसमें पैसे लगाने को तैयार नहीं हुआ. तब उन्होंने ट्विटर पर दुखी होकर लिख दिया कि वो फ़िल्में बनाना छोड़ रहे हैं और अब सिर्फ़ प्ले किया करेंगे. उन्होंने कहा इसके बाद मेरे एक प्रशंसक मनीष मुंद्रा ने मुझे कहा कि मैं फ़िल्म में पैसे लगाऊंगा. आप फ़िल्में छोड़ने की बात मत करिए. रजत ने बताया कि उसके बाद वो मनीष से मिले और उन्होंने ना सिर्फ़ फ़िल्म बनाने के लिए बजट मुहैया कराया बल्कि उसके प्रमोशन के लिए भी अपनी जेब ढीली की. इस तरह से रजत को फ़िल्म का प्रोड्यूसर ट्विटर से मिला. आंखो देखी में संजय मिश्रा ने बाबूजी का केंद्रीय किरदार निभाया है. रजत कपूर ने निर्देशन करने के अलावा फ़िल्म में संजय मिश्रा के छोटे भाई का किरदार भी निभाया है. रजत ने बताया कि उन्होंने फ़िल्म की स्क्रिप्ट संजय मिश्रा को ही ध्यान में रखकर लिखी थी. फ़िल्म 21 मार्च को रिलीज़ हो रही है. रजत कपूर ने इस इंटरव्यू के दौरान बड़ी बेबाकी से बताया कि वो मेनस्ट्रीम बॉलीवुड फ़िल्में नहीं देखते. उन्होंने कहा पिछले दस सालों में मुझे देव डी गैंग्स ऑफ़ वासेपुर शिप ऑफ़ थीसियस और मराठी फ़िल्म हरिश्चंद्र फ़ैक्ट्री के अलावा कोई फ़िल्म अच्छी नहीं लगी. मैं ज़्यादा फ़िल्में देखता ही नहीं. उन्होंने ये ज़रूर क़बूल किया कि हिंदी सिनेमा में बिना स्टार और आइटम सॉन्ग के फ़िल्म बनाना और रिलीज़ करना दोनों ही मुश्किल है और आगे भी हालात बदलने के कोई चांस नहीं हैं. तो क्या रजत आगे मेनस्ट्रीम कमर्शियल फ़िल्में बनाने लगेंगे. इसके जवाब में रजत कपूर ने ये कहते हुए अपनी बात ख़त्म की कि मुझे कमर्शियल फ़िल्में पसंद नहीं है. मैं यहां आसान काम करने नहीं बल्कि अपने पसंद का काम करने आया हूं. मुझसे किसी कमर्शियल फ़िल्म की उम्मीद करना वैसे ही है जैसे किसी शाकाहारी आदमी से मटन खाने की उम्मीद करना. |
| DATE: 2014-03-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1089] TITLE: इश्क़ जताने के लिए रियलिटी शो की ज़रूरत नहीं: गौहर ख़ान |
| CONTENT: बिग बॉस के दौरान कुशाल टंडन और गौहर ख़ान एक-दूसरे के नज़दीक आए थे. गौहर ख़ान और कुशाल टंडन रियलिटी शो बिग बॉस में साथ नज़र आए. शो के दौरान दोनों एक दूसरे के नज़दीक आए. शो तो ख़त्म हुआ लेकिन दोनों की नज़दीकियां जारी रहीं. अब एक बार फिर से ये दोनों एक और रियलिटी शो ख़तरों के खिलाड़ी में नज़र आने वाले हैं जो 22 मार्च को शुरू होगा. कुशाल के साथ नज़दीकियों पर गौहर ने मीडिया से कहा ये सही है कि हमारे इश्क़ की शुरुआत एक रियलिटी शो में हुई. लेकिन अब मामला ख़ासा निजी हो चुका है. वे कहती हैं अब हमें एक दूसरे के प्रति प्यार दर्शाने के लिए किसी रियलिटी शो की ज़रूरत नहीं. ख़तरों के खिलाड़ी में हमारा साथ आना महज़ एक इत्तेफ़ाक़ है. गौहर ने कहा कि उनके लिए रिलेशनशिप में रहना एक ख़ूबसूरत अनुभव है लेकिन वो इसे निजी ही बनाए रखना चाहती हैं. गौहर को पब्लिक प्लेटफ़ॉर्म पर अपने प्यार को जताना पसंद नहीं. कुशाल के बारे में गौहर ने कहा वो एक बेहतरीन इंसान हैं. जब भी मुझे उनकी ज़रूरत होती है वो मेरे लिए मौजूद होते हैं. शो के दौरान स्टंट करने में भी वो मेरी मदद करते हैं. टीवी के अलावा गौहर ख़ान रॉकेट सिंह सेल्समैन ऑफ़ द ईयर इशकज़ादे और वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई जैसी फ़िल्में कर चुकी हैं. वो अपनी एक और फ़िल्म की शूटिंग में व्यस्त हैं जो जल्द ही रिलीज़ होगी. गौहर ख़ान ने साल 2013 में रियलिटी शो बिग बॉस जीता था. ख़तरों के खिलाड़ी के पांचवे संस्करण में गौहर और कुशाल के अलावा दयानंद शेट्टी सलमान युसुफ़ ख़ान मुग्धा गोडसे और रणवीर शौरी जैसे कलाकार प्रतियोगी हैं. मशहूर अमरीकी शो फ़ीयर फ़ैक्टर से प्रभावित ख़तरों के खिलाड़ी के पांचवे संस्करण की मेज़बानी फ़िल्मकार रोहित शेट्टी कर रहे हैं. गौहर के मुताबिक़ वो शो के अब तक के सर्वश्रेष्ठ मेज़बान हैं जो प्रतियोगियों को सही तरीके से प्रोत्साहित करते हैं. रोहित से पहले इस शो को अक्षय कुमार और प्रियंका चोपड़ा जैसे सितारे होस्ट कर चुके हैं. |
| DATE: 2014-03-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1090] TITLE: बिकिनी पहनने से परहेज़ नहीं मोनाली को |
| CONTENT: ज़रा-ज़रा टच मी टच मी ख़्वाब देखे झूठे-मूठे से लेकर संवार लूं जैसे सुपरहिट गीत गाने वाली मोनाली ठाकुर अब हीरोइन के पीछे की आवाज़ से सामने आकर ख़ुद हीरोइन बन गई हैं. और वो अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत कर रही हैं नागेश कुकुनूर की फ़िल्म लक्ष्मी से. फ़िल्म में उन्होंने 14 साल की एक लड़की का किरदार निभाया है जो ज़बरदस्ती वेश्यावृत्ति में धकेल दी जाती है और वहां उसे तमाम तरह की मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं. बीबीसी से बात करते हुए मोनाली ठाकुर ने बड़े साफ़ शब्दों में कहा कि अपने एक्टिंग करियर के लिए उन्होंने कोई सीमा तय नहीं की है और वो हर तरह के रोल करने के लिए बिलकुल तैयार हैं. वो कहती हैं मेरी दूसरी फ़िल्म है मैंगो जिसमें मैंने सब कुछ किया है. आप मुझे किसिंग करते भी देखेंगे बिकिनी में भी देखोगे. मेरा मानना ये है कि जो करो उसमें एक क़िस्म का एस्थेटिक सेंस होना ज़रूरी है. हाव-भाव में सस्तापन ना हो. इस बात का ख़्याल रखूंगी. बाक़ी किसी भी क़िस्म के चैलेंज के लिए तैयार हूं. बंगाल की रहने वाली मोनाली के पिता शक्ति ठाकुर भी एक मशहूर गायक हैं. संगीत के माहौल में पली बढ़ी मोनाली बचपन से ही गायिका बनना चाहती थीं इस वजह से उन्होंने सिंगिंग रियलिटी शो इंडियन आइडल में हिस्सा लिया लेकिन वो फ़ाइनल तक पहुंचने के काफ़ी पहले ही आउट हो गईं. मोनाली कहती हैं इंडियन आइडल से बाहर होने का उस वक़्त बड़ा बुरा लगा लेकिन मेरा सपना रियलिटी शो जीतना नहीं बल्कि अच्छे गाने गाना था. आज मैं ख़ुश हूं क्योंकि भले ही मैंने कम गाने गाए हैं लेकिन अच्छे गाने गाए हैं. संगीतकार प्रीतम के साथ फ़िल्म रेस के गाने और हालिया रिलीज़ लुटेरा के गानों ने उन्हें शोहरत दिलाई. बतौर अभिनेत्री मौका मिलने के बावजूद मोनाली अपनी गायकी का सफ़र भी जारी रखना चाहती हैं. मोनाली के मुताबिक़ प्लेबैक सिंगिंग का सबसे बड़ा ख़ामियाज़ा ये भुगतना पड़ता है कि लोग सिर्फ़ गायक की आवाज़ पहचानते हैं चेहरा नहीं. जब वो टीवी रियलिटी शो सारेगामापा जज कर रहीं थी तब निर्देशिका तनूजा चंद्रा ने उन्हें देखा और एक फ़िल्म के लिए साइन किया. मोनाली बताती हैं मुझे फ़िल्म के लिए 20 किलो वज़न घटाना था. वज़न तो मैंने कम कर लिया लेकिन वो फ़िल्म ही नहीं बन पाई. मोनाली के मुताबिक़ एक दफ़ा नागेश कुकुनूर ने उन्हें अब्बास टायरवाला के घर पर पार्टी में देखा और अपनी फ़िल्म लक्ष्मी के लिए चुन लिया. फ़िल्म में 14 साल की बच्ची का किरदार निभाने के लिए मोनाली को नागेश ने खाने पीने के लिए कहा ताकि उनका चेहरा गोलमटोल और मासूम सा दिखे. मोनाली कहती हैं मैं नागेश जी की फ़िल्मों को बहुत पसंद करती हूं. वैसे मैं हिंदी फ़िल्में नहीं देखती. मैं अधिकतर विदेशी फ़िल्में ही देखती हूं. नागेश जी काफ़ी सुलझे हैं और कभी भी किसी पर चिल्लाते नहीं. उन्होंने कहा लक्ष्मी में शेफ़ाली शाह राम कपूर और सतीश कौशिक की भी अहम भूमिका है. जिससे मुझे काफ़ी मदद मिली लक्ष्मी के लिए. हाल ही में नागेश कुकुनूर ने लक्ष्मी की स्पेशल स्क्रीनिंग यौनकर्मियों के लिए रखी थी. इस फ़िल्म को कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में दिखाया जा चुका है. भारत में फ़िल्म 21 मार्च को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2014-03-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1091] TITLE: बस एक फ़ोन कॉल की ज़रूरत थी लेकिन .: अनुराग कश्यप |
| CONTENT: फ़िल्मकार अनुराग कश्यप के अपने नज़दीकी दोस्त निर्देशक राजकुमार हीरानी और आमिर ख़ान से नाराज़ होने की ख़बरें हैं. दरअसल कुछ दिनों पहले ही आमिर और राजकुमार हीरानी ने अपनी बहुप्रतीक्षित फ़िल्म पीके की रिलीज़ जून से आगे करके क्रिसमस पर करने का ऐलान किया और इसी बात से अनुराग ख़फ़ा हैं. अनुराग रणबीर कपूर और अनुष्का शर्मा को लेकर बनाई जा रही अपनी फ़िल्म बॉम्बे वैलवेट को क्रिसमस पर रिलीज़ करना चाहते हैं और इसी वजह से उनको धक्का लगा कि पीके भी दिसंबर में ही रिलीज़ होगी. अनुराग ने कहा बस एक फ़ोन कॉल की ज़रूरत थी. मुझे तक़लीफ़ हुई क्योंकि राजकुमार मेरा दोस्त है. उसने मुझे बताया नहीं कि उनका ऐसा कोई प्लान है. फ़िलहाल मैं अपनी फ़िल्म पर फ़ोकस कर रहा हूं. अनुराग ने माना कि एक ही दिन अगर दो बड़ी फ़िल्में रिलीज़ होती हैं तो दोनों का नुकसान होगा. नाना पाटेकर और नसीरूद्दीन शाह को बेहतरीन कलाकार माना जाता है लेकिन पर्दे पर दोनों की अदाकारी के जलवे एक साथ बहुत कम देखने को मिले हैं. दोनों ने बेहद चुनिंदा फ़िल्मों में ही साथ काम किया है और उनमें भी इन दोनों कलाकारों के आमने-सामने के दृश्य बहुत कम हैं. अब नाना और नसीर के प्रशंसकों की ये हसरत पूरी होगी अनीस बज़्मी की आने वाली फ़िल्म वेलकम बैक में जिसमें काम करने के लिए नसीरुद्दीन शाह ने हरी झंडी दे दी है. वेलकम बैक साल 2007 में आई फ़िल्म वेलकम का सीक्वल है. इसमें भी नाना पाटेकर और अनिल कपूर की अहम भूमिका होगी और इसमें नसीरुद्दीन शाह वो भूमिका निभाएंगे जो वेलकम में फ़िरोज़ ख़ान ने निभाई थी. फ़िल्म में अक्षय कुमार की जगह मुख्य भूमिका जॉन अब्राहम निभाएंगे. क़्वीन में अपने अभिनय के लिए तारीफ़ बटोरने वाली कंगना रानाउत के लिए अच्छी ख़बर ये है कि उन्हें सुजॉय घोष की अगली फ़िल्म में मुख्य रोल के लिए चुन लिया गया है. ये भूमिका पहले विद्या बालन निभाने वाली थीं लेकिन उनके इनकार के बाद अब ये रोल कंगना की झोली में आ गया. इस फ़िल्म का नाम है दुर्गा रानी सिंह. इसके अलावा कंगना जल्द ही एक और फ़िल्म में दिखेंगी जिसका नाम है रिवॉल्वर रानी. सात मार्च को रिलीज़ हुई कंगना रानाउत की फ़िल्म क़्वीन को दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने ही सराहा. ख़ास बात ये है कि क़्वीन ने उसी दिन रिलीज़ हुई माधुरी दीक्षित और जूही चावला जैसे बड़े सितारों की फ़िल्म गुलाब गैंग से कहीं ज़्यादा कारोबार किया. |
| DATE: 2014-03-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1092] TITLE: 76 के 'अंगड़ाई किंग' की बीबीसी से ख़ास मुलाक़ात |
| CONTENT: बचपन से ही मैंने शशि कपूर की कई फ़िल्में देखीं. 60 और 70 के दशक की उनकी कई फ़िल्मों को टीवी पर देखा. अमिताभ बच्चन के साथ उनकी जोड़ी मुझे दीवार त्रिशूल कभी-कभी सुहाग और नमक हलाल जैसी फ़िल्मों में बहुत लुभाती थी. उनके परिवार के बाक़ी सदस्यों जैसे उनके बड़े भाई दिवंगत शम्मी कपूर उनके भतीजे ऋषि कपूर उनके पोते रणबीर कपूर पोती करीना कपूर वग़ैरह से कई फ़िल्मी कार्यक्रमों को कवर करने के दौरान मेरी मुलाक़ात हो चुकी है. लेकिन शशि कपूर से मैं कभी नहीं मिली थी. वो बहुत कम घर से बाहर निकलते हैं और उन्हें हाल में सार्वजनिक समारोहों में यदा-कदा ही देखा गया है. मेरे ज़ेहन में उनका फ़िल्मी चेहरा ही अंकित था. असल शशि कपूर कैसे हैं ये मेरे लिए हमेशा एक पहेली ही थी. तो इस बार मैंने ठान लिया कि उनके जन्मदिन 18 मार्च से पहले मैं उनसे मुलाक़ात करूंगी. मैंने उनके जुहू स्थित घर पर कई चक्कर लगाए. लेकिन गेट पर तैनात गार्ड्स ने मुझे बताया कि शशि कपूर किसी से नहीं मिलते और घर से बाहर भी बहुत कम निकलते हैं इसलिए मुलाक़ात संभव नहीं है. लेकिन मैंने हार नहीं मानी. आख़िरकार एक बार उनकी बिल्डिंग के गार्ड ने मुझे शशि जी के निकट सहयोगी अमरेज सिंह से मिला ही दिया. अमरेज जी ने मुझसे कहा साहब की सेहत ठीक नहीं रहती. वो किसी से ज़्यादा बातचीत करते ही नहीं इंटरव्यू भी नहीं देते. फिर आप मिलकर क्या करेंगी. मैंने उन्हें समझाया कि इंटरव्यू संभव नहीं भी हुआ तो भी उन्हें जन्मदिन की शुभकामना तो दे ही सकती हूं. आख़िर अमरेज सिंह ने हमें बताया कि शशि कपूर अपने नियमित चेकअप के लिए अस्पताल गए हैं. जब वो लौट कर आएंगे तब उनसे पूछ कर बताएंगे कि हम उनसे मिल सकते हैं या नहीं. उन्होंने हमें शशि कपूर के घर के सामने स्थित पृथ्वी थिएटर में इंतज़ार करने को कहा. मुलाक़ात की पक्की गारंटी ना होने के बावजूद मैंने इंतज़ार करने का फ़ैसला किया और अपनी सहयोगी सुप्रिया सोगले को भी बुला लिया. दो घंटे के इंतज़ार के बाद हमे एक गाड़ी को शशि कपूर के घर आते देखा. मन में उम्मीद बंधी. मैं सोचने लगे कि अब शशि कपूर से मुलाक़ात होगी. मन में उनकी फ़िल्मों के दृश्य कौंधने लगे. दीवार में नीतू सिंह का साथ का उनका गाना कह दूं तुम्हें या चुप रहूं हो या मुमताज़ के साथ उनका गाना ले जाएंगे ले जाएंगे दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे जैसे गानों के ख़ूबसूरत शशि कपूर की छवि सामने आने लगी. लेकिन गाड़ी के रुकते ही जो नज़ारा देखा उससे मुझे धक्का सा लगा. गाड़ी के रुकते ही एक बुज़ुर्गवार को दो लोगों ने सहारा देकर गाड़ी से नीचे उतारा. 76 साल का ये बुज़ुर्ग शख़्स था 60 और 70 के दशक का वो हैंडसम हीरो जिसकी लड़कियां दीवानी हुआ करती थीं. मैं यक़ीन नहीं कर पा रही थी. उसके बाद शशि कपूर को व्हील चेयर पर बैठाया गया. मैं उन्हें देख ही रही थी कि तभी आवाज़ आई कि मैडम मिल लीजिए साहब से. मैं उनके पास गई और अभिवादन करके उन्हें बताया कि मैं बीबीसी से मधु पाल हूं. शायद उन्हें सुनाई नहीं पड़ा. उन्होंने कहा क्या. तब मैंने थोड़ा ज़ोर से कहा मैं बीबीसी से हूं. आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं. फिर मैंने उन्हें एक गुलदस्ता भेंट किया. शशि कपूर के चेहरे पर बाल सुलभ मुस्कुराहट आ गई. इतने दिनों बाद कोई पत्रकार उनसे मिलने पहुंचा. ये जानकर वो ख़ुश हो गए. उन्होंने बहुत हौले से कहा शुक्रिया. आपसे मिलकर अच्छा लगा. मैं बीबीसी से कई बार मिल चुका हूं. हमारा पुराना नाता है. उसके बाद उन्हें अंदर ले जाया गया. उन्होंने हमसे हाथ हिलाकर विदा ली. उनके सहयोगी अमरेज सिंह ने हमें बताया कि शशि कपूर सार्वजनिक समारोहों में ज़्यादा नहीं जाते. घर से भी वो सिर्फ़ मेडिकल चेकअप के लिए ही बाहर निकलते हैं. शशि कपूर हर रविवार पृथ्वी थिएटर में शो देखने जाते हैं. उन्हें ऐसा करना बहुत अच्छा लगता है. फ़िल्में अब वो नहीं देखते. उनसे मिलने धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन जैसे उनके क़रीबी दोस्त आते रहते हैं. उनके जन्मदिन पर पूरा कपूर परिवार इकट्ठा होता है. अमिताभ बच्चन अगर शहर में होते हैं तो वो भी उनसे मिलने आते हैं. शशि कपूर किसी से ज़्यादा बात नहीं कर पाते. लेकिन सब देखते और अपने प्रति इस प्यार को महसूस करते रहते हैं. अमरेज सिंह ने बताया कि उन्हें अपने बीते दिनों की कई बातें आज भी याद हैं. उनकी सेहत में भी पहले की तुलना में सुधार आया है. शशि कपूर से मेरी ये मुलाक़ात भले ही चंद मिनटों की थी लेकिन यादगार रही. उनकी वो मुस्कुराहट में भूल नहीं पाऊंगी. |
| DATE: 2014-03-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1093] TITLE: 'सत्यमेव जयते' की सोना क्यों है नाराज़? |
| CONTENT: आमिर ख़ान के बहुचर्चित शो सत्यमेव जयते के दूसरे संस्करण के पहले संस्करण में बलात्कार और इसकी शिकार महिलाओं को होने वाली दिक़्क़तों जैसे संवेदनशील मुद्दे को उठाया गया जिसकी सोशल मीडिया पर ख़ासी चर्चा हुई. लेकिन साथ ही एक बात की और चर्चा हुई. कार्यक्रम के आख़िर में गायिका सोना मोहपात्रा के गाए गीत बेख़ौफ़ आज़ाद है जीना मुझे ने लोगों की भावनाओं को छुआ और कई लोगों ने इसे बेहद भावुक गीत बताया. सोना को इस गीत के लिए बड़ी वाहवाही भी मिली. सोना कार्यक्रम के पहले संस्करण से ही काफ़ी चर्चा में आ गई थीं जब उन्होंने ओ री चिरैया और रुपय्या जैसे गाने गाकर लोगों के दिलों को छुआ. इंटरनेट पर उनके गानों को लाखों की संख्या में हिट्स भी मिले. अपने संगीतकार पति राम संपत के साथ मिलकर इस शो के संगीत पर काम करने वाली सोना कहती हैं सत्यमेव जयते का संगीत बनाना एक बड़ी चुनौती है. इसकी वजह आमिर ख़ान जैसे परफ़ेक्शनिस्ट का कार्यक्रम से जुड़ा होना नहीं बल्कि इस कार्यक्रम के मुद्दे हैं जो बेहद गंभीर होते हैं. बीबीसी से बात करते हुए सोना ने कहा संगीत बनाते वक्त चुनौती रहती है कि वो बहुत उबाऊ भी ना हो और सही तरह से मुद्दे के साथ संतुलन बनाए. हर बार कहां से उस तरह की धुन लाई जाए जो छू ले. सत्यमेव जयते को लेकर आ रहीं कुछ नकारात्मक प्रतिक्रियाओं पर वो कि अगर एक बड़ा सितारा ऐसे मुद्दों पर लोगों को जगा रहा है तो इसमें बुराई क्या है. सोना मोहपात्रा कहती हैं बहुत सारे लोग ये भी कहते हैं कि हम तो ये मुद्दे पहले ही उठा चुके हैं अब आमिर का नाम जुड़ा है तो ज़्यादा बातें हो रही हैं. लेकिन आमिर चाहते तो ज़्यादा पैसे वाला कोई काम करके हंसते-खेलते निकल जाते. ये बहुत मुश्किल शो है. आमिर कर रहे हैं और अगर इसके ज़रिए जागरूकता बढ़ती है तो अच्छी बात है. सोना आमिर का साथ देते हुए कहती हैं कि ये कार्यक्रम काफ़ी भावनात्मक है और अगर आमिर कुछ ऐसा कर रहे हैं तो उनकी तारीफ़ की जानी चाहिए. सोना ये भी जोड़ती हैं जब भी इस तरह का कुछ हो रहा होता है तो शैतान क़िस्म के लोगों रूकावटें पैदा करते ही हैं और वो करते रहेंगे. इससे फ़र्क नहीं पड़ता. पढ़ाई से इंजीनियर और पेशे से गायिकासंगीतकार और गीतकार सोना मोहपात्रा अपनी बेबाक शख़्सियत के लिए पहचानी जाती हैं. जब हमने ये पूछा कि इंडस्ट्री के अंदर महिलाओं के प्रति नज़रिए पर वो क्या सोचती हैं तो उन्होंने कहा मुझे ये बात साफ़ तौर पर बोलने में कोई हिचक नहीं है कि आज भी फ़िल्मों के सारे गाने लड़कों के लिए बनते है. हीरोइन सिर्फ़ एक वस्तु की तरह होती है जिसे कुछ नाचने के सीन दे दिए जाते है. भले ही उसका किरदार कितना ही सशक्त क्यों ना हो गाने हमेशा हीरो के लिए ही होते हैं. डेल्ही बेली आई हेट लव स्टोरीज़ तलाश और फ़ुकरे में गाने वाली सोना फ़िल्मों में महिलाओं के चित्रण पर क्या सोचती हैं इस सवाल के जवाब में वो कहती हैं मुझे लगता है कि महिलाओं के अंदर अलग अलग तरह की ऊर्जा है लेकिन उसे दिखाने में फ़िल्में असफल हैं. वो सिर्फ़ एक ही तरह की महिला को दिखाती हैं जो एक ही तरह के कपड़े पहनकर नाच-गा रही है. मैं ये नहीं कह रही हूं कि आप साड़ी लपेटकर सिंदूर लगाकर खड़ी हो जाएं लेकिन महिलाओं की विविध ऊर्जा को समेटने की कोशिश नहीं दिखती है. ये काफ़ी निराशाजनक लगता है. डेल्ही बेली फ़िल्म में काम के दौरान आमिर ख़ान संगीतकार राम संपत के काम से काफ़ी प्रभावित हुए जिसके बाद राम को सत्यमेव जयते के संगीत पर काम करने का मौक़ा मिला और फिर सोना भी कार्यक्रम में जुड़ गईं. |
| DATE: 2014-03-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1094] TITLE: बॉलीवुड के सितारे, क्या-क्या और कैसी 'बेवकूफ़ियां' |
| CONTENT: आयुष्मान खुराना और सोनम कपूर की फ़िल्म बेवकूफ़ियां 14 मार्च को रिलीज़ हो रही है. कहानी है आयुष्मान खुराना और सोनम कपूर की लव स्टोरी की और कैसे आयुष्मान और सोनम लड़की के पिता ऋषि कपूर को पटाने के लिए तमाम तरह की बेवकूफ़ियां करते चले जाते हैं. लेकिन असल ज़िंदगी में अक्सर बॉलीवुड के सितारों की वो क्या हरकतें होती हैं जिन्हें बेवकूफ़ी कहा जा सकता है. आयुष्मान से जब हमने ये सवाल किया तो वो बोले जब सितारे असल जीवन में भी एक्टिंग करते हैं. सितारों का नकलीपन जो वो है नहीं या वो जो महसूस नहीं करते उसे पेश करने की कोशिश करना. जब वो ऐसे करते हैं तो मुझे बेवकूफ़ी लगती है. सौभाग्यवश मैं ऐसा नहीं हूं. सितारों के इस नकलीपन से चिढ़ने वाले आयुष्मान खुराना को क्या बॉलीवुड की कोई और बात है जो पसंद ना हो. आयुष्मान ने बताया कि फ़िल्म इंडस्ट्री की एक बात जो उन्हें पसंद नहीं थी लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. वो क्या बात थी. आयुष्मान बोले आज से दस साल पहले इंडस्ट्री में किसी बाहरी आदमी का आना बड़ा मुश्किल था. बड़ा भाई-भतीजावाद का ज़ोर था. अगर आप फ़िल्मी परिवार से हो तो चांस मिलना बड़ा आसान लेकिन बाहरी आदमी के लिए बड़ा मुश्किल. किन कलाकारों से आयुष्मान अपनी प्रतिस्पर्धा देखते हैं. इसके जवाब में आयुष्मान बोले देखिए मैं इस पीढ़ी का इकलौता गायक-कलाकार हूं. एक्टिंग भी करता हूं. गाने भी गाता हूं. तो इस हिसाब से मेरा कोई मुक़ाबला नहीं. इस लीग का कोई कलाकार इस पीढ़ी में तो नहीं है. वैसे आयुष्मान मानते हैं कि रणबीर कपूर इस दौर के सबसे बड़े स्टार हैं. बेवकूफ़ियां में आयुष्मान खुराना और सोनम कपूर के बीच एक स्वीमिंग पूल का दृश्य है जिसमें सोनम ने बिकिनी पहनी है. बॉलीवुड आने से पहले ही शादीशुदा आयुष्मान की पत्नी इस तरह के अंतरंग दृश्यों पर कैसी प्रतिक्रिया देती हैं. इसके जवाब में आयुष्मान बोले उसे सब पता है यार कि इस तरह के दृश्य बड़े मैकेनिकल तरीके से फ़िल्माए जाते हैं. इनमें कोई भावना नहीं होती. इसलिए कोई दिक़्क़त नहीं होती. |
| DATE: 2014-03-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1095] TITLE: 'सत्यमेव जयते' ने दिखाया कमाल |
| CONTENT: आमिर ख़ान के बहुचर्चित शो सत्यमेव जयते के पहले एपिसोड की रेटिंग आ गई है और ये स्टार प्लस का नंबर वन शो रहा. इस कार्यक्रम को स्टार प्लस के सभी शोज़ के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा दर्शक मिले. सत्यमेव जयते के दूसरे सत्र के पहले एपिसोड में आमिर ख़ान ने साल 2012 में दिल्ली में हुए चर्चित निर्भया गैंगरेप केस और बलात्कार जैसे संवेदनशील मुद्दे को उठाया और शो के प्रस्तुतिकरण को लोगों ने ख़ासा पसंद किया. अब शो के अगले एपिसोड्स को लेकर दर्शकों की उत्सुकता और ज़्यादा बढ़ गई है. सत्यमेव जयते तो साप्ताहिक शो है लेकिन डेली सोप्स की बात करें तो लगातार तीसरे सप्ताह बाज़ी मारी स्टार प्लस के शो दिया और बाती हम ने और ये रहा पहले नंबर पर. संध्या की आईपीएस ट्रेनिंग वाला हिस्सा दर्शकों को बड़ा रास आ रहा है. संध्या और सूरज के प्रशंसकों को शायद इस बार ज़्यादा ख़ुशी हुई होगी क्योंकि संध्या अपनी ससुराल वापस आई हैं. संध्या की ननद की शादी है तो टीवी के दीवाने दर्शकों को अपने मनपसंद शो में उत्सव का माहौल देखने को मिल रहा है और अपने प्रिय किरदारों को साथ देखकर उन्हें बड़ा लुत्फ़ आ रहा है. साथिया में आख़िर अहम और गोपी के मिलन की घड़ी आ ही गई. दोनों बहुत ख़ुश हैं और साथ ही इस शो के चाहने वाले दर्शक भी. साथिया रहा इस सप्ताह दूसरे नंबर पर. राजपूत समुदाय के विरोध के बाद एकता कपूर अब जोधा-अकबर से अपना नाम वापस ले चुकी हैं. उनकी जगह अब इस शो को कौन प्रोड्यूस करेगा यह बड़ा सवाल है. या क्या विरोध के मद्देनज़र ये शो बंद हो जाएगा ये भी देखने वाली बात है. लेकिन बाकी दर्शकों को तो जोधा-अकबर की यह कहानी बड़ी रास आ रही है. यह शो रहा इस सप्ताह तीसरे नंबर पर. डांस इंडिया डांस लिटिल मास्टर और ये रिश्ता क्या कहलाता है संयुक्त रूप से चौथे स्थान पर रहे. डेली सोप्स को टक्कर दे पा रहा है सिर्फ़ कपिल शर्मा का शो कॉमेडी नाइट्स विद कपिल जो रहा पांचवें स्थान पर. चैनलों की रेस में सत्यमेव जयते ने दिखाया कमाल और स्टार प्लस को पहुंचा दिया पहले नंबर पर. दूसरे स्थान पर रहा कलर्स और उसके बाद नंबर रहा ज़ी का. अगले सप्ताह टीवी कार्यक्रमों की प्रतिस्पर्धा और दिलचस्प होने वाली है क्योंकि कलर्स पर शुरू होने वाला है रियलिटी शो ख़तरों के खिलाड़ी जिसे इस बार निर्देशक रोहित शेट्टी होस्ट कर रहे हैं. ये शो टीआरपी रेस का कितना बड़ा खिलाड़ी साबित होगा ये देखना बाक़ी है. |
| DATE: 2014-03-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1096] TITLE: 'कीचड़ उछालने वालों' को आमिर का जवाब |
| CONTENT: हिंदी सिनेमा में मिस्टर परफ़ेक्शनिस्ट के नाम से जाने जाने वाले आमिर ख़ान उम्र की हाफ़ सेंचुरी लगाने के बेहद क़रीब आ गए हैं. हिंदी सिनेमा में पिछले 25 साल से अपनी धाक जमाते आ रहे आमिर 14 मार्च को 49 साल के हो गए. 1988 में फ़िल्म क़यामत से क़यामत तक से अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत करने वाले आमिर के लिए बीता साल बेहद शानदार रहा था. पिछले साल आई उनकी इकलौती फ़िल्म धूम-3 ने बॉक्स ऑफ़िस के सभी रिकॉर्ड तोड़ते हुए 500 करोड़ रूपए की कमाई की थी. इस साल आमिर किसी भी नई फ़िल्म की शूटिंग शुरू नहीं करेंगे. 2014 के आख़िर में उनकी फ़िल्म पीके रिलीज़ होगी. लेकिन ये पूरा साल वो अपने टीवी शो सत्यमेव जयते को समर्पित कर रहे हैं. इस साल सत्यमेव जयते का दूसरा सीज़न दिखाया जा रहा है. इस शो का पहला सीज़न 2012 में आया था. इस शो में उठाए जाने वाले सामाजिक मुद्दों को लेकर आमिर ख़ूब सुर्ख़ियां बंटोर रहे हैं. लेकिन साथ ही उनके शो की कई बातों को लेकर आलोचना भी हो रही है. लोग उनके शो को एकतरफ़ा भी कह रहे हैं और कई लोग उन पर किसी भी समस्या का सिर्फ़ एक ही पहलू पेश करने का आरोप लगा रहे हैं. मीडिया से बात करते हुए इसका जवाब आमिर ने कुछ ऐसे दिया. हमने अपने शो के दूसरे सीज़न की शुरुआत दशरथ मांझी के गांव गहलोर से की. इसकी वजह यही थी कि हम भी दशरथ मांझी से प्रेरणा लेकर काम करना चाहते हैं. चाहे लोग हमारे बारे में अफ़वाहें फैलाएं बदनाम करें हम पर हंसे या डराने की कोशिश करें हम उससे ना घबराएं और अपने रास्ते पर बढ़ते रहें यही हमारी कोशिश है. ऐसी भी ख़बरें हैं कि इस शो के ज़रिए और आमिर के मशहूर हस्ती होने का फ़ायदा उठाकर कुछ दूसरे लोग इंटरनेट पर या कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सत्यमेव जयते के नाम पर अपने ट्रस्ट के लिए डोनेशन मांग रहे हैं. जिसके ख़िलाफ़ ख़ुद आमिर ख़ान पुलिस में शिकायत दर्ज करा चुके हैं. शो की आलोचना के जवाब पर आमिर ने कहा जब भी कोई अच्छा काम करने की कोशिश करता है तो कुछ लोग होते हैं जो उससे ख़ुश नहीं होते. उनकी संख्या कम हैं लेकिन वो कोशिश कर रहे हैं कि वो मेरे बारे में अलग-अलग अफ़वाहें फैलाएं. लोग सोशल मीडिया में ऐसी अफ़वाहें फैलाने का काम करते हैं और अपनी पहचान भी गुप्त रखते हैं. लोग जब ये सब करते हैं तो पढ़कर मुझे दुख भी होता है क्योंकि मैं अपनी तरफ़ से कुछ अच्छा करने की कोशिश कर रहा हूं. लेकिन मुझे ये भी पता है कि हिंदुस्तान की जनता ख़ूब समझती है कि क्या सच है और क्या सच नहीं है. पिछले 25 सालों से वो मुझे देख रही है. अपने टीवी शो की वजह से आमिर पर एक सवाल खड़ा हो रहा है कि वो ये शो करने के बदले चैनल से एक मोटी रक़म वसूल रहे हैं. इस बारे में आमिर का कहना है कि मैं पैसे लेकर अच्छा काम करूं ये मेरी कोशिश है. पैसे लेकर मैं बुरा काम भी कर सकता हूं. मेरी ये कोशिश रहती है कि मैं अच्छा काम करके कमाऊं क्योंकि मैं मेहनत कर रहा हूं. इस शो के ज़रिए मुझे बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है मुझे देश के अलग-अलग कोनों से लोगों से मिलने का मौक़ा मिल रहा है तो मैं अपने आपके बहुत समृद्ध महसूस करता हूं. आमिर ने हर साल की तरह इस साल भी अपना जन्मदिन परिवार के साथ ही बिताया. |
| DATE: 2014-03-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1097] TITLE: हॉलीवुड फिल्म 'नोह' पर मुस्लिम देशों में प्रतिबंध |
| CONTENT: संयुक्त अरब अमीरात क़तर और बहरैन समेत मध्यपूर्व के कई देशों ने हॉलीवुड की लोकप्रिय फिल्म नोह को प्रतिबंधित कर दिया है क्योंकि इसमें पैगंबर का चित्रण कर इस्लाम की वर्जनाओं का उल्लंघन किया गया है. संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रीय मीडिया सेंटर के जुमा-अल-लीम का कहना है फिल्म में ऐसे दृश्य हैं जो इस्लाम और बाइबल में विरोधाभास पैदा करने वाले हैं. इसलिए हमने इसे नहीं दिखाने का फैसला किया है. निर्देशक डारेन अरोनोफ़्स्की की इस फिल्म के स्टार रसेल क्रो जहाज बनाने वाले बाइबल के एक चरित्र हैं. अल लीम ने एसोसिएटेड प्रेस से कहा महत्वपूर्ण ये है कि धर्मों का सम्मान किया जाए और फिल्म को नहीं दिखाएं. मिस्र में इस्लाम के सबसे सम्मानीय धार्मिक संस्थान अल-अज़हर का बयान कुछ अलग है. उसका कहना है उन्हें फिल्म पर आपत्ति है क्योंकि ये इस्लामी कानूनों का उल्लंघन करती है और आस्थावान लोगों की भावनाओं को भड़का सकती है. पैरामाउंट पिक्चर्स की इस फिल्म को 125 मिलियन डॉलर से कहीं अधिक कीमत से बनाया गया है. समूचे अमरीका में टेस्ट स्क्रीनिंग के बाद इसपर नकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं. फिल्म नोह की कहानी रुढिवादी ईसाइयों में भी विवाद भड़का रही है. फिल्म नोह में बाइबल और कुरान की व्याख्याओं में अंतर दिखता है. नोह को अरबी में नुह के तौर पर उद्धृत किया जाता है. दोनों में ही ये बाढ़ में जहाज के ज़रिए हर जन्तु की प्रजातियों की रक्षा करता है. पाकिस्तान के केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड के मोहम्मद ज़रीफ़ कहते हैं हमने अभी इसे नहीं देखा है लेकिन मुझे नहीं लगता कि ये पाकिस्तान के सिनेमाघरों में दिखाई जा सकेगी. ट्यूनीशिया के संस्कृति मंत्रालय के प्रवक्ता फ़ैज़ल रोख ने कहा उन्हें स्थानीय वितरकों की ओर से फिल्म दिखाने का कोई अनुरोध नहीं मिला है लेकिन वो अक्सर ऐसी फिल्में नहीं दिखाते जिसमें पैगंबर का चित्रण किया गया हो. अक्टूबर 2011 में ट्यूनीशिया में जब एक प्राइवेट टेलीविजन स्टेशन से प्रसारित एक एनीमेशन फिल्म पर्सपोलिस में अल्लाह का चित्रण किया गया तो देशभर में दंगों और प्रदर्शनों की बाढ़ आ गई थी. बाद में टीवी स्टेशन के प्रमुख पर पवित्रता पर हमले का दोषी पाये जाने पर 1200 यूरो का जुर्माना हुआ. सऊदी अरब और गाज़ा स्ट्रीप में कोई सिनेमाघर नहीं है लेकिन वेस्ट बैंक के थिएटर क्लाक सिनेमा के मैनेजर कुदस मनारसा ने कहा है कि उसने फिल्म नोह का आर्डर दिया है. उनका कहना है फिल्म का प्रोडक्शन शानदार है और कहानी बहुत अच्छी. |
| DATE: 2014-03-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1098] TITLE: कैसी रहीं आयुष्मान-सोनम की 'बेवकूफ़ियां' ? |
| CONTENT: यशराज फ़िल्म्स की बेवकूफ़ियां मोहित चड्ढा आयुष्मान खुराना और मायरा सहगल सोनम कपूर की लव स्टोरी है. दोनों अच्छी नौकरियों पर हैं लेकिन मायरा मोहित से ज़्यादा कमाती है. मायरा के पिता वी के सहगल ऋषि कपूर एक रिटायर्ड आईएएस अफ़सर हैं. वो बेहद कड़क और उसूलों के पक्के इंसान हैं और अपनी बेटी के लिए उनके बड़े ऊंचे ख़्वाब हैं. वो मायरा की शादी किसी बेहद अमीर लड़के से करना चाहते हैं. इसी वजह से जब मायरा अपने पिता को मोहित के बारे में बताती है तो वो ख़ुश नहीं होते और उसे मोहित को रिजेक्ट करने के लिए उसके बारे में तमाम जानकारियां हासिल करने की ठान लेते हैं. इधर मंदी की वजह से मोहित को अपनी नौकरी गंवानी पड़ती है. मायरा उसे सलाह देती है कि वो भूलकर भी अपनी इस नौकरी छूटने वाली बात उसके पिता को ना बताए वर्ना वो उनकी शादी के लिए कभी नहीं मानेंगे. इस दौरान मोहित के ख़र्चे और उसके रहने का ख़र्च मायरा और मोहित का दोस्त प्रताप हांडा मिलकर उठाते हैं. इस बीच परिस्थितियों का चक्र कुछ ऐसा चलता है कि मायरा के पिता को लगने लगता है कि मोहित ही उनकी बेटी के लिए सही पसंद है. लेकिन तभी मायरा उन्हें बताती है कि उसका और मोहित का अलगाव हो चुका है आगे क्या होता है यही फ़िल्म की कहानी है. हबीब फ़ैसल की कहानी में मेट्रो शहर के नौकरी पेशा युवाओं की लाइफ़ स्टाइल को फ़ोकस किया गया है. उन्होंने फ़िल्म में युवा पीढ़ी और बुज़ुर्ग पीढ़ी के बीच के तनाव और मतभेद को सही तरीके से दिखाया गया है. लेकिन फ़िल्म के साथ सबसे बड़ी दिक़्क़त ये है कि ये बार-बार अपनी पकड़ खो देती है और भटकने लगती है. हालांकि आयुष्मान और सोनम कपूर के साथ-साथ ऋषि कपूर और आयुष्मान के बीच के कई दृश्य अच्छे बन पड़े हैं. ऋषि कपूर और सोनम कपूर के बीच की केमेस्ट्री भी अच्छी नज़र आती है. लेकिन एक हद के बाद फ़िल्म उबाऊ लगने लगती है. क्लाईमेक्स दिल को छू लेता है लेकिन बहुत ज़्यादा असर नहीं छोड़ पाता क्योंकि ये विश्वसनीय नहीं लगता. हबीब फ़ैसल के लिखे संवाद अच्छे और मनोरंजक हैं. ऋषि कपूर ने सोनम के पिता के रोल में जान डाल दी है और एक और ज़बरदस्त परफ़ॉर्मेंस दी है. दर्शकों को उनका किरदार बेहद पसंद आएगा क्योंकि ऋषि कपूर इस रोल में बड़े स्वाभाविक और बेहतरीन रहे हैं. आय़ुष्मान खुराना ने भी अपने रोल के साथ पूरा न्याय किया है. उन्होंने मोहित चड्ढा के किरदार को बड़ी सहजता से निभाया है. सोनम कपूर ने मायरा के किरदार को शानदार तरीके से निभाया है. उनके किरदार में जो चुलबुलापन ज़रूरी था उसे उन्होंने पूरी तरह से रोल में लाया है. वो काफ़ी ग्लैमरस लगी हैं. बिकिनी सीन में भी वो कमाल की लगी हैं. बाकी कलाकार भी अच्छे रहे हैं. नुपूर अस्थाना का निर्देशन ठीक-ठाक है लेकिन वो फ़िल्म में निरंतरता नहीं रख पाई हैं और फ़िल्म बीच-बीच में अपनी चमक खो देती है. इसी वजह से फ़िल्म दर्शकों को बांधे नहीं रख पाती. रघु दीक्षित का संगीत अच्छा है लेकिन ये युवा दर्शकों को लुभाने में नाकाम रहा है. कुल मिलाकर बेवकूफ़ियां सिर्फ़ कुछ हिस्सों में ही दर्शकों का मनोरंजन करती है. ये दर्शकों पर ज़्यादा असर नहीं छोड़ पाती. बॉक्स ऑफ़िस पर इसका अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद बहुत कम है. |
| DATE: 2014-03-14 |
| LABEL: entertainment |
| [1099] TITLE: एंजलीना जोली कराएँगी एक बार फिर सर्जरी |
| CONTENT: हॉलीवुड स्टार एंजलिना जोली ने साफ़ किया है वो स्तर-कैंसर से बचने के लिए और सर्जरी कराएँगी. जोली ने पिछले साल प्रिवेंटिव डबल मासटेकटॉमी कराई थी. इस सर्जरी में कैंसर से बचने के लिए दोनों स्तनों को आंशिक या फिर पूरी तरह हटा दिया जाता है. उन्होंने यह सर्जरी स्तन कैंसर होने की प्रबल संभावना को कम करने के लिए कराया था. 38 वर्षीय एंजलीना ने पिछले साल न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लेख में सर्जरी कराने की बात कही थी. उन्होंने इसकी वजह भी बताई है. उन्होंने पिछले साल कहा था इस ख़तरे को जितना कम किया जा सकता है उतना कम करने के लिए मैंने एहतियातन यह क़दम उठाया. अभी हाल ही में एंटरटेनमेंट वीकली को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि वो सर्जरी कराने के अपने निर्णय से बहुत ख़ुश हैं. उन्होंने कहा अभी एक और सर्जरी होनी है जिसे मैंने अब तक नहीं कराया है. मैं अगले चरण की सर्जरी कराने से पहले उन सभी शानदार लोगों से सलाह लूँगी जिनसे मैं पहले भी सलाह लेती रही हूँ. उन्होंने कहा मैं ख़ुसनसीब हूँ कि मुझे बहुत बढ़िया डॉक्टर मिले मैं ख़ुसनसीब हूँ कि मेरी सेहत में अच्छा सुधार हुआ और मैं ख़ुसनसीब हूँ कि मुझे अनब्रोकेन जैसी फ़िल्म को निर्देशित करना का मौका मिल जिस पर मैं सचमुच अपने को एकाग्र कर सकती हूँ. जोली ने कहा कि उन्हें जनता से बहुत समर्थन मिल रहा है. उन्होंने कहा मैं लोगों के समर्थन और उदारता से बेहद अभिभूत हूँ. छह बच्चों की माँ एंजलीना ने सर्जरी का कारण बताते हुए कहा था कि उनकी माँ का 56 साल की उम्र में गर्भाशय कैंसर के कारण देहांत हो गया था. उन्होंने बताया था कि उनकी माँ एक दशक तक कैंसर से जूझती रही थीं. एंजलीना के सर्जरी कराने के निर्णय की उनके पति ब्रैड पिट ने भी तारीफ़ की थी. एंजलीना के डॉक्टरों का अनुमान था कि उन्हें स्तर कैंसर होने की 87 फ़ीसदी और गर्भाशय कैंसर होने की 50 फ़ीसदी संभावना है. इंपीरियल कॉलेज के ओवरियन कैंसर एक्शन रिसर्च सेंटर की प्रोफ़ेसर हैनी गाब्रा कहती हैं कि जिन महिलाओं में बीआरसीए12 जीन म्यूटेशन होता है उनके पास ज़्यादा विकल्प नहीं होते. वो कहती हैं चिकित्सा विज्ञान के पास स्तन या और गर्भाशय हटवाने के अलावा दूसरे विकल्प बहुत कम ही हैं. वे कहती हैं ऐहतियातन स्तन या गर्भाशय को सर्जरी से हटवा लेने से गर्भाशय कैंसर होने की संभावना काफ़ी कम हो जाती है. प्रोफ़ेसर गैब्रा कहती हैं गर्भाशय निकालने से महिलाओं की गर्भ धारण करने की क्षमता ख़त्म हो जाती है और उन्हें असमय ही रजोनिवृत्ति से गुजरना पड़ता है. प्राकृतिक रूप से होने वाली रजोनिवृत्ति के मुक़ाबले यह बहुत तेज़ी से होता है. इसके कारण अस्थी ऊतकों के कमजोर होने या ऐसी ही दूसरी बिमारियों के होने का ख़तरा बढ़ जाता है. वे कहती हैं जो महिलाएँ इसे लेकर चिंतित हों उन्हें अपने डॉक्टर से इस पर राय लेनी चाहिए. |
| DATE: 2014-03-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1100] TITLE: मैं अभी ख़त्म नहीं हुआ हूं: सुभाष घई |
| CONTENT: कभी बॉक्स ऑफ़िस जिनके इशारों पर नाचता था जिनका नाम किसी फ़िल्म से जुड़ा होना ही कामयाबी की गारंटी माना जाता था और तो और जिन्हें राज कपूर के बाद शोमैन ऑफ़ बॉलीवुड कहा जाता था वो सुभाष घई लंबे समय से कामयाबी के लिए तरस रहे हैं. उनकी पिछली कई फ़िल्में जैसे युवराज किसना यादें फ़्लॉप रहीं. बतौर निर्माता भी वो कोई ख़ास कमाल नहीं कर पा रहे हैं. लेकिन सुभाष घई अभी मानने को तैयार नहीं है कि उनके अंदर का फ़िल्मकार ख़त्म हो गया है. उन्होंने कहा पूरे विश्व में चाहे कोई कितना भी बड़ा फ़िल्मकार क्यों ना हो. हिट और फ़्लॉप फ़िल्मों का सिलसिला चलता रहता है. यह तो एक सफ़र है. बड़ी बात यह है कि मुझमें अब भी फ़िल्म बनाने का जुनून है और जब तक ये है मैं फ़िल्म बनाता रहूंगा. मैं अभी ख़त्म नहीं हुआ हूं. सुभाष घई अब लेकर आने वाले हैं फ़िल्म कांची जिसमें नए सितारे हैं. उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा भारत में लोग सिर्फ़ बॉक्स ऑफ़िस को ही कसौटी मानते हैं. लेकिन अच्छी फ़िल्में हमेशा याद की जाती हैं. राज कपूर जी की फ़िल्म मेरा नाम जोकर नहीं चली थी. लेकिन लोग आज भी उसे महान फ़िल्म के तौर पर याद रखते हैं. यश चोपड़ा जी ने लम्हे जैसी ख़ूबसूरत फ़िल्म बनाई जो उस वक़्त नहीं चली. लेकिन लम्हे एक महान फ़िल्म थी लोग आज भी मानते हैं. सुभाष घई ने कहा कि 70 के दशक के आख़िर में उनकी फ़िल्म क्रोधी फ़्लॉप हुई तो लोगों ने कहा कि उनका करियर ख़त्म हो गया. उन्होंने कहा लेकिन क्रोधी के बाद मैंने विधाता हीरो क़र्ज़ राम-लखन जैसी बेहद कामयाब फ़िल्में दीं. फिर 90 के दशक में त्रिमूर्ति नहीं चली तो लोगों ने कहा बस अब बहुत हो गया. फिर मैंने ताल और परदेस जैसी कामयाब फ़िल्में दीं. तो ये साइकल तो चलता रहता है. सुभाष घई की नई फ़िल्म कांची में कार्तिक आर्यन और मिष्टी चक्रबर्ती जैसे नए कलाकार हैं. फ़िल्म 25 अप्रैल को रिलीज़ होगी. |
| DATE: 2014-03-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1101] TITLE: सलमान ख़ान के लिए कुछ भी कर सकती हूं: मीरा चोपड़ा |
| CONTENT: परिणीति चोपड़ा के बाद अब प्रियंका चोपड़ा की एक और बहन मीरा चोपड़ा बॉलीवुड में क़दम रखने जा रही हैं. हालांकि परिणीति की तरह वो भी प्रियंका की सगी बहन नहीं है और दूर के रिश्ते में उनकी बहन लगती हैं. लेकिन प्रियंका जैसी बड़ी सुपरस्टार की रिश्तेदार होने के बावजूद मीरा मानती हैं कि उन्हें इस बात का कोई फ़ायदा नहीं मिला. बीबीसी से ख़ास बातचीत करते हुए मीरा ने कहा प्रियंका की बहन होने से बस होता ये है कि बॉलीवुड में लोग आपसे तमीज़ से पेश आते हैं बस. इससे आगे कुछ नहीं. इसके अलावा मुझे कोई फ़ायदा नहीं मिला. यहां लोग बड़े प्रोफ़ेशनल हैं. सब कुछ ख़ुद करना पड़ता है. मीरा की पहली हिंदी फ़िल्म है गैंग ऑफ़ घोस्ट्स जो 21 मार्च को रिलीज़ हो रही है. इससे पहले वो कई दक्षिण भारतीय फ़िल्में कर चुकी हैं. क्या वो परिणीति और प्रियंका से कोई टिप्स लेती हैं. इसके जवाब में मीरा ने कहा मेरे पास दक्षिण भारतीय फ़िल्में करके ख़ासा अनुभव आ चुका है. मुझे किसी की टिप्स की ज़रूरत ही नहीं. मुझे पता है कि बॉलीवुड में क्या करना है. हां कभी-कभी मैं प्रियंका से ज़रूर सलाह ले लेती हूं और वो मुझे हर बार सही सलाह देती हैं. वैसे मीरा ने बताया कि प्रियंका या परिणीति से वो ज़्यादा मिलती नहीं है लेकिन प्रियंका के काम से ज़रूर प्रभावित हैं. वो कहती हैं प्रियंका बहुत बड़ी सुपरस्टार हैं. उन्होंने हर तरह के रोल किए हैं. कमाल की अदाकार हैं. दीपिका पादुकोण के काम से भी मैं प्रभावित हूं. इसके अलावा वो सलमान ख़ान की बहुत बड़ी प्रशंसक हैं. मीरा ने कहा सलमान तो कमाल हैं. मैं उनके लिए कुछ भी कर सकती हूं. उनके लिए क्रेज़ी हूं. उनके साथ फ़िल्म करने को मिल जाए तो मज़ा ही आ जाए. मीरा ने ये भी बताया कि वो एक्सपोज़ करने में सहज नहीं है. मैंने अब तक वो रोल स्वीकार नहीं किए हैं जिनमें अंग प्रदर्शन करना हो. मैं ऐसे रोल करने में सहज नहीं हूं. तंग कपड़े पहनने वाले रोल मुझे मंज़ूर नहीं. बिकिनी पहनना भी मुझे गवारा नहीं है. आगे भी ऐसे रोल नहीं करूंगी. गैंग ऑफ़ घोस्ट्स में शरमन जोशी माही गिल अनुपम खेर और असरानी जैसे कलाकारों के भी अहम रोल है. इसके निर्देशक सतीश कौशिक हैं. मीरा ने बताया कि वो फ़िल्मों में नहीं आना चाहती थीं बल्कि पत्रकार बनना चाहती थीं और अमरीका में उन्होंने पत्रकारिता का कोर्स भी किया. मीरा इसके अलावा मॉडलिंग भी करती थीं और उनका एक विज्ञापन देखकर उन्हें एक तमिल फ़िल्म करने का प्रस्ताव आया और इस तरह से उनका फ़िल्मी सिलसिला शुरू हो गया. लेकिन वो साफ़ तौर पर कहती हैं कि एक उत्तर भारतीय होने के नाते हिंदी फ़िल्में उनकी पहली पसंद हैं. वो कहती हैं मैंने दक्षिण भारतीय फ़िल्मों में काम करना छोड़ दिया है. क्योंकि जब मुझे हिंदी फ़िल्मों के प्रस्ताव मिल रहे हैं तो मैं वो फ़िल्में क्यों करूं जिनमें मैं कंफ़र्टेबल महसूस ना करती हूं. अब मैं सिर्फ़ बॉलीवुड में ही फ़ोकस करना चाहती हूं. गैंग ऑफ़ घोस्ट्स के बाद मीरा विक्रम भट्ट की एक फ़िल्म में काम कर रही हैं. |
| DATE: 2014-03-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1102] TITLE: मर्दों में नहीं है औरतों जितना दम: बेनेगल |
| CONTENT: भारतीय सिनेमा के सबसे सफल निर्देशकों में से एक श्याम बेनेगल ने अपने फ़िल्मी करियर में महिलाओं की सशक्त भूमिका वाली कई फ़िल्में बनाई हैं. वह कहते हैं महिलाओं को केंद्र में रखकर फ़िल्में बनाने की वजह यही रही कि औरतें समाज की धुरी हैं. उनकी भूमिका बेहद अहम है. वे पूरे परिवार को जोड़कर रखती हैं क्योंकि उनके ज़िम्मे बहुत सारे रोल हैं- मां बेटीपत्नी और बहन. पुरुष को तो ये नहीं करना पड़ता. दरअसल पुरुष में इतनी ताक़त भी नहीं है. औरतें ज़्यादा सबल हैं इसी कारण वे ये सब कर पाती हैं. हालांकि बेनेगल ये भी जोड़ते हैं कि भारतीय समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया गया और इसीलिए फ़िल्मों की कहानियां अक्सर महिलाओं की स्थिति के इर्द-गिर्द बुनी जाती हैं. बेनेगल हिंदी सिनेमा में अकेले ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने भारत में मुसलमान महिलाओं को लेकर तीन फ़िल्मों की कड़ी बनाई है जिसमें मम्मो सरदारी बेग़म औऱ ज़ुबैदा शामिल हैं. बेनेगल ने तकरीबन 25 साल बाद टेलीविज़न पर वापसी की है संविधान नामक एक सीरीज़ के साथ. यही नहीं उन्होंने 1962 में पहला वृत्तचित्र बनाया था लेकिन पहली फ़ीचर फ़िल्म बनाने में उन्हें 14 साल लग गए क्योंकि पैसे नहीं मिल रहे थे. इस बीच हार ना मानने के सवाल पर बेनेगल बहुत सफ़ाई से कहते हैं पैसे के लिए अपना स्तर नीचे गिराने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. पैसा तो सब चाहते हैं लेकिन एक बार अगर आपने अपना स्तर नीचे कर लिया तो फिर उसका कुछ नहीं हो सकता. उनके अनुसार आप दोबारा ऊपर नहीं जा सकते. समझौता बहुत ही ख़तरनाक होता है. शुरू से समझौता कर लिया तो फिर कुछ सही नहीं होता है. 1973 में आई अपनी पहली फ़िल्म अंकुर से ही बेनेगल ने अपनी एक अलग पहचान बनाई और एक नए सिनेमा का चेहरा बन गए. इस फ़िल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था. पिछले कुछ समय से बेनेगल एक नई फ़िल्म चमकी चमेली पर काम शुरू करना चाह रहे हैं लेकिन अब तक ये हो नहीं पाया. इसकी वजह पूछने पर वह कहते हैं फ़ाइनेंस को लेकर दिक़्क़त आ रही है. दिक़्क़त और श्याम बेनेगल जैसे नाम को ये सुनना थोड़ा अजीब लगता है पर सच है. बेनेगल बताते हैं दिक़्क़त सबको आती ही है निर्माता ढूंढ़ने में. निर्देशक के सामने सीधी चुनौती होती है कि वो जो कहानी कहना चाहता है उसके लिए बाज़ार है या नहीं और यहीं से पैदा होती है पैसे की चुनौती. देखते हैं अगर पैसा मिल गया तो मैं करूंगा काम. श्याम बेनेगल की नई टीवी सीरीज़ संविधान में भारत में सन 1946 से 1950 के बीच की घटनाओं का जि़क्र है. यही वो दौर था जब निर्माण हुआ था भारत के संविधान का और भारत गणतंत्र बना था. |
| DATE: 2014-03-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1103] TITLE: आमिर ख़ान ने मानहानि की शिकायत दर्ज कराई |
| CONTENT: अभिनेता आमिर ख़ान ने मुंबई पुलिस से शिकायत की है कि कुछ सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उनके ख़िलाफ़ मुहिम चलाई जा रही है जिसका मक़सद उनकी छवि ख़राब करना है. आमिर ख़ान ने इस मामले में मुद्दों पर आधारित अपने कार्यक्रम सत्यमेव जयते का भी ज़िक्र किया है. उनका कहना है कि इस कार्यक्रम के ख़िलाफ़ भी दुष्प्रचार किया जा रहा है. आमिर ख़ान की शिकायत पर पुलिस ने मामले की शुरुआती जांच-पड़ताल आरंभ कर दी है. मुंबई में मौजूद बीबीसी संवाददाता मधु पाल का कहना है कि आमिर ख़ान इस सिलसिले में आठ मार्च को मुंबई पुलिस आयुक्त राकेश मारिया और संयुक्त आयुक्त कानून-व्यवस्था सदानंद दाते से मिले थे. मुंबई पुलिस प्रवक्ता महेश पाटिल ने बीबीसी को बताया है कि इस मामले की पड़ताल का ज़िम्मा क्राइम ब्रांच की साइबर सेल को सौंपा गया है. आमिर ख़ान ने अपने फ़ेसबुक एकांउट पर जारी संदेश में कहा है व्हाट्सएप फ़ेसबुक ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया नेटवर्क्स के ज़रिये दुष्प्रचार किया जा रहा है कि सत्यमेव जयते सीज़न 2 में लोगों से मस्जिद निर्माण में मदद और मुसलमान युवकों की सहायता के लिए डोनेशन मांगा जा रहा है. इन आरोपों के जबाव में आमिर ख़ान ने कहा है जो डोनेशन मांगा जा रहा है उसका इस्तेमाल ज़रूरतमंदों के लिए होता है जिसमें मज़हब का कोई सवाल नहीं होता है. |
| DATE: 2014-03-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1104] TITLE: हीरोइन बनने के लिए फूंक-फूंक कर क़दम' |
| CONTENT: भले ही बॉलीवुड को पुरुष प्रधान इंडस्ट्री कहा जाता हो लेकिन टीवी पर औरतों का दबदबा है. फ़िल्म में एक बड़े सितारे की मौजूदगी उसे हिट करा सकती है तो टीवी पर सास-बहू की खिट-पिट सीरियल की टीआरपी बढ़ा सकती है. लेकिन टीवी के पर्दे तक पहुंचने के लिए इन महिला कलाकारों को कितना संघर्ष करना पड़ता है चलिए जानने की कोशिश करते हैं. मैंने इसके लिए कम से कम छह कलाकारों से बात की लेकिन चार ने तो कभी शूटिंग में व्यस्त रहने की बात करके तो कभी बीमार होने की बात कहके मुझे वक़्त नहीं दिया. फिर भी मेरी बात दो कलाकारों से हुई जिन्होंने अपने सफ़र के बारे में विस्तार से बात की. चंडीगढ़ से अपने अभिनय के सपनों को पूरा करने आई सलीना प्रकाश को पहला ब्रेक तो आसानी से मिल गया लेकिन उसके बाद कुछ समय तक उनके पास कोई काम नहीं था. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने बताया मुझे आज से चार साल पहले जब सीरियल शकुंतला में काम करने का मौक़ा मिला तो मैं बहुत ख़ुश हुई. मुझे मां का रोल ऑफ़र हुआ और मैंने सोचा कि एक कलाकार को हर तरह का रोल करना चाहिए. ये सोचकर मैंने वो प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. लेकिन मेरा पहला रोल ही मेरे लिए मुसीबत बन गया. सलीना बताती हैं कि उसके बाद वो जहां भी काम मांगने जातीं तो उन्हें जवाब मिलता कि शो में मां का रोल नहीं है. सलीना के मुताबिक़ टीवी पर कलाकार टाइपकास्ट बहुत जल्दी हो जाते हैं और उन पर एक लेवल लगा दिया जाता है. सलीना एड फ़िल्म्स करके अपना ख़र्च चलाती रहीं लेकिन सीरियल में काम ना करने की वजह से वो अवसाद की शिकार हो गईं. उन्होंने कहा मेरे लिए बड़ा तक़लीफ़देह समय रहा. मेरे बॉयफ़्रेंड से मेरा अलगाव हो गया. पैसों की कमी होने लगी. घर से पैसे नहीं मंगा सकती थी क्योंकि उन्हें मेरी हालत का पता चलता तो वो मुझे घर बुला लेते. सलीना ने हिम्मत नहीं छोड़ी. कई ऑडिशन देने के बाद उन्हें एक घर बनाऊंगा नाम के डेली सोप में एक निगेटिव रोल मिला. वो कहती हैं वैसे मेरा शो शाम साढ़े छह बजे जैसे अटपटे समय में आता है लेकिन चलो कम से कम एक मौक़ा तो मिला. मुंबई में ही पली बढ़ी इशिता शर्मा बचपन से ही मॉडलिंग करती रहीं और एड फ़िल्म्स में दिखती रही हैं. इशिता का करियर बतौर फ़िल्म अभिनेत्री शुरु हुआ. उन्होंने फ़िल्म दिल दोस्ती एटसेट्रा में अहम रोल निभाया था. जल्द ही इशिता की शादी हो गई और उनकी प्राथमिकता बदल गई. अब वो टीवी पर ही दिखती हैं. इशिता ने कहा टीवी भी तो कलाकारों के लिए एक माध्यम है. लेकिन पता नहीं क्यों लोग टीवी और फ़िल्म कलाकारों के बीच भेदभाव करते हैं. इशिता ने आख़िरी बार डांस इंडिया डांस नाम का शो होस्ट किया था. फ़िलहाल वो आराम कर रही हैं. क्या रोल पाने के लिए किसी कलाकार को समझौते भी करने पड़ते हैं. इसके जवाब में इशिता कहती हैं अगर आपका रुख़ साफ़ है और आप मज़बूत हो तो कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता. जब तक आप घुटने नहीं टेकोगे तो कोई समझौता नहीं करना पड़ेगा. सामने वाले को लगेगा कि आप वल्नरेबल हो तो वो आपका फ़ायदा ज़रूर उठाना चाहेगा. राखी सावंत से मिलना एक चुनौती है. लेकिन एक बार वो मिलीं तो उन्होंने खुलकर बातें कीं. अपने संघर्ष को याद करते हुए राखी ने बताया मुझे फ़िल्म और टीवी इंडस्ट्री के बारे में पांच पैसे की अक़्ल नहीं थी. मैंने दर दर की ठोकरे खाईं पर अपने सपने को पूरा किया. मेरे पिताजी पुलिस में हैं जो हमेशा चाहते थे कि मैं भी पुलिस में जाऊं या नेता बनूं पर मैंने कलाकार बनने का सोच लिया था. आइटम गर्ल और विवादों की रानी कहलाने वाली राखी कहती हैं मैंने टीवी पर सात साल राज किया है. जिस तरह के शो मैंने अपने करियर की शुरुआत में किए वैसे आमिर ख़ान और कपिल शर्मा जैसे लोग अब कर रहे हैं. राखी आगे कहती हैं बेशक मुझे इस मुक़ाम पर आने के लिए एक्सपोज़ करना पड़ा हो कम कपड़े पहनने पड़े हों लेकिन मैंने कोई अश्लील हरकत नहीं की. मैं जो चाहती थी वो हासिल किया. ये थी मुंबई से टीवी पर अभिनय करने वाले कलाकारों के संघर्ष की कहानियां. जिन्होंने संघर्ष किया और भले ही अपने क्षेत्र में चोटी का ना छुआ हो लेकिन काफ़ी हद तक अपने लिए एक पहचान बनाई. |
| DATE: 2014-03-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1105] TITLE: फ़िल्म समीक्षा: गुलाब गैंग |
| CONTENT: सहारा मूवी स्टूडियोज़ भरत शाह और बनारस मीडिया वर्क्स की गुलाब गैंग एक सामाजिक कार्यकर्ता रज्जो माधुरी दीक्षित की कहानी है जो एक गांव में रहती है और गुलाब गैंग नाम के औरतों के एक दल की मुखिया है. ये गैंग सताई हुई औरतों की मदद करता है और महिलाओं पर अत्याचार करने वाले पुरुषों की डंडों से पिटाई करती हैं. पढ़ी लिखी रज्जो गांव के बच्चों को भी पढ़ाती है और गांव में स्कूल खोलने का सपना देखती है. सुमित्रा देवी जूही चावला एक कपटी राजनेता है जो अपनी कुर्सी के लिए कुछ भी कर सकती है. गांव में रज्जो की लोकप्रियता को देखकर सुमित्रा देवी रज्जो की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाती हैं. पर रज्जो इस दोस्ती के प्रस्ताव को ठुकरा देती है और सुमित्रा देवी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने का फ़ैसला करती है. सुमित्रा देवी हर मुमकिन कोशिश करती है कि रज्जो हार जा क्या सुमित्रा देवी रज्जो को हरा पाती हैं या नहीं यही है फ़िल्म की कहानी. निर्देशक सौमिक सेन ने गुलाब गैंग में औरतों को काफ़ी बहादुर और निर्भय दिखाया है पर इस फ़िल्म का ड्रामा बहुत ही थका हुआ और ऊबाऊ है. रज्जो और सुमित्रा देवी के आमने-सामने के कुछ सीन अच्छे हैं लेकिन बाकी फ़िल्म बड़ी बोझिल सी है. रज्जो को फ़िल्म में जिस तरह से एक्शन करते और गुंडों को पीटते दिखाया गया है वो वास्तविक लगने के बजाय हास्यास्पद लगता है. सुमित्रा देवी जूही चावला को बहुत निर्दयी दिखाया गया है जो शायद जूही के प्रशंसकों के गले ना उतरे. फ़िल्म में माधुरी और जूही द्वारा इस्तेमाल की गई अभद्र भाषा भी दर्शकों को बिलकुल नही पसंद आएगी क्योंकि दोनों ही अभिनेत्रियां अब तक साफ़ सुथरे और पारिवारिक रोल्स के लिए जानी जाती हैं. माधुरी दीक्षित ने रज्जो का किरदार बखूबी निभाया है. उनके एक्शन सीन्स भले ही वास्तविक ना लगें लेकिन इन दृश्यों में उनके हावभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. जूही चावला ने सुमित्रा देवी के नकारात्मक किरदार को अच्छे से निभाया है. सौमिक सेन का निर्देशन इस फ़िल्म के ड्रामे की ही तरह बिलकुल बेजान है. हां फ़िल्म के कुछ संवादसौमिक सेन और अमितोष नागपाल ज़रूर तालियों के हक़दार हैं कुल मिलाकर गुलाब गैंग एक थकी हुई उबाऊ फ़िल्म है जो किसी भी तरह का मनोरंजन देने में असमर्थ है. |
| DATE: 2014-03-08 |
| LABEL: entertainment |
| [1106] TITLE: क्यों नहीं होगी आमिर की 'पीके' जून में रिलीज़? |
| CONTENT: राजकुमार हिरानी निर्देशित और आमिर ख़ान अभिनीत फ़िल्म पीके जून नहीं बल्कि दिसंबर में रिलीज़ होगी. ख़बरें थीं कि आमिर के अपने टीवी शो सत्यमेव जयते में व्यस्त होने की वजह से फ़िल्म की रिलीज़ टाल दी गई है. मुंबई में एक समारोह में मौजूद फ़िल्म के निर्देशक राजकुमार हिरानी ने फ़िल्म की रिलीज़ में देरी की असल वजह बताई. उन्होंने कहा दरअसल क्रिसमस पर आमिर की फ़िल्में बहुत अच्छा करती हैं. उनके लिए लकी रहा है क्रिसमस. त्यौहार का सीज़न रहता है. और जून मेरे लिए थोड़ा टाइट हो रहा था. तो हमने मिल-जुलकर क्रिसमस का टाइम निर्धारित किया. राजकुमार हिरानी और आमिर ख़ान की जुगलबंदी वाली फ़िल्म 3 इडियट्स साल 2009 के क्रिसमस पर ही रिलीज़ हुई थी और इसने धूम मचा दी थी. 3 इडियट्स ने भारत के अलावा विदेशों में भी ज़बरदस्त कमाई की थी और फ़िल्म को आलोचकों की ओर से भी काफी सराहना मिली थी. इसी वजह से इनकी फ़िल्म पीके का बेसब्री से इंतज़ार हो रहा है. फ़िल्म में संजय दत्त की भी अहम भूमिका है. इस बारे में राजकुमार हिरानी ने बताया फ़िल्म में संजय दत्त वाला हिस्सा उनके जेल जाने से पहले ही शूट कर लिया गया था. इसलिए इस बारे में हमें कोई दिक़्क़त नहीं हुई. ये फ़िल्म एक पॉलिटिकल सैटायर राजनीतिक कटाक्ष है जिसमें अनुष्का शर्मा और सुशांत सिंह राजपूत के भी अहम रोल हैं. राजकुमार हिरानी मेलबर्न फ़िल्म फ़ेस्टिवल के सिलसिले में आयोजित एक प्रेस वार्ता में मौजूद थे. इस फ़ेस्टिवल में चुनिंदा भारतीय फ़िल्में दिखाई जाती हैं. समारोह इसी साल मई में आयोजित होगा. इसी समारोह में उनके साथ अभिनेत्री विद्या बालन भी मौजूद थीं. विद्या ने इस मौक़े पर हंसते हुए कहा कि वो दिन दूर नहीं जब ऑस्कर भी उनकी पकड़ में होगा. उन्होंने कहा मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे कभी पद्मश्री जैसा बड़ा सम्मान मिलेगा. लेकिन वो मिल गया. उसी तरह से मैंने सोचा नहीं कि ऑस्कर कभी मिलेगा. तो हो सकता है कि ऑस्कर भी कभी पहुंच में हो. विद्या बालन की फ़िल्म शादी के साइड इफ़ेक्ट्स पिछले शुक्रवार को रिलीज़ हुई और इसे मिली-जुली प्रतिक्रिया मिल रही है. |
| DATE: 2014-03-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1107] TITLE: फ़िल्म रिव्यू: आपके दिलों पर राज कर पाएगी 'क्वीन'? |
| CONTENT: वायाकॉम 18 मोशन और फैंटम फ़िल्म्स की क्वीन कहानी है रानी कंगना रनाउत की जिसे उसका होने वाला पति शादी से कुछ दिन पहले ही धोखा दे देता है. विजय राजकुमार राव रानी से बहुत प्यार करता है और जहाँ भी वो जाती है उसके पीछे पीछे पहुंच जाता है. दोनों के परिवार शादी के लिए राज़ी हो गए. शादी की तैयारियां अभी चल ही रही थीं कि विजय रानी से कहता है कि वह उससे शादी नहीं कर सकता. रानी इससे गहरे सदमे में चली जाती है लेकिन फिर वह ठान लेती है कि अकेले ही हनीमून पर जाएगी. वह पेरिस और एम्सटर्डम के लिए निकल जाती है. पेरिस में उसकी मुलाक़ात होती है विजय लक्ष्मी लिसा हेडन से जो उसे मौज-मस्ती के साथ ज़िंदगी बिताने की सलाह देती है. विजय का मन तब बदल जाता है जब उसके फ़ोन पर ग़लती से रानी एक फ़ोटो भेज देती है. उस फ़ोटो में रानी ने मॉडर्न कपड़े पहने होते हैं और वह पहले से कहीं ज़्यादा अलग लग रही थी. विजय एम्सटर्डम आकर उससे मिलता है और उससे माफ़ी मांगकर फिर से शादी करने के लिए कहता है. पर क्या रानी विजय को माफ़ कर देती है या फिर उसे कोई और मिल जाता है यही फ़िल्म की कहानी है. परवेज़ शेख़ चैताली परमार और विकास बहल की कहानी में कई बड़े मज़ेदार लम्हे तो हैं लेकिन स्क्रीनप्ले बीच में रानी और विजय की कहानी से हटकर रानी की विदेश यात्रा पर केंद्रित हो जाता है. कई जगह पर फ़िल्म के लेखकों ने कई चीज़ों को अच्छे से नहीं समझाया है जिससे दर्शक सोच में पड़ जाते हैं. जैसे विजय ने रानी से शादी करने से इनकार क्यों कर दिया जबकि वह उससे बेहद मोहब्बत करता था. इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि जब रानी विदेश में अपने आपसे रूबरू होती है तो काफ़ी मनोरंजक पल आते हैं पर वो भी इस फ़िल्म की बिखरी हुई कहानी की भरपाई नहीं कर पाते. कंगना रनाउत ने रानी के किरदार में बहुत कमाल का अभिनय किया है. एक कम आत्मविश्वास वाली लड़की का किरदार उन्होंने बखूबी निभाया है. इस किरदार को कंगना ने अपनी बॉडी लैंग्वेज और पहनावे से काफ़ी जीवंत कर दिया है. ये रोल कंगना को कई अवॉर्ड्स दिला सकता है. राजकुमार राव को हालांकि सीमित मौक़े मिले हैं लेकिन उनका अभिनय भी काफ़ी वास्तविक लगा. लिसा हेडन ने विजय लक्ष्मी के किरदार को बहुत अच्छी तरह निभाया है. विकास बहल का निर्देशन और बेहतर हो सकता था. वह फ़िल्म के बीच में इसकी असली कहानी से भटक गए. कुल मिलाकर क्वीन कंगना के बेहतरीन अभिनय के लिए जानी जाएगी. |
| DATE: 2014-03-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1108] TITLE: सनी लियोनी को क्यों रोका गया? |
| CONTENT: अपनी फ़िल्म रागिनी एमएमएस-2 को प्रमोट करने सनी लियोनी इन दिनों भारत भर में घूम रही हैं. लेकिन मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में उन्हें आने की अनुमति नहीं मिली. दरअसल फ़िल्म को प्रमोट करने सनी लियोनी को इंदौर के एक मॉल में जाना था. लेकिन कथित तौर पर एक हिंदूवादी संगठन ने धमकी दी कि वो सनी को इंदौर में नहीं आने देंगे और अगर वो मॉल में जाती हैं तो तोड़-फोड़ करेंगे. सुरक्षा के मद्देनज़र मॉल के अधिकारियों ने सनी लियोनी को प्रवेश की इजाज़त नहीं दी और इसी वजह से वो इंदौर नहीं जा पाईं. कंगना रानाउत की फ़िल्म क्वीन को देखकर रणबीर कपूर बेहद प्रभावित हैं. उन्होंने फ़िल्म की ख़ास स्क्रीनिंग के मौक़े पर इसे देखने के बाद क्वीन जैसा ही रोल करने की चाहत जताई. रणबीर ने लीड रोल में कंगना की भी बहुत तारीफ़ की. इसके अलावा हुमा क़ुरैशी और ऋचा चड्ढा ने भी फ़िल्म की काफ़ी तारीफ़ की. सोनाक्षी सिन्हा ने कहा कि कंगना ने कमाल की अदाकारी की है. क्वीन के निर्माता अनुराग कश्यप और निर्देशक विकास बहल हैं. फ़िल्म शुक्रवार सात मार्च को रिलीज़ हुई. रोहित शेट्टी की आने वाली फ़िल्म सिंघम-2 में अजय देवगन को अपने सिक्स पैक ऐब्स की नुमाइश करनी है. इसके लिए उन्हें अपना वज़न कम करना होगा. अजय देवगन इसमें कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते और ख़बरों के मुताबिक़ उन्होंने विदेश से एक 15 लाख रुपए की विशेष मशीन मंगवाई है जिससे वो अपना वज़न कम करेंगे और शरीर को दुरुस्त करेंगे. इससे पहले इसी मशीन का इस्तेमाल अभिषेक बच्चन भी कर चुके हैं. |
| DATE: 2014-03-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1109] TITLE: ढाई सौ से ज़्यादा ऑडिशन. और एक रोल |
| CONTENT: भारत की वित्तीय राजधानी कहलाने वाला मुंबई घर है भारत की सबसे बड़ी टीवी और फिल्म इंडस्ट्री का. जिसे भी बचपन से जवानी तक फ़िल्मों का कीड़ा काटा उसने मुंबई का रास्ता नापा. ये शहर हर उस इंसान को न्योता देता है जो फ़िल्मो में या अभिनय में कुछ करने की मंशा रखता है. पर ये जितना आसान लगता है उतना है नहीं. मुंबई में कुछ ऐसे टीवी अभिनेताओं से मिलकर ये बात और भी साफ़ हो गई जिन्होंने कड़ी मेहनत कर इस इंडस्ट्री में अपने पैर जमाए. इस रिपोर्ट के लिए चुने गए तीन अभिनेताओं के स्ट्रगल की कहानी में कुछ ना कुछ विशेष है. शुरू करते है शशांक व्यास उर्फ़ जग्या की कहानी से. रोज़ रात 8 बजे और रात 11 बजे कलर्स चैनल पर आने वाला बालिका-वधू एक समय पर भारतीय टीवी का नंबर एक प्रोग्राम था. धारावाहिक बालिका वधू का मुख्य पात्र है जगदीश भैरों सिंह जिसे प्यार से जग्या बुलाया जाता है. जग्या का रोल निभाने वाले शशांक व्यास उज्जैन के रहने वाले है जो आज से पांच साल पहले मुंबई आए थे. बचपन से नाटक और स्टेज का शौक़ रखने वाले जग्या ने आते ही मुंबई में अनुपम खेर के स्कूल में एक्टिंग का कोर्स शुरु किया. कोर्स के ख़त्म होने पर शुरु हुई शशांक की असली लड़ाई मुंबई से काम की तलाश. शशांक बताते है इस शहर ने मुझे असली सीख दी जीना सिखा दिया मैं बस में सुबह ऑडिशन देने के लिए चमचमाता हुआ घर से निकलता था और ऑडिशन के टाइम मेरी बैटरी डाउन हो जाती थी मैं थक जाता था. सुबह शाम यहां से वहां भाग-भाग के ऑडिशन देता था- कुछ हाथ नहीं आता था. मैंने कुल मिलकर 275 से ज़्यादा ऑडिशन दिए और सभी में मैं फ़ेल. इतने ऑडिशंस देने के बाद आख़िरकार एक दिन क़िस्मत का सिक्का चल निकला. शशांक कहते हैं एक दिन अचानक से एक कॉल आया जिसने मेरी ज़िन्दगी बदल दी. मेरी तस्वीरें वहां तक कैसे पहुंची मुझे नहीं पता मैं लगातार एक ही प्रोडक्शन हाउस के चक्कर लगा रहा था. एक दिन पूछ लिया कि भाई क्यों बुला रहे हो मुझे काम दोगे भी. तो उन्होंने मुझे बोला कि तुम्हें बालिका वधू के लीड रोल के लिए लिया जा रहा है. ये सुनकर मैं नर्वस हो गया. पर आज मैं एक इतने बड़े टीवी धारावाहिक का हिस्सा हूँ ये मेरे लिए बड़ी बात है. शशांक व्यास बालिका -वधू के 1000 एपिसोड कर चुके है. रोज़ाना 14-15 घंटो की उनकी शूट रहती है और सिर्फ़ रविवार को छुट्टी मिलती है. मेरी मुलाकात शशांक से एक कॉफ़ी शॉप में हुई जहाँ मुंबई की बसों में घूमने वाला लड़का अब एक बड़ी आलीशान गाड़ी में मुझसे मिलने आया. आज भी जब अभिषेक अवस्थी का नाम आता है तो राखी सावंत की सूरत साथ दिखती है. काफ़ी समय तक अभिषेक की पहचान राखी सावंत के पुरूष मित्र के तौर पर ही रही पर अब वो राखी से अलग एक व्यस्त और सुखद जीवन बिता रहे है. लाइफ़ ओके का धारावाहिक कैसा ये इश्क है में अभिषेक एक अहम भूमिका में नज़र आ रहे है. कानपुर से मुंबई 14 साल पहले आए अभिषेक को ये सीरियल डेढ़ साल के इंतज़ार के बाद मिला. बिना काम के ख़ाली बैठने के अपने अनुभव को किसी स्ट्रगल से कम नहीं बताने वाले अभिषेक कहते हैं मेरा पिछला एक डेढ़ साल सबसे बुरा बीता मेरे पैसे ख़त्म हो गये थे और मुझे अपनी एफ़ डी तोडनी पड़ी. मुझे कोई काम नहीं दे रहा था. हताश अभिषेक से मैंने पूछा कि क्या ये उनकी इमेज की वजह से था इस पर अभिषेक ने कहा हो भी सकता है मेरे जीवन का सबसे बड़ा स्ट्रगल फ़िल्मी दुनिया में नहीं बल्कि राखी सावंत के चक्कर से निकलने में लगा है. मैंने उस रिश्ते में सब कुछ दिया और ये जानते हुए भी कि कौन ठीक है और कौन ग़लत मैंने दोस्ती निभाई पर अब मैं ख़ुश हूँ कि मैं अब उसके साथ नहीं हूँ. अभिषेक अवस्थी टीवी पर पहली बार एक सिने-स्टार खोजने वाले शो में दिखे थे. इस शो को जीतने वाले को फिल्म का कॉन्ट्रैक्ट मिलना था. अभिषेक इस शो में दूसरे स्थान पर रहे. अभिषेक कहते हैं उस शो के बाद लोग मुझे जानने लगे पर काम मिलना मुश्किल था मेरा पहला ब्रेक रिएलिटी शो नच बलिये था. अपने स्ट्रगल के दिनों को याद करते हुए अभिषेक बोले ऑडिशन देता था बात फ़ाइनल होती थी पर आगे कुछ नहीं होता था पर मैंने कभी हार नहीं मानी. अब मैं उन बातों से आगे बढ़ चुका हूँ. अपने मौजूदा शो से मैं बड़ा ख़ुश हूँ बेशक लीड रोल नहीं. मैं इस धारावाहिक का सलमान ख़ान हूँ. अभिषेक अवस्थी से मेरी मुलाक़ात उनके घर में हुई जहाँ उनके साथ उनके दो कुत्ते माफिया और लैला रहते हैं और साथ एक बिल्ली भी है. टीवी की दुनिया में अब किकु को हर कोई जानता है. कभी ये एक थानेदार के रूप में तो कभी पलक की वेश भूषा में दिखते हैं. किकु मुंबई के ही रहने वाले हैं जिन्हें कलाकार बनने के लिए ज़्यादा मशक़्क़त नहीं करनी पड़ी. मारवाड़ी व्यापारी खानदान से ताल्लुक़ रखने वाले किकु ने कभी सोचा नहीं था की वो अभिनय करेंगे क्योंकि उनके परिवार में ऐसा किसी ने नहीं किया था. उन्होंने एम बी ए किया और अपने पिता के साथ व्यापार में लग गए. आज अभिनय और टीवी की दुनिया में किकु को 11 साल हो गए है. अपने स्ट्रगल को स्ट्रगल ना कहते हुए किकु कहते हैं मुझे ज़्यादा स्ट्रगल करने की ज़रूरत नहीं पड़ी ना मैंने ऑडिशन दिए. मेरे दोस्त शक्ति सागर रामांनद सागर के पोते ने मुझे कॉलेज में ड्रामा और स्टेज सँभालते हुए कई बार देखा था. तो एक दिन वो मुझे बोला कि हम हातिम पर शो बन रहा है तू करेगा. मैंने शौकिया तौर पर हाँ कह दिया और वो मुझे बड़ौदा इस टीवी शो की शूटिंग पर ले गया. बस वहीं से मेरा करियर भी शुरू हो गया. किकु कहते हैं मैं कभी खाली नहीं बैठा काफ़ी व्यस्त रहा और मेरे पास काम आता रहा. मैंने कुछ ज़्यादा स्ट्रगल भी नहीं किया. अगर काम ना भी हो तो मेरे परिवार से मुझे पूरा सपोर्ट रहेगा. अभिनय को सबसे बढ़िया काम बताते हुए किकु कहते है 9 से 5 की जॉब में पैसा तो है पर पहचान नहीं टीवी कलाकार बनकर आज मेरी कुछ पहचान तो है. मैं कॉमेडी करता हूँ कैमरे के पीछे करता हूँ आगे करता हूँ और खूब मज़े से जी रहा हूँ. टीवी इंडस्ट्री में स्ट्रगल करने की हर हीरो या हीरोइन की अपनी कहानी है. ये कहानियां थी कुछ लड़कों की और अगली कड़ी में बातें लड़कियों के संघर्ष की. |
| DATE: 2014-03-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1110] TITLE: 'गुलाब गैंग' की रिलीज़ पर से रोक हटी |
| CONTENT: दिल्ली हाईकोर्ट ने माधुरी दीक्षित और जूही चावला की फ़िल्म गुलाब गैंग की रिलीज़ पर लगी रोक को हटा दिया है. अब फ़िल्म अपने तय समय और तय दिन यानी शुक्रवार सात मार्च को ही रिलीज़ हो रही है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ कोर्ट ने फ़िल्म के निर्माता अनुभव सिन्हा की विशेष याचिका पर ये फ़ैसला सुनाया. बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट की एक सदस्यीय बेंच ने रोक लगाने का फ़ैसला किया था लेकिन इसके ख़िलाफ़ फ़िल्म निर्माता डिविजन बेंच के सामने ये मामला ले गए थे. अब रोक हटने के बाद फ़िल्म की टीम ने आनन-फ़ानन में मीडिया के लिए गुरुवार देर शाम एक प्रेस शो का भी आयोजन किया है. इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने ही बुधवार को पूरे भारत में फ़िल्म की रिलीज़ पर रोक लगा दी थी. अदालत ने बुंदेलखंड की चर्चित गुलाबी गैंग की नेता संपत पाल की याचिका पर ये फ़ैसला सुनाया था. दरअसल संपत ने दावा किया था फ़िल्म उनकी निजी ज़िंदगी पर आधारित है और निर्माता अनुभव सिन्हा और निर्देशक सौमिक सेन ने इसके लिए उनसे कोई अनुमति नहीं ली. संपत ने तो ये भी दावा किया था कि वो फ़िल्म की रिलीज़ रुकवाने के लिए हर संभव कोशिश करेंगी और भूख हड़ताल करने से भी परहेज़ नहीं करेंगी. फ़िल्म की रिलीज़ पर रोक हटने से निर्माता के साथ-साथ फ़िल्म के वितरकों ने भी राहत की सांस ली. क्योंकि फ़िल्म का बड़े पैमाने पर प्रचार प्रसार किया जा चुका था और रिलीज़ रुकने से उन्हें काफ़ी घाटे की आशंका थी. गुलाब गैंग में माधुरी दीक्षित की मुख्य भूमिका है और जूही चावला का इसमें नकारात्मक किरदार है. ये पहला मौक़ा नहीं है जब किसी फ़िल्म की रिलीज़ से ठीक पहले ही वो मुश्किल में फंस गई हो. पिछले साल के आख़िर में संजय लीला भंसाली की फ़िल्म रामलीला पर भी रिलीज़ के चंद रोज़ पहले ही एक याचिका के बाद रोक लगाई गई थी जिसके बाद संजय लीला भंसाली को फ़िल्म का नाम बदलकर गोलियों की रासलीला राम-लीला करना पड़ा था. इसी तरह से अनुराग कश्यप की फ़िल्म गैंग्स ऑफ़ वासेपुर और आशुतोष गोवरीकर की फ़िल्म जोधा-अकबर भी कानूनी पेचीदिगियों में उलझने के बाद ही रिलीज़ हो पाई थीं. |
| DATE: 2014-03-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1111] TITLE: बदले-बदले से भूत नज़र आते हैं |
| CONTENT: वीराना दो गज़ ज़मीन के नीचे और तहख़ाना कुछ ऐसी हॉरर फ़िल्में हैं जिनका नाम सुनकर आज भी लोगों को डर लगता है. इन फ़िल्मों के भूत शायद अब भी आपको रात में बत्ती जलाकर सोने पर मजबूर कर सकते हैं. एक ज़माना था जब भूतिया फ़िल्म देखने से पहले ही डर का माहौल बन जाया करता था. सफ़ेद लिबास में लिपटा मोमबत्ती हाथ में लिए इधर से उधर घूमता भूत डर पैदा करता संगीत और चीख़ें डराने के लिए काफ़ी थीं. मुँह से टपकता ख़ून सफ़ेद आँखें 360 डिग्री पर घूमता हुआ सिर और भयानक चेहरे वाले भूत हॉरर फ़िल्मों में आम थे. लेकिन अब वो तरीक़े कारगर नहीं रह गए हैं. इस बात का सुबूत हैं वो फ़िल्में जिनमें भूत तो हैं लेकिन डराने के लिए नहीं हंसाने के लिए. पिछले कुछ सालों में ऐसी फ़िल्में आ रही हैं जिनमें भूतों का कुछ बदला हुआ रूप नज़र आ रहा है. मगर 21वीं सदी में भूतिया फ़िल्मों का नज़ारा बदल चुका है. हॉरर फ़िल्मों ने अब एक नई राह पकड़ ली है और इन्हें नया नाम दिया गया है घोस्ट कॉमेडी. इस सूची में कुछ नाम हैं भूल भुलैया भूतनाथ और भूतनाथ रिटर्न्स. और अब इस कड़ी में फ़िल्म गैंग ऑफ़ घोस्ट्स भी जुड़ गई है. गैंग ऑफ़ घोस्ट्स के निर्देशक सतीश कौशिक ने दावा किया है कि ये भारत की पहली घोस्ट कॉमेडी है. उनका कहना है कि इस फ़िल्म में 10-11 भूत हैं और इससे पहले इतने सारे भूत किसी एक हिन्दी फ़िल्म में कभी नहीं आए हैं. इस फ़िल्म में भूतों की दुनिया काफ़ी असली है और ये भूत समुद्र के किनारे पार्टी करने भी जाते हैं. निर्माता-निर्देशक विक्रम भट्ट ने राज़ 1920 और हॉरर स्टोरी जैसी फ़िल्में बनाकर भूतों का आधुनिकीकरण किया है. विक्रम भट्ट के मुताबिक लोग हँसना पसंद करते हैं रोना पसंद करते हैं लेकिन लोग थोड़ा बहुत डरना भी पसंद करते हैं. उनका कहना है कि दर्शकों के लिए हॉरर फ़िल्म एकअम्यूज़मेंट पार्क की तरह है और लोगों को डरने में मज़ा आता है. विक्रम भट्ट इस बात को मानते हैं कि जो डरना चाहेगा वो हॉरर फ़िल्म देखने ज़रूर जाएगा. राम गोपल वर्मा के निर्देशन में बनी फ़िल्म फूंक में मधु का किरदार निभाने वाली नायिका अश्विनी कल्सेकर का कहना है कि घोस्ट कॉमेडी हॉरर नहीं एक फैमिली ड्रामा है. अश्विनी को लगता है कि अगर भूतनाथ जैसी फ़िल्में घोस्ट कॉमेडी हैं तो रागिनी एमएमएस एक रूमानी हॉरर है. उन्हें ख़ुद हॉरर फ़िल्मों से डर लगता है और अश्विनी मानती हैं कि इतना पैसा खर्च करके फ़िल्म देखने जाने का मक्सद दिमाग को आराम देना होता है डरना नहीं. सोचने वाली बात ये है कि अब डराने वाले भूतों का क्या होगा. क्या लोग अब भी इन्हें देखना चाहते हैं. 80 और 90 के दशक में भूतिया फ़िल्में बनाने में रामसे ब्रदर्स का बोल बाला था. इन्होंने होटल पुराना मंदिर बंद दरवाज़ा जैसी फ़िल्मों का निर्देशन किया था. इस निर्माता-निर्देशक जोड़ी के श्याम रामसे का कहना है कि भूतिया फ़िल्में युवा पीढ़ी को सबसे ज़्यादा पसंद आती हैं. उनका कहना है कि पुरानी हॉरर फ़िल्मों में भूतों का जैसा मेक-अप किया जाता था अब वो लोगों को नकली लगता है. श्याम रामसे कहते हैं कि हॉरर फ़िल्मों का भूत अब काफ़ी बदल गया है और उसे आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके बनाया जाता है. मेक-अप करके भूत बनाने का चलन अब लगभग ख़त्म हो चुका है. श्याम रामसे मानते हैं कि फ़िल्म के हर रूप की अपनी ख़ूबसूरती है और जो लोग ज़्यादा डराने वाली फ़िल्में नहीं देख सकतेवो हंसाने वाली भूतों को देखने जाते हैं. दर्शक हॉरर के भी हैं और हॉरर कॉमे़डी के भी. बॉलीवुड के भूत अब अपना डराने का काम छोड़कर हँसाने लगे हैं तो कॉमेडी फ़िल्में और कॉमेडियन्स का क्या होगा. अभी तक नहीं सोचा था तो अब सोचना शुरू कर दो. |
| DATE: 2014-03-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1112] TITLE: अनुष्का और दीपिका पर गर्व: सोनम कपूर |
| CONTENT: बॉलीवुड एक पुरुष प्रधान इंडस्ट्री है आम तौर पर ये धारणा है. लेकिन अभिनेत्री सोनम कपूर इससे कतई इत्तेफ़ाक़ नहीं रखती. आमिर ख़ान शाहरुख़ ख़ान और सलमान ख़ान जैसे बड़े सितारों को किसी फ़िल्म के हिट होने का जो क्रेडिट मिलता है जिस स्तर पर उन्हें पैसा दिया जाता है वो टॉप की हीरोइन को क्यों नहीं मिलता. जब सोनम कपूर से ये सवाल पूछा गया तो वो बोलीं ग़लत बात है. आज दीपिका और अनुष्का जैसी हीरोइन प्रॉफ़िट शेयर करती हैं. दोनों शानदार काम कर रही हैं. और भी हीरोइन हैं जो उस स्तर तक पहुंच चुकी हैं. सोनम ने आगे कहा हालांकि मैं उस स्तर तक नहीं पहुंची हूं लेकिन उनके लिए मैं बहुत ख़ुश हूं. वो सच में बड़ी स्टार हैं. बॉलीवुड वाकई बदलाव के दौर से गुज़र रहा है. सोनम कपूर की आने वाली फ़िल्म है बेवकूफ़ियां जिसमें वो आयुष्मान खुराना के साथ हैं. उन्होंने कहा बेवकूफ़ियां की निर्देशक संपादक से लेकर ज़्यादातर क्रू मेंबर महिलाएं हैं. ये एक स्वागत योग्य बदलाव है. पहले ऐसा नहीं होता था. राजनीति में भी तो अब ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएं आने लगी हैं. आलोचक चाहे भले ही बॉलीवुड पर ज़्यादा महिला प्रधान फ़िल्में ना बनाने के आरोप लगाएं लेकिन सोनम ये बातें नहीं मानतीं. वो कहती हैं मौजूदा दौर में लड़कियों के लिए अच्छे रोल लिखे जा रहे हैं. मुझे भी जो रोल मिल रहे हैं मैं उनसे बहुत ख़ुश हूं. बेवकूफ़ियां में सोनम के बिकिनी पहनने की ख़ासी चर्चा है. उनके पिता अनिल कपूर की इस पर क्या प्रतिक्रिया रही. सोनम ने जवाब दिया मेरे पिता कलाकार हैं और खुले विचारों के हैं. उन्होंने इस बारे में मुझे कुछ नहीं कहा. उन्होंने ये ज़रूर कहा कि मेरी फ़िल्म को अच्छी ओपनिंग मिलेगी. सोनम ने ये भी दावा किया कि फ़िल्म में टू-पीस बिकिनी पहनने को लेकर वो बड़ी सहज रहीं और ये आइडिया उन्हीं का था. बेवकूफ़ियां यशराज बैनर की फ़िल्म है. इसमें ऋषि कपूर की भी अहम भूमिका है. उन्होंने सोनम के पिता का रोल अदा किया है. इसकी निर्देशक नूपुर अस्थाना हैं. फ़िल्म 14 मार्च को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2014-03-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1113] TITLE: 'गुलाब गैंग' पर रोक लगी |
| CONTENT: दिल्ली हाईकोर्ट ने माधुरी दीक्षित और जूही चावला की फ़िल्म गुलाब गैंग की पूरे भारत में रिलीज़ पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है. फ़िल्म इसी शुक्रवार सात मार्च को रिलीज़ होनी थी. अदालत ने बुंदेलखंड की चर्चित गुलाबी गैंग की नेता संपत पाल की याचिका पर ये फ़ैसला सुनाया. संपत ने दावा किया है कि फ़िल्म उनकी ज़िंदगी पर आधारित है और इसके लिए फ़िल्मकार ने उनसे कोई अनुमति नहीं ली है. जबकि फ़िल्म से जुड़े लोग लगातार दावा करते रहे हैं कि संपत की ये बात ग़लत है और फ़िल्म उनकी ज़िंदगी पर कतई आधारित नहीं है. दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद जब बीबीसी ने गुलाब गैंग के निर्माता अनुभव सिन्हा से और निर्देशक सौमिक सेन से बात करनी चाही तो उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया. ये पहला मौक़ा नहीं है जब किसी फ़िल्म की रिलीज़ से ठीक पहले ही वो मुश्किल में फंस गई हो. पिछले साल के आख़िर में संजय लीला भंसाली की फ़िल्म रामलीला पर भी रिलीज़ के चंद रोज़ पहले ही एक याचिका के बाद रोक लगाई गई थी जिसके बाद संजय लीला भंसाली को फ़िल्म का नाम बदलकर गोलियों की रासलीला राम-लीला करना पड़ा था. इसी तरह से अनुराग कश्यप की फ़िल्म गैंग्स ऑफ़ वासेपुर और आशुतोष गोवरीकर की फ़िल्म जोधा-अकबर भी कानूनी पेचीदिगियों में उलझने के बाद ही रिलीज़ हो पाई थीं. |
| DATE: 2014-03-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1114] TITLE: ऐश्वर्या राय को वज़न कम करने की हिदायत |
| CONTENT: अभिनेत्री ऐश्वर्या राय बच्चन मां बनने के बाद से फ़िल्मों में नज़र नहीं आई हैं. हालांकि उनके पास फ़िल्मों के कई प्रस्ताव हैं. एड गुरू प्रह्लाद कक्कड़ भी अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या को लेकर एक फ़िल्म बनाना चाहते हैं लेकिन वो चाहते हैं कि पहले ऐश्वर्या अपना वज़न कम करें. फ़िल्म की कहानी दक्षिण अफ़्रीक़ा में सेट है और इसमें ऐश्वर्या राय को एक 21 साल की लड़की का रोल अदा करना है. प्रह्लाद मानते हैं कि उन्हें फ़िल्म बनाने की जल्दी नहीं है और वो इसे तभी बनाना शुरू करेंगे जब ऐश्वर्या अपना वज़न कम कर लेंगीं. मुंबई में अभिनेता सनी देओल अपने दफ़्तर के नीचे एक कैफ़े खोलना चाहते हैं. दरअसल ये जगह बेहद प्राइम लोकेशन पर है और इसे ख़रीदने के लिए सनी के पास कई लोग अपने प्रस्ताव भेज रहे हैं लेकिन सनी इसमें अपने मेहमानों और दफ़्तर के कर्मचारियों के लिए एक कैफ़े खोलना चाहते हैं. इसमें वो एक थिएटर भी खोलना चाहते हैं और एक डबिंग स्टूडियो खोलने की भी उनकी योजना है. अनुभव सिन्हा की फ़िल्म गुलाब गैंग पर एक केस दायर किया गया है. चर्चित गुलाबी गैंग की नेता संपत पाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में केस दायर किया है. उनका कहना है कि फ़िल्म उनकी निजी ज़िंदगी पर आधारित है और इसके लिए फ़िल्मकार ने उनसे कोई अनुमति नहीं ली है. फ़िल्म इसी सप्ताह रिलीज़ होनी है और ऐशे में अगर अदालत का फ़ैसला इसके ख़िलाफ़ गया तो फ़िल्म की रिलीज़ खटाई में पड़ सकती है. इसमें माधुरी दीक्षित और जूही चावला की अहम भूमिका है. फ़िल्म से जुड़े लोगों का कहना है कि संपत का ये आरोप बिलकुल ग़लत है और फ़िल्म का उनकी निजी ज़िंदगी से कोई लेना-देना नहीं है. |
| DATE: 2014-03-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1115] TITLE: मिलिए उन पुरुषों से जो कामयाब 'औरतें' हैं |
| CONTENT: बड़ी पुरानी कहावत है कि हर एक कामयाब मर्द के पीछे एक औरत का हाथ होता है. लेकिन हम आज आपको मिलवा रहे हैं कुछ ऐसे पुरुषों से जिनकी कामयाबी औरत होने में ही है या यूं कहें कि औरत बनकर ये लोकप्रियता के झंडे गाड़ रहे हैं. टीवी के शौक़ीन दर्शकों में आज ऐसा कौन होगा जो गुत्थी पलक और पम्मी प्यारेलाल जैसे नामों से अनजान हो. इन किरदारों को जी रहे कलाकार सुनील ग्रोवर किक्कू और गौरव गेरा से जानते हैं इनके इस सफ़र की दास्तां. टीवी शो मैड इन इंडिया में चुटकी बनने वाले सुनील ग्रोवर कॉमेडी नाइट्स विद कपिल में गुत्थी बनकर लोगों के दिलों में छा चुके हैं. सुनील कहते हैं मैंने जब से औरत का किरदार निभाना शुरू किया है तब से मैं उन्हें और बेहतर तरीक़े से समझने लगा हूं. महिलाएं सिर्फ़ सम्मान की हक़दार हैं और उन्हें सिर्फ़ वही मिलना चाहिए. मेरी कोशिश यही है कि मेरे शो में भी औरतों के सम्मान को किसी तरह की ठेस ना पहुंचे और उनकी भावनाएं आहत ना हों. कॉमेडी नाइट्स विद कपिल में पलक का किरदार निभाने वाले कॉमेडियन किक्कू कहते हैं औरतों को कभी भी उनके रंग उनके नैन-नक्श और वेशभूषा के आधार पर नहीं आंकना चाहिए. अब पलक का ही किरदार लीजिए. वो देखने में बेहद मोटी ज़रूर है लेकिन लोगों का भरपूर मनोरंजन करती है. सबको ख़ुश रखती है जो ज़्यादा अहम है. अभिनेता गौरव गेरा मानते हैं कि टीवी पर अभिनेताओं की तुलना में अभिनेत्रियों का काम ज़्यादा चुनौतीपूर्ण होता है. गौरव गेरा ने टेलीविज़न पर मिस पम्मी प्यारेलाल का किरदार निभाकर वाहवाही बटोरी. वो कहते हैं जब मैं पम्मी का किरदार निभा रहा था तब मुझे ये एहसास हुआ कि अभिनेत्रियों को कितना कुछ करना पड़ता है. शूटिंग के दौरान काफ़ी तकलीफ़ झेलनी पड़ती है. कभी सैंडल्स काट रहे हैं तो कभी हील्स की वजह से टांगें दर्द कर रही हैं. आंखों पर आई लैशेस हैं तो आंखें खुल नहीं रहीं हैं उसके बावजूद सही हावभाव लाकर अभिनय करना पड़ता है. 12 से लेकर 15 घंटे तक की शिफ़्ट करनी पड़ती है. मैं तो सच में सभी महिला कलाकारों का क़ायल हो गया. महिला किरदार निभाने वाले इन पुरुष कलाकारों को क्या टाइपकास्ट होने का ख़तरा नहीं होता क्या उन्हें बार-बार इसी तरह के रोल ऑफ़र नहीं होते. इसके जवाब में पलक उर्फ़ किक्कू ने कहा शुरुआत में मुझे भी डर लग रहा था लेकिन फिर हम उसी शो में लच्छा नाम का एक पुरुष किरदार भी लाए जो मैं ही निभाता हूं. उसके बाद पलक की मां भी शो में आई. वो भी मैं ही निभाता हूं. तो इससे टाइपकास्ट होने का ख़तरा थोड़ा कम हो गया. वहीं चुटकी का किरदार निभाने वाले सुनील ग्रोवर टाइपकास्ट होने के सवाल पर कहते हैं मैं पहले भी कई ऐसे किरदार कर चुका हूं. जैसे रेडियो पर सुड जिसे सुनकर मेरे दोस्त बोलते थे कि यार तू ज़िंदगी भर के लिए सुड ही मत बन जाना. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. फिर मैंने एक साइलेंट शो भी किया. और अब ये चुटकी आई. तो मैं बस इसे एन्जॉय कर रहा हूं और कुछ नहीं सोच रहा हूं. अभिनेता शेखर सुमन टीवी पर कई कॉमेडी शो जज कर चुके हैं. शेखर सुमन सहित कई और विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे पर्दे पर पुरुष कलाकारों के महिला बनने का ट्रेंड अब बहुत ज़्यादा हो गया है और लोग जल्द ही इनसे बोर होने लगेंगे. लेकिन फ़िलहाल इन कलाकारों को ये डर नहीं सता रहा है और इन्हें महिला बनकर मिलने वाली कामयाबी से रत्ती भर भी परहेज़ नहीं है. |
| DATE: 2014-03-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1116] TITLE: सबसे महंगी दीपिका पादुकोण ! |
| CONTENT: क्या दीपिका पादुकोण बॉलीवुड की सबसे महंगी हीरोइन बन गई हैं. मुंबई मनोरजंन जगत की ख़बरों की मानें तो इसका जवाब है हां. हाल ही में दीपिका ने एक शीतल पेय कंपनी के साथ एक साल के लिए विज्ञापन का करार किया और इसके लिए उन्हें कथित तौर पर छह करोड़ रुपए की भारी भरकम रकम दी गई. इससे पहले किसी हीरोइन को विज्ञापन के लिए इतनी रकम कभी नहीं दी गई. दीपिका ने ऐसा करके प्रियंका चोपड़ा कटरीना कैफ़ और ऐश्वर्या राय बच्चन तक को पीछे छोड़ दिया जो एक विज्ञापन के लिए पांच से साढ़े पांच करोड़ रुपए तक लेती हैं. शाहरुख़ ख़ान के हिस्से में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे बाज़ीगर डर चक दे इंडिया कुछ-कुछ होता है और चेन्नई एक्सप्रेस जैसी बेहद हिट और यादगार फ़िल्में दर्ज हैं. लेकिन जब उनसे उनकी पसंदीदा फ़िल्में पूछी गईं तो उन्होंने इनमें से एक का भी नाम नहीं लिया. मुंबई में एक उत्पाद के प्रमोशनल इवेंट में पहुंचे शाहरुख़ ने पसंदीदा फ़िल्मों के नाम पर अपनी फ़्लॉप फ़िल्में गिनाईं. उन्होंने कहा मुझे रा. वन पहेली और फिर भी दिल है हिंदुस्तानी सबसे ज़्यादा पसंद हैं क्योंकि मां-बाप को अपना कमज़ोर बच्चा सबसे ज़्यादा लाडला होता है. इस साल शाहरुख़ ख़ान फ़राह ख़ान निर्देशित हैप्पी न्यू ईयर में नज़र आएँगे. सुभाष घई की 1983 की सुपरहिट फ़िल्म हीरो के रीमेक में तिग्मांशु धूलिया वो रोल करेंगे जो मूल फ़िल्म में शम्मी कपूर ने निभाया था. शम्मी ने फ़िल्म में हीरोइन मीनाक्षी शेषाद्रि के पिता को रोल निभाया था. रीमेक में हीरोइन अथैया शेट्टी के पिता बनेंगे. अथैया अभिनेता सुनील शेट्टी की बेटी हैं. फ़िल्म के हीरो हैं सूरज पंचोली जो आदित्य पंचोली के बेटे हैं. इसका निर्देशन कर रहे हैं निखिल आडवाणी. |
| DATE: 2014-03-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1117] TITLE: यूट्यूब से मिला नाम, पैसा और शोहरत |
| CONTENT: फ़ेसबुक और ट्विटर के अलावा इंटरनेट पर यूट्यूब एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है जो रोज़ाना इस्तेमाल किया जाता है. यूट्यूब पर अलग-अलग विषयों पर कई करोड़ वीडियो हैं. आप मनोरंजन से लेकर न्यूज़ और संगीत से लेकर टीवी प्रोग्राम सब यूट्यूब पर देख सकते हैं. लेकिन अब यूट्यूब का इस्तेमाल अपना हुनर दिखाने के लिए भी किया जा रहा है. भारत और विदेश में कई ऐसे लोग हैं जो अपना पेट अपने हुनर से पालते हैं. इन लोगों को आम बोल चाल की भाषा में यूट्यूबर्स कहा जाता है. ये वो लोग हैं जो सिर्फ़ यूट्यूब के लिए ओरिजिनल वीडियो बनाते हैं और उसे यूट्यूब पर अपलोड कर शोहरत और हिट्स पाते हैं. बीबीसी ने मुंबई में ऐसे ही कुछ यूट्यूबर्स से मुलाक़ात की जिन्होंने यूट्यूब के ज़रिए पैसा नाम और शोहरत कमाया. यूट्यूब के चैनल 88 कीज़ टू यूफ़ोरिया को डेढ़ करोड़ से भी ज़्यादा बार देखा जा चुका है. इस चैनल के संचालक आकाश गांधी हैं जो भारतीय मूल के अमरीकी हैं. आकाश अपने इस यूट्यूब चैनल पर बॉलीवुड की धुनें पियानो पर बजाकर गानों को एक नया रूप देते हैं. इस चैनल का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जोनिता गांधी. जोनिता और आकाश का कोई रिश्ता नहीं है. जोनिता कनाडा में पली बड़ी गायिका हैं और उन्हें बॉलीवुड गीत गाना पसंद है. जोनिता ने आकाश के यूट्यूब चैनल के लिए कई गाने गए है. जोनिता की आवाज़ यूट्यूब के ज़रिए संगीतकार एआर रहमान के कानों में पड़ी. थोड़े समय बाद एआर रहमान फ़िल्म हाइवे के लिए आवाज़ ढूंढ रहे थे जोनिता की आवाज़ उन्हें पसंद आई और उन्होंने जोनिता को तुरंत चेन्नई रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया. जोनिता ने बीबीसी को बताया यूट्यूब से रहमान तक पहुंच जाऊंगी ऐसा सोचा भी नहीं था. मैं रिकॉर्डिंग के समय कांप रही थी. मेरे गानों को बॉलीवुड के कई दिग्गजों ने यूट्यूब पर देखा और पसंद भी किया है. अमिताभ बच्चन ने भी मेरे गानों के लिंक ट्वीट किए हैं. एआर रहमान के लिए गाने के बाद जोनिता की झोली में अब बॉलीवुड के कई प्रोजेक्ट हैं. जोनिता और आकाश यूट्यूब पर गाने बनाने के अलावा प्राइवेट संगीत कार्यक्रम भी करते हैं. देहरादून के एक मध्यवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी श्रद्धा शर्मा एक यूट्यूब स्टार हैं. 18 साल की श्रद्धा को गाने का शौक़ बचपन से ही था. इस शौक़ की वजह से उन्होंने कई टीवी रियलिटी शो में हिस्सा लिया. कभी पहले राउंड से तो कभी दूसरे राउंड से बाहर निकलने के बाद भी श्रद्धा ने कभी हार नहीं मानी. अपने घर में एक वीडियो रिकॉर्डर पर गाने गाकर श्रद्धा ने यूट्यूब पर अपलोड करना शुरू किया. अब श्रद्धा के यूट्यूब चैनल पर एक करोड़ से ज़्यादा हिट्स हैं और हाथ में यूनिवर्सल म्यूज़िक का कॉन्ट्रैक्ट. श्रद्धा बताती हैं मैंने यूट्यूब पर बस मज़े-मज़े में वीडियो डालने शुरू किए वो कैसे रातोंरात इतने लोकप्रिय हुए मुझे नहीं पता. बेशक मुझे रिएलिटी शो में हिस्सा लेने का मौक़ा न मिला हो लेकिन असलियत यही है कि मैंने अपने गायिका बनने के ख़्वाब को जी लिया है. संगीतकार लेज़्ली लेविस ने अपने संगीत से श्रद्धा शर्मा की एल्बम रस्ते को सजाया है. कनाडा में जन्मी भारतीय पंजाबी लिल्ली सिंह यानी सुपरवुमन की यूट्यूब पर बहुत बड़ी फ़ैन फॉलोविंग है. लिल्ली के यूट्यूब चैनल पर क़रीब 20 करोड़ हिट हैं. लिल्ली अपने चैनल पर रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर व्यंग्यात्मक वीडियो डालती हैं. शाहरुख़ ख़ान और बॉलीवुड की फ़ैन लिल्ली को हाल ही में माधुरी दीक्षित के साथ फ़िल्म गुलाब गंग का प्रमोशन करने का अवसर मिला. इसके अलावा लिल्ली पंजाबी और अंग्रेज़ी में रैप भी करती हैं. उन्हें पंजाबी गायक जस्सी सिद्धू के गीत हिपशेकर में रैप करने का मौक़ा भी यूट्यूब पर बढ़ती लोकप्रियता की वजह से मिला. भारत में सुपरवूमन के कई करोड़ फ़ैन हैं ख़़ास तौर पर 11 से 20 साल के लड़के-लड़की. बीते शनिवार को मुंबई में भारत और विदेश से आए कई यूट्यूबर्स को एक मंच पर अपने प्रशंसकों से मिलने का मौक़ा मिला. ये समारोह था यूट्यूब द्वारा आयोजित भारत का पहला यूट्यूब फ़ैन फ़ेस्ट. इस फ़ेस्ट में शाहरुख़ ख़ान भी अपने बच्चों के साथ पहुंचे. शाहरुख़ ने कहा यूट्यूब एक बेहतरीन प्लेटफ़ॉर्म है अब आपको स्ट्रगल करने की ज़रूरत नहीं है. आप अपने कमरे से ही सुपरस्टार बन सकते हैं. |
| DATE: 2014-03-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1118] TITLE: हॉलीवुड और बॉलीवुड: सितारों की 'बदसलूकियां' |
| CONTENT: हाल ही में अमरीकी गायिका और संगीतकार केटी पेरी ने मिलान फ़ैशन वीक के दौरान वहां मौजूद तमाम लोगों के सामने एक अभद्र शब्द का इस्तेमाल किया. दरअसल केटी पेरी को इस शो में डिज़ाइनर जर्मी स्कॉट के कलेक्शन को स्टेज पर पेश करना था लेकिन केटी पूरे एक घंटे देर से इस समारोह में पहुंचीं. इस पर वहां मौजूद लोगों के सब्र का बांध टूट गया. जैसे ही केटी रैंप पर सज-धज कर कैटवॉक के लिए पहुंचीं लोगों ने उनकी हूटिंग शुरू कर दी. इस पर केटी भी ग़ुस्से में आ गईं और उन्होंने लोगों की तरफ़ इशारा करते हुए एक बेहद अभद्र शब्द का इस्तेमाल किया. ये पहला मौक़ा नहीं है जब किसी मशहूर हस्ती ने सार्वजनिक तौर पर ऐसी आपत्तिजनक हरकत की हो. मशहूर पॉप गायक जस्टिन बीबर पर तो ऐसे आरोपों की लंबी फ़हरिस्त है. इसी साल कनाडा के टोरंटो शहर में उन पर एक लिमोज़िन कार के ड्राइवर के साथ बदतमीज़ी और मारपीट का आरोप लगा था. उससे एक सप्ताह पहले मयामी में उन पर नशे की हालत में गाड़ी चलाने का आरोप लगा था. इसके अलावा उन पर एक नाइट क्लब में बाउंसर्स के साथ बदतमीज़ी के आरोप भी लग चुके हैं. मशहूर हॉलीवुड अभिनेत्री लिंडसे लोहान पर इस तरह के कई आरोप लग चुके हैं. उन पर शराब पीकर गाड़ी चलाने से लेकर जूलरी शोरूम में चोरी जैसे आरोप भी लग चुके हैं. इसके लिए उन्हें कई बार रिहैबिलिटेशन सेंटर भी भेजा गया. मशहूर ब्रितानी मॉडल नाओमी कैंपबैल पर एक विमान यात्रा के दौरान दो पुलिस अधिकारियों के साथ मारपीट करने और गाली गलौच के आरोप लगे थे. उनके घर पर काम करने वाली एक महिला कर्मचारी ने भी उन पर एक दफ़ा मारपीट का आरोप लगाया था. सार्वजनिक तौर पर बदतमीज़ी के आरोपों के मामले में बॉलीवुड भी पीछे नहीं है. साल 2008 में अभिनेता गोविंदा पर एक फ़िल्म की शूटिंग के दौरान उनके एक प्रशंसक ने चांटा मारने का आरोप लगाया था. हालांकि गोविंदा ने इन आरोपों का पुरज़ोर खंडन किया था और कहा था कि उनका वो प्रशंसक उनकी को-स्टार के साथ उनके अनुसार बेहूदगी से पेश आ रहा था. उसी तरह से साल 2011 में एक एनआरआई डॉक्टर ने एक विमान यात्रा के दौरान अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा पर बदतमीज़ी करने का आरोप लगाया था. डॉक्टर का कहना था कि प्रियंका विमान के उड़ान भरने के दौरान फ़ोन पर बात कर रही थीं. जब उन्होंने प्रियंका से ऐसा ना करने के लिए कहा तो प्रियंका उन पर भड़क गईं और गंदी भाषा का इस्तेमाल किया. हालांकि प्रियंका ने न सिर्फ़ इस पूरे वाक़ये का खंडन किया बल्कि डॉक्टर पर ही बदसलूकी का आरोप लगाते हुए कहा कि वो बिना उनकी अनुमति के अपने मोबाइल कैमरे से उन्हें शूट कर रहे थे. अभिनेता शाहरुख़ ख़ान का एक आईपीएल मैच के दौरान वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों से झगड़ा भला किसे याद नहीं. आईपीएल-2012 में मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में एक मैच के बाद जब शाहरुख़ ख़ान अपने कुछ दोस्तों के साथ मैदान में घुस रहे थे तो वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोका. वीडियो फ़ुटेज में देखा गया कि शाहरुख़ और सुरक्षाकर्मियों के बीच तीखी तकरार हो रही है और दोनों तरफ़ से आरोप प्रत्यारोपों की बौछार हो रही है. इस घटना के बाद शाहरुख़ ख़ान के वानखेड़े स्टेडियम में प्रवेश करने पर पांच साल का प्रतिबंध लगा दिया गया था. अभिनेता सैफ़ अली ख़ान पर भी साल 2012 में एक रेस्त्रां में एक एनआरआई ने मारपीट का आरोप लगाया था जिसके बाद सैफ़ के ख़िलाफ़ पुलिस ने मुक़दमा दर्ज कर चार्जशीट भी दायर की थी. |
| DATE: 2014-03-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1119] TITLE: सत्यमेव जयते: सीज़न नया, सवाल पुराना |
| CONTENT: रविवार बेफ़िक्री से भरा दिन होता है. ना बच्चों के स्कूल की चिंता ना आफ़िस जाने का टेंशन. हां कुछ बिन बुलाए मेहमानों के आ जाने का डर ज़रूर बना रहता है. आमिर ख़ान यही कहते हुए दोबारा नज़र आ रहे हैं इंडियन टेलीविज़न स्क्रीन पर. सत्यमेव जयते के दूसरे सीज़न की शुरूआत 2 मार्च से हो चुकी है. पहले संस्करण की ज़बरदस्त सफलता के बाद दूसरे सीज़न का आना तो निश्चित था ही लेकिन ध्यान देने वाली बात ये थी कि पिछली बार की तरह इस बार ये शो लोगों में उतना लोकप्रिय होता है या नहीं. इस कार्यक्रम ने पिछली बार कई महत्वपूर्ण मुद्दों को छुआ और एक बहस को जन्म भी दिया लेकिन आमिर को विरोध और आलोचना भी झेलनी पड़ी. आलोचकों ने कहा कि ये कार्यक्रम एक तरफ़ा ढंग से मुद्दों को पेश करता है. इस बार के कार्यक्रम में कितना दम है इस सवाल के जवाब में जानी-मानी फ़िल्म अभिनेत्री और वर्तमान में एक टैलेंट शो में निर्णायक की भूमिका में दिखने वाली किरण खेर कहती हैं कि इस शो में जान नहीं है. किरण का मानना है कि एक चैट शो में जब तक टकराव नहीं होगा तो उसमें मज़ा नहीं आएगा. अगर आप दर्शकों को बांध नहीं पा रहे हैं तो शो बोरियत भरा हो जाता है. शो एकतरफ़ा नज़र आता है. किरण अपना तर्क रखते हुए कहती हैं कि अगर आप यह कहते हैं कि हमारे देश में खाप प्रथा नहीं होनी चाहिए तो आपको उन लोगों को भी बुलाना चाहिए जो कहते हैं कि खाप प्रथा होनी चाहिए. किरण तो यहां तक कहती हैं कि जब ये शो आता है तो वो सो जाती हैं क्योंकि ये बहुत उबाऊ है. हालांकि आमिर इस कार्यक्रम के प्रसारण से पहले प्रेस से बातचीत में साफ़ तौर पर कह चुके हैं कि उन्हें संतुलन बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है. आमिर कहते हैं हमारे सामने जो सच्चाई आती है हम वो रखते हैं. अगर बैलेंस करना ग़लत है तो हम उस चीज़ को नहीं बताते हैं. हो सकता है आप हमारी बात नहीं मानें. ठीक है मत मानिए. एक मुद्दे पर कितना संतुलन है हम ये नहीं सोचते. इस कार्यक्रम को लेकर एक सवाल ये भी रहा है कि क्या रविवार की सुबह इस कार्यक्रम के लिए सही समय है. हफ़्ते भर के बाद आई इस छुट्टी के दिन लोग भारी-भरकम मुद्दों पर होने वाली चर्चा में शायद हिस्सा ना लेना चाहें. पिछली बार का अनुभव शायद इस शक़ के लिए कोई मज़बूत आधार नहीं देता लेकिन इस पर प्रतिक्रिया मिली-जुली है. टीवी शो दिया और बाती की संध्या कहती हैं कि हमारे देश के नौजवानों को इस तरह के कार्यक्रमों की ज़रूरत है. हर रविवार को पूरे परिवार के साथ ये शो देखना चाहिए ताकि वे इस पर बातचीत कर सकें. इसके विपरीत टीवी अभिनेता शरद मल्होत्रा का कहना है कि रविवार के दिन वो बिल्कुल तनावमुक्त रहना चाहते हैं. शरद का मानना है वो वक्त गया जब हम सबके परिवार इकट्ठे होकर महाभारत और रामायण देखते थे. नौजवान लोग अब शनिवार की पार्टी के बाद इतवार को देर से सोकर उठते हैं तो इस बात का ध्यान रखते हुए अगर इस कार्यक्रम के वक़्त में थोड़ा बदलाव किया जाएगा तो शायद और ज़्यादा दर्शक इससे जुड़ पाएंगे. आमिर ख़ान का नाम किसी कार्यक्रम के साथ जुड़ना ही उसकी तरफ़ लोगों को खींचने के लिए काफ़ी है. लेकिन जिस तरह की प्रतिक्रिया सत्यमेव जयते को मिली उसके चलते ये सवाल भी उठा कि क्या कार्यक्रम को ज़रूरत से ज़्यादा पब्लिसिटी मिल रही है. टीवी प्रडयूसर सुधीर शर्मा कहते हैं कोई भी जब बदलाव लाने की कोशिश करता है तो उसे समस्याओं का सामना करना ही पड़ता है. वही आमिर के साथ भी हो रहा है. अभिनेता आरिफ़ ज़कारिया का मानना है शो के अंतर्गत जो वादे आमिर या कोई और कर रहा है उन्हें शो के बाहर निभाना बहुत बड़ी बात है. जाने-माने टीवी प्रोड्यूसर यश पटनायक का मानना है कि चैनल औऱ आमिर दोनों ने एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी का काम लिया है. ऐसे शो आने के बाद लोगों के अंदर जो परिवर्तन की लहर जाग गई है उसको तोड़ पाना मुश्किल है. |
| DATE: 2014-03-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1120] TITLE: ऑस्कर सेल्फ़ी का ट्विटर पर रिकॉर्ड |
| CONTENT: साल 2014 के ऑस्कर समारोह में होस्ट ऐलन डेजेनेरस द्वारा पोस्ट की गई सेल्फ़ी ट्विटर पर सबसे ज़्यादा री-ट्वीट होने वाली तस्वीर बन गई है. इसे पोस्ट किए जाने के बाद कुछ देर के लिए माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर क्रैश कर गई. सेल्फ़ी उस तस्वीर को कहते हैं जो ख़ुद ही खींची गई हो. इस तस्वीर में ऐलन डेजेनेरस के अलावा हॉलीवुड के कई मशहूर सितारे देखे जा सकते हैं. इनमें जेनिफ़र लॉरेंस ब्रैड पिट एंजलीना जोली ब्रैडली कूपर जूलिया रॉबर्ट्स मेरिल स्ट्रीप केविन स्पेसी और सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री का अवॉर्ड जीतने वाली लुपिटा न्योंगो शामिल हैं. डेजेनेरस की इस सेल्फ़ी को सबसे ज़्यादा री-ट्वीट का पिछला रिकॉर्ड तोड़ने में 40 मिनट से भी कम समय लगा. इससे पहले सबसे ज़्यादा री-ट्वीट होने वाली तस्वीर का रिकॉर्ड अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा के नाम था जो साल 2012 में ओबामा के दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने के बाद पोस्ट की गई थी. ऑस्कर समारोह ख़त्म होने तक ये सेलेब्रिटी सेल्फ़ी 20 लाख से ज़्यादा बार री-ट्वीट हो चुकी थी. तस्वीर खींचने के बाद ऐलन डेजेनेरस ने ऑस्कर देख रहे एक अरब लोगों से इसे इतिहास में सबसे ज़्यादा री-ट्वीट होने वाली तस्वीर बनाने के लिए कहा और एक घंटे से कम समय में ये लक्ष्य पूरा भी हो गया. डेजेनेरस ने मज़ाक भरे स्वर में कहा हमने ट्विटर क्रैश कर दिया. फ़िल्म ट्वेल्व इयर्स ए स्लेव में अमरीकी राज्य लुइज़ियाना के एक कपास के खेत पर काम करने वाली एक युवा ग़ुलाम पैट्सी का किरदार करने वाली कीनियाई अभिनेत्री लुपिटा न्योंगो भी ट्विटर पर छाई रहीं. उन्हें इस भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री का अवॉर्ड मिला जबकि इस फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का ऑस्कर मिला है. समारोह शुरू होने से पहले से ही अपनी पोशाक और बालों में लगे हेडबैंड के लिए न्योंगो लंदन से लेकर नैरोबी और लॉस एंजेलेस सभी जगह ट्विटर पर ट्रेंड कर रही थीं. ट्विटर पर सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हैशटैगों में से एक था जो न्योंगो के रेड कार्पेट पर आने के बाद ट्रेंड करना शुरू हो गया. इसकी वजह ये थी कि न्योंगो ने अपनी नीले रंग की पोशाक के लिए कहा कि ये रंग उन्हें नैरोबी की याद दिलाता है. ऑस्कर मिलने के बाद उनके धन्यवाद भाषण ने भी ट्विटर पर सुर्खियां बटोरीं. |
| DATE: 2014-03-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1121] TITLE: ऑस्कर्स में 'ग्रैविटी' का दबदबा |
| CONTENT: लॉस एंजलिस के डॉब्ली थिएटर में हुए भव्य ऑस्कर्स पुरस्कार समारोह में अंतरिक्ष की गहराइयों को तलाशती फ़िल्म ग्रैविटी और ऐतिहासिक फ़िल्म 12 ईयर्स ए स्लेव पुरस्कारों की फ़ेहरिस्त में सबसे ऊपर रहीं. 12 ईयर्स ए स्लेव को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार दिया गया. इसी फिल्म के लिए अभिनेत्री लुपिटा न्योंगो को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री चुना गया. इस ब्रितानी फ़िल्म के निर्देशक स्टीव मैक्क्वीन ने ये पुरस्कार उन लोगों को समर्पित किया जिन्होने ग़ुलामी की प्रथा को सहा है. उन्होने कहा सभी को हक़ है ना सिर्फ़ ज़िंदा रहने का बल्कि जिंदगी जीने का. ग्रैविटी के लिए अलफोंसो कारोन को बेहतरीन निर्देशक का पुरस्कार मिला. वो ऑस्कर जीतने वाले पहले लातिन अमरीकी निर्देशक हैं. ग्रेविटी को बेस्ट विज़्युल इफ़ेक्ट्स साउंड एडिटिंग और साउंड मिक्सिंग के लिए ऑस्कर मिले. तकनीकी वर्ग में दो अंतरिक्ष यात्रियों की कहानी थ्री डी फ़िल्म ग्रैविटी का दबदबा रहा. फ़िल्म को विज़्युल इफ़ेक्ट्स साउंड मिक्सिंग साउंड एडिटिंग सिनेमेटोग्राफ़ी फ़िल्म एडिटिंग वर्गों में कुल मिलाकर 6 ऑस्कर मिले हैं. इससे पहले जेरड लेटो को फ़िल्म डैलस बायर्स क्लब के लिए सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता वर्ग में ऑस्कर मिला है. ये उनका पहला ऑस्कर नामांकन था. लेटो को अवॉर्ड अभिनेत्री एन हैथवे ने दिया. कैथरिन मार्टिन को फ़िल्म द ग्रेट गैट्सबी के लिए कॉस्ट्यूम डिज़ाइन और प्रोडक्शन डिज़ाइन वर्गों में ऑस्कर से सम्मानित किया गया. इस फ़िल्म में अमिताभ बच्चन ने भी अभिनय किया है. डैलस बायर्स क्लब के लिए अभिनेता मैथ्यू मैक्कॉन्हे ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार हासिल किया. मेकअप और केश विन्यास के लिए डैलस बायर्स क्लब को दूसरा ऑस्कर मिला. ट्वेन्टी फ़ीट फ्रॉम स्टारडम को बेस्ट डॉक्यूमेंट्री फ़ीचर ऑस्कर अवॉर्ड मिला. ये फ़िल्म उन पुरुष और महिला गायकों के बारे में है जिन्होंने आज तक के कुछ सबसे मशहूर गानों में बैकअप गाया. ओरिजनल स्कोर वर्ग में स्टीवन प्राइस ने फ़िल्म ग्रैविटी के लिए ऑस्कर जीता. मौलिक गीत का ऑस्कर एनिमेटिड फ़िल्म फ़्रोज़न के गाने लेट इट गो के लिए क्रिस्टीन एंडरसन लोपेज़ और रॉबर्ट लोपेज़ के नाम रहा. विदेशी भाषा फ़िल्म वर्ग में इटली की फ़िल्म द ग्रेट ब्यूटी को ऑस्कर मिला. फ़िल्म का निर्देशन पाउलो सोरेन्टीनो ने किया है. इस साल के समारोह का संचालन अभिनेत्री ऐलन डजेनेरिस ने किया. इससे पहले उन्होंने 2007 में भी समारोह का संचालन किया था. कार्यक्रम के दौरान वे समारोह से जुड़ी तस्वीरें भी ट्वीट करती रहीं. साथ ही दर्शकों के बीच घूमते हुए उन्होंने कुछ सेल्फ़ी भी खींची. एक तस्वीर में मेरिल स्ट्रीप जूलिया रॉबर्ट्स जेनिफ़र लॉरेंस जेरड लेटो जैसे इस साल के नामांकित कलाकार भी शामिल थे. लुपिटा न्योंगो को ट्वेल्व इयर्स ए स्लेव के लिए सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री ऑस्कर मिला. अमेरिकन हसल और ग्रैविटी को 10-10 नॉमिनेशन ट्वेल्व ईयर्स ए स्लेव को नौ कैप्टन फिलिप्स डैलस बायर्स क्लब और नेब्रास्का को छह-छह और हर और द वुल्फ़ ऑफ़ वॉल स्ट्रीट को पांच-पांच नॉमिनेशन मिले. दो अंतरिक्ष यात्रियों की कहानी पर आधारित फ़िल्म ग्रैविटी के लिए सांड्रा बुलॉक को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री नामांकन मिला . ये उनका दूसरा ऑस्कर नामांकन था. इससे पहले उन्हें 2010 में द ब्लाइंड साइड के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का ऑस्कर मिला था. फ़िल्म अमेरिकन हसल के लिए जैनिफ़र लॉरेंस को सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री वर्ग में नामांकित किया गया . 2013 में उन्हें सिल्वर लाइनिंग्स प्लेबुक के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री ऑस्कर मिला था. |
| DATE: 2014-03-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1122] TITLE: सलमान ने कर दी कमिटमेंट, पर पूरी नहीं की |
| CONTENT: मैंने एक बार जो कमिटमेंट की तो फिर मैं ख़ुद की भी नहीं सुनता. सलमान ख़ान की फिल्म वांटेड का यह मशहूर डायलॉग लोगों की ज़ुबान पर तो बहुत चढ़ा लेकिन शायद सलमान की निजी ज़िंदगी पर यह लागू नहीं होता. बीते दिनों एक अस्पताल के उद्घाटन समारोह पर सलमान को पहुंचना था. सलमान ने आने की हामी तो भर दी पर कार्यक्रम के दिन प्रबंधक इंतज़ार करते रहे और सलमान नहीं पहुंचे. कॉस्मेटिक सर्जरी के लिए खोले गए इस हॉस्पिटल के प्रबंधकों ने सलमान ख़ान का तीन घंटे इंतज़ार किया. वहां काफ़ी मीडियाकर्मी भी जमा हुए और रोड पर सलमान को देखने के लिए उनके चाहने वालों ने भी भीड़ लगाई. हालांकि सबकी ख़्वाहिशें अधूरी ही रह गईं. ख़ास बात यह है कि सलमान इस कार्यक्रम से एक दिन पहले कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की एल्बम लॉन्च पर पहुचे थे. भारत से हॉलीवुड के लिए कोई नया चेहरा नहीं है इरफ़ान खान. स्लमडॉग मिलियनेयर लाइफ ऑफ़ पाई और स्पाइडरमैन के बाद इरफ़ान खान स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म जुरासिक पार्क में नज़र आएंगे. स्पीलबर्ग अपनी डायनासोर फ्रैंचाइज़ी का चौथा भाग लेकर आ रहे है जिसमें इरफ़ान जुरासिक पार्क के मालिक बनेंगे. इरफ़ान का किरदार फ़िल्म में नकारात्मक नहीं है. साल 1993 में पहली बार फ़िल्म जुरासिक पार्क पर्दे पर आई थी अब इसी कड़ी का चौथा भाग 2015 के जून महीने में आने की संभावना है. विद्या बालन और फ़रहान अख़्तर की जोड़ी वाली फ़िल्म शादी के साइड इफेक्ट्स को देखने वाले सबका यही कहना है की फ़िल्म का पहला हिस्सा काफ़ी तेज़ और मजेदार है पर इंटरवल के बाद फ़िल्म ठंडी और बिखर सी जाती है. फ़िल्म को दर्शकों और समीक्षकों से मिली जुली प्रतिक्रिया मिली है और बॉक्स ऑफिस पर भी फ़िल्म का यही हाल है. रिलीज़ के दो दिन में शादी के साइड इफेक्ट्स सिर्फ़ 13 करोड़ रुपए ही कमा पाई है. फ़िल्म का कारोबार शुक्रवार के मुक़ाबले शनिवार को बढ़ने की रिपोर्ट है. |
| DATE: 2014-03-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1123] TITLE: कैसे होता है ऑस्कर में फ़िल्मों का चुनाव? |
| CONTENT: भारतीय समय के मुताबिक सोमवार सुबह 86वें ऑस्कर अवॉर्ड की 24 श्रेणियों के विजेताओं की घोषणा कर दी जाएगी. दो ऑस्कर मतदाताओं ने हमें बताया कि उन्होंने किस तरह से सबसे बेहतरीन फ़िल्म का चुनाव किया. इनमें एक मतदाता ख़ुद फ़िल्म निर्देशक शामिल हैं तो दूसरे साउंड मिक्सर हैं जो ख़ुद ऑस्कर जीत चुके हैं. फ़़िल्म निर्देशक जैरी फ़्रीडमैन ऑस्कर देने वाली संस्था एकैडमी ऑफ़ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेस के सदस्य हैं. 14 फ़रवरी को अंतिम मतदान शुरू होने से पहले उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था अगले कुछ दिनों में मैं एक या दो दिन निकालकर सिर्फ़ फ़िल्में ही देखूंगा. फ़्रीडमैन की तरह ही छह हज़ार से ज़्यादा एकैडमी सदस्यों के पास पिछले कुछ महीनों से फ़िल्मों की डीवीडी की बाढ़ सी आ गई है. ये डीवीडी उन्हें एकैडमी और फ़िल्म निर्माताओं की ओर से भेजी जा रही हैं. इस साल 289 फ़िल्मों को ऑस्कर पुरस्कारों में भागीदारी के लिए पात्र पाया गया. इनमें से 50 से ज़्यादा फ़िल्मों को किसी ने किसी श्रेणी में नामांकन भी मिला. कुछ फ़िल्मों को केवल एक श्रेणी में नामांकन मिला है तो कुछ को कई श्रेणियों में. एनिमेटेड फ़ीचर फ़िल्म द विंड राइजेज को केवल एक श्रेणी में नामांकन मिला है तो ग्रेविटी को 10 और ट्वेल्व इयर्स अ स्लेव को नौ श्रेणियों में नामांकन मिला है. ग्लोरी और डासेंज़ विद द वूल्वस के लिए ऑस्कर जीतने वाले साउंड मिक्सर रसेल विलियम्स कहते हैं कि जिस श्रेणी की सभी नामांकित फ़िल्मों को उन्होंने नहीं देखा होगा उस श्रेणी के लिए वो वोट नहीं देंगे. विलियम्स कहते हैं हो सकता है कि वो फ़िल्म मेरे वोट की ज़्यादा हक़दार हो जिसे मैंने देखा ही न हो. फ़्रीडमैन और विलियम्स ने बीबीसी से बात की और बताया कि वे फ़िल्म का चुनाव करते वक़्त उसमें क्या देखते-सुनते हैं. एकैडमी के सदस्य होने के अपने फ़ायदे हैं. समूचे अमरीका के सिनेमा घरों में मुफ़्त प्रवेश मिलता है विशेष स्क्रीनिंग समारोह के निमंत्रण मुफ़्त डीवीडी और फ़िल्मों की स्क्रिप्ट भी सदस्यों को मिलती है. फ़्रीडमैन कहते हैं कि वो घर बैठे ही दर्ज़नों फ़िल्में देखते रहते हैं. वो सालभर उनके पास पहुंचती रहती हैं. वो कहते हैं नामांकन से पहले भी मैं सभी बड़ी फ़िल्मों को देख रहा होता हूं. आप किसी भी फ़िल्म का नाम लीजिए मैंने देखी ही होगी. एकैडमी का सदस्य बनने के लिए फ़िल्म कारोबार से विशिष्टता और गुणवत्ता के उच्च स्तर पर जुड़ा होना ज़रूरी है. लेखकों निर्माताओं और निर्देशकों के नाम कम से कम दो फ़िल्में और अभिनेताओं के नाम कम से कम तीन फ़िल्में होनी ज़रूरी हैं. प्रत्येक सदस्य सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए दस नामांकन तक भेज सकता है. अन्य अवॉर्डों के लिए एकैडमी की संबंधित श्रेणी से जुड़े लोग ही फ़िल्मों का नामांकन कर सकते हैं. उदाहरण के लिए कोई निर्देशक ही सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के अवॉर्ड के लिए किसी फ़िल्म का नामांकन कर सकता है. सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म को छोड़कर हर श्रेणी में पांच नामांकन होते हैं. सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए दस फ़िल्मों को नामांकन प्राप्त होता है. विलियम्स कहते हैं मैं एक यात्रा पर जाना चाहता हूँ मैं इस दुनिया के बारे में ज़्यादा जानना चाहता हूँ मैं किसी भी अन्य व्यक्ति की तरह चाहता हूँ कि फ़िल्म मुझे अपने आप से चिपका ले. वे कहते हैं अगर फ़िल्म को पहली बार देखते समय ही मेरा ध्यान इस बात पर जाने लगे कि निर्देशक ने ये कैसे किया साउंड में वो कैसे हुआ तो समझिए की वो फ़िल्म विफल हो गई. फ़्रीडमैन कहते हैं मैं गुणवत्ता और मौलिकता देखता हूं. मैं देखता हूं कि फ़िल्म भावनात्मक रूप से मुझसे कितना जुड़ पाती है. एक कलाकार के रूप में मुझे कितना प्रभावित करती है. वे कहते हैं कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं जिन्हें देखकर आप कह उठते हैं कि ये खेल को ही बदल कर रख देंगी. साउंड मिक्सिंग एडिटिंग हेयरस्टाइल और सिनेमेटोग्राफ़ी जैसी श्रेणियों में चुनाव करने वाले कई बार फ़िल्मों को दोबारा देखते हैं ताकि वे उनका सही से आकलन कर सकें. फ़िल्म बनाने वाले स्टूडियो भी अपनी फ़िल्म को बढ़ावा देने के लिए व्यापक प्रचार अभियान चलाते हैं ताकि उनकी फ़िल्म को बढ़ावा मिल सके. फ़्रीडमैन कहते हैं ईमेल संदेशों की बाढ़ सी आ जाती है. वे बताते हैं वे चाहते हैं कि आप उनके बारे में सोचें. अगर आप फ़िल्म में काम करने वाले किसी व्यक्ति को जानते हैं तो अचानक आपकी मुलाक़ात फ़िल्म के निर्माता से हो जाती है और अचानक आप व्यक्तिगत रिश्ता बना लेते हैं. लेकिन जिनको नामांकन मिला हो उन पर मतदाताओं से संबंध स्थापित करने को लेकर बंदिशें भी लगी होती हैं और नियम तोड़ने पर प्रतिबंध के भी प्रावधान होते हैं. इस साल एकैडमी ने सर्वश्रेष्ठ गीत श्रेणी में एक कंपोज़र के गीत को इसलिए प्रतिबंधित कर दिया क्योंकि उन पर मतदाताओं से विशेष तौर पर अपना गीत सुनने का आग्रह करने के लिए संबंध स्थापित करने के आरोप लगे थे. क्या वूडी एलन के ख़िलाफ़ लगे यौन शोषण के आरोप जिन्हें वे नकारते रहे हैं और उनके ख़िलाफ़ कोई मामला भी नहीं चल रहा है उनकी तीन श्रेणियों में नामांकित फ़िल्म ब्लू जैस्मिन की संभावनाओं पर असर डालेंगेफ़्रीडमैन कहते हैं मुझे लगता है बहुत सारे लोग इससे बिदक सकते हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि इससे इस पर कोई फ़र्क पड़ेगा कि लोग केट ब्लैंचेट के बारे में कैसे वोट करेंगे. फ़्रीडमैन बताते हैं मैं ऐसे अभिनय को देखता हूं जिसमें बहुत ज़्यादा बनावट नहीं हो और अभिनेता को वह फ़िल्म करने में आनंद आया हो. कई बार ऐसा होता है कि अभिनय तो शानदार हो लेकिनफ़िल्म अच्छी न हो तो ऐसे में बहुत से लोग उससे बिदक जाते हैं. विलियम्स कहते हैं कैप्टन फ़िलिप्स फ़िल्म में असल प्रभाव साउंड से पैदा किया गया है. इसमें रेडियो पर बातचीत फ्राइटर का इंजीनियरिंग प्लांट लाइफ़बोट पर पानी के पड़ने की आवाज़ से वातावरण तैयार किया गया है. वे कहते हैं बिल्कुल असली परिस्थिति जैसा साउंड पैदा करने के लिए आपको बहुत मेहनत करनी पड़ती है. फ़िल्म ग्रेविटी में निर्माताओं ने अंतरिक्ष में भौतिकी के नियमों का ख्याल रखने की कोशिश की है. यहां तक कि हीरोइन के नज़दीक सेटेलाइट फ़टने की आवाज़ भी नहीं आती. विलियम्स कहते हैं यह सोचना बड़ा ही भयावह है कि आपकी धज्जियां उड़ जाएं और आपको एक भी शब्द सुनाई न दे. फ़्रीडमैन कहते हैं ट्वेलव इयर अ स्लेव और ग्रेविटी दोनों ही फ़िल्में खेल को बदल देने वाली हैं. वे कहते हैं कि फ़िल्म ग्रेविटी के पहले शॉट ने जिसमें पंद्रह मिनट तक अंतरिक्ष से धरती और उसके इर्द-गिर्द घूमने वाले उपग्रह दिखाए जाते हैं उन्हें बहुत प्रभावित किया है. वे कहते हैं कि इस तरह का शॉट सेल्यूलॉयड फ़िल्मों के ज़माने में असंभव था क्योंकि फ़िल्म के एक रोल में सिर्फ़ दस मिनट की ही फ़ुटेज ली जा सकती थी. वे कहते हैं एक फ़िल्म निर्माता के तौर पर कभी-कभी कुछ चीज़ें आपको हतप्रभ कर देती हैं. यह साल अविश्वसनीय हैं. यह कई दशकों में सबसे अच्छा साल है. |
| DATE: 2014-03-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1124] TITLE: भारत के संविधान की कहानी: श्याम बेनेगल की ज़ुबानी |
| CONTENT: मेरी मुलाकात भारत के संविधान से कक्षा छह में हुई. जब मेरा दो किलो का बस्ता सीधा तीन किलो का हुआ और मेरे बस्ते में जगह बना ली सिविक्स यानी नागरिक शास्त्र की किताब और कॉपी ने. डरता था मैं सिविक्स से कारण इसका कठिन होना. निर्देशक श्याम बेनेगल की नई टीवी सीरीज़ संविधान बनाने की प्रक्रिया और इसके मूल तत्वों को आसानी समझने का एक अच्छा जरिया हो सकती है. इस टीवी सीरीज में सन 1946 से 1950 की घटनाओं का जि़क्र है. यही वो दौर था जब निर्माण हुआ था भारत के संविधान का और भारत बना था गणतंत्र. इस धारावाहिक से 25 साल बाद फ़िल्मकार श्याम बेनेगल की टीवी पर वापसी हो रही है. सन 1988 में बने टीवी शो भारत एक खोज के बाद बेनेगल अब टीवी पर दिखाएंगे भारत के संविधान की कहानी. कितना चुनौतीपूर्ण था ये विषय और इस प्रोग्राम पर काम करने के अनुभव को श्याम बेनेगल ने बीबीसी से साझा किया. संसद के ऊपरी सदन राज्य सभा को समर्पित राज्य सभा टीवी ने संविधान पर टीवी प्रोग्राम बनाने का फ़ैसला किया है. भारत के उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने श्याम बेनेगल को बुलाया और उन्हें संविधान पर धारावाहिक बनाने का आइडिया दिया. बीबीसी से हुई बताचीत में श्याम बेनेगल ने कहा हमारा संविधान बहुत ही महत्वपूर्ण है जिसके बारे में कोई ज़्यादा सिखाता नहीं है हमारा संविधान हमारे देश के बारे में बताता है. हम कैसे लोग हैं क्या सोच हैं और लोकतांत्रिक रिश्ते कैसे बनते हैं. बेनेगल छह साल तक सांसद भी रहे हैं. संसद की गतिविधियों को जानने के बाद उन्होंने इस धारावाहिक पर काम करने का फैसला किया. संविधान को 10 अंकों में दिखाया जाएगा. इसका पहला अंक रविवार को प्रसारित किया गया. दो साल 11 महीने और 17 दिनों में बना था भारत का संविधान और लगभग इतने ही दिनों में श्याम बेनेगल ने अपना शो भी शूट किया. संविधान पर टीवी प्रोग्राम को एक रोमांचक अनुभव बताते हुए श्याम बेनेगल ने बताया ये रोमांचक इसलिए था क्योकि हमारे पूर्वजों ने इस संविधान को बनाने में 3 साल लगाए. इसे बनाने में संसद में बहस होती थी उसमें काफ़ी ड्रामा था. संविधान के बनने की कहानी एक नावेल जैसी है या कहूं तो एक नाटक जैसी. श्याम बेनेगल बताते हैं इस शो को बनाने के लिए खूब रिसर्च की गई. हमारे लेखकों ने एक-एक तथ्य को रिकॉर्ड्स में जांचा. हमारे प्रोग्राम में जो पंडित नेहरू ने कहा था वैसे का वैसा ही बोला गया है. एक भी फैक्ट इधर से उधर नहीं किया गया. अगर संविधान के निर्माण की कहानी इतनी ही दिलचस्प है तो क्यों आज तक इस विषय पर किसी ने काम नहीं किया यही सवाल जब मैंने बेनेगल से पूछ तो उन्होंने कहा ये मैं नहीं जानता और मैं यह भी नहीं समझता की हम लेट हो गए ऐसे विषय पर बात करने में क्योंकि एक देश का जीवन एक मनुष्य से लंबा है और देश चलता रहता है. जैसे भारत एक खोज मेरा टीवी शो आज भी देखा जा सकता है वैसे संविधान को भी लोग कभी भी उठा कर देख सकेंगे ये समयबद्ध नहीं है टाइमलेस शो है. उस दौर में संविधान से जुड़े सभी बड़े दिग्गजों को टीवी के परदे पर उतरा जाएगा. बीआर आंबेडकर से लेकर गाँधी तक और जिन्ना से लेकर नेहरू तक. शो की कास्टिंग के बारे में बात करते हुए बेनेगल ने बताया इस धारावाहिक के साथ कुल एक हज़ार लोग जुड़े हैं जिनमें से 150 फ़िल्मी या अन्य कलाकार है. इस शो के लिए लोगों को चुनना काफ़ी चुनौतीपूर्ण था क्योंकि अगर मुझे नेहरू को दिखाना है तो नेहरू जैसा कोई हो जिसपर दर्शक विश्वास कर सकें कि ये नेहरू हैं तो मैंने दिलीप ताहिल को नेहरू बनाया. उन्होंने बताया गाँधी के रूप में नीरज काबी को लिया जिन्होंने अपना सिर मुंडवाया और यहाँ तक गाँधी की तरह उन्होंने अपना दिनचर्या तक बना ली बीआर आंबेडकर के रूप में मराठी अभिनेता सचिन खेडेकर लिए गए तो एक-एक कलाकार ऐसा चुना गया जिसको देख आपको वो नेता याद आएंगे जिन्होंने संविधान का निर्माण किया था. संसद सदस्य के रूप में अपने अनुभव के बारे में पूछने पर श्याम बेनेगल कहते हैं सांसदों के संसद में व्यवहार का स्तर गिर गया है. जो स्तर उन्हें बनाए रखना था वे रख नहीं पा रहे हैं. उन्हें सुधार तो करना ही होगा. इसलिए ही इस किस्म के कार्यक्रम हमारे नेताओं के लिए भी ज़रूरी हैं. वे जान पाएंगे कि हमारे पुराने नेता किस तरह से संसद में व्यवहार करते थे. श्याम बेनेगल का यह धारावाहिक अगले 10 हफ्तों तक टीवी पर प्रसारित किया जाएगा और शायद इन दस हफ़्तों में इसकी वजह से मेरे जैसे कुछ स्कूली बच्चे भी भारत के संविधान में रुचि लेने लगें. |
| DATE: 2014-03-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1125] TITLE: सबसे बड़ा ख़ान मेरे साथ है: विद्या बालन |
| CONTENT: शादी करके शादी के साइड इफ़ेक्ट्स बता रही हैं अभिनेत्री विद्या बालन. ऐसा बिल्कुल नहीं है कि विद्या अपनी शादी से नाख़ुश हैं शादी के साइड इफ़ेक्ट्स उनकी नई फ़िल्म है और वो पूरे ज़ोर-शोर से इसका प्रमोशन कर रही हैं. लेकिन क्यों नहीं किया अभी तक विद्या ने किसी भी ख़ान के साथ काम और क्या वजह है कि 60 और 70 के दशक की अभिनेत्रियों के करियर कई सालों तक चलेइन टेढ़े सवालों का बिलकुल बिंदास और सीधा जवाब दिए विद्या बालन ने बीबीसी से बातचीत में. विद्या बालन ने लगे रहो मुन्नाभाई डर्टी पिक्चर और पा जैसी हिट फ़िल्मों में काम किया है और बॉलीवुड के कई बेहतरीन अभिनेताओं के साथ काम किया है. लेकिन विद्या ने अभी तक किसी भी ख़ान के साथ काम नहीं किया है. उनसे जब हमने ये सवाल पूछा तो उन्होंने अपनी उंगली से आसमान की तरफ़ इशारा करते हुए कहासबसे बड़ा ख़ान मेरे साथ है. अल्लाह ऊपरवाला मौला जो आप कहना चाहें. मैं अपने आपको बहुत ख़ुशक़िस्मत मानती हूं क्योंकि आज के दौर में काम कर रही हूं जहां हिंदी सिनेमा जगत में अभिनेत्रियों के लिए जो रोल लिखे जा रहे हैं वो बहुत ही बेहतरीन हैं. वो कहती हैं मैं इस दौर में अच्छे लोगों के साथ काम कर रहीं हूं जिन्हें बतौर अभिनेत्री मुझ पर भरोसा है. तो इन सबकी वजह से मेरी फ़िल्में चलीं हैं और मुझे क़ामयाबी मिली है. आप कह सकते हैं कि पूरी क़ायनात जुट गई है मेरे लिए ताकि मैं अपना सपना जी सकूँ. बॉलीवुड में 60 और 70 के दशक की अभिनेत्रियों के करियर कई साल तक चले. वैजयंती माला हेमा मालिनी और शर्मिला टैगोर जैसी अभिनेत्रियों ने बॉलीवुड पर काफ़ी लंबे समय तक अपनी पकड़ बनाए रखी. लेकिन आज के दौर में अभिनेत्रियां कई साल नहीं बस चंद फ़िल्मों में अपना अभिनय दिखाकर ही ग़ायब हो जाती हैं. इस सबकी क्या वजह है इस पर विद्या बालन कहती हैं जितने भी सितारे हों आसमान में आसमान कम नहीं पड़ता तो उस वजह से किसी की चकाचौंध कम नहीं होती. वे कहती हैं मुझे लगता है कि आज के दौर में हीरोइंस के करियर ज़्यादा चल नहीं पा रहे क्योंकि जब आपका कोई किरदार दर्शकों के बीच लोकप्रिय हो जाता है तो आपको उसी तरह के किरदार मिलने शुरू हो जाते हैं. इसका परिणाम ये होता है कि दर्शकों को आपसे बोरियत होने लगती है. तो शायद ये एक वजह हो सकती है आजकल की हीरोइंस के न चलने के पीछे. वे कहती हैं चाहे वो हेमा मालिनी हों रेखा वैजयंती माला या शर्मिला टैगोर हों इन सबकी फ़िल्मों के अलावा भी निजी जीवन में काफ़ी मज़बूत शख़्सियत हुआ करती थी. उनकी एक अलग पहचान हुआ करती थी और वो उसी के हिसाब से फ़िल्मों में अभिनय किया करती थीं. विद्या आगे बताती हैं आज के दौर में हीरोइंस पर बहुत सारा दबाव होता है कि इस तरह के बाल होने चाहिए इस तरह के कपड़े होने चाहिए और इससे उन अभिनेत्रियों का व्यक्तित्व कहीं खो सा गया है. मैंने भी ये कोशिश की साल 2007 में लेकिन मुझे कई थप्पड़ पड़े और मैंने सीखा कि अपने आपको इसमें नहीं खोना चाहिए. |
| DATE: 2014-03-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1126] TITLE: नहीं चला गुत्थी से चुटकी बने सुनील ग्रोवर का जादू |
| CONTENT: टीवी पर डेली सोप्स में सास-बहू की खींचतानी से मामला हटकर अब रोमांस प्रधान हो चला है. दिया और बाती हम में संध्या को अपने सपने को पूरा करने में सूरज का सहारा मिला और शो एक बार फिर अपना पहला स्थान बरक़रार रखने में कामयाब रहा. शो में मुख्य भूमिका निभा रहीं अभिनेत्री दीपिका सिंह को दर्शकों का भरपूर प्यार मिल रहा है और उनकी लोकप्रियता टीवी दर्शकों में बढ़ रही है. कई नए कलाकारों को टीवी पर मौक़े देने और उनका करियर जमाने में एकता कपूर का हाथ रहा है और अभिनेता रजत टोकस और अभिनेत्री परिधि शर्मा भी इसके लिए उनके शुक्रगुज़ार होंगे. जोधा-अकबर में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले इन कलाकारों को भी दर्शकों का प्यार मिल रहा है. इसी वजह से जोधा-अकबर रहा इस सप्ताह दूसरे नंबर पर. साथिया में एक बड़ा लीप आ चुका है. और ये सोप ऐसे मुक़ाम पर आ चुका है जब अहम और गोपी की शादी एक बार फिर देखने को मिल सकती है. साथिया रहा तीसरे स्थान पर. ये रिश्ता क्या कहलाता है रहा चौथे स्थान पर. कपिल शर्मा की कॉमेडी और बुआ की शादी को मिला दर्शकों का प्यार और कॉमेडी नाइट्स विद कपिल रहा पांचवें स्थान पर. सुनील ग्रोवर के शो मैड इन इंडिया को बेहद कम टीआरपी मिली. इससे ज़्यादा लोकप्रियता तो उनके साइलेंट शो गुटरगूं को मिल गई थी. चैनलों की प्रतिस्पर्धा में स्टार प्लस रहा पहले नंबर पर जबकि कलर्स को मिला दूसरा स्थान. ज़ी रहा तीसरे नंबर पर सोनी चौथे पर जबकि सब को मिला पांचवा स्थान. |
| DATE: 2014-03-01 |
| LABEL: entertainment |
| [1127] TITLE: फ़िल्म रिव्यू: 'शादी के साइड इफ़ेक्ट्स' |
| CONTENT: बालाजी मोशन पिक्चर्स और प्रीतीश नंदी कम्युनिकेशंस की शादी के साइड इफ़ेक्ट्स एक शादीशुदा जोड़े की कहानी है. ये शादीशुदा ज़िंदगी में घटी कुछ हास्यास्पद घटनाओं पर आधारित है. सिद्धार्थ रॉय उर्फ़ सिड फ़रहान अख़्तर और तृषा विद्या बालन सुखी वैवाहिक जीवन बिता रहे थे. तभी एक दिन पता चलता है कि तृषा गर्भवती है जिसके लिए दोनों ही उस वक़्त तैयार नहीं होते. सिड एक संघर्षरत संगीतकार है और तृषा भी नौकरीपेशा है. इस वजह से वो पहले तो गर्भपात के बारे में सोचते हैं क्योंकि दोनों ही अभी बच्चे के लिए तैयार नहीं है लेकिन बाद में वो अपना फ़ैसला बदल देते हैं. दोनों की बच्ची मिली के जन्म के बाद सिड काफ़ी परेशान रहने लगता है. क्योंकि बच्ची की देखभाल के लिए तृषा अपनी नौकरी छोड़ देती है और वो सिड से भी बराबर उम्मीद करती है कि वो भी बच्ची के पालन-पोषण में पूरा योगदान दे. आगे क्या होता है. तृषा और सिड अपनी ज़िंदगी में संतुलन बनाने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाते हैं. दोनों के बीच किस तरह की ग़लतफ़हमियां पैदा होती हैं. यही आगे की कहानी है. ज़ीनत लखानी और साकेत चौधरी की कहानी बड़ी दिलचस्प और हास्यप्रद है. फ़िल्म का स्क्रीनप्ले भी मज़ेदार हैं जिसमें शादीशुदा ज़िंदगी में होने वाली घटनाओं को बड़े दिलचस्प तरीके से प्रस्तुत किया गया है. अरशद सैयद के लिखे संवाद भी बढ़िया हैं. इंटरवल से पहले ख़ासतौर पर फ़िल्म बहुत मज़ेदार है और युवा लोगों को पसंद आएगी. इंटरवल के बाद ज़रूर फ़िल्म कई जगह ट्रैक से हटती हुई और खींची हुई लगती है. लेकिन इस हिस्से में भी कई जगह लोगों को हंसी आएगी. लेकिन ये भी कहना होगा कि फ़िल्म की कॉमेडी हर तरह के दर्शकों को पसंद नहीं आएगी और एक ख़ास दर्शक वर्ग को ही अपील कर पाएगी. साथ ही घरेलू ज़िंदगी की छोटी-छोटी बातों पर ही फ़िल्म आधारित है और कोई बड़ा ड्रामा नहीं है. इस वजह से भी फ़िल्म को एक बड़े दर्शक वर्ग का प्यार नहीं मिल पाएगा. साथ ही बच्ची के जन्म के बाद फ़िल्म के हीरो को अपनी ज़िंदगी बोझ जैसी लगने लगती है. ये बात कई लोगों को आपत्तिजनक लग सकती है. इंटरवल के बाद फ़िल्म काफ़ी हद तक बोझिल हो जाती है. फ़रहान अख़्तर सिड का अपनी समस्याएं रणवीर राम कपूर से डिस्कस करना और फिर रणवीर का उसे सलाह देने वाला हिस्सा बड़ा बोरिंग है और इसी वजह से फ़िल्म में दर्शकों की दिलचस्पी कम हो जाती है. फ़रहान अख़्तर ने सिड के रोल में ज़बरदस्त काम किया है. उनकी कॉमिक टाइमिंग और चेहरे के हाव-भाव ज़बरदस्त रहे हैं. विद्या बालन भी अपने रोल में बेहतरीन रही हैं. उनके हाव-भाव कॉमिक टाइमिंग बॉडी लैंग्वेज संवाद अदायगी सब कुछ शानदार है. एक छोटे से रोल में वीर दास ने बढ़िया काम किया है. राम कपूर ने भी अपने रोल के साथ पूरा न्याय किया है. बाकी कलाकार भी बढ़िया हैं. साकेत चौधरी का निर्देशन अच्छा है लेकिन फ़िल्म की स्क्रिप्ट एक ख़ास सेक्शन को ही पसंद आएगी. प्रीतम का संगीत उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया है. कुल मिलाकर शादी के साइड इफ़ेक्ट्स एक हल्की-फुल्की मज़ेदार फ़िल्म तो है लेकिन ये एक सीमित अपील वाली फ़िल्म है. |
| DATE: 2014-02-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1128] TITLE: जब मीका ने की गाली-गलौज |
| CONTENT: गुरूवार रात मुंबई में हुए एक म्यूज़िक अवॉर्ड्स में गायक मीका ने हद ही कर दी. जब उन्हें मशहूर संगीतकार दिवंगत आर डी बर्मन की 75वीं सालगिरह पर श्रद्धांजलि देने के लिए स्टेज पर बुलाया गया तो मीका ने माइक हाथ में थामते ही गाली गलौज शुरू कर दी. उन्होंने दर्शकों की तरफ़ देखते हुए एक बेहद गंदी गाली दी और कहा कि अगर मेरे साथ नहीं गाओगे तो घर दफ़ा हो जाओ. मीका ने ऐसा एक बार नहीं कई बार कहा और उनकी इस हरकत से वहां मौजूद दर्शकों का गुस्सा साफ़ देखा जा सकता है. उन्होंने अपने हाथ में बंधी बेशक़ीमती घड़ी की तरफ इशारा करते हुए कि मैं चाहूंगा कि ये एक करोड़ रुपए की घड़ी यहां बैठा हर गीतकार और गायक अपने जीवन में ख़रीद पाए. मशहूर टीवी कॉमेडियन कपिल शर्मा की प्राथमिकता अब टीवी के बजाय फ़िल्में हो गई हैं और सूत्रों के मुताबिक़ वो अपना बेहद मशहूर शो कॉमेडी नाइट्स विद कपिल तक छोड़ सकते हैं. दरअसल कपिल शर्मा ने यशराज बैनर के साथ तीन फ़िल्मों का अनुबंध किया है और इसी की वजह से भविष्य में उनकी व्यस्तता काफी बढ़ सकती है. इसलिए सप्ताह में दो बार आने वाला उनका शो कॉमेडी नाइट्स विद कपिल अब एक ही दिन आया करेगा. और बाद में कपिल इस शो से अलग भी हो सकते हैं. इसी तरह से एक दूसरे चैनल पर आ रहा शो मैड इन इंडिया भी मुश्किल में पड़ता दिख रहा है. शो के होस्ट मनीष पॉल अब अपने फ़िल्म करियर पर ध्यान देना चाहते हैं इसलिए वह इस शो में सुनील ग्रोवर का साथ छोड़ सकते हैं. ख़बरों के मुताबिक़ साल 1995 की बेहद कामयाब फ़िल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का रीमेक बनाए जाने की तैयारियां हो रही हैं. इसका निर्देशन भी ओरिजिनल फ़िल्म के निर्देशक आदित्य चोपड़ा ही करेंगे. फ़िल्म में शाहरुख़ ख़ान और काजोल छोटी सी भूमिकाओं में नज़र आएंगे जबकि मुख्य भूमिकाएं नए कलाकारों को दी जाएंगी. ओरिजिनल फ़िल्म में अनुपम खेर ने जो रोल निभाया था वो रीमेक में बोमन ईरानी और अमरीश पुरी वाला रोल परेश रावल निभाएंगे. |
| DATE: 2014-02-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1129] TITLE: मेरी जान को कोई ख़तरा नहीं: आमिर ख़ान |
| CONTENT: आमिर ख़ान ने अपनी जान को ख़तरा होने संबंधित ख़बरों को पूरी तरह से निराधार बताया है. मुंबई में अपने टीवी शो सत्यमेव जयते के दूसरे संस्करण के बारे में मीडिया से बात करते हुए आमिर ने ये बताया. दरअसल ऐसी ख़बरें थीं कि आमिर ने अपने इस शो में जिन मुद्दों को उठाया है उसके बाद उन्हें जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं. वह शो के पहले संस्करण में कन्या भ्रूणहत्या डॉक्टरी लापरवाही और ऑनर किलिंग जैसे गंभीर मुद्दे उठा चुके हैं. उसके बाद उन्हें कथित तौर पर अपने शो में ऐसे मुद्दे ना उठाने की धमकियां मिली थीं. कहा तो ये भी जा रहा है कि इसके बाद आमिर ने अपने लिए बुलेट प्रूफ़ कार मंगाने का फ़ैसला किया. इसके जवाब में आमिर ख़ान बोले मुझे कोई धमकी नहीं मिली. वैसे भी मैं अपने दिल की बात कहने और करने में डरता नहीं हूं. आप लोग कृपया अफ़वाहों पर यक़ीन ना करें. मेरी जान को ख़तरा नहीं है. सत्यमेव जयते का दूसरा संस्करण दो मार्च से शुरू हो रहा है. इस बार शो के सिर्फ़ पांच एपिसोड दिखाए जाएंगे. आमिर ने इस मौक़े पर कहा मैं अपने आपको समाज का संदेशवाहक मानता हूं. मेरी ज़िम्मेदारी है समाज में हो रही ग़लत बातों को उठाना और उन्हें सुलझाने की दिशा में अपना योगदान देना. मैं चाहता हूं कि समाज की बेहतरी की दिशा में उठाए गए हर कदम में लोग जुड़ें. निजी तौर पर मैं नारी सशक्तीकरण की दिशा में काम करना चाहता हूं. इस मौक़े पर आमिर ने ये भी कहा कि वह किसी राजनीतिक पार्टी को सपोर्ट नहीं करते और आगे भी वह किसी पार्टी से नहीं जुड़ेंगे. उन्होंने कहा मैं किसी पार्टी से नहीं बल्कि इश्यूज़ से जुड़ना चाहता हूं. आमिर ने ये भी माना कि शो के पहले संस्करण में वह काफ़ी रोए थे. उन्होंने कहा मैं शो में बहुत रोया क्यों कि मैं एक भावुक इंसान हूं. यक़ीन जानिए कई बार तो मैं इतना रोया कि शो की एडीटिंग के वक़्त मेरी रुलाई वाला हिस्सा काफ़ी हद तक काटना पड़ा क्योंकि शो में दूसरे भी अहम मुद्दों को जगह मिलनी ज़रूरी थी. आमिर ने बिहार के गया में शो के दूसरे संस्करण के लॉन्च का ऐलान किया था. उन्होंने दिवंगत दशरथ मांझी को अपना प्रेरणा स्त्रोत बताया था. दशरथ मांझी वह शख़्स थे जिन्होंने अपने दम पर पहाड़ का 360 फ़ीट लंबा और 30 फ़ीट चौड़ा हिस्सा काट कर रास्ता बनाया था. गांव में ख़राब चिकित्सा सेवाओं के चलते दशरथ मांझी की पत्नी की मौत हो गई थी जिसके बाद उन्होंने गहलौर के पास पहाड़ी को काटकर पास के क़स्बों से गांव की दूरी कम करने का फ़ैसला किया था. |
| DATE: 2014-02-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1130] TITLE: आलिया और अर्जुन की 'सगाई' |
| CONTENT: आलिया भट्ट और अर्जुन कपूर की सगाई का आमंत्रण कंगना रानाउत का नया ठिकाना और सोहा अली ख़ान को किस बात का अफ़सोस है. 28 फ़रवरी को आलिया भट्ट और अर्जुन कपूर की सगाई है और इसका कार्ड मीडिया को भेज दिया गया है. दरअसल दोनों ही सितारे आने वाली फ़िल्म टू स्टेट्स में साथ काम कर रहे हैं और फ़िल्म के ट्रेलर लॉन्च के लिए इसके निर्माता ने इस तरह के प्रमोशन का पैंतरा अपनाया है. इस कार्ड में आलिया भट्ट और अर्जुन कपूर के किरदारों के नाम के साथ-साथ उनका असल नाम भी छपा है. आलिया और अर्जुन की साथ में ये पहली फ़िल्म है. पिछले कुछ दिनों से उनके कथित रोमांस की ख़बरें भी मीडिया की सुर्खियां बनी हुई हैं. अभिनेत्री कंगना रानाउत 27 फ़रवरी को अपने नए घर में शिफ़्ट हो रही हैं. मुंबई के खार इलाके में कंगना का ये नया आलीशान फ़्लैट है जिसमें चार कमरे हैं. इसकी साज-सज्जा उनकी आने वाली फ़िल्म क्वीन के निर्देशक विकास बहल की पत्नी ऋचा ने की है. कंगना पहाड़ी इलाके की रहने वाली हैं इसलिए अपनी पसंद के हिसाब से उन्होंने इस फ़्लैट का डिज़ाइन पहाड़ी इलाकों के कॉटेज जैसे करवाया है. अभिनेत्री सोहा अली ख़ान मानती हैं कि बॉलीवुड में उन्होंने जिस फ़िल्म से अपना करियर शुरू किया वो एक बेहद ख़राब फ़ैसला था. सोहा ने साल 2004 में फ़िल्म दिल मांगे मोर से अपने करियर की शुरुआत की थी जिसमें उनके हीरो शाहिद कपूर थे. फ़िल्म बुरी तरह से फ़्लॉप हो गई थी. मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा मुझे समझ में ही नहीं आता कि मैंने वो फ़िल्म क्यों चुनी. ये ठीक फ़ैसला नहीं था क्योंकि फ़िल्म में एक हीरो और तीन हीरोइनें थीं. मेरे अलावा ट्यूलिप जोशी और आएशा टाकिया भी थीं. तो ऐसे में मेरे करने के लिए फ़िल्म में कुछ ख़ास था ही नहीं. हालांकि सोहा ने माना कि वो सिनेमा के अच्छे दौर में आईं और बाद में उन्हें कुछ ऐसे रोल मिले जो मज़बूत थे. |
| DATE: 2014-02-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1131] TITLE: नसीरुद्दीन की आलोचना पर फ़रहान का जवाब |
| CONTENT: नसीरुद्दीन शाह की कड़ी आलोचना का आख़िर फ़रहान अख़्तर ने जवाब दे दिया है. दरअसल पिछले साल की सुपरहिट फ़िल्म भाग मिल्खा भाग और उसमें केंद्रीय भूमिका निभाने वाले फ़रहान अख़्तर के अभिनय की नसीरुद्दीन शाह ने तीखे शब्दों में बुराई की थी. इस पर जब फ़रहान से जवाब मांगा गया तो उन्होंने कहा फ़िल्म को लोगों ने सराहा तारीफ़ की. मेरे निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा को मेरा काम पसंद आया. मिल्खा जी और उनका परिवार मेरे काम से ख़ुश था. वो ख़ुश तो मैं भी ख़ुश. फ़रहान का कहना था वैसे भी कुछ लोग आपके काम को पसंद करते हैं कुछ को आप पसंद नहीं आते. मैं इस मामले में सकारात्मक बातों पर फ़ोकस करता हूं. बाकी छोड़ देता हूं. हर किसी को अपने विचार रखने का हक़ है. दरअसल नसीरुद्दीन शाह ने कहा था कि भाग मिल्खा भाग एक नकली फ़िल्म थी और मिल्खा सिंह बने फ़रहान उसमें मिल्खा जैसे लग ही नहीं रहे थे. फ़रहान अख़्तर की आने वाली फ़िल्म है शादी के साइड इफ़ेक्ट्स जिसमें वह विद्या बालन के साथ अहम भूमिका में हैं. फ़िल्म में विद्या बालन उनकी पत्नी बनी हैं जो उन पर धौंस जमाती रहती हैं. निजी ज़िंदगी में फ़रहान की ज़िंदगी किस तरह की है वह कहते हैं मेरे परिवार में औरतों की ही सत्ता चलती है. जब मैं छोटा था तो मां और बहन का आधिपत्य में था. फिर शादी हुई तो पत्नी का ज़ोर चला और अब मेरी बेटियां मुझ पर धौंस जमाती रहती हैं. शादी के बाद विद्या बालन की ये दूसरी फ़िल्म है. पिछले साल उनकी घनचक्कर रिलीज़ हुई थी जो फ़्लॉप हो गई थी. अपनी उस नाक़ामयाबी के बारे में विद्या ने कहा मुझे घनचक्कर से ख़ासी उम्मीदें थीं. जब फ़िल्म नहीं चली तो मुझे दुख हुआ. कम से कम इस बात का संतोष है कि हमने कुछ नया करने की कोशिश की. आलोचना को वह किस तरह से लेती हैं. इसके जवाब में विद्या ने कहा दूसरे मेरे बारे में क्या कहते हैं या क्या उम्मीद करते हैं मुझे इस बात की ज़्यादा परवाह नहीं होती. मैं बस इस बात पर फ़ोकस करती हूं कि मुझे क्या करना है. शादी के साइड इफ़ेक्ट्स इस शुक्रवार 28 फ़रवरी को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2014-02-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1132] TITLE: क्या आप डोरेमोन और शिन चेन को जानते हैं? |
| CONTENT: छोटा भीम भारत में सबसे लोकप्रिय कार्टून किरदारों में से एक है. अगर टीवी कार्टून के नाम से आपको आज भी याद आता है - मिकी माउस डोनाल्ड डक या टॉम एंड जेरी और अगर निंजा हट्टोरी डोरेमोन या शिन चेन आपके लिए अजूबे-अनजाने से नाम हैं तो जनाब आपको अपना कार्टून ज्ञान जल्द से जल्द रिफ़्रेश करने की ज़रूरत है. एक्शन और रोमांच से भरपूर ये कार्टून आपके बच्चों के टेलीविज़न देखने के अंदाज को बदल रहे हैं. 80 और 90 के दशक में जब भारत में छोटे पर्दे पर कार्टूनों का पदार्पण हुआ तब लोगों के सामने कुछ ही विकल्प थे जिनमें डिज़्नी के मिकी माउस डोनाल्ड डक या हन्ना-बारबरा कृत टॉम एंड जेरी का नाम लिया जा सकता है. लेकिन माहौल बदल चुका है. आजकल शरारती बच्चा शिन चेन अपनी क्लासमेट को इंप्रेस करने की कोशिश करता नाबालिग नोबिता और दुश्मनों की पिटाई करता छोटा भीम बच्चों के दिलों पर राज कर रहे हैं. पांचवीं क्लास में पढ़ने वाले रोहित का हीरो डोरेमोन है और उसे भी अपनी क्लासमेट शुजुका जैसी नज़र आती है जिससे वह दोस्ती करना चाहता है. वहीं रोशनी जो नौवीं क्लास में पढ़ती है उसके हिसाब से शिन चेन से अच्छा किरदार कोई है ही नहीं क्योंकि शिन चेन से बातों में कोई नहीं जीत सकता. बच्चे भले ही इन कार्टूनों को कितना भी पसंद करें लेकिन अभिभावकों को लगता है कि इनमें ऐसा कंटेंट आता है जो किसी भी तरह से बच्चों के लिए सही नहीं है. आठवीं क्लास के शुभम की मां ने बताया शुभम को होमवर्क कराने में काफ़ी परेशानी होने लगी है क्योंकि वह अक़सर शिन चेन से सीखकर पेट दर्द का बहाना करता है. वहीं प्राइवेट स्कूल में टीचर और एक बच्चे की मां रूपा ने बताया क्लास में बच्चे अक़सर शिन चेन की तरह बर्ताव करते हैं और काफ़ी अजीब तरह के जवाब देते हैं जो एक सामान्य बच्चा कभी नहीं करेगा. ये बात वाकई चिंता का सबब है क्योंकि 90 के दशक में कार्टून्स जैसे गूफ़ी अलादीन डक टेल्स कुछ सामाजिक संदेश समेटे होते थे लेकिन आजकल कार्टून चरित्रों में अश्लीलता और तिरस्कार की भावना ज़्यादा भरी है. इन कार्टून किरदारों के लिए आवाज़ देने वाले कलाकारों का मानना है कि आजकल का ट्रेंड यही है. परीग्ना हैरी पॉटर में हरमायनी और कार्टून किरदार छोटा भीम की आवाज़ डब करती हैं. उन्होंने बताया हम ये ध्यान देते हैं कि कोई भी ऐसी बात या कंटेंट न जाए जो बच्चों के लिए हानिकारक है. वहीं नचिकेत जो कई कार्टून किरदारों की आवाज़ निकालते हैं उनके अनुसार ये वयस्क कंटेंट वाले कार्टून वो हैं जो बाहर नहीं चल पाए और चैनलों को कम दाम पर मिल जाते हैं ऐसे में चैनल भी इन्हें खूब दिखाते हैं. बच्चों को इनकी आदत हो जाती है और फिर बच्चे उनकी नकल करते हैं. लेकिन हिंदी भाषा के लिए सबसे पहले मिकी माउस के किरदार को अपनी आवाज़ दे चुके मशहूर एक्टर जावेद जाफ़री इस बात से सहमति नहीं रखते कि ये नए कार्टून बदतमीजी की सीमा लांघ रहे हैं. उन्होंने कहा मेरे हिसाब से ये कार्टून चरित्र एक नई लेयर ऑफ ह्यूमर लेकर आ रहे हैं और बच्चों से ज़्यादा ये बड़ों के लिए हैं और समय के साथ टेस्ट भी तो बदल जाता है. लेकिन लेयर्स या परतों के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता को क्या जावेद अपने बच्चों को दिखाएंगे तो उनका जवाब ना में था. मनोचिकित्सक विशाल छाबड़ा का मानना है कि ट्रेंड के नाम पर ये कार्टून बच्चों को पियर प्रेशर दे रहे हैं. डॉक्टर विशाल ने बताया अभी हाल ही में एक ऐसा मामला मेरे सामने आया जहां बच्चे ने एक कार्टून किरदार नोबिता जैसे व्यवहार करना शुरू कर दिया था. उसके अभिभावकों को काफी देर बाद बच्चे में इस बदलाव का पता चला. उनकी मानें तो ये पूरी तरह से अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों पर निगरानी रखें कार्टून लगाकर बच्चों को छोड़ देने से काम नहीं चलता उनके साथ बैठकर उन्हें गलत और सही में फ़र्क समझाना पड़ता है. ऐसा नहीं है कि अच्छे और आदर्शवादी कार्टून मौजूद नहीं हैं लेकिन आजकल बच्चों को ही-मैन की सीख नहीं निंजा हट्टोरी की किक ही पसंद आती है ऐसा कहना है टेलीविज़न समीक्षक पूनम सक्सेना का. उन्होंने कहा डिज़्नी के कार्टून्स भले ही साफ सुथरे और प्यारे लगें लेकिन ये वक़्त के साथ उबाऊ हो चुके हैं. समाज बदल गया है आजकल बच्चे भी थोड़ा मसाला और ऐक्शन पसंद करते हैं. रहस्य-रोमांच उन्हें भी आकर्षित करते हैं. ऐसे में शिन चेन या डोरेमोन से उन्हें ये मिलता है तो क्या बुरा है. कार्टून से ज़्यादा बच्चे अपने आसपास के वातावरण और अभिभावकों से सीखते हैं इसलिए अभिभावकों को अपने आचरण पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है. बात यहां पर आदर्शवादी होने की नहीं है. बात है बच्चों पर पड़ रहे बुरे असर की. अगर आपका बच्चा भी ऐसे ही कार्टून पसंद कर रहा है तो उसे डांटने की नहीं उसके साथ बैठकर समझाने की ज़रूरत है कि कार्टून क्या है और क्या हक़ीक़त. |
| DATE: 2014-02-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1133] TITLE: रणबीर से तुलना नहीं कर सकता: अमिताभ |
| CONTENT: पिछले 45 सालों से फ़िल्मी परदे पर छाए रहने के बावजूद अमिताभ बच्चन नई पीढ़ी की लोकप्रियता से बख़ूबी वाकिफ़ हैं. अमिताभ बच्चन जल्द ही भूतनाथ रिटर्न्स में दिखाई देंगे जिसका ट्रेलर लॉन्च करने वे पहुंचे थे. रणबीर कपूर इस फ़िल्म में एक मेहमान भूमिका कर रहे हैं. अमिताभ बच्चन से जब पूछा गया कि क्या रणबीर के साथ वो इस सीन में दिखाई देंगे तो अमिताभ ने कहा मैं दुर्भाग्यवश उस दृश्य में उनके साथ नहीं हूं. वैसे भी मैं अपनी तुलना उनके साथ नहीं कर सकता. वो तो बहुत लोकप्रिय हैं. उम्मीद है कभी मुझे अवसर मिलेगा उनके साथ काम करने का छोटा-मोटा तो अच्छा रहेगा. ये फ़िल्म साल 2008 में आई भूतनाथ का सीक्वल है. अभिनय करने के लिए ज़रूरी प्रक्रिया पर बात करते हुए अमिताभ बच्चन ने कहा मैंने कभी ऐक्टिंग सीखी नहीं है लेकिन मैं जहां भी जाता हूं या लोगों से मिलता हूं तो बहुत ध्यान से देखता हूं. न जाने क्यों कोई बात या कोई चीज़ हमारे अंदर रह जाती है और बहुत बाद में कहीं जाकर किसी रोल में हम उसका इस्तेमाल करते हैं. अमिताभ ने कहा कलाकार ऐसे ही करते रहते हैं. अब भी हम सीख रहे हैं और आगे भी सीखते रहेंगे . इंडस्ट्री में बिताए अपने चार दशकों का अनुभव बांटते हुए अमिताभ ने कहा हर 5-10 साल में इंडस्ट्री में एक नई पीढ़ी आती है और मुझे उनके साथ काम करने में बहुत मज़ा आ रहा है. ये मेरा सौभाग्य है कि मैं उनके साथ काम कर रहा हूं. आज की जो पीढ़ी है वो इतनी अद्भुत है. पहली ही फ़िल्म में इतना बढ़िया काम नज़र आता है. ऐसा काम मैं तो आज तक नहीं कर पाया. अमिताभ कहते हैं कि नई पीढ़ी के साथ काम करके उन्होंने बहुत कुछ सीखा है और यही एक अभिनेता के तौर पर उनकी तैयारी का हिस्सा होता है. भूतनाथ रिटर्न्स अप्रैल में रिलीज़ होगी. इस फ़िल्म का निर्देशन नीतेश तिवारी ने किया है. |
| DATE: 2014-02-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1134] TITLE: रणवीर और प्रियंका प्रेमी से बने भाई बहन! |
| CONTENT: हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म गुंडे में अभिनेता रणवीर सिंह और प्रियंका चोपड़ा के बीच प्रेम संबंध दिखाया था. अब ये दोनों कलाकार ज़ोया अख्तर की आने वाली फिल्म में भाई बहन का रोल अदा करेंगे. ख़बरों के मुताबिक़ इस रोल को तैयार करने के लिए प्रियंका और रणवीर आजकल घंटों एक साथ बिताते हैं. वे एक साथ कॉफ़ी पीने खाना खाने और घूमने जाते हैं. एक दूसरे के बचपन और बेहतर जानकारी के लिए रणवीर और प्रियंका काफी समय साथ बिता रहे हैं. लाइन में एक के बाद एक फ्लॉप देने वाले हिट डायरेक्टर राम गोपाल वर्मा इस साल फिल्म इंडस्ट्री में 25 साल पूरे करने वाले हैं. 25 सालों के इस सफ़र की ख़ुशी वो कैसे मनाएंगे ये सुनकर कुछ दर्शक शायद घबरा जाएं. रामू ने अगले 12 महीने 12 नई फिल्मों का डायरेक्शन करने की ठानी है. यानी एक साल में राम गोपाल वर्मा की 12 फिल्में. ये सभी फिल्में अलग-अलग भाषाओं में होगी. इन 12 फ़िल्मों की लड़ी में रामू तीसरी फ़िल्म पर पहुँच भी चुके हैं. सवाल ये उठ रहा है कि डिपार्टमेंट और सत्या 2 जैसी फिल्मों के बाद क्या लोग रामू को और झेल पाएंगेफ़िल्म जय हो बनाने के लिए सोहैल ख़ान ने कॉमेडी सर्कस से अपनी जज की कुर्सी छोड़ अपने भाई अरबाज़ को वहां बिठा दिया. लेकिन ख़बरों की मानें तो अब ये कुर्सी वापिस सोहेल लेने वाले हैं क्योंकि अब अरबाज़ की बारी है फ़िल्म बनाने की. अरबाज़ की अगली फ़िल्म है डॉली की डोली जिसमें मुख्य किरदार में सोनम कपूर नज़र आएंगी. कॉमेडी सर्कस की एक कुर्सी पर तो सालों से अर्चना पूरन सिंह बैठी ही हैं पर दूसरी कुर्सी ख़ान भाइयों के बीच अदला-बदली हो रही है. |
| DATE: 2014-02-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1135] TITLE: ये फूहड़ हँसी, ये भद्दे चुटकुले |
| CONTENT: दो दशक पहले जिन बातों पर भारतीय हंसते थे शायद अब वे मज़ाक बदल गए हैं. इसका सबूत टीवी चैनलों पर वे शो हैं जो कॉमेडी के नाम पर परोसे जा रहे हैं. फ्लाप शो ये जो है जिंदगी या नुक्कड़ किसी और ज़माने की बातें लगती हैं. आज कॉमेडी शो किसी भी तरह से किसी भी क़ीमत पर टीआरपी की होड़ में आगे रहना चाहते हैं. और इस चक्कर में कॉमेडी पर बहुत व्यक्तिगत बहुत भद्दी और बहुत फूहड़ होने के आरोप लग रहे हैं. भारत में कॉमेडी के कारोबार से जुड़े लोग भी इससे सहमत नज़र आते हैं. शेखर सुमन लंबे समय तक कॉमेडी कार्यक्रमों में जज और मेज़बान की भूमिका में नज़र आते रहे लेकिन फिर उन्होने हाथ खींच लिए. बीबीसी ने शेखर से ख़ास बातचीत में जब ये सवाल उठाया तो उनका कहना था जिस तरह का कंटेट इस्तेमाल होने लगा था द्विअर्थी और अश्लील उससे मामला गड़बड़ा गया. निकलना ज़रूरी हो गया था. मुझे लगता है मैं ज़्यादा रुक गया. दो चार साल और पहले निकलना चाहिए था. खिचड़ी साराभाई वर्सेज़ साराभाई जैसे बेहद सफल हास्य धारावाहिक बनाने वाले जमनादास मजीठिया कहते हैं रोज़ रोज़ कॉमेडी बनाना भी इतना आसान नहीं है इसलिए विषयवस्तु बेहद हल्की है. स्टैंड अप कॉमेडी में ज़्यादातर युवाओं को रिझाने की कोशिश रहती है. अक्लमंदी भरा हास्य नहीं है हमारे पास क्योंकि मज़बूत लिखाई नहीं है. बहुत फीका और कमज़ोर हो चुका है कंटेट. टीवी कलाकार रहीं वाणी त्रिपाठी भारतीय टेलीविज़न पर एक असमंजस की स्थिति की ओर इशारा करती हैं. वो कहती हैं हम ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि व्यंग्य फूहड़ व्यंग्य और फूहड़ कॉमेडी में क्या फर्क है. जो दिखता है वो बिकता है और टीआरपी के चक्कर में फंसकर हमने फूहड़ मज़ाक को अपना लिया है जबकि हमारा टीवी का इतिहास स्तरीय राजनीतिक सामाजिक और व्यक्तिगत हास्य वाले कार्यक्रमों से भरपूर रहा है. सवाल ये है कि हास्य की जिस परिभाषा की बात हो रही है वो क्या है और कैसे तय होती है. क्या भारतीय सेंस ऑफ़ ह्यूमर यानी हंसने की आदत की वाकई कोई परिभाषा है जिसे साफ़ तौर पर समझा जा सकता है लाफ़्टर चैलेंज जैसे स्टैंड-अप कॉमेडी कार्यक्रमों और उनसे निकले कलाकारों ने इस तस्वीर को बदलने में अहम भूमिका निभाई. आज टीवी पर कॉमेडी का पर्याय हैं ऐसे ही एक कॉमेडियन कपिल शर्मा फ़िल्मी सितारों से भरा उनका कार्यक्रम और कुछ अजीबो ग़रीब महिलाएं बने पुरुष. हाल ये है कि इस कार्यक्रम की लोकप्रियता ने जो लकीर खींची है प्रतियोगी चैनल उसे छोटा करने में लग गए हैं. मसला किसी एक कार्यक्रम का नहीं है बल्कि कॉमेडी के नाम पर लोगों की खिल्ली उड़ाने की नई हदें पार करना है. ज़नाना भूमिकाओं में मर्द कलाकार इन कार्यक्रमों में स्पेशल इफ़ेक्ट लेकर आते हैं और जो औरतें औरतों का ही रोल कर रही हैं उन्हें तरह तरह की भद्दी टिप्पणियों का शिकार बनाया जाता है जिनका दायरा उनके शारीरिक डील-डौल से लेकर उनके मायके वाले रिश्तेदारों तक फैला है. वे बोले जाते हैं और पीछे से हंसी-ठठ्ठे की आवाज़ें आती हैं जो बहुत बार दर्शकों की नहीं होती. टीवी समीक्षक शैलजा बाजपेयी कहती हैं ऐसा लगता है जैसे टीवी चैनल ये मान चुके हैं कि औरतों के लिए वो डेली सोप बना रहे हैं. पुरूषों के लिए खेल और समाचार हैं और छोटे शहरों में रहने वाले लोगों के लिए इस तरह के हास्य कार्यक्रम. इन कार्यक्रमों का लक्ष्य महानगर नहीं हैं. जो चल रहा है वो चलता जा रहा है. किसी में हिम्मत नहीं है कि उठ कर इसे बदले. भारत में रेडियो-टीवी माध्यमों से प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की शिकायतें सुनने का काम ब्रॉडकास्ट कंटेट कंप्लेंट काउंसिल का है. काउंसिल ने साल 2012 में कॉमेडी में परोसे जा रही अश्लीलता के ख़िलाफ़ चैनलों को चेताते हुए कहा कि कॉमेडी की अहम भूमिका है लेकिन घटियापन अश्लीलता और द्विअर्थी सामग्री को अलग करने वाली महीन रेखा को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. जसपाल भट्टी राकेश बेदी शफ़ी ईनामदार और सतीश शाह जैसे कलाकारों को पहचान दिलाई उनके निभाए हंसोड़ किरदारों ने. एक आम भारतीय की जिंदगी में रोज़ पैदा होने वाली परिस्थितियों को केंद्र में रखकर कहानी बुनना कुछ बेहद सफल हास्य धारावाहिकों की लोकप्रियता का आधार रहा है फिर चाहे वो सरकारी दफ़्तरों में रोज़ मीटिंग में वक़्त ज़ाया करने का मसला हो महंगाई या फिर चुनावों के वक़्त किए जाने वाले वायदों का सच. हास्य निकलता था बुनियादी बातों से. पर अब लोकप्रियता की कसौटियों पर सबसे आगे नज़र आने वाले कॉमेडी कार्यक्रमों में लोगों से जुड़ी बातें और मुद्दे नदारद दिखते हैं. कॉमेडी धारावाहिकों से ही अपनी पहचान बनाने वाले निर्माता-निर्देशक भी हास्य की कसौटियों में आए इस बदलाव को स्वीकार करते हैं. टीवी कॉमेडी की दुनिया में इस वक़्त बेहद चर्चित चेहरे स्तरहीन कॉमेडी को लेकर शायद उतने चिंतित नहीं हैं. जहां डॉली आहलूवालिया इसे व्यक्ति-विशेष का फ़ैसला मानती हैं वहीं कॉमेडी नाइट्स विद कपिल में गुत्थी के किरदार से चर्चा में आए सुनील ग्रोवर बचाव करते हुए कहते हैं कॉमेडियन की कोशिश होती है कि लोग उसके चुटकुले को व्यक्तिगत तौर पर ना लें. हालांकि कई बार लोग भावना में बह जाते हैं और मुंह से निकल जाता है लेकिन उतना ही करेंगे जितना हास्य की परिभाषा के अंदर आता है उससे ज़्यादा नहीं करेंगे. अभिनेत्री श्वेता तिवारी कई कॉमेडी कार्यक्रमों में काम कर चुकी हैं. वो महिलाओं पर केन्द्रित स्तरहीन सामग्री के सवाल पर कहती हैं कि मैं ख़ुद इस तरह के कार्यक्रमों से दूर रहती हूं. हालांकि बीच में कई कार्यक्रमों में ऐसा हुआ और मैने स्पष्ट तौर पर मना किया कि मैं ये नहीं करूंगी. लेकिन श्वेता ये भी जोड़ती हैं अगर थोड़ी बेइज्ज़ती करवानी भी पड़े तो चलता है. शायद भारतीयों का सेंस ऑफ़ ह्यूमर ऐसा ही है. हम दूसरों की बेइज़्ज़ती होने पर ही ज़्यादा हंसते हैं. हालांकि वाणी त्रिपाठी महिलाओं के प्रस्तुतिकरण की कड़े शब्दों में आलोचना करते हुए कहती हैं पहले तो फ़िल्म कलाकारों को निशाना बनाकर चुटकुले लिखे जाते थे. फिर दौर आया जब नेता निशाना बने और अब तो स्तर इतना नीचे चला गया है कि महिलाओं का चरित्र हनन ही होने लगा है. मुझे तो ये समझ में नहीं आता कि जो महिलाएं इनमें काम करती हैं उन्हें क्यों इसमें फूहड़ता नज़र नहीं आती. मैं इसकी भर्त्सना करती हूं. कॉमेडी बनाने वाले इस बात से भी इनकार नहीं करते कि साफ़ सुथरी कॉमेडी के दर्शक अभी भी मौजूद हैं. जमनादास मजीठिया साफ़ तौर पर दो तरह के दर्शकों की उपस्थिति मानते हैं- एक पारिवारिक और दूसरा स्टैंड-अप हास्य में रूचि रखने वाले युवा. लंबे समय तक टीवी से जुड़े रहने वाले और अब फ़िल्मकार साजिद ख़ान भी मानते हैं कि दर्शकों में ही तमाम वर्ग मौजूद हैं. ये धारावाहिक या फ़िल्म बनाने वाले या फिर किताब लिखने वाले पर निर्भर है कि वो किस तरह के दर्शकों में अपनी पैठ बनाना चाहता है. |
| DATE: 2014-02-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1136] TITLE: पोर्न लेखक 'मस्तराम' अब फ़िल्मी पर्दे पर |
| CONTENT: फ़िल्म मस्तराम में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले राहुल बग्गा. कौन है मस्तराम कहाँ से आया मस्तराम कहाँ रहता है मस्तराम इन सवालों से मस्तराम के पाठकों का कोई सरोकार नहीं. मस्तराम को पढ़ने वाले अक़सर इस पत्रिका को छिप-छिप कर पढ़ते थे. लेकिन अब सेमीपोर्न माने जाने वाले इस काल्पनिक किरदार से प्रभावित एक फ़िल्म जल्द ही बड़े पर्दे पर दिखाई देगी. मस्तराम नाम की इस फ़िल्म के निर्देशक हैं भोपाल के रहने वाले अखिलेश जायसवाल. बतौर निर्देशक ये अखिलेश की पहली फ़िल्म है. वह अनुराग कश्यप की बहुचर्चित फ़िल्म गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के सह-लेखक थे. बीबीसी से ख़ास बातचीत में अखिलेश ने बताया कि उन्हें बचपन में ही मस्तराम पढ़ने का चस्का लग गया था. वह कहते हैं मैं छिप-छिप कर मस्तराम पढ़ता था. और मुझे कोई ऐसा करते पकड़ नहीं पाया. अखिलेश बताते हैं कि स्कूल के दिनों में ही उनके दिमाग़ में मस्तराम पर फ़िल्म बनाने का विचार आया. अखिलेश के मुताबिक़ मस्तराम कौन था. उसका कैसा जीवन था और उसे किन हालात में पोर्न लेखन शुरू करना पड़ा. वह अपने घर में और सोसाइटी में अपने बारे में कैसे बताता होगा इस बात को जानने के लिए मैं बहुत उत्सुक रहा करता था. बड़े-बड़े राष्ट्रीय अखबारों में फ़िल्म मस्तराम का पोस्टर बतौर विज्ञापन एक पूरे पेज पर 14 फ़रवरी को प्रकाशित हुआ था. अखिलेश बताते हैं ऐसा इसलिए किया गया ताकि लोगों को उनके वे दिन याद आ जाएं जब वे ये पत्रिका पढ़ा करते थे. और जिन्हें इसके बारे में नहीं पता उनके मन में इसे जानने की उत्सुकता जागे. क्या ये फ़िल्म अश्लीलता को बढ़ावा नहीं देगी. क्या मस्तराम जैसे सेमीपोर्न किरदार पर फ़िल्म बनाकर खुलेआम नग्नता को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है अखिलेश इस आरोप को पूरी तरह नकार देते हैं. वह कहते हैं ये एक काल्पनिक किरदार है. इस पत्रिका को पढ़कर देखें. इसका लेखन काफी कलात्मक और काव्यात्मक था. लेकिन अब जो मस्तराम पत्रिका बाज़ार में उपलब्ध है उस पर काफ़ी अश्लील होने के आरोप लगते हैं. फ़िल्म मस्तराम में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले राहुल बग्गा कहते हैं हमारी फिल्म अश्लील कहीं से भी नहीं है. हां ये कामुक ज़रूर है पर इसमें घटियापन नहीं है. मस्तराम की कहानियां अपने ही ढंग में कलात्मक और हास्यास्पद होती थीं. भला इस फ़िल्म को बनाने के लिए अखिलेश को फ़ंड कहां से मिला इस तरह का किरदार जिसे एलीट कहे जाने वाले दर्शकों का प्यार ना मिलने की आशंका है उस पर पैसा लगाने के लिए कौन तैयार हुआअखिलेश कहते हैं आजकल नई कहानियों की माँग है. मुझे मस्तराम के लिए निर्माता ढूंढ़ने में ज़रा भी दिक़्क़त नहीं हुई. मैंने बोरा ब्रदर्स को फ़िल्म की स्क्रिप्ट दी और एक ही दिन के अंदर उन्होंने इस पर फ़िल्म बनाने का फ़ैसला कर लिया. फ़िल्म के ट्रेलर को यूट्यूब पर 12 लाख से ज़्यादा हिट्स मिल चुके हैं. फ़िल्म के हीरो राहुल बग्गा कहते हैं फ़िल्म को मिल रहे रिस्पॉन्स से हम ख़ुश हैं. लोग चाहे जो सोचें लेकिन फ़िल्म के अंदर ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे लोग इसे पोर्न फ़िल्म मानें. फ़िल्म को सेंसर बोर्ड से एडल्ट सर्टिफ़िकेशन ही मिलेगा ऐसा अखिलेश और राहुल बग्गा मानते हैं. लेकिन दोनों ही फ़िल्म के भविष्य को लेकर ख़ासे आशान्वित हैं. उन्हें उम्मीद है कि फ़िल्म के बारे में जो भी नकारात्मक प्रतिक्रियाएं हैं वो इसकी रिलीज़ के बाद बंद हो जाएंगी. |
| DATE: 2014-02-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1137] TITLE: शाहरुख़-दीपिका की फ़िल्म के सेट की तस्वीरें लीक |
| CONTENT: फ़िल्म हैप्पी न्यू ईयर के सेट की तस्वीरें लीक होने से ख़फ़ा निर्देशक फ़राह ख़ान ने क्या किया संजय दत्त को बार-बार पेरोल मिलने पर केंद्र सरकार ने उठाए सवाल और पहलवान की हुईं पायल. शाहरुख़ ख़ान और दीपिका पादुकोण की आने वाली फ़िल्म हैप्पी न्यू ईयर के सेट की तस्वीरें इंटरनेट पर लीक हो गईं जिससे निर्देशक फ़राह ख़ान बेहद नाराज़ हैं. इन तस्वीरों में फ़िल्म का लुट और सेट का डिज़ाइन भी क़ैद हो गए. साथ ही फ़िल्म के मुख्य कलाकार शाहरुख़ और दीपिका भी इन तस्वीरों में नज़र आ रहे हैं. फ़राह ख़ान ने इसके बाद फ़ौरन सेट पर मोबाइल और कैमरे ले जाने पर प्रतिबंध लगा दिया है क्योंकि वह नहीं चाहतीं कि फ़िल्म से जुड़ी कोई भी ख़बर या तस्वीर अभी से सार्वजनिक हो जाए. सूत्रों के मुताबिक़ सेट की तस्वीरें किसी जूनियर आर्टिस्ट ने खींचकर नेट पर डालीं. अभिनेता संजय दत्त को बार-बार पेरोल दिए जाने पर केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा है. 1993 मुंबई ब्लास्ट से जुड़े एक मामले में संजय दत्त को छह साल की सज़ा सुनाई गई है. उन्हें 42 महीने जेल में गुज़ारने हैं क्योंकि 18 महीने वह पहले ही जेल में काट चुके थे. उन्हें पिछले साल पुणे की येरवडा जेल भेजा गया. केंद्र सरकार ने राज्य सरकार से पूछा है कि संजय दत्त को विशेष दर्जा क्यों दिया जा रहा है और एक साल के भीतर ही उन्हें तीन बार पेरोल क्यों दी गई. संजय दत्त ने अपनी पत्नी मान्यता दत्त की बीमारी की वजह से पेरोल की अर्ज़ी दी थी. वह 21 दिसंबर को जेल से एक महीने के लिए बाहर आए थे. जिसके बाद दो बार और उनकी पेरोल की अर्ज़ी एक-एक महीने के लिए बढ़ाई जा चुकी है. पहलवान संग्राम सिंह और अभिनेत्री पायल रोहतगी 27 फ़रवरी को सगाई करने जा रहे हैं. लंबे समय से दोनों के बीच रोमांस चल रहा है. तीन साल पहले संग्राम और पायल एक रिएलिटी शो के दौरान मिले थे जिसके बाद दोनों के बीच नज़दीकियां हो गई थीं. दोनों इसी साल के अंत तक शादी भी करने की योजना बना रहे हैं. |
| DATE: 2014-02-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1138] TITLE: स्विमिंग पूल में बुरक़ा तो पहनूँगी नहीं: सोनम |
| CONTENT: अभिनेता अनिल कपूर की बेटी सोनम कपूर मानती हैं कि फ़िल्मी परिवार से आने की वजह से उन्हें वो तमाम फ़ायदे हुए हैं जो बाक़ी कलाकारों को नहीं मिलते. बीबीसी एशियन नेटवर्क से ख़ास बात करते हुए सोनम ने कहा लोगों को पता है कि मैं किस परिवार से आई हूं इसलिए बाक़ी कलाकारों की तुलना में वे मुझसे ज़्यादा अदब से पेश आते हैं. मैं उनकी तुलना में ज़्यादा सुविधाजनक स्थिति में हूं. सोनम ने ये भी कहा कि फ़िल्मी परिवारों से आए दूसरे कलाकार अपने आपको मिले इस फ़ायदे के बारे में बात नहीं करते. उन्होंने कहा फ़िल्मी बैकग्राउंड होने से फ़ायदा तो मिलता है. दूसरे कलाकार शायद ये बातें छिपा जाते हैं. लेकिन मैं मानती हूं कि इससे फ़ायदा होता है. सोनम ने ये भी कहा कि उनके ऊपर अपना घर चलाने की ज़िम्मेदारी नहीं है इस वजह से वह ज़्यादा सोच समझकर अपने लिए फ़िल्मों का चुनाव करती हैं. वह कहती हैं मेरे पास ये लग्ज़री है. जो मुझे पसंद नहीं है उसे मैं ठुकरा सकती हूं. और मैंने ऐसा किया भी है. रांझणा में काम करने के लिए मैंने तीन बड़े बैनरों की फ़िल्में ठुकराईं. सोनम ने बताया कि उनके पिता अनिल कपूर उन्हें लेकर ख़ासे पज़ेसिव हैं. वह कहती हैं मेरे पिता को लगता है कि कोई लड़का मेरे लिए परफ़ेक्ट है ही नहीं. मैं ही सबसे अच्छी हूं. लेकिन शायद हर एक मां-बाप को उनके बच्चे सबसे अच्छे लगते हैं. सोनम कपूर की आने वाली फ़िल्म यशराज बैनर की बेवक़ूफ़ियां हैं जिनमें उनके साथ आयुष्मान खुराना हैं. ऋषि कपूर फ़िल्म में सोनम के पिता बने हैं. फ़िल्म में सोनम ने बिकनी पहनी है जिसकी ख़ासी चर्चा हो रही है. वह अपने इस फ़ैसले का बचाव करते हुए कहती हैं मैं फ़िल्म में एक आधुनिक लड़की का किरदार निभा रही हूं. फ़िल्म में स्विमिंग पूल का दृश्य है. इसमें मैं कोई बुरक़ा तो पहनूंगी नहीं. बिकनी ही पहनूंगी ना. बेवक़ूफ़ियां के अलावा सोनम कपूर फ़िल्म ख़ूबसूरत में भी काम कर रही हैं जिसे उनकी बहन रिया कपूर बना रही हैं. ये फ़िल्म 80 के दशक में बनी ऋषिकेश मुखर्जी की रेखा अभिनीत ख़ूबसूरत का रीमेक है. |
| DATE: 2014-02-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1139] TITLE: 'फ़्लॉप' सनी की फ़िल्म डिब्बाबंद ! |
| CONTENT: कभी बॉलीवुड की एक्शन के सरताज माने जाने वाले सनी देओल के ऊपर से क्या हिल गया है बॉलीवुड का भरोसा अर्जुन कपूर के बारे में क्या सोचती हैं आलिया भट्ट और अभिषेक बच्चन को मिला शाहरुख़ ख़ान से तोहफ़ा. पढ़िए ख़बरें मुंबई डायरी में. 80 और 90 के दशक में कई सुपरहिट फ़िल्में देने वाले सनी देओल के दिन अब बॉक्स ऑफ़िस के लिहाज़ से ठीक नहीं चल रहे हैं. उनकी फ़िल्म आई लव न्यूयॉर्क पर लगभग ताला लग गया है. फ़िल्म में सनी देओल के साथ कंगना रानाउत की मुख्य भूमिका है. फ़िल्म 2011 से बनकर तैयार है लेकिन इसे वितरक ही नहीं मिल रहे हैं. कई बार इसके प्रमोशन समारोह भी हो चुके हैं लेकिन कोई इस फ़िल्म को हाथ लगाने को तैयार ही नहीं है. अब ताज़ा ख़बर ये है कि फ़िल्म की रिलीज़ अनिश्चित काल के लिए टाल दी गई है. दरअसल सनी देओल की पिछली दो फ़िल्में यमला पगला दीवाना-2 और सिंह साहब द ग्रेट के फ़्लॉप होने के बाद अब बतौर स्टार सनी की ताक़त को झटका लगा है. आई लव न्यूयॉर्क के निर्माता विनय सप्रू बेहद निराश हैं. अभिनेत्री आलिया भट्ट अर्जुन कपूर को अपनी ज़िंदगी का बेहद अहम हिस्सा मानती हैं. वो कहती हैं अर्जुन मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं और मेरी ज़िंदगी में ख़ास जगह रखते हैं. वो बहुत मज़ेदार शख़्स हैं. आलिया अर्जुन कपूर के साथ फ़िल्म टू स्टेट्स में काम कर रही हैं. उन्होंने स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर से अपने करियर की शुरुआत की थी. अपने सह कलाकार वरुण धवन के साथ उनके कथित रोमांस की ख़बरें भी मीडिया की सुर्खियां बनीं. इसके बाद अर्जुन कपूर से उनकी नज़दीकियों की ख़बरें भी बॉलीवुड में छाई रहीं. अपने बारे में छप रही इन ख़बरों पर आलिया कहती हैं सितारों की निजी ज़िंदगी की बातें करना मीडिया का काम है. मैं उन्हें दोष नहीं देती. वो अपने काम कर रहे हैं मैं अपना. अपनी दरियादिली के लिए जाने जाने वाले शाहरुख़ ख़ान ने अभिषेक बच्चन को क़रीब 12 लाख रुपए की एक महंगी बाइक गिफ़्ट की. अभिषेक शाहरुख़ की आने वाली फ़िल्म हैपी न्यू ईयर में उनके को-स्टार हैं और अभिषेक के काम से ख़ुश होकर शाहरुख़ ने उन्हें ये तोहफ़ा दिया. शाहरुख़ पहले भी अपने कई साथी अभिनेताओं को तोहफ़े दे चुके हैं. शाहरुख़ और अभिषेक इससे पहले साल 2006 की फ़िल्म कभी अलविदा ना कहना में साथ दिखे थे. |
| DATE: 2014-02-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1140] TITLE: पाक में शूटिंग के लिए सुरक्षा बड़ी समस्या: मीरा नायर |
| CONTENT: जानी मानी फ़िल्मकार मीरा नायर इन दिनों लाहौर में हैं जहां वो लेखकों के सालाना समारोह में हिस्सा ले रही हैं. वो पाकिस्तान के जाने माने लेखक मोहसिन हामिद की चर्चित किताब रिलकटेंट फंडामेंटलिस्ट पर फ़िल्म बना चुकी हैं जो पाकिस्तान में फैले चरमपंथ के बारे में है. इस फ़िल्म में पाकिस्तान के अदाकारों के साथ-साथ गीत-संगीतकारों ने भी अपना योगदान दिया है. मीरा नायर से लाहौर में बीबीसी उर्दू सेवा की नुख़बत मलिक ने बातचीत की. पढ़ें बाचतीच के चुनिंदा अंश. आपने अपनी पूरी फ़िल्म की शूटिंग पाकिस्तान में क्यों नहीं कीमेरी चाहत है कि मैं अपनी पूरी फ़िल्म लाहौर में बना सकूं लेकिन अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों में जिस तरह की सुरक्षा भावना की ज़रूरत होती है केवल कलाकारों के लिए नहीं बल्कि पूरी फ़िल्म क्रू के लिए वह यहाँ पाकिस्तान में नहीं मिल पाती है. पाकिस्तान के नाम को लेकर लोगों में काफ़ी असुक्षा का बोध है. हमें कोई आश्वस्त भी नहीं कर पाता है. इसका मुझे बहुत दुख है. इस वजह से यहाँ के दृश्यों को मैंने दिल्ली में शूट किया. आपकी फ़िल्म को लेकर कहा जा रहा है कि इसमें रेमंड डेविस के चरित्र को दिखाया गया है हमने रेमंड डेविस पूर्व अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंट को सीधे-सीधे नहीं दिखाया है. लेकिन मेरी इच्छा थी कि हम उसे याद करें. उसे भूले नहीं कि रेमंड डेविस था यहाँ. मैं उसे भूलना नहीं चाहती. उसने जो किया उसे मैं भूलना नहीं चाहती. उसके बारे में अख़बारों में छपा. इसलिए उसके बारे में हम जानते हैं. लेकिन उसके जैसे बहुत से लोग हैं यहां. दी रिलक्टेंट फंडामेंटलिस्ट के बारे में यह भी कहा जाता है कि किताब में जो लिखा है यह फ़िल्म उससे अलग है देखिए फ़िल्म और किताब दोनों अलग-अलग माध्यम हैं. मुझे यह किताब बहुत पसंद आई थी. इस किताब की जो आत्मा है कि कौन हैं हम. हम फंडामेंटलिस्ट हैं या कुछ और. ये अमेरिकन कौन हैं. किताब में अमरीकी और पाकिस्तानी के बीच जो संवाद है वह बहुत महत्वपूर्ण है. फ़िल्म और किताब में जो संवाद होता है उसे हम कभी फ़िल्मों में नहीं सुनते हैं. इस तरह की फ़िल्मों का जो बजट होता क्या वह सीमित होता है या पैसा लगाने वाले लोग वाकई इस तरह की फ़िल्मों में दिलचस्पी रखते हैं रिलकटेंट फंडामेंटलिस्ट की फंडिंग की कहानी रामकथा है. यह फ़िल्म तीन बार शुरू हुई और बंद हुई. बहुत मुश्किल थी इस फ़िल्म की फ़ंडिंग. लेकिन अंत में एक ही निवेशक रह गए जो शुरू से इसमें दिलस्चपी दिखा रहे थे वह था दोहा फ़िल्म इंस्टीट्यूट. भारत के युवा फ़िल्मकार किस विषय पर फ़िल्में बना रहे हैं भारत के युवा फ़िल्मकार बहुत अच्छी फ़िल्में बना रहे हैं. ज़ोया अख़्तर की फ़िल्में मुझे बहुत पसंद आती हैं. उनकी पहली फ़िल्म लक बाई चांस मुझे बहुत पसंद आई. किरण राव की फ़िल्म धोबीघाट भी मुझे बहुत पसंद आई. एक और फ़िल्म मैंने जो अभी देखी है और वह अभी रिलीज़ नहीं हुई है वह है किस्सा. यह एक पंजाबी फ़िल्म है जो विभाजन पर आधारित है. एक पंजाबी परिवार पाकिस्तान से भारत आता है उसकी तीन बेटियां हैं. उसी पर आधारित है यह फ़िल्म. पाकिस्तान में पिछले साल 26 फ़िल्में रिलीज हुई. ये फ़िल्में अलग-अलग विषय पर थीं. कराची के विषय पर फ़िल्में बनी. युद्ध पर फ़िल्में बनीं. ऐसे में आपको पाकिस्तान का सिनेमा कहाँ नज़र आता है मुझे लगता है पाकिस्तान का सिनेमा बहुत ही अच्छे मोड़ पर है. पूरी दुनिया में पाकिस्तान को लेकर बहुत दिलचस्पी है. लोग जानना चाहते हैं कि वहाँ क्या हो रहा है. मुझे बोल बहुत पसंद आई. लेकिन इसके बाद भी यहाँ अभी बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है. |
| DATE: 2014-02-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1141] TITLE: मुझे आइटम सॉन्ग पसंद नहीं: यामी गौतम |
| CONTENT: बॉलीवुड में आइटम सॉन्ग कम मेहनत में ज़्यादा पैसे और पहचान बनाने का ज़रिया बनता जा रहा है. सोनाक्षी सिन्हा दीपिका पादुकोण प्रियंका चोपड़ा और करीना कपूर जैसी अभिनेत्रियां कई आइटम सॉन्ग्स कर चुकी हैं. हिसाब सीधा है- इनकी शूटिंग के लिए महज़ एक या दो दिन खर्च करो और करोड़ों की फ़ीस लेकर चलते बनो. लेकिन अभिनेत्री यामी गौतम को ये पसंद नहीं. बीबीसी से ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा मुझे आइटम सॉन्ग पसंद नहीं. इन्हें करने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. यामी गौतम ने आयुष्मान खुराना के साथ फ़िल्म विकी डोनर से अपना करियर शुरू किया था. लेकिन अब डेढ़ साल के लंबे अंतराल के बाद उनकी दूसरी फ़िल्म रिलीज़ हो रही है टोटल स्यापा जो सात मार्च को रिलीज़ हो रही है. इतने लंबे ब्रेक की क्या वजह रही. यामी ने बताया मेरे पास प्रस्ताव तो कई आए लेकिन कुछ दिलचस्प नहीं लगा. टोटल स्यापा की स्क्रिप्ट मेरे पास आई और ये मुझे बहुत अच्छी लगी. इसलिए ये फ़िल्म कर रही हूं. हालांकि यामी ने ये भी बताया कि भविष्य में वो इतना भी ज़्यादा सोच समझकर फ़िल्में नहीं करेंगी क्योंकि वो मानती हैं कि ज़्यादा चूज़ी होना भी ठीक नहीं है. यामी बॉलीवुड में अपना कोई गॉडफ़ादर के ना होने के बारे में कहती हैं अगर आप अंदर से मज़बूत हो. आपको पता है कि आपको क्या करना है. तो किसी गॉडफ़ादर की ज़रूरत नहीं. एक फ़ेयरनेस क्रीम का विज्ञापन करने वाली यामी को ज़्यादा मेकअप करना पसंद नहीं है. टोटल स्यापा में यामी लंदन में बसी एक भारतीय लड़की का किरदार निभा रही हैं जिसे वहीं रहने वाले एक पाकिस्तानी लड़के से प्यार हो जाता है. पाकिस्तानी लड़के का किरदार पाकिस्तानी अभिनेता अली ज़फ़र निभा रहे हैं. अली ने फ़िल्म का संगीत भी दिया है और गाने भी गाए हैं. फ़िल्म की पूरी कहानी महज़ एक दिन की है. इसमें अनुपम खेर और किरण खेर की भी मुख्य भूमिका है और फ़िल्म के निर्माता हैं स्पेशल छब्बीस और अ वेडनसडे बनाने वाले नीरज पांडेय. यामी विद्या बालन रानी मुखर्जी और काजोल को अपना आदर्श मानती हैं. उनकी आने वाली फ़िल्म है एक्शन जैक्सन जिसमें वो अजय देवगन के साथ नज़र आएंगी. |
| DATE: 2014-02-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1142] TITLE: जॉर्ज क्लूनीः फ़िल्म निर्देशन पेंटिग बनाने जैसा |
| CONTENT: हॉलीवुड सुपरस्टार निर्माता और निर्देशक जॉर्ज क्लूनी दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान कलाकृतियों को बचाने वाली टुकड़ी की रोमांचक कहानी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इस पर एक फ़िल्म बनाने की ठान ली. मैंने उनसे नेशनल गैलरी में फ़िल्म द मॉन्यूमेंट्स मेन के लेखन प्रोडक्शन निर्देशन और अभिनय के बारे में बात की. यह फ़िल्म दूसरे विश्वयुद्ध की उस सैन्य टुकड़ी की कहानी है जिसने महत्वपूर्ण कलाकृतियों को हिटलर औऱ नाज़ी सैनिको से बचाने की ज़िम्मेदारी संभाली थी. जॉर्ज क्लूनी बताते हैं कि इस फ़िल्म की कहानी रॉबर्ट एम एडेसल की किताब पर आधारित है. वे इसमें दो कहानियां हैं महिलाओं और पुरुषों का एक समूह रोजेनबर्ग और आइज़नहावर के द्वारा कलाकृतियों की रक्षा के लिए भेजा गया था. विशेषकर यूरोप में इटली की ओर बढ़ती जर्मन सेना से प्रमुख ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी. इस काम के दौरान धीरे-धीरे उनको और ज़्यादा समझ में आया कि हिटलर और नाज़ी सेना जिन देशों को हरा रही थी वहाँ की महत्वपूर्ण कलाकृतियों को चुरा रही थी और सांस्कृतिक धरोहरों को सुनियोजित तरीके से नष्ट कर रही थी. इस युद्ध के दौरान वहाँ भेजे गए इन लोगों का उद्देश्य था कि कैसे महान सांस्कृतिक धरोहरों को बचाया जाए. वहाँ भेजे गए लोगों का मकसद पचास लाख कलाकृतियों को बचाना था. इस फ़िल्म के पात्र बहुत संजीदगी के साथ अपनी भूमिकाओं को निभाते हैं. हमने उनसे पूछा कि इन कलाकृतियों को बचाने के बारे में वो क्या सोचते हैं क्लूनी कहते हैं इस फ़िल्म की कहानी कालकृतियों को बचाने से ज़्यादा यह बताने के बारे में थी कि हिटलर आपकी हत्या ही नहीं करता आपको जीतने के साथ-साथ इन सारी उपलबध्यियों को इतिहास से ऐसे मिटा देना चाहता था जैसे कि उऩका कभी अस्तित्व ही न रहो हो. क्लूनी से हमने यह भी पूछा कि फ़िल्म के अभिनेता प्रोड्यूसर निर्देशक लेखक सारे काम अकेले कैसे कर सकेइसके जवाब में वो बोले ऐसा निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है. दूसरे लोगों को निर्देशित करना खुद को निर्देशित करने की तुलना में ज्यादा मुश्किल काम है. फ़िल्म का निर्देशक एक पेंटर की तरह होता है. लेखन अभिनय निर्देशन सब कुछ एक पेंटिग की तरह है. एक निर्देशक पेंटर वाली भूमिका में इन सारी चीज़ों को एक साथ लाता है. इस फ़िल्म में रूस को थोड़ा नकारात्मक रूप से दिखाया है. हमने क्लूनी से भी इसकी वजह पूछी तो क्लूनी बोले रूस को लेकर दुनिया में इस समय मिली-जुली प्रतिक्रिया है. रूस में समलैंगिकों को लेकर जो रवैया अख़्तियार किया है वो समझ से परे है. हमने क्लूनी से जानना चाहा कि अमरीका में अगर हिलेरी क्लिंटन राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ती है तो क्या वो उनके लिए प्रचार करेंगे क्लूनी ने बग़ैर कोई समय लिए कहा कि हिलेरी स्मार्ट नेता हैं. उनके चुनाव लड़ने को कोई घोषणा तो नहीं हुई है लेकिन हुई तो वो ऐसा करूंगा. |
| DATE: 2014-02-23 |
| LABEL: entertainment |
| [1143] TITLE: पहले तो हमारा मेकअप भी मर्द ही करते थे: माधुरी |
| CONTENT: अस्सी के दशक में अपना बॉलीवुड करियर शुरू करने वाली माधुरी दीक्षित तब से लेकर अब तक यहां क्या बदलाव देखती हैं राजश्री प्रोडक्शंस की अबोध से बतौर अभिनेत्री शुरुआत करने वाली माधुरी को जल्द ही रिलीज़ होने वाली गुलाब गैंग तक फ़िल्मी दुनिया में क्या परिवर्तन देखने को मिले हैंमाधुरी के मुताबिक़ इसका जवाब है महिलाओं की बढ़ती भागीदारी. बात को और स्पष्ट करते हुए माधुरी ने बताया पहले सेट पर हीरोइन और हेयर ड्रेसर के अलावा बाकी सब पुरुष होते थे. यहां तक कि मेकअप भी मर्द ही करते थे. अब स्थिति बदली है. कैमरे के पीछे भी औरतों का योगदान बढ़ रहा है. महिला निर्देशकों के अलावा एडीटर मेकअप आर्टिस्ट और बाक़ी के दूसरे काम भी औरतें संभालने लगी हैं. अपनी आने वाली फ़िल्म गुलाब गैंग के बारे में पत्रकारों से बात करते हुए माधुरी ने ये बातें कहीं. लेकिन ऐसा नहीं है कि सब कुछ बदल गया हो. माधुरी मानती हैं कि अब भी महिला और पुरुष कलाकारों के पारिश्रमिक में काफ़ी अंतर है. वह कहती हैं देखिए फ़ीस में बदलाव के लिए महिला कलाकारों का पारिश्रमिक बेहतर करने के लिए अब भी बहुत प्रयास करने की ज़रूरत है. माधुरी बॉलीवुड ही नहीं पूरे देश में औरतों की स्थिति को बेहतर बनाने की ज़रूरत मानती हैं. वह कहती हैं अब भी कई परिवारों में लड़कों को पढ़ाया जाता है जबकि लड़कियों को शिक्षा नहीं दी जाती. ये बिलकुल ग़लत है. उनके अनुसार अशिक्षा की वजह से ही महिलाओं की स्थिति ख़राब है. और ऐसे समाज में पुरुष भी महिलाओं को इज़्ज़त नहीं देते. इस सोच में बदलाव लाना बहुत ज़रूरी है. फ़िल्म इंडस्ट्री में माधुरी के दोस्त कौन-कौन हैं इसके जवाब में उन्होंने कहा 80 और 90 के दशक में जब मैं बहुत व्यस्त थी तो तीन-तीन शिफ़्ट में काम करती थी. तब किसी से इतना मिलने-जुलने का वक़्त ही नहीं था. तो दोस्ती किसी से हुई ही नहीं. हां अब भी जब मैं अपने पुराने साथी कलाकारों जैसे अनिल कपूर जैकी जी या आमिर शाहरुख़ से मिलती हूं तो बहुत अपनेपन से बात होती है. गुलाब गैंग में माधुरी दीक्षित के साथ जूही चावला की भी मुख्य भूमिका है. दोनों अभिनेत्रियां पहली बार साथ दिखेंगी और माधुरी इसे एक यादगार अनुभव मानती हैं. फ़िल्म के निर्देशक सौमिक सेन हैं और ये सात मार्च को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2014-02-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1144] TITLE: 'दिया और बाती' ने मात दी 'जोधा-अकबर' को |
| CONTENT: डेली सोप्स की दुनिया में दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखने के लिए हर तरह की कोशिशें की जाती हैं. दिया और बाती हम में संध्या जी जान से आईपीएस की ट्रेनिंग में जुटी हैं तो वहीं साथिया में गोपी और अहम की प्रेम कहानी विरह के पथ से गुज़र रही है. इस सप्ताह दिया और बाती हम धारावाहिक फिर से पहले नंबर पर आ गया. शो में संध्या अपने प्यार की ख़ातिर तन मन से आईपीएस की ट्रेनिंग में लगी है. लगता है दर्शकों को भी संध्या की इस ट्रेनिंग में भरपूर लुत्फ़ आ रहा है. लेकिन उम्मीद है कि ट्रेनिंग के दौर को शो के निर्देशक ज़रूरत से ज़्यादा ना खीचें. जोधा और अकबर की प्रेम कहानी भी छोटे पर्दे पर रंग ला रही है और ये शो इस सप्ताह रहा दूसरे नंबर पर. इस सप्ताह तीसरे नंबर पर रहा साथिया. शो में गोपी और अहम के नए लुक की बहुत तारीफ़ें हो रही हैं. शो के प्रशंसकों को इन दोनों ही किरदारों का ये बदला रूप बहुत भा रहा है. वैसे बहु-प्रतीक्षित कॉमेडी शो मैड इन इंडिया की रेटिंग्स अभी आई नहीं लेकिन दर्शकों की शुरुआती प्रतिक्रिया शो के लिए ख़ासी निराशाजनक है. शो में छुटकी बने सुनील ग्रोवर वो जादू जगा ही नहीं पाए जो उन्होंने कॉमेडी नाइट्स विद कपिल में गुत्थी बनकर जगाया था. लेकिन सुनील ग्रोवर ने अपने प्रशंसकों से वादा किया कि धीरे-धीरे शो की गुणवत्ता में सुधार आता जाएगा. देखते हैं सुनील अपने वादे पर कितना खरा उतरते हैं. मनोरंजन चैनलों की रेस की बात करें तो स्टार इस सप्ताह रहा पहले नंबर पर. कलर्स का रहा दूसरा स्थान जबकि ज़ी रहा तीसरे नंबर पर. |
| DATE: 2014-02-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1145] TITLE: आलिया दर्शकों को 'हाईवे' पर कहाँ तक ले जा पाईं |
| CONTENT: नाडियाडवाला ग्रैंडसन और विंडो सीट फ़िल्म्स की हाईवे कहानी है एक ऐसी लड़की की जिसका अपहरण हो जाता है और वो अपने ही अपहरणकर्ता से प्यार करने लगती है. वीराआलिया भट्ट की विनयअर्जुन मल्होत्रा से सगाई हो जाती है. लेकिन शादी से ठीक एक दिन पहले ही कुख्यात अपराधी महाबीर भाटी रणदीप हुडा उसको अग़वा कर लेता है. पहले तो वीरा बहुत डर जाती है लेकिन जल्द ही उसे एहसास हो जाता है कि महाबीर उसे शारीरिक तौर पर कोई नुक़सान नहीं पहुंचाएगा और उसने उसका अपहरण सिर्फ़ पैसों के लिए किया है. महाबीर के साथ रहने के दौरान वो धीरे-धीरे उसे पसंद करने लगती है. महाबीर भी वीरा की मासूमियत और चंचलता से प्रभावित हो जाता है. बल्कि वो महाबीर से बताती है कि अग़वा होने के बाद वो कितना आज़ाद महसूस कर रही है और वो सब कुछ कर पा रही है जो अपने अमीर मां-बाप के साथ रहते हुए वो नहीं कर पा रही थी. वीरा के साथ समय गुज़ारते हुए महाबीर का भी दिल बदल जाता है और वो वीरा को एक पुलिस स्टेशन के नज़दीक छोड़ देता है ताकि वो अपने परिवार वालों से मिल सके. लेकिन तब तक वीरा उससे प्यार करने लगती है और उसे छोड़कर अपने मां-बाप के पास जाना ही नहीं चाहती. आगे क्या होता है यही फ़िल्म की कहानी है. इम्तियाज़ अली की कहानी बिलकुल मौलिक तो नहीं है. हम ये सब दूसरी कुछ फ़िल्मों में भी देख चुके हैं लेकिन फ़िल्म का स्क्रीनप्ले इम्तियाज़ अली बिलकुल ताज़ा है. वीरा और महाबीर के बीच फ़िल्माए दृश्य ताज़गी का एहसास देते हैं और मनोरंजनक भी हैं. वीरा के किरदार में आलिया भट्ट की मासूमियत फ़िल्म का सबसे मज़बूत पहलू है. महाबीर और उसके साथियों की हरकतें और वीरा की सहज स्वाभाविक चंचलता फ़िल्म में आवश्यक कंट्रास्ट लाने में कामयाब होते हैं और यही बात दर्शकों को पसंद आएगी. हालांकि कहानी में गंभीर मोड़ तब आता है जब वीरा अपने बचपन के एक सदमे के बारे में महाबीर को बताती है. लेकिन जल्द ही निर्देशक फ़िल्म में वापस हल्के फुल्का माहौल लाने में कामयाब होता है. हालांकि स्क्रीनप्ले में कुछ कमियां भी हैं. जैसे वीरा के अपहरण के बाद निर्देशक ने लंबे समय तक ये दिखाने की ज़हमत ही नहीं उठाई कि उसके मां-बाप पर क्या बीत रही है और वो क्या क़दम उठा रहे हैं. साथ ही महाबीर का वीरा के प्रति लगाव होना और उसका दिल पिघलना भी बड़ी जल्दबाज़ी में दिखा दिया गया. साथ ही पहली बार आज़ादी का स्वाद चख रही वीरा का अपने अमीर मां-बाप के प्रति ग़ुस्सा भी बहुत सारे दर्शकों के गले नहीं उतरेगा. फ़िल्म का हास्य सीमित दर्शक वर्ग को ही पसंद आएगा. सिंगल स्क्रीन थिएटर्स के दर्शक शायद फ़िल्म को उतना प्यार ना दें. इंटरवल से पहले फ़िल्म ज़्यादा मनोरंजक है. इंटरवल के बाद फ़िल्म में मनोरंजन की कमी है. साथ ही ये हिस्सा खींचा गया और अवास्तविक सा लगता है. फ़िल्म की गति धीमी है. इम्तियाज़ अली के लिखे संवादों में दम है. महाबीर भाटी के किरदार में रणदीप हुडा ने अपने अभिनय का लोहा मनवाया है. उन्होंने एक ऐसे अपराधी का रोल बख़ूबी निभाया है जिसका ह्रदय परिवर्तन हो जाता है. आलिया भट्ट ने तो कमाल का अभिनय किया है. वो अपने किरदार में पूरी तरह से घुस गई हैं. बाकी कलाकारों ने भी उम्दा अभिनय किया है. इम्तियाज़ अली का निर्देशन अच्छा है. उनकी सबसे बड़ी कामयाबी ये रही कि उन्होंने अपने कलाकारों से बेहतरीन काम निकलवाया. एआर रहमान का संगीत अच्छा है लेकिन उनसे इससे कहीं बेहतर काम की उम्मीद थी. आली-आली गाना पहले ही सुपरहिट हो चुका है लेकिन बाकी गानों में वो माद्दा नहीं है जो लोगों की ज़ुबां पर चढ़ जाएं. कुल-मिलाकर हाईवे एक अच्छी फ़िल्म है लेकिन सिर्फ़ बड़े शहर के युवाओं को ही अपील कर पाएगी. |
| DATE: 2014-02-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1146] TITLE: इस बार विदेशी भाषा के ऑस्कर की ये हैं दावेदार |
| CONTENT: विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के ऑस्कर पुरस्कारों को मुख्य पुरस्कारों जितना मीडिया कवरेज नहीं मिलता लेकिन ये पुरस्कार सही मायने में विश्व सिनेमा का परिचय देते हैं. इस वर्ग की फ़िल्मों से हमें पता चलता है कि हॉलीवुड के बाहर दुनिया में कैसी और कौन सी फ़िल्में बन रही हैं. एक नज़र इस बार इस वर्ग की आख़िरी पाँच फ़िल्मों पर. देश- बेल्जियमभाषा- फ्लेमिश गाने अंग्रेज़ी भाषा मेंबेल्जियम का रिकॉर्ड इस श्रेणी में नामांकित होने वाली यह सातवीं फ़िल्म है. हालांकि बेल्जियम कभी जीत नहीं सका है. निर्देशक- फेलिक्स वैन ग्रोइनिंगमकहानी डीडीएर और एलिजे मिलते हैं. डीडीएर अमरीकी संस्कृति का दीवाना है. वो एक म्यूज़िक ग्रुप में बैंजो बजाता है और एलीजे उस ग्रुप की मुख्य गायिका बनकर आती है. दोनों को अमरीकी ब्लूग्रास संगीत पसंद है. दोनों की जल्द ही एक बेटी हो जाती है मेबेले. मेबेले तेज़ बीमार पड़ जाती है. दंपति में इसे लेकर तनाव बहुत बढ़ जाता है. यह कहानी है दुख और उसका सामना करने की कुव्वत के बारे में. फ़िल्म का संगीत काफ़ी उम्दा है. जीत की संभावना- यह फ़िल्म एक नाटक पर आधारित है. फ़िल्म के मुख्य अभिनेता जोहान हैल्डेनबर्ग इस नाटक के सह-लेखक हैं. पिछले साल के बर्लिन फ़िल्म फ़ेस्टीवल में इस फ़िल्म को काफ़ी तारीफ मिली थी. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस फ़िल्म की सराहना हुई है. फ़िल्म के मुख्य कलाकारों ने ज़बरदस्त प्रदर्शन किया है. फ़िल्म की कहानी काफ़ी आमफहम है. फ़िल्म दर्शकों को शायद ही कहीं चकित करती है. कुछ दर्शकों को फ़िल्म की पारिवारिक त्रासदी वाली कहानी पसंद आएगी. कुछ को फ़िल्म का अमरीकी ब्लूग्रास संगीत भाएगा. देश- इटलीभाषा- इतालवीइटली का रिकॉर्ड - इटली को इस श्रेणी में 28 बार नामांकन मिल चुका है. इटली ने अब तक 10 बार यह पुरस्कार जीता है. हालांकि वो आख़िरी बार 1998 में विजेता रहा था. इटली के 10 में से तीन अवॉर्ड साल 1956 के पहले के हैं जब इस पुरस्कार के लिए कोई मतदान नहीं होता था. निर्देशक पाओलो सॉरेन्टिनोकहानी जेप गैम्ब्रडैला टोनी सर्विले रोम में रहने वाला एक सफल पत्रकार है. अपनी जवानी में उसने एक बहु-प्रशंसित उपन्यास लिखा था लेकिन अब वो रोम के कुलीन समाज की मौज-मस्ती में रमा हुआ है. 65 साल की उम्र में वो अपने जीवन और संबंधों के बारे में विचार कर रहा है. जीत की संभावना- इस फ़िल्म ने रविवार को सर्वश्रेष्ठ ग़ैर-अंग्रेज़ी फ़िल्म वर्ग में बाफ़्टा पुरस्कार जीता है. पिछले साल कान पुरस्कारों में यह फ़िल्म समीक्षकों के बीच बेहद लोकप्रिय रही. फ़िल्म में रोम को बहुत दिलकश अंदाज़ मे दिखाया गया है. फ़िल्म के बाद के हिस्से में राजनीतिक पुट ज़्यादा है लेकिन ऑस्कर पुरस्कारों के लिए मतदान करने वाले शायद ही सिल्वियो बर्लुस्कोनी और इटली के राजनीतिक वर्ग के बारे में की गई टिप्पणियों की परवाह करें. देश डेनमार्कभाषा- डेनिशरिकॉर्ड डेनमार्क अब तक 10 बार नामांकित हो चुका है. वर्ष 1987 1988 और 2010 में वो विजेता रहा था. निर्देशक थॉमस विंटरबर्गकहानी लुकास मैड्स मिकेलसन एक स्कूल टीचर है. वह बच्चों में लोकप्रिय है. स्कूल के छात्रों में से एक क्लैरा उससे भावनात्मक रूप से जुड़ जाती है. इसकी वजह शायद क्लैरा के घर पर स्नेह और सुरक्षा का अभाव है. लुकास द्वारा स्वीकार न किए जाने की वजह से क्लैरा उस पर यौन हमले का आरोप लगाती प्रतीत होती है. कुछ दिनों तक सबका चहेता टीचर पूरे समाज के लिए खलनायक बन जाता है. जीत की संभावना दर्शकों में यह ऊहापोह बनी रहेगी कि क्या लुकास पर लगे आरोप सही हैं लेकिन थॉमस विंटरबर्ग इस फ़िल्म में किसी एक व्यक्ति को नहीं बल्कि पूरे समाज को कटघरे में खड़ा करते हैं. मिकेलसन ने हमेशा की तरह शानदार अभिनय किया है. यह फ़िल्म अपना असर महसूस कराने में कामयाब रहेगी और हो सकता है कि ऑस्कर में लोग ग्रेट ब्यूटी पर इसे तरजीह दें. फ़िल्म अंतरराष्ट्रीय दर्शकों और ऑस्कर पुरस्कार दोनों के लिए मुफीद है. देश कम्बोडियाभाषा - फ्रेंचरिकॉर्ड यह कम्बोडिया की पहली प्रविष्टि है. निर्देशक रिथी पान्हकहानी यह फ़िल्म एक डॉक्यूमेंट्री है. हालांकि यह परंपरागत डॉक्यूमेंट्रियों से हटकर है. इस फ़िल्म में 1960 के दशक में पोल पोट के सत्ता में आने के बाद कम्बोडिया में जो कुछ हुआ उसकी कहानी कही गई है. फ़िल्म में पुराने वीडियो फ़ुटेज और तस्वीरों का काफ़ी प्रयोग किया गया है. जीत की संभावना यह फ़िल्म इस वर्ग की सबसे अलग प्रविष्टि है. यह उन दर्शकों को अपील कर सकती है जो ऑस्कर पुरस्कारों में एकरसता की शिकायत करते हैं. देश फ़लस्तीनभाषा अरबीरिकॉर्ड फ़लस्तीन का दूसरा नामांकन है. फ़लस्तीन की ऑस्कर विदेश भाषा में नामांकित पहली फ़िल्म भी इन्हीं निर्देशक की थी. निर्देशक - हैनी अबु-असदकहानी यह फ़िल्म एक युवा फ़लस्तीनी की कहानी है. उसे एक लड़की से प्यार है. उसका भाई उसे एक हथियार बंद दस्ते में शामिल होने के लिए प्रेरित करता है. इस दस्ते के हाथों इसराइल का एक सैनिक मारा जाता है. ओमर को इसराइली उठा ले जाते हैं लेकिन उन्हें लगता है कि ओमर उनके ज़्यादा काम आ सकता है. इसके बाद उसकी ज़िंदगी अनेपक्षित मोड़ लेने लगती है. जीत की संभावना ऑस्कर में नामांकित अपनी पहली फ़िल्म पैराडाइज़ नाओ 2005 की तरह ही यह फ़िल्म भी एक कसी हुई राजनीतिक थ्रिलर है. अबु को पता है कि फ़िल्म में तनाव कैसे बुना जाता है. |
| DATE: 2014-02-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1147] TITLE: सलमान और संगीता: अब भी है याराना |
| CONTENT: सलमान ख़ान की अब भी है दोस्ती बरक़रार अपनी पुरानी गर्लफ़्रेंड संगीता बिजलानी से शाहरुख़ ख़ान के क्यों निकल पड़े आंसू और नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी के बढ़ गए भाव. पढ़िए ख़बरें मुंबई डायरी में. 90 के दशक में सलमान ख़ान और उनकी तत्कालीन गर्लफ़्रेंड संगीता बिजलानी की दोस्ती के चर्चे मीडिया की सुर्खियां हुआ करते थे. लेकिन जल्द ही ये रिश्ता टूट गया. संगीता सलमान की गर्लफ़्रेंड तो अब नहीं हैं लेकिन इऩ दोनों की दोस्ती अब भी बरक़रार है. हाल ही में सलमान ने अपने घर पर कुछ दोस्तों को बुलाया और संगीता भी इस पार्टी में शामिल हुईं. संगीता सलमान के परिवार वालों के साथ डिनर करके देर रात उनके घर से निकलीं. इस पार्टी में फ़िल्म जय हो की हीरोइन डेज़ी शाह भी पहुंची थीं. ग़ौरतलब है कि चैट शो कॉफ़ी विद करण में सलमान ख़ान ने संगीता बिजलानी के साथ अपने रिश्ते की बात खुलकर की थे और ये तक बताया था कि दोनों शादी करने के बिलकुल क़रीब पहुंच गए थे और शादी के कार्ड तक छप गए थे. लेकिन किन्हीं वजहों से ये रिश्ता नहीं हो पाया. हाल ही में अपनी आईपीएल टीम कोलकाता नाइट राइडर्स पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री के कुछ हिस्से देखकर शाहरुख़ ख़ान रो पड़े. जल्द ही इस डॉक्यूमेंट्री का प्रसारण एक चैनल पर होगा. शाहरुख़ ने मीडिया से बात करते हुए कहा मैं अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया. मैं अपनी टीम के सदस्यों को धन्यवाद देता हूं. जब हमने आईपीएल का ख़िताब जीता था तब मेरे लिए बहुत बड़ा क्षण था. शाहरुख़ ने ये भी बताया कि जब एक दफ़ा उनकी टीम लगातार नौ मैच हारी तो वो काफ़ी दुखी भी हुए थे लेकिन उन्होंने अपनी तक़लीफ़ ज़ाहिर नहीं होने दी. वो बोले मैं जानता था कि हमारे खिलाड़ी जान-बूझकर तो हारे नहीं. सबने कोशिश की. शाहरुख़ ख़ान की रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट और जूही चावला ने मिलकर साल 2008 में आईपीएल की कोलकाता नाइट राइडर्स टीम ख़रीदी थी. साल 2012 में इसने गौतम गंभीर की कप्तानी में आईपीएल का ख़िताब जीता था. कई फ़िल्मों में अपने अभिनय के लिए समीक्षकों की वाहवाही हासिल करने के बाद अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी ने कथित तौर पर अपनी फ़ीस बढ़ा दी है. साथ ही उनकी पहली प्राथमिकता सोलो लीड वाली फ़िल्में हैं. नवाज़ुद्दीन ने कम फ़ीस की वजह से बंगिस्तान और भूतनाथ रिटर्न्स जैसी फ़िल्मों के प्रस्ताव ठुकरा दिए हैं. हाल ही में उनकी फ़िल्म मिस लवली रिलीज़ हुई थी जिसे समीक्षकों ने तो सराहा था लेकिन टिकट खिड़की पर फ़िल्म नाकामयाब हो गई थी. |
| DATE: 2014-02-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1148] TITLE: फ़्लोरिडा में महफ़िल जमाने को तैयार बॉलीवुड |
| CONTENT: इस बार इंटरनेशनल इंडियन फ़िल्म एकेडमी पुरस्कार यानी आइफ़ा का आयोजन अमरीका के फ़्लोरिडा के टैम्पा बे में हो रहा है. अप्रैल में होने वाले इस समारोह की जानकारी देने के लिए मुंबई में एक संवाददाता सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें बॉलीवुड के कई सितारों ने हिस्सा लिया. यहां अनिल कपूर करीना कपूर माधुरी दीक्षित से लेकर प्रियंका चोपड़ा जैसे सितारे मौजूद रहे. जब बिपाशा बासु से पूछा गया कि क्या इस समारोह में उनके कथित बॉयफ़्रेंड हरमन बावेजा भी जा रहे हैं तो इसके जवाब में बिपाशा बोलीं मैं वहाँ अकेली जा रही हूँ और किसी भी प्रपोज़ल का स्वागत करती हूँ. मैं उम्मीद करती हूँ कि मुझे वहाँ कोई कुंवारा मिल जाए. जब उनसे कहा गया कि एक अख़बार को दिए इंटरव्यू में तो हरमन ने माना है कि वह बिपाशा को डेट कर रहे हैं तो इसके जवाब में बिपाशा के ही पास बैठे अनिल कपूर बोले डेट और प्रपोज़ल में बहुत अंतर है. क्या अनिल कपूर भी इस साल आइफ़ा में परफॉर्म करेंगे जब उनसे ये पूछा गया तो वह बोले मैं तो आइफ़ा के आमंत्रण का इंतज़ार कर रहा हूँ क्योंकि उन्होंने मुझे परफॉर्म करने के लिए कभी नहीं कहा. सच कहूँ तो मैं बहुत डेस्परेट हूँ. शो में माधुरी दीक्षित और करीना कपूर दोनों ही अपने परफ़ारमेंस को लेकर बहुत उत्साहित हैं. करीना के पति अभिनेता सैफ़ अली ख़ान समारोह में तकनीकी पुरस्कारों की श्रेणी वाला हिस्सा होस्ट करेंगे. सैफ़ ने शो के बारे में जानकारी देते हुए कहा इसकी स्क्रिप्ट कॉमेडियन वीर दास लिख रहे हैं जो बहुत ही बुद्धिमानी और चतुराई के साथ पहले भी कई मज़ेदार चीज़ें लिख चुके हैं. आइफ़ा 2014 का आयोजन 23 से 26 अप्रैल के बीच होगा. |
| DATE: 2014-02-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1149] TITLE: नरगिस और फ़्रीडा की 'बोल्ड' बातें |
| CONTENT: नरगिस फ़खरी और फ़्रीडा पिंटो की बोल्ड बातों की वजह से कॉफ़ी विद करण का समय बदलने पर विचार बेटी सोनम कपूर के लिए कैसा लड़का चाहते हैं पिता अनिल कपूर और मल्लिका शेरावत को चुकानी पड़ी अपने नखरों की क़ीमत. पढ़िए ख़बरें मुंबई डायरी में. मशहूर चैट शो कॉफ़ी विद करण के अगले एपिसोड का प्रसारण समय बदल सकता है. सामान्य तौर पर ये शो रात दस बजे प्रसारित होता है लेकिन इसके अगले एपिसोड का प्रसारण रात 11 बजे होने की संभावना है. इस एपिसोड में अभिनेत्री नरगिस फ़खरी और फ़्रीडा पिंटो साथ में आएंगी. करण जौहर की मेज़बानी वाले इस शो में नरगिस और फ़्रीडा दोनों ने ही इतनी बेबाकी से बातें कीं कि इसे चैनल के अधिकारी प्राइम टाइम के लिए इस एपिसोड को ख़ासा बोल्ड मान रहे हैं इस वजह से इसका टाइम बदलने पर विचार चल रहा है. शो पर मौजूद क्रू सदस्यों का कहना है कि ये एपिसोड कॉफ़ी विद करण का अब तक का सबसे बोल्ड एपिसोड है. अपनी बेटी सोनम कपूर के लिए अनिल कपूर कैसा लड़का चाहेंगे इस सवाल के जवाब में उनका कहना है कि सोनम जिसे पसंद करेंगी वो उसे अपने दामाद के रूप में अपना लेंगे लेकिन वो लड़का सोनम को बहुत प्यार करने वाला होना चाहिए. अनिल के मुताबिक़ वो पैसों को उतना महत्तव नहीं देते. सोनम कपूर की आने वाली फ़िल्म है बेवक़ूफ़ियां जिसमें ऋषि कपूर उनके पिता बने हैं जो उनके लिए पैसों वाला लड़का ढूंढ़ते हैं. फ़िल्म में सोनम के साथ आयुष्मान खुराना की भी मुख्य भूमिका है. बॉलीवुड अभिनेत्री मल्लिका शेरावत को अपने नखरों की क़ीमत चुकानी पड़ी. दरअसल उन्हें एक अमरीकी फ़िल्म प्रोडक्शन कंपनी ने अपनी आने वाली फ़िल्म अ लिटिल हेवन इन मी के लिए कास्ट किया था लेकिन सेट पर उनके नखरों और गैर पेशेवर रवैये से परेशान होकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. मल्लिका लंबे समय से बॉलीवुड से भी ग़ायब हैं. उनकी आख़िरी रिलीज़ थी साल 2012 की किस्मत लव पैसा दिल्ली जो बुरी तरह से फ़्लॉप हो गई थी. |
| DATE: 2014-02-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1150] TITLE: अमन की आशा जो बन गई 'टोटल स्यापा' |
| CONTENT: पाकिस्तानी गायक और अब बॉलीवुड अभिनेता अली ज़फ़र की नई फ़िल्म टोटल स्यापा की रिलीज़ नज़दीक है. हालांकि इस फ़िल्म का नाम पहले ये नहीं रखा गया था. शुरूआत में इसे अमन की आशा नाम दिया गया था. तो क्या वजह थी कि अमन की आशा बदल गई टोटल स्यापा में. इस सवाल का जवाब दिया फ़िल्म के मुख्य अभिनेता अली ज़फ़र ने. बीबीसी से ख़ास बातचीत में अली ज़फ़र ने बतायादरअसल इस फ़िल्म के अंदर इतना स्यापा है कि हमें लगा फ़िल्म का नाम भी टोटल स्यापा होना चाहिए. जो पंजाबी लोग इस शब्द को समझते हैं उन्हें पता है कि स्यापा का मतलब है तबाही. अली का दावा है कि फ़िल्म के अंदर इतना स्यापा मचता है कि आप हंस-हंस कर परेशान हो जाएंगे. वो भी सिर्फ़ इसलिए कि एक लड़का लड़की का हाथ मांगने चला जाता है और वो हिंदुस्तानी है जबकि लड़का पाकिस्तानी. अली ज़फ़र ने अब तक तेरे बिन लादेन मेरे ब्रदर की दुल्हन और चश्मेबद्दूर जैसी फ़िल्मों में काम किया है जिनमें हीरो की ज़िंदगी अक्सर उलझी ही रहती है. यह पूछने पर कि क्या अली की निजी ज़िंदगी में इस फ़िल्म जैसा कुछ स्यापा हुआ है कभी अली कहते हैं जिंदगी में तो चलता ही रहता है. मुझे लगता है सबसे ज़्यादा स्यापा तो राजनैतिक होता है. हर रोज़ टीवी चैनलों पर एक स्यापा होता है लगता है जैसे दुनिया बस ख़त्म ही होने वाली है. मुझे लगता है एक न्यूज़ चैनल होना चाहिए जिसका नाम हो टोटल स्यापा. अली ज़फ़र को हाल ही में एक अख़बार की तरफ़ से दुनिया का सबसे सेक्सी पुरूष घोषित किया गया था. इससे भी बड़ी बात ये है कि उन्होने रितिक रोशन को हराकर ये जगह बनाई. हालांकि अली ख़ुद इस बात पर हैरान हैं. इसका ज़िक्र करने पर अली कहते हैं मुझे नहीं पता कैसे किया है. अच्छी बात है अगर फ़ैंस ऐसा समझते हैं तो. मैं ख़ुशनसीब हूं लेकिन बहुत सारे मर्द मुझसे बेहतर दिखते हैं और शायद सेक्सी भी. टोटल स्यापा में अली ज़फ़र के साथ दिखेंगी अभिनेत्री यामी गौतम. |
| DATE: 2014-02-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1151] TITLE: कबाड़ हैं भारत के फ़िल्म पुरस्कार: अनुपम |
| CONTENT: कॉमेडी पर भी गंभीरता से काम करने वाले अनुपम खेर आजकल फिल्म अवॉर्ड्स देने वालों से काफी ख़फ़ा से लगते हैं. लगभग आठ साल बाद अनुपम खेर का नाम फिल्मफेयर 2013 और स्क्रीन अवॉर्ड्स के सर्वश्रेष्ठ सह-कलाकार की सूची में नामांकन हुआ. यह नामांकन उन्हें मिला था नीरज पांडेय निर्देशित फ़िल्म स्पेशल 26 के लिए. फिल्म स्पेशल 26 में नकली सीबीआई अफ़सर के तौर पर उनका अभिनय दर्शकों और समीक्षकों को काफी अच्छा लगा . पर अंत में ये अवॉर्ड अनुपम को नहीं मिला. अवॉर्ड समारोह को सीधे शब्दों में कबाड़ कहने वाले अनुपम खेर कहते हैं लोगों को लगता है कि शायद मैं बहुत अवार्ड्स जीतता हूँ इसीलिए मुझे छोड़ हर किसी को अवॉर्ड दे दो ऐसी एक सोच बन चुकी है. अवॉर्ड ना मिलने पर अनुपम का कहना है अगर मैंने बेकार ऐक्टिंग की होती और फिर मुझे अवॉर्ड मिलता तो मुझे और बुरा लगता पर अब मुझे पता है कि मैं उनमें से सबसे बढ़िया था इसीलिए मुझे अवॉर्ड नहीं मिला तो तो ठीक है. अवॉर्ड समारोह को टीवी का एक शो और इवेंट बताने वाले अनुपम कहते है हालाँकि ये सब अवॉर्ड कबाड़ हैं पर ना मिलने पर दुःख भी होता है क्योंकि जब काम अच्छा किया हो और अवॉर्ड ना मिले तो तकलीफ़ तो होती है. 28 साल की उम्र में एक 70 वर्षीय वृद्ध का रोल निभाते हुए अनुपम खेर ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपने करियर की शुरुआत की फिल्म सारांश से. इसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के कई अवॉर्ड मिले. सारांश को याद करते हुए अनुपम कहते हैं मैं आज भी सारांश जैसी फिल्म को मिस करता हूँ उस फिल्म ने दिल को जैसे छुआ था आजकल कहाँ ऐसी फिल्में बनती हैं पिछले 30 सालों में तो नहीं बनीं. अगले दो महीनों में लगभग हर हफ़्ते अनुपम खेर की कोई ना कोई फ़िल्म रिलीज़ होने वाली है. अपने आने वाली फिल्मों की बात करते हुए अनुपम का कहना है मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस देश का कोई भी अभिनेता मेरे जैसी रेंज और वेरायटी का अभिनय नहीं कर सकता क्योंकि मैं उम्दा काम इतनी आसानी से कर देता हूँ इसीलिए मेरी कला की कद्र नहीं होती. |
| DATE: 2014-02-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1152] TITLE: ‘सत्यमेव जयते’ का दूसरा सीज़न बिहार से शुरू होगा |
| CONTENT: आइसलैंड में छुट्टी मनाने के बाद आमिर ख़ान अब सत्यमेव जयते के दूसरे सीज़न को लेकर बेहद उत्साहित है. सत्यमेव जयते के पहले एपिसोड की शुरूआत वो बिहार के पर्वत-पुरूष दशरथ मांझी के गाँव से करेंगे. इसे शूट करने वे 22 फ़रवरी को बिहार जाएंगे और वहां मांझी के परिवार और गाँव वालों से भी मुलाकात करेंगे. दशरथ मांझी ने अपने गाँव गहलौर में अकेले 360 फुट का विशाल पर्वत काटकर रास्ता बनाया था. इस काम में मांझी को 22 साल लगे. गाँव में ख़राब चिकित्सा सेवाओं के चलते दशरथ मांझी की पत्नी की मौत हो गई जिसके बाद उन्होंने इस पर्वत को को काट गाँव को शहर से जोड़ने का फ़ैसला लिया. मुंबई बम धमाकों से जुड़े एक मामले में सज़ा काट रहे अभिनेता संजय दत्त की परोल के ख़िलाफ़ याचिका दाख़िल की गई है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ बॉम्बे हाईकोर्ट में दी गई जनहित याचिका में कहा गया है कि संजय दत्त की परोल बढ़ाकर पुणे संभागीय कमिश्नर और यरवदा जेल के सुपरिंटेंडेंट ने अपने अधिकारों का दुरूपयोग किया है. संजय दत्त की परोल की अवधि मंगलवार को तीसरी बार बढ़ाई गई थी. दत्त दिसंबर से ही परोल पर बाहर हैं. उनकी परोल जनवरी में एक महीने के लिए बढ़ाई गई थी. उन्हें 21 फ़रवरी को सरेंडर करना था. आर राजकुमार के बाद सोनाक्षी सिन्हा और शाहिद कपूर एक साथ कॉफ़ी विद करन पर नज़र आए और अब सोनाक्षी ने भी शाहिद के पसंदीदा निर्देशक विशाल भरद्वाज के साथ काम करने की इच्छा जताई है. सोनाक्षी कहती है कि उन्होने अभी तक सभी बड़े नामों के साथ काम कर लिया जैसे की तिग्मांशु धुलिया प्रभुदेवा विक्रमादित्य मोटवाने पर अब वो विशाल भारद्वाज के साथ काम करने की इच्छा रखती हैं. अपने कई इंटरव्यू में शाहिद विशाल को अपना पसंदीदा निर्देशक बताते रहे हैं. फ़िलहाल वो उनके साथ हैदर में काम कर रहे हैं. लगता है सोनाक्षी पर शाहिद की दोस्ती असर कर रही है. |
| DATE: 2014-02-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1153] TITLE: हँसी के शो में, हँसने वाले भाड़े के ? |
| CONTENT: कॉमेडी नाइट्स विद कपिल मैड इन इंडिया कॉमेडी सर्कस और वाह वाह क्या बात है जैसे टीवी पर आने वाले कॉमेडी शोज़ में मौजूद दर्शक बात-बात पर हँसते हैं ठहाके लगाते हैं. कई बार तो ऐसी-ऐसी बातों पर ये लोग हँस देते हैं जो हमें उतनी मज़ेदार ही नहीं लगतीं. ऐसे में ये सवाल उठना लाज़मी है कि क्या वाकई इन शोज़ की विषय वस्तु इतनी बेहतरीन होती है या फिर परदे के पीछे की सच्चाई कुछ और है प्राइम टाइम पर लगातार गूंजने वाली इस हंसी का राज़ क्या है आसिफ़ एक एजेंट हैं जिनका काम है टेलीविज़न के तमाम रियलिटी शोज़ और कॉमेडी शोज़ के लिए नकली दर्शक लाना. आसिफ़ कहते हैं हमसे दर्शक सप्लाई करने को कहा जाता है. इनमें ज़्यादातर कॉलेज स्टूडेंट्स संघर्षरत मॉडल्स और स्ट्रगलर्स होते हैं. इन तमाम शोज़ में मौजूद 50 से 70 प्रतिशत दर्शक नकली होते हैं. आसिफ़ ने ये भी बताया कि इन दर्शकों को साफ़ तौर पर ताली बजाने और हँसने की हिदायत दी जाती है और कई बार तो उन्हें कुछ डायलॉग भी दे दिए जाते हैं या ऊटपटांग गतिविधियां करवाई जाती हैं. आसिफ़ ने ये भी बताया कि शो में इनके बैठने की व्यवस्था कैसे की जाती है. उनके मुताबिक़ अच्छे दिखने वाले लड़के और लड़कियों को आगे की सीट पर बैठाया जाता है. और बाक़ी लोगों को पीछे. इन लोगों की आठ से 12 घंटे की शिफ़्ट होती है लेकिन कई बार कुछ घंटों का इंतज़ार भी करना पड़ता है. इन नकली दर्शको को इसके लिए पैसे दिए जाते हैं. कई संघर्षरत टीवी कलाकार या मॉडल्स इन शोज़ में दर्शकों के रूप में आकर नेटवर्किंग का काम करते हैं ताकि उन्हें आगे काम मिल सके. कई लोगों के लिए ये पैसे कमाने का ज़रिया होता है इसलिए ये लोग बार-बार अलग-अलग शोज़ में जाते रहते हैं. इन्हें टीवी की भाषा में रिपीट ऑडिएंस कहा जाता है. आसिफ़ बताते हैं कि सिर्फ़ वो ही नहीं बल्कि उनके जैसे क़रीब हज़ार एजेंट हैं जो मुंबई में सक्रिय हैं. आसिफ़ जैसे ही एक और एजेंट हैं आज़र जो इन टीवी शोज़ में दर्शक सप्लाई करने का काम करते हैं. वो कहते हैं इन शोज़ में हर तरह के दर्शक चाहिए होते हैं. हम विदेशी लड़कियों से लेकर भारतीय दर्शक छात्र-छात्राएं सभी को यहां भेजते हैं. पहले हम इन्हें ट्रेनिंग देते हैं ताकि शो में कोई ग़लती न हो. आज़र ने बताया कि फ़िल्मी पार्टियों और ऐसे ही दूसरे समारोहों में इन नकली दर्शकों से ये लोग मिलते हैं और नंबरों का आदान-प्रदान करते हैं और इस तरह से ये नेटवर्क काम करता है. कई बार इन शोज़ में देखने को मिलता है कि कोई दर्शक अचानक भीड़ से उठकर स्टेज में आता है और वहां मौजूद स्टार के साथ अजीबोग़रीब मुद्रा में डांस करने लगता है या कोई विचित्र या बेतुकी फ़रमाइश करके अपना ख़ुद का मज़ाक बनाता है. हो सकता है कि टीवी देख रहे लोगों का इससे मनोरंजन होता हो लेकिन आज़र के मुताबिक़ दरअसल इसमें से ज़्यादातर नकली और पूर्वनियोजित होता है. आज़र के मुताबिक़ इन दर्शकों को सिखाया जाता है कि उन्हें कब हँसना है कब रोना है कब नाचना है और कब तालियां बजाना है. कौन बनेगा करोड़पति तमाम कॉमेडी शोज़ और बिग बॉस जैसे शो में यही सब होता है. इन कॉमेडी शोज़ में पिछले पांच-छह महीने से आफ़रीन दर्शक के तौर पर जा रही हैं. वो कॉलेज में पढ़ती हैं और अपनी पॉकेट मनी के लिए नकली दर्शक बनकर इन शोज़ में जाती हैं. वो कहती हैं शुरूआत में तो मुझे मज़ा आता था लेकिन अब मैं बोर होने लगी हूं. कई बार हमारी शिफ़्ट लंबी खिंच जाती है क्योंकि इन शोज़ में आने वाले स्टार्स अपनी लाइन भूल जाते हैं या रीटेक्स लेते हैं. एक ही लाइन को बार-बार रिहर्स करते हैं जिससे सर दर्द करने लगता है. रशीद और रेहान भी ऐसे शोज़ का नियमित हिस्सा हैं. कॉमेडी नाइट्स विद कपिल में कई बार शो के होस्ट कपिल शर्मा वहां मौजूद दर्शकों में से किसी-किसी का बड़ा मज़ाक उड़ाते हैं. इसके पीछे क्या माज़रा है रशीद बताते हैं कोई फ़्री में भला अपनी बेइज़्ज़ती क्यों करवाएगा. जिन दर्शकों का मज़ाक उड़ाना तय होता है उन्हें बाक़ी लोगों की तुलना में ज़्यादा पैसे मिलते हैं. सब कुछ स्क्रिप्ट के हिसाब से होता है. शो में आए स्टार्स से क्या सवाल पूछने हैं क्या बोलना है कब ताली मारनी है सब हमें बताया जाता है. रेहान ने ख़ुद के अनुभव से बताया कि भारतीय दर्शकों को प्रति एपिसोड एक से दो हज़ार रुपये मिलते हैं. बकौल रेहान विदेशी दर्शकों को तीन से चार हज़ार रुपये और खाना मिलता है. सोफ़िया रूस से आई हैं. वो इन शोज़ में जाती रहती हैं. उन्होंने अपने भारतीय दोस्तों से कामचलाऊ हिंदी भी सीख ली है. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा हमें कई बार कोई बात समझ ही नहीं आती लेकिन दूसरों को हँसते देख हम भी हँसने लगते हैं. हम लोग ग्रुप बनाकर ऐसे शोज़ में जाते हैं. तो इन शोज़ में लगातार गूंजने वाली हँसी के पीछे का राज़ है पैसा. पैसे फेंक तमाशा देख. पैसे कर देता है लोगों को हँसने पर मजबूर वर्ना लोगों को अपने आप हँसी कम ही आती है. |
| DATE: 2014-02-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1154] TITLE: क्या 'चुटकी' में हँसा पाएगी 'गुत्थी'? |
| CONTENT: आजकल के दर्शकों से टीवी पर कॉमेडी शो के बारे में पूछा जाए तो शायद ज़्यादातर नाम लेंगे कॉमेडी नाइट्स विद कपिल का. इस शो पर तरह-तरह के किरदार और मेहमान आते हैं लेकिन सबसे लोकप्रिय किरदारों में से एक था गुत्थी का जिसे निभाया सुनील ग्रोवर ने. सुनील ग्रोवर कॉमेडी नाइट्स से अलग हो गए और अब ये किरदार एक नए नाम और पहचान के साथ स्टार प्लस के नए कॉमेडी प्रोग्राम मैड इन इंडिया पर आ रहा है. नाम है चुटकी. हर रविवार को प्रस्तावित इस प्रोग्राम के पहले एपिसोड में मेहमान बनकर आए बाबा रामदेव. मगर शो को देखने की वजह बाबा नहीं चुटकी थी. यह वही चुटकी है जो आज से पहले गुत्थी बनकर टीवी पर कपिल शर्मा के साथ आई. गुत्थी के किरदार की ख़ासियत थी इसका साधारण और सरल चाल-चलन. गुत्थी ने कलर्स के शो कॉमेडी नाइट्स विद कपिल से इतनी प्रसिद्धि पा ली थी कि लोगों ने उसके हाव-भाव की नकल करना शुरू कर दिया था. किरदार बेहद लोकप्रिय हो गया था कि अचानक ख़बर आई सुनील के इस शो से हटने की. बताया जाता है कि अभिनेता सुनील ग्रोवर का शो के निर्माताओं से अनुबंध को लेकर कुछ मनमुटाव हो गया था. मामला नहीं सुलझा और सुनील की गुत्थी को शो से अलग होना पड़ा. रविवार को एक बड़े इंतज़ार के बाद चुटकी पर्दे पर आ गई. सबको इस चुटकी से कुछ अलग करने की उम्मीद थी लेकिन दर्शकों को चुटकी में गुत्थी की ही छवि नज़र आई. उसी वेशभूषा और उसी अदा के साथ सुनील ग्रोवर अपने किरदार चुटकी में कुछ ख़ास फर्क नहीं दिखा पाए. यूट्यूब पर मैड इन इंडिया के पहले एपिसोड के वीडियो के नीचे लिखे कमेंट पढ़कर यही पता चलता है कि गुत्थी का चुटकी अवतार फ़ीका पड़ गया है. टिप्पणियों में एक दर्शक ने लिखा है यह एक फ्लॉप शो है. सुनील कपिल की बराबरी नहीं कर सकेगा. इस शो पर ना मौलिकता है न ही अच्छा कंटेट और अच्छे चुटकुले. एक अन्य दर्शक ने लिखा है पूरे शो पर ज्यादा हंसी नहीं आई पर जब चुटकी स्टेज पर उतरी तो मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट आई. कुल मिला कर अगर लोगों की प्रतिक्रिया की बात की जाए तो उन्हें चुटकी से कहीं ज्यादा की उम्मीद है. चुटकी का किरदार निभा रहे सुनील ग्रोवर का कहना है मैं कुछ नया पुराना नहीं सोच रहा मैंने कोई नए कपड़े तो सिलवाने नहीं है. मेरा उद्देश्य यही है कि मैं अपने किरदार से लोगों को हंसाऊं जिसे लोग पसंद करते हैं मैं वही करूँगा चुटकी के साथ. कपिल के शो पर सुनील जब गुत्थी बनते थे तो उनका साथ निभाती थी पलक. पलक का किरदार निभाने वाले किकु शारदा अब अपने बलबूते पर शो के महिला किरदार पलक को चला रहे हैं. किकु का कहना है किसी के शो से अलग हो जाने से शो को फर्क तो पड़ता है पर इतना नहीं कि शो बंद हो जाए गुत्थी अगर हमारे शो से अलग हुई है तो दो चीज़ें बढ़ी भी हैं. सुनील मेरा दोस्त है और मुझे भी उसकी कमी खली. पर दर्शक पुराना भूलकर आगे बढ़ जाते हैं. फ़िल्म और टीवी विशेषज्ञ श्राबंती चक्रबर्ती मैड इन इंडिया के बारे में कहती हैं मुझे इसका पहला एपिसोड पसंद नहीं आया. शो का फ़ॉर्मेट बुरा नहीं है लेकिन इसमें मनोरंजन के लिहाज़ से थोड़ी कमी है. वे कहती हैं जिस तरह का हास्य दर्शकों को कॉमेडी नाइट्स विद कपिल में देखने को मिलता है उस तरह का हास्य इस शो में बिल्कुल भी नहीं है. बुआ दादी और पलक मैड इन इंडिया के किसी भी पात्र से कहीं बेहतर हैं. मेरे ख़्याल से इन दोनों शोज़ की तुलना नहीं करनी चाहिए पर न चाहते हुए भी ऐसा होगा. मैड इन इंडिया टाइम पास करने का अच्छा जरिया है लेकिन छुटकी गुत्थी से काफी अलग है. क्या दर्शक गुत्थी को भुलाकर चुटकी से काम चलाने को तैयार होंगे. इसका जवाब मैड इन इंडिया के आने वाले एपिसोड में मिलेगा. |
| DATE: 2014-02-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1155] TITLE: होंगे ईद का चांद: कभी शाहरुख़, कभी सलमान |
| CONTENT: पिछले साल ईद पर चेन्नई एक्सप्रेस के साथ 300 करोड़ कमाने वाले शाहरुख़ इस साल ईद पर कोई फ़िल्म रिलीज़ नहीं करेंगे. 2014 की ईद पर सिनेमाघरों का क़ब्ज़ा करेंगे सलमान ख़ान अपनी फ़िल्म किक के साथ लेकिन अगले साल 2015 में ईद की तारीख़ शाहरुख़ ख़ान ने पहले ही अपने नाम कर ली है. सोनम कपूर के साथ शाहरुख़ की फ़िल्म रईस रिलीज़ होगी. ध्यान देने वाली बात ये है कि पिछले कई साल से ईद पर हिट देने वाले सलमान अब दीवाली की रिलीज़ डेट को ज़्यादा महत्व दे रहे हैं. अगले साल दीवाली पर सलमान सूरज बड़जात्या की एक फ़ैमिली ड्रामा में नज़र आएंगे. जानकारों का मानना है कि दीवाली और ईद पर फ़िल्म की रिलीज़ और फ़िल्म का बिज़नेस काफ़ी लाभदायक होता है इसीलिए इंडस्ट्री के हिट ख़ान इन दिनों पर ही अपनी फ़िल्मों को उतारना पसंद करते है. समीक्षकों और आलोचनाओं की दलीलों से परे रणवीर सिंह और अर्जुन कपूर की जोड़ी वाली फ़िल्म गुंडे ने पहले ही हफ़्ते में 43 करोड़ का बिज़नेस कर लिया है. 70-80 के दशक को पुनर्जीवित करने की कोशिश करती इस फ़िल्म ने शुक्रवार को 16 करोड़ का कलेक्शन किया. लगभग 50 करोड़ की लागत से बनी फ़िल्म गुंडे 2000 से ज़्यादा स्क्रीन्स पर रिलीज़ की गई. अभिनेता इमरान हाशमी के दो वर्षीय बेटे अयान का कैंसर का टोरंटो में इलाज चल रहा है. अयान को अभी 15 हफ़्तों के लिए कीमोथेरपी के लिए वहां रहना होगा लेकिन इमरान मुंबई वापस आ गए हैं. आने वाले महीनो में इमरान के पास काफ़ी फ़िल्में हैं जो उन्हें पूरी करनी हैं जैसे शातिर ऊँगली और मिस्टर एक्स. फ़िल्मालय स्टूडियो में इमरान की तस्वीर और उनका गेटअप महेश भट्ट ने ट्वीट किया जिसमें इमरान एक वैज्ञानिक बने हुए हैं. ख़बरों के मुताबिक़ इस साल मई के अंत में इमरान एक बार फिर अपने बेटे अयान के पास टोरंटो जाएंगे. |
| DATE: 2014-02-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1156] TITLE: प्लास्टिक सर्जरी और बॉलीवुड हीरोइनों का रंग रूप |
| CONTENT: हाल ही में अभिनेत्री अनुष्का शर्मा अपने होठों की कथित सर्जरी और बाद में उसके खंडन को लेकर काफ़ी चर्चा में रहीं. टीवी शो कॉफ़ी विद करण के एक एपिसोड में जब अनुष्का आईं तो उनके होठों को लेकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जो चर्चा शुरू हो गई. उससे परेशान होकर उन्होंने ट्विटर में अपनी सफ़ाई देते हुए लिखा मैंने कोई सर्जरी नहीं करवाई है और मेरे होठों के बदले रूप की वजह मेकअप है. ये पहला मौक़ा नहीं है जब किसी बॉलीवुड अभिनेत्री के प्लास्टिक सर्जरी के सहारे ख़ूबसूरती बढ़ाने की बातें मीडिया की सुर्ख़ियां बनी हो. इससे पहले कोएना मित्रा प्रियंका चोपड़ा से लेकर शिल्पा शेट्टी और श्रीदेवी तक की कथित प्लास्टिक सर्जरी की बातें बॉलीवुड में छाई रहीं हैं. पिछले साल की सबसे कामयाब अभिनेत्रियों में से एक और अपने स्टाइल के लिए जानी जाने वाली दीपिका पादुकोण की इस पर क्या राय है. मुंबई में एक पत्रिका से जुड़े समारोह में पहुंची दीपिका ने कहा मैं इस पर कुछ नहीं कह सकती. हर एक का अपना नज़रिया होता है. अगर किसी के लिए प्लास्टिक सर्जरी काम करती है तो बढ़िया है पर जहाँ तक मेरा सवाल है मैं ऐसी किसी भी चीज़ का समर्थन नहीं करती जो प्राकृतिक नहीं है. पिछले साल ये जवानी है दीवानी रेस 2 गोलियों की रासलीला रामलीला और चेन्नई एक्सप्रेस जैसी कामयाब फ़िल्में देने के बाद अब दीपिका की अगली फ़िल्म कौन सी होगी. क़यास लगाए जा रहे हैं कि करण जौहर की अगली महत्वाकांक्षी फ़िल्म शुद्धि में दीपिका के होने की संभावना है. पहले इसके लीड रोल में ऋतिक रोशन के होने की बात थी लेकिन अब वो इस फ़िल्म से अलग हो गए हैं. दीपिका ने इसके बारे में बताया मुझसे अभी तक शुद्धि के लिए किसी ने बात नहीं की है. जब ऋतिक रोशन फ़िल्म में थे मेरी दिलचस्पी इसमें थी और अभी पता नहीं कि उस फ़िल्म का क्या हो रहा है अगर फ़िल्म में ऋतिक नहीं भी हैं तब भी मैं ये फ़िल्म करना चाहूंगी. वो कहती हैं अगर करण जौहर को मुझ पर भरोसा है तो मैं ये फ़िल्म ज़रूर करूंगी. पर मुझे ख़ुद नहीं पता कि उस फ़िल्म के साथ क्या हो रहा है. ऐसी ख़बरें भी आ रही हैं कि अब ऋतिक की जगह रणवीर सिंह इस फ़िल्म का हिस्सा बन सकते हैं. फ़िलहाल दीपिका ने साफ़ किया कि वो इम्तियाज़ अली की अगली फ़िल्म में काम कर रही हैं जिसके हीरो रणबीर कपूर हैं. |
| DATE: 2014-02-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1157] TITLE: पाकिस्तान में फंसी ‘हंसी तो फंसी’ और ‘गुंडे’ |
| CONTENT: पाकिस्तान में मल्टीप्लेक्स दर्शकों में भारतीय फ़िल्मों को लेकर ख़ासा रूझान है लेकिन फ़िलहाल दो ताज़ा भारतीय फ़िल्में देखना उनके लिए मुमकिन नहीं हो पाया. पाकिस्तान के सूचना और प्रसारण मंत्रालय की तरफ़ से इन दोनों फ़िल्मों को नो ऑब्जेक्शन सर्टिफ़िकेट यानी अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं दिया गया है. पाकिस्तान में वरिष्ठ स्तंभकार और मांडीवाला ऐंटरटेनमेंट कंपनी में वितरण निदेशक नवाज़ हसन सिद्दीक़ी ने बताया कि कुछ पुराने फ़िल्मकारों ने कथित तौर पर ग़ैरक़ानूनी ढंग से दिखाई जाने वाली भारतीय फ़िल्मों पर रोक लगाने के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था. इसके बाद ही भारतीय फ़िल्मों को मिलने वाली एनओसी पर रोक लग गई है. नतीजतन हंसी तो फंसी और गुंडे सिनेमा हॉल तक नहीं पहुंच पाई हैं. फ़िल्में ना रिलीज़ होने से पड़ने वाले असर पर बात करते हुए नवाब हसन कहते हैं बिज़नेस पर बहुत असर पड़ता है. सिनेमा हॉल ख़ाली पड़े हैं. ये सिर्फ़ सिनेमा का मामला नही है. एक मल्टीप्लेक्स के अंदर और बहुत सी चीज़ें जुड़ी होती हैं. मिसाल के तौर पर फ़ूड कोर्ट के व्यवसाय पर बहुत असर पड़ता है. सैकड़ों लोग वहां काम करते हैं. साथ ही नवाज़ हसन ये भी जोड़ते हैं कि इस तरह सिनेमा हॉल में रिलीज़ पर रोक लगाने से क्या फ़ायदा जब फ़िल्में डीवीडी और केबिल पर भी दिखाई जा सकती हैं. नुकसान तो सिर्फ़ फ़िल्में दिखाने वाले थियेटर और वितरण चेन ही झेलती हैं. पाकिस्तान में लंबे समय से फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूशन में लगी कंपनी एवरेडी ग्रुप ऑफ़ कंपनीज़ के महाप्रबंधक अज़ीज़ पाशा बताते हैं कि 70-80 फ़ीसदी तक बिज़नेस प्रभावित हुआ है. अंग्रेज़ी फ़िल्मों से भी हमें थोड़ी-बहुत आमदनी हो जाती है मगर वो इस नुक़सान की भरपाई नहीं कर पातीं. हमें पता चला है कि इस बीच तकरीबन 40 पाकिस्तानी फ़िल्मों के प्रोडक्शन का काम शुरू हो चुका है. देखिए क्या होता है. क्या भारतीय फ़िल्मों पर रोक लगने से पाकिस्तानी फ़िल्म उद्योग को कुछ फ़ायदा होने की उम्मीद है. इस सवाल के जवाब में अज़ीज़ पाशा कहते हैंमुझे ऐसा नहीं लगता. फ़िल्मों की गुणवत्ता मायने रखती है और गुणवत्ता वहीं होती है जहां प्रतियोगिता होती है. |
| DATE: 2014-02-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1158] TITLE: कपिल की छलांग और दीपिका की केमिस्ट्री |
| CONTENT: टीवी पर कॉमेडी नाइट्स विद कपिल से कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ने वाले कपिल शर्मा ने एक और ऊंची छलांग लगाई है. जल्द ही कपिल फ़िल्मों में अपनी किस्मत आजमाते नज़र आएंगे. कपिल की पहली ही फ़िल्म किसी छोटे प्रोडक्शन हाउस की नहीं बल्कि यशराज जैसे प्रतिष्ठित बैनर की होगी. यशराज बैनर के यूथ फ़िल्म्स डिवीज़न के प्रोडक्शन में बनने जा रही फ़िल्म बैंक-चोर में वह लीड रोल में दिखाई देंगे. बैंक-चोर कहानी है तीन मूर्ख लड़कों की जो एक बैंक को लूटने का प्लान बनाते हैं और कैसे उनकी बेवक़ूफ़ी की वजह से उनका सारा प्लान धरा का धरा रह जाता है. दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह को लेकर जो चर्चाएं चल रही हैं उसके चलते इन दोनों को आजकल मीडिया के सवालों की बौछार झेलनी पड़ती है. हाल ही में एक कार्यक्रम में दीपिका मिल गई तो घुमा फिरा कर उनसे सवाल पूछा गया रणवीर सिंह के साथ राम-लीला में उनकी कैमिस्ट्री पर. दीपिका ने भी बड़े ही आत्मविश्वास से भर कर कहा जहां तक कैमिस्ट्री का सवाल है उसे कोई निर्देशक नहीं डाल सकता. ये पूरी तरह कलाकारों पर निर्भर करता है. राम-लीला में वैसी कैमिस्ट्री की ज़रूरत थी क्यों वो रोमियो-जूलियट की प्रेम कहानी पर आधारित है. सोनाक्षी सिन्हा ने हैरान कर दिया है. जाने माने फिल्मकार मणि रत्नम की फ़िल्म में काम करने से इनकार करके. यह फ़िल्म ऐश्वर्य राय बच्चन कि वापसी वाली फ़िल्म है जिसमें दो और अभिनेत्रियों की ज़रूरत है. श्रुति हसन इस फ़िल्म का हिस्सा बन चुकी हैं और तीसरी हीरोइन के लिए मणि रत्नम ने सोनाक्षी से संपर्क किया. सोनाक्षी का कहना था कि उन्होंने तारीखों की दिक़्क़्त के चलते फ़िल्म के लिए मना कर दिया. |
| DATE: 2014-02-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1159] TITLE: बाफ़्टा: '12 ईयर्स अ स्लेव' और ग्रैविटी की धूम |
| CONTENT: लंदन में बाफ़्टा अवॉर्ड्स का ऐलान कर दिया गया है. स्टीव मैकक्वीन की 12 ईयर्स अ स्लेव को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का अवॉर्ड मिला है. जबकि अंतरिक्ष ड्रामा पर बनी ग्रैविटी सर्वश्रेष्ठ ब्रितानी फ़िल्म चुनी गई है. ग्रैविटी को विज़ुअल इफ़ेक्ट सिनेमैटोग्राफ़ी बेस्ट साउंड और ओरिजनल म्यूज़िक के लिए भी अवॉर्ड मिले हैं. लंदन के रॉयल ओपेरा हाउस में आयोजित एक शानदार समारोह में 12 ईयर्स अ स्लेव के लिए शूएटल एजियोफ़र को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का अवॉर्ड मिला. ब्लू जैसमिन के लिए केट ब्लैंचेट को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का अवॉर्ड मिला. वहीं अल्फ़ांसो कुआरॉन को ग्रैविटी के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक चुना गया. लियोनार्डो दी कैप्रियो और अमिताभ बच्चन की फ़िल्म द ग्रेट गैट्सबी को प्रोडक्शन डिज़ाइन और कॉस्ट्यूम डिज़ाइन के लिए अवॉर्ड मिले. सोमालिया में जन्मे और अब अमरीका में रह रहे बर्खाद अब्दी को कैप्टन फ़िलिप्स के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का अवॉर्ड मिला है. बर्खाद अब्दी ने इस फ़िल्म से पहले कभी अभिनय नहीं किया था. फ़्रोज़न को सर्वश्रेष्ठ एनिमेशन फ़िल्म का अवॉर्ड मिला. बाफ़्टा अवॉर्ड ऑस्कर से दो हफ़्ते पहले दिए जाते हैं बाफ़्टा को ऑस्कर में कामयाबी का पूर्व संकेत माना जाता है. |
| DATE: 2014-02-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1160] TITLE: 'उम्र के साथ बेहतर शायर, अच्छे पिता बने जाँनिसार अख़्तर' |
| CONTENT: उनके बारे में बात करने में एक परेशानी तो यह होती है कि उनको एक शायर या कवि के रूप में बयान करूं या एक पिता के रूप में. मैं दोनों के रूप में एक-दो बात कह सकता हूं. जब वह पिता बने तो उनकी उम्र रही होगी करीब 27-28 साल. उस ज़माने में पिता की भूमिका कोई साफ़ नहीं थी कि पिता को क्या करना चाहिए और क्या नहीं. इसके अलावा उनके अपने पिता की भी मृत्यु तब हो गई थी जब वह 10-11 साल के रहे होंगे. तो उनके पास कोई रोल मॉडल नहीं था. तीसरे उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी उस वक़्त. तो वह मेरे या मेरे भाई के लिए बहुत आदर्श पिता नहीं रहे. लेकिन जब उनकी उम्र बढ़ी ज़िंदगी का तजुर्बा बढ़ा आर्थिक स्थिति ठीक हुई रहने का नया घर बना जिसमें कुछ सुविधाएं मिलीं रोज़ाना की ज़िंदगी का एक ढांचा बना तो फिर वह काफ़ी ज़िम्मेदार आदमी बने. सच तो यह है कि अपने लिखने में अपने काग़जात रखने में बहुत ही ज़िम्मेदार बहुत ही ख़्याल रखने वाले आदमी थे. स्वभाव से काफ़ी शर्मीले थे ज़्यादा बोलते नहीं थे. अगर वह कहीं किसी दावत में हों और कोई उनके हाथ में प्लेट न पकड़ा दे तो वह खाना भी नहीं खाते भूखे रह जाते. पैसों के मामले में भी ऐसा ही था. जो गाना लिख दिया- लिख दिया. पैसा आएगा तो आएगा मांगते नहीं थे. उस शर्म में पुराने लखनऊ की रवायत भी थी जिसे कुछ लोग कमज़ोरी भी समझ सकते हैं. अब यह इस पर निर्भर करता है कि आप इसे कैसे देखते हैं. लेकिन शाम को एक-दो पैग लगाने के बाद और दो-एक जवान दोस्तों के साथ बैठने पर- जिनमें निदा फ़ाज़ली थे साबिर दत्त थे साबिर कमाल अज़ीज़ कैसी वह ज़्यादा छोटे नहीं थे लेकिन थे छोटे पांच-छह लोग होते थे- वह खुलकर बात करते थे. फिर लतीफ़े सुनाना पुराने क़िस्से सुनाना शेरो-शायरी सुनना और सुनाना. कमाल क्या है कि उनकी शायरी के कई दौर गुज़रे हैं. पहले जवानी में रूमानी शायरी फिर समाज से जुड़ी शायरी. तो लोगों ने कहा कि ख़त्म हो गए यह अब भूल जाओ इनको. लेकिन एकदम से 70 के दशक में जो अचानक यह नई उर्दू शायरी शुरू हुई- जिसमें आसान ज़ुबां जिस्म का भी ज़िक्र और मन की समाज की उलझनों का ज़िक्र नहीं- उसमें भी वह मिल गए. उनका एक शेर है फ़िक्र ओ फ़न की सजी है नई अंजुमन हम भी बैठे हैं कुछ नौजवानों के बीच. बहुत सादा आदमी थे. मेरे ख़्याल से उन्होंने कभी कलाई घड़ी नहीं पहनी न उनके पास कभी कोई बटुआ था. जब-जब पैसे हुए जेब में हुए कभी नहीं भी हुए. उनकी ज़रूरतें बेहद कम थीं. ज़रूरतें बस इतनी ही थीं कि चीज़ें ख़ूबसूरत हों उनके इर्द-गिर्द लोग ख़ूबसूरत हों बातें ख़ूबसूरत हों ज़ुबान ख़ूबसूरत हो. मेरा ख़्याल है ख़ूबसूरती उनका एक मज़हब था. न वह हिंदू थे न मुसलमान. बुनियादी तौर पर ख़ूबसूरती उनका एक मज़हब था. लेकिन दुनिया तो ख़ूबसूरत होती नहीं है हमेशा वह तो चोट पहुंचाएगी. तो जब चोट पहुंचती है तो या तो आप बागी बन जाएं- विद्रोह करें या फिर अपने में सिमट जाएं और अपने अंदर डूब कर उसमें से निकाल कर शायरी करें. तो वह दूसरी क़िस्म के शायर थे. जैसे उनका एक शेर है सुबह की आस किसी लम्हा जो घट जाती है ज़िंदगी सहम के ख़्वाबों से लिपट जाती है. तो वह इस तरह के पुराने लखनवी आदमी थे. बंबई में रहे वह ज़रूर 30-32 साल लेकिन बंबई के कभी हुए नहीं न ही फ़िल्म इंडस्ट्री के हुए. गाने रिकॉर्ड होते थे तो कभी-कभी गानों की रिकॉर्डिंग में नहीं जाते थे. इस वजह से एक दो मज़ेदार ग़लतियां भी हो गईं. जैसे उनका एक मशहूर गाना है ग़रीब जान के तुम हमको न भुला देना तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना. तो उसको गीता दत्त ने गा दिया तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दबा देना. यह ग़लती ठीक हो सकती थी अगर वह वहां मौजूद रहते. तो बंबई में रहकर भी बंबई से बेनियाज़ ही रहे. बुनियादी तौर पर लखनऊ में ही रहते रहे वह ज़िंदगी भर. आमतौर पर उर्दू के शायर उम्र के मध्य में अच्छी शायरी करते हैं. जवानी में कुछ कमज़ोर जब 30-35 के होते हैं तब बेहतरीन शायरी और फिर 50-60-70 हल्के-हल्के उनकी शायरी कम होती जाती है. लेकिन कमाल की बात यह है कि जवानी की उनकी दो-तीन नज़्में अच्छी हैं ख़ासतौर पर जब हमारी मां की मौत हुई तब की. लेकिन उनकी बेहतरीन नज़्में हैं- बुढ़ापे की. हालांकि वह बुढ़ापा भी कोई बुढ़ापा नहीं था करीब 64-65 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई थी. उन्होंने आखिरी उम्र में जो शायरी की है वह बेहतरीन है. ग़ज़ल नज़्म- घर के बारे में बीवी के बारे में- वह बेहतरीन हैं. कुल मिलाकर मेरी राय यह है कि वह एक दिलचस्प आदमी थे जो अपने समाज के नुमाइंदे थे. दिलचस्प ख़ामोश शर्मीले आदमी थे. अमीर परिवार में पले थे पिता की मौत जल्द हो गई थी मां थीं जो बहुत प्रोटक्टिव थीं. इससे उनमें उलझनें पैदा हुईं जो कभी अच्छे ढंग से बाहर निकलीं कभी ख़राब ढंग से. कभी यह अपनी ज़िम्मेदारी से भागने शराब से बाहर आईँ तो कभी शायरी से रचनात्मकता से. |
| DATE: 2014-02-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1161] TITLE: 'रणवीर ! अमिताभ लगते हो तुम.' |
| CONTENT: बैंड बाजा बारात लेडीज़ वर्सेज़ रिकी बहल और लुटेरा जैसी फिल्मों के ज़रिए ध्यान ख़ींचने वाले अभिनेता रणवीर सिंह फिर सुर्ख़ियां बटोर रहे हैं. किसी अभिनेत्री के साथ अपने लिंक अप की वजह से नहीं बल्कि अपनी नई फ़िल्म गुंडे को लेकर. रणवीर का दावा है कि उनके काम को देखकर काफ़ी लोग उनकी सराहना करेंगे. प्रेस से बातचीत के दौरान भी रणवीर आत्मविश्वास से भरे हुए नज़र आए और बताया कि लोग तो उनकी तुलना अमिताभ बच्चन से करने लगे हैं. सबसे ख़ास सराहना के बारे में जब हमने पूछा रणवीर सिंह से तो उन्होंने ज़िक्र किया अमिताभ बच्चन का. वे बोले किसी एक ख़ास व्यक्ति ने जो यशराज बैनर के साथ जुड़े हुए हैं उन्होंने मुझे कहा कि यार तुम्हें देखकर अमिताभ बच्चन के जवानी के दिन याद आ गए. तो ये मेरे किरदार के लिए सबसे बड़ी सराहना है. और ये इस वजह से भी काफ़ी ख़ास है क्योंकि फ़िल्म इंडस्ट्री में आने की प्रेरणा मुझे अमिताभ बच्चन से ही मिली. वे कहते हैं मैं एक अभिनेता बनना चाहता था क्योंकि मैं बहुत सारी हिंदी फ़िल्में देखता था और मैं वो सब करना चाहता था जो उस फ़िल्म का हीरो किया करता था. जितनी भी फ़िल्में मैंने देखीं उन सब में अभिनेता सिर्फ़ अमिताभ बच्चन ही थे. तो मेरे हीरो बनने के पीछे बच्चन साहब का बहुत बड़ा हाथ है. फ़िल्म गुंडे में रणवीर बिक्रम का किरदार निभा रहे हैं. रणवीर सिंह ने अब तक 4 फ़िल्मों में काम किया है और वो मानते हैं की उनकी पांचवी रिलीज़ यानी गुंडे अब तक की सबसे ज़्यादा एनर्जी वाली फ़िल्म है. वे कहते हैं अब तक मैंने जितनी भी फ़िल्में की हैं गुंडे में उन सबसे ज़्यादा एनर्जी है. अली अब्बास ज़फ़र जिन्होंने गुंडे का निर्देशन किया है उनका इस फ़िल्म के दौरान एक तकिया क़लाम बन गया था. वो हमें कुछ ऐसे निर्देश देते थे रेडी रोल कैमरा एनर्जीवे कहते हैं जो भी लोग हमारे साथ थे क्रू में वो भी काफ़ी जवान थे तो एनर्जी सबमें कूट-कूट कर भरी थी और ये सारी एनर्जी आपको दिखेगी फ़िल्म गुंडे में. |
| DATE: 2014-02-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1162] TITLE: हर्फ-ब-हर्फ हरफ़न मौला – आई एस जोहर |
| CONTENT: एक लफ्ज़ है हरफ़न मौला. इस एक लफ्ज़ को अगर किसी नाम में बदला जाए तो एक नाम हो सकता है आईएस जोहर. पूरा नाम इन्द्र सेन जोहर. पैदाइश पंजाब के चकवाल जिले की तलागंग तहसील अब पाकिस्तान में16 फरवरी 1920 को. 10 मार्च 1984 को इस दुनिया से रुख़्सत हुए. मगर जाने से पहले अपने कारनामों की बदौलत एक यादगार इंसान बन गए. सबसे पहले एक मशहूर फ़िल्म कलाकार जो कभी फ़िल्म का हीरो तो कभी हास्य अभिनेता की तरह पर्दे पर नज़र आता. लेकिन पर्दे से परे वे लेखकनिर्माता-निर्देशक भी थे. असल में उनके फ़िल्मी सफर की शुरूआत ही प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक रूप के शोरी की फ़िल्म एक थी लड़की के लेखक के तौर पर ही हुई. इसी फ़िल्म में हास्य अभिनेता मजनू के साथ जोड़ी बनाकर एक भूमिका भी निभाई. अगले 35 बरस तक जोहर पर्दे पर लगातार छाए रहे. दिलीप कुमार देवानंद शम्मी कपूर राजेश खन्ना जॉय मुखर्जी जैसे कई सितारों के साथ हास्य भूमिकाओं के अलावा किशोर कुमार के साथ बेवक़ूफ1960 अकलमंद1966 और श्रीमान जी 1968 और महमूद के साथ जोहर-महमूद इन गोआ 1965 जोहर-महमूद इन हांगकांग 1971 में जोड़ी बनाकर मुख्य भूमिकाओं में भी काम किया. अपनी फ़िल्म जोहर-महमूद इन गोआ की कामयाबी से इतने उत्साहित हो गए कि उन्होंने अपने ही नाम से दो और फ़िल्में जोहर इन काश्मीर 1966 और जोहर इन बाम्बे भी बना डालीं. दोनो ही फ़िल्में फ्लॉप हुईं. अलबत्ता विजय आनंद के निदेशन में बनी सुपर हिट फ़िल्म जॉनी मेरा नाम1970 में अपनी तिहरी हास्य भूमिका के लिए उन्हें फ़िल्मफेयर अवार्ड ज़रूर मिला. इस फ़िल्म में उनके तीनों रूप पहलाराम दूजाराम और तीजाराम आज भी दर्शकों के दिलों में आज भी ज़िंदा हैं. इसी तरह फ़िल्म शागिर्द में जॉय मुखर्जी के साथ उनकी अधेड़ उम्र के आशिक़ की भूमिका भी यादगार है. फ़िल्म के प्रसिद्ध गीत बड़े मियां दीवाने ऐसे न बनोहसीना क्या चाहे हमसे सुनो के बजते ही जोहर का चेहरा नज़र आने लगता है. मगर फ़िल्मों में अभिनय करने भर से कोई हरफ़न मौला कहलाने का हक़दार नहीं हो जाता. उसके लिए बहुत कुछ ऐसा करना होता है जो अमूमन नहीं होता. अब जैसे आईएस जोहर ने दो बार एमए किया. पहली बार अर्थशास्त्र में दूसरी मर्तबा राजनीति शास्त्र में. फिर भी दिल नहीं माना तो वकालत की डिग्री हासिल करने के लिए एलएलबी भी कर डाला. पेशा चुनने का मौका आया तो पेशा इख्तियार किया फ़िल्म लेखक और अभिनेता का. पहला कदम सही पड़ा तो फिर डायरेक्टर भी बन गए. मौका दिया उस दौर के धुरंधर निर्माता फिल्मिस्तान के एस मुखर्जी ने उन्हें फ़िल्म श्रीमती जी 1952 और उसके बाद नास्तिक के लेखन-निर्देशन का. नास्तिक की ज़बरदस्त कामयाबी ने जोहर को स्थापित किया. इस जगह एक बात का ज़िक्र करना मुनासिब होगा. फ़िल्म नास्तिक की कहानी 1947 के बंटवारे में विस्थापित होकर आए लोगों के दुख-दर्द की कहानी है जो असल में जोहर के अपने निजी अनुभवों की ही कहानी पर ही आधारित है. फ़िल्म का नायक जीवन की उथल-पुथल से घबराकर ईश्वर में आस्था खो देता है और नास्तिक बन जाता है. विख्यात निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा इस फ़िल्म में जोहर के असिस्टेंट डायरेक्टर थे. दरअसल यश चोपड़ा के बड़े भाई बीआर चोपड़ा फ़िल्म जगत से निराश होकर पत्रकारिता की ओर लौटने की तैयारी में थे तब जोहर ने जो कि लाहौर के दिनों से उनके मित्र थे उन्हें अपनी लिखी एक कहानी देकर फ़िल्म बनाने का हौसला दिया था. किस्मत से वह फ़िल्म बेहद कामयाब हुई और बीआर चोपड़ा के पांव पूरी तरह जम गए. इस फ़िल्म का नाम था अफ़साना 1951. फ़िल्म के हीरो थे अशोक कुमार. इस फ़िल्म की कामयाबी से सीनियर चोपड़ा साहब जोहर की प्रतिभा से इतने मुतासिर हो गए कि उन्होंने अपने छोटे भाई को बजाय अपना असिस्टेंट बनाने के जोहर के पास भेज दिया. अब यह दीगर बात है कि यश चोपड़ा बाद में बड़े भाई की शागिर्दी करके ही यश चोपड़ा बन पाए. लेकिन उन्होंने हमेशा इस बात को याद रखा कि जोहर उनके पहले गुरू थे. जोहर कुछ-कुछ शौक से और कुछ-कुछ आदत से शायद सब कुछ ही करते थे. मसलन इश्क़. उन्होंने उम्र भर अनगिनत इश्क़ किए और शायद आधा दर्जन शादियां भी कीं. पहली पत्नी रमा बंस से भले ही आख़िर तक प्रेम का नाता बना रहा लेकिन अलगाव काफ़ी पहले हो गया था. फिर उनकी ज़िंदगी में प्रोतिमा बेदी भी आईं. प्रसिद्ध कैमरामैन जाल मिस्त्री की पत्नी को भी वे एक क्रिकेट मैच देखते-देखते ले उड़े. याद पड़ता है कि एक बार बातचीत में उन्होंने बताया था कि जब वे लाहौर के एफसी कालेज में छात्र थे तो कोई लड़की उन्हें घास नहीं डालती थी. वजह यह कि उस वक़्त वे काफ़ी दुबले-पतले थे और हड्डियों का ढांचा भर नज़र आते थे. तब उनकी नाक ज़रूरत से ज़्यादा बाहर भागती हुई लगती थी. अपनी इसी कमज़ोरी को ढकने के लिए और लड़कियों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उन्होंने लिखना शुरू कर दिया. पहले कुछ लेख और फिर नाटक लिखना शुरू किया. ज़ाहिर है कि वे अपने मक़सद में कामयाब हुए. कामयाब न होता तो लिखता ही क्यों रहता उन्होंने कहा था. उनकी शुरुआती फ़िल्में उनके इस बयान की ताईद करती हुई लगती हैं. साठ के दशक में कामयाबी की चर्बी जिस्म पर चढ़ी तो हुलिया कुछ बेहतर हुआ. और दीगर कारनामों में जोहर क्रिकेट प्रेमी उर्फ क्रिकेट खिलाड़ी भी थे. जब-जब किसी सामजिक कार्य में मदद के लिए फ़िल्मी सितारों के क्रिकेट मैच होते तो जोहर अपनी चटपटी कमेंट्री और ठहाकेदार बैटिंग और बॉलिंग से रंग जमा देते थे. लेकिन भारतीय टीम के मैच बड़े संजीदा तरीके से देखते और टीम का हौसला भी बढ़ाते थे. क्रिकेट से भी ज़्यादा उनकी दिलचस्पी थी राजनीति में. नेताओं का मखौल उड़ाने में उन्हें बहुत मज़ा आता था. अपनी फ़िल्मों के ज़रिए वो देश के हालात पर फ़िल्में बनाकर टिप्पणी करते थे. गोआ की आज़ादी की लड़ाई पर जोहर-महमूद इन गोआ बनाई तो कश्मीर के मसले पर जोहर इन काश्मीर. बांग्लादेश की बात आई तो जय बांग्ला देश बना डाली. इंदिरा गांधी की इमर्जेंसी से नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए नसबंदी1978 बना डाली. यह सारी फ़िल्में फ़िल्म निर्माण के स्तर की दृष्टि से न तो अच्छी फ़िल्में थी और न ही कामयाब फ़िल्में लेकिन जोहर का अपना अंदाज़ था और बात कहने की ज़िद थी. इसी बात कहने की ज़िद की ख़ातिर ही वे अक्सर चुनाव में भी स्वतंत्र उम्मीदवार की हैसियत से खड़े हो जाते थे और अपने भाषणों और बयानों से राजनेताओं को दुखी करते रहते थे. वर्ष 1977 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध फ़िल्म वालों ने जनता पार्टी को मदद की. जब जनता सरकार ने भी निराश किया तो जोहर के निशाने पर समाजवादी नेता राज नारायण आ गए जो उस समय सरकार में मंत्री भी थे. जोहर जब-तब उनको अपने बयानों से छेड़ते थे. उन्होने घोषणा कर दी कि जहां से भी राज नारायण चुनाव लड़ेंगे वे उनके विरुद्ध खड़े होंगे. नेताजी के नाम से लोकप्रिय राजनारायण जी उनसे काफ़ी परेशान रहे. यह और बात है कि फ़िल्मों में उनकी कॉमेडी पर हंसने वालों ने चुनाव में उनको कभी गंभीरता से नहीं लिया. यह भी सच है कि वे ख़ुद भी अपने चुनाव को गंभीरता से नहीं लेते थे. अंग्रेज़ी फ़िल्म पत्रिका फ़िल्मफेयर में उनका सवाल-जवाब का कॉलम क्वेश्चन बाक्स बेहद पापुलर था. 1978 में जब मेनका गांधी ने सूर्या नाम से एक पत्रिका शुरू की तो उसमें आईएस जोहर का एक कॉलम भी छपता था री-राईटिंग आफ़ द हिस्ट्री जिसमें वे तात्कालिक राजनतिक-सामाजिक घटनाओं पर व्यंग लिखते थे. उन्होने ख़ुद को भले ही कभी गंभीरता से न लिया हो लेकिन हॉलीवुड ने उनको बड़ी गंभीरता से लिया. इसी कारण उनको हैरी ब्लैक 1958 नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर 1959 लारेंस आफ़ अरेबिया 1962 और डेथ आन द नाईल 1978 जैसी फ़िल्मों में कास्ट किया. जिस वक़्त पाकिस्तान में जनरल ज़िया-उल-हक़ ने ज़ुल्फिकार अली भुट्टो का तख़्ता पलट कर फांसी देने का षड़यंत्र रचा तब इस विषय पर आईएस जोहर ने एक नाटक लिखा था भुट्टो जो बहुत चर्चित भी हुआ और प्रशंसा भी पाई. इस नाटक के अलावा जोहर ने लगभग एक दर्जन और भी नाटक लिखे लेकिन वे इतने चर्चित नहीं हुए. 10 मार्च 1984 को सात महीने की लंबी बीमारी के बाद उनका देहांत हो गया. मरने से पहले तक उनके सेंस आफ ह्यूमर में कोई कमी नहीं आई. मृत्यु के दो-तीन दिन पहले उन्होंने अपने बेटे अनिल और बेटी अंबिका को बुलाकर कहा था मेरे मरने की ख़बर छपे तो मुझे अख़बार भेजना मत भूलना. |
| DATE: 2014-02-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1163] TITLE: जब रजनीकांत के लिए बेच दिया अपना घर |
| CONTENT: क्या ऐसा कोई फैन या प्रशंसक हो सकता है जो अपने पसंदीदा अभिनेता के पोस्टर छपवाने के लिए ख़ुद का घर बेच देहां ज़रूर हो सकता है जब यह अभिनेता और कोई नहीं बल्कि सुपर स्टार रजनीकांत हों तो. ऐसे एक नहीं बल्कि कई प्रशंसक डॉक्युमेन्ट्री फिल्ममेकर रिंकु काल्सी की डॉक्युमेन्ट्री फिल्म फ़ॉर दी लव ऑफ अ मैन में देखे जा सकते है. एम्स्टर्डम में रहनी वाली और मुंबई में पली-बढ़ी रिंकु काल्सी ने अभिनेता रजनीकांत के प्रशंसकों पर डॉक्युमेन्ट्री बनाने का निर्णय किया तब शायद उन्हें कल्पना भी नहीं थी कि यह अनुभव उनके लिए कितना ख़ास रहेगा. चार साल से इस डॉक्युमेन्ट्री पर काम कर रही रिंकु ने बीबीसी से बात करते हुए बताया मैं एम्स्टर्डम में टेलीविजन के लिए एडिटिंग और अन्य कमिशन्ड प्रोजेक्ट्स पर काम करती हूं. मेरे मित्र और इस फ़िल्म के प्रोड्यूसर जॉयोजीत पाल के साथ बातचीत के दौरान मुझे दक्षिण भारत में रजनीकांत के क्रेज़ के बारे में पता चला और वहीं से इस डॉक्युमेन्ट्री का विचार आया. जॉयोजीत पाल मिशीगन यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं और नेत्रहीनों के लिए उपयोगी टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में शोध कर रहे हैं. उन्होंने हमें ईमेल से बताया मैं तमिलनाडु के अत्यंत गरीब और अंदरूनी इलाक़ों के बच्चों में कम्प्यूटर की जानकारी को लेकर शोध कर रहा था. यह उस साल की बात है जब रजनीकांत की फिल्म शिवाजी रिलीज़ हुई थी. सारे बच्चे कंप्यूटर इंजीनियर बनना चाहते थे क्योंकि शिवाजी फ़िल्म में रजनीकांत ने कंप्यूटर इंजीनियर की भूमिका की थी और अपने लैपटॉप की मदद से देश को बचाते हैं. उनका कहना है मजे की बात यह थी कि इन बच्चों ने वास्तव में कंप्यूटर देखे तक नहीं थे. उनके माता-पिता भी इस फिल्म से इतने ही प्रभावित थे. जब रजनीकांत की लोकप्रियता के बारे में और जानने की कोशिश की तब लगा इस पर डॉक्युमेन्ट्री बननी भी चाहिए. अगर रजनीकांत फैन क्लब में आप कोई महत्वपूर्ण स्थान पाना चाहते हो तो कुछ ख़ास करना ज़रूरी है. चेन्नई के गोपी चने बेचते हैं. गोपी को उनके इलाके के फैन क्लब में बढ़त पाने के लिए सुपरस्टार के 1500 पोस्टर छपवाने का आदेश दिया गया. यह उस वक्त की बात है जब 2005 में रजनीकांत की फ़िल्म चंद्रमुखी रिलीज़ हो रही थी. रिंकु ने बताया इनके लिए फैन क्लब में बढ़त बहुत बड़ी बात है और जब दूसरा कोई रास्ता नहीं दिखा तो गोपी ने अपना छोटा सा घर सिर्फ़ एक लाख रुपए में बेचकर पोस्टर छपवाए जबकि उन्हें इसके तीन लाख मिल सकते थे. दो महीने तक वह अपने पूरे परिवार के साथ फुटपाथ पर रहे. रिंकु ने साल 2010 में इंदीरन हिन्दी में रोबोट के रिलीज से पहले चेन्नई में प्रशंसकों और फिल्म समीक्षकों के इंटरव्यू लेने शुरू किया. सुबह चार बजे फिल्म का पहला शो दिखाया जाने वाला था. रजनीकांत के बड़े कटआउट पर दूध का अभिषेक किया जा रहा था. फिल्म की सफलता के लिए पूजा-आराधना चल रही थी. वेल्लौर के पास एक गाँव में रहने वाले एन. रवि रजनीकांत की फैन क्लब के प्रमुख हैं. इंदीरन की सफलता के लिए वो फैन क्लब के सदस्यों के साथ पूजा की थाली ले कर गाँव के पास के मंदिर की 1300 सीढ़ियां अपने घुटनों के बल चढ़े थे. साल 2012 में जब रजनीकांत बीमार थे तब दिसंबर में उनके जन्मदिन पर उनके घर के बाहर बहुत भीड़ जमा हुई थी और रजनीकांत ने घर की बालकनी में आकर फैंस का अभिवादन किया था. कुछ समय बाद उन्होंने वहाँ आए लोगों को संबोधित किया और फैंस को खुद के ठीक होने का यकीन दिलाया. उन्होंने इस भाषण में अपने फैंस को स्वास्थ्य संभलने की सूचना दी. धूम्रपान जैसी आदतें छोड़ने की बात कही. रिंकु ऐसे कई फैंस से मिली जिन्होंने अपने घरवालों की बात सालों तक नहीं मानी थी लेकिन रजनी सर ने बोला इसलिए धूम्रपान बंद कर दिया. दुनिया भर में रजनीकांत के 66000 फैन क्लब हैं. रजनीकांत को ही अपने फैंस से अनुरोध करना पड़ा कि वो अब और नए फैन क्लब न बनाएँ. फिर भी काफी फैन क्लब रजिस्टर नहीं किए गए हैं और युवा फैंस ने ऑनलाइन क्लब बनाए हैं. ये सभी क्लब रजनीकांत की फिल्में रिलीज़ होने पर मन्नत पूजा हवन जैसे कार्यक्रम करते हैं और सुपरस्टार के नाम से चंदा इकट्ठा करके गरीबों को और विकलांगों को दान देते हैं. ये क्लब रक्तदान कैंप जैसे आयोजन भी करते हैं. इन क्लब में 16 साल से लेकर 90 साल के उम्र के फैंस हैं. जॉयोजीतने बताया यह फिल्म एक सामाजिक टिप्पणी है उन प्रशंसकों के बारे में जो अपने स्टार की फिल्म रिलीज़ होने पर सेंटर स्टेज पर आते हैं. यह उनकी खुद की प्रसिद्धि की पंद्रह मिनट होते हैं. इस फिल्म से सिर्फ प्रशंसक ही नहीं बल्कि हर वो व्यक्ति जुड़ेगा जो भारतीय सिनेमा से परिचित नहीं है. रिंकु इस साल अप्रैल में रिलीज़ होने वाली रजनीकांत की फिल्म कोचाडियन के दौरान भी उनके फैंस की गतिविधियों को दर्ज करेंगी. तीन साल बाद रजनीकांत की फिल्म रिलीज़ हो रही है तो फैंस के लिए इसके बहुत मायने हैं. चार साल बाद खत्म होने वाला यह प्रोजेक्ट कई फिल्म फेस्टिवल में दिखाया जाएगा. रिंकु जिस भी प्रोजेक्ट पर काम करती हैं उससे कमाया हुआ सारा पैसा इस डॉक्युमेन्ट्री के निर्माण में लगा देती हैं. कुछ हद तक उन्होंने इंटरनेट के जरिए भी इस प्रोजेक्ट के लिए पैसे जमा किए हैं. हालांकि फिल्म बनाने के लिए चेन्नई में उनके साथ काम करने वाले क्रू ने के सदस्यों ने उनसे कहा यह रजनी सर पर बन रही फ़िल्म है तो हम आपके लिए निःशुल्क काम करने के लिए भी तैयार हैं. रिंकु ये बताते हुए कहतीं हैं ऐसा है सुपरस्टार रजनीकांत का जादू. इन फैंस के दीवानेपन में कोई कमी तक नहीं है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है की सामान्य बस कंडक्टर से स्टार बनने का सफर और गहरी सफलता के बाद भी नम्रता से भरी रजनीकांत की प्रतिभा इन फैंस के लिए एक प्रेरणा बन चुकी है और अब तो मैं भी उनकी फैन हो चुकी हूँ. |
| DATE: 2014-02-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1164] TITLE: कपिल शर्मा को 'चुटकी' से चुनौती ! |
| CONTENT: टेलीविज़न धारावाहिकों को हफ़्ते दर हफ़्ते अपने दर्शकों को अपने साथ जोड़ रखने की जुगत भिड़ानी पड़ती है. प्रतियोगिता इतनी तगड़ी है कि कौन कब आगे निकल जाए क्या पता. इस हफ़्ते चमत्कार कर दिखाया एकता कपूर की पेशकश जोधा-अकबर ने और सबको हैरत में डाल दिया. नंबरों की जंग में जोधा अकबर पहले नंबर पर रहा. हालांकि अब चुनौती इस नंबर पर बने रहने की है. दूसरे स्थान पर है सूरज और संध्या की प्रेम कहानी वाला शो दिया और बाती. शो में संध्या की सजाने-संवारने के लिए प्रवेश हुआ है रॉय का और संध्या इस बात को लेकर बहुत ख़ुश भी है. रॉय लगातार संध्या को प्रेरित करती रहती है. सास और बहुओं की दास्तां साथिया साथ निभाना टेलीविज़न धारावाहिकों की दौड़ में तीसरे नंबर पर रहा. अपने ससुर जी का घर दोबारा बसाने की जुगत में लगी अक्षरा की सफलता तो बाद में पता चलेगी. फ़िलहाल ये शो दर्शकों को अपनी ओर खींच रहा है और चौथे नंबर पर है. कॉमेडियन कपिल शर्मा का शो कॉमेडी नाइट्स विद कपिल पांचवे नंबर पर है लेकिन लगता है आगे उनके लिए यहां बने रहना मुश्किल होगा क्योंकि से स्टार प्लस पर शुरू हो रहा है मैड इन इंडिया. शायद कपिल शर्मा इस बात से बख़ूबी वाकिफ़ हैं और इसलिए शो पर शादी हो रही है बुआ यानी उपासना सिंह की. दूल्हा बनेंगे अभिनेता रज़्ज़ाक ख़ान उर्फ़ गोल्डन भाई. ऐसा सुनने में आया है कि रज़्ज़ाक ख़ान की पारी कपिल के परिवार में लंबी होगी. इस हफ़्ते स्टार प्लस की रणनीति चल निकली है. इस हफ़्ते से यह चैनल सारे डेली सोप हफ़्ते में छह दिन दिखाना शुरू कर चुका है. इसका ज़बरदस्त सकारात्मक असर चैनल के टीवीटी टेलिविज़न व्यूअरशिप इन थाउसंड्स् पर नज़र आ रहा है. चैनल ने 101 मिलियन की छलांग लगाई है. ख़ास बात यह है कि इससे पहले वर्ल्ड कप के दौरान 645 मिलियन का टीवीएम मिला था और इतने अंतर के बाद स्टार प्लस ने इस आंकड़े को छुआ है और इसका श्रेय जाता है स्टार गिल्ड अवॉर्ड्स को. होता भी क्यों नहीं आख़िर जिस शो में इंडस्ट्री के करन-अर्जुन यानी शाहरूख़ और सलमान ख़ान गले मिलेंगे तो दर्शक तो उसे देखने के लिए जुटेंगे ही. स्टार गिल्ड अवॉर्ड्स को मिला 8. 1 टीवीएम. चैनलों की दौड़ में स्टार प्ल्स पहले नंबर पर बना हुआ है. ज़ी का नंबर उसके बाद है. कलर्स का स्थान तीसरा है जबकि लाइफ़ ओके चैनल का चौथा नंबर है. अपने कॉमेडी धारावाहिकों के बल पर टिके रहने वाला चैनल सब टीवी नंबरों की लिस्ट में पांचवे नंबर पर है. |
| DATE: 2014-02-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1165] TITLE: फ़िल्म रिव्यू: गुंडे |
| CONTENT: यशराज फ़िल्मस् की गुंडे बिक्रम और बाला नाम के दो दोस्तों के इर्द गिर्द घूमती है. दोनों लड़के रिफ़्यूजी हैं जिनका इस दुनिया में कोई नहीं है सिवाय लतीफ़ नाम के एक किरदार के जो उन्हें जुर्म की दुनिया में धकेलता है. कहानी में ट्विस्ट लाता है दोनों का एक ही लड़की यानी प्रियंका चोपड़ा से प्यार जब दोनों की दोस्ती में पड़ती है दरार. अली अब्बास ज़फ़र का निर्देशन ठीक-ठाक है हालांकि रणवीर और अर्जुन के साथ कुछ दृश्यों में उनका काम बेहतर हो सकता था. प्रियंका के साथ रणवीर और अर्जुन के अलग-अलग दृश्यों में ज़फ़र की पकड़ बेहतर दिखी है. सुहेल सेन का संगीत फ़िल्म का मज़बूत पक्ष है. तूने मारी एंट्रियां पहले से ही काफ़ी हिट हो चुका है जश्न-ए-इश्क़ा जिया और सैंया भी बेहतर बन पड़े हैं. इरशाद कामिल के लिरिक्स लोक-लुभावने हैं. बॉस्को-सीज़र की कोरियोग्राफ़ी अच्छी है और शाम कौशल के ऐक्शन सीन भी लोगों को अपील करेंगे. निर्देशक अली अब्बास ज़फ़र ने कहानी को 70 के दशक में पेश करने की कोशिश की है लेकिन नएपन की कमी है. फ़िल्म का स्क्रीनप्ले में ऐसे बहुत से दृश्य हैं जो आपकी 70 या 80 के दशक की फ़िल्मों में देखे हुए से लगते हैं. दो दोस्तों के बीच की मज़बूत संवेदनाओं को उभारने में अली अब्बास कमतर साबित होते हैं. अगर स्क्रीनप्ले में कसावट होती तो फ़िल्म के कई दृश्य दर्शकों को रूला सकते थे. दुर्भाग्य से ऐसा नहीं होता क्योंकि पटकथा कहीं भी आपको छूती नहीं है और सारी कहानी एक बहुत ही बासीपन के साथ सामने आती है. हालांकि कुछ सीन ज़रूर हैं जो अच्छे बन पड़े हैं लेकिन ये उम्मीद से कहीं कम हैं. सबकुछ इतना जाना पहचाना है कि असर नहीं करता. कहानी में ज़्यादा उतार-चढ़ाव नहीं हैं और फ़िल्म दर्शकों को अपने साथ लेकर नहीं चल पाती. हालांकि यहां ये ज़रूर जोड़ना चाहूंगा कि लोग ऐसी कहानियां देखना पसंद करते हैं जहां दो दोस्तों के बीच तकरार की वजह एक लड़की हो. इस फ़िल्म में भी नएपन की कमी के बावजूद लोग इस कहानी में दिलचस्पी ले सकते हैं हालांकि दोस्ती में दरार ही इस कहानी का सबसे क़मज़ोर पहलू है. निर्देशक अली अब्बास ने संजय मासूम के साथ मिलकर संवाद लिखे हैं लेकिन भाषा कुछ ज़्यादा ही अलंकारिक है जो शायद आधुनिक दर्शकों के गले नही उतरेगी. यही नहीं कुछ किरदार इतना धीमे अपना संवाद बोलते हैं कि बोरियत और बढ़ जाती है. रणवीर सिंह ने बिक्रम का किरदार बेहद ईमानदारी से निभाया है. ऐक्शन दृश्य काफ़ी अच्छे किए हैं. अर्जुन कपूर भी ऐक्शन सीन में अच्छे लगते हैं लेकिन उनका काम साधारण है. उन्हें अपनी आवाज़ और भावों पर काम करने की ज़रूरत है. प्रियंका चोपड़ा आकर्षक लगती हैं और रोल भी अच्छे से निभाया है. सत्यजीत सरकार के रूप में अभिनेता इरफ़ान की उपस्थिति फ़िल्म में कोई असर पैदा नहीं करती. उनके पास ना तो उनके टैलेंट के हिसाब का रोल है और ना ही यादगार संवाद. फ़िल्म में उनके साथ न्याय नहीं हुआ है. पंकज त्रिपाठी छाप छोड़ते हैं और मनु ऋषि चड्ढा का काम ठीक है. बाक़ी किरदार भी ज़रूरत के हिसाब से ठीक लगते हैं. कुल मिलाकर गुंडे एक साधारण कहानी है जिसके दो मज़बूत आधार हैं- अच्छा संगीत और बेहतर शुरूआत. |
| DATE: 2014-02-14 |
| LABEL: entertainment |
| [1166] TITLE: दिलीप कुमार और मधुबाला: 'न जाने ख़ता किसकी थी' |
| CONTENT: ये बहुत कम लोगों के साथ होता है कि ज़िंदगी से उन्हें वक़्त भले ही कम मिला हो लेकिन उनके हुनर और कामयाबी की दास्तां इतनी लंबी होती है कि तकदीर की लकीर ही बेमानी हो जाए. हुस्न और अदाकारी की वो छाप जिसे मधुबाला कहते हैं आज ही के दिन पैदा हुई थीं. हालांकि मधुबाला को याद किया जाता है सिल्वर स्क्रीन की देवी के तौर पर लेकिन बीबीसी से विशेष बातचीत में उनकी सबसे छोटी बहन मधुर भूषण ने कहा कि मधु आपा को ज़िंदगी से कुछ नहीं मिला ना प्यार मिला और ना जिससे शादी की वो ही मिला. मधुर के शब्दों में अल्लाह ने जो एक सबसे बड़ी चीज़ उन्हें नहीं दी वो थी ख़ुशी. मधुर भूषण ने बहुत ही साफ़ शब्दों में कहा नौ साल की वो मोहब्बत बहुत ख़ूबसूरत थी उनकी शादी भी होने वाली थी लेकिन वो मोहब्बत बिखर गई. वो रिश्ता टूट गया और आज तक समझ नहीं आया कि आख़िर ख़ता किसकी थी. अब वो गुज़र चुकी हैं तो इस पर बात करना भी सही नहीं लगता. लेकिन थोड़ी देर बात करने पर मधुर बताती हैं कि एक फ़िल्म के सिलसिले में हमारे पिता जो मधु आपा का काम-काज संभालते थे की दिलीप साहब से अनबन हो गई थी. मामला कोर्ट में पहुंचा. हालांकि बाद में सहमति बन गई थी और विवाद ख़त्म कर लिया गया. आपा ने दिलीप साहब से कहा कि आप माफ़ी मांग लीजिए लेकिन दिलीप साहब ने मना कर दिया. आपा ने कहा अकेले में बोल दीजिए गले लगा लीजिए. यूसुफ़ भाई जान नहीं माने और वहां ये रिश्ता ख़त्म हो गया. मधुबाला की ख़ूबसूरती का असर ज़्यादा था या अदाकारी का ये भी अपने आप में एक चर्चा का विषय हो सकता है लेकिन फ़िल्मों में आना उनका चुनाव नहीं था. मधुर भूषण ने बताया मधु आपा सात साल की उम्र से गाना सीखती थी. बहुत शौक़ था सजने संवरने का लेकिन फ़िल्मों में काम तब शुरू किया जब घर में ग़रीबी आई. जब हमारे अब्बा की नौकरी छूट गई तो लोगों ने कहा आपकी बच्ची ख़ूबसूरत है इसे बॉम्बे ले जाए कुछ छोटे मोटे रोल मिल जाएंगे. मधुर कहती हैं कि उनके पिता को सारे ख़ानदान के ख़िलाफ़ जाकर क़दम उठाना पड़ा लेकिन वो मुंबई चले आए. मधुर याद करती हैं यहां उस समय बॉम्बे टॉकीज़ का स्टूडियो था. मुमताज़ शांति हिरोइन हुआ करती थीं. चंदू लाल शांति के यहां ले गए और बोले कि इसे देख लीजिए. मुमताज़ की छोटी सी बेटी का रोल मिला जिसमें मधु आपा ने गाना भी गाया था. वहां से इतनी तारीफ़ मिली कि बहुत सारी फ़िल्में मिलने लगीं. बाद में फिर नीलकमल मिली फिर महल मिली और उसके बाद उन्होने दोबारा पीछे मुड़कर नहीं देखा. मधुर भूषण कहती हैं कि उनके पिता के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है जबकि सच कुछ और है. मधुर सवालिया अंदाज़ में कहती हैं आप ही बताइए कि सात साल की बच्ची अपने आप क्या कर पाती जब तक बहुत मज़बूत आधार ना हो. पिता ने ही उन्हे सही रास्ते पर लगाया. हमेशा साथ दिया. हमसे पूछिए हमारे वालिद क्या थे हमारे लिए. मधुर बताती हैं कि उनका ख़ानदान ऐसा था कि जिसमें बडो़ं ने जो कह दिया वही लकीर होता था उस वक़्त उनके ग़ैर-शिक्षित पिता ने जो कुछ किया उसकी मिसालें कम मिलेंगी. मधुबाला की शख़्सियत पर बात करते हुए मधुर कहती हैं उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत थी कि वो बहुत जल्दी सीख लेती थीं. उस वक़्त अंग्रेजी़ फ़िल्में देखने की बिल्कुल मनाही थी लेकिन वो छिप-छिप कर पिक्चर देखती थीं. ख़ुदा का दिया तोहफ़ा था कि वो इतनी हुनरमंद थीं. |
| DATE: 2014-02-14 |
| LABEL: entertainment |
| [1167] TITLE: श्रीदेवी की 'सदमा' के निर्देशक नहीं रहे |
| CONTENT: श्रीदेवी और कमल हासन की फ़िल्म सदमा का निर्देशन करने वाले बालनाथन बेंजामिन महेंद्र अब नहीं रहे. 74 साल की उम्र में उनका निधन चेन्नई में हुआ. बृहस्पतिवार को उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. हालांकि उनका जन्म श्रीलंका में वर्ष 1939 में हुआ था लेकिन उन्होंने भारत को ही अपनी कर्मभूमि बनाया. महेंद्र ना सिर्फ़ फ़िल्म निर्माता और निर्देशक थे बल्कि पटकथा लेखक संपादक और छायाकार के रूप में भी उन्होंने फ़िल्मी दुनिया को बहुत कुछ दिया. लंदन विश्वविद्यालय से ऑनर्स डिग्री लेने के बाद उन्होंने भारत के फ़िल्म और टेलीविज़न संस्थान एफ़टीआईआई पुणे में सिनेमेटोग्राफ़र कोर्स में दाख़िला लिया. पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद वर्ष 1971 में महेंद्र ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत मलयालम फ़िल्म नेल्लू से की. उन्होंने इस फ़िल्म के लिए कैमरे की बागडोर संभाली. केरल सरकार ने उन्हें इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ छायाकार का पुरस्कार दिया. बालनाथन बेंजामिन महेंद्र के कैमरे की ख़ासियत थी- प्राकृतिक रोशनी का भरपूर इस्तेमाल. महेंद्र ने तमिल मलयालम तेलुगू और हिंदी भाषा में 20 से अधिक फ़िल्में की. उन्होंने तमिल सिनेमा को पुनर्जीवित किया. महेंद्र को पांच राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार तीन फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों के अलावा केरल कर्नाटक और आंध्र प्रदेश राज्य सरकारों ने कई सम्मान प्रदान किए. महेंद्र की ख़ूबी उनका कैमरे का काम निर्देशन और संपादन था. उनकी हिंदी फ़िल्म सदमा काफ़ी चर्चित और हिट थी. |
| DATE: 2014-02-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1168] TITLE: बाबूजी से सीखिए 'संस्कारी वैलेंटाइंस डे' |
| CONTENT: अपनी चरित्र भूमिकाओं के चलते बाबूजी के तौर पर मशहूर आलोक नाथ इस वैलेंटाइन डे पर एक संस्कारी रैपर के रूप में दिखाई देंगे. अलोक नाथ एनिमेटेड चरित्रों को सलाह देते हुए देखे जा सकेंगे कि कैसे मनाया जा सकता है संस्कारी वैलेंटाइन डे. अलोक नाथ लड़कियो के साथ नाचते हुए दिखेंगे. ख़बरों के मुताबिक़ अलोक नाथ का मानना है वैलेंटाइन डे सिर्फ गर्ल फ्रेंड के लिए नहीं है बल्कि पत्नी दोस्त या परिवार वाले किसी के साथ भी बनाया जा सकता है इसलिए यह वीडियो बड़े ही मज़ाकिया अंदाज़ में होगा . आलोकनाथ कुछ समय पहले तक ट्विटर पर चुटकुलों के केंद्र में थे. इस पर उनमें नाराज़गी भी थी लेकिन वे कहते हैं कि अब उन्हे इसकी आदत पड़ गई हैं. सरकार और सरकार राज में अमिताभ बच्चन ने शिवसेना प्रमुख बाला साब ठाकरे से प्रभावित किरदार निभाया था. अख़बारों में अब ये ख़बरें हैं कि अनिल कपूर ऐसा ही किरदार निभाने जा रहे है संजय गुप्ता कि अगली फ़िल्म मुम्बई सागा में. रिपोर्टें बताती हैं कि हुसैन ज़ैदी ने कहानी लिखी है और फ़िल्म के डायलॉग मिलाप ज़वेरी के हैं. प्रशांत पाण्डेय जिसने अमिताभ बच्चन की सरकार राज का स्क्रीप्ले लिखा था वही रोबिन भट्ट के साथ मिलकर इस फ़िल्म का स्क्रीनप्ले लिख रहे है. अभिनेत्री आलिया भट्ट कहती हैं कि वह अपने पिता फिल्मकार महेश भट्ट के निर्देशन में काम करना पसंद करेंगी लेकिन उन्हें नहीं लगता कि ऐसा हो पाएगा. आलिया ने फिल्म स्टूडेंट ऑफ द इयर से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी जिसमें उनके सहकलाकार नवोदित अभिनेता वरुण धवन और सिद्धार्थ मल्होत्रा थे. वरुण धवन की दूसरी फिल्म `मैं तेरा हीरो` का निर्देशन उनके पिता डेविड धवन कर रहे हैं लेकिन आलिया को संदेह है कि उन्हें अपने पिता के निर्देशन में काम करने का मौका कभी मिलेगा भले यह उनकी दिली तमन्ना हो. |
| DATE: 2014-02-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1169] TITLE: मौक़ा नहीं मिला सलमान के साथ: जूही |
| CONTENT: साल 1984 की मिस इंडिया रहीं फ़िल्म अभिनेत्री जूही चावला आजकल अपनी फ़िल्म गुलाब गैंग के चलते सुर्ख़ियों में बनी हुई हैं. चुलबुले और रोमैंटिक किरदार करने वाली जूही चावला फ़िल्म गुलाब गैंग में बिल्कुल अलग ही अंदाज़ में नज़र आएँगी. अपनी फ़िल्म प्रोमोशन के दौरान बीबीसी ने उनसे बातचीत की और जाना कि इतने साल इंडस्ट्री में बिताने के बावजूद आख़िर सलमान के साथ लोग उन्हे पर्दे पर क्यों नहीं देख पाए. इस सवाल के जवाब में जूही ने अपना दिल खोल कर रख दिया और बताया कि उनकी कितनी तमन्ना थी सलमान के साथ काम करने की. जूही ने लगभग सभी बड़े कलाकारों के साथ काम किया है. उनमें शाहरुख़ ख़ान आमिर ख़ान अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार शामिल हैं. पर सलमान ख़ान के साथ इनकी एक भी फ़िल्म नहीं आई. क्या इन्हें कभी कोई फ़िल्म सलमान ख़ान के साथ मिली ही नहीं या मिली तो इन्होनें की ही नहींजब ये सवाल हमने जूही से पूछा तो वे बोलीं ये आप सलमान से क्यों नहीं पूछते क्योंकि हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में हीरोइन अपने हीरो को नहीं चुनती बल्कि हीरो ख़ुद अपनी हीरोइन को चुनता है. तो आप उनके पास जाकर ये सवाल पूछिए. पर क्या उन्हें सलमान के साथ कभी कोई फ़िल्म करने का मौक़ा मिला इस पर जूही बोलीं सच बताऊँ तो मुझे याद ही नहीं है कि ऐसा कुछ हुआ था. पर काश मुझे हम आपके हैं कौन ऑफ़र हुई होती तो मैं ज़रूर सलमान के साथ काम करती. फ़िल्म गुलाब गैंग में जूही चावला के किरदार का नाम है सुमित्रा देवी. पर जूही को जब इस फ़िल्म के निर्देशक सौमिक सेन ने कहानी सुनाई और उनके किरदार के बारे में बताया तो जूही को लगा कि कहीं लोग इनका मज़ाक़ तो नहीं बनाएंगेवे कहती हैं जब सौमिक ने घर पर आकर मुझे इस फ़िल्म और किरदार के बारे में बताया तो मुझे लगा की सौमिक का दिमाग़ ख़राब हो गया है. इन्होनें ऐसा कैसे सोच लिया कि मैं ये किरदार कर पाऊंगी कहीं लोग मेरा मज़ाक़ तो नहीं बनाएंगे क्यूंकि मैंने कभी भी ऐसा किरदार नहीं निभाया. ये किरदार बहुत ही सरफिरी निर्दय चालाक है और इसके पीछे कोई कारण नहीं है वो बस ऐसी ही है. ज़ूही आगे कहती हैं सुमित्रा देवी जो उनका किरदार है वो एक राजनेता है और वो लोगों को अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करती है. उसके दिल में कुछ और है और बाहर कुछ और तो बहुत ही टेढ़ा मेढ़ा चरित्र है. जूही ने ये भी बताया की उन्होनें कई हफ़्तों तक इस फ़िल्म के बारे में सोचा फिर कहीं जाकर इस फ़िल्म को करने का फ़ैसला लिया. उन्होंने कहा मैंने ये फ़िल्म कुछ कारणों के लिए की. उनमें से एक कारण था इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट जिसमें सिर्फ़ दो अहम किरदार हैं और मुझे ये मानना ही पड़ा की इस फ़िल्म की हीरो माधुरी दीक्षित ही हैं. वो ही हैं जो नाच गाना करती हैं और अंत में वही विलन को मारती हैं. और दूसरा कारण था मेरा चरित्र सुमित्रा देवी का. जब ये विलन फ़िल्म में आती है तो इस फ़िल्म में कुछ नमक मिर्ची आती है और उसी से इस फ़िल्म में मसला आता है. |
| DATE: 2014-02-12 |
| LABEL: entertainment |
| [1170] TITLE: होंठों पर हंगामा क्यों. |
| CONTENT: टेलीविज़न शो कॉफ़ी विद करन में जब से अनुराग कश्यप के साथ अनुष्का शर्मा नज़र आई हैं तब से इंटरनेट समेत तमाम जगहों पर उनके होंठ की बदली हुई सूरत को लेकर काफी चर्चा हो रही है. इस मामले पर अनुष्का ने आख़िरकार अपनी चुप्पी तोड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर और कहा कि उन्होंने कोई सर्जरी नहीं करवाई है. मेरे बारे में बहुत सी बातें हो रही हैं. मुख्य तौर पर मेरे होंठ के बारे में. कुछ वक्त से मैं अस्थायी रूप से होंठ बढ़ाने की तकनीक का इस्तेमाल कर रही हूं. शायद इसलिए मेरे होंठों में कुछ बदलाव नज़र आ रहे है. मैं ये साफ़ कर देना चाहती हूं कि मैंने कोई सर्जरी नहीं करवाई है. होंठों पर मेरा जो लुक है वो मेरी फ़िल्म बॉम्बे वेलवेट के लिए है जो एक पीरियड ड्रामा है जिसमे मैं एक जैज़ सिंगर का किरदार निभा रही हूं. अनुष्का शर्मा कभी विराट कोहली के सवाल पर तो कभी अपने होंठों को लेकर लगातार सुर्ख़ियों में बनी हुई हैं. हिंदी फ़िल्म उद्योग से आए दिन किसी ना किसी के मुंह से बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के समर्थन में आवाज़ें सुनाई देती हैं. इस लिस्ट में नया नाम जूही चावला का है. अपनी नई फ़िल्म गुलाब गैंग में एक नेता का किरदार निभाने वाली जूही चावला प्रेस से बात करने पहुंची तो उनसे पूछा गया कि भारतीय राजनीति में उनका पसंदीदा नेता कौन है. पहले तो जूही थोड़ा हिचकिचाई लेकिन बाद में वो खुलकर बोलीं मैं नरेंद्र मोदी को पसंद करती हूं. हालांकि उनके साथ आई प्रमोशन टीम की तरफ़ से तब तक उन्हें ये संकेत दिया जा चुका था कि इसके आगे कुछ ना बोलें ताकि कहीं कोई नया विवाद ना पैदा हो जाए. सीक्वल चले या ना चले लेकिन हिट फ़िल्मों के सीक्वल बनाने की परंपरा तो चल ही रही है. अब जाने माने फिल्म मेकर केशू रामसे के बेटे आर्यमन रामसे अपने पिता की सुपरहिट फिल्म खाकी का सीक्वल बनाने की तैयारी में हैं. राजकुमार संतोषी के निर्देशन में बनी खाकी में अमिताभ बच्चन अक्षय कुमार अजय देवगन ऐश्वर्या राय और तुषार कपूर ने प्रमुख भूमिका निभाई थी. आर्यमन ने अपनी होम प्रोडक्शन फिल्म फैमिली-टाइज ऑफ ब्लड 2006 से बतौर अभिनेता अपने करियर की शुरुआत की थी. ख़बरों के मुताबिक़ आर्यमन फिल्म के सीक्वल के निर्देशन के लिए राजकुमार संतोषी के नाम पर विचार कर रहे हैं. बताया जाता है कि इसके लिए बिग बी और तुषार से भी बातचीत की जा रही है. फिल्म की शूटिंग अगले साल शुरू होने की संभावना है. |
| DATE: 2014-02-12 |
| LABEL: entertainment |
| [1171] TITLE: 100 करोड़ कमाने का फॉर्मूला 'ब्रेनलेस' है! |
| CONTENT: हाल में सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फ़ेसबुक पर किसी ने सवाल पूछा बीते एक साल की कौन सी फ़िल्में याद हैं आपको जो आपने एन्जॉय कीइसके जवाब में लोगों ने धूम 3 कृष 3 चेन्नई एक्सप्रेस ये जवानी है दीवानी ग्रैंड मस्ती भाग मिल्खा भाग स्पेशल 26 आशिक़ी 2 फुकरे रांझणा डी डे शुद्ध देसी रोमांस जैसी फ़िल्मों के नाम लिए. ये सभी फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर एक से बढ़कर एक हिट रही हैं. हाँ कमेंट लिखने वालों में कुछेक लोग ऐसे ज़रूर थे जिन्होंने शाहिद लुटेरा और शिप ऑफ़ थीसिस जैसी लीक से हट कर बनी फ़िल्मों के नाम लिए. लेकिन वहीं कुछ लोगों ने ये भी पूछा कि क्या शिप ऑफ़ थीसिस नाम की भी कोई फ़िल्म आई थी जवाब है जी बिल्कुल आई थी और फ़्लॉप भी हुई थी क्योंकि जानकारों का मानना था कि ये एक मसाला फ़िल्म नहीं थी जबकि ऊपर लिखी यादगार फिल्में जिनमें भाग मिल्खा भाग को छोड़कर बाक़ी सभी ठेठ बॉलीवुड मसाला फिल्मों के दर्जे में रखी जा सकती हैं. वैसे भाग मिल्खा भाग में भी मसाला फ़िल्मों के सभी गुण मौजूद थे जैसे हवन करेगें घुलमिल-घुलमिल जैसे गीत और मिल्खा का विदेशी युवती से प्रेम सब कुछ तो थाऐसे में कोई ये कह दे कि ये सब मसाला फिल्में बेकार और बिना दिमाग़ के इस्तेमाल के बनाई जाती हैं तो इस पर सवाल तो उठने ही थे. फ़िल्म अभिनेता और निर्माता-निर्देशक रजत कपूर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बयान दिया मैं मसाला एंटरटेनर न देखता हूँ न ही पसंद करता हूँ पता नहीं कैसे ये ब्रेनलेस मसाला फिल्में 100 करोड़ का बिज़नेस कर लेती हैं रजत कपूर की इस बात से कुछ लोग सहमत हो सकते हैं लेकिन मसाला फ़िल्मों के प्रमुख फ़िल्मकार माने जाने वाले साजिद ख़ान को थोड़े नाराज़ से लगे. बीबीसी से ख़ास बातचीत में साजिद ने कहा रजत साहब भूल गए कि भाग मिल्खा भाग ने भी 100 करोड़ कमाए और ये मसाला फिल्म नहीं थी. ये उनकी निजी सोच है वरना फिल्म अच्छी हो तभी ऑडियंस आपकी फिल्म देखती है. मेरी रोहित शेट्टी और फरहा की फिल्में इसलिए ही चलती हैं. तो क्या ये मान लिया जाए कि 100 करोड़ कमाने की कुंजी मसाला फिल्में ही हैं. फिल्म व्यापार विशेषज्ञ कोमल नाहटा की मानें तो बात सही है. वो कहते हैं बॉलीवुड की मसाला फिल्में न सिर्फ़ इंडिया में बल्कि ओवरसीज़ में भी बहुत अच्छा बिज़नेस करती हैं और ऐसी फिल्मों को बनाने में भी ब्रेन तो लगता ही है लोग एंटरटेन होना पसंद करते हैं हमेशा सोचने की मुद्रा में नहीं रहना चाहते. तो इसका तो सीधा अर्थ यही है कि जनाब पब्लिक मनोरंजन चाहती है ब्रेनलेस हो या ब्रेनफुल पिक्चर में मज़ा आया तो थिएटर हाऊसफुल वरना ख़ाली. |
| DATE: 2014-02-12 |
| LABEL: entertainment |
| [1172] TITLE: मैं माधुरी दीक्षित की फ़िल्म रिलीज़ नहीं होने दूंगी: संपत पाल |
| CONTENT: माधुरी दीक्षित और जूही चावला के अभिनय वाली बहुचर्चित फ़िल्म गुलाब गैंग की रिलीज़ जैसे जैसे नज़दीक आ रही है लगता है मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड इलाक़े में महिलाओं का गुलाबी गैंग गठित करने वाली संपत पाल ने कहा है कि इस फ़िल्म के सिनेमाघरों में रिलीज़ होने से पहले ही वे भूख हड़ताल पर बैठ जाएंगी. गुलाबी गैंग पर निष्ठा जैन निर्देशित डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग पर पहुंची संपत माधुरी दीक्षित पर ग़ुस्सा निकालती नज़र आईं. उन्होने मीडिया से कहा वो क्या फ़िल्म बनाएंगी वो कभी मुझसे मिलने आई हैं. कभी हमें देखा है. बिना हमारी इजाज़त के हम पर फ़िल्म बना रही हैं. अनुभव सिन्हा अपनी फ़िल्म का सपना भूल जाएं. फ़िल्म 7 मार्च को रिलीज़ होगी और मैं उससे पहले 2 मार्च से अन्ना जैसे अनशन करूंगी. तब समझ में आ जाएगा कि महिलाओं में क्या ताक़त होती है. हालांकि गुलाब गैंग के निर्देशक सौमिक सेन ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि फ़िल्म बिल्कुल काल्पनिक है. इसमें तो साड़ियों का रंग ही गुलाबी नहीं है. ऐसी कोई भी बात कहने से पहले उन्हें फ़िल्म देखनी चाहिएहाल ही में माधुरी दीक्षित ने भी कहा है कि गुलाब गैंग फ़िल्म की कहानी और गुलाबी गैंग में कोई समानता नही हैं. संपत पाल ख़ासतौर पर माधुरी दीक्षित से ख़ासी नाराज़ दिखाई दीं. वे कहती हैं ये देश तमाशे में चल रहा है. हमने अपनी ज़िंदगी क़ुर्बान कर दी और माधुरी दीक्षित ने एक बार में ही महिला सशक्तिकरण चला दिया. ऐक्टिंग के लिए ये लोग करोड़ों रूपए ले रही हैं. ये क्या तमाशा है. देश का पैसा इसी सबमें बर्बाद हो रहा है. संपत ने फ़िल्मकारों को महिलाओं का सही प्रस्तुतिकरण ना करने के लिए कार्यवाई करने की चेतावनी भी दी डाली है. संपत पाल ने कहा कि ये फ़िल्म उनकी ज़िंदगी पर आधारित है लेकिन उनसे बात नहीं की गई है इसलिए फ़िल्म से जुड़े लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर किया गया है. संपत के मुताबिक़ हाई-कोर्ट में मुक़दमा डाल दिया गया है. उन सबको पार्टी बनाया गया है. वो हमसे इजाज़त लें. अगर इजाज़त नहीं लेते हैं तो हम फ़िल्म रिलीज़ नहीं होने देंगे. संपत फ़िल्म में कुछ बदलावों की मांग कर रही हैं. वो कहती हैं उनको इजाज़त तो हम तभी देंगे जब वो किरदार का नाम रज्जो से बदल कर संपत करेंगी और गुलाब से बदल कर गुलाबी करेंगी. संपत पाल ने खुलकर अपना विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि फ़िल्मकार अभद्र फ़िल्में बनाते हैं और ये अब ज़्यादा दिन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. संपत कहती हैं अभी तो हमारा ध्यान महिलाओं की समस्याएं सुलझाने में है लेकिन जिस तरह की गंदी फ़िल्में लोग बनाते हैं हम उसका विरोध ज़रूर करेंगे. मैं एक झटका दे दूं तो सारी महिलाएं सेंसर बोर्ड का घेराव कर लेंगी और हम ये करेंगे. लगता है गुलाबी गैंग जल्दी ही समुद्र पर छा जाएगा. निर्देशन सौमिक सेन गुलाब गैंग से हिंदी फ़िल्म उद्योग में क़दम रख रहे हैं. इस फ़िल्म की चर्चा माधुरी दीक्षित और जूही चावला के एक साथ स्क्रीन पर आने की वजह से भी हो रही है. |
| DATE: 2014-02-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1173] TITLE: नरेंद्र मोदी के लिए नग्न फ़ोटो शूट |
| CONTENT: लोकसभा चुनाव में अभी तीन-चार महीने बाक़ी हैं लेकिन ऐसा लगता है कि चुनावों का बुख़ार लोगों पर अभी से चढ़ने लगा है. आम लोगों के अलावा ग्लैमर की दुनिया पर भी इसका असर देखा जा रहा है. अभी सलमान ख़ान और नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात की सुर्ख़ियां यादों से धुंधलाई भी नहीं थीं कि एक नई ख़बर ने या यूं कहें कि एक तस्वीर ने लोगों को हैरान कर दिया है. मॉडल और अभिनेत्री मेघना पटेल ने खुल कर नरेंद्र मोदी का समर्थन किया है लेकिन उनका अंदाज़ ज़रा हटकर रहा. मेघना ने भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के समर्थन में एक फ़ोटो शूट करवाया है. इन तस्वीरों में मेघना ने बीजेपी के चुनाव निशान कमल के फूल से पूरे शरीर को ढक कर फ़ोटो शूट करवाया है . इसके अलावा वो एक तस्वीर में बिना कपड़े पहने नरेंद्र मोदी के पोस्टर के साथ दिख रही हैं जिस पर मोदी के लिए वोट की अपील की गई है. इससे पहले मॉडल पूनम पांडेय भारतीय क्रिकेट टीम के लिए निर्वस्त्र होने की ख़्वाहिश ज़ाहिर कर चर्चा में आ चुकी हैं लेकिन किसी नेता के लिए ये पहले कभी नहीं हुआ. पर बीजेपी के महाराष्ट्र राज्य के प्रवक्ता माधव भंडारी ने इस पर कहा हम उनका स्वागत करते हैं जो लोग बीजेपी का समर्थन करते हैं पर हम इस तरह के आपत्तिजनक प्रदर्शन के सख्त ख़िलाफ़ हैं. अगर आप नरेंद्र मोदी को अपना समर्थन देना चाहते हैं तो उनकी रैली में आइये पर इस तरह के समर्थन की हम कड़ी निंदा करते हैं. उन्होनें मेघना के इस समर्थन को ख्याति पाने का एक तरीका बताकर कहा वो ऐसा करके बस अपनी लोकप्रियता में इज़ाफ़ा करना चाहती हैं. माधव भंडारी कहते हैं मैंने पार्टी के दिग्गज नेताओं से इस बारे में बात की है और भविष्य में ऐसे मसलों पर हमें क़ानून की मदद लेनी होगी. वहीँ मेघना का कहना है की उनका समर्थन बिलकुल भी आपत्तिजनक नहीं है. इंडियन क्रिकेटर विराट कोहली और बॉलीवुड अभिनेत्री अनुष्का शर्मा की दोस्ती की चर्चा हर जगह हो रही है लेकिन अब इन चर्चाओ में एक और नाम शामिल हो गया है. ये नाम है युवराज सिंह और नेहा धूपिया का. हालांकि ऐसा नहीं है कि पहली बार किसी बॉलीवुड अभिनेत्री का नाम युवराज सिंह के साथ जोड़ा जा रहा है. नेहा धूपिया से पहले युवराज का नाम किम शर्मा और दीपिका पादुकोण से भी जोड़ा गया है. गायिका और अभिनेत्री सोफ़िया चौधरी ने हाल ही में मुम्बई के एक बड़े रेस्त्रां में अपने जन्मदिन की पार्टी दी थी. इस आयोजन में युवराज सिंह और नेहा धूपिया के साथ पहुंचने से ये चर्चा ज़ोर पकड़ने लगी. नेहा और युवराज की यह दोस्ती उस पार्टी में सबका ध्यान अपनी और खींच रही थी. युवराज सिंह फ़िलहाल भारतीय क्रिकेट टीम से बाहर हैं और छुट्टियां मना रहे हैं. |
| DATE: 2014-02-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1174] TITLE: मैं इंटरव्यू नहीं देता, क्यों पीछे पड़े हो: असरानी |
| CONTENT: एक दिन मैं मुंबई डायरी लिखने बैठा ही था कि मेरी नज़र अखबार में छपे एक विज्ञापन पर गई. विज्ञापन एक नाटक का था. इसमें मशहूर कॉमेडियन असरानी अभिनय कर रह थे. असरानी को मैंने आजतक केवल फ़िल्मों में ही कॉमेडी करते देखा था. नाटक में तो उनका जोश कमाल का होगा यह सोचते ही मेरे अंदर का पत्रकार जाग उठा. मैंने विज्ञापन के नीचे दिए नंबर पर फ़ोन घुमा दिया. फ़ोन नंबर था नाटक के निर्माता नवीन बावा का. उन्होंने इस नाटक में असरानी के साथ अभिनय किया है. बावा से मैंने असरानी से मिलने की इच्छा जताई. उन्होंने कहाबहुत मुश्किल है असरानी साहब का इंटरव्यू मिलना. आजकल वो नाटक के अभ्यास में व्यस्त हैं लेकिन मैं कोशिश करुंगा. असरानी के इंटरव्यू की व्यग्रता कुछ ऐसी थी कि तीन घंटे बाद मैंने फिर बावा को फ़ोन मिला दिया और एक बार फिर असरानी के इंटरव्यू के लिए उनसे बात की. इस पर उन्होंने कहाउनके मूड पर है आप शाम को रिहर्सल के समय आ जाओ देखते हैं. मैं रिहर्सल के दौरान पहुँचा. स्टेज पर असरानी अपने डॉयलाग दोहरा रहे थे. कमाल की ऊर्जा थी. दो घंटे के इस कॉमेडी नाटक में असरानी पिता की भूमिका निभा रहे थे जो अपने बेटे का विवाह करवाना चाहता है. मंच पर असरानी साहब सबसे बड़े और रियल एक्टर लग रहे थे. इस नाटक में उन्होंने डांस गाना और मज़ाक सब किया. असरानी साहब का उत्साह देख मेरे होश उड़ गए. इस उम्र में इतनी ऊर्जा मैंने पहले किसी और में नहीं देखी थी. रिहर्सल ख़त्म होते ही मैं असरानी साहब के मेकअप रूम में जा पंहुचा और अपनी इच्छा बताई. इस पर वो बोले तो मैं क्या करुं भाई मैं नहीं देता इंटरव्यू मुझे जाना है. इस पर मैंने कहा असरानी साहब इस नाटक में आपके किरदार पर बात करनी है. यह सुनकर वो बोले भाई मुझे जाना है रहने दो. मैंने फिर सिर खुजलाया और कहा असरानी साहब यह बीबीसी से आपकी पहली मुलाकात है. मेरी इस बात पर पता नहीं क्या हुआ कि वो दरवाज़े की ओर चल पड़े मैं घबरा गया कि अब क्या हुआ. लेकिन असरानी साहब दरवाज़े की चिटकनी लगाने गए थे. वापस आकर कुर्सी खींचते हुए बोले शुरू करो भाई. मुझे जल्दी है. उन्होंने अपने बैग से तीन डिब्बियां निकालीं एक में इलायची एक में सौंफ और एक में सूखी पान सुपारी. उन्होंने मुझसे भी पान के बारे में पूछा. मैंने कहा नहीं सर इंटरव्यू शुरू करते हैं. इस पर मुंह में मसाला भर कर असरानी मेरे सामने बैठ गए. मैंने एक लंबी सांस भरी और पूछा असरानी साहब आज आपकी उम्र के अभिनेता बाबू जी या घर के बुज़ुर्ग की भूमिका करते हैं लेकिन आप आज भी कॉमेडियन कैसे ये जोश कहां से आयाउन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा देखो भाई ये सब अभ्यास से आता है. मुंबई के संघर्ष ने हमें सब सिखा दिया. मैं पूना के फिल्म स्कूल में एक्टिंग सीख रहा था. पूना से मुंबई चक्कर लगाने पड़ते थे कभी किसी डायरेक्टर के पास तो कभी प्रोड्यूसर से मिलने के लिए. कभी सफलता मिली कभी नहीं मिली पर हम ख़ुद को हमेशा ट्यून रखते थे. इससे पहले नाटक करने के सवाल पर उन्होंने कहा मैंने कभी नाटक लगातार नहीं किया. बस कॉलेज में ही एक दो किए. जब फ़िल्मो में आए तो किसी ने पूछा ही नहीं की भाई तुम थिएटर से हो क्या न हमने कभी नाटक किया न किसी ने हमसे पूछा. पर अब जब निर्माता मेरे पास एक अच्छे पात्र की कहानी लेकर आए तो मैंने हाँ कर दी. पुराने दौर में ऋषिकेश मुख़र्जी गुलज़ार एलवी प्रसाद ऐसे लोग अच्छे रोल देते थे तो कभी थिएटर की ओर कैरेक्टर ढूँढने जाना ही नहीं पड़ा. फिल्म और रंगमंच में से फिल्म को मुश्किल माध्यम बताते हुए असरानी ने कहा फिल्में ज्यादा मुश्किल हैं उसमें कैमरे से बात करनी पड़ती है. वहां आपको लाखों का सामना करना है. सबका मनोरंजन करना है. थिएटर में तो कुछ ही लोग सामने हैं ना. असरानी का फिल्म में होना मतलब कॉमेडी. मैंने उनसे पूछा असरानी साहब आपको केवल कॉमेडियन कहा गया इस तरह कहीं आपके साथ भेदभाव तो नहीं हुआइस पर उन्होंने कहा ये मेरा सौभाग्य था की मुझे गुलज़ार ऋषिकेश मुख़र्जी जैसे निर्देशक मिले जिन्होंने मुझे अलग-अलग रूप से इस्तेमाल किया. मैंने एक फिल्म ख़ुद बनाई चला मुरारी हीरो बनने उसमे मैंने खूब इमोशनल सीन किए. इसके अलावा मुझे कई गुजराती फ़िल्मों में लीड रोल भी मिले. मैंने सब किया. उस दौर के निर्देशकों को मैच्योर बताते हुए असरानी ने कहा उस समय के फ़िल्मकारों ने विमल रॉय के फ़िल्मिंग स्टाइल से खूब सीखा जिसने मुझे एक बेहतर अभिनेता बनाया. आज के लेखकों पर निशाना साधते हुए असरानी ने कहा आज सब हॉलीवुड से उठा रहे हैं. इसलिए लेखकों के संवाद में वह मज़ा नहीं आता. जब एक एक्टर उसे फिल्म में उतारने की कोशिश करता है तो वो सीधे मुंह गिर जाती है. हमारे टाइम में छह-सात लेखक होते थे. वो एक एक सीन लिखते थे. कॉमेडी के लिए लेखन और अच्छे लेखन दोनों पर ख़ूब ध्यान होना चाहिए. इतनी बातचीत के बाद असरानी कुर्सी छोड़ने का इशारा करने लगे. लेकिन मैंने हड़बडाते हुए एक और सावाल पूछ लिया. मैंने उनसे पूछा कि लेखक के अलावा एक अभिनेता का सेंस ऑफ़ ह्यूमर कैसे तैयार होता है इस पर उन्होंने कहा अच्छे निर्देशक अच्छी कहानी और इतने सालो के अनुभव से यह व्यंग्य उत्पन होता है. हमने अशोक कुमार और किशोर कुमार जैसे बड़े अभिनेताओं के साथ काम किया. कॉमेडी की टाइमिंग उनसे सीखी. इसके बाद अपने हाथ में झूलती हुई घड़ी की ओर देखते हुए उन्होंने कहामैं निकलता हूँ मुझे बस अब देरी हो रही है. मैंने उनका धन्यवाद किया और उनसे विदा ली. |
| DATE: 2014-02-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1175] TITLE: मैं शादियों में नहीं नाचता - अजय देवगन |
| CONTENT: किसी भी हाई - प्रोफ़ाइल शादी में डांस करके पैसे कमाना बॉलीवुड के सितारों के लिए आमदनी का एक अच्छा ख़ासा ज़रिया बन गया है. बॉलीवुड के जाने माने सितारे शाहरुख़ ख़ान ऐसा पिछले कई सालों से कर रहे हैं और अब इस चलन को कई जाने माने सितारों ने भी अपना लिया है. लेकिन आज भी बॉलीवुड में कई सारे सितारे हैं जिन्हें शादियों में नाचने से परहेज़ है. कुछ अभिनेता ये मानते हैं कि उनकी आमदनी विज्ञापनों और फ़िल्मों से इतनी हो जाती है कि उन्हें इस तरह का काम नहीं करना पड़ता वहीँ कई अभिनेत्रियां ऐसे काम को ठीक नहीं मानती और कहती हैं कि बॉलीवुड में कदम रखने से पहले ही उन्होंने सोच लिया था कि वो ऐसा कोई भी काम नहीं करेंगी. अभिनेता अजय देवगन भी किसी भी हाई-प्रोफ़ाइल शादी में नाचने को अजीब मानते हैं. जहाँ अभिनेता शाहरुख़ खान ने शादियों में नाचने को लेकर कहा कि शादी में डांस करके जो पैसे मुझे मिलता है वो उन फ़िल्मों की भरपाई कर देता है जिसे मैं नहीं करना चाहता. कई अभिनेताओं ने 70 फ़िल्में की हैं जिसमें से 30 फ़िल्में सिर्फ़ पैसों के लिए की गई होती हैं. वहीं अजय देवगन शादी में नाचने को लेकर कहते हैं मुझे लगता है कि मेरा काम कैमरे के सामने रहना है और मैं वही कर रहा हूँ. बहुत से लोग शादियों में डांस करते हैं पर मैं नहीं करता. अजय देवगन फ़िल्मों और कुछ गिने चुने विज्ञापनों के अलावा कहीं नहीं दिखते. फ़िल्म अवार्ड्स में भी वो बिल्कुल नही आते. जब उनसे इसका कारण पूछा गया तो वे बेझिझक बोले मुझे हर साल सारे फ़िल्म अवार्ड्स के लिए निमंत्रण मिलता है पर मैं नहीं जाता. मुझे ऐसे अवार्ड्स पर भरोसा ही नहीं है. अजय देवगन की बतौर निर्देशक एक ही फ़िल्म आई थी यू मी और हम. इस फ़िल्म में वो अपनी पत्नी काजोल के साथ दिखे थे. तो क्या वो एक बार फिर से बनेंगे निर्देशक और दिखेंगे अपनी बीवी काजोल के साथअजय ने इस पर कहा देखिये जहाँ तक निर्देशन का सवाल है मैं अभी एक स्क्रिप्ट पर काम कर रहा हूँ और इससे ज़्यादा मैं कुछ नहीं कहूंगा. रहा सवाल काजोल के साथ दोबारा दिखने का तो मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता. हम काजोल के लिए एक दूसरी स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं और क्योंकि उन्हें एक अच्छी फ़िल्म में काम करना है इसीलिए हम इस स्क्रिप्ट पर ज़यादा ध्यान दे रहे हैं. |
| DATE: 2014-02-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1176] TITLE: अमिताभ बच्चन बने सीबीआई की आवाज़ |
| CONTENT: अमिताभ बच्चन की आवाज़ का असर क्या है इसका अंदाज़ा सीबीआई को भी है. शायद इसीलिए अपनी एक ख़ास डॉक्यूमेंट्री के लिए इस एजेंसी ने आवाज़ ली है हिंदी सिनेमा के एंग्री यंग मैन की. सीबीआई इस साल अपने पचास बरस पूरे करने का जश्न यानी स्वर्ण जयंती मना रही है. इस मौक़े पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई गई है जिसमें अंग्रेज़ी में आवाज़ दी है कबीर बेदी ने जबकि हिंदी संस्करण अमिताभ बच्चन की आवाज़ में होगा. 71 साल के बच्चन ने शनिवार रात को डॉक्यूमेंट्री के कुछ भाग के लिए अपनी आवाज़ रिकॉर्ड की. उन्होने ट्विटर पर लिखा है सीबीआई की डॉक्यूमेंट्री करते समय मुझे बहुत आश्चर्य हुआ उनकी तकनीकी क्षमता और दक्षता पर. 21 मिनट की इस डॉक्यूमेंट्री में एजेंसी के जांच पड़ताल के जटिल तरीके फॉरेंसिक और वकीली कार्यवाही को बयां किया गया है. द पर्सूट ऑफ़ ट्रूथ नाम की इस फ़िल्म के निर्माता है एनएफ़डीसी और हैमरक फ़िल्म इंटरनेशनल. मुंबई बम धमाकों से जुड़े एक मामले के तहत जेल की सज़ा काट रहे फिल्म अभिनेता संजय दत्त ने एक बार फिर अपनी परोल की अवधि बढ़ाने के लिए अर्जी दायर की है. संजय ने परोल बढ़ाने के लिए अपनी पत्नी मान्यता की बीमारी का हवाला दिया है. खबरों के मुताबिक संजय ने खार पुलिस स्टेशन में अर्जी दायर की है. मान्यता की हाल ही में सर्जरी हुई है. ऐसे में संजय अपनी पत्नी के साथ ज्यादा समय बिताना चाहते हैं इसलिए वह अपनी परोल की अवधि एक महीने और बढ़वाना चाहते हैं. संजय दत्त परोल पर 21 दिसंबर को यरवदा जेल से बाहर आए थे. करण जौहर और करण मल्होत्रा की महत्वकांक्षी फ़िल्म शुद्धि में पहले से ही काफी अड़चने आ रही थी. दो दिसंबर 2013 को फ़िल्म की शूटिंग थी लेकिन फ़िल्म बैंग-बैंग के सेट पर ऋतिक रोशन के सिर पर चोट लगने से शूटिंग टल गई. फिर ऋतिक-सुज़ैन के बीच अलगाव की ख़बरें आईं. उसी दौरान शुद्धि में हो रही लगातार देरी से परेशान होकर फ़िल्म अभिनेत्री करीना कपूर ने फ़िल्म से बाहर निकलने के संकेत दिए. पर अब ऋतिक रोशन ने सूचना जारी करके कहा है कि वो शुद्धि का हिस्सा नहीं रहेंगे. उन्होंने कहा है मैंने और करण मल्होत्रा ने तय किया है कि हम शुद्धि के बाद दोबारा साथ आएँगे. बहरहाल शुद्धि जैसे सपने को मैं और बांध कर नहीं रख सकता. बतौर कलाकार अग्निपथ में करण मल्होत्रा के साथ मेरा अनुभव बहुत खूब रहा है. मुझे यकीन है ये रिश्ता इसके परे जाएगा. शुद्धि मेरे आत्मा का हिस्सा हमेशा रहेगी और मुझे यकीन है कि भारतीय सिनेमा की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म बनेगी शुद्धि मेरी शुभकामनाएँ उनके साथ है. कहा जा रहा है कि अब रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण ये फ़िल्म कर सकते है. |
| DATE: 2014-02-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1177] TITLE: जब लालू और अटल बने शेखर सुमन के मुरीद |
| CONTENT: 90 के दशक में शेखर सुमन टीवी पर अपना शो लेकर आए मूवर्स एंड शेकर्स. तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों को हास्य के पुट में परोसने वाला ये शो ख़ासा चर्चित हुआ और साथ ही मशहूर हुआ शेखर सुमन का वो ख़ास अंदाज़ जिसमें वो अटल बिहारी वाजपेई और लालू यादव सरीख़े नेताओं की नकल किया करते थे. बीबीसी से हुई ख़ास बातचीत में शेखर सुमन ने वो पुराने दिन याद किए और साथ ही इन नेताओं से अपने संबंधों का भी ज़िक्र किया. शेखर ने बताया एक दफ़ा तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई एक शादी समारोह में शरीक होने आए. वहां मैं भी था. जब वो जाने लगे तो सब उन्हें विदा करने के लिए खड़े हो गए. अचानक उनकी कार रुकी. वो उतरकर धीरे-धीरे मेरे पास आए. और मेरे गाल को प्यार से थपथपाते हुए कहा आप मेरी नकल बहुत अच्छे से करते हैं. ऐसा करते रहिए. शेखर अपने इस शो में अक्सर लालू यादव का भी मज़ाक उड़ाया करते थे. क्या कभी लालू ने बुरा नहीं मानाइसके जवाब में शेखर ने कहा मेरे सामने तो नहीं लेकिन मुझे ऐसा बताया गया था कि वो नाराज़ होते हैं. लेकिन जब मुझसे वो मिलते तो बड़े प्यार से मिलते. शेखर ने बताया कि जब वो पटना जाते तो लालू उन्हें अपने घर बुलाते और उनकी ख़ूब आवभगत करते. उन्होंने कहा लेकिन लालू जी के बच्चे मुझे बड़े ग़ुस्से से देखते. मानो कह रहे हों कि अच्छा बच्चू तुम्हीं हो जो हमारे पापा का मज़ाक उड़ाते हो. लेकिन मैं लालू जी के परिवार को समझाता कि ये सब शो में किया गया मज़ाक है. इसे गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं. शेखर सुमन के निर्देशन वाली फ़िल्म हार्टलेस शुक्रवार को रिलीज़ हुई. इस शुक्रवार को बतौर निर्देशक शेखर सुमन की पहली फ़िल्म रिलीज़ हुई हार्टलेस. जिसमें उनके छोटे बेटे अध्ययन सुमन और अरियाना अयम की मुख्य भूमिका है. बीबीसी से बात करते हुए शेखर ने बताया कि उनकी ये फ़िल्म उनके बड़े बेटे आयुष को समर्पित है जिनका महज़ 10 साल की उम्र में दिल की एक गंभीर बीमारी की वजह से निधन हो गया था. अपने बेटे को याद करते हुए शेखर कई बार भावुक भी हुए. उन्होंने बताया कि फ़िल्म से जो भी कमाई होगी उसे वो दिल की बीमारी से पीड़ित ग़रीब बच्चों के इलाज के लिए देंगे. इस दौरान शेखर सुमन ने अपने टीवी करियर के अलावा अपने फ़िल्मी करियर के बारे में भी बातें कीं. उन्होंने माना कि अपने करियर में उन्होंने कुछ ग़लतियां कीं जिन्हें अब वो नहीं दोहराएंगे. उन्होंने कहा डेविड धवन के निर्देशन वाली और बॉबी देओल की मुख्य भूमिका वाली फ़िल्म चोर मचाए शोर में मेरा जो रोल था मैं मानता हूं कि मुझे वैसे रोल नहीं करने चाहिए थे. लेकिन डेविड और बॉबी देओल मेरे दोस्त हैं. इसलिए मैंने वो कर लिया. लेकिन अब मैं महज़ दोस्ती की ख़ातिर ऐसे रोल नहीं करूंगा जो मुझे पसंद नहीं. शेखर ने इस बातचीत में ये भी माना कि टीवी पर कुछ कॉमेडी शो जज करने की भूमिका का उन्होंने बहुत लुत्फ़ उठाया लेकिन अब इऩ शोज़ में बढ़ रही अश्लीलता की वजह से वो इनसे दूर हो गए हैं. |
| DATE: 2014-02-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1178] TITLE: 'जोधा-अकबर' ने जीती जंग और 'दिया' भी जलता रहा |
| CONTENT: मनोरंजन चैनलों पर डेली सोप की रस्साकशी में बीते सप्ताह ज़ी टीवी पर प्रसारित होने वाला डेली सोप जोधा-अकबर दर्शकों की कसौटी पर खरा उतरा और इसने टीआरपी की जंग में लंबी छलांग मारी. लेकिन टॉप पोज़ीशन पर अब भी दिया और बाती हम बरक़रार है. दर्शकों के मन में ख़ासी उत्सुकता थी इस सोप की किरदार संध्या को लेकर. लेकिन अब जब पता चल चुका है कि संध्या गर्भवती नहीं है तो वो वापस जुट गई अपनी आईपीएस की ट्रेनिंग में. आने वाले सप्ताह में दर्शकों की दिलचस्पी इसमें होगी कि नए ट्रेनर कैसे संध्या की क़ाबिलियत को परखते हैं. वहीं जोधा-अकबर में दोनों अहम किरदारों की प्रेम कहानी एक नए मोड़ पर आकर खड़ी है जहां जोधा ने विषपान कर लिया है और दोनों मारवाड़ी पति पत्नी के भेष में राज्य के दौरे पर निकलेंगे. साथिया में जिसकी उम्मीद थी वही हुआ. शो लीप ले चुका है और दर्शक अहम और गोपी को नए रूप में देख रहे हैं. दोनों की प्रेम कहानी किस दिशा में जाती है ये आने वाला सप्ताह तय करेगा. साथिया रहा इस सप्ताह नंबर तीन पर. चौथे स्थान पर तारक मेहता का उल्टा चश्मा और कॉमेडी नाइट्स विद कपिल के बीच टाई रहा. कपिल और सिद्धू की जुगलबंदी और साथ में पलक और दादी की टाइमपास जोड़ी इस सप्ताह भी दर्शकों को गुदगुदाने में कामयाब रही. लेकिन अब कपिल को सावधान होना होगा क्योंकि कभी उनके शो की जान रहीं गुत्थी उर्फ़ सुनील ग्रोवर लेकर आ रहे हैं नया शो मैड इन इंडिया वो भी कलर्स के एक दूसरे प्रतिद्वंद्वी टैनल स्टार प्लस पर. तो देखना होगा कि कपिल और सुनील में बाज़ी किसके हाथ लगती है. लोकप्रियता के लिहाज़ से इस सप्ताह पांचवें नंबर पर रहा ये रिश्ता क्या कहलाता है. चैनल्स की बात करें तो इस सप्ताह नंबर एक पर रहा स्टार प्लस. जोधा-अकबर ने ज़ी को दूसरे स्थान पर ला खड़ा किया जबकि तीसरे नंबर पर रहा कलर्स. इस सप्ताह दर्शकों ने टीवी पर स्टार गिल्ड अवॉर्ड्स का भी लुत्फ़ उठाया जिसमें शाहरुख़ ख़ान और सलमान ख़ान गले मिलते नज़र आए. ज़ाहिर है इसने स्टार प्लस को इसी वजह से अच्छी रेटिंग्स दिलाई. |
| DATE: 2014-02-08 |
| LABEL: entertainment |
| [1179] TITLE: फ़िल्म रिव्यू: 'हंसी तो फंसी' |
| CONTENT: धर्मा प्रोडक्शंस और फैंटम फ़िल्म्स प्रोडक्शन की हंसी तो फंसी एक लव स्टोरी है. निखिल सिद्धार्थ मल्होत्रा एक मस्तमौला लड़का है जो एक सिद्धांतवादी पुलिस अफ़सर एसबी भारद्वाज शरत सक्सेना का बेटा है. वो करिश्मा अदा शर्मा से प्यार करता है और दोनों शादी करने का फ़ैसला कर लेते हैं. करिश्मा एक अमीर उद्योगपति मनोज जोशी की बेटी है. निखिल अपना ख़ुद का बिज़नेस शुरू करना चाहता है और वो चाहता है कि उसके होने वाले ससुर उसकी मदद करें. निखिल और करिश्मा की शादी के समारोह शुरू होने पर करिश्मा की बहन मीता परिणीति चोपड़ा भी अचानक सबके सामने आ जाती है. मीता कई साल पहले अपनी आगे की शिक्षा के खर्चे पूरे करने के लिए घर से गहने चुराकर भाग जाती है. करिश्मा निखिल से मीता का ध्यान रखने को कहती है ताकि उसके परिवार वालों को मीता की मौजूदगी का पता ना चल सके. निखिल पाता है कि मीता ड्रग्स की बुरी लत का शिकार हो चुकी है और वो उसे इससे बाहर निकालने की ठान लेता है. इस बीच निखिल और मीता एक दूसरे के क़रीब आ जाते हैं. आगे क्या होता है निखिल किससे शादी करता है- मीता से या करिश्मा से क्या मीता का परिवार उसे स्वीकार करता है यही फ़िल्म की कहानी है. हर्षवर्धन कुलकर्णी की कहानी और स्क्रीनप्ले बहुत दिलचस्प हैं. सबसे अच्छी बात ये है कि दर्शकों को अंदाज़ा भी नहीं होता कि आगे क्या होने वाला है. लेकिन ये भी कहना होगा कि कई जगह पर लेखक ने अपनी सहूलियत के हिसाब से फ़िल्म में मोड़ देने की कोशिश की है जो साफ़ समझ में आ जाता है. इंटरवल से पहले फ़िल्म के कई हिस्से उबाऊ है क्योंकि दर्शक समझ ही नहीं पाते कि फ़िल्म में जो हो रहा है वो दरअसल क्यों हो रहा है. लेकिन इंटरवल के बाद जैसे जैसे कहानी दर्शकों को समझ में आती है वो फ़िल्म से जुड़ने लगते हैं. निखिल जैसे जैसे मीता को समझता है और दर्शकों के सामने जैसे जैसे मीता के किरदार की परतें खुलती जाती हैं वो उसे पसंद करने लगते हैं. परिणीति चोपड़ा के किरदार का बिंदासपन उसका चुलबुलापन लोगों को बहुत पसंद आएगा. कई जगह दर्शक भावुक भी हो जाएंगे. निखिल का किरदार भी बहुत दिलचस्प है. फ़िल्म का हास्य एक ख़ास दर्शक वर्ग को ही पसंद आएगा. सिंगल स्क्रीन थिएटर्स के लोगों को फ़िल्म ख़ास लुभा नहीं पाएगी. फ़िल्म के संवाद बड़े चुटीले हैं. सिद्धार्थ मल्होत्रा अपनी दूसरी ही फ़िल्म में बेहद परिपक्व तौर पर सामने आए हैं. वो बहुत हैंडसम लगे हैं. परिणीति चोपड़ा ने अवॉर्ड विनिंग परफ़ॉर्मेंस दी है. उन्होंने अपने हर सीन में जान डाल दी है. करिश्मा के रोल में अदा शर्मा ने भी अच्छा अभिनय किया है. अनुशासनप्रिय पुलिस अफ़सर के रोल में शरत सक्सेना बहुत ज़ोरदार रहे. उन्होंने अच्छा मनोरंजन किया है. परिणीति के पिता के रोल में मनोज जोशी भावुक और कॉमिक दोनों ही तरह के दृश्यों में उम्दा रहे. एक सीन में जब वो अपने भाई के सामने रो पड़ते हैं उन्होंने लाजवाब अभिनय किया है. बाकी कलाकारों ने भी अच्छा सहयोग दिया है. विनिल मैथ्यू ने अच्छा निर्देशन किया है. अपनी पहली ही फ़िल्म में उन्होंने एक मुश्किल कहानी चुनी लेकिन उसे अच्छे से अंजाम दिया. विशाल-शेखर का संगीत अच्छा है लेकिन फ़िल्म में एक भी सुपरहिट गाना नहीं है. कुल मिलाकर हंसी तो फंसी एक मनोरंजक फ़िल्म है लेकिन एक ख़ास दर्शक वर्ग के लिए ही. |
| DATE: 2014-02-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1180] TITLE: लिज हर्ले का क्लिंटन के साथ अफेयर से इनकार |
| CONTENT: ब्रितानी अखबारों में बिल क्लिंटन और लिज हर्ले की खबरें सुर्खियां बनी हुई हैं. अभिनेत्री लिज़ हर्ले और पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की एक फैंसी ड्रेस पार्टी में ली गईं तस्वीरें ब्रितानी अख़बारों की सुर्खियां बनी हुई हैं. इससे पहले लिज़ हर्ले के ब्वॉयफ्रैंड रहे हॉलीवुड अभिनेता टॉम साइज़मोर ने एक साक्षात्कार के दौरान लिज़ हर्ले और क्लिंटन के बीच कथित अफेयर की बात कही थी. लिज़ हर्ले ने इस ख़बर का खंडन किया है कि राष्ट्रपति के रूप में क्लिंटन के कार्यकाल के दौरान उनके बीच ऐसा कोई संबंध था. इसके बाद पत्रकारों ने उनकी नौ वर्ष पुरानी तस्वीरें निकालीं. यह ख़बर ऐसे समय आई है जब बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में खड़े होने की तैयारी कर रही हैं. अख़बार डेली स्टार के मुताबिक लिज़ हर्ले ने अपने पूर्व ब्यॉवफ्रेंड टॉम साइज़मोर के आरोपों को हास्यास्पद मूर्खता और पूरी तरह से झूठ बताया है. हर्ले ने एक अमरीकी वेबसाइट के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की बात भी कही है. इस वेबसाइट ने ही फ़िल्म सेविंग प्राइवेट रेयान के अभिनेता टॉम साइज़मोर के साक्षात्कार का टेप सार्वजनिक किया था. |
| DATE: 2014-02-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1181] TITLE: हीरोइनों के चेहरे असली, पर आवाज़ें नक़ली |
| CONTENT: जिस्म में बिपाशा बासु के मादक डायलॉग रॉकस्टार में नरगिस फ़खरी की नखरीली आवाज़ और ग़ुलाम में रानी मुखर्जी की चुलबुली आवाज़ से अगर आप प्रभावित हैं तो आपके लिए ये जानना ज़रूरी है कि वो आवाज़ें इन अभिनेत्रियों की नहीं हैं. पर्दे पर दिखती इन छवियों के पीछे आवाज़ देकर उसमें रंग भरने का काम करती हैं कुछ ऐसी कलाकार आवाज़ें जिनके चेहरे लोग नहीं पहचानते. ये डबिंग आर्टिस्ट फ़िल्म उद्योग के लिए बेहद अहम हैं लेकिन अक्सर फ़िल्मों के क्रेडिट में इनका नाम भी शामिल नहीं होता. मोना शेट्टी ने बचपन से ही आवाज़ के इस्तेमाल के गुर सीखने शुरू किए. माता-पिता विज्ञापनों की दुनिया से जुड़े थे सो वास्ता जल्दी पड़ा और धीरे-धीरे डबिंग की दुनिया में क़दम रख दिया. मोना बताती हैं मुझे बचपन में की गई सबसे पहली रिकॉर्डिंग तो याद नहीं है लेकिन पहली हिन्दी फ़िल्म सोल्जर थी जिसके लिए प्रीति ज़िंटा के लिए आवाज़ दी. रानी मुखर्जी के लिए ग़ुलाम अमीषा पटेल के लिए कहो ना प्यार है काजोल के लिए दुश्मन दीपिका पादुकोण के लिए ओम शांति ओम सहित कई फिल्मों में बहुत सारी अभिनेत्रियों के लिए डब किया है. मैंने इतनी ज़्यादा आवाज़ें रिकॉर्ड की हैं कि अब तो याद भी नहीं है. मोना कहती हैं कि उन्हें आज की अभिनेत्रियों में कटरीना और दीपिका के लिए आवाज़ देने में अच्छा लगता है. हालांकि वो बताती हैं जब कलाकार नया होता है और उसमें अपनी आवाज़ की डबिंग करने का उतना आत्मविश्वास नहीं होता तो हमारी ज़रूरत पड़ती है. हालांकि आज की अभिनेत्रियां जैसे दीपिका पादुकोण कटरीना कैफ़ अब ख़ुद ही डबिंग करने लगी हैं. मोना शेट्टी ने जिस्म में बिपाशा बासु के किरदार को आवाज़ दी थी जिसे काफ़ी प्रशंसा मिली. मोना बताती हैं हर फ़िल्म में आवाज़ देने के लिए भी ऑडिशन तो होता ही है. वहीं हम ये देख लेते हैं कि अभिनेत्री की बोलचाल का तरीक़ा आवाज़ की पिच हावभाव क्या है. चुनौती होती है उस आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ पूरी तरह से मैच करने की ताकि वो नकली ना लगे. फ़िलहाल मोना अपनी वॉयस कंपनी चला रही हैं जहां वो दुनिया भर की फ़िल्मों को अलग-अलग भाषाओं में डब करने का काम करवाती हैं. इस क्षेत्र में लंबा अर्सा बिताने के बाद मोना मानती हैं कि इस काम के सकारात्मक पक्षों में अपनी इच्छा से काम की आज़ादी और बेहतर काम से मिलने वाली वाहवाही का सुख तो है लेकिन कुछ स्थितियों में बदलाव ज़रूरी है. मोना कहती हैं श्रेय मिलने का जहां तक सवाल है उसमें दिक्क़त आती है. किसी को पता ही नहीं होता कि किसी फ़िल्म में अभिनेत्री की आवाज़ उसकी अपनी नहीं किसी डबिंग कलाकार की है. कुछ फ़िल्मों में नाम लिख भी दिया जाता है लेकिन अभिनेत्री की सहमति के बाद ही. कई हीरोइनों को डर होता है कि इससे उनकी लोकप्रियता प्रभावित हो सकती है. नम्रता साहनी फ़िलहाल दो टीवी चैनलों के लिए आवाज़ देती हैं लेकिन उऩकी शुरुआत हुई थी रेडियो के ज़रिए और धीरे-धीरे एक्टिंग का सिलसिला भी चल निकला लेकिन आख़िरकार उनका करियर बना आवाज़ की जादूगरी. नम्रता कहती हैं परिवार वालों ने तो मुझे पूरी आज़ादी दी कि मैं जो चाहे करूं लेकिन बाहर के लोग अक्सर हैरान होते थे कि जब तुम ऐक्टिंग करती हो तो ये वॉयस देने का काम करने की क्या ज़रूरत है. वो कहती हैं लोग इसे निचले दर्जे का काम समझते थे. पर मेरे लिए ये एक सोचा-समझा चुनाव था. आप देखिए उस वक्त जो अभिनेत्रियां मेरे साथ काम कर रही थीं वो आज कुछ नहीं कर रही हैं जबकि मैं अब भी काम रही हूं. अपनी सबसे पहली यादगार डबिंग की बात करते हुए नम्रता कहती हैं उस वक्त श्रीदेवी बहुत बड़ी अभिनेत्री बन चुकी थीं और उनकी फ़िल्में हिंदी में डब होने लगीं. मैंने श्रीदेवी की जिस फ़िल्म के लिए आवाज़ दी वो थी आदमी और अप्सरा. उसके बाद मैंने श्रीदेवी की बहुत सारी दक्षिण भारतीय फ़िल्मों को हिंदी में डब किया. मैंने मनीषा कोईराला के लिए भी बहुत डब किया है. नम्रता थोड़े शिकायती लहजे में कहती हैं कि लोगों को लगता है ये बड़ा आसान काम है लेकिन इसमें बहुत मेहनत है. बार-बार एक अभिनेत्री की आवाज़ को सुनना पड़ता है. सही टोन पकड़नी होती है. नम्रता कहती हैं कि माधुरी दीक्षित उनकी पसंदीदा अभिनेत्री हैं लेकिन उनके लिए कभी डब करने का मौक़ा ही नहीं आता है. बाक़ी डबिंग कलाकारों की तरह नम्रता की ज़ुबान पर भी वही सवाल है कि आख़िर उनकी आवाज़ों को वाजिब पहचान क्यों नहीं मिलती. वे कहती हैं जिन सितारों को हम आवाज़ देते हैं अगर उनकी बात होती है तो हमारी क्यों नहीं. किसी को पता नहीं चलता कि आवाज़ किसकी है. मुझे नहीं लगता कि ये इंडस्ट्री ये समझती भी है कि ज़िक्र बेहद ज़रूरी है. |
| DATE: 2014-02-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1182] TITLE: ऊँची है सैंडल! आपके पाँव ठीक तो हैं न? |
| CONTENT: क्या ये मुमकिन है कि 1950 के शुरुआती दशक में फैशनपरस्त महिलाओं का दुबलेपन का जुनून स्टलेटोज़ यानी ऊंची नुकीली हील के चलन की वजह बनाइन जूतों के बारे में ये सोच ब्रुनो फ्रिसोनी की है. ब्रुनो फ़्रांसीसी लग्ज़री ब्रैंड रोजर विविए के क्रिएटिव निदेशक हैं. इस ब्रैंड के संस्थापक रोजर विविए उन दो लोगों में से एक थे जिनके नाम स्टलेटोज़ हील वाले जूतों की बनावट से जुड़े हैं. स्टलेटोज़ जूतों के दूसरे रचनाकार विविए के प्रतिद्वंद्वी इटली के साल्वातोर फेरागामो समझे जाते हैं जिन्हें सितारों का शूमेकर या जूते बनाने वाले कहा जाता है. फेरागामो के ग्राहकों में मार्लिन मुनरो ग्लोरिया स्वांसन और बैटी डेविस जैसी मशहूर हॉलीवुड हीरोइनें शामिल थीं. ब्रुनो फ्रिसोनी कहते हैं हमें शायद कभी नहीं पता चलेगा कि किसने पहले ये जूते बनाए. ये उस बहस की तरह है कि मिनी स्कर्ट किसने ईजाद की-कूर्गेस या मैरी क्वांटफ्रिसोनी के मुताबिक़ दूसरे विश्व युद्ध के दौरान विमानों के लिए अल्युमिनियम जैसे नई पदार्थ और धातु के साथ प्लास्टिक को फ्यूज़ करने जैसी नई तकनीकों ने दुनिया की सबसे पतली हील के विकास का रास्ता खोला. स्टलेटोज़ हील में ठोस स्टील की पांच मिलीमीटर व्यास की धातु की महीन नुकीली सुई फिट करने की कला की तुलना फ़्रिसोनी एक इमारत की आधारशिला से करते हैं. वे कहते हैं जूते से हील को जोड़ने के लिए तीन या चार कीलें या स्क्रू की ज़रूरत होती है. हील जोड़ने के लिए कम से कम जगह होती है और आपको कुछ आयामों को ध्यान में रखना होता है. इस पर हम हील और भी ज़्यादा पतली करने की कोशिश करते हैं. वे आगे कहते हैं हालांकि आजकल जब महिलाएं पतली हील देखती हैं तो पूछती हैं कि क्या ये हील व्यावहारिक है क्या वे उसे पहन कर चल पाएंगी क्या ये टूट सकती है एक आदर्श स्टलेटोज़ की हील लगभग 3-2 से 3-4 इंच होती है. अगर हील बेहद पतली है तो उसके ज़्यादा ऊंचा होने की ज़रूरत नहीं है. अहम बात ये है कि लोग इसे एक सेक्सी चीज़ की तरह देखें. पॉप गायिका लेडी गागा जैसी मशहूर हस्तियों ने स्टिलेटो जूतों को लोकप्रिय बनाया है. दरअसल स्टलेटोज़ एक छोटी और किनारों से पतली इतालवी छुरी होती है. ऑक्सफोर्ड इंग्लिश शब्दकोष के मुताबिक़ स्टलेटोज़ हील शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले 20 अप्रैल 1931 को अमरीकी राज्य इंडियाना के एक अख़बार के लेख में हुआ था. इस लेख में 19वीं सदी के कुछ चित्र भी छपे थे. लेकिन स्टलेटोज़ हील वाले जूतों का चलन 1950 के दशक में हुआ और 1974 में इसे मानोलो ब्लाहनिक से फिर से लोकप्रिय बनाया. उनके बनाए पतली हील वाले आगे से नुकीले जूतों को उस वक़्त प्रचलित चौड़े प्लेटफॉर्म हील वाले जूतों के सेक्सी विकल्प के तौर पर देखा गया. स्टलेटोज़ की लोकप्रियता जारी रही और 1990 के शुरुआती दशक में मशहूर पॉप गायिका मैडोना ने मनोलो ब्लाहनिक के बनाए स्टलेटोज़ जूतों की तुलना सेक्स से की. साल 2000 में टीवी चैनल एचबीओ पर सेक्स एंड द सिटी धारावाहिक के एक एपिसोड में कैरी ब्रैडशॉ नाम की किरदार को एक चोर से उसके पसंदीदा मानोलोज़ को छोड़ने का निवेदन करते हुए दिखाया गया. अतीत में महिलाएं स्टलेटोज़ जूते सिर्फ़ रात को ही पहनती थीं और दिन के दौरान छोटी हील के जूते पहनती थीं. लेकिन हाल ही में मशहूर हस्तियों के हर मौके पर स्टलेटोज़ पहनने के जुनून के चलते महिलाएं अब इन जूतों को हर रोज़ के पहनती हैं. जिन जानी-मानी हस्तियों ने स्टलेटोज़ हील वाले जूतों को लोकप्रिय बनाया है उनमें पॉप गायिका लेडी गागा भी हैं. उनके पास कई स्टलेटोज़ जूते हैं जिनमें अलेक्सेंडर मैक्कवीन द्वारा डिज़ाइन किया गया एक 10 इंच हील वाला जूता भी है. ऊंची हील वाले स्टिलेटो जूते पहनने के कई दुष्प्रभाव हैं. लेकिन फैशन पत्रिका वोग के अमरीकी संस्करण के एक संपादक आंद्रे लियोन टैली ने स्टलेटोज़ जूतों के चलन का खुल कर विरोध किया है. उनका कहना है बहुत सारी कामकाजी महिलाएं एक-दूसरे की नकल कर अव्यावहारिक जूते पहनती हैं. ये पैरों की सेहत के लिए अच्छे नहीं होते. इन ऊंचे यातना कक्षों को डिज़ाइन करने वाले डिज़ाइनरों को सच्चाई पता होना चाहिए. ऊंची हील वाले स्टलेटोज़ जूते पहनने के कई दुष्प्रभाव हैं. इससे टखने में मोच आने से लेकर गठिया और हड्डी टूटने तक कुछ भी हो सकता है. तीन इंच से ज़्यादा ऊंची हील से एड़ी पर सपाट तलवे वाले जूतों की तुलना में सात गुना ज़्यादा दबाव पड़ता है. ये दबाव कथित तौर पर हाथी के एड़ी पर पड़ने वाले दबाव से कहीं ज़्यादा है. अब स्टलेटोज़ जूते पहन कर चलना सिखाने के लिए क्लासें चलाई जा रही हैं. अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में विक्टर चू ऐसी ही एक क्लास चलाते हैं जिसमें वह अपनी छात्राओं को सिखाते हैं कि स्टलेटोज़ पहनकर ऊंची-नीची पटरियों और नालियों को ढंकने वाली जालियों पर किस तरह नज़ाकत से चला जाए. स्टलेटोज़ हील लॉन्च हुए 50 साल से ज़्यादा वक़्त बीत गया है लेकिन लगता है कि आज भी दुनियाभर में हज़ारों महिलाएं इन्हें पहनकर कष्ट सहने को तैयार हैं. पूर्व ब्रितानी महिला बैंड स्पाइस गर्ल की सदस्य विक्टोरिया बेकहम ने तो कथित तौर पर यहां तक कहा है कि वे फ्लैट या सपाट तलवे वाले जूते पहन कर ठीक से सोच नहीं पाती हैं. यहां तक कि पांच इंच ऊंची स्टलेटोज़ हील पहनने के चलते उन्हें स्लिप डिस्क हो गया था. वास्तुशिल्प के लिहाज़ से स्टलेटोज़ जूते बहुत सुंदर दिखते हैं. इसका एक आकर्षण ये भी है कि इसे पहन कर शारीरिक मुद्रा में भी बदलाव आ जाता है जिससे लंबी टांगों का आभास होता है. स्टलेटोज़ जूतों की फ़ैन महिलाओं का दावा है कि ये जूते पहनने से उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे सेक्सी और ग्लैमरस महसूस करती हैं. जैसा कि स्टलेटोज़ पहनने में एक्पसर्ट हॉलीवुड हीरोइन मर्लिन मुनरो ने एक बार कहा था अगर एक लड़की के पास सही जूते हों तो वो दुनिया फ़तह कर सकती है. |
| DATE: 2014-02-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1183] TITLE: रणबीर, प्रियंका या ऋतिक: कौन होगा सलमान के बाद? |
| CONTENT: टीवी रियलिटी शो बिग बॉस के पिछले दो सीज़न होस्ट करने वाले सलमान ख़ान अगला सीज़न नहीं करेंगे ये ख़बरें आम होते ही नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि ये कमान अब किसके हाथ में जाएगी. निर्माता आठवें सीज़न की तैयारी में तो जुटे हैं लेकिन पहली चुनौती है इस शो का होस्ट पक्का करना. होस्ट के तौर पर शो निर्माताओं के सामने तीन विकल्प नज़र आ रहे हैं - रणबीर कपूर प्रियंका चोपड़ा या ऋतिक रोशन. प्रोडक्शन हाउस के कुछ लोगों का कहना है की अगर सलमान नहीं तो उनकी पसंद रणबीर रहेंगे क्योंकि रणबीर युवा दर्शको में काफ़ी लोकप्रिय हैं और उनके प्रशंसक उन्हें काफ़ी फॉलो करते है. बिग बॉस के अब तक सात संस्करण प्रसारित हो चुके हैं. इनमें से चौथे छठे और सातवें सीज़न में सलमान ख़ान ने बिग बॉस की मेज़बानी की थी. यूँ तो धूम-3 ने 500 करोड़ का बिज़नेस किया पर फ़िल्म को देखने के बाद दर्शक एक ही चीज़ को तरसे कटरीना कैफ़ का रोल. फिल्म धूम-3 में कटरीना का बेहद ही छोटा रोल था जिसके कारण ऐसा लगा की फ़िल्म में कटरीना की जगह नाम मात्र के लिए है. मुंबई में हुई एक प्रेसवार्ता में कटरीना से धूम-3 में उनके छोटे रोल के बारे जब पुछा गया तो कटरीना ने कहा मैं इस बात को तारीफ़ के तौर पर लूंगी कि मुझे फ़िल्म में लोग और देखना चाहते है और में आगे से कोशिश करुँगी की वही फ़िल्म करूं जिसमे मेरा रोल बड़ा हो. ग़ौरतलब है कि धूम-3 के बारे में अपने एक पुराने इंटरव्यू में आमिर ख़ान ने भी ये बात मानी थी की कटरीना का रोल फ़िल्म में लम्बा किया जा सकता था. इस साल कटरीना फ़िल्म बैंग-बैंग में ह्रतिक के साथ नज़र आएंगी. जूनियर बच्चन अभिषेक का आज 38वां जन्मदिन है. अभिषेक मानते हैं कि अपने हर जन्मदिन पर काम करना काफ़ी लकी रहता है. पिछले कुछ जन्मदिन उन्होंने अपनी हिट फ़िल्मों के सेट पर बिताए हैं. धूम बंटी और बबली और बोल बच्चन. ये साल भी अभिषेक अपनी आने वाली फ़िल्म आल इज़ वेल और हैप्पी न्यू इयर की शूट में व्यस्त रहेंगे. अभिषेक बच्चन हाल ही में धूम-3 में नज़र आए थे. |
| DATE: 2014-02-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1184] TITLE: अमिताभ बच्चन और सलमान की आवाज़ें किसकी ? |
| CONTENT: फ़िल्मों से शौकीन जितने चाव से फिल्में देखते हैं उसी शौक से वो अपने पसंदीदा डायलॉग्स को बरसों बरस नहीं भूलते हैं. लेकिन कई बार ऐसा होता है जब वो संवाद पर्दे पर दिखने वाले अदाकार नहीं बल्कि अन्य लोग बोल रहे होते हैं. इसकी वजह कई बार अपनी आवाज़ देने के लिए अदाकारों का उपलब्ध न होना होता है तो कई बार इसकी कुछ और वजहें होती हैं. और यहीं फिल्म निर्माताओं के काम आते हैं डबिंग आर्टिस्ट. हिंदी फ़िल्मों में अमिताभ बच्चन की आवाज़ ख़ासी दमदार आवाज़ मानी जाती. कई डबिंग आर्टिस्ट और मिमिक्री आर्टिस्ट उनकी आवाज़ निकालते हैं लेकिन सुदेश भोंसले ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने अमिताभ बच्चन के लिए ना सिर्फ़ आवाज़ दी है बल्कि वो उनकी आवाज़ में गाना गाते हैं. अपने हुनर पर सुदेश कहते हैं बहुत मेहनत और प्रैक्टिस की है और ये देने वाले की देन है जो मैं अमिताभ बच्चन की आवाज़ में गा सकता हूँ और डायलॉग बोल सकता हूँ. मैंने उनके लिए चुम्मा चुम्मा हम मेरी मखणा बागवान शावा शावा कभी ख़ुशी कभी ग़म और सोणा सोणा छोटे मियां बड़े मियां जैसे गीत गाएं हैं. अपनी शुरुआत के बारे में सुदेश बताते हैं मैं एक बार उनकी फ़िल्म मुकद्दर का सिकंदर देख कर आया और एक लड़की के सामने उनका डायलॉग बोलने लगा और वो मेरे दोस्तों ने सुन लिया. जब उन्होंने रिकॉर्डिंग कर मुझे सुनाई तो मुझे भी लगा कि मेरी आवाज़ लगभग उनके जैसी है. उन्होंने कहा उसके अगले दिन ही आकर मैं उनकी कई फ़िल्मों की कैसेट लेकर उनके डायलॉग याद करने लगा और जब भी मौका मिलता स्टेज पर शो करता. उस समय नक़ल करने वाले कई आर्टिस्ट थे लेकिन शायद अमिताभ जी कि तरह आवाज़ देना वाला में ही था. वो कहते हैं मैंने अमिताभ बच्चन के लिए सबसे पहले शशि कपूर निर्देशित फ़िल्म अजूबा में या अली या अली मेरा नाम है अली गाया था. अमिताभ बच्चन के अलावा सुदेश भोंसले ने संजीव कुमार अनिल कपूर समेत कई अन्य अभिनेताओं के लिए भी आवाज़ दी है. किसी दूसरे की आवाज़ में गाना कितना मुश्किल होता है और कितना रियाज़ करते हैं इस सवाल के जवाब में सुदेश कहते हैं मैं गायक हूँ तो इतना मुश्किल नहीं होता. हाँ लेकिन डायलॉग बोलना बहुत मुश्किल है. डबिंग कलाकारों को फ़िल्म उद्योग में बेहतर पहचान और पुरस्कारों के सवाल पर सुदेश कहते हैं इंडस्ट्री में इस कला को बहुत निचले स्तर पर देखा जाता है लेकिन बाक़ियों की तरह उन्हें भी उतना ही सम्मान मिलना चाहिए. अगर अवॉर्ड मिलें तो और अच्छा क्योंकि ये एक मुश्किल कला है जिसे हर कोई नहीं कर सकता. सुदेश कहते हैं इस काम की अच्छी बात ये है कि हम वो काम करते हैं जो ज़्यादा लोग नहीं कर पाते. दूसरा हम निर्माताओं के करोड़ों रुपए डूबने से बचाते हैं लेकिन हमें अपने काम का वो श्रेय नहीं मिलता. कभी कभी तो ऐसा होता है कि आवाज़ें निकालते हुए हम अपनी ही पहचान भूल जाते हैं. ऐसे ही एक डबिंग आर्टिस्ट हैं चेतन शीतल जिन्होंने 150 कलाकारों के लिए फ़िल्मों में आवाज़ दी है. चेतन बताते हैं मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं इस वॉइसिंग इंडस्ट्री में आ पाऊंगा लेकिन बचपन से ही मेरा शौक था दूसरों की आवाज़ निकालना. मैं उस वक़्त जानवरों की आवाज़ बहुत अच्छी तरह निकाल लेता था और वो प्रतिक्रिया भी करते. वो कहते हैं मुझे ये मौका मिला 1989 -1990 में जब मुझे फ़िल्म अफ़सर में एक्टर पिंचू कपूर साहब के लिए डबिंग के लिए कहा गया. उनका देहांत हो गया था और उनका रोल फ़िल्म में काफ़ी रोमांचक था. उन्होंने कहा मैं उस समय सिर्फ़ 18 साल का था और पिंचू कपूर 89 बरस के थे और मुझे उनकी आवाज़ देनी थी. मैंने अपनी आवाज़ से सभी को अचंभित कर दिया. मैंने पिंचू कपूर की 8 फ़िल्मों की डबिंग की. चेतन बताते हैं कि उन्होंने सनी देओल के लिए डब किया है और एक्टर विनोद मेहरा अमजद ख़ान राकेश रोशन औरत फ़िल्म के लिए भी आवाज़ दी है. सलीम इशाक की फ़िल्म दूध का क़र्ज़ में भी अमरीश पुरी और प्रेम चोपड़ा के लिए आवाज़ दी और धीरे धीरे काफ़ी फ़िल्मों और स्टेज शो पर हुनर दिखाया. चेतन बताते हैं कि जब कभी किसी अभिनेता को समस्या होती थी तो प्रोड्यूसर उन्हें डबिंग के लिए बुलाते थे. उनके अनुसार 1993 में जब संजय दत्त का प्रॉब्लम हुआ तो मैंने उनकी फ़िल्मों आंदोलन नमक विजेता जय विक्रांता के लिए आवाज़ दी. चेतन बताते हैं कि उन्होंने सलमान ख़ान के लिए फ़िल्म बीवी नंबर 1 के लिए वसु ददलानी के कहने पर अपनी आवाज़ दी. इसके अलावा उन्होंने क़रीब 2500 विज्ञापनों के लिए भी डबिंग की है. वो बताते हैं मैंने अमिताभ बच्चन के लिए एक टीवी कमर्शियल और सचिन के लिए भी आवाज़ दी है. फ़िल्म दबंग 2 में विलेन प्रकाशराज के लिए पूरी फ़िल्म में वो अपनी आवाज़ दे चुके हैं. मुझे एक और मौका मिला सिमी ग्रेवाल की डॉक्यूमेंट्री में स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी की आवाज़ देने का. अपने हुनर पर बात करते हुए चेतन कहते हैं हर एक्टर की अपनी एक अलग आवाज़ है और उन सभी को डब करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है ताकि वो बिलकुल स्वाभाविक लगे. उन्होंने कहा आवाज़ को पूरी तरह से बोलना पहचानना ही आवाज़ का अध्ययन है. स्टेज पर किसी की नक़ल करना और किसी के लिए फ़िल्म में आवाज़ देना बहुत ही अलग है. लेकिन चेतन को फिल्म इंडस्ट्री से कुछ शिकायतें भी हैं. वो कहते हैं हम इतना काम करते हैं लेकिन हमें वो सम्मान नहीं मिलता जो मिलना चाहिए. मैं चाहता हूँ कि अवॉर्ड फंक्शन में बाक़ी कैटेगरी की तरह हमारे लिए भी एक कैटेगरी होनी चाहिए. हमारे काम को भी दुनिया के सामने आना चाहिए. |
| DATE: 2014-02-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1185] TITLE: कहां थे बहन की शादी पर सनी और बॉबी? |
| CONTENT: हिंदी फ़िल्मों के ही मैन कहे जाने वाले धर्मेंद्र और ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी की बेटी आहना की शादी पर फ़िल्म और उद्योग जगत की नामी हस्तियां पहुंची लेकिन चर्चा इस बात से ज़्यादा ये रही कि आहना के भाई सनी देओल और बॉबी देओल इस शादी से नदारद क्यों थे. आख़िर कहाँ व्यस्त थे सनी और बॉबी इस सवाल का जवाब लगातार तलाशा जा रहा था. अब पता चला है कि जहाँ एक ओर बॉबी देओल दुबई में सेलेब्रिटी क्रिकेट लीग में मुंबई हीरोज़ टीम का हिस्सा बन मैच खेल रहे थे वहीं दूसरी ओर सनी मुंबई में ही आराम कर रहे थे. इस से पहले भी जब हेमा मालिनी की बेटी ईशा देओल की शादी हुई थी तब भी सनी और बॉबी ने उस शादी से दूरी बनाए रखी. करण जौहर ने अपने चैट शो कॉफ़ी विद करण में सोनाक्षी को बुलाया. इस शो पर आने से पहले सोनाक्षी ने करण के सामने एक शर्त रखी ये शर्त थी कि इस शो पर सोनाक्षी के साथ अभिनेता शाहिद कपूर को भी बुलाने की. ग़ौरतलब है कि फ़िल्म आर राजकुमार के बाद से इन दोनों फ़िल्मी सितारों के बीच कथित तौर पर नज़दीकियां बढ़ती जा रही हैं. इस साल होने वाले कई अवॉर्ड समारोहों पर सोनाक्षी और शाहिद एक साथ दिखे. इस से पहले शाहिद कपूर जब भी करण के शो में गए हैं तो अकेले नहीं गए. उन्होंने दो बार इस कार्यक्रम में शिरकत की. एक बार करीना कपूर के साथ तो एक बार प्रियंका चोपड़ा के साथ. अब शाहिद कपूर सोनाक्षी के साथ शायद इस शो पर नज़र आएंगे. |
| DATE: 2014-02-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1186] TITLE: कौन है प्रियंका का 'नाज़ुक नवाब'? |
| CONTENT: मुंबई के मनोरंजन जगत में क्या ताज़ा हो रहा है आइए जल्दी से एक नज़र डाल लेते हैं मुंबई डायरी में. बॉलीवुड के हैंडसम हंक और सुपरफ़िट माने जाने वाले अक्षय कुमार को क्या बुढ़ापे ने आ घेरा है. मुंबई में रविवार को हुए एक सार्वजनिक समारोह में अक्षय कुमार को देखकर ऐसा ही लगा. यहां अक्षय कुमार जैसे दिख रहे थे उसे देखकर उनके प्रशंसकों को झटका लग सकता है. मुंबई के महालक्ष्मी रेसकोर्स में आयोजित डर्बी रेस में अक्षय कुमार की सफ़ेद दाढ़ी साफ़ नज़र आ रही थी और वो बूढ़े भी नज़र आ रहे थे. अक्षय ने इसी गेटअप में डिज़ाइनर शेन और पीकॉक के लिए रैंपवॉक भी किया. हालांकि पहले अपनी पत्नी ट्विंकल खन्ना की बीमारी के मद्देनज़र पहले अक्षय ने इस इवेंट में आने से मना कर दिया लेकिन फिर अचानक ही वो यहां अपने ख़ास गेटअप में नज़र आए. उद्योगपति विजय माल्या हाल ही में बिलकुल नए लुक में नज़र आए. उन्होंने ख़ास तरीके से अपने बाल कटवा रखे थे और उनका हेयरस्टाइल रैपर और गायक यो यो हनी सिंह के हेयरस्टाइल से ख़ासा मेल खा रहा था. अपनी कंपनी किंगफ़िशर एयरलाइंस की बेहद ख़राब माली हालत के मद्देनज़र माल्या कुछ समय से मीडिया में नज़र नहीं आ रहे थे लेकिन मुंबई में हुए एक इवेंट के दौरान उनके इस ख़ास अंदाज़ में देखकर लोग चौंक पड़े. वैसे माल्या अपने स्टाइल और ड्रेस सेंस के लिए सोशल सर्किल में ख़ासे मशहूर हैं. प्रियंका चोपड़ा को प्यार से पिग्गी चॉप्स कहा जाता है पर क्या आप जानते हैं कि वो कौन है जिसे प्रियंका प्यार से नाज़ुक नवाब बुलाती हैं. वो हैं अभिनेता रणवीर सिंह जिन्हें प्रियंका ने फ़िल्म गुंडे की शूटिंग के दौरान ये ख़िताब दिया. दरअसल फ़िल्म की शूटिंग के दौरान रणवीर सेट पर हर किसी से अपने बीमार पड़ने के या चोटिल होने के किस्से बयां करते रहते थे. और इसी वजह से प्रियंका ने उन्हें इस ख़िताब से नवाज़ा. गुंडे 14 फ़रवरी को रिलीज़ हो रही है जिसमें रणवीर और प्रियंका के अलावा अर्जुन कपूर की भी अहम भूमिका है. |
| DATE: 2014-02-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1187] TITLE: नायिका गर्भवती है, तो कॉमेडी शो पर सलमान |
| CONTENT: पिछले हफ़्ते की तरह इस हफ़्ते भी टेलीविज़न पर फ़िक्शन धारावाहिकों का जलवा जारी है. शशि और सुमित मित्तल का शो दिया और बाती हम पहले स्थान पर बरक़रार है. आख़िर हो भी क्यों ना संध्या ने जो सपना देखा था आख़िरकार वो पूरा होने को आया और वो पुलिस ट्रेनिंग पाने के लिए चल दीं. दिया और बाती हम के लेखक बहुत दिमाग़ लगाकर कहानी में जो ट्विस्ट लेकर आए थे उसमें वो सफल हो गए. फ़िलहाल जो दिखाया जा रहा है उसके मुताबिक़ संध्या गर्भवती है और उसे लेने के लिए ससुराल वाले पहुंचते हैं. ये अचानक हुआ बदलाव दर्शकों शायद पसंद करेंगे. दूसरे नंबर पर हैं स्टैंड अप कॉमेडियन कपिल शर्मा. मानना पड़ेगा कि उन्होंने बड़ी छलांग लगाई इस बार अपने शो में. आख़िरकार ख़ुद सलमान ख़ान जो आए थे इस हफ़्ते उनके कार्यक्रम में तो इसका पूरा फ़ायदा उठाते हुए टीआरपी की दौड़ में कॉमेडी नाइट्स विद कपिल शर्मा रहा दूसरे नंबर पर. तीसरे नंबर पर है गोपी और अहम की कहानी साथिया. शो में बहुत जल्द बड़े बदलाव दिखाई देंगे और उसके बाद क्या हाल होगा वो अगले हफ़्ते की टीआरपी से पता चल जाएगा. शो में गोपी का लुक बदलने वाला है और कुछ नए कलाकार भी दिखाई देंगे. तारक मेहता को छह साल होने को आए लेकिन इसकी टीआरपी बरक़रार है. चौथे स्थान पर हैं जेठालाल और उनका अनोखा परिवार यानी तारक मेहता का उल्टा चश्मा. 6 जुलाई 2014 को इस शो को छह साल पूरे हो जाएंगे. दिलीप जोशी और दिशा वकानी की कॉमेडी का तड़का लगातार दर्शकों की पसंद बना हुआ है. पांचवे नंबर पर है राजन शाही का पारिवारिक ड्रामा ये रिश्ता क्या कहलाता है. शो में फ़िलहाल हलचल बहुत है क्योंकि अक्षरा बहुत कोशिश कर रही हैं कि किसी भी तरह अपने ससुर जी की दोबारा शादी करवाएं. ये रिश्ता क्या कहलाता है में अक्षरा अपने ससुर की शादी कराने की कोशिश में हैं. ज़ाहिर है दर्शक भी इसका नतीजा देखने के लिए काफ़ी उत्सुक हैं और इस शो पर भी नायिका यानी अक्षरा मां बनने वाली हैं. अब देखना ये है कि अक्षरा वाकई गर्भवती है या ये सिर्फ़ ग़लत संकेतों का मामला है. इस हफ़्ते दो अवॉर्ड शो भी थे जिनमें से स्क्रीन अवॉर्ड्स को 9 टीवीएम मिला है और क्यों ना हो जब किंग ख़ान अपनी पूरी ताक़त लगाकर शो की मेज़बानी करेंगे तो असर पड़ना लाजमी है. चैनलों की होड़ पर देखें तो पहले नंबर पर रहा स्टार प्लस दूसरे स्थान पर रहा चैनल कलर्स का और तीसरा नंबर रहा ज़ी टीवी का. |
| DATE: 2014-02-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1188] TITLE: ऐश्वर्या चौथे और दीपिका 29वें नंबर पर! |
| CONTENT: पूर्व मिस वर्ल्ड ऐश्वर्या राय बच्चन की ख़ूबसूरती का जलवा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब भी क़ायम है और कोई भी बॉलीवुड की अभिनेत्री उनके आस-पास भी नहीं है. हॉलीवुड बज़ नाम की एक वेबसाइट के सर्वे में ऐश्वर्या राय बच्चन को विश्व की सबसे ख़ूबसूरत महिलाओं की श्रेणी में चौथे नंबर पर रखा गया है. ऐश्वर्या के बाद बॉलीवुड से दूसरा नाम इस लिस्ट में इस दौर की बेहद कामयाब अभिनेत्री दीपिका पादुकोण का है लेकिन वह ऐश्वर्या से बेहद पीछे 29वें नंबर पर हैं. हॉलीवुड बज़ का दावा है कि उन्होंने ये लिस्ट 40 लाख लोगों के वोटों के आधार पर बनाई है. ऐश्वर्या से आगे हॉलीवुड अभिनेत्री एंजेलीना जोली केट अप्टन और मोनिका बेलूची हैं. अपने कई प्रशंसकों के दिल तोड़ते हुए शाहिद कपूर आख़िरकार गंजे हो गए. उन्होंने विशाल भारद्वाज की फ़िल्म हैदर के लिए अपने बाल मुंडवा लिए. शाहिद ने जब ट्विटर पर इस बात का ऐलान किया था कि वह गंजे होने वाले हैं तो उनके प्रशंसकों ने ऐसा ना करने की अपील की थी और ट्विटर पर dontgobaldshahid नाम का हैशटैग काफ़ी ट्रेंड करने लगा था. लेकिन शाहिद ने अपने इस रोल के लिए बालों की बलि दे ही दी. इसके बाद शाहिद टोपी पहने नज़र आए और उन्होंने बड़ी सावधानी से अपना नया लुक बाहर नहीं आने दिया. विशाल भारद्वाज की इस फ़िल्म में इरफ़ान की भी अहम भूमिका है और इस वक़्त कश्मीर में इसकी शूटिंग चल रही है. हाल ही में ऐ मेरे वतन के लोगों के स्वर्ण जयंती समारोह में स्टेज पर ये गीत गुनगुनाने वाली लता मंगेशकर लंबे समय बाद फ़िल्मी गायन में सक्रिय हो रही हैं. वह एक मराठी फ़िल्म का गाना गाएंगी. ये एक पीरियड फ़िल्म है और इसकी संगीतकार वैशाली सामंत ने लता मंगेशकर को गाने के लिए मना लिया है. लता लंबे समय से फ़िल्मी गायन से दूर हैं. उन्होंने बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में माना था कि मौजूदा दौर के गानों में उनकी आवाज़ फ़िट नहीं बैठती इसलिए वह गायन से दूर हो गई हैं. |
| DATE: 2014-01-31 |
| LABEL: entertainment |
| [1189] TITLE: परिणीति के पास अमिताभ के साथ काम का वक्त नहीं! |
| CONTENT: अमिताभ बच्चन की फ़िल्में देख-देखकर बड़े होने वाले आज के सितारों के पास अब इतना भी वक्त नहीं है कि वे उनके साथ फ़िल्म का ऑफ़र स्वीकार कर सकें. चंद फ़िल्मों के ज़रिए ही अपनी पहचान बना लेने वाली परिणीति चोपड़ा के साथ कुछ ऐसी ही हुआ है. उन्हें अमिताभ बच्चन और इरफ़ान जैसे कलाकारों के साथ काम करने का मौक़ा मिल रहा था लेकिन वह फ़िल्म साइन नहीं कर पाईं. बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में जब इस बात का ज़िक्र उठा तो परिणीति ने कहामैं इस पर बहुत ज़्यादा कुछ बोलना नहीं चाहती हूं लेकिन चूंकि ये ख़बर मीडिया में आ चुकी है तो बता देती हूं बस यही कहूंगी कि हां वो फ़िल्म मेरे पास आई थी और मैं बहुत उत्साहित थी बच्चन साहब और इरफ़ान के साथ काम करने के लिए. लेकिन जब वो फ़िल्म शूट हो रही है तब मैं वाकई बहुत व्यस्त हूं. परिणीति बताती हैं मैं उस वक्त कोई और पिक्चर शूट कर रही हूं इसलिए नहीं कर पाउंगी और ऐसा होता है. आपको बहुत सारी फ़िल्में मिलती हैं जो पसंद भी आती हैं लेकिन अलग-अलग वजहों से आप कभी-कभी वो फ़िल्में नहीं कर पाते हैं. अक्सर फ़िल्मी सितारे जब लोकप्रियता हासिल कर लेते हैं तो उनकी इस तरह की बातों को सितारों के नख़रे कहा जाता है लेकिन परिणीति कहती हैं कि ना तो वह ख़ुद को स्टार मानती हैं और ना बदली हैं. फरवरी में रिलीज़ हो रही फ़िल्म हंसी तो फंसी में परिणीति चोपड़ा सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ नज़र आएंगी. परिणीति कहती हैं मैं बिल्कुल भी स्टार नहीं हूं. बहुत सालों के काम के बाद कोई स्टार बनता है. मुझमें कुछ नहीं बदला मैं वैसी ही हूं. पर्दे पर अलग-अलग क़िरदारों के साथ ज़रूर नज़र आती रहूंगी. परिणीति उन सितारों की लिस्ट में भी शामिल हैं जिनका वज़न उनकी परेशानी की वजह रहा है लेकिन अब वह अपने आप से ख़ुश हैं. परिणीति बेबाकी से बताती हैं एक वक्त था जब मेरा वज़न ज़्यादा था. मुझे ठीक से कपड़े पहनने का सलीक़ा भी नहीं था. अजीब तरह से कपड़े पहन लिया करती थी. लेकिन फिर मैंने वज़न कम किया. अब मैं पतली हो चुकी हूं लेकिन और फिट होना चाहती हूं. परिणीति चोपड़ा की अब तक तीन फ़िल्में रिलीज़ हो चुकी हैं. लेडीज़ वर्सेज़ रिकी बहल इशक़ज़ादे और शुद्ध देसी रोमांस. ये तीनों फ़िल्में यशराज बैनर के तले बनी थीं. परिणीति की अगली फ़िल्म हंसी तो फंसी फ़रवरी में रिलीज़ हो रही है. इसके निर्माता करण जौहर और अनुराग कश्यप हैं. |
| DATE: 2014-01-31 |
| LABEL: entertainment |
| [1190] TITLE: करीना कपूर: पांच साल तक मां नहीं बनूंगी |
| CONTENT: पिछले कुछ दिनों में मीडिया से करीना कपूर की दूरी ने एक शक़ को जन्म दिया. ऐसी अटकलें लगने लगी कि शायद करीना प्रेग्नेंट है. साड़ी में लिपटी करीना कपूर की कुछ तस्वीरों से इस बात को और भी हवा मिलती दिखाई दी. पर करीना ने इन बातों को नकारा कर स्थिति साफ़ की है. करीना कहती हैं कि वो अगले पांच साल तक माँ नहीं बनने का इरादा नहीं रखतीं और इस मसले पर उनके पति सैफ़ अली ख़ान पूरी तरह से उनके फ़ैसले के हक़ में हैं. दरअसल ये बातें तब उठने लगीं जब करीना इस साल किसी भी अवार्ड समारोह में परफॉर्म करती नहीं दिखी. फिर क्या था मीडिया में करीना कपूर के गर्भवती होने की सुगबुगाहट होने लगी. करीना ने इस बात को भी साफ़ कर दिया है की वो एक अवार्ड में तभी परफॉर्म करती है जब उन्हें उसके लिए पैसे दिए जाये. साल 2014 में करीना सिंघम 2 की शूटिंग करेंगी जिसकी तैयारी के लिए वो अपने आपको पहले से ज्यादा फिट बनायेंगी. पति अनुराग कश्यप के साथ मतभेदों की ख़बर पर अभिनेत्री कल्कि कोचलिन चुप्पी साधे हुए हैं. मुंबई में एक फ़ैशन पत्रिका के लॉन्च पर पहुंची कल्कि से जब मीडिया ने जानना चाहा कि अनुराग कश्यप के साथ उनके रिश्ते किस तरह के हैं तो कल्कि ने कहा मुझे आपका सवाल सुनाई ही नहीं पड़ा. जब दोबारा उनसे सवाल किया गया तो उन्होंने फिर से उसे अनसुना करते हुए दूसरी तरफ़ मुंह कर लिया. वैसे इसी सप्ताह कल्कि का एक प्ले देखने के लिए अनुराग पहुंचे थे. लेकिन मीडिया में लगातार दोनों के संबंध सामान्य ना होने की ख़बरें आती रहीं हैं जिसके पीछे अभिनेत्री हुमा क़ुरैशी और अनुराग कश्यप की नज़दीकियों को वजह बताया जा रहा है. हालांकि कल्कि ने मतभेद के लिए हुमा को ज़िम्मेदार मानने से साफ़ इनकार कर दिया. सत्यमेव जयते के पहले सीज़न के दौरान कई ऐसे मौक़े आए जब आमिर ख़ान भावुक हो गए. सत्यमेव जयते के दूसरे संस्करण को शूट करने के बाद आमिर ख़ान पर इसका इतना ज़्यादा असर हुआ कि वो किसी अनजान जगह पर छुट्टी मानाने निकल गए हैं. ख़बरों के मुताबिक इस सीज़न में भी आमिर को कई दिल छूने वाली कहानियां और घटनाएं सुनने को मिली और आमिर अपने आपको इमोशनल होने से रोक नहीं पाए. शूट निपटने के बाद आमिर 10 दिनों के लिए विदेश गए हैं. सुनने में आया है कि आमिर शायद आइसलैंड गए हैं ताकि कार्यक्रम के दौरान मिले भावुक पलों से दूर कुछ समय बिता कर तरोताज़ा महसूस कर सकें. |
| DATE: 2014-01-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1191] TITLE: बिग बॉस के बाद कितनी बदली ज़िंदगी? |
| CONTENT: रियलिटी शो बिग बॉस-7 में हिस्सा ले चुके प्रतियोगियों की ज़िंदगी में अब क्या चल रहा है क्या शो के दौरान नज़दीक आए अरमान-तनीषा और गौहर-कुशाल के बीच अब भी वही नज़दीकियां क़ायम हैं या ये सिर्फ़ शो की टीआरपी बढ़ाने की योजना मात्र थी रियलिटी शो बिग बॉस-7 के दौरान दर्शकों ने शो के प्रतियोगी कुशाल और गौहर को एक दूसरे के बेहद नज़दीक जाते देखा. यही हाल काजोल की बहन तनीषा मुखर्जी और अरमान कोहली का रहा. कुशाल और गौहर ने तो शो के दौरान एक दूसरे से प्यार का इज़हार भी कर लिया. लेकिन शो ख़त्म होने के बाद भी क्या इनमें वही नज़दीकियां कायम हैं या ये सारा ड्रामा सिर्फ़ शो की लोकप्रियता को बढ़ाने की योजना थी जब हमने कुशाल टंडन से ये पूछा तो वह बोले बिग बॉस के दौरान मुझे और गौहर को एक दूसरे से प्यार हुआ. हम दोनों अब भी एक साथ हैं और हमारे बीच चीज़ें काफी अच्छी चल रही हैं जिससे हम दोनों काफी ख़ुश हैं. ये तो रहा कुशाल का जवाब लेकिन गौहर ख़ान ने निजी बातों पर जवाब देने से साफ़ इनकार कर दिया. शो में इनके सह प्रतियोगी रहे एंडी का जवाब कुछ यूं मिला अगर आप मुझसे पूछेंगे कि कुशाल और गौहर के बीच क्या है या अरमान और तनीषा के बीच क्या है तो मैं ये कहूंगा उनके बीच जो कुछ भी हो या तो वे ख़ुद जानें या फिर ऊपर वाला जाने. इस सिलसिले में जब हमने अरमान कोहली से बात करनी चाही तो उनसे संपर्क नहीं हो पाया. एंडी के मुताबिक़ देखिए जब एक घर में बहुत सारे लोग बंद होते हैं तो उन लोगों के बीच दोस्ती भी बढ़ती है और प्यार भी होता है. पर अगर कोई पहले से ही सोच कर आया हो कि उसे कुछ ऐसा करना है जिससे शो की या उसकी टीआरपी बढ़े तो मैं उस सिलसिले में कुछ नहीं कह सकता. शो के बाद प्रतियोगियों की ज़िंदगी में क्या बदलाव आया क्या शो ने इन प्रतियोगियों की ज़िंदगी को और बेहतर बनाया बिग बॉस-7 की विजेता गौहर ख़ान कहती हैं लोगों का बहुत सारा प्यार मिल रहा है और लोग मेरा काम सराह रहे हैं. मैं खुद को बहुत ही ख़ुशकिस्मत समझती हूं. रॉकेट सिंह और इशक़ज़ादे सहित कई फ़िल्मों में काम कर चुकीं गौहर को क्या शो के बाद फ़िल्मों के प्रस्ताव और ज़्यादा मिलने लगे हैं इसके जवाब में वह कहती हैं बिग बॉस के बाद चीज़ें अच्छी हो रहीं हैं अब ख़ुद के लिए कम वक़्त मिलता है औए अब मेरा पूरा ध्यान काम पर है. हालांकि कुशाल टंडन के मुताबिक़ बिग बॉस से उनकी ज़िंदगी बिलकुल ही बदल गई हो ऐसा बिलकुल नहीं है. वह कहते हैं बिग बॉस के बाद सब पहले जैसा ही है परिवार और दोस्तों के साथ सब अच्छा चल रहा है. आजकल मैं काम के सिलसिले में कई लोगों से मिल रहा हूं. ऐसा बिलकुल नहीं है कि बिग बॉस के बाद फ़िल्मों की लाइन लग जाए. लेकिन हां बेहतर अवसर मिलने की संभावना बढ़ जाती है. वीजे एंडी ने हाल ही में इस साल का फ़िल्मफेयर रेड कारपेट होस्ट किया. वह कहते हैं बिग बॉस के बाद मैं बहुत सारे शोज़ कर रहा हूं. मुझे बहुत सारे मौके मिल रहे हैं. मेरे पास बहुत सारी फ़िल्मों के ऑफर्स भी आ रहे हैं और जल्द ही आप मुझे फिल्मों में भी देखेंगे. शो के एक और प्रतियोगी रहे पहलवान संग्राम सिंह कहते हैं बिग बॉस के बाद मुझे काफ़ी लोगों ने संपर्क किया. अभी मेरे पास पांच फ़िल्मों के ऑफर आए हैं. लेकिन मैं काम वही करूँगा जो मेरी छवि के मुताबिक़ हो. हालांकि बिग बॉस के इससे पहले के संस्करणों के विजेता जैसे विंदू दारा सिंह जूही परमार राहुल रॉय और उर्वशी ढोलकिया की व्यावसायिक ज़िंदगी में कोई ऐसे बदलाव नहीं आए जिससे उनके करियर की दिशा ही बदल जाए. |
| DATE: 2014-01-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1192] TITLE: अंतरंग दृश्यों ने की प्रीति की मदद! |
| CONTENT: अभिनेत्री प्रीति देसाई का मानना है कि वह अपने मित्र अभय देओल को लेकर ज़रा भी इनसेक्योर नहीं हैं. अभय के साथ पिछले चार साल से रिलेशनशिप में चल रहीं प्रीति अब उनके साथ पहली बार बड़े पर्दे पर आने वाली हैं फ़िल्म वन बाय टू में. फ़िल्म और अभय के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा अभय के दूसरी अभिनेत्रियों के साथ अंतरंग दृश्यों से मुझे ज़रा भी परेशानी नहीं होती. क्योंकि मैं भी ऐसे दृश्य दूसरे अभिनेता के साथ कर चुकी हूं. प्रीति इससे पहले तुषार कपूर के साथ शोर इन द सिटी फ़िल्म कर चुकी हैं जिसमें उनके कुछ बोल्ड दृश्य थे. उन्होंने कहा मैं अभिनेत्री नहीं होती तो शायद मुझे अभय के दूसरी अभिनेत्रियों के नज़दीक जाने पर दिक़्क़त होती. लेकिन मुझे अब आदत पड़ गई है. मुझे किसी तरह की ईर्ष्या नहीं होती. उन्होंने कहा कि अभय उनसे कहीं सीनियर हैं तो इस नाते वह उनसे सलाह ज़रूर लेती हैं लेकिन आख़िर फ़ैसला उनका ख़ुद का ही होता है. आम तौर पर बॉलीवुड में अभय देओल की छवि एक गुस्सैल आदमी की है. इस पर प्रीति ने कहा नहीं वह गुस्सैल नहीं हैं. जो लोग उन्हें अच्छे से नहीं जानते वही उनके बारे में ऐसा कहते हैं. हां वह थोड़े रिज़र्व तबीयत के ज़रूर हैं. अभय के साथ शादी के सवाल पर प्रीति ने कहा अभी तो मेरा करियर शुरू ही हुआ है. मैं बहुत ऊंचा उड़ना चाहती हूं. शादी एक फ़ुल टाइम कमिटमेंट है. मैं वो भी करूंगी लेकिन अभी नहीं. अभी सारा ध्यान करियर पर है. वन बाय टू की निर्देशक देविका भगत हैं और फ़िल्म सात फ़रवरी को रिलीज़ हो रही है. फ़िल्म में प्रीति ने एक डांसर की भूमिका अदा की है. फ़िल्म के हीरो होने के अलावा अभय देओल इसके निर्माता भी हैं. फ़िल्म का संगीत शंकर अहसान और लॉय ने दिया है. हाल ही में संगीत की रॉयल्टी के मुद्दे पर अभय गायकों और संगीतकारों के साथ खड़े नज़र आए. संगीत समुदाय का आरोप है कि म्यूज़िक कंपनियाँ फ़िल्म की रिलीज़ से पहले ही अपने मनमुताबिक़ अग्रिम रॉयल्टी लेने के लिए गायकों और संगीतकारों को बाध्य करती हैं और बाद में संगीत से आने वाली सारी रॉयल्टी ख़ुद रखती हैं. अभय ने इस मुद्दे पर कहा था कि संगीत कंपनियों का ये एकाधिकार ख़त्म होना चाहिए और संगीत बिरादरी को भी उसका हक़ मिलना चाहिए. |
| DATE: 2014-01-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1193] TITLE: किसने हैक की पूनम पांडेय की वेबसाइट? |
| CONTENT: पूनम पांडेय की वेबसाइट हुई हैक क्या बॉलीवुड के सहारे है पाकिस्तान फ़िल्म इंडस्ट्री और अमिताभ बच्चन के साथ कंधे से कंधा मिलाएंगे रणबीर कपूर. अभिनेत्री पूनम पांडेय की वेबसाइट हैक हो गई है. पूनम पांडेय ने ख़ुद ये जानकारी मीडिया को दी. पूनम पांडेय के मुताबिक़ उनकी वेबसाइट पर कुछ पाकिस्तान समर्थक नारे लिखे हुए थे और उसमें कश्मीर की आज़ादी के पक्ष में बातें लिखी हुई थीं. पूनम पांडेय ने साइबर क्राइम सेल में मामले की रिपोर्ट कर दी है और कहा है कि उनकी टीम वेबसाइट को रीस्टोर करने की कोशिशों में लगी हुई है. साल 2013 में 16 बॉलीवुड फ़िल्में पाकिस्तान में रिलीज़ हुईं और उनमें से ज़्यादातर ने वहां बहुत अच्छा व्यवसाय किया. कई सालों के प्रतिबंध के बाद पिछले साल ही पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्मों पर से प्रतिबंध हटाया गया है और ये फ़िल्में वहां के फ़िल्म उद्योग और सिनेमाघर मालिकों के लिए बड़े मुनाफ़े का सौदा साबित हो रही हैं. बॉलीवुड फ़िल्मों की बेहतरीन कमाई की वजह से पाकिस्तान में कई नए सिनेमाघरों का निर्माण भी हो रहा है. आमिर ख़ान की धूम-3 ने पाकिस्तान में रिकॉर्डतोड़ कमाई की. वहां 56 स्क्रीन्स पर रिलीज़ हुई धूम-3 ने पहले दिन दो करोड़ रुपये की कमाई की. इतनी कमाई आज तक किसी पाकिस्तानी फ़िल्म तक ने वहां नहीं की. इसके अलावा गोलियों की रासलीला आशिक़ी-2 और चेन्नई एक्सप्रेस ने भी पाकिस्तान में खूब कमाई की. लेकिन वहीं कुछ पाकिस्तान फ़िल्म निर्माताओं का मानना है कि भारतीय फ़िल्में जितने बड़े बजट में बनती हैं वो उनका मुक़ाबला नहीं कर सकते और बॉलीवुड फ़िल्में पाकिस्तान फ़िल्म उद्योग के लिए ख़तरा साबित हो रही हैं. अमिताभ बच्चन की फ़िल्म भूतनाथ रिटर्न्स में रणबीर कपूर एक छोटा सा रोल करेंगे. रणबीर के पिता ऋषि कपूर और अमिताभ बच्चन ने कई फ़िल्मों में साथ काम किया है लेकिन ये पहला मौक़ा होगा जब रणबीर और अमिताभ एक साथ पर्दे पर नज़र आएंगे. अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर इस बात की जानकारी देते हुए रणबीर कपूर का आभार जताया. भूतनाथ रिटर्न्स साल 2008 में आई हिट फ़िल्म भूतनाथ का सीक्वल है जिसमें अमिताभ के अलावा शाहरुख़ ख़ान ने भी एक छोटी सी भूमिका निभाई थी. भूतनाथ रिटर्न्स इस साल मई में रिलीज़ हो सकती है. |
| DATE: 2014-01-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1194] TITLE: 'जय हो' ना चली तो मेरी ज़िम्मेदारी: सलमान ख़ान |
| CONTENT: सलमान ख़ान की हालिया रिलीज़ फ़िल्म जय हो के उम्मीदों से कम कमाई करने की ख़बरों के बीच सलमान ख़ान ने कहा है कि फ़िल्म ना चली तो इसकी ज़िम्मेदारी किसी और पर नहीं बल्कि ख़ुद उनके कंधों पर होगी. मुंबई में एक प्रेस वार्ता के दौरान सलमान ने ये बात कही है. जय हो 24 जनवरी को रिलीज़ हुई थी और सप्ताहांत के दौरान इसकी कमाई सलमान ख़ान की पिछली फ़िल्मों के मुक़ाबले कम रही है. पूरे एक साल के बाद सलमान ख़ान के जलवे और ऐक्शन से भरपूर फ़िल्म आए लेकिन टिकट खिड़की पर जश्न का माहौल ना हो तो ख़बर बनना लाजमी है. जय हो से उम्मीद थी कि सलमान के जादू की आंधी बॉक्स ऑफ़िस को एक बार फिर हिला देगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. फ़िल्म को वैसी धुआँधार ओपनिंग नहीं मिली जिसकी उम्मीद की जा रही थी. इस फ़िल्म का निर्देशन सोहेल ख़ान ने किया है. उनकी अंतिम निर्देशित फ़िल्म थी मैने दिल तुझको दिया. फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञ कोमल नाहटा के मुताबिक़ पहले दिन फ़िल्म का कलेक्शन 17-75 करोड़. दूसरे दिन का कारोबार 16-75 करोड़ जबकि इतवार का कलेक्शन रहा 26-25 करोड़. यानी कुल मिलाकर तीन दिनों में कारोबार रहा 60-75 करोड़ रुपए. कोमल नाहटा कहते हैं कि ये कारोबार कम नहीं है लेकिन सलमान ख़ान की फ़िल्मों को जो शुरूआत मिलती है उस लिहाज से ये उम्मीद से कम रह गया है. सलमान की पिछली सारी फ़िल्में जिनसे तुलना की जा रही है वो ईद के मौक़े पर रिलीज़ हुई थीं. 26 जनवरी का मौक़ा ज़रूर था लेकिन त्यौहार जैसा कोई अवसर नहीं था. हालांकि फिर ये कहूंगा कि सलमान का वो करिश्मा दिखाई नहीं दिया. थियेटर श्रृंखला सिनेमैक्स इंडिया लिमिटेड के अध्यक्ष संजय दालिया बताते हैं सप्ताहांत पर फ़िल्म का प्रदर्शन बुरा नहीं कहा जा सकता लेकिन उम्मीदों से तो कम ही था. सिनेमाघरों में तकरीबन 35 प्रतिशत सीटें ख़ाली ही रहीं. ख़ासकर उत्तर भारत में शुक्रवार को जिस तरह के प्रदर्शन की उम्मीद थी वो नहीं रहने से कमाई कम हुई है. ग़ौरतलब है कि साल 2012 में भारतीय स्वतंत्रता दिवस के दिन रिलीज़ हुई फ़िल्म एक था टाइगर ने पहले ही दिन अपनी झोली में 32-5 करोड़ रुपए डाले थे. जय हो का प्रदर्शन इसकी तुलना में कहीं नहीं ठहरता. फ़िल्म व्यापार विश्लेषक कोमल नाहटा कहते हैं कि डेज़ी शाह में वो ग्लैमर फ़ैक्टर नहीं है. पिछले तीन-चार सालों से सलमान का सितारा बुलंदी पर चल रहा है. उन्होंने एक के बाद एक वॉन्टेड दबंग रेडी और बॉडीगार्ड जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में दी हैं. ये सभी एक्शन फिल्में थीं. दबंग रेडी और बॉडीगार्ड ने तो 100 करोड़ रुपए से ज्यादा का व्यवसाय किया है. कोमल नाहटा कहते हैं अगर जय हो का शुरुआती प्रदर्शन ठंडा है तो इसकी वजह सिर्फ़ ये नहीं कि सलमान का जादू नहीं चला. पिछली फ़िल्मों के ताबड़तोड़ प्रदर्शन के कई कारण थे जिनमें ख़ूबसूरत और ग्लैमरस हिरोइनों की भी बड़ी भूमिका थी. इस फ़िल्म के साथ ऐसा नहीं है. डेज़ी शाह में वो ग्लैमर फ़ैक्टर नहीं है. पिछली फ़िल्मों का संगीत भी बहुत ज़्यादा हिट रहा था जबकि जय हो के साथ ऐसा नहीं रहा है. इसका तो ट्रेलर भी उतना ज़बरदस्त नहीं था कि फ़िल्म की हवा बनती. हालांकि सिनेमैक्स के संजय दालिया कहते हैं आने वाले हफ़्तों में ऐसी कोई बड़ी हिंदी फ़िल्म नहीं है जिससे इसकी कमाई में बहुत ज़्यादा गिरावट आने की बात कही जा सके. मेरे ख़्याल से अभी ये फ़िल्म ठीक-ठाक कारोबार करेगी. दर्शकों की संख्या कम हो सकती है लेकिन धीरे-धीरे करके कमाई होने की उम्मीद है. सलमान की फ़िल्म एक था टाइगर ने पहले दिन रिकॉर्ड कमाई की थी. फ़िल्म के प्रदर्शन को देखते हुए ये सवाल उठना लाज़मी है कि कहीं दर्शक एक ही सांचे में ढली सलमान ख़ान के दम पर चलने वाली ऐक्शन फ़िल्मों से बोर तो नहीं हो गए. कोमल नाहटा इस बात से इनकार करते हुए कहते हैं वजह ये भी है कि सलमान ख़ान के अपने चाहने वालों में शायद एक बड़ा हिस्सा थे जिसे फ़िल्म पसंद नहीं आई. ऐसे में दर्शकों के सिर्फ़ एक छोटे हिस्से के बल पर फ़िल्म को ब्लॉकबस्टर शुरुआत मिलना मुमकिन नहीं हो पाया. जय हो का निर्देशन सलमान ख़ान के छोटे भाई सोहेल ख़ान ने किया है. |
| DATE: 2014-01-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1195] TITLE: 'मिस लवली' देखकर रिश्तेदारों ने भला-बुरा कहा: निहारिका |
| CONTENT: पिछले सप्ताह रिलीज़ हुई फ़िल्म मिस लवली की हीरोइन निहारिका सिंह को भारत में लोगों के फ़िल्मों को लेकर रवैये से ख़ासी दिक़्कत है. मिस लवली को कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में बहुत वाहवाही मिली और समीक्षकों ने भी फ़िल्म को काफ़ी सराहा. लेकिन फ़िल्म को बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी नहीं मिल पाई. इसे रिलीज़ होने के लिए वितरक भी बड़ी मुश्किल से मिले. निहारिका सिंह ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में इस बात पर काफ़ी अफ़सोस जताया. उन्होंने कहा यहां लोग सिर्फ़ पैसे के बारे में ही सोचते हैं. फ़लां फ़िल्म ने ढेर सारे पैसे बनाए तो वो अच्छी. ये फ़िल्म पैसे नहीं कमा पाई तो बुरी. मुझे ऐसी बातें बहुत बोर करती हैं. फ़िल्मों की क़्वालिटी की कोई बात ही नहीं करता. निहारिका के मुताबिक़ लोग लव ऑफ़ सिनेमा की वजह से यहां फ़िल्में ही नहीं बनाते. मिस लवली में निहारिका ने एक संघर्षरत एक्ट्रेस का किरदार निभाया है जो सेमीपॉर्न फ़िल्मों में काम करती है. उन्होंने कहा मेरे दोस्तों ने मुझे ये फ़िल्म करने से साफ़ मना कर दिया. उन्होंने कहा कि मेरी इमेज ख़राब हो जाएगी. ये एक सी ग्रेड की सेक्स फ़िल्म बन कर रह जाएगी. लेकिन मैंने किसी की ना सुनी. मैं सबसे कहती रही कि यार तुम्हें पता भी है कि फ़िल्म की स्क्रिप्ट कितनी दमदार है. लेकिन किसी की समझ में ये बात आई ही नहीं. निहारिका ने ये भी बताया कि उनके रिश्तेदार भी फ़िल्म देखकर परेशान हो गए. उन्होंने कहा मेरे मामा-मामी फ़िल्म देखने गए और आधी फ़िल्म छोड़कर आ गए. उन्होंने मुझसे कहा कि कैसी अजीब फ़िल्म है. हमें अच्छी नहीं लगी. निहारिका के मुताबिक़ मिस लवली को देखकर लोगों की प्रतिक्रिया दो तरह से सामने आई. लोगों को या तो फ़िल्म बहुत अच्छी लगी या लोगों ने इसे बिलकुल ही नकार दिया. कुछ लोगों ने फ़िल्म को प्यार किया और कुछ लोगों ने नफ़रत की. ये कोई ऐसी फ़िल्म नहीं थी जिसे लोग कहें कि यार ठीक-ठाक फ़िल्म थी. इसे लेकर लोगों की प्रतिक्रिया जुनूनी किस्म की थी. फ़िल्म के हीरो नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी के बारे में उन्होंने कहा जब फ़िल्म बननी शुरू हुई तो ना वो मुझे जानते थे ना मैं उन्हें. हम दोनों ही एक दूसरे के बारे में सोचा करते थे. यार ये है कौन एक्टिंग आती भी है या नहीं. लेकिन बाद में मैंने जाना कि कितने बेहतरीन अदाकार हैं नवाजु़्द्दीन. निहारिका ने बताया कि आगे भी वो ऐसी ही फ़िल्में करती रहेंगीं जो लोगों के दिलो-दिमाग को झंझोड़ कर रख दें. |
| DATE: 2014-01-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1196] TITLE: आमिर के 'सत्यमेव जयते' पर 'जय हो' |
| CONTENT: आमिर ख़ान अपने क़रीबी दोस्त सलमान ख़ान के लिए हर मुमक़िन कोशिश कर रहे हैं. मुंबई में अपने टीवी शो सत्यमेव जयते के दूसरे संस्करण के प्रोमो लॉन्च पर उन्होंने सलमान ख़ान की फ़िल्म जय हो का भी प्रमोशन कर डाला. जय हो शुक्रवार को पर्दे पर आई. इससे पहले सलमान ख़ान ने भी आमिर की फ़िल्म धूम-3 का अपने टीवी शो बिग बॉस में बहुत प्रचार किया और बार-बार धूम-3 का ज़िक्र किया. दोनों ही सितारे एक दूसरे की बड़ी तारीफ़ करते नज़र आते हैं. आमिर ने समय-समय पर सलमान को बॉलीवुड का सबसे बड़ा सितारा बताया. अभिनेत्री कंगना रानाउत अपनी आने वाली फ़िल्म क़्वीन के लिए अंग्रेज़ी सीख रही हैं. फ़िल्म में उन्होंने एक ऐसी लड़की का किरदार अदा किया है जो भारत से भागकर लंदन चली जाती है. फ़िल्म के लिए उन्हें कई संवाद अंग्रेज़ी में बोलने हैं और सही उच्चारण के लिए वह इंग्लिश की क्लास ले रही हैं. सूत्रों के मुताबिक़ कंगना की अंग्रेज़ी का पहले भी कई बार मज़ाक उड़ाया जा चुका है और कई बार वह पत्रकारों से बात करते हुए जिस तरह से अंग्रेज़ी शब्दों का उच्चारण करती हैं उसकी खिल्ली उड़ाई जा चुकी है. इसी वजह से इस बार वह फूंक-फूंक कर क़दम रखना चाहती हैं. आमिर ख़ान की साल 2009 में रिलीज़ हुई फ़िल्म 3 इडियट्स को 37वें जापान अकादमी पुरस्कारों के लिए सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की फ़िल्मों की सूची में नामांकित किया गया है. इस सूची में हॉलीवुड फ़िल्म कैप्टन फ़िलिप्स ग्रेविटी और ले मिज़रेबल जैसी फ़िल्में भी शामिल हैं. ये पुरस्कार सात मार्च को एक समारोह में दिए जाएंगे. 3 इडियट्स पिछले साल जापान में रिलीज़ हुई थी और इसे वहां पर भी लोगों ने खूब पसंद किया था. |
| DATE: 2014-01-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1197] TITLE: भाग मिल्खा भाग के नाम रहा फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड 2013 |
| CONTENT: महान धावक मिल्खा सिंह के जीवन पर बनी फ़िल्म भाग मिल्खा भाग 59वें आइडिया फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड्स समारोह में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म समेत सबसे ज़्यादा पुरस्कार जीतने में सफल रही. भाग मिल्खा भाग के निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और इसी फ़िल्म में मिल्खा सिंह का किरदार निभाने वाले फ़रहान अख़्तर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया गया. इसके अलावा गोलियों की रासलीला में अभिनय के लिए दीपिका पादुकोण को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार दिया गया. इसी फ़िल्म में दीपिका की माँ का किरदार निभाने वाली सुप्रिया पाठक को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार मिला. वहीं सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का पुरस्कार नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी को फ़िल्म द लंचबॉक्स में बेहतरीन अभिनय के लिए दिया गया. फ़िल्म द लंचबॉक्स के निदेशक रितेश बत्रा को निर्देशन के लिए दो पुरस्कार मिले. जीत गांगुली मिथुन और अंकित तिवारी को फ़िल्म आशिक़ी 2 के लिए सर्वेश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार दिया गया. इस पुरस्कार के लिए शंकर एहसान और एआर रहमान की जोड़ी भी दावेदार थी. वहीं पुरुष वर्ग में सर्वेश्रेष्ठ पार्श्वगायक का पुरस्कार अरिजित सिंह को फ़िल्म आशिक़ी का गाना तुम ही हो और महिला वर्ग में फ़िल्म लुटेरा के लिए सँवार लूँ गीत गाने वाली पार्श्वगायिका मोनाली ठाकुर को दिया गया. दक्षिण भारतीय सुपरस्टार धनुष को फिल्म रांझणा में बेहतरीन अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ डेबू अवार्ड दिया गया. बीते ज़माने की मशहूर अभिनेत्री तनुजा को लाइफ़टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से नवाज़ा गया. तनुजा को ये पुरस्कार मशहूर अभिनेता अमिताभ बच्चन के हाथों दिया गया. मुंबई में आयोजित पुरस्कार समारोह में रणवीर सिंह शाहिद कपूर माधुरी दीक्षित और कैटरीना कैफ़ ने कार्यक्रम भी पेश किए. |
| DATE: 2014-01-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1198] TITLE: फ़िल्म रिव्यू: 'जय हो' |
| CONTENT: इरॉस इंटरनेशनल और सोहैल ख़ान प्रोडक्शंस की जय हो कहानी है एक ऐसे शख़्स की जो इस दुनिया को बेहतर बनाना चाहता है. इस काम में उसे कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और उनसे वो कैसे निपटता है यही फ़िल्म की कहानी है. जय अग्निहोत्री सलमान ख़ान एक बहुत दिलेर और सिद्धांतवादी आर्मी अफ़सर है. वो अपने वरिष्ठ अधिकारियों की अवमानना के आरोप में सेना से निलंबित कर दिया जाता है. जय आसपास के लोगों की पीड़ा और उन पर हो रहे अत्याचार से बेहद परेशान रहता है और लोगों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता है. एक दफ़ा एक विकलांग लड़की जेनेलिया डिसूज़ा उसके सामने ख़ुदकुशी कर लेती है जिससे जय बेहद दुखी हो जाता है. उस लड़की की वो पहले मदद कर चुका होता है. जब उस लड़की के भाई को अपनी बहन की मौत के पीछे राज्य के गृहमंत्री की बेटी पर शक़ होता है और वो उसके ख़िलाफ़ शिक़ायत दर्ज कराता है. इससे नाराज़ होकर गृहमंत्री दशरथ सिंह डैनी उसके भाई को मरवा डालता है. जय कमज़ोर लाचार लोगों की मदद करने के मिशन में निकल पड़ता है और इसी वजह से गृहमंत्री समेत कई शक्तिशाली लोगों से दुश्मनी मोल ले लेता है. जहां एक ओर आम आदमी उसके साथ होता है वहीं भ्रष्ट राजनेता और दूसरे शक्तिशाली लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं. क्या अंत में जय इन लोगों के चंगुल से लोगों को बचा पाता है यही फ़िल्म की कहानी है. जय हो तेलुगू फ़िल्म स्तालिन का रीमेक है. स्तालिन ख़ुद हॉलीवुड फ़िल्म पे इट फ़ॉरवर्ड से प्रेरित है. एआर मुरुगदॉस की लिखी कहानी दिलचस्प है और देश में चल रहे वर्तमान घटनाक्रम से काफ़ी मेल खाती हुई है. लेकिन दिलीप शुक्ला का लिखा स्क्रीनप्ले ढीला है. इंटरवल से पहले के हिस्से में तो ऐसा लगता है कि कहानी में कोई तारतम्य ही नहीं है. बस सीन्स को एक दूसरे से जोड़ दिया गया है. फ़िल्म में ढेर सारे किरदार हैं और कई किरदारों को तो ठीक से परिभाषित भी नहीं किया गया. फ़िल्म देखकर लगता है कि निर्देशक किसी जल्दबाज़ी में हैं और बिखरी फ़िल्म को समेटने की कोशिश कर रहे हैं. जेलेनिया डिसूज़ा की ख़ुदकुशी के पीछे की वजह ठीक से बताई ही नहीं गई है. और इसी वजह से दर्शकों को उनसे सहानुभूति नहीं हो पाती. सलमान ख़ान का अच्छे नागरिक होने वाला प्लॉट भी ठीक से नहीं उभारा गया. इस वजह से लोगों को फ़िल्म प्रभावी नहीं लगेगी. हालांकि फ़िल्म में कुछ कॉमिक और ड्रामेटिक सीन बहुत अच्छे बन पड़े हैं. सलमान ख़ान और डेज़ी शाह के कुछ सीन और कुछ एक्शन दृश्य सचमुच बहुत जानदार हैं. साथ ही फ़िल्म के आख़िर के 20-25 मिनट बहुत प्रभावशाली हैं और दर्शकों को बांधे रखते हैं. क्लाईमेक्स अच्छा है. लेकिन दिलीप शुक्ला के लिखे संवादों में दम नहीं है. हां हास्य दृश्यों में संवाद अच्छे हैं. सलमान ख़ान बहुत अच्छे लगे हैं. उन्होंने अपना रोल बखूबी निभाया है. अपना किरदार उन्होंने बड़ी सहजता से निभाया है और कई एक्शन दृश्यों में उनके प्रशंसक ताली बजाने पर मजबूर हो जाएंगे. उनकी लोकप्रियता देखते हुए इस फ़िल्म में भी एक सीन है जिसमें उन्होंने शर्ट उतारी है और हमेशा की तरह लोगों को ये सीन भी बहुत पसंद आएगा. नवोदित अभिनेत्री डेज़ी शाह कैमरे के सामने सहज लगी हैं. हालांकि वो ग्लैमरस नहीं हैं लेकिन उन्होंने ठीक-ठाक काम किया है. सलमान ख़ान की बहन के रोल में तब्बू भी अच्छी रही हैं लेकिन वो फ़िल्म में फ़्रेश नहीं लगी हैं. खलनायक के रोल में डैनी बेहतरीन रहे हैं. नादिरा बब्बर ने कई जगह लोगों को हंसाया है. भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों के रोल में आदित्य पंचोली और शरद कपूर को बहुत सीमित मौक़े मिले हैं. क्लाईमेक्स में सुनील शेट्टी की मौजूदगी इसे और प्रभावी बना देती है. संतोष शुक्ला ने गुंडे के रोल में अपने बॉलीवुड करियर की बड़ी ज़बरदस्त शुरुआत की है. बाकी कलाकार भी ठीक हैं. सोहैल ख़ान का निर्देशन कहीं कहीं पर अच्छा है. एक्शन दृश्यों में जहां वो सटीक रहे हैं वहीं नाटकीय और भावुक दृश्यों को फ़िल्माने में वो विफल रहे. साजिद-वाजिद देवी श्री प्रसाद और अमल मलिक का संगीत बहुत निराशाजनक है. सलमान ख़ान की फ़िल्म में एक भी सुपरहिट गाने का ना होना उनके प्रशंसकों को बहुत निराश करेगा. फ़िल्म के एक्शन और स्टंट ज़रूर कमाल के हैं. कुल मिलाकर जय हो एक कमज़ोर स्क्रीनप्ले वाली फ़िल्म है. लेकिन सलमान ख़ान पूरी फ़िल्म में छाए हैं. सिंगल स्क्रीन थिएटर्स में सलमान के प्रशंसकों को फ़िल्म पसंद आएगी. लेकिन मल्टीप्लेक्सेस में फ़िल्म को मिश्रित प्रतिक्रिया मिलेगी. |
| DATE: 2014-01-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1199] TITLE: सारा काम स्टंट मास्टर का, हमारा क्या: सलमान ख़ान |
| CONTENT: सलमान ख़ान के प्रशंसक उनकी आने वाली फ़िल्म जय हो का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं और फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक़ इसके बॉक्स ऑफ़िस पर ज़बरदस्त शुरुआत करने की संभावना है लेकिन सलमान ख़ान फ़िल्म को लेकर परेशान हैं. मुंबई में फ़िल्म के बारे में बात करते हुए सलमान ख़ान ने कहा जय हो मेरी सबसे पसंदीदा फ़िल्मों में से एक है. लेकिन जैसा कि पहले भी होता आया है कि किसी एक्टर की जो फ़ेवरिट फ़िल्म होती है वो कई बार फ़्लॉप हो जाती है. हालांकि मेरे साथ अब तक ऐसा नहीं हुआ है लेकिन मैं जानता हूं कि किसी ना किसी दिन ऐसा ज़रूर होगा. मुझे चिंता हो रही है. दुआ करता हूं कि जय हो ऐसी फ़िल्म ना साबित हो. सलमान ने अपने प्रशंसकों को आश्वस्त करना चाहा इस फ़िल्म में वो सब कुछ है जो मेरे प्रशंसकों को पसंद होता है. रोमांस एक्शन कॉमेडी सब कुछ. लेकिन साथ ही ये भी कहना चाहूंगा कि मेरी पिछली फ़िल्मों के फ़ॉर्मेट से ये हटकर है. हालांकि सलमान ने ये भी जोड़ा कि मौजूदा दौर में एक्शन फ़िल्मों की भरमार हो गई है और अब लोग धीरे-धीरे इनसे बोर होने लगे हैं. सलमान ने कहा कि जल्द ही एक्शन फ़िल्मों का दौर ख़त्म हो जाएगा. लेकिन सलमान अपनी फ़िल्मों को विशुद्ध एक्शन फ़िल्म मानने से साफ़ इनकार कर देते हैं. मेरी फ़िल्म वॉन्टेड को एक्शन फ़िल्म माना गया जबकि उसमें एक कहानी भी थी. अगर मज़बूत स्क्रिप्ट ना होती तो वॉन्टेड दबंग और सिंघम जैसी फ़िल्में हिट ना होतीं. उन्होंने ये भी माना कि ऐसी एक्शन फ़िल्में जिसमें अवास्तविक एक्शन और स्टंट होता है उनमें हीरो के करने के लिए कुछ नहीं होता. हीरो की एक लात पर विलेन हवा में उड़ जाए. एक घूंसे पर ढेर सारे खलनायक धूल चाट जाएं ऐसी फ़िल्मों में हीरो के करने के लिए कुछ नहीं होता. सारा काम स्टंट मास्टर का होता है. हम क्या करें. जय हो के निर्देशक सलमान ख़ान के छोटे भाई सोहैल ख़ान है. फ़िल्म में नवोदित अभिनेत्री डेज़ी शाह हैं साथ ही वरिष्ठ अभिनेता डैनी डेंग्जोप्पा की भी अहम भूमिका है. |
| DATE: 2014-01-23 |
| LABEL: entertainment |
| [1200] TITLE: महेश भट्ट ने उड़ाई बॉलीवुड स्टार्स की खिल्ली |
| CONTENT: महेश भट्ट और इमरान ने क्यों उड़ाई बॉलीवुड स्टार्स की खिल्ली किसके लिए बनाया है रणदीप हुडा ने नया लुक और कटरीना कैफ़ कैसे चल पड़ी हैं ऐश्वर्या राय बच्चन के कदमों पर. महेश भट्ट और उनके भांजे इमरान हाशमी ने करन जौहर के टॉक शो कॉफ़ी विद करन में बॉलीवुड दिग्गजों की जमकर खिल्ली उड़ाई. इमरान हाशमी ने ऐश्वर्या राय बच्चन को प्लास्टिक आमिर खान को बोरिंग और इमरान खान को ओवररेटेड कहा तो महेश भट्ट ने फ़िल्मकार संजय लीला भंसाली को ओवररेटेड बताया. जब महेश भट्ट से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा क्या देश का सेंस ऑफ़ ह्यूमर ख़त्म हो गया है करन जौहर का शो ऐसा ही है जिसमें कुछ भी पूछ लिया जाता है और ईमानदारी से उनका जवाब देना होता है. लोगों की हमारे प्रति कोई न कोई राय ज़रूर होती है वैसे ही हमारी भी होती है. मुझे उम्मीद है कि हमारे जवाब को सही तरीके से लिया जाएगा. अगर आप पब्लिक स्पेस में है तो इसे दाल में नमक की तरह लें. अभिनेता रणदीप हुडा फ़िल्म मैं और चार्ल्स के लिए नए लुक में नज़र आए. पूजा भट्ट की फ़िल्म बैड का नाम बदल कर मैं और चार्ल्स रख दिया गया है. रीयल लाइफ कैदी चार्ल्स शोभराज की ज़िन्दगी से प्रभवित इस फ़िल्म का निर्देशन प्रवाल रमन करेंगे. फ़िल्म की शूटिंग के दौरान रणदीप हुडा का लुक एकदम बदला-बदला नज़र आया. कटरीना कैफ बन गई हैं भारत से लॉरियल पेरिस की चौथी ब्रांड अम्बैसडर. इससे पहले मिस वर्ल्ड और बॉलीवुड अभिनेत्री ऐश्वर्या राय बच्चन बॉलीवुड अभिनेत्री सोनम कपूर और स्लमडॉग मिलिनेयर से सिक्का ज़माने वाली फ्रीडा पिंटो इस ब्यूटी प्रोडक्ट ब्रांड का हिस्सा रही हैं. कटरीना कैफ़ की हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म धूम 3 ने 500 करोड़ की कमाई के साथ बॉलीवुड में कमाई के सारे रिकॉर्ड्स को तोड़ दिया है. |
| DATE: 2014-01-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1201] TITLE: सैफ़ई पर अब कुछ नहीं कहूंगी: आलिया भट्ट |
| CONTENT: सैफ़ई महोत्सव में हिस्सा लेने के बाद अब आलिया भट्ट बहुत फ़ूंक फूंक कर कदम रखना चाहती हैं. दरअसल उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित इस समारोह में वो सलमान ख़ान और माधुरी दीक्षित जैसे सितारों के साथ शामिल हुई थीं और उसके लिए उनकी कड़ी आलोचना हुई थी. तर्क दिया गया कि ऐसे समय में जब राज्य में मुज़फ़्फरनगर दंगा पीड़ित लोग राहत कैंपों में भयानक ठंड और बीमारियों से जूझ रहे हैं तब बॉलीवुड सितारों का ऐसे रंगारंग कार्यक्रम में हिस्सा लेना ग़लत था. इस पूरे विवाद के बाज जब आलिया भट्ट पहली बार मीडिया से रूबरू हुईं तो इस पर उनसे सवाल पूछा जाना लाज़िमी था. मौक़ा था आलिया की आने वाली फ़िल्म हाईवे के प्रमोशन का लेकिन पत्रकारों की रुचि सैफ़ई महोत्सव से जुड़े सवाल पूछे जाने पर ज़्यादा थी. आलिया ने इस पूरे विवाद का बेहद संक्षिप्त जवाब देकर मौन साध लिया. आलिया ने कहा मुझे जो कहना था वो कह चुकी. अब मैं इस मामले पर कुछ भी नहीं बोलूंगी. आलिया के इस समारोह में हिस्सा लेने के बाद उनके पिता महेश भट्ट ने एक समाचार चैनल को बताया था कि आलिया इसके बाद काफ़ी शर्मिंदा थीं और उन्होंने इस समारोह से मिली रकम को दंगा पीड़ितों को देने का फ़ैसला किया था. हालांकि इस मामले में अभिनेता सलमान ख़ान ने आलिया का समर्थन करते हुए कहा था कि उन्होंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है और महेश भट्ट को उनकी तरफ़ से माफ़ी नहीं मांगनी चाहिए. फ़िल्म हाईवे में आलिया भट्ट ने एक गाना भी गाया है. फ़िल्म के संगीतकार ए आर रहमान हैं. अपने इस अनुभव पर वो कहती हैं मैं कोई प्रशिक्षित गायिका नहीं हूं. मैं बाथरूम में गाती हूं. जब मुझसे गाने के लिए कहा गया तो मैं रोमांचित हो गई. रहमान सर ने मेरे साथ बहुत धैर्य दिखाया और मुझे अब लगता है कि बतौर अभिनेत्री फ़ेल हो गई तो गायिका बन जाऊंगी. आलिया ने बताया कि ये गाना गाने में उन्हें बहुत तक़लीफ़ पेश आई. उन्हें पता ही नहीं था कि गाते समय सांस पर कैसे नियंत्रण रखा जाता है लेकिन ए आर रहमान की वजह से वो सब कुछ अच्छे से कर पाईं. हाईवे के निर्देशक हैं इम्तियाज़ अली और इसमें आलिया के अलावा रणदीप हुडा की भी मुख्य भूमिका है. फ़िल्म 21 फ़रवरी को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2014-01-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1202] TITLE: आख़िर क्यों बढ़ी संजय दत्त की पेरोल ? |
| CONTENT: आख़िर क्यों बढ़ी संजय दत्त की पेरोल इरफ़ान के मुताबिक़ बॉलीवुड को नहीं मिलती इज़्ज़त और टल गई आमिर ख़ान की पीके की रिलीज़. ख़बरें पढ़िए मुंबई डायरी में. बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त की पेरोल एक महीने के लिए फिर बढ़ गई है. अपनी पत्नी की बीमारी की वजह से वो पहले ही एक महीने की पेरोल पर थे और 21 जनवरी को उन्हें वापस पुणे की येरवडा जेल जाना था लेकिन उनकी पेरोल बढ़ाने की अर्ज़ी स्वीकार कर ली गई है और अब वो फिर एक महीने की पेरोल पर जेल से बाह रहेंगे. दरअसल पत्नी मान्यता दत्त के ख़राब स्वास्थ्य का हवाला देकर संजय दत्त ने छुट्टियां बढ़ाने की अपील की थी. मान्यता का फेफड़ों की बीमारी की वजह से मुंबई के एक अस्पताल में इलाज चल रहा है. संजय के क़रीबी दोस्त बंटी वालिया ने मीडिया को बताया मान्यता की बीमारी की वजह से संजय दत्त बुरी तरह से टूट चुके हैं. वो मानसिक तौर पर बेहद परेशान हैं. पत्नी की ख़राब सेहत और घर में अकेले बच्चों की देखभाल करने की वजह से संजय दत्त की हालत ख़राब हो गई है. 1993 मुंबई ब्लास्ट से जुड़े एक मामले में संजय दत्त को 42 महीने जेल में काटने हैं. पिछले साल उन्हें पहले ही दो बार जेल से छुट्टी मिल चुकी है. हॉलीवुड की कुछ फ़िल्मों में काम कर चुके भारतीय अभिनेता इरफ़ान के मुताबिक़ बॉलीवुड को पश्चिमी देशों में इज़्ज़त नहीं मिलती. वो कहते हैं हम चाहे कितना भी कहते रहें कि सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा लेकिन सच्चाई ये है कि हमारा वजूद विदेश में मायने नहीं रखता. आजकल के फ़िल्मकार सिर्फ़ पैसों के लिए फ़िल्में बनाते हैं. गोविंद निहलाणी जैसे फ़िल्मकार में हिम्मत ती कि वो वास्तविकता से जुड़ी फ़िल्में बना सकें. और किसी में ये हिम्मत ही नहीं बची. इरफ़ान जल्द ही यशराज बैनर की फ़िल्म गुंडे में नज़र आएंगे. आमिर ख़ान की बहुप्रतीक्षित फ़िल्म पीके की रिलीज़ छह महीने टल गई है. राजकुमार हीरानी निर्देशित ये फ़िल्म पहले इस साल जून में रिलीज़ होने वाली थी लेकिन अब ये साल के अंत में क्रिसमस पर रिलीज़ होगी. धूम-3 की ज़बरदस्त कामयाबी के बाद अब आमिर के प्रशंसकों को इस फ़िल्म से बड़ी उम्मीदें हैं. फ़िल्म के निर्माता विधु विनोद चोपड़ा हैं. चोपड़ा हीरानी और आमिर ख़ान की तिकड़ी इससे पहले 3 इडियट्स जैसी ज़बरदस्त कामयाब फ़िल्म दे चुकी है. कुछ दिनों पहले ही आमिर ख़ान ने कहा था मैंने पीके का फ़र्स्ट कट अब तक नहीं देखा है. फ़िल्म जून में रिलीज़ होनी है लेकिन अगर मुझे इसे देखने के बाद लगता है कि फ़िल्म में किसी सुधार की गुंजाइश है तो हम इसकी रिलीज़ आगे बढ़ा देंगे. फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाने के अलावा आमिर फ़िल्म का वितरण भी कर रहे हैं. पीके में अनुष्का शर्मा और संजय दत्त भी अहम भूमिकाओं में हैं. |
| DATE: 2014-01-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1203] TITLE: विदेशी किरदारों के देसी बोल |
| CONTENT: परदे पर फ़र्राटेदार हिंदी या दूसरी भारतीय भाषा बोलते विदेशी चरित्र. शुद्ध भारतीय भाषा में रोमांटिक डायलॉग बोलते गाली गलौच करते और मारपीट करते ये विदेशी किरदार. जी हां भारत में हॉलीवुड फ़िल्मों को भारतीय भाषा में डब करके रिलीज़ करने का व्यापार दिनों दिन बढ़ता जा रहा है. पिछले शुक्रवार रिलीज़ हुई हॉलीवुड फ़िल्म द लेजेंड्स ऑफ़ हर्क्यूलिस ऐसी ही फ़िल्म है जिसे हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं में डब करके रिलीज़ किया गया. इन विदेशी फ़िल्मों के राइट्स ख़रीद कर उसे डब करके भारत में रिलीज़ करने वाली एक बड़ी कंपनी पीवीआर पिक्चर्स के मार्केटिंग हेड गिरीश वानखेड़े कहते हैं एक बार जब हम कोई हॉलीवुड फ़िल्म के भारतीय अधिकार ख़रीद लेते हैं तो उसे यहां किस तरह से रिलीज़ करना है ये हमारा फ़ैसला हो जाता है. फिर हम उसे हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में डब कराते हैं. इसके वॉइस ओवर के लिए कलाकारों का चयन भी हम ख़ुद करते हैं. जैसे हर्क्यूलिस के किरदार के लिए हम पहले अक्षय कुमार को अप्रोच कर रहे थे लेकिन वो व्यस्तता की वजह से ये नहीं कर पाए. तो हमने सोनू सूद को चुना. गिरीश के मुताबिक़ डबिंग के लिए कलाकारों का चयन उस किरदार की शख़्सियत को ध्यान में रख कर किया जाता है इसलिए हर्क्क्यूलिस के किरदार की डबिंग के लिए अक्षय या सोनू जैसे मज़बूत कद काठी के लोगों को चुनना ज़रूरी था. हॉलीवुड के बड़े स्टूडियो जै़से यूनिवर्सल और 20 सेंचुरी फॉक्स की बनाई फ़िल्में जब भारत में रिलीज़ होती है तो इन कंपनियों के भारत स्थित ऑफ़िस डबिंग स्टूडियो से संपर्क करते हैं. मशहूर फ़िल्मकार शक्ति सामंत के बेटे असीम सामंता का मुंबई में एक बड़ा डबिंग स्टूडियो हैं जहां पर हॉलीवुड फ़िल्मों की डबिंग और मिक्सिंग होती है. असीम के स्टूडियो में 1993 में रिलीज़ हुई ब्लॉक बस्टर जुरासिक पार्क सहित 100 से ज़्यादा हॉलीवुड फ़िल्मों की डबिंग हो चुकी है. असीम कहते हैं मुंबई भर में 60 से 70 डबिंग आर्टिस्ट हैं. हम किसी भी किरदार के लिए इन हॉलीवुड स्टूडियोज़ को 3 वॉइस सैंपल भेजते हैं जिसमें से वो एक चुनते हैं. तब हम उस आर्टिस्ट को फ़ाइनल करके डबिंग शुरू करवाते हैं. असीम ने बताया कि कुछ हॉलीवुड फ़िल्मों की डबिंग सिर्फ़ टीवी के लिए होती है. उसमें क़्वालिटी का उतना ध्यान नहीं रखा जाता. बस डिस्ट्रीब्यूटर उसे जैसे-तैसे डब करवा लेता है. असीम ने बाताया कि कुल मिलाकर भारत में हॉलीवुड की एक्शन फ़िल्मों की ज़्यादा डिमांड होती है. अभी वहां की एनिमेशन फ़िल्मों का बाज़ार उतना बड़ा नहीं है. असीम ने ये भी बताया कि बड़े बॉलीवुड सितारों जैसे अक्षय कुमार या शाहरुख़ ख़ान की आवाज़ लेने से कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होता और फ़िल्म तभी चलती है जब उसकी कहानी में दम हो. आम तौर पर एक फ़िल्म को डब करने का ख़र्च 8-10 लाख रुपए के बीच आता है. पीवीआर के गिरीश वानखेड़े के मुताबिक़ इऩ हॉलीवुड फ़िल्मों की डबिंग के बाद भी उनके प्रमोशन के लिए ख़ास रणनीति बनाई जाती है. स्पेशल स्क्रीनिंग रखी जाती है शहरों में बड़े बड़े होर्डिंग लगाए जाते हैं थिएटर में ट्रेलर दिखाए जाते हैं. एक और ख़ास बात ये है कि दिल्ली मुंबई जैसे बड़े शहरों में तो फ़िल्म का मूल अंग्रेज़ी संस्करण भी अच्छा व्यापार कर लेता है लेकिन इंदौर भोपाल लखनऊ और पटना जैसे शहरों में फ़िल्मों के डब संस्करण अच्छा व्यापार करते हैं. एक ज़माना था जब इन विदेशी फ़िल्मों के डब संस्करण देखना एक बेहद अटपटा अनुभव होता था जिसमें बड़े अजीब तरह के बेतुके संवाद होते थे लेकिन अब जैसे जैसे समय बढ़ रहा है फ़िल्मों की डबिंग पर ख़ास ध्यान दिया जाने लगा है. जुरासिक पार्क वॉल्वरिन दि एडवेंचर ऑफ़ टिनटिन और जेम्स बॉन्ड समेत कई फ़िल्मों के लिए डबिंग कर चुके कलाकार शक्ति सिंह कहते हैं अब हिंदी भाषा को ही लीजिए. भारत में अलग-अलग क्षेत्र में इसका उच्चारण लोग अलग अलग तरीक़े से करते हैं. हमें ऐसी सार्वभौमिक हिंदी बोलनी पड़ती है जो भारक के हर कोने के लोग समझ सकें. स्क्रिप्ट के साथ हमें थोड़ी आज़ादी मिलती है. अगर उसमें पर्याप्त इमोशन नहीं आ रहे हैं तो हम अपने हिसाब से उसमें कुछ बदलाव कर देते हैं. शक्ति सिंह के मुताबिक़ 90 के दशक में इस पेशे में पैसा बिलकुल भी अच्छा नहीं था लेकिन जैसे जैसे ये इंडस्ट्री बढ़ रही है लोगों को पैसा ठीक मिलने लगा है. परिगना पंड्या शाह छोटा भीम समेत कई हॉलीवुड फ़िल्मों के लिए डबिंग कर चुकी हैं. परिगना पंड्याशाह भी एक डबिंग आर्टिस्ट हैं जो कई सालों से हॉलीवुड फ़िल्मों को डब कर रही हैं. वो कहती हैं हमें कैरेक्टर की पर्सनैलिटी के हिसाब से अपनी आवाज़ ढालनी पड़ती है. स्क्रिप्ट में हमारा कोई हाथ नहीं होता वो हमें तभी मिलती है जब हम डबिंग करने पहुंचते हैं. परिगना मानती हैं कि डबिंग आर्टिस्ट को उतना पैसा नहीं मिलता जितनी वो मेहनत करते हैं. साथ ही वो चाहती हैं कि फ़िल्म के क्रेडिट रोल में डबिंग कलाकारों का नाम भी होना चाहिए. |
| DATE: 2014-01-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1204] TITLE: तालियों से पेट नहीं भरता: इरशाद कामिल |
| CONTENT: चमेली जब वी मेट मेरे ब्रदर की दुल्हन और रॉकस्टार जैसी फ़िल्मों के गाने लिखने वाले गीतकार इरशाद कामिल अपने सुकून भरे गीतों के लिए जाने जाते हैं लेकिन इस नाज़ुक दिल शायर के अंदर रहता है एक शख़्स जिसमें ज़माने भर के लिए ग़ुस्सा और खीझ है. इरशाद कामिल दिल्ली आए तो उनकी ज़िंदगी के तमाम पहलुओं पर एक ख़ास बातचीत हुई. सिलसिला शुरू हुआ उनके नाम से. ऐसा लगता है कि मेरे पेशे के साथ मेरे नाम का बेहद गहरा ताल्लुक़ है. हां जब मेरी अम्मी ने मेरा नाम इरशाद कामिल रखा था तब मुझे ये बिलकुल पसंद नहीं था. पांचवीं-छठीं क्लास तक मैं अम्मी को बोलता रहा कि अभी मेरे बोर्ड के एक्जाम नहीं हुए हैं अभी भी मेरा नाम बदल दो. वसीम रख दो या कुछ और रख दो. इरशाद भी कोई नाम होता है अगर किसी को मैं अपना नाम बताऊंगा तो वो इरशाद इरशाद करने लगेगा और चिढ़ाएगा. गीतों के साथ साहित्य के साथ जुड़ जाने के बाद अब लगता है कि मेरे लिए इससे खूबसूरत नाम कोई और नहीं है. ये बड़े इत्तेफाक़ की बात है. मेरा दोस्त ट्रिब्यून अखबार में सब-एडिटर के लिए इंटरव्यू देने गया था. मैं उसके साथ था. संयोग ऐसा हुआ कि वो भाई साहब रह गए और मैं चुन लिया गया. इस तरह ये सिलसिला शुरू हुआ. पहले ट्रिब्यून इसके बाद जनसत्ता. एक दिन जनसत्ता में अचानक रात के डेढ़ बजे मैं अपना डबल कॉलम लिख कर घर आ रहा था. अचानक दिमाग में बात आई कि इरशाद कामिल क्या तुमने ये सोचा था कि बड़े होकर खुशवंत सिंह बनोगे या कुलदीप नैयर बनोगे तो अंदर से आवाज़ आई नहीं ये तो नहीं सोचा था. और अगली ही सुबह मैंने इस्तीफ़ा दे दिया. फिर कुछ दिन चंडीगढ़ में घुमक्कड़ी और थिएटर करने के दौरान यूं ही एक दिन लेख टंडन से मुलाकात हो गई. लेख टंडन को लेखक की ज़रूरत थी. फिर क्या था मैंने उनके सीरियल कहां से कहां तक के लिए 22 दिन सेट पर बैठकर डायलॉग लिखे. हां बिलकुल ध्यान में था. तब मैं इस तरह के सवाल भी झेल रहा था कि गीत लिख कर क्या कभी किसी का पेट भरा है. मैंने पीएचडी के दौरान कविता विषय यही सोच कर चुना था कि काम की जो बारीकियां हैं उसे सीखूं. मैं इन दिनों अपने भीतर वह ज़मीन तैयार कर रहा था जहां से एक लेखक का जन्म हो सके. ये भी इत्तेफ़ाक की ही बात है कि इम्तियाज़ अली से मुलाक़ात हो गई और उन्होंने मुझे सोचा न था में मौक़ा दे दिया. इम्तियाज़ के साथ का जो सिलसिला चला वो अब तक चल रहा है. हां ये इस इंडस्ट्री की रवायत है. जब वी मेट के सारे गाने लोगों को बहुत पसंद आए थे. इस फ़िल्म ने मुझे एक अलग तरह की पहचान दी थी. इसके बाद आई रॉकस्टार. रॉकस्टार ने असल वाले इरशाद को जिसके लिए रोमांस उतनी सस्ती और उतनी उथली चीज़ नहीं थी लोगों के सामने ला खड़ा किया. अब लोगों के सामने वो इरशाद आया जो सिर्फ गीतकार नहीं है थोड़ा सा साहित्यकार थोड़ा सा शायर भी है. जिसके अंदर दुनिया के लिए खीझ है. जो ऊपर से भले ही बहुत नरम लगताहो मगर अंदर पूरा का पूरा जल रहा है. व्यावसायिक होते हुए भी हम किस हद तक साफ दिल हो सकते हैं अपनी सीमाओं को बढ़ा सकते हैं ये रॉकस्टार ने बता दिया. बाज़ार और रचनात्मकता क्या हमक़दम हो सकते हैंमुझे लगता है दोंनो एक साथ चल सकते हैं. कला व्यवसाय के बिना चल ही नहीं सकती. यदि मैं और मेरे जैसे गीतकारों को केवल लिखने से ही प्यार है तो वे घर में बैठकर लिखते ही रहें ना. क्यों लोगों तक पहुंचाएं ये सब. तालियों से पेट बिलकुल नहीं भरेगा. और यदि पेट नहीं भरेगा तो कोई भी कला या कलाकार ज़िंदा नहीं रह सकते. क्या नॉस्टाल्जिया और मेमोरी समकालीन सिनेमा के आड़े आते हैंमेरे ब्रदर की दुल्हन का टाइटिल ट्रैक था- मेट्रीमोनियल सी हो आंखें काम में जो ना हो लेज़ी जिसमें हो थ्री जी की तेजी. दूसरा गाना कैसा ये इश्क है अजब सा रिस्क है. शुद्धतावादी लोगों को इस पर काफी परेशानी है. भाषा पर खूब हायतौबा मचती है. हम राग अलापते हैं कि जो पुरानी चीजें थीं वे अच्छी थीं. हम नॉस्टाल्जिया में ही रहना चाहते हैं. मेरा मानना है कि इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसकी याददाश्त है. और उससे भी बड़ी ताकत है भूल जाना. यदि आप बंधी-बंधाई परिपाटी पर चलने के आदी हैं तो अपनी राह नहीं खोज सकतें. जहां तक शुद्धतावाद या भाषा की बात है सिनेमा कला और साहित्य का एक बहुत ही छोटा सा उदाहरण है. पूरे का पूरा सिनेमा कला या साहित्य नहीं है. सिनेमा का अहम पहलू है मनोरंजन. सबका मनोरंजन भाषा की शुद्धता से हो साहित्य से हो ये ज़रूरी नहीं है. कोई शिकायत अपने आप से तो कोई शिकायत नहीं है दुनिया से ज़रूर है. मेरे अंदर बहुत कुछ ऐसा है जिसे सिनेमा निकाल नहीं पाएगा क्योंकि वो बिकता नहीं है. उसके पैसे नहीं मिल सकते. ख़ुद को ख़ुश करने के लिए कभी कविताएं लिख लेता हूं. नाटक लिखता हूं. जो कुछ मुझसे हो सका है अब तक उससे मैं बहुत ख़ुश हूं. सफ़र तो अभी जारी है. |
| DATE: 2014-01-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1205] TITLE: बेटी की शादी में ज़रूर आएंगे सनी, बॉबी: हेमा मालिनी |
| CONTENT: हेमा मालिनी से मतभेद भुलाकर उनकी छोटी बेटी की शादी में शामिल होंगे सनी देओल और बॉबी देओल करीना कपूर क्या सीख रही हैं और शादी के ख़िलाफ़ नहीं हैं अभय देओल. पढ़िए ख़बरें मुंबई डायरी में. हेमा मालिनी इऩ दिनों अपनी छोटी बेटी आहना देओल की शादी में व्यस्त हैं. ये शादी होगी दो फ़रवरी को और हेमा ने दावा किया है कि आहना के भाई सनी और बॉबी देओल शादी में ज़रूर शामिल होंगे. ग़ौरतलब है कि सनी और बॉबी धर्मेंद्र की पहली पत्नी के बेटे हैं और उनके धर्मेंद्र की दूसरी पत्नी हेमा मालिनी से संबंध कथित तौर पर सामान्य नहीं रहे हैं. वो कभी भी किसी सार्वजनिक समारोह मे हेमा मालिनी के साथ नज़र नहीं आए. यहां तक कि हेमा मालिनी की बड़ी बेटी ईशा देओल की शादी में भी दोनों शामिल नहीं हुए थे. ईशा की शादी में धर्मेंद्र और उनके भतीजे अभय देओल ने हिस्सा लिया था और शादी में भाई की जो रस्में होती हैं वो अभय ने ही अदा की थीं. हेमा ने सफ़ाई दी कि ईशा की शादी में सनी और बॉबी इसलिए शादी में शामिल नहीं हो पाए क्योंकि वो शहर में थे ही नहीं. लेकिन आहना की शादी में वो दोनों ज़रूर आएंगे. हेमा ने इस शादी के लिए फ़िल्म इंडस्ट्री और राजनीति से जुड़े कई महत्तवपूर्ण लोगों को न्यौता दिया है. साल 2013 करीना कपूर के लिए कुछ ख़ास नहीं रहा. उनकी फ़िल्म सत्याग्रह कुछ ख़ास नहीं चली और नवंबर में रिलीज़ हुई गोरी तेरे प्यार में को तो दर्शकों ने बुरी तरह से नकार दिया. इसलिए करीना कपूर अब ना कहने की कला सीख रही हैं. ख़बरों के मुताबिक़ उनकी नज़दीकी दोस्तों और परिवार वालों ने उन्हें सलाह दी है कि भावना में बहकर वो कोई फ़िल्म साइन ना करें और पूरी तरह से स्क्रिप्ट पर यक़ीन ना हो तो फ़िल्म को मना कर दें. करीना भी मानती हैं कि उनसे कुछ ग़लतियां हुईं और अब वो ना कहने का सबक सीखने के लिए तैयार हैं. फिलहाल करीना अजय देवगन के साथ सिंघम-2 और ऋतिक रोशन के साथ फ़िल्म शुद्धि में व्यस्त हैं. चार सालों से अपनी गर्लफ़्रेंड प्रीति देसाई के साथ रह रहे अभिनेता अभय देओल ने साफ़ किया है कि वो शादी के ख़िलाफ़ नहीं है लेकिन उसे लेकर उनके विचार दूसरों से जुदा ज़रूर हैं. अभय कहते हैं मुझे शादी की अवधारणा से कोई आपत्ति नहीं है. मैं तो बस ये मानता हूं कि शादी एक सांस्कृतिक अवधारणा है प्राकृतिक नहीं. मैं शादी कर लूंगा तो अपनी गर्लफ़्रेंड के प्रति ज़्यादा वफ़ादार हो जाऊंगा ऐसा तो है नहीं. हम दोनों पहले से ही एक दूसरे के लिए बेहद वफ़ादार हैं. हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि हर इंसान के अपने विचार होते हैं और ये उनके निजी विचार हैं. किसी को उनसे असहमत होने का पूरा अधिकार है. अभय अपनी गर्लफ़्रेंड प्रीति के साथ जल्द ही फ़िल्म वन बाय टू में दिखेंगे. |
| DATE: 2014-01-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1206] TITLE: तो ये है इनका 'क्युटियापा'! |
| CONTENT: पहले कोई टीवी कार्यक्रम बनाओ फिर उसके प्रसारण के लिए विभिन्न टीवी चैनलों के चक्कर लगाओ. ये सब पुरानी बातें हो गईं. अब तो इंटरनेट ने युवाओं को एक नया ही प्लेटफॉर्म दे दिया है. जिन लोगों को लगता है कि उन्हें अपनी रचनात्मकता को दिखाने के मौके नहीं मिल रहे हैं इंटरनेट उनके लिए वरदान साबित हो रहा है. टीवीएफ यानी द वायरल फ़ीवर और एआईबी - ऑल इंडिया बकद दो ऐसे ही ग्रुप हैं जो अपनी रचनात्मकता को यू ट्यूब पर दर्शकों के सामने परोस रहे हैं और उन्हें ख़ासी लोकप्रियता भी हासिल हो रही है. टीवीएफ या क्यूटियापा ने यू-ट्यूब पर क्यूटियापा के नाम से कई वीडियो बनाए हैं. इसके संस्थापक अरुणाभ कुमार आईआईटी खड़गपुर से इंजीनियरिंग ग्रेजुएट हैं जबकि एआईबी - ऑल इंडिया बकद के संस्थापक हैं स्टैंड अप कॉमेडियन गुरसिमरन खम्बा तन्मय भट्ट रोहन जोशी और आशीष शाक्य. ये युवा नए-नए वीडियोज़ बनाकर उन्हें सीधे यू-ट्यूब पर लॉन्च करते रहते हैं. ये वीडियोज़ तकनीकी तौर पर उम्दा होते हैं. सवाल ये उठता है कि ऐसे वीडियोज़ बनाने के लिए इन्हें कहाँ से पैसा मिलता है. और इनकी कमाई का ज़रिया क्या है इन सवालों का जवाब दिया क्यूटीयापा के अरुणाभ कुमार और एआईबी - ऑल इंडिया बकद के तन्मय भट्ट ने. टीवीएफ़़ के संस्थापक अरुणाभ कुमार अभिनेता आयुष्मान ख़ुराना के साथ. एआईबी के तन्मय ने कहा हम ये तो नहीं बता सकते कि हमें पैसे कौन दे रहा है पर ज़्यादातर पैसा हमें अपनी जेब से देना पड़ता है. यू-ट्यूब के ज़रिए भी हम थोड़ा बहुत पैसा कमा रहे हैं. हालांकि वो इतना नहीं होता कि उससे हम नया वीडियो बना लें. वो बताते हैं हम सब स्थापित कॉमेडियन हैं. हम फिल्मों के लिए पटकथा लिखते हैं रेडियो में काम करते हैं और कभी-कभी अगर हमें कोई महंगी फ़िल्म बनानी होती है तो उसके लिए थोड़ा बहुत पैसा हमारी जेब से भी जाता है. टीवीएफ़ या द वायरल फ़ीवर के संस्थापक अरुणाभ कुमार कहते हैं यू-ट्यूब पर आपके वीडियोज़ को जितने व्यूज़ मिलते हैं उससे आपको थोड़ा बहुत पैसा मिल जाता है. इसके अलावा कई ब्रांड्स भी हमारे पास आते हैं जो हमें कहते हैं कि आप हमारे लिए भी ऐसे वीडियोज़ बनाइये और फिर वो हमें पैसे देते हैं. एआईबी से जुड़े लोगों को उ्म्मीद है कि इससे उनकी लोकप्रियता में इज़ाफ़ा होगा. टीवीएफ़ और एआईबी को लोग बहुत पसंद कर रहे हैं जिसका फ़ायदा ये दोनों बहुत ही बढ़िया तरीके से उठा रहे हैं. उनकी फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी अच्छी ख़ासी फ़ैन फॉलोइंग हैं. टीवीएफ़ के अरुणाभ कुमार कहते हैं मुझे बहुत सारे लोग मिलते हैं और कहते हैं आप बहुत सही काम कर रहे हैं और आपको ऐसा करते रहना चाहिए. मेरा मक़सद है कि मैं भारत में एक ऐसा टेलीविज़न चैनल लॉन्च करूं जो आज के युवाओं को लुभाए. मैं टीवीएफ़ को इस देश का डिज़नी या एचबीओ बनाने की तमन्ना रखता हूँ. दूसरी ओर एआईबी का लक्ष्य बहुत ही सरल और सामान्य है. एआईबी के तन्मय भट्ट कहते हैं हमें बहुत सारे लोग पसंद कर रहे हैं. हम उम्मीद करते हैं कि इससे बतौर स्टैंड अप कॉमेडियन भी हमारी लोकप्रियता में इज़ाफ़ा होगा. ऐसे वीडियोज़ की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर इतना तो कहा जा सकता है की आज की युवा पीढ़ी का झुकाव पारंपरिक सास बहू या किसी अन्य मनोरंजन धारावाहिक की तरफ़ थोडा कम हो गया है. लेकिन क्या इस तरह का मनोरंजन युवा पीढ़ी की बदलती चाल के साथ कदम बढ़ा पाएगा इस सवाल का जवाब शायद आने वाले वक़्त पर निर्भर करेगा. |
| DATE: 2014-01-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1207] TITLE: गुलाब गैंग: माधुरी भारी या जूही? |
| CONTENT: अभिनेत्री माधुरी दीक्षित के मुताबिक़ उनकी डिक्शनरी में मुश्किल जैसा कोई शब्द नहीं है और उन्हें चुनौतियां पसंद हैं. अपनी आने वाली फ़िल्म गुलाब गैंग के प्रमोशन पर माधुरी ने ये बातें कहीं. फ़िल्म में माधुरी के साथ जूही चावला की भी अहम भूमिका है. फ़िल्म में माधुरी ने कई एक्शन दृश्य किए हैं. उन्होंने बताया कि इसके लिए उन्होंने किसी बॉडी डबल का सहारा नहीं लिया और सारे स्टंट्स ख़ुद किए. क्या उन्हें ऐसे कठिन सीन करते समय किसी तरह की दिक़्क़त पेश आई. इसके जवाब में माधुरी ने कहा मैंने ताईक्वांडों सीखा है इसलिए मुझे ख़ास मुश्किल नहीं आई. ये पहला मौक़ा है जब माधुरी दीक्षित और जूही चावला किसी फ़िल्म में साथ नज़र आ रही हैं. इससे पहले एक बार दोनों के साथ काम करने की संभावना बनी थी लेकिन अंतत दोनों का साथ आना मुमकिन नहीं हो पाया. माधुरी ने कहा मैं ख़ुश हूं कि हम साथ आ रहे हैं. इससे पहले साथ में फ़िल्म ना करने का कोई अफ़सोस नहीं है. मुझे उम्मीद है कि हम फिर साथ आएंगे. फ़िल्म का ट्रेलर यू ट्यूब पर आ चुका है और अभी से मानो फ़िल्म प्रेमी दो खेमे में बंट गए हैं. कुछ लोगों को माधुरी असरदार लग रही हैं तो कुछ लोगों का मानना है कि जूही चावला की मौजूदगी ज़्यादा प्रभावी लग रही है. इस तुलना पर माधुरी कहती हैं मुझे नहीं लगता कि हमारे बीच तुलना होनी चाहिए. जूही और मेरा रोल बिलकुल जुदा है. मैं फ़िल्म की हीरो हूं वो विलेन हैं. हम दोनों का किरदार एक दूसरे के बिना कुछ भी नहीं है. मुझे लगता है कि फ़िल्म के लिए हम दोनों ने अपनी पूरी ऊर्जा से काम किया है. जूही चावला की तारीफ़ करते हुए माधुरी ने कहा कि उन्हें स्क्रीन पर देखना बहुत अच्छा लगता है और फ़िल्म में जूही ने कमाल का काम किया है. ऐसा रोल उन्होंने पहले नहीं किया. गुलाब गैंग के निर्देशक सौमिक सेन हैं. ये उनकी पहली फ़िल्म है. फ़िल्म कहानी है कुछ ऐसी महिलाओं की जो अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ एकजुट होकर आवाज़ उठाती हैं और अपने विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब देती हैं. गुलाबी साड़ी पहनी हुई इन महिलाओं को गुलाब गैंग कहा गया. फ़िल्म मार्च में रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2014-01-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1208] TITLE: क्या लुभा पाएगी 'मिस लवली' |
| CONTENT: फ़्यूचर ईस्ट फ़िल्म और ग्लोबल फ़िल्म इनशिएटिव की मिस लवली दो भाइयों की कहानी है. विकी दुग्गल अनिल जॉर्ज दो भाई हैं जो अर्धनग्न फ़िल्में सेमीपोर्नोग्राफ़िक फ़िल्में बनाते हैं जिनके हिस्से बाद में दूसरी फ़िल्मों में जोड़ दिए जाते हैं. इनमें काम करने के लिए उन्हें लगातार लड़कियों की ज़रूरत पड़ती रहती है. विकी फ़िल्मों का निर्देशन करता है और सोनू उन्हें बेचता है. इस काम के लिए उसे वितरकों तक अपनी फ़िल्म की हीरोइनें अय्याशी के लिए भेजनी पड़ती हैं. एक दिन सोनू की मुलाक़ात पिंकी निहारिका सिंह से होती है वो फ़िल्मों में आने के लिए बेताब है. वो ख़ुद निर्देशक बनकर उसे लॉन्च करने की ठान लेता है और इसके लिए वो अपने भाई के अकाउंट से पैसे चुराता है. सोनू और पिंकी एक दूसरे से प्यार करने लगते हैं. लेकिन इससे पहले कि वो अपनी फ़िल्म शुरू कर पाता विकी पिंकी को देख लेता है. कहानी में ट्विस्ट ये है कि विकी पिंकी से पहले ही मिल चुका होता है. पिंकी विकी से अपना नाम सोनिका बताकर पहले ही मिल चुकी होती है. इसी बात पर विकी और सोनू के बीच झगड़ा हो जाता है. इसके बाद क्या होता है. यही कहानी है. अशीम अहलूवालिया की लिखी कहानी बहुत बिखरी हुई है और दर्शकों को कतई बांध के नहीं रख पाती. फ़िल्म का स्क्रीनप्ले भी असरदार नहीं है. फ़िल्म के किरदार ठीक तरीके से परिभाषित नहीं किए गए हैं. फ़िल्म का कुछ हिस्सा वास्विकता के बिलकुल क़रीब है लेकिन ये कोई वजह नहीं है फ़िल्म को पसंद करने की. फ़िल्म का क्लाईमेक्स बिलकुल बेकार है. पूरी फ़िल्म अवसादग्रस्त लगती है. फ़िल्म के संवाद भी असर पैदा नहीं कर पाए हैं. नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी अपने किरदार में बिलकुल स्वाभाविक रहे हैं. उन्होंने ज़बरदस्त काम किया है. निहारिका सिंह ठीक-ठाक हैं. अनिल जॉर्ज ने बढ़िया काम किया है. बाकी कलाकार ठीक हैं. अशीम अहलूवालिया का निर्देशन कमज़ोर स्क्रिप्ट को नहीं बचा पाया है. फ़िल्म से दर्शक जुड़ ही नहीं पाते. फ़िल्म का संगीत भी काम चलाऊ है. हां मोहनन का कैमरावर्क ज़रूर असरदार है. कुल मिलाकर मिस लवली एक फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिखाई जाने लायक फ़िल्म ही बनके रह गई है. आम दर्शक फ़िल्म से बिलकुल नहीं जुड़ पाएंगे. |
| DATE: 2014-01-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1209] TITLE: 'उत्तम के जाने के बाद सबसे दूर हो गईं थीं सुचित्रा' |
| CONTENT: आंखों से अभिनय कैसे किया जाता है. ये कोई सुचित्रा सेन से सीखे. फ़िल्मकार कल्पना लाजमी ने बीबीसी से ख़ास बात करते हुए सुचित्रा सेन के बारे में अपने ये विचार व्यक्त किए. कल्पना कहती हैं इस दौर की अभिनेत्रियों को चाहिए कि वो फ़िल्म आंधी को सिनेमा स्टडी के तौर पर देखें. कैसे पूरी फ़िल्म में सुचित्रा सेन ने बिना ज़्यादा शारीरिक हाव-भाव के आंखों से अभिनय किया है. कल्पना मानती हैं कि सुचित्रा सेन क्लोज़ अप्स में जितनी ख़ूबसूरत लगती थीं उतनी शायद ही कोई और अभिनेत्री लगे. कल्पना ने बताया कि सुचित्रा उनके अंकल गुरुदत्त के ज़माने में ज़्यादा सक्रिय थीं. वो कहती हैं हिंदी फ़िल्मों में तो उन्होंने अपनी छाप छोड़ी ही लेकिन बांग्ला सिनेमा में तो उन्होंने तहलका मचा कर रख दिया. उत्तम कुमार और उन्होंने साथ में कई बेहतरीन फ़िल्में दीं. लेकिन उत्तम कुमार के कम उम्र में ही इस दुनिया से रुखसत हो जाने के बाद वो बेहद तन्हा हो गईं और उन्होंने अपने आपको सबसे दूर कर लिया. ग़ौरतलब है कि साल 1978 में रिलीज़ हुई बांग्ला फ़िल्म प्रनॉय पाशा के बाद उन्होंने फ़िल्मों से संन्यास ले लिया. इसके बाद वो सार्वजनिक जीवन से दूर हो गई थीं. कुछ और अहम लोगों ट्विटर पर सुचित्रा सेन के निधन पर गहरा दुख जताया. अमिताभ बच्चन एक और महान शख़्सियत हमारे बीच से चली गई. वो बेहद सुंदर प्रतिभाशाली अभिनेत्री थीं. अपनी गरिमामय मौजूदगी से उन्होंने बंगाली और हिंदी सिनेमा को धन्य किया. नरेंद्र मोदी सुचित्रा सेन को श्रद्धांजलि. उनके जाने से हमने हिंदी और बांग्ला सिनेमा की एक महान शख़्सियत को खो दिया है. रेखा भारद्वाज मेरी पहली मेमोरी उनको लेकर फ़िल्म ममता की है. मेरी उनकी सबसे पसंदीदा फ़िल्म आंधी है. श्रीदेवी बोनी कपूर बड़ी ज़बरदस्त प्रतिभाशाली अभिनेत्री अद्वितीय सुंदरी महान सुचित्रा सेन के जाने से एक स्थान रिक्त हो गया. आने वाली सदियां उनसे प्रेरणा लेती रहेंगी. सुषमा स्वराज गरिमा और सुंदरता की अद्भुत सम्मिश्रण थीं सुचित्रा सेन. मैं उनके लिए श्रद्धांजलि व्यक्त करती हूं. |
| DATE: 2014-01-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1210] TITLE: अमिताभ बनें देश के राष्ट्रपति: भाजपा नेता |
| CONTENT: शत्रुघ्न सिन्हा ने की अमिताभ बच्चन को राष्ट्रपति बनाने की वकालत माधुरी दीक्षित के साथ दोबारा काम करने को लेकर जूही चावला डांवाडोल और सलीम ख़ान किस बात में अपने बेटे सलमान ख़ान को अपने जैसा मानते हैं. अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की अमिताभ बच्चन से प्रतिद्वंद्विता किसी से छिपी नहीं है. वो समय-समय पर अमिताभ बच्चन की आलोचना करते रहे हैं. लेकिन बीती रात मुंबई में हुए स्क्रीन पुरस्कार समारोह में उन्होंने अमिताभ बच्चन को राष्ट्रपति बनाने की वकालत तक कर डाली. अमिताभ को इस समारोह में लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्हें स्टेज पर ये पुरस्कार शत्रुघ्न सिन्हा ने दिया. अमिताभ की तारीफ़ करते हुए उन्होंने कहा अमिताभ बच्चन फ़िल्म इंडस्ट्री और देश का गौरव हैं. उन्हें देश का राष्ट्रपति बनना चाहिए. कई फ़िल्मों में साथ काम कर चुके अमिताभ और शत्रुघ्न सिन्हा के बीच लंबे समय से आत्मीय संबंध नहीं रहे. शत्रुघ्न सिन्हा ने तब खुलकर नाराज़गी भी ज़ाहिर की थी जब अमिताभ ने उन्हें अपने बेटे अभिषेक की शादी में नहीं बुलाया था. जूही चावला फ़िल्म गुलाब गैंग में पहली बार माधुरी दीक्षित के साथ नज़र आएंगी. 90 के दशक की इन दोनों मशहूर अभिनेत्रियों ने अपने करियर के शीर्ष पर कभी एक दूसरे के साथ काम नहीं किया. और जूही चावला को नहीं लगता कि वो दोबारा माधुरी के साथ काम कर पाएंगी. उन्होंने एक समारोह के दौरान मीडिया से बात करते हुए कहा मुझे लगता है कि गुलाब गैंग के ज़रिए मुझे पहली और आख़िरी बार माधुरी के साथ काम करने का मौक़ा मिला है. मुझे नहीं लगता कि भविष्य में ऐसा मौक़ा फिर मिलेगा. गुलाब गैंग की कहानी बहुत सशक्त है और जूही को लगता है कि इस तरह की कहानियां बहुत कम होती हैं इसलिए वह और माधुरी को साथ देखने को लेकर उतनी आशावादी नहीं हैं. जूही ने आगे कहा यह कभी-कभी होता है जब हमें अच्छी कहानी मिलती है और हम समर्पण से काम कर सकते हैं. इसलिए मुझे नहीं लगता कि हम दोबारा साथ काम करेंगे. मशहूर लेखक सलीम ख़ान का मानना है कि उनके बेटे सलमान ख़ान कई मायनो में उनके जैसे ही है. एक अख़बार को दिए इंटरव्यू में सलीम ख़ान ने कहा सलमान की ज़िंदगी में जितनी भी महिला मित्र आईं बाद में उनसे भले ही सलमान का संबंध टूट गया हो वो उनके संपर्क में रहते हैं. एक या दो उदाहरण को छोड़ दिया जाए तो सलमान की दोस्ती अब भी उनकी पुरानी गर्लफ़्रेंड्स से है. उसी तरह से मैं भी अपनी पुरानी महिला मित्रों के संपर्क में रहता था. सलीम ख़ान कहते हैं कि यही वजह है कि संबंध टूट जाने के बावजूद उनकी अपनी पुरानी गर्लफ़्रेंड्स से रिश्तों में कड़वाहट नहीं आती. |
| DATE: 2014-01-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1211] TITLE: शाहरुख़-ऋतिक पर भारी कामसूत्र 3 डी? |
| CONTENT: हाल ही में शर्लिन चोपड़ा की नई फ़िल्म कामसूत्र 3 डी का ट्रेलर लॉन्च किया गया. हालांकि इस मौके पर खुद शर्लिन नहीं नज़र आईं. मीडिया के हर सवाल का जवाब देते नज़र आए फ़िल्म के निर्देशक रूपेश पॉल और निर्माता सोहन रॉय. इस मौके पर रूपेश और सोहन ये कहने से भी नहीं चूके कि कैसे उनकी फ़िल्म को अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म बाज़ार में कृष 3 और चेन्नई एक्सप्रेस से बेहतर दामों में खरीदा गया है. रूपेश कहते हैं यूके जापान थाईलैंड ताइवान इंडोनेशिया फिजी आस्ट्रेलिया न्यूज़ीलैंड और जर्मनी जैसे देशों में कामसूत्र को कृष 3 और चेन्नई एक्सप्रेस की तुलना में 70 से 80 प्रतिशत अधिक दाम में ख़रीदा गया है. रूपेश की ही बात को आगे बढ़ाते हुए निर्माता सोहन राय ने कहा सिंगापुर जैसे एक छोटे से देश में अमूमन एक भारतीय फ़िल्म को 40 हज़ार सिंगापुर डॉलर में खरीदा जाता है. कामसूत्र 3 डी को सिंगापुर में 75 हज़ार सिंगापुर डॉलर में खरीदा गया. अब अगर फ़िल्म को हर ओर से इतनी वाहवाही मिल रही है तो फ़िल्म में कोई न कोई बात तो होगी ही. तो क्या ख़ास है कामसूत्र 3 डी में इस सवाल का जवाब देते हुए रूपेश कहते हैं जिस तरह से हमने फ़िल्म की कहानी कही है वो ख़ास है. फ़िल्म में जिस तरह के ऐक्शन सीन है वो भी ख़ास हैं. फ़िल्म में ऐक्शन सीन तो हैं ही साथ ही शर्लिन चोपड़ा के कई अंतरंग दृश्य भी हैं और इस वजह से रूपेश थोड़ा घबराए हुए भी हैं. वो कहते हैं मुझे भारतीय सेंसर बोर्ड का डर है. बोर्ड को कला की समझ नहीं है. मेरी फ़िल्म को विदेश में हाथों-हाथ लिया गया है ये तो अच्छी बात है लेकिन मैं चाहता हूं कि मेरी फ़िल्म को मेरे देशवासी भी देखें. अपनी बात को पूरा करते हुए रूपेश कहते हैं अगर इटली में किसी दर्शक को मेरी फ़िल्म पसंद आती है और वो मेरी तारीफ भी करता है तो उसका क्या फ़ायदा वो तो अपनी ही भाषा में मेरी तारीफ़ करेगा जो मेरी समझ भी नहीं आएगी. मैं चाहता हूं कि भारत में लोग ये फ़िल्म देखें और इसकी तारीफ करें. मीडिया से बात करते हुए रूपेश ने ये भी बताया कि फ़िल्म के लिए उनकी पहली पसंद शर्लिन चोपड़ा कभी भी नहीं थी. वो कहते हैं मैं चाहता था कि करीना कपूर ये फ़िल्म करें उन्हें फ़िल्म की कहानी भी पसंद आई थी लेकिन फ़िल्म के शीर्षक से उन्हें समस्या थी. इतना ही नहीं मैं चाहता था कि फ़िल्म के गाने गुलज़ार साहब लिखें लेकिन उन्हें भी फ़िल्म के शीर्षक से ही ऐतराज़ था. |
| DATE: 2014-01-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1212] TITLE: फ़िल्म रिव्यू: 'डेढ़ इश्क़िया' |
| CONTENT: शेमारू और विशाल भारद्वाज पिक्चर्स की डेढ़ इश्क़िया साल 2010 में आई इश्क़िया का सीक्वल है. खालू नसीरुद्दीन शाह और बब्बन अरशद वारसी मशहूर ठग हैं. दोनों मुश्ताक सलमान शाहिद के लिए काम करते हैं. लेकिन वो तब खालू के पीछे पड़ जाता है जब वो एक सोने का क़ीमती हार चुराकर भाग जाते हैं. बब्बन वादा करता है कि वो खालू को ढूंढ निकालेगा. फ़िल्म कहानी है खालू और बेगम पारा माधुरी दीक्षित नेने और बब्बन अरशद वारसी और मुनिया हुमा क़ुरैशी के रोमांस की. बेगम पारा से जान मोहम्मद विजय राज़ भी इश्क़ करता है और उसे पाना चाहता है. इस बीच एक दिलचस्प मोड़ पर मुनिया बब्बन की मदद से बेगम पारा का अपहरण कर लेती है. ये अपहरण उसी दिन होता है जब खालू को ठेंगा दिखाकर बेगम पारा जान मोहम्मद से शादी करने का फ़ैसला कर लेती है. उसके बाद क्या होता है मुनिया बेगम पारा का अपहरण क्यों करवाती है क्या जान मोहम्मद अपनी होने वाली पत्नी बेगम पारा को उसके चंगुल से बचा पाता है खालू और बब्बन का आख़िर में क्या होता है यही फ़िल्म की कहानी है. दराब फ़ारुक़ी की कहानी में कुछ दिलचस्प मोड़ हैं लेकिन कुल मिलाकर देखें तो ये बचकानी नज़र आती है. ड्रामा ज़्यादा प्रभाव पैदा नहीं कर पाया है. फ़िल्म के आख़िर में दर्शक ठगा हुआ महसूस करते हैं क्योंकि बेगम पारा का किरदार अपने लक्ष्य को हासिल ही नहीं कर पाता. बेगम पारा क्या हासिल करना चाहती है यहां पर ये बताना ठीक नहीं होगा क्योंकि यही फ़िल्म का सस्पेंस है. विशाल भारद्वाज और अभिषेक चौबे का स्क्रीनप्ले बेहद धीमी गति से आगे बढ़ता है और पेचीदा है क्योंकि कहानी बार-बार फ़्लैशबैक में चली जाती है. लेकिन कहानी में कुछ बेहद दिलचस्प मौक़े आते हैं. ख़ासतौर से बब्बन और खालू के बीच के कुछ दृश्य बेहद मनोरंजक बन पड़े हैं. जान मोहम्मद विजय राज़ के भी कई दृश्य मज़ेदार हैं. लेकिन फ़िल्म में ऐसे मे कम ही आते हैं. फ़िल्म की शुरुआत में ही दर्शकों को पता चल जाता है कि हर किरदार एक दूसरे को बेवक़ूफ़ बनाने में लगा है. इस वजह से फ़िल्म में अनिश्चितता जैसी कोई बात ही नहीं दिखती. फ़िल्म का क्लाइमेक्स भी बेहद निराशाजनक है. विशाल भारद्वाज के लिखे डायलॉग अच्छे हैं लेकिन फ़िल्म में क्लिष्ट उर्दू का प्रयोग इसकी अपील पर विपरीत प्रभाव डालेगा. खालू के किरदार में नसीरुद्दीन शाह लाजवाब रहे हैं. वो एक ठग के रोल में पूरी तरह से घुस गए हैं और ज़बरदस्त कॉमेडी की है. माधुरी दीक्षित नेने बहुत ख़ूबसूरत भी लगी हैं और उनकी अदाकारी भी ज़बरदस्त रही है. फ़िल्म में उन्होंने जो गहने और ड्रेसेस पहने हैं वो नए फ़ैशन ट्रेंड को जन्म दे सकते हैं. हुमा क़ुरैशी ने भी बड़ा संतुलित अभिनय किया है. विजय राज़ ने भी बेहतरीन अभिनय किया है. मनोज पाहवा अपने रोल में अच्छे रहे हैं. मुश्ताक़ के रोल में सलमान शाहिद की भी तारीफ़ करनी होगी. बाकी कलाकार भी बहुत उम्दा रहे हैं. अभिषेक चौबे का निर्देशन अच्छा है लेकिन फ़िल्म एक सीमित दर्शक वर्ग को ही अपील कर पाएगी. लेखक और निर्देशक के तौर पर वो फ़िल्म में और कसावट ला सकते थे. विशाल भारद्वाज का संगीत अच्छा है लेकिन सुपरहिट गानों की कमी है. इश्क़िया में दो सुपरहिट गाने थे इब्नेबतूता और दिल तो बच्चा है जी वैसे गाने डेढ़ इश्क़िया में नहीं हैं. गुलजार के गाने भी एक ख़ास किस्म के श्रोता को ही पसंद आएंगे. कुल मिलाकर डेढ़ इश्क़िया एक उबाऊ फ़िल्म है. युवा वर्ग को लुभाने के लिए फ़िल्म में कुछ ख़ास नहीं है. फ़िल्म की कहानी और उर्दू डायलॉग एक ख़ास दर्शक वर्ग को ही पसंद आएंगे. |
| DATE: 2014-01-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1213] TITLE: पापा कमल हासन को बेटी श्रुति का इनकार |
| CONTENT: कमल हासन जैसे बड़े सितारे की फ़िल्म में कोई हीरोइन काम करने से इनकार कर दे यह सुनकर हैरानी हो सकती है. बात तब और दिलचस्प हो जाती है जब यह इनकार उनकी अपनी बेटी श्रुति हासन ने किया हो. कमल की आने वाली फ़िल्म उत्तम विलेन में श्रुति ने काम करने से कथित तौर पर मना कर दिया क्योंकि उनके पास डेट्स उपलब्ध नहीं हैं. अब कमल किसी दूसरे नए चेहरे को अपनी फ़िल्म में कास्ट करेंगे. यह फ़िल्म तमिल और कन्नड़ भाषा में बनेगी. फ़िलहाल कमल हासन इसकी स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं. मुंबई में गुरुवार देर शाम फ़िल्म डेढ़ इश्क़िया का प्रीमियर हुआ. इसमें बॉलीवुड के तमाम लोग और फ़िल्म से जुड़े कलाकार जैसे माधुरी दीक्षित हुमा क़ुरैशी और अरशद वारसी इकट्ठा हुए. हैरानी की बात तो यह थी कि फ़िल्म से जुड़े एक और मुख्य कलाकार नसीरुद्दीन शाह प्रीमियर में मौजूद नहीं थे. वैसे फ़िल्म के प्रमोशन में भी नसीर ज़्यादा नज़र नहीं आए और उन्होंने साफ़ तौर पर कहा भी कि प्रमोशन करना और ज़्यादा मीडिया से मुख़ातिब होना उनकी फ़ितरत नहीं. डेढ़ इश्क़िया शुक्रवार 10 जनवरी को रिलीज़ हुई है. अमिताभ बच्चन के टीवी गेम शो कौन बनेगा करोड़पति को ख़त्म हुए एक अरसा बीत चुका है लेकिन पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची में अब भी एक बड़ी इमारत पर अमिताभ बच्चन के इस शो का पोस्टर लगा हुआ है. इस पोस्टर को अभी तक हटाया नहीं गया है. यहां से गुज़रने वालों को इस विशालकाय होर्डिंग पर दूर से ही बच्चन का चेहरा नज़र आने लगता है. |
| DATE: 2014-01-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1214] TITLE: कार कंपनी ने क्या सोच कर सलमान को चुना ? |
| CONTENT: बीते सोमवार को अभिनेता सलमान ख़ान एक मशहूर कार कंपनी के नए मॉडल के लॉन्च पर पहुंचे. उन्हें इस कंपनी का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया है. सलमान ख़ान ने इस मौक़े पर कहा कृपया गाड़ी कभी भी तेज़ ना चलाएं. गाड़ी के तेज़ होने का मतलब ये नहीं है कि आप भी गाड़ी तेज़ चलाएं. गाड़ी के अंदर और बाहर वाले लोग सुरक्षित होने चाहिए. गाड़ी को सुरक्षित चलाने का संदेश देने वाले ये वही सलमान ख़ान हैं जिन पर लापरवाही से गाड़ी चलाने के मामले में हिट एंड रन केस चल रहा है. उन पर इस सिलसिले में ग़ैर इरादतन हत्या का मामला चल रहा है. अब सवाल ये उठता है कि एक मशहूर कार कंपनी ने एक ऐसे शख़्स को अपना ब्रांड एंबेसडर क्यों नियुक्त किया जिस पर लापरवाही से ड्राइविंग का इतना गंभीर मामला चल रहा हो. भले ही वो कितना लोकप्रिय क्यों ना हो. क्या ऐसा शख़्स लोगों को सुरक्षित कार चलाने का संदेश देने के लिए उपयुक्त है. सलमान पर चल रहे हिट एंड रन केस में सरकारी वकील आभा सिंह ने बीबीसी से कहा सलमान पर ग़ैर इरादतन हत्या का केस चल रहा है. इस मामले में उन्हें 10 साल तक की सज़ा हो सकती है. ऐसे में कार कंपनी का उन्हें ब्रांड एंबेसडर बनाने का फ़ैसला समझ से परे है. एक रोल मॉडल होकर वो ऐसे केस में फंसे हुए हैं तो कार निर्माता कंपनी को ये बात ध्यान में रखनी चाहिए थी. आभा सिंह ये भी कहती हैं कि एक मशहूर शख़्सियत होने के नाते सलमान पिछले 10 साल से लगातार बच रहे हैं वरना वो कभी के जेल में होते. वहीं मशहूर एड गुरू पीयूष पांडे इस बारे में कहते हैं देखिये उस कार कंपनी ने बड़ा सोच समझ के ही ये निर्णय लिया होगा. सलमान ख़ान की फ़िटनेस और उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें ब्रांड एंबेसडर बनाने का फ़ैसला ग़लत नहीं है. वो कहते हैं वैसे भी सलमान ख़ान को अभी तक दोषी नहीं क़रार दिया गया है वो अभी भी एक अभियुक्त हैं और उनपर मुक़दमा चल रहा है. तो ऐसे में उस कार कंपनी ने कानूनी सलाह लेकर ही सलमान ख़ान को अपना ब्रांड एंबेसडर बनाया है . सलमान ख़ान पर आरोप है कि साल 2002 में उनकी गाड़ी के नीचे आकर फुटपाथ पर सो रहे एक व्यक्ति की मौत हो गई थी लेकिन सलमान हमेशा ही इस आरोप से इनकार करते रहे हैं. अधिकारियों के मुताबिक 28 सितंबर 2002 को देर रात मुंबई के बांद्रा इलाके में सलमान ख़ान की गाड़ी अमरीकन एक्सप्रेस बेकरी में घुस गई. उस वक्त वहां फुटपाथ पर पांच लोग सो रहे थे जिनमें से 38 साल के नूरुल्लाह ख़ान की मृत्यु हो गई और तीन अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. एक अन्य व्यक्ति को मामूली चोट आई. सलमान पर शुरुआत में ग़ैर-इरादतन हत्या का आरोप लगा लेकिन उन्होंने इसे अदालत में चुनौती दी जिसके बाद आरोप घट कर लापरवाही की वजह से हत्या में तब्दील हो गया. दूसरे आरोप में दो साल की जेल की सज़ा का प्रावधान था. लेकिन मार्च 2011 में अभियोजन पक्ष ने ग़ैर-इरादतन हत्या का आरोप दोबारा लगाने की मांग की. इस साल फरवरी में अदालत ने आदेश दिया कि सलमान पर ग़ैर-इरादतन हत्या के आरोप में मुक़दमा चलना चाहिए जिसके बाद उन पर ये आरोप लगाया गया. पिछले ही महीने सलमान ख़ान की याचिका पर मुंबई की एक अदालत ने इस मामले में नए सिरे से सुनवाई का आदेश सुनाया. |
| DATE: 2014-01-08 |
| LABEL: entertainment |
| [1215] TITLE: अनुराग के साथ रिश्ते पर चुप हुमा |
| CONTENT: डेढ़ इश्क़िया में अरशद वारसी से इश्क़ लड़ाएंगी हुमा. हुमा क़ुरैशी इन दिनों सातवें आसमान पर हैं और ऐसा हो भी क्यों ना. माधुरी दीक्षित के साथ उनकी फ़िल्म डेढ़ इश्क़ियां जल्द रिलीज़ होने जा रही हैं. हुमा से इस फ़िल्म और उनकी निजी ज़िंदगी के बारे में चर्चा की बीबीसी की संवाददाता सुप्रिया सोगले ने. माधुरी के साथ डेढ़ इश्क़िया में दिखेंगी हुमा. माधुरी दीक्षित के साथ हुमा क़ुरैशी फ़िल्म डेढ़ इश्क़िया में नज़र आने जा रही हैं. उनके साथ प्रतिस्पर्धा की बात छिड़ी तो हुमा ने तुरंत बोला अगर आप मुझे बोलेंगे कि किसी दूसरी फ़िल्म में माधुरी हैं तो मैं तुरंत उस फ़िल्म को देखने के लिए जाऊंगी. माधुरी की तारफ़ी करते हुए उन्होंने आगे कहा वो एक महान अदाकारा हैं और मुझे नहीं लगता कि मैं माधुरी के साथ मुक़ाबला कर सकती हूँ मैं करना ही नहीं चाहती क्योंकि मैं उन्हीं को देखकर बड़ी हुई हूँ. सच कहूँ तो वो इतनी अच्छी और कमाल की इंसान हैं कि मुक़ाबले की भावना न तो उनके दिमाग़ में आई होगी और न ही किसी और के. और अगर आप फ़िल्मडेढ़ इश्क़िया देखेंगे तो हम सभी कलाकारों ने एक बराबर काम किया है और हम सबकी इस फ़िल्म में अहम भूमिकाएं है. सात फ़िल्म पुराने अपने फ़िल्मी करियर में हुमा ने सभी मल्टी स्टारर फ़िल्में की हैं. इनमें से कई फ़िल्मों में उन्हें दूसरी हिरोइन के साथ स्क्रीन शेयर करना पड़ा. ये पूछे जाने पर कि क्या दूसरी हिरोइन को देखकर या उनके साथ काम करके उन्हीं किसी तरह की इनसिक्योरिटी होती है हुमा कहती हैं मुझे नहीं लगता कि मैं इनसिक्योर पर्सन हूँ. अगर मैं कोई अच्छी परफॉर्मेंस देखती हूँ या किसी के साथ कुछ अच्छा होते देखती हूँ तो उससे प्रेरणा लेती हूँ. मैं एक मध्य वर्गीय परिवार से आती हूँ. जब आप कुछ करने का सपना देखते हैं और उसे पाने की सच्ची कोशिश करते हैं तभी आप कामयाब होते हैं. असुरक्षा की भावना आपको कहीं पहुंचने नहीं देती. हुमा कुरैशी गैंग्स ऑफ वासेपुर लव-शव ते चिकनखुराना एक थी डायन और डी-डे जैसी अलग-अलग शैली की फ़िल्में कर चुकी हैं. लेकिन सेक्स-कॉमेडी फ़िल्में करने के बारे में हुमा क्या सोचती हैं मैंने कभी किसी विशेष शैली की फ़िल्में करने के बारे में नहीं सोचा. मैं सभी तरह की फ़िल्में करना चाहती हूँ. अगर स्क्रिप्ट अच्छी है और फ़िल्म बनाने वाले लोग अच्छे हैं तो मैं ज़रूर काम करना चाहूँगी. फ़िल्म बनाना एक लम्बी प्रक्रिया है. अगर मैं किसी फ़िल्म के लिए हां कहती हूँ तो मुझे अगले छह से आठ महीने उन्हीं लोगों के साथ काम करना होगा. गर्ल नेक्स्ट डोर दिखने वाली हुमा क़ुरैशी का फ़िल्मी करियर तो काफ़ी अच्छा चल रहा है लेकिन उनकी निजी ज़िंदगी में कुछ विवाद जुड़ते रहे हैं. हुमा क़ुरैशी को लेकर गैंग्स ऑफ़ वासेपुर बनाने वाले निर्देशक अनुराग कश्यप और उनकी अभिनेत्री पत्नी कल्कि कोचलिन कुछ महीने पहले अलग हो गए. कथित तौर पर इसके पीछे वजह अनुराग कश्यप और हुमा के बीच बढ़ती नज़दीकियों को माना गया. हुमा इसपर खुलकर अपनी बात रखने से बचती ही दिखाई दीं. उनका कहना था मुझे इस मामले पर जो कहना था वो मैं कह चुकी हूँ. मुझे कभी भी इसपर और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी अगर पड़ी होती तो मैं ज़रूर साफ़ करती. |
| DATE: 2014-01-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1216] TITLE: हॉलीवुड में काम करना चाहते हैं नवाज़ुद्दीन |
| CONTENT: गैंग्स ऑफ वासेपुर और लंच बॉक्स जैसी फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा दिखा चुके एक्टर नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी इन दिनों अपनी आने वाली फ़िल्म मिस लवली को लेकर खासे उत्साहित हैं. निर्देशक अश्मिन अहलूवालिया की फ़िल्म मिस लवली इस महीने भारत में रिलीज़ हो रही है. ये फ़िल्म दो भाइयों की कहानी है जो सी-ग्रेड फिल्में बनाते हैं. नवाज़ इस फ़िल्म में छोटे भाई के किरदार में नज़र आएंगे. ये फ़िल्म पिछले साल कान फ़िल्म फेस्टिवल और टोरंटो इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल के अलावा कई और जगहों पर रिलीज़ हो चुकी है जहां इसे काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिला था. अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी हॉलीवुड में एंट्री की तैयारी कर रहे हैं. हिंदी सिनेमा में ख़ुद को एक लीड एक्टर के तौर पर स्थापित करने में नवाज़ को 14 साल का लंबा समय लग गया लेकिन हॉलीवुड में वह अपनी एंट्री के लिए और देर नहीं करना चाहते. नवाज़ हॉलीवुड फ़िल्म निर्माताओं के संपर्क में हैं और जल्द ही किसी लीड रोल में नज़र आ सकते हैं. वह कहते हैं अभी बात हो रही है ऊपरवाले ने चाहा तो बहुत जल्दी आपको ख़बर मिल जाएगी. हॉलीवुड में भारतीय कलाकारों के काम करने का चलन काफी पुराना है. अनुपम खेर ओम पुरी अनिल कपूर ऐश्वर्या राय बच्चन मल्लिका शेरावत और इरफ़ान ख़ान तक हॉलीवुड फिल्मों में काम कर चुके हैं. हालांकि इनमें से बहुत कम कलाकारों को लीड रोल मिला है. नवाज़ुद्दीन से ये पूछने पर कि वह हॉलीवुड में किस तरह के रोल करना चाहते हैं वह कहते हैं मेरा ध्यान लीड रोल पर है चाहे वह इंटरनेशनल फ़िल्म हों या अपने देश की फ़िल्म. हमारे देश में काफी अच्छा सिनेमा बन रहा है. नवाज़ुद्दीन आगे कहते हैं मैं कोशिश करूंगा कि अगर मैं इंटरनेशनल फिल्में भी करता हूं तो लीड रोल करूं. अमूमन हमारे एक्टर्स वहां की फिल्मों में छोटे-मोटे रोल कर लेते हैं. मैं वह नहीं करना चाहता. आने वाले दिनों में नवाज़ अच्छी स्क्रिप्ट पर ही काम करना चाहते हैं फिर चाहे फ़िल्म किसी भी शैली की हो. पिछले साल आई फ़िल्म लंच बॉक्स में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की कॉमेडी दर्शकों को काफी पसंद आई थी. नवाज़ के मुताबिक वह सेक्स-कॉमेडी फ़िल्म में भी काम करना चाहेंगे बशर्ते फ़िल्म की स्क्रिप्ट दमदार हो और उनका किरदार वास्तविक हो. वह कहते हैं अगर एक अच्छा किरदार है लेकिन उसकी भाषा खराब है तो भी मैं करूंगा. क्योंकि वह सिर्फ एक किरदार है. अगर वह किरदार वास्तविक दुनिया में पाया जाता है लेकिन उसकी भाषा अभद्र है तो ऐसे किरदार करने में मेरी दिलचस्पी होगी बजाय इसके कि लोगों को हंसाने के लिए जोक लिखे जाएं. वह मुझसे शायद बहुत मुश्किल से होगा. |
| DATE: 2014-01-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1217] TITLE: सबसे कम आमिर की फ़ीस! |
| CONTENT: आमिर ख़ान की फ़िल्म धूम-3 भारत में ही नहीं विदेशों में भी ख़ूब धूम मचा रही है. आमिर ख़ान जिस फ़िल्म में भी काम करते है उस फ़िल्म से उनके फ़ैंस की उम्मीदें बढ़ जाती हैं. मिस्टर परफ़ेक्शनिस्ट कहे जाने वाले आमिर ख़ान ने बॉलीवुड फ़िल्मों में अपनी अलग ही पहचान बना ली है. शाहरुख़ सलमान और आमिर हमेशा से ही फ़िल्म निर्देशकों की पहली पसंद हैं और ये बात तो हम सभी जानते है कि इन्हें एक फ़िल्म के लिए कितने सारे पैसे मिलते हैं. लेकिन ख़ुद आमिर ख़ान कहते है कि मैं कभी पैसो के लिए काम नहीं करता. उन्होंने कहा आप सब को जान कर हैरानी होगी कि मैं सभी बॉलीवुड हीरो में से सबसे कम पैसा लेता हूँ. बाकि कलाकारो के मुक़ाबले मेरी फ़ीस सबसे कम है. मैं अच्छे रोल की तलाश में रहता हूँ न कि पैसे की. मैं अपने रोल के साथ समझौता नहीं कर सकता. बिग बॉस से अपनी पहचान बनाने वाली वीना मलिक हमेशा ही विवादों से घिरी रही हैं. वीना का नाम बॉलीवुड अभिनेत्री अमीषा पटेल के भाई अष्मित पटेल के साथ भी ख़ूब जुड़ा. एक बार फिर वीना का नाम विवादों से जुड़ गया है. पिछले दिनों शादी के बंधन में बंधी पाकिस्तानी अभिनेत्री वीना मलिक ने अपने पूर्व भारतीय मैनेजर प्रशांत सिंह पर ब्लैकमेलिंग का आरोप लगाया है. वीना का कहना है कि पैसों और सस्ती लोकप्रियता की ख़ातिर प्रशांत ने उनकी कुछ विवादास्पद तस्वीरें उनके हैक किए जा चुके फ़ेसबुक और ट्विटर अकाउंट पर डाल दी हैं. पिछले कुछ दिनों तक प्रशांत भारत में वीना के डिजिटल मीडिया का काम देखते थे. प्रशांत ने दावा किया था कि वीना उनकी गर्लफ्रेंड हैं. इस पर पाकिस्तानी अभिनेत्री ने कहा वो झूठ बोल रहा है. उसका ये दावा ग़लत है. वो मेरे भाई की तरह है और मुझे अपनी बहन की तरह प्यार करता था. वीना ने कहा कि वो अपनी शादी को लेकर इन दिनों व्यस्त थीं जिसकी वजह से फेसबुक और ट्विटर अकाउंट का पासवर्ड नहीं बदल सकीं. अब प्रशांत उनकी कुछ तस्वीरों को सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर डालकर उन्हें पैसों के लिए ब्लैकमेल कर रहा है. वीना के मुताबिक़ प्रशांत को उन्होंने दस हज़ार रुपये प्रतिमाह के वेतन पर नौकरी पर रखा था और तीन लाख रुपये एडवांस अदा किए थे. उन्होंने कहा कि प्रशांत के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई का रास्ता खुला है. रिएलिटी शो बिग बॉस में भाग ले चुकीं वीना ने हाल ही में दुबई के कारोबारी असद बशीर ख़ान खट्टक के साथ शादी रचाई है. बॉलीवुड की स्टाइल आइकॉन मानी जाने वाली कंगना रानाउत को फ़िल्में देखना बिलकुल पसंद नहीं है. कंगना ने अपनी ज़िन्दगी में सिर्फ 10 फिल्में देखी हैं जिसमें से 5 -6 उनकी ही फ़िल्में है. कंगना ने अनुष्का शर्मा कि फ़िल्म बैंड बाजा बारात देखी है. कंगना कहती हैं कि फिल्में देखना उन्हें बहुत थकाऊ लगता है और फ़िल्में उनके लिए मनोरंजन का साधन नहीं हैं. इसकी वजह वो अपनी परवरिश को बताती है जहां उन्हें टीवी और फ़िल्में देखने पर मनाही थी. |
| DATE: 2014-01-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1218] TITLE: फिर जी उठा है शरलॉक होम्स! |
| CONTENT: दुनिया भर में शरलॉक के चाहने वाले उनकी वापसी का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. शरलॉक के नए संस्करण की पहली कड़ी द एम्प्टी हर्स में प्रशंसकों ने देखा कि शरलॉक होम्स ने मौत को कैसे चकमा दिया. इससे पहले शरलॉक की स्क्रीनिंग में शरलॉक के मुख्य कलाकारों और रचनाकारों के साथ सवाल जवाब भी शामिल किए गए थे. शरलॉक के दूसरे संस्करण की अंतिम कड़ी द राइकेनबेक फॉल ब्रिटेन में जनवरी 2012 में दिखाई गई थी. इसे 30 फ़ीसदी यानी 79 लाख टीवी दर्शकों ने देखा और सराहा था. तब से इसका प्रसारण दो सौ से ज़्यादा देशों में किया जा चुका है. बज़फ़ीड जैसी सोशल साइटों पर फ़ॉलोअर्स के बीच शरलॉक के फिर से ज़िंदा हो उठने के क़िस्से छाए हुए हैं. ट्विटर पर भी शरलॉक की वापसी को लेकर प्रशंसक लगातार ट्वीट कर अपनी ख़ुशी ज़ाहिर कर रहे हैं. बीबीसी ने भी नई कड़ी के बारे में सात मिनट का प्रिक्वेल ऑनलाइन जारी किया है. बेनेडिक्ट कम्बरबैच ने शरलॉक होम्स का किरदार पर्दे पर बेहद जीवंतता से निभाया. सह-रचनाकार और लेखक मार्क गैटिस स्वीकार करते हैं कि पिछली कड़ी देखने के बाद लोगों में जगी उत्सुकता और उत्साह बरक़रार है. उस कड़ी में शरलॉक की मौत हो जाती है. वे बताते हैं हमें इसका अंदाज़ा बिलकुल नहीं था कि शरलॉक की मौत का उनके चाहने वालों पर ऐसा व्यापक असर होगा. गैटिस कुछ हल्के फुल्के अंदाज़ में कहते हैं शरलॉक को फिर से ज़िदा करने के कई तरीक़े हो सकते थे. मगर मुझे लगता है कि लोग उनकी वापसी कुछ रहस्यमय अंदाज़ में जैसे टारडिस यानी टाइम मशीन के ज़रिए चाहते हैं. मार्क गैटिस विज्ञान फंतासी टीवी कार्यक्रम डॉक्टर हू का लेखन कर चुके हैं. वो कहते हैं हमें शुरू से ही इस बात का एहसास था कि हम इसे कैसे करने वाले हैं. सबसे ख़ास बात है कि शरलॉक अपने दोस्त जान वॉटसन की बांहों में मरता है और फिर अदृश्य हो जाता है. डॉक्टर हू के कार्यकारी निर्माता और साथी सह-निर्माता स्टीवन मोफैट का कहना है कि शरलॉक की सफलता उनकी उम्मीदों से कहीं आगे पहुंच गई है. उन्होंने कहा मार्क और मुझे पता है कि हमारा शो बेहतरीन है. मगर हमें इसके मेगा हिट होने की उम्मीद नहीं थी. दुनिया भर में शरलॉक टीवी शो के किरदार अपनी सूझ-बूझ पैनी निगाहों और साहस के लिए चर्चित हुए. इसके दोनों सितारों बेनेडिक्ट कम्बरबैच शरलॉक होम्स और मार्टिन फ्रीमैन जॉन वॉट्सन ने हॉलीवुड में एक ख़ास मुक़ाम बना लिया. एपिसोड में जॉन और शरलॉक का पुनर्मिलन दिखाया गया है. शरलॉक के दूसरे संस्करण की अंतिम कड़ी प्रसारित होने के बाद पीटर जैकसन की दो सफल हॉबिट फ़िल्म में मार्टिन फ्रीमैन ने मशहूर बिल्बो बैगिन्स का किरदार निभाया जबकि कम्बरबैच ने द नेक्रोमेंसर और स्मॉग द ड्रैगन को आवाज़ दी. इन दोनों फ़िल्मों ने अब तक बॉक्स ऑफिस पर ख़ूब कमाई की. शरलॉक का मुख्य किरदार निभाने वाले कम्बरबैच बताते हैं कि द एम्पटी हर्स की स्क्रिप्ट जब उन्होंने पहली बार पढ़ी तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. शरलॉक की नई कड़ी में शरलॉक होम्स और जॉन के बीच के उलझे हुए रिश्ते में कुछ बदलाव दिखाए गए हैं. शरलॉक को गुज़रे दो साल हो चुके हैं और जॉन इस सच्चाई को अब तक स्वीकार नहीं कर पा रहा है. कम्बरबैच कहते हैं सबसे ज्यादा ज़ोर दो दोस्तों के मिलन पर दिया गया है. वे आगे बताते हैं जॉन भावनात्मक तूफानों से गुज़र रहे हैं. इन दृश्यों को काफ़ी मार्मिकता से फिल्माया गया है. शरलॉक की वापसी को दिखाना आसान नहीं था. वो कहते हैं शरलॉक लौट आया है. उसे लगता है कि बस अब वह कॉलर उठाएगा पलकें झपकाएगा और फिर किसी रोमांचक सफर पर निकल जाएगा. साल 2011 में जॉन वॉट्सन की भूमिका के लिए बाफ़्टा अवार्ड जीतने वाले फ्रीमैन कहते हैं कि वे इसकी अच्छाइयों के कारण शो से काफी जुड़ाव महसूस करते हैं. वे कहते हैं यह जॉन और शरलॉक दोनों के लिए काफ़ी अच्छा साबित हुआ. जितनी भी स्क्रिप्ट मैंने अब तक पढ़ी यह उन सबसे सबसे शानदार है. 100 साल का भी हो जाऊं पर यह किरदार निभाता रहूंगा. अमांडा अब्बिंगट्न शरलॉक में जॉन वॉट्सन की महिला मित्र बनी हैं. वे असल जीवन में उनकी पत्नी हैं. दोनों सितारों का कहना है कि सैकड़ों की संख्या में जुटे प्रशंसकों के सामने शरलॉक के इमारत से गिरने को फ़िल्माना उनके लिए बेहद ख़ास अनुभव रहा. फ्रीमैन इसे कुछ इन शब्दों में बयां करते हैं कुछ हट कर अनुभव था. यह अभिनय का नया अंदाज़ था महज़ नाटक या फ़िल्मांकन नहीं था. पहली कड़ी में शरलॉक के भाई माइक्राफ्ट के रूप में गैटिस की वापसी होती है. इस एपिसोड में जॉन की महिला मित्र मैरी का किरदार निभा रही हैं फ्रीमैन की असली ज़िंदगी की साथी अमांडा अब्बिंगटन. पर्दे पर यह उनका पहला क़दम है. नए संस्करण की पहली कड़ी द एम्पटी हर्स बीबीसी वन पर 1 जनवरी को प्रसारित हुई है. |
| DATE: 2014-01-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1219] TITLE: फिल्म स्टूडियोज़ः कल चमन था, अब उजड़ा दयार! |
| CONTENT: वी शांताराम की सभी फ़िल्मों की शूटिंग राजकमल स्टूडियो में हुई. भारतीय सिनेमा ने साल 2013 में अपने सौ साल पूरे कर लिए. इस दौरान कई अविस्मरणीय फ़िल्में बनीं जिनकी शूटिंग हुई कई फ़िल्म स्टूडियोज़ में. महबूब आर के फ़िल्मिस्तान जैसे स्टूडियो में कई फ़िल्मों की शूटिंग हुई. इनमें से कई स्टूडियो ने बदलते वक़्त के साथ अपने आपको ढाला और तकनीक तौर पर उन्नत बनाया. लेकिन जो स्टूडियो ऐसा नहीं कर सके वो आज खस्ताहाल हैं. जाने माने फ़िल्मकार वी शांताराम ने 1942 में पुणे के प्रभात स्टूडियो को छोड़कर मुंबई के परेल इलाके में बसे वडिआ मूवी टाउन को ख़रीदा और उसे राजकमल कलामंदिर का नाम दिया. शकुंतला वो पहली फ़िल्म थी जिसकी यहां शूटिंग हुई. ये फ़िल्म सिनेमाघरों में तक़रीबन साल भर चली. इस स्टूडियो में वी शांताराम ने अपनी हर फ़िल्म की शूटिंग यहां की जैसे डॉक्टर. कोटनिस की अमर कहानी कहानी दहेज़ झनक झनक पायल बाजे भारत की पहली टेक्नीकलर फ़िल्म नवरंग वगैरह. वी शांताराम के अलावा कई और फ़िल्मकारो ने इस स्टूडियो में काम करना शुरू किया. बीआर चोपड़ा ने अपनी फिल्मों की शूटिंग यहां शुरू की. उनके छोटे भाई यश चोपड़ा को वी शांताराम अपने बेटे जैसा मानते थे. यश चोपड़ा ने बतौर निर्देशक अपनी पहली फ़िल्म धूल का फूल से लेकर आख़िरी फ़िल्म जब तक है जान का कुछ ना कुछ हिस्सा इस स्टूडियो में ज़रूर शूट किया. सत्यजीत रे राज कपूर मनमोहन देसाई हृषिकेश मुखर्जी शक्ति सामंत सुभाष घई और श्याम बेनेगल जैसे कई निर्देशकों ने यहां अपनी फ़िल्मो की शूटिंग की. 1975 की क्लासिक शोले की डबिंग भी राजकमल स्टूडियो में ही हुई. अब इस स्टूडियो की बागडोर वी शांताराम के बेटे किरण शांताराम के हाथों में है. फिलहाल यहां ज़्यादा फ़िल्मों की शूटिंग नहीं होती. बॉलीवुड के कई कलाकार मुंबई के उपनगरों में बस गए हैं और बेहद दूर स्थित होने की वजह से यहां आना लोग पसंद नहीं करते. इस वजह से यहां उतना काम नहीं होता. लेकिन किरण शांताराम को इससे कोई शिक़ायत नहीं है. वो ख़ुश हैं कि अपने पिता की ऐतिहासिक धरोहर को उन्होंने संभाल कर रखा हुआ है. बस अब वो कोशिश कर रहे हैं अपने पिता द्वारा इस्तेमाल की गई चीज़ों का म्यूज़ियम बनाने की. फ़ेमस स्टूडियो में गुरुदत्त की ज़्यादातर फ़िल्मों की शूटिंग हुई. देश के बंटवारे के वक़्त ये स्टूडियो रुंगटा परिवार के हिस्से में आया. शुरुआती दौर में गुरु दत्त जे बी प्रकाश और शक्ति सामंत जैसे कई फ़िल्मकारों के दफ़्तर भी यहीं थे. यहां प्यासा नीलकमल और सीआईडी जैसी कई फ़िल्मों की शूटिंग भी हुई. लेकिन 1985 के बाद से यहां शूटिंग बहुत कम हो गई. अब यहां फ़िल्मों की शूटिंग ना के बराबर होती है क्योंकि फ़िल्मसिटी स्टूडियो के अस्तित्व में आने के बाद ज़्यादातर फ़िल्मों की वहीं शूटिंग होती है. फ़ेमस स्टूडियो में ज़्यादातर टीवी कार्यक्रमों और विज्ञापन फ़िल्मों की शूटिंग ही होती है. 2012 में रिलीज़ हुई ऋतिक रोशन की अग्निपथ और 2013 में आई आशिक़ी-2 के कुछ हिस्सों की ज़रूर यहां शूटिंग हुई. अब यहां पुरानी फ़िल्मों का रिस्टोरेशन यानी पुनरुद्धार होता है. हाल ही में यहां पाकीज़ा मिस्टर इंडिया शोले और वो सात दिन जैसी फ़िल्मों का रिस्टोरेशन किया गया. राजकमल स्टूडियो में एक रिकॉर्डिंग के दौरान गायक किशोर कुमार के साथ वी शांताराम. मुंबई के अंधेरी इलाके में स्थित इस स्टूडियो की स्थापना शशाधर मुखर्जी ने साल 1958 में की थी. उन्होंने यहां दिल देके देखो लव इन शिमला और लीडर जैसी फ़िल्मों की शूटिंग की. फ़िलहाल इसकी बागडोर शशाधर मुखर्जी के पोते और अभिनेता जॉय मुखर्जी के बेटे मोन्जॉय मुखर्जी संभाल रहे हैं. मोन्जॉय बताते हैं कि जब वो छोटे थे तब यहां आते थे उस वक़्त ये बहुत बड़ा स्टूडियो हुआ करता था जहां घोड़े शेर बाघ जैसे जानर भी शूटिंग के लिए उपलब्ध होते थे. फ़िलहाल यहां फ़िल्मों और टीवी सीरियलों की शूटिंग चलती है. मोन्जॉय मानते हैं कि अगर पुराने स्टूडियोज़ को टिके रहना है तो उन्हें ख़ुद ही फ़िल्म निर्माण में उतरना होगा. वो सिर्फ़ दूसरों की फ़िल्मों के सहारे ज़िंदा नहीं रह सकते. भट्ट कैंप की ज़्यादातर फ़िल्मों की शूटिंग फ़िल्मालय में ही होती है. पहले मॉडर्न स्टूडियो के नाम से जाने जाना वाला इस स्टूडियो को 1968 में शक्ति सामंत आत्माराम प्रमोद चक्रवर्ती रामानंद सागर और एफ़ सी मेहरा ने साथ मिलकर ख़रीद लिया और नाम दिया नटराज स्टूडियो. इन पांच फ़िल्मकारों की फ़िल्मों का काम यहीं पर होता था. कई मशहूर फ़िल्में जैसे आराधना आरज़ू जुगनू और तुमसे अच्छा कौन है की शूटिंग नटराज में ही हुई. शक्ति सामंत के बेटे अशीम सामंत बताते हैं कि साल 2000 के आस-पास आर्थिक तंगी की वजह से ये स्टूडियो बेचना पड़ा. इसके आख़िरी दौर में यहां अक्षय कुमार की फ़िल्म बारूद और टीवी सीरियल अंतरिक्ष की शूटिंग हुई थी. अशीम फ़िलहाल अपने पिता शक्ति सामंत के बैनर को किसी कॉर्पोरेट हाउस के साथ मिलकर पुनर्जीवित करना चाहते हैं. अब ज़्यादातर फ़िल्मों की शूटिंग फ़िल्म सिटी स्टूडियो में होती है. 1977 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा अधिकृत ज़मीन पर बना ये स्टूडियो मुंबई के उपनगर गोरेगांव में स्थित है. अब ज़्यादातर फ़िल्मों की शूटिंग यहीं पर होती है. इसे दादा साहब फालके नगर भी कहा जाता है. इस स्टूडियो में कई रिकॉर्डिंग स्टूडियोज़ थिएटर्स तालाब बगीचे और एक बेहद बड़ा खुला मैदान है. |
| DATE: 2014-01-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1220] TITLE: क्या शादीशुदा हैं जॉन अब्राहम? |
| CONTENT: बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता जॉन अब्राहम ने इस नए साल पर उनके सभी फैंस को एक चौंका देने वाली ख़बर दी है. आज सुबह ठीक चार बजकर तीन मिनट पर जॉन ने ट्विटर पर अपने सभी फैंस को नए साल की बधाई देते हुए लिखा आप सभी और आपके परिवार वालों को साल 2014 बहुत-बहुत मुबारक हो. ये साल आपके जीवन में प्यार और बहुत सारी खुशियां लाएं. लव जॉन और प्रिया अब्राहम. अब जॉन के इस ट्वीट के बाद ये कहना आसान भी है और मुश्किल भी कि क्या जॉन अब्राहम की शादी उनकी लम्बे समय से गर्लफ्रेंड रही प्रिया रुंचल से हो गयी है ग़ौरतलब है कि प्रिया रुंचल से पहले अभिनेता जॉन अब्राहम का अभिनेत्री बिपाशा बासु के साथ काफी लम्बा रिलेशनशिप रहा था. हिंदी सिनेमा की सबसे कामयाब फ़िल्मों में से एक शोले के निर्देशक रमेश सिप्पी अपनी 1975 सुपर हिट फ़िल्म शोले के 3D रूपांतरण के रिलीज़ पर रोक लगाने के लिए गुरुवार को पहुचे सुप्रीम कोर्ट. वह अपने भतीजे शाशा सिप्पी के ख़िलाफ़ कॉपीराइट का मुक़दमा दायर कर रहे हैं. बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जिसमे फ़िल्म शोले 3D की रिलीज़ को हरी झंडी दी रमेश सिप्पी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है. भारत के चीफ़ जस्टिस पी सदाशिवम की बेंच इस मुद्दे पर फ़ैसला लेगी. शाशा सिप्पी जो रमेश सिप्पी के भाई विजय सिप्पी के बेटे हैं का कहना है कि वह वर्ष 2000 में बनी शोले मीडिया एंड एन्टरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड का हिस्सा है और रमेश सिप्पी ने इससे पहले कभी भी कॉपीराइट का मुद्दा नहीं उठाया. तब भी जब इस फ़िल्म का कमर्शियल इस्तेमाल किया जा रहा था. उनका अपना घर चेन्नई में है और वो मुम्बई में किराए के घर में रहते हैं जिसकी मालकिन हैं ख़ूबसूरत अदाकारा श्रीदेवी. पिछले कुछ साल से वो श्रीदेवी के किराएदार थे. हाल ही में श्रीदेवी के घर में आग लगी थी जिसके कारण निर्देशक प्रभु देवा ने तुरंत वो फ्लैट खाली कर दिया और श्रीदेवी को सौंप दिया. इस नए साल में प्रभु देवा मुम्बई में अपना नया घर तलाश रहे हैं और फ़िलहाल वो चेन्नई में रह रहे हैं. बेहतरीन अदाकारी के लिए जाने जाने वाले दिवंगत अभिनेता फ़ारूक़ शेख़ की आख़िरी फ़िल्म क्लब 60 आज मुम्बई और दिल्ली के थिएटर में पुनः रिलीज़ होगी. शेख़ का हाल में निधन हो गया था. क्लब 60 के डायरेक्टर संजय त्रिपाठी ने बताया कि छह दिसंबर को फ़िल्म रिलीज़ हुई और धूम 3 की रिलीज़ से पहले तक रोज़ाना इस फ़िल्म के छह शोज होते थे. उन्होंने बताया कि फ़ारूक़ साहब की अकस्मात मृत्यु के बाद फ़िल्म के बारे में काफ़ी पूछताछ हुई तो मैंने अपने डिस्ट्रीब्यूटर से कहा कि अगर इस फ़िल्म को हम दोबारा रिलीज़ कर सकें तो बहुत अच्छा रहेगा. उन्होंने कहा हमें खुशी है कि PVR ने हमारी भावनाएं समझी और फ़िल्म क्लब 60 को आज फिर से रिलीज़ किया ताकि फ़ारूक़ साहब के चाहने वाले उनकी यह आख़िरी फ़िल्म फिर से देख सकें. |
| DATE: 2014-01-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1221] TITLE: फ़रवरी में होगी रानी मुखर्जी-आदित्य चोपड़ा की शादी ? |
| CONTENT: क्या आदित्य चोपड़ा और रानी मुखर्जी फ़रवरी तक शादी के बंधन में बंध जाएंगे अरविंद केजरीवाल से प्रभावित अनिल कपूर अब क्या करने वाले हैं और किस एक्टर को लगा निर्माता बनने का चस्का. पढ़िए ख़बरें मुंबई डायरी में. लंबे समय से बॉलीवुड में अगर किसी संभावित शादी की चर्चा हो रही है तो वो है अभिनेत्री रानी मुखर्जी और निर्माता आदित्य चोपड़ा की शादी. दोनों के बीच लंबे समय से नज़दीकियों की बातें सामने आ रही हैं. आदित्य चोपड़ा के अपनी पत्नी पायल से तलाक के पीछे भी वजह कथित तौर पर रानी मुखर्जी से उनकी दोस्ती ही बताई गई. रानी चोपड़ा परिवार के हर समारोह में देखी जाती हैं. अब मनोरंजन जगत से आ रही ख़बरों के मुताबिक़ साल 2014 के फ़रवरी महीने में दोनों शादी के बंधन में बंध सकते हैं. और शादी जोधपुर में होने की संभावना है. दिल्ली विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने वाले अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी से बॉलीवुड भी ख़ासा प्रभावित है. ख़बरें हैं कि हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री बने केजरीवाल से प्रेरणा लेकर अनिल कपूर अपनी ही फ़िल्म नायक के सीक्वल की तैयारियां कर रहे हैं. साल 2001 में रिलीज़ हुई नायक में अनिल कपूर ने एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका बनाई थी जिसे एक दिन का मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा मिलता है. अनिल कपूर के मुताबिक़ केजरीवाल की जीत से लेखकों को फ़िल्म की कहानी को पिरोने में मदद मिलेगी. नायक-2 की कहानी पर अभी काम चल रहा है फ़िल्म की शूटिंग 2015 में शुरू होगी. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर कहानी और लंचबॉक्स जैसी फ़िल्मों से अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी अब निर्माता बन गए हैं. नवाज़ुद्दीन ने अपने भाई शम्सुद्दीन की फ़िल्म मियां कल आना का निर्माण किया है. फ़िल्म को उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में शूट किया गया है. फ़िल्म गांवों में औरतों के हालातों को बयां करती हैं जहां उन्हें अपने ख़ुद के फ़ैसले लेने का भी कोई हक़ नहीं है. |
| DATE: 2013-12-31 |
| LABEL: entertainment |
| [1222] TITLE: 'शोले' देखकर भावुक हुए सनी देओल |
| CONTENT: साल 1975 की सुपरहिट फ़िल्म शोले को थ्री डी रूप में देखकर फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले धर्मेंद्र के बेटे सनी देओल भावुक हो गए. फ़िल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग देखने पहुंचे सनी देओल ने कहा कि ये फ़िल्म युवा फ़िल्मकारों और कलाकारों के लिए एक मिसाल है. सनी देओल ने राजकमल स्टूडियो में इसका ख़ास शो देखने के बाद पत्रकारों से कहा ये एक ऐसी फ़िल्म है जिससे सारा देश जुड़ा हुआ है. पूरी फ़िल्म के दौरान मैं बहुत भावुक हो गया था. घर जा कर मैं पापा को झप्पी दूंगा. उनसे जब पूछा गया कि इस दौर के कौन से कलाकार हैं जो जय अमिताभ बच्चन और वीरू धर्मेंद्र के किरदार निभाने के लिए फ़िट हैं. जिसके जवाब में सनी ने कहा पापा और अमित जी ने जो काम किया है वैसा काम तो हम लोग कभी कर ही नहीं सकते. इसलिए इस बात का कोई जवाब नहीं दिया जा सकता. सनी देओल ने कहा कि नई फ़िल्मों को देखते देखते लोगों का ध्यान इधर-उधर भटक जाता है लेकिन शोले तो शुरू से आख़िर तक बांधे रखती है. उन्होंने कहा इस फ़िल्म को देखकर हम आज के कलाकारों को अपने काम पर शर्म आ जाती है कि हम क्या हैं. शोले का कोई जवाब नहीं. पापा अमित जी अमजद जी संजीव जी ने क्या कमाल का काम किया है. पूरी फ़िल्म ही ज़बरदस्त है. लोगों को इसे देखकर सीखना चाहिए कि फ़िल्म बनाई कैसे जाती है. इस स्पेशल स्क्रीनिंग पर पहुंचे फ़िल्मकार डेविड धवन ने भी शोले से जुड़े अपनी यादें ताज़ा की. उन्होंने कहा ये फ़िल्म बेमिसाल है. इस फ़िल्म की हर बात निराली है चाहे जय-वीरू की दोस्ती या वीरू-बसंती का रोमांस. हॉलीवुड को ये बॉलीवुड का जवाब है. शोले से कोई भी फ़िल्म बराबरी नहीं कर सकती. फ़िल्म को थ्री डी में बदला गया है और इसका ये संस्करण तीन जनवरी को रिलीज़ हो रहा है. फ़िल्म के निर्देशक रमेश सिप्पी इसे थ्री डी में बदलने के फ़ैसले से ज़्यादा ख़ुश नहीं हैं लेकिन फ़िल्म से जुड़े कलाकारों और फ़िल्म के लेखक सलीम-जावेद ने इस पहल का स्वागत किया है. |
| DATE: 2013-12-31 |
| LABEL: entertainment |
| [1223] TITLE: अभिनेत्री सुचित्रा सेन की हालत गंभीर |
| CONTENT: बंगाली और हिंदी फ़िल्मों की जानी-मानी अभिनेत्री सुचित्रा सेन की हालत बेहद गंभीर है. 82 वर्षीय सुचित्रा कोलकाता के एक अस्पताल में भर्ती हैं. डॉक्टरों के मुताबिक़ उनके फेफड़ों में पानी भर गया है और उन्हें लगातार ऑक्सीज़न मुहैया कराई जा रही है. सुचित्रा मधुमेह से भी पीड़ित हैं. इस वजह से उनकी सेहत ज़्यादा बिगड़ी. डॉक्टरों की एक टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही है सुचित्रा पिछले कई सालों से एक गुमनाम ज़िंदगी बिता रही हैं. वो कोलकाता स्थित अपने घर में ही ज़्यादातर वक़्त बिता रही थीं. उन्हें लंबे समय से सार्वजनिक तौर पर देखा ही नहीं गया. उन्होंने 1952 में बंगाली फ़िल्म शेष कोथाय से अपना करियर शुरू किया और कई मशहूर फ़िल्में कीं. उन्होंने हिंदी फ़िल्मों में भी यदा-कदा काम किया पर उनकी असल पहचान बंगाली फ़िल्मों से ही बनी. बिमल रॉय की मशहूर फ़िल्म देवदास में उन्होंने पारो का किरदार निभाया. इस फ़िल्म में दिलीप कुमार मोतीलाल और वैजयंती माला जैसे मशहूर हिंदी फ़िल्म कलाकार भी थे. इसके अलावा वो 1966 की फ़िल्म बंबई का बाबू में देव आनंद के साथ नज़र आईं. सुचित्रा सेन को हिंदी फ़िल्म प्रेमी सबसे ज़्यादा जानते हैं 1975 में रिलीज़ हुई फ़िल्म आंधी से. गुलज़ार निर्देशित इस फ़िल्म में वो संजीव कुमार के साथ दिखीं. आंधी के गाने बेहद मशहूर रहे. फ़िल्म कामयाब भी रही और विवादित भी क्योंकि कथित तौर पर सुचित्रा का किरदार तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलता जुलता था. साल 1978 में रिलीज़ हुई बंगाली फ़िल्म प्रनॉय पाशा के बाद उन्होंने फ़िल्मों से संन्यास ले लिया और एक गुमनामी की ज़िंदगी जीने लगीं. उन्होंने लोगों से मिलना जुलना भी छोड़ दिया. कहा जाता है कि साल 2005 में उन्होंने प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार लेने से भी इनकार कर दिया क्योंकि वो किसी को नज़र नहीं आना चाहती थीं. |
| DATE: 2013-12-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1224] TITLE: जिसने रचा 'कौन बनेगा करोड़पति' |
| CONTENT: दूरदर्शन पर क्विज़-टाइम और बीबीसी वर्ल्ड टीवी पर यूनिवर्सिटी चैलेंज जैसे क्विज़ प्रोग्राम के क्विज़-मास्टर सिद्धार्थ बसु ने कैसे शुरूआत की अपने सवाल-जवाब वाले करियर की और कौन बनेगा करोड़पति शुरू करते वक्त वो ख़ुद क्यों नहीं बने उसके क्विज़मास्टरऐसे कई सवाल मेरे मन में थे जब मैं उनसे मिली बीबीसी मीडिया ऐक्शन के कार्यक्रम में जहां वो एक ऐसे बड़े विचारों के बारे में बोलने आए थे जो बदलाव की ताक़त रखता हो. ठीक समझा आपने - कौन बनेगा करोड़पति - साल 2000 में उनके प्रोडक्शन हाउस का ऐसा आइडिया जिसने उनकी और सैंकड़ों दर्शकों की ज़िन्दगी बदल दी. ज़ाहिर है हमारी बातचीत जितनी उनके जीवन के बारे में थी उतनी ही कौन बनेगा करोड़पति पर भी और सवालों की झड़ी लगी तो जवाबों में निकलीं कुछ अनजानी बातें. भारत के सबसे जाने-माने क्विज़मास्टर होने के बावजूद जब आपने कौन बनेगा करोड़पति शुरू किया तो उसकी मेज़बानी के लिए ख़ुद को क्यों नहीं चुनामैंने बहुत से क्विज़ शो किए लेकिन ये सब अंग्रेज़ी में थे. हिन्दी में मेरा हाथ तंग है और लोगों से जुड़ने के लिए इस शो का हिन्दी में होना ज़रूरी था. अमित जी को उस वक्त किसी ने टीवी पर नहीं देखा था ये हमारे लिए बहुत बड़ा फ़ैक्टर बना. मैं उनका शुक्रगुज़ार हूं और इसे अपनी अच्छी किस्मत समझता हूं कि वो ये शो करने को राज़ी हुए. उनकी जगह भी शाहरुख खान ही ले पाए जो बेहद हाज़िर जवाब शख्सियत हैं. वैसे भी मैं आईने में खुद को देखना पसंद नहीं करता हूं बल्कि दूसरों को निर्देशित करना और उनके साथ काम करना अच्छा लगता है. बतौर निर्माता-निर्देशक मेरे लिए सबसे रोमांचक अनुभव वो था जब साल 2000 में केबीसी शुरू हुआ था हम रात को सड़क पर निकलते थे सन्नाटा रहता था रास्ते खाली हो जाती थी रेस्तरां का बिज़नेस कम हो जाता था फ़िल्मों के नाइट शो में लोग कम जाते थे. बस नौ बजते ही कई घरों से केबीसी की सिग्नेचर ट्यून सुनाई पड़ती थी. वो अनुभव कुछ और ही था. कौन बनेगा करोड़पति लोगों से जुड़ा कार्यक्रम है इनटरैक्टिव है पर इसमें प्रतियोगियों की ज़िन्दगी पर बने वीडियो का इस्तेमाल करने का फ़ैसला किस सोच के तहत लिया गयादरअसल ये एक ऐसा शो था जो आपकी ज़िन्दगी बदल सकता था और इसीलिए भारत में इतना मशहूर भी हुआ. कौन बनेगा करोड़पति की इस सफलता पर ही विकास स्वरूप ने किताब लिखी. जब उस किताब पर फ़िल्म स्लमडॉग मिलियनेयर बनी तब ये ज़िन्दगी बदलने वाली बात एक झोंपड़ पट्टी में रहने वाले शख़्स के अमीर बनने की संभावना और भी बहुत रोमांचक लगने लगी. दुनियाभर में इस भावना को किसी ना किसी तरह से इस्तेमाल किया गया. पर हमने ये सबसे ज़्यादा किया केबीसी में. लोगों की कहानियों से ये खेल श्रोताओं के और नज़दीक आ गया. ये केबीसी का पुनर्जन्म था और इस शो को लंबे समय तक रोचक बनाए रखने के लिए हमें बदलाव करते रहना ज़रूरी भी है. पर केबीसी दस का दम और सच का सामना जैसे शो ने क्या क्विज़ के स्तर को हल्का कर दिया है सभी तरह के शो को देखने वाले लोग हैं. मैं जैसे क्विज़ करवाता था चाहे वो क्विज़-टाइम हो या यूनिवर्सिटी चैलेंज उसे देखने वाले कुछ लोग हैं पर केबीसी को देखने वाले करोड़ों हैं. वो क्विज़ शो करवाने में कोई पैसा लगाना चाहे तो ज़रूर वो बनाए जाएंगे पर इसमें कमाने के लिए पैसा नहीं है यानी वापस कुछ नहीं मिलेगा बस एक अच्छी और सकारात्मक सोच को बढ़ावा मिलेगा. उदाहरण के तौर पर ऐसे समझें कि किसी ख़ास क्विज़ शो को देखने वाले लोगों की तादाद या व्यूरशिप का अनुमान होता है 30000 जबकि केबीसी का व्यूरशिप तीन करोड़ होता है. आप समझते हैं कि आपकी हिन्दी अच्छी नहीं है पर मद्रास कैफ़े और बॉम्बे वेलवेट के निर्देशक ऐसा नहीं सोचते. 58 साल की उम्र में आपने बड़े पर्दे का रुख कैसे कियामद्रास कैफ़े पर शूजीत लंबे समय से काम कर रहे थे. उन्हें एक ऐसे शख़्स की तलाश थी जो क़रीब मेरी उम्र का दिखता हो और बाल उड़ गए हों. वो मेरे दोस्त भी हैं. शायद उन्हें ये भी लगता था कि मैं जिस अंदाज़ में क्विज़ में सवाल पूछता था वो रौब या अंदाज़ उस पात्र के लिए सही था. वो एक नया चेहरा चाहते थे और डॉयलॉग्स में हिन्दी भी कम थी. तो बस वो कर लिया. और उसकी डबिंग ख़त्म ही की थी कि अनुराग कश्यप का फ़ोन आया कि मैं उनकी अगली फ़िल्म में हूं और आकर स्क्रिप्ट देखूं-सुनूं. बॉम्बे वेलवेट में मेरा रोल बहुत छोटा है एक वकील का पर उस फ़िल्म का कैनवस बहुत बड़ा है पीरियड फ़िल्म है और 11 गानों के साथ एक म्यूज़िकल भी. आपने नाटकों में काम किया क्विज़-मास्टर बने निर्माता-निर्देशक और अब अभिनेता इसमें से क्या करने में आपकी सबसे ज़्यादा रुचि थी सबसे ज़्यादा जुड़ाव रहा थिएटर से लेकिन उसमें जीविका नहीं थी. मेरे पीछे परिवार की कोई पुश्तैनी जायदाद भी नहीं थी. एक साल तक कोशिश की सिर्फ नाटक करने की पर गुज़ारा नहीं हुआ. दिल्ली के सेंट स्टीफन्स कॉलेज में पढ़ाई करते हुए मैंने नाटक किए. बैरी जॉन के साथ काम किया. फिर कुछ डॉक्यूमेंट्री बनाईं. आखिरकार एक होटल में काम किया. ये मेरी एकमात्र नौकरी थी दो साल के लिए इवेंट्स मैनेजर के तौर पर. उसी दौर में कभी कोई बीमार पड़ जाता था तो मुझे बुला लेते थे अनाउंसमेंट करने के लिए. ऐसे ही लोगों ने एनाउंसर के तौर पर मेरा काम जाना और फिर एक दिन फोन आया कि दूरदर्शन मुझसे एक क्विज़ शो होस्ट कराना चाहते थे. तो कभी सोचा नहीं था पर वहीं से सवालों के सफर की शुरुआत हो गई. और अब आपका अगला पड़ाव क्या होगा कोई ऐसा काम जिसे करने की इच्छा हमेशा रही हो. मैं प्रश्न चिन्ह से आगे बढ़ना चाहता हूं. एक ज़िन्दगी जिसमें सवालों के लिए कोई जगह ना हो. वो क्या होगा ये मैं नहीं जानता पर मैं उस अनुभव के रोमांच के लिए तैयार हूं. |
| DATE: 2013-12-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1225] TITLE: अमिताभ के बंगलों की सुरक्षा बढ़ाई गई |
| CONTENT: क्यों बढ़ाई गई अमिताभ बच्चन के घर की सुरक्षा सोनाक्षी सिन्हा का क़बूलनामा और धूम-3 ने बनाया इतिहास कृष-3 और चेन्नई एक्सप्रेस को छोड़ा पीछे. पढ़िए ख़बरें आज की मुंबई डायरी में. मुंबई में पुलिस ने बॉलीवुड स्टार अमिताभ बच्चन के तीनों बंगलों पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है. ये फैसला उनके घर के बाहर हुए हालिया प्रदर्शनों को देखते हुए लिया गया है. पिछले दिनों अमिताभ बच्चन महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे के साथ एक कार्यक्रम में मंच पर एक साथ दिखाए दिए थे. इसके बाद मुंबई में समाजवादी पार्टी के नेता अबु असीम आज़मी ने कहा था कि अमिताभ ने राज ठाकरे के साथ मंच साझा कर उत्तर भारतीयों के साथ धोखा किया है. इसके बाद अमिताभ के घर के बाहर समाजवादी पार्टी ही नहीं बल्कि बहुजन समाज पार्टी के समर्थकों ने प्रदर्शन किए. राज ठाकरे मुंबई में रहने वाले उत्तर भारतीयों के खिलाफ़ मुहिम चलाते रहे हैं. मुंबई में जुहू पुलिस थाने के सूत्रों ने बीबीसी को बताया कि अमिताभ के बगंलों जलसा प्रतीक्षा और दफ्तर जनक पर सुरक्षा बढ़ा दी है. एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा ने माना है कि फ़िल्मी परिवार से होने की वजह से उन्हें बॉलीवुड में आसानी से एंट्री मिल गई. सोनाक्षी ने माना कि उनके पिता शत्रुघ्न सिन्हा का स्थापित अभिनेता होना उनके लिए सहायक साबित हुआ. लेकिन सोनाक्षी ने ये भी कहा कि फ़िल्मों में प्रवेश मिलना ही काफ़ी नहीं होता बल्कि अपने आपको साबित करना पड़ता है. उन्होंने कहा कि कड़ी मेहनत करके उन्होंने जो कामयाबी हासिल की है उसका श्रेय उन्हें मिलना ही चाहिए. हालांकि साल 2013 सोनाक्षी के लिए बॉक्स ऑफ़िस के लिहाज़ से बहुत अच्छा साबित नहीं हुआ. उनकी लुटेरा वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई-दोबारा और बुलेट राजा जैसी फ़िल्में फ़्लॉप हो गई. सिर्फ़ दिसंबर में रिलीज़ हुई आर राजकुमार ही बॉक्स ऑफ़िस पर चल पाई जिसमें उनके हीरो शाहिद कपूर थे. आमिर ख़ान की धूम-3 बॉक्स ऑफ़िस पर सबसे ज़्यादा तेजी से 200 करोड़ रुपए की कमाई करने वाली फ़िल्म बन गई है. फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक़ धूम-3 ने रिलीज़ के नौ दिनों के भीतर ही भारतीय बॉक्स ऑफ़िस पर 200 करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर लिया. इसी साल रिलीज़ हुई ऋतिक रोशन की कृष-3 को इतनी कमाई करने में नौ दिन और शाहरुख़ ख़ान की चेन्नई एक्सप्रेस को 15 दिन लग गए थे. धूम-3 भारत की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म आसानी से बन सकती है. इस वक़्त ये रिकॉर्ड कृष-3 के नाम पर है जिसने विशेषज्ञों के मुताबिक़ कुल मिलाकर 244 करोड़ रुपए की कमाई की है. |
| DATE: 2013-12-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1226] TITLE: रिएलिटी टीवी शो बिग बॉस-7 रहा बेहद ख़ास |
| CONTENT: शुरुआती दौर से ही बिग बॉस सीज़न-7 का शो अखाड़े का मैदान बना जहां एंडी और अरमान तो कभी अरमान और कुशाल लड़ते दिखे. हद तो तब हो गई जब इस घर के अंदर अरमान और सोफ़िया का झगड़ा पुलिस स्टेशन पहुंच गया. लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ कुशाल-गौहर के प्रेम प्रसंग और अरमान-तनिशा के क़रीबी सीन तक इस सीज़न ने अपने नाम कई नए-नए विवाद जोड़े. सातवें सीज़न में जो कंटेस्टेंट्स आए उनके नाम पहले से ही कई विवाद से जुड़े हुए थे लेकिन शो में आने के बाद तो जैसे उन्होंने विवादों की नई इबारत ही लिख डाली. अरमान का बात-बात में ग़ुस्सा होकर चिल्लाना जहां बिग बॉस के पूर्व सीज़न की कंटेस्टेंट डॉली बिंद्रा की याद दिला रहा था वहीं कुशाल द्वारा दीवार फांदकर घर से भाग जाना बिग बॉस के अबतक के सभी सीज़न में शायद एक अलग ही घटना थी. लेकिन अब जब बिग बॉस-7 ख़त्म हो गया है तो सबने अपने गिले शिकवे भुला कर जबर्दस्त पार्टी की जिसमें बिग बॉस-7 के सभी कंटेस्टेंट मौजूद थे सिवाए सोफ़िया हयात के. बिग बॉस के घर की विजेता गौहर ख़ान रनर अप तनीशा मुखर्जी और तीसरे नंबर पर रहने वाले एजाज़ खान ने बिग बॉस के घर पर रहने का अनुभव साझा किया. गौहर अपने वोटरों का शुक्रिया अदा करती हुई कहती हैं मेरे सभी शुभ चिन्तक मेरा परिवार और मेरे दोस्तों का शुक्रिया जिनकी बदोलत में जीत पाई. मैं रोज़ ऊपर वाले से दुआ करती थी की मैं जीत जाऊं और में इस शो में आई ही थी जीतने के लिए लेकिन मुझे कभी नहीं लगता था कि मैं जीत जाऊंगी क्योंकी मेरा मुक़ाबला तनीशा के साथ था जो कि बहुत ही कड़ा मुक़ाबला था. जब मैंने ग्रांड फ़िनाले में तनूजा जी को देखा तो मुझे लगा कि तनीशा ही जीतेगी लेकिन जब मेरा नाम पुकारा गया तो मुझे एक झटका सा लगा. गौहर ने आगे कहा मैं कुशाल से सच में प्यार करती थी इस से पहले भी बिग बॉस के घर पर लोगों को प्यार हुआ लेकिन लगता है मीडिया से या लोगों के डर से उन्होंने बोला नहीं लेकिन मैंने सबके सामने अपने प्यार का इज़हार किया और लोगों को मेरी यही सच्चाई पसंद आई. जहा एक तरफ़ गौहर ने सबके सामने अपने प्यार का इज़हार किया वहीं तनीशा ने भी घर से बाहर आकर कहा कि वो और अरमान बहुत अच्छे दोस्त हैं अरमान उन्हें हमेशा सपोर्ट करता है. तनीशा ने कहा मैं उम्मीद करती हूँ कि मैंनें बहुत लोगों के दिल जीते हैं. मैंने बिग बॉस के घर पर कई दोस्त बनाए जो हमेशा मेरे दोस्त रहेंगे जैसे एंडी इल्ली और अरमान. मेरे परिवार वाले मुझसे और अरमान से नाराज़ नहीं हैं. मेरी फ़ैमिली मेरे लिए बहुत प्रोटेक्टिव है वो नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी किसी भी लड़ाई में शामिल हो और मेरी फ़ैमिली बहुत ख़ुश है मुझ से. जब तनीशा से पूछा गया कि क्या उन्होंने अरमान से दोस्ती सिर्फ़ बिग बॉस के घर पर रहने के लिए ही की थी इस पर तनीशा का कहना था मुझे गेम खेलना नहीं आता है. तनीशा ने आगे कहा मुझे ख़ुशी है की गौहर ख़ान जीत गईं लेकिन मुझे नहीं पता कि हम आगे कभी बात करेंगे या नहीं. मैं बस इतना ही कहूंगी कि बिग बॉस के घर पर रहने से मैंने बहुत कुछ सीखा और जिसे मैं कभी नहीं भुला सकती. गौहर और तनीशा के बाद एजाज़ रहे दर्शको के पसंदीदा और शायद यही वजह है कि उन्हें मिला तीसरा स्थान. ऐजाज़ से जब पूछा गया कि आप हमेशा कैमरे के सामने ही क्यों रोया करते थे इस पर एजाज़ कहते हैं मैं एक एक्टर हूँ और मैं एक सच्ची एक्टिंग कर रहा था. मैं दर्शकों और घर में रहने वाले सभी लोगों को इंटरटेन कर रहा था. मेरे आने से पहले बिग बॉस इतना इंटरटेनिंग नहीं था. एजाज़ ने कहा कि बिग बॉस के घर पर उनका सबसे अच्छा दोस्त उनका कैमरा था क्योंकि वो कैमरे से बहुत प्यार करते हैं. |
| DATE: 2013-12-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1227] TITLE: गौहर ख़ान बनीं बिग बॉस-7 की विजेता |
| CONTENT: जानी मानी टीवी स्टार और मॉडल गौहर ख़ान कलर्स के रियलिटी टीवी शो बिग बॉस-7 की विजेता बन गईं हैं. शनिवार शाम लोनावला में हुए ग्रांड फ़िनाले में उन्होंने तनीशा मुखर्जी को हराकर यह ख़िताब जीता. बिग बॉस के घर पर गौहर ख़ान ने 104 बिताए जबकि तनीषा ने 105 दिन बिताए. शनिवार को फ़ाइनल के दौरान पूरे दिन भर घर से बाहर निकलने की प्रक्रिया चलती रही. सबसे पहले शनिवार को घर से बाहर निकले संग्राम सिंह जो कि चौथे नंबर पर थे और फिर नंबर आया एजाज़ ख़ान का और फिर अन्त में कड़ा मुक़ाबला हुआ गौहर और तनीषा के बीच. बिग बॉस सीज़न सात का ख़िताब जीतने पर गौहर ख़ान को 50 लाख रुपए मिलेंगे. गौहर की हिम्मत बढ़ाने के लिए उनकी बहन निगार ख़ान और मां भी पहुंची थीं. गौहर और तनीशा की मां भी मौजूदगौहर ख़ान की मां ने इस मौक़े पर कहा कि उन्हें बेहद ख़ुशी है कि गौहर जीत गईं और आज उनका पूरा परिवार रात भर जश्न मनाएगा. निगार ख़ान ने कहा कि उन्हें अपनी बहन पर नाज़ है. गौहर ने जीत की ट्रॉफ़ी अपने हाथ में लेते हुए सबका शुक्रिया अदा किया. इस मौक़े पर गौहर की मां अपनी बेटी की जीत को देखकर थोड़ी देर के लिए भावुक हो गईं. वहीं दूसरी तरफ़ रनर-अप रहीं तनीषा की माँ और पुराने ज़माने की जानी मानी हिंदी फ़िल्म अदाकारा तनूजा भी बेहद भावुक हो गईं थीं. तनूजा ने कहा कि उन्हें गर्व है अपनी बेटी पर और तनीशा ने पूरे 105 दिन इस घर पर पूरी अच्छाई सच्चाई और ईमानदारी से बिताए. उन्होंने कहा कि उन्होंने इस सीज़न के सारे एपिसोड देखे हैं और जब-जब उनकी बेटी इस शो में रोईं तब-तब वो भी घर पर रोती थीं. उनके अनुसार उनके पास अपनी बेटी को देखने का यही एक ज़रिया था. तनीशा भी इस बात से बहुत ख़ुश थीं कि इस मौक़े पर उनकी मां उनके पास मौजूद थीं. बिग बॉस में गौहर की जीत के साथ इस शो में महिला प्रतिभागियों का दबदबा क़ायम रहा इससे पहले उर्वशी ढोलकिया श्वेता तिवारी और जूही परमार जीत चुकी हैं. ग्रांड फ़िनाले में सारे कंटेस्टेंट मौजूद थे. बिग बॉस-7 को ख़ास बनाने के लिए सलमान ख़ान ने अरमान प्रत्यूषा बनर्जी और काम्या पंजाबी के साथ डांस परफ़ॉर्मेंस किया तो वहीं दूसरी तरफ़ तनीशा अरमान और गौहर कुशाल की जोड़ी ने अपनी अदाओं के जलवे बिखेरे. |
| DATE: 2013-12-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1228] TITLE: करीना बनी पाकिस्तानी कंपनी की एम्बेसडर, सोशल मीडिया पर बवाल |
| CONTENT: पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्में दिखाए जाने को लेकर पिछले महीने काफ़ी विवाद रहा और मामला अदालत तक भी गया. फ़िल्मों को लेकर भले ही विवाद रहा हो लेकिन वहाँ का विज्ञापन जगत भारतीय सितारों को लेने में नहीं हिचकिचा रहा. पाकिस्तान की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनियों में एक ने किसी पाकिस्तानी हस्ती को नहीं बल्कि बॉलीवुड की टॉप हीरोइन करीना कपूर को बतौर ब्रैंड एम्बेसडर साइन किया है. क्यूमोबाइल के अधिरारी ज़िशान युसूफ़ ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने करीना को लेकर विज्ञापन बनाया है. हाल ही में अभिनेत्री जूही चावला ने भी पाकिस्तानी घी के लिए एक विज्ञापन किया है. इससे पहले कुछ भारतीय सितारे पाकिस्तानी विज्ञापनों में दिख चुके हैं लेकिन ज़्यादातर प्रोडक्ट पाकिस्तानी नहीं थे. लेकिन करीना कपूर ने अब पाकिस्तान की ही बहुत बड़ी कंपनी का इश्तेहार हासिल किया है. करीना कपूर भारत में भी कई बड़े ब्रैंड्स का चेहरा हैं. पाकिस्तानी मीडिया में करीना से जुड़ी ख़बर को काफ़ी दिलचस्पी है. वहीं सोशल मीडिया पर नज़र डालें तो इसे लेकर काफ़ी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है. कंपनी के फेसबुक अकाउंट पर बहुत सारे लोगों ने इस पर कड़ा ऐतराज़ जताया है कि एक बड़ी पाकिस्तानी कंपनी ने अपने मुल्क के बजाए एक भारतीय सितारे को अपना एम्बैसडर बनाया है. फेसबुक पर पाकिस्तान के फ़ैज़ अंसारी लिखते हैं पाकिस्तान में बहुत से मॉडल हैं और आपने भारतीय को ले लिया. मैं अब कभी आपका मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल नहीं करूँगा. जबकि सईद मोहम्मद नबील की राय मिलीजुली है. वे कहते हैं सब भारतीय फ़िल्में देखते हैं और भारतीय गाने सुनते हैं. एक विज्ञापन मे करीना क्या आ गई सबने ड्रामा शुरु कर दिया. कंपनी को शुभकामनाएँ लेकिन फिर भी पूछना चाहता हूँ पाकिस्तानी मॉडल क्यूँ नहीं तो अम्माल एन सईद ने कहा है वाह करीना. लेकिन सोशल मीडिया पर ज़्यादातर लोगों ने इस पर नाराज़गी ही जताई है. लाहौर के रेहान अहमद ने लिखा है कि सारे पाकिस्तान में कोई नहीं मिला जो वहाँ की अभिनेत्री को लिया है भारतीय फ़िल्मों में कई पाकिस्तानी सितारे और कलाकार समय-समय पर काम करते रहे हैं जिसमें अली ज़फ़र सलमा आग़ा राहत फ़हत अली खान जैसे नाम शामिल हैं. अली ज़फ़र तो यशराज बैनर से लेकर कई बड़ी हिंदी फ़िल्मों में नज़र आ रहे हैं. वैसे पाकिस्तानी सितारों के भारतीय फ़िल्मों में काम करने को लेकर भारत में भी कई बार विवाद हो चुका है. तो पाकिस्तान में बॉलीवुड फ़िल्में दिखाने को लेकर भी पाकिस्तान में मतभेद हैं. लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान में भारतीय सितारों की लोकप्रियता में कमी नहीं आई है. |
| DATE: 2013-12-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1229] TITLE: टीवी शोज़ में महिलाओं का शोषण पसंद नहीं: आशा पारेख |
| CONTENT: 60 और 70 के दशक की मशहूर अभिनेत्री आशा पारेख को मौजूदा टीवी कार्यक्रमों के कंटेट से सख़्त शिकायत है. हालांकि अपने फ़िल्मी करियर से ब्रेक लेने के बाद वो कुछ समय तक टीवी इंडस्ट्री में सक्रिय रहीं और उन्होंने कोरा काग़ज़ जैसे सुपरहिट सीरियल का निर्माण भी किया लेकिन फ़िलहाल वो टीवी से दूर ही रहना चाहती हैं. मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए आशा पारेख ने कहा मैंने कुछ टीवी कार्यक्रम बनाए. मैं उनसे बहुत ख़ुश हूं. लेकिन अब के कई सीरियल बड़े दुखदायी हैं. उन्हें देखकर मैं परेशान हो जाती हूं. भला इसकी क्या वजह है आशा पारेख ने जवाब दिया सीरियलों में महिलाओं पर जो अत्याचार दिखाया जाता है मुझे वो पसंद नहीं है. ऐसे कार्यक्रम बिलकुल नहीं बनाए जाने चाहिए. आशा पारेख ने कहा कि उन्हें रियलिटी शोज़ देखना ज़्यादा पसंद है. उन्होंने कहा मुझे डांस रियलिटी शोज़ देखना पसंद है. मैं माधुरी दीक्षित की प्रशंसक हूं. झलक दिखला जा जैसे शो मैं देखती हूं. आशा पारेख ख़ुद एक पारंगत कत्थत नृत्यांगना हैं. उनका मानना है कि आजकल की फ़िल्मों में नृत्य कम हो गया है. आशा के मुताबिक़ शुद्ध नृत्य अब देखने नहीं मिलता. फ़िल्मों में मिले जुले डांस का ज़माना है. भारतीय और पाश्चात्य नृत्य शैली को मिलाकर कुछ नया ही देखने को मिलता है जो पहले नहीं होता था. हम विदेशी डांस से प्रभावित होते जा रहे हैं और परंपरागत भारतीय नृत्यों को भूलते जा रहे हैं. काश हम अपने लोकृत्यों का समावेश अपनी फ़िल्मों में कर पाएं. आशा पारेख ने 1950 के दशक में बतौर बाल कलाकार अपना फ़िल्मी करियर शुरू किया. 60 के दशक में उन्होंने जब प्यार किसी से होता है फिर वही दिल लाया हूं ज़िद्दी तीसरी मंज़िल और प्यार का मौसम जैसी सुपरहिट फ़िल्में दीं. 70 के दशक में उन्होंने तत्कालीन सुपरस्टार राजेश खन्ना के साथ कटी पतंग और आन मिलो सजना जैसी सुपरहिट फ़िल्में दीं. राजेश खन्ना के अलावा उनकी जोड़ी शम्मी कपूर के साथ भी काफ़ी हिट रही. |
| DATE: 2013-12-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1230] TITLE: वीना मलिक ने चुपके से शादी रचाई |
| CONTENT: बेबाक अदाकारी के लिए मशहूर पाकिस्तानी अभिनेत्री वीना मलिक ने दुबई में एक पाकिस्तानी कारोबारी से शादी कर ली है. इस शादी की पुष्टि ख़ुद उन्होंने माइक्रो ब्लॉगिंग वेबसाइट ट्विटर पर की है. वीना ने अपने पति के साथ शादी की अंगुठियों वाली तस्वीर ट्वीट करते हुए लिखा है मुझे अपना सोलमेट यानी साथी मिल गया है जो कि मेरा पार्टनर भी है और दोस्त भी. पाकिस्तान के एक निजी टीवी चैनल से बात करते हुए वीना ने बताया कि शादी 25 दिसंबर को दुबई की एक अदालत में हुई और उनके पति असद बशीर ख़ान एक कारोबारी हैं और उनकी मां के दोस्त के बेटे हैं. वीना मलिक का कहना था कि यह शादी दोनों परिवारों की मर्ज़ी से हुई है. उन्होंने कहा कि इस मौके पर वो ख़ुद की दुनिया की सबसे भाग्यशाली लड़की समझती हैं. वीना मलिक का नाम इससे पहले पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहम्मद आसिफ़ और भारतीय अभिनेता अश्मित पटेल के साथ भी जोड़ा जाता रहा है. वीना मलिक अपने कथित अफेयर के अलावा भारतीय फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों में अपनी बेबाक अदाकारी और एक पत्रिका के लिए नग्न फोटो खिंचाने के लिए सुर्ख़ियों में रहीं. दिसंबर 2011 में जब यह तस्वीर प्रकाशित हुईं तो वीना मलिक ने एक बयान जारी कर कहा था कि तस्वीर के साथ छेड़छाड़ कर उसे प्रकाशित किया गया है और उन्होंने ख़ुद ऐसी कोई तस्वीर नहीं खिंचाई. इससे पहले 2010 में जब वो भारत के एक रियलिटी शो बिग बॉस में शामिल हुईं तो पाकिस्तान में कई वर्गों में इसको लेकर नाराज़गी जताई गई. |
| DATE: 2013-12-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1231] TITLE: इरफ़ान बनेंगे पोर्न फ़िल्ममेकर! |
| CONTENT: अभिनेता इरफ़ान ने विविधतापूर्ण रोल करके दर्शकों और समीक्षकों दोनों की ही काफी वाहवाही पाई है. अब वह अपनी आने वाली फ़िल्म में एक पोर्न फ़िल्मकार का रोल निभाएंगे. मनोरंजन जगत की ख़बरों के मुताबिक़ इस फ़िल्म को तिग्मांशु धूलिया बना रहे हैं और इसका नाम है द किलिंग ऑफ़ अ पोर्न फ़िल्ममेकर जिसमें इरफ़ान पोर्न फ़िल्म बनाने वाले निर्देशक की भूमिका निभाएंगे. तिग्मांशु धूलिया के मुताबिक़ ये एक ऐसे शख़्स की कहानी है जो लोगों के बाथरूम उनके बेडरूम और नितांत निजी जगहों पर हिडन कैमरे लगाता है और इसके सहारा पोर्न फ़िल्में बनाता है. इरफ़ान इससे पहले तिग्मांशु की ही फ़िल्म पान सिंह तोमर में नज़र आ चुके हैं. इस फ़िल्म से इरफ़ान और धूलिया दोनों को ही काफ़ी सराहना मिली थी. इसके अलावा इसी साल रिलीज़ हुई इरफ़ान की फ़िल्म लंचबॉक्स भी काफ़ी तारीफ़ें बटोर चुकी है. जहां नए साल के मौक़े पर बॉलीवुड की कई अभिनेत्रियों को डांस परफॉरमेंस करने के लिए करोड़ों रुपए की फ़ीस देने के प्रस्ताव मिल रहे हैं वहीं गायक मीका भी किसी से पीछे नहीं. मनाली के एक आलीशान रिसॉर्ट में नए साल के जश्न के मौक़े पर मीका को कार्यक्रम पेश करने का प्रस्ताव दिया गया है और इसके लिए उन्हें सवा करोड़ रुपए की भारी भरकम फ़ीस दी जाएगी. ख़बरों के मुताबिक़ मीका को इससे पहले इतनी बड़ी रकम किसी कार्यक्रम के लिए नहीं मिली है. 2013 में अनिल कपूर के टीवी सीरियल 24 की लोकप्रियता के बाद अब आने वाले साल में कई और हस्तियां टीवी पर अपनी किस्मत आज़माते दिखेंगी. जहां अनुराग कश्यप के निर्देशन में अमिताभ बच्चन एक सीरियल में दिखेंगे वहीं अब महेश भट्ट भी टीवी का रुख कर रहे हैं. वह एक ऐसा शो लाने वाले हैं जिसके बारे में दावा किया जा रहा है कि ये आम सास-बहू धारावाहिकों से एकदम अलग होगा. जुलाई में महेश भट्ट का ये शो लॉन्च किया जाएगा. वैसे इससे पहले महेश भट्ट 90 के दशक में दूरदर्शन पर स्वाभिमान नाम का एक डेली सोप ला चुके हैं. |
| DATE: 2013-12-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1232] TITLE: दिलीप कुमार फिर दिखेंगे सिनेमा घरों के पर्दे पर |
| CONTENT: 91 साल के दिलीप कुमार बरसों पहले फ़िल्मों में काम करना बंद कर चुके हैं. लेकिन उनके प्रशंसकों को उनकी एक ऐसी फ़िल्म बड़े पर्दे पर देखने को मिल सकती है जो आज तक किसी के सामने नहीं आई. 90 के दशक में बनी इस फ़िल्म के प्रिंट्स ग़ायब हो गए थे लेकिन इसके निर्देशक को दोबारा इसके प्रिंट्स मिले और अब वो इसे रिलीज़ करने की योजना बना रहे. दो दशकों से भी ज़्यादा समय से लापता दिलीप कुमार की इस फ़िल्म का नाम है आग का दरिया है जिसमें दिलीप कुमार के अलावा रेखा पद्मिनी कोल्हापुरे दिवंगत अमरीश पुरी और अमृता सिंह जैसे सितारे हैं. आग का दरिया का निर्देशन मशहूर कन्नड़ फ़िल्मकार वीएस राजेंद्र बाबू ने किया था. वो इससे पहले मेरी आवाज़ सुनो शरारा और एक से भले दो जैसी हिंदी फ़िल्में बना चुके हैं. बीबीसी से बात करते हुए निर्देशक राजेंद्र बाबू ने बताया साल 1991-92 के दौरान हमने फ़िल्म की शूटिंग की. ये उस दौर की सबसे महंगी फ़िल्मों में से एक थी और इसकी लागत उस वक़्त क़रीब पांच करोड़ रुपए थी. फ़िल्म की रिलीज़ रुकने के बारे में वो कहते हैं रिलीज़ के वक़्त फ़िल्म वित्तीय मुश्किलों में फंस गई और इसके निर्माता आर वेंकटरमण को अदालत के चक्कर भी लगाने पड़े. इसी दौरान उनका निधन हो गया और फ़िल्म की रिलीज़ ही रुक गई. राजेंद्र बाबू ने बताया कि फ़िल्म को लेकर फ़िलहाल किसी तरह की क़ानूनी समस्या नहीं है और इस वजह से इसे रिलीज़ किया जा सकता है. लेकिन फ़िल्म को रिलीज़ करने में सबसे बड़ी समस्या थी इसके प्रिंट्स. राजेंद्र बाबू ने कहा हम सब इस फ़िल्म के बारे में भूल चुके थे. लेकिन पिछले दिनों मैं हेमा मालिनी की बेटी अहाना की शादी में गया जहां सायरा जी भी मुझसे मिलीं और उन्होंने दिलीप साहब के सामने पूछा कि आग का दरिया का क्या हुआ. मैंने बैंगलोर आकर जब फ़िल्म के प्रिंट्स खोजे तो वो खस्ताहाल थे. फिर मुझे याद आया कि हमने फ़िल्म बनने के बाद उसके प्रिंट्स सिंगापुर के एक डिस्ट्रीब्यूटर को भेजे थे. राजेंद्र बाबू ने बताया कि उन्होंने सिंगापुर के उस वितरक से संपर्क साधा और पाया कि उनके पास आग का दरिया के प्रिंट्स बिलकुल सही हालत में रखे हैं. फ़िलहाल फ़िल्म के प्रिंट्स को डिजिटल करने की प्रक्रिया जारी है और इसके बाद पोस्ट प्रोडक्शन करके राजेंद्र बाबू की योजना फ़िल्म को रिलीज़ करने की है. दिलीप कुमार से अपनी पहली मुलाकात को याद करते हुए निर्देशक राजेंद्र बाबू बताते हैं मुझे हेमा मालिनी ने पहली बार दिलीप साहब से मिलवाया था. उन्होंने मेरे बारे में बताया और दिलीप साहब ने मुझे घर बुलाया. मैं उनके घर फ़िल्म की कहानी लेकर गया. वो बताते हैं कहानी सुनने के बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा और मैं वापस आ गया. उसके बाद शाम को मुझे फ़ोन आया कि दिलीप साहब मुझसे मिलना चाहते हैं. मैं उनसे फिर मिला तो उन्होंने बताया कि उन्हें फ़िल्म की कहानी पसंद है. फ़िल्म में दिलीप कुमार ने एक एयरफ़ोर्स ऑफ़िसर का रोल निभाया है और रेखा ने उनकी पत्नी का किरदार निभाया है और पद्मिनी कोल्हापुरे उनकी बेटी के रोल में हैं. फ़िल्म में अमृता सिंह ने एक आइटम नंबर भी किया है. ये एक पारिवारिक कहानी है जिसमें दिखाया गया है कि कैसे एक ईमानदार अफ़सर का परिवार कैसे सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार से लड़ता है. |
| DATE: 2013-12-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1233] TITLE: मुंबई में अब डर लगता है: करीना कपूर |
| CONTENT: अभिनेत्री करीना कपूर मानती हैं कि मुंबई महिलाओं के लिए पहले जैसी सुरक्षित नहीं रही. मुंबई में एक मोबाइल ऐप के लॉन्च के मौक़े पर करीना कपूर ने ये बातें कहीं. इस ऐप निर्माता कंपनी के मुताबिक़ ये मुसीबत में फंसी महिला के संबंधियों को अलर्ट भेजेगा. करीना कपूर कहती हैं मुंबई में अब पहले वाली बात नहीं रही. आज से दो साल पहले तक मैं यहां महफ़ूज़ महसूस करती थी. लेकिन अब कुछ ऐसी घटनाएं हो गईं हैं कि मुझे डर लगने लगता है. मैं यहां की सड़कों पर चलते वक़्त उतनी निश्चिंत नहीं रहती जितनी पहले रहती थी. ऐसा महसूस करने की वजह बताते हुए करीना कपूर ने कहा शक्ति मिल में महिला पत्रकार के साथ बलात्कार वाली घटना ने मुझे हिला दिया. अभी पिछले दिनों जहां मैं रहती हूं उसके ठीक बगल में एक विदेशी महिला के साथ बलात्कार हुआ. इऩ सब घटनाओं ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. वो कहती हैं कि कई दफ़ा शूटिंग के सिलसिले में वो देर रात तक व्यस्त रहती हैं और घर पहुंचने में विलंब हो जाता है. तब उनकी मां बहुत चिंतित हो जाती हैं और जब तक वो घर नहीं पहुंचती और उन्हें संदेश नहीं देतीं तब तक उनकी मां जागती रहती हैं. करीना कपूर ये भी मानती हैं कि बलात्कार की घटनाएं पूरे देश में लगातार हो रही हैं और इसके लिए शिक्षा की सख़्त जरूरत है ताकि लोगों की विकृत सोच को बदला जा सके और साथ ही ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हो सकें. उन्होंने इस बात पर ख़ुशी जताई कि बलात्कार कानून को सख़्त बनाया जा रहा है और इससे दोषियों को कड़ी सज़ा मिलेगी ताकि दूसरों को सबक मिल सके. उन्होंने ग्रामीण इलाकों में भी महिलाओं की स्थिति पर चिंता जताई और कहा कि सरकार को इसके लिए सख़्त क़दम उठाने की ज़रूरत है. |
| DATE: 2013-12-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1234] TITLE: हमें 'जजमेंटल' नहीं होना चाहिए: ऐश्वर्या राय बच्चन |
| CONTENT: हाल ही में अभिनेता ऋतिक रोशन और उनकी पत्नी सुज़ैन ने अलग होने का फ़ैसला किया और ये मामला मीडिया की सुर्खियां बना रहा. इससे पहले निर्देशख अनुराग कश्यप और उनकी पत्नी कल्कि केकलां के बीच भी तनाव की ख़बरें थीं. लेकिन अभिनेत्री ऐश्वर्या राय बच्चन ने लोगों से ग़ुज़ारिश की कि इस मामले में लोगों को किसी भी तरह की राय बनाने से बचना चाहिए. मुंबई में एक प्रोडक्ट लॉन्च पर पहुंची ऐश्वर्या राय बच्चन ने कहा रिश्ते बनते बिगड़ते रहते हैं. इसे सिर्फ़ बॉलीवुड तक ही सीमित करके देखना ठीक नहीं है. और लोगों को अपने रिश्तों के बारे में फ़ैसला लेने का हक़ है. उन्हें इस मामले में अकेला छोड़ देना चाहिए. मां बनने के बाद ऐश्वर्या राय फ़िलहाल फ़िल्मों से दूर हैं लेकिन उन्होंने कहा कि उनके विकल्प खुले हैं. ऐश्वर्या पहले से फ़िट और ख़ूबसूरत नज़र आ रही थीं. अपनी ख़ूबसूरती का श्रेय उन्होंने अपने मां-बाप को दिया. वो कहती हैं शायद मुझे ख़ूबसूरती विरासत में मिली. मेरा अपना कोई योगदान नहीं है. जो लोग मुझसे ब्यूटी टिप्स मांगते हैं उनसे यही कहूंगी कि वो अपने काम के प्रति रिश्तों के प्रति ईमानदार रहें. मन में सकारात्मक विचार लाएं और बड़ों की इज्ज़त करें. चेहरे पर चमक अपने आप आएगी. उन्होंने अपने मां बनने के अनुभव को बेहतरीन बताया और कहा कि वो अपनी बेटी आराध्या के साथ बहुत अच्छा वक़्त गुज़ार रही हैं. उन्होंने ख़ूबसूरती बढ़ाने के लिए किसी भी तरह की सर्जरी की वक़ालत नहीं की. उन्होंने कहा मैं प्राकृतिक सुंदरता में विश्वास रखती हूं. ऐश्वर्या राय बच्चन की आख़िरी रिलीज़ फ़िल्म साल 2010 में संजय लीला भंसाली की ग़ुज़ारिश थी. उसके बाद उन्होंने मधुर भंडारकर की फ़िल्म हीरोइन साइन की लेकिन प्रेग्नेंसी की वजह से उन्हें ये फ़िल्म छोड़नी पड़ी थी. |
| DATE: 2013-12-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1235] TITLE: सुरमयी दुनिया का 'सुर-असुर' संग्राम |
| CONTENT: तमाम तरह की हलचलों से भरी इंसानी ज़िंदगी में सुकून के लम्हे ईजाद करने वाले संगीत की दुनिया में इन दिनो एक बेसुरे झगड़े ने ख़लल पैदा कर रखा है. इस झगड़े की वजह है रायल्टी. मतलब संगीत की बिक्री से हुई मोटी कमाई से मिलने वाला एक हिस्सा. परंपरागत रूप से यह हिस्सा-बांट म्यूज़िक कम्पनी और फ़िल्म के निर्माता के बीच होता आया है. इसे अन्यायपूर्ण बताकर इन गीतों को रचने वाले गीतकारसंगीतकार और गायक कभी-कभी विरोध में खड़े होकर न्याय मांगने लगते हैं. निर्माता और म्यूज़िक कम्पनी ऐसे तमाम मौकों पर फ़िल्मी गीतों की बिक्री से जमा हुई दौलत पर चारों हाथ रखकर जवाब में चिलाते हैं बुरी नज़र वाले तेरा मुंह काला. इस बार इन चार हाथ वालों के निशाने पर हैं गायक सोनू निगम जिन्होंने बग़ावत का झंडा बुलंद करते हुए तमाम स्थापित गायकों को एकजुट कर लिया है. इन लोगों ने म्यूज़िक कम्पनियों के उस एग्रीमेंट पर दस्तख़त करने से इंकार कर दिया है जो बकौल सोनू न सिर्फ इन गायकों को रायल्टी से बेदख़ल करता है बल्कि म्यूज़िक बेचने वाली कम्पनी का ग़ुलाम भी बनाता है. ताज़ा विवाद शुरू हुआ है शेखर सुमन की फ़िल्म हार्टलेस के साथ. इस फ़िल्म के संगीत अधिकार टी सीरीज़ के भूषण कुमार ने खरीदे हैं. वह चाहते थे संगीत के रिलीज़ से पहले सोनू निगम और सुनिधि चौहान जिन्होंने इस फ़िल्म के गीत गाए हैं वे उनके बनाए हुए एग्रीमेंट पर दस्तख़्त करें अन्यथा वे इन गीतों को दूसरे गायकों की आवाज़ में डब करवाएंगे. दस्तख़त से इंकार करते हुए सोनू ने कहा कि वे ऐसा ज़ालिमाना और अन्यायपूर्ण एग्रीमेंट साईन करने के बजाय गाना छोड़कर घर पर योगा करना पसंद करेंगे. इस तमाम विवाद की जड़ें बहुत दूर उस दौर में छिपी हैं जहां पचास और साठ के दशक में लता मंगेशकर ने पार्श्व गायकों के साथ होने वाले इस अन्याय के ख़िलाफ उन्होने आवाज़ बुलंद की थी. सबसे पहली बात थी रिकार्ड पर गायक का नाम न होना. 1949 में रिलीज़ हुई फ़िल्म महल में संगीतकार खेमचंद प्रकाश के संगीत की एक महान रचना है आयेगा आयेगा आयेगा आयेगा आनेवाला आयेगा. इसे अक्सर लता मंगेशकर का गाया सर्वश्रेष्ठ गीत माना जाता है लेकिन जिस समय इस गीत का रिकार्ड जारी हुआ तो उस पर गायक के स्थान पर नाम लिखा था कामिनी. दरअसल इस फ़िल्म में हीरोइन मधुबाला का नाम कामिनी था. लता ने ग्रामोफ़ोन कम्पनी आफ इंडिया के साथ तब तक गाने से इंकार कर दिया जब तक वे रिकार्ड पर गायक का नाम नहीं देते. इस कम्पनी का एच एम वी लेबल सबसे ज़्यादा मशहूर था और एक अरसे तक लगभग उनकी मोनोपाली बनी रही थी. लेकिनइस विवाद के बाद रिकार्ड पर बकायदा गायक का नाम भी आने लगा. गायक की प्रतिष्ठा की लड़ाई का दूसरा मोर्चा था फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स. 1958 तक फ़िल्मफ़ेयर गायकों को कोई अवार्ड नहीं देता था. फ़िल्मफ़ेयर ने 1957 की फ़िल्म चोरी चोरी में लता मंगेशकर के गाए गीत रसिक बलमा के लिए बेस्ट संगीतकार का पुरस्कार शंकर जयकिशन को देने की घोषणा की. रसमन विजेता संगीतकार को अवार्ड फंक्शन में इस गीत के साथ परफ़ॉर्म करना होता है. लता मंगेशकर ने गीत गाने से इंकार करते हुए संगीतकार जयकिशन को सीधे-सीधे कहा दिया कि फ़िल्मफ़ेयर अगर गायक को कोई मान्यता ही नहीं देता तो फिर आप भी उनके मंच से अपने साज़ लेकर इस धुन को बजा लें. नतीजा यह हुआ कि फ़िल्मफ़ेयर को अगले ही साल से पार्श्व गायन के लिए पुरस्कार देने की शुरूआत करनी पड़ी. इसके बाद आया मुद्दा रायल्टी का. लता मंगेशकर की ही पहल पर उस दौर के तमाम गायक जमा हुए ताकि पूरी ताकत और यकमुश्ती के साथ गीतों की रायल्टी में से हिस्सा मांगा जा सके. इस बैठक में ही मुहम्मद रफ़ी और लता के बीच ऐसा विवाद हुआ जिससे दोनों ने एक-दूसरे से इस क़दर मुंह मोड़ा कि कई साल तक कोई गीत साथ नहीं गाया. असल में रफ़ी बहुत ही सीधे-सादे और अल्लाह वाले इंसान थे. उनका ख़्याल था कि जब गायक गाने की फ़ीस ले लेता है तो फिर उसके बाद रायल्टी मांगना जायज़ नहीं है. जबकि लता का मानना था कि गायक की आवाज़ ही गीत की आत्मा है और उसकी कमाई में उसका हक़ भी बनता है और यूं भी गायक को मिलने वाली फीस बहुत कम थी. यह बात एक हद तक बिल्कुल सही भी है. इतिहास इस बात का गवाह है कि बुढ़ापे में बिना काम के अनेक कलाकारों को या तो सड़कों पर भीख मांगने की नौबत आन पड़ी या फिर भूखे मरने की. हिंदुस्तानी सिनेमा की पहली बोलती फ़िल्म आलमआरा का पहला गीत दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे गर ताकत है देने की गाने वाले डब्लूएम ख़ान अपने अंतिम दिनों में यही गीत गाते-गाते इस दुनिया-ए-फ़ानी से रवाना हुए. फ़िल्म शहीद 1948 के लिए मुहम्मद रफ़ी के साथ वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो जैसे गीत गाने गायक-संगीत निदेशक ख़ान मस्ताना बम्बई के माहीम दरगाह के बाहर भीख मांगते हुए मरने की कहानी अब तक लोगों को याद है. जीएम दुर्रानी जैसे गायक जिनकी गायकी के अंदाज़ को अपनाकर मोहम्मद रफ़ी ने अपना सफ़र शुरू किया अपने अंतिम दिनों में बीमारी की हालत में इलाज के लिए भी औरों की तरफ ताकते रहते थे. जयदेव जैसे संगीतकार ज़िंदगी भर न तो अपना एक घर बना पाए और न कोई बैंक बैलेंस. आखिरी दिनों में जब बीमार होकर बिस्तर पकड़ा तो एक संगीत प्रेमी अजीत सेठ ने ही उनके इलाज की ज़िमेदारी उठाई वरना कहानी कुछ और होती. संगीतकर खेमचंद प्रकाश की दूसरी पत्नी तो आख़िर में एक फ़ुटपाथ पर बदहाली में जीती रहीं. ये कितनी अजीब बात है कि करोड़ों रुपए कमाकर निर्माता और म्यूज़िक कम्पनी की तिजोरियां भरने वाले गीतों को रचने वाले गीतकारसंगीतकार और गायक के लिए कुछ भी नहीं है. गीतकार जावेद अख़्तर ने जब कापीराईट एक्ट पर संशोधन के समय हुए विचार-विमर्श के दौरान गीतकार के लिए भी रायल्टी के प्रावधान की बात उठाई तो आमिर ख़ान जैसे अभिनेता-निर्माता से सामना करना पड़ा. नतीजा यह है कि जावेद अख़्तर जैसे गीतकार के पास कोई काम नहीं है. निर्माता उनसे कन्नी काटने लगे हैं. ग़नीमत है कि वे इसा सबके बावजूद अपने स्टेंड पर आज भी कायम हैं. इसी तरह संगीतकार सलीम-सुलेमान को भी रायल्टी में हिस्सा मांगने पर यशराज और करन जौहर की फ़िल्मों से हाथ धोना पड़ा है. पचासों बरस पुरानी इस लड़ाई में दोनो पक्षों की हार-जीत होती रही है. लता मंगेशकर को बाक़ायदा उनके गीतों की भरपूर रायल्टी आज भी मिलती है. आज के संगीतकारों में एआर रहमान तो बाकायदा मुनाफ़े में से अपना हिस्सा लेते हैं. जब आमिर ख़ान ने तारे ज़मीन पर के लिए इस शर्त से इंकार किया तो रहमान ने फ़िल्म में संगीत देने से ही इंकार कर दिया. आज इस संघर्ष के घनीभूत होने की वजह है जून 2012 में पारित वह कापीराईट एक्ट जिसमें सभी रचनात्मक योगदान देने वाले कलाकारों गीतकार संगीतकार गायक के लिए रॉयल्टी का प्रवाधान है. इस कानून को म्यूज़िक कंपनियों ने अदालत में चुनौती देकर रोक रखा है. हैरान करने वाली बात यह है कि कलाकारों के विरुद्ध इस लड़ाई में टी सीरीज़ के मालिक भूषण कुमार और उनके पिता गुलशन कुमार की हत्या के आरोपी टिप्स कम्पनी के मालिक रमेश तौरानी एक साथ खड़े नज़र आ रहे हैं. ज़ाहिर है हमेशा की तरह यहां भी दौलत वाले दौलत के लिए साथ-साथ हैं. ताज़ा एग्रीमेंट असल में इसी एक्ट के प्रावधानों से बचे रहने की कवायद है जिसे गायकों ने अपना एक नया संगठन द इंडियन सिंगर्स राईट्स एसोसिएशन बनाकर चुनौती दे रखी है. सोनू निगम इस लड़ाई में सबसे आगे खड़े हैं लिहाज़ा सारे वार भी उन्हीं पर हो रहे हैं. इस लड़ाई के बीच एक और चीज़ है जो म्यूज़िक कंपनियों के हाथ में एक ब्रह्मास्त्र की तरह मौजूद है वह है नए कलाकार. मौका पाने की गरज़ से ये नए कलाकार हर शर्त मानकर अपना रास्ता बनाना चाहते हैं. वे किसी भी एग्रीमेंट पर दस्तखत करने को तैयार हैं. ऐसे वक़्त में जब मशीनें बेसुरों को भी सुर दे देती हैं ऐसे में सुर वालों की परवाह कौन करे. |
| DATE: 2013-12-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1236] TITLE: प्रियंका को मिलेंगे सात मिनट के छह करोड़ |
| CONTENT: नए साल में प्रियंका चोपड़ा का जलवा श्रद्धा कपूर क्यों नहीं काम करना चाहतीं अक्षय कुमार के साथ और किस मुहिम के लिए सोनू निगम को मिला लता मंगेशकर का साथ. ख़बरें पढ़िए मुंबई डायरी में. नए साल के जश्न के मौक़े पर प्रियंका चोपड़ा धूम मचाने वाली हैं. ख़बरों के मुताबिक़ उन्हें चेन्नई में नए साल के जश्न के लिए एक डांस परफ़ारमेंस करने का न्यौता दिया गया है. कुल सात मिनट के इस परफ़ारमेंस के लिए प्रियंका को छह करोड़ रुपए की भारी भरकम फ़ीस दी जाएगी. प्रियंका ने ये प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया है लेकिन उन्होंने कथित तौर पर आयोजकों के सामने शर्त रखी है कि वो सिर्फ़ डांस करेंगी और गाना नहीं गाएंगी. प्रियंका के लिए बॉक्स ऑफ़िस के नज़रिए से ये साल मिला-जुला रहा. जहां उनकी फ़िल्म ज़ंजीर सुपरफ़्लॉप रही वहीं नवंबर में रिलीज़ हुई कृष-3 सुपरहिट रही. श्रद्धा कपूर की अब तक कुल मिलाकर सिर्फ़ एक फ़िल्म हिट रही है और वो थी इसी साल रिलीज़ हुई आशिक़ी-2. लेकिन श्रद्धा बड़े बड़े स्टार्स के साथ काम करने से इनकार कर रही हैं. पहले उन्होंने जॉन अब्राहम के साथ फ़िल्म वेलकम बैक में काम करने से इऩकार कर दिया क्योंकि कथित तौर पर वो उम्रदराज़ हीरो के साथ काम करना नहीं चाहतीं. और अब उन्होंने डेट्स की समस्या बताकर अक्षय कुमार के साथ फ़िल्म करने से पल्ला झाड़ लिया. अब इस फ़िल्म में उनकी जगह श्रुति हासन को लिया जाएगा. दरअसल मीडिया में छपी ख़बरों के मुताबिक़ श्रद्धा ने शुरुआत में ही तय कर लिया है कि वो अपने हमउम्र कलाकारों के साथ ही फ़िल्मों में काम करेंगी और चाहे कोई कितना बड़ा स्टार ही क्यों ना हो अगर वो उम्र में उनसे ख़ासा बड़ा है तो ऐसी फ़िल्मों में श्रद्धा काम नहीं करेंगी. गायक सोनू निगम ने हाल ही में एक मुहिम छेड़ी है जिसके तहत उन्होंने मांग उठाई है कि गानों की रॉयल्टी पर गायकों का भी हक़ होना चाहिए. सोनू को इस मुहिम में आशा भोसले अलगा याग्निक कविता कृष्णमूर्ति श्रेया घोषाल और सुनीधि चौहान जैसे गायकों का साथ मिल चुका है. लेकिन हाल ही में उन्हें सबसे बड़ी राहत तब मिली जब प्रख्यात गायिका लता मंगेशकर ने भी इस अभियान में उन्हें समर्थन देने का ऐलान किया. लता मंगेशकर ट्वीट किया नमस्कार सोनू. आपने जो ये रॉयल्टी के लिए पहल की है उससे मुझे बहुत ख़ुशी हुई. आज से 50 साल पहले मैंने भी इसी रॉयल्टी के लिए हमारी सिंगर्स असोसिएशन के सामने ये प्रस्ताव रखा था. मगर कुछ आर्टिस्ट ने हमारी बात नहीं मानी और हमें असोसिएशन बंद करना पड़ा. जबकि उस वक़्त भी मैं तो रॉयल्टी लेती ही थी पर मैं चाहती थी कि सब गायकों के लिए रॉयल्टी मिले. मगर आप जैसे कलाकार ने अब इस मामले को समझा है तो हम सबमिलकर इसका सामना करेंगे. मैं आपको शुभकामनाएं देती हूं. |
| DATE: 2013-12-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1237] TITLE: नहीं बढ़ेंगे 'धूम-3' के लिए टिकटों के दाम: आमिर ख़ान |
| CONTENT: आमिर ख़ान ने साफ़ तौर पर इन ख़बरों का खंडन किया है कि धूम-3 के लिए टिकटों के दाम बढाए गए हैं या ऐसा करने की कोई योजना है. मुंबई में पत्रकारों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा मैं सबको बता देना चाहता हूं कि धूम-3 के लिए टिकटों के दाम में कतई इज़ाफ़ा नहीं किया गया है. जिन लोगों ने फ़िल्म की एडवांस बुकिंग कराई है उनको अंदाज़ा हो गया होगा कि टिकटों के दाम नहीं बढ़े हैं. पिछली बड़ी फ़िल्म चेन्नई एक्सप्रेस के लिए जो दाम थे वही धूम-3 के लिए भी हैं. आमिर ने आगे कहा कि वो नहीं चाहते कि लोगों के मन में इसे लेकर किसी तरह की ग़लतफ़हमी हो. वो कहते हैं इस ग़लत ख़बर की वजह से मैं दो दिन से सो नहीं पा रहा हूं. हो सकता है कि कई लोग टिकटों के बढ़े दाम के बारे में सुनकर फ़िल्म देखने का विचार ही छोड़ दें. इसलिए मैंने ये सारी बातें साफ़ की. फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक़ आमिर ख़ान की इस फ़िल्म को ज़बरदस्त एडवांस बुकिंग मिल रही है और इस मामले में ये सलमान ख़ान की फ़िल्म एक था टाइगर का रिकॉर्ड तोड़ सकती है जिसके नाम पहले दिन की सबसे ज़्यादा एडवांस बुकिंग का रिकॉर्ड है. हालांकि अभी आंकड़े सामने नहीं आए हैं. वैसे आमिर अब भी ज़ोर दे रहे हैं कि वो लोगों की प्रतिक्रिया जानने का इंतज़ार कर रहे हैं. आमिर ने कहा देखिए ऐसी कई फ़िल्में रही हैं जिन्हें ज़बरदस्त एडवांस बुकिंग लगी है लेकिन वो लोगों को पसंद नहीं आईं और फिर बैठ गईं. ऐसे में हम चाहते हैं कि पहले लोगों की प्रतिक्रिया देखें. उम्मीद है लोगों को फ़िल्म पसंद आएगी. आमतौर पर किसी भी फ़िल्म की रिलीज़ से एक दिन पहले उसका प्रीमियर रखा जाता है लेकिन धूम-3 के मामले में ऐसा नहीं हो रहा है. आमिर ने बताया फ़िल्म के निर्माता आदित्य चोपड़ा चाहते हैं कि फ़िल्म को सबसे पहले आम दर्शक देखें. हमने अपने क़रीबी लोगों के लिए फ़िल्म का प्रीमियर रखा है लेकिन वो भी शुक्रवार को ही है जब फ़िल्म रिलीज़ हो रही है. आमिर ने अभिनेता सलमान ख़ान का इस बात के लिए आभार जताया कि वो अपने टीवी शो बिग बॉस में धूम-3 का प्रचार कर रहे हैं. आमिर के मुताबिक़ वो भी सलमान की फ़िल्म जय हो का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं. |
| DATE: 2013-12-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1238] TITLE: जो एकता कहती है वही करता हूं: जीतेंद्र |
| CONTENT: मशहूर अभिनेता जीतेंद्र मौजूदा दौर के संगीत से कुछ ख़ास संतुष्ट नहीं हैं लेकिन फ़िल्मों के लिहाज़ से वो इस दौर को भारतीय सिनेमा का सबसे अच्छा दौर मानते हैं. मुंबई में यूटीवी स्टार्स के कार्यक्रम वॉक ऑफ़ द स्टार्स में जीतेंद्र ने हिस्सा लेते हुए ये बातें कहीं. वॉक ऑफ़ द स्टार्स के तहत हिंदी सिनेमा के जाने-माने कलाकारों के हाथ और पैर के निशान यादगार के तौर पर लिए जाते हैं और इसी कड़ी में जीतेंद्र को भी आमंत्रित किया गया था. पत्रकारों से मुख़ातिब जीतेंद्र ने कहा मैं मौजूदा दौर की फ़िल्में देखता हूं. बहुत अच्छा दौर चल रहा है. हर तरह की फ़िल्में चलती हैं. मसाला फ़िल्में भी चलती हैं तो लीक से हटकर फ़िल्में भी चलती हैं. सितारों की फ़िल्में भी चलती हैं तो छोटे बजटकी अच्छी कहानी वाली फ़िल्में भी चलती हैं. वर्ना पहले तो वो लॉस्ट एंड फाउंड का फॉर्मूला था. उसी पर हर फ़िल्म बनती जाती थी. जीतेंद्र ने ये भी बताया कि वो वापस एक्टिंग करने के मूड में नहीं है लेकिन अगर उनकी बेटी एकता कपूर ने कहा तो वो उस पर विचार कर सकते हैं. उन्होंने कहा मैं 18-20 साल पहले तय किया था कि मैं वापस स्टूडियो में नहीं लौटूंगा. एक्टिंग नहीं करूंगा. मैंने अपने दौर में दिन में कई-कई घंटे सेट पर बिताए. मैं आराम की ज़िंदगी बसर करना चाहता था. लेकिन फिर मेरी बेटी और बेटा इसी क्षेत्र में आ गए. उन्होंने आगे कहा मेरी बेटी अगर कहेगी तो मैं ज़रूर अभिनय करूंगा. वर्ना मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. अपने करियर की बातें करते हुए जीतेंद्र ने कहा मेरे करियर में कई बार उतार चढ़ाव आए. 80 का दौर मेरे करियर में कामयाबी के लिहाज़ से सर्वश्रेष्ठ था. जब मैंने कई हिट फ़िल्में दीं. लेकिन मुझे अपने पूरे सफ़र पर गर्व है. जीतेंद्र अपने ख़ास तरह की नृत्य शैली के लिए सबसे ज़्यादा मशहूर थे. सफ़ेद पैंट सफ़ेद शर्ट और सफ़ेद जूते पहने हुए जीतेंद्र का डांस स्टाइल 70 और 80 के दशक में ख़ूब मशहूर हुआ और उन्हें जंपिग जैक भी कहा जाता था. वो कहते हैं जब मैं छोटा था तो कुक्कू जी के डांस का कायल था. फिर मैं फ़िल्मों में आया तो मैंने पाया कि एक ख़ास तरह से नृत्य करने की शैली लोगों को ख़ूब भाती है और मैंने वही करना शुरू किया. अब मैं अपने आपको देखता हूं तो लगता है कि मैं अपने दौर का कुक्कू था. वो मौजूदा दौर के कलाकारों में ऋतिक रोशन को सर्वश्रेष्ठ डांसर मानते हैं. अपने सबसे क़रीबी दोस्तों के बारे में उन्होंने बातें करते हुए कहा मेरी गुड्डू यानी राकेश रोशन सुजीत कुमार राजेश खन्ना और संजीव कुमार से बहुत अच्छी दोस्ती थी. लेकिन सुजीत संजीव और राजेश तो अब जा चुके हैं. मैं और गुड्डू अक्सर मिलते हैं और फ़िल्में देखने भी साथ जाते हैं. |
| DATE: 2013-12-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1239] TITLE: अरमान कोहली पर हंगामा है बरपा |
| CONTENT: टीवी रियलिटी शो बिग बॉस में अरमान कोहली के वापस जाने पर किसे है सख़्त एतराज़ निर्देशक रोहित शेट्टी की नई भूमिका और सचिन तेंदुलकर को आमिर ख़ान का ख़ास तोहफ़ा. पढ़िए ख़बरें मुंबई डायरी में. अभिनेता अरमान कोहली के टीवी रियलिटी शो बिग बॉस में दोबारा जाने पर हंगामा हो गया है. दरअसल शो की प्रतियोगी अभिनेत्री सोफ़िया हयात ने अरमान पर शो के दौरान मारपीट करने और बदसलूकी का आरोप लगाया था और उनकी शिक़ायत पर पुलिस ने उन्हें बिग बॉस हाउस से सोमवार को ग़िरफ़्तार कर लिया गया था लेकिन बाद में उन्हें ज़मानत मिल गई और वो दोबारा बिग बॉस हाउस में आ गए. इस पर कई समाजिक कार्यकर्ताओं ने गहरा विरोध जताया है. महिला सामाजिक कार्यकर्ता रंजना कुमारी के मुताबिक़ बिग बॉस शो में इस तरह की हरक़तें बिलकुल अक्षम्य हैं. महिलाओं के साथ शो में बदतमीज़ी की जा रही है. शो को फ़ौरन बंद करना चाहिए और अरमान ही नहीं बल्कि इसके निर्माता को भी जेल में बंद कर देना चाहिए. सोशल मीडिया पर भी शो के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठने लगी हैं. कई लोगों का मानना है कि शो का फॉर्मेट ही इस तरह का है जो लोगों को बुरा बरताव करने पर मजबूर करता है. शो में महिलाओं का ग़लत चित्रण होता है और उनके साथ ग़लत व्यवहार भी हो रहा है. इससे लोगों पर बुरा प्रभाव पड़ता है. कहा ये भी जा रहा है कि जब अरमान वापस अपनी कार में बिग बॉस हाउस जा रहे थे तो कथित तौर पर कुछ महिलाओं ने उनकी कार पर सड़े टमाटर फेंके. बतौर निर्देशक कई सुपरहिट फ़िल्में देने वाले रोहित शेट्टी अब टीवी रियलिटी शो ख़तरों के खिलाड़ी की मेज़बानी करेंगे. इस शो को पहले अक्षय कुमार और प्रियंका चोपड़ा जैसे सितारे होस्ट कर चुके हैं. ख़बरें हैं कि शो के नए सत्र के लिए रोहित के अलावा उनके क़रीबी दोस्त और अभिनेता अजय देवगन और सोनू सूद को भी अप्रोच किया गया था लेकिन बाद में रोहित शेट्टी के नाम पर सहमति बन गई. कथित तौर पर रोहित शेट्टी को शो की मेज़बानी के लिए 10 करोड़ रुपए फ़ीस दी जाएगी. फ़रवरी 2014 में इस शो को अर्जेंटीना में शूट किया जाएगा. आमिर ख़ान और सचिन तेंदुलकर की दोस्ती के किस्से नए नहीं है. सचिन तेंदुलकर के करियर का आख़िरी टेस्ट देखने आमिर ख़ान भी तीनों दिन मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में मौजूद रहे. अब ख़बरों के मुताबिक़ वो अपनी आने वाली फ़िल्म धूम-3 की स्पेशल स्क्रीनिंग का आयोजन ख़ास सचिन तेंदुलकर के लिए कर रहे हैं. ग़ौरतलब है कि फ़िल्म की रिलीज़ से पहसे इसका सस्पेंस ना खुले इसके लिए आमिर ने कोई प्रीमियर या प्रेस शो भी नहीं रखा है लेकिन सचिन तेंदुलकर के लिए वो धूम-3 की स्पेशल स्क्रीनिंग रख रहे हैं. इस दौरान आमिर का पूरा परिवार भी मौजूद रहेगा. |
| DATE: 2013-12-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1240] TITLE: मैं बहुत नर्वस हूं: आलिया भट्ट |
| CONTENT: आलिया भट्ट बॉलीवुड में सिर्फ़ एक फ़िल्म पुरानी हैं लेकिन ख़ासी मशहूर हो चुकी हैं. उनकी पहली फ़िल्म स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर को कामयाबी मिली थी और आलिया के अभिनय और ख़ूबसूरती दोनों को ही वाहवाही मिली थी. अब आलिया तैयार हैं अपनी दूसरी फ़िल्म हाईवे के साथ जिसके निर्देशक इम्तियाज़ अली हैं. लेकिन वो इस फ़िल्म को लेकर बहुत नर्वस हैं. मीडिया से इस बारे में बात करते हुए आलिया ने कहा जब इम्तियाज़ ने मुझे ये फ़िल्म ऑफ़र की तो मैं थोड़ी कशमकश में पड़ गई. लेकिन रोल बड़ा चुनौतीपूर्ण था. बाद में मैंने जब इसे किया तो बहुत मज़ा आया. फ़िल्म 21 फरवरी को रिलीज़ हो रही है. उन्होंने कहा जब तक फ़िल्म रिलीज़ नहीं हो जाती मेरी घबराहट दूर नहीं होगी. लेकिन इम्तियाज़ के साथ काम करना का अनुभव बेशकीमती रहा. फ़िल्म में रणदीप हुडा की भी मुख्य भूमिका है. इसकी शूटिंग भारत के छह अलग-अलग राज्यों में हुई. आलिया ने साल 1999 में बतौर बाल कलाकार फ़िल्म संघर्ष में काम किया था. बतौर लीड हीरोइन करण जौहर की स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर उनकी पहली फ़िल्म थी जिसमें उनके साथ सिद्धार्थ मल्होत्रा और वरुण धवन जैसे कलाकारों ने भी बॉलीवुड में प्रवेश किया. हाईवे के निर्देशक इम्तियाज़ अली बताते हैं कि रोमांस को पर्दे पर पेश करने का उनका जो जुनून है वो शायद इस वजह से है क्योंकि उनकी असल ज़िंदगी में रोमांस की सख़्त कमी है. हाल ही में उनका अपनी पत्नी प्रीति से अलगाव हुआ है. इम्तियाज़ ने सोचा ना था जब वी मेट लव आज कल और रॉकस्टार जैसी रोमांटिक फ़िल्में बनाई हैं. फ़िल्म हाईवे के बारे में उन्होंने कहा ये एकमात्र ऐसी फ़िल्म है जिसकी स्क्रिप्ट ही तैयार नहीं थी. फ़िल्म की कहानी इसके संवाद वगैरह हमने शूटिंग के दौरान ही तैयार किए. हाईवे कहानी है एक सफर की. समाज से दूर रहकर अपनी यात्रा एंजॉय करने की. ग़ौरतलब है कि ट्रैवल यानी यात्रा इम्तियाज़ की सभी फ़िल्मों की थीम रहा है. |
| DATE: 2013-12-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1241] TITLE: अरमान कोहली ज़मानत पर रिहा हुए |
| CONTENT: बिग बॉस के घर में अरमान और तनीषा की अच्छी दोस्ती हो गई है. सोमवार देर रात टीवी रिएल्टी शो बिग बॉस के घर से गिरफ़्तार होने के बाद मंगलवार को अभिनेता अरमान कोहली ज़मानत पर रिहा हो गए हैं. अरमान के ख़िलाफ़ मुंबई के सांताक्रूज़ पुलिस स्टेशन में बिग बॉस में हिस्सा लेने वाली मॉडल और गायिका सोफ़िया हयात ने मारपीट और दुर्व्यवहार की शिकायत दर्ज करवाई थी. सोमवार को अरमान की गिरफ़्तारी के बाद उन्हें मुंबई के लोनावला पुलिस थाने में रखा गया था. इस दौरान अरमान से पूछताछ भी की गई. सेफ़िया की शिकायत के बाद अरमान पर भारतीय दण्ड संहिता आईपीसी की धारा 324 धारा 504 धारा 506 और धारा 506 लगाई गई. लोनावला पुलिस थाने के हेड कांस्टेबल विश्वास अंबेकर ने बीबीसी को बताया कि रात में गिरफ़्तारी के बाद अरमान का बयान दर्ज किया गया. मंगलवार को अरमान को वडगाव कोर्ट में पेश किया जाना था लेकिन उससे पहले ही अरमान के वकील और परिवार वाले उनकी ज़मानत के कागज़ात लेकर पहुंच गए. उधर दूसरी ओर सोफ़िया कहती हैं कि वो चाहती हैं कि अरमान को उनके बर्ताव के लिए कड़ी सज़ा मिले. उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें भारतीय न्याय प्रणाली पर पूरा भरोसा है. |
| DATE: 2013-12-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1242] TITLE: सुज़ैन-ऋतिक अलगाव पर क्या बोले अभिषेक बच्चन? |
| CONTENT: अभिषेक बच्चन की अपने दोस्त ऋतिक रोशन और सुज़ैन रोशन के तलाक पर प्रतिक्रिया आमिर ख़ान क्यों हुए हैरान और कैसे हुई मुफ़्त में महाभारत. पढ़िए मुंबई डायरी में. अभिनेता अभिषेक बच्चन ने अपने क़रीबी दोस्त ऋतिक रोशन के उनकी पत्नी सुज़ैन से अलगाव पर पहली बार प्रतिक्रिया दी. अभिषेक ने प्रशंसकों से और मीडिया से गुज़ारिश करते हुए कहा ऋतिक रोशन ने अपनी निजता का सम्मान बनाए रखने की प्रार्थना हम सबसे की है. हमें उनकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए. हमें उन्हें अकेला छोड़ देना चाहिए. बस हमें दुआ करना चाहिए कि इस कठिन समय को सहने की उन्हें ताक़त मिले. इससे पहले अभिनेता अर्जुन रामपाल ने भी मीडिया ये यही ग़ुज़ारिश करते हुए इन अफ़वाहों को निराधार बताया कि ऋतिक और सुज़ैन के अलगाव में उनका हाथ है. तरुण तेजपाल पर एक महिला पत्रकार द्वारा लगाए गए यौन शोषण पर पहली बार अभिनेता आमिर ख़ान ने खुलकर अपने विचार रखे हैं. मुंबई में पत्रकारों से रूबरू आमिर ने कहा मुझे इस बात से झटका लगा है कि तेजपाल भी ऐसी हरकत कर सकते हैं. मैं उन्हें बेहद अच्छी तरह से जानता था. कई बार मेरी मुलाक़ात भी हुई. जब मीडिया के ज़रिए उऩ पर लगे आरोपों के बारे में मुझे पता लगा तो मुझे बहुत धक्का पहुंचा. आमिर ख़ान ने आगे कहा इस मामले में जो कुछ हुआ उससे मुझे बड़ी निराशा हुई है. मैं तरुण को जानता हूं और मैं वाकई इस बात से विचलित हूं कि उन्होंने ऐसा किया होगा. यह बहुत दुखद है. लड़की जिस भी स्थिति से गुज़र रही है उसमें मेरी संवेदना उसके साथ हैं. मैं समझता हूं कि हम सभी को उसके समर्थन में खड़ा रहना चाहिए. एनिमेशन फ़िल्म महाभारत में पात्रों की डबिंग बॉलीवुड के कई नामचीन सितारों ने की. लेकिन दिलचस्प बात तो ये है कि इस काम के लिए किसी ने एक पैसा भी नहीं लिया. फ़िल्म के निर्माता जयंतीलाल गढ़ा ने इस बात की जानकारी मीडिया को दी. फ़िल्म में भीष्म पितामह के लिए अमिताभ बच्चन ने कृष्ण के किरदार के लिए अजय देवगन ने कर्ण के लिए अनिल कपूर ने भीम के लिए सनी देओल ने दुर्योधन के लिए जैकी श्रॉफ़ ने और द्रौपदी के किरदार के लिए विद्या बालन ने अपनी आवाज़ दी. दिलचस्प बात ये भी है कि इन एनिमेटेड किरदारों की शक्ल भी इनको आवाज़ देने वाले किरदारों जैसी ही दी गई है. एनिमेशन फ़िल्म महाभारत 27 दिसंबर को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2013-12-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1243] TITLE: ऑस्कर भी आम पान मसाला अवॉर्ड्स तरह फ़िक्स होते हैं: नसीरुद्दीन शाह |
| CONTENT: अभिनेता नसीरुद्दीन शाह सार्वजनिक तौर पर मीडिया से बात करते हुए बहुत कम ही दिखते हैं. यहां तक कि अपनी आगामी फ़िल्म डेढ़ इश्क़िया के प्रमोशन के लिए भी वो बहुत झिझकते हुए सामने आ रहे हैं. इसी सिलसिले में मीडिया से रूबरू होते हुए उन्होंने डेढ़ इश्क़िया के अलावा बॉलीवुड और भारतीय सिनेमा पर भी बात की. उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि कई भारतीय फ़िल्मकार ऑस्कर पुरस्कारों के पीछे भागते हैं. उन्होंने कहा ऑस्कर के प्रति ये चाहत मुझे हास्यास्पद लगती है. क्योंकि मुझे लगता है कि हमें कभी ऑस्कर नहीं मिलेगा. इसलिए इसकी चिंता छोड़कर हमें वैसी ही फ़िल्में बनानी चाहिए जैसी हम बनाते चले आ रहे हैं. इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए नसीर बोले ऑस्कर पुरस्कार भी किसी आम पान मसाला फ़िल्म अवॉर्ड्स की तरह ही पूर्व निर्धारित होते हैं. इनके पीछे भागना बेकार है. नसीरुद्दीन शाह ने बताया कि वो ज़्यादा हिंदी फ़िल्में नहीं देखते लेकिन बीते सालों में उन्हें देव डी डेल्ही बैली गैंग्स ऑफ़ वासेपुर और राजकुमार हीरानी की फ़िल्में पसंद आईं. वो कहते हैं कि इरफ़ान नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी और मनोज बाजपेई जैसे कलाकार बेहद अच्छे हैं. नसीरुद्दीन शाह ने बताया कि डेढ़ इश्क़िया में माधुरी दीक्षित के साथ काम करने का अनुभव बेहद अच्छा रहा. वो कहते हैं माधुरी दीक्षित बहुत कमाल की अदाकारा हैं. इतनी कामयाबी हासिल करने के बाद भी उनका सरल स्वभाव मन मोह लेता है. मैं उनका प्रशंसक हूं. फ़िल्म में उनके और माधुरी दीक्षित के बीच कथित तौर पर अंतरंग दृश्य होने की बात सामने आई. इस बात से पर्दा उठाते हुए नसीरुद्दीन शाह बोले मेरे और माधुरी के बीच कुछ रूमानी दृश्य हैं लेकिन अंतरंग दृश्य बिलकुल नहीं है. तो जो लोग इस उम्मीद में हैं उन्हें बता दूं कि एक भी दृश्य अंतरंग किस्म का नहीं है. उन्होंने ये उम्मीद भी जताई कि उनकी और अरशद वारसी की जुगलबंदी एक बार फिर दर्शकों को पसंद आएगी. डेढ़ इश्क़िया साल 2010 में रिलीज़ हुई इश्क़िया का सीक्वल है. फ़िल्म 10 जनवरी 2014 को रिलीज़ होगी. |
| DATE: 2013-12-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1244] TITLE: बिग बॉस के घर से अरमान कोहली गिरफ़्तार |
| CONTENT: चर्चित टीवी शो बिग बॉस - 7 के प्रतिभागी अरमान कोहली को लोनावला पुलिस ने सोमवार को बिग बॉस के घर से गिरफ़्तार किया है. अरमान कोहली को बिग बॉस की ही एक अन्य प्रतिभागी सोफ़िया हयात की शिक़ायत के आधार पर गिरफ़्तार किया गया. बीबीसी संवाददाता मधु पाल के अनुसार लोनावला पुलिस ने अरमान कोहली को पूछताछ के लिए सोमवार रात करीब दस बजे बिग बॉस के घर से गिरफ़्तार किया. रियलिटी टीवी शो बिग बॉस-7 से हाल ही में बाहर हुई ब्रिटिश अभिनेत्री सोफ़िया हयात ने अपने सह प्रतियोगी अरमान कोहली पर बदतमीज़ी और मारपीट का आरोप लगाते हुए मुंबई के सांताक्रुज पुलिस थाने में शिक़ायत दर्ज कराई थी. शो में सोफ़िया और अरमान की कई बार तू-तू मैं-मैं हुई थी और दोनों ने ही खुलकर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ अपशब्दों का इस्तेमाल किया था. बीबीसी से ख़ास बातचीत में सोफ़िया ने कहा था शो के दौरान जब मैं वाइपर से कार साफ़ कर रही थी तो अरमान ने उसे मुझसे छीनने की कोशिश की और छीना-झपटी में मुझे चोट भी लगी. शो में वो बहुत आक्रामक हो गए थे. टीवी पर वो सारे दृश्य हटा दिए गए थे. शो में जितना दिखता है वो उससे कहीं ज़्यादा आक्रामक और हमलावर हैं. सोफ़िया ने ये भी कहा कि अरमान ने ना सिर्फ़ उनके साथ बल्कि शो में मौजूद दूसरी महिला प्रतियोगियों के साथ भी कई दफ़ा बदतमीज़ी की. बिग बॉस शो पर पहले भी कई तरह के आरोप लग चुके हैं. पिछले साल भी शो में प्रतियोगियों द्वारा अभद्र भाषा के इस्तेमाल के आरोप लगे थे जिसके बाद कुछ दिनों के लिए शो का वक़्त प्राइम टाइम से हटाकर रात 10 बजे कर दिया गया था. बाद में शो के आयोजकों ने जब सूचना और प्रसारण मंत्रालय को आश्वासन दिया कि शो में ऐसा नहीं होगा तब इसे वापस प्राइम टाइम पर लाया गया. |
| DATE: 2013-12-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1245] TITLE: मुझे सलमान सख़्त नापसंद थे: आमिर ख़ान |
| CONTENT: आमिर ख़ान और सलमान ख़ान एक दूसरे के बेहतरीन दोस्त माने जाते हैं और दोनों सार्वजनिक तौर पर एक दूसरे की तारीफ़ भी करते रहते हैं. लेकिन एक वक़्त ऐसा था जब आमिर ख़ान सलमान को बिलकुल पसंद नहीं करते थे. पहली बार चैट शो कॉफ़ी विद करन में आए आमिर ख़ान ने खुलकर शो के मेज़बान करण जौहर के सामने अपनी बातें रखीं. सलमान के बारे में आमिर ख़ान ने कहा फ़िल्म अंदाज़ अपना-अपना में मेरा सलमान के साथ काम करने का बेहद बुरा अनुभव रहा. मैंने उन्हें बेहद अशिष्ट और बेपरवाह पाया. मैं हालांकि जब जब उनसे मिलता तो शालीनता पूर्वक बात करता लेकिन अंदाज़ अपना-अपना के बाद मैं उनसे दूर ही रहने की कोशिश करता. हालांकि आमिर ने ये भी माना कि सलमान के बारे में उनके विचार बाद में पूरी तरह से बदल गए. उन्होंने कहा सलमान दोबारा मेरी ज़िंदगी में तब आए जब मेरा अपनी पत्नी रीना के साथ अलगाव हुआ था. तब मैं अपनी ज़िंदगी में बेहद निराशा के दौर से गुज़र रहा था. मैं डेढ़ साल तक तक़रीबन अपने घर में ही बंद रहा. मैं और सलमान एक ड्रिंक पर मिले. मुझे पता नहीं क्या हुआ लेकिन हम दोनों एक दूसरे से जुड़ गए. और हमारी दोस्ती बढ़ती ही चली गई. शाहरुख़ ख़ान के बारे में आमिर ने कहा हम दोनों एक-दूसरे के काम की बहुत इज़्ज़त करते हैं. लेकिन हम दोनों एक दूसरे की निजता का भी सम्मान करते हैं. लेकिन हां कुछ क्षण आए जब हमारे रिश्तों में तनाव था. क्या कभी उन्होंने अपने और शाहरुख़ के बीच की दूरी मिटाने की कोशिश की. इस पर आमिर ने कहा हम दोनों की ज़िंदगी के रास्ते उतने ज़्यादा नहीं मिलते. वो बहुत अच्छा कर रहे हैं. उनका बेहतरीन परिवार है. बेहतरीन दोस्त हैं. मुझे नहीं लगता कि उन्हें मेरी ज़रूरत है. मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं. मुझे एक दर्शक के तौर पर उनका काम देखना पसंद है. आमिर के साथ उनकी पत्नी किरण राव भी शो के दौरान मौजूद रहीं. |
| DATE: 2013-12-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1246] TITLE: इंडियन आइडल 2 संदीप आचार्य का निधन |
| CONTENT: टीवी रियल्टी शो इंडियन आइडल के दूसरे सीज़न के विजेता संदीप आचार्य का गुडगांव के एक अस्पताल में निधन हो गया. वो हेपेटाइटिस से पीड़ित थे. उन्हें 2006 में इंडियन आइडल 2 का विजेता चुना गया. वो अन्य कई टीवी शो में भी दिखाई दिए जिनमें जल्वा फ़ॉर टू का वन और गोल्डन वॉइस ऑफ राजस्थान भी शामिल हैं. उनका संबंध राजस्थान के बीकानेर से था. जाने माने गायक सोनू निगम रविवार को ट्वीट किया संदीप आचार्य का निधन हो गया हे भगवान 15 मिनट पहले ही उनके विकीपीडिया पेज को अपडेट किया गया है. क्या किसी को इस बारे में पता है. बड़े दुख की बात है. सोनी टीवी ने अपने ट्वीट में संदीप के निधन की पुष्टि की. ट्वीट में कहा गया इंडियन आइडल2 के विजेता संदीप आचार्य की मौत हम सब के लिए बहुत बड़ा सदमा है. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार को इस दुख घड़ी में उनके परिवार को ताकत दे. 29 वर्षीय संदीप शादी शुदा थे और उनकी एक महीने की एक बेटी भी है. उनकी वेबसाइट के अनुसार वो अपने दो बहनों और एक भाई में सबसे छोटे थे. जानी मानी गायिका श्रेया घोषाल ने भी संदीप की अचानक मौत पर दुख जताया है जबकि इंडियन आइडल की होस्ट मिनी माथुर ने ट्वीट किया है बड़े दुख की बात है. एक प्रतिभाशाली महत्वाकांक्षी मिलनसार व्यक्ति को समय से पहले ही अलविदा कहना पड़ा. संदीप आचार्य आपकी आत्मा को शांति मिले. |
| DATE: 2013-12-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1247] TITLE: इधर संजू जेल से बाहर, उधर 'मुन्नाभाई' शुरू: अरशद वारसी |
| CONTENT: मुन्नाभाई सीरीज़ की पिछली फ़िल्म लगे रहो मुन्नाभाई साल 2006 में रिलीज़ हुई थी और तब से लेकर इसकी तीसरी फ़िल्म को लेकर लगातार अटकलें लगाई जाती रहीं लेकिन किसी न किसी वजह से मामला टलता रहा. पहले फ़िल्म के निर्देशक राजकुमार हीरानी थ्री इडियट्स और फिर पीके फ़िल्मों में व्यस्त हो गए और फिर फ़िल्म के मुख्य कलाकार संजय दत्त को 1993 मुंबई बम ब्लास्ट से जुड़े एक मामले में जेल जाना पड़ा जिससे फ़िल्म खटाई में पड़ गई. लेकिन इस सीरीज़ में सर्किट की भूमिका निभाने वाले अरशद वारसी फ़िल्म को लेकर बड़े आशान्वित हैं. बीबीसी से हुई ख़ास बातचीत में उन्होंने बताया सुभाष कपूर फ़िल्म की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं. जब तक उनकी स्क्रिप्ट पूरी होगी तब तक संजय दत्त भी जेल से बाहर आ जाएंगे. इधर संजू जेल से बाहर आए उधर हमने मुन्नाभाई शुरू की. सुभाष कपूर ने अरशद वारसी अभिनीत फ़िल्म जॉली एलएलबी का निर्देशन किया था. हालांकि मुन्नाभाई एमबीबीएस और लगे रहो मुन्नाभाई का निर्देशन राजकुमार हीरानी ने किया था लेकिन दूसरी फ़िल्मों में व्यस्त होने की वजह से वह इस सीरीज़ की तीसरी फ़िल्म पर काम नहीं कर पाए तब निर्माता विधु विनोद चोपड़ा ने फ़िल्म की कहानी लिखने की और निर्देशन की ज़िम्मेदारी सुभाष कपूर को सौंपी. अरशद वारसी मानते हैं कि बाहरी लोगों को फ़िल्म इंडस्ट्री में जगह बनाने में ख़ासी मशक्कत करनी पड़ती है. वह मानते हैं कि सितारों के परिवार वालों को अपेक्षाकृत आसानी होती है. उन्होंने कहा जब शाहरुख़ ख़ान और अक्षय कुमार वगैरह ने फ़िल्मों में दस्तक दी तो उस वक़्त अभिषेक बच्चन और ऋतिक रोशन जैसे कलाकार छोटे थे. इसलिए शाहरुख़ वगैरह को अपना हुनर दिखाने के लिए खुला मैदान मिल गया. जब मैं फ़िल्मों में आया तो ऋतिक वगैरह बड़े हो चुके थे. इसलिए मुझे काफी संघर्ष करना पड़ा. अब तो भैया जब तक ये लोग बूढ़े नहीं हो जाते बाहर वालों को बड़ा संघर्ष करना पड़ेगा. अरशद वारसी की आने वाली फ़िल्म है डेढ़ इश्क़िया जो 10 जनवरी को रिलीज़ हो रही है. इसमें उनके अलावा नसीरुद्दीन शाह माधुरी दीक्षित और हुमा क़ुरैशी की मुख्य भूमिका है. वह कहते हैं नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार के साथ काम करने का लुत्फ़ ही कुछ और है. वह बेहद सेक्योर एक्टर हैं. उन्हें पता है कि वह क्या हैं इसलिए बड़े रिलैक्स्ड रहते हैं. मुझे उनका साथ बड़ा पसंद है. अरशद वारसी ने बताया कि उनके संघर्ष के दिनों में जब 2-3 साल तक उनके पास कोई फ़िल्म नहीं थी तब उनकी पत्नी मारिया ने उन्हें बड़ा सहयोग दिया. वह बताते हैं मारिया के पास नौकरी थी. उन्होंने मुझे भावनात्मक और वित्तीय सहारा दिया. जिस वजह से मैं फिर से वापसी कर पाया. अरशद वारसी ने बताया कि वह अमिताभ बच्चन के बहुत बड़े प्रशंसक हैं. अभिनेत्रियों में वह माधुरी दीक्षित और काजोल को पसंद करते हैं. |
| DATE: 2013-12-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1248] TITLE: पूनम-राखी के हथकंडों से डिंपल नाराज़ ! |
| CONTENT: इस सप्ताह रिलीज़ होने वाली फ़िल्म वॉट द फ़िश के प्रमोशन के तरीक़े ने इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभा रही अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया को सख्त नाराज़ कर दिया. दरअसल फ़िल्म का प्रचार कर रही पीआर कंपनी ने फ़िल्म को प्रमोट करने के लिए राखी सावंत और पूनम पांडेय को बुलावा भेजा. दोनों का फ़िल्म से कोई लेना-देना नहीं है. पूनम ने इवेंट पर जाने से पहले ट्विटर पर अपनी एक उत्तेजक फ़ोटो भी डाली और ऐलान किया कि वो डिंपल कपाड़िया के लिए स्ट्रिप भी करेंगी. राखी और पूनम दोनों ही इस इवेंट पर बेहद भड़कीले कपड़े पहनकर गईं. डिंपल कपाड़िया यहां गई ही नहीं और कथित तौर पर फ़िल्म की पीआर कंपनी से अपनी नाराज़गी भी जताई. कहा जा रहा है कि राखी और पूनम को मोटे पैसे देकर इस इवेंट में बुलाया गया था. इस साल शूटआउट एट वडाला में बबली बदमाश ज़ंजीर में पिंकी पैसे वालों की और राम-लीला में भी एक आइटम नंबर करने के बाद अब प्रियंका चोपड़ा कैबरे करते दिखेंगी. वो यशराज बैनर की आने वाली फ़िल्म गुंडे में हेलन की तरह कैबरे करेंगी. गुंडे फ़रवरी 2014 में रिलीज़ हो रही है. इसमें रणवीर सिंह अर्जुन कपूर और इरफ़ान की मुख्य भूमिका है. फ़िल्म में प्रियंका कोलकाता की एक लड़की का किरदार निभा रही हैं जो कैबरे करके अपने जीवन चलाती है. साल 2013 की सुपरहिट फ़िल्म चेन्नई एक्सप्रेस को अमरीका की मशहूर व्हार्टन यूनिवर्सिटी से एक ख़ास अवॉर्ड मिला है. फ़िल्म को ये अवॉर्ड मिला है सोशल मीडिया के ज़रिए बेहतरीन तरीक़े से मार्केटिंग करने के लिए. रिलीज़ से पहले और बाद में भी फ़िल्म को फ़ेसबुक यूट्यूब और ट्विटर के ज़रिए धुआंधार तरीक़े से प्रमोट किया गया और माना जा रहा है कि इसकी कामयाबी के पीछे बहुत हद तक इस तरह के प्रचार का भी योगदान है. |
| DATE: 2013-12-12 |
| LABEL: entertainment |
| [1249] TITLE: थोड़ा काम, ज़्यादा आराम, यही मेरी फितरत: फारुख़ शेख़ |
| CONTENT: हाल ही में फारुख़ शेख़ और सारिका कल्ब 60 में नज़र आए. अभिनेता फारुख़ शेख़ का नाम सुनते ही शायद आपके ज़हन में आती हों चश्मेबद्दूर साथ-साथ और कथा जैसी फ़िल्में. फारुख़ साहब ने अपने करियर की शुरुआत की 1973 में आई फ़िल्म गरम हवा से और वो हाल ही में नज़र आए क्लब 60 में. चालीस सालों से लगातार अभिनय से जुड़े फारुख़ शेख़ कहते हैं कि वह कम काम और ज़्यादा आराम में यकीन रखते हैं. बीबीसी से हुई बातचीत के दौरान फारुख़ शेख़ बोले थोड़ा काम करना और ज़्यादा आराम करना मेरी फितरत में शामिल है. एक दिन काम किया तो चार दिन आराम कर लो. वरना ऐसा लगता है मानो आप किसी दफ्तर में जा रहे हैं. मुझे उससे बहुत बोरियत होती है. फारुख़ साहब कहते हैं मैं रोज़ काम नहीं कर सकता. अगर कोई मुझसे कहे कि मुझे रोज़ाना काम करना है तो मैं भाग जाऊंगा. अगर इंडस्ट्री में कोई मुझे कहे कि साहब आप साल में छह फ़िल्में कर लीजिए तो भी मैं भाग जाऊंगा. वैसे कम काम करना मेरे ही नहीं बल्कि दर्शकों की सेहत के लिए भी अच्छा है. फारुख़ शेख़ कहते हैं कि उन्हें कम फ़िल्मों में ही काम करना अच्छा लगता है. भई फारुख़ शेख़ का कम काम करना उनके लिए अच्छा हो सकता है लेकिन दर्शकों को इससे क्या फायदा है भला इस सवाल का जवाब देते हुए वह कहते हैं अगर दर्शक मुझे सुबह-शाम हर रोज़ हर जगह देखने लग गए तो वे जल्द ही मुझसे ऊब जाएंगे. यही सोचेंगे कि कमबख़्त जाता ही नहीं है लगा ही रहता है. फारुख़ शेख़ ये भी मानते हैं कि फ़िल्में करना उनका एक शौक है. वह कहते हैं फ़िल्में करना मेरा जूनून नहीं है. बल्कि ये तो मेरा एक शौक है. एक ऐसा शौक जिसे करने से मुझे पैसे भी मिल जाते हैं. फ़िल्में करने का शौक तो अपनी जगह ठीक है लेकिन चालीस साल के लंबे करियर में कभी ऐसा हुआ कि उन्हें लगा कि करने को फ़िल्में नहीं हैं कोई पूछ नहीं रहा इस सवाल का जवाब भी अपने चिर-परिचित अंदाज़ में देते हुए फारुख़ साहब कहते हैं मैंने कभी भी ज़्यादा फ़िल्में करना पसंद नहीं किया. न ही मैं उस श्रेणी में कभी था कि ये है तो बस अब हमारी फ़िल्म 100 करोड़ का बिज़नेस कर लेगी. फारुख़ साहब कम फ़िल्में करते हुए भी अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे. फ़ारुख़ के मुताबिक़ मेरे साथ तो ये होता था कि मेरी फ़िल्म या तो चलती थी या फिर नहीं चलती थी. ये होता था कि फारुख़ शेख़ कि वो फ़िल्म नहीं चली. या ये होता था कि फारुख़ शेख़ कि वो फ़िल्म नहीं चली. ये कभी नहीं होता था कि फारुख़ शेख़ की वजह से ये फ़िल्म चल पड़ी. न तो हम पर फ़िल्म चलाने कि ज़िम्मेदारी थी और न ही हमारे नाम से वो कमाल जुड़ता था. तो मेरे साथ ये कभी नहीं हुआ कि अब तो मामला निपट गया. साथ ही वह ये भी कहते हैं कि किसी ने कभी ये नहीं कहा कि देखिए ये तो बड़े बॉक्स ऑफिस स्टार थे पर अब तो इनकी फ़िल्में पिट जाती हैं. फारुख़ शेख़ ये भी स्वीकार करते हुए ज़रा नहीं झिझकते कि वह कभी भी ए-लिस्ट की श्रेणी में आने वाले स्टार नहीं रहे. वह कहते हैं सैकड़ों फ़िल्में हर साल बनती हैं. और मुख्य किरदार निभाने वाले कलाकार गिनती के 15 या 20 होंगे. तो जो बहुत टॉप के सितारों को काम मिलेगा वो काम आप को नहीं मिल सकता. |
| DATE: 2013-12-12 |
| LABEL: entertainment |
| [1250] TITLE: दिलीप कुमार का जन्मदिन और पेशावर में कटा |
| CONTENT: हिंदी फिल्मों के महान अभिनेता दिलीप कुमार का जन्मदिन भारत में फ़िल्म उद्योग और उनके प्रशंसक तो मनाते ही हैं पाकिस्तान में उनके जन्म स्थान पेशावर में भी उनका जन्मदिन मनाया गया. बाक़ायदा केक काटा गया और फ़ोन लाइन पर मौजूद थे दिलीप कुमार और उनकी पत्नी सायरा बानो. फ़ोन लाइन पर अभिनेत्री वहीदा रहमान और कॉमेडियन जॉनी लीवर भी थे. पेशावर की मशहूर गली किस्सा ख्वानी में दिलीप कुमार का घर था. 1922 में इसी गली के एक मकान में दिलीप कुमार का जन्म हुआ था. दिलीप कुमार भले ही पेशावर से मुंबई चले गए लेकिन इस शहर से उनका नाता कभी नहीं टूटा. यहां के लोगों ने भी उन्हें कभी नहीं भुलाया. सायरा बानो ने बताया कि हर साल दिलीप साहब के जन्मदिन से कई दिन पहले ही बधाइयों का सिलसिला शुरू हो जाता है और दुनिया भर से लोग फ़ोन करते हैं लेकिन पेशावर से आने वाली मुबारक़बाद दिलीप कुमार के लिए ख़ास मायने रखती है. सायरा बानो ने बताया कि दिलीप साहब की तबीयत अब काफ़ी बेहतर है और छह दिंसबर को वे पारिवारिक शादी में शामिल भी हुए थे. वहीदा रहमान और जॉनी लीवर भी पेशावर में हुए इस जश्न में शामिल हुए- फ़ोन के ज़रिए. दिल दिया दर्द लिया समेत दिलीप कुमार के साथ चार फिल्मों में काम करने वाली वहीदा रहमान ने भी अपनी यादें बांटी. वहीदा रहमान ने बताया दिलीप कुमार के साथ काम करना बहुत अच्छा अनुभव होता था. वे साथी कलाकार को समझते थे. एकदम जेंटलमैन थे. उन्होंने कहास लोग उन्हें ट्रैजडी किंग कहते हैं लेकिन मैं तो उन्हें कॉमेडी किंग भी मानती हूं. सेट पर हम सब लोग अपने अपने साथ किताबें लेकर आते थे पढ़ने के लिए. तो दिलीप कुमार के साथ चर्चा हुआ करती थी कि किसको कौन सी किताब अच्छी लगी. दिलीप कुमार 80 के दशक में पेशावर गए थे और अपने घर भी गए थे. अपने ब्लॉग पर भी वे कभी कभी अपने पुराने घर को याद करते हैं. पिछले साल उनके पुश्तैनी घर को पाकिस्तान ने औपचारिक रूप से राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया था और उसे ख़रीदने का फ़ैसला लिया है. कॉमेडी किरदारों के लिए मशहूर जॉनी लीवर ने भी पेशावर में बैठे लोगों से दिलीप कुमार की यादें सांझा की. जॉनी लीवर ने बताया कि दिलीप कुमार अकसर चैरिटी संस्थाओं की बहुत मदद किया करते थे और अच्छे कलाकार होने के साथ-साथ बेहतर इंसान कैसे बना जाए ये उन्होंने दिलीप कुमार से सीखा. उन्होंने खुशी जताई कि पेशावर में दिलीप कुमार का जन्मदिन मनाया जा रहा है. कभी-कभी जैसी फ़िल्मों के लेखक सागर सरहदी ने इस मौके पर बताया कि एक बार अमिताभ बच्चन ने कहा था कि अगर कोई कलाकार ये कहता है कि उन्होंने दिलीप कुमार कुछ नहीं सीखा तो वो झूठ बोल रहा है. |
| DATE: 2013-12-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1251] TITLE: लोग बोले कवि बनो, एक्टर बनना भूल जाओ: अमिताभ |
| CONTENT: तुम्हारे पिता कवि हैं जाओ उन्हीं की तरह कविता करो. यहां कहां चले आए. अमिताभ बच्चन जब फ़िल्मों में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे तो उनसे निर्माता कुछ ऐसा ही कहते. अमिताभ बच्चन ने ख़ुद मुंबई में हुए एक इवेंट में ये बात बताई. अमिताभ बच्चन इनफ़ोर्मेशन सेंटर से जुड़ी एक कंपनी के ब्रांड प्रमोशन के लिए आए थे. उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा मैं जिसके पास भी काम मांगने जाता तो वो कहते तुम बड़े दुबले पतले और लंबे इंसान हो. फ़िल्मों के लिए फ़िट नहीं हो. कुछ और क्यों नहीं करते. एक्टर बनना भूल जाओ. अमिताभ बच्चन ने कहा कि अपनी इन आलोचनाओं को उन्होंने अपने लिए प्रेरणा के तौर पर लिया और लोगों को ग़लत साबित कर दिखाया. वो कहते हैं जिन जिन लोगों ने मेरी निंदा की मैंने उन्हीं लोगों के साथ काम किया. इस मौक़े पर जब इसी कंपनी से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि जब वो कंपनी के प्रचार के लिए अमिताभ बच्चन के पास गए तो उन्होंने इस उत्पाद के बारे में इतने सवाल किए कि वो परेशान हो गए. इसकी वजह अमिताभ बच्चन ने कुछ यूं बताई दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है. मेरे बिज़नेस को लेकर पिछले अनुभव बेहद कड़वे रहे हैं. इसलिए मैं हर क़दम फूंक फूंक कर उठाना चाहता हूं. अमिताभ बच्चन इस दौरान पूरी तरह हंसी-मज़ाक के मूड में रहे. आदित्य चोपड़ा की अगली फ़िल्म में काम करने के बारे में एक पत्रकार के सवाल पर अमिताभ बच्चन ने कहा नहीं भाई साहब. ऐसा तो कुछ भी नहीं है. लेकिन अगर आपकी उनसे कोई जान-पहचान हो तो मेरे नाम की सिफ़ारिश कर दीजिएगा. वैसे भी आजकल काम मिलने में मुश्किल हो रही है. अमिताभ बच्चन की पत्नी जया बच्चन जल्द एक टीवी सीरियल में नज़र आने वाली हैं. अमिताभ ने अपनी पत्नी के टीवी करियर की शुरुआत पर ख़ुशी जताई. अमिताभ बच्चन की आने वाली फ़िल्में हैं सुधीर मिश्रा की पहले आप जनाब और भूतनाथ-2. इसके अलावा वो संजय दत्त प्रोडक्शन की एक फ़िल्म में भी काम कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि इस फ़िल्म में वो राज कपूर के सुपरहिट गाने किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार में अभिनय करते दिखेंगे. अमिताभ ने इन ख़बरों का भी खंडन किया कि वो और रेखा 32 सालों बाद फिर से किसी फ़िल्म में नज़र आएंगे. |
| DATE: 2013-12-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1252] TITLE: साथ जन्मीं चार बहनें, फ़िल्म में भी एक साथ |
| CONTENT: राम-श्याम सीता और गीता और जुड़वां जैसी फ़िल्में शायद आपने देखी हों. शायद आपने चलती का नाम गाड़ी भी देखी होगी जिसमें सगे भाइयों किशोर कुमार अनूप कुमार और अशोक कुमार ने एक साथ काम किया था. लेकिन एक तमिल फ़िल्म निर्देशक जी रमेश ऐसी फ़िल्म बनाने जा रहे हैं जिसमें चार सगी बहनें काम कर रही हैं. इन चारों का जन्म आठ साल पहले एक साथ हुआ था. एन्ना सतम इंद नेर्म नाम की इस फ़िल्म में चेन्नई की रहने वाली आरती आकृति आपति और अक्षिति काम कर रही हैं. नाम की ही तरह इन चारों बहनों की शक्ल भी मिलती है. जी रमेश जब उनसे मिले तभी उन्हें लग गया था कि ये उनकी फ़िल्म के लिए बिल्कुल ठीक अभिनेत्री होंगी. जी रमेश कहते हैं इस कहानी के लिए किसी भी तरह ऐसे क्वाड्रोप्लेट्स चाहिए थे. इनके बारे में पता चलने के बाद भी इतनी उम्मीद नहीं थी क्योंकि इनको और इनके घर वालों को सिनेमा का कोई आइडिया नहीं था. यहाँ तक कि वे ज़्यादा टीवी भी नहीं देखते थे. इन चारों बहनों के माता-पिता श्रुति और विवेक से जी रमेश ने जब इस बारे में बात की तो पहले तो वो काफी चौंक गए लेकिन बाद में उन्होंने इन बच्चियों को फ़िल्म में काम करने की इजाज़त दे दी. आरती आकृति आपति और अक्षिति को माइक या कैमरा का कोई अनुभव नहीं था. इसलिए जी रमेश के लिए इन बच्चियों से अभिनय करवाना थोड़ा मुश्किल था. जी रमेश ने पहले इन चारों बहनों को फ़िल्मों और अभिनय के बारे में थोड़ी ट्रेनिंग दी. शूटिंग से पहले ये चारों बहनें सेट पर जमकर शरारत करती थीं लेकिन शॉट रेडी की आवाज़ सुनते ही अनुभवी अभिनेताओं की तरह शॉट के लिए तैयार हो जाती थीं. फ़िल्म अभिनेत्री मानु चार बहनों की मां का किरदार निभा रही हैं. कुछ दिनों के बाद तो निर्देशक और कैमरामैन को ये चारों बहनें शॉट के बारे में अपनी राय भी बताने लगी. शक्ल एक जैसी होने की वजह से प्रोड्यूसर को उन्हें पहचानने में भी दिक्कत होती थी. इसी फ़िल्म के ज़रिए तमिल अभिनेत्री मानु भी फिर से फ़िल्मों में आ रही हैं. मानु इन चारों बहनों के बारे में कहती हैं सबसे अच्छी बात तो ये है कि उनका बर्ताव सब के साथ बहुत अच्छा है और वे इतने अच्छे-अच्छे सवाल पूछते हैं कि हमें जवाब देने में मुश्किल होती हैं. मानु इस फ़िल्म में इन चारों बहनों की मां का किरदार निभा रही हैं. बड़े पर्दे की मां इन बहनों से ख़ुश हैं तो उनकी असली ज़िंदगी की मां को उनकी पढ़ाई की चिंता सता रही है. इन चारों बहनों को फ़िल्म की शूटिंग के लिए स्कूल से छुट्टी लेनी पड़ी और इस वजह से उन्हें एक नहीं चार-चार प्रोजेक्ट और होमवर्क करना पड़ा. इन चारों बहनों की मां श्रुति कहती हैं सबसे पहले तो उनकी पढ़ाई उसके बाद ही सिनेमा और बाकी सब कुछ. किसी भी हालत में उस पर हम असर होने नहीं देंगे. हालाँकि यह फ़िल्म जनवरी में रिलीज़ होगी लेकिन चार सगी बहनों के इस फ़िल्म में काम करने की वजह से इसे लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में शामिल कर लिया गया है. फ़िल्म के डायरेक्टर जी रमेश और पूरी टीम का कहना है कि अच्छा प्रदर्शन करने के लिए अब दबाव और बढ़ गया है. उन्हें उम्मीद है कि लोग इस कॉमेडी-थ्रिलर को पसंद करेंगे. दबाव एक तरफ तो शरारतें और ख़ुशी दूसरी तरफ. बातें करते-करते आरती आकृति आपति और अक्षिति अपनी कुर्सियां बदलतीं हैं और हँसते हुए हम से पूछती हैं अब आप हमारे नाम बताइएइस सवाल का जवाब देना मेरे लिए वाकई काफी मुश्किल है. |
| DATE: 2013-12-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1253] TITLE: दिलीप साहब का जादू आज भी मेरे सर चढ़ कर बोलता है: सायरा |
| CONTENT: सायरा बानो की फ़िल्म का एक गाना है उनसे मिली नज़र के मेरे होश उड़ गए ये गाना सायरा जी की निजी ज़िंदगी पर भी एक दम फिट बैठता है. बारह साल की सायरा बानो की नज़र जब पहली बार दिलीप कुमार से मिली तो उसका असर सायरा जी पर कुछ ऐसा हुआ कि वो दिलीप साहब से मोहब्बत कर बैठीं. दिलीप कुमार और सायरा बानो की शादी को 57 साल हो गए हैं लेकिन आज भी सायरा जी पर दिलीप साहब का जादू बरकरार है. भारतीय सिनेमा के महान अदाकारों में से एक दिलीप कुमार आज अपना 91वां जन्मदिन मना रहे हैं. इस मौके पर उनकी बेगम सायरा बानो ने बीबीसी से साझा की अपने पुराने दिनों की यादें. दिलीप साहब से अपनी पहली मुलाक़ात को याद करते हुए सायरा जी कहती हैं दुनिया जानती है कि जब मैं 12 साल की थी तब से मेरे ज़हन में दिलीप साहब बैठे हुए हैं. दिलीप साहब तो मुझे एक बच्ची की तरह देखते थे. लेकिन मेरी नज़र में तो दिलीप साहब दुनिया से निराले थे. मुझे तो लगता था कि वो मेरे राजकुमार हैं जो एक सफ़ेद घोड़े पर बैठ कर आएंगे और मुझे ले जाएंगेअपनी पहली मुलाक़ात को बयान करते हुए सायरा जी आगे कहती हैं हमारे एक पहचान वालों के यहां दिलीप साहब आए हुए थे. एक पार्टी थी. सब लोग दिलीप साहब का ऑटोग्राफ ले रहे थे. मुझमें तो इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं उनका ऑटोग्राफ ले लूं. इसके लिए भी मैंने अपनी एक सहेली को आगे कर दिया था. मैं उस वक्त 11 या 12 साल की रही होऊँगी. साहब लोगों से बाते करते रहे और मैं चोरी छिपे उन्हें देखती रही. फिर एक आधा बार मैं मुगल-ए-आज़म की शूटिंग भी देखने गई. बस इन्हीं मुलाक़ातों में मैंने तय कर लिया था कि अगर शादी करुंगी तो साहब से ही करूँगी. मुगल-ए-आज़म से जुड़ी एक और ख़ास याद है सायरा बानो की. वो कहती हैं कि छह दिनों की तैयारी कर वो बड़े चाव से मुगल-ए-आज़म के प्रीमियर पर गईं. वो कहती हैं मैंने ये सोच कर सारी तैयारी की थी कि प्रीमियर पर जब दिलीप साहब मुझे देखेंगे तो बस देखते ही रह जाएंगे. लेकिन दिलीप साहब फ़िल्म के प्रीमियर पर आए ही नहीं. मेरी सारी तैयारी धरी की धरी रह गई. दिलीप कुमार और सायरा बानो की शादी साल 1966 में हुई लेकिन आज भी सायरा जी को दिलीप साहब का वो जन्मदिन याद है जो उन्होंने शादी के बाद पहली बार साथ में मनाया था. उस जन्मदिन को याद करते हुए सायरा बानो कहती हैं मेरी नई-नई शादी हुई थी और दिलीप साहब एक फ़िल्म की शूटिंग के सिलसिले में कोल्हापुर में थे. दिलीप साहब का जन्मदिन मनाने के लिए पूरा यूनिट जुट गया था. खूब शोर शराबा था. दिलीप साहब ने केक भी काटा था. अपनी बात को पूरा करते हुए सायरा बानो कहती हैं मुझे आज भी याद है कि साहब ने क्या कपड़े पहने थे. उन्होंने लंबी बाज़ू की सफ़ेद कमीज़ पहनी थी. सफ़ेद ही उनकी पतलून थी. मैंने भी एक खूबसूरत सी सफ़ेद रंग की साड़ी पहनी थी. वहां हमारे साथ मुमताज़ और प्राण साहब भी थे. दिलीप कुमार और सायरा बानो की उम्र में 22 साल का फर्क है. तो क्या कभी ये फर्क उनके रिश्ते के बीच नहीं आया. इस सवाल का जवाब में सायरा बानो कहती हैं हम दोनों के बीच उम्र के इस फर्क को हमने कभी महसूस ही नहीं किया. उल्टा अब मुझे ये लगने लगा है कि वो मेरे से छोटे हैं. उम्र के इस पड़ाव पर आकर एक बीवी होने के साथ-साथ मैं उनकी एक मां की तरह भी देखभाल करने लगी हूं. सायरा बानो ये भी मानती हैं कि ये भी अपने आप में एक तरह का रोमांस हैं. वो कहती हैं हमारे बारे में अगर मैं कहूं तो मुझे लगता है कि उम्र के साथ हमारे बीच प्यार भी बढ़ता गया. हम तो आज भी एक दूसरे में कुछ न कुछ नया खोज ही लेते हैं. वैसे भी दिलीप साहब मेरे लिए तो एक कोहीनूर हीरे के बराबर हैं. हर दिन कुछ नया होता है उनमें. |
| DATE: 2013-12-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1254] TITLE: माइली सायरस 'सबसे ख़राब ड्रेस' वाली शख़्सियत |
| CONTENT: गायिका और हॉलीवुड अभिनेत्री माइली सायरस को अमरीका की टाइम पत्रिका ने साल 2013 की वर्स्ट ड्रेस्ड सेलेब्रिटी यानी सबसे ख़राब ड्रेस वाली सेलेब्रिटी का ख़िताब दिया. इसी साल हुए एमटीवी वीएमए अवॉर्ड समारोह में उनकी पहनी पोशाक के लिए उन्हें इस ख़िताब से नवाज़ा गया. इस समारोह में उन्होंने बेहद कम कपड़े पहने थे जिसके लिए उनकी कड़ी आलोचना भी हुई थी. टीवी स्टार किम कार्दाशियां इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर रहीं. उन्हें अपनी गर्भावस्था के दौरान सार्वजनिक तौर पर एक अजीब से पहनावे के लिए टॉप 10 वर्स्ट ड्रेस्ड सेलेब्रिटी में जगह मिली. इसके अलावा गायिका केशा टीवी स्टार जुलियान हॉग और ज़ोशा मैमेट को भी इस लिस्ट में अपने ख़राब पहनावे के लिए जगह मिली. द हंगर गेम्स की हीरोइन जेनिफ़र लॉरेंस को साल 2013 की बेस्ट ड्रेस्ड सेलेब्रिटी चुना गया. इस साल ऑस्कर में उन्होंने जो ड्रेस पहनी थी उसके लिए उन्हें ये ख़िताब मिला. डचेस ऑफ़ कैंब्रिज केट मिडिलटन गायिका और अभिनेत्री सेलेना गोम्ज़ और गायिका रिहाना को भी टॉप 10 बेस्ट ड्रेस्ड में जगह मिली. केट मिडिलटन इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर रहीं. अपनी गर्भावस्था के दौरान उन्होंने जिस गरिमामयी तरीक़े से कपड़ों का चुनाव किया उसके लिए इन्हें इस सम्मान का हक़दार माना गया और रिहाना को ग्रैमी अवॉर्ड समारोह के दौरान जो कपड़े पहने थे उसके लिए उन्हें इस लिस्ट में जगह मिली. |
| DATE: 2013-12-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1255] TITLE: आमिर के साथ बनाना चाहूंगी जोड़ी: आशा पारेख |
| CONTENT: देव आनंद शम्मी कपूर धर्मेंद्र और राजेश खन्ना जैसे कई कलाकारों के साथ 60 और 70 के दशक में परदे पर रोमांस कर चुकी अभिनेत्री आशा पारेख को मौजूदा दौर के किसी हीरो के साथ जोड़ी बनानी हो तो उनकी पहली पसंद कौन होगी. जब आशा पारेख से ये सवाल पूछा गया तो वो बोलीं मैं आमिर के साथ जोड़ी बनाना चाहूंगी. वो मुझे बहुत पसंद हैं. साथ ही मुझे शाहरुख़ ख़ान और सलमान ख़ान भी पसंद हैं. आशा ने बताया कि अभिनेत्रियों में वो दीपिका पादुकोण विद्या बालन और प्रियंका चोपड़ा को बहुत पसंद करती हैं. यूटीवी स्टार्स के कार्यक्रम वॉक ऑफ़ द स्टार्स में आशा पारेख ने हिस्सा लेते हुए ये बातें कहीं. वॉक ऑफ़ द स्टार्स के तहत हिंदी सिनेमा के जाने-माने कलाकारों के हाथ और पैर के निशान यादगार के तौर पर लिए जाते हैं और इसी कड़ी में आशा पारेख को भी आमंत्रित किया गया था. इस दौरान आशा पारेख के साथ और उनके दौर में काम कर चुके कई कलाकार जैसे वहीदा रहमान जीतेंद्र हेलन और शम्मी भी मौजूद रहे. आशा पारेख क्या फ़िल्मों में अब नहीं लौटेंगी. ये पूछने पर उन्होंने कहा भविष्य के बारे में क्या कहा जा सकता है. कुछ भी हो सकता है. मैं अभी कुछ नहीं कह सकती. फ़िलहाल मैं कोई स्क्रिप्ट नहीं देख रही हूं. आजकल वो अपना वक़्त कैसे बिताती हैं. ये पूछने पर आशा पारेख ने कहा जो आमतौर पर लोगों की दिनचर्या होती है वही करती हूं. कभी-कभी मैं हेलन शम्मी जी वहीदा रहमान साधना नंदा वगैरह मिलकर बाहर खाना खाने जाते हैं. अपने दौर की बातें करते हैं. बस इसी तरह से हमारा समय बीतता है. आशा पारेख ने कुछ सालों पहले टीवी सीरियल निर्माण में भी क़दम रखा था और कई सीरियल बनाए थे. लेकिन अब वो इस तरह का कोई इरादा नहीं रखतीं. उन्होंने कहा अब तो डेली सोप का ज़माना हो गया है. रचनात्मकता की जगह ही नहीं रह गई है. कई सीरियल तो महिलाओं को इतने बुरे तरीके से पेश करते हैं कि मेरा मन ही नहीं करता उन्हें देखना का. मुझसे इस तरह से काम नहीं होगा. आशा पारेख मौजूदा दौर में फ़िल्मों में आइटम सॉन्ग के चलन से भी ज़्यादा ख़ुश नहीं हैं. वो चाहती हैं कि फ़िल्मों में फ़ोक म्यूज़िक की वापसी होनी चाहिए. |
| DATE: 2013-12-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1256] TITLE: चाचा ऋषि, भतीजी करीना से नाराज़ ? |
| CONTENT: क्या ऋषि कपूर अपनी भतीजी करीना कपूर से हैं नाराज़ सूरज पंचोली पर किसका है हाथ और शत्रुघ्न सिन्हा बनेंगे कृष्ण की आवाज़. पढ़िए ख़बरें मुंबई डायरी में. मशहूर चैट शो कॉफ़ी विद करण में इस रविवार करीना कपूर अपने चचेरे भाई रणबीर कपूर के साथ नज़र आएंगीं. शो के प्रोमो टीवी पर दिखाए जा रहे हैं और कथित तौर पर शो की विषय वस्तु से रणबीर के पिता ऋषि कपूर ख़ासे नाराज़ हैं. सूत्रों के मुताबिक़ ऋषि का गुस्सा ख़ास तौर पर अपनी भतीजी करीना कपूर से है. शो के एक हिस्से में करीना कपूर अभिनेत्री कटरीना कैफ़ को भाभी कहती नज़र आ रही हैं यानी कथित तौर पर वो रणबीर कपूर की पत्नी के रूप में कटरीना को देखना चाहती हैं. साथ ही जब उनसे पूछा गया कि अगर उन्हें किसी समलैंगिक रिश्ते रखने हो तो वो कौन होगा. इसके जवाब में भी करीना ने कहा कि वो अपनी भाभी कटरीना से ही समलैंगिक रिश्ते रखना चाहेंगी. इसी बात पर ऋषि कपूर ख़फ़ा बताए जा रहे हैं. ग़ौरतलब है कि कॉफ़ी विद करण के पिछले संस्करण में भी अभिनेत्री दीपिका पादुकोण और सोनम कपूर जब आईं थीं और उन्होंने रणबीर कपूर के बारे में जो भी कहा उससे भी ऋषि कपूर नाराज़ हो गए थे. अभिनेत्री जिया ख़ान ख़ुदकुशी मामले में आदित्य पंचोली के बेटे सूरज पंचोली का नाम भी आया था और उन्हें कुछ दिन पुलिस का मेहमान भी बनना पड़ा था. फ़िलहाल सूरज ज़मानत पर बाहर हैं और अब उनका ध्यान अपनी पहली फ़िल्म पर है. ये फ़िल्म सलमान ख़ान के बैनर तले बन रही है और ये फ़िल्म वर्ष 1983 की सुपरहिट फ़िल्म हीरो की रीमेक है जिसे सुभाष घई ने बनाया था. सूरज फ़िल्म के लिए लगातार सलमान ख़ान के संपर्क में रहते हैं और उनसे मार्गदर्शन ले रहे हैं. फ़िल्म की हीरोइन हैं अभिनेता सुनील शेट्टी की बेटी. फ़िल्म के अगले साल रिलीज़ होने की संभावना है. अभिनेता और राजनेता शत्रुघ्न सिन्हा एनिमेशन फ़िल्म महाभारत में कृष्ण के किरदार को अपनी आवाज़ देंगे. दिलचस्प बात तो ये है कि इसी फ़िल्म में अमिताभ बच्चन भीष्म पितामह के किरदार के लिए डबिंग करेंगे. शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि वो इस बात से ख़ुश हैं कि अमिताभ बच्चन भी इसी फ़िल्म के लिए अपनी आवाज़ दे रहे हैं. उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें कृष्ण और भीष्म पितामह दोनों के किरदारों में से किसी एक को अपनी आवाज़ के लिए चुनने को कहा गया था और उन्होंने कृष्ण के किरदार को चुना. |
| DATE: 2013-12-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1257] TITLE: जो कुछ हूं, बॉबी की वजह से हूं: डिंपल |
| CONTENT: साल 1973 में रिलीज़ हुई बॉबी के बाद इस फ़िल्म के हीरो ऋषि कपूर और हीरोइन डिंपल कपाड़िया रातों-रात स्टार बन गए थे. राज कपूर निर्देशित इस फ़िल्म को रिलीज़ हुए 40 साल हो चुके हैं लेकिन आज भी डिंपल कपाड़िया अभिनीत फ़िल्मों की लिस्ट में इस फ़िल्म का कोई मुक़ाबला नहीं. वो कहती हैं मैं जो कुछ हूं बॉबी की वजह से हूं. इसी फ़िल्म की वजह से मेरा वजूद है. 40 सालों से इसी फ़िल्म के बलबूते मेरा अस्तित्व है. डिंपल कपाड़िया की नई फ़िल्म वॉट द फ़िश जल्द ही रिलीज़ होने वाली है. इस फ़िल्म के बारे में मीडिया से बात करते हुए वो पुरानी यादों में खो गईं. बॉबी की रिलीज़ के फ़ौरन बाद उन्होंने उस समय के सुपरस्टार राजेश खन्ना से शादी कर ली थी और फिर फ़िल्मों से लंबा ब्रेक ले लिया था. ये ब्रेक क़रीब 11 वर्षों तक चला जिसके बाद फ़िल्म सागर से उन्होंने फ़िल्मों में वापसी की. इस फ़िल्म में उन्होंने ऋषि कपूर और कमल हासन के साथ काम किया था. इसका निर्देशन रमेश सिप्पी ने किया था. क्या उन्होंने फ़िल्मों से ब्रेक ना लिया होता तो उनका करियर कुछ और ही होता ये पूछने पर डिंपल ने कहा हो सकता है मैं उन 10-11 सालों में काम करके ख़त्म हो चुकी होती. इसलिए मुझे कोई अफ़सोस नहीं है. उस दौरान मैंने अपने पारिवारिक जीवन की ज़िम्मेदारियों को निभाया. हालांकि उन्होंने ये ज़रूर माना कि जब वो फ़िल्मों में वापस लौटीं तो मुक़ाबला काफ़ी कड़ा हो चुका था. उन्होंने हंसते हुए कहा तब तक श्रीदेवी हिंदी फ़िल्मों में छा चुकी थीं. उन्होंने मेरे लिए कुछ छोड़ा ही नहीं. डिंपल कपाड़िया ने ये भी माना कि उन्होंने राज कपूर जैसे बेहतरीन फ़िल्मकार के निर्देशन में अपना करियर शुरू किया लेकिन उसके बाद जब वो दोबारा लौटीं तो वो फ़िल्मों का बेहद ख़राब दौर था. उन्होंने कहा राज कपूर जैसे शानदार और जीनियस निर्देशक के साथ काम करने के बाद 80 के दौर में काम करना बड़ा तक़लीफ़देह था. चार सीन उसके बाद दो गाने. निर्देशक के बिना सोचे समझे एक्शन कहना और बिना सोचे समझे कट कह देना. डिंपल कपाड़िया और उनके पति राजेश खन्ना को फ़िल्म प्रेमी एक साथ पर्दे पर कभी नहीं देख पाए. दोनों ने साथ में एक ही फ़िल्म की शूटिंग की जिसका नाम था जय जय शिवशंकर. लेकिन वित्तीय समस्या की वजह से ये फ़िल्म कभी रिलीज़ ही नहीं हो पाई. उन्होंने राजेश खन्ना के बारे में एक दिलचस्प बात बताई. उन्होंने कहा एक दफ़ा उनकी तबियत ठीक नहीं थी. घर के बाहर प्रेस वाले खड़े थे. काका जी बालकनी में जाने लगे. तो मैंने उनसे कहा कि आप शॉल ओढ़ लीजिए और मेरे सन ग्लासेस लगा लीजिए. इस पर उन्होंने मेरी तरफ़ मुड़कर देखा और कहा अब तुम मुझे सिखाओगी कि मुझे क्या करना है. उनके जैसा सुपरस्टार आज तक नहीं हुआ. अपने पसंदीदा को स्टार्स के बारे में उन्होंने कहा कमल हासन मुझे पसंद है. ऋषि कपूर मेरे सबसे पसंदीदा को स्टार हैं. मुझे सैफ़ अली ख़ान और बमन ईरानी भी पसंद हैं. डिंपल कपाड़िया साल 2001 में रिलीज़ हुई दिल चाहता है को अपने करियर की इस तीसरी पारी का अहम मोड़ मानती हैं. वो कहती हैं बहुत कमाल की फ़िल्म थी और सैफ़ आमिर और अक्षय के साथ बड़ा मज़ा आया. डिंपल मानती हैं कि मौजूदा दौर के फ़िल्मकार बेहद समझदार हैं और काफ़ी समझदारी से स्क्रिप्ट लिखते हैं जिस वजह से विविधतापूर्ण फ़िल्में देखने को मिलती हैं और उन जैसी उम्रदराज़ अभिनेत्री के लिए भी रोल लिखे जाते हैं. |
| DATE: 2013-12-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1258] TITLE: जहां पुरुषों का रसूख़, वहां यौन शोषण: चित्रांगदा |
| CONTENT: अभिनेत्री चित्रांगदा सिंह का कहना है कि जहां पुरुषों का रसूख़ होगा वहां यौन शोषण जैसी बातें ज़रूर होंगी. चित्रांगदा की फ़िल्म इनकार कार्यस्थल में महिलाओं के यौन शोषण पर आधारित थी. चित्रांगदा मुंबई में चल रहे ब्राइडल फ़ैशन वीक में हिस्सा लेने आई थीं. जब चित्रांगदा से पूछा गया कि तहलका पत्रिका के संपादक रहे तरुण तेजपाल पर अपनी एक महिला सहकर्मी के कथित यौन शोषण के आरोपों पर उनका क्या सोचना है तब चित्रांगदा ने कहा मैं तरुण तेजपाल के केस के बारे में ज़्यादा नहीं जानती. लेकिन ऐसी कोई भी जगह जहां पुरुषों का वर्चस्व होगा या रसूख़ होगा यौन शोषण जैसी बातें ज़रूर होंगी. चित्रांगदा सिंह अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का मौक़ा मिलने पर भी बेहद उत्साहित हैं और मानती हैं कि उनका बचपन का सपना पूरा हो गया है. वो अमिताभ के साथ सुधीर मिश्रा की फ़िल्म पहले आप जनाब में नज़र आएंगी. पहले इस फ़िल्म का नाम महरुन्निसा था. फ़िल्म की शूटिंग जनवरी 2014 में शुरू होगी. चित्रांगदा ने कहा अमिताभ बच्चन सदाबहार हैं. मैं बचपन से उनकी प्रशंसक हूं. उनके साथ स्क्रीन शेयर करना अद्भुत होगा. इस फ़िल्म में ऋषि कपूर की भी अहम भूमिका होगी. सुधीर मिश्रा के निर्देशन में चित्रांगदा ने इससे पहले हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी ये साली ज़िंदगी और इनकार जैसी फ़िल्में की हैं. ब्राइडल फ़ैशन वीक में रैंप पर चलने के अनुभव को बयां करते हुए चित्रांगदा ने कहा मैं पहले बहुत नर्वस थी. लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता मेरी घबराहट दूर हो गई. मुझे अपनी शादी का दिन याद आ गया. चित्रांगदा मशहूर गॉल्फ़र ज्योति रंधावा की पत्नी हैं. उन्होंने साल 2005 में सुधीर मिश्रा की हज़ार ख्वाहिशें ऐसी से अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत की थी. उसके बाद उन्होंने फ़िल्मों से तीन साल का ब्रेक लिया. फिर साल 2008 में वो ओनीर की फ़िल्म सॉरी भाई में नज़र आईं जो पिट गई. उसके बाद वो अक्षय कुमार के साथ फ़िल्म देसी बॉयज़ में दिखीं. |
| DATE: 2013-12-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1259] TITLE: बॉम्बे टॉकीज़: यहाँ थप्पड़ खाया तो किस्मत चमकी |
| CONTENT: तीस के दशक में बॉम्बे टॉकीज़ एक बहुत बड़ा नाम हुआ करता था. हिमांशु राय राजनारायण दुबे और देविका रानी ने फ़िल्म स्टूडियो बॉम्बे टॉकीज़ की नींव रखी थी. इस स्टूडियो ने कई मशहूर कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका दिया. दिलीप कुमार मधुबाला राज कपूर किशोर कुमार सत्यजीत रे बिमल रॉय और देव आनंद जैसे सितारों ने अपने करियर की शुरुआत इसी बॉम्बे टॉकीज़ से की थी. इस स्टूडियो ने कई यादगार फ़िल्में बनाई जो आज भी लोगों के दिल और दिमाग में बसी हुई है. लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया जब इस बॉम्बे टॉकीज़ को पूरी तरह से बंद कर दिया गया. अब सालों बाद एक बार फिर से बॉम्बे टॉकीज़ का दोबारा शुरू किया जा रहा है. बॉम्बे टॉकीज़ के संस्थापक रहे स्वर्गीय राजनारायण दुबे के पोते अभय कुमार इसे रिलॉन्च कर रहे हैं. अभय अपने दादाजी के सपने को एक बार फिर से साकार करना चाहते हैं. इसलिए वो अपनी पहली फ़िल्म बतौर अभिनेता और निर्माता चाहे कोई मुझे जंगली कहे बना रहे हैं. इस फ़िल्म को वे 2014 में रिलीज़ करेंगे क्योंकि इसी साल बॉम्बे टॉकीज़ अपने 80 साल पूरे करने जा रहा हैं. उस ज़माने में भले घरों की लड़कियों का फ़िल्मों में काम करना अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था और इन्ही हालातों में बॉम्बे टॉकीज़ की शुरुआत हुई थी. बॉम्बे टॉकीज़ के पीछे तीन लोग थे हिमांशु राय देविका रानी और राजनारायण दुबे. इन तीनों ने हिंदी सिनेमा को एक पहचान और दिशा दी. राजनारायण दुबे जी के पोते अभय कुमार कहते हैं बॉम्बे टॉकीज़ हिंदुस्तान में और हिंदुस्तान से बाहर भी बहुत मशहूर रहा है और इतने साल बाद एक बार फिर से इसका आना एक तोहफ़ा है. उन सभी के लिए जो सिनेमा से और बॉम्बे टॉकीज़ से जुड़े रहे हैं. वो चाहे अभिनेता हों या संगीतकार या टेक्नीशियन या फिर कहानी लेखक. यह उन सभी के लिए यह एक खास तोहफ़ा है. हिमाशु राय लंदन से जब भारत आए थे तो उनका बस एक ही सपना था कि वो फ़िल्में बनाए. उनके पास सभी सहूलियतें थीं लेकिन उन्होंने देखा कि यहाँ के लोगों का नज़रिया अच्छा नहीं है फ़िल्मों को लेकर. फ़िल्मों में काम करने वाले लोगों की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी एक गंभीर मुद्दा था. फ़िल्मों में काम करने वाली लड़कियों के बारे में लोग तरह-तरह की बातें करते थें. कुछ की हालत ख़राब हुआ करती थी और वे मजबूरी में फ़िल्मों में काम करती थीं. उस ज़माने में लोग अपने परिवार वालों से छुप कर चुपचाप सिनेमा देखने जाया करते थे. बच्चों को तो सिनेमा देखने की इज़ाज़त ही नहीं दी जाती थी. अभय बताते हैं कि इसलिए मेरे दादा जी राज नारायण और हिमांशु राय ने यह संकल्प किया था कि वे भारतीय सिनेमा को सम्मानजनक स्थान दिलाएंगे. उन्होंने कोशिश की और लोगों की सोच तब बदली जब देविका रानी हिंदी सिनेमा के साथ जुड़ीं. उन्होंने फ़िल्मों में काम किया और आगे चल कर उनकी शादी हिमांशु राय से हुई. देविका रानी रवींद्र नाथ टैगोर की भाँजी थीं. इसके बाद से ही सिनेमा को लोगों ने हलके में न लेकर उसके प्रति अपनी दिलचस्पी दिखानी शरू की. आगे चलकर हिंदी सिनेमा को सम्मान मिलना शुरू हुआ. अच्छी फ़िल्में बनने लगीं. अछूत कन्या और बन्धन जैसी फ़िल्मों का निर्माण हुआ. अशोक कुमार की किस्मत पहली मेगा हिट फ़िल्म थी. ये 350 दिनों तक सिनेमा घरों में लगी रही. बॉम्बे टॉकीज़ ने 280 कलाकारों को मौका दिया. बॉम्बे टॉकीज़ के आने से पहले कोई भी फ़िल्म हिट नहीं हुआ करती थी लेकिन चर्चा में ज़रूर रहती थी. आलम आरा पहली बोलती फ़िल्म थी राजा हरिश्चंद्र उसी ज़माने में बनी थी. उस वक़्त साधन कम थे इसलिए हमारा सिनेमा तक़नीक के लिहाज़ से उतना अच्छा नहीं लगता था. कई कमियाँ थीं. बॉम्बे टॉकीज़ ने उन कमियों को पूरा किया. बॉम्बे टॉकीज़ ने एडिटिंग डबिंग कपड़े मिक्सिंग लोकेशन और कलाकारों का लुक इन सब का पूरा ज़िम्मा उठाया. 1934 से लेकर 1954 तक 102 फ़िल्में बनाई गईं. इसी बीच में दूसरा विश्वयुद्ध भी हुआ और चार सालों तक कोई फ़िल्म नहीं बन सकीं. ज़्यादातर फ़िल्में सफल हुईं. 1954 में बॉम्बे टॉकीज़ के पास करने के लिए कुछ नया नहीं रह गया था. दिलीप साहब मधुबाला अशोक कुमार राज कपूर जैसे कई कलाकारों को मौका दिया गया. इन सभी को कामयाबी की बुलन्दी पर जाते देख मेरे दादा राजनारायण जी बहुत खुश थे इसलिए उन्होंने आगे कोई फ़िल्म बनाने कि इच्छा नहीं रखी. अभय कुमार बताते हैं मेरे दादा जी कहते थे कि बॉम्बे टॉकीज़ में जिसने भी थप्पड़ खाया उसे सफलता मिली. राज कपूर को भी थप्पड़ पड़ा. राज कपूर फ़िल्म ज्वारभाटा कि शूटिंग कर रहे थे. केदार शर्मा उस फ़िल्म के असिस्टेंट डायरेक्टर थे. जब वो शूट पर क्लैप कर के शूट शुरू करने के लिए बोलते थे तब-तब राज कपूर कैमरे के सामने आकर बाल ठीक करने लग जाया करते थे. दो-तीन बार देखने के बाद केदार शर्मा ने उन्हें एक थप्पड़ लगा दिया और फिर उन्हीं केदार शर्मा ने अपनी फ़िल्म नीलकमल में राज कपूर को मधुबाला के साथ लिया. ये फिल्म बॉम्बे टॉकीज़ ने बनाई थी. इस थप्पड़ ने राज कपूर जी की किस्मत ही बदल कर रख दी और कुछ ऐसा ही हुआ दिलीप कुमार जी के साथ भी. पुणे से दिलीप साहब को मेरे दादा जी मुम्बई लेकर आए थे. उन्होंने कहा उस वक्त दिलीप साहब बहुत तनाव में रहा करते थे. उन्हें महीने का 80 या 120 रुपये वेतन मिला करता था. वे बॉम्बे टॉकीज़ के कंपाउंड में ही रहा करते थे. मेरे दादा राजनारायण दुबे ब्राह्मण और पहलवान भी थे. उन्हें सिगरेट पसंद नहीं थी और दिलीप साहब तनाव में रहने की वजह से बहुत सिगरेट पिया करते थे. एक बार मना किया तो वो शूटिंग के दौरान चुपचाप सिगरेट पीने लगे. इसी क्रम में एक बार देखने पर उनका एक महीने का वेतन काट लिया गया. इसके बावजूद दिलीप साहब ने सिगरेट पीनी नहीं छोड़ी. तब एक दिन किसी ने उन्हें देख लिया और उनकी शिकायत कर दी. यह सुनने के बाद राजनारायण दुबे जी गए और उन्हें एक थप्पड़ मार दिया. उनके लगाए इस थप्पड़ ने हिंदुस्तानी सिनेमा का इतिहास बदल कर रख दिया. बॉम्बे टॉकीज़ को देव साहब भी कुछ अलग ही ढंग से मिले. देव साहब की पहली फ़िल्म हम सब एक है रिलीज हुई थी. वो सिनेमा घरों में नहीं चली. इससे देव साहब बेहद दुखी थे. उनकी हालत ठीक नहीं थी. वे बाकी लड़कों की तरह बॉम्बे टॉकीज़ के बाहर लाइन लगाकर कर खड़े थे तभी राजनारायण दुबे कमल प्रदीप और अशोक कुमार बाहर बात कर रहे थे. तभी एक लड़का आया और उसने देव साहब के बारे में बताया और कहा कि वे बहुत दुखी हैं. यह सुनने के बाद राजनारायण दुबे ने उन्हें एक मौका दिया. अशोक कुमार ने कहा कि क्यों न मेरी फ़िल्म इसे दे दी जाए. फ़िल्म का नाम था ज़िद्दी. इस फ़िल्म की एक दिन की शूटिंग भी हो गई थी लेकिन अशोक कुमार ने अपना बड़ा दिल दिखाया और ज़िद्दी देव साहब को दे दी गई. लेकिन इससे फ़िल्म के निर्देशक कमल प्रदीप नाराज़ हो गए. फ़िल्म ज़िद्दी ने देव साहब की दुनिया ही बदल दी. इसके बाद उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने के कई मौके मिले. मधुबाला ने बॉम्बे टॉकीज़ में बाल कलाकार के रूप में काम करना शुरू किया था. फ़िल्म बेबी मुमताज़ में उनके पिता बॉम्बे टॉकीज़ के कंपाउंड में काम किया करते थे. अभय कुमार कहते हैं सायरा बानो को जब मैंने बताया कि हम एक बार फिर से बॉम्बे टॉकीज़ शुरू कर रहे हैं तो वो आश्चर्यचकित हो गईं. वो बहुत खुश हुईं. अभी बॉम्बे टॉकीज़ से अपनी फ़िल्म चाहे कोई मुझे जंगली कहे से मेरे एक्टिंग करियर की शुरुआत की बात जब सायरा जी ने दिलीप साहब को बताया तो वे भी बेहद खुश हुए. सायरा जी के साथ हमारे घरेलू रिश्ते हैं. मेरी फ़िल्म का टाइटल भी सायरा जी ने ही दिया है. भारतीय सिनेमा में भीष्म पितामह का दर्जा रखने वाले दिलीप कुमार ने तबियत ठीक न होने के बावजूद भी हमसे बहुत सारी बातें कीं और पुरानी यादों को एक बार फिर से ताज़ा किया. बॉम्बे टॉकीज़ की चर्चा करते वक़्त वे बेहद भावुक हो गए. उन्होंने हमसे ढेर सारी बातें कीं. आखिर में अभय कहते है कि एक बार फिर से बॉम्बे टॉकीज़ को खड़ा करना बहुत बड़ा चैलेंज था. उन्होंने कहा 60 साल बाद हम भले ही कोई फ़िल्म कर रहे हो लेकिन लोगों को बॉम्बे टॉकीज़ सुना-सुना सा लगता है. उन्हें ये नाम अपना सा लगता है. |
| DATE: 2013-12-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1260] TITLE: शर्मिला टैगोर का 'दर्द' |
| CONTENT: कश्मीर की कली एन इवनिंग इन पेरिस आराधना सफ़र अमर प्रेम और दाग जैसी कई यादगार फ़िल्में देने वाली शर्मिला टैगोर को मौजूदा दौर से एक शिक़ायत है. और वो ये कि उनके जैसी उम्रदराज़ हीरोइनों के लिए कोई फ़िल्म नहीं लिखी जाती. दिल्ली में भारतीय सिनेमा पर महिलाओं का चित्रण विषय पर आयोजित एक सेमीनार में शर्मिला ने अपना ये दर्द बयां किया. उन्होंने कहा अमिताभ बच्चन नसीरुद्दीन शाह और अनुपम खेर जैसे अभिनेताओं के लिए स्क्रिप्ट लिखी जाती है. लेकिन हम जैसी हीरोइनों के लिए कोई नहीं लिखता. शर्मिला ने आगे कहा 40 पार कर चुके और 50 छू रहे अभिनेताओं को हम किशोरावस्था वाली हीरोइनों के साथ रोमांस करते अक्सर देखते रहते हैं. लेकिन इसका उल्टा हमारी फ़िल्मों में नहीं दिखाते. शर्मिला मानती हैं कि भारतीय फ़िल्मों में ज़्यादातर अभिनेत्रियों को महज़ शो-पीस की तरह इस्तेमाल किया जाता है. वो कहती हैं समानांतर सिनेमा के कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो ज़्यादातर हमारी फ़िल्मों में महिलाओं की यही छवि रहती है. ख़ासतौर से मुख्य धारा की हिंदी फ़िल्मों में तो ख़ास तौर से ऐसा देखा गया है. शर्मिला टैगोर ने 1960 के दशक में अपना फ़िल्मी करियर शुरू किया था. शम्मी कपूर के साथ उनकी फ़िल्म कश्मीर की कली से उन्हें बहुत सराहना मिली. उन्हें उस दौर की सबसे ख़ूबसूरत अभिनेत्रियों में से एक माना जाता है. वर्ष 1967 की फ़िल्म एन इवनिंग इन पेरिस में उन्होंने बिकीनी पहनी जो उस दौर के हिसाब से एक बहुत साहसी कदम माना गया था. उन्होंने ग्लैमरस रोल के अलावा आराधना सफ़र अमर प्रेम दाग और चुपके-चुपके जैसी फ़िल्मों में विविधतापूर्ण किरदार निभा कर दर्शकों और समीक्षकों दोनों की वाहवाही पाई. |
| DATE: 2013-11-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1261] TITLE: अब मैं दिल्ली कभी नहीं आऊंगा: सैफ़ अली ख़ान |
| CONTENT: दिल्ली में क्यों गर्माए बुलेट राजा मिलिए कौन बनेगा करोड़पति के सातवें सीज़न की पहली महिला करोड़पति से और नीतू चंद्रा की ग्रीक फ़िल्म. ख़बरें मुंबई डायरी में. जब हम आएंगे तो गर्मी बढ़ जाएगी. कुछ ऐसा ही डायलॉग है सैफ़ अली ख़ान का उनकी आने वाली फ़िल्म बुलेट राजा में और इसे सही सिद्ध कर दिखाया उन्होंने दिल्ली में जब उनके एक समारोह में माहौल वाक़ई गर्मा गया. दरअसल दिल्ली चुनाव आयोग के एक समारोह में सैफ़ अली ख़ान और सोनाक्षी सिन्हा को पहुंचना था. वहां मीडिया का जमावड़ा हो गया लेकिन सैफ़ और सोनाक्षी एक-दो नहीं बल्कि पूरे चार घंटे देर से पहुंचे. इस पर वहां मौजूद पत्रकारों के सब्र का बांध टूट गया और सब सैफ़ गो बैक के नारे लगाने लगे और उनसे माफ़ी मांगने को कहने लगे. इस पर सैफ़ ने माफ़ी मांगने से साफ़ तौर पर इनकार कर दिया और उन्होंने कहा मैं माफ़ी नहीं मागूंगा. ये मेरी ग़लती नहीं थी. मैं ट्रैफ़िक में फंस गया था. मुझे लगता है कि सितारों को दिल्ली आना ही नहीं चाहिए. ये मेरी दिल्ली में आख़िरी विज़िट थी. अब मैं सिर्फ़ मुंबई में ही इंटरव्यू दिया करूंगा. उन्होंने ये भी कहा कि ग़लती चुनाव अधिकारियों की है कि उन्होंने आख़िरी समय में उन्हें न्यौता भेजा. सैफ़ और सोनाक्षी को इस समारोह में लोगों को वोटिंग के प्रति जागरुक बनाने के अभियान के तहत बुलाया गया था. इन दोनों के अलावा अभिनेता जिमी शेरगिल और निर्देशक तिग्मांशु धूलिया भी मौजूद रहे. हालांकि बाद में दिल्ली के एक चुनाव अधिकारी ने बताया कि सैफ़ ने इस मामले पर माफ़ी मांग ली है. मशहूर टीवी गेम शो कौन बनेगा करोड़पति के सातवें संस्करण को पहली महिला करोड़पति मिल गई हैं. इस सत्र के आख़िरी एपिसोड में उत्तर प्रदेश की फ़िरोज़ फ़ातिमा ने एक करोड़ रुपए की इनामी राशि जीती. 22 साल की फ़िरोज़ विज्ञान की छात्रा हैं और इनाम जीतने के बाद उन्होंने कहा कि वो अपने पिता के इलाज के लिए गए लोन को चुकाएंगी और बचे पैसे से बिज़नेस करेंगीं. रविवार एक दिसंबर को इस एपिसोड का प्रसारण होगा. हिंदी भोजपुरी तमिल और तेलुगू फ़िल्में करने के बाद अब अभिनेत्री नीतू चंद्रा एक ग्रीक फ़िल्म में दिखाई देंगीं. ब्लॉक 12 नाम की इस फ़िल्म में नीतू ने एक हिंदू देवी की भूमिका निभाई है. फ़िल्म गोवा में चल रहे 44वें अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में दिखाई जा रही है. ग्रीक और भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री में अंतर के बारे में पूछने पर नीतू ने कहा कि ग्रीक फ़िल्म इंडस्ट्री बेहद अनुशासित है लेकिन बॉलीवुड की तुलना में इसके पास बेहद सीमित संसाधन है और पैसों की कमी है. नीतू अभिनय के अलावा फ़िल्म निर्माता भी बन गई हैं और हाल ही में उन्होंने एक भोजपुरी फ़िल्म का निर्माण भी किया है जो रिलीज़ होने का इंतज़ार कर रही है. |
| DATE: 2013-11-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1262] TITLE: 'हर चीज़ बैन करना मूर्खता है': सैफ़ अली ख़ान |
| CONTENT: गोलियों की धांय-धांय बड़ी शान से पिस्तौल हाथ में थामे और बच्चों के खेल की तरह लोगों का ख़ून बहाते और हत्या करने के दौरान अपने दोस्त से हंसी मज़ाक़ करते सैफ़ अली ख़ान. आने वाली फ़िल्म बुलेट राजा के प्रोमो में यही देखने को मिल रहा है जिसमें सैफ़ अली ख़ान अपराधी की भूमिका निभा रहे हैं. क्या ये अपराध का महिमामंडन करना नहीं है जब फ़िल्म के प्रमोशन पर सैफ़ से ये पूछा गया तो वो बोले नहीं. बिलकुल नहीं. इससे 10 गुना ज़्यादा हिंसा वीडियोगेम्स में देखने को मिलती है जिसे बच्चे धड़ल्ले से खेलते हैं. लेकिन फ़िल्मों को सॉफ़्ट टारगेट बना दिया जाता है और ऐसी ही बातों को लेकर कभी उन पर बैन लगा दिया जाता है कभी सीन काटने को कह दिए जाते हैं. सैफ़ के मुताबिक़ बैन लगाना किसी समस्या का समाधान नहीं है. उन्होंने कहा ऐसा तो है नहीं कि लोग फ़िल्म देखकर गन हाथ में पकड़ेंगे और सड़कों पर क़त्लेआम करने निकल पड़ेंगे. हर बात को बैन करना तो मूर्खता है. लोगों की समझदारी भी कोई चीज़ होती है. बुलेट राजा में सैफ़ के साथ सोनाक्षी सिन्हा अहम किरदार में हैं और इसके निर्देशक हैं तिग्मांशु धूलिया. फ़िल्म से क्या उम्मीदें हैं. सैफ़ ने कहा फ़िल्म अच्छी बन पड़ी है. लेकिन ऐसी फ़िल्मों से आप 100 करोड़ रुपए कमाने की उम्मीद नहीं करते. हां मैं ये ज़रूर चाहता हूं कि फ़िल्म पैसे बनाए. ये कमर्शियल फ़िल्म है. लेकिन ये तिग्मांशु की फ़िल्म है. जिनमें एक क्लास है. ये वैसी फ़िल्म नहीं है. सैफ़ से जब पूछा गया कि वो बॉक्स ऑफ़िस रिज़ल्ट या समीक्षकों की तारीफ़ में से क्या ज़्यादा पसंद करते हैं तो उन्होंने कहा कितना अच्छा हो कि दोनों मिल जाएं. 200 करोड़ रुपए और राष्ट्रीय पुरस्कार साथ मिल जाएं तो क्या बात है. कई फ़िल्मों में समीक्षकों की तारीफ़ और दर्शकों की वाहवाही पाने के बाद भी सैफ़ अली ख़ान का नाम आमिर सलमान और शाहरुख़ वाली लीग में क्यों नहीं है. इस पर सैफ़ ने कहा देखिए वो तीनों ख़ान मुझसे सीनियर हैं. मैंने उन तीनों से बहुत कुछ सीखा है. मैं उनकी इज़्ज़त करता हूं. लेकिन मैं भी अपने आपको अच्छी स्थिति में पाता हूं और संतुष्ट हूं. अपने करियर की सबसे आरामदायक स्थिति में हूं. मुंबई में रहने वाले सैफ़ को मुंबई में शूटिंग करना बिलकुल पसंद नहीं है. वो कहते हैं मुझे इस शहर की ऊर्जा बहुत पसंद है लेकिन यहां का मौसम बड़ा कष्टदायक रहता है. गर्मियों में तो ख़ासतौर पर. इसलिए मुझे लंदन जैसे शहर में शूटिंग करना पसंद है. जहां एक बार मेक-अप कराया और दिन भर शूटिंग कर ली. सैफ़ की बेटी सारा भी बड़ी हो चुकी हैं. क्या वो फ़िल्मों में काम करेंगी. इस पर सैफ़ ने कहा अभी तो वो अपनी डिग्री के सिलसिले में अमरीका में है. फ़िल्मों में काम करने के लिए पहले उसे अपना वज़न कम करना पड़ेगा. क्योंकि वो माशाअल्लाह काफ़ी सेहतमंद हैं. बुलेट राजा 29 नवंबर को रिलीज़ हो रही है. सैफ़ इसके निर्माता भी हैं. |
| DATE: 2013-11-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1263] TITLE: बिग बी और रेखा के साथ आने की संभावना ख़त्म |
| CONTENT: बरसों से अमिताभ बच्चन और रेखा को एक साथ फ़िल्म में देखने वालों का सपना एक बार फिर टूट गया है. मनोरंजन जगत की ख़बरों के मुताबिक़ दोनों के एक साथ अनीस बज़्मी की फ़िल्म वेलकम बैक में दिखने की संभावना थी लेकिन अब ये पुष्टि हो चुकी है कि न तो रेखा और न बिग बी इस फ़िल्म में काम कर रहे हैं. रेखा ने डेट्स की समस्या कहकर फ़िल्म करने से इनकार कर दिया. उनके मुताबिक़ वह उसी दौरान इंद्र कुमार की फ़िल्म सुपर नानी में काम करेंगी. इसलिए वेलकम बैक नहीं कर पाएंगी. वहीं अमिताभ बच्चन ने भी यह फ़िल्म करने से इनकार कर दिया है. वेलकम बैक साल 2007 की हिट फ़िल्म वेलकम का सीक्वेल है. इसमें फ़िरोज ख़ान अक्षय कुमार कटरीना कैफ़ नाना पाटेकर और अनिल कपूर की मुख्य भूमिका थी. अब फ़िरोज ख़ान वाला डॉन का किरदार फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह निभाएंगे जबकि जो रोल रेखा को ऑफ़र हुआ था उसे डिंपल कपाड़िया के निभाने की संभावना है. नाना और अनिल कपूर भी फ़िल्म का हिस्सा होंगे. सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के बाद अब उनके समकालीन धर्मेंद्र भी भोजपुरी फ़िल्म में दिखेंगे. फ़िल्म का नाम है देस परदेस और ये 29 नवंबर को रिलीज़ होगी. इसी दिन आमिर ख़ान की बहुप्रतीक्षित फ़िल्म धूम-3 भी रिलीज़ हो रही है. देस परदेस में अभिनेता कादर ख़ान भी अतिथि भूमिका में दिखेंगे. फ़िल्म में रति अग्निहोत्री ने भी एक अहम किरदार निभाया है. एक महीने पहले बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड पर फ़िल्म बनाने का ऐलान करने वाले निर्देशक मिलन लूथरिया ने अब अपना इरादा छोड़ दिया है. इस मामले में कल ही सीबीआई की विशेष अदालत ने आरुषि के माता-पिता को दोषी मानते हुए उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है. मिलन के मुताबिक़ इस केस को लेकर कई सारे सवाल हैं और लोग इसे लेकर काफी भावुक भी हैं. इस केस में बहुत ड्रामा है दर्द है और ढेर सारे सवाल भी. इसलिए अब वो ये फ़िल्म नहीं बनाना चाहते. |
| DATE: 2013-11-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1264] TITLE: नसीर के सामने शर्मा गई मैं: माधुरी दीक्षित |
| CONTENT: नसीरुद्दीन शाह और माधुरी दीक्षित का रोमांस. सुनने में थोड़ा अलग लगता है. लेकिन दर्शकों को ये रोमांस देखने को मिलेगा आने वाली फ़िल्म डेढ़ इश्क़िया में जिसके निर्माता हैं विशाल भारद्वाज और निर्देशक हैं अभिषेक चौबे. फ़िल्म के ट्रेलर लॉन्च पर नसीरुद्दीन शाह तो नहीं आए लेकिन माधुरी आईं और नसीर जैसे कलाकार के साथ पर्दे पर इश्क़ करने के अपने अनुभव को बयां किया. माधुरी ने बताया मुझे हमेशा से ही उनकी आंखों में अजीब सी कशिश देखने को मिली. तो रोमांटिक दृश्य करते समय मैं कई बार शर्मा जाती. लेकिन ये अनुभव बेहतरीन रहा. माधुरी दीक्षित ने बताया कि फ़िल्म में काम करने से पहले उन्हें बताया गया था कि नसीर सेट पर कई बार किसी भी बात पर खीझ जाते हैं. लेकिन डेढ़ इश्क़िया के सेट पर ऐसा बिलकुल भी नहीं हुआ और पूरी फ़िल्म के दौरान वो बेहद हंसी मज़ाक के मूड में नज़र आए. डेढ़ इश्क़िया साल 2010 में रिलीज़ हुई इश्क़िया का सीक्वल है. इसमें माधुरी और नसीर के अलावा हुमा क़ुरैशी और अरशद वारसी की भी मुख्य भूमिका है. माधुरी ने 80 के दशक में अपना करियर शुरू किया था और कई कामयाब फ़िल्में देने के बाद उन्होंने शादी करके फ़िल्मों से लंबा ब्रेक ले लिया था. लेकिन उसके बाद उन्होंने दोबारा बॉलीवुड में कदम जमाने की कोशिश की है. तब और अब हिंदी फ़िल्मों के तौर तरीके में क्या बदलाव आया है. इसके जवाब में माधुरी दीक्षित ने कहा अब सब कुछ सुनियोजित तरीक़े से होने लगा है. स्क्रिप्ट तैयार मिलने लगी है. माहौल अनुशासित रहने लगा है. तो इससे कलाकारों के लिए काम आसान हो गया है. फ़िल्म में हुमा क़ुरैशी और माधुरी दीक्षित को एक गाने में डांस करना था और हुमा इससे पहले काफी नर्वस थीं. हुमा ने बताया मैंने निर्देशक अभिषेक चौबे से कहा कि आप पागल हो क्या जो मुझे माधुरी जैसी अभिनेत्री के साथ डांस करने को कह रहे हो. मैं बहुत घबराई हुई थी. लेकिन माधुरी के सहयोग की वजह से सब ठीक से हो गया. डेढ़ इश्क़िया के अलावा माधुरी दीक्षित गुलाब गैंग नाम की फ़िल्म में भी काम कर रही हैं जिसमें वो एक गैंगस्टर की भूमिका निभा रही हैं. इसमें जूही चावला की भी मुख्य भूमिका है. |
| DATE: 2013-11-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1265] TITLE: तनीशा से नाराज़ काजोल और अजय देवगन? |
| CONTENT: तनीशा से क्यों नाराज़ हैं उनकी बहन काजोल और अजय देवगन 40 के दशक की बॉम्बे टॉकीज़ होगी पुनर्जीवित और दीपिका से क्यों हैरान हुए उनके मां-बाप. पढ़िए ख़बरें मुंबई डायरी में. ख़बरें हैं कि रियलिटी शो बिग बॉस में प्रतियोगी अरमान कोहली और तनीशा मुखर्जी की कथित नज़दीकियों से तनीशा की बहन काजोल और उनके जीजा अजय देवगन बेहद नाराज़ हैं. ख़बरें तो ये भी हैं कि शो के दौरान तनीशा एक दफ़ा अपनी मां तनूजा से फ़ोन पर बात करना चाहती थीं लेकिन तनूजा ने साफ़ इनकार कर दिया. ख़ुद अजय देवगन कई बार कथित तौर पर कलर्स चैनल से अनुरोध कर चुके हैं कि तनीशा को शो से बाहर किया जाए लेकिन सूत्रों के मुताबिक़ चैनल ऐसा करने के लिए तैयार नहीं क्योंकि तनीशा और अरमान की वजह से बिग बॉस की लोकप्रियता बढ़ रही है. 30 के दशक में मशहूर फ़िल्म स्टूडियो बॉम्बे टॉकीज़ को फिर से ज़िंदा करने की तैयारियां चल रही हैं. इसे शुरू किया था हिमांशु राय राजनारायण दुबे और देविका रानी ने और इसके बैनर तले कई नामचीन फ़िल्में बनाई गईं जिनमें दिलीप कुमार देव आनंद मधु बाला और किशोर कुमार सरीखे कलाकारों ने काम किया. लेकिन बाद में आर्थिक हालात ख़राब होने की वजह से यह स्टूडियो बंद हो गया था. अब राजनारायण दुबे के पोते अभय कुमार इस 80 साल पुराने प्रोडक्शन हाउस को फिर से शुरू करना चाहते हैं और इसके बैनर तले फिर से फ़िल्में बनाएंगे. संजय लीला भंसाली की फ़िल्म गोलियों की रास-लीला राम-लीला में दीपिका पादुकोण के अभिनय को देखकर उनके मां-बाप हैरान हैं. दीपिका के मुताबिक़ उनकी एक्टिंग से उनके मां-बाप इतने प्रभावित हुए कि उन्हें यक़ीन ही नहीं हो रहा है कि यह दीपिका ही हैं. यह साल वैसे भी दीपिका के लिए बेहतरीन रहा है. उनकी ये जवानी है दीवानी चेन्नई एक्सप्रेस और रेस-2 जैसी फ़िल्मों ने 100 करोड़ रुपए से ऊपर का कारोबार किया. |
| DATE: 2013-11-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1266] TITLE: 83 साल के अटलबिहारी का फ़िल्मी आगाज़ |
| CONTENT: उम्र सिर्फ़ एक नंबर है दिल जवान होना चाहिए. 83 साल के अटल बिहारी कुछ ऐसा ही मानते हैं जो इस उम्र में बन गए हैं एक फ़िल्म में लीड हीरो. गोवा में चल रहे 44वें अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में ओडिशा से 35 लोगों की टीम आई है जो अपनी उड़िया फ़िल्म साला बूढ़ा को लेकर यहां आए हैं. फ़िल्म के मुख्य कलाकार है अटल बिहारी पंडा जो 83 साल की उम्र में इस फ़िल्म से अपना करियर शुरू कर रहे है. पंडा साहब मानते हैं कला तो कला है. इसकी उम्र क्या है. कलाकार के लिए उम्र का कोई सवाल नहीं है. अटल बिहारी उड़िया थिएटर का एक बड़ा नाम हैं. उन्होंने अपने जीवन में कई नाटकों का निर्देशन किया है. साथ ही रंगमंच पर अदाकारी भी की है. लेकिन साला बूढ़ा उनकी पहली फ़ीचर फ़िल्म है. इससे पहले वो लगभग 60 नाटक लिख चुके हैं. फ़िल्म के बारे में पंडा कहते हैं साला बूढ़ा के निर्देशक सब्यसाची महापात्रा ने ऐसे काम कराया है कि जैसे मैं 83 नहीं 38 की उम्र का हूं. शुरुआत में मुझे लगा कि मुझसे शायद यह नहीं होगा. कैमरे से भी मैं परिचित नहीं था. लेकिन निर्देशक ने मुझ पर विश्वास किया और मुझसे अभिनय कराने में सफल रहे. उनके परिवार में पत्नी के अलावा तीन लड़कियां और तीन लड़के हैं. जब उन्होंने फ़िल्म में एक्टिंग करने के बारे में अपने घर में बताया तो उन्हें पूरा समर्थन मिला. पंडा कहते हैं हम अभिनेता लोग स्वार्थी होते हैं. हम परिवार और बच्चो की नहीं सोचते. हमारे लिए कला ही सबसे पहले है. फ़िल्म साला बूढ़ा एक पीरियड फ़िल्म है जो 100 साल पहले ओडिशा में आए एक भयंकर अकाल पर आधारित है जहां गांव का मुखिया अपना सब कुछ अपने गांव वालों पर न्योछावर कर देता है. उड़िया फ़िल्मों से 30 साल से जुड़े निर्देशक सब्यसाची महापात्रा बताते हैं कि फ़िल्म की कहानी उनके पिता ने लिखी है और इसके निर्माता हैं उनके छोटे भाई. फ़िल्म के संवाद अटल बिहारी पंडा ने ही लिखे हैं. फ़िल्म की शूटिंग में 30 दिन का वक़्त लगा और इसकी लागत आई तक़रीबन 40 लाख रुपए. फ़िल्म का प्रचार करने इसकी टीम हाथ में ढोल नगाड़े लिए ख़ूबसूरत उड़िया कुरता-पायजामे और गमछा पहने नज़र आई. इस समारोह के बाद साला बूढ़ा देश भर के अन्य फ़िल्म समारोहों में दिखाई जाएगी. |
| DATE: 2013-11-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1267] TITLE: साथी कलाकारों से बहुत बेहतर है मेरा भाई बॉबी : सनी देओल |
| CONTENT: अपने 18 साल लंबे करियर में बॉबी देओल ने तक़रीबन 40 फ़िल्में कीं जिनमें से कुल जमा आधा दर्जन फ़िल्में भी कामयाब नहीं हो पाईं. उनकी अभिनय क्षमता पर समीक्षकों ने हज़ारों सवाल खड़े किए. लेकिन एक शख़्स ऐसा है जिसे बॉबी देओल के अभिनय में कोई खोट नज़र नहीं आती और वो हैं उनके बड़े भैया सनी देओल. बल्कि सनी तो बॉबी को उनके समकालीन कलाकारों से कहीं बेहतर करार देते हैं. अपनी हालिया रिलीज़ सिंह साहब द ग्रेट के बारे में बात करते हुए सनी देओल ने अपने भाई के बारे में भी बात की और कहा बॉबी मौजूदा दौर के कई कलाकारों से कहीं अच्छा कलाकार है. वो बहुत ख़ूबसूरत लड़का है. तो फिर बॉबी उनकी या पिता धर्मेंद्र की तरह कामयाब क्यों नहीं हो पाए. इस पर भी सनी का जवाब तैयार था. वो बोले किस्मत. किस्मत अच्छी नहीं थी बेचारे की. एक कलाकार की कामयाबी बहुत बातों पर निर्भर करती है. अच्छी कहानी अच्छे निर्देशक शायद उसे नहीं मिले. लेकिन अब भी उसके पास समय है. और वो बेहतरीन वापसी करेगा. और सनी के पसंदीदा कलाकार कौन हैं इसका जवाब भी उनके पास फ़ौरन तैयार था. छूटते ही बोले पापा और बॉबी. वैसे अभय भी अच्छा कलाकार है. जब बात परिवार की ही हो रही थी तो हमने सोचा कि उनके बेटे के संभावित फ़िल्मी करियर पर भी सवाल पूछ लिया जाए. इस पर सनी बोले अभी हम इस बारे में सोच रहे हैं. कुछ भी फ़ाइनल नहीं हुआ है. किसी उत्साही पत्रकार ने ज़रूरत से ज़्यादा जोश में डिक्लेयर कर दिया कि मेरा बेटा फ़िल्मों में बस आने ही वाला है. मुझे इस तरह की पत्रकारिता ज़रा भी पसंद नहीं. जब कुछ तय होगा मैं ख़ुद बता दूंगा. थोड़े गुस्से में आ गए थे सनी ऐसा बोलते हुए. घायल घातक दामिनी गदर जैसी एक्शन फ़िल्मों से ज़बरदस्त लोकप्रियता हासिल करने वाले सनी देओल मानते हैं कि मौजूदा दौर का एक्शन बदल गया है. हमने पूछा कैसे जवाब मिला कोई कहानी ही नहीं होती. बिना कहानी की मार-धाड़ में कोई दम नहीं. ये कोई समझता ही नहीं. हम सिर्फ़ दक्षिण भारतीय फ़िल्मों को उठाकर हिंदी में ट्रांसलेट कर देते हैं. ये ग़लत है. फ़िल्म प्रमोशन करना सनी की फ़ितरत नहीं- ऐसा वो ख़ुद मानते हैं. सिंह साहब द ग्रेट के प्रमोशन पर भी वो जहां-जहां गए बड़े शर्माते सकुचाते और लजाते नज़र आए. सनी ने कहा लेकिन अब प्रमोशन से बचा नहीं जा सकता. ढिंढोरा पीटना ज़रूरी हो गया है. तो मुझे भी करना पड़ता है. सनी मानते हैं कि उनके प्रशंसक उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा देखना चाहते हैं. इसलिए अब वो साल में कम से कम तीन फ़िल्में करेंगे. सिंह साहब द ग्रेट में उनकी अभिनेत्री हैं उर्वशी रौतेला जो 19 साल की हैं. जबकि सनी की उम्र उनसे तीन गुना यानी 57 साल की है. क्या उन्हें नहीं लगता कि उम्र का इतना ज़्यादा फ़ासला परदे पर कुछ अजीब सा रिज़ल्ट देता है. सनी इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. वो कहते हैं अब तो असल ज़िंदगी में भी आपको उम्र का ये अंतर देखने को मिल जाएगा. तो फिर फ़िल्मों में क्या बुराई है. और हम अपनी कहानी कुछ इस तरह से कहते हैं कि ये अंतर मायने नहीं रखता. वैसे भी हम किरदार निभा रहे होते हैं. और ऐसा तो हर जगह होता है. उनके पिता धर्मेंद्र की सुपरहिट फ़िल्म शोले को थ्री डी में परिवर्तित करके रिलीज़ किया जा रहा है. सनी देओल इस क़दम का स्वागत करते हैं और मानते हैं कि शोले के करोड़ो प्रशंसकों के लिए ये एक तोहफ़ा होगा. |
| DATE: 2013-11-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1268] TITLE: नसीर, अरशद की मुलाक़ात ख़तरनाक बेगम से |
| CONTENT: विद्या बालन के बाद अब माधुरी दीक्षित पर्दे पर इश्क़ फ़रमाती नज़र आएंगी नसीरुद्दीन शाह के साथ. अभिषेक चौबे निर्देशित फ़िल्म डेढ़ इश्क़िया का आधिकारिक ट्रेलर सोमवार को लॉन्च हो रहा है. इश्किया की तरह इस फ़िल्म में भी नसीरुद्दीन शाह और अरशद वारसी की मुख्य भूमिका है. फ़र्क ये है कि जहां इश्क़िया में दो हीरो और एक हीरोइन थीं वहीं डेढ़ इश्क़िया में हीरोइन भी दो होंगी. माधुरी का रोमांस नसीर के साथ होगा अरशद वारसी के साथ जोड़ी होगी हुमा क़ुरैशी की. फ़िल्म निर्माता विशाल भारद्वाज का कहना है कि इस फ़िल्म के लिए हमेशा से उनकी पसंद माधुरी दीक्षित थीं और अगर वह इस रोल के लिए मना कर देतीं तो वो डेढ़ इश्क़िया बनाते ही नहीं. ये फ़िल्म 10 जनवरी को रिलीज़ होगी. हिंदी फ़िल्मों के कामयाब स्टार सैफ़ अली ख़ान और उनकी बीवी रीना कपूर हिंदी फ़िल्में देखते ही नहीं. करीना ने अपने चचेरे भाई रणबीर कपूर की सुपरहिट फ़िल्म बर्फी अब तक नहीं देखी है. सैफ़ अली ख़ान अपनी इस आदत के बारे में कहते हैं कि दिन भर सेट पर फ़िल्मी माहौल में रहने फिर छुट्टी मिलने पर वही चीज़ टीवी या सिनेमाहॉल में देखना उन्हें पसंद नहीं. सैफ़ कहते हैं कि वह टीवी पर कुछ ऐसा देखना पसंद करते हैं जिससे कुछ नया सीखने को मिले और अपने साथी कलाकारों के काम को देखकर नया सीखने को नहीं मिलता इसलिए वो अमरीकी टीवी शोज़ देखना ज़्यादा पसंद करते हैं. बीते शुक्रवार को रिलीज़ हुई इमरान ख़ान और करीना कपूर की फ़िल्म गोरी तेरे प्यार में को दर्शकों की बेहद ठंडी प्रतिक्रिया मिली. करण जौहर जैसे बड़े निर्माता की फ़िल्म और करीना कपूर जैसी बड़ी स्टार होने के बावजूद दर्शकों ने इस फ़िल्म को नकार दिया. फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक़ गोरी तेरे प्यार में ने पहले दिन तक़रीबन साढ़े तीन करोड़ रुपए कमाए जो इतने बड़े बैनर की फ़िल्म के लिए बेहद निराशाजनक प्रदर्शन रहा. अगले दिन भी फ़िल्म को दर्शकों से कोई सहारा न मिला और इसका व्यापार तीन करोड़ रुपए से भी कम रहा. वहीं इसी दिन रिलीज़ हुई सनी देओल की फ़िल्म सिंह साहब द ग्रेट का व्यापार गोरी तेरे प्यार में से कहीं बेहतर रहा. सनी की इस फ़िल्म ने पहले दिन क़रीब चार करोड़ 75 लाख रुपए जुटाए. |
| DATE: 2013-11-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1269] TITLE: जिय हो बिहार के फ़िरंगी लाला ! |
| CONTENT: नमस्ते जी मैं देहाती फ़िरंगी हूँ ना बिहार का आपसे मिलके अच्चा लगे. कुछ ऐसी हिंदी है चार्ल्स थॉमसन की. गोवा में चल रहे एनएफ़डीसी के फ़िल्म बाज़ार में मुझे ये शख़्स मिला जो गहरे लाल रंग के कुर्ते में लोगों को अपना परिचय कुछ ऐसे ही दे रहा है. हाथ जोड़ कर सर झुकाए सबको नमस्ते कहना और उनका ध्यान आकर्षित कर उनसे हिंदी में घंटों गप्पे हांकना चार्ल्स थॉमसन की ख़ासियत है. थोड़ी देर उन्हें दूर से देखने के बाद मुझसे रहा नहीं गया और मैंने जाते ही चार्ल्स से हिंदी में बात करनी शुरू की. मेरे एक एक सवाल के चार्ल्स के पास दो-दो जवाब. मेरी दिलचस्पी बढ़ने लगी. मैं जानना चाहता था कि कोई विदेशी कैसे ऐसी स्पष्ट हिंदी भारतीय हाव-भाव से और हिंदुस्तानी व्यंग्य को समझते हुए बोल सकता है. मैं हूँ बिहारी फ़िरंगीदेखिये ना मैं हूँ बिहारी फ़िरंगी. जब चार्ल्स ने ऐसा कहा तो मैंने पूछा वो कैसे. चार्ल्स ने बताना शुरू किया मैं 11 साल की उम्र में सिडनी से अकेले भारत आ गया था और आते ही मैं बिहार में बस गया. मुझे बचपन से भारत बहुत आकर्षित करता था और भारत आकर हिंदी सीखने के लिए बिहार से अच्चा क्या होता. 12 साल मैं बिहार में साधु संतों के साथ रहा हिंदी सीखी योग सीखा. तो हो गया ना मैं बिहारी फ़िरंगी. 23 साल की उम्र में चार्ल्स वापस अपने देश ऑस्ट्रेलिया चले गए. उन्होंने एक थाई रेस्टारेंट में काम किया और कई हिंदी भाषी दोस्त बनाए. सिडनी में चार्ल्स की दोस्ती शशांक केतकर से हुई जो मराठी टीवी जगत के सुपरस्टार हैं . शशांक ने चार्ल्स को भारत बुलाया और एक मराठी फ़िल्म के लिए ऑडिशन देने को कहा. चार्ल्स ने वीर सावरकर पर बनने वाली मराठी फ़िल्म 1909 का ऑडिशन दिया और उसमें उन्हें सरकारी अफ़सर जैक्सन के रोल के लिए चुन लिया गया. चार्ल्स बोले मुझे एक्टिंग का बहुत शौक है. देखिये ना में आया बॉलीवुड में काम करने मुझे मराठी ने पकड़ लिया. अगले महीने मेरी फ़िल्म आएगी और फिर हिंदी फ़िल्में भी मिलेंगी क्योंकि टॉम आल्टर के बाद में ही एक हिंदी बोलने वाला फ़िरंगी हूं. चार्ल्स इस फ़िल्म बाज़ार में निर्माताओं निर्देशकों और लेखकों से लगातार बात करके अपने संपर्क सूत्र बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. उनका विज़टिंग कार्ड भी उन्हें अनोखी पहचान देता है जिस पर तिरंगे के साथ लिखा है वन्दे मातरम. चार्ल्स ने मुझे एक रोचक किस्सा सुनाया. मैं कुंभ के मेले में गया. वहां मुझे लोग बड़ी अहमियत देने लगे. वहां पर तैनात सरकारी अधिकारियों ने मुझे सलाम किया. किसी ने सुरक्षा जांच वाली जगह पर मेरी जांच भी नहीं की. मैं समझ नहीं पाया कि ये हो क्या रहा है. जब मैं आगे बढ़ा तो मुझे सुनाई पड़ा- ये राहुल गांधी है. इन्हें जाने दो. फ़िलहाल चार्ल्स दिल्ली में एक गैर सरकारी संस्था से जुड़े हैं. वो गांवों में बैंकिंग की सुविधा और उसके इस्तेमाल के लाभ ग्रामीण लोगों तक लेकर जाते है . लेकिन उनका सपना तो बॉलीवुड में आने का ही है. जिसके बारे में वो ख़ासे आशान्वित है. चार्ल्स कहते हैं मुझ जैसे बिहारी फ़िरंगी को बॉलीवुड में चांस तो मिलेगा ही. जाते-जाते चार्ल्स ने मुझे वज़न कम करने की भी हिदायत दे डाली. |
| DATE: 2013-11-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1270] TITLE: क्या 'ग्रेट' साबित होंगे 'सिंह साहब'? |
| CONTENT: सिंह साहब द ग्रेट कहानी है एक सिद्धांतवादी व्यक्ति की भ्रष्टाचार से लड़ाई की. सरनजीत तलवार सनी देओल एक शहर में कलेक्टर हैं जहां भूदेव प्रकाश राज का राज चलता है. उसका कहा वहां पत्थर की लकीर माना जाता है. सरनजीत को अपनी तरफ़ मिलाने के लिए भूदेव उसे रिश्वत देने की कोशिश करता है. लेकिन सरनजीत सिद्धांतवादी होने के नाते रिश्वत से साफ़ इनकार कर देता है और भूदेव के सारे अवैध धंधे बंद करवा देता है. भूदेव सरनजीत को सबक सिखाने के लिए उसके परिवार के पीछे पड़ जाता है और साज़िश के तहत उसकी पत्नी मिनी उर्वशी रौतेला को ज़हर देकर मरवा डालता है. फिर वो सरनजीत को झूठे आरोप में फंसाकर जेल भिजवा देता है. जेल से छूटने के बाद सरनजीत भूदेव से बदला लेने के बजाय समाज सुधार के काम में और लोगों की मदद में लग जाता है. उसके अच्छे कामों से प्रभावित होकर लोग उसे सिंह साहब कहने लगते हैं. फिर वह वापस भूदेव के शहर में आता है और उसे अच्छा इंसान बनाने की कोशिश करता है लेकिन भूदेव और चिढ़ जाता है वो सरनजीत की बहन और भांजे का अपहरण कर लेता है. सरनजीत के पास कोई और चारा नहीं बचता तो वह भी बदले में भूदेव की पत्नी और बेटी का अपहरण कर लेता है. आगे क्या होता है. यही फ़िल्म की कहानी है. फ़िल्म में कुछ भी नयापन नहीं है. भ्रष्टाचार बहुत पुरानी सामाजिक बुराई है और फ़िल्म में उससे निपटने का कोई नया तरीका नहीं दिखाया गया है. बदले के बजाय बदलाव की बात कहानी में नई ज़रूर है लेकिन फ़िल्म के बीच में यह बदलाव वाला एंगल भी कहीं ग़ायब हो जाता है. जिससे फ़िल्म एक आम रिवेंज ड्रामा बनकर रह जाती है. स्क्रीनप्ले लेखक शक्तिमान ने सिंघम जैसी फ़िल्म का बेहद दिलचस्प स्क्रीनप्ले लिखा था लेकिन सिंह साहब द ग्रेट सिंघम के आसपास भी नहीं पहुंच पाई है. इंटरवल से पहले फ़िल्म बहुत धीमी रफ़्तार से बढ़ती है और दर्शकों को बोर कर देती है. इस हिस्से में सनी देओल के लुक्स और कपड़ों पर भी ध्यान नहीं दिया गया है. इंटरवल के बाद फ़िल्म में रफ़्तार आती है. हालांकि इस हिस्से में भी कोई नवीनता नहीं है लेकिन सनी देओल और प्रकाश राज के बीच कुछ सीन अच्छे बन पड़े हैं जो दर्शकों को पसंद आएंगे. फ़िल्म के एक बड़े हिस्से में सनी देओल और प्रकाश राज की चिल्ला-चिल्लाकर बोलने वाली संवाद अदायगी से कई दर्शकों को खीझ भी हो सकती है. फ़िल्म की कहानी को भावनात्मक बनाने की कोशिश की गई है लेकिन परदे पर वो भावनाएं नज़र नहीं आतीं. सनी देओल ने एक्शन दृश्यों में जान डाल दी है और बाकी के दृश्यों में भी वह जमे हैं लेकिन अब उन्हें उम्र के इस पड़ाव पर अपने लुक्स और कपड़ों पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत है. नवोदित उर्वशी रौतेला अच्छी लगी भी हैं और उन्होंने अच्छा काम भी किया है. प्रकाश राज खलनायक के रोल में जमे हैं. वह कई दृश्यों में बहुत असरदार लगे हैं. अमृता राव ने भी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है. निर्देशक अनिल शर्मा ने एक ख़ास दर्शक विशेष को ध्यान में रखकर फ़िल्म बनाई है. उनका निर्देशन ठीक है लेकिन फ़िल्म के लिए विषय का चुनाव ठीक नहीं है. फ़िल्म का संगीत भी साधारण है. फ़िल्म के एक्शन दृश्य अच्छे हैं और दर्शकों को पसंद आएंगे. कुल-मिलाकर सिंह साहब द ग्रेट एक आम रिवेंज ड्रामा है. इसके सिंगल स्क्रीन थिएटर्स में चलने की ज़्यादा संभावना है. मल्टीप्लेक्सेज़ में फ़िल्म का कारोबार मंदा ही रहेगा. |
| DATE: 2013-11-23 |
| LABEL: entertainment |
| [1271] TITLE: मनोज कुमार की हॉलीवुड को 'चुनौती' |
| CONTENT: गोवा में चल रहे 44वें अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में देशभक्ति फ़िल्में बनाने के लिए मशहूर अभिनेता मनोज कुमार ने भारतीय पैनोरमा सेक्शन का उद्घाटन करते हुए भारत की क्षेत्रीय फ़िल्मों को बढ़ावा देने की बात कही. मनोज कुमार ने कहा रीजनल सिनेमा ही ओरिजिनल सिनेमा है. हमें इन फ़िल्मों को बिल्कुल नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए. मनोज कुमार ने ऑस्कर पुरस्कारों को ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत देने पर भी अफ़सोस जताया. मनोज कुमार ने कहा हमें ऑस्कर की दौड़ में अंधा नहीं होना चाहिए. बल्कि ऐसे अवॉर्ड बनाने चाहिए कि ख़ुद हॉलीवुड उसे जीतने के लिए तरसे. सेहत पूरी तरह से दुरुस्त ना होते हुए भी मनोज कुमार ने कार्यक्रम में शिरकत की. इसके अलावा यहां मनोज बाजपेई सुभाष घई और प्रेम चोपड़ा जैसी हस्तियां भी पहुंची. इस समारोह के पहले दिन अमरीकी अभिनेत्री सूज़न सरेन्डन ने प्रेस वार्ता में कहा अमरीका विश्व का सबसे बड़ा वॉर और लड़ाई निर्यात केंद्र है. अगर मेरे बस में हो तो सबसे पहले मैं दुनिया भर में लड़ाई के हालातों को ख़त्म करने की दिशा में ही काम करूं. उन्होंने पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को निशाना बनाते हुए कहा बुश के दो कार्यकालों की वजह से अमरीका के आर्थिक हालात बेहद ख़राब हैं और जिसकी वजह से लोगों का ध्यान हिंसा और लड़ाई पर ज़्यादा जाने लगा है. सूज़न का नाम ऑस्कर के लिए पांच बार नामांकित हुआ है और वो एक बार ऑस्कर अवार्ड जीत भी चुकी हैं . 11 दिनों तक चलने वाले इस समारोह में देश-विदेश की कुल 326 फिल्में दिखाई जाएंगी लेकिन मैनेजमेंट पर दबाव पहले दिन से ही शुरू हो गया है. इन फिल्मों को दिखाने के लिए सात स्क्रीन की व्यवस्था की गई है फिर भी अपनी मनपसंद फ़िल्म देखने के लिए टिकट पाना आसान नहीं है. फ़िल्म प्रेमियों को लंबी लाइन और हाउसफ़ुल के बोर्ड मायूस कर रहे हैं. साथ ही लोगों को कार्यक्रमों की सूचना सामग्री हासिल करने के लिए भी ख़ासी मशक्कत करनी पड़ी. समारोह का प्रबंध संभाल रहे आयोजक अपने काम को करने में पूरी तरह से विफल नज़र आ रहे हैं. |
| DATE: 2013-11-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1272] TITLE: नीतू को अमिताभ से भी 'नहीं मिली मदद' |
| CONTENT: गरम मसाला ट्रैफ़िक सिग्नल 13 बी और ओए लकी लकी ओए जैसी फ़िल्मों में नज़र आ चुकी अभिनेत्री नीतू चंद्रा पिछले कुछ समय से बॉलीवुड से ग़ायब हैं. वह भोजपुरी सिनेमा में सक्रिय हो चुकी हैं और थिएटर भी कर रही हैं. बतौर निर्माता उन्होंने एक भोजपुरी फ़िल्म देसवा भी बनाई है जो अब तक रिलीज़ नहीं हो पाई है. इसी बात को लेकर उन्हें शिकायत है. बीबीसी से ख़ास बातचीत में नीतू कहती हैं मेरी यह फ़िल्म कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में जा चुकी है. इसकी रिलीज़ को लेकर हमने कई स्टूडियोज़ से बात की लेकिन उनकी शायद भोजपुरी फ़िल्म को लेकर कोई ख़ास सोच है और वे फ़िल्म की रिलीज़ के लिए तैयार नहीं हुए. नीतू ने ये भी कहा कि वह बॉलीवुड की बड़ी बड़ी हस्तियों के पास भी मदद के लिए गईं थीं लेकिन बात नहीं बनी. नीतू के शब्दों में मैं अनुराग कश्यप के पास गई. इम्तियाज़ अली से मिली. यहां तक कि अमिताभ बच्चन से भी इस सिलसिले में मदद मांगी. लेकिन शायद उनकी भी कुछ सीमाएं होंगी. अगर इतने बड़े लोग मेरी फ़िल्म से जुड़ जाते तो हम इसे ज़रूर रिलीज़ कर पाते. देसवा एक पॉलिटिकल क्राइम थ्रिलर है. इसकी पूरी शूटिंग बिहार में हुई है. फ़िल्म का निर्देशन किया है नीतू के भाई नितिन चंद्रा ने. नीतू उमराव जान नाम के एक प्ले में आजकल व्यस्त हैं. क्या उन्हें फ़िल्में नहीं मिल रही हैं इसके जवाब में वह कहती हैं हिंदी फ़िल्मों में काम ना करने का मतलब यह तो नहीं कि मैं फ़िल्में ही नहीं कर रही हूं. मैं तमिल फ़िल्म कर रही हूं. भोजपुरी सिनेमा में मेरी व्यस्तता है. मैंने एक ग्रीक यूरोपियन फ़िल्म की है जो गोवा में चल रहे अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में दिखाई जाएगी. नीतू चंद्रा ताइक्वांडो खिलाड़ी भी रह चुकी हैं. तो फिर उन्होंने खेल में ही अपना करियर बनाने के बारे में क्यों नहीं सोचाइस पर नीतू कहती हैं सच तो ये है कि भारत में लड़कियों का खेल में करियर बनाना बेहद मुश्किल है. सानिया मिर्ज़ा और सायना नेहवाल जैसी खिलाड़ी तो बहुत कम हैं. आज भारत की महिला क्रिकेट टीम और फ़ुटबॉल टीम के बारे में कौन जानता है. नीतू चंद्रा की मीडिया से भी शिकायत है. वह कहती हैं कि मीडिया को हमेशा मसालेदार ख़बरों की तलाश भी रहती है. उनके ताइक्वांडो खेलने संबंधी ख़बरों को कभी प्रमुखता नहीं दी गई. नीतू फ़िलहाल थिएटर और दक्षिण भारतीय फ़िल्में करने में व्यस्त हैं. उनके पास अभी कोई हिंदी फ़िल्म नहीं है. |
| DATE: 2013-11-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1273] TITLE: मेरी किस्मत ख़राब है: शाहिद कपूर |
| CONTENT: पिछले दो-तीन सालों से लगातार शाहिद कपूर की फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर एक के बाद फ़्लॉप होती जा रही हैं वहीं उनके समकालीन दूसरे युवा अभिनेता जैसे रणबीर कपूर और रणवीर सिंह एक के बाद कामयाबी पाते जा रहे हैं. शाहिद कपूर ने मौसम तेरी मेरी कहानी और इस साल रिलीज़ हुई फटा पोस्टर निकला हीरो से नाकामी की हैट्रिक बना डाली. शाहिद पूरा दोष किस्मत पर डाल देते हैं. आने वाली फ़िल्म आर राजकुमार के बारे में बात करते हुए जब पिछली नाकामियों की बात चली तो वो बोले मेरी किस्मत ख़राब है. इसके अलावा और कोई वजह नहीं है. कई बार आपको अपना काम अच्छा नहीं लगता लेकिन फ़िल्म चल जाती है. कई बार इसका उल्टा होता है. तो बस मुझे थोड़े से लक की ज़रूरत है. लगातार फ़्लॉप फ़िल्मों के बाद भी शाहिद ये मानने को तैयार नहीं कि उनकी लोकप्रियता में कोई कमी आई. वो कहते हैं भगवान का शुक्र है कि अब भी दर्शक मुझे पसंद करते हैं. उम्मीद करता हूं कि मेरा भाग्य जल्द ही बदलेगा. अपने ख़ुद के काम का विश्लेषण करते हुए वो कहते हैं कि जब वी मेट उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म है जबकि विशाल भारद्वाज की कमीने में वो अपने अभिनय को बेहतरीन मानते हैं. पिछले दिनों ख़बरें आईं कि शाहिद के पिता पंकज कपूर उनके लिए लड़की देखने पंजाब गए. ऐसी ख़बरों को शाहिद ने बकवास करार दिया. वो कहते हैं मैं और पापा अपने-अपने काम में व्यस्त हैं. उनके पास इतना टाइम नहीं कि वो मेरे लिए लड़की देखें. वैसे भी मैं अपनी पसंद की लड़की के साथ शादी करूंगा. पापा की भी इसी बात पर सहमति होगी. शाहिद ने माना कि पिछले दो सालों से वो किसी रिलेशनशिप में नहीं है और इस बात को लेकर वो बड़े ख़ुश भी हैं. करियर की शुरुआत में शाहिद का नाम पहले अभिनेत्री करीना कपूर और फिर विद्या बालन और प्रियंका चोपड़ा के साथ जुड़ चुका है. आर राजकुमार के निर्देशक हैं प्रभु देवा और उनकी हीरोइन हैं सोनाक्षी सिन्हा जिनके बारे में शाहिद कपूर कहते हैं सोनाक्षी संपूर्ण हीरोइन हैं. बेहतरीन अभिनय करती हैं. शानदार डांस करती हैं. सेट पर बेहद सहज रहती हैं. कोई नखरे नहीं हैं उनके. बड़ा मज़ा आता है उनके साथ काम करके. आर राजकुमार 6 दिसंबर को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2013-11-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1274] TITLE: अब 'गब्बर' की बेटी भी फ़िल्मों में |
| CONTENT: शोले के गब्बर सिंह की बेटी की फ़िल्मी पारी शाहिद कपूर क्यों होंगे गंजे और क्या सनी देओल बनेंगे निर्देशक. ख़बरें मुंबई डायरी से. हिंदी फ़िल्मों के जाने-माने खलनायक दिवंगत अमजद ख़ान की बेटी भी अब फ़िल्मों में प्रवेश कर चुकी हैं. अमजद ख़ान जिन्होंने शोले में गब्बर सिंह का किरदार निभा कर तहलका मचा दिया था उनकी बेटी अहलम ख़ान निर्देशक मकरंद देशपांडे की फ़िल्म मिस सुंदरी से अपने बॉलीवुड करियर का आगाज़ करने वाली हैं. ये फ़िल्म मकरंद के नाटक मिस ब्यूटीफ़ुल पर आधारित है. अमजद के बेटे शादाब ख़ान भी कुछ फ़िल्मों में बतौर अभिनेता आ चुके हैं लेकिन उनका करियर कुछ ख़ास चल नहीं पाया. अहलम लंबे समय से थिएटर से जुड़ी हैं. ख़बरें हैं कि विशाल भारद्वाज की फ़िल्म हैदर के लिए शाहिद कपूर अपने बालों की क़ुर्बानी देने वाले हैं. फ़िल्म में शाहिद के कई लुक हैं. शाहिद को अपना किरदार इतना पसंद आया कि उन्हें इसके लिए अपना सिर मुंडाने में भी गुरेज़ नहीं है. फ़िल्म की शूटिंग कश्मीर में हो रही है. फ़िलहाल शाहिद अपनी आने वाली फ़िल्म आर राजकुमार के प्रमोशन में व्यस्त हैं जो छह दिसंबर को रिलीज़ हो रही है. अभिनेता सनी देओल फिर से निर्देशक बनने के लिए बेताब हैं. अपनी आने वाली फ़िल्म सिंह साहब द ग्रेट के प्रमोशन पर उन्होंने कहा मैं निर्देशक बनने के लिए उतावला हूं. मुझे पता है कि मेरे अंदर एक डायरेक्टर है. लेकिन मैंने अपने आपको रोका हुआ है. भविष्य में अगर कोई विषय अच्छा लगा तो मैं ज़रूर फ़िल्म का निर्देशन करना चाहूंगा. सनी देओल ने अपने 30 साल लंबे करियर में सिर्फ़ एक फ़िल्म का निर्देशन किया है. साल 1999 में उनकी होम प्रोडक्शन फ़िल्म दिल्लगी में वो निर्देशक थे. फ़िल्म में उनके छोटे भाई बॉबी देओल और उर्मिला मांतोडकर ने अभिनय किया था. हालांकि फ़िल्म फ़्लॉप हो गई थी. |
| DATE: 2013-11-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1275] TITLE: दीपिका को अमिताभ ने क्यों भेजी चिट्ठी? |
| CONTENT: अभिनेत्री श्रुति हासन पर किसने किया हमला अमिताभ बच्चन ने क्यों भेजा दीपिका पादुकोण को ख़त और शाहरुख़-काजोल एक बार फिर दिखेंगे साथ-साथ. मुंबई डायरी में पढ़िए बॉलीवुड की हलचल. हाल ही में अभिनेत्री श्रुति हासन को ज़बर्दस्त झटका लगा जब एक शख़्स ने उन पर लगभग हमला कर दिया. मंगलवार को वह मुंबई में अपने फ़्लैट में थीं तभी किसी ने दरवाज़े पर घंटी बजाई. उन्होंने दरवाज़ा खोला तो अपने सामने एक शख़्स को खड़े पाया जिसने उन्हें अपनी तरफ़ खींचने की कोशिश की. श्रुति ने उसे धक्का दिया और फिर दरवाज़ा बंद कर लिया. बाद में वह व्यक्ति वहां से भाग खड़ा हुआ. ख़बरों के मुताबिक़ यह शख़्स पहले भी कई बार श्रुति का पीछा करते देखा गया है. श्रुति हासन के मैनेजर ने बीबीसी को बताया कि वह इस मामले की पुलिस में शिकायत दर्ज कराएंगी. दीपिका पादुकोण इन दिनों बेहद ख़ुश हैं. उनकी फ़िल्म राम-लीला को समीक्षकों और दर्शकों दोनों की ही वाहवाही मिल रही है. सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को भी यह फ़िल्म और दीपिका का अभिनय बेहद पसंद आया है. उन्होंने फ़िल्म देखने के बाद दीपिका को गुलदस्ता भेजा और एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने दीपिका की ज़बर्दस्त तारीफ़ की. दीपिका ने इस बात पर बेहद ख़ुशी ज़ाहिर की और कहा कि बिग बी का यह ख़त उन्हें ज़िंदगी भर की ख़ुशी देने के लिए काफ़ी है. शाहरुख़ खान और काजोल की मशहूर फ़िल्मी जोड़ी फिर एक बार साथ-साथ नज़र आएगी. किसी फ़िल्म में नहीं बल्कि एक टीवी शो में. फ़िल्मकार करण जौहर के मशहूर टीवी शो कॉफ़ी विद करण के तीसरे संस्करण में दोनों साथ दिखेंगे. बीच में दोनों के बीच कथित तौर पर खटास की ख़बरें आईं थीं जब शाहरुख़ ख़ान और काजोल के पति अजय देवगन के बीच फ़िल्म सन ऑफ़ सरदार को लेकर विवाद हो गया था. |
| DATE: 2013-11-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1276] TITLE: मुझे चाहिए लंबा लड़का: सोनाक्षी सिन्हा |
| CONTENT: सोनाक्षी सिन्हा ने फ़िल्म दबंग से अपना करियर शुरू किया जिसमें उनके हीरो थे सलमान ख़ान जिनकी लंबाई सोनाक्षी के तक़रीबन बराबर ही है. उनकी आने वाली फ़िल्म आर. राजकुमार है जिसमें उनके साथ हैं शाहिद कपूर और उनकी लंबाई भी सोनाक्षी के बराबर ही है. लेकिन असल ज़िंदगी में सोनाक्षी को लंबे क़द के लड़के पसंद हैं. आर राजकुमार के प्रमोशन पर पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा मुझे छोटे क़द के लड़के पसंद नहीं है. मैं लंबे क़द का और अच्छे सेंस ऑफ़ ह्यूमर वाला लड़का पसंद करूंगी. जो बुद्धिमान हो जिसके साथ बात करने में मज़ा आए और जो अच्छा दिखता हो. अपने साथी कलाकारों में वो अक्षय कुमार और दीपिका पादुकोण के स्टाइल से प्रभावित हैं. सोनाक्षी के मुताबिक़ अक्षय और दीपिका जो भी पहन लेते हैं उन पर अच्छा लगता है. दोनों को अपने आपको हैंडल करना बख़ूबी आता है. इस बीच ख़बरें आईं थीं कि सलमान ख़ान उनसे नाराज़ हैं. ख़बरों के मुताबिक़ वो अपनी फ़िल्म किक में सोनाक्षी को लेना चाहते थे लेकिन बात नहीं बनी इस वजह से सलमान कथित तौर पर ग़ुस्सा हो गए थे. सोनाक्षी ने कहा सलमान अगर मुझसे नाराज़ हैं तो उनसे पूछिए. मुझसे क्यों पूछ रहे हैं. जहां तक मेरी जानकारी है ऐसा कुछ नहीं है. किक के लिए मुझे बहुत पहले अप्रोच किया गया था लेकिन फ़िल्म शुरू हुई नहीं इस बीच मैंने दूसरी फ़िल्में साइन कर लीं. क्या भविष्य में वो सलमान के साथ काम करेंगी सोनाक्षी का जवाब था फ़िलहाल तो ऐसा कुछ भी नहीं है. आगे कुछ होगा तो देखा जाएगा. आर राजकुमार निर्देशक प्रभु देवा के साथ उनकी दूसरी फ़िल्म है. इससे पहले प्रभु देवा के निर्देशन में वो राउडी राठौर में काम कर चुकी हैं. फ़िल्म के हीरो शाहिद कपूर का ट्रैक रिकॉर्ड पिछले कुछ समय से ठीक नहीं चल रहा है. मौसम तेरी मेरी कहानी और फटा पोस्टर निकला हीरो जैसी उनकी कई फ़िल्में फ़्लॉप हो गईं थीं. ऐसे में उनके साथ काम करते हुए उन्हें किसी तरह की असुरक्षा महसूस नहीं हो रही है. सोनाक्षी बोलीं शाहिद बहुत टैलेंटेड कलाकार हैं. असफलता के बावजूद उनके मार्केट में कोई असर नहीं पड़ा है. लोग उन्हें पसंद करते हैं. और इस फ़िल्म के बारे में हम दोनों ही आशावान हैं. फ़िल्मों में अंगप्रदर्शन के सवाल पर सोनाक्षी कहती हैं मैं बिकिनी हीरोइन नहीं हूं. मुझे ऐसे दृश्य करना असहज लगता है और मैं नहीं करूंगी. क्या भविष्य में सोनाक्षी अपने पिता शत्रुघ्न सिन्हा के साथ काम करना चाहेंगी. इस पर सोनाक्षी ने कहा ज़रूर. लेकिन कहानी ऐसी होनी चाहिए जो मेरे पिता की दमदार पर्सनैलिटी के हिसाब से हो. सिर्फ़ साथ आने के लिए तो हम कोई फ़िल्म करने नहीं वाले. स्क्रिप्ट एकदम परफ़ेक्ट होनी चाहिए. आर राजकुमार 6 दिसंबर को रिलीज़ हो रही है. उससे एक सप्ताह पहले सोनाक्षी और सैफ़ अली ख़ान की तिग्मांशु धूलिया निर्देशित फ़िल्म बुलेट राजा रिलीज़ होगी. |
| DATE: 2013-11-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1277] TITLE: सलमान की अपील, सचिन की पार्टी |
| CONTENT: सलमान ख़ान ने किस मामले में की अपील सैफ़ अली ख़ान ने करीना की किस फ़िल्म में काम करने से किया था इनकार और सचिन तेंदुलकर की पार्टी में अमिताभ बच्चन सहित उमड़ीं जानी-मानी हस्तियां. पढ़िए ख़बरें मुंबई डायरी में. अभिनेता सलमान ख़ान ने साल 2002 के हिट एंड रन मामले में कोर्ट से एक बार फिर मुक़दमा चलाने की अपील की है. सलमान ख़ान की दलील है कि चूंकि इस मामले में उन पर हाल ही में ग़ैर इरादतन हत्या का भी आरोप जोड़ दिया गया है इसलिए इस सिलसिले में पहले पेश किए गए सबूतों को अमान्य माना जाए और फ़्रेश ट्रायल किया जाए. सलमान के वकील ने मुंबई के एक सेशन कोर्ट में बहस करते हुए कहा कि सलमान ख़ान को गवाहों के आमने-सामने जिरह और ग़ैर इरादतन हत्या के आरोप में अपना पक्ष रखने का मौक़ा अब तक नहीं दिया गया है. अभियोजन पक्ष ने इस पर कहा कि ये सलमान ख़ान की इस केस को जान बूझकर लटकाने की साज़िश है. कोर्ट में सलमान ख़ान की इस अपील पर पांच दिसंबर को सुनवाई होगी. मुंबई के बांद्रा इलाक़े में 28 दिसंबर 2002 को हुए इस एक्सीटेंड में फ़ुटपाथ पर सो रहे एक शख़्स की मौत हो गई थी और चार लोग घायल हो गए थे. ये हादसा तब हुआ जब उन पर एक गाड़ी चढ़ गई थी जिसे कथित तौर पर सलमान ख़ान चला रहे थे. करीना कपूर और इमरान ख़ान की जोड़ी वाली फ़िल्म गोरी तेरे प्यार में के लिए पहले सैफ़ अली ख़ान को अप्रोच किया गया था लेकिन उन्होंने इसमें काम करने से इनकार कर दिया था. फ़िल्म के निर्देशक पुनीत मल्होत्रा के मुताबिक़ पहले इस फ़िल्म की कहानी में दो हीरो और दो हीरोइन होने वाली थीं. इसके लिए वो सैफ़ और इमरान ख़ान को लेना चाहते थे. लेकिन सैफ़ के मना करने के बाद उन्हें ये फ़िल्म सोलो हीरो और हीरोइन वाली कहानी में तब्दील करनी पड़ी. पुनीत मल्होत्रा के साथ इमरान की ये दूसरी फ़िल्म है. इससे पहले वो पुनीत की आई हेट लव स्टोरीज़ में काम कर चुके हैं. क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद और भारत रत्न मिलने की ख़ुशी में सचिन तेंदुलकर ने सोमवार को मुंबई में एक ज़बरदस्त पार्टी का आयोजन किया जिसमें क्रिकेट जगत के अलावा बॉलीवुड और उद्योग जगत की कई हस्तियों ने शिरकत की. लता मंगेशकर अमिताभ बच्चन आमिर ख़ान और राहुल बोस जैसी फ़िल्मी हस्तियों के अलावा इसमें सचिन तेंदुलकर के गुरू रमाकांत अचरेकर और आईपीएल की मुंबई इंडियंस टीम की मालिक नीता अंबानी भी पहुंचीं. इसके अलावा केंद्रीय मंत्री शरद पवार महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण भी सचिन के मेहमान बने. क्रिकेटिंग जगत से पूर्व खिलाड़ी सुनील गावस्कर कृष्णामाचारी श्रीकांत संदीप पाटिल और सचिन के साथ खेल चुके सौरव गांगुली वीवीएस लक्ष्मण और वीरेंद्र सहवाग ने भी पार्टी में शिरकत की. मुंबई के अंधेरी इलाक़े में स्थित एक आलीशान होटल में आयोजित इस पार्टी में बेहद कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी और सभी मेहमानों का स्वागत ख़ुद सचिन तेंदुलकर और उनकी पत्नी अंजलि तेंदुलकर ने किया. |
| DATE: 2013-11-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1278] TITLE: पोर्न स्टार छवि से दिक्कत नहीं: सनी लियोनी |
| CONTENT: बॉलीवुड में आने से पहले सनी लियोनी अमरीकी पोर्न फ़िल्मों का एक जाना माना नाम थीं. लेकिन अब चूंकि वो हिंदी फ़िल्मों में काम करने लगी हैं तो क्या उन्हें अपनी उस पुरानी छवि से कोई समस्या होती है. इसके जवाब में सनी लियोनी कहती हैं मुझे अपनी छवि से कभी कोई समस्या नहीं रही. मैं हमेशा ख़ुद के साथ बेहद सहज रही हूं. लोग आपके बारे में बोलते रहते हैं कि उसे ऐसा करना चाहिए वैसा करना चाहिए. वो आपके लिए मानदंड तय करते हैं लेकिन मैं इसकी परवाह नहीं करती और वही करती हूं जो मुझे अच्छा लगता है. सनी ने अपनी आने वाली फ़िल्म जैकपॉट के बारे में बीबीसी से बातचीत में ये कहा. क्या उन्हें अपनी पुरानी इमेज की वजह से कुछ ख़ास किस्म के रोल ही ज़्यादा ऑफ़र होते हैं इसके जवाब में वो कहती हैं मैं ख़ुश हूं कि अपने अब तक के बॉलीवुड करियर में मैंने अलग किस्म के भूमिकाएं निभाई हैं. मैं किसी भी फ़िल्म की स्क्रिप्ट सुनकर फ़ैसला लेती हूं कि वो मुझे करनी है या नहीं. मेरे पति मुझे फ़िल्म चुनने के लिए सुझाव देते हैं. पिछले दिनों एक अख़बार में ख़बर छपी थी कि सनी लियोनी आगे से अंग प्रदर्शन नहीं करेंगी. इस पर उनकी प्रतिक्रिया कुछ यूं रही. मेरे बारे में ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें छपती रहती हैं. मैंने ऐसा कभी नहीं कहा. फ़िल्म और रोल की डिमांड हो तो भला मुझे अंग प्रदर्शन से क्या एतराज होगा. फ़िल्म जैकपॉट के निर्देशक कैज़ाद गुस्तद हैं और इसमें वो नसीरुद्दीन शाह और सचिन जोशी के साथ काम कर रही हैं. अपने किरदार के बारे में वो कहती हैं मैं माया नाम की लड़की का रोल निभा रही हूं. ये एक निगेटिव रोल है. वो अपने बॉस यानी नसीरुद्दीन शाह और एक लड़के सचिन जोशी दोनों के साथ डेट करती है. किसी को समझ में नहीं आएगा कि वो चाहती क्या है. सनी लियोनी ने नसीरुद्दीन शाह के साथ काम करने को एक यादगार अनुभव बताया. वो कहती हैं नसीर एक इंस्टीट्यूशन हैं. मैं उनके सामने बेहद नर्वस हो जाती थी. उनसे पूछती रहती थी कि मुझे बताइए मैं फलां सीन कैसे करूं. वो मुस्कुरा देते. मुझे बेहद सहज महसूस कराते. उन्होंने कहा कितना कुछ सीखा जा सकता है उनसे. सिर्फ़ अपने चेहरे के हाव भाव से ही वो सब बयां कर देते हैं. सनी लियोनी टीवी रिएलिटी शो बिग बॉस में हिस्सा ले चुकी हैं और कहती हैं कि उन्हें अपनी इस फ़िल्म के प्रमोशन के लिए बिग बॉस जाना अच्छा लगेगा. सनी ने ये भी बताया कि उन पर एक डॉक्यूमेंट्री बन रही है. ये मेरे अब तक के सफ़र के बारे में होगी. कैसे मैं पोर्न स्टार बनी फिर वहां से मैं बॉलीवुड तक कैसे पहुंची. ये बेहद दिलकश कहानी है. उन्होंने बताया कि वो ज़्यादा पार्टियों में जाना पसंद नहीं करतीं और खाली वक़्त मिलने पर आराम करना पसंद करती हैं. |
| DATE: 2013-11-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1279] TITLE: सोहा की बिकनी, सलमान-सलीम की कॉफ़ी |
| CONTENT: अपने करियर में पहली बार बिकनी में नज़र आएंगी अभिनेत्री सोहा अली ख़ान करण जौहर की कॉफ़ी पीएंगे सलमान ख़ान पिता सलीम ख़ान के साथ और सनी देओल को क्यों और किस पर आया ग़ुस्सा. पढ़िए ख़बरें मुंबई डायरी में. अभिनेत्री सोहा अली ख़ान बड़े परदे पर बिकनी में नज़र आएंगी. इस फ़िल्म का नाम है मिस्टर जो बी कारवालो जिसमें अरशद वारसी भी मुख्य भूमिका में हैं. फ़िल्म में सोहा एक पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका में हैं. और वो कई स्टंट करते हुए भी दिखेंगी. क़रीब 46 साल पहले सोहा की मां शर्मिला टैगोर ने भी फ़िल्म एन इवनिंग इन पेरिस में बिकनी पहली थी. फ़िल्म में शम्मी कपूर हीरो थे. उस वक़्त शर्मिला के इस क़दम को ख़ासा बहादुरी वाला माना गया था. फ़िल्मकार करण जौहर ने अपने टीवी चैट शो कॉफ़ी विद करण के तीसरे संस्करण के शुरुआती एपिसोड में सलमान ख़ान को बुलाने का फ़ैसला किया है. इससे पहले के दोनों संस्करण की शुरुआत उन्होंने अपने सबसे क़रीबी दोस्त शाहरुख़ ख़ान को बुलाकर की थी. लेकिन इस बार उनके चिर परिचित प्रतिस्पर्धी सलमान को बुलाकर करण ने सबको चौंका दिया है. ख़बरें ये भी हैं कि इस एपिसोड में करण सलमान के पिता सलीम ख़ान को भी आमंत्रित कर रहे हैं. शो में सलमान के निजी जीवन और फ़िल्मी करियर से संबंधित ढेर सारी बातों पर चर्चा होगी. निर्माता महेंद्र धारीवाल को हाल ही में अभिनेता सनी देओल के ग़ुस्से का स्वाद चखना पड़ा. दरअसल धारीवाल की फ़िल्म भैयाजी सुपरहिट में सनी देओल काम कर रहे हैं और कथित तौर पर अपनी फ़ीस ना मिलने से वो बेहद गुस्से में थे. इसी बात को लेकर सनी के जुहू स्थित ऑफ़िस में धारीवाल और सनी देओल के बीच कथित तौर पर ज़बरदस्त कहा-सुनी हो गई और निर्देशक नीरज पाठक के बीच बचाव करने पर सनी शांत हुए. बाद में सनी देओल ने फ़ीस ना मिलने की स्थिति में फ़िल्म की डबिंग करने से इनकार कर दिया. फ़िल्म के एक्शन डायरेक्टर टीनू वर्मा के पास जब निर्माता महेंद्र धारीवाल सलाह के लिए गए तो उन्होंने भी महेंद्र से सनी की पूरी फ़ीस अदा करने के लिए कहा. धारीवाल ने बाद में दावा किया कि मामला सुलझ गया है. |
| DATE: 2013-11-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1280] TITLE: बॉलीवुड में संघर्ष करते विदेशी कलाकार |
| CONTENT: भारतीय छोटे परदे पर फिरंगी बहू नाम से एक सीरियल आने वाला है जो सांस्कृतिक टकराव और बदलते सामाजिक तौर-तरीकों की कहानी है. यह कहानी एक पारंपरिक गुजराती परिवार की है जिसके घर यूरोप की एक लड़की बहू बनकर आती है. बहू की भूमिका के लिए चुनी गईं हॉलैंड की अभिनेत्री सिपोरा अन्ना ज़ोउटवेले के लिए यह एक बड़ी सफलता है क्योंकि भारतीय स्क्रीन पर विदेशी कलाकारों को मुश्किल से कोई अहम किरदार निभाने को मिलता है. ज़ोउटवेले का कहना है कि बॉलीवुड में काम हासिल करने के लिए आपको भाग्यशाली होने की ज़रूरत है. उन्होंने कहा यहां बड़ी भूमिका हासिल करना आसान काम नहीं है क्योंकि यह केवल आपके टैलेंट का मसला नहीं बल्कि आप किसको जानते हैं यह काफी मायने रखता है. ज़ोउटवेले ने कहा यदि आप पैसे वाले परिवार से हैं या आप कई लोगों को जानते हैं तो आपके लिए चीजें आसान हो जाती है. वे आपको लॉन्च कर सकते हैं. वे आपके लिए एक फ़िल्म बना देंगे. उन्होंने कहा एक बाहरी होने के नाते काम मिलना तो आसान है लेकिन यहां लंबे समय तक बने रहना और एक से अधिक फ़िल्में हासिल करना मुश्किल है. एक छोटे शहर की रहने वाली ज़ोउटवेले सबसे पहले डांस सीखने के लिए मुंबई आईं. उनको यह शहर बहुत पसंद आया और उन्होंने मॉडलिंग और टीवी विज्ञापन के लिए कोशिश की. एक साल बाद एक निर्माता ने उन्हें टीवी सीरियल में भूमिका निभाने का ऑफर दिया. इस तरह उनको करियर में ब्रेक मिला. इस तरह से ब्रेक हासिल करने के बारे में बहुत लोग सपना देखते हैं लेकिन बहुत कम को ही सफलता मिलती है. दरअसल मुंबई का फ़िल्म उद्योग काफी प्रतिस्पर्धी होने के साथ-साथ जोख़िम भरा भी है. दर्शक स्थानीय कलाकारों को पसंद करते हैं और अधिकतर भूमिकाएं हिंदी में होती हैं. इन दिनों दुनिया के कोने-कोने से बॉलीवुड में किस्मत आज़माने के लिए कलाकार आ रहे हैं. हालांकि इस बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है कि कितने कलाकार बॉलीवुड में आ रहे हैं लेकिन कास्टिंग निर्देशक मुकेश छाबड़ा का कहना है कि उन्हें हर महीने ऑडिशन के इच्छुक विदेशियों के 10 से 15 ईमेल आते हैं. आमतौर पर निर्देशक विदेशी कलाकारों को बतौर डांसर या फिर दृश्य को आकर्षक बनाने के लिए फिल्मों में लेते हैं. ज़ोउटवेले कहती हैं कि विदेशी होने के नाते आमतौर पर आइटम गर्ल के रूप में भूमिका निभाने के लिए आपसे संपर्क किया जाता है. भारत में मल्टीप्लेक्स के बढ़ते दर्शकों को देखते हुए फिल्म निर्माता लीक से हटकर कहानियों को आज़मा रहे हैं जिससे विदेशी कलाकारों के लिए संभावनाएं बढ़ रही है. छाबड़ा का भी कहना है कि इंडस्ट्री को और अधिक विदेशी चेहरे चाहिए क्योंकि वे एक ही चेहरे को हर फिल्म में नहीं दिखा सकते. उनका कहना है कि विदेशी कलाकार यहां टिकना नहीं चाहते. अधिकतर अच्छे कलाकार हॉलीवुड का रुख कर लेते हैं. लेकिन अगर वे यहां रुकते हैं तो निश्चित तौर पर उन्हें अधिक काम मिलेगा. लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां बाहरी कलाकारों को अब भी मुख्य भूमिका नहीं मिलती. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कलाकार लंबे समय तक यहां नहीं टिक पाते. काफी समय पहले करियर बनाने के लिए वेल्स से यहां आने वाली पूर्व मिस लैनेली लिज़ा लज़ारस का कहना है कि यदि आप यहां आते हैं तो आपको कड़ी मेहनत करने और ख़ुद को समर्पित करने के लिए तैयार करना होगा. ऐतिहासिक ड्रामा वीर में काम करने से पहले वह कभी भारत नहीं आई थी. वह बॉलीवुड के अनुभव के बारे में कहती हैं कि यहां काफी दबाव है. कई बार तो वह 24 घंटे की शूटिंग के बाद घर जाकर खूब रोती थी. उन्होंने कहा कि उनकी एक ड्रेस का वज़न 15 किलो था और उनको उसे तीन हफ़्ते तक पहनना था. इस बारे में ज़ोउटवेले कहती हैं कि अगर आप कड़ी मेहनत करते हैं तो आपको बताने और सहयोग करने वाले लोग मिल जाते हैं. तमाम बुराइयों और कास्टिंग काउच की घटनाओं से भरे इस उद्योग में आपको यह पता होना चाहिए कि आप क्या चाहती हैं. यहां पर लोग कई ऑफर देते हैं और ये सभी बेहद आकर्षक दिखते हैं लेकिन ये होते नहीं. |
| DATE: 2013-11-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1281] TITLE: आमिर की तमन्ना, सलमान-कटरीना मिल जाएं |
| CONTENT: आमिर ख़ान मुबई में अपनी बहु-प्रतीक्षित फ़िल्म धूम-3 के प्रमोशन के लिए रखी गई प्रेस कांफ्रेस में काफ़ी हल्के फ़ुल्के मूड में नज़र आए. उन्होंने इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में मौजूद फ़िल्म की हीरोइन कटरीना कैफ़ पर जमकर चुटकी ली. आमिर ख़ान के मुताबिक़ वो सलमान ख़ान और कटरीना को एक साथ देखना चाहते हैं. उन्होंने कहा मैं दोनों को असल ज़िंदगी में भी साथ देखना चाहता हूं लेकिन मेरी तमन्ना का कोई मतलब ही नहीं. इस पर कटरीना कैफ़ ने कहा काश मेरे पास इस बात का कोई ज़बरदस्त जवाब होता. मैं निरुत्तर हूं. काश मैं कुछ कह पाती. आमिर ख़ान इस समारोह में देर से पहुंचे थे. क्योंकि वो वानखेड़े स्टेडियम में सचिन तेंदुलकर की बैटिंग देखने के लिए मौजूद थे. कटरीना ने कहा आमिर के साथ मैंने धूम-3 में रोमांस किया है. लेकिन मैं उन्हें 10 में से 9 नंबर दूंगी. क्योंकि साफ़ ज़ाहिर है उन्हें मुझसे ज़्यादा सचिन तेंदुलकर से प्यार है. इसलिए मैंने उनका एक नंबर काट लिया. धूम-3 का टाइटल ट्रैक धूम मचा ले भी गुरूवार को लॉन्च हुआ. कटरीना ने इस बारे में कहा इस गाने को भव्य तरीके से फ़िल्माया गया है. मुझे इसके लिए कड़ी तैयारी करनी पड़ी. कुछ महीनों पहले रणबीर कपूर और कटरीना कैफ़ के फ़ोटो इंटरनेट पर लीक होने से मचे हंगामे के बाद रणबीर कपूर ने तो इस बारे में मीडिया से बात करके अपना पक्ष रखा था लेकिन कटरीना कैफ़ ने पहली बार सार्वजनिक रूप से इस पर पत्रकारों से बात की. मीडिया ने जब इस बारे में कटरीना से पूछा तो उन्होंने कहा हां इस मुद्दे पर मैं उस वक़्त हताश और निराश थी. मुझे ठेस पहुंची थी. मेरी मीडिया से कोई दुश्मनी नहीं है और मैं उनके काम की इज़्ज़त करती हूं लेकिन इस घटना से मुझे धक्का पहुंचा था. जब उनसे पूछा गया कि रणबीर कपूर ने तो इस मामले को बेहद सहज रूप से लिया था तो वो क्यों इतनी हताश हुईं. इस पर कटरीना ने कहा हर मामले में लोगों का नज़रिया अलग-अलग होता है. किसी समस्या पर एक पुरुष का सोचने का तरीका अलग होता है और महिला का अलग. कटरीना ने कहा कि बात अगर फ़िल्म प्रमोशन की हो तो मीडिया का कवरेज समझा जा सकता है. लेकिन जब को ई फ़िल्म स्टार छुट्टी पर या अपनी निजी यात्रा पर हो तो उसका इस तरह से पीछा करना और फ़ोटो खींचना थोड़ा दुख देता है. फिर माहौल का हल्का बनाने की कोशिश के तहत उन्होंने कहा अगली बार ऐसे छुपकर मेरी फ़ोटो खींचनी हो तो कृपया मुझे थोड़ा पहले सूचित करें. ताकि मैं मैचिंग ड्रेस पहन सकूं. कटरीना सलमान ख़ान शाहरुख़ ख़ान और अब आमिर ख़ान तीनों के साथ काम कर चुकी हैं. कटरीना ने तीनों ख़ान की तुलना करते हुए कहा शाहरुख़ के साथ काम करते हुए मैं सबसे ज़्यादा नर्वस हुई थी. कारण मुझे नहीं पता. मैंने सबसे ज़्यादा सहज सलमान ख़ान के साथ महसूस किया क्योंकि मैं उनको पहले से जानती थी. बात धूम-3 की करें तो इसमें आमिर ख़ान कटरीना कैफ़ अभिषेक बच्चन और उदय चोपड़ा की मुख्य भूमिका है. फ़िल्म 20 दिसंबर को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2013-11-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1282] TITLE: क्या रंग लाएगी भंसाली की 'राम-लीला' ? |
| CONTENT: इरॉस इंटरनेशनल और भंसाली प्रोडक्शंस की राम-लीला दुश्मनी घृणा और ख़ून ख़राबे के बीच पनपी एक प्रेम कहानी है. गुजरात में सनेड़ा और रजाड़ी खानदानों के बीच पांच सौ सालों से दुश्मनी चली आ रही है. दोनों के बीच दुश्मनी का पुराना ख़ूनी इतिहास है. राम रणवीर सिंह रजाड़ी खानदान के नेता का बेटा है. वो दिलफेंक क़िस्म का लड़का है और जब मौका मिलता है तो लड़कियों से इश्क़ फ़रमाने लगता है. वो सनेड़ा खानदान की मुखिया धानोकर बा सुप्रिया पाठक की बेटी लीला दीपिका पादुकोण से मोहब्बत करने लगता है और लीला का रुझान भी राम की तरफ़ हो जाता है. इधर धनोकर बा लीला की शादी कहीं और तय कर देती हैं. राम और लीला की मोहब्बत परवान चढ़ ही रही होती है कि राम के भाई की हत्या सनेड़ा खानदान के लोगों के हाथ हो जाती है और गुस्से में आकर राम लीला के भाई की हत्या कर देता है. लेकिन लीला अपने प्यार के आगे भाई की हत्या को भूलकर राम के साथ भाग जाती है. आगे क्या होता है क्या राम और लीला की शादी हो जाती है क्या दोनों खानदान अपने बच्चों के प्यार को कुबूल कर लेते हैं क्या दोनों खानदानों की दुश्मनी फ़ौरन ख़त्म हो जाती है या आगे और भी ज़्यादा ख़ून ख़राबा होता है यही फ़िल्म की कहानी है. फ़िल्म की कहानी शेक्सपियर के ड्रामा रोमियो और जूलियट पर आधारित है. संजय लीला भंसाली ने इसे बेहतरीन तरीक़े से भारतीय परिस्थितियों में पिरोया है. सिद्धार्थ-गरिमा और संजय लीला भंसाली का स्क्रीनप्ले बेहतरीन है. फ़िल्म में इतने दिलचस्प मोड़ हैं कि दर्शक शुरू से आख़िर तक कहानी के साथ बंधे रहते हैं. राम और लीला के साथ भागने तक फ़िल्म की रफ़्तार थोड़ी धीमी है लेकिन उसके बाद फ़िल्म गति पकड़ लेती है. कहानी में मेलोड्रामा राम और लीला की इस लव स्टोरी को एक अलग ही स्तर तक ले जाता है. फ़िल्म को बहुत बड़े और भव्य स्केल पर फ़िल्माया गया है जो इसका एक मज़बूत पक्ष है. फ़िल्म में किरदारों का भी बेहद सशक्त चित्रण है और फ़िल्म के पात्र लंबे समय तक दर्शकों के ज़ेहन में बने रहेंगे. फ़िल्म का एक कमज़ोर पहलू भी है और वो है भावनाओं की तीव्रता की कमी. दर्शक दोनों प्रेमियों की पीड़ा को महसूस तो करेंगे लेकिन वो उनसे इतना नहीं जुड़ पाते कि उनके लिए आँसू बहा सकें. फ़िल्म की कहानी में हालांकि कई भावनात्मक दृश्यों की गुंजाइश थी लेकिन लेखक इस क्षेत्र में चूक गए. लेकिन राम और लीला की बेहतरीन प्रेम कहानी की वजह से दर्शक इन छोटी-मोटी कमियों को नज़र अंदाज़ कर देंगे. फ़िल्म के डायलॉग बेहतरीन हैं. रणवीर सिंह अपनी बेहतरीन एक्टिंग से सबको चौंका देंगे. उनकी संवाद अदायगी कमाल की है बॉडी लैंग्वेज और हाव भाव ज़बरदस्त हैं और एक कलाकार के तौर पर उनकी रेंज हैरान कर देती है. फ़िल्म में उनका शरीर बेहद ख़ूबसूरत और तराशा गया लगता है. उनका डांस भी शानदार है. लीला के रोल में दीपिका पादुकोण ने अपनी छाप छोड़ी है. फ़िल्म के शुरुआती हिस्सों में उनका चुलबुलापन देखते ही बनता है. पारंपरिक गुजराती परिधानों में वो बेहद ख़ूबसूरत लगी हैं. फ़िल्म के दूसरे हिस्से में उनका गंभीर अभिनय बताता है कि वो कितनी शानदार अभिनेत्री हैं. दीपिका इस फ़िल्म में अपनी ख़ूबसूरती और अभिनय दोनों से ही दर्शकों के दिलो-दिमाग में छा जाएंगी. फ़िल्म में उनके गहने और कपड़े नए फ़ैशन ट्रेंड को जन्म दे सकते हैं. उनका डांस भी ज़बरदस्त है. लीला की मां के रोल में सुप्रिया पाठक भी बेहतरीन रही हैं. रसीला के रोल में ऋचा चड्ढा ने भी कमाल किया है. बाकी कलाकारों ने भी उम्दा अभिनय किया है. एक गाने में स्पेशल अपियरेंस में नज़र आईं प्रियंका चोपड़ा ने फ़िल्म के ग्लैमर को और बढ़ाया है. संजय लीला भंसाली एक रंगीन और भव्य फ़िल्म बनाने के लिए बधाई के पात्र हैं. फ़िल्म के हर फ़्रेम में बारीकियों का ध्यान रखा गया है. उन्होंने फ़िल्मों को अलग-अलग रंगों में पिरोया है. फ़िल्म के कलाकारों से शानदार काम निकलवाने के लिए भी उनकी तारीफ़ की जानी चाहिए. संजय लीला भंसाली ने फ़िल्म का संगीत भी दिया है. हालांकि इंटरवल से पहले गाने बहुत कम अंतराल में आते हैं लेकिन उनका प्रस्तुतीकरण दर्शकों को बोर नहीं होने देता. फ़िल्म के एक्शन दृश्य और एडिटिंग भी अच्छी है. कुल मिलाकर राम-लीला एक बेहतरीन फ़िल्म है. फ़िल्म हर तरह के दर्शक वर्ग का मनोरंजन करेगी. मल्टीप्लेक्सेस और सिंगल स्क्रीन थिएटर दोनों ही जगह फ़िल्म को अच्छी प्रतिक्रिया मिलने की उम्मीद है. |
| DATE: 2013-11-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1283] TITLE: 'हार्टलेस', मेरे बेटे को श्रद्धांजलि: शेखर सुमन |
| CONTENT: अभिनेता और टीवी होस्ट शेखर सुमन अब बतौर निर्देशक अपनी पारी की शुरूआत करने वाले हैं. उनकी पहली फ़िल्म का नाम है हार्टलेस. फ़िल्म के फ़र्स्ट लुक लॉन्च पर पत्रकारों से मुख़ातिब शेखर सुमन ने बताया कि उनकी यह फ़िल्म उनके बड़े बेटे आयुष को समर्पित है जिनकी मौत दिल की एक दुर्लभ बीमारी की वजह से हो गई थी. इस मौके पर विशेष अतिथि के रूप में उन्होंने अभिनेता अमिताभ बच्चन को भी आमंत्रित किया. शेखर सुमन ने बताया जब मुझे पहली बार डॉक्टरों ने बताया कि मेरे बेटे को यह बीमारी हो गई है तो मुझे एकबारगी यक़ीन नहीं हुआ. तब मैं काफ़ी युवा था. मुझे समझ में आ ही नहीं रहा था कि मैं करूं क्या. फ़िल्म के प्रमोशन पर अमिताभ बच्चन को बुलाने की वजह बताते हुए उन्होंने कहा वैसे तो अमिताभ इतने बड़े और महान कलाकार हैं और हर कोई उनको बुलाना चाहता है. लेकिन मैं उन्हें इसलिए बुलाया है कि जब मुझे पता चला कि मेरे बेटे को यह बीमारी है तो मैंने अमित जी को फ़ोन किया तो उन्होंने फ़ौरन मुझे अपने घर बुलाया. शेखर सुमन ने कहा हालांकि मैं अपने बेटे को बचा नहीं सका लेकिन अमित जी ने उस दौरान हमारी हर संभव मदद की. अमिताभ बच्चन ने इस मौके पर कहा अपने जीवनकाल में संतान को खो देने से बड़ा दुख कोई नहीं है. उन्होंने कहा मैं शेखर जी और उनके परिवार की सराहना करूंगा कि इसके बाद भी उन्होंने बड़ी हिम्मत से काम लिया और जिस आत्मबल का परिचय देते हुए उन्होंने अपने बेटे की यादों को फ़िल्म में पिरोया है वो क़ाबिले-तारीफ़ है. अमिताभ ने कहा फ़िल्म का ट्रेलर देख कर लग नहीं रहा है कि ये बतौर निर्देशक शेखर की पहली फ़िल्म है. शेखर सुमन ने बताया कि फ़िल्म एक रोमांटिक मेडिकल थ्रिलर है और मुख्य भूमिका उनके छोटे बेटे अध्ययन सुमन ने निभाई है. फ़िल्म में अभिनेत्री हैं अरीना अयाम और साथ ही दीप्ति नवल ओम पुरी और मदन जैन ने भी मुख्य भूमिका निभाई है. हार्टलेस अगले साल फ़रवरी में रिलीज़ होगी. |
| DATE: 2013-11-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1284] TITLE: आख़िरी टेस्ट मैच से पहले 'तेंदुलकर आउट'! |
| CONTENT: मुंबई के वानखेडे स्टेडियम को अब इंतज़ार है उन 34000 लोगों का जो गुरूवार को इस मैदान पर सचिन तेंदुलकर को उनके करियर का 200वां और आख़िरी टेस्ट मैच खेलते देखेंगे. हालांकि मैच के शुरु होने में अभी कुछ वक़्त बाक़ी है पर पहले ही तेंदुलकर आउट की ख़बरें आना शुरु हो गई हैं. घबराइए नहीं ये सचिन तेंदुलकर के आउट होने की नहीं बल्कि सुनील तेंदुलकर के आउट होने की बात है. सुनील तेंदुलकर किरदार है इस हफ्ते रिलीज़ होने वाली मराठी फ़िल्म तेंदुलकर आउट का. फ़िल्म से सचिन तेंदुलकर का कोई नाता नहीं है वो तो बस कहानी के साथ साथ टीवी पर चल रहे भारत-पाकिस्तान के एक वन डे मैच का हिस्सा हैं. फ़िल्म का शीर्षक तेंदुलकर आउट फ़िल्म के पात्रों की परिस्थितयों की बात करता है जो किसी न किसी दुविधा में फंसे हैं और उनसे बाहर निकलना चाहते हैं. फ़िल्म के निर्देशक स्वप्निल जयकर कि ये पहली फ़िल्म है और वो कहते है कि आज की तारीख़ में लोगों की ज़िंदगियां एक वन डे मैच जैसी अनिश्चित हो गई हैं. वो कहते हैं कब क्या हो जाए किसी को नहीं पता. हम सब ऐसी परिस्तिथियों से आउट होना यानि निकलना चाहते हैं. स्वप्निल अपनी बात को पूरा करते हुए कहते हैं मेरी फ़िल्म का मुख्य किरदार सुनील तेंदुलकर एक बी ग्रेड फ़िल्मकार है जो एक भारी क़र्ज़ तले दबा है सुनील को मरवाने के लिए अंडरवर्ल्ड डॉन ने दो छोटे चोरों को सुपारी दी है. अब वो ऐसी परिस्तिथि से कैसे आउट होगा यही है मेरी कहानी है. सचिन तेंदुलकर इस हफ्ते अपने करियर का आखरी मैच खेल रहे हैं. स्वप्निल कहते है कि उन्हें पता भी नहीं था कि उनकी फ़िल्म सचिन के आखिरी टेस्ट मैच के साथ मेल खाएगी. वो कहते हैं हमे तो सिर्फ ये पता था कि 15 नवंबर 1989 में सचिन ने पहला टेस्ट मैच खेल था और हम उसी तारिख को अपनी फ़िल्म तेंदुलकर आउट रिलीज़ करेंगे. स्वप्निल कहते है कि उन्हें पहले से ही पता था कि जो भी इस फ़िल्म के नाम को एक बार सुनेगा उसके कान खड़े हो ही जाएगें क्योंकि क्रिकेट में अगर तेंदुलकर आउट तो सब ख़त्म. फ़िल्म के शीर्षक में तेंदुलकर होने से ये फयदा हुआ है कि फ़िल्म की पब्लिसिटी करने में आसानी हो रही है. फ़िल्म तेंदुलकर आउट एक डार्क कॉमेडी है जिसे लिखा है योगेश विनायक जोशी ने. |
| DATE: 2013-11-14 |
| LABEL: entertainment |
| [1285] TITLE: सचिन की विदाई में शाहरुख़ बेगाना! |
| CONTENT: पूरी दुनिया के क्रिकेट प्रशंसकों के अलावा बॉलीवुड भी मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को ज़ोर-शोर से विदाई देने की योजना बना रहा है. ख़बरों के मुताबिक़ सुपरस्टार अमिताभ बच्चन और आमिर ख़ान मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में होने वाले सचिन तेंदुलकर के आख़िरी टेस्ट मैच के दौरान मौजूद रहेंगे. लेकिन इस तमाम हंगामे में क्रिकेट के ज़बरदस्त प्रशंसक और आईपीएल की कोलकाता नाइट राइडर्स टीम के मालिक शाहरुख़ ख़ान के तन्हा ही रहने की संभावना है. क्योंकि वो एक बैन की वजह से वानखेड़े स्टेडियम में प्रवेश नहीं कर सकते. यह मैच 14 नवंबर को शुरू होगा. दरअसल साल 2012 में एक आईपीएल मैच के दौरान उनकी एमसीए महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के अधिकारियों से झड़प हो गई थी जिसकी वजह से उन पर स्टेडियम में घुसने पर पांच साल का प्रतिबंध लगा दिया गया था. शाहरुख़ ख़ान ने सचिन का आख़िरी टेस्ट ना देख पाने की आशंका पर अपनी निराशा ट्विटर पर ज़ाहिर भी की थी. उन्होंने लिखा मैं वानखेड़े नहीं जा सकता. दुनिया में कुछ जगहें ऐसी हैं जहां लोग नहीं चाहते कि मैं जाऊं. वैसे सचिन के आख़िरी टेस्ट के मद्देनज़र उम्मीद व्यक्त की जा रही थी कि शाहरुख़ ख़ान को ये मैच देखने की अनुमति दी जा सकती है. जब बीबीसी ने इस बारे में महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के पदाधिकारियों से बात करनी चाही तो तमाम प्रयासों के बावजूद उनसे संपर्क नहीं हो पाया. वैसे शाहरुख़ के साथ एक क्रूर मज़ाक पिछले हफ़्ते हो चुका है. चूंकि शाहरुख़ ख़ान को इस बात का साफ़ अंदेशा था कि वो वानखेड़े में होने वाला सचिन का 200वां और आख़िरी टेस्ट मैच नहीं देख पाएंगे इसलिए वो कोलकाता के ईडन गार्डन में भारत और वेस्ट इंडीज़ के बीच हुए पहले टेस्ट मैच को देखने की योजना बना रहे थे जो सचिन का 199वां टेस्ट मैच था. शाहरुख़ ने योजना बनाई थी कि वो टेस्ट मैच का चौथा और पांचवां दिन देखेंगे लेकिन भाग्य की विडंबना देखिए कि टेस्ट तीन दिन में ही ख़त्म हो गया और शाहरुख़ का प्लान धरा का धरा रह गया. |
| DATE: 2013-11-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1286] TITLE: दबंग में तो मुन्नी चाहिए, ग़ज़ल का क्या काम: अनूप जलोटा |
| CONTENT: भजन गायकी हो या ग़ज़ल गायक अनूप जलोटा ने ख़ासा नाम कमाया है. हालांकि आजकल ग़ज़लों में ढली मखमली आवाज़ें फ़िल्मों में कम ही सुनने को मिलती हैं. अनूप जलोटा कहते हैं कि जब आजकल फिल्में दबंग जैसी बन रही हैं तो उनमें मुन्नी ही फिट बैठती है ग़ज़लें नहीं. ग़ज़ल को वो मुकुट में जड़ा हीरा बताते हैं जिसकी जगह सिर पर है पैरों में नहीं. बीबीसी ने अनूप जलोटा से विशेष बातचीत की. पढ़िए मुख्य अंश. आपको भजनों को लिए सबसे ज़्यादा याद किया जाता है. ऐसी लागी लगन जैसे आपके कई भजन लोकप्रिय हैं. आपने कब और क्यों सोचा कि गायकी की इस विधा को आगे बढ़ाया जाए या फिर यह एक संयोग था मैं सात-आठ सालों से गा रहा हूं. मुझे महसूस हुआ कि इससे बेहतर कोई और क्षेत्र नहीं है लोग आपको प्यार भी करते हैं आपकी बहुत इज़्ज़त भी करते है. कई लोग भजन सुनकर पैर भी छूते हैं आपको संत-महात्मा समझते हैं साथ ही आपको भजन गाने के पैसे भी देते हैं. मैं समझता हूं कि इससे बेहतर कोई दूसरा क्षेत्र नहीं है. यदि भजन को शास्त्रीय ढंग से गाया जाए तो बेहद आदर प्राप्त किया जा सकता है. मुझे भजन गाकर ही पद्मश्री पुरस्कार मिला और डॉक्टरेट की उपाधि मिली. मुझे हाउस ऑफ़ कॉमंस इंगलैंड ने ग्लोब अवॉर्ड दिया. मुझे भजन गाकर ही सब कुछ हासिल हुआ है. भजन से श्रेष्ठ गायन दूसरा नहीं है. आपने फ़िल्मों में भी गाया है. आप अपने फ़िल्मी सफ़र के बारे में बताइए कि यह कैसे शुरू हुआ और किन लोगों से आप जुड़ेअभिनेता मनोज कुमार फ़िल्म शिरडी के साईं बाबा बना रहे थे तो उसमें मैंने गाना गाया. मैंने रफ़ी साहब के साथ भी गाना गाया. उसके बाद हमें कल्याण जी ने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल बप्पी लाहिड़ी आर डी बर्मन साहब ने अलग-अलग फ़िल्मों में गाने का मौका दिया. हमने कुछ फ़िल्में बनाई हैं. हम साल में तीन फ़िल्में बनाते हैं. हालांकि हम यह कोशिश नहीं करते हैं कि हम जबरदस्ती अपनी फ़िल्मों में गाएं. आपने कई ग़ज़लें भी गाईं हैं जिन्हें लोगों ने पसंद भी किया है. लेकिन आजकल फ़िल्मों से ग़ज़लें जैसे ग़ायब सी हो गई हैं. जब फ़िल्म बनी थी मेरे हुज़ूर तो उसमें सारी ग़ज़लें थीं. मेरे महबूब पाक़ीज़ा में ग़ज़लें थीं. फ़िल्म के हिसाब से ही संगीत बनता है. अब फ़िल्म बनती है दबंग तो उसमें मुन्नी चाहिए. अगर आप मन तड़पत हरि दर्शन को आज या अल्लाह तेरो नाम जैसे गाने का दबंग में इस्तेमाल करती हैं जो ज़रा सोचिए इसका क्या हश्र होगा. हीरे का अपना एक स्थान होता है. हीरे को मुकुट में पहनिए हार में लगाइए या अंगूठी में लगाइए हीरे को पैरों में रख देंगे तो उसका मज़ा नहीं आएगा. इसलिए आजकल फ़िल्मों में ग़ज़लों का कोई स्थान नहीं है. लेकिन कोई बात नहीं है ग़ज़ल अपने आप में सशक्त है. ग़ज़लों के कार्यक्रम होते हैं. हम लोग सारी दुनिया में ग़ज़लों की परफॉर्मेंस देते हैं. आवाज़ क़ुदरत की देन मानी जाती है लेकिन इसके अलावा ऐसी कौन सी चीज़ें हैं जो एक गायक को महान गायक बनाती हैं एक कच्चा हीरा जो खदान में मिलता है उसमें चमक नहीं होती है. उसे चमकाना पड़ता है. वही संगीत में है कि आवाज़ भगवान ने दे दी है लेकिन सिर्फ़ उससे काम नहीं चलता है. हम राग शास्त्रीय संगीत अदब और संस्कृति जैसी कई चीजें सीखते हैं. यह सब सीखकर हम आवाज़ रूपी हीरे को चमकाते हैं जिससे उसका मूल्य बढ़ जाता है. अगर हम ऐसा न करें तो वही कच्ची आवाज़ रह जाएगी जैसी और लोगों की होती है. हम कई दफ़ा लोगों की आवाज़ सुनकर यह कहते हैं कि आप तो बहुत अच्छा गाते हैं आपको सीखना चाहिए था लेकिन भगवान ने उन्हें ऐसी सदबुद्धि नहीं दी कि वे इसे महत्व दे सकें. विदेशों की बात करें तो वहां स्वतंत्र संगीत की अपनी एक ख़ास जगह होती है लेकिन भारत में फ़िल्म संगीत ही छाया रहता है. संगीत की बाक़ी विधाएं सुर्ख़ियों में नहीं रहती हैं इसकी वजह यह है कि किसी ख़ास चीज़ को ख़ास लोग ही पसंद करते हैं. जैसे डिज़ाइनर परिधान को वही ख़रीदते हैं जो उसे समझ पाते है. इसमें कोई अचंभे वाली बात नहीं है. पंडित रविशंकर को वही सुन पाएगा जिसमें उसके लिए योग्यता होगी. मीका और दलेर मेहंदी को सब सुनेंगे लेकिन ऐसे कलाकारों को वही लोग सुन पाएंगे जिनमें थोड़ी योग्यता होगी. यदि आप वैसी योग्यता चाहते हैं तो थोड़ा गीत-संगीत सीखिए आप अच्छे श्रोता भी बन जाएंगे. हमारे देश में भारत रत्न जैसा सम्मान पंडित रविशंकर लता मंगेशकर भीमसेन जोशी जैसे कलाकारों को दिया जाता है. यह सम्मान यहां कभी भी किसी पॉप गायक को नहीं दिया जाएगा. इसलिए हम बेहद संतुष्ट हैं कि हमारे तरह के संगीत को काफ़ी आदर मिलता है उसका एक अलग स्थान है और यह काफी सुरक्षित है. जब तक भारत है तब तक यह संगीत बना रहेगा. आप कई फ़िल्में बना चुके हैं और आपकी कई फ़िल्में बन भी रही हैं तो फ़िल्मों की ओर आपका रुझान कैसे हुआहर इंसान के अंदर प्रोडक्शन का कीड़ा होता है. जैसे आप रेडियो अनाउंसर हैं तो आपके मन में होगा कि आपका अपना रेडियो होना चाहिए. जो साबुन बेचता है उसका मन होता है कि उसकी साबुन की फ़ैक्ट्री होनी चाहिए. ऐसे ही हम फ़िल्मों में गाते हैं और संगीत देते हैं तो मन होता है कि अपनी फ़िल्म बनाई जाए. यह कीड़ा मेरे मन में भी है और आपके मन में भी है. जो लोग सक्षम होते हैं वे इसे पूरा करने में कामयाब होते हैं. गायकी के क्षेत्र में ऐसी कौन सी हस्तियां हैं जिन्हें आप अपना आदर्श मानते हैं मैं आपको और गुरुओं के नाम गिनाऊं जिनको सुन सुनकर सीखा है उनमें बेग़म अख़्तर मेहंदी हसन ग़ुलाम अली जगजीत सिंह पंडित जसराज भीमसेन जोशी हरि प्रसाद चौरसिया पंडित रविशंकर शिवकुमार शर्मा जी पंडित रामनारायण के नाम शामिल हैं. लेकिन विधिवत गुरू पिताजी हैं जिनसे हमने संगीत सीखा है. आपका जन्म नैतीताल में हुआ. लेकिन अब पहाड़ी इलाक़े काफ़ी बदल गए हैं. आज का नैनीताल तब से लेकर अब कितना बदल गया है. उन दिनों पहाड़ थे अब इमारतों के बीच में पहाड़ ढूंढने पड़ते हैं. पहाड़ों में काफी इमारतें होटल और गेस्टहाउस बना दिए गए हैं कि पहाड़ नज़र नहीं आते. यही वजह है कि पहाड़ उन्हें झेल नहीं पाते और टूटने लगते हैं. हाल में उत्तराखंड में जो हुआ इसकी वजह यह भी थी कि वहां अत्यधिक निर्माण कार्य हुआ वह जगह बेहद कमज़ोर हो गई और इतने लोगों को जान गंवानी पड़ी. |
| DATE: 2013-11-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1287] TITLE: बदलाव की बयार में झूमता पाकिस्तानी सिनेमा |
| CONTENT: पाकिस्तानी सिनेमा में वार की कामयाबी को नए दौर की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है. वार इस साल रिलीज़ हुई कई कामयाब फ़िल्मों से एक है. वार को उर्दू में जंग कहते हैं. 2009 में एक बड़ी पुलिस अकादमी पर हुए तालिबानी हमले की सच्ची घटना से प्रेरित वार पाकिस्तान की पहली बड़े बजट की एक्शन फ़िल्म है. बॉक्स ऑफ़िस पर इस फ़िल्म ने कामयाबी के झंडे गाड़े हैं. एक वक़्त था जब पाकिस्तान का मनोरंजन उद्योग जीवंत हुआ करता था लेकिन हालात हमेशा ऐसे नहीं रहे. इस साल वार की तरह ही कम से कम 21 फ़ीचर फ़िल्में पाकिस्तान में रिलीज हुई हैं और इसे अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे फ़िल्म निर्माण उद्योग को दोबारा ऑक्सीज़न मिलने की तरह देखा जा रहा है. पाकिस्तान सिनेमा में निर्देशन से जुड़े इरम परवीन बिलाल ने हाल ही में अपनी फ़िल्म जोश से कामयाबी का स्वाद चखा है. वे कहती हैं पाकिस्तानी फ़िल्म निर्माता के तौर पर काम करने की सबसे बड़ी ख़ासियत यह होती है कि आपकी पहुँच ऐसे देश में होती है जहाँ पहुँच पाना कम ही लोगों के बस में होता है. इस क्षेत्र में फ़िल्म निर्माण से जुड़ी गतिविधियाँ आमतौर पर बढ़ ही रही हैं. यहाँ कई आज़ाद आवाज़ें सुनी जा सकती हैं. हमें उम्मीद है कि वे इस आंदोलन का हिस्सा बनेंगी. पाकिस्तान में थिएटर भी 90 के दशक में धीरे-धीरे कम होने लगे थे लेकिन बदलाव की बयार के झोंके ने न केवल सिनेमा जगत को छुआ बल्कि नाटकों की दुनिया में भी फिर से चहलपहल सुनाई देने लगी है. अगले साल होने वाले एडिनबरा फ़्रिंज फ़ेस्टिवल में पहली बार कोई पाकिस्तानी नाटक दिखाया जाएगा. इन बातों ने पाकिस्तान के सिनेमा और थिएटर जगत से जुड़े लोगों के बीच यह उम्मीद जगाई कि गहरी नींद में सो रहा मनोरंजन उद्योग फिर जाग सकता है. 80 के दशक में पाकिस्तान का थिएटर जगत अपने चरम पर था लेकिन स्टेज पर पेश होने वाली चीज़ों के तरीक़ों में बाद के वक़्त में हुए कुछ ऐसे बदलाव हुए जिनसे दर्शकों की तादाद कम होने लगी. थिएटर जाने वाले कई नाटक प्रेमियों के लिए ये बदलाव अश्लीलता की तरह ही था. कराची के उमर अल्वी नाटक समीक्षक के तौर पर जाने जाते हैं. वे कहते हैं ज़्यादातर लोगों को थिएटर के स्टेज पर अदाकाराओं को नाचते देखना अच्छा नहीं लगा. कलाकारों को सस्ता मज़ाक़ करते देखना पसंद नहीं किया गया और कॉमेडी का स्तर भी मानकों के अनुरूप नहीं था. मगर देश के नौजवान अब स्टेज पर चहलपहल लौटने की उम्मीद में हैं. अभिनेताओं और निर्देशकों की नई पौध आ रही है जिन्होंने नाटकों की तालीम भी हासिल की है. अभिनेता लेखक और निर्देशक उस्मान ख़ालिद बट भी इसी पौध से आते हैं. ख़ालिद कहते हैं एक बार दर्शकों ने देखा कि यह एक अच्छी सांस्कृतिक चीज़ है तो परिवारों ने अपने बच्चों को इजाज़त देनी शुरू कर दी और फिर लोगों ने इसमें भाग लेना शुरू किया. यह न केवल स्टेज पर हुआ बल्कि नेपथ्य में भी देखने को मिला. उस्मान के नाटक सम लाइक इट हॉट और फ़्रीडम बाउंड को हज़ारों लोगों ने देखा. वे इन दिनों एडिमबरा फ़्रिंज फ़ेस्टिवल में दिखाए जाने वाले नाटक की तैयारी कर रहे हैं. वे कहते हैं हमें दुनिया को दिखाने की ज़रूरत है कि हमारे पास भी प्रतिभा है. हमें थिएटर के प्रचार-प्रसार के लिए सरकारी मदद की उम्मीद है. इस बीच पाकिस्तानी सिनेमा को भी अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलनी शुरू हो गई है. 50 साल में पहली बार उर्दू फ़िल्म ज़िदा भाग ऑस्कर पुरस्कारों की विदेशी भाषा श्रेणी के लिए पाकिस्तान की नुमाइंदगी कर रही है. |
| DATE: 2013-11-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1288] TITLE: गब्बर सिंह कैसे बच गया ज़िंदा? |
| CONTENT: गब्बर सिंह को ठाकुर अपने जूतों के नीचे कुचलने की पूरी तैयारी कर लेता है. वो उसे मारने ही वाला होता है कि तभी पुलिस आ जाती है. गब्बर को क़ानून के हवाले कर दिया जाता है. ठाकुर को समझाया जाता है कि अपराधी को सज़ा देना क़ानून का काम है. ठाकुर को बात समझ में आ जाती है और फिर लात घूंसों से पिटे ख़ून में सने गब्बर सिंह को पुलिस अपने साथ ले जाती है. साल 1975 की सुपरहिट फ़िल्म शोले का सब ने यही अंत देखा है. लेकिन क्या आपको पता है कि फ़िल्म की मूल स्क्रिप्ट में गब्बर सिंह ठाकुर के हाथों मारा जाता है. फिर ये बात दर्शकों के सामने क्यों नहीं आई. ये बताया फ़िल्म की लेखक जोड़ी सलीम-जावेद के जावेद यानी जावेद अख़्तर ने. उन्होंने मीडिया को बताया वो इमरजेंसी का ज़माना था. हमसे सरकारी अधिकारियों ने कहा कि भाई गब्बर सिंह को मारना ग़ैर क़ानूनी है. ये अलग बात है कि गब्बर सिंह की करतूतें उन्हें ग़ैर क़ानूनी नहीं लगीं. लेकिन हमारे सामने कोई चारा नहीं था. तो मजबूरन हमें क्लाइमेक्स रीशूट कराना पड़ा. जावेद अख़्तर ने बताया कि फ़िल्म के मूल क्लाइमेक्स में गब्बर सिंह को मारने वाला दृश्य इंटरनेट पर मौजूद है. शोले फ़िल्म को थ्री डी में परिवर्तित करके उसे दोबारा रिलीज़ करने की तैयारी है. और इसी घोषणा के लिए इसकी लेखक जोड़ी सलीम ख़ान और जावेद अख़्तर को न्यौता दिया गया था. इस मौक़े पर ही शोले से जुड़ी कई दिलचस्प बातों को इस जोड़ी ने साझा किया. ज़ंजीर शोले दीवार डॉन और त्रिशूल जैसी सुपरहिट फ़िल्में लिखने वाली ये जोड़ी अब टूट चुकी है. लेकिन बरसों बाद ये दोनों पुराने दोस्त सार्वजनिक तौर पर शोले की ख़ातिर साथ नज़र आए. जावेद अख़्तर ने ये भी बताया कि शोले की स्क्रिप्ट को कई निर्माता पहले नकार चुके थे और अंतत जब उन्होंने जीपी सिप्पी को ये कहानी सुनाई तो उन्हें ये बहुत पसंद आई. जावेद अख़्तर ने बताया जीपी सिप्पी साहब बेहद जुनूनी फ़िल्मकार थे. उन्होंने शोले की कहानी 15 मिनट सुनने के बाद ही कह दिया कि वो इस फ़िल्म को बनाएंगे. फिर रमेश सिप्पी ने फ़िल्म का निर्देशन किया. फ़िल्म को थ्री डी में बदला पैन इंडिया के जयंतीलाल गढ़ा ने. उन्होंने बताया कि इस काम में 25 करोड़ रुपए की लागत आई. फ़िल्म अगले साल तीन जनवरी को रिलीज़ होगी. इस मौक़े पर शोले के निर्देशक रमेश सिप्पी नज़र नहीं आए. जयंतीलाल गढ़ा ने बताया रमेश सिप्पी के कुछ मसले हैं और उन्होंने शोले के थ्री डी संस्करण के ख़िलाफ़ केस दायर कर रखा है. लेकिन हमें उम्मीद है कि अंत में सब कुछ सुलझ जाएगा. शोले को लिखने वाले लेखक सलीम-जावेद कई सालों बाद साथ नज़र आए. शोले के डायलॉग जैसे कितने आदमी थे तेरा क्या होगा कालिया इतना सन्नाटा क्यों है भाई वग़ैरह बड़े लोकप्रिय साबित हुए. लेकिन सलीम ख़ान मानते हैं कि उन्होंने सोचा ही नहीं था कि ये संवाद हिट होंगे. सलीम ख़ान बोले शोले के वो डायलॉग जो हमने बड़ी मेहनत से लिखे और जिन्हें लेकर हमें बड़ी उम्मीद थी वो तो चले ही नहीं. और ये सब चल गए कि तेरा क्या होगा कालिया. कितने आदमी थे. ये तो सवाल थे. डायलॉग थोड़े न थे. सलीम-जावेद की जोड़ी ने 70 के दशक में कई सुपरहिट फ़िल्में लिखीं. लेकिन 80 के दशक में ये जोड़ी टूट गई. तब सलीम ख़ान ने कुछ फ़िल्में अकेले लिखीं और जावेद अख़्तर ने बतौर गीतकार अपना करियर आगे बढ़ाया. तो क्या ये जोड़ी भविष्य में फिर से एक साथ काम करेगी. जावेद अख़्तर ने कहा आप इंतज़ार कीजिए. भविष्य में किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. कुछ भी हो सकता है. |
| DATE: 2013-11-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1289] TITLE: 'स्टार वार्स' में मुख्य भूमिका के लिए ऑडिशन |
| CONTENT: स्टार वार्स फ़िल्मों की श्रंखला की सातवीं कड़ी के लिए दो प्रमुख भूमिकाओं के लिए ऑडिशन की शुरुआत ब्रिस्टल से हो रही है. इसमें हज़ारों उम्मीदवारों के ऑडिशन के लिए पहुँचने की संभावना है. इसके लिए निर्माता लुकास फ़िल्म दो प्रमुख भूमिकाओं के लिए अभिनेताओं की तलाश कर रही है. निर्माताओं को स्मार्ट किशोरी की भूमिका के लिए एक युवती की तलाश है जबकि स्मार्ट और सक्षम युवा की भूमिका के लिए एक युवक की तलाश है जिनकी उम्र बीस साल के आसपास हो. इसके लिए निर्माता समूचे ब्रिटेन और ऑयरलैंड में ऑडिशन का आयोजन करेंगे. नवंबर में ग्लास्गो मैनचेस्टर डबलिन और लंदन में भी ऑडिशन होंगे. स्टार वार्स-7 की शूटिंग लंदन के नज़दीक स्थित पाइनवुड स्टूडियो में होगी और यह फ़िल्म 18 दिसंबर 2015 को रिलीज़ होगी. इन ऑडिशन की घोषणा सबसे पहले ट्विटर अकाउंट पर की गई थी. ट्वीट में कहा गया था कि डिज़्नी द्वारा बनाई जाने वाली एक बड़ी हॉलीवुड फ़िल्म के लिए ऑडिशन होंगे. डिज़्नी ने अक्टूबर 2012 में लुकास फ़िल्म को क़रीब चार अरब डॉलर में खरीद लिया था. इस फ़िल्म के लिए इसी हफ़्ते अमरीका में भी ऑडिशन शुरू होंगे. ऑडिशन के लिए ऑनलाइन आवेदन भी किया जा सकता है. फ़िल्म के कॉस्टिंग निर्देशक शिकागो और नैशविले में ऑडिशन लेंगे और ऑनलाइन भेजे गए ऑडिशन भी देखेंगे. इतनी बड़ी फ़िल्म में मुख्य भूमिका के लिए खुले ऑडिशन लिया जाना अभूतपूर्व है. हालांकि स्टार वार्स में इससे पहले भी अनजान अभिनेताओं को मुख्य भूमिकाएं दी जाती रही हैं. मार्क हमील ने जब ल्यूक स्काईवॉकर की भूमिका के लिए चुने गए थे तब उन्हें बहुत कम लोग जानते थे. कई अन्य बड़ी फ़िल्मों में सहायक भूमिकाओं के लिए ओपन ऑडिशन लिए जाते रहे हैं. हैरी पॉटर श्रंखला की बाद की फ़िल्मों में सहायक भूमिकाओं के लिए ऑडिशन लिए गए थे. फ़िल्म द गोल्डन कंपास की मुख्य पात्र लॉयरा की भूमिका अभिनेत्री डकोटा ब्लू रिचर्ड्स को ऑडिशन के ज़रिए ही मिली थी. फ़िल्म के निर्माता और सह-लेखक जेजे अबराम्स ऑडिशन नहीं लेंगे. अभिनेत्री की भूमिका के लिए 16 वर्ष से अधिक और अभिनेता की भूमिका के लिए 18 वर्ष से अधिक के युवा अभी किस्मत आज़मा सकते हैं. ऑडिशन के दौरान उन्हें फ़िल्म के कॉस्टिंग निर्देशकों से मिलने का मौका भी मिलेगा. |
| DATE: 2013-11-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1290] TITLE: 'सत्या-2' नहीं 'सत्यानाश' |
| CONTENT: सत्या-2 साल 1998 में रिलीज़ हुई फ़िल्म सत्या का सीक्वल है. मुंबई पर अंडरवर्ल्ड का प्रभुत्व लगभग ख़त्म हो चुका है और सत्या पुनीत सिंह रत्न इस स्थिति का फ़ायदा उठाना चाहता है. वो अपने छोटे गांव से मुंबई पहुंचता है और अपने दोस्त नारा के साथ रहने लगता है. नारा एक संघर्षरत फ़िल्म निर्माता है और अपनी फ़िल्म के लिए पैसा जुटाने की कोशिश में लगा है. सत्या एक बिल्डर के साथ मिलकर लोगों के मन में एक बार फिर से अंडरवर्ल्ड का ख़ौफ लोगों के मन में पैदा करके उनसे पैसे उगाहने का काम करने लगता है. जल्द ही वो बिल्डर के साथ अंडरवर्ल्ड डॉन आरके का चहेता बन जाता है. सत्या के कारनामों की चर्चा पूरे मुंबई में होने लगती है और वो सरकार की आंखों की किरकिरी बन जाता है. वो शहर में अपनी दहशत कायम करने के लिए मशहूर हस्तियों रईस लोगों यहां तक कि मंत्रियों और व्यापारियों की हत्याएं करने और करवाने लगता है. पुलिस और सरकार उस पर काबू करने में नाकाम रहती है. आगे क्या होता है क्या सत्या पर अंकुश लगाया जा सकेगा पुलिस उसकी हरकतों को कैसे रोक पाएगी. यही आगे की कहानी है. राधिका आनंद की कहानी में ख़ामियां ही ख़ामियां हैं और वो लोगों के ज़ेहन में किसी तरह का डर या ख़ौफ़ पैदा करने में नाकाम रही है. स्क्रीनप्ले में जान ही नहीं है. कहानी में दिखाया गया है कि अंडरवर्ल्ड कैसे बर्बादी से उठकर फिर से एक शहर पर काबू कर लेता है लेकिन फ़िल्म देखते समय दर्शकों को फिल्म के पात्र कहीं से भी खौफ़ज़दा नहीं कर पाते. फ़िल्म में हत्याओं के सिवा कुछ नहीं होता. फ़िल्म में लगभग सभी पात्र नए चेहरे हैं और उनके किरदारों को भी ठीक से डेवलप नहीं किया गया है. इस वजह से भी दर्शक फ़िल्म से जुड़ नहीं पाते. फ़िल्म की गति बेहद धीमी है. फ़िल्म का केंद्रीय पात्र सत्या भी इतनी धीमी गति से बोलता है कि दर्शकों को खीझ होने लगती है. सत्या के किरदार को कूल बनाने के चक्कर में फ़िल्म में उससे बहुत धीमी आवाज़ में संवाद अदायगी कराई गई है जो दर्शकों के संयम की परीक्षा लेती है. कुल मिलाकर सत्या की कहानी और स्क्रीनप्ले बेहद बचाकाना किस्म के हैं. फ़िल्म देखकर दर्शकों के मन में ना तो किसी तरह का ख़ौफ़ पैदा हो पाता है ना ही उनका मनोरंजन हो पाता है. पुनीत सिंह रत्न में आत्मविश्वास तो नज़र आया लेकिन अभिनय के मामले में वो साधारण ही रहे. परदे पर वो आलसी दिखे और उनकी संवाद अदायगी की वजह से वो दर्शकों के मन में किसी भी तरह का प्रभाव नहीं छोड़ पाए. सत्या की गर्लफ्रेंड चित्रा के रोल में अंकिता सोती ने अच्छा अभिनय किया है. फ़िल्म के दौरान मकरंद देशपांडे की हिंदी में कमेंट्री बेहद उबाऊ और लंबी है. इसके अलावा उनकी इस कमेंट्री की भाषा में कई गड़बड़ियां भी हैं. रामगोपाल वर्मा का निर्देशन बिलकुल भी असरदार नहीं है. वो बिलकुल भी फॉर्म में नहीं है. फ़िल्म के गाने और संगीत भी बेदम हैं. ये फ़िल्म सत्या जैसी फ़िल्म का सीक्वल होना बिलकुल भी डिज़र्व नहीं करती. इस फ़िल्म को सत्या नहीं बल्कि सत्यानाश कहना ज़्यादा ठीक होगा. |
| DATE: 2013-11-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1291] TITLE: ट्विटर पर अमिताभ को चाहने वालों की संख्या हुई 70 लाख के पार |
| CONTENT: यूं तो अमिताभ बच्चन के चाहने वाले आपको हर गली हर शहर और हर देश में मिल जाएंगे. लेकिन अगर बात करें सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर की तो यहाँ अमिताभ के चाहने वालों का आंकड़ा 70 लाख को पार कर गया है. अमिताभ सोशल नेटवर्किंग साइट पर काफी सक्रिय रहते हैं और शायद यही वजह उन्हें इतना लोकप्रिय बनाती है. ट्विटर पर अपने सभी प्रशंसकों को धन्यवाद देते हुए अमिताभ ने लिखा आप सब का धन्यवाद. ट्विटर पर 70 लाख से भी ज्यादा. अनुराग कश्यप की फ़िल्म अग्ली इसी साल अक्टूबर के महीने में रिलीज़ होनी थी लेकिन अब इसकी रिलीज़ को अगले साल तक के लिए टाल दिया गया है. आपने ध्यान दिया ही होगा कि जब भी फ़िल्मों में धूम्रपान के दृश्य आते हैं तो साथ ही वैधानिक चेतावनी भी दी जाती है कि धूम्रपान सेहत के लिए हानिकारक है. लेकिन अनुराग अपनी फ़िल्म अग्ली के धूम्रपान संबंधी दृश्यों में ये चेतावनी नहीं देना चाहते. बस इसी बात पर उनकी और सेंसर बोर्ड के बीच ठन गई है. अनुराग कश्यप की फ़िल्म कंपनी फैंटम के प्रवक्ता की अगर मानें तो सेंसर बोर्ड ने ये निर्देश दिया है कि फ़िल्म में जहाँ भी धूम्रपान के दृश्य हैं वहाँ वैधानिक चेतावनी का इस्तेमाल करना ही होगा. तभी फ़िल्म को सेंसर की स्वीकृति मिलेगी. फैंटम फ़िल्म्स का ये भी कहना है कि वह अब भी अपनी मांग पर अडिग हैं और वह सेंसर को समझाने की कोशिश कर रहे हैं. अनुराग की फ़िल्म कंपनी के प्रवक्ता ये भी कह रहे हैं कि सेंसर बोर्ड के साथ चल रही इस बातचीत का अगर कोई संतोषजनक समाधान नहीं निकला तो वो कोई दूसरा तरीका खोजेंगे. |
| DATE: 2013-11-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1292] TITLE: बॉबी के 40 साल: गाँव से चलती थी बॉबी बस |
| CONTENT: यूँ तो हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में बेशुमार फ़िल्में बनती हैं लेकिन कुछ फ़िल्में ऐसे होती हैं जो यादगार बन कर रह जाती हैं. ऐसी ही एक फ़िल्म है राज कपूर की बॉबी. 1973 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म ने अपने 40 साल पूरे कर लिए हैं. बॉबी को असल मायनों में हिंदी फ़िल्मों की पहली टीनएज लव स्टोरी कहना शायद ग़लत नहीं होगा. जहाँ अधेड़ उम्र के हीरो अक्सर कॉलेज के किशोर का रोल निभाते आए हैं वहाँ 16-17 साल की डिंपल और कोई 20-21 साल के ऋषि कपूर पर्दे पर अलग ताज़गी लेकर आए. ऋषि कपूर के बेपरवाह बाप के रोल में प्राण साहब बॉबी पर जान छिड़कने वाले पिता के रूप में प्रेमनाथ और मिसिज़ ब्रिगेंन्ज़ा के रोल में दुर्गा खोटे सब एक से बढ़कर एक थे. कहते हैं कि फ़िल्म बॉबी की लोकप्रियता का आलम ये था कि गाँवों-क़स्बों से बड़े शहरों के थिएटरों के लिए विशेष बसें चलती थीं जिन्हें बॉबी बस कहा जाता था. ये बस लोगों को फ़िल्म दिखाकर वापस गाँव लेकर आती थी. लेकिन फ़िल्म बनाने और रिलीज़ करने से पहले राज कपूर के हालात काफ़ी मुश्किल थे. फ़िल्म में पैसा चाहिए था जिसके लिए हिंदूजा परिवार आगे आया. वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश चौकसे बताते हैं फ़िल्म बनकर तैयार थी. राज साहब फ़िल्म का ऊंचा दाम मांग रहे थे. वह राजेश खन्ना का दौर था और राज साहब राजेश खन्ना की फ़िल्म से एक लाख ऊपर दाम मांग रहे थे. शशि कपूर पहले डिस्ट्रीब्यूटर थे जिन्होंने इसे ख़रीदा. शशि कपूर ने कोठारी साहब की साझेदारी में दिल्ली-यूपी ख़रीदा. और एक वकील हुआ करते थे जिन्होंने पंजाब के अधिकार ख़रीदे. और कहीं के लिए फ़िल्म बिकी ही नहीं. मुसीबत यहीं ख़त्म नहीं हुई और फ़िल्म में पैसा लगाने वाले हिंदूजा परिवार से अदालत तक की नौबत आ गई. चौकसे बताते हैं राजकपूर को लगा कि अगर फ़िल्म हिट होगी तो बाक़ी जगहों के अधिकार भी बिक जाएंगे लेकिन हिंदूजा को लगा कि सिर्फ़ दो जगह के अधिकार से पैसा कैसे निकलेगा. उन्होंने उनके ख़िलाफ़ हाइकोर्ट में केस कर दिया. रिलीज़ के पहले राजकपूर ने उनका पैसा लौटा दिया. लेकिन पिक्चर का पहला शो हाउस फुल हो गया और फ़िल्म चल पड़ी. उसके बाक़ी के अधिकार बिक गए और इंडस्ट्री में लोग फिर से राजकपूर को महान डायरेक्टर मानने लगे. वे लोग भी उनके साथ हो गए जो कहने लगे थे कि राज निर्देशन भूल गया है. फ़िल्म के बनने और रचे जाने की कहानी भी काफ़ी दिलचस्प है. राज कपूर के क़रीबी रहे वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश चौकसे बताते हैं राज साहब के ऑफ़िस में उस समय सिर्फ़ ज़मीन पर दरी बिछी रहती थी और मेज़ लगी रहती थी. उस मेज़ पर आर्ची कॉमिक्स पड़ी रहती थीं. ऐसे ही उन्होंने कॉमिक्स में एक कैरेक्टर के बारे में पढ़ा जिसे इश्क हो गया था तो उसका बाप बोलता है कि यह तुम्हारी उमर है इश्क करने की यू आर टू यंग टू फॉल इन लव. वहीं से यह आइडिया आया कि ऐसी फ़िल्म बनाई जाए जिनके बारे में लोग कहते हैं कि यह भी कोई उमर है प्यार करने की. फ़िल्म बॉबी ने रिलीज़ होने के बाद कामयाबी के झंडे गाड़ दिए और इसके गानों का क्रेज़ भी ग़ज़ब था. लेकिन बॉबी बनाने से पहले भी निर्माता-निर्देशक राज कपूर के हालात अच्छे नहीं थे. 1970 में राज कपूर की फ़िल्म मेरा नाम जोकर फ़्लॉप हो गई थी. उसके एक साल बाद राज जी की प्रोड्यूस हुई फ़िल्म कल आज कल जिसे रणधीर कपूर ने डायरेक्ट की थी वह भी फ़्लॉप हो गई. उस समय मार्केट में आरके बैनर की क्रेडिबिलिटी कम हो गई थी. उसी दौरान पृथ्वी राजकपूर की मृत्यु हुई उनकी माताजी गुज़र गईं उनके क़रीबी जयकिशन की भी मृत्यु हुई. इन्हीं चुनौतियों के बीच राज कपूर ने एक युवा प्रेम कहानी बनाने की ठानी. ऋषि कपूर बतौर बाल कलाकार मेरा नाम जोकर में राष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर अपना जौहर दिखा चुके थे. डिंपल कपाड़िया को हीरोइन चुनने की रोचक कहानी जयप्रकाश चौकसे यूँ बताते हैं किशन धवन चरित्र कलाकार थे. उनकी पत्नी बुंदी धवन राज कपूर की पत्नी कृष्णा की दोस्त थीं. उन्होंने डिंपल कपाड़िया का नाम सुझाया. स्क्रिप्ट के साथ डिंपल के सीन लिए गए वो आज भी आरके स्टूडियो में कहीं रखे हुए होंगे. स्क्रिप्ट सीन देख कर आपको यक़ीन नहीं होगा कि यह वही डिंपल कपाड़िया हैं. राज कपूर ने डिंपल को डांस और एक्टिंग क्लास भेजकर पारंगत करना शुरू किया. उस समय डिंपल की उम्र बमुश्किल 15 या 16 की रही होगी. वैसे जब बॉबी की शूटिंग अपने अंतिम पड़ाव में थी तो डिंपल कपाड़िया ने राजेश खन्ना से शादी कर ली थी. बॉबी के रिलीज़ के बाद ऋषि कपूर-डिंपल की जोड़ी ने तहलका मचा दिया था. बॉबी सिर्फ़ एक फ़िल्म भर न होकर एक फ़ैशन स्टेटमेंट भी थी. डिंपल की वो मिनी स्कर्ट पोलका डॉट वाली शर्ट हॉट पैंट्स बड़े चश्मे पार्टियाँ. राज कपूर ने जवान भारत की पहचान एक नई जीवनशैली से कराई थी. बॉबी की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह उसके गीत थे जो उस समय किसी एंथम से कम नहीं थे. उस समय जय किशन की मृत्य हो गई थी और बताया जाता है कि शंकर से राज कपूर की अनबन हो गई. इसलिए उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारे लाल को साइन किया. राज कपूर की आवाज़ मुकेश को माना जाता था लेकिन ऋषि कपूर के लिए वे नई आवाज़ चाहते थे. सो नए गायक शैलेंद्र सिंह को लिया गया. फ़िल्म का हिट गीत झूठ बोले कौवा काटे दरअसल एक लोकगीत था जिसे राज कपूर ने तीसरी क़सम फ़िल्म की शूटिंग के सिलसिले में सागर में बिट्ठल भाई पटेल के यहां सुना था. कहा जाता है कि उन्होंने तभी कहा था इसे रिकॉर्ड करके इसपर कोई गाना बनाऊंगा. उन्होंने यही गीत फ़िल्म में लिया भी. कहते हैं कि बॉबी बनाते वक़्त इंडस्ट्री के बड़े-बड़े लोग धर्मेंद्र प्राण साहब राजेंद्र कुमार ने उनसे कहा था कि आरके बैनर को फिर से खड़ा करने के लिए वे लोग बिना पैसे लिए काम करेंगे. लेकिन राज कपूर ने सबका शुक्रिया अदा करते हुए कहा था इस वक़्त मेरी फ़िल्में फ़्लॉप हो चुकी हैं इसलिए मेरा लेवल नीचे है और आपका ऊपर. हम तब साथ काम करेंगे जब हमारा और आपका लेवल बराबर हो जाएगा. और राज कपूर ने वो करके भी दिखाया बंदिशों को तोड़ता प्रेम अमीरी-ग़रीबी को पाटता प्यार बाली उम्र की ये प्रेम कहानी आज भी बेहतरीन टीनएज लव स्टोरी के रूप में याद की जाती है. |
| DATE: 2013-11-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1293] TITLE: स्मार्ट हैं दर्शक, बढ़ गई है ज़िम्मेदारी: टॉम हैंक्स |
| CONTENT: हॉलीवुड के मशहूर वरिष्ठ अभिनेता टॉम हैंक्स ने सोमालिया के समुद्री डाकुओं द्वारा 2009 में अमरीका के एक जहाज़ को हाइजैक कर लेने की वास्तविक घटना पर बनी फिल्म कैप्टन फिलिप्स में कैप्टन रिचर्ड का किरदार निभाया है. हॉलीवुड निर्देशक पॉल ग्रीनग्रास द्वारा निर्देशित यह फिल्म इस जहाज़ के कैप्टन रिचर्ड फिलिप्स द्वारा उनके सच्चे अनुभवों पर लिखी गई किताब ए कैप्टन्स ड्यूटी पर आधारित है. वर्ष 2009 में हुए इस हाइजैक में सोमाली डाकुओं ने कार्गो जहाज एमवी मेअरसेक अलबामा सहित पूरे चालक दल का अपहरण कर लिया था. लंदन में अपनी फिल्म कैप्टन फिलिप्स के प्रमोशन के दौरान टॉम हैंक्स ने बीबीसी के कार्यक्रम आउटलुक के में इस फिल्म के अनुभव साझा किए. असल जीवन के किरदार को निभाते समय आप पर कैसी ज़िम्मेदारी थी हाँ इस फिल्म को करते समय मेरे ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी और फिल्म के दौरान मैं और निर्देशक पॉल ग्रीनग्रास अकसर किरदार के बारे में बात किया करते थे. हम एक विश्वसनीय और सच्चा किरदार लोगों के सामने पेश करना चाहते थे. मैं चाहता था कि दर्शक मुझे कैप्टन रिचर्ड की तरह ही पहचानें. इस किरदार को करते समय आप किस प्रक्रिया और अनुभवों से गुज़रेइस किरदार को जीवंत बनाने में बहुत मेहनत की गई. लेकिन जब हम इस तरह का किरदार कर रहे होते हैं तो ये सिर्फ एक व्यक्ति का प्रयास न होकर एक सामूहिक प्रयास बन जाता है. साथी कलाकार क्रू सदस्य सभी की इसमें पूरी मेहनत रही. तनाव तो था लेकिन सभी के सहयोग से ये फिल्म शानदार बनी. सोमालियन डाकुओं के बारे में आप क्या सोचते हैं आपका क्या कहना है इस बारे मेंआलीशान जहाज़ जिन पर सुख-सुविधा की सभी वस्तुएं होती हैं जब वे अरब सागर में सोमालिया के तट पर पहुँचते हैं तो उन्हें लूट लिया जाता है. सोमालिया एक ऐसा इलाका है जो पूरी तरह से उपेक्षित है और वहाँ के लोग निराश हो चुके हैं. सोमालिया में लोग भूखे मर रहे हैं. इस फिल्म को करते वक्त मैंने इसकी गंभीरता को महसूस किया. इन सब चीजों ने मुझे फिल्म करने औऱ चीजों को जानने में बहुत मदद की. 57 साल की उम्र में इस किरदार को करने पर टॉम हैंक्स कहते हैं मेरे ऊपर इसे लेकर कोई दवाब नहीं था. मैं 57 की उम्र में भी ये किरदार कर सकता हूँ. जहाँ तक दर्शकों की बात है तो वे बहुत स्मार्ट हैं वे मुझे पिछले 20 सालों से भी ज्यादा सालों से एक अभिनेता के तौर पर देखते आ रहे है. |
| DATE: 2013-11-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1294] TITLE: केटी पेरी के साढ़े चार करोड़ से ज़्यादा फ़ॉलोअर, जस्टिन बीबर को पछाड़ा |
| CONTENT: केटी पेरी ने ट्विटर पर फॉलोअर्स के मामले में नया रिकॉर्ड बना लिया है. उनके इस सोशल नेटवर्किंग साइट पर चार करोड़ 65 लाख से भी ज़्यादा फ़ॉलोअर हो गए हैं. वो ट्विटर पर ऐसी हस्ती बन गई हैं जिसके सबसे ज़्यादा फ़ॉलोअर हैं. इससे पहले ये रिकॉर्ड युवा पॉप गायक जस्टिन बीबर का था. उनके ट्विटर पर कुल 46510838 फ़ॉलोअर्स हैं जबकि केटी पेरी के अब कुल 46534966 फ़ॉलोअर हो गए हैं. ट्विटर से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि जल्द ही केटी पेरी ट्विटर पर पांच करोड़ फ़ॉलोअर्स का आंकड़ा छूने वाली शख़्सियत बन सकती हैं. ऑल ट्विटर न्यूज़ ब्लॉग की शे बेनेट कहती हैं बीबर पिछले कई दिनों से ट्विटर पर ख़ासे सक्रिय हैं वो अपने ब्राज़ील टूर को लेकर लगातार ट्वीट कर रहे हैं लेकिन केटी पेरी अक्तूबर से ट्विटर पर बिल्कुल सक्रिय नहीं हैं. उसके बावजूद वो आगे निकल गईं. उम्मीद है कि जब वो दोबारा ट्विटर पर सक्रिय होंगी तो उनके फ़ॉलोअर्स का आंकड़ा पांच करोड़ तक पहुंच जाएगा. जस्टिन बीबर से पहले सिंगर लेडी गागा पहले नंबर पर थीं. जस्टिन बीबर ने चार करोड़ फ़ॉलोअर्स का आंकड़ा इस साल जून में छुआ था. इससे पहले इस साल की शुरुआत में आई एक रिपोर्ट में ये आशंका व्यक्त की गई थी कि बीबर के ट्विटर पर फ़ॉलोअर्स में से आधे फ़ेक यानी नकली हो सकते हैं. जस्टिन बीबर के कई विवादों में पड़ने की वजह से उनकी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ख़ासी आलोचना भी होती है. अपने ब्राज़ील दौरे के दौरान उनके एक वेश्यालय में जाने की ख़बरें भी मीडिया की ख़ूब सुर्खियां बनीं. केटी पेरी और जस्टिन बीबर के बाद लेडी गागा अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और गायिका टेलर स्विफ़्ट का नंबर आता है. अगर फ़ेसबुक की बात करें तो वहां केटी पेरी लेडी गागा से पीछे हैं. |
| DATE: 2013-11-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1295] TITLE: फ़ैशन इंडस्ट्री में बंद हो नस्लभेद: नाओमी कैंपबेल |
| CONTENT: फ़ैशन इंडस्ट्री में नस्लभेद होता है और इस पर रोक लगनी चाहिए. ये कहना है ब्रितानी सुपरमॉडल नाओमी कैंपबेल का. नाओमी सिंगापुर में आयोजित डिजिटल फ़ैशन वीक में हिस्सा लेने पहुंची थीं. वहां बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा ये एक बड़ा मुद्दा है. हमने साल 2009 में भी ये बात उठाई थी लेकिन इसे उपेक्षित कर दिया गया. बहुत कम लोगों ने हमारी बात सुनी. नाओमी ने आगे कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले विभिन्न फ़ैशन शोज़ में सिर्फ़ छह फ़ीसदी काले मॉडल और नौ फ़ीसदी ही एशियाई मॉडल होती हैं. हमें सवाल करना चाहिए कि ऐसा क्यों होता है. वो कहती हैं हम किसी से लड़ना नहीं चाहते लेकिन ये एक ऐसा मुद्दा है जिस पर लोगों को मिल बैठकर विचार करना चाहिए कि इसे कैसे दूर किया जा सकता है. फ़ैशन इंडस्ट्री में उस दिन का आना बहुत ज़रूरी है जब किसी मॉडल को इस वजह से तवज्जो दी जाए कि वो कितनी सुंदर और टैलेंटेड है. ना कि उसकी त्वचा के रंग के आधार पर उसे सेलेक्ट या रिजेक्ट किया जाए. क्या कभी नाओमी को ख़ुद भेदभाव का शिकार होना पड़ाइसके जवाब में नाओमी ने कहा हां लेकिन मैं अब उसके बारे में ज़्यादा बात नहीं करना चाहती. मैंने उस बात को अपनी मज़बूती बनाया. उस भेदभाव से मुझे लड़ने की और अपने आपको प्रेरित करने की ताक़त मिली. नाओमी ने बताया कि वो मुहिम चला रही हैं ताकि फ़ैशन इंडस्ट्री को नस्लभेद मुक्त बनाया जा सके. उन्होंने बताया कि कई एशियाई अश्वेत मॉडलों ने उनसे अपनी पीड़ा बयां की कि कैसे बड़े-बड़े फ़ैशन डिज़ाइनर उनसे भेदभाव करते हैं. तब उन्होंने तय किया कि वो इस मुद्दे पर कुछ करेंगी और भेदभाव का शिकार होने वाली इन मॉडलों के हक़ की लड़ाई लडेंगी. 43 साल की नाओमी ने मॉडल बनने से पहले कुछ म्यूज़िक वीडियो में काम किया था. 80 के दशक के आख़िर से उनके करियर का सितारा चमकना शुरू हुआ और 90 के दशक में वो चोटी की मॉडल बन गईं जब कई अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के कवर पेज पर उनकी तस्वीरें छपीं. |
| DATE: 2013-11-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1296] TITLE: पहले यूट्यूब अवार्ड की घोषणा |
| CONTENT: न्यूयॉर्क में पहले यूट्यूब अवार्ड समारोह का आयोजन किया गया. जोश खरोश से लबरेज इस अवार्ड समारोह के संचालन का जिम्मा अभिनेता जैसन श्वार्त्समन और संगीतकार रेगी वाट्स ने संभाला. विडियो शेयरिंग वेबसाइट यू-ट्यूब के इस कार्यक्रम में एमिनेम लेडी गागा और एमआईए जैसी नामचीन हस्तियाँ शरीक हुईं. आवार्ड से जुड़े स्पाइक जोंज़े और दूसरे लोगों ने लेडी गागा एमिनेम और एमआईए के म्यूजिक विडियो का निर्देशन किया. एमिनेम को आर्टिस्ट ऑफ दि ईयर अवार्ड के लिए चुना गया है जबकि टेलर स्विफ्ट की आई न्यू यू वेयर ट्रबल को यू ट्यूब फेनोमेनल अवार्ड दिया गया है. अवार्ड समारोह का इंटरनेट पर सीधा प्रसारण किया गया. अवार्ड के नामांकित किए गए संगीत कलाकारों का चयन यूट्यूब पर उनकी लोकप्रियता के आधार पर किया गया. इसमें संगीत कलाकारों के यूट्यूब पेज पर आने वाले लोगों की संख्या उस पर मौजूद म्यूजिक लिंक्स को मिलने वाले लाइक कमेंट्स और उन्हें सब्सक्राइब करने वालों की तादाद का ध्यान रखा गया है. अदाकार ग्रेटा ग्रेविग के परफॉर्मेंस से प्रोग्राम की शुरुआत हुई. अपने नए गीत आफ्टरलाइफ पर भी उन्होंने प्रस्तुति दी. इसके बाद बारी लेडी गागा की थी. अपनी एकल प्रस्तुति में उन्होंने बेसबॉल टोपी और ढीली ढाली सी शर्ट पहन रखी थी. दि कोविटेड विडियो ऑफ दि ईयर अवार्ड दक्षिण कोरिया के लड़कियों के ग्रुप के पॉप को उनके गीत आई गॉट अ ब्वॉयदिया गया. यूट्यूब अवार्ड की शुरुआत से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि इंटरनेट पर संगीत देखने सुनने वालों का रुझान बढ़ा है. |
| DATE: 2013-11-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1297] TITLE: पिता ने कहा, यौनकर्मी मत बन जाना: रवि किशन |
| CONTENT: क्यों रवि किशन के पिता को उन्हें सलाह देनी पड़ी कि यौनकर्मी मत बनना करीना कपूर को ब्रिटेन में मिलेगा सम्मान और अब अनुष्का शर्मा का नया अवतार. भोजपुरी फ़िल्मों के अमिताभ बच्चन माने जाने वाले अभिनेता रवि किशन ने एक अख़बार को दिए इंटरव्यू में कहा कि अगर उनके पिता ने उन्हें बचपन में मारा-पीटा नहीं होता तो वह पुरुष यौनकर्मी भी बन सकते थे. रवि किशन ने अख़बार को बताया मेरे पिता का डेरी का व्यवसाय था जो किसी कारणवश बंद हो गया. मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं उसे दोबारा शुरू करूं. वह मुझे मारते थे लेकिन ये बात सच है कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया होता तो मैं चरसी और लड़कीबाज़ बन गया होता. रवि किशन ने बताया कि उनके पिता उन्हें सलाह दिया करते अपनी ऊर्जा अच्छे कामों के लिए बचाकर रखो. लड़कियों के पीछे मत भागो. हमेशा एक ही औरत के बनकर रहो. पुरुष यौनकर्मी मत बन जाना. रवि किशन ने बताया कि हालांकि उनके पिता नहीं चाहते थे कि वह फ़िल्मों में आएँ लेकिन उनकी नसीहतों की वजह से ही वह अपनी ज़िंदगी में संभल पाए. हाल ही में अभिनेत्री करीना कपूर को ब्रिटेन में हाउस ऑफ़ कॉमन्स में सम्मानित किया गया. ये सम्मान उन्हें एक एशियाई एथनिक साप्ताहिक पत्रिका ने वैश्विक स्तर पर मनोरंजन जगत को दिए योगदान के लिए दिया. करीना ने सम्मान लेते हुए कहा ब्रिटेन मेरी पसंदीदा जगह रही है. मेरी परदादी यहां से थीं. मेरे ससुर नवाब मंसूर अली ख़ां पटौदी भी ऑक्सफ़ोर्ड क्रिकेट टीम के कप्तान था. मुझे यहां आना बेहद पसंद है. अभिनेत्री अनुष्का शर्मा ने अब निर्माता बनने का फ़ैसला कर लिया है और उनकी पहली फ़िल्म होगी एनएच 10. ये फ़िल्म अनुष्का और फैंटम कंपनी के अनुराग कश्यप विक्रमादित्य मोटवानी और विकास बहल मिलकर बनाएंगे. फ़िल्म की शूटिंग दिल्ली में होगी और ये अगले साल रिलीज़ होगी. फ़िलहाल अनुष्का रणबीर कपूर के साथ अनुराग कश्यप की ही फ़िल्म बॉम्बे वैलवेट में काम कर रही हैं. |
| DATE: 2013-10-31 |
| LABEL: entertainment |
| [1298] TITLE: मेरे लायक़ कोई बना ही नहीं: प्रियंका चोपड़ा |
| CONTENT: अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा शादी के बारे में फ़िलहाल बिलकुल नहीं सोच रही हैं. वो इसलिए क्योंकि उन्हें अपने लायक़ कोई लड़का ही नहीं मिला. मुंबई में एक इवेंट के दौरान प्रियंका से जब पूछा गया कि उनके छोटे भाई की सगाई तक हो गई और उन्होंने अब तक इस बारे में क्यों नहीं सोचा तो प्रियंका बोलीं मुझे अब तक कोई इतना ख़ास लगा ही नहीं कि मैं उसे अपनी ज़िंदगी का इतना अहम हिस्सा बना सकूं. लगता है कोई मेरे लायक़ बना ही नहीं. हालांकि कुछ समय पहले उनकी शाहिद कपूर और फिर शाहरुख़ ख़ान से कथित नज़दीकियों की काफ़ी ख़बरें मीडिया की सुर्ख़ियां बन चुकी हैं. प्रियंका चोपड़ा ने संजय लीला भंसाली की फ़िल्म रामलीला में एक आइटम सॉन्ग राम चाहे लीला भी किया है. वह कहती हैं ये गाना बेहद ख़ास है फ़िल्म के लिए क्योंकि इस गाने के ज़रिए मैं राम और लीला के किरदारों को इंट्रोड्यूस कर रही हूं. गाना करते हुए बड़ा मज़ा आया. ये मॉडर्न मुजरे की तरह है. प्रियंका चोपड़ा की पिछली फ़िल्म ज़ंजीर बुरी तरह से फ्लॉप हो गई थी. फ़िल्म में तेलुगू फ़िल्मों के सुपरस्टार रामचरण तेजा भी थे. ज़ंजीर को 2013 की सबसे बड़ी फ़्लॉप फ़िल्मों में से एक माना जा रहा है. प्रियंका इसकी नाकामी पर कहती हैं बुरा तो बिलकुल लगा. लेकिन अफ़सोस करने से क्या फ़ायदा. अगर मैं ऐसा करने लगूंगी तो काम-धाम बंद करके बैठना होगा. मुझे नाकामयाबी को भुलाकर आगे देखना है और वही मैं कर रही हूं. प्रियंका भारतीय महिला मुक्केबाज़ एम सी मेरीकॉम के जीवन पर आधारित बायोपिक में काम कर रही हैं. इसे संजय लीला भंसाली बना रहे हैं. वह कहती हैं ये फ़िल्म शारीरिक रूप से मेरे जीवन के लिए सबसे मुश्किल फ़िल्म साबित हो रही है. मुझे कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है. कई बार ख़ुद मेरीकॉम कहती हैं कि तुम इतनी मेहनत क्यों कर रही हो. मेरे जैसा शरीर बनाने के लिए इतनी मेहनत की ज़रूरत नहीं. प्रियंका की आने वाली फ़िल्म है कृष-3 जो दीवाली पर रिलीज़ हो रही है. फ़िल्म में प्रियंका के दो किरदार हैं. एक अच्छा और दूसरा बुरा. फ़िल्म में वो ऋतिक रोशन की पत्नी का रोल निभा रही हैं. कृष-3 में कंगना रानाउत और विवेक ओबेरॉय की भी मुख्य भूमिका है. |
| DATE: 2013-10-31 |
| LABEL: entertainment |
| [1299] TITLE: पाकिस्तान में कॉन्सर्ट करना चाहूंगा: एआर रहमान |
| CONTENT: ख्वाजा मेरे ख्वाजा हो या फिर अर्ज़ियाँ सारी एआर रहमान के संगीत में सूफ़ी संगीत की एक बड़ी छाप नज़र आ ही जाती है. रहमान कहते हैं कि उन्होंने पहली बार अगर कोई सूफ़ी संगीत सुना तो वो पाकिस्तानी सूफ़ी गायक नुसरत फ़तेह अली खान का था. बीबीसी से हुई एक खास बातचीत में रहमान कहते हैं नुसरत साहब के सूफ़ी संगीत को जब मैंने सुना तो मेरा नज़रिया ही बदल गया. मुझे उनसे सूफ़ी संगीत के साथ साथ कव्वाली सीखने का मौका भी मिला. रहमान मानते हैं कि सूफ़ी संगीत के कारण उनके निजी जीवन में भी बहुत बदलाव आए हैं. इतना ही नहीं रहमान ये भी सोचते हैं कि सूफ़ी संगीत ने सिर्फ उन्हीं की नहीं बल्कि सुनने वालों की सोच को भी बदला है. वो कहते हैं मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि ख्वाजा मेरे ख्वाजा इस कदर लोगों को छू जाएगा. इस गाने ने हर इंसान को छुआ है चाहे वो किसी भी धर्म का हो. संगीत में यही तो ख़ास बात होती है कि वो लोगों को आपस में जोड़ता है. भई रहमान अगर जोड़ने की ही बात कर रहे हैं तो एक सवाल उनसे ये भी बनता है कि क्या वो कभी पाकिस्तान जा कर कोई कॉन्सर्ट करना चाहेंगे. इस सवाल के जवाब में रहमान कहते हैं 1998 में मुझे पाकिस्तान जाने का मौका मिला. मैंने पाकिस्तान जा कर नुसरत साहब के साथ कुछ गाने रिकॉर्ड किए. उसके बाद मुझे कभी दोबारा पाकिस्तान जाने का मौका नहीं मिला. अगर मौका मिले तो एक बार फिर पाकिस्तान जा कर मैं परफॉर्म करना चाहूंगा. रहमान कहते हैं मैं उम्मीद करता हूं कि पाकिस्तान में हालात जल्द ही सुधर जाएं. वहां शांति हो. बीबीसी से बात करते हुए रहमान ने बताया कि वो अपनी आनेवाली फ़िल्म हाई-वे में कुछ पाकिस्तानी कलाकारों के साथ काम कर रहे हैं. वो कहते हैं इम्तियाज़ अली निर्देशित फ़िल्म हाई-वे में मैं ज़ेब और हानिया की जोड़ी के साथ काम कर रहा हूं. संगीत की कोई सीमा नहीं होती. रांझणा में भी मैंने सिराज उप्पल के साथ काम किया था. रहमान ने हाल ही में भारत की बी-सिटीज़ में रहमान इश्क़ नाम का एक कॉन्सर्ट किया. इस कॉन्सर्ट की शुरुआत उन्होंने कोलकाता से की फिर उन्होंने जयपुर में ये कॉन्सर्ट किया. रहमान इश्क़ का अंत उन्होंने अहमदाबाद में किया. रहमान कहते हैं इस कॉन्सर्ट के ज़रिए उनकी कोशिश थी कि वो अपनी जड़ों तक वापस पहुच पाएं. वो कहते हैं ये मेरे लिए भी एक मौका था कि मैं अपने सुनने वालों के रुबरु हूं और ये मेरे सुनने वालों के लिए भी एक मौका था कि वो मुझे प्रत्यक्ष रूप में देखें. मुझे इन सभी शोज़ में भरपूर प्यार मिला. उम्मीद करता हूं कि फिर मुझे ऐसे शो करने का मौका मिले. |
| DATE: 2013-10-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1300] TITLE: बंगला, गाड़ी सब है.आइटम सॉन्ग की क्या मजबूरी है?: राकेश मेहरा |
| CONTENT: लद्दाख में सुबह की ठंडी बयार सिंधु नदी का किनारा और बातचीत के लिए साथ में फ़िल्म निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा. भाग मिल्खा भाग और रंग दे बसंती जैसी फ़िल्में बनाने वाले राकेश मेहरा ने बीबीसी से कई मुद्दों पर बड़ी साफ़गोई से बाते कीं. हमारी फ़िल्मों में महिलाओं को एक प्रॉपर्टी एक वस्तु की तरह इस्तेमाल किया जाता है. फ़िल्मों में आइटम सॉन्ग जैसी चीज़ें करने वाली अभिनेत्रियाँ ऐसी भी नहीं है कि उन्हें कोई पैसे की मजबूरी है. या उनके घर में कोई बीमार पड़ा है कि एक आइटम सॉन्ग कर लेंगे तो पैसे आ जाएँगे. ऐसा भी नहीं है कि खाने को कुछ नहीं है और छोटे भाई को खाना खिलाना है. सबके पास चार चार गाड़ियाँ हैं बंगला है दुनिया घूमते हैं यानी कोई मजबूरी नहीं है. अगर आपकी मजबूरी सिर्फ़ ग्लैमर है कि कैसे मैं मशहूर हो जाउँ. ये तो मजबूरी साफ दिखती है लोगों को. जितना ताज्जुब मुझे ऐसे रोल करने वालों और बनाने वालों पर होता है उतना ही ताजुब्ब दर्शकों पर होता है क्योंकि वो उसे सराहते हैं. कल अगर इन चीज़ों की माँग नहीं होगी तो वो बिकना भी बंद हो जाएगा. ये सब एक दुख भरा व्यंग है. इन चीज़ों पर आप लोग सवाल उठाएँगे हम फ़िल्मकार अपने अंदर झाँकेंगे तो शायद कुछ बदलेगा. शर्म सी आती है कि हमारे समाज में महिलाओं के साथ ऐसा हो रहा है जानवर भी ऐसा बर्ताव नहीं करते. लेकिन ये नया नहीं है. ये बस हज़ारों सालों से चल रहा है. हम सबको शर्म तो आनी ही चाहिए पर हम कर क्या रहे हैं ये सोचने वाली बात है. जब कोई बच्चा पैदा होता है तो उसके माथे पर रेपिस्ट तो नहीं लिखा होता. समाज और उसकी परिस्थितियाँ उसे ऐसा बना देती हैं. सोचना ये है कि हम अपने समाज में कर क्या रहे हैं. अभी हम कह रहे हैं कि उन्हें फाँसी पर चढ़ा दो ख़ून का प्यासा कैसे हो गया पूरा देश जबकि हम गाँधी के देश में रहते हैं. आप सही बोल रहे हैं कि इस बारे में फ़िल्म तो बननी ही चाहिए. ये मेरा काम है और सोच चल रही है. एक लेखक निर्देशक होने के नाते अपनी फ़िल्मों के ज़रिए आप कुछ बोलना चाहते हैं. हर बार अलग बात कहने की चाहत होती है इसलिए हर दफ़ा नया मुद्दा उठाना चाहता हूँ. अक्स में दिखाना चाहता था कि अच्छाई और बुराई जीवन के दो पहलू हैं. वो बात कुछ अधूरी रह गई तो दिल्ली-6 बनाई. साहिर लुधयानवी का एक शेर है - बहुत दिनों से है मशगला सियासत का जब जवां हो बच्चे तो क़त्ल हो जाएँ. यहीं से रंग दे बसंती बन गई. जब मिग एयरक्राफट क्रैश हो रहे थे और कैग की रिपोर्ट में करोड़ों का घोटाला सामने आया था. बहुत गु़्स्सा आया. या तो उस गुस्से को बातों में निकाल दें या फिर कुछ किया जाए. इसलिए रंग दे बसंती बनाई. मिल्खा सिंह को लेकर अलग दृष्टिकोण था कि अपने अतीत से भागना नहीं चाहिए. ये ज़रूरी नहीं कि हर फिल्म सामाजिक ही हो. मैं अपनी मर्ज़ी से फ़िल्मकार बना हूँ इसलिए चुनौती का भी मुझे ही सामना करना होगा. किसका काम चुनौतीपूर्ण नहीं होता. हम भाग मिल्खा के लिए स्टीम इंजन के लिए शूट कर रहे थे जो कोयले से चलता है. आम लोग मानेंगे नहीं लेकिन आप वहाँ तीस सैंकेड से ज़्यादा नहीं रुक सकते. आपके आगे मानो भट्टी जल रही है. उस ड्राइवर के बारे में सोचिए जो 16 घंटे उसी में रहता है. सड़कें बनती हैं वहाँ औरतें बच्चियाँ काम करती हैं तारकोल जलाती हैं. इनके सामने तो हमारी चुनौती कुछ भी नहीं . हम एसी कमरे में बैठते हैं एक्शन बोलते हैं और फ़िल्म बन जाती है. अगर मैं ये कहूँ कि बॉक्स ऑफ़िस पर कमाई से मुझे फर्क नहीं पड़ता तो मैं झूठ बोल रहा हूँ. फ़िल्म बनाने में करोड़ों का निवेश होता है इसलिए पैसा वापस भी मिलना चाहिए. लेकिन आप इसकी आड़ में कुछ भी बनाकर नहीं बेच सकते. फ़िल्मकार के नाते मुझे एक्सेलेंस और मनोरंजन का ध्यान रखना है जब वो हो जाएगा तो पैसे अपने आप आ जाएँगे. पैसा आपके काम पर हावी नहीं हो सकता. मैं जब भी नई फ़िल्म करता हूँ तो सबसे पहले मैं ख़ुद को शीशे में देखकर बोलता हूँ कि तुम्हें फेल होने की अनुमति है मैं सोचता हूँ कि ये फिल्म तो फ्लॉप होने वाली है. इससे बुरा क्या हो सकता है. कोई फाँसी पर तो लटकाएगा. जब मैने खुद की असफल होने की अनुमति दे दी तो मन से डर निकल जाता है और वो काम में नहीं झलकता. पैसे का क्या है कभी बनेगा कभी नहीं बनेगा. हुआ क्या था कि रात को कुछ एलियन यहाँ आए थे और यहाँ कूड़ा फैलाकर चले गए. पता नहीं कौन लोग हैं ये जो कूड़ा फेंकते रहते हैं गाड़ी से हाथ निकलता और चिप्स का पैकट बाहर आता है. आजकल आप कहीं रास्ता नहीं भूल सकते. बस प्लास्टिक के पैकेटों के साथ चलते रहें और मंजिल तक पहुँच जाएँगे. हम ही लोग हैं जो गंदगी फैलाते हैं और कौन करेगा. |
| DATE: 2013-10-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1301] TITLE: जया के लिए लता अलग ही सुर में गाती थींः अमिताभ |
| CONTENT: अमिताभ बच्चन को हिंदी फिल्म उद्योग में उनके योगदान के लिए ह्रदयनाथ मंगेशकर पुरस्कार से कुछ दिन पहले सम्मानित किया गया. अमिताभ को यह पुरस्कार जानी मानी पार्श्व गायिका लता मंगेशकर देने वाली थीं. लता मंगेशकर अपने खराब स्वास्थ्य के कारण नहीं आ सकीं. उन्होंने आदिनाथ मंगेशकर के मोबाइल पर अमिताभ को अपनी शुभकामनाएं दीं. यह मौका कई मौकों का गवाह बना. लता मंगेशकर के छोटे भाई पंडित ह्रदयनाथ मंगेशकर का 76वां जन्मदिवस मनाया गया. ह्रदयनाथ आर्ट्स की 24वीं वर्षगांठ के साथ साथ अमिताभ का 71 वां जन्मदिन भी उनके चाहने वालों ने सेलिब्रेट किया. यह मौका इस मायने में भी खास रहा कि भारतरत्न लता मंगेशकर ने गायन के क्षेत्र में 71 साल पूरे हुए. अमिताभ ने लता जी के प्रति अपना आभार प्रकट करते हुए उनकी प्रशंसा की. उन्होंने बताया जब मैं अपने पूज्य बाबूजी से पूछता था कि लता जी का वर्णन करना हो तो किन शब्दों में किया जाए तो बाबूजी ज्यादा नहीं बोलते थे. चंद ही शब्दों में अपनी बात रखते थे. उन्होंने कहा कि सुर ऐसा तार है जो ईश्वर के साथ जुड़ा है. जब सुर सही लगता है तो वह झंकृत हो जाता है. लता जी जब गाती हैं तो वो तार हमेशा झंकृत होता है सीधा ईश्वर से जाकर मिलता है. अमिताभ बच्चन ने कहा कि मैंने लता जी की प्रशंसा में कई जगहों पर ये कहा कि हमारे जो पड़ोसी देश हैं वे कहते हैं कि हमारे पास सब कुछ है जो भारत में है बस दो चीजें नहीं हैं. एक ताजमहल और एक लता मंगेशकर. लता मंगेशकर के गायन के 71 साल पूरे हुए. लता मंगेशकर ने 13 साल की उम्र में साल 1942 में गाना शुरू किया था. सात दशक के अपने गायन के करियर में उन्होंने हिंदी ही नहीं कई क्षेत्रीय भाषाओं में गाने गाए. अमिताभ ने कहा जब मैं पैदा हुआ तब से आज तक लता जी का सुर ताल हमारे बीच है. साल 2013 में भारतीय फिल्म उद्योग को 100 वर्ष पूरे हो गए हैं. 100 वर्षों में से 71 वर्ष लता जी का योगदान रहा ये कोई छोटी बात नहीं है. वे आगे बोले और जब आप अनुमान लगाएंगे तो पता चलेगा कि लता जी की तुलना तो हो ही नहीं सकती है. जितने भी और बड़े दिग्गज हैं उन्होंने फिल्म उद्योग को काफी सम्मानित किया है बड़ा नाम दिया है. मगर 71 साल एक ही व्यवसाय को एक ही कार्य को एक ही कला को अपना योगदान देना ये शायद मैं पहली बार सुन रहा हूं. लता जी के रिकॉर्ड न केवल भारत में बल्कि विश्व भर में फैले हुए हैं. ये कोई पहला मौका नहीं था कि अमिताभ ने लता जी की बड़ाई की हो. उनका साथ पुराना है. एक दूसरे के प्रति अपने प्यार को अमिताभ और लता मंगेशकर कई मौकों पर जता चुके हैं. अमिताभ ने कहा कि जब भी लता जी ने मुझे और मेरे परिवार को आमंत्रित किया है या कभी मिलना चाहा है या कभी कहीं आने का न्योता दिया है तो हमने स्वीकार किया है. क्योंकि न जाने क्यों हमारे समस्त परिवार के ऊपर उनका स्नेह रहा है. जया बच्चन के लिए लता मंगेशकर ने ढेर सारे गाने गाए. उनमें से कई गाने सुपरहिट हुए. जैसे अभिमान फिल्म का जया भादुड़ी पर फिल्माया लता मंगेशकर की आवाज में गाना पिया बिना. अमिताभ ने कहा मैं बताना चाहता हूं कि जब भी लता जी को कोई ऐसा गाना मिलता था जो जया के लिए गाना होता था तो न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है उनका सुर और लय एकदम अलग होता था. मैं लता जी के प्रति अपना आभार प्रकट करना चाहता हूं कि जब भी मैं जया पर फिल्माया गाना सुनता हूं तो लगता है कि लता जी ने खासतौर से उनके लिए गाया है. इसी दौरान अभिनेता अमिताभ ने मुंबई के प्रति अपना प्यार जाहिर करते हुए कहा कि जो कुछ भी मुझे मिला है वो मुंबई ने दिया है. कला पत्नी घर बच्चे सब मुझे मुंबई में मिले. इस विशेष अवसर पर संगीत कार्यक्रम भी आयोजित किया गया था. इस कार्यक्रम में सुदेश भोसले सिद्धांत भोसले शान साधना सरगम सुनिधि चौहान महालक्ष्मी अय्यर विभावरी आप्टे और कई गायकों ने मशहूर गाने गाए. हरीश भिमानी अपने रंग में थे. जया बच्चन ह्रदयनाथ मंगेशकर अविनाश प्रभावलकर आदिनाथ मंगेशकर हेमा भोसले श्रुति भोसले अशोक कुमार सरफ प्रवीण कुमार सरफ और अन्य मेहमान भी इस अवसर पर उपस्थित रहें. पार्ले तिलक विद्यालय का ओपेन एयर स्थल मधुर गीत और संगीत से गूंजता रहा. |
| DATE: 2013-10-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1302] TITLE: आमिर ख़ान अमरीका में सम्मानित हुए |
| CONTENT: अभिनेता आमिर ख़ान ने अमरीका में एक सम्मान ग्रहण किया है. उन्हें उनके असरदार काम के लिए अमरीका में सम्मानित किया गया. अंतरराष्ट्रीय मामलों पर कार्यक्रम बनाने वाली जानी-मानी संस्था अमरीका अब्रॉड मीडिया ने आमिर को स्थानीय समयानुसार सोमवार रात वाशिंगटन में अपने वार्षिक कार्यक्रम में ये सम्मान दिया. अमरीका अब्रॉड मीडिया ने अपने ट्विटर अकाउंट पर कहा आमिर खान के काम का असर अमरीका में भी देखा गया है. वह अपने सेलेब्रिटी स्टेटस का सही उपयोग करते हैं. संस्था उन लोगों को सम्मानित करती है जिनका काम मीडिया की उपयोगिता को दर्शाता है- जैसे कि जानकारी देना शिक्षित और सशक्त करना. अमरीका अब्रॉड मीडिया ने अपनी वेबसाइट पर लिखा है कि आमिर के टीवी कार्यक्रम सत्यमेव जयते भारत की सामाजिक समस्याओं पर चर्चा करता है और इस कार्यक्रम को करोड़ों लोगों ने टेलीविज़न पर देखा है. अमरीका में भारत की राजदूत निरुपमा राव भी इस कार्यक्रम में मौजूद थीं. कार्यक्रम को जब आमिर ने संबोधित किया तो उन्होंने अपने ट्विटर पर लिखा आमिर कह रहे हैं कि वह काफ़ी उत्साहित हैं और उनके काम के प्रति प्यार और उम्मीद जताए जाने से अभिभूत हैं. अमरीका अब्रॉड मीडिया ने आमिर के अलावा ज़ीरो डार्क थर्टी फिल्म की निर्देशिका कैथरीन बिगेलो और द इंटरनेशनल सेंटर ऑन नॉनवॉयलेंट कॉन्फ्लिक्ट को भी पुरस्कार दिया. संस्था कहती है कि अपने विभिन्न कार्यों के ज़रिए वह विचारों के आदान-प्रदान को बढ़ावा दे रही है. इस कार्य के लिए अमरीका अब्रॉड मीडिया रेडियो और टेलीविज़न कार्यक्रम बनाने के अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई कार्यक्रमों का आयोजन करता है. |
| DATE: 2013-10-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1303] TITLE: सरबजीत पर फ़िल्म, अमिताभ कर सकते हैं काम |
| CONTENT: पाकिस्तान की जेल में क़रीब 21 साल बंद रहे और बाद में जेल में हमले में मारे गए भारतीय क़ैदी सरबजीत सिंह के जीवन पर फ़िल्मकार सुभाष घई एक फ़िल्म बनाने वाले हैं. बीबीसी से बातचीत में सुभाष घई ने इन ख़बरों की पुष्टि की और बताया कि उनकी स्क्रिप्ट पूरी हो चुकी है. ख़बरें आ रही थीं कि अमिताभ बच्चन फ़िल्म में सरबजीत सिंह का मुख्य किरदार निभाएंगे. सुभाष घई ने यह बात तो नकार दी लेकिन ये ज़रूर माना कि अमिताभ फ़िल्म में एक दूसरा अहम किरदार निभा सकते हैं. सुभाष घई ने कहा अमिताभ सरबजीत का रोल तो नहीं निभाएंगे लेकिन हमने फ़िल्म में एक और बेहद अहम किरदार के लिए उन्हें अप्रोच किया है. उम्मीद है वे मान जाएंगे. ये किरदार भी बेहद शक्तिशाली होगा. सुभाष घई ने बताया कि उनकी ही फ़िल्म ब्लैक एंड व्हाइट में मुख्य भूमिका निभा चुके अभिनेता अनुराग सिन्हा सरबजीत सिंह का रोल निभाएंगे. ख़बरें ये भी हैं कि सरबजीत की बहन दलबीर का किरदार निभाने के लिए सोनाक्षी सिन्हा से बात चल रही है. सुभाष घई ने इस पर कहा इस किरदार के लिए हम किसी बड़ी हीरोइन को लेंगे. हां सोनाक्षी सिन्हा भी हमारी विशलिस्ट में हैं. सरबजीत सिंह की बहन दलबीर कौर ने भी इन ख़बरों की पुष्टि करते हुए कहा जब सरबजीत ज़िंदा थे तभी से मैं सुभाष घई के संपर्क में हूं. हम उन पर तभी से फ़िल्म बनाना चाहते थे. मैं चाहती थी कि दुनिया देखे कि सरबजीत को किन हालात से गुज़रना पड़ा. मुझे उम्मीद थी कि फ़िल्म देखकर लोगों को पता चलेगा कि असल में हुआ क्या और सरबजीत की रिहाई में मदद मिल पाएगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका. अब फ़िल्म का अंत हमें दुर्भाग्यवश बदलना पड़ेगा. उन्होंने बताया कि फ़िल्म में सरबजीत सिंह के जन्म से लेकर उनके ग़लती से सीमा पारकर पाकिस्तान जाने और फिर उनकी मौत तक का वाक़या दिखाया जाएगा. आप किसे चाहती हैं कि वह पर्दे पर दलबीर कौन यानी आपके किरदार को निभाए. जब बीबीसी ने उनसे ये सवाल पूछा तो वो बोलीं सोनाक्षी सिन्हा या विद्या बालन मेरी पसंद होंगी. जब हमने उनसे कहा कि फ़िल्म में अमिताभ बच्चन को लिए जाने की संभावना है तो वे बोलीं अगर उनके जैसा बड़ा कलाकार फ़िल्म में काम करता है तो यह हमारे लिए बेहद ख़ुशी की बात होगी. वो एक बेहद संजीदा कलाकार हैं और उनकी बेहतरीन आवाज़ हमारी फ़िल्म को और ताक़तवर बनाएगी. फ़िल्म की शूटिंग अगले साल मार्च में शुरू हो जाएगी. सुभाष घई फ़िल्म को अगले साल के अंत तक रिलीज़ करने की योजना बना रहे हैं. |
| DATE: 2013-10-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1304] TITLE: डॉक्टरों ने कहा भूल जाओ एक्टर बनना: ऋतिक रोशन |
| CONTENT: अभिनेता ऋतिक रोशन ने अपनी आने वाली फ़िल्म कृष-3 में कई हैरतअंगेज स्टंट सीन किए हैं. लेकिन कभी ऋतिक इतने अनफ़िट और बीमार थे कि डॉक्टरों ने उन्हें चेतावनी तक दे डाली थी कि वो एक्टर बनने के बारे में तो कम से कम न सोचें. फ़िल्म के प्रमोशन में जुटे ऋतिक रोशन ने ये बात ख़ुद बताई. अपनी ज़िंदगी में आए उतार-चढ़ाव के बारे में ऋतिक कहते हैं मैं हर बार गिर कर उठा हूँ. मेरा बचपन बहुत अच्छा नहीं रहा है स्कूल से घर लौटकर मैं रोया करता था. उन्होंने बताया कि वो शारीरिक रूप से बहुत कमज़ोर थे और बाकी लड़के उनका मज़ाक उड़ाया करते थे. ऋतिक बताते हैं 16 साल की उम्र में पहली बार मेरी पीठ में चोट लगी थी उसके बाद मुझे घुटनों की तकलीफ़ भी झेलनी पड़ी. डॉक्टरों ने कह दिया था कि पीठ में दिक्कत के चलते मैं एक्टर नहीं बन पाऊंगा. ऋतिक बताते हैं कि अपनी मज़बूत इच्छा शक्ति और परिवार के सहयोग से उन्होंने अपनी हर कमज़ोरी पर विजय पाई और एक्टर बने. ऋतिक ने बताया कि कृष-3 की शूटिंग से पहले और इसके दौरान भी उन्हें कई तरह की तक़लीफ़ें झेलनी पड़ीं. ऋतिक के अनुसार फिल्म की शुरुआत के वक्त मेरी पीठ में चोट थी और मेरे पिता ने मुझसे उस समय कह दिया कि वो फ़िल्म नहीं बनाएंगे. लेकिन उसके बाद मुझे लगा कि मैं ज़िंदगी से हार नहीं मान सकता इसके बाद चोट से उबरने में मैंने अपनी पूरी ताकत लगा दी. मैंने दुनिया भर से सबसे अच्छे ट्रेनर ढूंढे और विज्ञान को ग़लत साबित कर दिखाया. ऋतिक के मुताबिक डॉक्टरों ने उन्हें एक्शन फिल्म करने से मना कर दिया था लेकिन उन्होंने पूरे 80 दिन तक बिना किसी दर्द के फिल्म में एक्शन दृश्य किये. उस समय वो एक 18 साल के लड़के की तरह ऊर्जावान महसूस कर रहे थे. ऋतिक के मुताबिक कृष-3 पहली भारतीय फिल्म है जिसके सभी स्पेशल इफेक्ट्स भारतीयों ने दिए हैं. वो कहते हैं यह पूरी फिल्म बिना किसी विदेशी मदद के बनाई गई है. इसलिए अगर फिल्म सफल होती है तो इसे बनाने वाले और काम करने वाले हर व्यक्ति को बहुत खुशी मिलेगी. स्टारडम को लेकर ऋतिक का कहना है स्टारडम मेरे लिए घर के दरवाज़े के बाहर होता है. जब मैं अपने परिवार और दोस्तों के साथ होता हूँ तो स्टारडम कोई मायने नहीं रखता. स्टारडम का इस्तेमाल मैं दूसरे लोगों को शक्तिशाली महसूस कराने के लिए करता हूँ. ऋतिक ने बताया कि उनके परिवार को कृष-3 बहुत पसंद आई है. उनकी पत्नी सुज़ेन ने इसे उनके करियर की अब तक की सबसे बेहतरीन फ़िल्म बताया है. |
| DATE: 2013-10-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1305] TITLE: सोनम कपूर को किस की फिल्में पसंद हैं |
| CONTENT: अभिनेत्री सोनम कपूर अपनी फ़िल्मों से ज़्यादा अपने स्टाइल के लिए चर्चा में रहती हैं. सोनम दुनिया भर की फ़िल्में देखती हैं और आला दर्जे के डायरेक्टरों के साथ काम करना चाहती हैं. गुरुवार को 15वें मुंबई फ़िल्म फ़ेस्टिवल के आख़िरी दिन जब सोनम से विश्व सिनेमा में उनकी रुचि के बारे में सवाल पूछा गया तो सोनम ने छूटते ही जवाब दिया मैं वर्ल्ड सिनेमा की बहुत बड़ी दीवानी हूँ. मैं बॉलीवुड का हिस्सा हूँ इसलिए मैं खुद को वर्ल्ड सिनेमा का हिस्सा मानती हूँ. वो कहती हैं मैं जितनी फ़िल्में देख सकती हूँ देखती हूँ. मैंने यह पेशा अपनी मर्ज़ी से चुना है और अगर मैं फ़िल्में नहीं देखती तो यह रियाज़ न करने जैसा होगा. यह अपने पेशे को छोटा दिखाना होगा. अगर सोनम वर्ल्ड सिनेमा की फैन हैं तो यह सवाल लाज़मी था कि उनके पसंदीदा निर्देशक कौन हैं. इस पर सोनम का कहना था कि वो वर्ल्ड सिनेमा के दो स्टीवन की बहुत बड़ी फैन हैं. सोनम बोलीं. हॉलीवुड के बहुत से निर्देशक मुझे पसंद हैं जिनके साथ मैं काम करना चाहूँगी लेकिन मैं सबसे बड़ी फैन स्टीवन स्पिलबर्ग और स्टीवन सोडेनबर्ग की हूँ. मैं दोनों के साथ काम करना चाहूँगी. दोनों बिल्कुल अलग-अलग तरह के निर्देशक हैं. दोनों ही कमर्शियल और आर्ट दोनों तरह की फ़िल्में बनाने में माहिर हैं. पत्रकारों ने जब उनसे उन फ़िल्मों के बारे में पूछा जिनसे वो बहुत प्रभावित हुई हों तो सोनम ने विश्व सिनेमा की दो और अपने पिता अनिल कपूर की एक फ़िल्म का नाम लिया. सोनम ने कहा लाइफ इज ब्यूटीफूल एमी फ़िल्में उन्हें बहुत पसंद हैं. उन्हें अपने पिता की फ़िल्म ईश्वर ने बहुत प्रभावित किया. सोनम ने इन फ़िल्मों को पसंद करने की वजह बताते हुए कहा इन फ़िल्मों में मनुष्य की जिजीविषा का ख़ूबसूरत प्रदर्शन है. इन फ़िल्मों में उन लोगों की कहानी है जो ज़िंदगी को प्यार करते थे और जीवन को हमेशा सकारात्मक तरीके से देखते थे. इसीलिए इऩ तीनों फ़िल्मों ने मेरे ऊपर गहरा प्रभाव छोड़ा है. जब सोनम से यह पूछा गया कि हॉलीवुड के किस हीरो के साथ वो काम करना चाहेंगी तो सोनम ने इस सवाल को यह कहकर ख़ारिज कर दिया हॉलीवुड हो या बॉलीवुड यह कहना कि मुझे इन हीरो के साथ काम करना पसंद है असल में निर्देशक को कमतर करके आंकना है. सोनम ने कहा फ़िल्म निर्देशक का मीडियम है तो मैं एक्टर को चुनने की बजाय डायरेक्टर को चुनना पसंद करूँगी. मैं निर्देशक और अपने चरित्र को चुनना चाहूँगी. निर्देशक और टेक्निकल टीम ही फ़िल्म बनाती है. जब सोनम से यह पूछा गया कि क्या वो ख़ुद आर्ट फ़िल्मों में काम करेंगी तो उन्होंने पत्रकारों को यह कहकर निरुत्तर कर दिया कि मुझे लगता है कमर्शियल और आर्ट सिनेमा में फर्क नहीं करना चाहिए मेरे लिए दोनों सिनेमा है फ़ेस्टिवल की तारीफ करते हुए सोनम ने कहा इस तरह के फ़ेस्टिवल मुंबई शहर यहाँ के सिनेमा और दूसरी चीजों को प्रमोट करने का बहुत अच्छा मौका है. यह हमारे शहर और इसकी भावना को दिखाने का अच्छा तरीका है. सोनम फेस्टिवल में खालिद मोहम्मद की डॉक्यूमेंट्री लिटिल बिग पीपुल को प्रस्तुत करने के लिए आई थीं. सोनम ने कहा मैं मुंबई फ़िल्म फेस्टिवल में पहली बार आई हूँ. मुझे पहले मौका नहीं मिला. लेकिन मैं आगे से एक आम दर्शक की तरह ज़रूर आना चाहूँगी. |
| DATE: 2013-10-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1306] TITLE: क्या किशोर, रफ़ी और मुकेश से पीछे रह गए थे मन्ना डे? |
| CONTENT: शास्त्रीय गायन में सिद्धहस्त हर तरह के गाने गाने में प्रवीण 60 सालों से भी ज़्यादा समय तक गायन में सक्रिय रहे मन्ना डे क्या लोकप्रियता के पैमाने पर किशोर कुमार मोहम्मद रफ़ी और मुकेश जैसे अपनी पीढ़ी के गायकों से पीछे रह गए थे संगीत प्रेमियों के ज़हन में ये सवाल अक्सर कौंधता रहता है. फ़िल्म संगीत से जुड़े लोगों की इस पर मिली जुली प्रतिक्रिया है. संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंद जी जिनके लिए मन्ना डे ने यारी है ईमान मेरा समेत कई हिट गाने गाए के आनंद जी कहते हैं कि मन्ना डे जैसे गायकों को लोकप्रियता की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए. बीबीसी से बात करते हुए आनंद जी ने कहा वो हीरो के साथ-साथ चरित्र कलाकारों के लिए भी गाने गाते थे. हर तरह के गाने गाने में उन्हें दक्षता हासिल थी. इसलिए ये कहना कि वो रफ़ी किशोर या मुकेश से पीछे रह गए ग़लत होगा. संगीतकार-गायक बप्पी लाहिरी ने किशोर कुमार और मोहम्मद रफ़ी जैसे गायकों और मन्ना डे के बीच फ़र्क को समझाते हुए कहते हैं रफ़ी और किशोर की तो बात ही अलग थी. एक तो दोनों ने मसाला और मेन्स्ट्रीम किस्म के गाने गाए जिनके आम लोगों के बीच हिट होने की ज़्यादा गुंजाइश हुआ करती थी. मन्ना दा ने अपेक्षाकृत कम और चुने हुए गाने गाए. शायद ये वजह हो सकती है लोकप्रियता में फ़र्क की. लेकिन बप्पी लाहिरी ये भी मानते हैं कि मन्ना डे ने जो गाने गाए उनका कोई जवाब नहीं. वो कहते हैं बंगाल के तो वो किंग थे. यहां उनसे बड़ा कोई नहीं. जिस तरह के गाने उन्होंने गाए. उसकी मिसाल नहीं मिलती. गायक अभिजीत की राय भी ऐसी ही है. वो कहते हैं कि ये तुलना बेमानी है. अभिजीत के मुताबिक़ मैं इसे इस तरह से नहीं देखता. अगर आप भारत के पूर्वी हिस्से की तरफ़ जाएं तो मन्ना डे को भगवान का दर्जा प्राप्त है. उन्हें पूरब का भगवान कहा जाता है. मेरे लिए मन्ना डे को गायक के तौर पर देखने के लिए लोकप्रियता कतई एक पैमाना नहीं है. वहीं संगीत समीक्षक पवन झा का मानना है कि करियर के शुरुआती दौर में मन्ना डे के गानों में शास्त्रीय संगीत का ज़्यादा पुट होता था जिन्हें फ़िल्म में नायक नहीं गाता था. पवन झा के मुताबिक़ ज़ाहिर है रफ़ी और किशोर मुख्य नायक के लिए गाते थे. इस वजह से उनके गाने ज़्यादा लोकप्रिय हुए. लेकिन 50 के दशक में मन्ना दा ने भी नायकों के लिए गाना शुरू कर दिया. भले ही मुकेश को राज कपूर की आवाज़ माना जाता है लेकिन मन्ना डे ने भी उनके लिए कई गाने गाए जो लोकप्रिय साबित हुए. बल्कि मैं तो कहूंगा कि मन्ना डे ने अपनी आवाज़ के ज़रिए कलाकारों को जो विविधता पूर्ण अभिव्यक्ति दी वो किशोर रफ़ी और मुकेश भी नहीं दे पाए. संगीतकार ललित पंडित के मुताबिक़ असल में मन्ना डे की आवाज़ हीरो पर उतनी नहीं जमती थी जितनी किशोर या रफ़ी की आवाज़ जमती थी. इस वजह से किशोर और रफ़ी जैसे गायक ज्यादा लोकप्रिय रहे. लेकिन मन्ना डे की विविधतापूर्ण गायकी का जवाब नहीं. ज़्यादातर संगीत समीक्षकों का मानना है कि किशोर कुमार मोहम्मद रफ़ी और मुकेश जैसे अद्वितीय गायकों के सामने भी अपना एक अलग मुक़ाम बनाना मन्ना डे जैसे गायक के ही बूते की बात थी. |
| DATE: 2013-10-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1307] TITLE: मन्ना डे के दस मशहूर गाने |
| CONTENT: मन्ना डे को भारतीय संगीत की जानी मानी आवाज़ों में से एक माना जाता था. पचास और साठ के दशक में अगर हिंदी फ़िल्मों में राग पर आधारित कोई गाना होता तो उसके लिए संगीतकारों की पहली पसंद मन्ना डे ही होते थे. मन्ना डे का जन्म पहली मई 1919 को उत्तरी कोलकाता के एक रुढ़िवादी संयुक्त बंगाली परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम पूर्ण चंद्र डे और मां का नाम महामाया डे था. मन्ना डे का असली नाम प्रबोध चंद्र डे है. उनके मामा संगीताचार्य कृष्ण चंद्र डे ने मन्ना डे के मन में संगीत के प्रति दिलचस्पी पैदा की. बतौर पार्श्व गायक उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1943 में आई फ़िल्म तमन्ना से की थी. इसमें संगीत दिया था कृष्ण चंद्र डे ने. सुरैया के साथ गाया गया मन्ना डे का गीत ज़बर्दस्त हिट रहा. मन्ना डे को 1950 में आई फ़िल्म मशाल में पहली बार एकल गीत गाने का मौका मिला. गीत के बोल थे ऊपर गगन विशाल और इसे संगीत से संवारा था सचिन देव वर्मन ने. साल 1952 में मन्ना डे ने अमर भूपाली नाम से मराठी और बांग्ला में आई फ़िल्म में गाना गाया और खुद को एक बंगाली गायक के रूप में स्थापित किया. उन्होंने हिन्दी के अलावा बंगाली मराठी गुजराती मलयालम कन्नड और असमिया भाषा में भी गीत गाए. चाहे वो मेरी सूरत तेरी आंखें का पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई हो या दिल ही तो है का लागा चुनरी में दाग़ बुढ्ढा मिल गया का आयो कहां से घनश्याम या बसंत बहार का सुर न सजे मन्ना डे हर गाने पर अपनी छाप छोड़ जाते थे. लेकिन ऐसा नहीं कि मन्ना डे की आवाज़ सिर्फ़ गंभीर गानों पर ही सजती थी. उन्होंने दिल का हाल सुने दिल वाला ना मांगू सोना चांदी और एक चतुर नार जैसे हल्के-फुल्के गीत भी गाये हैं. मन्ना डे ने सभी संगीतकारों के लिये कभी शास्त्रीय कभी रूमानी कभी हल्के फुल्के कभी भजन तो कभी पाश्चात्य धुनों वाले गाने भी गाए. उनकी आवाज़ में एक अजीब सी उदासी भी सुनाई दे जाती थी. काबुलीवाला का ए मेरे प्यारे वतन और आनंद का ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय इसकी मिसाल हैं. मन्ना डे ने लोकगीत से लेकर पॉप तक हर तरह के गीत गाए और देश विदेश में संगीत के चाहने वालों को अपना मुरीद बनाया. उन्होंने हरिवंश राय बच्चन की मशहूर कृति मधुशाला को भी आवाज़ दी. वर्ष 1953 में उन्होंने केरल की सुलोचना कुमारन से शादी की. उनकी दो बेटियां सुरोमा और सुमिता हैं. मन्ना डे को संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. उन्हें 1971 में पद्मश्री और 2005 में पद्म विभूषण से नवाजा गया था. साल 2007 में उन्हें प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के अवार्ड प्रदान किया गया. |
| DATE: 2013-10-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1308] TITLE: मशहूर गायक मन्ना डे का निधन |
| CONTENT: जाने माने पार्श्व गायक मन्ना डे का बैंगलोर के एक अस्पताल में निधन हो गया है. वो 94 वर्ष के थे. पिछले दिनों छाती में संक्रमण के कारण उन्हें बंगलौर के नारायणा हृदयालय अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी. उनका देहांत आज सुबह तीन बजकर 50 मिनट पर हुआ. मई में ही मन्ना डे का 94वां जन्मदिन मनाया गया था. इस मौके पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनसे मुलाकात की थी. मन्ना डे को भारतीय संगीत की जानी मानी आवाजों में से एक माना जाता है. पचास और साठ के दशक में अगर हिंदी फ़िल्मों में राग पर आधारित कोई गाना होता तो उसके लिए संगीतकारों की पहली पसंद मन्ना डे ही होते थे. मन्ना डे ने सभी संगीतकारों के लिये कभी शास्त्रीय कभी रूमानी कभी हल्के फुल्के कभी भजन तो कभी पाश्चात्य धुनों वाले गाने भी गाए. इसीलिए उन्हें हरफनमौला गायक कहा जा सकता है. मन्ना डे को संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. उन्हें 1971 में पद्मश्री और 2005 में पद्म विभूषण से नवाजा गया था. साल 2007 में उन्हें प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के अवार्ड प्रदान किया गया. |
| DATE: 2013-10-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1309] TITLE: एड्स के लिए साथ आएंगी शैरन स्टोन और ऐश्वर्या |
| CONTENT: क्या गोविंदा को मंजूर है रणबीर कपूर का पिता बनना क्यों भारत आ रही हैं हॉलीवुड अभिनेत्री शैरन स्टोन जानने के लिए पढ़िए आज की मुंबई डायरी. ऐश्वर्या राय बच्चन और हॉलीवुड स्टार शैरन स्टोन जल्द ही साथ होंगे. जी नहीं किसी फ़िल्म में नहीं बल्कि मुंबई में होने वाले एक फ़ंडरेज़िंग इवेंट में. एक अंतरराष्ट्रीय एड्स रिसर्च संस्था 17 नवंबर को भारत में ये कार्यक्रम आयोजित करने वाली हैं. इस कार्यक्रम को प्रस्तुत करेंगी शैरन स्टोन जो इस संस्था की ग्लोबल फंडरेज़िंग चेयरपर्सन हैं. इस मौके पर ऐश्वर्या राय बच्चन और उनके पति अभिषेक बच्चन भारत की तरह से प्रतिनिधि होंगे. इतना ही नहीं इस इवेंट में मशहूर गायिका केशा भी परफॉर्म करेंगी. ये एक ब्लैक टाई इवेंट होगा. निर्देशक अनुराग बासु की आने वाली फ़िल्म जग्गा जासूस में गोंविदा को रणबीर कपूर के पिता की भूमिका ऑफर की गई है. अभी तक बड़े परदे पर सिर्फ हीरो के ही रोल करने वाले गोविंदा क्या इस भूमिका के लिए राज़ी होंगे. पिछले हफ़्ते गोविंदा और अनुराग बासु की एक लंबी मीटिंग हुई. फ़िल्म में रणबीर के पिता का किरदार बहुत मज़ाकिया होगा. अमिताभ बच्चन की 1992 में आई फ़िल्म ख़ुदा गवाह का सीक्वल बनाने की तैयारी ज़ोरों पर है. ख़ुदा गवाह के निर्माता मनोज देसाई चाहते हैं कि वो फ़िल्म का सीक्वल बनाएं. मनोज कहते हैं हमने फ़िल्म की स्क्रिप्ट पर काम शुरू कर दिया है. मैं चाहता हूं कि अमिताभ बच्चन इस फ़िल्म का हिस्सा बने और मैं जल्द ही उनसे इस बारे में बात करने वाला हूं. ख़ुदा गवाह 1992 की सबसे अधिक बिज़नेस करने वाली फ़िल्म थी. ये फ़िल्म भारत में जितनी लोकप्रिय हुई उतना ही इस फ़िल्म को अफ़ग़ानिस्तान में सराहा गया. |
| DATE: 2013-10-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1310] TITLE: 'जब अमिताभ के लिए मुजाहिदीन से कहा कि लड़ाई रोक दो' |
| CONTENT: हिंदी फि़ल्मों के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन भारत में ही नहीं विदेशों में भी बेहद मशहूर हैं. भारत के पड़ोसी देशों में भी अमिताभ के प्रति दीवानगी सिर चढ़कर बोलती है. पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में अमिताभ के कई दीवाने हैं. इसकी एक मिसाल भारत में अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत शाइदा मोहम्मद अब्दाली ने मुझसे बातचीत के दौरान दी जो अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता को दर्शाती है. 90 के दशक में अमिताभ बच्चन की एक फ़िल्म आई थी खुदागवाह. इस फ़िल्म की शूटिंग अफ़ग़ानिस्तान में हुई थी. उस वक़्त अफ़ग़ानिस्तान के हालात काफी खराब थे. नजीबुल्लाह वहाँ के राष्ट्रपति थे और उससे पहले वहाँ सोवियत सेना का नियंत्रण था. उसी दौर का एक किस्सा अफ़ग़ान राजदूत ने कुछ यूँ सुनाया अफ़ग़ानिस्तान में मुजाहिदीन की लड़ाई जारी थी. ऐसे में तत्कालीन राष्ट्रपति नजीब की बेटी ने अपने पिता से गुज़ारिश करते हुए कहा कि वे मुजाहिदीन से कहें कि एक दिन के लिए लड़ाई बंद कर दें. उन्होंने कहा बच्ची चाहती थी कि अमिताभ बच्चन जैसा इतना बड़ा स्टार भारत से अफ़ग़ानिस्तान आया है तो अगर लड़ाई बंद रहेगी तो वो शहर में घूम पाएँगे और लोग भी उन्हें देख पाएँगे. कुछ महीने पहले अमिताभ बच्चन ने भी फेसबुक पर अपने अफ़ग़ानिस्तान दौरे की यादें साझा की थी. अमिताभ ने फ़ेसबुक पर लिखा था राष्ट्रपति नजीबुल्लाह हिंदी फिल्मों के बहुत बड़े फ़ैन थे. वो मुझसे मिलना चाहते थे और हमें वहाँ शाही तरीके से रखा गया. उन्होंने कहा हमें उस ख़ूबसूरत इलाके में हवाई जहाज़ के ज़रिए और सुरक्षा गार्डों के साथ घुमाया गया. हमें होटल में नहीं रहने दिया जाता था. एक परिवार ने अपना घर हमारे लिए खाली कर दिया और ख़ुद एक छोटे घर में रहने चले गए. अमिताभ ने आगे लिखा सुरक्षा की दिक्कत थी. सड़कों पर हर जगह टैंक और सैनिक थे लेकिन वो एक यादगार दौरा था. हमारी फ़िल्म यूनिट को एक कबीले के नेता ने आमंत्रित किया था. मैं डैनी के साथ चॉपर से गया था आगे पीछे पाँच हेलीकॉप्टर. ऊपर से पहाड़ों का नज़ारा गज़ब था. अमिताभ ने लिखा जब हम पहुँचे थे तो कबीले के नेता हमें गोद में उठाकर अंदर लेकर गए क्योंकि परंपरा ये थी कि मेहमान के पैर ज़मीन पर नहीं पड़ने चाहिए. काबुल में हमें बहुत तोहफ़े मिले. राष्ट्रपति नजीब ने राष्ट्रपति भवन में बुलाया और हमें ऑर्डर ऑफ अफ़गानिस्तान के पुरस्कार से नवाज़ा. उस रात राष्ट्रपति के अंकल ने हमारे लिए भारतीय राग गाया. अब मुझे नहीं पता कि वो सब कहाँ हैं जिन्होंने मेहमाननवाज़ी की थी. मैं अकसर उनके बारे में सोचता हूँ. अफ़ग़ान राजदूत कहते हैं कि अमिताभ केवल भारत के नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के स्टार हैं और भारतीय फ़िल्में दोनों देशों के बीच गहरे रिश्तों को और मज़बूत करने का काम करती आई हैं. |
| DATE: 2013-10-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1311] TITLE: कौन तय करता है कला के मूल्य ? |
| CONTENT: ग्रेसन पेरी ने लोकतंत्र को कला की समझ नहीं है व्याख्यान में किसी कलाकृति के मूल्य निर्धारण के तरीकों पर विचार किया है. उन्होंने वर्तमान समय में किसी कलाकृति में सर्वाधिक प्रभावशाली कारकों पर अपनी राय रखी है. जानिए उन्हीं के शब्दों में. मैं कला के बारे में एक कलाकार के तौर पर बोल रहा हूँ. उन अनुभवों के आधार पर बोल रहा हूँ जो मुझे एक कलाकार के तौर पर हुए हैं. अकादमिक तौर पर मैं कला विशेषज्ञ नहीं हूँ और इसीलिए मेरे द्वारा केवल अपने अनुभवों के साधारणीकरण के आधार पर कला के बारे में कहना अकादमिक जगत के लोगों को बुरा लग सकता है. मेरा लेक्चर कला की दुनिया के बारे में है. कला आप जिसे दुनियाभर के संग्रहालयों कला दीर्घाओं में देखते हैं या फिर गलियों में और साइबर वर्ल्ड या कहीं भी देखते हैं. मैं इस लेक्चर में बताना चाहूँगा कि लोकतंत्र को कला की समझ नहीं है. कला जगत में क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं इसका निर्णय करने का आधार क्या होता है इसका जवाब देना आसान नहीं है. कला जगत में लोकप्रियता और कलात्मकता के बीच कोई सीधा संबंध नहीं रहा है. मैं इसलिए कह रहा हूँ कि क्योंकि मैं कला के मूल्य के बारे में बात करने जा रहा हूँ. बाज़ार मूल्य लोकप्रियता ऐतिहासिक महत्व कलात्मक गुणवत्ता इत्यादि कला के मूल्य निर्धारण के आधार हो सकते हैं. आप देख सकते हैं कि कला के मूल्य निर्धारण के कई प्रतिमान परस्पर विरोधी भी हो सकते हैं. कई बेहद लोकप्रिय कलाकृतियों को कला के लिए समर्पित लोगों ने वाहियात माना है. 1990 के आसपास दो रूसी कलाकारों ने कई देशों की लोकप्रिय कलाकृतियों का अध्ययन करवाया. उन्होंने पाया कि हर देश में लगभग एक तरह ही की कलाकृति पसंद आती है. ऐसे चित्र मूलतः प्रकृति चित्र थे जिनमें नीले रंग का बहुतायत में इस्तेमाल किया गया था. इस नतीजे के बाद इन कलाकारों ने कहा था कि हम स्वतंत्रता की तलाश में निकले थे लेकिन हमें ग़ुलामी मिली. किसी कलाकृति के बारे में यह कहना कि यह सुंदर नहीं है उसके मूल्य निर्धारण का ग़लत प्रतिमान होगा क्योंकि सुंदरता एक बहुत ही सापेक्षिक मूल्य है. यह मूलतः एक कंस्ट्रक्ट है. ऐसे में सवाल उठता है कि अच्छी कला क्या है इसका निर्धारण कौन करता है बहुत सारी कलाकृतियां विलास की वस्तु हो चुकी हैं. कई सारे कला संग्रहकर्ताओं के लिए फेरारी कार ख़रीदने और कोई महँगी कलाकृति ख़रीदने में कोई अंतर नहीं है. इसलिए इसे भी कला के मूल्य निर्धारण का आधार नहीं माना जा सकता. इसलिए मेरा मानना है कि किसी कलाकृति की गुणवत्ता के निर्धारण का कोई अनुभवसिद्ध तरीक़ा अगर है तो वो बाज़ार है. और शायद यही वजह है कि आज की दुनिया से कला लुप्त होती जा रही है. कला आलोचक क्लीमेंट ग्रीनबे ने एक बार कहा था कला की नाभिनाल पैसे से जुड़ी है अब वो चाहे निजी पूँजी हो या सरकारी. ऐसे में सवाल उठता है कि किसी कलाकृति की क़ीमत कौन तय करता है मीडिया कला आलोचक कला संरक्षक कला के ख़रीदकार या फिर आम दर्शक मेरा मानना है कि कला जगत में किसी कलाकृति के मूल्य निर्धारण में किसी की सर्वाधिक भूमिका होती है तो कला संरक्षक की है. जर्मन कला आलोचक विली बॉनगार्ड ने एक बार कहा था कला संरक्षक कला जगत के पोप हैं. मेरा मानना है कि ऐतिहासिक तौर पर कला जगत काफी हद तक अंतर्मुखी रहा है. कई ऐसे सफल कलाकार हुए हैं जिन्हें व्यापक जनता की ज़रूरत नहीं रही है. यह कलाकारों आर्ट डीलर संग्रहकर्ताओं के बीच का मामला रहा है. व्यापक जनता तक की कला का पहुँचना बहुत ज़्यादा मायने नहीं रखता है. हालाँकि कोई भी व्यक्ति कला का आनंद उठा सकता है. यहाँ तक कि मैं भी. |
| DATE: 2013-10-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1312] TITLE: सेक्सी और उत्तेजक दिखने को किया जाता है मजबूर: गायिका शार्लोट |
| CONTENT: मशहूर गायिका शार्लोट चर्च संगीत उद्योग की मौजूदा संस्कृति से बेहद ख़फ़ा हैं. वह कहती हैं कि इसने न केवल महिलाओं की गरिमा को कम किया है बल्कि कलाकार खुद को सेक्स ऑब्जेक्ट बनाकर बिकने पर बाध्य किए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि जब वह 19 या 20 साल की थीं तो पुरुष एक्ज़िक्यूटिव उन पर भी वीडियो के लिए छोटे कपड़े पहनने का दबाव डालते थे. अब 27 साल की हो चुकी शार्लोट कहती हैं कि युवा महिला कलाकारों पर करियर को बनाए रखने के लिए लगातार उत्तेजक भाव-भंगिमाओं के प्रदर्शन का भी दबाव डाला जाता है. उन्होंने ये टिप्पणी बीबीसी 6 म्यूज़िक के जॉन पील लेक्चर कार्यक्रम में की. संगीत उद्योग के मौजूदा हाल पर उनकी तीखी टिप्पणी तब आई है जबकि पॉप स्टार रिहाना और माइली साइरस की उत्तेजक अदाओं पर गरमा-गरम बहस चल रही है. शार्लोट चर्च कहती हैं कि संगीत के कारोबार पर पुरुषों का वर्चस्व है इसका दृष्टिकोण लिंग और सेक्शुअलिटी पर टिका है और उनमें युवा कलाकारों को सेक्स ऑब्जेक्ट के तौर पर दिखाने की चाहत बढ़ रही है. स्टार का कहना है कि युवा गायकों को अत्यधिक सेक्सी अवास्तविक कार्टून की तरह दिखाया जा रहा है. वह आगे कहती हैं जब मैं 19 या 20 साल की थी तब मैंने भी ख़ुद को इसी स्थिति में पाया था तब मुझ पर लगातार छोटे-छोटे कपड़े पहनने के लिए दबाव डाला जाता था. उन्होंने कहा अधेड़ उम्र के पुरुष मुझसे बार-बार कहते थे तुम ग़ज़ब हो तुम्हारे पास शानदार शरीर है इसे क्यों नहीं दिखाती या वो कहतेचिंता मत करो ये शानदार दिखेगा कलात्मक दिखेगा इस सबको लेकर मैं बहुत असहज महसूस करती थी लेकिन एक्ज़िक्यूटिव मुझे बार-बार ये याद दिलाते थे. वह याद करती हैं कि किस तरह वह अपने वीडियो कॉल माई नेम इन 2005 में कम कपड़ों और घुटनों तक ऊंचे जूतों के साथ डांस में उन्हें बहुत खराब लग रहा था. वह ये भी कहती हैं मैं इस दोष की जिम्मेदारी से ख़ुद भी नहीं बच सकतीं तब मैंने किशोरवास्था को बस पार ही किया था. लेकिन उन प्रदर्शनों के लिए मुझ पर सोशल मीडिया में लगातार ताना कसा जाता है और अपशब्द कहे जाते हैं. इस अतीत के चलते उनके लिए बेहतर जगहों पर जाकर अपने संगीत का प्रचार करना मुश्किल हो गया है. शार्लोट ने खासतौर पर माइली साइरस रिहाना और रॉबिन थिक की आलोचना की. पिछले महीने एमटीवी अवॉर्ड में माइली साइरस ने रॉबिन थिक के साथ मिलकर ऐसी भावभंगिमाओं और इशारों वाला डांस किया जो कुछ लोगों के मुताबिक शालीनता की सीमाओं से काफी परे चला गया. इसके बाद शीनाड ओकॉनर ने माइली साइरकस को एक खुला खत लिखकर आगाह किया कि वह संगीत कारोबार के ज़रिए खुद का शोषण नहीं होने दें. शार्लोट ने वीडियो बेवसाइट्स पर भी आरोप लगाया कि वो युवा दर्शकों को ऐसे वीडियो से दूर रखने के लिए कुछ नहीं कर रही. उन्होंने एनी लेनॉक्स की इस बात का समर्थन किया कि पॉप वीडियो को भी फिल्मों की तरह उम्र के हिसाब से रेटिंग दी जानी चाहिए. शार्लोट चर्च ने ये भी कहा कि रेडियो स्टेशनों को ऐसी छवि वाले कलाकारों के गाने न सुनाने के बारे में भी सोचना चाहिए. |
| DATE: 2013-10-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1313] TITLE: 'सुलझी पर सीमित अपील वाली फिल्म है शाहिद' |
| CONTENT: यूटीवी स्पॉटब्वॉय और बोहरा ब्रदर्स की फ़िल्म शाहिद कहानी है एक वकील की जो मुस्लिम समुदाय के उन लोगों की कानूनी मदद करता है जिन्हें बेवजह परेशान किया जाता है और निर्दोष होने पर भी जेल में डाल दिया जाता है. साथ ही उन पर चरमपंथी होने का आरोप मढ़ दिया जाता है. शाहिद क़ाज़मी राजकुमार ख़ुद पुलिस की ज़्यादतियों का शिकार है. उस पर आतंक फैलाने का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया जाता है जहां उसे पुलिस की ज़्यादतियां झेलनी पड़ती हैं. जेल से बाहर आकर वो क़ानून की पढ़ाई करता है और अल्पसंख्यक समुदाय के उन तमाम लोगों की क़ानूनी मदद करता है जो ग़लत आरोपों में जेल में डाल दिए गए हैं. वो ख़ासतौर से उन लोगों की मदद करता है जिनके पास क़ानूनी लड़ाई के लिए पैसा नहीं है. लेकिन धार्मिक कट्टरपंथियों को शाहिद के तौर तरीके रास नहीं आते. उसे धमकियां मिलती हैं कि वो अपनी हरकतों से बाज़ आए. लेकिन शाहिद पुलिस ज़्यादतियों का शिकार हुए लोगों की लगातार मदद करता रहता है. फिर एक दिन कुछ लोग उसकी हत्या कर देते हैं. फ़िल्म की कहानी शाहिद आज़मी की असल ज़िंदगी पर आधारित है. समीर गौतम सिंह ने एक बेहद कसी हुई कहानी लिखी है. समीर गौतम सिंह अपूर्वा असरानी और हंसल मेहता का लिखा स्क्रीनप्ले भी अच्छा है. ड्रामा तेज़ गति से आगे बढ़ता है जिससे दर्शक बोर नहीं हो पाते. लेकिन फ़िल्म की कहानी में कोई शॉक वैल्यू नहीं है. हालांकि ये लेखक की ग़लती नहीं है. फ़िल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है. तो ज़ाहिर है इसमें घुमावदार मोड़ नहीं हैं. दर्शकों को पता होता है कि ड्रामा कहां ख़त्म होगा. इस वजह से फ़िल्म एक ख़ास दर्शक वर्ग को ही पसंद आएगी. समीर गौतम सिंह के संवाद बेहद दमदार हैं और स्क्रीनप्ले को मज़बूत करते हैं. फ़िल्म में सभी कलाकारों ने ज़बरदस्त काम किया है. राजकुमार ने शाहिद आज़मी के रोल में जान डाल दी है. वो फ़िल्म में बिलकुल वास्तविक लगे हैं. राजकुमार के सुलझे हुए अभिनय को देखना और सीन दर सीन उनकी अप्रोच एक बेहद सुखद अहसास देती है. शाहिद की पत्नी के रोल में प्रभलीन संधु ने भी बढ़िया अभिनय किया है. शालिनी वत्सा ने सरकारी वकील के रूप में उम्दा काम किया है. बाकी कलाकारों का प्रदर्शन भी सराहनीय रहा है. हंसल मेहता ने बेहतरीन निर्देशन किया है. उन्होंने इस संवेदनशील विषय को बेहद परिपक्व तरीके से संभाला है. उन्होंने कहीं भी फ़िल्म को बोझिल नहीं होने दिया. करण कुलकर्णी का बैकग्राउंड संगीत फ़िल्म के प्रभाव को बढ़ाता है. फ़िल्म का संपादन और सिनेमेटोग्राफ़ी भी सराहनीय है. कुल मिलाकर शाहिद एक बेहद सुलझी हुई फ़िल्म है. लेकिन इसकी अपील बहुत सीमित है. ये एक ख़ास दर्शक वर्ग को ही लुभा पाएगी. वर्ड आफ़ माउथ से फ़िल्म को ज़रूर फ़ायदा पहुंचेगा. फ़िल्म के लो बजट होने की वजह से इसकी लागत वसूल हो सकती है. |
| DATE: 2013-10-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1314] TITLE: महिलाओं का 'ग्रैंड मस्ती' देखना हैरानी भरा था: विवेक ओबेरॉय |
| CONTENT: विवेक ओबेरॉ़य आफ़ताब शिवदासानी और रितेश देशमुख की फ़िल्म ग्रैंड मस्ती समीक्षकों की तमाम आलोचनाओं के बावजूद हिट तो हो गई लेकिन ख़ुद अभिनेता विवेक ओबेरॉय इसकी सफलता से हैरान हैं. फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक़ ग्रैंड मस्ती ने बॉक्स ऑफ़िस पर 100 करोड़ की कमाई का आंकड़ा पार कर लिया है. जबकि अभिनेता विवेक ओबेरॉय इस बात से चकित हैं कि ऐसी एडल्ट कॉमेडी देखने के लिए महिलाएं बड़ी संख्या में कैसे थिएटर पहुंची. मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा मुझे आफ़ताब और रितेश में से किसी को यक़ीन नहीं था कि लोग ऐसी फ़िल्म को अपने परिवार के साथ बड़ी संख्या में देखने पहुंचेगे. फ़िल्म को महिलाओं और सीनियर सिटीज़ंस ने भी देखा जो काफ़ी हैरानी भरा था क्योंकि ये एक एडल्ट कॉमेडी है. विवेक कहते हैं कि चेन्नई एक्सप्रेस जैसी बड़ी फ़िल्म जो साढ़े तीन हज़ार से भी ज़्यादा स्क्रीन्स पर रिलीज़ हुई उसका पहले दिन बॉक्स ऑफ़िस पर ज़बर्दस्त शुरुआत करना समझ में आता है लेकिन ग्रैंड मस्ती जैसी फ़िल्म जो उससे आधे स्क्रीन्स पर रिलीज़ हुई उसका ज़ोरदार शुरुआत पाना हमारी समझ से परे था. इंद्र कुमार निर्देशित इस फ़िल्म की कथित तौर पर बेहूदे संवादों और द्विअर्थी चुटकुलों की वजह से ख़ासी आलोचना भी झेलनी पड़ी थी लेकिन कमाई के मामले में ये इस साल की बड़ी फ़िल्मों में से एक बन गई. विवेक ओबेरॉय इन दिनों अपनी आने वाली फ़िल्म कृष-3 को लेकर बड़े उत्साहित हैं. फ़िल्म में वो खलनायक बने हैं. ऋतिक रोशन और प्रियंका चोपड़ा की मुख्य भूमिका वाली ये फ़िल्म एक सुपरहीरो फ़िल्म है जिसमें विवेक बेहद शक्तिशाली काल का किरदार निभा रहे हैं. विवेक ये दावा तक कर देते हैं कि यह फ़िल्म उनके करियर की दिशा ही बदल देगी. विवेक दावा करते हैं कि उन्होंने अपने करियर में अलग-अलग तरह के रोल किए हैं. हालांकि इनमें से कामयाबी उन्हें कितनी फ़िल्मों में मिली है ये पूछने पर वो हंसते हुए बात टाल जाते हैं. फिर वो कहते हैं मेरी पिछली सोलो रिलीज़ जयंता भाई की लव स्टोरी थी. जिसके सुपरफ़्लॉप होने की मैं ज़िम्मेदारी लेता हूं. विवेक ओबेरॉय ने रामगोपाल वर्मा की फ़िल्म कंपनी से अपना करियर शुरू किया था. फ़िल्म में उनके अभिनय को काफ़ी सराहा गया था. फिर यशराज बैनर की फ़िल्म साथिया में भी वो सराहे गए और फ़िल्म कामयाब हो गई. लेकिन विवेक के करियर में उसके बाद फ़्लॉप फ़िल्मों की लंबी कतार लग गई. उन्होंने उम्मीद जताई कि ग्रैंड मस्ती और अब कृष-3 से उनके करियर को सहारा मिलेगा. |
| DATE: 2013-10-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1315] TITLE: म्यूज़िक वीडियो के लिए फ़्रीडा पिंटो ने 'उतारे कपड़े' |
| CONTENT: किस कलाकार के म्यूज़िक वीडियो के लिए फ़्रीडा पिंटो ने उतारे कपड़े करीना कपूर कैसे मनाएंगी करवा चौथ का त्यौहार और मुंबई में लगेगा फ़िल्मों का मेला. पढ़िए आज मुंबई डायरी में. ब्रिटिश फ़िल्मकार डैनी बॉयल की फ़िल्म स्लमडॉग मिलेनियर से चर्चा में आईं अभिनेत्री फ़्रीडा पिंटो भले ही बॉलीवुड में सक्रिय ना हों लेकिन उन्हें लगातार हॉलीवुड फ़िल्मों सहित कई दूसरे काम मिल रहे हैं. फ्रीडा जल्द ही अमरीकन पॉप स्टार ब्रूनो मार्स के एक म्यूज़िक वीडियो में कपड़े उतारते नज़र आएंगी. गोरिल्ला नाम के इस सिंगल में वो एक स्ट्रिपर का रोल अदा कर रही हैं. कहा जा रहा है कि इस वीडियो में फ़्रीडा जिस अंदाज में नज़र आएंगी उन्हें पहले किसी ने उस रूप में नहीं देखा होगा. वीडियो में उनके और ब्रूनो मार्स के बीच ख़ासे उत्तेजक दृश्य होंगे और वो इस वीडियो में पोल डांस भी करती दिखेंगी. 16 अक्टूबर को करीना कपूर और सैफ़ अली ख़ान ने अपनी शादी की पहली सालगिरह लंदन में मनाई और अब करीना करवा चौथ का व्रत भी रखेंगी. इसके लिए उन्होंने अपनी आने वाली फ़िल्म गोरी तेरे प्यार में के प्रमोशन से छुट्टी भी मांग ली है. करवा चौथ 22 अक्टूबर को है और वो ये दिन अपने पति सैफ़ अली ख़ान के साथ ही बिताना चाहती हैं. सैफ़ इन दिनों लंदन में अपनी फ़िल्म हमशक्ल की शूटिंग कर रहे हैं. 17 अक्टूबर से मुंबई में 15वां मुंबई फ़िल्म फ़ेस्टिवल शुरू हो रहा है जिसे मामी भी कहा जाता है. इस बार इसमें 65 देशों से आई 200 से भी ज़्यादा फ़िल्में दिखाई जाएंगीं. फ़ेस्टिवल की शुरुआत में मशहूर अभिनेता और फ़िल्मकार कमल हासन को फ़िल्मों में योगदान के लिए लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया जाएगा. साथ ही यश चोपड़ा प्राण और ऋतुपर्णो घोष जैसी फ़िल्मी हस्तियों को श्रद्धांजलि दी जाएगी. |
| DATE: 2013-10-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1316] TITLE: 'क्यों अमिताभ बच्चन को रिहर्सल पंसद नहीं' |
| CONTENT: भारत में सिनेमा और फ़िल्मी सितारे लोगों की ज़िंदगी का अहम हिस्सा हैं. दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ बच्चन तक और शाहरुख़ खान से लेकर रणबीर कपूर तक. फ़िल्मी कलाकारों को लेकर लोगों के मन में तरह तरह की जिज्ञासाएँ और सवाल होते हैं. लेकिन आख़िर एक कलाकार के मन में क्या चलता है जब वो सेट पर शॉट दे रहा होता है या कोई निर्देशक कैमरे के पीछे किसी सितारे को कै़द कर रहा होता है वरिष्ठ फिल्म पत्रकार भावना सोमाया ने ऐसे ही पहलूओं को छुआ है अपनी किताब में जिसका नाम है टॉकिंग सिनेमा. ये किताब इंररव्यू फ़ॉर्मेट में है. चार भागों में बंटी ये किताब आपको कई दिग्गज निर्देशकों अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के मन में चलने वाली उन आशंकाओं आंकाक्षओं से रूबरू कराती है जो बतौर कलाकार होने के नाते उनके ज़हन में रहती हैं. पहले सेक्शन में कलाकार बताते हैं कि उनकी अभिनय की प्रक्रीया कैसी रहती है. मसलन अमिताभ बचच्न बताते हैं एक्टर होने के नाते हम रिहर्सल करते हैं कभी कभी अपने कमरे और बाथरुम में भी. लेकिन सेट पर आते ही एक नई दुनिया मानो आपके सामने खड़ी हो जाती है. उस वक़्त आप जो करते हैं वो उस चीज़ से बिल्कुल अलग होता है जिसकी आपने कल्पना या रिहर्सल की होती है. इसलिए मैं ज़्यादा रिहर्सल नहीं करना चाहता क्योंकि मुझे लगता है कि ऐसा करने से वो पल चला जाएगा. इसी तरह अपनी फिल्में देखने के बारे में शाहरुख़ खान किताब के बारे में कहते हैं मैं जब भी पहली बार अपनी फ़िल्म देखता हूँ तो मुझे उसकी हर चीज़ ख़राब लगती है. फिर जितनी बार मैं फिल्म को दोबारा देखता हूँ तो कुछ बेहतर लगती है. फिर धीरे धीरे आप उस विशेष किरदार से बाहर आ जाने लगते हैं. समय के साथ ये डिचैटमेंट या दूरी जल्दी आने लगी है. किताब में इस बारे में भी बात की गई है कि कैसे कोई एक्टर किसी ख़ास किरदार में ढल जाता है या ढाल दिया जाता है जिसमें इसकी बोली कॉस्ट्यूम हाव भाव सब शामिल है. लेखिका भावना सोमाया मिसाल देते हुए बताती हैं जैसे रेखा जी को लज्जा में अवधी बोलती हैं उन्होंने राम दुलारी नाम की महिला का रोल किया था. तो उन्हें इस किरदार में ढलने के लिए अलग तरह से मेहनत करनी पड़ी. इसी तरह सरकार में रोल के लिए अमिताभ बच्चन ने बताया कि उन्हें कॉस्टूयम डिज़ाइनर ने लूँगी दी मेकअप आर्टिस्ट ने बड़ा सा लाल तिलक लगा दिया और विग डाल दी. अमिताभ बच्चन ने बताया कि उस समय तक उन्होंने सोचा नहीं था कि सरकार की भूमिका वो कैसे करेंगे. लेकिन जैसी ही तैयार होने के बाद वो अपनी वैन से निकले कुर्ते के स्लीव ऊपर किए तो सब लोग डर कर हट गए वहाँ से. तो इस तरह की किताब लिखने के बारे में कैसे सोचा इस पर भावना सोमाया कहती हैं लंबे अरसे से सिनेमा से जुड़े मुद्दों और लोगों पर लिखती आई हूं. कई कलाकारों और फ़िल्मकारों के संपर्क में हूँ उनको काम करते हुए देखा है. मैने सोचा कि एक ऐसी किताब होनी चाहिए जहाँ ये लोग सिर्फ अपने काम के बारे में बात कर सकें. जब ये अपने काम के बारे में सोचते हैं जब स्टूडियो में जाते हैं जब शॉट शुरु होता है तब उनके ज़हन में क्या क्या चलता है शॉट के बाद क्या सोचते हैं. यही सोचकर मैने किताब लिखी है. इसी तरह डाइरेक्टर्स कट में निर्देशकों का नज़रिया भी पेश करने की कोशिश की गई है जिसमें ऋषिकेश मुखर्जी से लेकर गुलज़ार यश चोपड़ा गोविंग निहलानी और करण जौहर शामिल हैं. भावना सोमाया मिसाल देते हुए बताती हैं सबका अलग अलग नज़रिया रहता है. जैसे गोविंद निहलानी ने समझाया कि उनका अपना कितना भी टेंशन क्यों न रहता हो लेकिन उनकी ज़िम्मेदारी ये है कि उनके कलाकार सहज और ख़ुश हैं या नहीं. वहीं श्याल बेनेगल ने मुझे बताया कि वे अपनी फ़िल्म में विषय के अनुसार एक्टर और जगह को चुनते हैं और सिनेमा का रुख़ निर्देशक के हिसाब से चलता है इसलिए कलाकारों को भी निर्देशक की पर्सनेलिटी को अपनाना ज़रूरी है. किताब के आख़िर में एक सेक्शन रखा गया है द स्पेशलिस्ट जिसमें उन ख़ास मुद्दों या किरदारों की बात की गई हैं जो किसी कलाकार विशेष से जुड़कर रह गए. जैसे रोमांस को यश चोपड़ा से जोड़कर देखा जाता है तवायफ़ के रोल को रेखा से अमिताभ बच्चन और पुलिस की वर्दी का ख़ासा रिश्ता रहा है तो श्याम बेनेगल ने महिलाओं पर काफ़ी फिल्में बनाई हैं. किताब में यश चोपड़ा से हुई इंटरव्यू में उनकी कई जानी-अनजानी बातें सामने आती हैं. जैसे वो बताते हैं कि फिल्म धूल का फूल में एक सीन था जहाँ हीरो और हीरोइन का साइकिल एक दूसरे से टकराता है लेकिन सेंसर ने ये सीन हटाने के लिए कहा था क्योंकि उन्हें ये दृश्य अश्लील लगा था. इसमें यश चोपड़ा अपना आंकलन करते हुए कहते हैं कि फासले जैसी उनकी फ़िल्मों की विफलता इसलिए हुई क्योंकि वे अपनी जिद्द पर अड़ गए थे. किताब में यश चोपड़ा ये भी बताते हैं कि डर में शाहरुख़ खान उनकी पहली नहीं बल्कि चौथी पसंद थे. लेखिका भावना सोमाया कहती हैं कि विदेशों में इस तरह की किताबें ख़ूब चलती हैं लेकिन भारत में ऐसी किताबें अभी कम चलती हैं क्योंकि ज़्यादातर लोगों को फिल्मी कलाकारों की निजी ज़िंदगी में ज्यादा दिलचस्पी रहती है. ये किताब सिनेमा के कई दिग्गजों की दुनिया में झांकने का एक मौका देती है जहाँ चकाचौंध के पीछे की उनकी दुनिया को समझा जा सकता है. |
| DATE: 2013-10-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1317] TITLE: जब 'गेटवे ऑफ़ इंडिया' में घिर गए थे अमिताभ |
| CONTENT: अभिनेता अमिताभ बच्चन 11 अक्तूबर को 71 साल के हो गए. साल 1969 में उन्होंने ख़्वाजा अहमद अब्बास की फ़िल्म सात हिंदुस्तानी से अपना करियर शुरू किया. ये तस्वीर उसी फ़िल्म की है. जिसमें दुबले-पतले अमिताभ सबसे दाएं नज़र आ रहे हैं. फ़िल्म को बॉक्स ऑफ़िस पर तो कामयाबी नहीं मिली लेकिन अमिताभ बच्चन को बेहतरीन अभिनय के लिए अपनी पहली ही फ़िल्म में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. 1978 में रिलीज़ हुई फ़िल्म डॉन तो आपमें से कई लोगों ने देखी ही होगी. लेकिन ये तस्वीर कम ही लोगों ने देखी होगी. ये तस्वीर है डॉन की शूटिंग के दौरान की जिसमें अमिताभ बच्चन फ़िल्म के निर्देशक चंद्रा बारोट के साथ हंसी मज़ाक़ करते नज़र आ रहे हैं. डॉन की शूटिंग का एक दृश्य. फ़िल्म के गाने ई है बंबई नगरिया की शूटिंग गेटवे ऑफ़ इंडिया में हो रही थी और अमिताभ को देखने के लिए सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा हो गई. शूटिंग करने में ख़ासी दिक्क़त पेश आई. इस तस्वीर में निर्देशक चंद्रा बारोट भी नज़र आ रहे हैं. चंद्रा अमिताभ को टाइगर कहकर बुलाते हैं. डॉन की शूटिंग के दौरान ही फ़िल्म के निर्माता नरीमन ईरानी का निधन हो गया था. तब चंद्रा बारोट अमिताभ बच्चन और प्राण जैसे कलाकारों ने मिलकर फ़िल्म पूरी करने में नरीमन ईरानी की पत्नी को भरपूर सहयोग दिया था. फ़िल्म में प्राण को अमिताभ बच्चन से ज़्यादा मेहनताना मिला था. 1975 में रिलीज़ हुई फ़िल्म शोले को भला कौन भूल सकता है. फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी के नए आयाम रचे. इसी फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक सीन पर चर्चा करते निर्देशक रमेश सिप्पी और अमिताभ बच्चन. शोले जब रिलीज़ हुई थी तो पहले हफ़्ते फ़िल्म को दर्शकों ने लगभग नकार दिया था. तब निर्देशक रमेश सिप्पी ने अमिताभ बच्चन से कहा कि वो क्लाईमेक्स दोबारा शूट करना चाहते हैं. क्लाइमेक्स में अमिताभ बच्चन का किरदार मर जाता है और सिप्पी उसे क्लाइमेक्स रीशूट करके इसे बदलना चाह रहे थे. लेकिन दूसरे हफ़्ते में अचानक दर्शक शोले देखने टूट पड़े और फिर जो हुआ वो तो इतिहास है. इस तस्वीर में 70 के दशक के युवा अमिताभ बच्चन नज़र आ रहे हैं फ़ोटोग्राफ़र दीपक तांबे के साथ. अमिताभ बच्चन ने जब फ़िल्मों में प्रवेश किया उस वक़्त राजेश खन्ना की आंधी थी. अमिताभ की लगातार कई फ़िल्में फ़्लॉप हुईं और उनका करियर लगभग समाप्ति की ओर था. लेकिन साल 1973 में आई प्रकाश मेहरा की ज़ंजीर ने सब बदल कर रख दिया और अमिताभ ने जो स्टारडम की ओर क़दम बढ़ाया तो आज तक उनका वो रुतबा क़ायम है. गायक सुदेश भोसले के साथ अमिताभ बच्चन. ये तस्वीर है 90 के दशक के शुरुआत की. इसी दौर में आई फ़िल्म हम के गाने जुम्मा चुम्मा ने कामयाबी का इतिहास बना दिया. अमिताभ के लिए ये गाना सुदेश भोसले ने ही गाया. उनकी आवाज़ अमिताभ बच्चन से इतनी ज़्यादा मिलती है कि एक दफ़ा सुदेश ने फ़ोन पर अमिताभ की पत्नी जया बच्चन से बात की तो वो उन्हें अमिताभ ही समझ बैठीं. ये तस्वीर है फ़िल्म अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो के प्रमोशन के दौरान की. जिसमें धर्मेंद्र भी नज़र आ रहे हैं. फ़िल्म 2004 में रिलीज़ हुई थी. ये बॉक्स ऑफ़िस पर नाकाम रही थी. ये तस्वीर है अमिताभ बच्चन के मुंबई स्थित घर जलसा की. जिसमें पत्नी जया बच्चन बहू ऐश्वर्या राय बच्चन और बेटे अभिषेक बच्चन भी नज़र आ रहे हैं. अमिताभ बच्चन हर रविवार अपने घर के बाहर प्रशंसकों से मिलते हैं. |
| DATE: 2013-10-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1318] TITLE: मर्लिन मुनरो ने कराई थी प्लास्टिक सर्जरी |
| CONTENT: मर्लिन मुनरो की छवि सौंदर्य मल्लिका की है. उनकी तस्वीरें आज भी उतनी ही लोकप्रिय हैं जितनी उनके जीवन काल में रही थीं. मर्लिन मुनरो के प्रशंसकों के लिए इस बात पर यक़ीन करना मुश्किल होगा कि उनके दिलों पर राज करने वाली इस सिने तारिका अपने सौंदर्य को बढ़ाने के लिए प्लास्टिक सर्जरी का सहारा लिया था. वो भी तब जब इस तरह की सर्जरी के बारे में लोग ज़्यादा जानते भी नहीं थे. लेकिन लाखों दिलों पर राज करने वाली मुनरो के इस पहलू का पता तब चला जब मुनरो के छह एक्स-रे और उनके डॉक्टर के ज़रिए लिखे गए नोट्स सामने आए. इन एक्स-रे पर जून 1962 की तारीख़ है यानी ये एक्स-रे मुनरो की मौत के मात्र दो महीने पहले लिए गए थे. इस सामग्री से यह पता चला कि मर्लिन मुनरो ने ठुड्डी और नाक की प्लास्टिक सर्जनी कराई थी. इन मेडिकल नोट्स में मुनरो के एक्स-रे के लिए जॉन न्यूमैन का छद्म नाम का प्रयोग किया गया था. एक्स-रे रिपोर्ट में मुनरो की लंबाई पाँच फिट छह इंच और वज़न 115 पाउंड बताया गया है. कैलिफ़ोर्निया में इस साल नवंबर में होने वाली नीलामी में इन छह एक्स-रे और डॉक्टर के नोट्स को बेचा जाएगा. इन चीज़ों की नीलामी से क़रीब 15-30 हज़ार डॉलर तक मिलने की उम्मीद है. इससे पहले मुनरो के सीने के एक्स-रे की नीलामी से क़रीब 45 हज़ार डॉलर मिले थे. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार गार्डिन के नोट्स और एक्स-रे 1958 में लिए गए थे जब मुनरो ने अपनी अपनी ठुड्डी में विकृति आने की शिकायत की थी. इस मेडिकल रिपोर्ट को माइकल गर्डिन नामक डॉक्टर ने लिखा था. जूलियन ऑक्शन से जुड़े मार्टिन नोलान कहते हैं मुनरो ने प्लास्टिक सर्जरी कराई थी या नहीं इसके लेकर हमेशा ही अनुमान लगाए जाते रहे हैं. वो प्राकृतिक रूप से इतनी सुंदर थीं कि लोगों के लिए यह स्वीकार करना कठिन था कि उन्होंने प्लास्टिक सर्जरी कराई थी. 1950 के दशक में आमतौर पर लोग ऐसी सर्जरी नहीं कराते थे. तब यह एक नई चीज़ थी लेकिन मुनरो समय से आगे चलने के लिए ही जानी जाती हैं. इस साल नवंबर 9-10 को होने वाली यह नीलामी कैलिफ़ोर्निया बेवेर्ली हिल्स के जूलियन ऑक्शन नामक संस्था कर रही है. मर्लिन मुनरो के सबसे चर्चित फ़िल्में हाउ टू मैरी अ मिलिनेयर1953 दि सेवेन ईयर इच 1955 और सम लाइक इट हॉट 1959 इसी दौर में आई थीं. |
| DATE: 2013-10-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1319] TITLE: भक्ति गीतों में भी बॉलीवुड की भेड़चाल |
| CONTENT: बॉलीवुड धुनों पर बनने वाले देवी गीतों की भरमार हो रही है. काँटा लगा बन गया मैया मेरी सैयां दिल में आना रे बन गया माँ के मंदिर आना रे और ऐसे ही न जाने कई गानों से नवरात्रि के दिनों में धूम मच जाती है. मंदिरों से लेकर घरों तक गली से लेकर मोहल्ले तक बॉलीवुड गानों की धुनों पर बने ऐसे सैकड़ों गाने सुनने को मिल जाते हैं. कई लोग ये गाने गुनगुनाते हैं कई लोग मुस्कुराते हैं और कई इन्हें एक गंदा मज़ाक़ समझते हैं. लेकिन गाने सुनते वक़्त एक सवाल ज़ेहन में हमेशा आता है कि आख़िर ये गाने लिखता कौन है और क्या ऐसे गाने लिखते वक़्त उस के मन में ज़रा भी भक्ति भावना होती है मुकेश पाण्डेय ऐसे ही कई गानों को लिख चुके हैं और उनको संगीतबद्ध भी कर चुके हैं वो सोनू निगम विनोद राठौड़ अनुराधा पौडवाल और बाबुल सुप्रियो जैसे गायकों को बॉलीवुड पैरोडी में भी गवा चुके हैं. मुकेश कहते हैं कि ये उनके लिए बस काम है. मुकेश कहते हैं अगर हमें मज़ाक़ ही करना है तो हम माता को लेकर तो मज़ाक़ नहीं करेंगे और भी बहुत सारी चीज़ें हैं मज़ाक़ करने के लिए. अब अगर कोई वैष्णो देवी जाता है तो उसमें उर्जा जगाने के लिए हम बॉलीवुड का कोई ऐसा गीत चुनते हैं जिसमें भरपूर उर्जा हो और लोग उसे गुनगुना भी पाएं. अब अगर हम भीमसेन जोशी के गीत पर पैरोडी बनाकर लोगों को चढ़ाई करवाएं तो वो थोड़ा मुमकिन सा नहीं लगेगा. तो बॉलीवुड के चर्चित गीत इंसान में जोश भर देते हैं. मुकेश कहते हैं युवा पीढ़ी में भक्ति भावना जगाने का इससे अच्छा तरीक़ा और कोई हो ही नहीं सकता. युवा चर्चित बॉलीवुड गानों पर बनी पैरोडी को सुनते ही वो उसकी धुन को किसी बॉलीवुड गाने से मिलाने में लग जाता है और उस वक़्त वो इसी दुविधा में गाना सुन लेता है. बॉलीवुड के चर्चित गीत अपने आप में सम्मोहन लिए हुए रहते हैं जैसे की टिंकू जिया अब इस गाने की धुन पर और कोई भी दूसरा गाना बनाया जाए तो वो यक़ीनन हिट हो जाएगा. चाहे बात युवा पीढ़ी की हो या श्रद्धालुओं की ऐसे भक्ति गीत जो बॉलीवुड के चर्चित गानों पर बनते हैं जाने अनजाने में ही कई लोगों की भावनाओं को ठेस पुहंचा देते हैं. पर पैरोडी का ये चलन आख़िर शुरू कैसे हुआ और कब ये बदलते बदलते भक्ति गीतों पर आकर रुक गया. पैरोडी का दौर शुरू हुआ 40 के दशक में और अगर उसके पीछे आपकी नीयत साफ़ है तो इस में कुछ ग़लत नहीं है ऐसा मानना है संगीत समीक्षक पवन झा का. वो कहते हैं शुरूआती पैरोडी की अगर बात करें को करन दीवान का गाना जब तुम ही चले परदेस उस पर एक बहुत ही चर्चित पैरोडी बनी थी जब तुम ही चले इंग्लैंड बजा के बैंड और फ़िल्म ख़ज़ांची का गाना सावन के नज़ारे हैं उस पर भी बहुत कमाल की पैरोडी बनी थी. तो बॉलीवुड में पैरोडी का दौर बहुत पहले से ही चल रहा है. पवन के मुताबिक़ अगर पैरोडी अच्छी नीयत और नएपन से की जाए तो एक बहुत ही अच्छा मज़ेदार प्रयोग हो सकता है पर जहाँ तक भक्ति गीतों में पैरोडी का सवाल है उन्हें जब भी मैं सुनता हूँ तो मुझे बहुत दुख होता है. ऐसे गीतकारों के पास यक़ीनन टैलेंट की कमी है और वो कम वक़्त में ज़्यादा प्रसिद्धि पाना चाहते हैं. कई श्रद्धालु इस तरह के चलन को भद्दा मज़ाक़ मानते हैं. दिल्ली की नैना कहती हैं धुनों पर माता के भजनों का बनना एक बहुत ही ग़लत बात है. माता जिन्हें हम पूजते हैं उनके लिए ऐसे गाने जब हम सुनते हैं तो हमें बहुत बुरा लगता है और उनमें शोर भी बहुत ज़्यादा होता है. श्रद्धा की बात करें तो उनमें पुराने भजन अच्छे हैं लेकिन फ़िल्मी धुनों पर जो भजन बनते हैं वो बहुत ग़लत बात है. वाराणसी से एक और श्रद्धालु रमाकांत त्रिपाठी का कहना है माता के ऊपर बॉलीवुड की धुनों से बने जो भक्ति गीत हैं उन्हें नहीं बनाना चाहिए. अभी हाल ही में बॉलीवुड के एक गाने तैनू मैं लव करदा पर ऐसा ही एक भक्ति गीत बना है जो सुनने मैं बहुत ही गंदा लगता है. तो मैं तो इसके बिलकुल ही ख़िलाफ़ हूँ और ऐसे गाने न ही बनें तो बेहतर है. लेकिन ऐसे गानों का बाज़ार दिन प्रति दिन बढ़ रहा है जिससे ये साफ़ है कि ऐसे गानों को पसंद करने वाले लोग भी कहीं न कहीं मौजूद हैं तभी हर एक धार्मिक त्यौहार या उत्सव में इन्हें बड़े ज़ोरों से बजाया जाता है और लोग इससे चाहकर भी नज़रंदाज़ नहीं कर सकते. |
| DATE: 2013-10-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1320] TITLE: जब गले मिले अमिताभ और सलमान |
| CONTENT: गुरुवार को फ़िल्म अभिनेत्री रेखा का 59वां जन्मदिन है. रेखा को एक कमाल की अदाकारा तो माना ही जाता है साथ ही उनकी शख्सियत के रहस्यों की चर्चा भी अकसर होती रहती है. उनके जन्मदिन पर बीबीसी ने बात की कुछ ऐसे लोगों से जिन्हें रेखा को क़रीब से जानने का मौक़ा मिला. वरिष्ठ पत्रकार रउफ़ अहमद रेखा को तब से जानते हैं जब वो फ़िल्मफ़ेयर के लिए काम करते थे. बीबीसी से बातचीत में रउफ़ कहते हैं रेखा आज जैसी दिखती हैं उसमें अमिताभ बच्चन का बड़ा योगदान है. सन् 1976 में आई फ़िल्म दो अनजाने में उन्होंने अमिताभ के साथ काम किया. वो आगे कहते हैं इसके बाद से वो हर मामले में अमिताभ बच्चन की राय लेने लगीं. उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए वो सब अमिताभ से ही पूछतीं. वैसे भी रेखा को एक गुरु और मार्गदर्शक की ज़रूरत थी. रउफ़ कहते हैं कि रेखा की सबसे अच्छी बात यह है कि वो अपनी बात बहुत साफ़ तरीक़े से बोलने में यक़ीन रखती हैं. रेखा के बारे में एक बड़ी ही दिलचस्प बात रउफ़ अहमद ने बीबीसी के साथ साझा की. वो कहते हैं रेखा कभी भी दोपहर दो बजे से पहले अपनी कोई तस्वीर नहीं खिंचवाती थी. उनका मानना था कि सुबह के समय चेहरे पर एक अलग तरह की सूजन रहती है जो क़रीब एक बजे तक चली जाती है. रउफ़ अहमद कहते हैं एक समय में वो एक ही फ़ोटोग्राफ़र के साथ काम करती थी. अगर उन्हें अपनी कोई तस्वीर अच्छी नहीं लगती तो वो उस तस्वीर को तुरंत हटवा देती. वो हमेशा फ़ोटोग्राफ़र के पीछे एक बड़ा आइना लगवा देती थीं ताकि वो देख सकें कि वो कैसी दिख रही है. अहमद कहते हैं कि अगर उन्हें रेखा को कुछ शब्दों में समेटना हो तो वो कहेंगे कि रेखा एक दिलचस्प पहेली हैं जो मांग में सिंदूर लगाती हैं रहस्यमयी जीवन जीती हैं और कभी अकेलेपन की शिकायत नहीं करतीं. वरिष्ठ पत्रकार प्रवीना भारद्वाज का कहना है कि रेखा ने बहुत कम उम्र में फ़िल्मों में काम करना शुरु कर दिया था इस वजह से उन्हें फ़िल्में चुनने की समझ ही नहीं थी. प्रवीना के अनुसार रेखा को लगता था कि उन्हें जो भी फ़िल्म मिल रही हैं उन्हें कर लेनी चाहिए. लेकिन आगे चल कर उन्हें ये अहसास हुआ कि उन्हें सही चुनाव करने होंगे. प्रवीना ने बताया दक्षिण भारतीय फ़िल्मों से आने के कारण वो शुरुआत में थोड़ी मोटी थी. उनका रंग भी सांवला था. आज आप उनकी कोई पुरानी तस्वीर देख लें तो यक़ीन नहीं होगा कि ये रेखा है. धीरे-धीरे उन्होंने सीखा कि अपने लुक्स पर काम करना कितना ज़रूरी है. प्रवीना के मुताबिक़ पहले लोग उन पर व्यंग कसते थे उन्हें अग्ली डक्लिंग बुलाते थे. लेकिन फिर रेखा ने तय किया कि वो अपनी ये छवि बदल कर रहेंगी. योग और मेडिटेशन के ज़रिए उन्होंने अपने शरीर में कई बदलाव किए. एक और वरिष्ठ पत्रकार हैं जिन्हें रेखा को पास से जानने का मौक़ा मिला उदय तारा. उदय तारा की रेखा से पहली मुलाक़ात हुई 1971 में आई फ़िल्म एलान के सेट पर. वो कहती हैं जब मैं रेखा से मिली तो मैंने पाया कि उन्हें चॉकलेट खाना बेहद पसंद है. वो बहुत चुलबुली लड़की थी. उदय तारा ने बताया रेखा को शुरू में लंबे डायलॉग से बहुत डर लगता था. वो एक जगह बैठ कर खूब अभ्यास किया करती थी. वैसे वो अभिनेत्री तो अच्छी हैं ही साथ ही वो गाती भी बहुत बढ़िया हैं. उदय तारा बताती हैं कि रेखा को कुत्तों से भी बहुत प्यार है और उन्होंने घर पर भी कुत्ते पाले हुए हैं. जो रेखा अपनी तस्वीरों को लेकर इतना सोचती रही हों वो भला बिना मेकअप के लिए तस्वीरें खिचवाने के लिए कैसे मान गईं. रेखा को इस बात के लिए राज़ी करने का श्रेय जाता है फ़ोटोग्राफ़र जयेश सेठ को. बीबीसी से बात करते हुए जयेश कहते हैं मेरे पूरे करियर का एक ही लक्ष्य था कि मैं रेखा की तस्वीरें खीचूं. वो मेरी रोल मॉडल रही हैं. उनकी ही वजह से मैंने फ़ोटोग्राफ़ी शुरू की. अपना करियर शुरू करने के 10 साल बाद मुझे उनकी तस्वीरें खींचने का मौक़ा मिला. जयेश बताते हैं कि उन्होंने 1995 में पहली बार रेखा की तस्वीरें खींची. उनके अनुसार रेखा ने कभी ये नहीं जताया कि वो एक सुपरस्टार हैं. जयेश कहते हैं कि रेखा बिना मेकअप के भी बहुत आकर्षित लगती हैं. वो कहते हैं मैंने उनसे कहा कि वो एक बार बिना मेकअप के शूट करके देखें. पहले तो वो हिचकिचाई पर जब उन्होंने अपनी फ़ोटो देखी तो उन्होंने मेरे साथ कई बार बग़ैर मेकअप के फ़ोटोशूट किए. प्रवीना भारद्वाज बताती हैं कि अपने करियर की शुरुआत में रेखा नहीं जानती थी कि किससे क्या बात करनी चाहिए. प्रवीन कहती हैं एक बार उन्होंने एक महिला पत्रकार से अपनी निजी ज़िन्दगी की कुछ बातें कह डालीं. रेखा ने उस पत्रकार को अपना दोस्त समझा. लेकिन उस पत्रकार ने वो सारी बातें एक किताब में छाप दी. उस किताब में आधा सच और आधा झूठ लिखा था. तब से रेखा ने मीडिया से दूरी बना ली. मीडिया ही नहीं फ़िल्म इंडस्ट्री में भी उनके बहुत कम दोस्त हैं. रेखा के करीबी मित्रों में हेमा मालिनी श्रीदेवी जीतेन्द्र और राकेश रोशन के नाम शामिल हैं. |
| DATE: 2013-10-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1321] TITLE: दूसरे बच्चे के बारे में न लगाएं क़यास: ऐश्वर्या |
| CONTENT: मौक़ा चाहे जो भी हो कुछ लोग बड़े सितारों की निजी ज़िन्दगी में हस्तक्षेप करने से ज़रा नहीं हिचकिचाते. हाल ही में ऐश्वर्या राय बच्चन स्टेम सेल संरक्षण करने वाली एक कंपनी से जुडी हैं. मुंबई में पत्रकारों से बातचीत करते हुए ऐश्वर्या राय सबको स्टेम सेल संरक्षण के फ़ायदों के बारे में जागरुक करती नज़र आईं. इस मौक़े पर ऐश्वर्या ने ये भी बताया कि उनकी बेटी के जन्म के वक़्त उन्होंने भी स्टेम सेल संरक्षित करवाए थे. ऐश्वर्या और अभिषेक बच्चन की बेटी आराध्या जल्द ही दो साल की हो जाएंगी. इस मंच पर खड़ी ऐश्वर्या से जब एक पत्रकार ने ये पूछा कि वो इस सुविधा का दोबारा लाभ कब उठाने वाली हैं तो हंसते हुए ऐश्वर्या बोलीं मैं जानती हूं कि आपका सवाल वो नहीं है जो आप बोल रहे हैं. आपका इशारा तो किसी दूसरी ही ओर है. और आपके इशारे को मैं ही नहीं बल्कि यहां मौजूद हर इंसान समझ रहा है. अपनी बात को पूरा करते हुए ऐश्वर्या बोलीं हमारे जीवन में जब एक बार फिर ये मौक़ा आएगा तब आप ख़ुद ही जान जाएंगे. लेकिन अभी से बच्चे को लेकर कोई क़यास न लगाएं. लेकिन ऐश्वर्या के इतना कहने पर भी पत्रकार ने अपनी ज़िद नहीं छोड़ी और एक बार फिर उसने ऐश्वर्या से पूछ ही डाला कि वो दोबारा मां कब बनने वाली हैं पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए ऐश्वर्या ने कहा मैंने हमेशा कहा है कि बच्चे भगवान की देन होते हैं. ये सब चीज़ों को जब होना होता है तभी होती हैं. अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय की शादी 2007 में हुई थी. उनकी बेटी आराध्या का जन्म 2011 में हुआ. इतना ही नहीं इस मौक़े पर वो अपनी बेटी आराध्या के बारे में भी बात करती सुनाई दी. ऐश्वर्या कहती हैं आराध्या को पा कर हम सब बहुत ख़ुश हैं. वो हमारे जीवन में ढेर सारी ख़ुशियां लाई है. आराध्या को पा कर मैं भगवान का बहुत धन्यवाद करती हूं. आराध्या 16 नवंबर को दो साल की हो जाएंगी. इस बीच बच्चन परिवार में और भी जन्मदिन हैं. शुरुआत होती है अमिताभ बच्चन के जन्मदिन से जो 11 अक्तूबर को होता है. ऐश्वर्या कहती हैं आने वाले कुछ दिन तो उनके घर में त्योहार जैसा ही माहौल रहने वाला है. वो कहती हैं इन दिनों नवरात्री चल रही हैं. फिर पा का जन्मदिन है फिर मेरा और फिर आराध्या का. इसी बीच दशहरा और दिवाली भी है. |
| DATE: 2013-10-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1322] TITLE: दिलीप कुमार की दास्तां: मधुबाला, सायरा और दोस्ती के क़िस्से |
| CONTENT: अभिनेता दिलीप कुमार एक ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने अपने निजी जीवन के बारे में बहुत कम ही बात की है. लोगों को उनके फ़िल्मी जीवन के अलावा बाक़ी बातें कम ही पता हैं. लेकिन अब एक ऐसी किताब आने वाली है जिसके बारे में दावा किया जा रहा है कि इसमें दिलीप कुमार की ज़िंदगी से जुड़े कई ऐसे पहलू होंगे जिनके बारे में अब तक किसी को जानकारी नहीं. बीबीसी से ख़ास बात करते हुए किताब की लेखिका उदय तारा ने ये दावा किया. उदय तारा ने बताया कि ख़ुद दिलीप कुमार और सायरा बानो किताब का कवर पेज लॉन्च 11 अक्तूबर को अपनी शादी की सालगिरह पर करेंगे. इस साल दोनों की शादी को 47 साल पूरे हो जाएंगे. पूरी किताब 11 दिसंबर को दिलीप कुमार के 91वें जन्मदिन पर लॉन्च की जाएगी. दिलीप कुमार और मधुबाला के प्यार के अफ़साने उस दौर में बहुत हुआ करते थे. दोनों की जोड़ी बड़े पर्दे पर भी ख़ासी हिट रही. लेकिन 1960 में आई के आसिफ़ की फ़िल्म मुग़ले आज़म के बाद दोनों ने साथ कभी काम नहीं किया. इस किताब में दिलीप कुमार ने खुलकर मधुबाला के साथ अपने रिश्तों के बारे में बातें की हैं. इसके अलावा अभिनेत्री कामिनी कौशल और दिलीप कुमार की दोस्ती का ज़िक्र भी इस किताब में है. कामिनी कौशल और दिलीप कुमार ने 40 के दशक में शहीद नदिया के पार आरज़ू और शबनम जैसी कई फ़िल्में कीं. किताब में दिलीप कुमार ने क़ुबूल किया है कि कामिनी कौशल ही वो पहली महिला थीं जिनके प्रति वो आकर्षित हुए. इस किताब में दिलीप कुमार और सायरा बानो की पहली मुलाक़ात और फिर शादी का ज़िक्र भी होगा. किताब के पहले हिस्से में पेशावर में जन्म लेने से लेकर उनकी आख़िरी फ़िल्म 1998 में रिलीज़ हुई क़िला तक का ज़िक्र होगा. उदय तारा ने बताया कि किताब के लिए जब दिलीप कुमार अपनी मां और बड़े भाई अयूब ख़ान की मौत का ज़िक्र कर रहे थे तो अपनी भावनाओं पर क़ाबू नहीं रख सके और उनकी आंखों में आंसू आ गए. किताब में दिलीप कुमार के स्कूल के दिनों बचपन की बातें और बॉम्बे टॉकीज़ में उनके शुरुआती दिनों का वर्णन भी होगा. दिलीप कुमार फ़िल्मों में अपने रोल की तैयारी कैसे करते थे इस बात को भी विस्तार से बताया जाएगा. किताब के दूसरे हिस्से में अमिताभ बच्चन यश चोपड़ा अनिल कपूर जैसे कई कलाकार दिलीप कुमार के बारे में अपने विचार और उनके साथ काम करने के अनुभव बांटेंगे. इसके अलावा दिलीप कुमार के ग़ैर फ़िल्मी दोस्तों की भी इसमें बातें होंगी. इसी साल सितंबर में दिलीप कुमार को बीमारी की वजह से अस्पताल में भर्ती कराया गया था. अब वो पूरी तरह से ठीक होकर घर वापस आ चुके हैं और इस किताब को लेकर उत्साहित हैं. |
| DATE: 2013-10-08 |
| LABEL: entertainment |
| [1323] TITLE: कुरान पढ़ रही हैं पॉप स्टार मडोना |
| CONTENT: जानी मानी पॉप गायिका मडोना ने एक पत्रिका के लिए लिखे गए अपने लेख में कहा है कि वो आजकल कुरान पढ़ रही हैं. हार्पर्स बाजार नाम की पत्रिका में प्रकाशित इस लेख में उन्होंने अपने जीवन से जुड़ी कई बातें उजागर की हैं. जहां उन्होंने खुद को बंदूक की नोंक पर बंधक बनाने का जिक्र किया है वहीं ये भी बताया कि उनके फ़्लैट में तीन बार चोरी हुई. साथ ही उन्होंने अपने साथ बलात्कार होने की बात भी कही है. इसी लेख में उन्होंने इन कुरान पढ़ने की बात भी कही है. वो कहती हैं मैं इस्लामी देशो में लड़कियों के लिए स्कूल बनवा रही हूं और कुरान पढ़ रही हूं. मेरे ख्याल से सभी धर्मों के पवित्र ग्रंथों को पढ़ना चाहिए. मडोना कहती हैं जैसा कि मेरे दोस्त यमन कहते हैं कि एक अच्छा मुसलमान एक यहूदी होता है एक अच्छा यहूदी एक अच्छा ईसाई होता है और मैं इस बात से सहमत हूं. मडोना के मौजूदा पार्टनर मुसलमान है और वो इस्लाम के बारे में ज्यादा से ज्यादा जान रही हैं. मडोना ने इस लेख में मिड वेस्ट से न्यूयॉर्क आने पर वहां शुरुआती दिनों की मुश्किलों के बारे में भी लिखा है. मडोना लिखता हैं न्यूयॉर्क वैसा नहीं था जैसा मैंने सोचा था. उसने मेरा स्वागत नहीं किया. मिडवेस्ट से न्यूयॉर्क आने के बारे में उन्होंने लिखा है पहले साल मुझे बंदूक की नोंक पर बंधक बनाया गया. एक इमारत की छत पर मेरा रेप हुआ. मेरी पीठ पर छुरी रख कर मुझे ऊपर ले जाया गया. मेरे फ़्लैट में तीन बार चोरी हुई. |
| DATE: 2013-10-08 |
| LABEL: entertainment |
| [1324] TITLE: लद्दाख़ी शोले की बसंती जो सरकारी नौकर है. |
| CONTENT: गब्बर बसंती जय वीरू बेहद कम फ़िल्म प्रेमी होंगे जो फ़िल्म शोले के इन किरदारों से वाक़िफ़ नहीं होंगे. लेकिन क्या आपने लद्दाख़ी भाषा में बनी शोले के बारे में सुना है. या कहें कि लद्दाख़ के फ़िल्म उद्योग के बारे में सुना है यहाँ भाग मिल्खा भाग और थ्री इडियट्स जैसी कई फ़िल्में शूट हुई हैं लेकिन मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि लद्दाख़ में भी फ़िल्म इंडस्ट्री है जो अपने आप में बेहद दिलचस्प और अनोखी है. यू ट्यूब पर लद्दाख़ी शोले देखने के बाद मैंने लद्दाख़ के फ़िल्म उद्योग के लोगों से मिलने की ठानी. तलाश शुरू हुई लद्दाख़ी शोले की बसंती से. नॉरज़ुम लद्दाख़ की सबसे मशहूर युवा अभिनेत्रियों में से एक है जो लेह से 26 किलोमीटर दूर माटो गाँव से हैं. मज़े की बात ये है कि नॉरज़ुम असल में सरकारी कर्मचारी हैं- वे लेह में लोक निर्माण विभाग में काम करती हैं. लद्दाख़ में आपको ज़्यादातर हीरो हीरोइन फ़िल्मकार कैमरामैन एडिटर ऐसे ही मिलेंगे. वे आम दिनों में टैक्सी ड्राइवर हैं टीचर हैं दुकानदार हैं या गाइड हैं. लेकिन गर्मियों में जब फ़िल्म शूट होती है यही लोग फ़िल्म क्रू के सदस्य बन जाते हैं. लद्दाखी फिल्म उद्योग में प्रशिक्षित फ़िल्म क्रू नहीं है. वहां लोग लाइटिंग मेकअप के गुर अभी सीख रहे हैं. नॉरज़ुम से मिलने और उन्हें मनाने के लिए ख़ासी मशक्क़त करनी पड़ी. आख़िरकार जब वो तैयार हुईं तो बताया गया कि वे इस समय अपने सरकारी दफ़्तर में ड्यूटी पर हैं. लेह में उनके सरकारी दफ़्तर के पीछे कुछ देर पैदल चलने के बाद एक शांत सी जगह पर हम मिले. लद्दाख़ की सबसे बड़ी अभिनेत्री मेरे साथ पैदल चल रही थी और मुझे थोड़ी हैरत हो रही थी कि आस-पास के लोग सामान्य तरीक़े से अपना काम किए जा रहे थे. सरकारी कर्मचारी होते हुए फ़िल्मों में काम मेरे इस सवाल को भाँपते हुए नॉरज़ुम ने बताया मैं सामान्य तौर पर सरकारी दफ़्तर में काम करती हूँ. जब कोई शूटिंग होती है तो शनिवार- रविवार को शूटिंग कर लेती हूँ. जब आउटडोर शूटिंग होती है तो मैं अपने सीनियर को बताती हूँ कि मुझे शूटिंग के लिए छुट्टी चाहिए. वो अकसर मान जाते हैं और फिर कोई दिक्क़त नहीं होती. यहाँ आपसे कोई स्टार की तरह बर्ताव नहीं करता. हाँ गाँवों में जाओ तो लोगों में थोड़ी उत्सुकता रहती है. मोतुप लद्दाख के लोकप्रिय युवा हीरो हैं. म्यूज़िक वीडियो में हिट होने बाद वह हीरो बन गए. लद्दाख़ में हर साल चार-पाँच फ़िल्में बनती हैं दो से पांच लाख के बजट की ये फ़िल्में गर्मियों में शूट होती हैं. लद्दाख़ का फ़िल्म उद्योग छोटा सही लेकिन लोग इनका भरपूर आनंद उठाते हैं. सर्दियों में कड़ी ठंड की वजह से यहाँ का जीवन काफ़ी कठिन रहता है मनोरंजन के साधन कम है. तो लोग इन्हीं फ़िल्मों से अपना मनोरंजन करते हैं. लेह में रहने वाले ताशी दावा मोबाइल एक्सेसरिज़ की दुकान चलाते है लेकिन वो लद्दाख़ी फ़िल्मों में बतौर कैमरामैन और एडिटर भी काम करते हैं. हाल में उनकी डॉक्यूमेंट्री को लद्दाख़ फ़िल्म फ़ेस्टिवल में पुरस्कार भी मिला. दुकानदार और कैमरामैन के बीच के इस घालमेल के बारे में ताशी कहते हैं मैं फ़िल्मों के साथ जुड़ा हुआ हूँ. लेकिन सिर्फ़ फ़िल्म लाइन के पैसों से मेरा घर नहीं चल सकता. बाक़ी समय मैं अपनी दुकान पर बैठता हूँ. जब मैं शूट कर रहा होता हूँ तो मेरी पत्नी दुकान चलाती है. पैसे कमाने के लिए मैं हर छोटा बड़ा काम करता हूँ. यहाँ आप ये नहीं सोच सकते कि फ़िल्म लाइन में हैं तो बहुत बड़े हो गए. सबकी अमूमन यही कहानी है. मोतुप लद्दाख़ के लोकप्रिय युवा हीरो हैं. पिता की दुकान पर उनका मन नहीं लगता था. फिर एक दिन एक दोस्त के साथ मिलकर लेह में म्यूज़िक वीडियो शूट किया और अपनी दुकान के बाहर टीवी पर चला दिया. बस फिर क्या था बाज़ार में बेतहाशा भीड़ जुट गई और पुलिस को बीच बचाव करना पड़ा. मोतुप बताते हैं कि उनके वीडियो की इतनी डिमांड हुई कि उन्होंने सोचा क्यों न वीडियो की जगह फ़िल्म का हीरो बना जाए. वे बताते हुए ख़ुद ही भूल जाते हैं कि वे हीरो निर्देशक या कैमरामैन या फिर सब कुछ हैं. लद्दाखी फ़िल्में हिमाचल प्रदेश नेपाल और मंगोलिया के कुछ हिस्सों में भी लोकप्रिय हैं. स्थानीय लोग बताते हैं कि उन्हें मेलो़ड्रामा रोमांस वाली पारिवारिक फ़िल्में पसंद हैं और नाच गाना होना तो ज़रूरी है- बॉलीवुड स्टाइल. हालांकि लेह भर में एक ऑडिटोरियम है जहाँ फ़िल्में दिखाई जाती है और वहाँ से गाँव-गाँव ले जाकर इन फ़िल्मों को दिखाया जाता है. यहाँ पहली बार फ़िल्म बनाने के बारे में सोचने वालों में वरिष्ठ फ़िल्मकार और अभिनेता चेतन का नाम आगे आता है. वे बताते हैं 1989 की बात है. मैंने एक नाटक के लिए कहानी लिखी. यहाँ थिएटर की परंपरा रही है. एक दिन यूँ ही मैंने बोल दिया कि इस पर फ़िल्म बनाएँगे. जब नाटक हिट हो गया तो सब कलाकार कहने लगे क्यों न फ़िल्म बनाने की कोशिश करें देखते हैं क्या होता है. हालांकि हमें ठीक से अंदाज़ा नहीं था कि कैसे क्या करना है. कहीं से कैमरा मिला फ़िल्म शूट हुई गाँवों में हमने दिखाई. वहीं से शुरुआत हुई. तब से लद्दाख़ फ़िल्म इंडस्ट्री आगे बढ़ी है. लद्दाख़ फ़िल्म फ़ेस्विटल के निदेशक मेल्विन विलियम्स बताते हैं कि लद्दाख़ी फ़िल्में लद्दाख़ में ही नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश नेपाल में भी लोकप्रिय हैं. चेतन ने बताया कि एक बार दिल्ली हवाई अड्डे से आते वक़्त उनका सामान ज़्यादा हो गया तो किसी अजनबी सह यात्री ने उनका सामान अपने नाम पर करवाकर उनकी मदद की. बाद में उस यात्री ने चेतन को बताया कि वो हिमाचल में लद्दाख़ी फ़िल्में देखते हैं और बतौर अभिनेता चेतन की फ़िल्में देख चुके हैं और उन्हें पहचानते हैं. अब कोशिश यही है कि इस पहचान को और आगे तक ले जाया जाए. लद्दाख़ को क़ुदरत ने ग़ज़ब की ख़ूबसूरती बख़्शी है इसलिए शूटिंग लोकेशन की कोई कमी नहीं है. पर यहाँ अब भी प्रशिक्षित फ़िल्म क्रू नहीं है लाइटिंग मेकअप आदि के गुर अभी लोग सीख रहे हैं. पिछले कुछ सालों में राकेश मेहरा श्याम बेनेगेल जैसे फ़िल्मकार लद्दाख़ से जुड़े हैं. जैसे जैसे बाहरी दुनिया से संपर्क बढ़ रहा है लद्दाख़ी फ़िल्मों की स्क्रिप्ट तकनीक और सोच में विविधता आ रही है. लद्दाख़ में इन फ़िल्मों की लोकप्रियता और माँग में कोई कमी नहीं है. बड़ा बजट न सही तकनीक न सही सिनेमाहॉल न सही लेकिन यहाँ इनके पास अपने अपने सलमान शाहरुख़ करीना कटरीना हैं. तो कभी मौक़ा लगे तो आप भी लद्दाख़ी फ़िल्म का आनंद लीजिए. हाँ ये ज़रूर हो सकता है कि यही सितारे आपको लद्दाख़ के बाज़ार में दुकान पर किसी स्कूल में किसी सरकारी दफ़्तर में भी काम करते हुए मिल जाएँ. नॉरज़ुम की तरह जो बसंती और सरकारी कर्मचारी दोनों का किरदार बख़ूबी निभा लेती हैं. |
| DATE: 2013-10-08 |
| LABEL: entertainment |
| [1325] TITLE: टैटू, शेक्सपीयर और सिलेब्रिटीज |
| CONTENT: शेक्सपीयर ने शायद ही कभी सोचा होगा कि उनकी लिखी बातों को मेगन फॉक्स डेनिएले लाइंकर लिंडसे लोहान जैसी हॉलीवुड अभिनेत्रियां अपने बदन पर गुदवाएँगी. शायद ही ऐसा कोई हफ्ता गुज़रता होगा जब किसी सिलेब्रिटी के शरीर पर नए-नवेले तरह का टैटू न देखा जाता हो. अभी हाल ही में एंजलीना जोली को अरबी में लंबी सूक्ति गुदवाए हुए देखा गया. जोली ने मशहूर अमरीकी लेखक टेनेसी विलियम्स की एक उक्ति भी गुदवा रखी है. साहित्यिक पंक्तियाँ गीतों के बोल और दार्शनिक उक्तियाँ टैटू गुदवाने वालों की पहली पसंद होती हैं. मेगन फॉक्स ने अपनी देह पर शेक्सपीयर के नाटक किंग लीयर की पंक्ति वी विल लाफ एट गिल्डेड बटरफ्लाई हम स्वर्णमंडित तितलियों पर हँसेंगे. डेनियल लाइंकर ने शेक्सपीयर के नाटक मेजर्स ऑफ मेजर्स की पंक्ति अवर डाउट्स आर ट्रेटर्स एंड मेक अस लूज दि गुड वी ऑफ्ट माइट विन बाइ फियरिंग टू अटेंप्ट हमारा संदेह ही हमारे लिए असली धोखेबाज़ साबित होता है. ये हमें उन अच्छे कामों को करने से रोकता है जो हम कर सकते हैं लेकिन डर के कारण उसके लिए प्रयास नहीं करते. लिंडसे लोहान ने भी शेक्सपीयर के मशहूर नाटक हैमलेट की पंक्ति गुदवा रखी हैं. ये पंक्ति है व्हाट ड्रीम मे कम तो कौन से सपने आएँगे. ये पंक्ति शेक्सपीयर ने नींद की तुलना मौत से करते हुए लिखी हैं कि मृत्युरूपी सपने के दौरान मनुष्य को कौन से सपने आते होंगे टैटू बनवाने वालों की कोशिश होती है कि वो सारगर्भित दार्शनिक अर्थ वाले टैटू बनवाएँ. फुटबॉल खिलाड़ी डेविड बेकहम ने अपनी पत्नी विक्टोरिया बेकहम के नाम के ठीक नीचे उट एमेन एट फोवियम ताकि मैं प्यार करूं और याद करूं गुदवा रखा है. लेखक और आलोचक सैम लीथ कहते हैं ये वाक्यों वाले टैटू प्रेरक हो सकते हैं लेकिन इनकी कुछ सीमा भी है. लीथ कहते हैं हो सकता है समय के साथ आपकी पसंद बदल सकती है. 15 साल की उम्र में आपको लग सकता है कि कैचर ऑफ दि राइ आपके जीवन का सार है. 50 साल में आपको लगे कि ऐसा नहीं है. इसलिए कुछ गूढ़ और संक्षिप्त हो तो बेहतर. किसी की गर्दन पर गुदे डेनमार्क के दार्शनिक सोरेन कीर्कगार्द या फिर गन्स एंड रोज़ेज़ के बोल से कोई सोच में पड़ सकता है. हो सकता है कि ऐसे किसी टैटू को देखकर कोई सोचे कि गर्दन पर गुदवाने की बजाय इसे अपने दिमाग में क्यों नहीं रख लेता पेन्सिलवेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी में एंथ्रॉपलॉजी की प्रोफेसर नीना जैब्लांस्की कहती हैं टैटू बनवाने में एक बुनियादी अंतरविरोध भी होता है. सभी लोग चाहते हैं कि उनका टैटू सबसे अलग हो लेकिन वो यह भी चाहते हैं कि वो एक खास तरह का भी हो. नीना कहती हैं इस से लोग अपनी साझी पहचान को स्थापित करना चाहते हैं और अपनी किसी खास चीज के बारे में बताना चाहते हैं. यह चीज इसमें नयापन लाती है. शेक्सपीयर दांते या नीत्से की पंक्ति के माध्यम के आपका एक खास व्यक्ति से परिचय भी होता है. लेकिन एक और सवाल है जो साहित्य के कट्टर चाहने वालों को परेशान करता है. ऐसे लोग को इस बात की चिंता रहती है कि इन बड़े लेखकों के लिखे को अपने शरीर पर गुदवाने वाले क्या उसका मतलब भी समझते हैं एक साहित्यिक संस्था चलाने वाली एड्रियन टॉड जूनिंगा कहती हैं हो सकता है कि मेगन फॉक्स को शेक्सपीयर के नाटक के गिल्डेड बटरफ्लाई वाले अंश के बारे में पता हो या उन्हें ये लगा हो कि ये पढ़ने-सुनने में अच्छा है. |
| DATE: 2013-10-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1326] TITLE: ऑस्कर नहीं, दर्शक़ ज़्यादा अहम: फ़रहान अख़्तर |
| CONTENT: इस साल भारत की तरफ़ से ऑस्कर के लिए आधिकारिक तौर पर गुजराती फ़िल्म द गुड रोड भेजी गई जिसे लेकर ख़ासा विवाद भी हुआ. ज्यूरी में शामिल फ़िल्मकार गौतम घोष ने भी माना था कि इरफ़ान की फ़िल्म लंचबॉक्स इस सम्मान की ज़्यादा हक़दार थी. दूसरी तरफ फ़रहान अख़्तर की फ़िल्म भाग मिल्खा भाग को भी इस साल दर्शकों और समीक्षकों दोनों की वाहवाही मिली. प्रख्यात भारतीय धावक मिल्खा सिंह के जीवन पर आधारित इस फ़िल्म को विदेश में भी बहुत सराहना मिली. तो क्या भाग मिल्खा भाग के ऑस्कर में ना भेजे जाने पर फ़रहान भी नाराज़ हैं. मुंबई में एक प्रमोशनल इवेंट के दौरान आए फरहान ने कहा मुझे इसे लेकर कोई अफसोस नहीं हैं हम एक बेहतरीन फिल्म बनाना चाहते थे फिल्म वैसी बनी और दर्शकों को पसंद आई. ऑस्कर के लिए बनी कमेटी जो निर्णय लेती है वह ठीक होता है. मुझे इसे लेकर किसी से कोई शिकायत नहीं है. जब उनसे पूछा गया कि वह अपनी फिल्म की समीक्षाओं को कितनी गम्भीरता से लेते हैं तो फरहान ने कहा फिल्म को मिली हर समीक्षा महत्वपूर्ण नहीं होती. फिल्म बनाते वक्त इन सब चीजों से प्रेरणा नहीं मिलती. मेरे लिए दर्शकों की प्रतिक्रिया बहुत मायने रखती है. फरहान ऋतिक रोशन की आने वाली फिल्म कृष 3 देखने के लिए खासे उत्सुक हैं. फ़रहान ने बतौर निर्देशक फ़िल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था. उन्होंने आमिर ख़ान सैफ़ अली ख़ान और अक्षय खन्ना को लेकर फ़िल्म दिल चाहता है साल 2001 में बनाई थी. फ़िल्म को दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने सराहा. इसके बाद उन्होंने ऋतिक रोशन और प्रीति ज़िंटा को लेकर लक्ष्य और फिर शाहरुख़ खान और प्रियंका चोपड़ा को लेकर डॉन2 बनाई. साल 2008 में उन्होंने बतौर अभिनेता अपने सफ़र की शुरुआत की फ़िल्म रॉक ऑन से जिसे अभिषेक कपूर ने निर्देशित किया. फ़िल्म को ख़ासी वाहवाही मिली और फ़रहान के अभिनय को भी. फ़रहान की बतौर अभिनेता अन्य फ़िल्में हैं कार्तिक कॉलिंग कार्तिक ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा और भाग मिल्खा भाग. उनकी आने वाली फ़िल्म है शादी के साइड इफैक्ट्स जिसमें वो विद्या बालन के साथ काम कर रहे हैं. और इसे वो अपने लिए बेहतरीन अनुभव मानते हैं. |
| DATE: 2013-10-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1327] TITLE: बॉलीवुड की भीड़ में खोना नहीं चाहता: रब्बी शेरगिल |
| CONTENT: ऐसा कम ही होता है जब आप रब्बी शेरगिल को किसी फ़िल्म के लिए गाते हुए सुनते हैं. वैसे हाल ही में उन्होंने रांझणा के लिए तू मन शुदी गाया है. तो बॉलीवुड से इस दूरी की क्या कोई ख़ास वजह है. क्या रब्बी इस बात से डरते हैं कि कहीं वो बॉलीवुड की भीड़ में खो न जांएबीबीसी के इस सवाल का जवाब देते हुए रब्बी कहते हैं हां बॉलीवुड की भीड़ में खो जाने का डर तो है ही साथ ही मुझे ये भी लगता है कि बॉलीवुड का जो संगीत है वो आर्ट से ज़्यादा क्राफ़्ट है. अपनी बात को पूरा करते हुए रब्बी कहते हैं मुझे ये लगता है की बॉलीवुड में भी आर्ट हो सकती है लेकिन मैं ख़ुद को अपनी ही मिट्टी से उखाड़ कर बॉलीवुड में लागों ये बात मुझे बहुत विचित्र लगती है. बनावटी लगती है. मुंबई अपनी चाल से चलता है मैं अपनी चाल से चलता हूँ. फिर भी कभी कभी हमारी राहें मिल जाती हैं. लेकिन ज़्यादातर अलग ही रहती हैं. भारत में इंडिपेंडन्ट आर्टिस्ट की कमी क्यों है जब ये सवाल बीबीसी ने रब्बी से किया तो सवाल का जवाब देते हुए वो बोले जी हां ये बात दुखदायक है कि भारत में ऐसे लोग कम हैं जो ख़ुद ही अपना संगीत बनाते हैं. भारत एक ऐसे दौर से गुज़र रहा है जब उसके पास कहानियों की कोई कमी नहीं है. लेकिन इन कहानियों को कहने वाले लोग नहीं हैं. अपनी बात को पूरा करते हुए वो आगे कहते हैं कि भारत की ज़मीन कहानियों और संगीत के लिए काफ़ी उपजाऊ है लेकिन बस दुख इस बात का है कि बिना झिझक अपनी बात कहने वाले कलाकार काफ़ी कम हो गए हैं. रब्बी के संगीत में आपको जाने अनजाने सूफ़ी संगीत की झलक मिल ही जाती है. इस बारे में वह बताते हैं कि आज सूफ़ी एक कमर्शियल लिहाफ़ बनकर रह गया है जिसे किसी भी चीज़ के ऊपर डाल दिया जाता है. रब्बी फिलहाल पंजाबी के शायर लाल सिंह दिल की कविताओं को संगीत में उतारने पर काम कर रहे हैं. रब्बी बताते हैं कि इन कविताओं में थोड़ा सा ग़म है. |
| DATE: 2013-10-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1328] TITLE: क्या हिटलर के इशारों पर चलता था हॉलीवुड? |
| CONTENT: एक नई विवादित किताब में दावा किया गया है कि अमरीकी फ़िल्म उद्योग हॉलीवुड के फ़िल्म स्टूडियो 1930 के दशक में जर्मनी के नाज़ी शासक हिटलर की मर्ज़ी के हिसाब से काम करते थे. द कोलाबॉरेशन हॉलीवुड्स पैक्ट विद हिटलर के लेखक हार्वर्ड विश्वविद्यालय के विद्वान बेन उरवांड एक सौम्य स्वभाव के इंसान हैं जिनकी किताब की विभिन्न हल्कों में कड़ी निंदा के साथ ही थोड़ी तारीफ़ भी हो रही है. न्यूयॉर्कर पत्रिका के डेविड डेन्बी अमरीका के चोटी के फ़िल्म समीक्षकों में से एक हैं. वे इस किताब को एक अपमान बताते हैं. डेन्बी कहते हैं मैंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से कहा है कि वह इस किताब को वापस ले ले. ये अपुष्ट दावों से भरी है. अमरीकी फ़िल्मों की ट्रेड पत्रिका हॉलीवुड रिपोर्टर में छपे आलेख में ब्रैन्डिस विश्वविद्यालय के इतिहासविद टॉमस डोहर्टी ने बेन उरवांड की किताब को मिथ्या और ग़ैर ऐतिहासिक बताया है. डोहर्टी की किताब हॉलीवुड एंड हिटलर 1933-1939 हाल ही में प्रकाशित हुई है और वो बेन उरवांड के सबसे मुखर आलोचकों में से एक हैं. बेन उरवांड की किताब दस साल तक जर्मनी और अमरीका में किए गए अनुसंधान पर आधारित है. इसमें उन्होंने ये दावा किया है कि हॉलीवुड के स्टूडियो के कर्ताधर्ता हिटलर की यूरोप में बढ़ती ताक़त का विरोध करने वाले लोग नहीं थे बल्कि उन्होंने तो नाज़ियों की मांगों को चुपचाप मान कर और उनका साथ दिया. किताब में तो यहां तक कहा गया है कि एक स्टूडियो ने जर्मनी को हथियार बनाने के लिए पैसा मुहैया कराया था. उरवांड कहते हैं जर्मनी में अपना कारोबार बनाए रखने के लिए एमजीएम स्टूडियो जर्मन हथियार बनाने के लिए निवेश कर रहा था ये सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात सामने आई थी. उरवांड आगे कहते हैं स्टूडियो के प्रबंधक 1930 के दशक में जर्मनी में अपना कारोबार बचाए रखना चाहते थे. और इसके लिए वे नाज़ी जर्मनी के दूत को लॉस एंजेलेस स्थित अपने स्टूडियो में बुलाते थे और वो फ़िल्में दिखाते थे जो जर्मनी के लिए अप्रिय हो सकती थीं. वे लोग नाज़ी दूत को उन फ़िल्मों को काटने देते थे. जियोर्ग गिसलिंग लॉस एंजेलेस में जर्मन सरकार के कूटनीतिक प्रतिनिधि थे. उन्हें हिटलर का हॉलीवुड दूत भी कहा जाता है और उनका काम हॉलीवुड स्टूडियोज़ की गतिविधियों पर नज़र रखना था. उरवांड के मुताबिक नाज़ी फ़िल्में बनने से रोक भी सकते थे. उनका दावा है कि नाज़ियों के दबाव की वजह से हिटलर के यहूदियों के साथ किए गए बर्ताव के बारे में एक हॉलीवुड फ़िल्म कभी बन ही नहीं पाई. उन्होंने बताया साल 1933 में हॉलीवुड के महान स्क्रीनराइटर और सिटिज़न केन लिखने वाले हर्मन मान्किएविज़ ने हिटलर द्वारा यहूदियों पर अत्याचार के बारे में एक स्क्रिप्ट लिखी जिसमें उन्होंने भविष्यवाणी की कि आगे चल यहूदियों को मारा जाएगा. जियोर्ग गिसलिंग ने स्टूडियो के प्रबंधकों को कहा कि अगर ये फ़िल्म बनाई गई तो जर्मन मार्किट में सभी हॉलीवुड स्टूडियो की फ़िल्मों पर प्रतिबंध लग जाएगा. लेकिन स्टूडियो के मालिक आखिरकार नाज़ियों को ख़ुश क्यों रखना चाहते थे जबकि ज़्यादातर स्टूडियो मालिक तो ख़ुद ही यहूदी थे. उरवांड का मानना है कि वे ऐसा इसलिए करते थे क्योंकि वे जर्मन बाज़ार में अपनी पहुंच बरक़रार रखना चाहते थे. लेकिन उनके आलोचक कहते हैं कि ये सही नहीं है क्योंकि 1930 के दशक में जर्मन मार्केट हमेशा ही फ़ायदेमंद नहीं साबित होता था. उरवांड ये बात तो मानते हैं लेकिन उनका ये भी कहना है कि असल में हॉलीवुड भविष्य के बारे में भी सोच रहा था. अमरीकी फ़िल्म उद्योग जर्मनी के साथ कारोबारी रिश्ते बनाए रखना चाहता था ताकि हिटलर की दूसरे यूरोपीय देशों पर संभावित जीत की स्थिति में उद्योग की जर्मनी और दूसरे यूरोपीय देशों के बाज़ार तक पहुंच बरक़रार रह सके. यूएससी में इतिहास के प्रोफेसर स्टीवन जे रॉस के मुताबिक जर्मन दूत नहीं बल्कि स्थानीय अमरीकी अधिकारी ही हॉलीवुड का मोशन पिक्चर प्रोडक्शन कोड लागू कर रहे थे. ये कोड वो दिशानिर्देश थे जिन्हें हॉलीवुड ने ख़ुद अपने लिए तय किया था. ये कोड तय करता था कि फ़िल्मों में सेक्स ड्रग्स और हत्या जैसे मुद्दों को कैसे दिखाया जाना चाहिए. स्टीवन रॉस के मुताबिक इन दिशा-निर्देशों के तहत किसी दूसरे देश या उसके नेता का अपमान करने पर भी प्रतिबंध था. इसका मतलब था कि नाज़ियों के खिलाफ़ फ़िल्में जर्मन दूत जियोर्ग गिसलिंग की दखलअंदाज़ी की वजह से नहीं बल्कि प्रोडक्शन कोड के प्रतिबंधों की वजह से नहीं बन पाईं. बेन उरवांड के आलोचकों का ये भी कहना है कि उनकी किताब में लॉस एंजेलेस में नाज़ी विरोधी गुटों के लिए स्टूडियो मालिकों के समर्थन को भी ज़्यादा तवज्जो नहीं दी है. यूनिवर्सल स्टूडियोज़ के संस्थापक जर्मन मूल के कार्ल लैमले और जैक वॉर्नर हॉलीवुड नाज़ी विरोधी लीग के बोर्ड सदस्यों में शामिल थे. जैक वॉर्नर और उनके तीन भाइयों ने मिलकर वॉर्नर ब्रदर्स स्टूडियो की स्थापना की थी. प्रोफेसर टॉमस डोहर्टी का कहना है जैक और हैरी वॉर्नर ने नाज़ी विरोधी कामों के लिए हज़ारों डॉलर दिए. उन्होंने हॉलीवुड एंटी नाज़ी लीग को अपने रेडियो स्टेशन पर प्रसारण के लिए समय दिया. स्टीवन रॉस के मुताबिक लॉस एंजेलेस के यहूदी समुदाय के नेताओं और 40 से ज़्यादा फ़िल्म स्टूडियो मालिकों ने अमरीका के पश्चिमी तट पर नाज़ी जासूसों की जासूसी और तोड़फोड़ की कोशिशों को रोकने के लिए बनाए गए कार्यक्रम के लिए रकम जुटाई. बेन उरवांड कहते हैं कि उन्होंने अपनी किताब में स्टूडियो मालिकों की नाज़ी विरोधी कोशिशों की बात की है लेकिन इससे उनकी खोज नहीं बदल जाती. वे कहते हैं एक लोकतंत्र में बिल्कुल सुरक्षित रह रहे यहूदियों की रक्षा के लिए लॉस एंजेलेस में एक छोटे से जासूसी गुट के लिए पैसा इकट्ठा करना और जर्मनी में यहूदियों को एक ही स्तर पर नहीं रखा जा सकता. मैंने किताब में लॉस एंजेलेस में हुई इन गतिविधियों की बात की है लेकिन बड़ी बात ये है कि इन लोगों ने नाज़ी सरकार का साथ दिया. टॉमस डोहर्टी कहते हैं कि स्टूडियो मालिकों का व्यवहार संदर्भ में रख कर देखना चाहिए. वे कहते हैं 1930 के दशक में नाज़ी हैवानियत का प्रतीक नहीं बने थे जैसा कि आज है. उस वक्त किसी को नहीं पता था कि ऐसा होगा. इसलिए मेरे हिसाब से नाज़ियों के साथ काम करने के लिए निर्माताओं की एक पूरी पीढ़ी की निंदा करना ग़ैर ऐतिहासिक है. लेकिन इसके जवाब में बेन उरवांड कहते हैं ये एक मिथक है कि जो कुछ हो रहा था उसके बारे में लोग नहीं जानते थे. इस बारे में कोई शक़ नहीं है कि स्टूडियो मालिकों को पता था कि जर्मनी में क्या चल रहा है. हॉलीवुड स्टूडियो के नाज़ियों के साथ स्प्ष्ट रिश्ते की सच्चाई तक पहुंचना आसान नहीं है. लेकिन ये भी पूरी तरह साफ़ नहीं है कि बेन उरवांड के आरोपों से उनके आलोचक इतने ख़फ़ा क्यों हैं. इसकी एक वजह ये हो सकती है कि लोग हॉलीवुड फ़िल्म कंपनियों को हिटलर के खिलाफ़ देखना पसंद करते हैं. बेन उरवांड कहते हैं जब हम हॉलीवुड और नाज़ियों के रिश्तों के बारे में सोचते हैं तब हम 1942 की फ़िल्म कैसाब्लैंका और ऐसी ही और फ़िल्मों के बारे में सोचते हैं जो अमरीकी संस्कृति में आज स्थापित हो चुकी हैं. ज़ाहिर है अगर लोगों को पता चले कि तीस के दशक में इससे एकदम अलग हालात थे तो वे हैरान होंगे. आलोचना के बावजूद बेन उरवांड अपने दावों पर क़ायम हैं. वे कहते हैं इस किताब में मैंने जो भी दावे किए हैं वे ऐतिहासिक दस्तावेज़ों पर आधारित हैं. मेरी किताब में हर बात प्रमाणित है. |
| DATE: 2013-10-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1329] TITLE: पहले यू-ट्यूब अवॉर्ड्स में होंगी लेडी गागा |
| CONTENT: यू-ट्यूब पहली बार म्यूज़िक अवॉर्ड्स आयोजित कर रहा है. यह एक ऐसा समारोह होगा जिसमें पिछले एक साल में हिट रहे गानों और कलाकारों को सम्मानित किया जाएगा. यू-ट्यूब के अधिकृत ब्लॉग के मुताबिक लेडी गागा एमीनेम और आर्केड फ़ायर कुछ उन कलाकारों में होंगे जो तीन नवंबर को न्यूयॉर्क में होने वाले इस समारोह में हिस्सा लेंगे. हिट रहे गानों और उनके गायकों के नामों का नामांकन उन वीडियो के आधार पर होगा जिन्हें पिछले एक साल में देखा और शेयर किया गया है. सोशल मीडिया पर इन नामांकनों को शेयर करके यू-ट्यूब के यूज़र्स से विजेताओं को चुनने को कहा जाएगा. नामों के चुनाव की घोषणा का समारोह 17 अक्टूबर को इंटरनेट पर लाइव दिखाया जाएगा. यू-ट्यूब का दावा है कि उसकी साइट पर हर महीने एक अरब नए यूज़र्स शामिल होते हैं. समारोह से पहले चुने गए नामितों के अधिकृत म्यूज़िक वीडियो कवर पैरॉडी कंसर्ट साक्षात्कार और फ़ैन वीडियो शेयर किए जाएंगे. रात को कलाकार और यू-ट्यूब के कुछ सबसे ज़्यादा लोकप्रिय कॉन्ट्रीब्यूटर जिनमें लिंडसे स्टर्लिंग और सीज़ा शामिल हैं दुनियाभर में संगीत समारोहों और परफ़ॉर्मेंस में हिस्सा लेंगे. न्यूयॉर्क में होने वाले लाइव समारोह के अलावा सोल मॉस्को लंदन रियो डी जनेरो में शो का आयोजन किया जाएगा. यू-ट्यूब म्यूज़िक अवॉर्ड्स की मेजबानी अमरीकी कलाकार जेसन श्वार्ज़मैन करेंगे. व्हेयर द वाइल्ड थिंग्स आर समेत कई वीडियो और डॉक्यूमेंट्री के निर्देशक स्पाइक जोंस इस समारोह के क्रिएटिव डायरेक्टर होंगे. |
| DATE: 2013-10-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1330] TITLE: लोग कहानी क्यों बता देते हैं? |
| CONTENT: कुछ लोगों का ये मानना है कि कुछ फ़िल्में जैसे द क्राइंग गेम हो या द सिक्स्थ सेंस इनके रोमांच भरे दृश्यों के बारे में बता देने में कुछ ग़लत नहीं है. अमरीकी सीरियल ब्रेकिंग बैड के प्रशंसक आखिरी एपिसोड की जानकारियों से बचते रहे क्योंकि वो इसे ख़ुद देखना चाहते थे. ऐसा ही कुछ ब्रितानी कॉमेडी सीरियल व्हाटएवर हैपंड टू द लाइकली लैड्स के मशहूर एपिसोड नो हाइडिंग प्लेस के मुख्य किरदारों के साथ होता है. इस एपिसोड में सीरियल के मुख्य किरदार एक पूरा दिन इंग्लैंड के फुटबॉल मैच का स्कोर जानने से बचते रहते हैं क्योंकि वे इस मैच की हाइलाइट अनजान रहते हुए देखना चाहते हैं. यहां बात सिर्फ़ फिल्म और टेलीविज़न की ही नहीं है. उपन्यासों के पीछे छपे सारांश को लेकर भी तलवार की धार पर चलना पड़ता है. आइन बैंक के उपन्यास वॉकिंग ऑन ग्लास के पीछे छपे सारांश में उपन्यास के एक अहम मोड़ की जानकारी दे दी गई थी. ज़्यादातर लोग जो फ़िल्म सीरियल या उपन्यास की कहानी बताना चाहते हैं वे इससे पहले कुछ इस तरह की बात कहते हैं फ़िक्र मत करो. ये कुछ ख़ास नहीं है. लेकिन ये अक्सर ख़ास होता है. साउथैम्पटन विश्वविद्यालय की प्रोफेसर लूसी मैज़डॉन कहती हैं कि फ़िल्म स्टूडियो की पढ़ाई करने वाले लोग फ़िल्म देखे बगैर उसके बारे में जानने को रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा समझते हैं. समाचार वेबसाइटों पर फ़िल्म की कहानी को लेकर चेतावनी लिखी होती है वहीं फ़िल्म स्टूडियो की पढ़ाई करने वाले समझते हैं कि उनके दोस्त हर शानदार फ़िल्म की कहानी जानते हैं. मैज़डॉन कहती हैं ये उन चीज़ों में से है जो शैक्षणिक कामों को फ़िल्म की आलोचना से अलग करती है. हमेशा की तरह सोशल मीडिया फ़िल्म और सीरियल की कहानी बता देने का सबसे बुरा स्रोत है. ब्रेकिंग बैड के प्रशंसकों के लिए तो एक ऐप लॉन्च किया गया था ताकि वे सीरियल की कहानी को लेकर आ रहे ट्वीट को न पढ़ सकें. ये बहस असल ज़िंदगी की चीज़ों तक भी फैल सकती है. जब साल 2001 में जूडिथ केप्पल हू वांट्स टू बी ए मिलियनियर में 10 लाख पाउंड जीतने वाली पहली प्रतियोगी बनीं तो पहले रिकॉर्ड किए गए इस शो का नतीजा मीडिया में लीक कर दिया गया था. ऐसे में शायद असली चेतावनी कुछ ऐसी होनी चाहिए कहानी के बारे में अहम जानकारी देना लोगों को बहुत नाराज़ कर सकता है. |
| DATE: 2013-10-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1331] TITLE: संजय दत्त को जेल से दो हफ़्ते की छुट्टी |
| CONTENT: अभिनेता संजय दत्त को दो हफ़्ते के लिए जेल से बाहर आने की इजाज़त मिल गई है. वो पुणे की येरवडा जेल से मुंबई स्थित अपने घर की ओर रवाना हो चुके हैं. ख़बरों के मुताबिक़ स्वास्थ्य संबंधी वजहों से संजय दत्त को ये अनुमति मिली है. संजय दत्त ने अगस्त महीने में ही सेहत संबंधी वजहों से एक महीने की छुट्टी की अर्ज़ी दी थी जिसे उस वक़्त नामंज़ूर कर दिया गया था. इसी वजह से वो राखी भी घर में नहीं मना पाए थे. फ़िलहाल संजय दत्त 1993 मुंबई ब्लास्ट से जुड़े एक मामले में 42 महीने की सज़ा काट रहे हैं. उन्होंने इसी साल मई में मुंबई के टाडा कोर्ट के समक्ष आत्म समर्पण किया था. बाद में उन्हें पुणे की येरवडा जेल में शिफ़्ट कर दिया गया था. इससे पहले पिछले सप्ताह जेल में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में संजय दत्त को हिस्सा लेना था लेकिन बाद में सुरक्षा वजहों से वो कार्यक्रम रद्द कर दिया गया. ये कार्यक्रम क़ैदियों और उनके परिवार वालों की बेहतरी के लिए फ़ंड इकट्ठा करने के उद्देश्य से आयोजित होना था. संजय के फ़िल्मी करियर की बात करें तो जेल जाने के बाद उनकी दो फ़िल्मों पुलिसगिरी और ज़ंजीर रिलीज़ हो चुकी हैं. लेकिन दोनों ही फ़िल्मों को नाकामयाबी झेलनी पड़ी. |
| DATE: 2013-10-01 |
| LABEL: entertainment |
| [1332] TITLE: आज की बॉलीवुड फ़िल्में वन नाइट स्टैंड की तरह: इरफ़ान |
| CONTENT: टोरांटो फ़िल्म फेस्टिवल में हिस्सा लेने पहुंचे अभिनेता इरफ़ान अपने प्रशंसकों के साथ. अभिनेता इरफ़ान बॉलीवुड के मौजूदा दौर से ज़रा भी ख़ुश नहीं है. बीबीसी एशियन नेटवर्क से बात करते हुए उन्होंने कहा आज की फ़िल्में वन नाइट स्टैंड की तरह हो गई हैं. आप उसे देखते हैं और भूल जाते हैं. मुझे इस तरह का सिनेमा ज़रा भी पसंद नहीं है. इरफ़ान की हालिया रिलीज़ फ़िल्म लंचबॉक्स है और इसे समीक्षकों की काफ़ी सराहना मिली है. ये फ़िल्म इस महीने होने वाले लंदन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में चुनी गई एकमात्र भारतीय फ़िल्म है. इरफ़ान के मुताबिक़ बॉलीवुड फ़िल्मकारों के पास कल्पनाशीलता की सख़्त कमी है. वो कहते हैं फ़िल्मों में गाने बिना किसी रचनात्मकता के इस्तेमाल किए जाते हैं. वो बोझ की तरह हो गए हैं. यही वजह है कि पश्चिमी देशों के दर्शक हमारी फ़िल्मों से जुड़ ही नहीं पाते. भारतीय सिनेमा ने इस साल 100 बरस पूरे कर लिए हैं लेकिन इरफ़ान के मुताबिक़ भारतीय सिनेमा 100 साल इसलिए पूरे कर पाया क्योंकि हमारे पास मनोरंजन का कोई और साधन नहीं है. हालांकि इरफ़ान बीते दौर की फ़िल्मों के मुरीद हैं. वो कहते हैं 50 और 60 के दशक में हमारी फ़िल्मों की एक विशिष्ट भाषा हुआ करती थी. गाने फ़िल्मों की मज़बूती हुआ करते थे. बड़े क्रिएटिव तरीक़े से उनका इस्तेमाल होता था. लेकिन अब वो बात नहीं. हम अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं. इरफ़ान मानते हैं कि पुराने भारतीय फ़िल्मकारों ने शानदार काम किया और उनकी फ़िल्में इसलिए सराही गईं क्योंकि वो विशुद्ध भारतीय हुआ करती थीं और उनमें जो मुद्दे उठाए जाते थे वो देश के लोगों से जुड़े होते थे. इरफ़ान कहते हैं मैं वैसी फ़िल्में करने की कोशिश करता हूं जिनका दर्शकों पर लंबे समय तक असर रहे. फ़िल्म देखने के बाद भी वो उनके ज़ेहन में ताज़ा रहे. लंचबॉक्स को तमाम तारीफ़ मिलने के बाद भी ये ऑस्कर पुरस्कारों की दौड़ में शामिल नहीं हो सकी. भारत की तरफ़ से गुजराती फ़िल्म द गुड रोड ऑस्कर के लिए भेजी जा रही है. वैसे इसे लेकर ख़ासा विवाद भी हुआ था और लंचबॉक्स के निर्देशक रितेश बत्रा ने बीबीसी से बात करते हुए इस बारे में नाराज़गी भी जताई थी. |
| DATE: 2013-10-01 |
| LABEL: entertainment |
| [1333] TITLE: लकड़ी की साइकिल से ओलंपिक का शानदार सफ़र |
| CONTENT: मध्य अफ़्रीक़ा के एक छोटे से देश रवांडा के बारे में जब भी बातें होती हैं तब या तो 1994 की जातीय हिंसा की याद आती है जिसमें लगभग आठ लाख लोग मारे गए थे या फिर रवांडा के ख़ूबसूरत पहाड़ों का ज़िक्र होता है. रवांडा के साइकिलिस्ट एड्रियन नियोनशुटी ने साल 2007 से पहले ओलंपिक के बारे में सुना भी नहीं था. लेकिन 2012 ओलंपिक में रवांडा की छह सदस्यों वाली टीम का प्रतिनिधित्व कर इतिहास रच दिया. 25 वर्षीय एड्रियन ने लंदन ओलम्पिक में एकल साइकिलिंग रेस में भाग लिया और उसे पूरा कर रेस में 39 वां स्थान हासिल किया. इसके बाद उन्हें खूब सराहना मिली. साइकिलिंग टीम के गठन की कहानी भी काफ़ी दिलचस्प है. अमरीका के टॉम रिचे एक सफल बाइक डिजाइनर थे. लेकिन अपने ब्रेकअप के बाद वह परेशान थे. इसी दौरान वह दो हफ्तों के एक बाइक टूर के सिलसिले में रवांडा गए. बस यहीं से जन्म हुआ रवांडा की वुडन बाइक क्लासिक रेस का जिसने टॉम और एड्रियन दोनों की जिन्दगी बदल दी. रवांडा के स्थानीय लोगों द्वारा चलायी जाने वाली लकड़ी की साइकिलों ने टॉम को इस रेस की शुरुआत करने की प्रेरणा दी. इस रेस में अमरीका के बहुत से प्रतिभागियों को पछाड़कर रवांडा के एड्रियन ने रेस में पहला स्थान हासिल कर जीत दर्ज की. लकड़ी की बनी इन साइकिलों को रवांडा में हर तरह के कामों में भारी-भरकम सामान ले जाने में भी इस्तेमाल किया जाता है. इसके बाद टॉम ने रवांडा की राष्ट्रीय टीम का गठन किया और टीम को प्रशिक्षित करने के लिये अमरीका से साइकिलिंग कोच जोनाथन बोयर पूर्व अमरीकी साइकिलिस्ट को भी बुलवाया. एड्रियन भी टीम में बतौर सदस्य शामिल थे. 16 साल की उम्र में साइकिलिंग की शुरुआत करने वाले एड्रियन ने बीबीसी को दिये एक साक्षात्कार में कहा ओलंपिक में अपने देश का प्रतिनिधित्व करना मेरे लिए बहुत गर्व की बात थी यह एक सुखद अनुभव था. एड्रियन ने पांच साल तक टूर द रवांडा रेस में टॉप टेन में जगह हासिल की. जबकि 2006 और 2010 में उन्होंने इस साइकिलिंग रेस को जीत पहला स्थान हासिल किया. 2010 और 2011 में वह रवांडा के नेशनल रोड रेस चैंपियन भी रह चुके हैं. एड्रियन के मुताबिक रवांडा की इन लकड़ी का साइकिलों की रेस होना बहुत ही सुखद था. इस तरह की कोई रेस पहली बार रवांडा में आयोजित हो रही थी. 1994 में रवांडा में हुए संहार में एड्रियन ने अपने छः भाइयों को खो दिया था. इस बारे में पूछने पर एड्रियन का कहते हैं मेरे लिये अपने भाइयों को खोना बहुत दर्दनाक था ओलम्पिक में रेस के वक्त मुझे अपने भाइयों के अपने साथ न होने की कमी बहुत महसूस हुई. लेकिन वे हमेशा मेरे प्रेरणास्रोत रहे हैं. एड्रियन के मुताबिक लंदन ओलम्पिक का टिकट मिलना उनके परिवार के लिए गौरव की बात थी. एड्रियन रवांडा में पढ़ाई बिजनेस क्षेत्र में तरक्की चाहते हैं और रवांडा को विकसित होते देखना चाहते हैं. एड्रियन बचपन में फुटबॉल खेलते थे लेकिन शुरुआन से ही वह एक साइकिलिस्ट बनना चाहते थे. |
| DATE: 2013-09-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1334] TITLE: बड़े-बड़े हीरो महमूद से डरते थे: जूनियर महमूद |
| CONTENT: महमूद अली अपने ज़माने के मशहूर अभिनेता थे जिन्हें किंग ऑफ़ कॉमेडी का ख़िताब दिया गया. उनका जन्म 29 सितंबर 1932 में हुआ था. उन्होंने बहुत सी फिल्मों में काम किया. उनकी यादगार फ़िल्मों में कुछ हैं- भूत बंगला पड़ोसन बॉम्बे टू गोवा गुमनाम कुँवारा बाप. उन्होंने लगभग सभी अभिनेता और अभिनेत्रियों के साथ काम किया. उन्होंने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत फिल्म सीआईडी से की. महमूद ने कई हास्य कलाकारों को फिल्मों में काम करने का मौका दिया. उनमें से एक हैं जूनियर महमूद. उन्होंने पांच साल की उम्र में ही जूनियर महमूद को अपना शिष्य बना लिया था. जूनियर महमूद कहते हैं महमूद बहुत ही अच्छे स्वाभाव के आदमी थे. वे अपने काम के लिए जाने जाते थे उन्होंने अपनी ज़िंदगी में बहुत कुछ सहा. महमूद ने जूनियर महमूद को अपना नाम और पहचान दी. जूनियर महमूद बताते हैं कि किस तरह उस ज़माने के बड़े-बड़े अभिनेता महमूद से डरा करते थे. जूनियर महमूद कहते हैं उस वक़्त महमूद बहुत बड़ा नाम था. वो एक ऐसे एक्टर थे जो दर्शकों को अपनी एक्टिंग से खूब हँसाते थे और खूब रुलाते भी थे. उनके डायलॉग सुनकर अच्छे से अच्छे अभिनेता के भी पसीने छूट जाते थे. वो जब भी फिल्म का कोई शॉट देते किसी को पता नहीं रहता था कि वो अब क्या बोल देंगे और कैसे करेंगे. वो सब कुछ अपने तरीके और स्टाइल से करते थे. यहाँ तक कि महमूद को भी नहीं पता होता था कि वो सीन में क्या करेंगे. जब शूट ख़त्म होता तो महमूद के लिए जमकर तालियां बजाईं जाती थीं. महमूद अकेले ऐसे हास्य कलाकार थे जिनकी तस्वीर फ़िल्मी पोस्टर में हीरो के साथ रहा करती थी. फ़िल्म में कितना भी बड़ा हीरो क्यों न हो दर्शक सिनेमाघरों में महमूद को देखने जाया करते थे. डायरेक्टर को यह बात अच्छी तरह पता होती थी कि अगर उसे अपनी पिक्चर हिट करनी है तो उसे महमूद को अपनी फ़िल्म में लेना होगा. इसलिए कई फ़िल्मों में महमूद को काम मिला. जूनियर महमूद ने बताया हैरानी की बात यह थी कि उन्हें किसी ने कभी रिहर्सल करते नहीं देखा. वो जो भी करते थे फिल्मों में लाइव किया करते थे. यही वजह थी कि हीरो उनसे बहुत डरते थे. इतना ही नहीं उनकी पर्सनेलिटी ऐसी थी कि वो जब भी सेट पर खड़े हो जाते हीरो अपनी शर्ट के बटन बंद कर लिया करते थे. जूनियर महमूद के मुताबिक़ उस वक़्त महमूद को हीरो से ज़्यादा पैसे मिला करते थे. यह बात कई हीरो को पसंद नहीं थी. इसलिए वो यही कोशिश करते थे कि उनकी फिल्मों में निर्देशक और निर्माता महमूद को न लें. मगर ऐसा बहुत कम हुआ. जूनियर महमूद बताते हैं कि महमूद ने सिर्फ़ हास्य कलाकार का रोल नहीं किया. उनकी सबसे यादगार फ़िल्म थी कुँवारा बाप जिसमें उनकी असल ज़िंदगी की कहानी थी. उनका बेटा मकदूम अली जिन्हें सब प्यार से मिक्की अली बोलते थे. वो पोलियो के शिकार हो गए. महमूद ने उनके इलाज के लिए क्या कुछ नहीं किया. उन्हें विदेश ले गए काफी पैसा खर्च किया लेकिन फिर भी वो ठीक नहीं हो पाए तो उन्होंने अपना दुःख अपनी इस फ़िल्म में दिखाया. यहाँ फ़िल्म बनाने का उनका सिर्फ़ एक ही उद्देश्य था कि उन जैसा अमीर आदमी भी अपने बेटे का इलाज करवाने के लिए मजबूर है लेकिन उस ग़रीब बाप का क्या जिसके पास पैसे ही नहीं होते इलाज के लिए. इसलिए इन्होंने इस फिल्म में एक रिक्शे वाले का किरदार निभाया और ख़ुद उनके बेटे जिनकी उम्र लगभग 15 साल की होगी उन्होंने भी अपने पिता के साथ काम किया और अपनी फ़िल्म के ज़रिए लोगों को पोलियो जैसी बीमारी से जागरूक करवाया. महमूद कई परिवार वालों की चोरी-छिपे मदद भी खूब किया करते थे. जिसे भी पैसों की ज़रूरत होती थी उनके घर पैसे भिजवाते थे. महमूद के क़रीबी और आख़िरी वक़्त में भी उनके साथ रहने वाले हास्य कलाकार बीरबल कहते हैं उनकी और महमूद की सबसे पहली मुलाक़ात फ़िल्म बॉम्बे टू गोवा में हुई थी. उन्होंने मुझे अपनी फ़िल्म में काम दिया था. वहीं से जो साथ काम करने सिलसिला शुरू हुआ फिर बढ़ता ही गया. मैंने उनके साथ कई फिल्मों में काम किया. वे फ़िल्मो में अपने कई दृश्य ख़ुद ही लिखा करते थे. मैंने महमूद जी के साथ एक फिल्म में काम किया था जिसका नाम था मैं सुंदर हूँ . उस फिल्म के हीरो विश्वजीत जी थे लेकिन उन्हें उस फिल्म में काम करने के लिए मिली थे दो लाख और महमूद जी को मिले थे आठ लाख. और तो और फिल्म हमजोली में जीतेंद्र जी थे हीरो लेकिन फिर भी महमूद जी को उनसे ज्यादा पैसे मिले. बीरबल जी कहते हैं महमूद जी से अच्छे- अच्छे अभिनेता भी डरा करते थे लेकिन खुद महमूद जी किशोर कुमार से डरा करते थे. मैंने एक बार उनसे पूछ था कि आप को किस अभिनेता की एक्टिंग से डर लगता है तो उन्होंने कहा कि मैं सभी अभिनेताओं की सीमा जानता हूँ कि कौन कितने पानी में है लेकिन किशोर कुमार का पता लगाना थोड़ा मुश्किल है. वो कभी भी कुछ भी कर जाते हैं अपने किरदार के साथ. फिल्म पड़ोसन में महमूद जी प्रोडूसर भी थे. उन्होंने किशोर कुमार और सुनील दत्त के साथ काम किया और वो फिल्म अपने आप में ही बहुत बड़ी सफल फिल्म रही. बीरबल कहते हैं महमूद जी के अच्छे दोस्तों में धर्मेन्द्र जीतेंद्र संजीव कुमार विश्वजीत विनोद महरा विनोद खन्ना थे इन्होंने उनके साथ एक साथ काम भी खूब किया. लेकिन दिलीप कुमार और राज कपूर के कभी इतने करीब नहीं आये और ना ही कभी ज्यादा मेल जोल बढ़ाया. न के बराबर काम किया उन्होंने दिलीप कुमार और राज कपूर के साथ. शम्मी कपूर ने महमूद जी के साथ फिल्म तुमसा नहीं देखा में काम किया था. लेकिन उसके बाद महमूद जी के साथ शम्मी कपूर ने कभी काम नहीं किया. और जब भी उन्हें अपनी फिल्मो में किसी हास्य कलाकार की ज़रूरत हुई उन्होंने राजेंद्र जी को लिया महमूद जी को नहीं. बीरबल ने बताया महमूद ने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा. उन्होंने सबकी मदद की. यही नहीं उन्होंने कई लोगों को मौका भी दिया. आरडी बर्मन को भी उन्होंने ही फ़िल्मों में काम करने का मौका दिया. अमिताभ बच्चन की मुलाक़ात महमूद के भाई अनवर अली ने महमूद से करवाई थी. अमिताभ शुरुआती दिनों में जब संघर्ष कर रहे थे तो महमूद ने ही उन्हें लंबे समय तक अपने घर पर आसरा दिया. इतना ही नहीं उन्हें अपनी फ़िल्म बॉम्बे टू गोवा में लीड हीरो के तौर पर काम दिया. उस फ़िल्म के दौरान महमूद और अरुणा ईरानी का रोमांस भी चल रहा था. इसलिए अमिताभ बच्चन हीरोइन अरुणा ईरानी का हाथ पकड़ने में बहुत शरमाते थे. महमूद ने अमिताभ बच्चन को समझाया और कहा कि अच्छे से काम करो किसी चीज़ के बारे में मत सोचो. बॉम्बे टू गोवा के सफल होने के बाद अमिताभ बच्चन को ज़ंजीर मिली. बीरबल कहते हैं मैं महमूद के आख़िरी दिनों तक उनसे मिलता रहा. आख़िरी दिनों में भी वो काम के प्रति अपना लगाव दिखाते रहे. बीमार होने के बावजूद भी स्टेज शो और फ़िल्मों में अपनी रुचि दिखाते थे. वो हमेशा कहा करते थे कि ज़िन्दगी गमों का एक सागर है तैरकर जाना है. चाहे कुछ भी हो जाए हर हाल में मुस्कराते रहो. |
| DATE: 2013-09-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1335] TITLE: 25 साल की हुईं बेवॉच की जलपरियाँ |
| CONTENT: भारत में सेटेलाइट टेलीविजन की शुरुआत होने के साथ ही छोटे पर्दे पर बेवॉच की इठलाती बलखाती जलपरियों को देखकर आम भारतीयों के दिलों की धड़कनें बढ़ गई थीं. दुनिया भर में सबसे ज्यादा देखे जाने वाले टीवी शो बेवॉच ने अपने प्रसारण के 25 साल पूरे कर लिए हैं. बेवॉच का पहला एपिसोड 22 सितंबर 1989 को प्रसारित हुआ था और जल्द ही इस शो का प्रसारण 148 देशों में और 44 भाषाओं में किया जाने लगा. लेकिन कामयाबी के हर सफर की तरह बेवॉच का सफर भी आसान नहीं था. इस टीवी शो के कार्यकारी निर्माता माइकेल बर्क ने बीबीसी के साथ एक खास बातचीत में बताया कि हम लोग बीच पर गए और यह जानने की कोशिश की कि हम कैसा शो तैयार कर सकते हैं. वह आगे कहते हैं हमने देखा कि नाव पानी को चीरती हुई आ जा रही है. तटों पर लाइफगार्ड्स अपने टावर से निगरानी कर रहे हैं और गश्त लगा रहे हैं. वो लोगों को बचा रहे हैं. अमरीकी लोग चारों ओर से घेरा बनाकर अपने नायकों को देख रहे हैं. जिंदगी और मौत के हालात. आखिर इससे पहले किसी का इस ओर ध्यान क्यों नहीं गया. इस तरह बेवॉच की शुरुआत हुई. यह शो कैलीफ़ोर्निया के समुद्र तटों पर गश्त लगाने वाले लॉस एंजेल्स काउंटी लाइफगार्ड्स के बारे में था. माइकल बर्क और डगलस श्वार्ट्ज ने इन लाइफ गार्ड्स को केन्द्र में रखकर पहले एक टीवी फिल्म तैयार करने का फैसला किया. माइकल बर्क बताते हैं कि लाइफ गार्ड्स के बचाव कार्य लगभग एक ही तरह के होते हैं इसलिए हमने इस शो के लिए एक म्यूजिक वीडियो तैयार करने का फैसला किया. इसमें लाइफ गार्ड्स के एक्शन के दृश्य थे. समुद्र तट के लोग थे और इस सब दृश्यों को एक थीम सांग से साथ जोड़ दिया. बीच वीडियो के आधार पर एक टेली फिल्म तैयार की गई जिसका नाम बेवॉच पैनिक एट मालीबू पियर था. इसके लिए कलाकार के तौर पर शॉन वेदरले और पार्कर स्टीवेंशन को चुना गया. इसे टीवी चैनल एनबीसी पर प्रसारित किया गया और यह उस सप्ताह सर्वाधिक रेटिंग वाली टीवी मूवी थी. इसके बाद टीवी फिल्म के आधार पर सीरियल तैयार करने का निर्णय लिया गया. पहला बेवॉच सीरियल 22 सितंबर 1989 को प्रसारित हुआ. इसकी लोकप्रियता काफी अधिक थी लेकिन इसकी राह में कुछ बाधाएं भी आईं. माइकल बताते हैं कि कुछ मतभेदों के चलते एनबीसी ने एक सत्र के बाद बेवॉच का प्रसारण रोकने का फैसला किया. लेकिन इस सीरियल के निर्माता माइकल बर्क और डगलस श्वार्ट्ज को भरोसा था कि उनके आइडिया में काफी दम है. उन्होंने सभी स्टूडियो से संपर्क किया और आखिरकार किसी स्टूडियो का सहारा नहीं मिलने पर उन्होंने अकेले ही आगे बढ़ने का फैसला किया. माइकल बर्क बताते हैं कि मैंने और मेरे पार्टनर ने बेवॉच के अधिकार वापस 10 डॉलर में खरीद लिए और खुद इसका निर्माण करने का फैसला किया. नए सत्र में पामेला एंडरसन और डेविड शेवरले थे और एक साल के अंदर यह दुनिया का सबसे अधिक लोकप्रिय शो बन गया. किसी स्टूडियो का हस्तेक्षप नहीं होने के कारण टीम अपने विचारों पर काम करने के लिए स्वतंत्र थी. माइकेल के मुताबिक हमने वो किया जो हम करना चाहते थे. इस दौरान बेवॉच में उड़नतस्तरी की घटना पानी के भीतर हवाई जहाज की दुर्घटना भूकंप और शार्क के हमलों से लेकर सीरियल कीलर को दिखाया गया. इस शो में ऐसी विषम परिस्थितियों में लोगों की जान बचाने के दृश्य आम थे. दूसरे साल इस शो का नाम दुनिया में सबसे अधिक देखे गए टीवी शो के रूप में गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल हो गया. एक पत्रिका ने इसे दुनिया का पहला शो बताया जिसे एक अरब लोग देखते थे. माइकल के मुताबिक अमेजन के जंगलों में लोग जेनरेटर के जरिए बेवॉच देखते थे. दूसरी ओर कई अरब देशों में बेवॉच पर प्रतिबंध भी लगाए गए. उन्होंने बताया कि हमने बेवॉच की लोकप्रियता के कारणों को जानने के लिए कई अध्ययन कराए. ज्यादातर लोगों ने कहा कि उन्हें नीले आकाश समुद्र और कैलीफोर्निया की जीवन शैली काफी पसंद है. इस शो के एक जाने पहचाने दृश्य में लाइफ गार्ड्स स्लो मोशन में दौड़ते हुए दिखाई देते थे. इस बारे में माइकेल बर्क बताते हैं कि उनका एक साथी ओलंपिक की शूटिंग करके लौटा ही था और उसने ही यह आइडिया दिया. उन्होंने आगे बताया कि हमने अपने पहले वीडियो में ऐसा किया. हमने एथलेटिक भावना के लिए लाइफ गार्ड्स को समुद्र तट पर दौड़ते हुए दिखाया लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा था कि जब महिलाएं स्लो मोशन में दौड़ेंगी तो यह इस शो की एक विशिष्ट पहचान बन जाएगा. वह बताते हैं कि हमने कभी भी इस शो की सेक्स अपील पर जोर नहीं दिया. हम केवल अच्छी कहानियों पर फोकस कर रहे थे. यही वजह है कि यह कार्यक्रम इतने समय तक प्रसारित होता रहा. बेवॉच का कथानक आमतौर पर समुद्र तट पर मौजूद जोखिमों और कैलीफोर्निया की समुद्र तटीय जीवन शैली की अन्य गतिविधियों से जुड़ा हुआ था. |
| DATE: 2013-09-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1336] TITLE: शहद की धार की तरह है लता दीदी की आवाज: अमिताभ बच्चन |
| CONTENT: पार्श्व गायिका लता मंगेशकर अब फ़िल्मों में गाना लगभग बंद कर चुकी हैं. मुंबई में वो अपने परिवार के साथ वक़्त बिताती हैं लेकिन 28 सितंबर को उनके जन्मदिन पर पूरी दुनिया में फैले उनके प्रशंसक और बॉलीवुड बिरादरी उन्हें याद करना नहीं भूलती. अभिनेता अमिताभ बच्चन लता मंगेशकर को बधाई देते हुए कहते हैं मैं ही क्या पूरी दुनिया दिल से दुआ करती है कि लता दीदी चिरायु रहें. युगों-युगों तक अपने संगीत से हमें धन्य करती रहें. एक बार मैंने अपने पिताजी से पूछा कि लता दीदी के बारे में आपकी क्या राय है. तो वो बोले कि उनकी आवाज़ शहद की लहर की तरह है जो कभी टूटती नहीं. यूं तो लता मंगेशकर और उनकी बहन आशा भोसले के बीच हमेशा उनके प्रशंसक तुलना करते रहते हैं और अपनी अपनी पसंदीदा गायिका को बेहतर साबित करने की कोशिश करते हैं लेकिन बीबीसी से हुई एक ख़ास बातचीत में ख़ुद आशा भोसले ने माना था कि उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर उनसे कहीं बेहतर हैं. दोनों के बीच पहले मन-मुटाव की ख़बरें आती रहीं लेकिन इस साल मुंबई में हुए एक समारोह में दोनों बहनें खुलकर मिलीं. लता मंगेशकर ने ताउम्र शादी क्यों नहीं की उनके प्रशंसकों के ज़ेहन में ये सवाल कई बार आता है. बीबीसी से हुई एक ख़ास मुलाक़ात में लता मंगेशकर ने इसका जवाब दिया. वो बोलीं दरअसल घर के सभी सदस्यों की ज़िम्मेदारी मुझ पर थी. ऐसे में कई बार शादी का ख़्याल आता भी तो उस पर अमल नहीं कर सकती थी. बेहद कम उम्र में ही मैं काम करने लगी थी. बहुत ज़्यादा काम मेरे पास रहता था. सोचा कि पहले सभी छोटे भाई बहनों को व्यवस्थित कर दूं. फिर कुछ सोचा जाएगा. फिर बहन की शादी हो गई. बच्चे हो गए. तो उन्हें संभालने की ज़िम्मेदारी आ गई. और इस तरह से वक़्त निकलता चला गया. लता मंगेशकर ने 40 के दशक में अपने गायन करियर की शुरुआत की. उन्होंने शुरुआत में कुछ फ़िल्मों में अभिनय भी किया लेकिन उन्होंने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया कि अभिनय करना उन्हें ज़रा भी पसंद नहीं था. शुरुआती अभिनय करने के बाद उन्होंने ये क्षेत्र छोड़कर पूरी तरह से गायन में अपना ध्यान लगाया. यश चोपड़ा सरीखे कई फ़िल्मकारों ने उनसे अपनी तक़रीबन हर फ़िल्म में गाना गवाया. कभी-कभी दीवार त्रिशूल से लेकर साल 2003 में आई वीर-ज़ारा तक लता मंगेशकर ने यश चोपड़ा की सभी फ़िल्मों में गाना गाया. लता मंगेशकर अपने दौर के सभी संगीतकारों की चहेती रहीं. करियर की शुरुआत में कई लोगों को उनकी आवाज़ में 40 के दशक की सुपरस्टार गायिका नूरजहां की आवाज़ की झलक मिली. लेकिन साल 1949 में आई महल के गाने आएगा आने वाला ने सारे समीकरण ही पलट कर रख दिए. इस गाने में लता मंगेशकर ने अपना अलग स्टाइल अपनाया. मधुबाला पर फ़िल्माया गया ये गीत ऐतिहासिक हिट हुआ. लता मंगेशकर ने अपने 60 साल से भी ज़्यादा लंबे गायन करियर में नरगिस दत्त मीना कुमारी वहीदा रहमान साधना सायरा बानो से लेकर नए दौर की अभिनेत्रियों जैसे काजोल और रानी मुखर्जी तक के लिए गाने गाए. बीबीसी से एक ख़ास मुलाक़ात में लता मंगेशकर ने बताया कि गीतकार मज़रुह सुल्तानपुरी की पत्नी से उनकी ख़ासी अच्छी दोस्ती थी. इसके अलावा दिलीप कुमार उन्हें अपनी छोटी बहन मानते हैं. लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप का लिखा गीत ऐ मेरे वतन के लोगों 60 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के सामने गाया था और कहा जाता है कि ये गीत सुनकर उनकी आंखों में आंसू आ गए थे. |
| DATE: 2013-09-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1337] TITLE: भारतीय जूरी को ऑस्कर की समझ नहीं: रितेश बत्रा |
| CONTENT: भारत की ओर से ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भेजी जाने वाली फ़िल्मों को लेकर विवाद होना अब कोई नई बात नहीं रह गई. पिछले साल अगर लोगों ने बर्फ़ी पर ऊंगली उठाई तो इस साल कुछ लोग इस बात से ख़फ़ा हैं कि लंच बॉक्स के बजाए गुजराती फ़िल्म द गुड रोड को ऑस्कर के लिए भारत की आधिकारिक फ़िल्म के रुप में क्यों भेजा जा रहा है. बीबीसी ने बात की लंच बॉक्स के निर्देशक रितेश बत्रा से और पूछा कि क्या उनकी फ़िल्म लंच बॉक्स और ज्ञान कोरिया की फ़िल्म द गुड रोड के बीच छिड़ गई है एक जंग. रितेश कहते हैं जब भी कभी ऐसा कोई विवाद होता हैं तो फ़िल्मकारों को आगे कर दिया जाता है लेकिन वास्तव में यह सिस्टम की असफलता है. हमारी जूरी को इस बात की समझ ही नहीं है कि किस तरह की फ़िल्म को ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भेजा जाए. फ़िल्म में निम्रत कौर के अभिनय को खूब सराहा जा रहा है. बीबीसी से बात करते हुए रितेश कहते हैं लंच बॉक्स को ऑस्कर में भेजने की चर्चा हमने नहीं शुरू की थी. ये फ़िल्म टेलुराइड फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिखाई गई और फिर हम टोरंटो गए. वहां दर्शकों ने इस फ़िल्म को बहुत पसंद किया. अपनी बात को पूरा करते हुए वो कहते हैं इतना ही नहीं पिछले 21 सालों से ऑस्कर के पूर्वानुमान कर रहे जाने माने फ़िल्म समीक्षक स्कॉट फ़ाइनबर्ग ने कहा कि अगर भारत ऑस्कर में लंच बॉक्स को भेजता है तो यह विदेश फ़िल्मों की श्रेणी में अग्रणी रहेगी. टेलूराइड और टोरंटो फ़िल्म महोत्सव को रोड टू दि ऑस्कर कहा जाता है. हम तो ऑस्कर की इस रोड पर सही जा रहे थे. लेकिन देसी जूरी ने हमारी राह ही रोक दी. रितेश मानते हैं कि ऑस्कर के लिए नाम भेजने वाली कमेटी ने इन बातों पर विचार ही नहीं किया. और जूरी के इस क़दम से लंच बॉक्स का ही नहीं बल्कि दि गुड रोड का भी नुक़सान हुआ है. लंच बॉक्स का नुक़सान हुआ ये तो माना लेकिन दि गुड रोड का क्या नुक़सान हुआ है बीबीसी के इस सवाल का जवाब देते हुए रितेश कहते हैं ऑस्कर में फ़िल्म के लिए एक अभियान चलाना पड़ता हैं. हमारी फ़िल्म को सोनी पिक्चर्स ने ख़रीदा है और वो हमारे लिए ऑस्कर में अभियान चलाने के लिए भी तैयार थे. सोनी का रिकार्ड बहुत अच्छा रहा है. वो एक अमरीकी वितरक भी है. पिछले साल उन्होंने आमोर को प्रमोट किया था. आमोर ने ऑस्कर जीता. क्या एनएफ़डीसी द गुड रोड के लिए अभियान चलाएगारितेश कहते हैं कि उनकी फ़िल्म भारत के लिए ऑस्कर जीत सकती थी लेकिन उन्हें आगे नहीं जाने दिया. रितेश को जूरी से भले ही कितनी ही शिकायत क्यों न हो लेकिन वो ये बात स्वीकारते ज़रा नहीं हिचके कि ज्ञान कोरिया की फ़िल्म द गुड रोड एक बहुत ही अच्छी फ़िल्म है. लंच बॉक्स को समीक्षकों और दर्शकों दोनों का ही प्यार मिल रहा है. रितेश बत्रा ये मानते हैं कि भारत को ऑस्कर की ज़रूरत है. रितेश कि इस सोच के पीछे कोई ख़ास वजहइस सवाल का जवाब देते हुए रितेश कहते हैं कुछ लोग सोचते हैं कि हमें ऑस्कर जैसे किसी पुरस्कार की ज़रूरत नहीं है. लेकिन मुझे लगता है कि भारत को ऑस्कर की ज़रूरत इसलिए है ताकि हमारी फ़िल्मों के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार खुले. वो कहते हैं आर्जनटीना में बनने वाली फ़िल्मों के साथ ठीक यही हुआ. उनकी एक फ़िल्म ने जब ऑस्कर जीता तो उनकी फ़िल्में विश्व भर में जाने लगी. |
| DATE: 2013-09-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1338] TITLE: बाल कलाकार जो कभी थे सुपर स्टार |
| CONTENT: सुपर स्टार राजेश खन्ना की फ़िल्म हो या फिर शम्मी कपूर की या फिर अमिताभ बच्चन की. अमूमन इन सभी की फिल्मों में एक बात समान रहती थी. और वो बात थी इन फ़िल्मों के बाल कलाकार. हिंदी सिनेमा में एक वक़्त ऐसा भी था जब बाल कलाकारों के बिना फ़िल्में बनती ही नहीं थीं. बीते ज़माने के कुछ मशहूर बाल कलाकारों से की मुलाक़ात बीबीसी ने और जाना उनके सुनहरे दौर के बारे में. इस दौर का एक जाना माना नाम रहे जूनियर महमूद जिन्होंने 265 फ़िल्मों में बतौर बाल कलाकार काम किया. सुनिए जूनियर महमूद कि कहानी उन्हीं की ज़ुबानी. आजकल मैं टीवी सीरियल प्यार का दर्द है मैं शैंकी का करिदार निभा रही हूं. मैंने अपना फ़िल्मी सफ़र 1966 में शुरू किया. मैं सिर्फ सात साल का था. फ़िल्मों में काम करने के लिए मुझे कभी ऑडिशन नहीं देना पड़ा. एक दिन मैं पेशे से फोटोग्राफर अपने चचरे भाई के साथ जॉनी वॉकर की फ़िल्म कितना नाज़ुक है ये दिल के सेट पर पहुंच गया. जॉनी वॉकर कुछ बच्चों के साथ शूटिंग कर रहे थे. एक बच्चा बार बार अपने संवाद भूल रहा था. मुझे नहीं पता था कि मैं जहां खड़ा हूं उसके पास कुर्सी में बैठा इंसान निर्देशक है. अनजाने ही मेरे मुंह से निकल गया कि कितना आसान संवाद है फिर भी ये बच्चा नहीं बोल पा रहा है. मेरी ये बात निर्देशक ने सुन ली. उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं वो संवाद बोल सकता हूं. मैंने झट से हां बोल दिया. मुझे उस बच्चे के कपड़े पहनाए गए और फिर सीन के बाद 5 रुपए मिले. फिर नौनिहाल में मुझे संजीव कुमार के छोटे भाई का रोल मिला. उसके बाद मैंने जीतेंद्र के साथ सुहागरात की. मैं एक फ़िल्म में काम कर रहा था. इस फ़िल्म में महमूद साहब भी थे. एक दिन जब मैं सेट पर पहुंचा तो मुझे पता चला कि उस दिन महमूद साहब की बेटी का जन्मदिन था. महमूद जी ने हर किसी को बुलाया था सिवाए मेरे. मैं उनके पास जाकर बोला कि आपने मुझे क्यों नहीं बुलाया. मैं गरीब हूं इसलिए. इस बात पर वो झट बोले आ जाओ शाम को. मैं अपने पिता के साथ जब उनके घर गया तो दरबान ने मुझे अंदर नहीं जाने दिया. मैं बाहर ही खड़ा खड़ा रोने लगा. मेरा रोना सुनकर महमूद जी बाहर आए और मुझे अंदर ले गए. मैंने उस दिन महमूद जी के गाने काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं पर खूब डांस किया. बस उसी दिन से मेरा नाम जूनियर महमूद पड़ गया. नाम बदलने के बाद मैंने कुल मिलाकर 265 फ़िल्में कीं. मैंने अपने फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत 1960 में की जब मैं पांच साल की थी. पैसों की तंगी के कारण मुझे फ़िल्मों में आना पड़ा. मेरी पहली ही फ़िल्म चैरिटी मास्टर दिलीप कुमार के साथ थी लेकिन ये फ़िल्म कभी रिलीज़ ही नहीं हो पाई. फिर मुझे बिमल रॉय की फ़िल्म सुजाता में छोटी शशिकला का किरदार निभाने का मौका मिला. मैंने कुल 200 फ़िल्में कीं जिनमें सबसे यादगार थी कागज के फूल चौदहवीं का चाँद काबुलीवाला राम और श्याम ब्रहमचारी और दोस्ती. मुझे एक बाल कलाकार के रूप में सभी बड़े निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला. जब मैं बड़ी हुई तो मुझे बतौर अभिनेत्री कई फ़िल्मों के ऑफर आए. मुझे बॉबी में डिंपल कपाड़िया वाला रोल भी ऑफर हुआ. लेकिन उस वक्त मुझ पर डॉक्टर बनने का भूत सवार था. राज कपूर जी ने मेरी मां और मुझे बहुत समझाया. राज साहब ने तो यहां तक कहा कि वो मेरी छुट्टियों के दौरान शूटिंग करेंगे. लेकिन मेरी मां ने साफ़ इनकार कर दिया. मेरे दादा जी भी नहीं चाहते थे कि मैं बड़ी हो कर फ़िल्मों में काम करूं. बॉबी के बाद मुझे उपकार और जवानी दीवानी जैसी फ़िल्म के लिए भी ऑफर मिले. फ़िल्में छोड़ने के बाद मैं डॉक्टर भी नहीं बन पाई और मेरी मां ने मेरी शादी करा दी. मैं अपनी शादी से खुश थी फिर बच्चे हुए और उनकी परवरिश में लग गई. लेकिन आज भी उस बात का पछतावा है मुझे. दिल में एक कसक सी रह गई. काश उस वक़्त मैंने बॉबी कर ली होती. इन दिनों में कुछ टीवी शो कर रही हूं. बीच में मैंने 3 इडियट्स जैसी फ़िल्म में भी काम किया. इन दिनों सब लोग मुझे फरीदा दादी बुलाते हैं. आज की तारिख़ में अभिनय से मेरा दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है. मैं एक निजी बैंक में उपनिदेशक के पद पर काम कर रहा हूं. मुझे आज भी याद है कि बतौर बाल कलाकार मैं अपने वक्त का सबसे महंगा कलाकार था. मेरी सबसे पहली फ़िल्म थी 1976 में आई फ़िल्म फकीरा. मेरे बड़े भाई भी फ़िल्मों में काम करते थे. एक दिन मैं उनके साथ शूटिंग देखने चला गया. मुझ पर शशि कपूर की नज़र पड़ी. उन्होंने निर्देशक से कह कर मुझे फ़िल्म में काम दिला दिया. फकीरा में मैं शशि कपूर और शबाना आज़मी का बेटा बना हूं. शशि जी ने मेरा नाम कई निर्देशकों को दिया. मैंने क़ुली अमर अकबर एंथनी नसीब देश प्रेमी शक्ति जैसी फ़िल्मों में अमिताभ बच्चन के बचपन की भूमिका निभाई है. मैंने 300 फ़िल्में की हैं. इतना ही नहीं 15 अलग अलग भाषाओं में भी काम किया हैं. बड़े होकर मैंने फ़िल्में इसलिए नहीं कि क्योंकि मैं किसी के भाई या दोस्त का किरदार नहीं निभाना चाहता था. |
| DATE: 2013-09-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1339] TITLE: सुरों पर थिरकते संगीत का जिस्म |
| CONTENT: अलग अलग धुनों में बजता संगीत कैसा सुनाई देता है ये तो हम जानते हैं. पर क्या आपने कभी संगीत को देखा है अलग-अलग धुनों पर थिरकता मचलता शोर मचाता हुआजर्मन फोटोग्राफर मार्टिन क्लीमस ने संगीत के उस चेहरे को तलाशने की कोशिश की जो तेज़ बजते संगीत पर दिखाई देता है. इसी कोशिश में सामने आया उनका नया नवेला प्रोजेक्ट सोनिक. मार्टन क्लीमस ने एक खास प्रयोग किया. उन्होंने रंगों की कुछ बूंदें ली और स्पीकर पर रख दीं. फिर अलग अलग शैली के संगीत को काफी तेज आवाज में बजाया और इस तरह सामने आया संगीत का रंग रूप. देखिए इन तस्वीरों में उन रंगीलीं बूंदों का कमाल जो उठती गिरती हैं लय और ताल के साथ. आलेख स्टीफन डावलिंग. तस्वीरें मार्टिन क्लीमस जैसे ही स्पीकर पर बैंगनी गुलाबी और पीले रंगों की कुछ बूंदें डाली गई तो आवाज ने अपनी कारीगरी दिखानी शुरू कर दी रंग संगीत की धुन पर मस्ती से नाचने लगे. ये तस्वीर तब उभरी जब जैज़ संगीत के मशहूर गायक चार्ली पार्कर का मशहूर गीत ऑर्निथालजी बजा. ये रंग जैज़ संगीत की धुन पर थिरक रहे हैं. ड्राफ़्ट पंक फ़्रांस का इलेक्ट्रॉनिक म्यूज़िक बैंड है. इसमें दो संगीतकार मैनुएल जे और होमेम क्रिस्टो की जोड़ी है. यह बैंड 1990 के दशक में फ्रांस के हाउस मूवमेंट में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिए जाने के कारण काफी लोकप्रिय हुआ था. अराउंड द वर्ल्ड ड्राफ्ट पंक बैंड का गीत है. इस गीत में जैज़ शास्त्रीय संगीत रॉक एंड डांस सहित कई शैली के संगीत का इस्तेमाल हुआ है. यह अमरीकी रिकार्डिंग कलाकार प्रिंस का नौवां स्टूडियो एलबम है जिस पर रंगों की ये तस्वीर उभरती है. इस गीत को 1987 में रचा गया था. बेहद तेज़ बजते संगीत पर फूटते रंगों को कैमरे ने बेहद करीने से पकड़ा है. क्राफ़्टर्क पावर प्लांट 1970 के दशक में बना एक जर्मन इलेक्ट्रॉनिक बैंड है. हरा और पीला रंग क्राफ़्टर्क के ट्रांजिस्टर गीत की कंपन पर उछल-उछल कर आसमान की नई ऊंचाइयों को छूने को बेताब दिख रहा है. क्लीमस ने 2012 में दिए गए एक इंटरव्यू में कहा था न जाने कितने ही कलाकारों ने संगीत के लिए काम किया. मगर आज तक मुझे इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि संगीत आखिर दिखता कैसा है राइड ऑफ वलकैरीज जर्मन संगीतकार रिचर्ड वैगनर के मशहूर चार ओपेरा संगीतों में से दूसरे नंबर पर है. जर्मन कलाकार मार्टिन क्लीमस इस प्रोजेक्ट के जरिए दर्शकों को यह दिखाता है कि अलग अलग शैली या धुनों पर बजते संगीत आपस में कितने अलग दिखते हैं. टाईम रॉक बैंड पिंक फ्लोयड के 1973 में आए एलबम द डार्क साइड ऑफ द मून से लिया गया गीत है. यह गीत कहता है कि समय फिसलता जा रहा है मगर लोग जब तक इसे समझते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. आलोचकों से लेकर नामी गिरामी फोटोग्राफर हेरोल्ड इजर्टन तक ने क्लीमस की इन धड़कती मचलती और जीवंत तस्वीरों की तारीफ़ की है. जर्मन संगीतकार और वायलिन वादक अरगनिस्ट योहान सेबेस्टियन बाख ने डी माइनर के टेकट्टा और फुग्यू को रचा है. ड्यूसलडोर्फ के फोटोग्राफर क्लीमस ने पहले भी इस तरह की हाई-स्पीड फोटोग्राफरी की है. उन्होंने चीनी मिट्टी के बर्तनों के टूट कर चूर-चूर होने सिल्क स्कार्फ के खुल कर जमीन पर निढाल हो जाने की भी तस्वीरें खींची हैं. वेलवेट अंडरग्राउंड एण्ड निको अमरीकी रॉक बैंड द वेलवेट अंडरग्राउंड और निको का पहला साझा एलबम है. इस बैंड के गीत-संगीत का विषय ज्यादातर मादक पदार्थों का सेवन वेश्यावृत्ति शोषण कामुकता यौन विचलन आदि रहे हैं. रन रन रन एक गीत है. इसे वेलवेट अंडरग्राउंड एण्ड निको बैंड के एलबम से लिया गया है. क्लीमस के सोनिक का प्रदर्शन इस सप्ताह न्यूयार्क में शुरू होने जा रहा है. यह प्रदर्शनी 3 नवंबर तक चलेगी. |
| DATE: 2013-09-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1340] TITLE: कार जो 52 साल में बस 32 किलोमीटर चली |
| CONTENT: माना जाता है कि कार की असली मालकिन ने खरीदने के बाद अपने जीवन में इसे बिल्कुल भी नहीं चलाया. इसे एक संजीदा महिला मालकिन की एक क्लासिक कार के रूप में जाना जाता है. लेकिन ट्रायम्फ हेरॉल्ड की सबसे खास बात जो इसे औरों से अलग बनाती है वह है इसके द्वारा तय की गई दूरी. 52 वर्ष पहले फैक्टरी से ब्रांड न्यू निकलने के बाद इसने महज 32 किलोमीटर की दूरी तय की है. नीली और सफेद रंग की इस कार को डीलर ने खरीददार के घर ट्रेलर से पहुंचाई थी और इसमें 1961 का बना डिस्क अभी भी काम करता है. ईस्ट एंग्लियन मोटर ऑक्शन कम्पनी द्वारा इसे शनिवार को वाईमोंढम में नीलाम किया जा रहा है. ट्रियूम्फ की वास्तविक मालिकिन की मृत्यु के सालों बाद उनके परिवार ने उस डीलर को वापस बेच दिया जिससे यह खरीदी गई थी. नीलाम करने वाले ट्रिस्ट्रम बेलमूर-स्मिथ ने कहा जब डीलर कार को देखने गया तो उसे पता चला कि ब्रांड न्यू डिलीवर होने के बाद यह बिल्कुल भी नहीं चली थी. और उसने इसे अपने निजी कलेक्शन में शामिल करने का फ़ैसला किया. उन्होंने उम्मीद जताई कि ट्रायम्फ की नीलामी के दौरान इसकी कीमत 12 लाख रुपये से 15 लाख रुपये तक पहुंचेगी. |
| DATE: 2013-09-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1341] TITLE: क्या आप गंदे नायकों को अपना हीरो मानेंगे? |
| CONTENT: ब्रेकिंग बैड अमरीकी टेलीविज़न का ऐसा शो है जिसे बहुत से आलोचकों ने अब तक का सबसे महान शो बताया है और इसके सिर्फ़ दो एपिसोड अब एयर होने बाकी हैं. ब्रेकिंग बैड एक हाईस्कूल कैमिस्ट्री टीचर वॉल्टर व्हाइट के क्रियाकलापों की कहानी है. उसे जब पता चलता है कि उसे फेफड़े का कैंसर है तो वह बुरा बनने का फ़ैसला करता है और परिवार के लिए पैसा जुटाने की कोशिश में क्रिस्टल मीथेमफ़ेटामाइन बनाना शुरू करता है. क्रिस्टल मीथेमफ़ेटामाइन एक ख़ास किस्म की ड्रग है जो इंसान का मूड और उसका व्यवहार बदल सकती है. शो निर्माता विंस गिलीगन का कहना है कि उनकी योजना एक ऐसे शख़्स की कहानी सुनाने की थी जो मिस्टर चिप्स से स्कारफ़ेस में बदलता है. तो एक ड्रग डीलर हत्या के लिए उतारू सनकी नायक किरदार प्राइमटाइम अमरीकी टेलीविज़न शो पर आया कैसेएक शो जो वॉल्ट से ज़्यादा लोकप्रिय है अब नैतिकता के गर्त में गिर चुका है. मनोरंजन वेबसाइट सेलन के लेखक डेनियल डी अडारियो कहते हैं कि पिछले दो दशकों में टीवी के प्रमुख किरदार काफ़ी बदल चुके हैं. किरदार गंदे से गंदे होते गए हैं- आज इस तथ्य पर यक़ीन करना मुश्किल है कि एक वक़्त था कि टीवी सिरीज़ के नायक कमोबेश साफ़-सुथरे हीरो हुआ करते थे. यह ट्रैंड 1993 तक रहा जब पुलिस ड्राम एनवायपीडी ब्ल्यू सिरीज़ शुरू हुई. इस सिरीज़ को अमरीकन फ़ैमिली एसोसिएशन ने सॉफ़्ट-कोर पोर्न का दर्जा दिया. इसमें मुख्य नायक एंडी सीपोविज़ दारूबाज़ी व्यभिचार और बेवफ़ाई से जूझता दिखाई दिया था. फिर बदलाव क्यों टेलीविज़न किरदारों के चरित्र में नैतिक बदलाव को निश्चित तौर पर अमरीकी टीवी केबल नेटवर्कों के विस्तार से सहारा मिला है. इन नेटवर्कों ने प्रोग्राम निर्माताओं को ऐसे कंटेंट को बनाने की छूट दी जिसकी बहुत अपील नहीं थी और उन्हें वह सब कुछ दिखाने का मौक़ा दिया जिसकी इजाज़त नहीं थी. हफ़िंगटन पोस्ट की टीवी आलोचक मॉरीन रयान इन टीवी किरदारों के नैतिक चरित्र को इनके पूर्ववर्तियों के मुक़ाबले कमज़ोर पाती हैं. वह कहती हैं अब मुख्यधारा की कॉमेडी और ड्रामा के बीच लाइन खींचना काफ़ी मुश्किल है क्योंकि इसमें लचीलापन बहुत है. अगर ग़ैरक़ानूनी काम करने वालों के व्यवहार की कहानी रोचक है और किरदारों के कार्यकलाप किसी भी तरह न्यायोचित हैं तो एचबीओ शोटाइम एएमसी एफ़एक्स और दूसरे केबल नेटवर्क के मामले में तो यह रेखा कहीं भी हो सकती है. एचबीओ के द सोपरानोस में हीरो के खांचे को लगातार तोड़ने वाला किरदार टोनी सोपरानो मुख्य किरदार है. टोनी वो शख़्स है जिसे अपने परिवार की बेहद परवाह है पारंपरिक और आपराधिक दोनों और लगता है मानो वह अमरीकी इतिहास में जगह पाने को बेक़रार है. वह सिरीज़ के पायलट एपिसोड में पूछता है गैरी कूपर को क्या हुआ मज़बूत ख़ामोश इंसान. वह अमरीकी था. उसे अपनी भावनाओं का पता नहीं था. उसने वही किया जो वह करता. भले ही टोनी गैरी कूपर बनना चाहता हो पर असल में वह टीवी के नए अमरीकी एंटी हीरो का अवतार है एक इंसान जो अपने ही ग़ैरक़ानूनी तरीक़ों में उलझा है और अपने कामों को बड़ी अच्छाई के लिए ज़रूरी बताता है- चाहे वह बड़ी अच्छाई का काम सिर्फ़ उसके लिए ही क्यों न हो. मनोरंजन अख़बार द एवी क्लब की लेखक डोना बोमैन एंटी हीरो को कामयाबी की ज़रूरत से सराबोर और सुरक्षा पाने के लिए कुछ भी ख़तरनाक करने को तैयार शख़्स के बतौर देखती हैं. वह कहती हैं हम जानते हैं कि आज की स्थितियों में हम पूरी तरह साफ़-सुथरे नहीं हो सकते और यह सिर्फ़ बताता है कि हम जो चाहते हैं उसे पाने के लिए कितना और गिर सकते हैं. टोनी सोपरानो बेशक 911 के बाद के जटिल और मुश्किलों से घिरे अमरीका का किरदार हो पर इस शो को प्रेरणा लॉस एंजेलेस पुलिस के एक भ्रष्टाचार के मामले से मिली जो 1990 के दशक में हुआ था. इसमें दिखाया गया है कि एक इंसान जो चाहता है उसे हासिल करने के लिए कितना गिर सकता है. द शील्ड यूएस केबल चैनल एफ़एक्स पर 2002 में प्रसारित होना शुरू हुआ और इसमें मुख्य किरदार डिटेक्टिव विक मैकी को पेश किया गया था जिसका खुद के बारे में कहना है- एक अलग तरह का पुलिसकर्मी. सात सीज़न तक उसका व्यवहार उन अपराधियों से भी ख़राब था जिनका वह पीछा कर रहा था और इस पर भी लोगों को उस पर यक़ीन था. डेनियल डी अडारियो समझाते हैं एक टीवी शो वहां तक चलता है जब तक उसकी इजाज़त होती है. अगर इसमें कोई ढांचा नहीं है तो शो खुद को भ्रमित करने वाली स्थितियों में ढाल लेगा. टोनी सोपरानो से तुलना करें तो द शील्ड में मैकी को सुधरने के और भी कम मौक़े हासिल थे. मॉरीन रयान द सोपरानोस और द शील्ड को अपने समय के दो सबसे प्रभावशाली शो के बतौर देखती हैं. वह कहती हैं द शील्ड और द सोपरानोस से शुरू होने के कुछ साल बाद और जब इस बात की कम परवाह थी कि आप लोगों और उनके कामों को कैसे पेश करते हैं लगा मानो कोई बांध टूट गया हो. वह आगे कहती हैं निर्माताओं को न केवल मुश्किलभरे क्षेत्र में घुसने की इजाज़त दी गई थी बल्कि उन्हें बहुत से केबल नेटवर्कों से भी बढ़ावा मिला जो सभी ऐसे शो के ज़रिए अपनी पहचान बनाना चाहते थे जिन्हें ख़तरनाक और विध्वंसकारी माना जाता था. द सोपरानोस ने बेशक एंटी हीरो के किरदार की शुरुआत की लेकिन टोनी के अलावा इस बीच कई दूसरे किरदार आ गए हैं. 24 हाउस डैक्स्टर द वायर डेडवुड हाउस ऑफ़ कार्ड्स और मैडमैन जैसे शोज़ ने नायक के पारंपरिक स्वरूप को चुनौती दी और दिखाया कि आप किसी किरदार को कहां तक ले जा सकते हैं और कितनी देर तक दर्शक को उससे जोड़े रख सकते हैं. टोनी सोपरानो विक मैके और डॉन ड्रेपर सभी को उनके संदिग्ध व्यवहार के बावजूद उनके चाहने वाले मौजूद हैं. बोमैन का मानना है कि इस तरह के किरदारों को दर्शकों से जोड़ने के लिए हमें समझना होता है कि जो वो करते हैं तो क्यों करते हैं; उनके कार्यकलाप किसी परिस्थिति से जुड़े होने चाहिए जिसे हमें समझना होता है. तो वाल्टर व्हाइट और उसमें बदलाव कैसे आएगा शायद जब सिरीज़ ख़त्म होगी तभी हम पूरी तरह आंकलन कर पाएंगे कि वह टीवी के एंटी हीरो यानी अपराधियों की श्रेणी में कहां खड़ा है. मगर मौत और मुक्ति अगर उसकी गुंजाइश हो भी तो भी व्हाइट के अपराधों के असर को पांच साल में नहीं बदल पाया है. मॉरीन रयान इसे यूं कहती हैं कम ही शोज़ ऐसे हैं जिनके मुख्य किरदारों का साथ देने की आपकी इच्छा होगी चाहे उन्होंने कुछ भी किया हो. मगर अव्वल दर्जे के शो आपको याद दिलाते हैं कि नायक ऐसा नहीं कि आप उसका अनुसरण करें और ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि आप उनसे सहानुभूति कैसे रखेंगे. |
| DATE: 2013-09-23 |
| LABEL: entertainment |
| [1342] TITLE: दि गुड रोड ऑस्कर में भारत की दावेदार |
| CONTENT: गुजराती फ़िल्म दि गुड रोड को भारत की तरफ से सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फ़िल्म श्रेणी में ऑस्कर पुरस्कारों के लिए आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुना गया है. प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक गौतम घोष ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि फ़िल्म फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया द्वारा चुनी गई चयन समिति ने एकमत से इस फ़िल्म का चयन किया. गौतम घोष 16 सदस्यों वाली इस समिति के प्रमुख थे. उन्होंने कहा दि गुड रोड एक नई लेकिन चकित कर देने वाली फ़िल्म है. यह गुमशुदा बच्चे के माध्यम से अनदेखे भारत से हमारा परिचय कराती है. नवोदित निर्देशक ज्ञान कोरिया की यह फ़िल्म ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भेजी गई संभवतः पहली गुजराती फ़िल्म है. दि गुड रोड को इस साल का सर्वश्रेष्ठ गुजराती फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए आधिकारिक फ़िल्मों की दौड़ में कुल 21 फ़िल्मे थीं. लंचबॉक्स शिप ऑफ़ थीसियस भाग मिल्खा भाग इंग्लिश विंग्लिश विश्वरूपम जैसी हिन्दी फ़िल्मों के साथ ही मलयाली फ़िल्म सेल्युलॉयड और बांग्ला फ़िल्म शब्दो को ऑस्कर के लिए भेजे जाने की दौड़ में मुख्य दावेदार माना जा रहा था. गौतम घोष ने कहा लंचबॉक्स भी तगड़ी दावेदार थी. मुझे लंचबॉक्स बहुत पसंद आई. इरफ़ान और नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी अभिनीत लंचबॉक्स को इस बार भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए जाने का प्रमुख दावेदार माना जा रहा था. फ़िल्म फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया के महासचिव सुपर्ण सेन ने कहा 16 सदस्यों वाली चयन समिति ने भारतीय भाषाओं की विभिन्न फ़िल्मों में से ऑस्कर प्रविष्टि के लिए इस फ़िल्म का एकमत से चुनाव किया. यह फ़िल्म नेशनल फ़िल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन एनएफ़डीसी की सहायता से बनी है. इस फ़िल्म के साउंड डिज़ाइनर रसूल पूकुट्टी को 2009 में स्लमडॉग मिलेनियर के लिए सर्वश्रेष्ठ साउंड डिजाइनिंग का ऑस्कर मिल चुका है. यह फ़िल्म गुजरात में 19 जुलाई को रिलीज़ हुई थी. इस फ़िल्म में रेगिस्तान से गुजरने वाले हाईवे पर घटने वाली तीन समानांतर घटनाओं को कहानी का मुख्य कथानक बनाया गया है. एक ट्रक ड्राइवर एक मध्यवर्गीय परिवार और उनका बेटा तथा एक छोटी लड़की हाईवे पर एक साथ सफ़र कर रहे हैं. इस सफ़र के दौरान तीनों के अनपेक्षित घटनाएँ घटती हैं जिससे फ़िल्म की कहानी बनती है. इस फ़िल्म में सोनाली कुलकर्णी अजय गेही केवल कत्रोदिया शामजी धाना केरासिया प्रियंक उपाध्याय और पूनम केसर सिंह राजपूत ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं. |
| DATE: 2013-09-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1343] TITLE: सोनाली और सुमंत: ग़रीबी से ग्लैमर तक |
| CONTENT: सोनाली मजुमदार और महाराजू सुमंत की जो़ड़ी भले ही झलक दिखला जा के छठें सीज़न में विजेता न बन पाई हो लेकिन उन्होंने अपने डांस से जानी-मानी हस्तियों समेत सभी का दिल जीत लिया. नौ वर्षीय सोनाली और पंद्रह वर्षीय सुमंत की जोड़ी डांस टैलेंट हंट शो झलक दिखला जा में सेकेंड रनर अप रही है. इंडिया गॉट टैलेंट का ख़िताब ये जोड़ी पहले ही जीत चुकी है. सोनाली और सुमंत बेहतरीन डांसर हैं यह तो सब जानते हैं कि लेकिन अच्छा डांसर बनने के पीछे छुपी उनकी कड़ी मेहनत के बारे में कम लोग जानते हैं. झलक दिखला जा में सेकेंड रनर अप आने के बाद सोनाली ने कहा मेरे लिए यह सब किसी सपने से कम नहीं है. सोनाली का गाँव बकता कोलकाता से पाँच घंटे की दूरी पर बांग्लादेश सीमा के पास है. वो कहती हैं इस छोटे से गाँव में न तो बिजली की सुविधा थी और न ही अच्छे स्कूल की. हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी. अपने परिवार के बारे में सोनाली कहती हैं मेरे पिता किसान हैं और प्रतिदिन वो 80 रुपए कमाते थे और मेरी माँ हमारा घर पर ही रह कर ध्यान रखती थीं. हमारे पास ढंग का घर भी नहीं था मिट्टी के घर में रहते थे. मुझे डांस करने का शौक बचपन से ही था. मेरे पिताजी के पास इतने पैसे नहीं थे की मुझे अच्छे डांसिंग स्कूल में डाल सकें. जब कभी भी गाँव में बिजली रहती थी तो मैं अपनी छोटी सी टीवी में माधुरी दीक्षित का डांस देखती थी और उससे सीखने की कोशिश करती थी. सोनाली बताती हैं मेरे गाँव में एक भैया थे जो डांस सीखने के लिए बिवास सर के पास जाया करते थे. मैंने उनसे कहा कि एक बार मुझे भी ले चलो. पहले तो बिवास सर मुझे डांस ट्रेनिंग देने के लिए नहीं तैयार नहीं हुए. उन्होंने मेरे ऑडिशन लिया. मैं अच्छा डांस कर सकती हूँ ये देखकर उन्होंने मुझे अपने डांसिंग स्कूल में भर्ती कर लिया. बिवास सर ने फीस के तौर पर मुझसे एक भी पैसा नहीं लिया. सोनाली ही की तरह सुमंत भी एक साधारण परिवार से आते हैं. उनके पिता चतुर्थ श्रेणी के रेलवे कर्मचारी हैं. अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में सुमंत बताते हैं मेरे माता-पिता के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि मुझे अच्छे से स्कूल में डाल सकें. उनके पास मुझे ऑडिशन देने के लिए एक शहर से दूसरे शहर भेजने के लिए भी पैसे नहीं थे. हमारे पास घर नहीं था हम रेलवे के दिए हुए घर में रहते थे. सुमंत कहते हैं मैं बिवास सर के पास आया और अपना ऑडिशन दिया. मेरा डांस देख उन्होंने मुझे अपने डांसिंग स्कूल में एडमिशन दे दिया. सुमंत कहते हैं हमने कभी नहीं सोचा था की मुंबई आने के बाद हमारी ज़िन्दगी इस कदर बदल जाएगी. हमने बहुत मेहनत की और दर्शकों ने हमें इंडिया गॉट टैलेंट का खिताब जिता दिया. इसके बाद तो हमने कभी पीछे मुड कर ही नहीं देखा. सोनाली बताती हैं मेरे माता-पिता को मेरा जीतना एक सपने जैसे लगा. हमने कभी नहीं सोचा था की हम जैसे बच्चे भी कुछ कर पायेंगे. जब मैं जीती तो मेरे माता-पिता की आँखों से ख़ुशी के आंसू निकल गए. इंडिया गॉट टैलेंट में जीतने के बाद सोनाली और सुमंत वापस कोलकाता चले गए. सुमंत बताते हैं 8 महीने बाद हमें बिवास सर का फ़ोन आया. उन्होंने हमें बताया कि हमें झलका दिखला जा सीज़न-6 में भाग लेना है. ये सुन कर हम दोनों बहुत खुश हुए. झलका दिखला जा एक सेलिब्रिटी डांस शो है जहाँ जानी मानी हस्तियाँ भाग लेती हैं. हम लोग तो बस एक डांसर हैं लेकिन हम जैसे लोगों को मौका मिला ये हमारा सौभाग्य है. झलक दिखला जा के लिए सुमंत और सोनाली ने जबरदस्त मेहनत की. सुमंत कहते हैं सोनाली और मैं 6 से 8 घंटे डांस की प्रैक्टिस करते हैं और 4 घंटे पढ़ते हैं. हम जानते हैं कि शिक्षा बहुत जरूरी है इसलिए मैंने और सोनाली ने प्राइवेट ट्यूशन लेना शुरू कर दिया है. हमें लगातार स्कूल जाने की जरूरत नहीं पड़ती. साल में 2 बार परीक्षा देनी पड़ती है. मैं दसवीं में पढ़ता हूँ और सोनाली पाँचवी में. सोनाली और सुमंत कहते हैं कि झलक दिखला जा में वे कई जानी-मानी हस्तियों से मिले कई हीरो हीरोइनों से भी मिले. इन लोगों से मिलना उनके लिए किसी खूबसूरत सपने से कम नहीं था. सुमंत बताते हैं कि इस शो के जरिए वो सलमान खान ऋतिक रोशन शाहरुख़ खान जैसे कई कलाकारों से मिले. सुमंत कहते हैं मुझे कोई भी हीरोइन अच्छी नहीं लगी. हीरो में मैं सलमान खान और हृतिक रोशन का डांस और स्टाइल कॉपी करने का कोशिश करता हूँ वहीं सोनाली कहती हैं बड़ी होकर मैं माधुरी दीक्षित जैसी बड़ी डांसर बनना चहती हूँ और डांस करते वक़्त चेहरे पर उनके जैसे ही एक्सप्रेशन लाना चाहती हूँ. झलक दिखला जा सीज़न-6 न जीतने का सोनाली और सुमंत को बहुत दुःख हुआ. हारने के बाद वो रोए भी. सोनाली कहती हैं झलक दिखला जा सीज़न-6 से हमें एक अच्छा प्लेटफार्म और चांस मिला और अब हम और मेहनत करना चाहेंगे. हम वर्ल्ड फेमस डांसर बनना चाहते हैं. हम इंटरनेशनल लेवल पर डांस करने के लिए बाहर जाकर हम अपने देश का नाम रोशन करना चाहते हैं. |
| DATE: 2013-09-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1344] TITLE: हम दोनों भाई माफ़िया हैं: अभिनव कश्यप |
| CONTENT: दोनों ताल्लुक़ रखते हैं एक ही परिवार से दोनों की कर्मभूमि है फ़िल्म उद्योग लेकिन अंदाज़ एक दूसरे से बिल्कुल जुदा. अनुराग कश्यप जहां हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में सिक्का जमा चुके है वही उनके छोटे भाई अभिनव कश्यप की कोशिश जारी है. जब उनसे पूछा गया कि क्या वो कभी अनुराग के स्टाइल की फ़िल्में बनाएँगे तो उनका कहना था जब अनुराग मसाला फ़िल्में बनाएगा तब मैं उसकी तरह की फ़िल्में बनाने की कोशिश करूंगा. हम दोनों भाई मिलकर राज करना चाहते हैं. हम दोनों माफ़िया हैं जो एक दूसरे के इलाक़े में ऑपरेट नहीं करते. अभिनव कश्यप ने सलमान ख़ान के साथ दबंग से बॉलीवुड में अपनी पारी की शुरुआत की थी. उनकी दूसरी फ़िल्म बेशरम जल्द ही सिनेमा घरों में रिलीज़ होने वाली है जिसमें रणबीर कपूर पहली बार अपने माता पिता के साथ काम करते हुए नज़र आएंगे. अभिनव कश्यप अपनी सफलता में भाई अनुराग का हाथ मानते हैं. रणबीर और सलमान के बारे में अनुभव क्या सोचते हैं अनुभव का कहना है कि दोनों बहुत ही अच्छे कलाकार है. सलमान सेट पर लेट आते हैं उनके साथ 12 बजे से पहले काम नहीं कर सकते. कभी कभी तो तीन भी बज जाते थे. सलमान शाम को काम करना पसंद करते हैं. रणबीर वक़्त के पाबंद हैं. सलमान अपने हिसाब से काम करते है. हमें पता नहीं होता कि वो क्या करने वाले है. जब कर लेते हैं तो हमें उस हिसाब से एडजस्ट करना पड़ता है. रणबीर सतर्कतापूर्वक काम करते है. पूरी प्लानिंग बता के रिहर्सल करते हैं. अनुभव कहते हैं मेरा सलमान के साथ कोई रिश्ता नही है. ना कोई झगड़ा ना कोई दोस्ती है. दोस्ती तो कभी थी ही नहीं. दबंग के समय मैंने पेशेवर तरीक़े से काम किया है. मेरा रिश्ता अरबाज़ के साथ था. वो कहते हैं जब मैं दबंग-2 से बाहर आया तब से मैं सलमान से मिला नहीं हूँ. अरबाज़ से मेरा फ़ॉर्मल रिलेशनशिप है. वो मेरे वरिष्ठ हैं. आख़िरी बात उनसे एसएमएस के ज़रिए हुई थी दबंग-2 की रिलीज़ के बाद. मैंने उन्हें बधाई दी थी और उन्होंने धन्यवाद कहा था. अपने भाई अनुराग कश्यप के बारे में पूछने पर अभिनव कहते हैं वो मेरे बड़े भाई हैं और मेरे गुरूजी भी हैं. उन्होंने बेशरम का प्रोमो देखा और उन्हें वो बड़ा बेहूदा पर आत्मविश्वासी लगा. आज मेरी जो भी पहचान है उसमें अनुराग का बहुत बड़ा हाथ है. वो अनुराग के बारे में बताते हैं जब कोई उनसे मेरे बारे में पूछता है तो वो भी बड़ा खुश होता है. जब वो गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के प्रमोशन के लिए गया था तब लोगो ने उसे दबंग का निर्देशक समझ लिया था. तब उसने मुझे फ़ोन किया और कहा तूने एक फ़िल्म में ही छक्का मार लिया है. मैंने 10 फ़िल्में की है लेकिन मुझे कोई नहीं पहचानता. |
| DATE: 2013-09-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1345] TITLE: फिल्म रिव्यू : लंच बॉक्स |
| CONTENT: यूटीवी मोशन पिक्चर्स धर्मा प्रोडक्शन्स डर मोशन पिक्चर्स सिख्य ऐंटरटेनमेंट और एनएफडीसी की पेशकश लंचबॉक्स कहानी है दो अजनबियों की. किस तरह एक युवा महिला और रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़ा एक व्यक्ति लंच बॉक्स के जरिए एक दूसरे को जान पाते हैं और प्यार कर बैठते हैं. इला निमरत कौर एक हाउस वाइफ है और उसकी एक छोटी बेटी है. उसके पति नकुल वैद्य के विवाहेतर संबंध हैं. उसका पति हमेशा अपने सेलफोन से चिपका रहता है. अपने पति के लिए बेहतरीन खाना बना ऑफिस भेजकर वह उसका प्यार पाने की कोशिश करती है. साजन फर्नांडीज़ इरफान ख़ान सरकारी ऑफिस में काम करते हैं. उनकी पत्नी का निधन हो चुका है और वो अपने ऑफिस में टिफिन सर्विस से खाना मंगवाते हैं. वैसे मुम्बई में डिब्बेवालों से गलती होने की संभावना नहीं होती है लेकिन फिल्म में एक दिन डिब्बेवाली की ग़लती से मिसेज इला के पति का डिब्बा जो कि इला ने खुद बनाया था साजन के पास पहुँच जाता है और साजन का डिब्बा इला के पति को. पहली बार टिफिन बदलने के बाद डिब्बेवाले को अपनी इस गलती का कभी पता ही नहीं चलता और दोनों के टिफिन रोज बदलते रहते हैं. पहले दिन टिफिन बदलने के बाद इला अगले दिन डिब्बे में हाथ से लिखा हुआ एक नोट रखती है. साजन उस पत्र का जवाब देता है और इस तरह दो अजनबियों के बीच बिना मिले बातचीत का सिलसिला शुरू हो जाता है. वे हर मसले पर बात करते हैं यहाँ तक कि इला फर्नांडीज को अपने पति के विवाहेतर संबंधों के बारे में भी बता देती है. फिर एक दिन इला और फर्नांडीज मिलने का फैसला करते हैं. क्या इला ओर साजन मिल पाते हैं रितेश बत्रा की कहानी बहुत साधारण होने के बावजूद अच्छी लगती है. बत्रा की पटकथा कुछ कड़वे प्यारे कुछ अजीब और मीठे पलों से भरी हुई है. हास्य को इसमें इतनी खूबसूरती से विकसित किया गया है कि कई जगह दर्शक मुस्कुराने की जगह ठहाके लगाने पर मजबूर हो जाते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि सरल धीमी गति और आम पटकथा होने के बाद भी फिल्म खास वर्ग के दर्शकों को एंटरटेन करती है. फर्नांडीज और इला की कहानी के साथ ही फिल्म में एक और कहानी चलती है . फर्नांडीज और शेख नवाजुद्दीन सिद्दीकी की. शेख ऑफिस में नया है और ऑफिस में फर्नाडीज की जगह लेने वाला है. शेख और फर्नांडीज के बीच फिल्माए दृश्य हास्य उत्पन्न करते हैं और दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए शानदार हैं. फिल्म एक खास वर्ग के दर्शकों को अपील करती है लेकिन धीमी गति और क्लाइमेक्स का न होना फिल्म के दो कमजोर बिंदु हैं. वासन बाला निमरत कौर और रितेश बत्रा के लिखे संवाद असाधारण हैं. फिल्म में सभी कलाकारों ने बेहतरीन अभिनय किया है. पत्र लिखने के प्रारम्भिक दृश्य से लेकर रोज़मर्रा की छोटी-छोटी ज़रूरतों को इरफान ने जिस बेहतरी से निभाया है वह पुरस्कार योग्य है. शेख के किरदार में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी शानदार रहे हैं. निमरत कौर ने बिना ग्लैमर वाले इस रोल में कमाल की एक्टिंग की है. नकुल वैद्य डेंजिल स्मिथ श्रॉफ के रूप में और बच्चे की भूमिका में पुनीत नागर याशवी के रूप में बढ़िया रहे हैं. इला की मां की भूमिका में लिलेट दुबे ठीक लगी हैं. भारती अचरेकर की आवाज का अभिनय शानदार रहा है. लेखक-निर्देशक रितेश बत्रा की ये पहली फिल्म है और जिस सादगी से वो भावनाओं का बयान कर गए हैं वो तारीफ़ के क़ाबिल है. ये कहानी सुनने में तो बेहद सरल लगती है लेकिन फिल्म देखने के दौरान पता चलता है कि बिना कहे वो कितना कुछ कह गए हैं. भारती अचरेकर की आवाज का प्रयोग उन्होंने जिस तरह किया है वह बेहतरीन है. उन्होंने एक मनोरंजक और प्यारी फिल्म बनाई है. माइकल साइमंड ने कैमरे का बेहतरीन उपयोग किया है. कुल मिलाकर लंच बॉक्स एक बेहतरीन फिल्म है. सभी वर्ग के दर्शकों को यह फिल्म पसंद आएगी और बड़े शहरों में मल्टीप्लेक्स में भी कमाई करेगी. फिल्म को कई जगह धीमी शुरुआत मिल सकती है लेकिन बड़े शहरों में बाद में इसके बॉक्स ऑफिस पर हिट रहने की उम्मीद है. इसके कई पुरस्कार जीतने की भी संभावना है. लंच बॅाक्स प्रतिष्ठित कान फ़िल्म महोत्सव समेत पूरी दुनिया में वाहवाही बटोर चुकी है. |
| DATE: 2013-09-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1346] TITLE: पचास साल बाद पाकिस्तानी फ़िल्म ऑस्कर में |
| CONTENT: ज़िंदा भाग पाकिस्तान की तरफ़ से 50 साल बाद ऑस्कर में भेजी जाने वाली पहली फ़िल्म है. ज़िंदा भाग ये वो पाकिस्तानी फ़िल्म है जिसने इतिहास बनाया. 50 साल बाद ये पाकिस्तान की ओर से ऑस्कर में भेजी जाने वाली पहली आधिकारिक फ़िल्म है. फ़िल्म के निर्माता हैं मज़हर अली ज़ैदी और इसके निर्देशक हैं फ़रज़ाद नबी और उनकी पत्नी मीनू गौर जो एक भारतीय हैं. बीबीसी से ख़ास बात करते हुए मज़हर ने अपनी इस फ़िल्म के अलावा पाकिस्तानी फ़िल्म उद्योग और बॉलीवुड के बारे में भी कई बातें कीं. पेश है इस बातचीत के चुनिंदा अंश. ज़िंदा भाग एक कॉमेडी फ़िल्म है जो तीन लड़कों की कहानी है. फ़िल्म के निर्माता मज़हर ज़ैदी हैं. बड़ी ख़ुशी की बात है कि हमारी फ़िल्म ऑस्कर में जा रही है. हमारी फ़िल्म कोई गंभीर क़िस्म की फ़िल्म नहीं है. ये एक कॉमेडी फ़िल्म है जिसमें गाने भी हैं. राहत फ़तेह अली ख़ान आरिफ़ लोहार और शफ़क़त अमानत अली जैसे लोगों ने इसमें गाना गाया है. फ़िल्म 20 सितंबर को रिलीज़ हो रही है. कहानी है लाहौर में रहने वाले तीन लड़कों की जो अपने करियर की बेहतरी और पैसा कमाने के लिए मुल्क छोड़कर कहीं बाहर जाने की फ़िराक़ में हैं. हालांकि पाकिस्तान में बहुत कम सिनेमाघर हैं लेकिन हमें उम्मीद है कि फ़िल्म अच्छा व्यापार करेगी. इसे हम भारत में भी रिलीज़ करना चाहते हैं और हमारी कुछ वितरकों से बात चल रही है. फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह ने भी अहम भूमिका निभाई है. हम ख़ासे ख़ुशक़िस्मत हैं कि नसीरुद्दीन शाह जैसे बड़े सितारे ने हमारी फ़िल्म में काम किया. वो इतने बेहतरीन इंसान हैं कि उन्होंने अपनी सामान्य फ़ीस से काफ़ी कम में हमारे लिए काम किया. वर्ना तो हम उन्हें अपनी फ़िल्म में ले भी नहीं पाते. हमारी फ़िल्म में कई नए सितारे हैं. नसीर साहब ने पाकिस्तान आकर उन सभी लड़कों को अभिनय की ट्रेनिंग भी दी. हम इसके लिए उनके बड़े शुक्रगुज़ार हैं. ज़िंदा भाग के निर्माता मज़हर ज़ैदी कहते हैं कि पाकिस्तान के फ़िल्मकार ख़ासे बहादुर हैं. मैं दाद देता हूं पाकिस्तान के फ़िल्मकारों को जो तमाम ख़तरों फ़ंडामेंटलिज़्म और उग्रवाद के बावजूद काफ़ी बोल्ड फ़िल्में बनाते हैं. वो इश्यूज़ उठाते हैं जो समाज के लिए ज़रूरी हैं. ऐसी फ़िल्में लगातार बन रही हैं. जैसे शोएब मंसूर की ख़ुदा के लिए फिर बोल और हाल ही में आई मैं हूं शाहिद अफ़रीदी भी इसी श्रेणी में आती है. हमारी फ़िल्मों में सिर्फ़ मसाला नहीं होता बल्कि एक संदेश भी होता है जो पाकिस्तानी समाज की बेहतरी के लिए ज़रूरी है. फ़िल्म 20 सितंबर को पाकिस्तान में रिलीज़ हो रही है. निर्माता मज़हर इसे भारत में भी रिलीज़ करना चाहते हैं. बॉलीवुड फ़िल्में पाकिस्तान में बहुत मशहूर हैं. लेकिन हमें उनसे किसी तरह का डर महसूस नहीं होता. बल्कि हम उनसे प्रेरणा लेते हैं. उन फ़िल्मों को देखकर हम भी सीखेंगे कि फ़िल्मों को और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है. मैं भविष्य में बॉलीवुड के किसी फ़िल्मकार के साथ मिलकर फ़िल्म बनाना चाहता हूं. मैं दिबाकर बनर्जी की फ़िल्ममेकिंग का प्रशंसक हूं. साथ ही कलाकारों में मुझे नसीरुद्दीन शाह के अलावा नई पीढ़ी के ऋतिक रोशन बहुत पसंद है. पहले बॉलीवुड की कई फ़िल्मों पर पाकिस्तान में बैन लग जाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब हमारा सेंसर बोर्ड ख़ासा उदार हो गया है. हालांकि और सुधार की ज़रूरत है लेकिन फिर भी हालात पहले से काफ़ी बेहतर हुए हैं. अब सेंसर बोर्ड में ज़्यादा से ज़्यादा फ़िल्मों से जुड़े लोग आ रहे हैं. ये अच्छा है. लेकिन मैं ये भी कहूंगा कि फ़िल्मकारों को भी किसी भी मामले को डील करते वक़्त सभी लोगों की संवेदनाओं का ध्यान रखना चाहिए. पहले भारत की कई फ़िल्मों में पाकिस्तान को बेहद ख़राब तरीक़े से पेश किया गया. यही हाल कई पाकिस्तानी फ़िल्मों का भी था. जिनमें भारत की छवि ठीक तरह से पेश नहीं की गई. लेकिन अब दोनों मुल्कों के फ़िल्मकार परिपक्व हो गए हैं. मेरी फ़िल्म में कैमरा क्रू और साउंड डिपार्टमेंट भारत से आई टीम ने संभाला है. तो हालात अब बेहतर हो रहे हैं. |
| DATE: 2013-09-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1347] TITLE: 'कुछ-कुछ होता है' बेहूदा कहानी थी: करण जौहर |
| CONTENT: करण जौहर ने अपनी ही सुपरहिट फ़िल्म का उड़ाया मज़ाक सलमान ख़ान किसके बनेंगे मेहमान और ग्रैंड मस्ती ने आलोचना के बाद भी गाड़े झंडे. मनोरंजन जगत की हलचल आज मुंबई डायरी में. करण जौहर की बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म कुछ कुछ होता है सुपरहिट रही और इसने रातों रात करण को सुपरहिट निर्देशक के तौर पर स्थापित कर दिया. लेकिन फ़िल्म की रिलीज़ के 15 साल बाद करण मानते हैं कि फ़िल्म की कहानी बेहूदा थी. इरफ़ान की फ़िल्म लंचबॉक्स से करण जौहर जुड़े हैं और इसी फ़िल्म के प्रमोशन पर उन्होंने मीडिया से ये बात कही. करण कहते हैं हर फ़िल्म एक नई ग़लती होती है. अब मैं कुछ-कुछ होता है देखता हूं तो मुझे इसकी कहानी मूर्खतापूर्ण लगती है. कभी ख़ुशी कभी ग़म देखता हूं तो लगता है फ़िल्म 35 मिनट लंबी थी. स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर में और ज़्यादा इमोशन होने चाहिए थे. इसलिए हर फ़िल्म आपको कुछ ना कुछ सिखाती है. वैसे लंच-बॉक्स की बात करें तो फ़िल्म के मुख्य कलाकार इरफ़ान हैं और इसे भारत में रिलीज़ कराने में करण जौहर का धर्मा प्रोडक्शन सहयोग कर रहा है. फ़िल्म 20 सितंबर को भारत में रिलीज़ हो रही है. करण जौहर के सुपरहिट चैट शो कॉफ़ी विद करन में अमिताभ बच्चन शाहरुख़ ख़ान समेत कई हस्तियां आ चुकी हैं. लेकिन इसमें अब तक सलमान ख़ान नहीं आए हैं. ख़ुद करण जौहर ने कई बार कहा कि वो सलमान को शो में अपना मेहमान बनाना चाहते हैं. अब लगता है करण की ये तमन्ना पूरी होने वाली है. चर्चा है कि इस शो के अगले सीज़न के पहले एपिसोड में सलमान ख़ान आ सकते हैं. लेकिन कथित तौर पर सलमान ख़ान ने ये शर्त रखी है कि इस एपीसोड में उनके अलावा कोई और मेहमान नहीं होगा. इंद्र कुमार निर्देशित एडल्ट कॉमेडी ग्रैंड मस्ती को आलोचकों ने भले ही नकार दिया हो लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर इस फ़िल्म ने धूम मचा दी. रितेश देशमुख विवेक ओबेरॉय और आफ़ताब शिवदासानी की मुख्य भूमिका वाली इस फ़िल्म ने रिलीज़ होने के पहले तीन दिनों में ही तक़रीबन 40 करोड़ रुपए की कमाई की और इस साल पहले सप्ताहांत में सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्मों की सूची में चौथे नंबर पर आ गई है. फ़िल्म की विषय वस्तु और संवादों को कई समीक्षकों ने बचकाना और अश्लील करार दिया था. |
| DATE: 2013-09-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1348] TITLE: कई बार मैंने कहा 'बर्फी' छोड़ दूंगी: इलियाना डी क्रूज़ |
| CONTENT: अनुराग बासु निर्देशित फ़िल्म बर्फी बॉक्स ऑफिस पर बेहद कामयाब रही और इसने अभिनेत्री इलियाना डी क्रूज़ को बॉलीवुड में एक पहचान भी दिलाई. लेकिन इलियाना बताती हैं कि शूटिंग के दौरान उनका निर्देशक अनुराग बासु के साथ कई बार झगड़ा भी हुआ. इलियाना की आने वाली फ़िल्म है फटा पोस्टर निकला हीरो. इसी के प्रमोशन पर मीडिया से बात करते हुए वो कहती हैं अनुराग के साथ मेरा लव-हेट रिलेशन है. बर्फी के दौरान मेरी उनसे कई बार लड़ाई हुई. कई बार मैंने कहा कि मैं फ़िल्म छोड़ दूंगी. लेकिन बाद में सब ठीक हुआ. इलियाना कहती हैं कि इतना सब कुछ होने के बावजूद अनुराग उनका बहुत ध्यान रखते थे. वो कहती हैं अनुराग कमाल के बंदे हैं. वो बॉलीवुड में मेरे गॉडफादर तो नहीं है लेकिन मैं उन्हें बहुत पसंद करती हूं. उनकी फ़िल्म बर्फी ने बॉलीवुड में मुझे जगह दिलाई. मैं इस बात को नहीं भूल सकती. इलियाना छह सालों तक दक्षिण भारतीय फ़िल्मों में काम करने के बाद बॉलीवुड आईं हैं. फ़िल्म फटा पोस्टर निकला हीरो उनकी दूसरी हिंदी फ़िल्म है. फ़िल्म में उनके साथ शाहिद कपूर हैं. बर्फी में उनकी जोड़ी रणबीर कपूर के साथ थी. तो रणबीर कपूर और शाहिद कपूर में क्या अंतर है. इलियाना कहती हैं रणबीर स्विच ऑफ़ स्विच ऑन एक्टर हैं. वो रिहर्सल में यक़ीन नहीं रखते. बस कैमरे के सामने आते ही चालू हो जाते हैं. जबकि शाहिद रिहर्सल करना पसंद करते हैं. फटा पोस्टर निकला हीरो के निर्देशक राजकुमार संतोषी हैं. इलियाना कहती हैं कि संतोषी का हास्य बोध कमाल का है. राजकुमार संतोषी ने इससे पहले अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी और अंदाज़ अपना अपना जैसी कॉमेडी फ़िल्में बनाई हैं. इलियाना कहती हैं कि 18 साल की उम्र में जब उन्होंने फ़िल्में करनी शुरू की थीं तब उन्हें एक्टिंग में बिलकुल मज़ा नहीं आता था. मुझे ये काम बड़ा बोरिंग लगता था. लेकिन धीरे-धीरे काम में मज़ा आने लगा. बॉलीवुड और दक्षिण भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री में क्या फर्क है. इलियाना कहती हैं दक्षिण भारत में अगर शूट पांच बजे का है तो वो ठीक पांच बजे शुरू हो जाता है. लेकिन बॉलीवुड में ऐसा नहीं है. यहां थोड़ा चलता है वाला रवैया ज़्यादा है. इलियाना इस वक़्त सैफ़ अली ख़ान के साथ हैपी एंडिग और वरुण धवन के साथ मैं तेरा हीरो कर रही हैं. |
| DATE: 2013-09-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1349] TITLE: आरके स्टूडियो मेरी पहचान नहीं: रणबीर कपूर |
| CONTENT: आजकल अभिनेता रणबीर कपूर अपनी आने वाली फ़िल्म बेशर्म के प्रमोशन में पूरी तरह व्यस्त हैं. वे मीडिया को भी खूब समय दे रहे हैं. मीडिया से बातचीत में उन्होंने अपनी फ़िल्म बेशर्म के अलावा आरके स्टूडियो पापा ऋषि कपूर और कटरीना कैफ़ के साथ अपने कथित अफेयर के बारे में भी बात की. यहां उसी बातचीत के मुख्य अंश पेश हैं. मेरे पापा ऋषि कपूर मीडिया फ्रेंडली नहीं हैं. हालांकि उनकी यही उम्र है मीडिया फ्रेंडली होने की. ऐसा इसलिए है कि वे लीड ऐक्टर नहीं हैं. इसलिए उन्हें अपनी फ़िल्म प्रमोट करने की ज़्यादा ज़रूरत नहीं पड़ती. पापा बहुत खुल कर बोल लेते हैं. वे जब भी कुछ ज़्यादा बोल जाते हैं घर आने पर मम्मी से उन्हें बहुत डांट पड़ती है. वे मुझे निकम्मा बेवकूफ बेशर्म भी बोलते हैं और मेरे जीवन का एक लक्ष्य है मैं पापा को गलत साबित करूं. मेरे निजी जीवन के बारे में बहुत अफवाहें उड़ती रहती हैं. मैं अपनी लाइफ को रिएलिटी शो नहीं बनाना चाहता. हां कैटरीना मेरी बहुत ख़ास दोस्त हैं. मैंने पहले भी बताया था. मैंने अपने अनुभव से ये जाना है कि जब आप अपने रिश्तों के बारे में बेहद खुले होते हैं और दुर्भाग्य से वह रिश्ता शादी में नहीं बदल पाता तो ये बहुत दुखद स्थिति होती है. समाज में अक्सर महिलाओं पर खूब टीका-टिप्पणी की जाती है. उन पर उंगली उठाई जाती है कि वह अमुक रिश्ते में थी. इस तरह की बातों पर रोक लगनी चाहिए. अभी पिछले दिनों कटरीना के साथ मेरी कुछ तस्वीरों के सामने आने से काफ़ी हंगामा हुआ था. मैं भी उम्र के उस दौर से गुज़र चुका हूं जब हम अपने चहेते ऐक्टर के बारे में छोटी से छोटी बात भी जानना चाहते थे. आज हर कोई जर्नलिस्ट है. क्योंकि उनके पास कैमरा फोन है. वो ट्विटर फ़ेसबुक पर अपनी राय रख सकता है. एक अभिनेता होने के नाते आपको इन सबके लिए तैयार रहना चाहिए. आरके स्टूडियो का रुतबा राज कपूर से था. आज मैं जो कुछ कर रहा हूं अपनी बदौलत कर रहा हूं. मेरा अपना तरीका है अपना नज़रिया है. मैं आरके स्टूडियो की छवि के दम पर नहीं जी सकता. वो मेरे दादा का था. मेरी कोशिश है कि मैं अपने नज़रिए से दुनिया को अपनी किस्म की फ़िल्में दिखाऊं. इसलिए मैं अनुराग बासु इम्तियाज़ अली अयान मुखर्जी के साथ फ़िल्में प्रोड्यूस कर रहा हूं. ये मेरी फ़िल्में हैं. मैं चाहता हूं कि आज से 20 साल बाद लोग मेरे प्रोडक्शन से मुझे जानें. आरके स्टूडियो राजकपूर का था ये मेरा होगा. मैं राजकपूर ऋषि कपूर और शम्मी कपूर की छाया तले नहीं रहना चाहता. मैं अपनी पहचान अलग बनाना चाहता हूं. |
| DATE: 2013-09-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1350] TITLE: 'फ़्रंटियर गाँधी' के लिए राष्ट्रपति का न्यौता |
| CONTENT: ऐसा कम ही होता है जब भारत के राष्ट्रपति आधिकारिक तौर पर किसी ख़ास फ़िल्म या डॉक्यूमेंट्री को देखने की फ़रमाइश करें. वो भी कैबिनेट मंत्रियों के साथ. ऐसी ही एक डॉक्यूमेंट्री है जिसका नाम है फ़्रंटियर गांधी जो ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान की ज़िंदगी पर बनी है. कनाडा की रहने वाली निर्देशक टेरी मैकुलाहन ने इस डॉक्यूमेंट्री को बनाने में अपने जीवन के 22 साल लगा दिए. 17 सितंबर को राष्ट्रपति के ये फ़िल्म देखने के अनुरोध की बात ख़ुद निर्देशक टेरी ने हमें बताई. राष्ट्रपति भवन में ये फ़िल्म दिखाई जाएगी. लद्दाख अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल में सबसे ज़्यादा यही डॉक्यूमेंट्री पसंद की गई और निर्देशक टेरी का पूरे हॉल में लोगों ने खड़े होकर अभिनंदन किया था. इसी डॉक्यूमेंट्री के बहाने भारत के लोग एक बार फिर याद कर रहे हैं उस व्यक्ति को जिसे लोग बादशाह ख़ान या फ़्रंटियर गांधी भी बुलाते हैं. इसमें इंदर कुमार गुजराल हामिद करज़ई से लेकर परवेज़ मुशर्रफ़ तक के इंटरव्यू हैं. इसे आवाज़ ओम पुरी ने दी है. ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान अविभाजित भारत की वो हस्ती हैं जिनका ज़िक्र अब गाहे बगाहे ही होता है लेकिन बहुत से लोग इतिहास में उनको बड़ी शिद्दत और अदब से याद करते हैं. वे पहले ग़ैर भारतीय थे जिन्हें भारत सरकार ने साल 1987 में भारत रत्न से नवाज़ा था. अगर आप दिल्ली के बहुचर्चित ख़ान मार्केट से परिचित हों तो 1950 के दशक में ये मार्केट ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान के नाम पर ही बनाया गया था. आज ये दुनिया की सबसे महंगी हाई स्ट्रीट में से है. ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान का जन्म आज के ख़ैबर पख़्तूनख्वाह में हुआ था और उनकी गिनती अविभाजित भारत के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानियों में होती थी. वे पख्तूनों के बड़े नेता थे और महात्मा गांधी के वे बेहद क़रीबी थे. फ़िल्म में ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान और गांधीजी का असल और बेहद दुर्लभ फ़ुटेज दिखाया गया है. निर्देशक टेरी ने बताया कि ये फ़ुटेज मिलना आसान नहीं था और कई देशों से ये अन्य तरीक़ों से बाहर निकाला गया. डॉक्यूमेंट्री में दिखाया गया है कि कैसे खा़न अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान ने ब्रितानी राज को हटाने के लिए अविभाजित भारत के नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया. लेकिन जब आज़ादी मिली तो वे भारत के बंटवारे के सख़्त ख़िलाफ़ थे. गांधी और ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान के रिश्तों की नज़दीकी को दर्शाते हुए डॉक्यूमेंट्री में दिखाया गया है कि कैसे चश्मा नहीं होने पर बादशाह ख़ान गांधीजी का चश्मा लेकर क़ुरान पढ़ लेते यानी दोनों का दिल और नज़रिया एक ही था. अहिंसा में उनके यक़ीन को डॉक्यूमेंट्री में दर्शाया गया है. हालांकि बंटवारे को लेकर कांग्रेस और खा़न अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान के मतभेदों को भी उजागर किया गया है. भारत में आमतौर पर उन्हें काफ़ी चाव से याद किया जाता है हालांकि पाकिस्तान में उन्हें लेकर मत बंटा हुआ है. डॉक्यूमेंट्री में लिए इंटरव्यू में पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ कहते हैं उन्होंने आज़ादी के लिए लड़ाई की ये सही है लेकिन वे पाकिस्तान यानी अपने देश के बनने के ही ख़िलाफ़ थे. जबकि लद्दाख़ में बीबीसी से बातचीत के दौरान भारत में अफ़गानिस्तान के राजदूत शाइदा मोहम्मद अब्दाली ने ख़ान अब्दुल गफ़्फार ख़ान को पूरे दक्षिण एशिया का करिश्माई नेता बताया जिनके आदर्शों की पूरे इलाक़े को ज़रूरत है. ख़ान अब्दुल ग़फ्फार ख़ान न सिर्फ़ अंग्रेज़ हुकूमत के ख़िलाफ़ लड़े बल्कि वे पख्तून समुदाय के लिए समाज सुधारक बनकर भी उभरे. डॉक्यूमेंट्री में ख़ुदाई ख़िदमतगार का भी ज़िक्र है. बादशाह ख़ान ने 1929 में ख़ुदाई ख़िदमतगार नाम का आंदोलन चलाया था जिसके कार्यकर्ताओं को सुर्ख़ पोश भी कहा जाता था. दो बार ख़ान अब्दुल ग़फ्फार ख़ान नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी नामांकित हुए. अपने जीवन के कई साल उन्हें जेल में बिताने पड़े या निर्वासन में रहे. साल 1988 में 98 साल की उम्र में उनकी मौत हुई. डॉक्यूमेंट्री में वो फ़ुटेज भी दिखाया है जब उनकी मौत के बाद पाकिस्तान से होकर अफ़ग़ानिस्तान तक उनका जनाज़ा निकला था. उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा था कि उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में जलालाबाद के पास दफ़नाया जाए. उस समय अफ़ग़ानिस्तान में गृह युद्ध चल रहा था. कहा जाता है कि उन्हें सुपुर्दे ख़ाक करने के लिए कुछ समय के लिए युद्ध को विराम दे दिया गया था. इस वृत्तचित्र को बनाने में निर्देशक टेरी को 22 साल लग गए और उनका कहना है कि उन्हें कभी नहीं लगा कि वे इस प्रयास को छोड़ दें. लेकिन इसे रिलीज़ करने का संघर्ष जारी है. टेरी कहती हैं कि दुनिया में इस समय इस्लाम को लेकर डर का माहौल है और उसे हिंसा से जोड़ कर देखा जाता है जबकि डॉक्यूमेंट्री में कुछ और ही दिखाया गया है. इसी वजह से पश्चिम में ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान पर बनी इस डॉक्यूमेंट्री को रिलीज़ करने में दिक्क़तें हैं. एक दर्शक के तौर पर ये डॉक्यूमेंट्री आपको इतिहास से फिर रूबरू कराती है और इस बनाने में लगी कड़ी मेहनत लगन और संघर्ष के 22 साल के सफ़र को सलाम करने पर मजबूर करती है. |
| DATE: 2013-09-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1351] TITLE: 'झलक दिखला जा' की ट्रॉफी उठाई दृष्टि धामी ने |
| CONTENT: झलक दिखला जा के सीजन 6 की विजेता बनी हैं दृष्टि धामी और उनके कोरियोग्राफर पार्टनर सलमान युसुफ़ ख़ान. उन्होंने इस प्रतियोगिता के फाइनल के साथ पचास लाख रुपए भी जीते. दृष्टि धामी छोटे परदे की एक जानी मानी कलाकार हैं. उनकी खूबसूरती की वजह से उन्हें मधुबाला के नाम से भी जाना जाता है. दृष्टि ने साल 2007 में टीवी सीरियल दिल मिल गया से अपनी टीवी करियर की शुरुआत की थी. इसके बाद वो गीत सीरियल में नज़र आईं और फिर दिखीं मधुबाला में. इस सीरियल ने उन्हें नाम और पहचान दोनों दी. सीरियल में बेहद सीधी सादी लड़की दिखने वाली मधुबाला जब झलक दिखला जा के स्टेज पर आईं तो उनके ठुमकों ने सभी को हैरान कर दिया. अपनी मेहनत और कलाकारी के दम पर दृष्टि ने 16 हफ्तों तक चले झलक दिखला जा के सफर को यादगार और दिलचस्प बना दिया. झलक दिखला जा में भाग लेने से पहले दृष्टि ने कभी भी किसी डांस शो में हिस्सा नहीं लिया था और न ही नृत्य कला का कोई प्रशिक्षण ही उनके पास था. इस शो के फाइनल में लॉरेन गुटीब और सोनाली मजूमदार को हराकर दृष्टि ने ख़िताब अपने नाम किया. ये दोनों कलाकार पहली और दूसरी रनर अप रहीं. झलक दिखला जा के इस सीजन में गायक शान अभिनेत्री श्वेता तिवारी अभिनेता सिद्धार्थ शुक्ला और करणवीर बोहरा ने भी हिस्सा लिया था. ख़िताब जीतने के बाद दृष्टि ने कहा कि उन्हें यकीन नहीं हो पा रहा है कि वे जीत गई हैं. दृष्टि ने कहा जजों ने मेरे काम को सराहा और मुझे अपने डांस को और बेहतर करने की हिम्मत दी. मेरे कोरियोग्राफर सलमान ने हमेशा मेरा साथ दिया और उनके चलते ही हम यहाँ तक पहुँचे. सलमान ने ही मुझे एक अच्छी डांसर बनायाअपने फैंस का आभार व्यक्त करते हुए दृष्टि ने कहा मैं हमेशा अपने चाहने वालों की एहसानमंद रहूंगी. उन्होंने मेरी कड़ी मेहनत और मेरे काम को देखा और वोट देकर मेरे प्रति अपना प्यार जताया. इस डांस शो के जज माधुरी दीक्षित करण जौहर और रेमो डीसूजा थे. फाइनल के मौके पर पहुँचे ऋतिक रोशन और प्रियंका चोपड़ा ने अपनी आने वाली फिल्म कृष-3 का प्रमोशन भी किया. |
| DATE: 2013-09-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1352] TITLE: पर्दे से गायब क्यों है सुपरहीरोइन? |
| CONTENT: यह साल भी सुपरहीरो और कॉमिक्स के चरित्रों पर बनी फ़िल्मों के लिए काफी बढ़िया रहा है. ऑयरन मैन सुपरमैन और वॉल्वेराइन जैसे चरित्र न केवल दुनिया को ख़तरों से बचाने में कुशल हैं बल्कि सिनेमा हॉल में दर्शकों की भीड़ खींचने में भी माहिर हैं. 2011 की हिट फ़िल्म थोर के इस साल रिलीज़ होने वाले सिक्वेल थोर दि डार्क वर्ल्ड के भी हिट होने की उम्मीद जताई जा रही है. हॉलीवुड में कामिक्स के चरित्रों पर बनी फ़िल्मों का महत्व और संख्या बढ़ती जा रही है लेकिन इन चरित्रों में महिला चरित्रों की संख्या बहुत कम है. गिनेथ पाल्ट्रावआयरैन मैन एमी एडम्ससुपरमैन और नताली पोर्टमैनथोर की सुपरहीरो वाली फ़िल्में इस साल रिलीज़ होने वाली हैं. गिनेथशेक्सपीयर इन लव और नतालीब्लैकस्वान अपने शानदार अभिनय के लिए ऑस्कर जीत चुकी हैं तो एमी को भी उनकी फ़िल्म जूनबग के लिए ऑस्कर नामांकन मिल चुका है. सशक्त और प्रभावशाली महिला किरदार होने के बावजूद फ़िल्म में इन नायिकाओं का मुख्य काम फ़िल्म के मर्द हीरो के मिशन में उसकी मदद करना ही है. कनाडा के अख़बार दि नेशनल पोस्ट की नतालिया एटकिंसन कहती हैं कामिक्सों पर बनी फ़िल्मों में ज़्यादातर महिला किरदार या तो हीरो की सहायक होती हैं या फिर फ़िल्म के रोमांटिक उपकथानक की ज़रूरत. कई बार ये महिला किरदार खलनायिकाएं होती हैं तो कई बार हीरो की जानलेवा कमजोरी. पेपर पॉटगिनेथ जैसी फ़िल्मों के महिला किरदार काफी बेहतर होते हैं लेकिन इस फ़िल्म में भी नायिका को नायक की मदद की ज़रूरत पड़ ही जाती है. फ़िल्मों की इस सीमा के बार में फ़िल्म पत्रिका एंपायर से जुड़ी हेलेन ओ हारा कहती हैं इसका एक बड़ा कारण यह है कि ये सारी फ़िल्में बेहद लोकप्रिय पुरुष कॉमिक्स चरित्रों पर आधारित होती हैं. लोकप्रिय महिला कॉमिक्स चरित्रों की कमी नहीं है लेकिन वंडर वूमैन जैसे बेहद सफल महिला चरित्रों को भी सिनेमा में बैटमैन या सुपरमैन जैसे पुरुष कॉमिक्स चरित्रों जैसी तवज्जो नहीं मिल पाती. दि एवेंजर के निर्देशक जॉस वेडन ने कई साल पहले वंडर वूमैन पर आधारित एक पटकथा लिखी भी थी लेकिन वार्नर ब्रदर्स के अधिकारियों ने उसे ख़ारिज कर दिया था. कार्टूनिस्ट डियाना टैंबलिन कहती हैं अब दूसरे या तीसरे स्तर के सुपरहीरो पर आधारित फ़िल्में भी बनने लगीं हैं लेकिन कई मुख्य चरित्रों के ऊपर केवल इसलिए फ़िल्म नहीं बनती क्योंकि वो महिला हैं. मुझे इस बात पर कतई यकीन नहीं है कि वंडर वुमैन जैसे मज़ेदार और लोकप्रिय चरित्र में लोगों की रुचि नहीं है. फ़िल्म आलोचक मैरी एन्न जोहानसन कहती हैं जिस कारण से मुख्यधारा में महिला प्रधान फ़िल्में कम बनती हैं उसी कारण से कॉमिक्स के महिला चरित्रों पर भी कम फ़िल्में बनती हैं. हॉलीवुड वालों ने तय कर रखा है कि वो केवल किशोरों और नौजवानों के लिए फ़िल्में बनाएंगे. हॉलीवुड को लगता ही नहीं कि दर्शक महिला प्रधान या सुपरहिरोइन वाली फ़िल्में देखना चाहते हैं. हॉलीवुड में यह मान्यता रूढ़ हो गई है कि नौजवान ही ज़्यादा फ़िल्में देखते हैं जबकि मोशन पिक्चर ऑफ अमरीका के आंकड़े बताते हैं कि वास्तविकता में दर्शकों की कुल संख्या में महिलाएं 52 प्रतिशत होती हैं. सुपरवुमैन वाली आखिरी फ़िल्म 2005 में आई इलेक्ट्रा थी. इस फ़िल्म की नायिका थीं जेनीफर गार्नेर. यह फ़िल्म भी 2004 में आई हैल बेरी की फ़िल्म कैटवूमैन की तरह बॉक्स ऑफिस पर असफल रही थी. टैंबलिन कहती हैं. हॉलीवुड इलेक्ट्रा और कैटवूमैन की असफलता को इस बात का प्रमाण मानता है कि सुपरवूमैन वाली फ़िल्में सफल नहीं हो सकतीं लेकिन ये फ़िल्में इसलिए नहीं पिटी कि ये नायिका प्रधान थीं बल्कि इसलिए पिटीं कि ये बुरी फ़िल्में थीं. सिनेमाब्लेंड वेबसाइट की केटी रिच कहती हैं इन फ़िल्मों के मुख्य चरित्र पुरुष होते तो इनकी असफलता को इतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता. ग्रीन लैंटर्न या टू हल्क जैसी सुपरहीरो वाली फ़िल्मों के लिए उनके पुरुष चरित्रों को दोषी नहीं ठहराया जाता. दि ट्विलाइट सिरीज़ की फ़िल्मों की सफलता ने साबित कर दिया है कि महिला प्रधान होना सुपरहीरो वाली फ़िल्मों की सफलता में बाधक नहीं होती. इस सिरीज़ की पाँच फ़िल्मों ने तीन अरब डॉलर से ज्यादा की कमाई की है. दि हंगर गेम्सजेनीफर लांरेस की सफलता ने भी प्रमाणित किया है कि मजबूत एवं जटिल महिला चरित्रों वाली फ़िल्मों की भी दर्शकों में अच्छी मांग है. जोहानसन कहती हैं जब तक हॉलीवुड महिला फ़िल्म निर्माताओं को सचेत रूप से बढ़ावा नहीं देता और उन्हें अपनी कहानियां सामने लाने के लिए सकारात्मक माहौल नहीं बनाता तब तक यह स्थिति नहीं बदलने वाली. भविष्य की संभावनाओं के बार में रिच कहती हैं कि सुपरहिरोइन वाली फ़िल्मों को वंडर वूमैन या ऐसे ही दूसरे बहुत चरित्रों से ज्यादा उम्मीद तुलनात्मक रूप से छोट कॉमिक्स चरित्रों के फ़िल्मी रुपांतरण से है. इन फ़िल्मों में छिपी संभावनाओं को अब तक पूरा दोहन नहीं किया गया है. दूसरी तरफ दर्शकों को भी वंडर वूमैन के रुपहले पर्दे पर आने का इंतज़ार करने के साथ-साथ अन्य कम लोकप्रिय महिला चरित्रों बारे में अपनी जानकारी बढ़ाते रहने की ज़रूरत है. |
| DATE: 2013-09-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1353] TITLE: मैं नसीर साहब के सामने गिड़गिड़ाया: रणदीप |
| CONTENT: रणदीप हूड्डा और जॉन डे में उनके साथ काम कर रही अभिनेत्री ऐलेना कान्ज़ानसीरुद्दीन शाह और रणदीप हूड्डा ये दोनों कलाकार इस हफ़्ते रिलीज़ हो रही फ़िल्म जॉन डे में साथ नज़र आने वाले हैं. रणदीप कहते हैं कि उनकी और नसीर साहब की दोस्ती मानसून वेडिंग के दिनों से चली आ रही है. मानसून वेडिंग साल 2001 में रिलीज़ हुई थी लेकिन रणदीप को आज भी नसीर साहब के साथ अपनी पहली मुलाक़ात याद है. रणदीप कहते हैं जब मैंने पहली बार नसीर साहब को देखा तो ऐसा लगा कि मैं किसी भगवान को देख रहा हूं. वो कमरे में बैठे थे. मैं चुप-चाप जा कर एक कोने में खड़ा हो गया और अपनी लाइनों की रिहर्सल करने लगा. चाय-ब्रेक के वक़्त नसीर साहब ने मुझसे बातचीत की और साथ ही मुझसे दोस्ती भी कर ली. अपनी दोस्ती के बारे में रणदीप कहते हैं तब से हमारी दोस्ती है. जब मैं मुंबई गया तो मैं सीधे नसीर साहब के पास पहुंचा और मैंने गिड़गिड़ाते हुए उनसे काम मांगा. उन्होंने बड़े ही हिचकिचाते हुए मुझे अपने थिएटर ग्रुप में काम दिया था. बस तब से मैं उनके साथ थिएटर कर रहा हूं. मंच पर वो मेरे सह-कलाकार भी रहे हैं. मैंने उनके निर्देशन तले भी काम किया है. जॉन डे के निर्देशक हैं अहिशोर सोलोमन. बतौर निर्देशक ये सोलोमन की पहली फिल्म है. दिल्ली में अपनी फ़िल्म जॉन डे को प्रोमोट करने पहुंचे रणदीप कहते हैं कि उन्होंने इस फ़िल्म के लिए हां इसलिए की क्योंकि फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह हैं. रणदीप कहते हैं फ़िल्म के निर्देशक अहिशोर सोलोमन ने जब मुझे फ़िल्म की कहानी दी तो साथ ही उन्होंने मुझसे ये भी कहा कि नसीर साहब जॉन डे के लिए पहले ही हां कर चुके हैं. मैंने स्क्रिप्ट तुरंत पढ़ी और सोलोमन को हामी भर दी. इस फ़िल्म का हिस्सा होना मेरे लिए गर्व की बात है. वैसे जहां तक बात है गर्व की तो गर्व तो रणदीप को इस बात पर भी होता होगा कि फ़िल्मों में इतने नकारात्मक किरदार निभाने के बावजूद भी महिलाओं में उनकी अच्छी ख़ासी लोकप्रियता है. रणदीप की कुछ महिला प्रशंसक तो ऐसी भी हैं जो उनके लिए कविताएं लिखती हैं उनके चित्र भी बनाती हैं. तो कैसा लगता है रणदीप को इतना प्यार पा कर. बीबीसी को इस सवाल का जवाब देते हुए रणदीप कहते हैं ये सब बातें सुन कर जान कर मुझे बहुत अच्छा लगता है. लेकिन कभी कभी ये भी लगता है कि वो ये सब मेरे लिए नहीं किसी और के लिए कर रही हैं. परदे पर इतनी नकारात्मक छवि के बावजूद भी इतनी महिला प्रशंसक. ये तो कमाल की बात है. लेकिन ऐसा हुआ कैसेइस सवाल का जवाब बड़ी ही सहजता से देते हुए रणदीप कहते हैं मैं जानता हं कि मेरी फ़िल्मों से मेरी जो एक छवि बन गई है लोग उसे बड़ी गंभीरता से लेते हैं. लेकिन लगता है कि लड़कियों को बैड बॉयज़ ज्यादा पसंद आते हैं. बैड बॉयज़ ज्यादा मज़ेदार जो होते हैं. |
| DATE: 2013-09-12 |
| LABEL: entertainment |
| [1354] TITLE: बॉक्स ऑफिस पर परिणीति ने प्रियंका को पछाड़ा |
| CONTENT: शुद्ध देसी रोमांस बॉक्स ऑफिस पर अच्छा बिज़नेस कर रही है. पिछले हफ्ते बॉक्स ऑफिस पर रिलीज़ हुई दोनों ही फ़िल्मों की अभिनत्री रहीं मिस चोपड़ा. शुद्ध देसी रोमांस में थी परिणीति चोपड़ा और ज़ंजीर में नज़र आईं प्रियंका चोपड़ा. आज मुंबई डायरी में पढ़िए की बॉक्स ऑफिस पर कैसे फिसली ज़ंजीर. साथ ही जानिए कि कैसा है रणवीर सिंह का नया लुक. बॉक्स ऑफिस पर अगर नज़र डालें तो आंकड़ो से पता चलता है कि ज़ंजीर ने अपने पहले तीन दिनों में सिर्फ 12 करोड़ ही कमाए हैं. फ़िल्म बिज़नेस पंडितों के मुताबिक़ जंजीर को साल 2013 की सबसे बड़ी फ्लॉप करार दिया जा सकता है. वही ज़ंजीर के मुकाबले छोटे बजट और कम थियटरों में रिलीज़ हुई शुद्ध देसी रोमांस ने अच्छी शुरुआत की है. युवाओं को फ़िल्म पसंद आ रही है और बिज़नेस के लिहाज़ से तो यही लग रहा है कि प्रियंका चोपड़ा अपनी बहन परिणीती से पीछे रह गई हैं. तस्वीर में जो आप ये मूछें देख रहे हैं ये मूछें अभिनेता रणवीर सिंह की पर्सनेलिटी का हिस्सा पिछले एक साल से बनी हुई हैं. किसी पार्टी फंक्शन या फिर किसी अवार्ड समारोह रणवीर हर जगह इन मूछों के साथ ही नज़र आए. लेकिन अब रणवीर ने तय किया है कि वो आठ अक्टूबर को इन मूछों को साफ कर देंगें. संजय लीला भंसाली की फ़िल्म राम लीला और यशराज की फ़िल्म ग़ुंडे के लिए रणवीर ने ये मूंछे रखीं थी. हालांकि इस बीच आई उनकी फ़िल्म लूटेरा में उनकी क्लीन शेव लुक थी पर फ़िल्म प्रमोशन के दौरान रणवीर ने इन मूछों के साथ ही नज़र आए. |
| DATE: 2013-09-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1355] TITLE: लोगों ने मुझे धोखा दिया: कंगना |
| CONTENT: गैंगस्टर वो लम्हे फ़ैशन तनु वेड्स मनु जैसी फिल्मों की ग्लैमरस अभिनेत्री कंगना रनाउत जितना अपनी दमदार भूमिका को लेकर चर्चा में रहीं हैं उतना ही वे विवादों में भी घिरी रही हैं. कभी उनके अफेयर्स पर विवाद होते हैं तो कभी उन्हें टैन्ट्रम क्वीन कहा जाता है. हाल ही में बीबीसी से बातचीत में कंगना ने दिल खोलकर बात की. मौका था उनकी निजी वेबसाइट के लॉन्च का. हमने उनसे जानना चाहा कि वे अपनी निजी ज़िंदगी के विवादों को लेकर क्या सोचती हैं निजी ज़िन्दगी से जुड़े विवादों और अफ़वाहों के बारे में कंगना बताती हैं सभी का अपना-अपना नज़रिया होता है अनुभव होते हैं मतभेद होते हैं तो विवाद के लिए भी जगह बन जाती है. वे आगे कहती हैं ऐसा नहीं है कि अब इन विवादों से फ़र्क नहीं पड़ता पड़ता है. कई बार जब निजी बातें सार्वजनिक हो जाती हैं और गॉसिप बनकर चटखारों का विषय बन जाती हैं तो तकलीफ़ भी होती है. मगर फिर उन्हें हैंडल भी करना पड़ता है. कहते हैं कि इंसान के अतीत के फ़ैसले ही उसका आज बनाते हैं. कंगना जब से फिल्मों में आईं उनका नाम किसी न किसी से जुड़ता रहा. पहले उनका नाम आदित्य पंचोली से जोड़ा गया. फिर अध्ययन सुमन से उनके प्रेम प्रसंग पर चर्चे हुए. अतीत को लेकर उनके मन में कहीं किसी तरह का पछतावा तो नहीं. वे कहती हैं अफ़सोस तो नहीं होता. आप किसी हालात से गुज़रे हों या किसी भी तालमेल में रहे हों ऐसा नहीं होता कि आप कुछ सीखते नहीं हैं. हर अनुभव एक सबक होता है. उसमें ये सोचना कि ऐसा नहीं होता तो वैसा होता बेवकूफी है. क्योंकि कितने अरबों-खरबों पल और कितने अनगिनत इत्तेफ़ाक आपको इस मुकाम यानी वर्तमान तक लाते हैं. इस फ़लसफ़े से तो सभी वाकिफ़ हैं कि एक भी सेकेंड इधर-उधर हो गया होता तो हम और आप यहाँ बैठे बातें न कर रहे होते. मैं अपनी ज़िंदगी को अध्यात्मिक नज़रिए से देखती हूँ. पर्दे पर ट्रेजेडी क्वीन के किरदार बखूबी अंजाम देने वाली कंगना के बारे में कहा जाता है कि वे प्यार के मामले में अनलकी साबित हुई हैं. क्या अब प्यार को लेकर उनके मन में कड़वाहट है इस सवाल पर वे कहती हैं माना मुझे लोगों ने धोखा दिया मेरे साथ बुरा बर्ताव किया पर परिवार और दोस्तों के मामले में मैं लकी हूँ. मेरा परिवार मुझे बहुत चाहता है. जहाँ तक किसी ख़ास दोस्त या किसी ख़ास शख़्स की बात है तो फिलहाल मेरे पास इतना वक़्त नहीं है. जब वक़्त आएगा तब उसे भी मौका दूँगी. फिलहाल मैं सिंगल हूँ. कंगना एक अच्छी अभिनेत्री हैं ये सभी मानते हैं पर उनके साथ काम करनेवालों का इल्ज़ाम है कि उनके नाज़-नखरे बहुत होते हैं. कहा जाता है कि आमतौर पर वे सेट पर सामंजस्य नहीं बिठा पातीं. कुछ अरसा पहले डेविड धवन की रास्कल के दौरान उन पर ये इल्ज़ाम लगा था. इस आरोप पर वे कहती हैं सबका स्वभाव अलग होता है. मैं स्वभाव से थोड़ी ज़िद्दी हूं अड़ियल हूं और मुझे कई बार बहुत ग़ुस्सा आ जाता है. अगर मुझे दाएं जाना है तो दुनिया की कोई ताक़त मुझे बाएं नहीं भेज सकती. मेरा यह स्वभाव बचपन से है. कई लोग इसे बुरा मानते हैं पर कई इस ज़िद्दी स्वभाव के कारण मेरी क़द्र करते हैं. वे कहती हैं मुझे अपने इस स्वभाव का ख़मियाज़ा भी भुगतना पड़ा है. मेरे हाथों से कई बार चीजें छिन जाती हैं. मगर यह भी महसूस होता है कि मेरा ज़िद्दीमिज़ाज ही मुझे इस मुकाम तक लाया है. ये बदतमीजियां और ज़िद मैंने अपने घर में न की होतीं तो शायद मैं यहाँ न होती. एक तरफ कंगना तनु वेड्स मनु के दमदार किरदार में सबका दिल जीत लेती हैं तो दूसरी ओर रास्कल्स और डबल धमाल में बिकनी बेब और अर्थहीन भूमिकाएं कर दर्शकों को निराश कर देती हैं. इस पर वे कहती हैं देखिए यह फिल्म इंडस्ट्री काफी असुरक्षित जगह है. कई बार आप पैसों के लिए ऐसे रोल कर जाते हैं जिन्हें लेकर आप खुद भी खुश नहीं होते. रास्कल्स या डबल धमाल जैसी फिल्में करने का दुःख नहीं है पर मैं यह जान चुकी हूँ कि वो मेरा अंदाज़ नहीं है. कंगना के नाम पर इंटरनेट पर कई फ़र्ज़ी अकाउंट्स मौजूद हैं. उनकी वेबसाइट इसी को ठीक करने की कोशिश है. मुझे लगा कि मुझसे जुड़ी जानकारी सही माध्यम से बाहर नहीं जा पा रही है. इसके अलावा ट्विटर और फ़ेसबुक मेरा समय बहुत खाता है तो मुझे लगा कि वेबसाइट लॉन्च करना सही होगा. सच कहूँ तो आज तक मेरे और मेरे प्रसंशकों के बीच कोई सीधा ज़रिया रहा ही नहीं. मेरी कई फ़िल्में आ रही हैं जैसे कृष 3क्वीनरिवॉल्वर रानीउंगली और रज्जो. मुझे लगा कि मुझे अपने फ़ैन्स से जुड़ने की ज़रूरत है. इस वेबसाइट का सबसे बड़ा आकर्षण होगा कंगना का ब्लॉग और रचनात्मक बातचीत. जैसे कंगना की पसंद-नापसंद डायट. इसके अलावा दूसरी जानकारियां भी वहां होंगी. |
| DATE: 2013-09-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1356] TITLE: और ये हैं केबीसी 7 के पहले करोड़पति |
| CONTENT: मुंबई डायरी में पढ़िए कि क्या सोचती हैं करीना कपूर अपने पति सैफ अली खान के बारे में. क्यों नहीं है उन्हें परहेज़ ऑनस्क्रीन किसिंग से. और क्या हैं इरादे कौन बनेगा करोड़पति 7 के पहले करोड़पति के. अभी कौन बनेगा करोडपति के सातवें सीज़न की शुरुआत ही हुई है और शुरू होते ही उसे मिल गया है अपना पहला करोड़पति. उदयपुर के ताज मोहम्मद रंगरेज़ हैं केबीसी 7 के पहले करोड़पति. ताज मोहम्मद एक अध्यापक हैं जो उदयपुर के ही एक स्कूल में इतिहास पढ़ाते हैं. इस एक करोड़ रुपयों से ताज मोहम्मद एक नहीं कई बड़े काम करने की सोच रहे हैं. इन पैसों से वो अपनी बीमार बेटी का इलाज करना चाहते हैं. एक घर खरीदना चाहते हैं. साथ ही वो चाहते हैं कि तीन आर्थिक रूप से कमज़ोर बच्चों की शिक्षा का खर्च दें. इतना ही नहीं ताज मोहम्मद दो अनाथ लड़कियों की शादी भी करवाना चाहते हैं. जब से करीना कपूर और सैफ अली खान की शादी हुई है मीडिया में ये खबरें आने लगी कि अब करीना बड़े परदे पर किसिंग सीन नहीं करेंगी. लेकिन अगर करीना की माने तो इस बात में कोई सच्चाई नहीं है. वो कहती हैं मैं एक अभिनेत्री हूं. अगर कोई किसिंग सीन कहानी का ज़रूरी हिस्सा है तो मुझे वो दृश्य फिल्माने में कोई परहेज़ नहीं है. साथ ही करीना ये भी बात साफ़ कर देना चाहती हैं कि बतौर अभिनेत्री उन्होंने अपने लिए ऐसी कोई सीमा नहीं बांध राखी जो उनके काम के आड़े आए. वो कहती हैं मैंने हमेशा से ही स्क्रिप्ट को सबसे ऊपर रखा है. जैसा स्क्रिप्ट में होता है मैंने वैसा ही करती हूं. एक फ़िल्मी पत्रिका के लांच पर मीडिया से बात करते हुए करीना ने अपने पति सैफ अली खान की भी जम कर तारीफ की. करीना कहती हैं सैफ भारत के सबसे स्टाइलिश अभिनेता हैं. इस बात में कोई शक ही नहीं है. अगर वो एक टी-शर्ट और जीन्स में भी होते हैं तब भी कमाल दिखते हैं. सैफ की वजह से मैं भी हमेशा बन-ठन के ही रहती हूं. अपने ज़माने में जंपिंग जैक के नाम से मशहूर अभिनेता जीतेंद्र कहते हैं कि उन्होंने जो भी डांस सीखा है वो उनके घर के पास होने वाले जन्माष्ठमी और गणेश चतुर्थी उत्सव से ही सीखा है. जीतेंद्र हर साल अपने घर गणपति स्थापति करते हैं. जीतेंद्र कहते हैं कि उनके लिए गणेश उत्सव के बहुत मायने हैं. वो कहते हैं जब मैं बच्चा था तो एक महीना पहले से ही इस त्यौहार की तैयारी में लग जाता था. आज भी उसी उत्साह से मैं गणपति मनाता हूं. |
| DATE: 2013-09-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1357] TITLE: आपको कैसी लगी 'डायना'? |
| CONTENT: ब्रिटेन की राजकुमारी डायना के जीवन पर बनी फ़िल्म डायना की जमकर आलोचना हुई है. फ़िल्म में अभिनेत्री नाओमी वाट्स ने डायना का किरदार निभाया है. फ़िल्म गुरुवार को लंदन में रिलीज़ हुई. इस फ़िल्म में भारतीय मूल के अभिनेता नवीन एंड्र्यूज़ ने दिल के सर्जन हसनत ख़ान का किरदार निभाया है जिनसे डायना का दो साल तक प्रेम प्रसंग चला था. फ़िल्म बनाने वाली कंपनी का कहना है कि उन्होंने डायना के जीवन के आखिरी सालों को लेकर पैनी नज़र वाली और संवेदनशील फ़िल्म बनाने का बीड़ा उठाया था. आलोचकों ने इस फ़िल्म को भयानक और दखल देने वाला बताया है. द टाइम्स की फ़िल्म आलोचक केट मुइर ने फ़िल्म को एक स्टार दिया है. केट ने फ़िल्म की छटपटाती हुई शर्मनाक स्क्रिप्ट को निशाना बनाया है. द मिरर के डेविड एडवर्ड्स ने फ़िल्म को सस्ती और उत्साहहीन कोशिश बताया है जो चैनल 5 की हफ़्ते के बीच में दोपहर में दिखाई जाने वाली फ़िल्म जैसी लगती है. इसी तरह डेली मेल में क्रिस्टोफ़र टूकी ने भी फ़िल्म को एक स्टार दिया है. टूकी ने फ़िल्म को बेहद बेहद फीका बताया है. टूकी लिखते हैं फ़िल्म उतनी सनसनीखेज़ या भद्दी नहीं है जितना डर था लेकिन शाही परिवार को कुछ ज़्यादा दिखाया गया है. गार्डियन में पीटर ब्रैडशॉ ने लिखा मैं कार क्रैश ड्रामा शब्द का इस्तेमाल करने में हिचकूंगा लेकिन दुखद सच यह है कि साल 1997 के उस भयानक दिन के 16 साल बाद उनकी एक बार फिर दुखद मौत हुई है. द इम्पॉसिबल और 21 ग्राम के लिए ऑस्कर में नामांकित होने वाली वाट्स की भी आलोचना की गई है. ब्रैडशॉ ने लिखा है वाट्स ने जो छाप छोड़ी है वो कुछ ऐसी है. हिरण जैसी आंखों के साथ लुभाना और उलाहने देना. वो ऐसी दिखती हैं जैसे जैफ़री आर्चर के लिखे दो घंटे के स्पिटिंग इमेज स्केच एक ब्रिटिश शो जिसमें कठपुतलियों का इस्तेमाल होता था में हों. डेविड एडवर्ड्स ताना देते हैं वाट्स न वेल्स की राजकुमारी जैसी दिखती हैं न अभिनय करती हैं और न वैसी महसूस होती हैं. सुनहरे बालों वाले विग में वेज़्ले स्नाइप्स अमरीकी अभिनेता ज़्यादा विश्वसनीय लगते. द इंडिपेंडेंट के जैफ़री मक्नैब ने फ़िल्म को तीन स्टार दिए हैं. उन्होंने वाट्स के गंभीर अभिनय की तारीफ़ की है लेकिन कहते हैं कि 44 साल की वाट्स उस किरदार जैसी नहीं लगतीं जिसे वह निभा रही हैं. वह लिखते हैं फ़िल्म की जो बात निराश करती है वो यह है कि मिज़ाज में अचानक कई बदलाव आते हैं. हालांकि द डेली एक्सप्रेस ने लिखा है कि यह इस पतझड़ में देखने लायक फ़िल्म है जो दर्शकों को रुला देगी. |
| DATE: 2013-09-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1358] TITLE: मेरी मुहब्बतें मेरी नाकामी की वजह नहीं: शाहिद |
| CONTENT: इन दिनों शाहिद कपूर अपनी आने वाली फ़िल्म फटा पोस्टर निकला हीरो के प्रमोशन में लगे हैं. लेकिन आज भी उनसे उनकी आने वाली फ़िल्म के बारे में पूछने से पहले ये पूछा जाता है कि क्या पिछले कुछ समय में मिली नाकामी की वजह उनके बहु-चर्चित प्रेम संबंध हैं बीबीसी से शाहिद ने कहा मेरे जीवन में कोई संबंध हैं या नहीं हैं उससे किसी पर क्या असर पड़ता है. मेरे निजी जीवन में अगर कोई उथल पुथल चल भी रही है तो उसे मैं फ़िल्म के सेट पर तो नहीं ले जा सकता. किसी फ़िल्म के सफल या असफल होने से मेरे अफेयर का क्या लेना देना है. वो कहते हैं एक अभिनेता के जीवन में ऐसा कई बार होता है कि उसकी सफलता और असफलता के लोग कई कारण सोच लेते हैं. लोग ये सोच कर बैठ जाते हैं कि अरे शाहिद की एक अदद प्रेमिका ज़्यादा हो गई है इसलिए इसकी फिल्में नहीं चल रही हैं. लेकिन फ़िल्म तो एक निर्देशक बनता है. मैं या मेरी गर्लफ्रेंड नहीं. लेकिन लोग इसी तरह चीज़ों को देखते हैं. मैं किसी को कोई दोष नहीं दे रहा लेकिन मैं चीज़ों को वैसे नहीं देखता. शाहिद चाहे कुछ भी कहें लेकिन हाल ही में ये भी सुनने में आया कि शाहिद और प्रियंका चोपड़ा फ़िल्म मिलन टॉकीज़ के सेट पर एक दूसरे से कतराते नज़र आए. लेकिन शाहिद एक बार फिर इस बात को सिरे से नकारते हुए कहते हैं अगर मीडिया वाले अपने अख़बार के पन्ने आठ से घटा कर तीन कर दें तो इस तरह की अफ़वाहें उड़ना अपने आप ही बंद हो जाएंगी. शाहिद ने पिछले तीन साल में जो दो फ़िल्में की वो हैं मौसम और तेरी मेरी कहानी और दोनों ही फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली. तो इन फ़िल्मों की असफलता के पीछे क्या कोई ख़ास वजह देखते हैं शाहिदशाहिद कहते हैं जब वक़्त सही चल रहा हो तो सब ठीक होता है और जब वक़्त ख़राब चल रहा हो तो आपका हर फैसला गलत साबित हो जाता है. ये फ़िल्म इंडस्ट्री की एक बहुत बड़ी सच्चाई है. वो कहते हैं हां ये बात भी ज़रूर है कि इन दोनों ही फ़िल्मों में कोई न कोई कमी ज़रूर रही होगी तभी ये फ़िल्में दर्शकों को पसंद नहीं आई. लेकिन बस मुझे इस बात की ख़ुशी है कि कभी किसी ने ये नहीं कहा कि उन्हें मेरा काम अच्छा नहीं लगा. शाहिद ये भी मानते हैं कि वो सीख रहे हैं और भविष्य में कोशिश करेंगे कि वो सही फ़िल्मों का चुनाव करें. शाहिद कहते हैं जब फटा पोस्टर निकला हीरो फ़िल्म के निर्माता रमेश तुरानी उनके पास इस फ़िल्म का प्रस्ताव लेकर आए तो उन्होंने झट से हां कर दी. इसमें शाहिद अपने रोल के बारे में कहते हैं फ़िल्म में मेरे किरदार का नाम है विश्वास राव. मेरा जो किरदार है वो बचपन से ही एक अभिनेता बनने के सपने देखता है. वो चाहता है कि उसके बड़े बड़े पोस्टर लगें. लेकिन उसकी मां चाहती है कि वो एक ईमानदार पुलिस ऑफिसर बने. फ़िल्म में बहुत बढ़िया कॉमेडी है. राजकुमार संतोषी ने इस फिल्म का निर्देशन किया है. राजकुमार संतोषी अंदाज़ अपना अपना घायल घातक दामिनी और हाल फिलहाल में अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी जैसी फ़िल्मों के लिए जाने जाते हैं. संतोषी के बारे में शाहिद कहते हैं अपने काम को लेकर राज जी में जो उत्साह है वो देखते हैं बनता है. उनका सेंस ऑफ़ ह्यूमर कमाल का है. जब राज जी ने हमें इस फ़िल्म की कहानी सुनाई थी तो हमारा हंसते-हंसते पेट दर्द हो गया था. मेरे साथ फ़िल्म की अभिनेत्री इलियाना डी क्रूज़ भी थी. हम सबका हंसने की वजह से बुरा हाल था. शाहिद तो यहां तक कहते हैं कि उन्होंने फटा पोस्टर निकला हीरो में राजकुमार संतोषी की नक़ल उतारी है. वो कहते हैं जैसा जैसा राज जी कहते गए मैं हूबहू वैसा वैसा करता चला गया. |
| DATE: 2013-09-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1359] TITLE: दुनिया को चैलेंज करने ही आया हूँ : इरफ़ान |
| CONTENT: इरफ़ान ख़ान की फ़िल्म लंच बॅाक्स आपको उस वक़्त की याद दिलाती है जब मोबाइल फ़ोन नहीं होते थे औऱ लोग ख़त लिखकर अपने प्यार का इज़हार किया करते थे. बॅालीवुड में अपनी अलग छवि रखने वाले इरफ़ान ने बीबीसी से खास बातचीत की. लंच बॉक्स में किरदार की कई छोटी-छोटी बारीकियां थीं. स्टेपलर उठाने से लेकर ट्रेन में सफ़र घर का अकेलापन और टिफ़िन खाने तक के दृश्य बेहद बारीकी से पेश किए गए हैं. लंच बॅाक्स में रोज़मर्रा की छोटी-छोटी आदतों का अभिनय करने वाले इरफ़ान ने अपने आदर्श के बारे में बताया. वे कहते हैं यह किरदार करते समय मैं अपने मामा से बहुत ज़्यादा प्रेरित था. मामू मंज़ूर अहमद सुबह सात बजे बस लेकर स्टेशन जाते ट्रेन पकड़ते ट्रेन से फिर चर्चगेट जाते दफ्तर पहुंचने के लिए वहां से फिर एक और ट्रेन लेते. फ़िल्म में मैंने अपने मामा के रोज़ शाम घर लौटने के बाद के हावभाव याद कर उन्हें किरदार में ढालने की कोशिश की. लंच बॅाक्स के साथ करन जौहर अनुराग कश्यप और सिद्धार्थ राय कपूर जैसे बड़े नाम जुड़ने पर इरफ़ान कहते हैं फ़िल्म बनाने के बाद हमें इसे बेचने के लिए खरीददार ढूंढने की ज़रूरत नहीं पड़ी. फ़िल्म बहुत तेज़ी से दुनिया भर में बिक चुकी है. फिल्म में यूनीवर्सल लैंग्वेज होने से पूरी दुनिया में लोग इसके साथ जुड़ रहे हैं. इरफ़ान की फ़िल्म लंच बॅाक्स प्रतिष्ठित कान फ़िल्म महोत्सव समेत पूरी दुनिया में वाहवाही बटोर चुकी है. उन्होंने कहा मैं इस दुनिया में चीज़ों को चैलेंज करने आया हूं. ख़ुद को भी चैलेंज करता रहूंगा. साथ में कुछ परिभाषाएं भी बदलें तो बढ़िया. लंच बॅाक्स को मिल रही तारीफ़ के बारे में फिल्म समीक्षक अरनव बनर्जी कहते हैं भारत में जो हिंदी फ़िल्में बनती रही हैं वे असल में भारत का चित्रण नहीं करतीं. हिंदी में फ़ैंटेसी फिल्में ज़्यादा बनती हैं . लंच बॅाक्स जैसी फ़िल्म की कामयाबी के बारे में उनका कहना है भारत में ऐसी फ़िल्में बहुत कम बनी हैं और जो बनी भी हैं उन्हें भारत से बाहर पहचान नहीं मिल पाई लेकिन मार्केटिंग और इंटरनेट के इस दौर में फ़िल्म निर्माताओं के प्रयास से लंच बॅाक्स सफल रही. यूनीवर्सल कहानी होने की वजह से दर्शक आसानी से इससे जुड़ पाता है. अरनव के मुताबिक लंच बॅाक्स की सफलता से ऐसी फ़िल्मों का बाज़ार बढ़ेगा. प्रसिद्ध लेखक सलमान रुश्दी ने भी लंच बॅाक्स की तारीफ की है. उन्होंने ट्विटर पर लिखा है मुझे लंच बॅाक्स बहुत अच्छी लगी. टेलुराइड फ़िल्म फ़ेस्टिवल में यह हिट रही है. काफ़ी वक़्त बाद एक बेहतरीन भारतीय फ़िल्म देखने को मिली. मेरे विचार में यह ऑस्कर के लिए कड़ी दावेदार है. |
| DATE: 2013-09-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1360] TITLE: 'चलती-फिरती लाश' पर ऑनलाइन कोर्स |
| CONTENT: क्या ज़ॉम्बी यानी ज़िंदा लाशें भी गंभीर शैक्षणिक अध्ययन का विषय हो सकता है क्या यह भविष्य की उच्च शिक्षा पद्धति का नया नमूना है एजूटेनमेंट यानी शैक्षणिक मनोरंजन की दिशा में अपनी तरह के इस सबसे बड़े प्रयोग का दावा किया जा रहा है. अमरीका की एक टेलीविज़न कंपनी ने केलीफ़ोर्निया के टॉप रैंकिंग विश्वविद्यालय की साझेदारी में हिट टीवी शो पर आधारित एक ऑनलाइन कोर्स तैयार किया है. शैक्षणिक अध्ययन और मनोरंजन उद्योग में धुंधली होती डिजिटल सीमाओं के बीच अगले महीने से यह कोर्स लॉन्च हो रहा है जिसे वॉकिंग डेड नाम की टीवी श्रंखला पर आधारित किया गया है. अब तक टेलीविज़न शो पर आधारित वीडियो गेम्स और मार्केटिंग उत्पाद तैयार होते रहे हैं मगर अपोकलिप्स यानी तबाही से निपटने और सामाजिक विघटन से बचाव के बारे में बनी इस ड्रामा सिरीज़ का अब अपना विश्वविद्यालय कोर्स होगा. इस ऑनलाइन कोर्स को तैयार करने वाले केलीफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के मुताबिक़ शैक्षणिक लिहाज़ से शो में दिखाई गई घटनाओं के वैज्ञानिक पहलुओं को समझाना काफ़ी मुश्किल और गंभीर काम है. इस कोर्स में एक भौतिक विज्ञानी तबाही के पीछे विज्ञान की जानकारी देंगे. जनस्वास्थ्य विभाग इस सिरीज़ के ज़रिए एक अहम सवाल की पड़ताल होगी कि पिछली महामारियों से हम क्या सीख सकते हैं गणित पर होने वाले लैक्चरों के ज़रिए बताया जाएगा कि कैसे कैलकुलस के बाद के गणित का इस्तेमाल जनसंख्या और महामारी की गत्यात्मकता समझने में हो सकता है. इस शो को एएमसी ने बनाया है जिसने मैड मैन ब्रेकिंग बैड और द किलिंग जैसी मशहूर सिरीज़ बनाई थीं. एएमसी की वाइस प्रेसीडेंट थेरेसा बेयर कहती हैं कि यह शो बिज़नेस और शैक्षणिक साझेदारी एक अनोखा शैक्षणिक अनुभव देने में कामयाब होगी. वह कहती हैं कि एएमसी पहला ऐसा मनोरंजन ग्रुप होगा जो ऑनलाइन शिक्षा के क्षेत्र में आ रहा है. वह इस कोर्स को शो के साथ गहरे और लंबे संबंध के बतौर देखना चाहती हैं. वॉकिंग डैड टीवी सिरीज़ को दुनियाभर में तक़रीबन एक करोड़ लोग देखते हैं. उम्मीद की जा रही है कि ऑनलाइन कोर्स के लिए आवेदन करने वाले छात्रों की तादाद भी लाखों में होगी. अगर यह प्रयोग कामयाब रहा तो इस कोर्स के लिए ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म मुहैया कराने वाली संस्था इन्स्ट्रक्चर आगे भी दूसरे टीवी शो और यूनिवर्सिटी पाठ्यक्रमों के बीच तालमेल पैदा कर सकती है. इन्स्ट्रक्चर के सीईओ जोश कोट्स कहते हैं कि किसी सिरीज़ जैसे मैडमैन के आसपास किसी एडवर्टाइज़िंग पाठ्यक्रम को बुनना मुश्किल काम नहीं है. इस साझेदारी की वजह से मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्सेज़ यानी मूक्स के तेज़ी से बढ़ते दायरे में भी इज़ाफ़ा होगा. मूक्स को हाल ही में ऑक्सफ़ोर्ड ऑनलाइन डिक्शनरी में शामिल किया गया है. लाखों छात्रों ने पिछले साल ऑनलाइन पाठ्यक्रमों में ख़ुद को पंजीकृत कराया था. इससे लगता है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे पाठ्यक्रमों की मांग बढ़ रही है. हालांकि लाखों छात्र अपने कोर्स पूरे करने में नाकामयाब रहे. इससे पता चलता है कि ऑनलाइन पढ़ाई की दिशा में चुनौतियां भी कम नहीं हैं. आठ मॉड्यूल वाला यह कोर्स अक्टूबर के मध्य में शुरू होगा और हर किसी को मुफ़्त में उपलब्ध होगा. बस आपके पास इंटरनेट कनेक्शन होना चाहिए. पढ़ाई करने वाले छात्रों के ऑनलाइन इम्तिहान लिए जाएंगे और इसमें चर्चा के लिए ग्रुप होंगे. हालांकि इस कोर्स के छात्रों को इसके एवज में कोई क्रैडिट या डिग्री नहीं मिलेगी. इसलिए इसमें ऐसे छात्र ज़्यादा हिस्सा लेंगे जो अपने हिसाब से इसकी पढ़ाई करना चाहते हैं. तो क्या इसके कुछ ख़तरे भी हैं क्या केलीफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी अपने प्रॉस्पेक्टस में ज़ॉम्बी की पढ़ाई को दर्ज कराना चाहती है यूनिवर्सिटी में दूर शिक्षा की असोसिएट डीन मैलिसा लोबल कहती हैं जब हमने साझेदारी का फ़ैसला किया तो हमें पता था कि हर मॉड्यूल को शैक्षणिक दृष्टि से बेहद मज़बूत बनाना ज़रूरी होगा. कोर्स के पाठ काफ़ी कठिन और शानदार होंगे और शो से उनका सीधा संबंध होगा. सामाजिक विज्ञान के लैक्चरर जोआन क्रिस्टोफ़रसन कहते हैं कि यह मौजूदा मीडिया के इस्तेमाल की दिशा में एक क़दम आगे की चीज़ है. वह कहते हैं मुझे छात्रों को पढ़ाते समय अपने लैक्चर दिलचस्प बनाने के लिए उन्हें ताज़ा मुद्दों से जोड़ना पड़ता है. केवल इसलिए नहीं कि जिन्हें मैं पढ़ा रहा हूं वो अभी हाईस्कूल से निकले किशोर हैं बल्कि इसलिए कि क्लासिक सिद्धांतों को उनके लिए प्रासंगिक बनाना ज़रूरी है. हम इस सिरीज़ को पूरे कोर्स के लिए एक उदाहरण के बतौर पेश करने की कोशिश में हैं. इन्स्ट्रक्चर के प्रमुख जोश कोट्स कैनवस ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म मुहैया कराते हैं. उनके मुताबिक़ इसमें विज्ञान और सामाजिक विज्ञान के मुद्दों को टीवी शो के आधार पर देखने की कोशिश की जाएगी. वह कहते हैं यह काफ़ी मौजूं है. आतंकी हमले कटरीना तूफ़ान फ़ुकुशिमा जैसी चीज़ें हमारी दुनिया में रोज़ घटित होती हैं. जो एक तरह से स्थानीय तौर पर ही सही पर हमारे लिए अपॉकलिप्स की तरह हैं यानी हमारी बनाई दुनिया में तबाही लाती हैं. यह कोर्स लोगों को ऐसी आपदाओं को समझने का एक मौक़ा देता है. यूनिवर्सिटी ऑफ़ बकिंघम में सेंटर फ़ॉर एजुकेशन एंड एम्प्लॉयमेंट रिसर्च के डायरेक्टर एलन स्मिथर्स टीवी से जुड़े ऐसे ऑनलाइन पाठ्यक्रमों पर संदेह जताते हैं. उनका कहना है कि बगैर पूर्व योजना और निजी कॉन्टेंट के इस्तेमाल किए यह पाठ्यक्रम एक टेलीविज़न डॉक्यूमेंट्री से ज़्यादा कितना दे पाएगा यह देखना ज़रूरी होगा. |
| DATE: 2013-09-08 |
| LABEL: entertainment |
| [1361] TITLE: वो जिनके लिखे पर अमिताभ बोलते हैं 'देवियों और सज्जनों' |
| CONTENT: आर डी तेलांग ये ही वो शख्स हैं जिनके लिखे हुए शब्दों को अमिताभ बच्चन अपनी बुलंद आवाज़ में दोहराते हैं. आर डी तेलांग ने कभी नहीं सोचा था कि वो लेखक बनेंगे और वो भी अमिताभ बच्चन जैसी शख्सियत के लिए संवाद लेखक. साल 2000 में कौन बनेगा करोड़पति की शुरुआत हुई और उन्हें कार्यक्रम के लिए संवाद लिखने का मौक़ा मिला तो ये उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि थी. आज उन्हें केबासी से जुड़े 13 साल हो गए हैं जिसे वो किसी सुंदर सपने से कम नहीं मानते. वो कहते हैं कि 13 साल तक का यह सफर सपनों की दुनिया जैसा रहा. अमिताभ बच्चन के साथ काम करना ही अपने आप में सपने की दुनिया में विचरण करने जैसा है. तेलांग बचपन से ही एक बैंक अधिकारी बनना चाहते थे. लेकिन बहुत सी परीक्षाएं देने के बावजूद कुछ नहीं हो पाया. मध्य प्रदेश से होने के कारण उनकी हिन्दी अच्छी थी. इसलिए जब बैंक अधिकारी बनने का सपना टूटा तो मुंबई आकर पत्रकार बन गए. तेलांग बताते हैं कि मैंने बहुत से लोगों के इंटरव्यू किए इवेंट कवर किए और जब आप पत्रकार बन जाते हैं तो अच्छा लिखने का गुण आ ही जाता है और फिर धीरे-धीरे मैं एक लेखक बन गया और पत्रकारिता छोड़ दी. तेलांग कहते हैं शुरुआत में मैंने फ़रीदा जलाल शेखर सुमन और शाहरुख ख़ान समेत कई लोगों के लिए लिखना शुरू किया. इसके बाद मुझे केबीसी के बारे में पता चला और मैंने अपनी लिखी कुछ लाइनें केबीसी टीम के पास नमूने के तौर पर भेजीं. कार्यक्रम निर्माताओं और अमिताभ बच्चन को मेरा लिखा अच्छा लगा. इस तरह केबीसी के साथ मेरे सफ़र की शुरुआत हो गई. तेलांग बताते हैं केबीसी से जुड़े लोग रिसर्च कर यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि दर्शकों को पिछले सीजन में क्या अच्छा लगा और वो क्या देखना चाहते हैं और जब हमें यह पता चल जाता है तो हम दर्शकों की सोच को दिखाने की कोशिश में लग जाते है लेकिन एक लेखक के तौर पर यह बहुत मुश्किल काम होता है. केबीसी हर बार एक थीम को आगे बढ़ाती है और उसी के इर्द-गिर्द कार्यक्रम का निर्माण किया जाता है. तेलांग इसे समझाते हुए कहते हैं -केबीसी की एक थीम कोई भी सवाल छोटा नहीं होता इसमें हमने दिखाने की कोशिश की थी कि आप दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएँ क्या पता कौन सा सवाल आपको कब क्या हासिल करवा दे. इस थीम के बाद कोई भी इंसान छोटा नहीं होता इससे हम कहना चाहते थे कि कोई व्यक्ति किसी भी मज़हब और किसी भी आर्थिक स्थिति से ताल्लुक रखता हो लेकिन अगर उसमें योग्यता है तो वो कोई भी चीज़ हासिल कर सकता है. फिर हमने बनाया ज्ञान ही आपको आपका हक़ दिलाता है इसके पीछे हमारी सोच थी कि आप अमीर हों या ग़रीब लेकिन अगर आप ज्ञानी हैं तो आपको आपका हक़ ज़रूर मिलेगा. और अब हमारी थीम है- सीखना बंद तो जीतना बंद और इसके पीछे हमारी यह सोच है कि आप जिस भी उम्र के हों आप हमेशा सीख सकते हैं. हर दिन आप जो भी सीखते हैं वो कहीं ना कहीं काम आता है. अगर आप सीखना बंद कर देंगे तो जीतेंगे कैसे इस तरह की थीम बनाकर हम बड़े ही सीधे और सरल तरीके से अपनी बात लोगों के सामने रख सकते हैं. तेलांग के अनुसार अमिताभ बच्चन का योगदान बहुत ज़्यादा रहता है क्योंकि मैं जो भी लिखता हूँ वो उन पंक्तियों को बोलकर उनमें जान डाल देते हैं. उनकी आवाज़ उनका ज्ञान और शब्दों के प्रति उनकी समझ अद्भुत है. मैं जो कुछ लिखता हूँ अमिताभ उसमें अपने हिसाब से थोड़ा-बहुत बदलाव कर उसे अपने अंदाज में बोलते हैं. एक लेखक होने के नाते मुझे यह ध्यान रखना पड़ता है कि जो कुछ भी मैं लिखूं उसमें अमिताभ का अंदाज दिखाई दे और सीधे दर्शकों के दिल को छुए. न कि ऐसा लगे कि वो लिखा हुआ कुछ पढ़ रहे हैं. तेलांग का कहना है कि कई शोज़ में बहुत ड्रामा दिखाया जाता है लेकिन केबीसी में ऐसा नहीं होता. हम खिलाड़ियों को कोई ड्रामा करने को नहीं कहते क्योंकि यहाँ उसकी कोई गुंजाइश ही नहीं होती. यह खेल ज़रूर दिमाग़ का है लेकिन यहाँ आने वाला हर खिलाड़ी दिल से खेलता है. हम उनसे कोई हंगामा मचाने को नहीं कहते. खिलाड़ियों की जो कहानी हम दिखाते हैं वे खुद इतनी दिलचस्प होती हैं यहाँ आने वाले हर खिलाड़ी में इतनी सच्चाई और सपने होते हैं कि हमें अलग से ड्रामा करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. तेलांग का यह कहना है कि इस शो का फॉरमेट ही अपने आप में एक हीरो है और इसमें अमिताभ की उपस्थिति चार चाँद लगा देती है. मैंने कई होस्ट देखे हैं लेकिन अमिताभ जैसा होस्ट होना नामुमकिन है क्योंकि यहाँ वो अमिताभ न रहकर खिलाड़ियों के दोस्त बन जाते हैं और जब कोई खिलाड़ी करोड़पति बनता है तो अमिताभ सबसे ज़्यादा खुश होते हैं उसके परिवार से मिलते हैं उन्हें बधाई देते हैं. तेलांग का कहना है क़ि केबीसी तो साल में एक बार आता है वो भी तीन-चार महीने के लिए. इसलिए मैं फ़िल्मों कई इवेंट्स और फ़िल्मफ़ेयर जैसे अवॉर्ड्स के लिए लिखता हूँ. लेकिन इस बार केबीसी सीजन सात के बाद मैं खुद की एक फ़िल्म का निर्देशन करूँगा. अपनी फ़िल्म में अमिताभ को लेने पर तेलांग कहते हैं कि मैं तो यही चाहूँगा कि अमिताभ जैसा महानायक यह फ़िल्म करे बाकी सब स्क्रिप्ट पर निर्भर करेगा. तेलांग बताते हैं कि यह एक कॉमेडी फ़िल्म होगी क्योंकि उन्हें लगता है कि कॉमेडी में उनकी समझ काफ़ी अच्छी है इसलिए उसी में हाथ आज़माने वाले हैं. |
| DATE: 2013-09-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1362] TITLE: 'बॉलीवुड' का रिक्शावाला |
| CONTENT: दीपक शेवाले पिछले 13 सालों से ऑटो चला रहे हैं. दीपक शेवाले मुंबई के हज़ारों ऑटो रिक्शा चालकों में से एक हैं. लेकिन फिर भी उनमें कुछ ऐसा ख़ास है जो उन्हें बाकी रिक्शा चालकों से अलग बनाता है. 35 साल के दीपक पिछले 13 सालों से मुंबई की सड़कों पर ऑटो चला रहे हैं. लेकिन पिछले चार सालों में उन्होंने जो किया उसकी वजह से वो बॉलीवुड का रिक्शा वाला कहलाने लगे. दरअसल उन्होंने अपने ऑटो को बिलकुल फ़िल्मी ऑटो की तरह सजाया है. इसकी प्रेरणा उन्हें कई बॉलीवुड फ़िल्मों से मिली. फ़िल्म अकेला में अमिताभ बच्चन जिस तरह से अपनी कार को सजाकर रखते हैं और उसे रामप्यारी नाम दिया. फ़िल्म मेला में आमिर ख़ान फ़िल्म कारवां में जीतेंद्र जैसे कलाकारों के ट्रक जिस तरह से सजावट से भरपूर होते हैं वैसे ही दीपक ने अपने ऑटो की सजावट में पूरा ध्यान दिया है. दीपक के ऑटो में अख़बार फर्ट् एड बॉक्स से लेकर पंखे तक की सुविधा है. इस ऑटो में उन्होंने दो पंखे लगाए हैं. इसमें एक टेलीविज़न भी है जिसमें आप सफर करते हुए अपनी पसंदीदा फ़िल्में देख सकते हैं. रिक्शे में एक कैमरा भी है जिसके सहारे आस पास हो रही घटनाओं पर नज़र भी रखी जा सकती है. इसमें फर्स्ट एड बॉक्स भी है जिसमें सरदर्द सर्दी खांसी से लेकर मामूली चोट के लिए मरहम पट्टी का इंतज़ाम भी है. आग लगने की स्थिति में उसे बुझाने के लिए अग्नि शमन फायर इक्स्टिंगग्विशर भी है. कई भाषाओं के अख़बार भी वो अपने रिक्शे में रखना नहीं भूलते. इसके अलावा कई हैल्पलाइन नंबर भी हैं जैसे पुलिस अस्पताल महिलाओं और बच्चों संबंधी सुरक्षा हैल्प लाइन नंबर भी हैं. रिक्शे में मोबाइल चार्जर की सुविधा भी है. ऑटो में पानी की सुविधा भी है. दीपक के ऑटो में सांप्रदायिक सद्भाव से लेकर ग्लोबल वॉर्मिंग तक के लिए संदेश लिखे हैं. दीपक कहते हैं चार साल पहले जब मैंने ये सब शुरू किया था तो लोग मुझ पर हंसते थे. कहते थे इतना पैसा खर्च करने की क्या ज़रूरत है. लेकिन मैंने उनकी नहीं सुनी. आज जो मेरे रिक्शे में बैठता है वो मुझे कभी भूल नहीं पाता. इतनी सुविधाएं देने के बाद भी दीपक का दावा है कि वो अपनी सवारियों से एक पैसा भी अतिरिक्त चार्ज नहीं करते. दीपक दिन भर में क़रीब 800 रुपए ही कमा पाते हैं लेकिन फिर वो अपने ऑटो की देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ते. दीपक बताते हैं जब मेरे सजे हुए ऑटो को देखकर लोग पूछते हैं कि किराया कितना है तो मैं कहता हूं कि जो मीटर से बने वो देना. ये सुनकर सवारियां ख़ुश हो जाती हैं. दीपक के ऑटो में सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश देने वाली बातों से लेकर ग्लोबल वॉर्मिंग के ख़तरों के बारे में भी आगाह किया गया है. कई टीवी कलाकार दीपक के रिक्शे में बैठकर सफर करते हैं. उन्होंने दीपक का नंबर भी ले रखा है दीपक बताते हैं कि जब भी उनकी गाड़ी ख़राब होती है तो वो उन्हें ही फोन करते हैं. दीपक फ़िल्में देखते हैं और उनके पसंदीदा सितारे हैं आमिर ख़ान. दीपक कहते हैं आमिर दूसरे हीरो की तरह एक साल में कई फ़िल्में नहीं करते. वो मन लगाकर साल में एक ही फ़िल्म करते हैं. उनकी तरह मैं भी दिल लगाकर काम करने में यक़ीन रखता हूं. दीपक चाहते हैं कि आने वाले समय में वो अपने ऑटो में इंटरनेट और कूलर भी लगाना चाहते हैं. दीपक की तमन्ना है कि वो आमिर ख़ान को अपने ऑटो मे बैठाकर सैर कराएं. आमिर की तरह दीपक भी मुंबई के बांद्रा इलाके में रहते हैं. फ़र्क ये है कि वो बांद्रा की एक निम्न मध्यमवर्गीय कॉलोनी में रहते हैं. दीपक बताते हैं कि उनके ऑटो को देखकर कई यात्री ने उनका नंबर मांगते रहते हैं. इस वजह से अब उन्होंने अपना विज़िटिंग कार्ड भी बनवा लिया है. |
| DATE: 2013-09-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1363] TITLE: कहां गए 'केबीसी' के वो पहले करोड़पति |
| CONTENT: अमिताभ बच्चन के साथ हर्षवर्धन नवाथे और उनका परिवारसाल 2011 में मशहूर गेम शो कौन बनेगा करोड़पति में पांच करोड़ रुपए जीतने वाले सुशील कुमार अब भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा हैं. इतनी बड़ी राशि जीतने वाले वो इस गेम शो के इकलौते प्रतियोगी जो थे. उसके बाद उन्हें कई विज्ञापनों में भी काम करने का मौका मिला और डांस रियलिटी शो झलक दिखला जा में भी उन्होंने हिस्सा लिया. लेकिन क्या आपको पता है कि इस गेम शो में पहली बार एक करोड़ रुपए यानी कौन बनेगा करोड़पति के पहले करोड़पति हर्षवर्धन नवाथे कहां हैं और क्या कर रहे हैं. 13 साल पहले साल 2000 में कौन बनेगा करोड़पति में हर्षवर्धन ने सभी 15 सवालों के सफलतापूर्वक जवाब देकर एक करोड़ रुपए का इनाम जीता था. कौन बनेगा करोड़पति का सातवां संस्करण शुरू होने को है. हमने इस मौके पर सोचा कि हर्षवर्धन से बात की जाय. काफी प्रयासों के बाद उनका नंबर मिला और बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. पेश है उनसे बातचीत के कुछ चुनिंदा अंश उन्हीं के शब्दों में. साल 2007 में हर्षवर्धन ने शादी की. उनके दो बेटे हैं. 13 साल पहले मैंने ये कारनामा किया था लेकिन जब भी टीवी पर कौन बनेगा करोड़पति का प्रोमो देखता हूं या ये कार्यक्रम देखता हूं तो मुझे वो दिन याद आ जाते हैं कि मैंने कैसे तैयारी की थी. कैसे सारे सवालों के जवाब दिए थे. कैसे मेरी मुलाक़ात मिस्टर अमिताभ बच्चन से हुई थी. सब याद आता है. सेट पर हम सभी प्रतियोगी बैठे थे और अपने ख़ास अंदाज़ में चलते हुए अमिताभ बच्चन आए. वो सेट वो लाइट्स सब कुछ याद आता है. मैं केबीसी का एक प्रतियोगी रह चुका हूं. तो मुझे मालूम है कि एक मेज़बान के तौर पर अमिताभ बच्चन का काम कितना कठिन होता है. शो में उन्हें लाइव ऑडियेंस को संभालना पड़ता है. फिर शो प्रस्तुत करना होता है. प्रतियोगी की घबराहट भी दूर करनी होती है. बीच-बीच में वो चुटकुले भी सुनाते हैं लेकिन वक़्त रहते उससे वापस आकर दोबारा सवालों पर फ़ोकस करते हैं. मैं इनाम जीतने के बाद उनसे कई बार मिला. पूरी आत्मीयता से मुझसे और मेरे परिवार से मिलते हैं. मैं उनका ज़बरदस्त प्रशंसक हूं. अपने पिता और बेटे के साथ हर्षवद्धन नवाथे. सुशील कुमार ने शो में पांच करोड़ जीते और मेरा रिकॉर्ड टूटा. मुझे इसका कोई ग़म नहीं है क्योंकि रिकॉर्ड तो बनते ही टूटने के लिए हैं. लेकिन एक बात जो कोई बदल नहीं सकता. और वो ये है कि मैं कौन बनेगा करोड़पति का पहला करोड़पति हूं. कोई मुझसे ये ख़िताब नहीं छीन सकता. मैं एक बात और बताना चाहता हूं कि एक बार जो शख़्स हॉट सीट तक पहुंच जाता है उसे दोबारा हॉट सीट तक पहुंचाने का मौक़ा नहीं मिलता. चाहे उसने एक करोड़ रुपए जीते हैं या कुछ भी ना जीता हो. इसलिए केबीसी में मैं दोबारा हिस्सा नहीं ले सकता. नियम ऐसे ही हैं. हालांकि अपने काम की वजह से मैं बहुत व्यस्त रहता हूं लेकिन कोशिश करता हूं कि जब भी मौका मिले मैं ये शो ज़रूर देखता हूं. छोटे बेटे के साथ हर्षवर्धन. वो कहते हैं कि कौन बनेगा करोड़पति की वजह से उनका आईएस बनने का सपना अधूरा रह गया लेकिन उन्हें इसका कोई अफ़सोस भी नहीं है. इस कार्यक्रम में जब मैं गया तो 27 साल का था. मैं आईएएस की तैयारियां कर रहा था. लेकिन शो के बाद पैसा और फ़ेम मिला. मेरी तैयारियों का सिलसिला टूटा और मैं आईएएस नहीं बन पाया. तो कह सकते हैं कि केबीसी में जीतता नहीं तो शायद आईएएस बन जाता लेकिन फिर भी मुझे कोई अफ़सोस नहीं है. मैं लोगों की भलाई के लिए काम करना चाहता था और मेरा मौजूदा जॉब इसी तरह का है. मैं किसानों की भलाई से जुड़े एक कार्यक्रम में अपनी सेवाएं दे रहा हूं. कौन बनेगा करोड़पति की इनामी राशि ने मेरे जीवन पर बड़ा असर डाला. मैंने अपने पैसों से मुंबई में घर लिया. गाड़ी ख़रीदी. एमबीए करने ब्रिटेन गया. उसके बाद कॉर्पोरेट कंपनीज़ में नौकरी की. फिर कई एनजीओ से भी जुड़ा. मैंने ख़ासा पैसा निवेश भी किया. साल 2007 में मैंने शादी की. मेरी पत्नी सारिका एक मराठी टीवी और फ़िल्म अभिनेत्री हैं. हमारे दो बेटे हैं. मैं मुंबई के सायन इलाके में अपनी बीवी-बच्चों और मां-बाप के साथ रहता हूं. |
| DATE: 2013-09-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1364] TITLE: 'बहू' बनना चाहती हैं प्रियंका चोपड़ा |
| CONTENT: क्या करना चाहते हैं अमिताभ बच्चन अपने पिता हरिवंशराय बच्चन के लिए. क्या है प्रियंका चोपड़ा की ख़्वाहिश और कैसे मना रहे हैं ऋषि कपूर अपना जन्मदिन पढ़िए आज मुंबई डायरी मेंबॉम्बे हाईकोर्ट से हरी झंडी मिलने के बाद प्रियंका चोपड़ा की आने वाली फिल्म ज़ंजीर का प्रमोशन ज़ोरों पर है. हाल ही में प्रियंका चोपड़ा टीवी सीरियल बड़े अच्छे लगते हैं के सेट पर पहुंचीं. यहां उन्होंने कहा कि अगर मौका मिले तो वो भी किसी टीवी सीरियल में बहू बनना चाहेंगी. प्रियंका का यह भी कहना था कि जैसे टीवी में बहुएं सुंदर मेकअप और ज़ेवरात पहनती हैं वह भी वैसे ही सजना चाहती हैं. 31 वर्षीया प्रियंका चोपड़ा के रिलेशनशिप स्टेटस की अगर बात करें तो वो खुद को सिंगल कहना पसंद करती हैं. 70 के दशक में अपनी चॉकलेटी लुक के लिए मशहूर अभिनेता ऋषि कपूर आज पूरे 61 साल के हो गए हैं. 61 के होने के बावजूद भी ऋषि रिटायर होने के मूड में बिलकुल नहीं हैं बल्कि उन्होंने बॉलीवुड में अपनी दूसरी पारी शुरू कर दी है. आज भी अपने जन्मदिन पर वह छुट्टी पर नहीं हैं बल्कि काम कर रहे हैं. वो आज बेशरम के एक गाने की शूटिंग में व्यस्त रहेंगे. ख़ास बात यह कि ऋषि के साथ उनकी बीवी नीतू और बेटे रणबीर कपूर भी शूटिंग पर मौजूद होंगे. कौन बनेगा करोड़पति का नया सीज़न शुरू होने में अब बस कुछ ही दिन बचे हैं. इस शो में व्यस्त होने से पहले अमिताभ बच्चन ने एक ख़ास काम अंजाम दिया है. उन्होंने अपने पिता और मशहूर कवि हरिवंशराय बच्चन की याद में एक ट्रस्ट खोलने की घोषणा की है. अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर लिखा है कि वह काफी समय से अपने पिता के नाम पर एक मेमोरियल खोलना चाहते थे. करीना कपूर मां बनने के लिए तैयार हैं निजी जीवन में नहीं बल्कि बड़े परदे पर. करीना की आने वाली फिल्म गोरी तेरे प्यार में के कुछ दृश्यों में वो एक गर्भवती के रूप में नज़र आएंगी. इस फ़िल्म में उनके साथ हैं इमरान ख़ान. ये दोनों कलाकार इससे पहले एक मैं और एक तू में साथ काम कर चुके हैं. |
| DATE: 2013-09-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1365] TITLE: 'क्या बॉलीवुड समलैंगिक अभिनेता को स्वीकार करेगा' |
| CONTENT: मिस यूनिवर्स मिस वर्ल्ड या फिर मिस्टर यूनिवर्स प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने वालों पर बॉलीवुड की अक्सर मेहरबानी रही है. ज़ीनत अमान से सुष्मिता सेन ऐश्वर्या राय लारा दत्ता और प्रियंका चोपड़ा तक सभी को बॉलीवुड ने सिर आंखों पर बिठाया है. लेकिन क्या बॉलीवुड नोलन लुइस को भी मौक़ा देगाहाल ही में बेल्जियम में हुई मिस्टर गे प्रतियोगिता में भारत की ओर से हिस्सा लिया नोलन लुइस ने. वो इस प्रतियोगिता के आख़िरी 10 प्रतियोगियों में पहुंचने वाले पहले भारतीय हैं. प्रतियोगिता से लौटने के बाद क्या नोलन को भी किसी फ़िल्म का ऑफ़र मिला है. बीबीसी के इस सवाल के जवाब में नोलन कहते हैं हां मुझे एक फ़िल्म का प्रस्ताव तो मिला है लेकिन ये प्रस्ताव बॉलीवुड से नहीं है बल्कि एक अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्मकार की ओर से है. जहां तक बॉलीवुड का सवाल है क्या बॉलीवुड ऐसे अभिनेता को काम देगा जो समलैंगिक है. वह अपनी बात आगे रखते हुए कहते हैं ये ज़रूर है कि आज की तारीख़ में बॉलीवुड में ऐसी फ़िल्में बन रही हैं जहां मुख्य कलाकार एक समलैंगिक की भूमिका निभाते नहीं हिचकिचाते. लेकिन क्या बॉलीवुड एक ऐसे कलाकार को मौक़ा देने के लिए तैयार है जिसके समलैंगिक होने के बारे में दुनिया जानती है क्या बॉलीवुड एक समलैंगिक अभिनेता को स्वीकार करेगा. नोलन तो यहां तक कहते हैं कि क्या बॉलीवुड में यह बात हज़म हो पाएगी कि एक समलैंगिक पुरुष एक मुख्य धारा या यूं कहिए कि एक हीरो का किरदार निभा रहा है. फ़िल्म इंडस्ट्री भले एक समलैंगिक कलाकार को सहजता से न स्वीकारे लेकिन कुछ समय से सिल्वर स्क्रीन पर कई ऐसे किरदार देखने को मिले हैं जो समलैंगिक हैं. फिर चाहे वह मधुर भंडारकर की फ़िल्म फ़ैशन हो या करण जोहर की फ़िल्म दोस्ताना और स्टूडेंट ऑफ़ द इयर. इन सभी फ़िल्मों में समलैंगिक किरदार दिखाए तो गए हैं लेकिन बड़े ही मज़ाक़िया अंदाज़ में. तो क्या नोलन को कभी इस बात से आपत्ति नहीं होती कि फ़िल्मों में हमेशा समलैंगिक किरदारों इसी अंदाज़ में दर्शाया जाता है इसके जवाब में नोलन कहते हैं सिनेमा तो समाज का प्रतिबिंब है. जब तक ज़्यादा से ज़्यादा समलैंगिक पुरुष अपनी पहचान के बारे में खुलकर बात नहीं करेंगे तब तक परिस्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा. अपनी बात पूरी करते हुए नोलन कहते हैं दुर्भाग्य की बात ये है कि जो भी समलैंगिक पुरुष सामने आते हैं उनका व्यवहार महिलाओं की तरह होता है. और बॉलीवुड इसी बात को पेश करता है. जब तक हम यह बात मानने के लिए तैयार नहीं होंगे कि एक बलशाली पुरुष भी एक समलैंगिक हो सकता है तब तक कुछ नहीं बदलेगा. नोलन को कम उम्र में ही अपने समलैंगिक होने का एहसास हो गया था. वो कहते हैं आज मेरी उम्र 29 साल है. आज से दस साल पहले मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मैं बाक़ी पुरुषों से ज़रा अलग हूं. ऐसा नहीं है कि लड़कियों के साथ मेरे कभी संबंध नहीं बने. लेकिन किसी लड़की के साथ होने के बावजूद मैं वैसा महसूस नहीं कर पता था जैसा मेरे मित्र करते थे. तब मुझे लगा कि मैं अलग हूं. अपनी बात पूरी करते हुए नोलन कहते हैं 19 साल की उम्र में पहली बार मेरे संबंध एक पुरुष से बने. तब मुझे इस बात का यक़ीन हो गया कि मैं एक समलैंगिक हूं. जब नोलन के परिवार को उनके समलैंगिक होने के बारे में पता चला तब क्या हुआइसके जवाब में नोलन कहते हैं हालांकि मेरे परिवार की सोच काफ़ी आधुनिक है लेकिन तब भी उन्हें इस बात को स्वीकार करने में थोड़ा वक़्त लगा कि उनका ख़ुद का बेटा एक समलैंगिक है. उन्होंने इस तरह के व्यवहार के बारे में काफ़ी शोध की. मुझसे कहा कि मैं किसी मनोचिकित्सक से मिलूं. लेकिन धीरे-धीरे वो यह बात समझ गए कि समलैंगिक होना कोई गुनाह नहीं है. आज की तारीख़ में नोलन का परिवार उनके हर क़दम में उनका साथी है लेकिन नोलन को अगर तलाश है तो वह है एक जीवन साथी की. नोलन कहते हैं मेरे रिलेशनशिप स्टेटस की अगर बात करें तो अभी मैं अकेला हूं लेकिन मैं चाहता हूं कि मैं जल्द ही अपना घर बसा लूं. मैं तो बच्चे भी गोद लेना चाहता हूं. बस एक सही साथी की तलाश है. तो कैसा हो नोलन का मिस्टर राइट नोलन कहते हैं मैं चाहता हूं मेरा जो साथी हो वह मेरी ही तरह खुलकर बात करने वाला हो. वो भी मेरे ही तरह सारी दुनिया के सामने यह बात स्वीकारता हो कि वो एक समलैंगिक है. हां मैं ये भी चाहता हूं कि वो देखने में अच्छा हो लेकिन सबसे बड़ी बात ये कि वह ईमानदार हो. |
| DATE: 2013-09-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1366] TITLE: मैंने अपनी कोई हद तय नहीं की: वाणी कपूर |
| CONTENT: वाणी कपूर की पहली फ़िल्म शुद्ध देसी रोमांस है. वाणी कपूर की कहानी में ना ड्रामा है ना सस्पेंस है ना कोई रोमांच. ऐसा वो ख़ुद मानती हैं. दिल्ली की रहने वाली वाणी मॉडलिंग से फ़िल्मों में आ गईं हैं और इसके लिए उन्हें बिलकुल संघर्ष भी नहीं करना पड़ा. पहली ही फ़िल्म उन्हें यशराज जैसे बड़े बैनर की मिल गई. वो इस हफ़्ते रिलीज़ हो रही शुद्ध देसी रोमांस में सुशांत सिंह राजपूत और परिणीति चोपड़ा के साथ दिखेंगी. पेश है वाणी कपूर से की गई बातचीत के ख़ास अंश. मैं दिल्ली से हूं. घर में मां-बाप और बड़ी बहन है. मॉडलिंग और थिएटर करती थी. फिर शुद्ध देसी रोमांस की कास्टिंग निर्देशक शानू शर्मा से मुलाक़ात हुई. उन्होंने मुझे इस रोल के बारे में बताया और फ़िल्म के निर्देशक मनीष शर्मा से मुझे मिलाया. फिर मुझे यशराज स्टूडियो बुलाया गया. और इसके बाद तो ना जाने मेरे कितने ऑडिशन हुए. जितनी बार मैं यशराज स्टूडियो जाती उतनी बार मेरे ऑडिशन होते. आखिरकार मुझे चुन लिया गया. शुक्र है मैं हीरोइन बन गई वरना पता नहीं क्या बनती. शुद्ध देसी रोमांस में वाणी कपूर सुशांत सिंह राजपूत और परिणीति चोपड़ा के साथ दिखेंगी. फ़िल्मों में आने से पहले मैंने अंग प्रदर्शन या एक्सपोज़र को लेकर कोई सीमा तय नहीं की. दरअसल ये सब निर्भर करता है कि फलां सीन किस तरह से फ़िल्माया गया. शुद्ध देसी रोमांस में भी इस तरह के जो दृश्य हैं उन्हें बेहद ख़ूबसूरती से फ़िल्माया गया है. अगर मुझे अपने किरदार पर अपने निर्देशक पर और निर्माता पर भरोसा है तो मैं शर्माउंगी नहीं. मैं वो सीन कर लूंगी. वो सीन कहानी के हिसाब से होना चाहिएजब मैं दिल्ली में थी तो बॉलीवुड के बारे में दोस्त और आसपास के लोग तरह-तरह की बातें करते थे तो मुझे बड़ा डर लगता था. लोग कहते थे बॉलीवुड में कास्टिंग काउच बहुत होता है. वहां कामयाब होने के लिए समझौते करने पड़ते हैं. लेकिन यहां आने के बाद लगा कि सब सुनी सुनाई बातें हैं. एकाध कोई केस ऐसा हो तो उसके आधार पर पूरी इंडस्ट्री के बारे में ऐसी राय बनाना ग़लत है. मुझे ख़ुशी है कि मैंने अपना करियर यशराज जैसे प्रतिष्ठित बैनर के साथ शुरू किया. मुझे कभी भी किसी भी तरह के कास्टिंग काउच का सामना नहीं करना पड़ा. शुद्ध देसी रोमांस की कहानी का प्लॉट मूलत लिव इन रिलेशन पर आधारित है. लेकिन मैं अपनी सोच में मॉडर्न के साथ-साथ परंपरागत भी हूं. असल ज़िंदगी में मैं अगर किसी के साथ रहूं तो उससे शादी करना चाहूंगी. जिसके साथ मैं रहूं चाहूंगी कि वो मेरे विश्वास पर खरा उतरे. हालांकि मैं ये भी समझती हूं कि आजकल की ज़िंदगी में ऐसा इंसान मिलना बहुत मुश्किल है जो ताउम्र आपका भरोसेमंद हो. |
| DATE: 2013-09-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1367] TITLE: वियतनाम: 'बेसुरा' संगीत बचाने की मुहिम |
| CONTENT: विन्ह बाओ को सुनना एक दुर्लभ अनुभव है. 95 साल के यह कलाकार वियतनाम का पारंपरिक संगीत ज़िंदा रखने की मुहिम में जुटे हैं. विन्ह बाओ वियतनाम के पारंपरिक संगीत के सबसे महान कलाकारों में एक हैं और वियतनामी संगीत न्हाक ताई तू नाम बो यानी शौकिया लोगों के संगीत के सबसे बड़े संरक्षक हैं. वे ज्यादा चल-फिर नहीं पाते इसलिए जब मैं हो ची मिन्ह सिटी में उनके घर पहुंचा तो उनकी बेटी ने दरवाज़ा खोला. वह मुझे पहली मंज़िल पर बने उनके छोटे से संगीत कक्ष में ले गईं. संगीत के उस्ताद फ़र्श पर बैठे थे. दिखने में वे एक छोटे क़द के सफ़ेद बालों वाले मामूली आदमी लगे पर उनकी आँखों में चमक थी. जल्द ही मुझे पता चल गया कि उनकी बुद्धि और तेज़ी अभी भी बरक़रार है. उन्होंने अपने पीछे रखे एक अज़ीब से वाद्य यंत्र की ओर देखा और बजाने की पेशकश की. वे बताते हैं कि यह उनका सबसे पसंदीदा वाद्य यंत्र है. इसे डैन त्रान्ह या वियतनामी छहतारा कहा जाता है. पॉलिश की गई लकड़ी से बना छहतारा क़रीब एक मीटर लंबा और 15 सेंटीमीटर चौड़ा होता है. इसकी उत्तल सतह पर 17 तार हैं जो दो लकड़ियों से जुड़े हैं. बुज़ुर्ग कलाकार वाद्य यंत्र पर झुकते हैं और उसे एक हाथ से बजाना शुरू करते हैं जबकि उनका दूसरा हाथ तारों को दबाता चलता है. उनके हाथ आश्चर्यजनक ढंग से तेज़ी और सफ़ाई के साथ चल रहे हैं. मगर इसका नतीजा वो नहीं जिसकी मुझे उम्मीद थी. मुझे अचानक एक झरने जैसी आवाज़ सुनाई देती है. इसमें लय बेहद कम थी और कई सुर कानों तक आते हुए धुन से अलग सुनाई पड़ रहे थे. जैसे ही वह बजाना बंद करते हैं मैंने असहजता के साथ सिर हिलाया और मुस्कराकर प्रशंसा की मुद्रा में देखने लगा. मुझे लगा कि उन्हें पता चल गया है कि उनका वादन मुझे समझ नहीं आया है. वह बताते हैं आपको सही उतार-चढ़ाव का विचार भूलना होगा. वह कहते हैं वियतनामी संगीतकार अपने वाद्ययंत्रों को अपने हिसाब से या अपने गायकों की गायन शैली के मुताबिक़ ट्यून करते हैं. वियतनामी संगीत भाषा की रंगत का नतीजा है. ऊंची तान में किसी शब्द को गिरती हुई लय के साथ नहीं गाया जा सकता या इसका उल्टा भी मुमकिन नहीं है. ऐसे में सुर माधुर्य को सुरों में बदलाव के साथ विकसित किया गया है ताकि शब्दों की संगत को उससे मिलाया जा सके. वह कहते हैं कि इसी वजह से सुरों की सजावट और उन्हें संवारने पर ज़ोर दिया जाता है. यह एक वजह है कि पश्चिमी लोगों को वह लय से जुदा लगता है. विन्ह बाओ कहते हैं इसीलिए न्हाक ताई तू नाम बो की कला को ज़िंदा रखना मुश्किल हो गया है. जबकि वियतनामी नौजवानों के सामने पश्चिमी जगत अपने उम्दा वाद्ययंत्रों सही नोटेशन विस्तृत रंगपटल अनुशासित ऑर्केस्ट्रा पेश करता है. ऐसे में उन्हें अपने पुराने वाद्ययंत्रों की तरफ़ खींच पाना मुश्किल हो गया है. उनके पास दो तारों वाले चांद के आकार के तंबूरा डान न्गुयेट हवाइन गिटार की तरह सुरों को मोड़ने वाले भैंस के सींग से बना एकतारा डान बाऊ और कोकोनट वायोला डान गाओ रखे हैं. वह चेतावनी देते हुए कहते हैं नौजवान वियतनामी संगीत को एक फूहड़ बूढ़ी औरत की तरह देखते हैं. एक देश जो अपनी संस्कृति गंवा देता है उसके दिन भी कम ही रह जाते हैं. उनकी उम्र और उनकी बातों को सुनते हुए मैं वियतनामी संगीत के भविष्य को लेकर चिंतित हो उठा हूं. मगर मुझे तब ताज्जुब हुआ जब वो अचानक मुस्कराने लगते हैं और एक कंप्यूटर की तरफ़ इशारा करते हैं जो उनके पीछे रखा है. इसी के पास एक महंगी रिकॉर्डिंग डिवाइस रखी है. वह गर्व से बताते हैं मेरे आज बहुत से छात्र हैं. सारी दुनिया में मेरे शिष्य मौजूद हैं. विन्ह बाओ नई तकनीक को वियतनामी संगीत की विरासत को बचाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. वह कहते हैं उन्होंने क्लासिक न्हाक ताई तू नाम बाओ की कई धुनें रिकॉर्ड कर ली हैं और उन्हें लोगों को सिखा रहे हैं. अब वो स्काइप के ज़रिए भी संगीत शिक्षा देते हैं. 90 साल से ऊपर के विन्ह बाओ की उंगलियां कीबोर्ड पर भी उसी कुशलता के साथ चलती हैं जैसे कोकोनट वायोला पर. मेरे सामने कुछ ही क्षणों में वह टैक्सस में एक वियतनामी-अमरीकी महिला से बात कर रहे थे और उसे संगीत सिखा रहे थे. मेरे अनुवादक ने मुझे बताया कि विन्ह बाओ का संगीत इतना नाज़ुक है कि उसकी आंखों में आंसू आ गए हैं. अब मैं कुछ कुछ समझ पाया हूं कि असल में यह संगीत क्या है. विन्ह बाओ एक बार फिर झुककर अपने वाद्ययंत्र को बजाने लगते हैं. |
| DATE: 2013-09-01 |
| LABEL: entertainment |
| [1368] TITLE: फ़िल्म रिव्यू: सत्याग्रह |
| CONTENT: यूटीवी मोशन पिक्चर्स और प्रकाश झा प्रोडक्शंस की सत्याग्रह एक आदर्शवादी इंसान द्वारका आनंद अमिताभ बच्चन की कहानी है जो लोगों की भलाई और उनके अधिकारों के लिए सीधे सरकार से भिड़ जाता है. द्वारका आनंद एक रिटायर्ड स्कूल प्रिसिंपल हैं जो सिद्धांतवादी हैं. वो अंबिकापुर में अपने बेटे अखिलेश इंद्रनील सेनगुप्ता के साथ रहता है. इंद्रनील की शादी सुमित्रा अमृता राव से होती है. अखिलेश का दोस्त मानव राघवेंद्र अजय देवगन एक पूंजीपति है जिसके विचारों से द्वारका आनंद सहमत नहीं होता. असल में द्वारका मूलत पूंजीपतियों के ख़िलाफ़ हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ग़रीबों के हक़ का पैसा मारकर ये लोग अमीर बनते हैं. अखिलेश एक इंजीनियर जो सरकारी नौकरी करता है लेकिन शादी के फौरन बाद एक रोड दुर्घटना में उसकी मौत हो जाती है. गृहमंत्री बलराम सिंह मनोज बाजपेई 25 लाख रुपए के मुआवज़े की घोषणा करता है लेकिन सुमित्रा को सरकार से ये पैसे हासिल करने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ता है. सरकारी अफ़सर उसे पैसे देने के एवज़ में रिश्वत मांगते हैं. सुमित्रा उन पैसों से बच्चों के लिए स्कूल बनाना चाहती है. एक दिन द्वारका आनंद अनुदान लेने के लिए कलेक्टर के ऑफ़िस जाते हैं. वहां उनकी कलेक्टर से बहस हो जाती है और वो कलेक्टर को थप्पड़ लगा देते हैं. इस बात पर द्वारका आनंद को जेल में डाल दिया जाता है. मानव को जब ये बात पता लगती है तो वो वहां पहुंचता है और एक स्थानीय नागरिक अर्जुन सिंह अर्जुन रामपाल के सहयोग से जनता का समर्थन हासिल करता है और द्वारका आनंद को जेल से छुड़ाने की मुहिम छेड़ देता है. आखिर सरकार को झुकना पड़ता है और द्वारका आनंद को रिहा कर दिया जाता है. जेल से छूटने के बाद द्वारका मुआवज़े का चेक लेने से इनकार कर देते हैं और सरकार से कहते हैं कि जनता की जो भी मांगे हैं वो एक महीने के भीतर पूरी करे. इस आंदोलन में उनके साथ मानव अर्जुन सुमित्रा और एक टीवी पत्रकार यासमीन करीना कपूर भी जुट जाती हैं. आगे क्या होता है क्या सरकार झुक जाती है क्या द्वारका आनंद को अपने मिशन में कामयाबी मिलती है यही फ़िल्म की कहानी है प्रकाश झा और अंजुम राजाबाली की कहानी अन्ना हज़ारे के आंदोलन से काफ़ी प्रभावित लगती है. इस वजह से लोगों को कहानी से तारतम्य बिठाने में दिक्कत पेश नहीं आएगी. फ़िल्म के कई दृश्यों से दर्शक अपने को जोड़ पाएंगे. कई दृश्य दर्शकों की आंखों में आंसू भी लाएंगे. लेकिन कहानी की प्रकृति ही ऐसी है कि ये ख़ासी नीरस है. इसमे हल्के-फुल्के दृश्यों की सख्त कमी है. यही वजह है कि युवा वर्ग फिल्म से नहीं जुड़ पाएगा. हालांकि इसके बाद भी काम बन सकता था लेकिन स्क्रीनप्ले में सहूलियत के हिसाब से कुछ छूट ले ली गई है जिससे कहानी की ईमानदारी पर शक होता है. जैसे द्वारका आनंद पहले अर्जुन सिंह को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं लेकिन बाद में उसका समर्थन लेने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती. मानव को लेकर भी पहले द्वारका आनंद को परेशानी होती है लेकिन बाद में वो उसे भी स्वीकार कर लेते हैं. द्वारका आनंद और उनके समर्थकों की मांगे इतनी आदर्शवादी और सैद्धांतिक होती है कि दर्शकों को वो कई दफ़ा अव्यवहारिक लगेंगी. इंटरवल से पहले फिल्म की गति काफी तेज़ है और ये दर्शकों को बांधे रखती है. लेकिन इंटरवल के बाद फ़िल्म अपनी पकड़ खो देती है. क्लाईमेक्स में भी निर्देशक की हड़बड़ाहट साफ़ देखी जा सकती है. प्रकाश झा और अंजुम राजाबाली के लिखे संवाद अच्छे हैं लेकिन उन्हें और दमदार होना चाहिए थे. अमिताभ बच्चन ने अपने किरदार को बेहतरीन तरीके से निभाया है. वो इस रोल में ज़बरदस्त रहे हैं. एक सीन है जिसमें द्वारका आनंद भूख हड़ताल पर हैं. उसमें वो ख़ासे कमज़ोर लग रहे हैं और जिस तरीके से वो चल रहे हैं और बातें कर रहे हैं उनमें उनकी अभिनय क्षमता की रेंज देखी जा सकती है. अजय देवगन ने भी पूरी ईमानदारी से अपना रोल निभाया है. करीना कपूर भी टीवी पत्रकार के रोल में प्रभावी रही हैं. अर्जुन रामपाल भी ठीक रहे हैं. गृहमंत्री बलराम सिंह के रोल में मनोज बाजपेई ने शानदार काम किया है. उनके अभिनय के साथ-साथ संवाद अदायगी भी जानदार रही है. अमृता राव अपने छोटे से रोल में अच्छी लगी हैं. बाकी कलाकारों ने भी अच्छा काम किया है. प्रकाश झा का निर्देशन अच्छा है लेकिन उऩका कहानी कहने का ढंग स्क्रिप्ट की कमियां ढंक नहीं पाया है. सलीम-सुलेमान. आदेश श्रीवास्तव मीत ब्रदर्स अनजान और इंडियन ओशन का संगीत अच्छा है. रघुपति राघव राजा राम को प्रसून जोशी ने बेहतरीन अंदाज़ में अपने शब्दों में पिरोया है. जयेश प्रधान और उमा गैती की कोरियोग्राफी भी अच्छी है. सचिन कृष्ण का कैमरावर्क अच्छा है. संतोष मंडल की एडिटिंग और बेहतर हो सकती थी. कुल मिलाकर सत्याग्रह एक औसत फ़िल्म है. फिल्म के बॉक्स ऑफ़िस पर अच्छा प्रदर्शन करने के अवसर कम हैं क्योंकि युवा वर्ग को शायद ये अपील न कर पाए. मल्टीप्लेक्सेस में इसका व्यापार सिंगल स्क्रीन से बेहतर होगा. |
| DATE: 2013-08-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1369] TITLE: अब प्रचार का ज़रिया 'गोविंदा' |
| CONTENT: कृष्ण के जन्मदिन को पूरे भारत में धूम-धाम से मनाया जाता है लेकिन महाराष्ट्र में कृष्ण जन्माष्टमी का असली मज़ा अगले दिन होता है. इसे गोविंदा का दिन कहते हैं. मुंबई में कई गोविंदा मंडल बने हुए हैं. कृष्ण के ये भक्त उन की ही तरह दही-माखन के शौक़ीन हैं और इस शौक को पूरा करने के लिए हर साल दही-हांडी फोड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लेते है. दही की हांडी को करीब 40 फीट या उस से ज़्यादा ऊंचाई पर बांधा जाता है. फिर गोविंदाओं की टोली उसे फोड़ने के लिए पिरामिड का आकार बनाती है. एक के ऊपर एक जोश भरे गोविंदा चढ़ते हैं और इस हांडी को तोड़ जश्न मनाते हैं. मुंबई के दादर में रहने वाले 25 साल के कुमार पेंढणेकर बताते हैं मैं 2 साल की उम्र से हांडी फोड़ प्रतियोगिता में हिस्सा ले रहा हूँ. बचपन में मैं पिरामिड के सबसे ऊपर चढ़ हांडी फोड़ता था. हमारा साईं सेवा मंडल 1987 में बना और तब से हर साल हम जन्माष्टमी पर हांडी फोड़ते आ रहे हैं. कुमार पेशे से शारीरिक प्रशिक्षक हैं. वे इस साल दही-हांडी फोड़ने के दौरान सबसे नीचे खड़े होंगे. कुमार कहते हैं कि इस खेल का शौक फ्लैट और बंगले वालों की बजाय चॉल में रहने वाले लोगों में ज़्यादा है. ऐसा इसलिए क्योंकि चॉल के लोगों में एकता और हमेशा साथ रहने की भावना बचपन से ही डाली जाती है. गोविंदा की एक टीम में 150 से 200 सदस्य शामिल होते हैं. हांडी फोड़ने का अभ्यास जन्माष्टमी के 2 महीने पहले शुरू हो जाता है. इन गोविंदाओं को प्रशिक्षण देने के लिए हर टीम में एक कोच भी होता है. कुमार बताते हैं हम सब अपने अपने कामों से फारिग होकर अभ्यास के लिए हर रात 11 बजे के बाद मिलते थे. मुंबई में दही हांडी फोड़ने की प्रैक्टिस रात में ही की जाती है. मुंबई में हर इलाके में गोविंदा मंडप लगाए जाते हैं. इन इलाकों के नेता दही-हांडी फोड़ने वाले गोविंदा मंडलों के प्रायोजक बन कर इन संघों को काफी पैसा देते हैं. नेता अपने और अपनी पार्टी के प्रचार के लिए इन मंडलों को हर साल नई टी-शर्ट मुहैया कराते हैं और साथ ही पूरी मुंबई घूमने के लिए गाड़ी ट्रक बैंड-बाजे का भी इंतज़ाम करते हैं. कुमार अपने मंडल के बारे में बताते हैं हमने हमेशा आपस में चंदा जोड़कर ही गोविंदा में हिस्सा लिया है. कई राजनीतिक दल आते हैं अपने प्रचार के लिए लेकिन त्योहार पॉलिटिक्स के लिए नहीं है. हर साल ऊँची से ऊँची हांडी फोड़ने वाली टीम के लिए कई लाख के इनाम का ऐलान होता है. दही-हांडी के दिन मुंबई में ऐसे कई प्रोग्राम होते हैं जहाँ बड़े इनाम के साथ इन गोविंदाओं का जोश बढ़ाने के लिए कई फिल्म स्टार शामिल होते हैं. इस दिन शाहरुख़ खान अर्जुन रामपाल रोहित शेट्टी समेत बॉलीवुड की बड़ी हस्तियां जन्माष्टमी में हांडी फोड़ते नज़र आती हैं. अपने दल के बारे में बताते हुए कुमार पेंढणेकर कहते हैं हम हांडी-फोड़ने में कई बार इनाम जीत चुके हैं लेकिन हम सिर्फ इनाम के लिए नहीं बल्कि इस त्योहार के महत्व को बढ़ाने के लिए हिस्सा लेते हैं. मुंबई के विले पार्ले के एक एमएलए ने अपने यहां दही-हांडी जीतने वालों के लिए 11 लाख के इनाम का ऐलान किया है. |
| DATE: 2013-08-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1370] TITLE: क्या कटरीना से नाराज़ हैं ऋषि कपूर ? |
| CONTENT: क्या रणबीर कपूर के पिता ऋषि कपूर को कटरीना कैफ़ मंज़ूर नहीं वीना मलिक की ज़िंदगी में अब कौन आया और एक बार फिर गदर के लिए तैयार सनी देओल. पेश हैं आज मनोरंजन जगत की हलचल मुंबई डायरी में. जहां एक तरफ रणबीर कपूर और कटरीना कैफ़ के बीच कथित रोमांस की ख़बरें मीडिया की सुर्खियां आए दिन बनती रहती हैं वहीं अब ये भी ख़बर आ रही हैं कि रणबीर के पिता ऋषि कपूर को कटरीना कैफ़ पसंद नहीं हैं. मुंबई के तमाम अख़बारों और टीवी चैनलों में ये ख़बर आ रही है कि दोनों की साथ में तस्वीरें इंटरनेट पर जब से लीक हुई हैं तब से ऋषि कपूर ख़ासे नाराज़ हैं. अख़बारों के मुताबिक हाल ही में कटरीना जब रणबीर का हाल-चाल लेने उनके घर पहुंचीं तो ऋषि भी वहीं मौजूद थे. उन्होंने कटरीना को रणबीर से मिलने नहीं दिया और बाहर का रास्ता दिखाया. मल्लिका शेरावत और सनी लियोनी जल्द ही साथ-साथ एक टीवी शो में नज़र आएंगी. शो का नाम होगा मेरे ख़्यालों की मलिका. मल्लिका ने शो की शूटिंग उदयपुर में शुरू कर दी है और जल्द ही सनी लियोनी भी उनका साथ देने उदयपुर पहुंचेंगी. मशहूर टीवी अभिनेता रोहित रॉय शो के होस्ट होंगे. इस शो में मल्लिका 30 प्रतियोगियों में से अपने लिए दूल्हा चुनेंगी और सनी लियोनी इस काम में उनकी मदद करेंगी. यमला पगला दीवाना के सीक्वल के फ्लॉप हो जाने के बाद एक बार फिर गदर मचाने की ठानी है सनी देओल ने . गदर की ही तरह अपनी आने वाली फ़िल्म सिंह साहब द ग्रेट में वो एक बार फिर सिख किरदार में दिखेंगे. फ़िल्म का निर्देशन कर रहे हैं गदर के निर्देशक अनिल शर्मा. मुंबई में गुरूवार को मीडिया के सामने फ़िल्म का फ़र्स्ट लुक लॉन्च किया जाएगा. |
| DATE: 2013-08-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1371] TITLE: 'रिश्तों से ब्रेक' लेंगे माइकल डगलस और ज़ेटा जोंस |
| CONTENT: तेरह साल तक शादी के बंधन में बंधे रहने के बाद हॉलीवुड अभिनेता माइकल डगलस और अभिनेत्री कैथरीन ज़ेटा जोंस ने रिश्तों से ब्रेक लेने का फैसला लिया है. कैथरीन की प्रचार अधिकारी ने बीबीसी से कहा कि इस जोड़े ने अपनी शादी का फिर से मूल्यांकन करने का फैसला लिया था. 68 साल के डगलस और 43 साल की ज़ेटा जोंस की शादी 2000 में हुई थी. दोनों के डायलन 13 और कैरिस 10 नाम के दो बच्चे हैं. इस जोड़े ने हाल के वर्षों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना किया है. डगलस का 2010 में गले के कैंसर का इलाज हुआ था तो ज़ेटा जोंस को 2011 और इस साल की शुरुआत में अपनी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या का इलाज कराना पड़ा था. इस साल डगलस ने कान फिल्म महोत्सव में दावा किया था कि उनकी यह दशा मुख मैथुन करने की वजह से हुई है हालांकि उनकी तबीयत में अब सुधार आया है. डगलस और जोंस दोनों का जन्मदिन एक ही दिन 25 सितंबर को है. दोनों की मुलाक़ात 1998 में फ्रांस में होने वाले डांविल फ़िल्म समारोह में हुई थी. इसके दो साल बाद दोनों ने शादी कर ली थी. उनके पहले बच्चे का जन्म 2000 में हुआ था. इसके तीन महीने बाद उन्होंने न्यूयॉर्क के प्लाजा होटल में आयोजित एक भव्य समारोह में शादी की थी. गोल्डी हॉन क्रिस्टोफर रीव जैक निकोल्सन और ब्रैड पिट इस समारोह में उनके मेहमान थे. इस शादी की एक्सक्लूसिव तस्वीरें प्रकाशित करने के लिए ओके नाम की एक पत्रिका ने 10 लाख पाउंड का भुगतान किया था. लेकिन हलो नाम की उसकी प्रतिद्वंदी पत्रिका ने इस शादी की तस्वीरें प्रकाशित कर उसकी योजना पर पानी फेर दिया था. माना जाता है कि ये तस्वीरें किसी ने मेहमान या बैरा बनकर ली थीं. यह मामला अदालत में पहुँचा था. ब्रिटेन में लंबी चली क़ानूनी लड़ाई में इस दंपति ने कहा था कि हलो ने उनकी निजता का हनन किया है. इस मामले का समाधान 2007 में हुआ था जब हाउस ऑफ़ लार्ड्स ने अपने फ़ैसले में कहा कि हलो ने ओके की गोपनीयता का उल्लंघन किया है. ख़बरों के मुताबिक शादी से पहले इस जोड़े ने एक समझौते पर दस्तखत किए थे. इसके मुताबिक़ शादी के टूटने की दशा में ज़ेटा जोंस को शादी के हर साल के लिए 10 लाख पाउंड मिलेंगे. डगलस ने इस समझौते पर इसलिए ज़ोर दिया था क्योंकि तलाक के बाद उनकी पहली पत्नी डाएंड्रा को 44 मिलियन पाउंड का मुआवजा मिला था. इसी महीने अख़बार मिरर से डगलस ने कहा था कि उन्हें सबसे बड़ा पछतावा इस बात का है कि उन्होंने अपनी पहली शादी को जल्द ही खत्म नहीं किया. डाएंड्रा से उनकी शादी 1977 में हुई थी. दोनों 1995 में अलग हो गए थे. लेकिन उन्होंने 2000 तक तलाक के लिए आवेदन नहीं किया. उन्होंने कहा मेरे मन में उसके खिलाफ कुछ भी नहीं है मेरी पहली पत्नी वास्तव में मुझे बहुत प्रिय रही हैं. लेकिन हमें अपनी शादी को आठ या दस साल पहले ही तोड़ लेना चाहिए था. उन्होंने कहा यह समझने में मुझे अधिक समय लगा कि अगर आप समस्या के समाधान के लिए शादी के सलाहकार के पास जाते हैं तो उनके हित में है कि शादी को चलते रहने दिया जाए. इसी साक्षात्कार में डगलस ने ज़ेटा जोंस को इसलिए धन्यवाद दिया कि उन्होंने उन्हें दूसरी बार परिवार बसाने का मौका दिया. डगलस के मशहूर फ़िल्मों में वॉल स्ट्रीट और बेसिक इंस्टिंक्ट शामिल हैं. कैंसर का इलाज कराने के बाद उन्होंने बिहाइंड दि कैंडिलाब्रा से पर्दे पर वापसी की है. ज़ेटा जोंस को फ़िल्म शिकागो में उनकी भूमिका के लिए उन्हें ऑस्कर मिल चुका है. वे हाल ही में एक्शन फिल्म रेड-2 में हेलेन मिरेन और ब्रूस विलिस के साथ नज़र आईं. |
| DATE: 2013-08-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1372] TITLE: एकता कपूर करेंगी 'ऊ लाला' |
| CONTENT: एकता कपूर द डर्टी पिक्चर के गाने पर डांस के लिए तैयार जन्माष्टमी के आयोजनों के लिए बॉलीवुड ने कसी कमर प्रियंका चोपड़ा किससे हैं नाराज़ और क्या फ़िरोज़ ख़ान की जगह लेंगे अमिताभ बच्चन. मनोरंजन जगत की हलचल मुंबई डायरी में. बतौर निर्माता अपनी फ़िल्म द डर्टी पिक्चर के मशहूर गाने ऊ लाला पर अब एकता कपूर थिरकेंगी. लेकिन उनका ये गाना जनता के लिए या किसी सार्वजनिक समारोह में नहीं होगा. एकता कपूर इस गाने पर नाचेंगी अपनी क़रीबी दोस्त अनीता हसनंदानी की शादी पर. ये शादी गोवा में होगी. शादी समारोह में हिस्सा लेने के बाद एकता कुछ समय अपने पूरे परिवार के साथ छुट्टियां बिताएंगी. मुंबई मे कृष्ण जन्माष्टमी की तैयारियां ज़ोरों पर है . जगह-जगह दही हांडी के कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं जिसके लिए बॉलीवुड तैयार है. गुरुवार को होने वाली दही हांडी में शाहरुख़ खान अर्जुन रामपाल रोहित शेट्टी सिद्धार्थ मल्होत्रा और कई नामी कलाकार शिरकत करते नज़र आएंगे समय की पाबंद होने का दावा करने वाली प्रियंका चोपड़ा को किसी के लिए इंतज़ार करना पसंद नहीं है. लेकिन उनकी आने वाली फिल्म ज़ंजीर के हीरो राम चरण तेजा प्रियंका को इन दिनों हर प्रमोशनल इवेंट पर लंबा इंतज़ार करा रहे हैं. बीते दिनों मीडिया से बात करने आई प्रियंका इसी वजह से राम चरण तेजा से ख़ासी नाराज़ दिखीं. उस कार्यक्रम में भी उन्होंने प्रियंका को डेढ़ घंटे से ज़्यादा इंतज़ार कराया. निर्माता साजिद नाडियाडवाला की आने वाली फ़िल्म वेलकम बैक के लिए अमिताभ बच्चन को प्रस्ताव मिलने की चर्चा है. ये फ़िल्म साल 2007 में आई हिट फ़िल्म वेलकम का सीक्वल है. इसमें अनिल कपूर नाना पाटेकर के अलावा जॉन अब्राहम और श्रुति हासन की मुख्य भूमिका है. वेलकम में विलेन आरडीएक्स का जो किरदार फ़िरोज़ ख़ान ने निभाया था. साजिद नाडियाडवाला और निर्देशक अनीस बज़्मी सीक्वल में ये रोल बिग बी को देना चाहते हैं. हालांकि अमिताभ ने अब तक इस रोल के लिए हां नहीं की है. वेलकम में फ़िरोज़ ख़ान का रोल ज़्यादा बड़ा नहीं था. लेकिन अनीस बज़्मी के मुताबिक़ वेलकम बैक में अमिताभ बच्चन का रोल ख़ासा बड़ा होगा. |
| DATE: 2013-08-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1373] TITLE: 'मुझे 'सी-ग्रेड' की फ़िल्मों का शाहरुख़ कहते थे' |
| CONTENT: अमित पचौरी 150 से ज़्यादा लो बजट की फ़िल्मों में काम कर चुके हैं. जब हिंदी फ़िल्मों की बात आती है तो ज़हन में तुरंत मदर इंडिया मुग़ल-ए-आज़म शोले दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे वांटेड और दबंग जैसी फ़िल्मों के नाम दिमाग में आते हैं. लेकिन घर में हो साली तो पूरे साल दिवाली यौवन के लुटेरे और आई जवानी झूम के जैसी फ़िल्मों के नाम किसी के ज़हन में नहीं आते. कोई माने या न माने बॉलीवुड में बनने वाली सी-ग्रेड फ़िल्में भी हिंदी सिनेमा का ही हिस्सा हैं. एक वक्त ऐसा था जब इन फ़िल्मों का एक बड़ा बाज़ार था. इन फ़िल्मों की मांग थी. लेकिन धीरे धीरे इन फ़िल्मों का व्यापार कम होता चला गया. आज की तारीख़ में ये फ़िल्में ना के बराबर बन रही हैं. हिंदी सिनेमा के इसी हिस्से पर रोशनी डालने की एक कोशिश में बीबीसी ने मुलाक़ात की 150 से भी ज़्यादा सी-ग्रेड फ़िल्मों में काम कर चुके अभिनेता अमित पचौरी से. अमित के नाम कमसिन जंगली टार्ज़न और पतली कमर लंबे बाल जैसी फ़िल्में हैं. मैंने अपने करियर की शुरुआत टीवी सीरियल ॐ नमः शिवाय से की. उसके बाद मैंने कुछ और पौराणिक धारावाहिकों में भी काम किया. लेकिन फिर मुझे कुछ कम बजट की फ़िल्मों के ऑफर आए. मैं इंडस्ट्री के बारे में कुछ नहीं जानता था. मुझे नहीं पता था कि ये किस तरह की फ़िल्में हैं. मैंने एक के बाद एक कई फ़िल्में कर डालीं. जल्द ही मैं इन फ़िल्मों का एक बड़ा नाम बन गया. 90 के दशक में सी-ग्रेड फ़िल्मों का बोलबाला था. बॉलीवुड के कई जाने-माने अभिनेता भी ऐसी फ़िल्में कर रहे थे. मैं तो इन फ़िल्मों का एक ऐसा हीरो बन गया था जिसके नाम से ही फ़िल्म बिक जाया करती थी. इन फ़िल्मों से मैंने बहुत पैसा कमाया. इन फ़िल्मों ने मुझे बहुत कुछ दिया है. काम करना सिखाया है. मुझे इस बात का कोई ग़म नहीं है कि मैंने इनमें काम किया. आप यकीन नहीं मानेंगे कि इन फ़िल्मों में पैसों की कोई कमी नहीं थी. एक वक़्त ऐसा था जब मेरी गाड़ी का डैश बोर्ड पैसों से भरा रहता था. अमित ने पौराणिक धारावाहिकों से अपनी शुरुआत की. मैं इन फिल्मों का एक सुपरस्टार बन गया था. लोग कहते थे कि मैं सी-ग्रेड फ़िल्मों का शाहरुख़ ख़ान हूं. लेकिन थोड़े समय बाद मुझे ये सुनकर इसलिए अच्छा नहीं लगता था क्योंकि अब मेरी समझ में आने लगा था कि मैं किस तरह के सिनेमा का हिस्सा हूं. मेरी फ़िल्में और मेरा काम न तो मैं अपने परिवार को दिखा सकता था और न ही मेरे दोस्तों को. मेरे दोस्त भी मुझसे दूरी बनाने लगे थे. क्योंकि मैं सी-ग्रेड की फ़िल्मों का बड़ा स्टार बन गया था तो मेरे लिए अपनी इस छवि से बाहर निकलना बड़ा मुश्किल था. आज की तारीख में मैं सी-ग्रेड फ़िल्में नहीं करता. मैं कई टीवी धारावाहिकों में काम कर रहा हूं. लेकिन मुझे इस बात का कोई अफ़सोस नहीं है कि मैंने ऐसी फिल्मों में काम किया है. हां ये ज़रूर है कि इन फ़िल्मों को करके मुझे कभी कोई आत्मसंतुष्टि नहीं हुई. लोग मुझे इज़्ज़त की नज़रों से नहीं देखते थे. जब मैंने इन फ़िल्मों से निकलना चाहा तो किसी ने मेरा साथ नहीं दिया. मेरे कई दोस्त टीवी पर निर्देशन कर रहे थे. मैंने उनसे कहा कि वो अपने सीरियल में मुझे कोई रोल क्यों नहीं देते. इस बात पर वो यही कहते थे कि मेरी इमेज सी-ग्रेड फ़िल्मों की है मैं उनके सीरियल में फिट नहीं बैठता. अपनी इसी छवि को तोड़ने के लिए मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी. मैं अपने शरीर का काफी ध्यान रखता हूं. जिम जाता हूं. बॉडी बिल्डिंग करता हूं. हमेशा से ही मैं ऐसा ही रहा हूं. जब मैं सी-ग्रेड फ़िल्मों में काम कर रहा था उस वक़्त मेरे पास कई पोर्न फ़िल्मों के ऑफर भी आते थे. एक बार तो एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी से भी मुझे पोर्न फ़िल्म का ऑफर भी मिला. ऑफर इतना बड़ा था कि अगर कोई और होता तो शायद ये पोर्न फ़िल्म कर लेता. लेकिन मैंने मना कर दिया. सी-ग्रेड फ़िल्मों में काम करने की वजह से मेरी जो छवि बनी हुई है उसकी वजह से आज भी मुझसे सेक्शुअल फेवर्स मांगे जाते हैं. हर तीन दिन में मुझे इस तरह का ऑफर आता है. हमारी इंडस्ट्री में इस तरह के लोगों की कमी नहीं है. लेकिन मैं इन बातों पर ध्यान नहीं देता. अब तो फिर भी लोगों की हिम्मत नहीं होती कि वो सीधे आकर मुझसे कुछ कहें. पहले जब कोई ऐसा प्रस्ताव मेरे सामने रखता था तो स्थिति बड़ी ही अजीब सी हो जाती. जब मैं सी-ग्रेड फ़िल्में करता था उस वक़्त तो मुझे ऐसे-ऐसे फ़ोन आते थे कि मैं आपको बता भी नहीं सकता. अब भी लड़कियां मुझे मैसेज करती हैं और लिखती हैं कि वो मुझसे प्यार करती हैं. कम से कम पहले से तो बेहतर है. अमित को बॉडी बिल्डिंग का बहुत शौक है. आज की तारीख़ में किसी भी बात को छुपाना संभव नहीं है. एक अभिनेता के लिए तो बिलकुल भी नहीं. मेरी सी-ग्रेड की सभी फ़िल्में इंटरनेट पर मौजूद हैं. मेरा एक बेटा है. कई बार लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मैं नहीं चाहूंगा कि इंटरनेट से उन फ़िल्मों को हटा दूं. मैं हमेशा कहता हूं कि मैं ऐसा कुछ नहीं करना चाहता. वो फ़िल्में मेरी औक़ात हैं. मैं आज जहां भी हूं उन्हीं सी-ग्रेड फ़िल्मों के कारण हूं. अमित पचौरी आज कई टीवी चैनल्स के लिए काम कर रहे हैं. वो धारावाहिक शपथ का भी हिस्सा हैं. |
| DATE: 2013-08-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1374] TITLE: मैडोना सबसे ज्यादा कमाई करने वाली सेलेब्रिटी |
| CONTENT: पॉप स्टार मैडोना पिछले साल सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली सेलिब्रिटी रही हैं और उन्होंने मशहूर टीवी एंकर ओप्रा विन्फ्री और फिल्मकार स्टीवन स्पीगलबर्ग को भी पछाड़ दिया है. जानी मानी पत्रिका फ़ोर्ब्स का कहना है कि मैडोना ने साल भर में लगभग 12-5 करोड़ डॉलर यानी 817 करोड़ रुपए की कमाई की. इसमें न सिर्फ उनके एमडीएनए टूर का योगदान रहा बल्कि उनके ब्रांड वाले कपड़ों और परफ्यूम की बिक्री से होने वाली कमाई भी शामिल है. फ़ोर्ब्स का कहना है कि 1999 में जब से उसने जानी मानी हस्तियों की कमाई का रिकॉर्ड रखना शुरू किया है तब से ये एक साल में मैडोना की सबसे ज्यादा कमाई है. इस फ़ेहरिस्त में हॉलीवुड के फ़िल्मकार स्टीवन स्पीगलबर्ग 10 करोड़ डॉलर के साथ दूसरे पायदान पर हैं. उनकी कमाई में ईटी और जुरासिक पार्क जैसी फिल्मों से मिलने वाली रकम का योगदान रहा जिन्हें हाल ही में थ्रीडी में रिलीज़ किया गया था. इसके अलावा पिछले साल ऑस्कर जीतने वाली उनकी फ़िल्म लिंकन भी उनकी कमाई का ज़रिया रही. इसके अलावा यूनिवर्सल स्टूडियो थीम पार्कों में टिकटों से मिलने वाली राशि में भी उनका हिस्सा होता है. सबसे ज्यादा कमाई करने वालों की इस फ़ेहरिस्त में तीसरे पायदन के लिए 50 शेड्स ऑफ़ ग्रे की लेखक ईएल जेम्स लेखक और प्रजेंटर साइमन कोवेल और लेखक व रेडियो हस्ती हॉवर्ड स्टर्न के बीच टाई रहा जिनकी कमाई को 9-5 करोड़ डॉलर आंका गया है. थ्रिलर लेखक जेम्स पेटरसन 9-1 करोड़ डॉलर के साथ चौथे स्थान पर रहे जबकि उनके बाद हैं टीवी और रेडियो प्रस्तोता ग्लेन बेक जिन्होंने पिछले एक साल 9 करोड़ डॉलर की कमाई की. दस सबसे कमाऊ सेलेब्रिटीज़ की फ़ेहरिस्त में ट्रांसफ़ॉर्मर के निर्देशक माइकल बे 8-2 करोड़ डॉलर निर्माता जेरी ब्रुकहाइमर 8 करोड़ और पॉप स्टार लेडी गागा 8 करोड़ डॉलर भी शामिल हैं. फ़ोर्ब्स जानी मानी हस्तियों के एजेंटों मैनजरों निर्माताओं और अन्य स्रोतों से जानकारी लेकर उनकी कमाई का अनुमान लगाती है. इन आंकडों में टैक्स कटौतियां एजेंटों की फ़ीस या फिर सेलेब्रिटी होने के अन्य खर्चों को नहीं दर्शाया गया है. |
| DATE: 2013-08-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1375] TITLE: ज़ंजीर: अमिताभ राजी, सलीम-जावेद अड़े |
| CONTENT: बॉलीवुड की मशहूर लेखक जोड़ी सलीम-जावेद के तमाम विरोध के बावजूद 70 के दशक की क्लासिक फ़िल्म ज़ंजीर के रीमेक की रिलीज़ की तारीख़ तय कर दी गई है. फ़िल्म का प्रोमोशन जोर-शोर से शुरू हो चुका है. मगर सलीम-जावेद ने फ़िल्म के प्रदर्शन को अभी हरी झंडी नहीं दी है. केस अभी भी कोर्ट में है. ज़ंजीर का रीमेक हिंदी और तेलुगु दोनों भाषाओँ में एक साथ शूट हुआ और अब एक ही तारीख यानी छह सितंबर को प्रदर्शित भी हो रही है. फ़िल्म को लेकर सबसे बड़ा विवाद कॉपीराइट्स को लेकर रहा. जावेद अख्तर ने रॉयल्टी के रूप में तीन करोड़ की मांग की थी. जावेद की शिकायत थी कि फ़िल्म के मूल लेखक होने के नाते फ़िल्म की रीमेक बनाने से पहले उनसे अनुमति नहीं ली गई. फिलहाल मामला अदालत में है. लेकिन नई ज़ंजीर के निर्देशक अपूर्व लाखिया काफी नर्वस और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. उन्होंने बीबीसी से ख़ास बातचीत में बताया नर्वस और असुरक्षित होना बहुत ही स्वाभाविक है. हमारी न्याय व्यवस्था ही ऐसी है कि वह फैसला करने में वक़्त लगाती है. मुझे पूरा विश्वास है कि जो भी निर्णय आएगा वो उचित ही होगा. वो कहते हैं फिलहाल मेरे निर्माताओं ने मुझे ये बताया है कि मेरी फ़िल्म 6 सितंबर को प्रदर्शित हो रही है. मैं उसी अंदाज़ से प्रोमोशन और दूसरी तैयारियां कर रहा हूँ. फ़िल्म का रीमेक बनाते समय मूल लेखक की अनुमति लेना कितना ज़रूरी होता है यह सवाल पूछे जाने पर अपू्र्व ने कहा मुझे इसका जवाब देना अच्छा लगता. मगर केस अभी भी कोर्ट में है तो इस बारे में मुझे बात करने की अनुमति नहीं है. व्यवसायी और पुरानी ज़ंजीर में पार्टनर रहे प्रिंस तुली ने अपूर्व लाखिया और फ़िल्म के निर्माताओं पर केस दर्ज किया है कि उन्होंने फ़िल्म की शूटिंग में उस मोटर बाइक का इस्तेमाल किया है जो उन्होंने लाखिया को दोस्ती में दी थी. अपूर्व आगे कहते हैं लेकिन ईमानदारी से कहूँ तो मैंने इस ओर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया. क्योंकि जोया और फ़रहान मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं. सलमान और सोहेल भाई के लिए मैं क्रिकेट खेलता हूँ. हम एक दूसरे से इस बारे में बातें करते ही नहीं. वे लोग भी निर्माता-निर्देशक हैं. उन्हें पता है कि इंडस्ट्री में ये सब होता ही रहता है. मगर मुझे ज्यादा बुरा ये लगा कि एक आदमी ने मुझ पर मोटर बाईक का केस ठोक दिया. मुंबई से आया मेरा दोस्त एक अजनबी और मिशन इस्तांबुल के निर्देशक रह चुके अपूर्व का मानना है कि किसी भी नामी फ़िल्म की रीमेक बनाना दो धारी तलवार होती है. वे बताते हैं कई लोगों का मानना है कि क्लासिक को छूना नहीं चाहिए. और कई इसके हक में हैं. तो आप पर वो दबाव तो रहता ही है. मेरी ज़ंजीर मूल फ़िल्म के फ़िल्मकारों को मेरा एक ट्रीब्यूट है. जो ये कहते हैं कि मैंने इस फ़िल्म का रीमेक बनाने की हिम्मत कैसे की वो मेरा घर नहीं चलाते. निर्देशक आशुतोष गोवारिकर के सहायक रहे अपूर्व को भले फ़िल्म के लेखक सलीम-जावेद का विरोध झेलना पड़ा हो मगर फ़िल्म के हीरो अमिताभ बच्चन का उन्हें काफ़ी सहयोग मिला. अपूर्व कहते हैं अमित जी मुझे बहुत प्यार करते हैं. उन्हें और अभिषेक को प्रोमोज बहुत अच्छे लगे थे. उन्होंने ट्वीट भी किया था. मैं उनसे फ़िल्म के एक गाने मुंबई का हीरो के संदर्भ में मिला था. मुझे उसमें उनकी आवाज़ इस्तेमाल करनी थी. उन्होंने हमेशा मुझे निजी रूप से सपोर्ट किया है. अपूर्व और अभिषेक गहरे दोस्त भी हैं. अपूर्व लाखिया की इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं प्रियंका चोपड़ा और संजय दत्त. फ़िल्म में अमिताभ बच्चन की भूमिका को दक्षिण भारत के अभिनेता रामचरण निभाया है. तेलुगु में इस फ़िल्म का नाम तूफ़ान रखा गया है. |
| DATE: 2013-08-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1376] TITLE: 'शकुनि! मैं तेरी दूसरी टांग भी तोड़ दूंगा' |
| CONTENT: महाभारत का प्रसारण 25 साल पहले दूरदर्शन पर शुरू हुआ था. इस पर बीबीसी की ख़ास पेशकश के पहले हिस्से में हमने आपको बताया था कि युधिष्ठिर का किरदार निभाने वाले गजेंद्र चौहान और दुर्योधन का किरदार निभाने वाले पुनीत इस्सर की ज़िंदगी में महाभारत के बाद क्या बदलाव आए. इस शृंखला की दूसरी और आख़िरी कड़ी में जानिए भीष्म पितामह का किरदार निभाने वाले मुकेश खन्ना शकुनि का किरदार निभाने वाले गूफ़ी पेंटल और गांधारी का किरदार निभाने वाली रेणुका इसरानी की दास्तां उन्हीं के शब्दों में. मैंने सुना है कि टीवी पर दोबारा एक नया महाभारत लाने की तैयारी है. मैं कहता हूं कि 25 साल पहले जो महाभारत बन गया वैसा तो अब बन ही नहीं सकता. मैं ख़ुद भी चाहूं तो दोबारा भीष्म पितामह नहीं बन सकता. आज से चंद बरस पहले एकता कपूर भी जब अपना महाभारत टीवी पर लाई थीं तो मैंने कहा था कि वो पुरानी बात नहीं आ पाएगी. एकता कपूर ने नाराज़ होकर कहा था कि मुकेश खन्ना ने बिना मेरे सीरियल का एक भी फ़्रेम देखे ये बात कैसे कह दी. मैं आपको बताऊं कि महाभारत से पहले मैंने क़रीब 15 फ़िल्में की थीं. कई डिब्बा बंद हो गईं और जो रिलीज़ हुईं वो सब फ़्लॉप हो गईं. लेकिन महाभारत ने जैसे क़िस्मत ही पलट दी. लोगों ने कहा भैया कहां थे तुम. मैंने कहा बस यहीं था. आप लोगों की नज़रें नहीं पड़ीं. मैं महाभारत में अर्जुन या कर्ण का किरदार निभाना चाहता था. फिर मुझे दुर्योधन का किरदार ऑफ़र हुआ लेकिन मैंने साफ़ मना कर दिया. सबने कहा कि मैं पागलपन कर रहा हूं क्योंकि दुर्योधन का किरदार काफ़ी वज़नदार था. लेकिन मैंने कहा कि मैं निगेटिव रोल कर ही नहीं सकता. तब मुझे द्रोणाचार्य का किरदार मिला जो मैंने स्वीकार भी कर लिया. लेकिन मेरी क़िस्मत में तो आयुष्मान भव कहना लिखा था. भीष्म पितामह का रोल विजेंद्र घाटगे को दिया गया. लेकिन शायद उन्हें सफ़ेद दाढ़ी लगाना गवारा नहीं था. वो नहीं आए. तब मुझे इस रोल को करने का सौभाग्य मिला और मैं इस बात को अपनी ख़ुशनसीबी मानता हूं. महाभारत को लोगों का अपार प्यार मिला. ऐसी कामयाबी आज तक किसी भी टीवी कार्यक्रम को नहीं मिली. लोग मज़ाक में कहते थे कि कोई दुश्मन देश भारत पर महाभारत के प्रसारण के वक़्त हमला कर दे तो जीत जाएगा क्योंकि उस वक़्त पूरा देश और सुरक्षा बल भी सीरियल देख रहे होते. वैसे तो मुझे महाभारत करने के 90 फ़ीसदी फ़ायदे हुए लेकिन कुछ नुक़सान भी हुए. भीष्म पितामह का किरदार निभाने के बाद मुझे ज़्यादातर बुज़ुर्ग किरदारों के रोल मिलने लगे. मुझे शाहरुख़ ख़ान अक्षय कुमार से लेकर बॉबी देओल तक के पिता के रोल मिलने लगे. हद तो तब हो गई जब फ़िल्म यलग़ार में मैंने फ़िरोज़ ख़ान साहब के पिता का रोल निभाया. लोग हंसते जब स्क्रीन पर ख़ान साहब मुझे डैड डैड कह कर बुलाते. लेकिन इन चंद बातों को छोड़ दिया जाए तो महाभारत मेरे लिए मील का पत्थर साबित हुआ. महाभारत जैसे रोल तो कहते हैं ना कि ज़िंदगी में एक बार ही मिलते हैं. मैं इस महाकाव्य का हिस्सा बनने पर गर्व महसूस करता हूं. मुझे हर जगह प्रशंसकों का भरपूर प्यार मिलता है. लोग मुझसे नफ़रत भी करते हैं और आशीर्वाद भी लेते हैं. मुझे आज भी लोग शकुनि मामा कहते हैं. मैंने शकुनि का रोल निभाने के अलावा महाभारत के लिए कास्टिंग डायरेक्टर और प्रोडक्शन डिज़ाइनर की ज़िम्मेदारी निभाई. महाभारत शुरू होने से पहले रामायण के रूप में बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम आ चुका था. ऐसे में उसके जैसी कामयाबी पाना बेहद मुश्किल माना जा रहा था. लेकिन महाभारत का प्रसारण शुरू होने के एक हफ़्ते बाद जो टीआरपी आई उसमें कमाल हो गया. महाभारत ने नए रिकॉर्ड बनाए. उसके बाद तो जैसे कामयाबी और लोकप्रियता का नित नया इतिहास रचा जाने लगा. मैं आपको एक मज़ेदार वाक़या बताता हूं. आपको पता ही होगा कि शकुनि का मेरा किरदार लंगड़ा कर चलता था. जब महाभारत का प्रसारण चल रहा था तो उस वक़्त मुझे रोज़ाना प्रशंसकों से हज़ारों चिट्ठियां मिलती थीं. ऐसे ही मुझे एक सज्जन की चिट्ठी मिली जिसमें उन्होंने लिखा था ओए शकुनि तूने बड़ा ख़राब काम किया. पांडवों और कौरवों के बीच फूट डाली. जुआ करवाया. द्रौपदी का चीरहरण भी करवाया. यहां तक कि हमारे श्रीकृष्ण भगवान की बात भी नहीं मानी और युद्ध करवा दिया. अगर अगले एपिसोड तक युद्ध बंद नहीं हुआ तो तेरी दूसरी टांग भी तोड़ दूंगा. महाभारत की शूटिंग के दौरान कलाकारों के बीच काफ़ी दोस्ताना रिश्ता क़ायम हो गया. हमारे परिवारों के बीच भी दोस्ती हो गई. हम छुट्टियों पर पिकनिक मनाने जाते. कई सालों तक दीवाली और होली हम साथ मनाते. हालांकि समय के साथ अब मिलना-जुलना काफ़ी कम हो गया है लेकिन हमारे बीच दोस्ती क़ायम है. महाभारत से पहले मैं हम लोग जैसा लोकप्रिय सीरियल कर चुकी थी. लेकिन गांधारी के किरदार ने मुझे सच्चे मायनों में लोगों के घर-घर तक पहुंचा दिया सेट पर उन दिनों ज़ोरदार माहौल हुआ करता था. इतनी दिलचस्प बातें हुईं कि आज भी याद करके भावुक हो जाती हूं. निर्देशक रवि चोपड़ा हम सब कलाकारों का बेहद ध्यान रखते थे. बस मुझे एक बात का अफ़सोस है कि उऩ दिनों मैं बेहद युवा थी लेकिन मुझे गांधारी का बुज़ुर्ग किरदार दिया गया. मुझे लगता कि मैं लोगों को कैसे समझाऊं कि अभी मैं जवान हूं क्योंकि लोग तो मेरा वही किरदार देखकर मुझे बुज़ुर्ग समझते. लेकिन मैं कहूंगी कि मुझे कभी भी रोल्स की कमी नहीं रही. महाभारत मेरे करियर का वो अविस्मरणीय अध्याय है जिसे मैं भूलूंगी नहीं. मैं हमेशा बीआर चोपड़ा और रवि चोपड़ा की ऋणी रहूंगी. |
| DATE: 2013-08-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1377] TITLE: 'महाभारत' के बाद क्या हुआ युधिष्ठिर और दुर्योधन का? |
| CONTENT: आज से 25 साल पहले जब कौरव पांडवों की गाथा पर आधारित सीरियल महाभारत शुरू हुआ तो शायद इसके निर्देशक बीआर चोपड़ा को भी इल्म नहीं रहा होगा कि आने वाले दिनों में एक इतिहास रचा जाने वाला है. इससे पहले रामानंद सागर निर्मित रामायण ने भी दूरदर्शन पर अपार सफलता पाई थी. ऐसे में महाभारत के लिए उतनी लोकप्रियता तक पहुंच पाना ख़ासा मुश्किल काम था लेकिन महाभारत ने यह काम कर दिखाया. इसका निर्देशन किया था रवि चोपड़ा ने और संवाद लिखे थे राही मासूम रज़ा ने. कई विशेषज्ञों का मानना है कि इतना कामयाब टेली सीरियल भारतीय टेलीविज़न इतिहास में कोई नहीं हुआ. इसके पात्र मानो भारत के हर घर का हिस्सा बन गए. हर रविवार को प्रसारित होने वाले इस धारावाहिक में दिखाई जाने वाली घटनाओं का ज़िक्र लोगों की चर्चा का विषय बनने लगा. इसमें काम करने वाले कलाकार रातों-रात शोहरत की बुलंदियों पर पहुंच गए. हम आपको मिलवा रहे हैं महाभारत के कुछ कलाकारों से जो बता रहे हैं कि इसमें काम करने के बाद उनके करियर पर क्या असर पड़ा. सीरियल के बाद क्या उनकी किस्मत चमकी या फिर वो दोबारा संघर्ष करने के लिए मजबूर हो गए. इस श्रंखला की पहली कड़ी में जानिए युधिष्ठिर का किरदार निभाने वाले गजेंद्र चौहान और दुर्योधन का किरदार निभाने वाले पुनीत इस्सर की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी. महाभारत ने मेरे करियर पर इतना गहरा असर डाला कि गजेंद्र चौहान की मेरी असल छवि दबकर रह गई. जहां मैं जाता लोग मुझे युधिष्ठिर नाम से बुलाने लगते. दरअसल लोगों ने इससे पहले यह गाथा सिर्फ सुनी थी. टीवी पर इसे लोगों ने पहली बार देखा तो उन्होंने हर कलाकार के चेहरे को उसके द्वारा निभाए गए किरदार से जोड़ लिया. मैं उनके लिए युधिष्ठिर बन गया. रूपा गांगुली द्रौपदी और नीतीश भारद्वाज कृष्ण बन गए. हमें उस दौरान बड़े-बड़े उद्योगपतियों से लेकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक ने खाने पर आमंत्रित किया. एक बार मेरे घर की घंटी बजी. मैंने दरवाज़ा खोला तो एक सज्जन बाहर खड़े थे और रो रहे थे. उन्होंने कहा कि वो कोलकाता से आए हैं और उनके पिता बहुत बीमार हैं. वह एंबुलेंस में मेरे घर के बाहर ही थे. उन सज्जन ने मुझसे उनके पिता के सिर पर हाथ रखने की ग़ुज़ारिश की ताकि वो ठीक हो जाएं. या ठीक ना भी हो पाएं तो उन्हें संतोष रहेगा कि मरने से पहले धर्मराज युधिष्ठिर ने उन्हें स्पर्श किया. मुझे यह बात बड़ी अजीब लगी और थोड़ी झिझक भी हुई लेकिन उनके बार-बार कहने पर मैं मान गया. मैं उनके पिता से मिला और उनके सिर पर हाथ रखा. किस्मत देखिए. कुछ दिन अस्पताल में रहने के बाद वह बिलकुल ठीक भी हो गए और बार-बार मेरा अहसान माना. इसी तरह से एक बार मैं और अरुण गोविल जिन्होंने रामायण में राम का किरदार निभाया था चंडीगढ़ एयरपोर्ट में मिले. हम बात कर रहे थे कि हमें अपने पैर के पास कुछ महसूस हुआ. हमने नीचे देखा कि क़रीब 90 वर्ष के एक बुज़ुर्ग अपना एक हाथ मेरे पैरों पर और दूसरा हाथ अरुण गोविल के पैरों पर रखे हुए हैं. हम चौंक गए. उन्हें उठाया और कहा कि यह आप क्या कर रहे हैं. तो वो बोले ज़िंदगी में पहली बार श्रीराम और धर्मराज युधिष्ठिर को साथ देख रहा हूं. अब मैं चैन से मर सकूंगा. एक बार मैं और अर्जुन महाभारत में जो अर्जुन बने थे दिल्ली के एक रेस्टॉरेंट में नॉन-वेज खाना खाने गए. वहां खाने के बाद जब हम पैसे देने लगे तो रेस्टॉरेंट के मैनेजर ने हाथ जोड़कर पैसे लेने से इनकार कर दिया और बोला पहली बार भगवान मेरे होटल में गोश्त खाने आए. मैं भला उनसे कैसे पैसे ले सकता हूं. एक बार हवाई जहाज़ में एक महिला मुझसे मिली और बोली मैं तुम्हें थप्पड़ मारना चाहती हूं. आख़िर तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई द्रौपदी को दांव पर लगाने की. महाभारत से मुझे अपार लोकप्रियता मिली लेकिन सीरियल ख़त्म हो जाने के बाद मेरा संघर्ष शुरू हो गया. दरअसल निर्माता दुविधा में थे कि मुझे कैसे रोल दें. युधिष्ठिर का रोल निभाने के बाद सब मुझे कुछ उसी तरह के आदर्श किरदार में देखना चाहते थे लेकिन हर रोल तो वैसा हो नहीं सकता तो मुझे दिक्कत पेश आने लगी. फिर मैंने सोचा ऐसे तो मैं टाइपकास्ट हो जाऊंगा. तो मैंने ख़ुद ही हटकर रोल स्वीकार करने शुरू कर दिए. मैंने जान-बूझकर कुछ नकारात्मक किरदार किए ताकि अपनी युधिष्ठिर की छवि को तोड़ सकूं. उस दौरान मैंने कुछ बी और सी ग्रेड की फ़िल्में भी कीं. एक बार इस संघर्ष का दौर बीत जाने के बाद मुझे रोल लगातार मिलने लगे और आलम ये है कि अब तक मैं कोई 600 धारावाहिकों में काम कर चुका हूं. लेकिन कहना होगा कि इसके लिए सिर्फ महाभारत ज़िम्मेदार है. उसी की वजह से लोग मेरा चेहरा पहचानने लगे. आज मैं जो हूं महाभारत की वजह से हूं. पहले मैं एक संघर्षशील कलाकार था. कलाकार इसके बाद बना. इसने मुझे ही नहीं ज़्यादातर कलाकारों को पैरों पर खड़ा कर दिया. आजकल जो सीरियल टॉप पर हैं उनकी रेटिंग सात या आठ प्रतिशत होती है. महाभारत की टीआरपी 99-6 प्रतिशत होती थी जो आज तक किसी सीरियल की नहीं है. आज भी हम कलाकार जब भी मिलते हैं तो सिर्फ़ महाभारत के दौर की बातें होती हैं. अब ये हमारी ज़िंदगी का अभिन्न अंग बन चुका है. मैं अपने आपको बेहद सौभाग्यशाली समझता हूं कि ऐसी महान कृति में काम करने का मौका मिला. वो संस्कृत में कहते हैं ना भूतो ना भविष्यति. ये धारावाहिक भी ऐसे ही हैं. मैं आज जो हूं इसी सीरियल की वजह से हूं. इसके पहले मुझे फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल मिलते थे लेकिन महाभारत ने सारी कहानी बदल दी. मेरा अस्तित्व दुर्योधन की वजह से ही है. साल 1982 में कुली फ़िल्म की दुर्घटना किसे याद नहीं जब मेरे साथ एक एक्शन दृश्य करते वक़्त सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को चोट लग गई थी. उसके बाद के कुछ साल मेरे लिए बड़े संघर्ष वाले थे. लेकिन महाभारत ने मानो सब कुछ बदलकर रख दिया. इसके बाद मुझे फ़िल्मों में बड़े रोल मिलने लगे. मुख्य खलनायक की भूमिका मिलने लगी. एक दिलचस्प घटना बताता हूं. महाभारत के क्लाईमेक्स की शूटिंग जयपुर में चल रही थी. लोग दूर से शूटिंग देख रहे थे. कोई मेरे पास आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. एक बुज़ुर्ग महिला काफी देर बाद हिम्मत जुटाकर मेरे पास आई और बोली राजा जी अब गुस्सा थूक भी दो दे दो ना पांडवों को पांच गांव. इसी तरह से एक बार हमें एक मारवाड़ी उद्योगपति ने खाने पर आमंत्रित किया. मेरे अगल-बगल में अर्जुन और रूपा गांगुली द्रौपदी बैठे हुए थे. घर की महिलाएं आतीं वो अर्जुन को परोसतीं फिर रूपा को और मुझे परोसे बिना बढ़ जातीं. मैंने तब घर की बुज़ुर्ग महिला से पूछा माताजी मुझसे कोई ग़लती हुई क्या. तो उन्होंने मुझे झिड़कते हुए कहा चुप रहो. तुमने पांडवों के साथ इतना बुरा क्यों किया. ये घटनाएं दर्शाती हैं कि लोग कितनी शिद्दत से इस धारावाहिक का अनुसरण करते थे और हमारे किरदार किस हद तक हमसे जुड़ गए थे. |
| DATE: 2013-08-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1378] TITLE: 'मद्रास कैफ़े' को हरी झंडी, लेकिन तमिलनाडु में नहीं होगी रिलीज़ |
| CONTENT: अभिनेता और निर्माता जॉन अब्राहम की फ़िल्म मद्रास कैफ़े के तमिल संस्करण को गुरुवार को सेंसर बोर्ड ने यूए सर्टिफ़िकेट के साथ रिलीज़ करने की अनुमति दे दी. इससे पहले मद्रास हाईकोर्ट ने भी फ़िल्म की रिलीज़ पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. फ़िल्म 23 अगस्त को पूरे भारत में प्रदर्शित हो रही है लेकिन तमिलनाडु में इसका विरोध किया जा रहा है. इसी वजह से राज्य के सिनेमाघरों ने सुरक्षा कारणों से फिलहाल इसे नहीं दिखाने का फैसला लिया है. सिनेमाघर मालिकों का कहना है कि जब-तक उन्हें सरकार की तरफ़ से सुरक्षा का पूरा आश्वासन नहीं मिल जाता वो फिल्म नहीं दिखाएंगे. एमडीएमके नेता वाइको के अलावा एक और संगठन का आरोप है कि फ़िल्म में एलटीटीई का ग़लत तरीके से चित्रण किया गया है. हालांकि बीबीसी से ख़ास बात करते हुए मद्रास कैफ़े के निर्देशक शूजित सरकार ने इऩ तमाम आरोपों का खंडन किया है. शूजित ने कहा मैंने छह साल तक इस फ़िल्म के विषय पर इतनी रिसर्च सिर्फ़ इसलिए की ताकि मैं चीज़ों को संतुलित तरीके से दिखा सकूं. शक़ करना बेकार है. शूजित ने ये तो माना कि उन्होंने फ़िल्म में श्रीलंकाई सेना और एलटीटीई के बीच के संघर्ष को दिखाया है. साथ ही भारत की भेजी गई शांति सेना को भी फ़िल्म में दर्शाया है और एलटीटीई के पहलू को भी फ़िल्म में जगह दी है लेकिन उन्होंने इस बात से साफ़ इनकार कर दिया कि फ़िल्म किसी एक पक्ष को नकारात्मक रूप से पेश करती है. वो कहते हैं मैंने फ़िल्म में किसी की साइड नहीं ली है. पहली बार भारत में किसी ने बिलकुल असल घटनाओं पर इस तरह की कोई फ़िल्म बनाई है. शूजित ने बताया कि फ़िल्म में असल जीवन की घटनाओं के संदर्भ लिए गए हैं लेकिन मूल कहानी फ़िक्शनल है. शूजित बोले मैं फ़िल्मकार हूं. सभी लोगों की संवेदनाओं से वाक़िफ हूं. यक़ीन जानिए हमने संतुलित फ़िल्म बनाई है. बिना इसे देखे किसी निष्कर्ष पर ना पहुंचा जाए. इसे देखिए. उसके बाद मैं हर बहस के लिए तैयार हूं. उधर जॉन अब्राहम ने भी चेन्नई के फ़िल्म प्रेमियों से अपील की है कि उनकी फ़िल्म को समर्थन दें. मद्रास कैफ़े 80 और 90 के दशक की घटनाओं पर आधारित है जिस दौरान श्रीलंका गृहयुद्ध से गुज़र रहा था. जॉन अब्राहम ने कहा मैं लोगों से अपील करता हूं कि मद्रास कैफ़े को सपोर्ट करें. हमने इसे बहुत दिल लगाकर बनाया है और इससे किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचेगी. शूजित सरकार निर्देशित इस फ़िल्म में नरगिस फ़करी की भी अहम भूमिका है. वो फ़िल्म में एक पत्रकार की भूमिका निभा रही हैं. |
| DATE: 2013-08-23 |
| LABEL: entertainment |
| [1379] TITLE: 'लिव-इन' से परिवार को कोई समस्या नहीं: सुशांत |
| CONTENT: काय पो छे से फिल्मों में कदम रखने वाले सुशांत सिंह राजपूत की आने वाली फ़िल्म शुद्ध देसी रोमांस के गाने या फिर ट्रेलर को अगर आपने देखा है तो आपको इस बात का अंदाज़ा हो ही गया होगा कि फ़िल्म में लिव-इन रिलेशनशिप को बड़ी सहजता से दिखाया गया है. वैसे सुशांत सिर्फ़ पर्दे पर ही नहीं बल्कि निजी जीवन में भी लिव-इन को बड़ी सहजता से लेते हैं. वो पिछले कुछ सालों से अपनी गर्लफ्रेंड अंकिता लोखंडे के साथ मुंबई में रह रहे हैं. तो शादी से पहले ही अपनी गर्लफ्रेंड के साथ एक ही छत के नीचे रहने से सुशांत के परिवार ने उन्हें रोका नहीं. इस सवाल का जवाब देते हुए सुशांत कहते हैं नहीं मेरा परिवार मुझे बहुत अच्छी तरह समझता है. उन्हें मेरे और अंकिता के साथ रहने से कोई समस्या नहीं है. वैसे भी हम अगले साल तक शादी कर ही लेंगे. आजकल जहां फिल्म एक्टर अपने रिलेशनशिप स्टेटस के बारे में खुल कर बात नहीं करते वहीं सुशांत सिंह राजपूत ज़रा अलग हैं. तो क्या उन्हें इस बात का डर नहीं है कि कहीं उनके रिश्ते के बारे में जानकर उनकी महिला प्रशंसकों की कमी हो जाएगी. बीबीसी को इस सवाल का जवाब देते हुए सुशांत कहते हैं देखिए हमसे ऐसा कहा जाता है कि हम अपने निजी रिश्तों के बारे में बात न करें इससे हमारी लोकप्रियता पर असर पड़ेगा. लेकिन मैं किसी से कुछ नहीं छुपाता. इसकी एक वजह ये भी है कि मैं बॉलीवुड में स्टार नहीं एक अच्छा कलाकार बनाने आया हूं. अपनी बात को पूरा करते हुए सुशांत कहते हैं अगर आप हॉलीवुड की ओर देखें तो वहां तो किसी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका चहेता कलाकार शादी-शुदा है या तलाक-शुदा. वहां तो लोग एक नहीं चार-चार बार शादी कर लेते हैं और ये बात किसे से छुपाते भी नहीं. उनके निजी जीवन के कारण कभी उनकी लोकप्रियता पर कोई असर नहीं होता. सुशांत ये भी मानते हैं कि दर्शक एक कलाकार को उसकी अभिनय शैली के लिए पसंद करते हैं न कि उसके रिलेशनशिप स्टेटस के लिए. शुद्ध देसी रोमांस में कुछ अंतरंग दृश्य फ़िल्माए गए हैं. वैसे बात जब रिश्तों की ही चल रही है तो क्यों न लगे हाथों सुशांत से ये भी पूछ ही लिया जाए कि जब वो फ़िल्मों में किसी अभिनेत्री के साथ कोई अंतरंग दृश्य करते हैं तो क्या उनकी गर्लफ्रेंड अंकिता को इस बात से कोई परेशानी होती है इस सवाल का जवाब देते हुए सुशांत कहते हैं अंकिता ने आज तक मुझे अंतरंग दृश्य करने से नहीं रोका. वो खुद एक कलाकार हैं. हालांकि बीच में ऐसी अफवाहें मैंने भी अख़बारों में पढ़ी कि अंकिता मुझे लेकर इनसिक्योर हैं. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है. सुशांत की फ़िल्म शुद्ध देसी रोमांस 6 सितंबर को रिलीज़ हो रही है. फ़िल्म में सुशांत के साथ हैं परिणिति चोपड़ा और वानी कपूर. इस फ़िल्म के निर्देशक हैं मनीष शर्मा. मनीष की पहली फ़िल्म बैंड बाजा बारात थी. |
| DATE: 2013-08-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1380] TITLE: रक्षाबंधन पर शाहरुख़ का तोहफा |
| CONTENT: क्या है शाहरुख़ ख़ान का तोहफा रक्षाबंधन पर अजय देवगन या फिर इमरान ख़ान किसे चुनेंगी एकता कपूर और क्या हुआ जयपुर में मल्लिका शेरावत के साथ जानने के लिए पढ़िए मुंबई डायरी. शाहरुख़ ख़ान फ़िल्म अभिनेता से ज़्यादा एक मार्केटिंग गुरु बनते जा रहे हैं. हाल ही में रिलीज़ हुई उनकी फ़िल्म चेन्नई एक्सप्रेस पहले ही बॉक्स ऑफिस पर ज़बरदस्त कमाई कर रही है और कई रिकॉर्ड तोड़ चुकी है. लेकिन लगता है कि शाहरुख़ का दिल मांगे मोर. रक्षाबंधन के मौके पर शाहरुख़ ने अपनी फ़िल्म को प्रमोट करने का एक और तरीका निकाला है. आज अगर कोई चेन्नई एक्सप्रेस की दो टिकट खरीदता है तो इस पर उसे एक टिकेट फ़्री मिलेगी. कई अख़बारों में चेन्नई एक्सप्रेस का फुल पेज विज्ञापन है जिसपर लिखा है कि फिल्म तेज़ी से 300 करोड़ बनाने की ओर है. चेन्नई एक्सप्रेस का सिनेमाघरों में ये दूसरा हफ्ता है. भले ही फ़िल्म समीक्षकों से इसे मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली हो लेकिन फ़िल्म को दर्शकों का भरपूर प्यार मिल रहा है. धावक मिल्ख़ा सिंह और बॉक्सर मैरी कॉम पर बनने वाली फ़िल्मों के बाद अब बारी है पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन की. मोहम्मद अज़हरुद्दीन की कहानी को बड़े परदे पर उतारने की ठानी है निर्माता एकता कपूर ने. लेकिन एकता के सामने बड़ी समस्या इस बात की आ गई है कि फ़िल्म में अज़हरुद्दीन की भूमिका निभाएगा कौन. वैसे इस रोल के लिए अजय देवगन और इमरान हाश्मी दोनों के नामों पर गौर किया जा रहा है. बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक जिनके नाम के जलवे हैं वो हैं मल्लिका शेरावत. इन दिनों मल्लिका एक हिंदी फ़िल्म की शूटिंग में व्यस्त हैं. फ़िल्म का नाम है डर्टी पॉलिटिक्स. हाल ही में इस फ़िल्म की शूटिंग के लिए मल्लिका जयपुर में थीं. दिन की शूटिंग ख़त्म करने के बाद जब मल्लिका अपने होटल वापस लौटीं तो उन्हे कहां पता था कि कुछ लोग उनसे मिलने के लिए बेताब हैं. अगर ये मल्लिका के आम चाहने वाले होते तो शायद मल्लिका को कोई परेशानी न होती लेकिन इनमें से कुछ लोग तो नशे में थे. इन लोगों ने मल्लिका से मिलने के लिए ज़ोर-ज़बरदस्ती तक कर डाली. यहां तक कि वो मल्लिका के कमरे में भी पहुंच गए. घबराई हुई मल्लिका ने इनसे बचने के लिए होटल और फ़िल्म के स्पॉट बॉयज़ की मदद ली. इस पूरे मामले के बाद मल्लिका ने जयपुर में शूट करने से ही इनकार कर दिया. |
| DATE: 2013-08-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1381] TITLE: अजय देवगन और करीना कपूर की नज़दीकियां! |
| CONTENT: ओंकारा के बाद एक बार फिर से अजय देवगन और करीना कपूर की नज़दीकियां देखते ही बनती हैं. इस बार ये दोनों कलाकार प्रकाश झा की फ़िल्म सत्याग्रह में अपना जादू बिखेरने के लिए तैयार हैं. जल्द ही रिलीज़ होने वाली इस फ़िल्म में दोनों के बीच कुछ अंतरंग दृश्य भी फ़िल्माए गए हैं. इससे पहले दोनों के बीच ऐसे ही कुछ दृश्य साल 2006 में आई फ़िल्म ओंकारा में भी थे. करीना के साथ अपनी इस केमिस्ट्री के बारे में अजय कहते हैं करीना मेरी अच्छी दोस्त हैं उनके साथ काम करने और ऐसे दृश्य फ़िल्माने में कोई परेशानी नहीं हुई. हालंकि अजय कहते हैं कि इन दृश्यों में ऐसा भी कुछ नहीं है जितना कि लोग बात कर रहे हैं. वो कहते हैं ये एक बेहद संतुलित फ़िल्म है. हां मेरे और करीना के बीच जो दृश्य हैं उनमें रोमांस है पर वो रोमांस काफी सच्चा है. असल ज़िंदगी में जिस तरह का रोमांस हम करते हैं सत्याग्रह में उसी तरह के रोमांस को दर्शाया गया है. फ़िल्म में अमिताभ बच्चन मनोज बाजपेयी अर्जुन रामपाल भी हैं. अजय के मुताबिक़ सत्याग्रह भ्रष्टाचार के खिलाफ़ एक आवाज़ है. वो कहते हैं हम सब एक तरह से उस भ्रष्टाचार का हिस्सा हैं. आज अपना काम निकालने के लिए लोग 100-200 रूपए देने से नहीं हिचकिचाते. तो क्या खुद अजय ने भी कभी किसी को कोई रिश्वत दी है इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं मैंने आज तक ऐसा नहीं किया. मगर ज़्यादातर लोग ऐसा करते हैं. मेरी कोशिश यही रहती है कि मैं ऐसा न करूं. गंगाजल और सिंघम जैसी अपनी फ़िल्मों की वजह से मैं अपने आप को थोड़ा और ज़िम्मेदार महसूस करता हूं. सत्याग्रह प्रकाश झा के साथ अजय देवगन की पाँचवी फ़िल्म है. इन बीते सालों में अजय अपने और प्रकाश झा के साथ के बारे में कहते हैं हमारी फ़िल्म दिल क्या करे को 14 साल हो गए हैं. जैसा प्रकाश जी भी मानते हैं कि अब हमें एक-दूसरे को ज़्यादा कुछ समझाना नहीं पड़ता. अपनी बात को पूरा करते हुए अजय आगे कहते है आज तक हमने साथ में जो भी फ़िल्में की हैं वो सारी कामयाब रही हैं. वो हार्ड हिटिंग फ़िल्में रही हैं. असल में प्रकाश जी सीख गए हैं कि एक अच्छी कहानी को बिना डॉक्यूमेंटरी बनाए कैसे कहा जाए. जहां तक बात है सत्याग्रह की तो ये एक कमर्शियल फ़िल्म होने के साथ-साथ एक आक्रामक फ़िल्म भी है. निर्देशक रोहित शेट्टी की अगली फ़िल्म सिंघम 2 में एक बार फिर नज़र आएंगे अजय देवगन. अगर अजय की प्रकाश झा से दोस्ती गहरी है तो फ़िल्मकार रोहित शेट्टी भी तो अजय के अच्छे दोस्त है. रोहित की हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म चेन्नई एक्सप्रेस को अगर छोड़ दें तो उनकी सभी फ़िल्मों में अजय की मुख्य भूमिका रही है. लेकिन चेन्नई एक्सप्रेस में रोहित ने शाहरूख खान के साथ काम किया है. ये फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर ज़बरदस्त बिज़नेस कर रही है. अजय कहते हैं कि वो रोहित के लिए बेहद खुश हैं. अजय ने भले ही रोहित कि इस फ़िल्म में काम न किया हो लेकिन अजय और रोहित की जोड़ी सिंघम 2 के साथ जल्द ही लौटेगी. इस फ़िल्म के बारे में अजय कहते हैं सिंघम 2 की स्क्रिप्ट पर हमने बहुत मेहनत की है और वो बहुत अच्छी नज़र आ रही है. |
| DATE: 2013-08-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1382] TITLE: मनाली से क्यों भागी प्रियंका चोपड़ा? |
| CONTENT: फ़िल्म की शूटिंग बीच में ही छोड़ मनाली से क्यों लौटी प्रियंका चोपड़ा दीपिका पादुकोण की लंबी छुट्टी और सलमान ख़ान की मराठी सिनेमा में एंट्री. मनोरंजन जगत की हलचल आज मुंबई डायरी में. पिछले कुछ समय से अपने अंतर्राष्ट्रीय गानों इन माई सिटी और एक्सॉटिक को लेकर व्यस्त प्रियंका चोपड़ा अब अपनी अगली फ़िल्म की शूटिंग में लग गई हैं. ओलंपिक कांस्य पदक विजेता बॉक्सर मेरी कॉम के जीवन पर आधारित फ़िल्म में प्रियंका मुख्य भूमिका में हैं. हाल ही में इस फ़िल्म के कुछ हिस्सों की शूटिंग मनाली में चल रही थी. शूटिंग के दौरान प्रियंका चोपड़ा को किसी कीड़े के काटने से एलर्जी हो गई. एलर्जी इतनी बढ़ गई कि प्रियंका ने मनाली में शूट करने से इनकार कर दिया और वो तुरंत मुंबई लौट आई. वैसे जो सीन मनाली में शूट न हो सका उसे मुंबई के फिल्मिस्तान स्टूडियो में पूरा किया गया. दीपिका पादुकोण के नाम एक लंबी छुट्टी तो बनती है. इस साल पहले तो ये जवानी है दीवानी और फिर चेन्नई एक्सप्रेस लगातार दो बड़ी हिट फ़िल्में दी हैं दीपिका ने. जब इतनी मेहनत की है तो अब आराम तो बनता है. अगले 15 दिनों के लिए दीपिका अपने परिवार के साथ यूरोप घूमने जा रही हैं. दीपिका ने ये छुट्टी अपने सभी बचे हुए प्रोजेक्ट को पूरा करने के बाद ली है. वैसे इस छुट्टी पर भी दीपिका अपने साथ कुछ फ़िल्मों की स्क्रिप्ट लेकर गई हैं. हिंदी फ़िल्मों के दबंग ख़ान यानी सलमान ख़ान अब मराठी फ़िल्मों में एंट्री लेने वाले हैं. अभिनेता रीतेश देशमुख के बैनर तले बनने वाली मराठी फ़िल्म लाइ भारी में सलमान नज़र आएंगे हालंकि ये सिर्फ एक गेस्ट अपियरेंस होगी. रीतेश और सलमान की दोस्ती हैदराबाद में हुई जहां दोनों अपनी-अपनी फ़िल्मों की शूटिंग कर रहे थे. इस बीच रितेश ने लाइ भारी की कहानी सलमान को सुनाई और सलमान ने तुरंत इस फिल्म में एक सीन करने की हामी भर दी. |
| DATE: 2013-08-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1383] TITLE: काजोल क्यों नहीं लौटीं फ़िल्मों में |
| CONTENT: अभिनेत्री काजोल के प्रशंसक उन्हें बड़े पर्दे पर लंबे अरसे से नहीं देख पाए हैं. माधुरी दीक्षित हों श्रीदेवी या करिश्मा कपूर - सभी शादी और फिर बच्चे होने के बाद भी फ़िल्मों और टेलीविज़न कार्यक्रमों के ज़रिए दर्शकों से जुड़ी हुई हैं लेकिन काजोल ने बेटे के जन्म के बाद से कोई फ़िल्म नहीं की है. काजोल की आखिरी फ़िल्म थी टूनपुर का सुपरहीरो जो 2010 में आई थी. बीते तीन सालों में काजोल ने न तो कोई फ़िल्म साइन की है और न ही किसी रिएलिटी शो को जज किया है. इस वजह से वो अपने प्रशंसकों से दूर होती नज़र आ रही हैं. लेकिन काजोल को इससे कोई दिक्कत नहीं है. जब काजोल से पूछा गया कि अपनी हमउम्र अभिनेत्रियों की तरह वो अपने करियर पर ध्यान क्यों नहीं दे रही हैं तो वो मुस्कुरा देती हैं. काजोल ने कहा मैं अपनी ज़िंदगी और अपने बच्चों के साथ बहुत ख़ुश हूं. मुझे अपना सारा वक़्त अपने बच्चों के साथ बिताना अच्छा लगता है. मां बनने के बाद मेरी ज़िंदगी और भी ख़ूबसूरत हो गई है. काजोल ने कहा कि उन्हें अपने बच्चों के साथ खेलना उनके आगे-पीछे भागना पसंद है और इसी वजह से वो बेहद फ़िट भी हैं. उन्होंने कहा मेरे पास कई स्क्रिप्ट आती हैं लेकिन मुझे पसंद नहीं आतीं. अगर मैं कोई फ़िल्म करना चाहूं भी तो कोई ख़ास वजह होनी चाहिए या स्क्रिप्ट में दम हो जो मुझे अपने बच्चों से दूर करने के लिए मजबूर कर दे लेकिन ऐसी किसी फ़िल्म का प्रस्ताव मेरे पास नहीं आया है. काजोल और अभिनेता अजय देवगन की शादी 24 फ़रवरी 1999 को हुई थी. 2001 में काजोल ने एक बेटी को जन्म दिया और उसके फिर उसके बाद फ़िल्मों में उनकी उपस्थिति कम सी हो गई. साल 2010 में वो एक बेटे की मां बनीं जिसका नाम रखा गया योग. वैसे तो काजोल फ़िल्मों में अजय देवगन बॉबी देओल सलमान ख़ान और कई अन्य अभिनेताओं के साथ दिखाई दी लेकिन काजोल और शाहरुख की जोड़ी हिट रही है. इस जोड़ी ने एक साथ कई सुपर हिट फ़िल्मों में काम किया जैसे - बाज़ीगर दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे कुछ-कुछ होता है कभी खुशी कभी ग़म और माई नेम इज़ ख़ान. इन दोनों की एक साथ आखिरी फ़िल्म थी माई नेम इज़ ख़ान. हालांकि काजोल के पति अजय देवगन और शाहरुख ख़ान के बीच अनबन की ख़बरें भी आती रही हैं. फ़िल्म जब तक है जान और सन ऑफ़ सरदार को लेकर शाहरुख ख़ान और काजोल के पति अजय देवगन के बीच काफ़ी अनबन हुई थी. ये अनबन इतनी बढ़ गई कि दोनों ने मीडिया में एक-दूसरे के खिलाफ़ खुलकर बयानबाज़ी की और झगड़ा कोर्ट तक पहुंच गया था. इतना कुछ होने के बाद भी शाहरुख और काजोल की दोस्ती आज भी बरकरार है. हाल ही में शाहरुख की ईद की पार्टी में काजोल भी नज़र आई थीं. |
| DATE: 2013-08-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1384] TITLE: मेघा श्रीरामः नगपुरिया लोकगीतों को लोगों तक पहुँचाना चाहती हूँ |
| CONTENT: झारखंड की लोकगायिका मेघा श्रीराम डॉल्टन अनुराग कश्यप निर्मित दैट गर्ल इन यलो बूट और मनीष झा की अनवर जैसी फिल्मों में अपनी आवाज़ का जादू बिखेर चुकी हैं. मेघा ने कोक स्टूडियो के भारतीय संस्करण में भी झारखंडी लोकगीतों का समां बांधा था. पेश है मेघा श्रीराम से रंगनाथ सिंह की बातचीत. आपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएँ. मैं अपने बारे में यही बताना चाहूँगी मैं आज जो भी हूँ उसका श्रेय मेरे माता-पिता को जाता है. मुझे लगता है कि मेरी माँ अपने जीवन में गायिका बनना चाहती होंगी. वो अपनी इच्छा नहीं पूरा कर पाईं तो उन्होंने हम बहनों के माध्यम से अपनी भड़ास निकाली. आपके नाम में लगे डॉल्टन का क्या अर्थ है. मेरा जन्मस्थान झारखण्ड का डाल्टनगंज है इसलिए बस प्रेमवश मैंने अपना नाम मेघा श्रीराम डॉल्टन रखा. आपने संगीत की शिक्षा कहाँ से ली. बच्चों में जो शुरुआती बीज डाला जाता है उसका श्रेय मेरी माँ को ही जाता है. उसके बाद मैंने संगीत की शिक्षा डॉल्टनगंज में रहने वाले उस्ताद अमजद अली जी से ली है. लोक संगीत को क्यों चुना. मैंने इंडियन क्लासिकल सीखा था. बचपन में हमारे यहाँ उस्ताद आते थे और वो हमें क्लासिकल संगीत सिखाते थे. लेकिन मैंने लोक संगीत को हमेशा ही अपने करीब पाया है. इसका भी कारण मेरी माँ है. मैं शास्त्रीय संगीत सुनती थी तो वो मुझे बहुत टेक्निकल लगता था. लोक संगीत को मैं दिल से गाती थी और गाना तो दिल की चीज है. लोक संगीत खासकर झारखंड के लोक संगीत के बारे में आप की टिप्पणी चाहेंगे. इसे अभी तक एक्सपोजर ही नहीं मिला है. भोजपुरी ने पूरी दुनिया में जगह बनाई है. मगही ने भी थोड़ी जगह बनाई है लेकिन नगपुरिया लोकगीत तो ना के बराबर है. मेरी कोशिश है कि मैं इस पर फोकस हो कर इसे इकठ्ठा करूँ और सभी तक पहुँचाऊँ. आप शादी-शुदा हैं. आपके बच्चे भी हैं. शादी-शुदा जीवन और प्रोफेशनल करियर के बीच कैसे तालमेल बिठाती हैं. कई बार लगता है कि स्वतंत्र जीवन अच्छा होता है लेकिन घर-परिवार और बच्चों के साथ इतना सब करने के बाद जो खुशी मिलती है उसका वर्णन करना मुश्किल है. आपके पसंदीदा लोकगायक कौन हैं झारखंड के राम दयाल मुंडा मधु मंसूरी मुकुंद नायक हैं. आसाम के खोगेन दा हैं. भोजपुरी की शारदा जी भी हैं. बंगाल के नचिकेता और बाउल गीतों पर काम रहे सौरभ मुनि हैं और भी बहुत से लोग हैं. कोक स्टूडियो तक कैसी पहुँचीमुझे इसके लिए कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी. मैंने वहाँ जाने से दो-तीन महीने पहले ही जाना कि कोक स्टूडियो क्या है. डायरेक्टर ने मुझे गुलाब बाई पर आधारित एक नौटंकी पर आधारित नाटक अफसाने बाई से बायस्कोप तक में सुना था. मुझे लगता है कि वही सुनकर मुझे गाने के लिए एप्रोच किया गया था. संगीत के क्षेत्र में आपकी योजना क्या है. मैं नगपुरिया मूल धुनों पर काम करना चाहती हूँ. लोक संगीत को इकट्ठा करके ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहती हूँ. हमने सुना है कि आप कजरी पर भी कुछ काम करना चाहती हैं. कजरी अपने आप में बहुत ही समृद्ध धुन है. आमतौर पर कजरी की दो-चार धुनें ही लोकप्रिय हैं. जबकि इसकी सौ से ज्यादा धुनें हैं. मैं चाहती हूँ कि इन सभी धुनों की नोटेशन तैयार करूँ. उन्हें सीखूँ. |
| DATE: 2013-08-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1385] TITLE: सिंगल हूँ पर प्यार के लिए तैयार नहीं: नरगिस फ़करी |
| CONTENT: रॉकस्टार से बॉलीवुड में कदम रखने वाली नरगिस फ़करी फ़िल्मों की वजह से भले ही चर्चा में ना रही हों लेकिन पहले रणबीर कपूर फिर शाहिद कपूर और अब उदय चोपड़ा के साथ कथित दोस्ती को लेकर वो हमेशा सुर्खियां बटोरती रहीं हैं. इस बात का जवाब देते हुए उन्होंने बीबीसी से कहा मैं सिंगल हूं लेकिन प्यार के लिए फ़िलहाल कतई तैयार नहीं हूं. क्योंकि इस फ़़ील्ड में प्यार क्या दोस्ती के लिए वक़्त नहीं मिलता. मेरा पूरा फ़ोकस काम पर है. लेकिन पिछले दो साल से तो उनकी कोई फ़िल्म आई नहीं आई. फिर वो भला कहां व्यस्त रहीं. इसका जवाब देते हुए नरगिस कहती हैं मैं विज्ञापनों की शूटिंग में व्यस्त रही. कई पत्रिकाओं के लिए फ़ोटो शूट किए और अपनी हिंदी पर भी काम करती रही. अपने बारे में आ रही तमाम ख़बरों पर उनकी क्या प्रतिक्रिया रहती है. इस पर नरगिस का जवाब था पहले मैं काफी परेशान हो जाती थी. लेकिन धीरे-धीरे समझ गई कि स्टार होने की ये क़ीमत तो निभानी पड़ेगी. लोगों को अपना पेपर तो बेचना ही पड़ेगा. फिलहाल नरगिस अपनी फ़िल्म मद्रास कैफे के प्रमोशन में व्यस्त हैं. इस फ़िल्म में वो एक पत्रकार के रोल में दिखेंगी. इसके निर्माता जॉन अब्राहम जो फ़िल्म में नायक की भूमिका में हैं. इसका निर्देशन शूजित सरकार ने किया है. नरगिस बताती हैं फ़िल्म में मैंने काफी मुश्किल परिस्थितियों में भी शूटिंग की है. मैं एक ऐसी पत्रकार का किरदार निभा रही हूं जो युद्धग्रस्त परिस्थितियों में ख़बरों को कवर कर रही है. मद्रास कैफ़े 23 अगस्त को रिलीज़ हो रही है इसके अलावा नरगिस ने आने वाली फ़िल्म फटा पोस्टर निकला हीरो में एक आइटम डांस भी किया है. इसके बारे में उन्होंने बताया मैं डांस करने से पहले ख़ासी नर्वस थी. मुझे शाहिद कपूर जैसे बेहतरीन डांसर के साथ जो डांस करना था. साथ ही इसमें काफी लटके झटके भी थे. लेकिन मेरी मेहनत का अच्छा परिणाम आया है. नरगिस फ़करी एक भारतीय पिता और अमरीकन मां की संतान है. फ़िल्मों में आने से पहले वो मॉडलिंग किया करती थीं. रणबीर कपूर के साथ इम्तियाज़ अली निर्देशित रॉक स्टार से उन्होंने अपना बॉलीवुड करियर शुरू किया था. |
| DATE: 2013-08-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1386] TITLE: छोटी फ़िल्मों ने किया चीन की नाक में 'दम' |
| CONTENT: फिल्म निर्देशक अन हुई की माई वे एक माइक्रो फिल्म है. इसके केंद्र में वे किन्नर हैं जिस पर सरकारी मीडिया की मुख्यधारा में चुप्पी है. चीन में माइक्रोब्लॉगिंग फ़िल्मों ने धूम मचा दी है. माइक्रोब्लॉगिंग यानी छोटी फ़िल्में. बड़े पर्दे की फ़िल्मों पर कई तरह की पाबंदियों और फ़िल्म समारोहों के स्वतंत्र आयोजन पर रोक के कारण फ़िल्म प्रेमियों के बीच छोटी फ़िल्में ख़ासी लोकप्रिय हो रही हैं. किन्नर से जुड़े बेहद संवेदनशील विषय पर बनी फ़िल्म माई वे को जब मुख्यधारा की फ़िल्मों में जगह नहीं मिली तो इसे चीन के यू ट्यूब संस्करण याऊकू पर दिखाया गया. जल्द ही 40 लाख से ज्यादा लोगों ने इसे देख डाला. इसके कमेंट सेक्शन में ज़ोरदार बहस भी हुई. माई वे फ़िल्म के निर्देशक अन हुई बताते हैं अगर यह फ़िल्म मुख्यधारा में दिखाई जाती तो मुझे इसके लिए पैसे जुटाने में दिक्क़त होती. अब न तो बॉक्स ऑफ़िस की चिंता है और न ही कारोबार की. मैं विषय के साथ अब ज्यादा ईमानदारी बरत सकता हूं. चीन में बॉक्स ऑफ़िस की कमाई एक तरफ़ तो क़रीब 17 लाख 90 हज़ार डॉलर तक पहुंच गई है. वहीं दूसरी ओर ऑनलाइन क्रांति की सुगबुगाहट सुनाई दे रही है. चीनी भाषा में डब की हुई लघु फ़िल्में यानी माइक्रो मूवीज घर में लगे कंप्यूटर स्मार्टफ़ोन और टेबलेट्स पर देखी जा रही हैं. सरकार की सख्त सेंसरशिप स्टूडियो के वर्चस्व और कारोबारी मजबूरियों के कारण ऑनलाइन बन और दिखाई जा रही लघु फिल्में निर्देशकों के लिए संभावनाओं के नए दरवाज़े खोल रही हैं. ऑनलाइन आजादी ने विवादास्पद कलात्मक और बोल्ड विषयों पर बनी फ़िल्मों की क़तार लगा दी है. लोगों का कहना है कि चीन का सरकारी मीडिया मनोरंजन की आड़ में अक्सर सुस्त और उबाऊ चीज़ें परोसता है. दर्शकों को इन लघु फ़िल्मों की वजह से उबाऊ चीज़ों से राहत मिली है. चीन के महानगरों में भारी ट्रैफ़िक जाम में लाखों लोग घंटों फंसे रहते हैं. वे मन बहलाने के लिए स्मार्टफ़ोन पर चिपके रहते हैं. बीजिंग के स्थानीय निर्देशक अना शी कहते हैं यहां जीवनशैली बेहद व्यस्त है. ट्रैफ़िक का हाल बुरा है. हर जगह लाइन लगानी पड़ती है. ऐसे में इन लघु फ़िल्मों से लोगों को चंद घड़ी की राहत मिल जाती है. लोगों के बीच लघु फ़िल्मों की लोकप्रियता ऐसी है कि 2011 में मुख्यधारा की 500 फ़ीचर फ़िल्मों की तुलना में दो हज़ार से ज्यादा लघु फ़िल्में बनीं. चीन के नेटवर्क सूचना केंद्र चीनी सरकार की इकाई के मुताबिक़ 2012 में इंटरनेट पर आने वाले लोगों की संख्या पिछले साल के मुक़ाबले 20 फ़ीसदी बढ़ गई. पोर्टेबल डिवाइसों पर वेब तक पहुंचने वाले लोग 59. 1 करोड़ हो गए. चीनी इंटरनेट मार्केटिंग कंपनी आईसर्च के अनुसार जनवरी 2013 में 45-2 करोड़ लोगों ने ऑनलाइन वीडियो देखे. ये लघु फिल्में इसलिए भी चर्चित हो रही हैं कि इन्हें बड़ी आसानी से दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ साझा किया जा सकता है. माई वे को भी इसी वजह से करोड़ों हिट मिलें. माई वे की ही तरह ओल्ड ब्यॉज़ को भी करोड़ों लोगों ने नेट पर देखा. यह 2010 के अंतिम महीनों में बनी 43 मिनट की माइक्रो फ़िल्म है. ओल्ड ब्यॉज़ युवा वर्ग की आशाओं आकांक्षाओं नाकामियों और टूटे हुए सपनों की कहानी है. युवा पीढ़ी को अपनी ओर खींचने वाले प्यार रिश्ते पढ़ाई और नौकरी जैसे विषयों पर छोटी फ़िल्में ज्यादा बन रही हैं. माइक्रो फ़िल्म की ही तरह माइक्रो वेब सीरियल भी सफल हो रहे हैं. उदाहरण के लिए हिप हॉप ऑफिस क्वॉर्टर. यह एक दफ्तर में काम करने वाले चार दोस्तों की कहानी है. इस माइक्रो वेब सीरियल को चीन के यू ट्यूब संस्करण याऊकू पर 20 करोड़ लोगों ने देखा. इसे इतना पसंद किया गया कि अब इसका पांचवां सीजन लाने की तैयारी चल रही है. याऊकू के प्रतिनिधि जीन शाओ ने बताया यह सीरियल युवाओं के जीवन और उनकी भाषा के करीब है. यह सीसीटीवी सरकारी टीवी पर दिखाए जाने वाले सीरियल से एकदम अलग है. माइक्रो फिल्में युवा निर्देशकों के लिए भी खुला आकाश साबित हो रही हैं. क्या आप फिल्म बनाना चाहते हैं यदि हां तो आपके पास बस एक वीडियो कैमरा होना चाहिए. अब फिल्म बनाइए और उसे इंटरनेट पर डाल दीजिए. प्रतिक्रयाएं तुरंत आने लगती हैं. आपको फीडबैक के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता. कारोबार की नई ऊंचाइयों तक पहुंचने के कारण माइक्रो फिल्म समारोहों की बाढ़ आ गई है. इंटरनेट सेवा उपलब्ध करवाने वाले टेनसेंट और याऊकू जैसी कंपनियां अब अपनी फिल्में बना रही हैं. शाओ बताते हैं स्टूडियो आपके काम को पहचाने और फिल्म से पैसे बने वह वक्त आने के पहले फिल्म बनाने वालों को कई साल गुमनामी में बिताने पड़ते थे. मगर अब आपको बस इतना करना है कि अपनी फिल्म अपलोड कीजिए और पैसे बनाइए. हालांकि सरकारी सेंसरशिप छोटी फिल्मों के पंख कतरने की कोशिश में है. पिछले साल सरकारी रेडियो फिल्म और टेलीविजन से जुड़ी चीनी सेशरशिप ने माइक्रो फिल्मों और वीडियो सामग्री पर यह कहते हुए नई पाबंदियां लगाईं कि वे इसके ज़रिए अपने हितों को बढ़ावा दे रहे हैं. मगर इंटरनेट पर सरकार का नियंत्रण टेढ़ी खीर साबित हुआ. इंटरनेट पर डाली जाने वाली बेहिसाब सामग्रियों के कारण उन पर कड़ी नज़र रखा जाना संभव नहीं है. |
| DATE: 2013-08-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1387] TITLE: गोरेपन की क्रीम नहीं लगाता: रणदीप हुडा |
| CONTENT: आजकल भारतीय पुरुषों को फेसवॉश या गोरेपन की क्रीम इस्तेमाल करने से कोई गुरेज़ नहीं है. लेकिन एक्टर रणदीप हुडा कहते हैं कि वो ऐसे मर्दों की जमात में नहीं हैं. रणदीप कहते हैं मेरी मां ने मुझसे कहा था कि शेरों के मुंह किसने धोएं हैं बेटा. और काफ़ी समय तक मैं इस बात पर यक़ीन करता रहा. तो मैं तो कम से कम मेट्रोसेक्सुअल नहीं हूं. मर्डर 3 जिस्म 2 साहिब बीवी और गैंगस्टर डी और हीरोइन जैसी फ़िल्मों में दिख चुके रणदीप इन दिनों अपनी नई फ़िल्म जॉन डे का प्रमोशन कर रहे हैं. फ़िल्म में उनके साथ नसीरुद्दीन शाह मुख्य भूमिका में हैं. इनके अलावा फ़िल्म में शरनाज़ पटेल विपिन शर्मा और एलेना कज़ान भी हैं. अपने रोल के बारे में रणदीप कहते हैं मुझे इस रोल के लिए ज़्यादा मेहनत करनी पड़ी. मेरा किरदार बचपन का एक सदमा अपने साथ लेकर घूम रहा है. जिन लोगों को आप सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं और जिन पर विश्वास करते हैं जब वो आपको धोखा देते हैं तो आप पर क्या बीतती है और आप उससे कैसे निपटते हैं ये मेरे लिए फ़िल्म में सबसे महत्वपूर्ण था. रणदीप ये भी कहते हैं कि निजी ज़िंदगी में भी उन्होंने धोखे और विश्वासघात को महसूस की है. वे कहते हैं मेरे माता-पिता मध्य पूर्व में काम करते थे. मेरे पिता डॉक्टर हैं. उन्होंने मुझे मेरी नानी के पास छोड़ दिया था. वो बाहर इसलिए गए थे ताकि वो वहां पैसे कमा कर मेरी शिक्षा और पालन-पोषण अच्छी तरह से कर सकें. मैं बहुत छोटा था. इसलिए काफ़ी सालों तक यहां तक कि अभी तक मेरे अंदर अकेलेपन की भावना है. मुझे वो धोखा लगा था. लेकिन बतौर एक्टर वो एकाकीपन मुझे प्रेरित भी करता है. नसीरूद्दीन शाह और रणदीप ने इससे पहले साल 2001 में मॉनसून वेडिंग में एक साथ काम किया था. वो पिछले कई सालों से नसीर के थियेटर ग्रुप मोटली क्रू के साथ भी जुड़े हुए हैं. तो क्या इस फ़िल्म में वो नसीर को टक्कर दे रहे हैं रणदीप इस बात से इंकार करते हैं. वे कहते हैं मैं उनके पास नहीं आ सकता हूं क्योंकि उनका अनुभव हमेशा मुझसे ज़्यादा रहेगा. कल को मैं नसीर बनना चाहूं वो भी मुमकिन नहीं है. हां उनका अपने रोल के प्रति जो समर्पण है उसमें मैं चाहूंगा कि मैं उन पर हावी हो जाऊं. हम कोई भी एक्टर दूसरे पर हावी नहीं हो सकता. ये सिर्फ़ तभी मुमकिन है जब वो एक ही रोल कर रहे हों. जॉन डे अगले महीने रिलीज़ हो रही है. फ़िल्म के डायरेक्टर अहिशोर सोलोमन और निर्माता अंजुम रिज़वी आतेफ़ ए ख़ान और के आसिफ़ हैं. |
| DATE: 2013-08-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1388] TITLE: क्या आप शोले को थ्रीडी में देखना चाहेंगे? |
| CONTENT: 1975 में बनी फ़िल्म शोले को भला कौन भूल सकता है. यह उन चुनिंदा फ़िल्मों में से है जिसके डायलॉग और सीन हर किसी को ज़ुबानी याद हैं. शोले फ़िल्म के सभी किरदार फिर वो चाहे जय और वीरू हों या बसंती और मौसी सभी अपने आप में यादगार हैं. फ़िल्म शोले अब एक बार फिर से हम सब के बीच आ रही है. आप सोच रहे होंगे कि क्या एक बार फिर से राम गोपाल वर्मा की आग के बाद कोई और इसका रीमेक बना रहे हैं. तो हम आपको बता दें कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा है. शोले आप सबके बीच आ तो रही है पूरे 37 साल बाद लेकिन थ्रीडी में. भारतीय सिनेमा की मशहूर फ़िल्म से एक शोले को अब आप थ्रीडी में देख पाएंगे. 15 अगस्त को फ़िल्म शोले अपने 38 साल पूरे करेगी और इस मौके पर इस फ़िल्म के थ्रीडी लुक को पहली बार दिखाया जाएगा. फ़िल्म को थ्रीडी में बदलने में लगभग 16 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं जिसे एक नए रंग रूप और तकनीक के साथ सितबंर में रिलीज़ किया जाएगा. फ़िल्म शोले ने अमिताभ बच्चन को वो कामयाब दिलाई जिसकी कल्पना हर कलाकार करता है. आज वो बॉलीवुड के शहंशाह कहे जाते हैं. पेन फ़िल्म के मालिक जयंती लाल गड़ा इस फ़िल्म को 11 अक्टूबर के दिन रिलीज कर अमिताभ बच्चन को उनके जन्मदिन का तोहफा देंगे. फ़िल्म शोले 15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई थी. इसका निर्देशन किया था रमेश सिप्पी ने और इसकी कहानी लिखी थी जावेद अख़्तर और सलीम ख़ान ने. फ़िल्म में अमिताभ बच्चन के साथ-साथ धर्मेंद्र संजीव कुमार हेमा मालिनी जया भादुड़ी अमजद खान मुख्य भूमिका में थे. शोले भारतीय फ़िल्म के इतिहास मे ऐसी पहली फ़िल्म बनी जिसने सौ से भी ज्यादा सिनेमाघरों मे सिल्वर जुबली मनाई. |
| DATE: 2013-08-14 |
| LABEL: entertainment |
| [1389] TITLE: 'आप सुंदर हैं तो लोग 'आइटम' का तमगा देते हैं' |
| CONTENT: कपिल शर्मा राजू श्रीवास्तव कृष्णा और सुदेश जैसे स्टैंड-अप कॉमेडियंस के बीच सुगंधा मिश्रा और भारती सिंह दो ऐसे नाम हैं जिन्होंने इस क्षेत्र में पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती दी और अपनी एक अलग पहचान बनाई. लोगों के बीच कामयाबी भी पाई और पैसे भी कमाए. लेकिन एक लड़की होने के नाते स्टैंड-अप कॉमेडियन होने की अपनी अलग चुनौतियां हैं. सुगंधा मिश्रा जब स्टेज पर आती हैं तो लोग उनकी ख़ूबसूरती की वजह से कई बार ऐसी टिप्पणियां कर देते हैं जो उन्हें मुश्किल में डाल देती हैं. बीबीसी से ख़ास बातचीत में सुगंधा ने बताया कॉमेडी में ठीक-ठाक या प्रजेंटेबल लगना आपके लिए मुश्किलें खड़ी कर देता है. क्योंकि उससे लोग आपको देखते ही हंसना शुरू नहीं कर देंगे. फिर यह भी ध्यान में रखना पड़ता है कि आपका कोई एक्ट अश्लील न हो जाए. सुगंधा के मुताबिक़ कई बार लोग आपकी बातों को दूसरे अर्थों में लेकर मतलब निकालने लगते हैं कि यह लड़की कुछ ज़्यादा ही खुली हुई है. एक घटना का ज़िक्र करते हुए सुगंधा कहती हैं एक बार मैं एक लाइव शो कर रही थी. मेरे स्टेज पर जाते ही लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया और आइटम-आइटम कहकर चिल्लाने लगे. ऐसी स्थिति में बोल्ड और स्मार्ट बनना पड़ता है. तब मैंने अचानक गाना शुरू किया और स्थिति संभाली. सुगंधा बताती हैं कि कई बार लोग उन्हें देखकर सीटी बजाने लगते हैं. अपने परिवार के बारे में बात करते हुए सुगंधा बताती हैं कि वह संगीत घराने से हैं. अपने परिवार की संस्कृति को ध्यान में रखते हुए एक्ट करना पड़ता है ताकि वो अश्लील न लगे. मर्दों का क्षेत्र समझे जाने वाले स्टैंड-अप कॉमेडियन का पेशा क्यों चुनाइसके जवाब में सुगंधा कहती हैं मैं गायिका हूं. बचपन से ही मुझे साउंड मेमोरी की ख़ासी समझ रही है. इसलिए मैं बचपन से ही मिमिक्री करती आ रही हूं लेकिन तब भी मैंने सोचा नहीं था कि इस पेशे को अपनाऊंगी. जब पंजाब में लाफ्टर चैलेंज के ऑडिशन हुए और मैं चुन ली गई तब से मेरा सफ़र शुरू हो गया. सुगंधा के मुताबिक़ मर्द होने के नाते पुरुष कॉमेडियंस कई बार वल्गर कॉमेडी भी कर लेते हैं लेकिन महिला होने के नाते वह ऐसा नहीं कर पातीं और तब चुनौती होती है कि साफ-सुथरी कॉमेडी करके लोगों को हंसाया जाए. वो इसका एक फ़ायदा भी गिनाती हैं. जब लोग कहते हैं कि आपकी कॉमेडी को परिवार के साथ बैठकर देखा जा सकता है तो मुझे ख़ुशी होती है. डबल मीनिंग जोक करना बिलो द बेल्ट या टॉयलेट ह्यूमर करना बहुत आसान है पर अच्छी बातें करके हंसाना बहुत मुश्किल है. सुगंधा कहती हैं कि इस वजह से पुरुष और महिला स्टैंड-अप कॉमेडियन को मिलने वाले पैसों में भी फ़र्क होता है. पुरुषों की कोई लिमिट नहीं होती. वो किसी भी विषय पर मज़ाक कर लेते हैं इसलिए उन्हें ज़्यादा पैसे मिलते हैं. हमारी सीमाएं होती हैं इस वजह से पैसे कम मिलते हैं. सुगंधा बताती हैं कि उन्हें सबसे ज़्यादा कॉम्प्लिमेंट लता मंगेशकर की मिमिक्री करने की वजह से मिले. सुगंधा ख़ुश हैं कि उन्हें पहचान मिल रही है और अब तो उनके पास दो-तीन फ़िल्में भी हैं. वह साजिद नाडियाडवाला की फ़िल्म हीरोपंती में सेकेंड लीड हीरोइन का रोल कर रही हैं. टीवी दर्शकों के बीच आज भारती सिंह एक जाना-माना नाम है. स्टैंड-अप कॉमेडियंस के बीच वो एक बड़ा नाम बन चुकी हैं और कई अवॉर्ड फंक्शंस में बड़े फ़िल्मी सितारों के साथ परफॉर्म भी कर चुकी हैं. चुनौतियां उनकी भी वही हैं जो सुगंधा मिश्रा को पेश आती हैं. मैं औरत होने के नाते सेक्स पर बात नहीं कर सकती. टॉयलेट ह्यूमर नहीं कर सकती क्योंकि वह मेरी कद-काठी को सूट नहीं करता. लोग हमेशा मुझे अपने मोटापे का सहारा लेकर कॉमेडी करते देखना चाहते हैं. मुझे रोते हुए देखना वो पसंद नहीं करते. भारती बताती हैं कि आमतौर पर लोगों की धारणा है कि स्टैंड-अप कॉमेडी बिना डबल मीनिंग का सहारा लिए नहीं हो सकती. वह इसी धारणा को तोड़ना चाहती हैं. मैं ख़ुद अपने मोटापे का ख़ासा मज़ाक उड़ाती हूं. मैंने तो अपने शोज़ में बच्चन साहब तक को नहीं छोड़ा. भारती मानती हैं कि कॉमेडी करते वक़्त उन्हें कई तरह से सावधानी बरतनी पड़ती है. मैं मॉडल तो हूं नहीं. इसलिए अश्लील कपड़े पहनने की कोई तुक नहीं. भारती के लिए कामयाबी पाने का सफ़र इतना आसान भी नहीं रहा. उन्हें अपने रिश्तेदारों का विरोध भी झेलना पड़ा. वह बचपन से ही मिमिक्री करती थीं. एक बार मैंने लाफ्टर चैलेंज का ऑडिशन दिया लेकिन वहां किसी को हंसी ही नहीं आई. एक हफ़्ते बाद फ़ोन आया कि मैं शॉर्ट लिस्ट हो गई हूं. जब मुंबई आने की बात आई तो रिश्तेदारों के ताने शुरू हो गए. सब कहने लगे कि हमें पता है मुंबई में पैसे कैसे कमाए जाते हैं. भारती ने बताया कि उनके पिता बचपन में ही गुज़र गए थे लेकिन उनकी मां ने उनका बहुत साथ दिया और उन्हीं की वजह से वो आज इस मुकाम पर हैं. कॉमेडी शोज़ में होने वाली अश्लील और डबल मीनिंग कॉमेडी पर भारती क्या कहती हैं वह चाहे ख़ुद ऐसी कॉमेडी न करने का दावा करें लेकिन इन शोज़ का हिस्सा तो होती ही हैं. इस पर भारती कहती हैं अगर आपको ऐसा लगता है तो आप मत देखिए. रिमोट आपके पास है. सनी लियोनी को किसने हिट किया सबको पता है कि वो पोर्न स्टार हैं. आप अगर उनकी फ़िल्म देखने न जाते तो वो हीरोइन नहीं बनतीं. आप ही उस चीज़ को बढ़ावा देते हैं. हालांकि हमारा शो तो एक फ्रूट प्लेट की तरह है जिसमें हर तरह के फ्रूट हैं. आपको जो पसंद नहीं है उसे मत खाइए. क्या पुरुष और महिला स्टैंड-अप कॉमेडियन को मिलने वाले पैसों में फ़र्क होता है. भारती कहती हैं मुझे तो अच्छे पैसे मिलते हैं. मैं काम का कोई मौक़ा नहीं छोड़ती. दिन-रात काम करती हूं. रात को जब घर वापस लौटती हूं और अपनी मां और भाई को एसी में सोते देखती हूं तो बड़ा सुकून मिलता है. आगे क्या लक्ष्य है. भारती फ़ौरन कहती हैं हाउसवाइफ़ बनना चाहती हूं. |
| DATE: 2013-08-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1390] TITLE: रंगभेद अभी भी है समस्या : ओप्रा विनफ़्री |
| CONTENT: अमेरिकी टॉक शो होस्ट ओप्रा विनफ़्री का कहना है कि हाल ही में उन्हें अपनी स्विट्जरलैंड यात्रा के दौरान नस्लवाद का शिकार होना पड़ा. ओप्रा के मुताबिक ज्यूरिख के एक बाजार में एक सहायक ने उन्हें हैंडबैग देने से मना कर दिया था. ओप्रा जिन्हें दुनिया की सबसे अमीर महिलाओं में शुमार किया जाता है उन्हें यह कह कर बैग देने से मना कर दिया गया था कि वे बहुत महंगे हैं. ओप्रा ने यह बयान एक अमेरिकी टेलीविजन कार्यक्रम में दिया हैली डेनियल की नयी फिल्म द बटर में मुख्य भूमिका कर रहीं विनफ्री पिछले महीने गायिका टीना टर्नर की शादी में शामिल होने के लिये स्विट्जरलैंड गयी थीं. विनफ्री का शो स्विट्जरलैंड में नहीं दिखाया जाता है. उनके अनुसार वह दुकान से बिना बहस करे चुपचाप वापस आ गयी लेकिन इससे यह साबित होता है कि रंगभेद की समस्या अब तक ख़त्म नहीं हुई है. उन्होंने कहा कि आप इसे दो अलग तरह से ले सकते है. या तो मैं इस बात को पूरी तरह हवा में उड़ा देती लेकिन मैने ऐसा नहीं किया क्योंकि वाकई यह समस्या अब तक कायम है. दुकान मालिक ट्रुडी गोट्ज़ के मुताबिक एक सहायक ने गलतफहमी से पहले विनफ्री को लगभग बीस लाख रुपये का एक बैग दिखाया था जो कि शीशे के अंदर रखा हुआ था. बीबीसी संवाददाता के मुताबिक ओप्रा विनफ़्री के इस बयान के बाद स्विट्ज़र्लॅंड के जनसंपर्क विभाग के लिए मुश्किलें बढ़ गयीं हैं. |
| DATE: 2013-08-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1391] TITLE: किराए की कोख पर ऐतराज़ नहीं: इमरान |
| CONTENT: किराए की कोख पर नहीं है ऐतराज़ ये कहना है अभिनेता इमरान ख़ान का. बीबीसी से हुई खास बातचीत में उन्होंने स्वीकार किया कि भविष्य में यदि उन्हें सरोगेसी का सहारा लेना पड़े तो वे पीछे नहीं हटेंगे. आजकल सरोगेसी यानी किराए की कोख का मुद्दा काफी चर्चा में है. टीवी और अख़बार ही नहीं सोशल मीडिया भी इस पर खूब बातें कर रहा है. हाल ही में दो बड़े सितारे अभिनेता शाहरुख़ ख़ान और आमिर ख़ान भी सरोगेसी की मदद से पिता बने हैं. इमरान ख़ान से जब पूछा गया कि वे सरोगेसी और इस पर चल रही बहस के बारे में क्या सोचते हैं तो उन्होंने बताया इसमें बहस की क्या बात है. अगर किसी को बच्चा पैदा करना है. और कोई चाहता है कि वो इनकी मदद करे तो इससे किसी का क्या लेना देना है. लोग फ़िज़ूल की बातों पर बहस करते हैं. सरोगेसी को लेकर अकसर ये कहा जाता है कि यह पैसा कमाने का ज़रिया है और इसे अपने फ़ायदे के लिए कारोबार बनाया जा रहा है. इस बारे में इमरान कहते हैं भई हम भी जो करते है एक अभिनेता के बतौर वह भी तो एक व्यापार है. आपके मनोरंजन के लिए नाचते हैं गाते हैं. इसमें तो कुछ गलत नहीं तो सरोगेसी में गलत क्या है हमारा दिल जिस काम की गवाही दे वो चाहे कुछ भी हो हमें वही करना चाहिए. बातचीत में इमरान ने स्वीकार किया कि यदि उन्हें भी मौका मिले तो सरोगेसी के लिए जाना चाहेंगे. उन्होंने कहा अगर मजबूरी की वजह से मुझे सरोगेसी तकनीक की मदद लेनी पड़े तो बिलकुल लूंगा क्यों नहीं. इमरान ख़ान सरोगेसी को इंसान के लिए वरदान मानते हैं. वे मानते हैं जिस जोड़े को किसी तरह की समस्या होती है चाहे बायोलॉजिकल हो या मेडिकल. वे बच्चे पैदा नहीं कर पाते. यदि उन्हें बच्चे पैदा करने हैं तो हम कौन होते हैं उन्हें रोकने वाले. सोशल नेटवर्क फ़िल्मी हस्तियों के लिए अपने चाहने वालों से बेहतर संवाद स्थापित करने का ज़रिया साबित हुआ है. इससे इतर इमरान सोशल मीडिया पर बिलकुल सक्रिय नहीं हैं. इमरान का कहना है सोशल मीडिया पर फॉलो करने वालों का जो आंकड़ा होता है वह शक के घेरे में है. मुझे इस पर विश्वास नहीं. तो फिर इमरान ख़ान अपने चाहने वालों से कैसे संपर्क करते हैं या संवाद रखते हैं. इमरान ने बताया मैं ऑन द ग्राउण्ड इवेंट्स पसंद करता हूं. जहां आप अपने चाहने वालों से सीधे मिल सकें. उनसे हाथ मिला सकें गले लग सकें. जब लोगों को मौका मिलता है कि वे आपकी आंखों में आंखें डाल कर बातें कर सकें तो वो लम्हा वे ज़रूर याद रखते हैं. इमरान ख़ान ने टीवी पर चलने वाले कई रियलिटी शो के बारे में बात करते हुए उनके बारे में अपना नज़रिया जा़हिर किया. उन्होंने बताया कि उन्हें टीवी देखना भी गवारा नहीं है. इमरान ने बताया एक शो चलता है टीवी पर आपने सुना होगा. इमोशनल अत्याचार. इसमें लोगों का पीछा किया जाता है. ब्यॉफ्रेंड या गर्लफ्रेंड जो एक दूसरे को धोखा दे रहे हैं उसका वीडियो टेप कर दिखाते हैं. फिर दोनों को सबके सामने लड़ाया जाता है. अब किसी की कोई कमज़ोरी पर्सनल प्रॉब्लम है उसे हमारे मनोरंजन के लिए ऐसे सबके सामने तमाशा बना देना बिलकुल गलत बात है. |
| DATE: 2013-08-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1392] TITLE: कैंसर के बाद मनीषा कोइराला ने नई पारी शुरु की |
| CONTENT: मनीषा कोइराला एक बार फिर फ़िल्मों में वापसी के लिए तैयार हैं. मनीषा पाँच महीने तक न्यूयॉर्क में गर्भाशय के कैंसर का इलाज कराकर मुंबई लौटी हैं. मनीषा अब पूरी तरह स्वस्थ हो चुकी हैं. वो कुछ दिन पहले ही नेपाल भी गई थीं. उन्होंने पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद अपने घर पर महापूजा का आयोजन किया था. मनीषा ने मुंबई में आते ही काम शुरू भी कर दिया है. उन्होंने एक फोटोशूट करके अपनी नई पारी की शुरुआत भी कर दी है. यह फोटोशूट एक कॉफीटेबल बुक के लिए किया गया है. मनीषा को इस किताब में इन्सपायरिंग वूमेन के रूप में शामिल किया गया है. आइकॉनिक वूमन ऑफ इंडिया प्रोजेक्ट के लिए मनीषा की बेहतरीन तस्वीरें ली गई हैं. मनीषा के अलावा किरण बेदी भी इस प्रोजेक्ट के लिए फोटोशूट कराएंगी. मनीषा कोइराला आमिर ख़ान शाहरुख ख़ान सलमान ख़ान अनिल कपूर रजनीकांत कमल हसन जैसे बड़े स्टार्स के साथ काम कर चुकी हैं. बीमारी के कारण मनीषा ने फ़िल्मों में काम करना छोड़ दिया था. बीमारी से पहले उनकी आखिरी फ़िल्म राम गोपाल वर्मा की भूत-रिटर्न थी. 42 वर्षीय मनीषा कोइराला नेपाल के मशहूर राजनीतिक परिवार से संबंध रखती हैं. मनीषा ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरआत 1989 में एक नेपाली फ़िल्म फेरी भेटौला फिर मिलेंगे से की थी. हिन्दी फ़िल्मों में उन्होंने 1991 में सुभाष घई की सुपरहिट फिल्म सौदागर से कदम रखा था. मणिरत्नम की बॉंबे और दिल से विधु विनोद चोपड़ा की 1942 ए लव स्टोरी और राम गोपाल वर्मा की कंपनी में मनीषा के अभिनय की काफी तारीफ हुई थी. मनीषा हिंदी के अलावा नेपाली तमिल तेलुगु और मलयालम फिल्मों में भी काम कर चुकी हैं. |
| DATE: 2013-08-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1393] TITLE: बतौर अभिनेत्री पहचान बनाने का मलाल: डॉली अहलूवालिया |
| CONTENT: हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म बजाते रहो में अहम किरदार निभाने वाली अभिनेत्री डॉली अहलूवालिया को फ़िल्म विकी डोनर में अपने दिलचस्प और बिंदास रोल के लिए प्रशंसा और राष्ट्रीय पुरस्कार दोनों ही पा चुकी हैं. बतौर अभिनेत्री तो वो अपनी इस उपलब्धि पर खुश तो हैं लेकिन रंगमंच की पृष्ठभूमि वाली डॉली अहलूवालिया को इस नई पहचान का मलाल भी है. बीबीसी से ख़ास बातचीत में वो कहती हैं देखिए ये फ़िल्म जगत का चलन है कि जो पर्दे पर आता है उसी को सराहा जाता है. हालाँकि पर्दे के पीछे काम करने वालों के बगैर फ़िल्म बन ही नहीं सकती. आज भले ही डॉली को लोग अभिनेत्री के तौर पर पहचानते हों लेकिन प्रतिष्ठा उन्हें मिली बतौर कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर. वो कहती भी हैं मुझे अन्दर से इस बात का दुख भी है कि एक विकी डोनर करने से मुझे इतनी ज़बरदस्त पहचान मिली जबकि कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर के रूप में अपनी पहली ही फ़िल्म बैंडिट क्वीन के लिए मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. उसके बाद वाटर ओमकारा लव आजकल कमीने और हालिया रिलीज़ भाग मिल्खा भाग जैसी फ़िल्मों में मेरे योगदान के लिए मुझे अब तक आईफा फ़िल्म फेयर संगीत नाटक अकादमीबलराज साहनी जैसे कई पुरस्कार तो मिल चुके हैं. लेकिन मुझे कोई नहीं जानता था. डॉली राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से अभिनय के लिए गोल्ड मेडलिस्ट भी रहीं. फिर भी उन्होंने कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग का क्षेत्र क्यों चुना इस सवाल पर वे कहती हैं अस्सी के दशक की शुरुआत में नाटकों का इतना ज़ोर नहीं था और मैं घर से पैसे नहीं लेना चाहती थी. भूमिकाओं की तलाश शुरू हुई. कुछ हाथ भी लगे लेकिन उन रोल्स के लिए सुबह से बुलाकर रात तक बैठा कर रखा जाता था और रात को कहा जाता था कि आपका सीन कल होगा. बस तब मुझे अहसास हुआ कि मुझे जो ज़िंदगी मिली है उसे मैं इंतज़ार में क्यों बिता दूं उसके बाद उन्होंने कॉस्ट्यूम डिज़ाइनिंग के क्षेत्र में ही करियर बनाने का सोचा. ऐसी ख़बरें थीं कि विकी डोनर के एक दृश्य को विश्वसनीय बनाने के लिए उन्होंने शराब भी पी थी. इस बात का पुरज़ोर खंडन करते हुए वे कहती हैं नहीं नहीं कृपया ऐसा न कहें. मैंने दारू कभी चखी तक नहीं ना ही मैंने कभी सिगरेट पी है. वो सब झूठ था. असल में हमारे निर्देशक शुजीत सरकार ने चाय के पानी में जूस मिलाकर हमें दिया था. बस वो तो अच्छे लिखे हुए सीन का नशा था. बजाते रहो के प्रचार में डॉली को फ़िल्म की मुख्य कलाकार के तौर पर प्रमोट किया गया था और लोग अब उन्हें स्टार कहने लगे हैं. इस पर वे कहती हैं मैं चाहती हूँ लोग मुझे स्टार न कहें बल्कि कलाकार का दर्जा दें. मैं एक्टर हूँ. मैं ऊपर वाले की शुक्रगुज़ार हूँ क्योंकि ज़िंदगी के बेहतरीन दौर से गुज़र रही हूँ. |
| DATE: 2013-08-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1394] TITLE: सेक्स कॉमेडी की आड़ में फूहड़ मज़ाक? |
| CONTENT: इंद्र कुमार निर्देशित फिल्म ग्रैंड मस्ती का ट्रेलर आजकल यूट्यूब पर चर्चा का विषय बना हुआ है. कुछ लोगों को फिल्म का प्रोमो बेहद अभद्र लग रहा है. रितेश देशमुख आफ़ताब शिवदासानी और विवेक ओबेरॉय अभिनीत इस फिल्म के कई संवाद बेहद अश्लील स्तर के हैं और उनका विवरण यहां देना संभव नहीं है. इससे पहले इंद्र कुमार नौ साल पहले सेक्स कॉमेडी मस्ती बना चुके हैं. यूट्यूब पर ट्रेलर देख रहे टिप्पणियां कर रहे लोग फिल्म का विरोध दो स्तरों पर कर रहे हैं. कुछ लोगों को फिल्म बेहद अभद्र लग रही है वहीं कुछ लोग ये भी कह रहे हैं कि सेक्स कॉमेडी की आड़ में किया गया ये बचकाना प्रयास है. हालांकि कई लोगों को फिल्म का प्रोमो पसंद भी आ रहा है और वे इसे फनी करार दे रहे हैं. बीबीसी ने इस मुद्दे पर सीधे फिल्म के निर्देशक इंद्र कुमार की राय जाननी चाही. इंद्र कुमार ने ग्रैंड मस्ती का बचाव कुछ ऐसे किया आज हर किसी के फोन पर गंदे-गंदे एसएमएस होते हैं. ख़ुद मेरे बच्चों को ये मैसेज आते हैं. और दिलचस्प बात ये है कि बच्चे बड़े शौक से अपने मां-बाप को ऐसे मैसेज सुनाते हैं. तो जब ज़माना बदल रहा है तो एक फिल्मकार होने के नाते मुझे भी बदलना होगा. एक और सेक्स कॉमेडी फिल्म डेल्ही बेली में काम कर चुके अभिनेता वीर दास से जब बीबीसी ने पूछा कि क्या इस तरह की फिल्में दर्शकों की समझ को कम करके नहीं आंकती कि जो भी दर्शकों को परोसो उन्हें पसंद आ ही जाएगाक्या फिल्मकार दर्शकों को नासमझ मान कर चल रहे हैं इस पर वीर दास बोले बिलकुल ग़लत. कोई भी फिल्मकार दर्शकों को कम अक्लवाला मानने की भूल कर ही नहीं सकता. करोड़ों के बजट में क्या कोई ये सोचकर फिल्म बनाएगा कि दर्शक नासमझ हैं. मेरे ख्याल से हर तरह की कॉमेडी का एक अलग दर्शक वर्ग होता है. कुछ कॉमेडी फिल्मों को युवा दर्शक पसंद करते हैं कुछ कॉमेडी फिल्मों को बुज़ुर्ग दर्शक पसंद करते हैं. वीर दास के मुताबिक़ भारत में हमेशा अच्छे कंटेट वाली फिल्में चलती रही हैं. इसलिए किसी फिल्म के कंटेट पर उंगली उठाना ठीक नहीं होगा. वरिष्ठ फिल्म समीक्षक कोमल नाहटा की राय अलग है. वो कहते हैं इस तरह की सेक्स कॉमेडी अगर बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से बनाई जाए और डायलॉग थोड़ा सा हिंट करते हुए हों तो चलता है. लेकिन जब ये कुछ ज़्यादा होने लगता है तो दर्शक ऊब जाते हैं. तो फिल्मकारों को ज़रा सावधान रहना चाहिए. कोमल नाहटा कहते हैं कि सेक्स कॉमेडी और अभद्र डायलॉग की भरमार रखकर फिल्म को हिट कराने की गारंटी नहीं ली जा सकती. उनके मुताबिक अगर आप अनुपात देखें तो ऐसी दस फिल्मों में से दो या तीन ही सफल होती हैं. बाकी तो असफल ही हो जाती हैं ना. लेकिन इंद्र कुमार ग्रैंड मस्ती के बारे में कई बड़े-बड़े दावे करने से नहीं चूकते. वह कहते हैं हॉलीवुड की अमेरिकन पाई और हैंगओवर जैसी सेक्स कॉमेडी को तो हम भारतीयों ने भी बहुत पसंद किया. और मेरा दावा है कि ग्रैंड मस्ती इन दोनों हॉलीवुड फिल्मों से बढ़कर साबित होगी. और जिन दर्शकों को ऐसी फिल्मों या ऐसे विषय से सख्त आपत्ति है उनके लिए इंद्र कुमार का साफ और सख्त संदेश है मैंने फिल्म के प्रोमो में साफ लिखा है. सिर्फ एडल्ट कॉमेडी के शौकीनों के लिए. अगर आपको ये पसंद नहीं है तो कृपया फिल्म देखने ना आएं. |
| DATE: 2013-08-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1395] TITLE: हॉलीवुड का पैसा 'दबाए' हुए हैं चीन |
| CONTENT: इन दिनों चीन हॉलीवुड की आंखों की किरकिरी बना हुआ है. चीन पर डिज़नी वॉर्नर यूनिवर्सल पैरामाउंट फॉक्स और सोनी जैसे बड़ी निर्माण कंपनियों के कई सौ मिलियन डॉलर बकाया हैं. हॉलीवुड ट्रेड पेपर्स के मुताबिक चीन की सरकारी फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी चाइना फिल्म ग्रुप पर वॉर्नर ब्रदर्स के 31 मिलियन डॉलर सोनी के 23 मिलियन डॉलर और फॉक्स स्टूडियो के 23 मिलियन डॉलर बकाया हैं. दरअसल हॉलीवुड फ़िल्मों पर चीन में दो प्रतिशत का अतिरिक्त टैक्स वैट वैल्यू एडेड टैक्स के रूप में लगाया जाता है. जब बड़ी अमरीकी फिल्म निर्माण कंपनियों ने इस फैसले का विरोध किया तो चीन ने इन हॉलीवुड फ़िल्म निर्माण कंपनियों को बकाया पैसा देना बंद कर दिया. चीन चाहता है कि हॉलीवुड निर्माण कंपनियां ये अतिरिक्त कर दें जबकि इन कंपनियों का कहना है कि ये कर उस समझौते की अवमानना है जो पिछले साल फरवरी में विश्व व्यापर संगठन में किया गया था. पिछले साल दोनों देशों के बीच ये तय हुआ था की हॉलीवुड ज्यादा संख्या में अपनी फिल्में चीन में प्रदर्शित करेगा और इसके बदले चीन इन फिल्मों से होने वाले मुनाफे का 25 प्रतिशत हिस्सा इन कंपनियों को देगा. इन कंपनियों की ओर से द मोशन पिक्चर एसोसिएशन ऑफ़ अमरीका चीन से इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन मुनाफा न मिलने के बावजूद भी ये अमरीकी फिल्म निर्माण कम्पनियां चीन में अपनी फिल्में प्रदर्शित कर रही हैं क्योंकि चीन इस वक़्त सबसे फलता फूलता बाज़ार है और हॉलीवुड यहां अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है. |
| DATE: 2013-07-31 |
| LABEL: entertainment |
| [1396] TITLE: बॉलीवुड के 'असली पुलिस इंस्पेक्टर' जगदीश राज नहीं रहे |
| CONTENT: हिंदी फिल्मों में अक्सर पुलिस इंस्पेक्टर का रोल निभाने वाले चरित्र अभिनेता जगदीश राज का निधन हो गया है. 1928 में पाकिस्तान में जन्मे जगदीश राज ने 100 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया. आमतौर वे फ़िल्मों में पुलिस इंस्पेक्टर का रोल किया करते थे. 60 और 70 के दशक में तो ये एक तरीके से तय होता था कि फिल्म में पुलिस वाले का रोल जगदीश राज ही करेंगे. हालांकि कुछ फिल्मों में उन्होंने जज या डॉक्टर का किरदार भी निभाया है. वे फिल्म अभिनेत्री अनीता राज के पिता हैं. जगदीश राज ने हम दोनों काला बाज़ार जॉनी मेरा नाम गैंबलर ड्रीम गर्ल दीवार जैसी हिट फिल्मों में काम किया. 80 और 90 के दशक में उनकी सक्रियता कम होने लगी. उन्होंने देव आनंद से लेकर अमिताभ बच्चन जैसे अभिनेताओं के साथ काम किया. उनका अंतिम संस्कार मुंबई में रविवार को कर दिया गया. सोशल मीडिया पर कई जानी मानी हस्तियों और उनके प्रशंसकों ने उन्हें याद करते हुए श्रद्धांजलि दी है. फ़िल्मकार अशोक पंडित ने लिखा है जगदीश राज के निधन के बारे में सुनकर दुख हुआ. फिल्म इंडस्ट्री ने अपना महान पुलिस अफ़सर खो दिया है. |
| DATE: 2013-07-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1397] TITLE: सलमान से गले मिलने पर शाहरुख की प्रतिक्रिया |
| CONTENT: शुक्रवार को पूनम पांडेय की फिल्म नशा रिलीज़ हुई. साल 2011 से पहले पूनम पांडेय का नाम बहुत कम लोगों ने सुना था. लेकिन पूनम के एक ऐलान ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया. उन्होंने घोषणा की थी कि अगर भारतीय टीम ने विश्व कप क्रिकेट जीत लिया तो वो नग्न फोटोशूट कराएंगी. भारतीय टीम ने विश्व कप जीता. पूनम ने भले ही अपना वादा पूरा ना किया हो लेकिन सुर्खियों में रहने की आदत जो उन्हें लग गई तो आज तक नहीं छूटी. उनकी फिल्म नशा शुक्रवार को रिलीज़ हो रही है और इसके बारे में उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए जो पूछा गया उसका जवाब दिया और जो नहीं पूछा गया उसका भी जवाब देने से नहीं चूकीं. पेश है इस बातचीत के मुख्य अंश. पूनम पांडेय कहती हैं कि उन पर उनकी फिल्म नशा का नशा छाया हुआ है. वो दावा करती हैं कि उनके प्रशंसक निराश होकर नहीं लौटेंगे. पूनम के शब्दों में मैंने इस फिल्म से पहले तक़रीबन 40 स्क्रिप्ट्स कैंसिल की. मैं अपने प्रशंसकों के सामने इतना कुछ परोसूंगी कि वो निराश होकर नहीं लौटेंगे. फिल्म में मेरा अफेयर अपने से कम उम्र के एक लड़के से है. वो ये भी कहती हैं कि उनकी फिल्म बोल्ड ज़रूर है लेकिन कोई पोर्न फिल्म नहीं है. पूनम कहती हैं फिल्म में कहानी है डायलॉग हैं. बेवजह के अजीब से दृश्य और ऊट पटांग आवाज़ें बस नहीं हैं. पूनम मानती हैं कि क्रिकेट विश्व कप के दौरान उनके नग्न फोटोशूट कराने के ऐलान ने उन्हें बहुत फायदा पहुंचाया. वो कहती हैं हां मुझे उस पब्लिसिटी स्टंट से फायदा हुआ. मुझे विवादों में रहना अच्छा लगता है. लेकिन साथ ही ऐसी बातों को हैंडल करना आता है. पूनम बताती हैं कि उन्हें उत्तेजक फोटो खिंचाना बहुत भाता है. उन्होंने दावा किया कि ट्विटर पर उन्हें ढेर सारे अच्छे कमेंट्स मिलते हैं और जो लोग उनके ख़िलाफ़ बातें करते हैं वो उनकी परवाह ही नहीं करतीं. पूनम पांडेय को सलमान ख़ान और शाहरुख़ ख़ान जैसे सुपरस्टार्स के साथ काम करना पसंद नहीं. वो कहती हैं मैं दोनों ही कलाकारों की बहुत बड़ी प्रशंसक हूं लेकिन उनके साथ काम नहीं करना चाहती. सलमान और शाहरुख के इर्द गिर्द डांस करने से अच्छा है कि ऐसी फिल्में करो जो आपकी अपनी अलग पहचान दे सकें. पूनम आगे कहती हैं वैसे मुझमें और सलमान ख़ान में ये समानता है कि उन्हें भी कपड़े उतारना पसंद है और मुझे भी. पूनम पांडेय लगातार अपने बोल्ड फोटोशूट कराती रहती हैं. उत्तेजक फोटो ट्विटर पर पोस्ट करती रहती हैं. क्या इस बात से उनके परिवार वालों को आपत्ति नहीं होती पूनम पांडेय कहती हैं मेरे परिवार वाले पहले मुझे बहुत टोकते थे. लेकिन अब वो समझ गए हैं कि मैं नहीं सुधरने वाली. मैं बड़ी बेशर्म हूं. इसलिए अब उन्होंने कहना बंद कर दिया है. |
| DATE: 2013-07-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1398] TITLE: किसने बनाई भारत की 'सर्वश्रेष्ठ फिल्म'? |
| CONTENT: पिछले हफ्ते दो हिंदी फिल्में रिलीज़ हुईं - डी-डे और रमैया वस्तावैया. इन दोनों फिल्मों के साथ ही हिंगलिश श्रेणी हिंदी-अंग्रेज़ी का मिश्रण में शिप ऑफ थीसियस नाम की फ़िल्म भी रिलीज़ हुई जिसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पिछले कुछ वर्षों की सर्वश्रेष्ठ भारतीय फ़िल्म बताया जा रहा है. श्याम बेनेगल ने इसे भारत की सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म बताया है तो वहीं ब्रिटेन के अख़बार द इंडिपेंडेंट ने इसे एक मास्टर पीस करार दिया है. इस फिल्म को आमिर ख़ान की पत्नी किरण राव द्वारा प्रस्तुत किया गया है और इसके निर्देशक आनंद गांधी हैं जिनकी ये पहली फ़ीचर फ़िल्म है. अगर एक जहाज़ की मरम्मत के दौरान उसके सारे पुर्ज़े बदल दिए जाएँ तो क्या वो जहाज़ असली बचता है या फिर कुछ और हो जाता है इसी विरोधाभास के फ़लसफ़े की बात करती है ये फिल्म जिसमें तीन किरदारों की कहानी है जिन्हें अंग-दान के ज़रिए एक नया जीवन मिलता है लेकिन उसके बाद ही शुरू होती है उनकी ख़ुद से लड़ाई. मनुष्य के अस्तित्व पर सवाल करती ये फिल्म जटिल होने और बेवजह का संदेश देने से बची है और निर्देशक ने बेहद ही सादगीपूर्ण तरीके से अपनी बात कही है. बीबीसी से बातचीत में आनंद कहते हैं जो विरोधाभास ही आपको ये आभास कराता है कि दरअसल जीवन छोटे-छोटे कणों से और उनके आपसी रिश्तों से बना है और एक कण भी बदल जाए तो सब कुछ बदल जाता है. इस तरह हर एक क्षण एक नया जहाज़ जन्म लेता है. अपने अनुभव के बारे में आनंद कहते हैं बचपन में सभी की तरह मेरे दिमाग़ में भी ये सवाल आते थे कि मैं कहां से आया हूं क्या कर रहा हूं क्या मेरे होने का कोई मतलब है या फिर मैं बस ऐसे ही हूं. व्यस्तता के बीच शायद हम इसका जवाब ढूंढ नहीं पाते हैं लेकिन सवाल तो बना ही रहता है. 32 वर्षीय आनंद गांधी हैं जिन्होंने उन्नीस साल की उम्र में अपने करियर की शुरुआत प्रसिद्ध सीरियल क्योंकि सास भी कभी बहू थी से की थी जिसके साथ वो पहले एक साल तक जुड़े रहे. आनंद के मुताबिक उस वक्त मैं अपना हुनर हर तरह के साहित्य को देना चाहता था. मैं नाटक भी लिखता था शॉर्ट फिल्म भी लिखी और इस प्रयोग के दौरान क्योंकि और कहानी घर-घर की जैसे सीरियल भी लिखे. हालांकि आनंद ने स्पष्ट किया कि वह भारतीय टेलीविज़न के मौजूदा स्वरुप से बहुत खुश नहीं हैं और इसके ज़िम्मेदार वह कहीं ना कहीं खुद को भी मानते हैं. बीबीसी से बातचीत में आनंद कहते हैं हमारे यहाँ ऐसा टेलीविज़न बनता है जहाँ एक ही प्रकार के विचार को बार-बार ठूँसा जाता है. हाँ मैं मानता हूं कि शुरुआत मैंने ही की है और ये काम करते वक्त भी मुझे कहीं ना कहीं एहसास था कि ये दर्शकों के लिए हानिकारक है. बात पूरी करते हुए आनंद ने कहा मैंने कोशिश भी की कि कुछ ऐसा बनाऊं जिससे मनोरंजन के साथ-साथ लोगों को कुछ गहरे अनुभव भी मिल सकें लेकिन किसी भी टीवी निर्माता को मैं कुछ नया करने के लिए मना नहीं सका. सबको वही क्योंकि वाला काम चाहिए था. |
| DATE: 2013-07-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1399] TITLE: क्या पाकिस्तान में क़बूल होगी 'अर्थ' |
| CONTENT: 1983 में रिलीज़ हुई थी महेश भट्ट की फिल्म अर्थ. विवाहेतर संबंधों पर आधारित इस फिल्म ने तत्कालीन भारतीय समाज के नियमों को चुनौती दी. ख़ुद निर्देशक महेश भट्ट के जीवन पर आंशिक रूप से आधारित इस फिल्म का अब पाकिस्तान में रीमेक बनेगा और इसे बनाने का बीड़ा उठाया है मशहूर पाकिस्तानी अभिनेता-निर्माता शान ने. सवाल ये उठता है कि इतने बोल्ड विषय को क्या पाकिस्तान के दर्शक स्वीकार कर पाएंगे. इसके जवाब में महेश भट्ट कहते हैं मौजूदा पाकिस्तान में भी औरतों की सोच सर चढ़कर बोल रही है. स्त्री-पुरुष की समानता का मुद्दा सिर्फ भारत का नहीं है. ये पूरे दक्षिण एशिया का अहम मुद्दा है. औरतों की सोच की हमारे समाज में धीरे-धीरे अहमियत बढ़ रही है. शायद इसलिए शान ने इस फिल्म को बनाने का सोचा. लेकिन महेश भट्ट ने माना कि फिल्म का विषय अभी के समाज के हिसाब से भी बोल्ड है. वो कहते हैं हमारे समाज में हमारे पुरखे बताते चले आ रहे हैं कि औरत मर्द की बैसाखी के बिना नहीं चल सकती. हमने इसी सोच को अर्थ में चैलेंज किया था. सच्चाई ये है कि औरत को किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है. वो अकेली चल सकती है. महेश भट्ट की इस फिल्म को तब कला और व्यावसायिक सिनेमा के बीच की खाई पाटने वाली फिल्म समझा गया था. फिल्म को लिखने की ज़िम्मेदारी शगुफ़्ता रफ़ीक़ को दी जा सकती है जिन्होंने ख़ुद भट्ट कैंप की कई फिल्मों की कहानी लिखी. लेकिन बीबीसी से बात करते हुए शगुफ़्ता ने कहा अगर शान पुरानी अर्थ के जैसे का तैसा बनाने का फैसला करते हैं तब तो मेरी कोई ज़रूरत नहीं है. हां अगर वो पुरानी कहानी में कुछ बदलाव करना चाहते हैं और मुझसे कहानी लिखने को कहते हैं तो मैं लिख दूंगी. शान ने महेश भट्ट से फिल्म बनाने की इजाज़त ले ली है. वो फिल्म का निर्देशन करने के अलावा मुख्य भूमिका भी निभाएंगे जो महेश भट्ट की अर्थ में कुलभूषण खरबंदा ने निभाई थी. 1983 की अर्थ में शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल ने भी अहम भूमिकाएं निभाई थीं. |
| DATE: 2013-07-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1400] TITLE: गाना गाते वक्त, मैं सब कुछ भूल जाती हूं: लता |
| CONTENT: लता मंगेशकर. बस नाम ही काफी है. दुनिया के किसी कोने में ये नाम लीजिए और आपको अहसास हो जाएगा कि लता जी के दीवाने कहां कहां मौजूद हैं. 84 साल की उम्र में उन्होंने इन दिनों फ़िल्मों में गाना भले बंद कर दिया हो लेकिन बीते छह दशक में उनके गाए गीत हर रोज दुनिया भर में करोड़ों लोग सुनते हैं. आज भी लता मंगेशकर के रिकॉर्ड दुनिया भर में सबसे ज्यादा बिकते हैं. उनकी कामयाबी और बुलंदी का सफ़र महज़ पाँच साल की उम्र में शुरू हो गया था. लता मंगेशकर के पिता संगीतकार दीनानाथ मंगेशकर थे. घर का माहौल संगीतमय जरूर था लेकिन लता जी को संगीत की समझ कितनी है इसका पता कब चलाइसको याद करते हुए लता मंगेशकर ने बीबीसी रेडियो 4 को बताया जब मैं पांच साल की थी तब की बात है. मेरे पिता बाहर गए हुए थे. लेकिन उनके शिष्य मेरे घर में रियाज़ कर रहे थे. एक शिष्य गा रहा था लेकिन ग़लत अंदाज़ में. मुझसे रहा नहीं गया. मैंने उसे जाकर समझाया कि कैसे गाना है. जब पिता को ये मालूम हुआ तो उन्हें अहसास हो गया कि लता मंगेशकर कितनी ऊंचाइयों तक पहुंचेगी. लेकिन जीवन में तूफ़ान का आना बाकी था. 1942 में जब लता महज़ तेरह साल की हुईं तो उनके पिता का निधन हो गया. लता जी घर की बड़ी लड़की थीं और पूरे परिवार की जिम्मेदारी उन पर आ गई. इसके बाद रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने का संघर्ष शुरू हो गया. लता जी की जीवनी लिख चुके पत्रकार-लेखक हरीश भिमानी ने बीबीसी रेडियो 4 को बताया लता जी को एक्टिंग पसंद नहीं थी लेकिन 13 साल की उम्र में उन्हें यही काम मिला. तो परिवार चलाने के लिए वे फ़िल्मों में काम करने लगीं. पांच-छह फ़िल्मों में उन्होंने काम किया. उस दौर में प्ले बैक गायक नहीं होते थे. ऐक्टर-ऐक्ट्रेस को ही गाने गाने होते थे. लता जी आवाज़ ने लोगों का ध्यान खींचा. लता जी की आवाज़ आज भी जवान हैं. उनके गाने को सुनकर कभी ये अंदाज़ा ही नहीं होता है कि लता जी ने ये गाना किस उम्र में गाया. फिल्म पत्रकार शशि बलिगा बीबीसी रेडियो 4 को बताती हैं संगीतकार मदन मोहन ने एक बार बताया था कि उन्होंने देश भर में कई कलाकारों की आवाज़ को सुना लेकिन लता मंगेशकर से बेहतर आवाज़ उन्हें नहीं मिली. हरीश भिमानी बताते हैं जब भारत में अंग्रेजों का शासन था एक तरह से सेंसरशिप लागू थी तब उन्होंने वंदे मातरम जैसा गीत गाया. इसके बाद लाल किले पर उनका गाया गीत ऐ मेरे वतन के लोगों आज भी देशभक्ति के जज़्बे से लोगों को ओतप्रोत कर देता है. ऐसे में लता जी राजनीति को किस अंदाज में देखती थीं बीबीसी के रेडियो 4 ने इसे भी जानने की कोशिश की. लता जी ने बताया देशभक्ति के जज़्बे से प्रेरित गाने जब मुझे गाने को मिले तो मैंने गाया है. मैं इसके लिए कभी मना नहीं कर सकती. लेकिन राजनीति में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. कइयों को ये अजीब लगता है कि प्यार किया तो डरना क्या से लेकर लग जा गले कि ये हसीं रात हो ना हो या फिर आजा रे परदेसी जैसी मधुर प्रणय गीतों को आवाज़ देने वाली लता मंगेशकर ने कभी प्रेम नहीं किया. न ही शादी की. शायद संगीत और गीत से उनका अटूट रिश्ता जो बन चुका था. गाने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का ज़िक्र करते हुए बॉलीवुड के अभिनेता कबीर बेदी ने बीबीसी रेडियो 4 को बताया एक बार मैंने उन्हें एक गीत की रिकॉर्डिंग करते हुए देखा. वे अपने साथ एक मुड़ा तुड़ा कागज़ लेकर आईं थीं जिस पर उन्होंने फोन पर ही गीत लिखे थे. उस कागज़ को देखते हुए चार- पांच घंटे के अंदर ही उन्होंने एक उम्दा गीत रिकॉर्ड कर लिया. ये बिना किसी ताम-झाम के अपने काम के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की मिसाल है. गाने की इसी प्रतिबद्धता की वजह से लता मंगेशकर छह दशकों तक बॉलीवुड की न जाने कितनी अभिनेत्रियों की आवाज़ बनी रहीं. अपनी इस प्रतिबद्धता और समपर्ण के बारे में लता जी ने बीबीसी के रेडियो 4 से कहा जब भी मैं गाना गाती हूं मुझे कुछ भी याद नहीं रहता. कहां हूं क्या करना है कितना पैसा मिलेगा गाना हिट होगा भी या नहीं इन सबको भूल जाती हूं. कुछ भी याद नहीं होता. बस मेरा ध्यान उस गाने को गाने पर लगा होता है. ब्रिटेन के युवा संगीतकार नितीन सोनी लता मंगेशकर के गाने अपने बचपन से सुनते रहे हैं. उन्होंने बीबीसी रेडियो 4 से कहा लता जी ने जिस पवित्रता से तरह-तरह के अंदाज़ में गाने गाए हैं वह भी एकदम सहजता से उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती. बॉलीवुड के सौ साल के इतिहास में छह-सात दशक को लता जी ने करीब से देखा है. शुरू-शुरू में फिल्मों में गीत को रिकॉर्ड करने के लिए एक साथ सौ लोगों का दल काम करता था जिसमें गायक से लेकर तमाम तरह के संगीतकार तक शामिल होते थे. ये सफ़र आज के तकनीकी युग में महज एक लैपटॉप तक सीमित हो गया है. इस बदलाव पर लता मंगेशकर कहती हैं तकनीक भले आधुनिक हो गई और इसने कलाकारों की सुविधाओं को बढ़ा दिया है लेकिन संगीत की आत्मा को नुकसान पहुंचाया है. एक तो बढ़ती उम्र और दूसरी तकनीक पर आधारित होते संगीत के चलते ही लता जी अब गाना नहीं गातीं. लेकिन उनके गाए करीब 25 हज़ारों गीतों में कोई ना कोई गीत तो हम-आप रोजाना ही सुनते हैं. आने वाली पीढ़ियां भी सुनती रहेंगी. |
| DATE: 2013-07-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1401] TITLE: श्वेता की शादी में राजा 'दीवाना' |
| CONTENT: कुछ लोग ध्यानाकर्षण के लिए कोई ना कोई रास्ता खोज ही लेते हैं. टीवी एक्टर राजा चौधरी भी ऐसा ही एक नाम हैं जिनकी पहली पत्नी श्वेता तिवारी ने हाल ही में दूसरी शादी की है. अब इन सबके बीच राजा कैसे शांत बैठ सकते हैं. टीवी एक्टर राजा चौधरी का आज जन्मदिन हैं और इस मौके पर उन्होंने अपनी पहली बीवी श्वेता तिवारी की दूसरी शादी का जश्न मानाने की ठानी है . बीबीसी को आए इस निमंत्रण में लिखा है Double Whammy from Raja यानी राजा की ओर से दोहरी मार. न्यौते में साफ तौर पर लिखा है कि ये पार्टी राजा के जन्मदिन के साथ साथ उनकी पहली पत्नी की दूसरी शादी के उपलक्ष्य में भी है. हालांकि मीडिया का मानना है कि राजा आज भी कुछ ड्रामा करने से नहीं चूकेंगे. 2007 मे श्वेता और राजा के बीच तलाक हुआ था. दोनों ही कलाकार रिएलटी शो बिग बॉस का हिस्सा रहे है. श्वेता की शादी हाल ही में टीवी एक्टर अभिनव कोहली से हुई है. ये दोनों ही कलाकार टीवी सीरियल जाने क्या बात हुई में एक साथ नज़र आए थे. इन दिनों बॉलीवुड में बायोपिक की लहर चल रही है. पान सिंह तोमर और भाग मिल्खा भाग के बाद अब बहुत जल्द अभिनेता दारा सिंह पर भी एक फिल्म बनाई जाएगी. बीबीसी से बातचीत में दारा सिंह के बेटे विंदू दारा सिंह ने इस ख़बर की पुष्टि की है साथ ही ये भी कहा कि ये फिल्म भाग मिल्खा भाग से ज़्यादा मसालेदार होगी. अब इसका क्या मतलब हुआ विंदू जी माही गिल ने साहब बीवी और गैंगस्टर के दोनों हिस्सों में अभिनय किया है. फिल्म गैंग्स ऑफ घोस्ट में माही गिल पर फिल्माया जाने वाले गीत की लाइन है दिल अपना फ़ोकट में नहीं दूंगी. इस फिल्म के निर्देशक हैं सतीश कौशिक जिनकी पहली फिल्म थी रूप की रानी चोरों का राजा. सुपरहिट फिल्म तेरे नाम का निर्देशन भी सतीश ने ही किया था. बताया जा रहा है कि गैंग्स ऑफ घोस्ट में माही गिल को मीना कुमारी लुक मे देखा जाएगा. |
| DATE: 2013-07-23 |
| LABEL: entertainment |
| [1402] TITLE: जब लता की वजह से गुलज़ार हुए मजबूर |
| CONTENT: सुरमयी रात के लॉन्च पर भूपेंद्र गुलज़ार और भूपेंद्र की पत्नी मिताली. गुलज़ार जैसे नामी गिरामी गीतकार को अपना फैसला भला किसकी वजह से बदलने पर मजबूर होना पड़ सकता है जवाब है लता मंगेशकर की वजह से. किस्सा बहुत पुराना है और इसे पत्रकारों से ख़ुद गुलज़ार ने बांटा. 60 के दशक में फिल्म ख़ामोशी बन रही थी. जिसके लिए गुलज़ार ने गीत लिखा था हमने देखी है उन आंखों की महकती ख़ुशबू. गुलज़ार कहते हैं मैंने ये गाना फिल्म के पुरुष कलाकार के लिए लिखा था लेकिन जब फिल्म के संगीतकार हेमंत कुमार ने ये गीत सुना तो फट से बोले ये गाना तो लता गाएगी. गुलज़ार बताते हैं कि ये सुनते ही वो घबरा गए और हेमंत कुमार से बोले लेकिन दादा ये गाना तो किसी मर्द पर फिल्माया जाना चाहिए जो फिल्म की हीरोइन के लिए ये गा रहा है. क्योंकि हमने देखी है उन आंखों की महकती ख़ुशबू कोई स्त्री पुरुष के लिए गाए ये बात अजीब सी लगती है. लेकिन हेमंत कुमार अड़े रहे और आखिरकार ये गाना लता मंगेशकर ने ही गाया. गुलज़ार आगे कहते हैं अब आप ये गाना सुनो तो अहसास तक नहीं होगा कि मैंने शुरुआत में ये किसी पुरुष के गाने के लिए लिखा है. ये ताकत है लता मंगेशकर की जो किसी गाने का जेंडर तक बदल देने की क़ाबिलियत रखती हैं. गुलज़ार ने ये बातें कहीं एलबम सुरमयी रात के लॉन्च के मौके पर जिसके गीत उन्होंने लिखे हैं और गाया है उनके क़रीबी दोस्त और गायक भूपेंद्र ने. गुलज़ार ने बताया कि इस एलबम के सारे गीत रात पर आधारित हैं. जब उनसे पूछा गया कि रात को लेकर इतना आकर्षण क्यों तो गुलज़ार ने कहा दरअसल रात ही वो वक़्त होता है जब आप सिर्फ अपने आपके साथ होते हैं. दिन की चहल-पहल में तो अपने ख़ुद पर फोकस ही नहीं कर पाते हो. इसलिए रात मुझे हमेशा लुभाती है. इस मौके पर कई बार मीडिया के सवालों ने गुलज़ार को परेशान किया. जब एक बार फिर किसी पत्रकार ने उनसे से सवाल दागा कि रात पर ही आधारित गाने क्यों तो गुलज़ार बोले मैं कितनी दफा इस बात का जवाब दूं. बार-बार एक ही बात को दोहराओ तो लगने लगता है कि आप झूठ बोल रहे हो. आप क्यों एक ही सवाल बार-बार पूछते हो. जब उनसे एक पुराने अभिनेता की बरसी पर आधारित सवाल किसी पत्रकार ने पूछा तो गुलज़ार को ये सवाल भी पसंद ना आया और वो बोले आप किसी की शादी में जाओ और कोई आपसे जनाज़े की बात करे या किसी की मौत पर ग़म जताने जाओ और कोई किसी की शादी पर सवाल करे तो बड़ी बेतुकी सी बात लगती है. मीडिया की ज़िम्मेदारी है कि इस तरह की संवेदनशीलता तो कम से कम दिखाए. गुलज़ार के आने वाले प्रोजेक्ट कौन-कौन से हैं किन फिल्मों के लिए वो गाने लिख रहे हैं और बतौर फिल्म निर्देशक क्या उनकी वापसी होगी जब ये सवाल उनसे पूछे गए तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया इस पर फिर कभी बात करेंगे. |
| DATE: 2013-07-23 |
| LABEL: entertainment |
| [1403] TITLE: ये फिल्म है या गूगल का 'विज्ञापन' ? |
| CONTENT: मैं फिल्में देखने जाता हूं इस उम्मीद से की एक अच्छी कहानी देखने को मिलेगी. अगर मेरी किस्मत अच्छी रही तो फिल्म थोड़ी गहरी और दमदार भी हो सकती है. हालांकि आजकल तो फिल्मों में विभिन्न कंपनियों के उत्पाद भी फ्रेम दर फ्रेम देखने को मिल जाते हैं. लेकिन हॉलीवुड की नई कॉमेडी फिल्म द इंटर्नशिप ने ब्रांड प्लेसमेंट को किसी और ही जगह पहुंचा दिया है ; ये फिल्म नहीं गूगल का अच्छा ख़ासा विज्ञापन है. इस फिल्म में अभिनेता ओवन विल्सन और विंस वॉन ने दो असफल सेल्समैन की भूमिका निभाई है जो कुछ नए की तलाश में गूगल के इंटर्नशिप प्रोग्राम में दाखिल होते हैं. ज़्यादातर सीन इस सर्च इंजन के मुख्यालय में दिखाए गए हैं जहां गूगल के उत्पाद दिख रहे हैं और पूरी फिल्म ये दिखाने की कोशिश में है कि काम करने के लिए ये कंपनी सर्वश्रेष्ठ है. शायद हो भी लेकिन जब आप फिल्म में एक गूगल कर्मचारी को ये बोलते हुए पाते हैं कि हम यहां जो करते हैं उससे लोगों की ज़िंदगी थोड़ी बेहतर हो जाती है तब आप सोच में पड़ जाते हैं कि मैं एक फिल्म देख रहा हूं या फिर किसी एजेंसी के कॉपीराइटर द्वारा तैयार किया गया विज्ञापन हविंगटन पोस्ट में अमरीका के मनोरंजन लेखक माइक राइन ने लिखा है कि द इंटर्नशिप को दरअसल मुफ्त में दिखाया जाना चाहिए क्योंकि ये तो गूगल का दो घंटे का विज्ञापन है. इसकी जानकारी तो नहीं है कि गूगल और द इंटर्नशिप के बीच क्या बात हुई है लेकिन अभिनेता विंस का कहना है कि कंपनी ने फिल्म में किसी तरह का पैसा नहीं लगाया है. ऐसा कहा जा रहा था कि गूगल ने निर्माताओं के साथ मिलकर काम किया और स्क्रिप्ट भी पढ़ी लेकिन फिल्म के निर्देशक शॉन लेवी के मुताबिक कंपनी ने किसी तरह की संपादकीय दख़लअंदाज़ी नहीं की है. अगर गूगल के नज़रिए से देखें तो उनके ब्रांड के प्रचार का ये सुनहरा अवसर था और मुख्य कार्यकारी अधिकारी लैरी पेज ने माना भी कि वो इस फिल्म से इसलिए जुड़े क्योंकि उनकी कंपनी मार्केटिंग में कच्ची है. हालांकि द इंटर्नशिप कोई पहली फिल्म नहीं है जिसने ब्रांड प्रमोशन की सीमा पार कर दी हैं. इससे पहले भी हॉलीवुड की कई फिल्मों ने ये काम किया है. 2002 में बॉंड फिल्म डाय अनैदर डे को बाय अनैदर डे कहा जाने लगा था क्योंकि बहुत सारी कंपनियों ने फिल्म में अपने उत्पाद दिखाने के लिए पैसे दिए थे. हालांकि फिल्म अध्ययन से जुड़े लोगों का मानना है कि द इंटर्नशिप ने तो हद ही कर दी है. गूगल ये दिखाने की कोशिश में है कि वो कोई विशालकाय कॉरपॉरेट नहीं बल्कि एक बेहद ही प्यारी सी जगह है जहां सब बहुत खुश है और प्यार से काम कर रहे हैं. कुछ मीडिया विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि गूगल के लिए पब्लिसिटी पाने का ये एक अच्छा मौका है. वैसे भी स्नोडेन के खुलासे के बाद कई लोगों का बड़ी आईटी कंपनियों पर से भरोसा उठता जा रहा है. ऐसे में ये फिल्म गूगल की छवि को बचाए रखने में मदद कर सकता है. हालांकि बॉक्स ऑफिस पर ये फिल्म बहुत कमाल नहीं कर पाई है लेकिन इसके बावजूद मुझे लगता कि अब इस फिल्म की देखा-देखी दूसरी और कंपनियां भी फिल्म का केंद्रीय बिंदू बनने की फिराक़ में रहेंगी. मार्केटिंग के लोगों की आक्रमकता इस हद तक बढ़ गई है कि विज्ञापन हमारी ज़िंदगी में पूरी तरह दाखिल कर गए हैं फिर वो ऑनलाइन हो या फिर फिल्में. द इंटर्नशिप जैसी फिल्म भी ऐसा ही कुछ कर रही है जिसमें आपको गूगल की दुनिया में बंद कर दिया जाता है - एक अच्छी ख़ासी फिल्म को बिना रुकावट के खेद वाला विज्ञापन बना दिया गया है. |
| DATE: 2013-07-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1404] TITLE: कितना लंबा चलेगा शाहरुख़-सलमान का 'मिलन' |
| CONTENT: बॉलीवुड के चर्चित तीन ख़ान जब एक दूसरे से मिलते हैं तो चर्चा का विषय बन ही जाते हैं. कुछ साल पहले आमिर ख़ान के भांजे इमरान ख़ान की शादी में शाहरुख़ ख़ान पहुंचे थे जिसकी काफी बात हुई थी और अब कथित तौर से एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाने वाले शाहरुख़-सलमान का एक दूसरे से गले लगना सुर्खियां बटोर रहा है. पढ़िए मुंबई डायरी की आज की ख़बरें. 5 सालो से दूरी बनाये रखने के बाद बॉलीवुड के सितारे सलमान ख़ान और शाहरुख़ ख़ान कल मुंबई के एक होटल मे आयोजित इफ्तार पार्टी में एक दुसरे से गले मिले. एक राजनेता द्वारा आयोजित इस पार्टी पर सलमान ने पहल करते हुए शाहरुख़ खान से हाथ मिलाया और फिर दोनों गले भी मिले जिसके बाद पूरे हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दी. कथित तौर पर इन दोनों ही कलाकार के बीच करीब पांच साल पहले अभिनेत्री कटरीना कैफ के जन्मदिन पर काफी कहा सुनी हो गई थी जिसमें बाद से इनके बीच बातचीत बंद थी. मीडिया और सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में यह बात कल रात से काफी चर्चा में है. देखना होगा कि क्या ये मुलाक़ात लंबी चलेगी या फिर महज़ एक औपचारिक भेंट बनकर रह जाएगी आज 22 जुलाई को हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध गायकों में से एक मुकेश का 90वां जन्मदिन है. राजकपूर की आवाज़ माने जाने वाले मुकेश ने हिंदी फिल्मों को कई यादगार गाने दिए हैं. 1959 में उन्हें अनाड़ी के लिए पहली बार सर्वश्रेष्ठ गायक का फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार मिला और इसके बाद तीन और फ़िल्म फ़ेयर उन्हें मिले. 1974 में फ़िल्म रजनीगंधा के गीत कई बार यूं भी देखा है के लिये उन्हें सर्वश्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. अपने दौर का प्रसिद्ध धारावाहिक बुनियाद एक बार फिर दूरदर्शन पर प्रसारित होने जा रहा है. 1947 के विभाजन की कहानी कहता ये सीरियल गुरुवार से टेलीविज़न पर नज़र आएगा. वैसे तो ये ड्रामा सीरिज़ पहले भी कई चैनल पर प्रसारित हो चुकी है लेकिन इस बार इसकी एक ख़ास बात रही. इस धारावाहिक के निर्माता-निर्देशक रमेश सिप्पी ने पूरी टीम के लिए एक पार्टी का आयोजन किया ताकि इस सीरियल के पुराने दिनों को फिर से याद किया जाए. सिप्पी कहते हैं हमें उम्मीद है कि इस बार युवा दर्शक भी इसे पसंद करेंगे. विभाजन की बातें होती रहती हैं यहां तक की शांति के दौरान भी. ये एक अच्छा तरीका है याद दिलाने का की उस वक्त लोग किस दौर से गुज़रे. बुनियाद को रमेश सिप्पी और ज्योति सप्रू द्वारा निर्देशित किया गया था वहीं मनोहर श्याम जोशी इस धारावाहिक के लेखक थे. भारतीय सिनेमा की मशहूर फिल्मों में से एक शोले को अब आप थ्रीडी में देख पाएंगे. 15 अगस्त को फिल्म शोले अपने 38 साल पूरे करेगी और इस मौके पर इस फिल्म के थ्रीडी लुक को पहली बार दिखाया जाएगा. फिल्म को थ्रीडी में बदलने में लगभग 16 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं जिसे एक नए रंग रूप और टेक्नोलॉजी के साथ संभवत 20 सितम्बर को रिलीज़ किया जायेगा. |
| DATE: 2013-07-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1405] TITLE: 'बैड' के सेट पर पूजा भट्ट और पुलिस में ठन गई |
| CONTENT: फिल्म निर्माता और अदाकारा पूजा भट्ट की निर्माणाधीन फिल्म बैड की शूटिंग को लेकर राजस्थान में झीलों की नगरी उदयपुर में शनिवार को पुलिस और भट्ट के बीच अच्छा ख़ासा विवाद हो गया . भट्ट ने पुलिस पर अपनी टीम के साथ बदसलूकी का आरोप लगाया है. हालांकि पुलिस इससे इनकार करती है. इस विवाद की वजह से काफी देर तक फिल्म की शूटिंग रुकी रही. पूजा भट्ट ने इस घटना को अपने ट्वीट के जरिए बयां किया है. फिल्म निर्माता ने इस वाकये को गंभीर बताया है और कहा कि उदयपुर में ये उनका दिन बहुत ही ख़राब था. पूजा भट्ट अपनी टीम के साथ इन दिनों उदयपुर में हैं और उनकी पूरी युनिट फिल्म की शूटिंग में मशगूल है. ये घटना तब हुई जब शनिवार को भट्ट की टीम के सदस्य उदयपुर में जिला कलेक्टर परिसर में शूटिंग कर रहे थे. उदयपुर के पुलिस अधीक्षक का दफ्तर भी वही स्थित है. जानकारों के मुताबिक जब फिल्म की टीम कैमरे और उपकरणों के साथ शूटिंग में व्यस्त थी ठीक उसी वक़्त एसपी हरिप्रसाद शर्मा अपने दो मातहत अधिकारियो के साथ दफ्तर की तरफ़ जा रहे थे. शूटिंग से बेखबर शर्मा जब अपने दफ्तर की ओर बढ़े तो युनिट के लोगों ने उन्हें रोका. पुलिस अधीक्षक शर्मा उस वक्त सादी वर्दी में थे. उन्हें ये बात नागवार लगी. इसी बात को लेकर दोनों पक्षों में बहस हो गई. सूत्रों ने बताया कि एसपी ने शूटिंग दल से उन्हें रोकने का सबब पूछा और कानूनी कारर्वाई की धमकी दी. इस पर टीम के सदस्यों ने उन्हें बताया कि वो विधिवत अनुमति लेकर ही शूटिंग कर रहे है. ये विवाद इतना बढ़ा कि खुद पूजा भट्ट मौके़ पर पहुँच गईं और एसपी शर्मा से उनकी अच्छी ख़ासी तकरार हो गई. बाद में भट्ट ने उदयपुर के जिला कलेक्टर विकास भाले से इस घटना की शिकायत की. इस दौरान शूटिंग रुकी रही. फिल्म अदाकारा ने अपने पिता और मशहूर फिल्म निर्माता महेश भट्ट को फोन कर घटना की जानकारी दी. पूजा भट्ट ने इस घटना पर ट्वीट किया और कहा कि एसपी शर्मा जबरन शूटिंग के सेट पर आ धमके और टीम के साथ बद्सलूकी की. भट्ट ने कहा कि एसपी की भाषा भी ठीक नहीं थी. पूजा भट्ट पूछती हैं कि आखिर एसपी ने ऐसा सलूक क्यों किया. बात महज इतनी सी थी कि उन्हें सिर्फ मिनट भर इंतजार करने को कहा था ताकि तब तक कैमरा अपना काम कर ले. उधर एसपी शर्मा कहते हैं मैंने कोई बदसलूकी नहीं की. दरअसल जब मैं अपने दफ्तर की ओर बढ़ा तो देखा कुछ लोग रास्ता रोके हुए हैं और मुझे आगे जाने से मना कर रहे थे. उन्हें बताया गया कि ये एसपी का दफ्तर का मार्ग है और आप रोक नहीं सकते. इस पर बहस हो गई. पुलिस के मुताबिक बाद में शूटिंग फिर शुरू हो गई. इस फिल्म में रणदीप हूडा अहम किरदार में हैं. ऐसा कहा जा रहा है कि ये फिल्म अपराध की दुनिया के एक चर्चित चेहरे चार्ल्स शोभराज की जिन्दगी से जुडी है. |
| DATE: 2013-07-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1406] TITLE: एक ही फ़िल्म में दिखेंगे सुपरमैन और बैटमैन |
| CONTENT: हॉलीवुड स्टूडियो वॉर्नर ब्रदर्स ने सुपरहीरो सुपरमैन-बैटमैन की फ़िल्म बनाने की घोषणा की है. हॉलीवुड फ़िल्मों के दो मशहूर किरदार सुपरमैन और बैटमैन अब एक ही फ़िल्म में नज़र आएंगे. हॉलीवुड स्टूडियो वॉर्नर ब्रदर्स ने यह घोषणा की है कि हॉलीवुड के दो सुपरहीरो पहली बार बड़े पर्दे पर एक-साथ किरदार निभाते हुए दिखेंगे. सुपरमैन की हाल की सबसे नई फ़िल्म मैन ऑफ स्टील के निर्देशक जैक स्नाइडर ही इस फ़िल्म का निर्देशन करेंगे. सैन डियागो के एक कॉमिक कन्वेंशन में स्नाइडर ने अपने प्रशंसकों के सामने इस ख़बर का ख़ुलासा किया. हालांकि उनका कहना था कि इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट अभी भी लिखी जा रही है. सुपरमैन और बैटमैन सीरीज़ की फ़िल्में खासी मशहूर हैं और इन्होंने एक अरब डॉलर से ज़्यादा की कमाई की है. दुनिया भर में सुपरमैन कॉमिक्स भी काफी मशहूर है. ब्रितानी अभिनेता हेनरी कैविल ही एक बार फिर से सुपरमैन की भूमिका निभाते हुए दिखेंगे लेकिन बैटमैन का नया किरदार कौन निभाएगा ये अभी तय नहीं हुआ है. अगले साल इस फ़िल्म की शूटिंग शुरू हो जाएगी और साल 2015 की गर्मी के मौसम के दौरान यह फ़िल्म रिलीज़ हो सकती है. वैसे सुपरमैन ने बॉक्स ऑफ़िस पर हमेशा कामयाबी पाई हो ऐसा भी नहीं है. साल 2006 में रिलीज़ हुए सुपरमैन के सीक्वल का प्रदर्शन उतना बेहतर नहीं रहा. लेकिन मैन ऑफ स्टील ने दुनिया भर में 62 करोड़ डॉलर की कमाई की. दो सुपरहीरो वाली फ़िल्म में बैटमैन का किरदार कौन निभाएगा यह तय नहीं है. वॉर्नर ब्रदर्स के ग्रेग सिल्वरमैन का कहना है कि सुपरमैन और बैटमैन को एक साथ पर्दे पर दिखाने के लिए जैक स्नाइडर से बेहतर कोई नहीं हो सकता था. उन्होंने कहा स्नाइडर बेहद प्रतिभाशाली फ़िल्मकार है और उन्हें अपना हुनर अच्छी तरह मालूम ह |
| DATE: 2013-07-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1407] TITLE: ब्रूस ली की मौत के चालीस साल |
| CONTENT: ब्रूस ली की मौत के वक्त शैनॉन सिर्फ चार साल की थीं. 40 साल पहले 20 जुलाई 1973 को प्रसिद्ध मार्शल आर्ट कलाकार और फ़िल्म अभिनेता ब्रूस ली की 32 साल की अल्प आयु में मौत हो गई थी. लेकिन इस छोटे से जीवन में ही ब्रूस ली कामयाबी की एक बड़ी दास्तान लिख गए. ब्रूस ली की मौत के वक़्त उनकी बेटी शैनॉन ली सिर्फ़ चार साल की थी. अपने पिता की यादों को ज़िंदा रखने के लिए उन्होंने पिछले साल एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाई थी. शैनॉन ने उस वक़्त ब्रूस ली से जुड़ी कुछ यादें बीबीसी से साझा की थी. मुझे ज्यादा कुछ याद नहीं है लेकिन अपने घर के आँगन में उनके साथ खेलना याद है. हांगकांग में हमारे पास अपना अलग घर था जो वहाँ के हिसाब से बड़ी बात थी. मार्शल आर्ट के बिना हमारे घर में रहना नामुमकिन था. वे हमें लात-घूँसे चलाना सिखाते थे. हम कुश्ती बहुत ज्यादा खेलते थे. मेरे पिता को लगता था कि बच्चों के लिए जूडो ज्यादा बेहतर है. अपनी मार्शल आर्ट और अदाकारी से ब्रूस ली कामयाबी की नई इबारत लिख रहे थे. वे फ़िल्मों की शूटिंग और अपनी कुंग फू अकादमी के काम में व्यस्त थे. मौत के वक़्त न वे बहुत बीमार थे और न ही किसी और परेशानी का शिकार थे. अचानक उनकी तबीयत ख़राब हुई और उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया. उनकी मौत को याद करते हुए शैनॉन कहती हैं यह एक दुखद दुर्घटना थी. वे बहुत स्वस्थ और फ़िट थे और अपने क्षेत्र में ऊँचाई पर थे. अचानक एक एलर्जिक रिएक्शन से उनकी मौत हो गई. उस दिन वह अपने एक सहकर्मी के अपार्टमेंट में थे. वे लोग एक नई फ़िल्म पर काम कर रहे थे. अचानक उनके सिर में दर्द हुआ. उन्हें दर्द की दवाई दी गई. उनके दिमाग़ में सूजन आ गया था. वे लेट गए और फिर ज़िंदा नहीं उठे. ब्रूस ली की अंतिम यात्रा को याद करते हुए शैनॉन कहती हैं मुझे हांगकांग में हुई अंतिम यात्रा याद है. हज़ारों लाखों लोग सड़कों पर खड़े थे. मैंने शोक के दौरान पहनी जाने वाली पारंपरिक सफ़ेद चीनी पोशाक पहन हुई थी. उन्हें खुले ताबूत में रखा गया था. बहुत अफ़रा-तफ़री थी. ब्रूस ली ने अपने करियर में बहुत ज्यादा फ़िल्में नहीं की. लेकिन जो फ़िल्में की वे उन्हें इतिहास के सबसे चर्चित लोगों में से एक बना गईं. मार्शल आर्ट की उनकी कला ने दुनिया को दीवाना बना दिया. शैनॉन मानती हैं कि उन्हें असली ख्याति मौत के बाद ही हासिल हुई. अपने पिता के करियर को याद करते हुए शैनॉन कहती हैं. मौत से पहले वह हांगकांग और दक्षिण पूर्वी एशिया में बड़े स्टार बन चुके थे. वे सड़क पर नहीं चल सकते थे. वे जहाँ जाते थे भीड़ इकट्ठा हो जाती थी. लोग उनका ऑटोग्राफ़ लेना चाहते और उनके साथ फ़ोटो खिँचाना चाहते थे. लेकिन पश्चिम में वे इतने बड़े स्टार नहीं थे. हॉलीवुड की कंपनी वार्नर ब्रदर्स के सहयोग से बनी उनकी फ़िल्म एंटर द ड्रैगन उनकी मौत के एक महीना बाद रिलीज़ हुई थी. इस फ़िल्म ने उन्हें नई ऊँचाई दी और उनकी बाक़ी फ़िल्मों के अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुँचने का रास्ता साफ़ किया. उसके बाद से उनके प्रति क्रेज़ बढ़ता ही जा रहा है. लेकिन ब्रूस ली को दुनिया सिर्फ़ एक फ़िल्म अभिनेता के रूप में ही नहीं बल्कि एक उम्दा मार्शल आर्ट कलाकार के रूप में ज्यादा याद रखेगी. ब्रूस ली भी मार्शल आर्ट को ही सबसे ज्यादा महत्व देते थे. ब्रूस ली की मार्शल आर्ट के बारे में शैनॉन कहती हैं उन्होंने अपने जीवन में मार्शल आर्ट की अपनी अलग कला विकसित की. वे इसे जीत कुन डो कहते थे. वे खुद को अभिनेता या लेखक से पहले हमेशा एक मार्शल आर्टिस्ट मानते थे. उन्होंने अपनी कला में सादगी सरलता और स्वतंत्रता को सर्वोपरि माना. पुराने और पारंपरिक तरीक़ों से स्वतंत्रता ही उनकी कला का आधार था. ब्रूस ली के लिए जब हांगकांग में रहना मुश्किल हो गया तो वे बेहतर जीवन की तलाश में अमरीका आ गए. कामयाबी के शिखर पर पहुँचा यह सितारा हालात से संघर्ष करता रहा. लेकिन यहाँ भी कई बार उन्हें पूर्वाग्रहो का सामना करना पड़ा. इस बारे में शैनॉन मेरे पिता को अपने जीवन में हर स्तर पर पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ा. हॉलीवुड में उन्हें चीनी होने का पूर्वाग्रह झेलना पड़ा लेकिन बचपन में उन्हें हांगकांग में भी पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ा. दरअसल मेरे पिता पूरी तरह चीनी नहीं थे. उनकी माँ एक अर्धगोरी महिला थी. जब वे एक स्कूल में विंग चुन सीख रहे थे तो उनके पूरी तरह चीनी न होने पर उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था. वे चाहते थे जो व्यवहार उनके साथ हुआ वह किसी और के साथ न हो. किसी और को बेवजह पूर्वाग्रहों का सामना न करना पड़े. ब्रूस ली को दुनिया को अलविदा कहे आज चालीस साल पूरे हो गए हैं. अपनी मौत के इतने अर्से बाद भी वे एक चर्चित चेहरा हैं. दुनिया न सिर्फ़ उन्हें जानती है बल्कि उनकी कमी महसूस भी करती है. एचके हेरिटेज म्यूजियम ब्रूस ली की याद में एक प्रदर्शनी शुरू कर रहा है. यह प्रदर्शनी पाँच साल तक चेलगी. इसमें उनके जीवन से जुड़ी 600 चीज़ें प्रदर्शित की जाएंगी. इसमें चीनी और अंग्रेजी में लिखी उनकी कविताएँ भी शामिल हैं. एचके फ़िल्मेकर्स एसोसिएशन द्वारा बनाई गई एक नई डाक्यूमेंट्री फ़िल्म भी दिखाई जाएगी. |
| DATE: 2013-07-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1408] TITLE: 'आफ़रीदी क्रिकेटरों के अमिताभ बच्चन हैं' |
| CONTENT: शाहिद आफ़रीदी ने क्रिकेट के मैदान में ख़ूब चौके छक्के उड़ाए. लेकिन अब वो फ़िल्मी पर्दे पर भी जल्द ही नज़र आएंगे. ईद के मौक़े पर पाकिस्तानी फ़िल्म मैं हूं शाहिद आफ़रीदी रिलीज़ हो रही है जिसमें शाहिद आफ़रीदी एक ख़ास भूमिका में दिखेंगे. ये फ़िल्म शाहिद आफ़रीदी के जीवन पर पूरी तरह से आधारित नहीं है. ये फ़िल्म है एक युवा पाकिस्तानी के क्रिकेटर बनने के सपने की जो शाहिद आफ़रीदी को अपना प्रेरणा स्त्रोत मानता है. फ़िल्म के मुख्य कलाकार हमज़ा अली अब्बासी ने बीबीसी एशियन नेटवर्क से ख़ास बातचीत की और इस फिल्म के अलावा पाकिस्तानी फ़िल्म उद्योग के बारे में भी काफ़ी चर्चा की. पेश है इस बातचीत के ख़ास अंश. मैं हूं शाहिद आफ़रीदी क्यों इस बात के जवाब में हमज़ा अली अब्बासी ने कहा इमरान ख़ान के बाद शायद शाहिद आफ़रीदी सबसे बड़े पाकिस्तानी स्टार हैं. हर युवा क्रिकेटर उन जैसा बनना चाहता है. वो क्रिकेटरों के अमिताभ बच्चन हैं. ये फ़िल्म एक युवा के अपने आइडल जैसा बनने के सपने की कहानी है. हमज़ा ने बताया कि शाहिद ख़ुद इस फ़िल्म में एक ख़ास भूमिका में नज़र आएंगे. उन्होंने दावा किया कि ये पाकिस्तानी की पहली स्पोर्ट्स फ़िल्म है. क्या पाकिस्तान की जनता मनोरंजन के लिए सिर्फ़ बॉलीवुड पर निर्भर है. इस बात के जवाब में हमज़ा ने कहा नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है. इस्लामाबाद में आज से दो साल पहले सिर्फ़ एक ही सिनेमाहॉल हुआ करता था. अब तीन-चार नए हॉल खुल गए हैं. हमारा उद्योग अगर नहीं बढ़ रहा होता तो ऐसा नहीं होता. लेकिन हमज़ा मानते हैं कि पाकिस्तानी फ़िल्मों को अपने तौर-तरीक़े बदलने चाहिए. वो कहते हैं हमारा मुख्य उद्देश्य सिर्फ मनोरंजक फ़िल्में बनाना होना चाहिए. बॉलीवुड या हॉलीवुड आर्ट फ़िल्में बना सकते हैं क्योंकि उनकी बहुत बड़ी इंडस्ट्री है. हमारी इंडस्ट्री को अगर ज़िंदा रहना है तो मनोरंजक फ़िल्में बनानी ही होंगी. हमज़ा को भला आर्ट सिनेमा से दिक्क़त क्यों है इसके जवाब में वो कहते हैं देखिए पाकिस्तान में भ्रष्टाचार है ग़रीबी है हालात ख़राब हैं ये तो सबको पता है. हमें फ़िल्मों में ये दिखाने की क्या ज़रूरत है. देश में 40 से ज़्यादा न्यूज़ चैनल हैं. अगर अपने आपको डिप्रेस करना हो तो न्यूज़ चैनल देख लो. फ़िल्म देखने आने की क्या ज़रूरत है. हमज़ा फ़िल्मों में आने से पहले स्टेज से भी जुड़े रहे. उन्होंने काफ़ी विज्ञापन भी किए. वो कहते हैं कि फ़िल्म में शाहिद आफ़रीदी की तरह बॉ़लिंग सीखने के लिए उन्हें काफ़ी मेहनत करनी पड़ी. जाते-जाते वो हंसते हुए कह गए फ़िल्म की शूटिंग के लिए मैंने गेंदबाज़ी की इतनी प्रेक्टिस की कि अब तो मुझे पाकिस्तानी क्रिकेट टीम में भी जगह मिल जाएगी. |
| DATE: 2013-07-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1409] TITLE: क्या है हरभजन का 'दूसरा' करियर ? |
| CONTENT: फिल्म और संगीत एक ऐसी दुनिया हैं जहां किसी डिग्री की ज़रुरत नहीं होती. शायद इसलिए दूसरे क्षेत्र के लोग भी इस इंडस्ट्री में अपना भाग्य आज़माने पहुंच जाते हैं. शाहरुख खान की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस एक दिन लेट चल रही है. 8 अगस्त को पूरे विश्वभर मे रिलीज़ होने वाली ये एक्शन मसाला फिल्म अब 9 अगस्त को रिलीज़ होगी. जानकारों के मुताबिक ऐसा फैसला इसलिए लिया गया क्योकि फिल्म के निर्माता चेन्नई एक्सप्रेस को ईद के दिन रिलीज़ करना चाहते थे जो कि अब 9 अगस्त को पड़ रही है. फिल्म में शाहरुख़ के साथ दीपिका पादुकोण भी नज़र आएंगी. 2002 के हिट एंड रन मामले मे अभिनेता सलमान खान पर नए सिरे से आरोप तय करने को लेकर सुनवाई 24 जुलाई को होगी. वैसे इस पर आज सुनवाई होनी थी लेकिन अब फिलहाल इसे 24 जुलाई तक के लिए टाल दिया गया है. पहले सलमान पर लापरवाही का केस चल रहा था लेकिन अब यह गैर-इरादतन हत्या के मामले में तब्दील हो चुका है. शुक्रवार को इस केस की नए सिरे से सुनवाई शुरू हुई और सलमान भी कोर्ट में पेश हुए. इससे पहले एक बार भी अपने केस के सिलसिले मे सलमान खान कोर्ट नहीं पहुंचे थे. अगर आरोप साबित होते हैं तो सलमान को 10 साल की सजा हो सकती है. इन दिनों क्रिकेटऱ हरभजन सिंह मैदान पर अपनी गेंदबाज़ी का जौहर नहीं दिखा पा रहे हैं लेकिन शायद खाली बैठना उन्हें भी पसंद नहीं है और इसलिए अब उन्होंने गायकी की राह पकड़ ली है. हाल ही में उन्होंने मेरी मां नाम का गीत रिकॉर्ड किया साथ ही उसके वीडियो में अभिनय भी किया. ये गीत हरभजन ने अपनी मां को समर्पित किया है. देखना होगा कि गेंदबाज़ी के बाद हरभजन का ये दूसरा प्रयास उन्हें कितना जमता है. कमल हासन की बेटी श्रुति हासन के लिए ये शुक्रवार काफी अहम है क्योंकि उनकी दो फिल्में एक साथ रिलीज़ हो रही हैं. एक है निखिल आडवाणी की डी-डे जिसमें वो एक पाकिस्तानी वैश्या का रोल निभा रही हैं. दूसरी फिल्म है प्रभु देवा द्वारा निर्देशित रमैया वस्तावैया जो एक लव स्टोरी बताई जा रही है. फिल्म में उनके साथ नज़र आएंगे गिरीश कुमार जो टिप्स कपंनी के मालिक रमेश तौरानी के बेटे हैं. वैसे इन दोनों फिल्मों के अलावा आनंद गांधी की फिल्म शिप ऑफ थीसियस भी रिलीज़ हो रही है जो मुख्यधारा से थोड़ी भिन्न फिल्म बताई जा रही है. इस फिल्म को प्रस्तुत कर रही हैं आमिर खान की पत्नी किरण राव. |
| DATE: 2013-07-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1410] TITLE: फ़िल्मों ने मुझे आवाज़ दी, पहचान दी: हायफ़ा |
| CONTENT: वाजिदा की निर्देशक हैं हायफ़ा अल मंसूर. साउदी अरब में महिलाएं न तो मतदान कर सकती हैं न गाड़ी चला सकती हैं और न ही उन्हें इस बात की इजाज़त है कि वो पुरुषों के साथ काम करें. ऐसे में जब हायफ़ा अल-मंसूर अपनी पढ़ाई पूरी कर सऊदी अरब लौटीं तो उन्हें लगा कि जैसा उनका कोई वजूद ही नहीं रह गया है. सऊदी अरब एक पुरुष प्रधान समाज है. ऐसे में न तो हायफ़ा की आवाज़ को सुनने वाला कोई था और न ही उनकी शख़्शियत को महत्व देने वाला. इस बात से बेहद निराश हायफ़ा ने ठाना कि वो कुछ ऐसा कर दिखाएंगी जिससे उनकी बात उनकी आवाज़ लोगों तक पहुंचे. उनकी इसी सोच ने उन्हें साऊदी अरब की पहली महिला फ़िल्मकार बना दिया. हायफ़ा की फ़िल्म वाजिदा को दुनिया भर में सराहा जा रहा है. हाल ही में जब वो बीबीसी के लंदन स्टूडियो आईं तो उन्होंने बताया कि निर्देशन की ओर कैसे बढ़े उनके क़दम. वो कहती हैं मेरे ही देश में न तो मेरी आवाज़ सुनी जा रही थी और मेरे होने या न होने से किसी को कोई फर्क पड़ रहा था. ये बात मुझे बहुत खल रही थी परेशान कर रही थी. हायफ़ा कहती हैं फ़िल्म बनाना तो मैंने एक रूचि के तौर पर लिया. एक शॉर्ट फ़िल्म बना कर मैंने उसे आबू-धाबी में होने वाली एक प्रतियोगिता में भेजा. उन्होंने मेरी फ़िल्म को प्रतियोगिता के लिए चुन लिया. मुझे वहां बुलाया गया. जब मैं वहां पहुंची तो उन्होंने मुझसे कहा कि मैं सऊदी अरब की पहली महिला फ़िल्मकार हूं. इस बात को सुनकर मुझे कितनी ख़ुशी हुई मैं आपको बता भी नहीं सकती. हालंकि हायफ़ा कहती हैं कि उन्हें इस बात का गर्व है कि वो सऊदी अरब की पहली महिला फ़िल्म निर्देशक हैं. लेकिन उन्होंने फ़िल्में बनाना सिर्फ़ इस टैग के लिए नहीं शुरु किया. वो फ़िल्मकार इसलिए बनी ताकि उनकी एक पहचान बने. अब तो बतौर फ़िल्मकार हायफ़ा अपनी पहचान बना चुकी हैं लेकिन फ़िल्मों के प्रति उनका ये जो लगाव है उसकी शुरुआत हुई कैसेइस सवाल का जवाब देते हुए हायफ़ा कहती हैं मैं सऊदी के छोटे से शहर से हूं. हम 12 भाई बहन हैं. हमारे घर में ख़ूब शोर रहता था. हमें शांत रखने के लिए मेरे पिता हमारे लिए फ़िल्में लाया करते थे. ये फ़िल्म या तो जैकी शीन की होती थी या फिर ब्रूस ली की. तो बस बचपन से ही मुझे फ़िल्मों से प्यार हो गया. हायफ़ा की फ़िल्म वाजिद एक ऐसी छोटी लड़की की कहानी है जो एक हरे रंग की साइकल ख़रीदना चाहती है. लेकिन लड़की होने के कारण उसे साइकल ख़रीदने के लिए न तो इजाज़त मिलती है और न ही पैसे. फ़िल्म में दिखाया गया है कि कैसे ये लड़की साइकल ख़रीदने के लिए पैसे जमा करती हैं. हायफ़ा कहती हैं कि अपनी इस फ़िल्म के ज़रिए वो ये दिखाना चाहती थी कि कैसे उनका देश नए और पुराने के बीच ताल-मेल बिठा रहा है. वो कहती हैं सऊदी अरब एक आधुनिक देश है यहां बड़ी इमारतों से लेकर आधुनिक तकनीक सब मौजूद है. लेकिन अभी भी लोगों की मानसिकता बहुत पारंपरिक है. ये मेरी फ़िल्म की कहानी के लिए एक बेहतरीन पृष्ठभूमि थी. साथ ही हायफ़ा ये भी साफ़ कर देना चाहती हैं कि वो अपनी इस फ़िल्म के ज़रिए सिर्फ ये नहीं बताने कि कोशिश कर रहीं कि सऊदी अरब पुरुष प्रधान है बल्कि वो ये दिखाने की कोशिश भी कर रहीं हैं कि कैसे ये लड़की मुश्किलों का सामना कर अपनी मंज़िल को पाने की कोशिश करती है. अरबी भाषा में वाजिद का मतलब होता है किसी चीज़ को पाने की चाह. सऊदी अरब में ये फ़िल्म सार्वजनिक तौर पर नहीं दिखाई जा सकती तो जहां तक हायफ़ा की चाहत का सवाल है तो वो बस यही चाहती हैं कि उनकी ये फ़िल्म सऊदी अरब के घर घर में देखी जाए. |
| DATE: 2013-07-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1411] TITLE: ख़ुद को देखना पसंद नहीं करते थे राजेश खन्ना ! |
| CONTENT: अपने प्रशंसकों के बीच काका नाम से मशहूर राजेश खन्ना की 18 जुलाई को पहली बरसी है. इस मौक़े पर उनके कुछ क़रीबी दोस्त और सहअभिनेता बीबीसी के साथ बांट रहे हैं उनसे जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें. मैं उनसे पहली बार मिली जब मैं बहुत छोटी थी. मेरे एक परिचित मुझे उनकी शूटिंग दिखाने ले गए. वो सेट पर एक कुर्सी पर तौलिया लपेटे बैठे थे. मैं उन्हें देखते ही रह गई. तब से लेकर आज तक मुझे उनसे अच्छा कोई और नहीं लगा. फिर मैं दोबारा उनसे महबूब स्टूडियो में मिली. तब मेरी उम्र कोई 13 साल रही होगी. उसके बाद मैं अगले आठ-दस महीने उनसे लगातार मिलती रही. वो मुझे देखकर काफ़ी ख़ुश हो जाते. मुझे समझ में ही नहीं आता कि इतना बड़ा सुपरस्टार मुझे क्यों इतना पसंद करता है. फिर मैं अपने गृहनगर जयपुर चली गई और हमारा संपर्क ख़त्म हो गया. फिर कई सालों बाद 1990-91 में मैं उनसे दोबारा एक पार्टी में मिली. वो मेरे पास आए और फिर धीरे-धीरे मिलने का सिलसिला शुरू हो गया. साल 2000 के बाद मैं उनके मुंबई स्थित घर आशीर्वाद भी आने लगी. काकाजी को अकेलेपन से बेहद डर लगता था. वो रात को तेज़ आवाज़ में टीवी चलाकर और घर की लाइटें ऑन करके सोते थे. मुझे ये बात बड़ी अजीब सी लगती. वो अपनी फ़िल्में नहीं देखते थे. टीवी पर उनकी जब कोई फ़िल्म आती तो मैं कहती कि काकाजी चलिए ये फ़िल्म देखें. तो वो कहते मुझे नहीं देखनी. तुम देखो. शायद अपने आपको देखना उन्हें पसंद ही नहीं था. उन्हें हर काम सलीक़े वाला पसंद था. कोई बात उनके मन की ना हो या कोई सामान अपनी जगह पर ना रखा हो तो वो बेहद ग़ुस्सा हो जाते थे. उनका स्टाफ़ उनसे थर-थर कांपता था. कई बार ग़ुस्से में वो खाने की प्लेट भी फेंक देते. लेकिन शाम होते ही वो बिलकुल बच्चे बन जाते. ज़िद करने लगते कि मुझे आइसक्रीम खानी है. मुझे छोले-भटूरे खिलाओ. वग़ैरह-वग़ैरह. काफ़ी रोमांटिक तबियत के थे. कई बार अपने गाने मेरे सपनों की रानी पर नाचने लगते. काफ़ी धार्मिक भी थे. घर में पूजा-पाठ भी करते थे. शराब ने उन्हें बहुत नुक़सान पहुंचाया. आख़िरी दिनों में बेहद कमज़ोर हो गए थे. बार-बार गिर पड़ते. जिससे उन्हें कई फ्रैक्चर हो गए थे. बेहद ग़मगीन रहने लगे थे. सोते नहीं थे. कहते थे कोई दूसरे ग्रह से आएगा और मुझे ले जाएगा. उन्हें मौत का डर सताने लगा था. बार-बार कहते मैं 70 साल से ज़्यादा नहीं जिऊंगा. वो उसके भी पहले चले गए. मैंने दो रास्ते कटी पतंग और आन मिलो सजना सहित काकाजी के साथ 10 से ज़्यादा फ़िल्में कीं. मैंने उनकी सुपरस्टारडम का जो दौर देखा है वैसी लोकप्रियता मुझे नहीं लगता कि किसी और को हासिल हुई होगी. एक बार उनकी शूटिंग देखने कॉलेज से कुछ लड़कियां आईं. जैसे ही काका जी सेट पर पहुंचे उन लड़कियों ने उन्हें घेर लिया और उनको लेकर छीना छपटी होने लगी. काका के कपड़े तक फट गए. सेट पर काका बेहद ख़ामोश रहते थे. साथी कलाकारों से भी बहुत कम बातें करते थे. कभी कभी मुझसे हाल-चाल पूछ लेते बाकी ज़्यादा बातें बिलकुल नहीं करते थे. स्पॉट ब्वॉय या सेट पर मौजूद असिस्टेंट्स की तरफ़ तो वो देखते तक नहीं थे. बाद में धीरे-धीरे हम लोगों के बीच में संपर्क ख़त्म होने लगा. कई साल पहले मैं उनसे एक बार एयरपोर्ट पर टकराया. उन्होंने मुझसे बड़े प्यार से हाल-चाल पूछे और फिर हम दोनों अपनी-अपनी राह हो लिए. वो मेरी उनसे आख़िरी मुलाक़ात थी. मैंने उनके साथ दो-तीन नहीं बल्कि 25-26 फ़िल्में कीं. हम लोग दोस्तों की तरह रहते. हंसी मज़ाक़ करते. मैं उनके घर खाना खाने जाता. उन्हें दाल बनाने का बड़ा शौक़ था. आम धारणा है कि वो बड़े घमंडी थे. लेकिन मुझे ऐसा कुछ नज़र नहीं आया. कई बार अपने सहयोगियों की मदद भी कर दिया करते. लेकिन किसी को पता नहीं चलने देते. अपने ज़माने में बेहद मशहूर थे. हमेशा लड़कियों का हुजूम उनके इर्द गिर्द रहता था. उनके साथ दिक्क़त ये हो गई कि वो नाकामयाबी से उबर नहीं पाए. बदलते वक़्त के साथ अपने आपको ढाल नहीं पाए. जैसा अमिताभ बच्चन ने बड़ी कामयाबी से किया वैसा काका नहीं कर पाए. अपने अंतिम दिनों में उन्होंने अपने आपको सबसे अलग कर लिया था. एक बार मैं उनसे पार्टी में मिला. मैंने पुराने साथी होने के नाते उन्हें गले लगाया. लेकिन उन्होंने बिलकुल ठंडी प्रतिक्रिया दी. मुझे ये देखकर बड़ा अफ़सोस हुआ. दुख इस बात का नहीं था कि उन्होंने मुझे उपेक्षित कर दिया. दुख इस बात का था कि वो अपने आपसे कितने दुखी थे. |
| DATE: 2013-07-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1412] TITLE: शाहरुख, सलमान की 'बहादुरी' की हक़ीकत |
| CONTENT: फिल्म रांझणा के जिस दृश्य में सोनम कपूर को पानी में गिरना था वो दृश्य सोनम कपूर की जगह स्टंटमैन विक्रम दाहिया ने किया. हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म रांझणा में एक दृश्य है जिसमें धनुष और सोनम कपूर स्कूटर सहित गंगा नदी में गिर जाते हैं. स्क्रीन पर तो पानी में गिरते हुए सोनम कपूर ही नज़र आती हैं. लेकिन असल में वो सोनम नहीं बल्कि एक पुरुष हैं. जिन्होंने दरअसल इस जोखिम भरे दृश्य को अंजाम दिया है. उसी तरह से रा. वन में शाहरुख खान के कई स्टंट हों या अग्निपथ में ऋतिक रोशन के बॉलीवुड में ये आम बात है जब किसी मुश्किल या जोखिम भरे दृश्य को अंजाम देना होता है तो निर्माता किसी बड़े बॉलीवुड स्टार की जान जोखिम में बिलकुल नहीं डालना चाहते. कई अभिनेत्रियों के लिए भी स्टंटमैन ख़तरनाक दृश्यों को अंजाम देते हैं. इसके लिए स्टंटमैन का इस्तेमाल किया जाता है. जो हीरो या हीरोइन की जगह उस सीन को करते हैं. हां लेकिन परदे पर तालियां स्टार को ही मिलती हैं. आइए मिलाते हैं ऐसे ही बॉलीवुड के ऐसे ही कुछ असल एक्शन हीरोज़ से. मैं इस प्रोफेशन में छह सालों से हूं. मुझसे पहले मेरे पिताजी भी इसी प्रोफेशन से जुड़े थे. उन्होंने अमिताभ बच्चन की डॉन से लेकर आखिरी रास्ता तक धर्मेंद्र की लोहा सहित कई फिल्मों में स्टंट किया. विक्रम के पिता राजेंद्र दाहिया ने भी अमिताभ बच्चन सहित कई अभिनेताओं के लिए स्टंट किया है. निर्माता नहीं चाहते कि जिस स्टार पर करोड़ों रुपए लगा हो उसकी जान ख़तरे में डाली जाय. इसलिए ख़तरनाक दृश्यों के लिए हमारा इस्तेमाल किया जाता है. मैंने अजय देवगन वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई रणबीर कपूर की अजब प्रेम की ग़जब कहानी और ये जवानी है दीवानी और ऋतिक रोशन की अग्निपथ जैसी फिल्मों के लिए स्टंट किया है. स्टंट करते वक़्त इस बात का ध्यान रखा जाता है कि स्टंटमैन की कद काठी वज़न वगैरह हीरो से मिलना चाहिए. तभी आपको काम मिलता है. हमारे लिए बीमा जैसी कोई व्यवस्था नहीं होती. क्योंकि ख़तरनाक सीन करना ही हमारा काम है. इसमें चोट लगना तो बेहद आम बात है. कभी कोई बड़ी दुर्घटना हो गई तो हमारे परिवार को निर्माता मुआवज़ा दे देता है. बस इससे ज़्यादा कुछ नहीं. आने वाली फिल्म सत्याग्रह में मेरा एक सीन है जहां स्टेज पर अमिताभ बच्चन करीना कपूर और अजय देवगन खड़े होते हैं और मैं अपने पूरे शरीर में आग लगाता हूं. अलग-अलग कैमरे एंगल से शूट करने के लिए मुझे अपने शरीर में 6-7 बार आग लगानी पड़ी. सीन ख़त्म होने के बाद ख़ुद अमिताभ बच्चन मेरे पास आए और बोले बेटा तुमने बहुत अच्छा काम किया. मुझे लगा कि जैसे मेरा जीवन ही सफल हो गया हो. सनोबर ऐश्वर्या राय कटरीना कैफ से लेकर अनुष्का तक के लिए स्टंट कर चुकी हैं. पहले तो मैं एक बात साफ करना चाहूंगी कि मैं स्टंटगर्ल हूं बॉडीडबल नहीं. बॉलीवुड में कई लड़कियां बॉडीडबल का काम भी करती हैं जैसे फिल्म में कोई अंतरंग दृश्य हो या कोई अंगप्रदर्शन वाला सीन तो मुख्य हीरोइन ना करके उसे उसकी बॉडीडबल करती है. लेकिन मैं सिर्फ स्टंट करती हूं. मैं 14 सालों से स्टंट कर रही हूं. जब मैं 12 साल की थी तो पहली बार ऐश्वर्या राय के लिए स्टंट किया था. मुझे 20 फीट की ऊंचाई से छलांग लगानी थी. मैं जिमनास्ट होने के साथ साथ मार्शल आर्ट भी जानती हूं और तैराकी में भी निपुण हूं. मैंने रब ने बना दी जोड़ी और जब तक है जान में अनुष्का के लिए बाइक चलाई है. फिल्म द डर्टी पिक्चर में विद्या बालन के लिए भी सनोबर ने पानी वाले कुछ दृश्य किए. वीर ज़ारा में पहाड़ों में फंसी प्रीति ज़िंटा को जब शाहरुख ख़ान हेलीकॉप्टर से बचाते हैं वो सीन मैंने किया है. मैंने द डर्टी पिक्चर के लिए भी पानी के अंदर वाले कुछ दृश्य विद्या बालन के लिए किए. मैं चाहती हूं कि अभिनेत्री बनूं लेकिन अब तक मेरे पास कोई प्रस्ताव नहीं आया. कोशिश जारी है. आनेवाली फिल्म रामलीला में दीपिका पादुकोण के लिए स्टंट कर रही हूं. एक स्टंट में सलमान ख़ान की मदद कराते स्टंटमैन हबीब हाजी. मेरे पिता हाजी सैयद भी एक स्टंटमैन थे. 1991 में फिल्म हमला के एक दृश्य में वो अनिल कपूर के लिए बॉडी डबल थे. वो सीन करते हुए उनकी मौत हो गई थी. मेरे पिता इससे पहले द बर्निंग ट्रेन में स्टंट करते हुए जल भी गए थे. मैंने जॉन अब्राहम की फिल्म धूम के लिए बाइक पर ढेर सारे स्टंट किए. तब से मैं जॉन का फेवरिट बन गया. इस साल रिलीज़ हुई फिल्म रेस-2 के लिए भी मैंने ही स्टंट किए. शाहरुख ख़ान की बहुचर्चित फिल्म रा. वन के लिए भी मैंने कई सीन किए. इसमें मैंने शाहरुख के अलावा करीना के लिए भी एक कार वाला स्टंट विग और साड़ी पहनकर किया. परिणीति चोपड़ा के लिए भी लेडीज़ वर्सेस रिकी बहल में मैंने एक सीन किया था. मेरे पिताजी की मौत के बाद मेरी मां और अब मेरी बीवी बहुत चिंता करते हैं. हमें ये काम शुरू करने से पहले दो साल ट्रेनिंग लेनी पड़ती है. हमारी मुंबई में एक यूनियन भी है जो कोई दुर्घटना होने पर स्टंटमैन के परिवार को सहायता प्रदान करती है. हाल ही में हमारी यूनियन का एक सदस्य शाहरुख ख़ान की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस का स्टंट करते हुए जख़्मी हो गया था तब शाहरुख ने उसे आर्थिक मदद दी थी. जैसे-जैसे वक़्त आगे बढ़ रहा है हमारी हिफ़ाज़त के इंतज़ाम बेहतर होते जा रहे हैं. पहले किसी ऊंची बिल्डिंग से छलांग लगाते वक़्त केबल वायर नहीं होते थे जो अब होने लगे हैं. पहले कूदने वाले दृश्यों में नेट होता था. अब काफी गद्दे और बॉक्सेस होते हैं. हालांकि दुर्घटनाएं अब भी हो जाती हैं लेकिन पहले की तुलना में काफी कम होती हैं. मेरा एक 15 साल का बेटा है मैं नहीं चाहूंगा कि वो कभी भी स्टंटमैन बने. |
| DATE: 2013-07-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1413] TITLE: बॉलीवुड और सच्चे किरदारों का कनेक्शन |
| CONTENT: भाग मिल्खा भाग एक जीवित व्यक्ति पर बनी उन चुनिंदा बायोपिक में से एक हैं जिसके कुछ फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी हैं. भाग मिल्खा भाग में अच्छी बात ये है कि निर्देशक तथ्यों की ग़लती करने से बचे रहे क्योंकि ख़ुद मिल्खा सिंह सही जानकारियां देते रहे. नुक़सान ये रहा कि फ़िल्म में मुख्य पात्र के किसी भी नकारात्मक पहलू को नहीं दिखाया गया जिसके कारण फिल्म एक संत की कथा बनकर रह गई. निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा की इस फ़िल्म में हद से ज़्यादा मेलोड्रामा है लेकिन शायद निर्देशक अपनी फिल्म के ज़रिए भारतीय खेल के एक महान हीरो को सम्मानित करना चाहते थे भले ही पचास साल बाद सही. इन दिनों बॉलीवुड की नज़र ख़ास शख्सियतों पर बनने वाली फ़िल्मों यानी बायोपिक पर है - कहानियां जिसमें सच का तड़का लगा होता है. इसी की देन है पान सिंह तोमर जो एक सच्ची कहानी थी. वहीं द डर्टी पिक्चर भी आई जिसे कथित तौर पर सिल्क स्मिता के जीवन पर आधारित बताया जा रहा था लेकिन सिल्क के भाई ने जब मुआवज़े और माफ़ी की मांग की तो फिल्म को काल्पनिक कहा जाने लगा. बायोपिक बनाते समय एक फ़िल्मकार को कई सीमाओं का ध्यान रखना पड़ता है. कहानी या चरित्र का रोचक या प्रेरणात्मक होना तो सबसे ज़रुरी है. ज़्यादातर विषय खिलाड़ी फिल्म स्टार राजनेता या फूलन देवी जैसे चरित्रों पर केंद्रित होते हैं. श्याम बेनेगल की फिल्म मंथन को दूध क्रांति के जनक वरगिस कुरियन के जीवन पर आधारित बताया जाता है. वहीं चक दे इंडिया को भारतीय हॉकी के कोच मीर रंजन नेगी और गुरु को धीरुभाई अंबानी के जीवन के करीब बताया जाता है. हालांकि ज़्यादातर फिल्मकार विवादों से बचने के लिए अपनी फ़िल्म को काल्पनिक ही बताते हैं. मणिरत्नम की फिल्म नायकन रामगोपाल वर्मा की सरकार और कई ऐसी फ़िल्में हाजी मस्तान दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन पर बनी है. हालांकि नाचे मयूरी एक ऐसी फिल्म थी जिसमें असल पात्र सुधा चंद्रन ने ही फिल्म में अपना चरित्र निभाया था. जहां तक राजनेताओं पर फ़िल्म बनाने की बात है तो भारत में एक ईमानदार बायोपिक बनाना लगभग असंभव सा है. इंदिरा गांधी राजीव गांधी और सोनिया गांधी पर फ़िल्मों ने लगातार अड़चनों का सामना किया है वहीं पश्चिम में मारग्रेट थैचर के जीवित रहते हुए ही द आयरन लेडी जैसी फ़िल्म बनाई गई जो पूरी तरह चापलूसी से भरा फ़िल्मांकन नहीं था. मारग्रेट के परिवार से किसी ने भी फ़िल्म पर पाबंदी की बात नहीं की थी. हालांकि उन्होंने मीडिया के ज़रिए फ़िल्म को लेकर अपनी नापसंदगी ज़ाहिर की थी. भारत में जब निर्देशक जब्बार पटेल ने बाबा साहेब अंबेडकर श्याम बेनेगल ने नेताजी बोस और केतन मेहता ने सरदार पटेल जैसी फिल्में बनाईं तो उससे पहले इन सभी शख़्सियतों के अनुयायियों को संतुष्ट किया गया ताकि फ़िल्म पर प्रतिबंध लगने से बचा जा सके. हॉलीवुड में लिंकन जैसी फ़िल्म बिना किसी विरोध के बन जाती है वहीं जेफ़रसन इन पेरिस भी शांति से रिलीज़ हुई जिसमें एक पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति के एक काली नौकरानी के साथ संबंध बताए गए थे. वहीं भारत में मंगल पांडे जैसी फ़िल्में बनती हैं जिनके बारे में लोग कम ही जानते हैं या फिर ज़रूरत से ज़्यादा प्रसिद्ध नाम जैसे रानी लक्ष्मीबाई और बाजीराव मस्तानी जैसे किरदारों को पर्दे पर उतारा जाता है जिनके बारे में बचपन से पढ़ा और लिखा जाता रहा है. मौजूदा दौर में मुक्केबाज़ मैरी कॉम पर एक फ़िल्म बन रही है जो पूर्वोत्तर भारत की इस महिला बॉक्सर के संघर्षों की कहानी बयां करेगी. हालांकि फ़िल्मकारों ने जब भी किसी फ़िल्मी हस्ती को बतौर विषय उठाया है तो उनके परिजनों की कई आपत्तियों और सवालों का सामना करना पड़ा है. जाहिर सी बात है ऐसे में फ़िल्म से ईमानदारी की अपेक्षा कम ही हो जाती है. वहीं पश्चिम में फेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग पर फ़िल्म बनाई गई जिसमें उनके कुछ नकारात्मक पक्ष भी दिखाए गए थे वहीं पूर्व अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन पर भी एक फ़िल्म की योजना बनाई जा रही है जिसमें ख़ुद हिलेरी भी काफ़ी दिलचस्पी ले रही है. फिर भी ये कहना ग़लत नहीं होगा कि बॉलीवुड में भी बदलाव की हवाएं चल रही हैं और फ़िल्मकार कुछ नई अनोखी और सच्ची कहानियां ढूंढ रहे हैं. शायद वक़्त के साथ कड़वे सच को दिखाने का तरीक़ा भी धीरे धीरे परिपक्व हो जाएगा और ये सोच भी बदलेगी कि भारतीय हीरो कोई संत नहीं है और ना ही उन्हें ऐसा होने की ज़रूरत है. |
| DATE: 2013-07-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1414] TITLE: फ़रहान नहीं थे पहली पसंद: राकेश ओमप्रकाश मेहरा |
| CONTENT: भाग मिल्खा भाग के पोस्टर की तरफ इशारा करते मिल्खा सिंह. मशहूर भारतीय धावक मिल्खा सिंह के जीवन पर आधारित फ़िल्म भाग मिल्खा भाग बीते शुक्रवार को रिलीज़ हुई. रिलीज़ के बाद फ़िल्म के निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने बीबीसी की दीप्ति कार्की से विभिन्न मुद्दों पर बात की. पेश है इस बातचीत के मुख्य अंश. फ़रहान अख़्तर मिल्खा सिंह की केंद्रीय भूमिका के लिए पहली पसंद नहीं थे. मैंने ढेर सारे लोगों के स्क्रीन टेस्ट लिए. भारत ही नहीं पाकिस्तान यूके कनाडा सहित कई जगहों पर मैंने स्क्रीन टेस्ट लिए. लेकिन कोई भी नहीं जमा. फिर अचानक फ़रहान अख़्तर का ख़्याल आया. और उसके आगे मैंने सोचना ही बंद कर दिया. फ़रहान को मैंने 20 मिनट कहानी सुनाई. उन्होंने मुझसे कहा ये विषय तुम्हारे दिल के बेहद क़रीब है. मैं ये फ़िल्म ज़रूर करूंगा. फ़िल्म को कई लोगों की तारीफें मिल रही हैं. कुछ लोग इसे काफी लंबी भी बता रहे हैं. मैं तारीफ़ और आलोचना दोनों को ही ज़्यादा गंभीरता से नहीं लेता. मिल्खा सिंह की कहानी मुझे बड़ी प्रेरणादायक लगी. उन्होंने विभाजन के दर्द को सहा. उनके सामने उनके पूरे परिवार को क़त्ल कर दिया गया. उसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी. मुश्किलों से लड़ना सीखा और चैंपियन बनकर उभरे. उन्होंने हमें सिखाया मुश्किलों से भागो नहीं. उनके साथ भागो और उन्हें पस्त कर दो. फ़िल्म की रिलीज़ के बाद अमिताभ बच्चन का मेरे पास संदेश आया. जिसमें लिखा था फ़िल्म देखने के बाद मैं बहुत भावुक हो गया. मेरे पास अपनी भावनाएं बयां करने के लिए शब्द नहीं है. जब मेरे पास कुछ बोलने को होगा तब मैं बात करूंगा. ऐसी ही फ़िल्में बनाते रहो. उनका ये संदेश मेरे दिल को छू गया. वैसे भी मिस्टर बच्चन को मैं बहुत मानता हूं. उन्होंने मेरे साथ मेरी पहली फ़िल्म अक्स में काम किया था. बच्चन ने मेरी पीठ पर हाथ रखा तब जाकर मेरे जैसे फ़िल्मकार का जन्म हुआ. मैं उनके साथ रोज़ाना काम करने की सोचता हूं लेकिन अब तक कोई उचित स्क्रिप्ट मेरे हाथ नहीं लगी. जिस दिन ऐसा होगा मैं उनके साथ फ़िल्म ज़रूर बनाऊंगा. मेरे पास दो स्क्रिप्ट तैयार हैं. मिर्ज़ा साहिबा जिसे गुलज़ार भाई ने लिखा है और राजा जो ख़ुद मैंने लिखी है. मिर्ज़ा साहिबा एक रोमांटिक फ़िल्म होगी. जबकि राजा एक पीरियड फ़िल्म होगी जो 1920 के वक़्त की है. ये ज़बरदस्त एक्शन फ़िल्म होगी. |
| DATE: 2013-07-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1415] TITLE: प्रियंका चोपड़ा के 'एक्जॉटिक' ठुमके |
| CONTENT: अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने मशहूर अंतरराष्ट्रीय रैपर पिटबुल के साथ जमकर देसी ठुमके लगाए हैं. प्रियंका ने अपने अंतरराष्ट्रीय सिंगल एक्जॉटिक के लिए ये किया है. इस गाने के वीडियो में प्रियंका ने बिकीनी पहनी है. इसके पीछे प्रियंका का एक ख़ास मकसद है. क्या है प्रियंका का वो मकसद. मुंबई में इस सिंगल के लॉन्च के मौके पर बीबीसी से ख़ास बात करते हुए उन्होंने कहा ये बहुत ही मस्ती भरा गाना है. भारतीय संगीत के बारे में दूसरे देशों में ये धारणा है कि इसमें सिर्फ तबला और सितार जैसे यंत्र ही होते हैं. मैं इस मिथक को तोड़ना चाहती थी. मैं बताना चाहती थी कि हम भारतीय भी जमकर मस्ती कर सकते हैं. इससे पहले प्रियंका का पहला अंतररराष्ट्रीय सिंगल इन माय सिटी रिलीज़ हो चुका है. प्रियंका बताती हैं कि वो अमरीका में पली बढ़ी हैं इसलिए मुझे पता है कि पश्चिमी सभ्यता और भारतीय सभ्यता को रचनात्मक तरीके से कैसे मिलाया जा सकता है और उससे कैसे अच्छे परिणाम हासिल किए जा सकते हैं. अभिनय से गायन की ओर मुड़ने के अपने फैसले के बारे में प्रियंका ने कहा मुझे शुरुआत से ही जोखिम लेना पसंद है. मैं परिणाम की ज़्यादा परवाह नहीं करती. मुझे अजीबोग़रीब चीज़ें करना बहुत पसंद है. मेरी कई फिल्में नहीं भी चलीं लेकिन मैं चिंता नहीं करती. प्रियंका बताती हैं कि जब वो 17 साल की थीं तब इंडस्ट्री में आईं और कई बातें उन्होंने ग़लतियां करके सीखीं. प्रियंका अपनी आने वाली फिल्म गुंडे मैं एक कैबरे कर रही हैं. इसे लेकर भी वो ख़ासी उत्साहित हैं. इसके अलावा इसी साल सितंबर में उनकी फिल्म ज़ंजीर रिलीज़ हो रही है. जो साल 1973 में आई अमिताभ बच्चन-जया भादुरी की ज़ंजीर का रीमेक है. इसके अलावा नवंबर में वो ऋतिक रोशन के साथ फिल्म क्रिश-3 में नज़र आएंगीं. प्रियंका अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त और ओलंपिक कांस्य पदक विजेता भारतीय मुक्केबाज़ मेरी कॉम के जीवन पर आधारित फिल्म में भी काम कर रही हैं जो अगले साल रिलीज़ होगी. |
| DATE: 2013-07-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1416] TITLE: प्राण: वो सुपरविलेन जिसकी फ़ीस हीरो से भी ज़्यादा थी |
| CONTENT: मेरे प्रिय दोस्त प्राण को मुझसे फ़ोन पर बात करना पसंद था. हम जब मिलते थे तो पंजाबी चुटकुलों पर ख़ूब हँसा करते थे. मैं कभी नहीं भूल सकता कि प्राण कैसे ख़राब मौसम के बावजूद शादी में शिरकत करने के लिए श्रीनगर से बंबई पहुँचे थे. उन्होंने श्रीनगर से दिल्ली और फिर बंबई की फ्लाइट ली ताकि मेरे निकाह से पहले मुझे गले लगा सकें. अपने दोस्त और सह अभिनेता प्राण के लिए ये शब्द दिलीप कुमार ने उनकी मौत के बाद ट्विटर पर लिखे हैं. ये वही प्राण हैं जिनकी फ़िल्मी पर्दे पर दिलीप कुमार ने कई बार पिटाई की होगी. लेकिन दिलीप कुमार के ये स्नेह भरे शब्द दर्शाते हैं कि क्यों प्राण साहब फ़िल्मी दुनिया के इतने दुलारे थे. प्राण साहब ने 40 के दशक के अशोक कुमार से लेकर 90 के दशक के सलमान ख़ान तक की ज़िंदगी फ़िल्मी पर्दे पर दुश्वार की है यानी इन हीरो के साथ विलेन का रोल किया है. कहने को तो प्राण हिंदी फ़िल्मों के खलनायक थे पर कहते हैं कि कई फ़िल्मों में प्राण साहब की फ़ीस हीरो जितनी और कई बार हीरो से भी ज़्यादा होती थी. फ़िल्में जितनी हीरो के नाम पर बिकती थीं उतनी ही प्राण के नाम पर वितरकों में बिक जाया करती थी. प्राण फ़िल्मों में आने को इत्तेफाक़ कहते थे. हुआ दरअसल यूँ कि वो लाहौर के अनारकली बाज़ार में पान खाते हुए पानवाले से बड़े ही मज़ेदार लहजे में बात कर रहे थे जो वहाँ बैठे फ़िल्म यूनिट के सदस्य को भा गया. बस वहीं से फ़िल्मी सफ़र शुरू हुआ जो भारत में जारी रहा और ज़बरदस्त हिट रहा. वैसे कहने को तो प्राण मुख्यतः खलनायक का रोल निभाते थे लेकिन उनकी शख्सियत ड्रेसिंग स्टाइल संवाद अदायगी सिगरेट पकड़ने का जुदा अंदाज़ ऐसा था कि वो बड़े-बड़े हीरो को टक्कर दे देते थे- फिर वो देवानंद हो राजकपूर या फिर दिलीप कुमार. अपने समय की इस मशहूर त्रिमूर्ति के साथ प्राण ने मधुमति राम और श्याम जैसी कई हिट फ़िल्में कीं. ये तीनों भले ही अपने ज़माने के सुपर सितारे थे लेकिन प्राण साहब को ये सब बहुत मानते थे. बतौर चरित्र अभिनेता मशहूर होने के बहुत साल पहले ही राज कपूर ने उन्हें अपनी फ़िल्म आह में पैरेलल लीड रोल दिया था. एक पुराना क़िस्सा याद करते हुए वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे ने बताया एक दिन अचानक प्राण साहब ने मुझे बुलाया और पूछा कि क्या तुम राज कपूर के तीनों बेटों- ऋषि रणधीर और राजीव को मेरे घर लेकर आ सकते हो क्योंकि मैं उनके साथ एक शाम बिताना चाहता हूँ. मैने ऐसा ही किया. बाद में प्राणजी ने मुझे बताया कि दरअसल फ़िल्म बॉबी की शूटिंग के दौरान उनका राज कपूर से कुछ झगड़ा हो गया था जिसके लिए उन्हें मलाल था. उसी की भरपाई के लिए प्राणजी ने राज कपूर के बच्चों को बुलाया और उनके साथ समय बिताया. ये भी उनकी शख्सियत का एक पहलू था. खलनायकी और चरित्र भूमिकाओं के साथ-साथ प्राण ने कॉमेडी में भी हाथ आज़माया. विक्टोरिया नंबर 203 जैसी फिल्में इसकी मिसाल हैं. इसमें प्राण और अशोक कुमार ने बेहतरीन जुगलबंदी करते हुए लोगों को ख़ूब हँसाया था. प्राण फ़िल्मों के बाहर ऊर्दू शायरी खाने-पीने और खेल के शौक़ीन थे. कपिल देव को उनकी मदद का क़िस्सा भी शायद कम लोग जानते हैं. जयप्रकाश चौकसे ने प्राण के एक और अनछूए पहलू के बारे में बताया. वे बताते हैं प्राण साहब खेलों के बेहद शौक़ीन थे. एक बार उन्हें पता चला कि भारतीय क्रिकेटर कपिल देव को चोट लगी है और इलाज के लिए उन्हें विदेश जाना पड़ेगा. तब कपिल नए नए थे. क्रिकेट बोर्ड का रुतबा अब जैसा नहीं था. तब प्राण साहब आगे आए और कहा कि अगर बोर्ड के पास पैसे नहीं है तो वे कपिल देव का इलाज कराएँगे. फ़िल्म इंडस्ट्री के जूनियर कलाकारों की मदद करने के लिए भी वे जाने जाते हैं. अदाकारी को काम न समझकर उसे कहीं आगे तक ले जाना उनकी ख़ासियत मानी जाती थी. कहते हैं कि वो कभी किसी सेट पर देर से नहीं पहुँचे- हमेशा शूटिंग शुरू होने से आधा घंटा पहले तैयार होकर बैठे रहते थे. शायद यही बातें थीं जो उन्हें सबसे से जुदा बनाती थी. क़रीब तीन-चार साल पहले लंदन की एक शाम थी जब उनके बेटे से बात हुई और तय हुआ कि प्राण साहब से फ़ोन पर इंटरव्यू किया जाएगा. मैं इसे लेकर काफ़ी उत्साहित थी. काफ़ी तैयारी की- कई सारे सवाल लिखकर रखे आख़िर प्राण जी का इंटरव्यू करना था. लेकिन ऐन मौक़े पर मुझे अचानक भारत आना पड़ा और इंटरव्यू नहीं हो पाया जिसका अफ़सोस मुझे आज तक है. प्राण साहब के लिए तैयार किए गए सवाल आज भी संभाल कर रखें हैं. सवालों के नीचे जवाब की जगह अब हमेशा ख़ाली ही रहेगी. |
| DATE: 2013-07-14 |
| LABEL: entertainment |
| [1417] TITLE: खलनायकों, चरित्र अभिनेताओं का शहंशाह: प्राण |
| CONTENT: इस साल प्राण को लाइफ़टाइम अचीवमेंट के लिए दादासाहेब फाल्के पुरस्कार दिया गया. लेकिन वह सम्मान बहुत देर से मिला. इस समय एक पूरी पीढ़ी ऐसी है जिसने प्राण को बड़े परदे पर नहीं देखा था. प्राण ने अपना फ़िल्मी जीवन चालीसवें दशक में शुरू किया था. वह उस समय के बहुत कम अभिनेताओं में से हैं जिन्हें सिनेमा प्रेमी अब तक याद करते हैं. इसकी वजह बाद के सालों में उनके द्वारा निभाई गई वह यादगार भूमिकाएं हैं. चरित्र अभिनेता के रूप में वह भूमिकाएं जो उन्होंने खलनायक बनना बंद करने के बाद कीं. इसमें सह अभिनेता की कुछ कभी न भुलाई जा करने वाली भूमिकाएं भी थीं जिनमें ज़ंजीर के लाल बालों बड़े दिल वाले पठान- शेर ख़ान का किरदार भी है. उस वक्त सह अभिनेताओं को भी उनकी ख़ास भाव-भंगिमाओं और आवाज़ की वजह से पहचाना जाता था. प्राण की आवाज़ और भेदने वाली आंखें उनकी पहचान थीं. अपनी हर भूमिका के लिए वह अपने कपड़ों भाव भंगिमाओं और तकिया-कलाम पर ख़ास ध्यान देते थे. स्टार्स ने अपने लुक पर ध्यान देना उनके बहुत बाद में शुरू किया. प्राण जैसे अभिनेताओं ने सहायक भूमिकाओं के क्षेत्र में अपनी ख़ास जगह बनाई जहां से वह मुख्य कलाकार की भूमिका को बनने-जमने में मदद करते थे. आज के मुख्य अभिनेताओं को सहायक कलाकारों की ज़रूरत नहीं होती. और अगर उसे लड़ने के लिए कोई गुमनाम पहलवान मिल जाता है तो बस वही काफ़ी है. लेकिन अपने वक्त में प्राण उन मुख्य अभिनेताओं के मुकाबले जो क्लाइमैक्स में उन्हें पीटा करते थे अक्सर ज़्यादा करिश्माई लगते थे. प्राण खलनायकों के शहंशाह थे और अपने आप में एक बडे स्टार भी. फिर उन्होंने अपनी विरासत प्रेम चोपड़ा अमरीश पुरी रंजीत गुलशन ग्रोवर जैसे खलनायकों को सौंप दी. ऐसे खलनायक जिन्हें पहलवानों सा शरीर बनाने और कमीज़ें फाड़ने की ज़रूरत नहीं थी- बस एक क्रूर दृष्टि भौंहों के उठने या ख़ास तरह के दिखने से ही इनका काम हो जाता. धीमी आवाज़ में चबा कर बोला गया बर्खुरदार जैसा शब्द सुनते ही दिमाग में प्राण की तस्वीर बन जाती है. यह बात तो सभी जानते हैं कि प्राण ने अपने खलनायकों वाले किरदारों में ऐसी जान डाली कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना बंद कर दिया. वर्ष 1999 तक के अपने लंबे फ़िल्मी जीवन में प्राण ने सैकड़ों फ़िल्मों में काम किया. लेकिन उनकी ख़ुशकिस्मती यह थी कि उन्होंने कई पीढ़ी के मुख्य नायक नायिकाओं के साथ कई यादगार भूमिकाएं कीं. अब कोई भी उग्र नारायण राका मलंग चाचा राणा माइकल डिसूज़ा मोती जेजे और बेशक शेरखान जैसी भूमिकाएं नहीं लिखता. और अगर आप इन नामों से जुड़ी फ़िल्मों को नहीं जानते हैं तो आपकी बॉलीवुड की जानकारी अधूरी है. |
| DATE: 2013-07-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1418] TITLE: प्राण ने 'शेर खान' बनने से कर दिया था मना |
| CONTENT: अभिनेता प्राण ने यूँ तो कई किरदार निभाए लेकिन फ़िल्म ज़ंजीर में शेर ख़ान के किरदार ने उन्हें अलग ही पहचान दी. इस फ़िल्म का एक गाना यारी है ईमान मेरा आज भी लोगों के लबों पर है. अब जब वे नहीं हैं तो उनके लिए दिए जा रहे श्रद्धांजलि संदेशों में भी शेर ख़ान को बार-बार याद किया जा रहा है. लेकिन ज़ंजीर के लिए प्राण को मनाने में निर्देशक प्रकाश मेहरा को खासी मेहनत करनी पड़ी थी और शूटिंग शुरू होने से ऐन पहले प्राण ने फ़िल्म में काम करने से मना भी कर दिया था. लेकिन प्रकाश मेहरा ने एक बार फिर उन्हें मना लिया था. फ़िल्म ज़ंजीर की रीमेक बना रहे प्रकाश मेहरा के बेटे अमित मेहरा ने प्राण के बारे में यह बातें बीबीसी से बातचीत में बताईं. अमित मेहरा ने ज़ंजीर की रीमेक पर चर्चा करने के लिए प्राण से मुलाकात की थी. उस मुलाकात को याद करते हुए अमित ने बताया मैंने उन्हें ज़ंजीर को दोबारा बनाने की योजना के बारे में बताया और उनसे कहा कि संजय दत्त शेर ख़ान की भूमिका करेंगे. वे यह सुनकर बहुत खुश थे और उन्होंने कहा था कि इस रोल को संजय दत्त से बेहतर और कोई कर भी नहीं पाएगा. इस मुलाकात में ही प्राण ने अमित को याद दिलाया कि जिस साल ज़ंजीर बन रही थी उस साल ही अमित पैदा हुआ थे. उन्होंने ज़ंजीर के बारे में यादें साझा करते हुए कहा कि प्रकाश मेहरा ने उनसे कहा था कि ज़ंजीर में शेर ख़ान का रोल उनके लिए ही बना है और अगर वे फ़िल्म में काम नहीं करेंगे तो ज़ंजीर बनेगी ही नहीं. अमित से इस मुलाकात में प्राण ने बताया प्रकाश मेहरा के यह बात कहने के बाद ही मैंने ज़ंजीर फिल्म के लिए हाँ की थी. और आज मैं जहाँ भी जाता हूं लोग यारी है ईमान मेरा गाना गाते हैं. अमित ने बीबीसी को बताया प्राण जी ने मुझे बताया कि किस तरह उन्हें ज़ंजीर फ़िल्म करने के लिए मनाया गया. फ़िल्म का मुहुर्त शॉट ही यारी है ईमान मेरा गाने से था. यह जानकर प्राण ने मेरे पिता से कहा कि पहले तो आपने मुझे इस रोल के लिए मनाया और अब आप मुझसे डांस भी करवाएंगे तो मैं अब यह फ़िल्म नहीं करूँगा. आख़िरकार प्राण इस शर्त पर माने कि यदि गाना उन्हें अच्छा नहीं लगा तो इसे फ़िल्म से हटा दिया जाएगा. प्राण की मौत से दुखी अमित ने कहामैं चाहता था कि उन्हें ज़ंजीर की रीमेक दिखाऊं लेकिन यह हो नहीं सका. मुझे नहीं लगता कि इंडस्ट्री में उनसे बेहतर अदाकार कोई होगा. प्राण से मुलाकात को याद करते हुए अमित ने कहा जब मैं उनसे मिला तब वे काफी बीमार थे लेकिन फिर भी वे बहुत खुश होकर मिले और आशीर्वाद भी दिया. ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वे बीमार हैं वे बहुत ही खुशमिजाज थे. उनका जाना हम सब के लिए एक बड़ा झटका है. |
| DATE: 2013-07-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1419] TITLE: फ़िल्म रिव्यू: भाग मिल्खा भाग |
| CONTENT: धावक मिल्खा सिंह के जीवन को पर्दे पर जीवंत किया गया है हिंदी फ़िल्म भाग मिल्खा भाग में. मिल्खा सिंह फ़रहान अख़्तर का बचपन दर्द और वेदना से भरा रहा. साल 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान मिल्खा सिंह के माता-पिता की हत्या हो जाती है. मिल्खा अपनी शादी-शुदा बहन दिव्या दत्ता के साथ रहने लगते हैं. लेकिन छोटे से मिल्खा से ये नहीं देखा जाता कि कैसे उसकी बहन का पति उसे प्रताड़ित करता है. एक दिन ऐसा आता है जब मिल्खा को उसका जीजा घर से बाहर निकाल देता है. मिल्खा बड़े होने के बाद भारतीय सेना में भर्ती हो जाते है. जल्द ही वो फ़ौज में एक धावक के रूप में मशहूर भी हो जाते है. फ़िल्म में दिखाया गया है कि कैसे अपने लक्ष्य को पाने के लिए मिल्खा रात दिन एक कर देता है. फ़िल्म की कहानी मिल्खा के भूत और वर्तमान के बीच झूलती रहती है. भाग मिल्खा भाग मिल्खा सिंह के फ्लाइंग सिख बनने तक की कहानी है. कहानी में मिल्खा सिंह अगर एक ओर छोटे से बच्चे हैं तो वहीं दूसरी ओर वो इश्क फरमाते हुए एक नौजवान हैं. तो वहीं वो नए कीर्तिमान बनाते हुए फ्लाइंग सिख भी हैं. फ़िल्म की कहानी के लिए लेखक प्रसून जोशी ने बहुत अच्छा शोध किया है. फ़िल्म तीन घंटे में मिल्खा सिंह के पूरे जीवन को बख़ूबी बड़े पर्दे पर उकेरती है. फ़िल्म की कहानी लिखने के साथ-साथ पटकथा भी प्रसून ने ही लिखी है. फ़िल्म में दर्द ड्रामा हास्य ख़ुशी गम हार जीत और प्यार सभी तरह के भाव हैं. लेकिन फ़िल्म में कई बार दर्शकों को ये महसूस हो सकता है कि मिल्खा का दर्द ज़रूरत से ज़्यादा दिखाया जा रहा है. फ़िल्म में दिव्या दत्ता और छोटे मिल्खा के बीच कुछ भावनात्मक दृश्य हैं. निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा चाहते तो इस ड्रामा को थोड़ा कम कर सकते थे. एक समय के बाद फ़िल्म की कहानी खिचती हुई सी लगती है. लेकिन फिर भी मुझे पूरा यकीन है कि एक खास तरह के दर्शकों को ये फ़िल्म बहुत पसंद आएगी. फ़िल्म में कई अच्छी बातें हैं. भले ही मिल्खा के बचपन के दृश्य हों या फिर आर्मी सेंटर के दृश्य इन दृश्यों में हास्य का अच्छा पुट है. फ़िल्म में कुछ बेहद संवेदनशील दृश्य भी हैं जो दर्शकों की आंखों को नम कर देते हैं. मेरे हिसाब से तो फ़िल्म का अंत भी ज़बरदस्त है. ये कहना पड़ेगा कि फ़िल्म का पहले हिस्से में कई मनोरंजक तत्व हैं. खासतौर पर मिल्खा के बचपन के हिस्से बहुत अच्छे हैं. लेकिन ये भी सच है कि पहले हिस्से में कई जगह फ़िल्म खीची गई है. हालांकि इंटरवल के बाद फ़िल्म तेज़ी पकड़ती है. प्रसून जोशी ने फ़िल्म के संवाद बखूबी लिखे हैं. जहां तक बात है अभिनेता फ़रहान अख़्तर कि तो उन्होंने मिल्खा सिंह के किरदार को बहुत ही अच्छी तरह से अदा किया है. फरहान ने इस किरदार के लिए जितनी मेहनत की है वो साफ़ नज़र आ रही है. सोनम कपूर का फ़िल्म में छोटा-सा रोल है लेकिन उन्होंने अच्छा काम किया है. मिल्खा के गुरु के रोल में पवन मल्होत्रा हों या फिर नेशनल कोच के रोल में योगराज सिंह सभी ने अपने अपने किरदारों में जान डाली है. जहां तक राकेश ओमप्रकाश मेहरा के निर्देशन की बात करें तो उनका काम बेहतरीन है. मैं ये ज़रूर मानता हूं कि राकेश ने फ़िल्म के कुछ दृश्य बहुत ही लम्बे शूट किए हैं लेकिन इसके बावजूद भी वो मनोरंजक हैं. फ़िल्म का संगीत शंकर-एहसान-लॉय भी बहुत अच्छा है. फ़िल्म के मूड के लिए एक दम सटीक. फ़िल्म के गीतों में प्रसून जोशी के शब्दों ने जान डाली है. बिनोद प्रधान की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. फ़िल्म में एलन अमीन ने एक्शन दृश्यों को बढ़िया तरीके से फ़िल्माया है. पीएस भारती की एडिटिंग भी अच्छी है. फ़िल्म भाग मिल्खा भाग के सिनेमाघरों में अच्छा करने की उम्मीद है. मगर हो सकता है की फ़िल्म की लम्बाई इसके बिज़नस पर असर डाले. बड़े शहरों और मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में फ़िल्म के अच्छा बिज़नस करने की उम्मीद है. |
| DATE: 2013-07-12 |
| LABEL: entertainment |
| [1420] TITLE: किससे 'इश्क़' फरमा रही हैं पूनम पांडेय ? |
| CONTENT: मुंबई के रहने वाले 22 वर्षीय शिवम ने जब अपने दोस्तों को बताया कि वो पूनम पांडेय के साथ एक फ़िल्म कर रहे हैं तो उनकी प्रतिक्रिया थी क्या तुम्हें यक़ीन है तुम ठीक कर रहे हो. एक बार फिर सोच लो. शिवम ने ये बात बीबीसी को बताई. वो पूनम पांडेय के साथ फिल्म नशा से बॉलीवुड में प्रवेश कर रहे हैं. पूनम पांडेय के बारे में शिवम कहते हैं भला कौन होगा जो उन्हें नहीं जानता. जब मुझे पता लगा कि फ़िल्म में मेरी हीरोइन वो होंगी तो मुझे तो ये बात बड़ी दिलचस्प लगी. मुझे लगा ये मेरे करियर के लिए सही होगा. नशा के निर्देशक अमित सक्सेना हैं. ये फिल्म एक कम उम्र के लड़के और उससे ज़्यादा उम्र की एक लड़की के प्यार पर आधारित है. शिवम फ़िल्म में पूनम के 18 वर्षीय प्रेमी की भूमिका निभा रहे हैं. शिवम कहते हैं कि उन्हें शुरुआत से ही पता था कि फ़िल्म में इस तरह के कई दृश्य होंगे और इसके लिए वो मानसिक तौर पर पहले से ही तैयार थे. लेकिन फिर भी पहले सीन की शुरुआत में वो नर्वस थे. शिवम कहते हैं पूनम और मेरे बीच जब पहला किस फ़िल्माया जा रहा था तो मैं घबराया हुआ था. लेकिन उसके बाद निर्देशक ने सेट पर हमारे लिए काफ़ी आसान माहौल कर दिया. फिर मुझे कोई तकलीफ़ नहीं हुई. पूनम पांडेय के बारे में शिवम कहते हैं ईमानदारी से कहूं तो उनकी जो इमेज मेरे दिमाग़ में थी वो उसके बिल्कुल विपरीत निकलीं. भारतीय टीम के विश्व कप जीतने पर उन्होंने जो अपने कपड़े उतारने की बात कही थी या और भी कई बातें जो उन्होंने पब्लिसिटी के लिए कही थीं वो मुझे पता थीं. लेकिन मैंने उन्हें काफी मिलनसार समर्पित और एक प्यारी लड़की पाया. शिवम के मुताबिक पूनम किसी ना किसी वजह से हमेशा सुर्खियों में रहती हैं. और ये बात उनकी फ़िल्म को भी फ़ायदा पहुंचाएगी. नशा 26 जुलाई को रिलीज़ होगी. |
| DATE: 2013-07-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1421] TITLE: जिन्होंने राजेश खन्ना और बिग बी के लिए सीटी बजाई |
| CONTENT: बचपन में नागेश सुर्वे जब सीटी बजाते थे तो उनकी दादी बोलती थी बेटा सीटी मत बजा साँप आ जाएगा. उनको नहीं पता था कि सीटी बजाने का यही हुनर सुर्वे को बॉलीवुड की फ़िल्मी दुनिया में नाम और शोहरत दिलाएगा. सुर्वे ने 16 साल की उम्र से सीटी से धुन निकालने के हुनर को अपना पेशा बना लिया. अभी उनकी अम्र 64 साल है. हिंदी फ़िल्मों में राजेश खन्ना अमिताभ बच्चन आमिर ख़ान और पिछले साल की सुपरहिट फ़िल्म बर्फी में रणबीर कपूर के लिए उन्होंने सीटी बजाई. उन्होंने जूली फ़िल्म के लिए पहली बार सीटी बजाई थी जिसका एक गाना दिल क्या करे जब किसी को किसी से प्यार हो जाए काफी लोकप्रिय हुआ. इसके बाद नागेश ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उनके पास एक के बाद एक फ़िल्मों के प्रस्ताव आते गए. अभी 64 साल की उम्र में उनके पास 1500 फ़िल्मों में सीटी की धुन देने का रिकॉर्ड है. नागेश पहले ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने इतनी सारी फ़िल्मों में सीटी की धुन दी है. बहुमुखी प्रतिभा के धनी नागेश एक पेशेवर सितार वादक हैं. वह वॉयलिन भी बजाते हैं. नागेश चालीस सालों से फ़िल्मों में सीटी के ज़रिए धुन देने का काम कर रहे हैं. वह कहते हैं सिर्फ़ सीटी बजाकर परिवार का पेट नहीं पाला जा सकता है. फिल्म इंडस्ट्री में काम करने के लिए बैकअप होना बहुत ज़रूरी है. नागेश के मुताबिक़ अगर मैं केवल सीटी बजा रहा होता तो मेरे लिए बहुत मुश्किल होती. मेरे लिए यह एक शौक है जिसका मुझे फ़िल्मों में उपयोग करने का अवसर मिला. रिक्शे वाले से लेकर गाड़ी चलाने वाले लोग रास्ते पर हमारे देश में सीटी बजाते हैं. लेकिन सीटी का सही इस्तेमाल कम ही लोग करते हैं. नागेश कहते हैं कि बचपन में लड़कियों को छेड़ने के लिए सीटी बजाता था तो बड़े लड़कों से चॉकलेट मिलती थी लेकिन अब उन्हें लगता है कि राह चलते सीटी बजाना बुरा है. नागेश कहते हैं सीटी बजाना बहुत आसान है. इसके लिए किसी तरह के प्रशिक्षण की ज़रूरत नहीं होती. मुँह से हवा फूँकने भर से सीटी बजती है. केवल हमें उसे शेप देने की ज़रूरत होती है. नागेश कहते हैं कि सीटी कई तरह की होती है लेकिन यह संगीत निर्देशक पर निर्भर करता है कि उसे किस तरह की सीटी वाली धुन चाहिएशाहरुख़ ख़ान की फ़िल्म पहेली के बैकग्राउण्ड में चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ नागेश की सीटी से निकली थी. आजकल इलेक्ट्रॉनिक वाद्यों के चलते सीटी बजाने के लिए इंसानों की ज़रूरत नहीं है. इन यंत्रों के ज़रिए सीटी की अलग-अलग धुनें निकाली जा सकती हैं. नागेश इस बात से नाख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहते हैं कि आप कंप्यूटर से सीटी की धुन तो निकाल सकते हैं लेकिन उसमें इंसानी भाव कहां से लाएंगे सुख और दुख के भावों को कंप्यूटर कैसे जान सकता है सीटी की धुनों से संगीत प्रेमियों को लुभाने वाले नागेश कभी न कभी आपके मोबाइल की रिंगटोन बने होंगे. फ़िल्म फ़ना का चाँद सिफारिश या फ़िल्म कुछ-कुछ होता है की सिग्नेचर धुनों ने लोकप्रियता की ऊंचाइयों को छुआ. यह सीटी के धुनों की उड़ान कही जा सकती है कि सुर्वे ने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से लेकर अनु मलिक तक और जतिन ललित से लेकर प्रीतम तक जाने-माने संगीतकारों की धुनों में अपनी सीटी से जान डाली. |
| DATE: 2013-07-11 |
| LABEL: entertainment |
| [1422] TITLE: बॉलीवुड से आगे सिनेमा और भी. |
| CONTENT: बांधोन पहली असमिया फ़िल्म है जिसे देश भर में रिलीज़ किया गया है. आजकल अगर आप सिनेमा घर के बाहर हिंदी फ़िल्मों के साथ-साथ तमिल तेलुगू पंजाबी या फिर बांग्ला फिल्मों का पोस्टर भी देखते हैं तो ये इस बात का प्रमाण है कि प्रादेशिक फ़िल्मों का दायरा धीरे-धीरे ही सही लेकिन बढ़ रहा है. हर शुक्रवार हिंदी फ़िल्में भारत के हर शहर में दस्तक देती हैं. लेकिन पिछले कुछ समय में एक बदलाव नज़र आया है. अब प्रादेशिक भाषा में बनने वाली फ़िल्मों की आहट भी जगह-जगह सुनाई देने लगी है. पिछले हफ्ते की ही बात करें तो जानू बरुआ निर्देशित असमिया फ़िल्म बांधोन देश भर में रिलीज़ की गई. फ़िल्म को सब-टाइटल्स के साथ दिल्ली मुंबई बंगलौर और पुणे के सिनेमा घरों में दिखाया जा रहा है. ग्यारह बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके जानू बरुआ कहते हैं कि हालांकि वो कई बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके हैं लेकिन विडंबना ये है कि उनकी फ़िल्में लोगों ने देखी ही नहीं हैं. लेकिन क्यों नहीं देखी किसी ने उनकी फ़िल्में बीबीसी को इस सवाल का जवाब देते हुए जानू कहते हैं भई लोगों को मेरी फ़िल्में देखने का मौका ही नहीं मिला लेकिन बांधोन के साथ एक अच्छी शुरुआत हुई है. भले ही आज हमारी फ़िल्मों को कम सिनेमा घर मिलें लेकिन कल इनकी संख्या बढ़ेगी. लोग हमारी फ़िल्मों के बारे में भी जानने लगेंगे. जानू ने मैंने गांधी को नहीं मारा हर पल और मुंबई कटिंग जैसी हिंदी फ़िल्में बनाई हैं लेकिन बावजूद इसके वो मानते हैं कि हिंदी सिनेमा के मुक़ाबले प्रादेशिक भाषाओं में ज़्यादा अच्छी फ़िल्में बनती हैं. जानू कहते हैं अब दर्शक ज़्यादा परिपक्व हो गए हैं. वो अच्छे और बुरे सिनेमा में फ़र्क महसूस कर सकते हैं. प्रादेशिक फ़िल्मों को देश भर में रिलीज़ करने का ज़िम्मा उठाया है पीवीआर ने. अपनी इस मुहिम के बारे में पीवीआर के शिलादित्य बोरा कहते हैं आज की तारीख़ में भारत में हर तरह के सिनेमा के लिए दर्शक मौजूद हैं. पहले प्रादेशिक या विदेशी फ़िल्में देखने का मौका किसी फ़िल्म महोत्सव के दौरान ही मिला करता था जो साल में एक बार होता था. हमने सोचा कि क्यों न अपने दर्शकों को हर हफ्ते ये मौका दिया जाए. प्रादेशिक सिनेमा को मिल रहे इस महत्व से सिर्फ जानू बरुआ ही नहीं बल्कि दक्षिण भारतीय मराठी और पंजाबी फ़िल्मकार भी खुश हैं. बांधोन के साथ-साथ 5 जुलाई को रिलीज़ हुई तमिल फ़िल्म सिंघम 2 ने तो रिलीज़ के साथ ही रिकॉर्ड कमाई भी कर ली. भारत समेत दुनिया भर के 2400 सिनेमाघरों में ये फ़िल्म तमिल और तेलुगु भाषा में रिलीज़ की गई. अब इस हफ्ते ये फ़िल्म हिंदी में डब करके रिलीज़ की जा रही है. इससे पहले 28 जून को पंजाबी फ़िल्म जट और जूलिएट भी हिंदी फ़िल्म घनचक्कर के साथ रिलीज़ हुई. इस फ़िल्म की अगर बात करें तो इसे भी उतने ही सिनेमाघरों में दिखाया गया जितने सिनेमाघरों में घनचक्कर दिखाई गई. इस बात से पता चलता है कि पंजाबी फ़िल्में दर्शकों के बीच कितनी लोकप्रिय हैं. जट और जूलिएट के निर्देशक अनुराग सिंह बीबीसी से बात करते हुए कहते हैं पिछले तीन-चार सालों में पंजाबी सिनेमा में एक नया उछाल आया है. अब तो फ़िल्म निर्माता मुफ़्त में भी फ़िल्म के प्रिंट दे देते हैं ताकि पंजाबी फ़िल्मों को बढ़ावा मिले. भारत के साथ-साथ इस फ़िल्म को जर्मनी और इटली में भी रिलीज़ किया गया. मराठी फ़िल्मों ने भी पिछले दस सालों में कई बदलाव देखे हैं. सुपरहिट मराठी फ़िल्म अनुमति के निर्देशक गजेन्द्र अहिरे ने बीबीसी को बताया कि जहाँ कुछ समय पहले तक साल में सिर्फ़ 14 या 15 मराठी फ़िल्में बना करती थी वहीं अब इनकी संख्या बढ़ कर 100 हो गई है. अहिरे कहते हैं कि इन फ़िल्मों को हिंदी फ़िल्मों के साथ सिनेमा घरों में दिखाया जाता है और जनता इन फिल्मों को पसंद भी करती है. वैसे भी जहाँ तक फ़िल्मों का सवाल है जनता फ़िल्में सिर्फ एंटरटेन मनोरंजन होने के लिए देखती है. एंटरटेनमेंट फिर उन्हें हिंदी फ़िल्मों से मिले या फिर प्रादेशिक फ़िल्मों से उनके लिए बात बराबर ही है. |
| DATE: 2013-07-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1423] TITLE: शाहरुख़ ख़ान और गौरी के घर आए अबराम |
| CONTENT: बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख़ ख़ान ने एक बयान जारी कर किराए की कोख के ज़रिए एक बेटे का पिता बनने की पुष्टि की है. पिछले हफ़्ते मीडिया में जब ये ख़बर आई थी तो उन्होंने इसे एक निजी मामला बताया था. मंगलवार शाम को एक बयान जारी कर उन्होंने कहा जो भी शोर-शराबा इस ख़बर को लेकर हुआ है उसके बीच मुझे सबसे मीठी आवाज़ अपने बच्चे अबराम AbRam की लगी. उसका जन्म समय से पहले सातवें महीने में ही हो गया था और आख़िरकार वो घर आ गया है. शाहरुख़ ने बच्चे के लिंग परीक्षण को लेकर हो रहे विवाद पर विराम लगाते हुए कहा है कि उन्होंने ऐसा कोई परीक्षण नहीं करवाया था. उनका कहना था मैं ये साफ़-साफ़ कह दूं कि हमने बच्चे का लिंग परीक्षण नहीं करवाया. मीडिया और कुछ संगठनों ने इस बारे में जो भी मुद्दे उठाए थे वो मेरे बयान से साफ़ हो जाते हैं. शाहरुख़ ने कहा कि उन्होंने न ही ऐसा किया है और न ही किसी क़ानून का उल्लंघन किया है. उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी गौरी और उनका पूरा परिवार बच्चे की सेहत को लेकर काफ़ी समय से परेशान थे. इस मुद्दे पर अपनी शुरुआती चुप्पी को लेकर उन्होंने सफ़ाई देते हुए कहा कि चूंकि ये मामला बेहद निजी और भावुक था इसलिए उन्होंने इस पर टिप्पणी नहीं की. बच्चे के जन्म से जुड़े अस्पताल और डॉक्टरों से माफ़ी मांगते हुए उन्होंने कहा मुझे इस बात का खेद है कि उन्हें कुछ तबकों से कई सवालों का सामना करना पड़ा. मैं उन डॉक्टरों नर्स और मेडिकल स्टाफ़ का शुक्रिया अदा करता हूं जिन्होंने बच्चे को ज़िंदगी दी. उन्होंने जनता से अपील की कि वे उनके इस निजी पल की ख़ुशियां मनाने में उनका साथ दें. हालांकि उन्होंने इस बात को दुर्भाग्यपूर्ण भी बताया कि उन्हें इस मामले पर इतनी सफ़ाई देनी पड़ी. |
| DATE: 2013-07-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1424] TITLE: अफ़ेयर शुरू होते ही शक करने लगते थे संजीव कुमार? |
| CONTENT: मैं उन्हें संजीव कुमार नहीं बल्कि हरिभाई जरीवाला बुलाती थी जो उनका असली नाम था. मेरी मां उन्हें राखी बांधती थी. कई बार वो राखी के वक़्त लंदन में होतीं तो राखी भेज देतीं तो उनके बदले मैं हरि को राखी बांधती थी. इस नाते वो मेरा मामा भी थे भाई भी और दोस्त तो ख़ैर थे ही. वो बहुत कम बोलते थे. लेकिन उनका सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का था. वो मुझे राखी में कभी रुपए तो कभी महंगी साड़ियां तोहफे में देते थे. उनके बारे में धारणा थी कि वो बहुत कंजूस हैं. लेकिन ऐसा नहीं है. उन्हें जिसे जो देना होता था वो दे देते थे. जिसे नहीं देना होता था तो नहीं देते थे हरिभाई अपनी सहज स्वाभाविक मुस्कान से लड़कियों का दिल लुभा लेते थे. उनकी आंखों में ग़ज़ब का आकर्षण था. उनकी कई अभिनेत्रियों से गहरी मित्रता थी. जब मैं हरि से उनके बारे में बात करती तो हम उनके नाम से नहीं बल्कि नंबर से बुलाते. मैं कहती हरि. आज तुम एक नंबर से मिल रहे हो ना. या आज सात नंबर वाली से तुम्हारा झगड़ा हुआ क्या. वगैरह-वगैरह. वो कभी भी अपनी महिला मित्रों पर बेवजह का अधिकार नहीं जमाते थे. वो पज़ेसिव नहीं थे. उनके साथ महिलाएं बेहद सहज महसूस करती थीं. हरि उर्फ संजीव कुमार के साथ एक समस्या ज़रूर थी. जब कभी कोई औरत उनकी तरफ आकर्षित हो जाती या उनका अफेयर शुरू होता तो उन्हें शक़ होने लगता कि कहीं ये उनकी दौलत और नाम के पीछे तो नहीं है. मैं उनसे अक्सर कहती ऐसे तो तुम कुंवारे ही मर जाओगे. ऐसा थोड़े ना होता है. किसी एक औरत पर तो भरोसा करो. ऐसे ही वो एक महिला को खासा पसंद करते थे. लेकिन शायद उस अफेयर में भी उनका दिल टूटा. एक ये वजह भी थी उनके बीमार पड़ने की. संजीव कुमार के परिवार में ज़्यादातर पुरुष सदस्यों की मौत युवावस्था में ही हो गई थी. वो जब भी कहा करते कि मैं भी जल्द चला जाऊंगा तो मैं उनसे कहती हरि चुप रहो. ज़्यादा पिया मत करो. खाने-पीने का ध्यान रखो. तुम्हें कुछ नहीं होगा. एक बार मैं एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में फिल्मिस्तान स्टूडियो जा रही थी वहां मैंने एक बेहद बुज़ुर्ग शख़्स को देखा. मैं आगे बढ़ गई. थोड़ा आगे गई तो अचानक मुझे कुछ महसूस हुआ. मैंने गाड़ी पीछे की तो देखा कि वो बुज़ुर्ग और कोई नहीं संजीव कुमार थे. मैं हैरान रह गई. वो अमरीका से अपने दिल का इलाज कराके लौटे थे. मैं कुछ दिनों से उनसे मिल नहीं पाई थी. वो अपनी उम्र से 15 साल ज़्यादा लग रहे थे. मुझे उन्हें देखकर बड़ा दुख हुआ. वो अपने आख़िरी दिनों में बेहद शांत हो गए थे. किसी से मिलते जुलते नहीं थे. प्यार और प्रॉपर्टी के मामले में हरिभाई कभी भी भाग्यशाली नहीं रहे. जब भी वो फ्लैट खरीदने का सोचते उनके पास कुछ पैसे कम पड़ जाते. आखिरकार उन्होंने जुहू में एक प्रॉपर्टी खरीदी. लेकिन उसका सुख नहीं भोग पाए. वहां शिफ्ट होने से पहले ही उनकी 6 नवंबर 1985 को 47 साल की उम्र में मृत्यु हो गई. हरिभाई के फिल्म इंडस्ट्री में ज़्यादा दोस्त नहीं थे. हां वो शत्रुघ्न सिन्हा और पूनम सिन्हा के काफी क़रीब थे. संजीव कुमार का जन्मदिन 9 जुलाई को होता था इसी दिन शत्रुघ्न और पूनम की शादी की सालगिरह थी. तब हरिभाई अपना जन्मदिन शत्रु और पूनम के साथ ही केक काटकर मनाते थे. मैं उन्हें बहुत मिस करती हूं. हरिभाई अगर आप ऊपर से मुझे देख रहे हो तो मैं कहना चाहूंगी आई लव यू टू मच बच्चा. |
| DATE: 2013-07-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1425] TITLE: 'दर्शकों की ही सोचेंगे तो दिल की बात कैसे कहेंगे' |
| CONTENT: फिल्म निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म भाग मिल्खा भाग इसी हफ़्ते रिलीज़ हो रही है. जैसा कि फिल्म के नाम से ही पता चल जाता है फ़िल्म कहानी है धावक मिल्खा सिंह की. बतौर निर्देशक राकेश ने अब तक अक्स रंग दे बसंती और दिल्ली 6 जैसी फिल्में बनाई हैं. इन सभी फ़िल्मों के विषय लीक से हटकर थे. अब उन्होंने जाने माने धावक मिल्खा सिंह की कहानी को पर्दे पर उतारा है. क्या सोच कर चुनते हैं राकेश अपनी फिल्मों की कहानी. बीबीसी से बातचीत में राकेश कहते हैं अगर एक निर्देशक या फिर एक अभिनेता फ़िल्मों की कहानी का चुनाव करते वक़्त दर्शकों के बारे में सोचेगा तो इससे उसके काम पर अच्छा असर नहीं पड़ेगा. राकेश कहते हैं अगर हम सिर्फ़ दूसरों के बारे में सोचेंगे तो फिर हमारी कहानियों में हमारा नहीं बल्कि उनका रंग होगा. हम उन कहानियों पर फिल्म बना ही नहीं पाएंगे जिन कहानियों को हम दुनिया के सामने लाने के लिए तड़प रहे हैं. फिल्मकार पर अगर किसी बात का गहरा असर पड़ा है तो वो चाहेगा कि वो बात अपनी फिल्म के ज़रिए सभी से साझा करे. राकेश मानते हैं कि अगर आप लोगों से प्रभावित हो जाएंगे तो आप उन्हीं की कहानियां उन्हीं को सुना रहे होंगे. वो कहते हैं कि हो सकता है कि कुछ लोगों को ये सही लगता हो लेकिन इस काम में न तो कोई मज़ा है और न ही कोई चुनौती. भाग मिल्खा भाग के बारे में राकेश कहते हैं मिल्खा सिंह की मेरे ही नहीं बल्कि पूरे देश के ज़हन में एक अमिट छाप है. मैं तो बड़ा ही हुआ हूं उनकी कहानियों पर. राकेश बताते हैं कि वो खुद एक खिलाड़ी रह चुके हैं और जब वो दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में जाया करते थे तो वहां उन्हें मिल्खा सिंह के बारे में काफ़ी कुछ सुनने को मिलता था. एक वक़्त था जब ख़ुद मिल्खा सिंह इसी नेशनल स्टेडियम में अभ्यास करते थे. इस फ़िल्म में मिल्खा सिंह की भूमिका में हैं फ़रहान अख्तर और फिल्म में सोनम कपूर और दिव्या दत्ता भी अहम भूमिकाएं निभा रही हैं. |
| DATE: 2013-07-09 |
| LABEL: entertainment |
| [1426] TITLE: अब एआर रहमान बनेंगे पटकथा लेखक |
| CONTENT: कई राष्ट्रीय और ऑस्कर सहित कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके संगीतकार एआर रहमान अब कहानीकार बनने वाले हैं. रहमान एक स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं. वो इस पर आधारित फिल्म के निर्माण का हिस्सा होंगे. वो फिल्म के क्रिएटिव प्रोड्यूसर होंगे. मुंबई में एक म्यूज़िक चैनल के कार्यक्रम में आए एआर रहमान ने मीडिया को ये बात बताई. उन्होंने कहा मेरे पास स्क्रिप्ट के 6-7 ड्राफ्ट्स तैयार हैं. मैं इस फिल्म को पहले हिंदी में बनाउंगा. ये एक रोमांटिक कहानी है. एआर रहमान से जब पूछा गया कि फिल्म में वो किस कलाकार को लेंगे तो उन्होंने हंसते हुए कहा मैं उस कलाकार को लूंगा जो फिल्म बनाने में मेरी मदद करे. ना कि उसमें किसी तरह की दिक्कत पैदा करे. रहमान ने बताया कि स्क्रिप्ट लिखने का आइडिया उनके दिमाग में पिछले चार-पांच साल से चल रहा था और आखिरकार उन्होंने इसे अमल में लाने का फैसला कर लिया. पत्रकारों के बार-बार पूछने पर भी उन्होंने और ज़्यादा जानकारी देने से इनकार कर दिया. एआर रहमान अपनी हालिया रिलीज़ फिल्म रांझणा की कामयाबी पर कहते हैं इसके टाइटल ट्रैक पर मैंने काफी काम किया. आखिर-आखिर तक मैं इससे संतुष्ट नहीं था. लेकिन जब ये लोगों को बेहद पसंद आया तो मैं हैरान रह गया. रहमान कहते हैं कि एक संगीतकार के लिए फिल्म की कहानी और उसके माहौल के हिसाब से अपने मूड को ढालना बहुत ज़रूरी होता है. वो कहते हैं रांझणा जैसी देसी फिल्म और किसी ऐसी फिल्म जिसकी पृष्ठभूमि मॉडर्न हो उनके लिए संगीत देने में काफी अंतर होता है. ऐसे में आप पर फिल्मकार का भरोसा होना बहुत ज़रूरी है. वो आपको पर्याप्त वक़्त दे ताकि आप फिल्म के माहौल के हिसाब से संगीत रचने में कामयाब हो सको. रहमान मौजूदा दौर के संगीतकारों में प्रीतम और सचिन-जिगर के संगीत को पसंद करते हैं. |
| DATE: 2013-07-08 |
| LABEL: entertainment |
| [1427] TITLE: जानती हूँ, रणवीर से कितनी दूरी रखनी है: सोनाक्षी |
| CONTENT: सोनाक्षी सिन्हा का कहना है कि वह अपनी हर फ़िल्म के बारे में पापा शत्रुघ्न सिन्हा को इत्तला देती हैं हालाँकि उनके अनुसार फ़िल्म करने या नहीं करने को लेकर अंतिम फ़ैसला उनका अपना होता है. सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म लुटेरा पांच जुलाई को रिलीज़ हुई है. रिलीज़ से पहले बीबीसी से ख़ास बातचीत में उन्होंने अपने सह कलाकार रणवीर सिंह की बिंदास छवि के बारे में भी बात की. सोनाक्षी ने कहा वह एक बेहद ज़िंदादिल इंसान हैं. उन्हें कैसे संभालना है और उनसे कितनी दूरी पर रहना है ये मैं अच्छी तरह से जानती हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि बस काम से काम रखना चाहिए . रणवीर काफी मेहनती और प्रतिभाशाली अभिनेता हैं. काम में अपने परिवार के सुझावों के बारे में सोनाक्षी कहती हैं अब भी मैं अपने परिवार से राय लेती हूँ. कोई भी फिल्म करने से पहले मैं पापा शत्रुघ्न सिन्हा को सब बता देती हूं पर अंतिम निर्णय मेरा ही होता है. मैं उन्हें हर बात की इत्तला देती हूं ताकि उन्हें पता रहे कि मैं कौन-कौन सी फिल्में कर रही हूँ. शुक्रवार को रिलीज़ हुई फ़िल्म लुटेरा 50 के दशक के बंगाल की कहानी है. फ़िल्म में उन्होंने एक ज़मींदार की बेटी का किरदार निभाया है जिसे पेंटिंग में रुचि है. लुटेरा का निर्देशन विक्रमादित्य मोटवाने ने किया है. इसे अनुराग कश्यप की कंपनी फैंटम फिल्म्स ने बनाया है. सोनाक्षी की आने वाली फिल्म है वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई दोबारा जिसमें वह अक्षय कुमार और इमरान ख़ान के साथ काम कर रही हैं. फिल्म में इमरान और सोनाक्षी पर एक गाना फ़िल्माया गया है तैयब अली प्यार का दुश्मन ये गाना 1977 की सुपरहिट फिल्म अमर अकबर एंथनी में भी था जिसे ऋषि कपूर और नीतू सिंह पर फ़िल्माया गया था. फ़िल्मों में अंग प्रदर्शन के सवाल पर सोनाक्षी कहती हैं आज तक कोई मेरे पास इस तरह की फिल्मों के प्रस्ताव लेकर नहीं आया जिसमें अंग प्रदर्शन करना हो या किस करना हो. उन्हें पता होता है कि मैं ऐसी फिल्में करने ही नहीं वाली. तो निर्माता साफ-सुथरी फिल्में लेकर ही मेरे पास आते हैं. |
| DATE: 2013-07-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1428] TITLE: फालतू गाने मैं नहीं गाता: सोनू निगम |
| CONTENT: कुछ साल पहले तक सोनू निगम हर दूसरे संगीतकार की पसंद हुआ करते थे. लेकिन आजकल सोनू बहुत कम गाने गा रहे हैं. इसकी क्या वजह है बीबीसी ने जब सोनू से ये पूछा तो वो बोले देखिए फालतू गाने मैं गाता नहीं. और जो दूसरे गुणी संगीतकार हैं वो उन्हीं गायकों से गाने गवाते हैं जो उनके कॉन्सर्ट्स में गाने के लिए तैयार हो जाते हैं. सोनू आगे कहते हैं मैं संगीतकारों के पास नहीं जाता. उन्हें मेरा पास आना होगा. सोनू निगम आने वाली फिल्म लव यू सोनियो के लिए गाने गा रहे हैं. इसी के म्यूज़िक लॉन्च पर उन्होंने हमसे ख़ास बात की. वो ऐसा नहीं मानते कि उनके पास काम की कमी है. वो कहते हैं चाहे अग्निपथ का अभी मुझमें कहीं बाकी है या चश्मेबद्दूर का हर एक फ्रेंड कमीना होता है. गाने अब भी मेरे हिट हो रहे हैं. मैं भगवान का शुक्रिया अदा करता हूं कि गायकी करियर शुरू होने के 22 साल बाद भी मुझे काम मिल रहा है. क्या आजकल के गायकों और संगीतकारों में जोश और जुनून की कमी है ये पूछने पर सोनू बोले मैं ऐसा नहीं मानता. लेकिन हां इस दौर में तकनीक का काफी अहम रोल हो गया है. मौजूदा तकनीक की मदद से एक साधारण गायक भी अच्छा गा सकता है. लेकिन अब भी संगीत की वजह से फिल्में बिकती हैं. सोनू निगम अब संगीतकार भी बन गए हैं. वो जल और सिंह साहब द ग्रेट जैसी फिल्मों के लिए संगीत दे रहे हैं. हिमेश रेशमिया ए आर रहमान अमित त्रिवेदी जैसे संगीतकार खुद भी गाने गाते हैं लेकिन सोनू मानते हैं कि किसी संगीतकार को खुद ही अपने लिए गाने की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए. |
| DATE: 2013-07-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1429] TITLE: क्या अमिताभ ही बचे हैं आख़िरी रास्ता! |
| CONTENT: हाल ही में अमिताभ बच्चन की दो फ़िल्मों आख़िरी रास्ता और अंधा क़ानून के रीमेक अधिकार ख़रीदे गए. ये दोनों ही फ़िल्में 80 के दशक की बेहद कामयाब फ़िल्में हैं. इन फिल्मों के रीमेक अधिकार पैन इंडिया नेटवर्क ने खरीदे हैं. इससे पहले शाहरुख खान ने अमिताभ की डॉन और ऋतिक रोशन ने अग्निपथ के रीमेक में काम किया था. ज़ंजीर के रीमेक की शूटिंग चल रही है. दो और दो पांच सत्ते पे सत्ता और दीवार के रीमेक खरीदे जाने की बात चल रही है. हाल के सालों में बॉलीवुड में कई पुरानी फ़िल्मों के रीमेक बने हैं लेकिन रीमेक के इस बाज़ार में सबसे ज़्यादा मांग अमिताभ बच्चन की फ़िल्में की है. भला ऐसा क्यों अग्निपथ का रीमेक बनाने वाले निर्देशक करण मल्होत्रा कहते हैं अमिताभ बच्चन भारत के सबसे बड़े सितारे हैं. हम सभी लोग उन्हें देखकर बड़े हुए हैं. हर कोई ख़ुद को उनसे जोड़ सकता है. इस वजह से उनकी फ़िल्मों के रीमेक की सबसे ज़्यादा मांग होती है. अमिताभ के क़रीबी दोस्त और 1978 की उनकी सुपरहिट फ़िल्म डॉन के निर्देशक चंद्रा बारोट कहते हैं अमिताभ पिछले 40 साल से लोगों से जुड़े हुए हैं. उन्होंने हर दौर में अपने आपको ढाला हुआ है. हर पीढ़ी का दर्शक उनसे जुड़ा हुआ है. बाकी सितारों के साथ ये बात नहीं है. इसलिए अमित की फ़िल्मों के रीमेक में हर किसी की दिलचस्पी होती है. आखिरी रास्ता और अंधा कानून के रीमेक अधिकार ख़रीदने वाली पैन इंडिया कंपनी के पास अमिताभ बच्चन की कई फ़िल्मों के वीडियो अधिकार हैं जिन्हें वो कई सैटेलाइट चैनलों को बेचती है. पैन इंडिया के सीएमडी जयंतीलाल गाढा कहते हैं अमित जी की फ़िल्में जितनी बार भी टीवी पर दिखाई जाती हैं उन्हें ज़बरदस्त प्रतिक्रिया मिलती है. टीवी चैनलों के लिए वो हमेशा फ़ायदे का सौदा साबित होती हैं. अमिताभ बच्चन नाम इतना बड़ा ब्रांड है कि हर कोई इससे जुड़ना चाहता है. इसलिए वो रीमेक के बाज़ार के भी शहंशाह हैं. करण मल्होत्रा भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं. वो कहते हैं टीवी पर हम उनकी वो फ़िल्में देखकर भी भरपूर लुत्फ़ उठाते हैं जो उस दौर में सफल नहीं रहीं. तूफ़ान और जादूगर जैसी फिल्मों को देखते हैं और फिर उनकी कॉपी करते हैं. किसी भी प्रोड्यूसर से आप रीमेक की बात करो और सिर्फ अमिताभ की फ़िल्म का नाम बस ले लो. वो फ़ौरन तैयार हो जाता है. हालांकि फ़िल्मकार मानते हैं कि अमिताभ की फ़िल्मों के रीमेक बनाते वक़्त इस बात का ख़्याल रखना ज़रूरी है कि नई फ़िल्म में हीरो के किरदार को थोड़ा बदल दिया जाए. वरना लोग उसे अमिताभ के किरदार से तुलना के तौर पर देखेंगे और ये बात नई फ़िल्म के लिए हानिकारक साबित होगी. करण मल्होत्रा कहते हैं मेरे लिए पुरानी अग्निपथ के अमिताभ भगवान की तरह थे. वो लार्जर दैन लाइफ किरदार थे. वहीं मैंने अपनी अग्निपथ में उस किरदार को थोड़ा अंडरडॉग बनाया जिसे ऋतिक ने निभाया. मेरी अग्निपथ का विजय दीनानाथ चौहान मेरा दोस्त था. हालांकि अमिताभ की हर फ़िल्म का रीमेक कामयाब हो ऐसा भी नहीं है. ख़ुद अमिताभ बच्चन ने अपनी ही सुपरहिट फिल्म शोले के रीमेक में काम किया था जिसका निर्देशन रामगोपाल वर्मा ने किया था. फ़िल्म का नाम था रामगोपाल वर्मा की आग और ये बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह नाकाम रही. चंद्रा बारोट मानते हैं कि फ़िल्म चाहे किसी की भी हो रीमेक उन्हीं फ़िल्मों का बनना चाहिए जो लोगों के दिमाग़ में बसी हों. लेकिन कई फ़िल्मकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही रीमेक ज़्यादा अच्छा व्यवसाय करें लेकिन लोग कुछ समय बाद पुरानी फ़िल्मों को ही याद रखते हैं. |
| DATE: 2013-07-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1430] TITLE: 'सत्यन्वेषी ब्योमकेश बक्शी' बड़े पर्दे पर |
| CONTENT: टीवी पर 90 के दशक में आने वाले धारावाहिक ब्योमकेश बक्शी का एक दृश्य. 90 के दशक में टेलीविज़न पर जासूसी धारावाहिक ब्योमकेश बक्शी ने धूम मचा दी थी. सरदेंदु बनर्जी के लिखे इस जासूसी चरित्र पर आधारित था ये टीवी सीरियल जिसे मशहूर फिल्मकार बासु चटर्जी ने बनाया था और सत्यन्वेषी ब्योमकेश बक्शी की मुख्य भूमिका निभाई थी रजित कपूर ने. वैसे तो इस चरित्र को कई बार बंगाली फिल्मों में उतारा जा चुका है लेकिन पहली बार अब इस पर हिंदी फिल्म बनाने की तैयारी हो रही है. इसे फिल्मकार दिबाकर बनर्जी यशराज बैनर के साथ मिलकर बना रहे हैं. फिल्म का निर्देशन भी दिबाकर बनर्जी ही करेंगे. बीबीसी से खास बात करते हुए दिबाकर ने कहा मैं 25 सालों से ब्योमकेश बक्शी पर फिल्म बनाने का सपना देख रहा हूं. बचपन से हम ब्योमकेश बक्शी की कहानियां पढ़ते आ रहे हैं. इनमें बड़ा रोमांच होता था. इसका कुल 13 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. इसलिए मैं इसे लेकर बड़ा रोमांचित महसूस कर रहा हूं. ब्योमकेश बक्शी की केंद्रीय भूमिका के लिए दिबाकर ने सुशांत सिंह राजपूत को चुना जो अपनी फिल्म काय पो छे को लेकर खासी वाहवाही बटोर चुके हैं. उनके चयन पर दिबाकर ने कहा मैं ब्योमकेश बक्शी के युवा रूप को दिखाना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि मेरा ब्योमकेश बिलकुल मॉडर्न हो ग्लैमरस हो रोमांटिक हो. इस वजह से मैंने सुशांत को चुना. दिबाकर ने बताया कि ब्योमकेश बक्शी को सरदेंदु बनर्जी ने 30 के दशक में लिखा और अपनी फिल्म में वो 40 के दशक के कोलकाता को दिखाएंगे. इसमें एक्शन और स्टंट भी होंगे और ये काफी बड़े पैमाने पर बनाया जाएगा इसलिए इसे टीवी सीरियल नहीं बल्कि फिल्म के रूप में बनाने का सोचा. दिबाकर ने कहा टीवी धारावाहिक ब्योमकेश बक्शी में रजित कपूर ने शानदार काम किया था. मैं जानता हूं कि काफी लोग इस किरदार से उनका चेहरा जोड़कर देखते हैं. लेकिन पुराने परसेप्शन तो तोड़ने ही पड़ते हैं. हम ब्योमकेश बक्शी को बिलकुल नए अंदाज़ में दिखाएंगे. टीवी सीरियल के ब्योमकेश रजित कपूर ने कहा वैसे तो कई बंगाली फिल्में इस किरदार पर पहले ही बन चुकी हैं. इसलिए ये कोई नई बात हो नहीं रही है. लेकिन मैं ब्योमकेश बक्शी बनाने वाली इस नई टीम को अपनी शुभकामनाएं देता हूं. मैं इस किरदार पर अपना इतना हक़ नहीं समझता कि कोई दूसरा बनाए तो मुझे बुरा लगे. रजित कपूर मानते हैं कि असल में ये किरदार ही इतना शक्तिशाली है कि लोगों को खूब भाता है. |
| DATE: 2013-07-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1431] TITLE: 'स्ट्रगल' कर रही है शाहरुख़ की 'बेटी' |
| CONTENT: कुछ-कुछ होता है में शाहरुख खान की बेटी अंजलि का रोल निभाने वाली सना सईद का मानना है कि बाल-कलाकारों को आम कलाकारों की तुलना में ज़्यादा दबाव झेलना पड़ता है. वो कहती हैं कि बड़े होने पर बाल कलाकारों को बॉलीवुड में जगह बनाने में ख़ासी मुश्किलें पेश आती हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए सना ने कहा बाल कलाकारों से कुछ बातों की उम्मीद हमेशा की जाती है. दर्शक हमेशा उनसे उनकी पहली फ़िल्म जैसी उम्मीद करते हैं. बाल कलाकार जब बड़े होते हैं तो उन्हें हमेशा इस दबाव को झेलना पड़ता है. सना ने पिछले साल करण जौहर की रिलीज़ फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर में एक सपोर्टिंग रोल किया था. उन्होंने कुछ कुछ होता है के अलावा हर दिल जो प्यार करेगा और बादल में बाल कलाकार के तौर पर काम किया. लेकिन उसके बाद सना पढ़ाई में व्यस्त हो गईं और उन्होंने फ़िल्म में काम करना बंद कर दिया. बॉलीवुड कलाकार श्रीदेवी आमिर ख़ान उर्मिता मांतोडकर और कुणाल खेमू ने भी बतौर बाल कलाकार अपना करियर शुरू किया था. सना ने टीवी शो बाबुल का आंगन छूटे ना में भी अभिनय किया. अब वो डांस रिएलिटी शो झलक दिखला जा में नज़र आ रही हैं. शो को फिल्म निर्देशक करण जौहर अभिनेत्री माधुरी दीक्षित और कोरियोग्राफर रेमो फर्नांडिज़ जज कर रहे हैं. चूंकि सना ने करण जौहर की दो फ़िल्म में काम किया है तो क्या उन्हें करण से किसी तरह का ज़्यादा समर्थन मिलने की उम्मीद है इसके जवाब में सना कहती हैं नहीं. बल्कि वो तो और बारीक़ी से मेरा परफॉर्मेंस देखेंगे क्योंकि वो मेरा मज़बूत और कमज़ोर दोनों ही पक्ष जानते हैं. वो कहती हैं मैं कोई ट्रेंड डांसर नहीं हूं लेकिन मुझे डांस करना बहुत पसंद है. उम्मीद करती हूं कि आने वाले समय में मैं और अच्छी डांसर बन जाऊंगी. सना को उम्मीद है कि उन्हें और भी फ़िल्म के प्रस्ताव मिलेंगे और वो स्थापित कलाकारों के बीच अपनी जगह बना पाएंगी. |
| DATE: 2013-07-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1432] TITLE: जब सोनम कपूर ने किया सिर्फ 11 रुपए में काम |
| CONTENT: अभिनेत्री सोनम कपूर अपनी फिल्म रांझणा की कामयाबी से खुश हैं और अब उन्हें अपनी अगली फिल्म भाग मिल्खा भाग का इंतजार है. दिलचस्प बात है कि इस फिल्म के लिए उन्होंने सिर्फ 11 रुपए मेहनताना लिया है. बीबीसी से खास बातचीत में सोनम ने कहा ये एक महान शख़्सियत पर आधारित फिल्म है. मुझे पूरी उम्मीद है कि ये फिल्म इतिहास का हिस्सा होने वाली है. ऐसी फिल्मों के लिए पैसे मायने नहीं रखते. भाग मिल्खा भाग मशहूर भारतीय एथलीट मिल्खा सिंह के जीवन पर आधारित है. इसमें फरहान अख़्तर मुख्य भूमिका निभा रहे हैं. फिल्म के निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा हैं और इसे प्रसून जोशी ने लिखा है. फिल्म 12 जुलाई को रिलीज़ हो रही है. सोनम कपूर अपनी हालिया फिल्म रांझणा की कामयाबी से बेहद खुश हैं. उनके छह साल के करियर में ये पहली हिट फिल्म है. इस फिल्म में उनके साथ तमिल फिल्मों के अभिनेता धनुष मुख्य भूमिका में हैं. सोनम कहती हैं मैं बेहद खुश हूं लेकिन इस कामयाबी को सेलिब्रेट करने का वक़्त ही नहीं मिल पाया है. फिल्म के निर्देशक आनंद राय बॉलीवुड में मेरे सबसे फेवरिट निर्देशक बन गए हैं. अभिनेत्री सोनम कपूर को फिल्मी कलाकारों से शिक़ायत है कि वे सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों या फिर समाज की ग़लत बातों पर भी वो अपने विचार नहीं रखते और नो कमेंट्स कहकर निकल जाते हैं. बीबीसी से ख़ास बातचीत में सोनम कपूर ने कहा एक मशहूर हस्ती होने के नाते हमारा फर्ज़ बनता है कि हम ऐसे मुद्दों पर बोलें. हमें जिया ख़ान मुद्दे पर बात करनी चाहिए. हमें उत्तराखंड में आई त्रासदी पर बात करनी चाहिए. नो कमेंट्स कहकर निकल लेना मुझे बड़ा ग़ैरज़िम्मेदार रवैया लगता है. सोनम दावा करती हैं कि जब भी उन्हें अपने आस-पास या समाज में कुछ ग़लत होता नज़र आता है तो वो अपनी राय ज़रूर रखती हैं. वो कहती हैं बलात्कार जैसे मामले पर जब कोई मूर्ख राजनेता कह देगा कि लड़कियों को छोटी स्कर्ट पहनकर बाहर नहीं निकलना चाहिए तो ज़ाहिर सी बात है मुझे गुस्सा आएगा. और मैं खुलकर इस तरह की बातों के खिलाफ अपनी राय रखती हूं. हर बार डिप्लोमेटिक होना सही नहीं होता. कई मुद्दों पर राय रखना ज़रूरी हो जाता है. |
| DATE: 2013-07-01 |
| LABEL: entertainment |
| [1433] TITLE: ये अन्ना का 'सत्याग्रह' नहीं है: प्रकाश झा |
| CONTENT: मीडिया में कई दिनों से ख़बरें आ रही थीं कि प्रकाश झा की आने वाली फिल्म सत्याग्रह भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हज़ारे के साल 2011 में किए गए आंदोलन पर आधारित है. साथ ही ये भी चर्चा थी कि फिल्म में अमिताभ बच्चन जो किरदार निभा रहे हैं वो अन्ना हज़ारे से प्रेरित है. फिल्म के फर्स्ट लुक लॉन्च के मौके पर प्रकाश झा ने इन ख़बरों का खंडन कर दिया है. प्रकाश झा ने कहा दूर-दूर तक ये फिल्म अन्ना हज़ारे मूवमेंट पर आधारित नहीं है. सत्याग्रह की परिकल्पना महात्मा गांधी ने रखी थी. ये विरोध करने का तरीका है. प्रकाश झा बताते हैं कि फिल्म सरकार की ग़लत नीतियों और देश के बुरे हालात से तंग आकर आम आदमी के संघर्ष पर आधारित है. फिल्म में अमिताभ बच्चन अजय देवगन करीना कपूर और मनोज बाजपेई की मुख्य भूमिका है. फिल्म में अमिताभ बच्चन एक ऐसे व्यक्ति का किरदार निभा रहे हैं जो सत्य की ताकत पर पूरी तरह विश्वास करता है. जब अमिताभ बच्चन से पूछा गया कि वर्षों पहले वो भी सांसद थे और राजनीति का हिस्सा थे उस समय उन्हें किस बात पर महसूस हुआ कि सत्याग्रह की ज़रूरत है. तब उन्होंने ये कहते हुए बात टाल दी कि वो बहुत पुरानी बात है. करीना कपूर फिल्म में एक टीवी पत्रकार की भूमिका निभा रही हैं. प्रकाश झा की पिछली फिल्मों जैसे राजनीति और आरक्षण के रिलीज़ के वक्त भी विवाद हुए थे. ऐसा अक़सर क्यों होता है इसके जवाब में प्रकाश झा कहते हैं जब भी आप किसी सामाजिक मुद्दे पर फिल्म बनाते हैं तो अक़सर लोग पत्थर चलाते हैं लेकिन बाद में फिल्म देखकर वो शांत हो जाते हैं. ये आम सी बात है. फिल्म में अजय देवगन एक व्यवसायी की भूमिका में हैं जबकि मनोज बाजपेई एक राजनेता की भूमिका में हैं. फिल्म 23 अगस्त को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2013-06-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1434] TITLE: मौत से पहले क्यों अकेले रह गए थे आर डी बर्मन? |
| CONTENT: एक रिकॉर्डिंग के दौरान आशा भोसले के साथ आरडी बर्मन. 60 के दशक से 80 के दशक तक कई सुपरहिट गीत रचने वाले और तत्कालीन फिल्मी संगीत की हर परंपरा को चुनौती देकर कामयाबी के नए कीर्तिमान रचने वाले राहुलदेव बर्मन यानी आर डी बर्मन उर्फ पंचम दा अपने आखिरी दिनों में बिलकुल अकेले पड़ गए थे. मौत के वक़्त बस चुनिंदा दोस्त ही उनके आस-पास थे. इतनी कामयाबी पाने के बावजूद संगीत और फिल्म जगत के कई नामचीन लोगों के इतने क़रीबी होने के बाद भी ऐसा क्यों हुआ आर डी बर्मन हर निर्माता की पहली पसंद हुआ करते थे तो आख़िर क्यों उनको काम मिलने में मुश्किलें पेश आने लगींडॉक्यूमेंट्री पंचम अनमिक्स्ड में कई नामचीन गायकों संगीतकारों कलाकारों और आर डी बर्मन के क़रीबी लोगों ने इसकी कई वजहें बताई हैं. पंचम अनमिक्स्ड को ब्रह्मानंद सिंह ने बनाया है और इसे राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है. अभिनेता शम्मी कपूर ने आर डी बर्मन के बारे में कहा था हर एक शख़्स की ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आते हैं लेकिन पंचम अपने उतार से अच्छी तरह से निपट नहीं पाए. शम्मी कपूर की फिल्म तीसरी मंज़िल में आर डी बर्मन ने बेहतरीन संगीत दिया था और इसके सारे गाने सुपरहिट हुए थे. इसी फिल्म के बाद से फिल्म इंडस्ट्री में आर डी बर्मन के नाम की धूम मच गई. आर डी बर्मन के क़रीबी दोस्त और गीतकार जावेद अख़्तर कहते हैं हमारे यहां टैलेंट की कोई कद्र नहीं होती. बस वर्तमान देखा जाता है. इसी सोच की वजह से हमने आर डी जैसे जीनियस को खो दिया. 80 के दशक में कुछ नाकामयाबी हाथ लगने के बाद आर डी बर्मन को फिल्में नहीं मिल रहीं थीं. काफी लंबे समय बाद 90 के दशक की शुरुआत में उन्हें विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 1942 अ लव स्टोरी में संगीत देने का मौका मिला. फिल्म के सारे गाने सुपरहिट साबित हुए लेकिन अफ़सोस कि इसकी कामयाबी देखने के लिए ख़ुद आर डी बर्मन ज़िंदा नहीं थे. वो अपनी आख़िरी सफलता को देखने से पहले ही दुनिया से विदा हो चुके थे. चार जनवरी 1994 को 55 साल की आयु में उनका निधन हो गया था. फिल्म के गीत लिखने वाले जावेद अख़्तर कहते हैं पंचम एक ऐसा शख़्स था जिसने अपने आपको संगीत का बादशाह साबित किया. फिर उससे वो ताज छिन भी गया लेकिन उसने 1942 में शानदार संगीत देकर फिर से साबित कर दिया कि साहब संगीत का शहंशाह तो वही है. अफसोस कि उस बादशाह की जान तख्त पर दोबारा बैठने से पहले ही निकल गई. गायक भूपिंदर कहते हैं बड़े दुख की बात है कि वो आदमी एक वक़्त ढेर सारे दोस्तों से घिरा रहता था लेकिन अपने आख़िरी दिनों में बिलकुल अकेला रह गया था. आर डी को क़रीब से जानने वाले लोग बताते हैं कि शुरुआत से ही उनमें विलक्षण प्रतिभा थी. उन्होंने अपने पिता एसडी बर्मन सचिनदेव बर्मन के कई गानों को रिकॉर्ड किया लेकिन क्रेडिट नहीं लिया. आर डी बर्मन की पत्नी और मशहूर गायिका आशा भोंसले बताती हैं मैंने एक बार पंचम से पूछा कि तुम अपना नाम क्यों नहीं लेते. तो वो बोले कोई बात नहीं. पिताजी के लिए ही तो काम कर रहा हूं. मेरा नाम ना भी आए तो क्या फर्क पड़ता है. आशा भोंसले ने एक मज़ेदार वाकया बताया. एसडी बर्मन के बीमार पड़ने के बाद जब आर डी बर्मन निर्माताओं के पास अपना संगीत लेकर जाते तो वो निर्माता उनसे कहते यार पंचम तुम्हारे संगीत में वो बात नहीं जो तुम्हारे पिता के संगीत में हुआ करती थी. कुछ और सुनाओ. ऐसा ही कुछ जब उनसे फिल्मकार शक्ति सामंत ने कहा तब आर डी ने चुपके से आशा भोंसले से कहा अब मज़ा देखना. फिर शक्ति सामंत से उन्होंने कहा मेरे पिताजी ने एक ट्यून बनाई थी. जो इस्तेमाल नहीं हो पाई. वो सुनाऊं क्या. शक्ति सामंत ने कहा फौरन सुनाओ. तब आर डी ने अपने पिता का नाम लेकर अपनी ख़ुद की ही ट्यून सुना दी. जिसे सुनने के बाद शक्ति सामंत बोले वाह-वाह. क्या बात है. मैंने कहा था ना कि तुम्हारे पिता की बात ही अलग थी. शम्मी कपूर बताते हैं कि गाइड और आराधना का संगीत एसडी बर्मन ने दिया था लेकिन गाता रहे मेरा दिल और कोरा काग़ज़ था ये मन मेरा जैसे गाने पंचम ने रिकॉर्ड किए थे. आर डी बर्मन के एक और क़रीबी दोस्त गुलज़ार के मुताबिक़ फिल्म इजाज़त का गाना मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है जब मैं उन्हें सुना रहा था तो पंचम को लगा कि मैं उसे कोई सीन सुना रहा हूं. जब मैंने बोला ये गीत है तो वो कॉपी मेरी तरफ ढकेलता हुआ बोला कल को तुम कोई न्यूज़पेपर लेकर आ जाओगे और कहोगे कि चलो गाना बनाओ. गुलज़ार ने बताया कि आर डी बर्मन बेहद उतावले इंसान थे. जब वह संगीत रच रहे होते थे तो काफी बैचेन रहते थे. अगर उस वक़्त उन्हें गर्मागर्म चाय पेश की जाती तो वह उसके ठंडा होने का इंतजा़र भी ना करते. पानी में डालकर उसे पी जाते. लेकिन इतने उतावले होने के बाद भी उनके संगीत में एक ठहराव था. आर डी बर्मन के लिए कई गाने गा चुके अमित कुमार से एक बार आर डी ने ख़ुद कहा था यार. मेरे पास ढेर सारे आयडिया हैं लेकिन कोई मुझे समझ ही नहीं पाया. मैंने अभी तक कुछ किया ही नहीं है. |
| DATE: 2013-06-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1435] TITLE: क्यों रो पड़े जावेद अख़्तर ? |
| CONTENT: गीतकार और कहानीकार जावेद अख़्तर बीते दिनों अपने आंसू नहीं रोक पाए. वो रो पड़े. और इसकी वजह थी उनके बेटे फ़रहान अख़्तर की फिल्म भाग मिल्खा भाग. बीबीसी से ख़ास बात करते हुए ख़ुद फ़रहान ने ये बात बताई. वो कहते हैं फिल्म को देखकर पापा को शायद अपने संघर्ष के दिन याद आ गए. मिल्खा सिंह को जिस तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ा था और तमाम चुनौतियों को पछाड़ते हुए उन्हें जिस तरह से जीत हासिल की उस जज़्बे ने उनकी लड़ाई ने पापा की आंखों में आंसू ला दिए. फ़रहान अख़्तर ने बताया उनके पिता जावेद अख़्तर ने भी अपने करियर के शुरुआती दिनों में ख़ासा संघर्ष किया. उन्हें कई बार स्टूडियो में ही सोना पड़ता था. और तमाम विपरीत परिस्थितियों का उन्होंने जिस तरह से सामना किया वही सब बातें उन्हें भाग मिल्खा भाग को देखकर याद आईं. भाग मिल्खा भाग मशहूर भारतीय एथलीट मिल्खा सिंह के जीवन पर आधारित है. फ़रहान कहते हैं मिल्खा सिंह जी के बारे में हममें से ज़्यादातर लोगों को यही पता है कि उन्होंने एशियाई और कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण पदक जीता. ओलंपिक में पदक जीतने से वो बस थोड़ा सा चूक गए. लेकिन उनकी ज़िंदगी के कई पहलुओं के बारे में हमें कुछ नहीं पता. यही बात हम इस फिल्म में दिखा रहे हैं. फ़रहान बताते हैं कि फिल्म के लिए उन्हें कई महीनों तक एथलीट की तरह ट्रेनिंग करनी पड़ी. नंगे पैर दौड़ लगानी पड़ी. और तब उन्हें महसूस हुआ कि मिल्खा सिंह कितने जीवट के इंसान हैं. भाग मिल्खा भाग में सोनम कपूर भी अहम भूमिका निभा रही हैं. इसके लेखक प्रसून जोशी हैं और इसके निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा हैं. फिल्म 12 जुलाई को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2013-06-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1436] TITLE: सिगरेट पीने वाले शाहरुख भला कहां के सुपरहीरो: मुकेश खन्ना |
| CONTENT: कई साल पहले दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले बच्चों के कार्यक्रम शक्तिमान की वापसी हो रही है. इसके निर्माता और अभिनेता मुकेश खन्ना ने इस पर एक टेलीफिल्म बनाने का फैसला किया है और उनके मुताबिक अगर इसको अच्छी प्रतिक्रिया मिली तो वो इसे सीरियल के रूप में बनाएंगे. मुकेश खन्ना शक्तिमान को भारत के शुरुआती सुपरहीरो किरदार में से एक बताते हैं. शाहरुख ख़ान ने अपनी साइ-फाइ फिल्म रा. वन के प्रचार के वक्त दावा किया था कि ये भारत की पहली सुपरहीरो फिल्म होगी. मुकेश खन्ना उनके इस दावे पर चुटकी लेते हुए कहते हैं कि सब जानते हैं भारत का पहला सुपरहीरो शक्तिमान था. शाहरुख खान की आलोचना करते हुए वो कहते हैं शाहरुख भला बच्चों के सुपरहीरो कैसे हो सकते हैं. सिगरेट पीने वाला और अपनी सेहत का ख़्याल ना रखने वाला इंसान बच्चों के लिए कभी भी प्रेरणादायक नहीं बन सकता. मैंने अपनी ज़िंदगी में आज तक सिगरेट और शराब को हाथ भी नहीं लगाया है. मुकेश खन्ना आगे कहते हैं खुद शाहरुख खान ने कबूल किया कि उनकी बेटी उनसे सवाल करती है-पापा आप सिगरेट पीते हो. आप बच्चों के लिए कैसे कोई मिसाल पेश कर सकते हो. मुकेश खन्ना कहते हैं कि पैसों की कमी की वजह से अपार लोकप्रिय होने के बाद भी शक्तिमान बंद करना पड़ा. वो कहते हैं हमारा बजट बढ़ गया था. इसलिए मैं उसे आगे नहीं बना सकता था. लेकिन अब वक्त आ गया है कि मैं इसे दोबारा बनाऊं. वो ये मानते हैं कि शक्तिमान के लिए पहले जितनी लोकप्रियता हासिल करना मुश्किल होगा. पहले पूरे देश में सिर्फ दूरदर्शन का चैनल ही हुआ करता था. अब 200 से ज़्यादा सैटेलाइट चैनल हैं. इसलिए मैं ये दावा नहीं करता कि शक्तिमान पहले जितना मशहूर होगा. लेकिन हां धीरे-धीरे आज के बच्चे इसे पसंद करेंगे. मुकेश खन्ना ने बी आर चोपड़ा के मशहूर धारावाहिक महाभारत में भीष्म पितामह की भूमिका निभाई थी. उनका ये किरदार खासा मशहूर हुआ. मुकेश कहते हैं मुझ पर भीष्म पितामह की इमेज का ऐसा ठप्पा लगा कि मैं उसे कई दूसरे किरदार और फिल्में करने के बाद भी हटा नहीं पाया. तब मैंने सोचा कि मुझे कुछ करना पड़ेगा कि मैं इस ठप्पे को हटा सकूं. वो बताते हैं कि ख़ुद बी आर चोपड़ा ने उनसे कहा था कि वो पितामह की छवि से बाहर नहीं निकल पाएंगे. मुकेश के शब्दों में शक्तिमान ने मुझे एक नई पहचान दी. मैं भीष्म पितामह की छवि से निकल तो नहीं पाया लेकिन शक्तिमान के रूप में नई इमेज मिली. अब मैं बड़े बुज़ुर्गों के बीच भीष्म पितामह नाम से और बच्चों के बीच शक्तिमान के रूप में जाना जाता हूं. नए शक्तिमान में वो एक बाल कलाकार को पेश करेंगे और खुद भी एक अहम भूमिका निभाएंगे. |
| DATE: 2013-06-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1437] TITLE: खूबसूरती की तारीफ़ से परहेज़ कैसा: रणवीर सिंह |
| CONTENT: आखिर क्यों रणवीर सिंह का नाम बार-बार अपनी सह अभिनेत्रियों से जोड़ा जाता है क्यों उनका नाम फ़िल्मों की वजह से कम उनकी फ्लर्ट छवि की वजह से ज़्य़ादा सुर्खियां में रहता है. रणवीर सिंह अपनी इस छवि के बारे में कहते हैं मुझे इससे कोई समस्या नहीं. मैं ख़ूबसूरती की तारीफ करने से अपने आपको रोक नहीं पाता. मुझे कोई अच्छा लगता है तो मैं कह देता हूं. इसलिए शायद लोग मुझे फ्लर्ट कहते हैं. रणवीर सिंह की आने वाली फ़िल्म लुटेरा है जिसमें उनके साथ सोनाक्षी सिन्हा हैं. वो कहते हैं सोनाक्षी और मेरे अफेयर की खबरें तो लुटेरा की शूटिंग शुरू होने से पहले ही शुरु हो गईं थीं. उससे पहले हम दोनों ने एक स्टेज शो पर साथ में परफॉर्म किया था और खबर फैल गई. जब मैं पहले दिन शूटिंग पर पहुंचा तो सोनाक्षी ने मुझे देखते ही कहा हलो ब्वॉयफ्रेंड. क्या हाल है. और उनके ऐसा कहते ही माहौल बिलकुल हल्का हो गया. और फिर हमने बड़े मज़े-मज़े में शूटिंग की. सोनाक्षी सिन्हा की ज़बरदस्त तारीफ करते हुए रणवीर कहते हैं कि वो अपने रोल की तैयारी बिलकुल नहीं करतीं. रणवीर के मुताबिक सोनाक्षी सेट पर आती हैं और जो करती हैं बिलकुल स्वाभाविक तरीके से करती हैं. वो पहले से तैयारी में यक़ीन नहीं रखतीं. शायद इस वजह से वो इतनी नेचुरल लगती हैं. रणवीर मानते हैं कि उनके लिए बॉलीवुड में अच्छी शुरुआत लेना बहुत ज़रूरी था. मैं कोई फ़िल्मी परिवार से तो हूं नहीं. इसलिए मेरे लिए ज़ोरदार शुरुआत करना बहुत ज़रूरी था. वर्ना मुझे आगे अवसर नहीं मिलता. खुशकिस्मत हूं कि मेरी पहली ही फ़िल्म में लोगों ने मेरी प्रतिभा को पहचाना और मुझे आगे अवसर मिल रहे हैं. लुटेरा 5 जुलाई को रिलीज़ होने वाली है. इसके अलावा रणवीर दीपिका पादुकोण के साथ संजय लीला भंसाली की फ़िल्म रामलीला में भी काम कर रहे हैं. |
| DATE: 2013-06-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1438] TITLE: टीवी लेखन: कला या मज़दूरी ज़्यादा ? |
| CONTENT: जब भारत में सिर्फ एक ही राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन हुआ करता था तब धारावाहिकों या टीवी कार्यक्रमों का विषय तो दूरदर्शन तय करता था लेकिन उसके बाद लिखना क्या है यह लेखक ही तय करता था. फिर 90 का दशक आया जब भारत में डेली सोप की अवधारणा आई और दर्शक काफ़ी उत्साह में थे कि अब उन्हें रोज़ नए-नए एपीसोड देखने को मिलेंगे. डेली सोप के साथ सोप शब्द जुड़े होने पर मनोहर श्याम जोशी अपनी पुस्तक पटकथा में लिखते हैं कि चूंकि अमरीका में जब टीवी धारावाहिक शुरू हुआ तो प्रायोजक साबुन बनाने वाली कंपनियाँ थी इसलिए व्यंग्य में लोगों ने इसे सोप ओपेरा कहना शुरू कर दिया. भारत में वही सोप ओपेरा डेली सोप बन गया है लेकिन एक विचार यह भी है कि जैसे साबुन के झाग में अनगिनत बुलबुले होते हैं वैसे ही एक धारावाहिक में भी अनगिनत एपीसोड होते हैं. इसलिए इन साबुन के बुलबुलों को डेली सोप कहा गया है. इन साबुन के बुलबुलों की रचना में सबसे अधिक योगदान लेखकों का होता है जो दिन रात लगभग 15-16 घंटे रोज़ काम करते हैं. महाराणा प्रताप नामक सीरियल के संवाद लेखक अभय तिवारी कहते हैं टीवी में आपको कम समय में अधिक उत्पादन करना होता है. बहुत ज़्यादा. एक डेली सोप का लेखक हर दिन 12-14 घंटे लिखने का आदी हो जाता है. शायद इसीलिए अभय इसको गधा मजूरी भी कहते हैं. इसी बात को दूसरे शब्दों में राम मिलाए जोड़ीऔर तुम देना साथ मेरा की लेखिका रजिता शर्मा कहती हैं कि टीवी की लेखनी में हर एपीसोड के अंत में कहानी को या तो अनसुलझी छोड़ देते है या वहां से नई कहानी शुरू कर देते हैं. अभय तिवारी इसे मज़ाक में कहते हैं कि टीवी की कथा शैली दर्शक को थोड़ा खिलाती है और थोड़ा ललचाती है कि देखो कल के लिए ये बचा है. लेखकों के मुताबिक़ दोनों ही स्थिति में उन्हें कलम तोड़ मेहनत करनी होती है. ताकि दर्शकों की जिज्ञासा हमेशा बनी रहे कि आगे क्या होगा. कॉमेडी सर्कस और मास्टर शेफ़ जैसे नॉन फ़िक्शन शो के लेखक गुंजन जोशी कहते हैं कि फिल्मों में एक बड़ी सी कहानी को छोटे में कहते हैं वैसे ही टीवी में एक छोटी सी कहानी को बहुत बड़ी बना कर कहते हैं. कुल मिला कर यह समझाना भले ही मुश्किल हो लेकिन सच यही है कि डेली सोप बनाने का काम किसी कारख़ाने के काम से कम नहीं है. इसीलिए नॉन फ़िक्शन लेखक हेमंत खेर ड्रामेबाज़ के लेखक कहते हैं टेलीविजन की लेखनी यानी जल्दी सोचो जल्दी समझो और ऐसे लिखो कि हर किसी की समझ में आये. इसीलिए आज के दौर में टीवी धारावाहिक बनाना कारख़ाने में कोई उत्पाद तैयार करने के बराबर है. अब अगर हर रोज़ किसी लेखक को 14 घंटे काम करना हो तो लेखक के लिए तो बहुत मुश्किल होता होगा. इस पर गुंजन कहते हैं सबसे बड़ी चुनौती यही है कि एक ही बात को बार बार लिखा जाए और आदमी बोर न हो. इसलिए गुंजन टीवी सीरियल को राईटर्स मीडियम या लेखक का माध्यम मानते हैं क्योंकि असली कलात्मकता तो यही है कि आप कहानी को चाहे जितना भी खींच लें दर्शक फिर भी बोर न हो. जबकि रजिता शर्मा कहती हैं कि इसे दर्शकों का माध्यम कहना चाहिए क्योंकि हमें दर्शकों से साप्ताहिक फ़ीडबैक टीआरपी के रूप में मिलता है जिसके अनुसार हम लोग तय करते हैं कि कौन सा स्टोरी ट्रैक रखना है और कौन सा हटाना है. यानी टीवी लेखन एक अथक परिश्रम से भरा काम है. वो आगे कहती हैं टी आर पी होड़ में कई बार कहानी से काफ़ी छेड़ छाड़ भी होती है. इसीलिए तो अभय तिवारी कहते हैं टीवी चैनल में बैठे लोग ही सब कुछ तय करते हैं. बाकी सारे लोग मजदूरी करते हैं. निर्माता भी एक ठेकेदार से अधिक कुछ भी नहीं. शायद इसीलिए अभय तिवारी टीवी के लेखन को कला कम क्राफ्ट शिल्प ज़्यादा मानते हैं. यानी जिस का उस क्राफ्ट पर अधिकार हो उसके लिए टीवी लेखन बहुत आसान हो जाता है. जबकि हेमंत खेर कहते हैं क्या बेचना है अगर यह न पता हो तो काम बहुत मुश्किल हो जाता है. ज़ाहिर सी बात है चैनल और निर्माताओं पर जितना बाज़ार का दबाव है उतना ही लेखकों पर भी है. अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए रजिता कहती हैं जो कहानी या प्रसंग आपको अच्छा लग रहा हो वह दर्शकों को भी पसंद आए यह ज़रूरी नहीं है. इसलिए मैंने दर्शको को समझना और उसके अनुसार लिखना सीखा है. डेली सोप बनने की वजह से लेखकों की एक अच्छी खासी फ़ौज टीवी इंडस्ट्री में है लेकिन टीवी लेखन को साहित्य लेखन से बिलकुल अलग मानना चाहिए. जिसके पास भी टीवी लेखन का क्राफ्ट होगा वह यहाँ लेखक होगा. इसे अभय इन शब्दों में कहते हैं जैसे बढ़ई किताबों की अलमारी बनाने से विद्वान नहीं होता वैसे ही सीरियल लिखने से कोई कलाकार नहीं होता. फिल्म और टीवी के लेखन में कोई मौलिक अंतर नहीं है फिर भी अभय के शब्दों में टीवी की राइटिंग में सूक्ष्मताओं के लिए जगह नहीं होती है. टीवी लेखन में भावनाओं की अतिरंजना होती है. टीवी के विपरीत फिल्मों में लिखने के अवसर काफ़ी कम हैं और नए लोगों के लिए संघर्ष बहुत ज़्यादा है. जबकि डेली सोप की वजह से संघर्ष करते लेखक को अब भूखों नहीं मरना पड़ता है. बहरहाल टीवी ने नए लिखने वालों को काफ़ी नए नए अवसर प्रदान किए हैं. हालांकि कुछ लोग लेखकों की बढ़ती भीड़ से काफ़ी चिंतित हैं कि टीवी लेखन की क्वालिटी में निरंतर गिरावट आएगी लेकिन इसके विपरीत रजिता शर्मा बहुत आशावान हैं कि टीवी लेखन पहले से और बेहतर होता जाएगा. |
| DATE: 2013-06-23 |
| LABEL: entertainment |
| [1439] TITLE: हीरो बनने आए थे 'विलेन' अमरीश पुरी |
| CONTENT: अपनी दमदार आवाज़ डरावने गेटअप और प्रभावशाली शख्सियत से सालों तक फिल्मप्रेमियों के दिलों में ख़ौफ़ पैदा करने वाले जाने-माने खलनायक अमरीश पुरी दरअसल फिल्मों में हीरो बनना चाहते थे. 22 जून को उनका 81वां जन्मदिन है. इस मौके पर ऐसी ही कई दिलचस्प बातों को बीबीसी के साथ साझा किया उनके बेटे राजीव पुरी ने. अमरीश पुरी ने 30 साल से भी ज़्यादा वक़्त तक फ़िल्मों में काम किया और नकारात्मक भूमिकाओं को इस प्रभावी ढंग से निभाया कि हिंदी फ़िल्मों में वो बुरे आदमी का पर्याय बन गए. अपने पिता के बारे में राजीव पुरी बताते हैं पापा जवानी के दिनों में हीरो बनने मुंबई पहुंचे. उनके बड़े भाई मदन पुरी पहले से फिल्मों में थे. लेकिन निर्माताओं ने उनसे कहा कि तुम्हारा चेहरा हीरो की तरह नहीं है. उससे वो काफी निराश हो गए थे. नायक के बतौर अस्वीकार कर दिए जाने के बाद अमरीश पुरी ने थिएटर में अभिनय शुरू कर दिया और वहां खूब ख्याति पाई. इसके बाद 1970 में उन्होंने फ़िल्मों में काम करना शुरू किया. राजीव ने बताया पापा ने फिल्मों में काफी देर से काम शुरू किया. लेकिन एक थिएटर कलाकार के तौर पर वो ख़ासी ख्याति पा चुके थे. हमने तभी से उनकी स्टारडम देख ली थी और हमें पता चल गया था कि वो कितने बड़े कलाकार हैं. 70 के दशक में उन्होंने निशांत मंथन भूमिका आक्रोश जैसी कई फ़िल्में की. 80 के दशक में उन्होंने बतौर खलनायक कई अविस्मरणीय भूमिकाएं निभाईं. हम पांच नसीब विधाता हीरो अंधा कानून अर्ध सत्य जैसी फिल्मों में उन्होंने बतौर खलनायक ऐसी छाप छोड़ी कि फिल्म प्रेमियों के मन में उनके नाम से ही ख़ौफ़ पैदा हो जाता था. साल 1987 में आई मिस्टर इंडिया में उनका किरदार मोगैम्बो बेहद मशहूर हुआ. फिल्म का संवाद मोगैम्बो खुश हुआ आज भी लोगों के जे़हन में बरकरार है. राजीव पुरी बताते हैं कि असल जीवन में अमरीश पारी बेहद अनुशासनप्रिय और वक़्त के पाबंद इंसान थे. वो कहते हैं पापा के सिद्धांत बिलकुल स्पष्ट थे. जो बात उन्हें पसंद नहीं आती थी वो उसे साफ-साफ बोल देते थे. वो हमारे रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ बिलकुल विनम्र रहते. उन्होंने कभी किसी को नहीं जताया कि वो कितने मशहूर हैं. अमरीश पुरी श्याम बेनेगल गोविंद निहलानी अमिताभ बच्चन धर्मेंद्र और शत्रुघ्न सिन्हा के काफी क़रीब थे. युवा कलाकारों में भी उनकी शाहरुख़ ख़ान आमिर ख़ान और अक्षय कुमार से खासी निकटता थी. राजीव पुरी बताते हैं उन्हें अपने पोते-पोतियों से काफी लगाव था. जब वो उनके साथ होते तो हमसे कहते-चलो अब तुम लोग जाओ. ये हम बच्चों के खेलने का वक़्त है. अमरीश पुरी अपने करियर के आखिरी सालों में चरित्र भूमिकाएं करने लगे थे. इसके बाद उन्होंने परदेस ताल और दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे जैसी फिल्मों में अभिनय की ज़बर्दस्त छाप छोड़ी. 12 जनवरी 2005 को उनका निधन हो गया. |
| DATE: 2013-06-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1440] TITLE: वर्ल्ड म्यूज़िक डे: प्यारेलाल, पंचम दा कैसे रचते थे गाने |
| CONTENT: एक दौर था जब संगीत की तालीम लिए बगैर आप संगीतकार नहीं बन सकते थे और एक ये दौर है जब संगीत बनाने के लिए कम्प्यूटर की तालीम भी बेहद ज़रुरी हो गई है. जिस तरह फिल्मी डायलॉग और कहानी लिखी जाती है उसी तरह संगीत भी लिखा जाता है. इस तस्वीर में फिल्मी संगीत की मशहूर जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के प्यारेलाल हैं जो एक गाने के नोट लिख रहे हैं. इन नोट्स को ऑरकेस्ट्रा में बांट दिया जाता था और एक बड़े स्टूडियो में बैठकर इन्हें रिकॉर्ड किया जाता था. प्यारेलाल जी बताते हैं उन दिनों बिना नोट के संगीत बनाना मुश्किल था लेकिन अब इनको जानने वाले काफी कम रह गए हैं. ये काम अब एक संगीतकार के कान और उसका कम्प्यूटर करता है. 1940-45 का दौर जब संगीतकार की पूरी टीम मिलकर संगीत तैयार करती थी और गाना रिकॉर्ड करती थी. इस तस्वीर में माइक पर बैठे हैं संगीतकार बप्पी लाहिड़ी के पिता अपरेश लाहिड़ी जिन्होंने लता मंगेशकर द्वारा गाए कई हिट बंगाली गाने बनाए हैं. बप्पी के बेटे बप्पा लाहिड़ी कहते हैं मुझे गर्व है कि मैं इस परिवार का हिस्सा हूं हमारा इकलौता ऐसा परिवार है जो तीन पीढ़ियों से संगीत बना रहा है. जैसा कि तस्वीर में दिख रहा है गायक के साथ सभी वाद्य यंत्र बजाने वाले एक ही कमरे में बैठकर गाना बना रहे हैं. एक दूसरे के साथ ताल-मेल बैठाकर एक अच्छा गाना बनाना वाकई में एक चुनौतीपूर्ण काम रहता होगा. धुन अगर रात के तीन बजे दिल में आए तो क्या किया जाए सुबह तक भूल गए तो इस समस्या का निवारण करने के लिए टेप-रिकॉर्डर की मदद से धुनें रिकॉर्ड होना शुरु हुई. तस्वीर में प्यारेलाल जी के छठें भाई नरेश हारमोनियम पर धुन बनाकर पास रखे टेप रिकॉर्डर पर उसे रिकॉर्ड कर रहे हैं. 1930 के आसपास हुए इस आविष्कार ने संगीतकारों के काम को थोड़ा आसान कर दिया. संगीतकार को केवल फिल्म के गाने ही नहीं उसका बैंकग्राउंड स्कोर भी तैयार करना होता है. संगीतकार प्यारेलाल बताते हैं कि पहले के दौर में एक बड़े पर्दे पर फिल्म की रील चलती थी और फिल्म देखते हुए पियानो पर मन में आई धुनों को बजाया जाता था. साथ बैठा सहायक इन धुनों के नोट लिख लेता था जिसे बाद में रिकॉर्ड किया जाता था. ये तस्वीर है एक साउंड रिकॉर्डिंग सेशन की जिसमें दाएं और आर डी बर्मन है उनके बाद साउंड रिकॉर्डिस्ट कौशिक फिर सेक्साफॉन बजाने वाले मनोहारी सिंह और सबसे बाएं पर खड़े हैं बर्मन के ख़ास परकशनिस्ट मारुति राव कीर. 1970 में पेन ड्राइव या हार्ड डिस्क जैसा कुछ तो होता नहीं था इसलिए 35 एमएम की स्पूल टेप पर रिकॉर्डिंग होती थी जिसे चौथाई इंच टेप यानि ऑडियो कैसेट में डाल कर संगीतकार अपने सुनने के लिए घर ले जाता था. महबूब स्टूडियो की एक पूरी मंजिल रिकॉर्डिंग स्टूडियो की तरह काम करती थी. 1986 की इस तस्वीर में युवा अनु मलिक के साथ गायक सुखविंदर सिंह है. फिल्म एक चादर मैली सी के गीत माता रानी का दरबार की रिहर्सल में पीछे कोरस के लिए गायिकाएं खड़ी हैं और बाएं और नरेश शर्मा हैं जिन्होंने इस गीत के लिए 80 पीस ऑरकेस्ट्रा अरैंज किया था. 1982 से पहले ना कोई मिथुन चक्रवर्ती को डिस्को डांसर कहता था और ना ही बप्पी लाहिड़ी को डिस्को किंग. इस तस्वीर में बप्पी लाहिड़ी के साथ हैं उनके सिंथेसाइज़र जिन्हें स्टूडियो तक लाने में थोड़ा संघर्ष करना पड़ा. बप्पी के बेटे बप्पा बताते हैं अस्सी के दशक में पापा न्यूयॉर्क से 12 सिंथेसाइज़र लेकर आए और हवाई अड्डे पर कस्टम वालों ने पापा को पकड़ लिया. फिर पापा ने समझाया कि भाई साहब ये संगीत बनाने के लिए हैं. और फिर वो दौर भी आया जब संगीत का कम्प्यूटर से मिलन हुआ. बप्पी लाहिड़ी के स्टूडियो टेम्पटेशन की इस तस्वीर के बारे में बप्पा बताते हैं देखिए पापा के सामने एक छोटा सा सफेद रंग का कम्प्यूटर लगा है जो शुरुआती ब्रांड अटारी का है. इस ब्लैक एंड व्हाइट कम्प्यूटर पर प्रोग्राम किया गया था संजय दत्त पर फिल्माया सुपरहिट गाना तम्मा तम्मा लोगे. और इसके बाद तो धीरे धीरे कम्प्यूटर ने संगीत के दिल में जगह बना ली. कम्प्यूटर के साथ जोड़ी बनाई सॉफ्टवेयर ने और इस तरह संगीत का हुआ डिजिटलीकरण. स्टूडियो छोटे होने लगे और ऑरकेस्ट्रा कम. अब गाना भी उतना कठिन नहीं रह गया है. तस्वीर में आशिक़ी 2 के सबसे लोकप्रिय गाने तुम ही हो के संगीतकार मिथुन का छोटा सा स्टूडियो है जहां कई गाने जन्म लेते हैं. साथ में है अभिनेत्री सोनल चौहान जिन्होंने अपनी फिल्म थ्री जी के लिए भी गाना गाया था. संगीतकार जोड़ी सचिन जिगर मानते हैं कि गाने के लिए सिर्फ दिल होना चाहिए. दिल से गाना गाइए बाकी काम के लिए कम्प्यूटर है ना. इस तस्वीर में प्यारेलाल एक लाइव ऑरकेस्ट्रा को निर्देशित कर रहे हैं. संगीत के इस सफर में बेशक कुछ लोग ऑरकेस्ट्रा भूल डिजिटल हो गए हैं पर कुछ गीतों के लिए अभी भी लाइव संगीत का इस्तेमाल किया जाता है. फालतू फिल्म का संगीत देने वाली संगीतकार जोड़ी सचिन-जिगर कहते हैं कि बजट मिल जाने के बाद वो जितना चाहे लाइव या ऑरकेस्ट्रा इस्तेमाल कर सकते हैं. हालांकि उन्होंने ये भी माना कि डिजिटल होने से समय और पैसा दोनों की बचत है और साथ ही संगीत के साथ प्रयोग भी मुमकिन है. |
| DATE: 2013-06-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1441] TITLE: रजनीकांत से तुलना बेवकूफी है : धनुष |
| CONTENT: दक्षिण भारत के अभिनेता धनुष अपनी पहली हिंदी फिल्म रांझणा के प्रमोशन में एक सवाल से बच ही नहीं पा रहे हैं - अपने ससुर रजनीकांत से हो रही तुलना को धनुष किस तरह लेते हैं इस सवाल के जवाब में धनुष ने कहा देखिए रजनीकांत से तुलना होना तो लाज़मी है इसे रोका नहीं जा सकता लेकिन मैं ऐसी बातों पर प्रतिक्रिया देना पसंद नहीं करता. धनुष के मुताबिक मेरा और उनका एक्टिंग का तरीका एकदम जुदा है और वैसे भी मात्र 24 फिल्म पुराने लड़के की एक दिग्गज के साथ तुलना करना बेवकूफी है. लोगों का हक है कि वो हम दोनों की तुलना करें लेकिन इस पर कुछ बोलने या नहीं बोलने का हक़ तो मेरा ही है ना. गौरतलब है कि धनुष की शादी रजनीकांत की बड़ी बेटी एश्वर्या के साथ हुई है जिन्होंने 2012 में अपनी पहली फिल्म थ्री का निर्देशन किया था. इस फिल्म में धनुष और श्रुति हासन मुख्य भूमिका में थे. रांझणा फिल्म में धनुष एक स्कूल जाने वाले बनारसी लड़के का रोल निभा रहे हैं जो सोनम कपूर के पात्र से बचपन से ही बेइंतहा मोहब्बत करता है. धनुष ने बताया कि जब वो दसवीं क्लास में थे तब उन्हें भी प्यार हुआ था और इस फिल्म में दिखाई गई कई घटनाएं उनके असल जीवन से मिलती जुलती है. अपने किशोरावस्था के प्रेम के बारे में धनुष बताते हैं मैं सोलह साल का था और वो मेरा पहला प्यार थी. आप फिल्म में जो देखेंगे वैसा ही सब कुछ मैंने उस लड़की के लिए किया और उसने मुझे स्वीकार भी कर लिया. हालांकि एक साल बाद उसने मुझे छोड़ भी दिया था. हालांकि जब धनुष से पूछा गया कि उनके हिसाब से सच्चे प्यार की क्या परिभाषा है तो उनका जवाब था अब प्यार का मतलब हर किसी के लिए अलग अलग हो सकता है. इसलिए मेरी राय कुछ ख़ास मायने रखती नहीं है. दक्षिण भारतीय होने के बावजूद धनुष ने अपनी पहली हिंदी फिल्म में एक ठेठ बनारसी का रोल निभाया है. अपने रोल की तैयारियों के बारे में बात करते हुए धनुष ने कहा मैंने कोई तैयारी नहीं की जो कुछ किया फिल्म के लेखक हिमांशु शर्मा और निर्देशक आनंद राय ने किया. मेरी भाषा पर भी हिमांशु ने ही मेहनत की अगर आप डबिंग स्टूडियो में आते तो आपको असलियत पता चलती. धनुष ने सभी सवालों के जवाब अंग्रेज़ी में दिए और कहा अभी हिंदी में जवाब देने के लिए साहस जमा नहीं कर पाया हूं एक और फिल्म की मोहलत दीजिए उसके बाद सारे जवाब हिंदी में ही दूंगा. वैसे धनुष का असली नाम प्रभू है और उन्होंने अपनी पहली फिल्म से ही अपना नाम बदल लिया था. वजह - प्रभू नाम का हीरो पहले से ही इंडस्ट्री में है. रांझणा में धनुष के साथ सोनम कपूर औऱ अभय देओल नज़र आएंगे. फिल्म 21 जून को रिलीज़ होगी. |
| DATE: 2013-06-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1442] TITLE: जैकी की पसंद: बॉलीवुड गाने,पापड़ और बिरयानी |
| CONTENT: बहुत से लोगों की तरह एक्शन फिल्मों से मेरी पहचान और दिलचस्पी बरसों पहले जैकी चैन जैसे अभिनेताओं के ज़रिए हुई - मार्शल आटर्स और कॉमेडी के उनके घालमेल के दुनिया भर में करोड़ों प्रशंसक हैं. इन दिनों जैकी दिल्ली में चीनी फिल्म समारोह में हिस्सा लेने आए हुए हैं. पर्दे पर जिस तरह वे हँसमुख और जोशीले अंदाज़ में दिखते हैं उनकी बातचीत में भी यही जोश हँसी मज़ाक वाला सहज अंदाज़ झलकता है. दिल्ली में जैकी को मिली जोशीली प्रतिक्रिया ने दिखा दिया कि भारत में भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं है. ख़ुद जैकी को भी बॉलीवुड फिल्में और उसका नाच-गाना भाता है. तो क्या जैकी भारतीय फिल्म में काम करना चाहेंगेइस सवाल का जवाब बड़ी तत्परता से देते हुए जैकी ने कहा मैं तो कब से इंतज़ार कर रहा हूँ कि कोई भारतीय निर्देशक निर्माता मुझे रोल दे. हाँ स्क्रिप्ट अच्छी होनी चाहिए. मैं डांस तो नहीं कर सकता पर मैं गा सकता हूँ. अपनी गायन प्रतिभा का एक नमूना जैकी चैन ने भरी सभा में दिया भी जब सबके सामने एक पूरा गीत गाकर उन्होंने लोगों को हैरान कर दिया. जैकी को थ्री इडियट्स काफी पंसद आई है. फिल्मों के बारे में पूछे जाने पर जैकी ने कहा मैं नाम नहीं याद रखा पाता लेकिन मैने कई फिल्में देखी हैं. पिछले कुछ समय से बॉलीवुड में काफी सुधार आया है. लेकिन दुख कि बात है कि बहुत से लोगों को बॉलीवुड के बारे में पता नहीं. भारत की फिल्मों का अच्छे से प्रमोशन ही नहीं हुआ है. कुछ साल पहले जैकी की फिल्म में द मिथ में मल्लिका शेरावत को लिया गया था. जैकी ने कहा कि वे चाहते हैं कि दोनों देशों के कहानीकार फिल्मकार आगे आएँ और मिलकर फिल्म बनाएँ जिसमें भारतीय नाच गाना हो और चीनी महक भी. भारतीय फिल्मों के चटख रंग ही नहीं भारतीय खाने के मिर्च-मसाले भी जैकी को पसंद हैं. जैकी ने कहा मैं ये इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि क्योंकि मैं भारत में हूँ. मुझे वाकई भारतीय खाना अच्छा लगता है. मैं चाहे हॉंगकॉंग में रहूँ या लॉस एंजेलेस में महीने में दो- तीन बार भारतीय रेस्तरां में ज़रूर जाता हूँ. मुझे पापड़ चिकन करी और बिरयानी बहुत पसंद है. जैकी चैन कई लोगों के पसंसीदा एक्शन स्टार हैं लेकिन खु़द जैकी सिलवेस्टर स्टेलॉन को अपना रोल मॉडल मानते हैं. जैकी कहते हैं कि अगर वे हॉलीवुड में हैं तो उन्हीं की वजह से. चीनी फिल्मों की बात करते हुए जैकी ने कहा कि चीन ने अपनी फिल्मों में सुधार किया और बाकी लोगों से भी सीखा और धीरे-धीरे चीनी फिल्मों का बाज़ार बढ़ता गया. यही वजह है कि अब हॉलीवुड भी चीन को तरजीह देता है और कई स्क्रिप्ट तक चीनी किरदारों के हिसाब से लिखे जाते हैं. उनका कहना था कि जैसे जैसे भारत एक बड़ा बाज़ार बनेगा भारत को भी लोग तरजीह देने लगेंगे. बात भारत-चीन के सीमा विवाद और तनावपूर्ण रिश्तों की भी उठी. इस सवाल पर जैकी पहले तो चुप रहे लेकिन फिर अपने ही अंदाज़ में बोले आप अपना पड़ोसी नहीं चुन सकते. तो क्यों न प्यार और मोहब्बत से रहें. फिल्मों गानों के ज़रिए थोड़ा प्यार बढ़ाएँ. सीमा पर एक गाना फिल्माना कैसा रहेगाजाते-जाते जैकी ने फिर दोहराया- मैं बॉलीवुड में काम करना चाहता हूँ मेरी बात ज़रा यहाँ के फिल्मकारों तक पहुँचाओ. |
| DATE: 2013-06-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1443] TITLE: पाकिस्तानी मीरा की भारतीय हीरोइनों को चुनौती |
| CONTENT: महेश भट्ट की फिल्म नज़र में पहली बार बॉलीवुड में नज़र आई पाकिस्तानी अभिनेत्री मीरा तैयार हैं अपनी एक और फिल्म भड़ास के साथ. फिल्म 28 जून को रिलीज़ होने वाली है. बीबीसी से खास बात करते हुए मीरा ने बताया कि फिल्म की कहानी शैरोन स्टोन की फिल्म बेसिक इंस्टिंक्ट से प्रेरित है. नज़र मीरा की पहली हिंदी फिल्म थी उसके बाद उन्होंने एक और हिंदी फिल्म कसक की. उसके बाद वो ग़ायब ही हो गईं. आखिर क्यों उन्हें यहां ज़्यादा काम नहीं मिला. इसके जवाब में मीरा कहती हैं बाहर से आई अभिनेत्रियों के लिए बॉलीवुड में मुक़ाम बनाना बहुत मुश्किल है. पाकिस्तानी पुरुष कलाकारों के लिए यहां फिर भी काम मिलना उतना मुश्किल नहीं है. लेकिन अभिनेत्रियों के लिए यहां बड़ी मुश्किल है. क्योंकि ये पुरुष प्रधान इंडस्ट्री है. मीरा कहती हैं कि अगर उन्हें पर्याप्त मौके दिए जाएं तो वो अपना टैलेंट साबित कर सकती हैं. मैं चाहती हूं कि प्रियंका चोपड़ा और विद्या बालन जैसी चोटी की अभिनेत्रियों के साथ पर्दे पर दिखूं ताकि लोगों को समझ में आए कि ज़्यादा टैलेंटेड कौन है. ज़रा खुल कर हंगामा हो. मीरा सलमान और सैफ़ अली ख़ान जैसे कलाकारों के साथ भी काम करना चाहती हैं. मीरा तो आगे ये भी कहती हैं कि वो कई अभिनेत्रियों की कामयाबी से हैरान हैं. उनके शब्दों में मैं भी सोचती हूं कि कटरीना कैफ को हिंदी भी नहीं आती वो अच्छी अभिनेत्री भी नहीं हैं. फिर भी ना जाने क्यों कामयाब हैं. मीरा ये भी कहती हैं कि अगर उन्हें ऐसा कोई किरदार मिलता है जिसे कहानी की मांग के हिसाब से अंग प्रदर्शन करना है तो उन्हें इसमें एतराज़ नहीं होगा. मीरा ने ये भी बताया कि उन्हें कई फिल्मों के प्रस्ताव मिलते रहे हैं लेकिन किसी ना किसी वजह से वो ये फिल्में नहीं कर पाईं. मुझे यश चोपड़ा जी ने अपनी फिल्म जब तक है जां में वो दूसरा वाला रोल ऑफर किया था. फिर इम्तियाज अली ने भी एक बार एक फिल्म का प्रस्ताव दिया था. लेकिन कुछ समस्याओं की वजह से बात बन नहीं पाई. मीरा अपनी साथी पाकिस्तानी कलाकार वीना मलिक की तारीफ करती हैं और मानती हैं कि पाकिस्तान से आने के बावजूद भारत में वीना ने जो मुक़ाम हासिल किया है वो क़ाबिले-तारीफ है. |
| DATE: 2013-06-19 |
| LABEL: entertainment |
| [1444] TITLE: शाहरुख़ के ख़िलाफ़ लिंग परीक्षण मामले में जाँच |
| CONTENT: क्या बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख़ ख़ान और उनकी पत्नी को मालूम है कि उनके यहाँ बेटा पैदा होने वाला है जन्म से पहले लिंग परीक्षण पर प्रतिबंध को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी इस मामले की जाँच कर रहे हैं. महाराष्ट्र में स्वास्थ्य मंत्री सुरेश शेट्टी ने अधिकारियों से कहा है कि वो शाहरुख खान से जुड़े मामले की छानबीन करें. सरकार ने देश में कन्या भ्रूण हत्या के बढ़ते मामलों को देखते हुए लिंग परीक्षण को अपराध घोषित किया है. एक मेडिकल एसोसिएशन ने मंत्रालय को इस बारे में पत्र लिख कर जाँच की माँग की थी. शाहरुख़ ख़ान और उनकी पत्नी की तरफ से गर्भावस्था या लिंग परीक्षण के बारे में कोई टिप्पणी नहीं आई है. शेट्टी ने पुष्टि की है कि उनके मंत्रालय को इंडियन रेडियोलॉजी एंड इमेजिंग एसोसिएशन आईआरआईए की तरफ से एक ईमेल मिला है जिसके बाद उन्होंने अपने अधिकारियों को जांच कर रिपोर्ट सौंपने को कहा है. स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि अगर जरूरी हुआ तो इस मामले में उचित कार्रवाई की जाएगी. आईआरआईए के प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया हम जाँच की माँग कर रहे हैं ताकि सच सामने आए. हम जानना चाहते हैं कि किसने किससे क्या कहाशाहरुख़ ख़ान और गौरी ख़ान के फिलहाल एक बेटी और एक बेटा हैं. अब तक वो मीडिया की इन ख़बरों पर टिप्पणी करने से इनकार करते रहे हैं जिनके अनुसार सरोगेट मदर किराए की कोख के जरिए उनके घर में तीसरा बच्चा आने वाला है और वो इस बात को जानते हैं कि वह बेटा होगा. संवाददाताओं के अनुसार हो सकता है कि ये मीडिया खबरें गलत हों या फिर शाहरुख़ और उनकी पत्नी ने ऐसे किसी देश में अल्ट्रासाउंड कराया हो जहाँ ये गैर-कानूनी नहीं है. आईआरआईए के प्रवक्ता का कहना है कि उनकी चिंता इस बात को लेकर है कि अगर जन्म से पहले लिंग परीक्षण पर रोक है तो ये नियम सब पर लागू होना चाहिए चाहे वो अमीर हो या गरीब. |
| DATE: 2013-06-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1445] TITLE: 41 साल बाद डिब्बाबंद फिल्म होगी रिलीज़ ! |
| CONTENT: साल 1972 में बनी एक फ़िल्म को अब 41 साल बाद रिलीज़ करने की तैयारियां चल रही हैं. फ़िल्म का नाम है लव इन बॉम्बे जिसमें जॉय मुखर्जी वहीदा रहमान अशोक कुमार किशोर कुमार और रहमान जैसे कलाकारों की मुख्य भूमिका है. फ़िल्म के गीत लिखे हैं मज़रूह सुल्तानपुरी ने और संगीत दिया है शंकर-जयकिशन ने. फ़िल्म में मोहम्मद रफ़ी किशोर कुमार और आशा भोंसले ने गाने गाए हैं. इसके निर्माता खुद दिवंगत जॉय मुखर्जी हैं. फ़िल्म को अब रिलीज़ करने का बीड़ा उठाया है उनकी पत्नी नीलम मुखर्जी और बेटे मोन्जॉय मुखर्जी ने. फ़िल्म के इस साल जुलाई में रिलीज़ होने की संभावना है. 12 जून को फ़िल्म का संगीत सारेगामा ने रिलीज़ किया. लेकिन सवाल ये उठता है कि फ़िल्म अब तक क्यों डब्बा बंद थी. और इसे अब क्यों रिलीज़ किया जा रहा है. बीबीसी ने नीलम और मोन्जॉय मुखर्जी से बात कर जानने की कोशिश की. नीलम ने बताया कि फ़िल्म 1972 में बनकर तैयार हो गई थी और इसे सेंसर बोर्ड ने पास भी कर दिया था. फिर फ़िल्म क्यों नहीं रिलीज़ हुई. इसके जवाब में नीलम ने कहा अब कुछ बातें थीं जिनकी वजह से फ़िल्म रिलीज़ नहीं हो पाई. हम नहीं चाहते कि उन कड़वी यादों के बारे में फिर से बात की जाय. लेकिन जॉय साहब का सपना था इस फ़िल्म को रिलीज़ करने का जो अब पूरा होने जा रहा है. वो सपना जिसे वो जीते जी पूरा नहीं कर पाए. जॉय के बेटे मोन्जॉय ने भी फ़िल्म के अब तक रिलीज़ ना होने की कोई स्पष्ट वजह नहीं बताई. मोन्जॉय कहते हैं फ़िल्म बन गई. पापा ने कई बार रिलीज़ करना चाहा. 80 और 90 के दशक में भी उन्होंने कोशिशें की लेकिन फ़िल्म रिलीज़ कर ना पाए. मैं उनसे कहता कि पापा कहां है आपकी लव इन बॉम्बे. तो वो बस मुस्कुरा देते. साल 2012 में जॉय मुखर्जी का निधन हो गया था. मोन्जॉय बताते हैं कि जॉय मुखर्जी के निधन के बाद उनकी मां ने एक बार फिर से फ़िल्म लव इन बॉम्बे की चर्चा छेड़ी. मैं वर्ली स्थित एक कोल्ड स्टोरेज गया जहां पर फिल्मों के निगेटिव को संरक्षित किया जाता है. वहां मुझे लव इन बॉम्बे का निगेटिव मिल गया. वो काफी बेहतर हालत में था. मैं हैरान रह गया. तब स्टोरेज के जो कर्ता धर्ता थे उन्होंने मुझे बताया कि पापा हर साल यहां आते और फ़िल्म के निगेटिव को साफ करवाते. तब मुझे लगा कि पापा के इस सपने को पूरा करके ही रहूंगा. मोन्जॉय ने फ़िल्म लव इन बॉम्बे के निगेटिव साफ कराए. फ़िल्म के प्रिंट्स के कलर बेहतर कराए गए. उसे डिजिटाइज़ किया गया. फ़िल्म की हीरोइन वहीदा रहमान की इस बारे में थोड़ी अलग हटकर है. वो कहती हैं मैं इस बात को लेकर हैरान हूं कि आज के जमाने में कौन देखेगा ये फ़िल्म. मुझे तो बड़ी घबराहट हो रही है. लेकिन मैं जॉय के परिवार को शुभकामनाएं देती हूं. वहीदा ने बताया कि उस दौर में वो काफी सीरियस किस्म की फ़िल्में कर रही थीं तो उनके करीबी दोस्त नरीमन ईरानी ने उन्हें कहा कि कुछ हल्की फुल्की फ़िल्में करो. जॉय ऐसे ही फ़िल्में बनाते थे तो उन्होंने उनकी इस फ़िल्म को हां कर दी. हालांकि वहीदा आगे कहती हैं मुझे पता भी नहीं कि फ़िल्म पूरी हुई या नहीं. मुझे ये तक याद नहीं कि मैंने फ़िल्म की डबिंग की या नहीं. नीलम मुखर्जी कहती हैं कि उस दौर के काफी बड़े सितारे इस फ़िल्म में हैं. उन्होंने बताया कि अशोक कुमार और किशोर कुमार जॉय मुखर्जी के मामा लगते थे. उन्होंने फ़िल्म में अहम भूमिकाएं निभाई हैं. लव इन बॉम्बे से पहले जॉय लव इन शिमला और लव इन टोक्यो जैसी रोमांटिक फ़िल्में कर चुके थे जो खासी बड़ी हिट साबित हुई थीं. जॉय मुखर्जी के बारे में वो कहती हैं मैं मानती हूं कि जॉय कोई इतने बड़े फ़िल्मकार नहीं थे कि संजीदा विषयों पर फ़िल्में बनाएं और उनमें काम करें. लेकिन वो बड़े रोमांटिक थे. उनका चेहरा भी बड़ा प्यारा किस्म का था. वो ऐसी ही हल्की फुल्की फ़िल्में बनाते थे और उनमें काम करते थे. नीलम और मोन्जॉय ने बताया कि कई वितरकों और सिनेमा हॉल मालिकों से उनकी बातचीत चल रही है. उन लोगों ने खुद इस फ़िल्म में दिलचस्पी दिखाई. जॉय मुखर्जी के परिवार को उम्मीद है कि भारतीय सिनेमा प्रेमियों के लिए ये फ़िल्म एक सौगात होगी. |
| DATE: 2013-06-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1446] TITLE: अपने बच्चों को मौका देना हमारा अधिकार: सुनील शेट्टी |
| CONTENT: जैकी श्रॉफ गोविंदा शक्ति कपूर बोनी कपूर डेविड धवन. बॉलीवुड से जुड़े ये वो चंद नाम हैं जिनके बच्चों ने या तो फिल्मों में हाल ही में प्रवेश किया है या करने वाले हैं. और ये सिलसिला नया नहीं है. हमेशा से ही माना जाता रहा कि सितारों के बच्चों के लिए फिल्मों में प्रवेश पाना बाहरी लोगों की तुलना में काफी आसान रहा है. अभिनेता सुनील शेट्टी इसमें कुछ भी ग़लत नहीं मानते. ख़ुद सुनील की बेटी फिल्मों में आने वाली हैं. उन्हें सलमान ख़ान अपनी होम प्रोडक्शन फिल्म से लॉन्च करने वाले हैं. बीबीसी से खास बात करते हुए सुनील कहते हैं ऐसा क्यों ना हो. हम लोग 20-20 साल से इंडस्ट्री में हैं. मेहनत करके अपना मुकाम बनाया है. तो हमारे बच्चों को इसका फायदा क्यों ना मिले. मुझे इसमें कुछ भी ग़लत नज़र नहीं आता. हालांकि सुनील ये भी कहते हैं कि बाहरी लोगों के लिए भी बॉलीवुड में अब रास्ते खुल रहे हैं. वो आगे कहते हैं वैसे भी इंडस्ट्री के लोगों को एक फिल्म में ज़रूर चांस मिल जाएगा. लेकिन वो अपने आपको साबित नहीं करेंगे तो उन्हें नकार भी दिया जाएगा. सुनील शेट्टी और अक्षय कुमार ने 90 के दशक में मोहरा वक़्त हमारा है और सपूत जैसी कई कामयाब फिल्मों में काम किया. फिर क्या वजह हुई कि अक्षय उनसे लोकप्रियता के मामले में कहीं आगे निकल गए. सुनील इसके जवाब में कहते हैं मैंने दिल से कई फैसले लिए. मैंने कई नए निर्देशकों के साथ भी काम किया क्योंकि मुझे वो लोग अच्छे लगे. शायद मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था. लेकिन मुझे कोई अफसोस नहीं. सुनील कहते हैं कि वो अक्षय कुमार को प्रतिस्पर्धी की नज़र से नहीं बल्कि मार्गदर्शक की तरह देखते हैं और उनसे प्रेरणा लेते हैं. सुनील के शब्दों में वैसे में अपनी हर खुशी को फिल्मों की कामयाबी से जोड़ कर नहीं देखता. मैं बाकी कलाकारों की तरह ज़्यादा पार्टियों में जाना पसंद नहीं करता. जहां मुझे दिखना चाहिए मैं वहां दिखता हूं. और मैं अपने करियर से अपने परिवार से खुश हूं. सुनील शेट्टी की आने वाली फिल्म एनिमी है जो 21 जून को रिलीज़ हो रही है. इसमें मिथुन चक्रवर्ती की भी अहम भूमिका है. |
| DATE: 2013-06-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1447] TITLE: मुझे बस एक हिट चाहिए: सोनम कपूर |
| CONTENT: रांझना में सोनम कपूर और धनुष की मुख्य भूमिका है. सोनम कपूर ने साल 2007 में संजय लीला भंसाली की फिल्म सावरिया से फिल्मों में प्रवेश किया. तब से वो कुल मिलाकर सात फिल्में कर चुकी हैं. लेकिन कामयाबी हाथ नहीं लगी. बीबीसी से खास बातचीत में उन्होंने भी इस बात को माना. सोनम कपूर कहती हैं हां मुझे एक हिट की सख्त ज़रूरत है. लेकिन सब कुछ किस्मत के हाथ में है. जब भगवान चाहेंगे तब मुझे कामयाबी मिल ही जाएगी. सोनम कहती हैं कि वो अपने पापा अनिल कपूर से भी इस बारे में सलाह लेती हैं. सोनम के शब्दों में मैं पापा से पूछती रहती हूं कि मैं कड़ी मेहनत करती हूं. बहुत ध्यान से फिल्में और अपने रोल चुनती हूं फिर भी बात क्यों नहीं बन रही है. तो वो कहते हैं बेटा धैर्य रखो. मेहनत करती जाओ. एक दिन उसका परिणाम ज़रूर अच्छा मिलेगा. सोनम के साथ आईं दीपिका पादुकोण और उनके बाद आईं सोनाक्षी सिन्हा और अनुष्का शर्मा जैसी अभिनेत्रियां भी उनसे ज़्यादा कामयाब हैं. इस तुलना के सवाल पर सोनम ने गंभीरता से जवाब दिया मैं अपने रोल के लिए इतिहास में याद रखे जाना पसंद करूंगी. ना कि हिट और फ्लॉप से. लोग दस सालों बाद मेरे किरदार याद रखेंगे. मैं चाहती हूं कि मुझे एक गंभीर कलाकार के तौर पर जाना जाय. सोनम कपूर की आने वाली फिल्म है रांझना जिसमें वो तमिल फिल्मों के मशहूर स्टार धनुष के साथ काम कर रही हैं. धनुष की ये पहली हिंदी फिल्म है. सोनम मानती हैं कि इस वजह से फिल्म को हिट कराने की ज़्यादा ज़िम्मेदारी ख़ुद उन पर ही है. सोनम कपूर रांझना में ज़ोया नाम की एक लड़की का किरदार निभा रही हैं. फिल्म में उनका किरदार का सफर 15 साल की आयु से 26 साल तक का है. उन्होंने बताया कि 15 साल की लड़की का रोल निभाने के लिए उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म गुड्डी से प्रेरणा ली. सोनम कहती हैं मैं जया बच्चन जी की बहुत बड़ी प्रशंसक हूं. इसलिए इस किरदार को निभाने का प्रस्ताव जब मेरे पास आया तो मुझे उनकी फिल्म गुड्डी सबसे पहले याद आई जिसमें उन्होंने एक स्कूल की लड़की का किरदार निभाया है. रांझना में ए आर रहमान ने संगीत दिया है. फिल्म के निर्देशक आनंद एल राय हैं जो इससे पहले तनु वेड्स मनु जैसी हिट फिल्म का निर्देशन कर चुके हैं. फिल्म शुक्रवार 21 जून को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2013-06-17 |
| LABEL: entertainment |
| [1448] TITLE: फ़िल्म उद्योग में मंदी का ख़तरा: स्पीलबर्ग |
| CONTENT: हॉलीवुड के जाने माने निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग और जॉर्ज लुकास ने आशंका जताई है कि फ़िल्म उद्योग पर मंदी के बादल मंडराने का ख़तरा है. उनका कहना है कि हॉलीवुड अब ज़्यादातर बड़े बजट वाली फ़िल्मों पर निर्भर करने लगा है जिसके कारण आने वाले दिनों में छोटे बजट की फ़िल्मों को थियेटर तक पहुंचाने में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना होगा. एक कार्यक्रम में स्पीलबर्ग ने कहा कि फ़िल्म लिंकन को टीवी नेटवर्क एचबीओ के लिए बनाया गया था क्योंकि सिनेमाघरों में इसे रिलीज़ करने में काफ़ी संघर्ष करना पड़ा था. स्पीलबर्ग का कहना था थियेटर में फ़िल्में रिलीज़ करने का रास्ता दिन ब दिन तंग होता जा रहा है. जॉर्ज लुकास ने कहा कि वो सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली फ़िल्मों के टिकट का दाम निर्धारित करने वाले एक मॉडल के बारे में विचार कर रहे हैं जहां कम फ़िल्में रिलीज़ की गई और वो लगभग एक साल तक सिनेमाघरों में लगीं रहीं और फिर फ़िल्म के आधार पर उनके टिकट के दाम बढ़ाए गए. ब्रिटेन में हॉलीवुड फ़िल्म वितरण संगठन फ़िल्म डिस्ट्रिब्यूटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष लॉर्ड डेविड पुटनैम ने न्यूज़बीट से एक इंटरव्यू में कहा कि इसमें बदलाव की ज़रूरत है. उनका कहना था हर फ़िल्म की मार्केटिंग की अपनी चुनौती है और ये सोचना कि एक ही नियम सब पर लागू है सच्चाई से बिल्कुल परे है. लॉर्ड पुटनैम का कहना है फ़िल्म उद्योग को फ़िल्म और उसके दर्शकों के बीच बनावटी बाधा नहीं खड़ी करनी चाहिए. फ़िलहाल जो तरीक़े अपनाए जा रहे हैं वे लंबे समय तक चलने वाले नहीं हैं. लॉर्ड पुटनैम के अनुसार फ़िल्म उद्योग को ऐसे नियम नहीं बनाने चाहिए जिससे किसी फ़िल्म को नुक़सान हो. उनका कहना है कि हर फ़िल्म का आकलन उसकी योग्यता के आधार पर किया जाना चाहिए. लॉर्ड पुटमैन आगे कहते हैं असल बिंदु ये है कि किसी फ़िल्म की आमदनी कैसे बढ़ाई जाए. किसी दूसरी फ़िल्म को इसलिए नुक़सान सहना चाहिए क्योंकि कोई और दूसरी फ़िल्म अच्छा कर रही है इस तरह की सोच का कोई औचित्य नहीं है. लॉर्ड पुटनैम के अनुसार उनका काम ग्राहकों को ख़ुश रखना है और इसके लिए सबसे अहम बात ये है कि फ़िल्म के दर्शकों को ये अधिकार होना चाहिए कि वो जो फ़िल्म जहां देखना चाहें वहां देख सकें. |
| DATE: 2013-06-16 |
| LABEL: entertainment |
| [1449] TITLE: टीवी पर्दे के पीछे दाग, गंदगी और तनाव |
| CONTENT: पिछले दिनों टीवी अभिनेता अबीर गोस्वामी का सिर्फ 37 साल की उम्र में निधन हो गया था. अबीर जिम में व्यायाम कर रहे थे कि तभी दिल का दौरा पड़ा और अस्पताल पहुंचने के चंद लम्हों बाद ही उनकी मौत हो गई. तब कई टीवी कलाकारों ने टेलीविजन इंडस्ट्री के तौर तरीकों पर सवाल उठाए थे और आरोप लगाया था कि यहां कलाकारों के लिए माकूल माहौल नहीं होता. टीवी सीरियल बालिका वधू में केंद्रीय भूमिका निभाने वाली कलाकार प्रत्यूषा बनर्जी ने इस धारावाहिक से हटने का फ़ैसला किया क्योंकि उनका मानना था कि लगातार काम करने की वजह से उनकी सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा था. मीडिया में आई कई रिपोर्ट्स में टीवी कलाकारों ने शूटिंग के दौरान ख़राब परिस्थितियों ख़राब खाना परोसे जाने और गंदगी की शिकायत की. क्या वाकई टीवी उद्योग कलाकारों के लिए क्रूर है. क्या लंबी-लंबी शिफ्ट में काम करने की वजह से उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है क्या डेली सोप में काम करने वाले कलाकारों को निर्माताओं और चैनलों की ज़्यादतियों का शिकार होना पड़ रहा हैचूंकि ज़्यादातर टीवी कार्यक्रमों का प्रसारण रोज़ाना होता है इसलिए इन कलाकारों से लगातार मशीन की तरह काम लिया जा रहा है. क्योंकि सास भी कभी बहू थी कसौटी ज़िंदगी की और अदालत जैसे कई शो में काम कर चुके जाने-माने कलाकार रोनित रॉय ने बीबीसी से बात करते हुए कहा टीवी पर इतने ज़्यादा कार्यक्रम आ रहे हैं कि उससे काम करने की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है. सेट पर जो आवश्यक साफ-सफाई होनी चाहिए टॉयलेट साफ-सुथरे होने चाहिए कलाकारों के आराम के लिए जो सुविधाएं होनी चाहिए. वो नहीं होता. रोनित कहते हैं कि इतने ज़्यादा कार्यक्रम बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में स्टूडियो उपलब्ध नहीं है इसलिए ढेर सारे मेकशिफ्ट स्टूडियो बनाए जाते हैं जहां बारिश तक से बचने के लिए सुविधा नहीं होती. टीवी कलाकार हितेन तेजवानी कहते हैं कि सेट पर कलाकारों को मुहैया कराया जाने वाला खाना उच्च स्तरीय नहीं होता. हितेन के मुताबिक खाना देने वाले लोगों के पैसे नहीं बढ़ाए जाते. तो एक समय के बाद वो खाने की क्वालिटी के साथ समझौता करना शुरू कर देते हैं. कई बार आधी पकी रोटियां होती हैं. चावल में स्टार्च मिला दिया जाता है ताकि वो ज़्यादा मात्रा में दिखे और कम खाकर ही लोगों का पेट भर जाए. हितेन तेजवानी और रोनित रॉय दोनों का कहना है कि इन्हीं वजहों से वो सेट का खाना पसंद नहीं करते और घर से खाना लेकर आते हैं. फिल्म और टीवी कलाकारों के हितों की देख-रेख करने वाली संस्था फ़ेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लायीज़ एफडब्ल्यूआईसीई के महासचिव दिनेश चतुर्वेदी कहते हैं फ़िल्म सिटी जैसे इतने बड़े और पुराने स्टूडियो तक में कलाकारों के लिए सुविधाएं नहीं होतीं. टॉयलेट गंदे पड़े रहते हैं. महिला कलाकारों के लिए कई बार चेंजिंग रूम नहीं होते. आग से बचाव के पर्याप्त उपाय नहीं होते. दिनेश कहते हैं कि हालांकि उनकी संस्था के दखल के बाद अब स्थितियों में सुधार हो रहा है लेकिन अब भी काफी कुछ करने की गुंजाइश बाकी है. दिनेश कहते हैं कि उनकी संस्था ये भी देखती है कि कलाकारों से एक शिफ्ट में 12 घंटे से ज़्यादा काम ना लिया जाए. हालांकि खिचड़ी साराभाई वर्सेस साराभाई और बा बहू और बेबी जैसे सीरियल के निर्माता जे डी मजीठिया की राय इस बारे में अलग है. वो कहते हैं मैं मानता हूं कि सेट पर साफ़-सफ़ाई होना बहुत ज़रूरी है. लेकिन ये नहीं कहा जा सकता कि हालात इतने ख़राब हैं कि लोगों की सेहत ख़राब हो. काम करने के घंटे भी ऐसे नहीं होते कि आपकी ज़िंदगी के लेने के देने पड़ जाएँ. आपको अपने काम करने के घंटों के बीच अपने शरीर को सही तरीके से मैनेज करना आना चाहिए. इस संबंध में हमने कई चैनलों से बात करके उनका पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन कोई भी हमसे बात करने को सहमत नहीं हुआ. तो ज़रूरी नहीं कि टीवी पर आने वाले तमाम शोज़ में चमकदार साड़ियां पहने गहरा मेकअप लगाए चमकते-दमकते चेहरों के पीछे की दुनिया भी इतनी ही ख़ूबसूरत हो. उसके पीछे की सच्चाई कुछ और है. |
| DATE: 2013-06-14 |
| LABEL: entertainment |
| [1450] TITLE: पैसों की तंगी, फिल्म प्रमोशन नेट पर |
| CONTENT: शाहरुख ख़ान की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस का गुरूवार को कई प्रमुख समाचार पत्रों में दो-तीन पेज पेज में विज्ञापन छापा गया. शाहरुख ख़ान की कंपनी रेड चिलीज़ निर्मित इस फिल्म के समाचार पत्रों में पहले ही विज्ञापन पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए. अभी तो ये शुरुआत है. आने वाले दिनों में पूरी संभावना है कि फिल्म का प्रचार पत्रिकाओं में टीवी पर और बड़े बड़े होर्डिंग्स लगाकार किया जाएगा और इसके लिए भारी भरकम बजट का प्रावधान किया गया है. अपनी फिल्म के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडियम में प्रचार पर करोड़ों रुपए खर्च करना इस दौर की ज़रूरत बन गई है. लेकिन आने वाली फिल्म शिप ऑफ थीसस का प्रचार पैसों की कमी की वजह से सिर्फ इंटरनेट पर किया जा रहा है. फिल्म के निर्माता-निर्देशक आनंद गांधी हैं और इसे आमिर ख़ान की पत्नी किरण राव प्रस्तुत कर रही हैं. बीबीसी से ख़ास बातचीत में किरण राव ने कहा इस दौर में जब लोगों के पास आइपैड लैपटॉप और मोबाइल होना आम बात हो गई है हमने सोचा कि इंटरनेट पर फिल्म का प्रमोशन करना अच्छा आइडिया है. इसलिए हमने इसका ट्रेलर सीधे यूट्यूब पर लॉन्च किया. किरण ने ये भी बताया कि निर्माता आनंद गांधी ने बड़े मुश्किल से ये फिल्म बनाई और उन लोगों के पास पैसे की तंगी थी. इसलिए किरण के पति सुपरस्टार आमिर ख़ान ने भी ये आइडिया दिया कि फिल्म का प्रचार इंटरनेट पर करना एक अच्छा आइडिया है. शिप ऑफ थीसस कहानी है तीन लोगों की और उनके संघर्षों की दास्तां की. किरण राव कहती हैं इस तरह की फिल्मों के लिए निर्माता मिलने बड़े मुश्किल होते हैं क्योंकि हर किसी को पैसे कमाने होते हैं. इसलिए अब ऐसी फिल्मों के रिलीज़ और उनके प्रचार-प्रसार के लिए ऐसे ही अनोखे तरीके अपनाने होंगे. शिप ऑफ थीसेस 19 जुलाई को रिलीज़ होगी. इसे यूटीवी मोशन पिक्चर्स रिलीज़ कर रही है. किरण राव ख़ुद आमिर ख़ान की मुख्य भूमिका वाली फिल्म धोबी घाट का निर्देशन कर चुकी हैं. अब बतौर निर्देशक उनकी अगली फिल्म कौन सी होगी. ये पूछने पर किरण कहती हैं अब मेरा ज़्यादातर समय मेरे बेटे आज़ाद की देखभाल में और उसे खिलाने में जाता है. इसलिए मुझे कुछ लिखने का वक़्त नहीं मिल पा रहा है. जैसे ही मुझे टाइम मिलेगा तो मैं लिखूंगी और उसका निर्देशन करूंगी क्योंकि मुझे ख़ुद की लिखी फिल्मों का ही निर्देशन करना ज़्यादा अच्छा लगता है. इसके अलावा किरण ने आमिर ख़ान के बड़े बेटे जुनैद के बारे में भी बातें कीं. जुनैद आमिर और उनकी पहली पत्नी रीना के बेटे हैं. जुनैद के फिल्मों में कदम रखने के बारे में उन्होंने कहा जब हम मिलते हैं तो काम की बातें नहीं करते. ये फैसला उन्हें खुद करना है. वैसे वो फिल्म पीके पर काम कर रहे हैं और उन्हें देखकर लगता तो है कि वो फिल्म निर्माण की प्रक्रिया में ख़ासी दिलचस्पी रखते हैं. फिल्म पीके का निर्देशन राजकुमार हीरानी कर रहे हैं और इसमें आमिर ख़ान की मुख्य भूमिका है. जुनैद ख़ान फिल्म में बतौर सहायक निर्देशक काम कर रहे हैं. |
| DATE: 2013-06-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1451] TITLE: मिल्खा को किसिंग सीन से समस्या नहीं: प्रसून जोशी |
| CONTENT: भारत के जाने-माने एथलीट मिल्खा सिंह के जीवन पर बन रही एक फिल्म के किसिंग सीन पर क्या ख़ुद मिल्खा सिंह को कोई आपत्ति हुई. ये सवाल बीबीसी ने पूछा फिल्म के लेखक प्रसून जोशी से. दरअसल मिल्खा सिंह के जीवन पर आधारित इस फिल्म में मिल्खा सिंह की केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं फरहान अख़्तर. फिल्म का निर्देशन कर रहे हैं राकेश ओमप्रकाश मेहरा. फिल्म में फरहान अख़्तर और एक ऑस्ट्रेलियाई अभिनेत्री के बीच एक किसिंग सीन फिल्माया गया है. और मीडिया में आई कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक ख़ुद मिल्खा सिंह इस बात से ख़ुश नहीं थे. लेकिन फिल्म के लेखक प्रसून जोशी ने इन बातों को ग़लत करार दिया. उन्होंने कहा मुझे नहीं लगता मिल्खा सिंह जी को कोई आपत्ति हुई. हमारे बीच सब कुछ ठीक है. प्रसून आगे कहते हैं हमने फिल्म में कुछ जगहों पर कल्पना का सहारा ज़रूर लिया है लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं दिखाया जो मिल्खा सिंह जी के चरित्र से मेल ना खाता हो. और जब किसी शख़्स पर कोई फिल्म बनती है तो उसके हर पहलू को दिखाना पड़ता है. ख़ुशी उल्लास ग़म उसके प्रेम प्रसंग वगैरह. हमने मिल्खा जी के खेल जीवन के अलावा उनके इंसानी पहलू को भी दिखाने की कोशिश की है. प्रसून के मुताबिक़ फिल्म की टीम मिल्खा सिंह पर कोई बोरिंग डॉक्यूमेंट्री नहीं बनाना चाहती थी. हम एक मनोरंजक फिल्म बनाना चाहते थे. जिसे देखकर लोगों को मज़ा आए. हम इसे कोई उपदेशात्मक तरीके से नहीं बनाना चाहते थे. प्रसून जोशी अपने आपको खुशकिस्मत मानते हैं कि मिल्खा सिंह ने इस विषय पर उन्हें फिल्म बनाने की पूरी छूट दी और साथ ही हर तरह का सहयोग भी दिया. फिल्म जुलाई में रिलीज़ हो रही है. मिल्खा सिंह ने पहली बार 1956 के मेलबोर्न ओलंपिक्स में हिस्सा लिया था. उसके बाद उन्होंने 1958 के एशियाई खेलों में 200 और 400 मीटर रेस में स्वर्ण पदक जीता. 1960 के रोम ओलंपिक्स में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए 400 मीटर रेस के फाइनल में जगह बनाई और फिर चौथा स्थान हासिल किया. अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन करने के लिए उन्हें फ्लाइंग सिख का ख़िताब दिया गया. |
| DATE: 2013-06-12 |
| LABEL: entertainment |
| [1452] TITLE: रफ़ी के 'यमला पगला दीवाना' रिकॉर्ड करने का क़िस्सा |
| CONTENT: पिछले हफ्ते धर्मेंद्र सनी देओल और बॉबी देओल की फिल्म यमला पगला दीवाना-2 रिलीज़ हुई. इस फिल्म का नाम साल 1975 में रिलीज़ हुई धर्मेंद्र की ही फिल्म प्रतिज्ञा के गाने मैं जट यमला पगला दीवाना से प्रेरित है. जिसका संगीत मशहूर जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने दिया था और इसे गाया था मोहम्मद रफ़ी ने. इस गाने को लिखा था आनंद बक्शी ने. लेकिन क्या आपको पता है कि इस सुपरहिट गाने को कैसे रिकॉर्ड किया गया था. ये बताया बीबीसी को ख़ुद संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के प्यारेलाल ने. प्यारेलाल ने बताया कि इस गाने की रिकॉर्डिंग के वक़्त मोहम्मद रफ़ी को विदेश दौरे पर जाना था. वो हर साल मई में डेढ़ महीने के लिए विदेश यात्रा पर जाते थे. उनके जाने में सिर्फ एक ही दिन बचा था. तब प्यारेलाल ने रफी से पूछा क्या आप बीच में वापस आकर गाना रिकॉर्ड कर सकते हो. इसके जवाब में मोहम्मद रफ़ी ने कहा नहीं. मैं बीच में नहीं आ सकता. आपको जो रिकॉर्डिंग करवानी है. अभी करवा लीजिए. तब लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने फैसला किया कि सभी बची हुई रिकॉर्डिंग एक ही दिन में करानी पड़ेगी. प्यारेलाल ने बीबीसी को बताया हमने मैं जट यमला पगला दीवाना समेत पांच गाने एक साथ रफी साहब से रिकॉर्ड कराए. और रफी साहब ने इतना कम वक़्त होते हुए भी हर गाने को पूरा मन लगाकर तन्मयता से गाया. और मैं जट यमला पगला दीवाना तो सुपरहिट साबित हुआ. प्यारेलाल बताते हैं कि गायक मोहम्मद रफी उस दिन सुबह 10 बजे रिकॉर्डिंग के लिए आए और अगले दिन सुबह तीन बजे तक रिकॉर्डिंग करते रहे. फिर सुबह छह बजे वो फ्लाइट पकड़कर विदेश दौरे के लिए गए. प्यारेलाल कहते हैं इतना समर्पण इतनी लगन भला कहां देखने को मिलती है. प्यारेलाल बताते हैं कि अभिनेता धर्मेंद्र के साथ उनकी और लक्ष्मीकांत की ख़ासी मित्रता थी. और धर्मेंद्र की ज़्यादातर फिल्मों में उन्हीं का संगीत हुआ करता था. |
| DATE: 2013-06-12 |
| LABEL: entertainment |
| [1453] TITLE: नहीं रहे प्रियंका चोपड़ा के पिता |
| CONTENT: अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के पिता डॉक्टर अशोक चोपड़ा का निधन हो गया है. वो कैंसर से पीड़ित थे. सोमवार दोपहर करीब 12-30 बजे उन्होंने मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में अंतिम सांस ली. अस्पताल के सूत्रों ने बीबीसी को बताया कि वो पिछले 17 दिनों से अस्पताल में भर्ती थे. उन्हें कुछ सालों पहले ही कैंसर का पता चला था. डॉक्टर अशोक चोपड़ा भारतीय सेना में डॉक्टर थे. प्रियंका अपने पिता के बहुत करीब थीं. अपने ट्विटर अकाउंट में भी उन्होंने अपने परिचय में डैडीज़ गर्ल लिखा है. प्रियंका ने कुछ दिनों पहले अस्पताल में अपने पिता के साथ अपनी एक तस्वीर ट्विटर पर शेयर भी की थी. प्रियंका ने उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए बीते दिनों एक पूजा का भी आयोजन किया था. इसके अलावा वैंकूवर में हुए एक फिल्म अवॉर्ड समारोह में वो प्रियंका चोपड़ा के साथ गए थे. प्रियंका को उस समारोह में फिल्म बर्फी के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था. तब प्रियंका ने अपने पिता को स्टेज पर बुलाया था और उन्होंने प्रियंका की तरफ से ये अवॉर्ड ग्रहण किया था. उस दौरान प्रियंका चोपड़ा ख़ासी भावुक हो गईं थीं. अशोक चोपड़ा को गाने का भी बहुत शौक था. |
| DATE: 2013-06-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1454] TITLE: राजनीतिक फ़िल्म नहीं है सत्याग्रह: प्रकाश झा |
| CONTENT: राजनीति और आरक्षण के बाद प्रकाश झा तैयार हैं अपनी आने वाली फिल्म सत्याग्रह के साथ. कहा जा रहा है कि फिल्म अन्ना हज़ारे की भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाई गई मुहिम पर आधारित है. लेकिन बीबीसी से ख़ास बातचीत करते हुए प्रकाश झा कुछ और ही बोले. जब उनसे मैंने पूछा कि राजनीति और आरक्षण के बाद अब सत्याग्रह. क्यों आपका रुझान सिर्फ ऐसे राजनीतिक विषयों पर ही ज़्यादा है तो प्रकाश झा ख़ासे उत्तेजित हो गए. अपने शांत स्वभाव के लिए जाने जाने वाले प्रकाश भड़कते हुए बोले सत्याग्रह राजनीतिक विषय पर आधारित नहीं है भाई. ये एक पिता-पुत्र की कहानी है. इसकी पृष्ठभूमि में हैं भारत के युवा और मध्यमवर्ग का आंदोलन. ऐसी बातों के खिलाफ इस वर्ग का गुस्सा जो उसके जीवन को सीधे प्रभावित कर रही हैं. क्या ऐसे विषय बड़े शहरों में रहने वाले मल्टीप्लेक्स जाने वाले युवा को आकर्षित कर पाएंगे. प्रकाश झा बोले क्यों नहीं. यही युवा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में हिस्सा लेता है. इंडिया गेट जाकर कैंडल लाइट मार्च करता है तो ये विषय उसे प्रभावित क्यों नहीं करेगा. अमिताभ बच्चन ही लीड रोल के लिए क्यों इसके जवाब में प्रकाश झा ने कहा क्यों नहीं. वो बेहतरीन कलाकार हैं. लेजेंड हैं. उनके करोड़ों प्रशंसक हैं और सबसे बड़ी बात तो ये कि ये रोल उनके व्यक्तित्व पर बिलकुल फबता है. उन्हें रोल पसंद आया. तो फिर भला अमिताभ क्यों नहीं. प्रकाश झा कहते हैं कि इतने सालों बाद भी अमिताभ के अंदर वही भूख कायम है. वो किसी भी सीन में थोड़ी बहुत ऊंच-नीच हो जाए तो चितिंत हो जाते हैं. मेरे ही नहीं किसी के साथ भी उनकी बॉन्डिंग शानदार होगी. खबरें ये भी थीं कि अजय देवगन के साथ फिल्म राजनीति के दौरान उनके कुछ मतभेद हो गए थे. झा ने इन बातों को भी दरकिनार करते हुए कहा ऐसा कुछ भी नहीं था. इसी वजह से वो दोबारा मेरे साथ काम कर रहे हैं. राजनीति में उन्होंने बेहतरीन काम किया है. भला वो क्यों मुझसे नाराज़ होंगे. हमारे हमेशा से शानदार संबंध हैं. सत्याग्रह में अमिताभ बच्चन अजय देवगन और करीना कपूर की मुख्य भूमिका है. फिल्म अगस्त में रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2013-06-10 |
| LABEL: entertainment |
| [1455] TITLE: क्या वाकई में 'क्रूर' है बॉलीवुड? |
| CONTENT: जिया ख़ान की मौत का सच अभी तक सामने नहीं आया है लेकिन उनके जाने से बॉलीवुड के कई अंतहीन संघर्षों की कहानियां चर्चा का विषय बन गई है. फिल्म निशब्द में जिया को पहला ब्रेक देने वाले रामगोपाल वर्मा ने एक अख़बार में लिखा मैं बेफकूफ था कि तुम्हे धैर्य रखने को कहता रहा उसे जो पिछले छह सालों से सिर्फ और सिर्फ इंतज़ार कर रही थी काम मिलने का इंतज़ार. ग्लैमर और ख़ासतौर पर बॉलीवुड की दुनिया के लिए कहा जाता है कि छह क्या कई सालों के इंतज़ार के बाद भी काम मिलना आसान नहीं होता. लेकिन क्या बॉलीवुड वाकई में इतना क्रूर है कि महज़ पच्चीस साल की उम्र में हार मान ली जाए और ग्लैमर की दुनिया में असफलता का डर केवल अभिनेत्रियों को ही खाए जाता है आज के दौर के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में से एक नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी चालीस साल के होने वाले हैं और उन्हें अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाने में दस साल से भी ज़्यादा लग गए. आमिर खान की फिल्म सरफरोश में नवाज़ ने हवालात में बंद एक अपराधी का रोल निभाया था जो तीस सेंकड से भी कम का था. मुन्नाभाई एमबीबीएस में सुनील दत्त की जेब काटने वाले शख़्स का रोल नवाज़ ने निभाया था जो तीस सेंकड से थोड़ा सा बड़ा था दो मिनट का था. 15 सेंकड से 3 घंटे के रोल तक आने में नवाज़ को काफी साल लग गए लेकिन इतना धैर्य रखना क्या सबके बस की बात है फिल्म निर्देशक सुधीर मिश्रा कहते हैं नौजवान लोग जब यहां आते हैं तो तैयार नहीं होते रिजेक्शन के लिए. उनको सपनों की दुनिया दिखती है जहां बहुत पैसा है ख़्वाब बहुत होते हैं और उसे संभालना बड़ा मुश्किल होता हैं. कई बार अकेलापन होता है एक अलग शहर का और अगर सही राय ना मिलें तो ये सब मुश्किलें तो आती हैं. सुधीर के मुताबिक बॉलीवुड में क्या ग्लैमर की पूरी दुनिया में लोगों को कोई समझाने वाला नहीं होता कि अपने दोस्तों के इर्द-गिर्द रहिए अपना बैकअप प्लान बनाकर चलिए अपने हुनर पर ध्यान लगाओ परेशान मत हो ऐसे में आप भावनात्मक तरीके से संभले ना हो तो बात बिगड़ती है. इंडस्ट्री में अपने शुरुआती दिनों के बारे में अभिनेत्री जूही चावला कहती हैं मैं अपने संघर्षों की बात सबके सामने नहीं लाती हूं. मैं कुछ ऐसे दर्दनाक हादसों से गुज़री हूं कि शायद मैं हिम्मत हार जाती लेकिन ख़ैर मैं इस बारे में बात ही नहीं करना चाहती. वहीं रॉक ऑन और फिराक़ जैसी फिल्मों में अपने सहज अभिनय के लिए पहचानी जाने वाली अभिनेत्री शहाना गोस्वामी के मुताबिक सिर्फ फिल्मों को क्यों दोष दिया जाए ऐसी दिक्कतें तो हर क्षेत्र में है. शहाना कहती हैं देखिए ये एक क्रिएटिव काम है कुछ कॉरपोरेट जैसा तो है नहीं कि एक सीढ़ी के बाद दूसरी सीढ़ी चढ़नी होगा. यहां तो आप अपनी पसंद से आते हैं और सब कुछ आपके निर्णय पर निर्भर करता है. आपको सोचना है कि इस मोड़ पर मुझे इस किस्म का काम मिल रहा है ये मुझे करना है या नहीं. लेकिन अगर बात इतनी ही आसान है तो क्यों पैंतालीस पार कर चुके सलमान और शाहरुख़ अभी भी बॉक्स ऑफिस पर राज कर रहे हैं. वहीं उनके बाद आई ऐश्वर्या और रानी मुखर्जी अपने करियर के ढलान पर हैकहते हैं कि जब हीरोइन तीस पार कर लेती है तो उसके अभिनय से ज़्यादा उसकी झुर्रियों की चर्चा ज़्यादा की जाती है. सुधीर कहते हैं लड़कियों को ग्लैमर के रुप में ज़्यादा देखा जाता है. जब एक्टर की तरफ देखते हैं तो कहते हैं कि क्या एक्टिंग करता है लेकिन लड़की की तरफ देखेंगे तो उसके अभिनय की नहीं उसकी खूबसूरती की बात ज़्यादा करते हैं. ये तो होता है जैसा समाज है वैसी ही इंडस्ट्री है. फिल्मों में खबूसूरती कितनी अहमियत रखती है इसका अंदाज़ा शबाना आज़मी की इस बात से लगा लीजिए जो उन्होंने बीबीसी को बताई थी. शबाना ने बताया मेरे दांत थोड़े उभरे हुए हैं तो जब मैंने अपने करियर की शुरुआत की उस वक़्त जो फ़िल्मी पत्रिकाएं आती थी उनमें मेरे दांतों का बड़ा मज़ाक उड़ाया जाता था. मैं अपने दांतों को लेकर अपनी हंसी को लेकर बहुत ही झिझकने लगी थी. शहाना के मुताबिक अब वक्त बदल रहा है पहले जैसा हाल नहीं है. हां ये हो सकता है कि उम्र के बाद काम अलग किस्म का मिलने लगे लेकिन देखिए ना गुलाब गैंग जैसी फिल्म भी बन रही है जहां अपने वक्त की दो बड़ी हीरोइन जूही और माधूरी काम कर रही हैं. हमारे पास चित्रांगदा और पूर्णा जगन्नाथ भी है जो कि एक मां है. असल ज़िंदगी हो या फिल्में हीरो हो या हीरोईन दो मिनट के रोल का संघर्ष हो या फिर शीर्ष का सितारा बने रहने की जद्दोजहद शिखर पर वही पहुंचा है जो मुश्किलों से उसी तरह निपटता है जिस तरह फिल्म का हीरो गुंडों को पीटता है. सुधीर मिश्रा की माने तो अगर बॉलीवुड एक क्रूर इंडस्ट्री है तो यही वो जगह है जहां लोगों को जल्दी माफ भी कर दिया जाता है. यहां शुक्रवार को सब तय होता है. जो यहां गिरते हैं वो संभलते भी हैं. |
| DATE: 2013-06-08 |
| LABEL: entertainment |
| [1456] TITLE: मैंने चोरी नहीं की: अमित त्रिवेदी |
| CONTENT: अगर आप नई हिंदी फिल्मों के गाने सुनते हैं तो अमित त्रिवेदी का नाम शायद आपने सुना होगा. आमिर फिल्म से शुरुआत करने वाले अमित फिलहाल बॉलीवुड के व्यस्ततम संगीतकारों में से एक हैं. देव डी के सुपरहिट संगीत से अमित ने कई पुरस्कार जीते और साथ ही फिल्म इंडस्ट्री की नज़रों में भी आ गए. वर्तमान में अमित घनचक्कर और लुटेरा जैसी फिल्मों में संगीत दे रहे हैं लेकिन जैसा कि कलाकारों के साथ अक्सर होता है अमित के संगीत पर चोरी का आरोप लगाया जा रहा है. दरअसल अमित की नई फिल्म लुटेरा का थीम संगीत ब्रिटिश संगीतकार रेचेल पॉर्टमैन की धुन से काफी मेल खा रहा है. बीबीसी से बातचीत में अमित ने कहा हुआ यूं कि एक साल पहले मैंने ये धुन बनाई थी किसी और गाने के लिए लेकिन लुटेरा के निर्देशक विक्रमादित्य को ये इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने कहा कि इसे फिल्म का थीम संगीत बनाते हैं. लेकिन जैसे ही ये रिलीज़ हुआ तो यूट्यूब वगैरह पर मैंने लोगों के कमेंट पढ़े कि अमित त्रिवेदी चोर है. ये धुन तो रेचेल पॉर्टमैन की है. अमित कहते हैं ये सब पढ़कर मैं तो हिल गया विक्रम और फिल्म के निर्माता अनुराग कश्यप भी चकरा गए. फिर हमें समझ आया कि दरअसल रेचेल के गीत वन डे की शुरुआती धुन का नोट वैसे तो अलग है लेकिन एक आम आदमी अगर उसे सुने तो वो एक जैसा लगेगा. अपने ऊपर से इस आरोप को हटाने के लिए अमित ने बताया कि उन्होंने रेचेल के घर फोन किया और उन्हें एक ईमेल भी भेजा. ईमेल के बारे में अमित ने कहा ईमेल में मैने पूरी बात लिखी कि किस तरह महज़ संयोग है कि उनकी और मेरी धुन मिलती-जुलती है. मैंने तो उनसे चार्ज भी पूछ लिया था लेकिन उनका कोई जवाब ही नहीं आया और इसलिए मामला वैसे ही रह गया. इस पूरी घटना में कई लोगों ने अमित की तुलना प्रीतम और अनु मलिक से भी कर डाली जिन पर समय समय पर धुन चुराने के आरोप लगते रहे हैं. हालांकि जब अमित से इस बारे में पूछा गया तो जवाब मिला हां मैंने कमेंट पढ़े थे जहां लोगों ने प्रीतम और अनु मलिक से मेरी तुलना की थी. हालांकि मुझे ये दोनों संगीतकार बहुत पसंद है लेकिन फिर भी मैं लोगों की प्रतिक्रिया से काफी सदमे में था. अपनी बात पूरी करते हुए अमित ने कहा देखिए दुनिया में केवल सात सुर है और कौन से कोने में किसने क्या धुन बनाई है और किस तरह वो किसी और से मिलती है ये पता करना मुश्किल है. इस धुन का मिलना ये मेरी क्या किसी की भी गलती नहीं है. अमित के अनुसार वो तो जानते भी नहीं थे कि रेचेल पॉर्टमैन नाम की कोई संगीतकार है. रेचेल ने कई अंग्रेज़ी फिल्मों के लिए धुने बनाई हैं औऱ 1996 में फिल्म एमा के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ कॉमेडी स्कोर का अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है. वहीं अमित ने वेकअप सिड काय पो चे आयशा और उड़ान जैसी फिल्मों का संगीत दिया है. |
| DATE: 2013-06-07 |
| LABEL: entertainment |
| [1457] TITLE: मिस वर्ल्ड में बिकनी नहीं पहनेंगी सुंदरियां |
| CONTENT: मिस वर्ल्ड 2013 की प्रतिभागियों को इस बार बिकनी राउंड से गुज़रना नहीं पड़ेगा. हर साल की तरह इस बार भी सितंबर में इस प्रतियोगिता का आयोजन किया जाएगा जिसकी मेज़बानी इंडोनेशिया करेगा. एक मुस्लिम-बहुल देश में बिकनी राउंड शायद परेशानी का सबब बन सकता है यही सोचकर आयोजकों ने ऐसा फैसला लिया है. समाचार एजेंसी एएफपी से बातचीत में मिस वर्ल्ड की अध्यक्ष जुलिया मोरली ने ज़ोर देकर कहा है कि कार्यक्रम में कोई भी प्रतिभागी बिकनी नहीं पहनेगी. जुलिया कहती हैं हम ऐसी किसी परिस्थिति को पैदा नहीं करना चाहते जिससे कोई मुसीबत में पड़े या बेइज़्जती महसूस करे. हम हर उस देश की संवेदनशीलता का सम्मान करते हैं जो इस प्रतियोगिता में भाग लेता है. इस प्रतियोगिता में दुनिया भर से 137 सुंदरियां भाग लेंगी जो बीच सेक्शन के लिए अब बिकनी की जगह पांरपरिक पहनावे में नज़र आएंगी. हालांकि आयोजकों द्वारा लिए गए इस फैसले के बावजूद कुछ इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों ने कहा है कि वो इस अनैतिक सौदर्य प्रतियोगिता को नहीं होने देंगे. हिज़बुत-तहरीर संगठन ने कहा है कि ये प्रतियोगिता महिलाओं के शरीर को बेचने जैसी है और इसलिए इसका कड़ा विरोध किया जाएगा. अमरीका के साथ साथ कई देशों में बिकनी राउंड को प्रतियोगिता का अहम हिस्सा माना जाता है लेकिन इसके बावजूद इसका विरोध किया जाता रहा है. 1996 में इस प्रतियोगिता का आयोजन बैंगलोर में किया गया था जिसका ख़ासा विरोध किया गया था और बिकनी राउंड को भारत की जगह सेशिल्स में स्थानांतरित कर दिया गया था. साल 2002 में ये प्रतियोगिता नाइजेरिया में होने वाली थी लेकिन कुछ मुस्लिम संगठनों के विरोध के चलते कार्यक्रम का आयोजन लंदन में किया गया था. नाइजेरिया के कदुना शहर में हुए इस विरोध में 100 लोग मारे गए थे और 500 घायल हुए थे. वैसे आपको पता है पहली मिस वर्ल्ड स्वीडन की रहने वाली किकि हाकॉनसन थी जो स्वीम सूट में ताज पहनने वाली पहली और आखिरी विजेता भी थी. प्रतियोगिता के पहले दशक में सुंदरियों के कपड़ों ने अख़बारों की सुर्खियां भी बनाई और लोगों की भौंहे भी चढ़ा दी. भारत की ओर से इस बार मिस वर्ल्ड में नवनीत कौर ढिल्लन भाग ले रही है. 20 साल की नवनीत पटियाला की रहने वाली है और फौजी परिवार से ताल्लुक रखती है. |
| DATE: 2013-06-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1458] TITLE: अब सीरियल में अभिनय करेंगे अमिताभ |
| CONTENT: टेलीविज़न पर अमिताभ बच्चन का आना कोई नई बात नहीं है. कौन बनेगा करोड़पति से लेकर बिग बॉस और टीवी विज्ञापन हर जगह अमिताभ बच्चन छाए रहते हैं लेकिन बहुत जल्द उन्हें एक नए अवतार में देखा जाएगा. अमिताभ एक टीवी सीरिज़ में अभिनय करते नज़र आएंगे जिसका क्रिएटिव निर्देशन अनुराग कश्यप कर रहे हैं. अन्य धारावाहिकों की बनिस्पत ये सीमित एपिसोड का कार्यक्रम होगा जिसमें अमिताभ बच्चन की कंपनी सह-निर्माता है. हालांकि अमिताभ अनुराग और चैनल में से किसी ने भी फिलहाल सीरिज़ की कहानी या परिकल्पना के बारे में बात नहीं की है लेकिन बच्चन ने बताया कि वो सभी पिछले छ महीने से इस प्रोजक्ट पर काम कर रहे थे. अब जब कि टीवी पर सीरियल की बाढ़ आई हुई है जिनमें से कुछ कार्यक्रम तो पिछले कई सालों से लगातार चलते आ रहे हैं ऐसे में अमिताभ का सीरियल किस तरह भिन्न होगा या फिर वो भी भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाएगा इस पर अमिताभ ने कहा टीवी पर बहुत सारे सीरियल चल रहे हैं जो सफल भी है और हम इसकी सराहना करते हैं लेकिन हम कुछ ऐसी कहानी बनाना चाहते थे जो थोड़ी अलग हो और जो दर्शकों के सामने पहले कभी नहीं आई हो. अमिताभ बच्चन के मुताबिक भारतीय सिनेमा की तरह ही टेलीविज़न भी धीरे धीरे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश में सफल होगा. सौ साल के हो चुके भारतीय सिनेमा की बात करते हुए अमिताभ ने कहा कई सालों तक पश्चिम में हमारे सिनेमा को किस नज़रिए से देखा जाता था हम सब जानते हैं. वो हमारे यहां के आम आदमी के सिनेमा-प्रेम को जानते ही नहीं थे लेकिन आज हमारे अभिनेताओं को पूरी दुनिया में पहचाना जाता है. बच्चन के अनुसार बिना किसी तुलना की चिंता किए टेलीविज़न पर भी कुछ अलग और एकदम मौलिक करने की कोशिश की जा सकती है जिसकी पश्चिम में भी प्रशंसा की जा सके. भारतीय दर्शकों की बात करते हुए अमिताभ ने कहा हमारी आबादी जिस पर लांछन कसे जाते थे कि बहुत ज्यादा है मैं तो समझता हूं उस आबादी की वजह से ही टीवी चल रहा है. दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जहां पर 460 टीवी चैनल हो और अभी भी ऐसा अनुमान है कि 840 आवेदन सरकार के पास रखे हुए हैं. इस बीच ख़बर है कि अमरीकी धारावाहिक सोप्रानोज़ के हिंदी संस्करण में भी अमिताभ बच्चन मुख्य रोल में नज़र आएंगे. ये एक माफिया सीरियल है और सुत्रों का कहना है कि निर्माता कपंनी और अमिताभ बच्चन के बीच बातचीत बहुत जल्द किसी नतीजे पर पहुंचेंगी. सोप्रानोज़ के अभी तक 6 सीज़न आ चुके हैं और इस सीरिज़ ने कई अवार्ड भी जीते हैं. |
| DATE: 2013-06-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1459] TITLE: माइकल जैक्सन की बेटी ने की आत्महत्या की कोशिश |
| CONTENT: पॉप स्टार माइकल जैक्सन की बेटी पेरिस जैक्सन ने ख़ुदकुशी करने की कोशिश की जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया है. इस मामले में अभी और जानकारी नहीं मिल पाई है. माइकल जैक्सन के पिता जो जैक्सन के एक प्रेस एजेंट एजेंल हावांसकि ने बीबीसी से इस ख़बर की पुष्टि की है. लॉस एंजेलेस की मनोरंजन से जुड़ी मीडिया का कहना है कि पेरिस को स्थानीय समय के मुताबिक़ दो बजे घर से ले जाया गया. हालांकि बीबीसी के एलेस्टर लीथेड का कहना है कि एजेंल हावांसकि इस बात की पुष्टि नहीं कर पाए कि ये नशीली दवाओं के अधिक सेवन का मामला है या पेरिस की कलाई पर कटने के बहुत सारे ज़ख़्म थे. माइकल जैक्सन के बच्चों में पेरिस जैक्सन अकेली बेटी हैं. मशहूर पॉप स्टार के परिवार ने माइकल जैक्सन की मौत के सिलसिले में एक कंपनी पर करोड़ो डॉलर का मुक़दमा कर रखा है. पेरिस माइकल जेक्सन की इकलौती बेटी हैं और इस मामले में उनकी हिस्सेदारी भी है. पेरिस माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर काफ़ी सक्रिय हैं. उनकी आखिरी ट्वीट साठ के दशक का मशहूर ब्रितानी पॉप ग्रुप बीटल्स के गाने के शब्द थे जिनका मतलब है कल तक मेरी सभी मुश्किलें बहुत दूर लगती थीं लेकिन आज लगता है कि अब ये मुश्किलें हमेशा मेरे साथ रहेंगी. लॉस एंजेलेस में बीबीसी संवाददाता रेगन मौरिस का कहना है कि माइकल जैक्सन अपने बच्चों को दुनिया की नज़रों से बचाए रखने की पूरी कोशिश करते थे. जब वे अपने बच्चों के साथ बाहर जाते थे तो वे उन्हें मास्क पहना देते थे ताकि कोई उनकी पहचान न कर पाए. स्टारडम से भरपूर अपने बचपन के विपरीत माइकल जैक्सन अपने बच्चों को एक साधारण जीवन देना चाहते थे लेकिन उनकी मौत के बाद पेरिस जैक्सन ने खुद को दुनिया से नहीं छिपाया है. वे अपने स्कूल में चीयरलीडर हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें चर्चा में बने रहना पसंद है. अपने पिता के अंतिम संस्कार के दौरान पेरिस अपनी दादी और दो भाइयों के साथ नज़र आई थीं. अखबारों और पत्रिकाओं में उनकी तस्वीरें या उनसे जुड़ी ख़बरें छापने की होड़ सी लगी रहती है. इसके अलावा पेरिस सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर भी बेहद मशहूर हैं जहां उन्हें लाखों लोग फॉलो करते हैं. |
| DATE: 2013-06-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1460] TITLE: अभिनेत्रियां जो 40 भी पार न कर पाईं. |
| CONTENT: महज़ 25 साल की उम्र में अभिनेत्री जिया ख़ान ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. साल 2007 में अमिताभ बच्चन जैसे सितारे के साथ फिल्म निशब्द से उन्होंने बॉलीवुड में कदम रखा था. जिया ऐसी पहली अभिनेत्री नहीं हैं जो इतनी कम उम्र में ही चल बसीं. बीबीसी से ख़ास बात करते हुए लंबे समय से फिल्मों के जानकार रहे जयप्रकाश चौकसे ने बताया कुछ ऐसी ही अभिनेत्रियों के बारे में जिनकी ज़िंदगी का सफर अचानक से थम गया. एक नज़र उन अभिनेत्रियों पर. ह्रदय रोग के कारण मधुबाला की मृत्यु सिर्फ 36 साल की उम्र में ही हो गई. मधुबाला के दिल में एक छोटा सा छेद था और उस वक़्त ये बीमारी लाइलाज थी. जयप्रकाश चौकसे कहते हैं मधुबाला के अंतिम वर्ष बेहद दुखद रहे. वो आईना देख कर घबरा जाती थीं. उनका खूबसूरत चेहरा धीरे धीरे बिगड़ने लगा था. वो हर दिन अपने मेकअप मैन को घर बुलाने लगी. शूटिंग न होते हुए भी वो मेकअप करके बैठी रहती थीं. चौकसे के मुताबिक़ जिस औरत की खूबसूरती का दीवाना ज़माना रहा हो वो औरत जब खुद को तिल-तिल बदसूरत होते देख रही हो तो कितना भयावह रहा होगा वो वक़्त उसके लिए. अपनी बात को पूरा करते हुए चौकसे कहते हैं इतना ही नहीं मधुबाला के इर्द-गिर्द के लोग हमेशा उनकी खूबसूरती की तारीफ करते रहते थे ताकि वो निराश न हो जाएं. मीना कुमारी की जब मृत्यु हुई उस वक़्त उनकी उम्र 39 वर्ष थी. 31 मार्च 1972 को उनकी मृत्यु लीवर सिरोसिस नाम की बीमारी की वजह से हुई. मीना कुमारी के बारे में बात करते हुए चौकसे कहते हैं मीना कुमारी की शराबनोशी के किस्से बहुत मशहूर हैं. अपने आखिरी के सालों में वो बहुत शराब पीने लगीं थीं. इतना ही नहीं चौकसे बताते हैं कि कैसे मीना कुमारी के नजदीकी लोग उन्हें देसी शराब विदेशी शराब की बोतल में भर कर दे देते थे. नशे में डूबी मीना को कुछ मालूम भी नहीं पड़ता था. स्मिता पाटिल की मृत्यु बेटे प्रतीक के जन्म के तुरंत बाद प्रसव के दौरान हुई कुछ जटिलताओं की वजह से हुई. वो मात्र 31 वर्ष की थीं. चौकसे कहते हैं स्मिता पाटिल अद्भुत अभिनय क्षमता की मालकिन थीं. फिल्म वारिस उनके करियर की बेहतरीन फिल्मों में से एक थी. अर्थ भूमिका मंडी और निशांत जैसी कई यादगार फिल्में उन्होंने की. स्मिता पाटिल राज बब्बर की पत्नी थीं. साउथ सेंसेशन सिल्क स्मिता 23 सितंबर 1996 को चेन्नई में अपने घर में मृत पाई गईं. वो 35 वर्ष की थीं. ऐसा कहा जाता है कि सिल्क अपने जीवन से इतना निराश हो गईं थीं कि उन्होंने आत्महत्या कर ली. सिल्क स्मिता के बारे में बात करते हुए चौकसे कहते हैं सिल्क को उनकी लोकप्रियता ले डूबी. उनकी छवि एक सेक्स सायरन की बन चुकी थी. पत्रिकाओं में उनके बारे में भद्दी बातें लिखी जा रहीं थी. राह चलते लोग उन्हें गंदे इशारे किया करते थे. ये सब उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ. दिव्या भारती सिर्फ 19 साल की थीं जब मुंबई में उनकी मृत्यु पांच मंज़िला इमारत से गिरने की वजह से हुई. उनकी मृत्यु के इर्द-गिर्द कई सवाल उठाए गए. किसी ने कहा कि ये एक एक्सीडेंट था किसी ने इसे आत्महत्या कहा तो किसी ने कहा कि दिव्या साजिश का शिकार हुई. हालांकि पुलिस को इस बारे में कोई ठोस सबूत नहीं मिल पाया. दिव्या भारती के बारे में बात करते हुए चौकसे कहते हैं दिव्या की मृत्यु को पुलिस जांच में तो एक्सीडेंट ही पाया गया. जांच में ये भी सामने आया कि वो नशे में थीं और खुद को संभाल नहीं पाई और नीचे गिर गईं. अपनी बात को पूरा करते हुए चौकसे कहते हैं मैं समझता हूं कि दिव्या भारती अपनी सफलता के कारण मरी. बहुत छोटी उम्र में बहुत बड़ी कामयाबी उन्हें मिल गई थी. इतनी बड़ी कामयाबी को संभालना कैसे है ये वो समझ नहीं पा रहीं थीं. इसलिए शायद वो ड्रग्स भी लेने लगीं और शराब भी. सफलता का वहन कर उसका निर्वाह करना हर किसी के बस की बात नहीं है. जिया खान के बारे में बात करते हुए चौकसे कहते हैं मैं जिया से कई बार मिल चुका था. उन्होंने विदेश में अपनी पढ़ाई की जहां का वातावरण बहुत खुला होता है. वहां से वो बॉलीवुड में आई और यहां आते ही उन्होंने तीन बड़ी फिल्मों में काम किया. तीनो ही फिल्में सफल रही. लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में सफल फिल्में इस बात की गारंटी नहीं हैं कि आपको काम मिलता ही रहेगा. चौकसे आगे कहते है यहां काम पाने के लिए कुछ दुनियादारी भी करनी पड़ती है. लोगों से मिलना जुलना पड़ता है. लेकिन ये कहना भी सही नहीं होगा कि काम न मिलने की वजह से जिया की मृत्यु हुई है. वो सिर्फ 25 वर्ष की थी अगर फिल्मों में काम नहीं मिल रहा था तो टीवी में काम कर सकती थी. अवसर की कमी उनकी मौत की वजह नहीं हो सकती हां अगर कोई पारिवारिक कारण हो तो उसकी जानकारी हमें नहीं है. जिया की मौत पर अमिताभ बच्चन से लेकर दिया मिर्ज़ा तक सभी ने खेद व्यक्त किया है. |
| DATE: 2013-06-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1461] TITLE: माधुरी-नसीर के बीच अंतरंग दृश्य की सच्चाई |
| CONTENT: माधुरी दीक्षित और नसीरुद्दीन शाह पहली बार बड़े परदे पर एक दूसरे के साथ इश्क फरमाते नज़र आएंगे. फिल्म का नाम है डेढ़ इश्किया और निर्देशक हैं अभिषेक चौबे. अभिषेक ने 2010 में इश्किया का निर्देशन भी किया था. हाल ही में मीडिया में ये ख़बर आई की डेढ़ इश्किया में माधुरी और नसीर के बीच कुछ अंतरंग दृश्य हैं. बीबीसी ने अभिषेक से पूछा कि क्या इस बात में कोई सच्चाई है इस सवाल का जवाब देते हुए अभिषेक कहते हैं इस बात का बतंगड़ बना दिया गया है. फिल्म में माधुरी और नसीर एक दूसरे के प्रेमी ज़रूर हैं लेकिन दोनों के बीच कोई अंतरंग या कामुक दृश्य नहीं हैं. हां दोनों के बीच रोमांटिक दृश्य ज़रूर हैं. चलिए मान लेते हैं अभिषेक की बात. लेकिन माधुरी और नसीर के बीच जो रोमांटिक दृश्य हैं ऐसे दृश्यों को फिल्माने से पहले क्या अभिषेक को कुछ टिप्स देनी पड़ी इन दोनों ही कलाकारों कोमाधुरी दीक्षित फिल्म में शाही बेगम नाम का किरदार निभा रही हैं. अभिषेक कहते हैं रोमांटिक दृश्यों के बारे में मैं माधुरी और नसीर जी को क्या बताऊंगा. मैं जब पालने में था तब से ये लोग अभिनय कर रहे हैं. इनके साथ ये सीन फिल्माना बहुत ही आसान था. अभिषेक ये भी मानते हैं कि नसीरुद्दीन शाह और माधुरी दीक्षित की ऑनस्क्रीन केमिस्ट्री कमाल की है. वो कहते हैं दोनों एक साथ परदे पर बहुत अच्छे लगते हैं. फिल्म में दोनों के बीच जो रोमांस है उसे देख कर चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती है. फिल्म के मज़ाक रोमांच और क्राइम के बीच इन दोनों के प्यार की एक ख़ास जगह है. जहां तक जगह की बात है तो हमने अभिषेक से पूछा कि डेढ़ इश्किया में उन्होंने इश्किया की विद्या बालन की जगह माधुरी दीक्षित को क्यों लिया क्या फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्हें विद्या की कमी महसूस नहीं हुईनसीरुद्दीन शाह और अरशद वारसी क्या इश्किया का जादू डेढ़ इश्किया में भी बरक़रार रख पाएंगे. बीबीसी के इस सवाल का जवाब देते हुए अभिषेक कहते हैं ये फिल्म इश्किया से बहुत ही अलग है. विद्या बालन और माधुरी जी के किरदार में कोई भी समानता नहीं है. तो इस फिल्म में विद्या की कमी खलने का सवाल ही नहीं था. डेढ़ इश्किया की शूटिंग लगभग पूरी हो चुकी है. फिल्म में नसीर और माधुरी के साथ साथ अरशद वारसी और हुमा कुरैशी भी हैं. |
| DATE: 2013-06-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1462] TITLE: सनी का धर्मेंद्र को ख़ास तोहफा |
| CONTENT: इस हफ्ते देओल परिवार की फिल्म यमला पगला दीवाना 2 रिलीज़ हो रही है. इस फिल्म की खास बात ये है कि फिल्म का एक गाना मैं तां एदां ही नचना खुद धर्मेंद्र सनी बॉबी और सनी के बेटे करण देओल ने मिलकर गया है. ये एक रैप सॉंग है. वैसे इस गाने में दिलजीत दोसांज और सचिन गुप्ता ने भी अपनी आवाज़ें दी हैं. फिल्म का संगीत यूं तो तोशी और शारीब सबरी का है लेकिन ये रैप सॉंग कम्पोज़ किया है सचिन गुप्ता ने. ये गाना ही है सनी देओल का तोहफा अपने पिता धर्मेंद्र को. अब आप कहेंगे कैसेबीबीसी ने बात की सचिन से और जाना कि कैसे सनी देओल उनके पास एक प्रस्ताव लेकर आए. सचिन कहते हैं मैं मेरे डैड की मारुती कर रहा था तब सनी सर ने मेरे गाने सुने. वो मुझसे मिले और कहा कि वो धर्मेंद्र जी को एक ऐसा गाना तोहफे में देना चाहते हैं जो उनके डांसिग स्टाइल को बयां करता हो. इसीलिए तो गाने के बोल हैं मैं तां एदां ही नचना. वैसे खुद धर्मेंद्र कैसे मान गए इस गाने को अपनी आवाज़ देने के लिएइस सवाल का जवाब देते हुए सचिन कहते हैं धर्मेंद्र जी बड़ी ही आसानी से मान गए. मैंने उनसे कहा कि अगर वो ये लाइन मैं तां एदां ही नचना बोलेंगे तो दर्शक झट से इस गाने के साथ कनेक्ट हो करेंगे. सचिन कहते हैं जब धर्मेंद्र स्टूडियो में गाना रिकॉर्ड करने आए तब उनका जज़्बा देखते ही बनता था. वो कहते हैं हम सब इस बात से हैरान थे कि इस उम्र में भी वो इतने एक्टिव कैसे रहते हैं. इतना ही नहीं धर्मेंद्र को ये गाना गाता देख सनी और बॉबी ने भी एक एक लाइन गा दी. सनी के बेटे करण देओल ने इस गाने में अंग्रेज़ी में रैप किया है. सचिन बताते हैं कि इस गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान कैसे धर्मेंद्र ने खूब मस्ती भी की. वो कहते हैं जैसे ही हमने रिकॉर्डिंग शुरू की और धर्मेंद्र जी ने गाना शुरू किया. वो गाने के साथ साथ नाचने भी लगे और गाना बड़े ही मस्त अंदाज़ में रिकॉर्ड हुआ. संगीत सिवन निर्देशित फिल्म यमला पगला दीवाना 2 2011 में आई फिल्म यमला पगला दीवाना का सीक्वल है. |
| DATE: 2013-06-05 |
| LABEL: entertainment |
| [1463] TITLE: 'करियर को लेकर डिप्रेस्ड थीं जिया' |
| CONTENT: निशब्द फ़िल्म से चर्चा में आई बॉलीवुड अभिनेत्री जिया ख़ान की मौत पर सिनेमा जगत की हस्तियों ने ट्विटर पर आश्चर्य और दुःख जताया है. जैसे ही ये ख़बर सामने आई निशब्द फ़िल्म के उनके साथी कलाकार अमिताभ बच्चन ने ट्वीट किया- क्या जिया ख़ान ये क्या हुआ क्या ये सही है यक़ीन नहीं हो रहाजिया ख़ान नाम से जानी जाने वाली अभिनेत्री का नाम नफ़ीसा ख़ान था और उनका ख़ुद का ट्विटर अकाउंट इसी नाम से था. जिया ने निशब्द के अलावा ग़जनी और हाउसफ़ुल फ़िल्मों में भी काम किया थानिशब्द फ़िल्म के निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने जिया की मौत पर अफ़सोस जताते हुए उनकी मनोदशा का भी ज़िक्र किया है. वह कहते हैं जब मैं जिया से आख़िरी बार मिला तो उसने मुझे बताया कि कैसे उसके इर्द-गिर्द के लोग उसे हमेशा ये अहसास कराते थे कि वह विफल रही है. निशब्द में काफ़ी तारीफ़ पाने और ग़ज़नी तथा हाउसफ़ुल जैसी सफल फ़िल्मों का हिस्सा होने के बावजूद उसके पास पिछले तीन वर्षों से कोई काम नहीं था. वर्मा के मुताबिक़ मुझे वजह तो पता नहीं कि जिया ने ऐसा क्यों किया मगर वह अपने करियर को लेकर काफ़ी डिप्रेस्ड और भविष्य को लेकर डरी हुई थी. उन्होंने लिखा उसकी जो भी परेशानियाँ रही हों काश उसने निशब्द फ़िल्म की फ़िलॉसॉफ़ी को अपनी ज़िंदग़ी में भी अपनाया होता. दिया मिर्ज़ा ने भी जिया की मौत पर अफ़सोस व्यक्त किया है. उन्होंने पहले लिखा- नफ़ीसा जिया ख़ान तुम्हारी आत्मा को शांति मिले. तुम काफ़ी युवा और ख़ूबसूरत थी. इसके बाद सुबह एक बार फिर दिया ने लिखा कल रात मैं काफ़ी सदमे में थी इसलिए ज़्यादा कुछ कह नहीं सकी. जीवन बहुमूल्य है. बुरा समय बीत जाता है. कभी हिम्मत नहीं छोड़नी चाहिए. शाहिद कपूर ने ट्वीट करते हुए लिखा जिया ख़ान के बारे में सुनकर काफ़ी दुखी और सदमे में हूँ. ये काफ़ी परेशान करने वाली ख़बर है. उनकी आत्मा को शांति मिले. अनुपम खेर कहते हैं जिया ख़ान के साथ जब मैंने काफ़ी पहले काम किया था तो वह जीवन से भरपूर थीं. ये बहुत दुखद है कि किसी वजह से उन्हें ऐसा क़दम उठाना पड़ा. सोनम कपूर ने भी जिया की मौत पर श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए लिखा किसी को भी इतने दर्द में और निराशा में नहीं होना चाहिए. मैं उम्मीद करती हूँ कि मौत से उसकी आत्मा को कुछ शांति मिलेगी. अभिनेत्री नेहा धूपिया ने इस ख़बर पर अफ़सोस जताते हुए लिखा है कि जिया काफ़ी जल्दी चली गईं. अरशद वारसी ने लिखा जिया ख़ान के बारे में सुनकर सदमे में हूँ. ज़िंदग़ी की आस छोड़ने के लिए वह अभी काफ़ी युवा थी. |
| DATE: 2013-06-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1464] TITLE: नूतन के बेटे क्यों नहीं देखते उनकी फिल्में |
| CONTENT: सुजाता पेइंग गेस्ट सीमा बंदिनी सरस्वती चंद्र मिलन और मैं तुलसी तेरे आंगन की जैसी फिल्मों में बेहतरीन अभिनय करने वाली अभिनेत्री नूतन की आज 77वीं जयंती है. 1991 में 54 साल की उम्र में कैंसर की वजह से उनका निधन हो गया. बीबीसी ने बात की नूतन के बेटे अभिनेता मोहनीश बहल से जिन्होंने उनके बारे में कई दिलचस्प बातें बताईं. हमारा परिवार बिलकुल आम परिवारों की तरह था. मेरे दोस्तों के घर से मेरा घर बस इस मायने में अलग होता था कि हमारे यहां मां की जीती हुई तमाम ट्रॉफियां रखी होती थीं. मुझे बचपन का एक मज़ेदार किस्सा याद आता है. एक बार मैं दोस्तों से मिल जुलकर लौट रहा था तो देखा की मां की कार हमारे घर के पास वाली लॉन्ड्री में खड़ी है. मैं वहां गया तो पता चला कि मां तो वहां है ही नहीं. मैं घर भागा तो मां वहां थीं. मैंने पूछा आप लॉन्ड्री गईं थीं उन्होंने कहा हां. लेकिन अब तो आ गई हूं ना. मैंने पूछा तो आपकी कार वहां क्या कर रही है. उन्होंने आश्चर्य से कहा क्या. मैं कार लेकर गई थी वहां. सॉरी मैं भूल ही गई. मैं हैरान रह गया कि कोई कार लेकर जाए उसे कैसे भूल कर वापस पैदल आ सकता है. मैं उनकी फिल्में ज़्यादा नहीं देखता. क्योंकि जितना मैं देखूंगा उतना ही उन्हें मिस करूंगा. और उन्होंने काफी गंभीर फिल्में भी की हैं. जिससे मैं ज़्यादा आइडेंटीफ़ाइ नहीं कर पाता. मैं उन्हें पर्दे पर ही सही लेकिन तकलीफ सहते हुए नहीं देख सकता. मेरी मां एक प्रशिक्षित क्लासिकल डांसर थीं. मैं उनके तमाम शोज़ पर जाता था. कई बार कश्मीर जैसी जगहों पर आउटडोर शूटिंग होती थी तब भी मैं उनके साथ जाता था. मुझे देव साहब राज अंकल और सुनील दत्त साहब के साथ उनकी जोड़ी अच्छी लगती है. वो बेहद बहादुर और आध्यातिमक थीं. कैंसर जैसी बीमारी का उन्होंने बहादुरी से सामना किया. जब उन्हें कैंसर का पता चला तो वो मायूस नहीं हुईं. उन्होंने कैंसर से पहली जंग जीत भी ली थी. लेकिन उसके बाद कैंसर ने उनके लिवर पर आक्रमण किया. हमने जब दोबारा डॉक्टर से जांच कराई तब तक वो काफी फैल चुका था. और वो बच ना पाईं. बीमारी के दौरान भी वो हमें हौसला देती रहीं. उनके जीवित रहते मेरा फिल्मी करियर शुरू हो चुका था लेकिन परवान नहीं चढ़ा था. उन्होंने मेरी फिल्में मैंने प्यार किया और बाग़ी देखीं. उन्हें मेरा काम पसंद आया. हालांकि मेरा फिल्मी करियर इससे कई साल पहले से शुरू हो चुका था. लेकिन बीच में दो ढाई साल मेरे पास काम नहीं था. तब भी वो मेरी हिम्मत बढ़ाती रहती थीं. रात के डेढ़-दो बजे तक हम मां-बेटे साथ में बैठे रहते. उन्होंने मुझे एक ही शिक्षा दी थी कि कैमरे के सामने हमेशा ईमानदार रहना और हमेशा जो दिल में हो वही करना. मैं भी अपने बच्चों को यही सलाह देता हूं. |
| DATE: 2013-06-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1465] TITLE: अपने सपनों को जीने भारत आई थीं जिया |
| CONTENT: जिया ख़ान की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक़ उनका जन्म न्यूयॉर्क में 1988 में हुआ था और उनकी परवरिश लंदन के चेल्सी में हुई. वे अली रिज़वी ख़ान और राबिया अमीन की बेटी थी. मीडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ राबिया ख़ान 1980 के दशक में एक अभिनेत्री रह चुकी थीं और ताहिर हुसैन की फिल्म दुल्हा बिकता है के लिए उन्हें याद किया जाता है. जिया ख़ान की दो छोटी बहने भी हैं. हालांकि उनका असली नाम नफ़ीसा था लेकिन उन्होंने अपना नाम बदल कर जिया रख लिया था. जिया की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक उन्होंने लंदन में अंग्रेज़ी साहित्य की पढ़ाई की जिसके बाद उन्होंने शेक्सपियर और अभिनय के बारे में पढ़ाई की. उनकी ज़िंदगी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब बॉलीवुड निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने उन्हें अपनी फिल्म निशब्द में अमिताभ बच्चन के साथ लीड रोल दिया. उस वक्त जिया केवल 18 साल की थीं और फिल्म चर्चित होने के बाद उन्हें बॉलीवुड में एक नई पहचान मिली. इस फिल्म का विषय बहुत संवेदनशील था और फिल्म में उनके चित्रण ने भी लोगों का ध्यान बटोरा. इस फिल्म में जिया ने बहुत बोल्ड अभिनय किया जिस पर समाज में काफी चर्चा भी हुई. निशब्द फिल्म साल 2007 में रिलीज़ हुई और जिया को उनके अभिनय के लिए फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला. जिया युवा वर्ग के बीच काफी लोकप्रिय रहीं. वे एक प्रशिक्षित ऑपरा गायक थीं और पियानो भी बजाती थीं. इसके अलावा उन्हें विभिन्न प्रकार की नृत्य शैलियां भी आती थीं. वे साल्सा जैज़ कत्थक बैले रेगी और बेली डांस जैसी नृत्य शैलियां जानती थीं. उन्होंने सुपरहिट फिल्म गजिनी में भी आमिर ख़ान के साथ काम किया जिसके लिए उनकी काफी तारीफ हुई. उनकी आखिरी फिल्म थी हाउसफुल जिसमें वे अक्षय कुमार के साथ नज़र आई. इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत सफलता मिली. उनकी वेबसाइट के मुताबिक उन्हें हाल ही में एक हॉलीवुड प्रॉजेक्ट भी मिला था जिसके बारे में वे जल्द ही अपने फैन्स को बताने वाली थीं. लेकिन सोमवार देर रात को उनके सपनों को अंकुश लग गया जब संदिग्ध परिस्थिति में उनकी मौत हो गई. |
| DATE: 2013-06-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1466] TITLE: हमेशा के लिए 'निशब्द' हो गईं अभिनेत्री जिया ख़ान |
| CONTENT: बॉलीवुड की अभिनेत्री जिया ख़ान की मौत हो गई है. मुंबई पुलिस के मुताबिक जिया ख़ान को मृतावस्था में कूपर अस्पताल लाया गया. जिया ख़ान का शव उनके जुहू स्थित घर से बरामद हुआ है. यहाँ वे अपनी माँ के साथ रहती थी. जिया ख़ान ने अमिताभ बच्चन के साथ साल 2007 में रामगोपाल वर्मा की फ़िल्म निशब्द से फ़िल्मों में कदम रखा था. इस फ़िल्म में उन्होंने एक गाना भी गाया था. इसके अलावा वे 2008 में उन्होंने आमिर ख़ान के साथ गजनी में और 2010 में अक्षय कुमार के साथ हाउसफुल में भी काम किया था. उन्होंने कुछ विज्ञापन भी किए थे. पुलिस उपायुक्त चेरिंग दोरजी का कहना है कि उनका शरीर घर में लटका हुआ मिला था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने तक यह नहीं कहा जा सकता कि यह ख़ुदकुशी का मामला है या कुछ और. जिया की मौत पर हैरानी जताते हुए अमिताभ बच्चन ने ट्वीट किया है क्या जिया ख़ान क्या हुआ है क्या ये सच है अविश्वसनीयअभिनेत्री दीया मिर्ज़ा ने ट्विटर पर अपनी श्रद्धांजलि में लिखा नफ़ीसा जिया ख़ान तुम अभी बहुत छोटी और खूबसूरत थीं. जिया ख़ान का ट्विटर अकाउंट नफ़ीसा ख़ान के नाम से था जिसमें उन्होंने खुद को कलाकार कवयित्री गायिका संगीतकार और ड्रीमर बताया था. उनकी आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक वे अमरीका के न्यूयॉर्क में पैदा हुईं और लंदन में पली-बढ़ी थीं. |
| DATE: 2013-06-04 |
| LABEL: entertainment |
| [1467] TITLE: 'ये जवानी.' पर उमर अब्दुल्ला का गुस्सा |
| CONTENT: पिछले हफ्ते रिलीज़ हुई फिल्म ये जवानी है दीवानी दर्शकों को ख़ासी पसंद आ रही है लेकिन जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला फ़िल्म से ज़रा नाराज़ हैं. लेकिन भला उमर गुस्से में क्यों हैं. दरअसल फिल्म के एक बड़े हिस्से की शूटिंग गुलमर्ग में हुई है लेकिन उमर के मुताबिक़ फिल्म में उस स्थान को मनाली कहा गया है. उन्होंने ट्विटर पर खुलकर अपने ग़ुस्से का इज़हार किया. उमर ने लिखा बहुत दुख होता है कि फिल्म की शूट में मदद हम करें और दर्शकों को ये बताया जाए कि वो मनाली हैं. फिल्म की शुरुआत में बताया गया है कि रणबीर दीपिका और उनके दोस्त एक ट्रैकिंग ट्रिप के लिए मनाली के पहाड़ चढ़ने जाते हैं जो असल में कश्मीर का प्रसिद्ध पर्यटक स्थल गुलमर्ग है. उमर ने ट्विटर पर ये भी लिखा कि जो लोग फिल्म देखने के बाद मनाली जाने की सोच रहे हैं वे ये बात जान लें कि फिल्म में दिखाए रिसोर्ट और मंदिर के अलावा सभी दृश्य कश्मीर में फिल्माए गए हैं. इस फिल्म का निर्देशन अयान मुख़र्जी ने किया है और निर्माता करण जौहर हैं. फिल्म के क्रेडिट रोल में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री को धन्यवाद कहा गया है. करण के प्रोडक्शन हाउस धर्मा प्रोडक्शंस ने बीबीसी को अपने जवाब में कहा हमने फिल्म की शुरुआत में ही कश्मीर सरकार को क्रेडिट देते हुए उन्हें धन्यवाद कहा है. फिल्म के शुरूआती क्रेडिट रोल की तस्वीर भी हम आपको भेज रहे हैं जिसमें आप ये बात साफ देख सकते हैं. बीते कुछ समय से कश्मीर के गुलमर्ग में पर्यटकों की गिनती गिरती जा रही है. कई राज्य अब फिल्मों के ज़रिए अपने यहां पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयास कर रहे हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि इस फिल्म के ज़रिये भी राज्य सरकार गुलमर्ग को पर्यटन स्थल के रूप में प्रचारित करना चाहती थी. |
| DATE: 2013-06-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1468] TITLE: 'हीरोइनों के साथ नाम जोड़े जाने की आदत हो गई है' |
| CONTENT: निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने को उनकी पहली फिल्म उड़ान के लिए भी काफी तारीफें मिली. रणवीर सिंह ने बैंड बाजा बारात से फिल्मों में अपनी शुरुआत की. इसके साथ ही शुरू हुआ सिलसिला उनके लिंक-अप्स का भी. पहले अनुष्का शर्मा फिर दीपिका पादुकोण और अब सोनाक्षी सिन्हा. जिस भी अभिनेत्री के साथ ये फिल्म करते हैं खुद ब खुद उसके नाम के साथ इनका नाम जुड़ जाता है. बीबीसी ने एक खास मुलाक़ात के दौरान रणवीर से पूछा कि अपने इन लिंक-अप्स के बारे में क्या कहना चाहेंगे वोइस सवाल के जवाब में रणवीर कहते हैं शुरू शुरू में जब अपने बारे में मैं ये सब पढ़ता था तो मुझे बहुत बुरा लगता था. मैं सोचता था कि मीडिया मेरी निजी ज़िन्दगी के बारे में ये सब कैसे लिख सकता है. चार पांच दिनों तक मैं बस यही सोचता रहता था. लेकिन फिर मुझे ये समझ आ गया कि मैं जिस इंडस्ट्री का हिस्सा हूं वहां ये सब तो होगा ही. रणवीर और सोनाक्षी की जोड़ी पहली बार साथ में आ रही है. तो क्या अब आदत हो गई है रणवीर को इन सब बातों की रणवीर कहते हैं अब तो मैं ये सब बातें पढ़ता भी नहीं हूं. अगर आप जवान हैं एक अभिनेता हैं तो आपके बारे में ये सब कयास तो लगाए ही जाएंगे. नहीं अभी पूरी नहीं हुई है रणवीर की बात. वो कहते हैं कि आने वाले समय में उनकी एक के बाद एक चार फिल्में आ रही हैं और वो चाहते हैं कि लोग उनकी निजी ज़िन्दगी नहीं बल्कि उनके काम के बारे में लिखें. रणवीर जल्द ही विक्रमादित्य मोटवाने की लुटेरा में सोनाक्षी सिन्हा के साथ नज़र आने वाले हैं. फिल्म में रणवीर और सोनाक्षी के बीच कुछ अंतरंग दृश्य हैं. अब क्योंकि रणवीर का नाम सोनाक्षी से भी जोड़ा जा चुका है तो क्या इन अंतरंग दृश्यों को फिल्माते वक़्त दोनों के बीच कोई असहजता थी इस सवाल का जवाब देते हुए रणवीर कहते हैं हम दोनों ही प्रोफेशनल हैं. सोनाक्षी बहुत ही समझदार हैं इसलिए असहजता का कोई सवाल ही नहीं था. हम जानते हैं कि कैमरे के सामने हम जो भी कर रहे हैं वो हमारा काम है. फिल्म की कहानी 1953 की है. रणवीर इन दृश्यों को खूबसूरती से फिल्माने का पूरा श्रेय निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने को देते हैं. रणवीर कहते हैं विक्रमादित्य ने हमारे कम्फर्ट का ध्यान रखते हुए एक छोटा सेट बनाया था. जहां मेरे और सोनाक्षी के अलावा सिर्फ वो और कैमरामैन ही होता था. सिर्फ इतना ही नहीं विक्रमादित्य से हमें हर तरह का प्रोत्साहन और साथ मिला है. फिल्म के बारे में बात करते हुए रणवीर कहते हैं कि लुटेरा एक बहुत ही भावुक फिल्म है. सेट पर सभी इस बात को समझते थे कि लुटेरा एक जज़्बाती फिल्म है और सबका व्यवहार उसी तरह का होता था. लुटेरा 5 जुलाई को रिलीज़ हो रही है. |
| DATE: 2013-06-03 |
| LABEL: entertainment |
| [1469] TITLE: लैंगिकता से परे है ऋतुपर्णो घोष की पहचान |
| CONTENT: इसमें कोई शक नहीं कि ऋतुपर्णो घोष बंगाल के और भारत के बेहतरीन फिल्म निर्देशकों में से एक थे. बीस साल के अपने फिल्म करियर में उन्होंने 24-25 फिल्में बनाईं और हाल में कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया. इसके अलावा वह लेखक और कवि भी थे और बंगाल के सबसे प्रभावशाली लोगों में उनकी गिनती होती थी. कुछ समीक्षकों का यह भी कहना था कि उन्होंने बंगाल के साहित्य और फिल्म शैली को दुनिया तक पहुँचा कर सत्यजीत रे की विरासत को आगे बढ़ाया था. लेकिन उनकी असमय मौत के कुछ वर्षों पहले वह फिल्म निर्माता कम और एलजीबीटी लेस्बियन गे बाईसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रतीक ज्यादा बन गए थे. अपनी दूसरी फिल्म उनिशे अप्रैल के लिए जो माँ-बेटी के रिश्तों के बारे में थी उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. लेकिन तीसरी फिल्म दहन के बाद तो उनकी प्रतिष्ठा आसमान छूने लगी और उन्हें चुनिंदा पुरुष निर्देशकों में शामिल होने का श्रेय मिलने लगा जिन्हें महिला मनोविज्ञान की सटीक समझ थी. दहन एक सच्ची घटना पर आधारित थी और आज भी प्रासंगिक है जब हमारे समाज और मीडिया में स्त्रियों के प्रति हिंसा को लेकर गर्मागरम बहस चल रही है. इस फिल्म में एक लड़की दूसरी लड़की के साथ दुर्व्यवहार होता हुआ देखती है और चाहती है कि दोषियों के सजा मिले लेकिन कोई इस झंझट में नहीं पड़ना चाहता है. अपनी अगली फिल्म बाड़ीवाली ने उनके फिल्मों के नारीवादी पक्ष को और मजबूत किया. इस फिल्म में उन्होंने संवेदनशील ढंग से अधेड़ विधवा के जीवन के एकांत को पर्दे पर उतारा जिसका सहज वजूद उस समय बाधित हो जाता है जब वह एक फिल्म यूनिट को अपनी जर्जर हवेली की शूटिंग करने की इजाजत दे देती है. ऋतुपर्णो का वर्णन बेहतरीन था और जिस खूबसूरती से महिला मुख्य पात्र के दिल को पर्दे पर हूबहू उतारा गया ऐसा वह ही कर सकते थे. पहले से ही उनका व्यक्तित्व आकर्षक था. वह हमेशा बंगाली स्टाइल की चुन्नट की धोती पहनते थे और बारीक काम वाले कुर्ते जो रबिन्द्रनाथ टैगोर के पहनावे से प्रेरित थे. लेकिन शुरू में उनकी समलैंगिक प्रवृत्ति के बारे में पता नहीं था. अफवाह तो थी और मजाक भी लेकिन उनकी फिल्मों की सफलता और इतने सारे पुरस्कारों ने लोगों की जुबान बंद कर रखी थी. उनकी हर फिल्म में सहज लेकिन विस्तृत संवादों के जरिए स्त्री-पुरूष के संबंधों को इतनी बारीकी से दर्शाया गया था कि यह सोचना असंभव था कि उन्होंने वास्तव में उस छटपटाहट को स्वयं अनुभव नहीं किया है. मुंबई अपनी उदारवादी छवि पर गर्व करती है लेकिन यहाँ भी वैकल्पिक लैंगिक वरीयता को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया है. तो फिर रूढ़िवादी कोलकाता में तो सामने आने के लिए बहुत अधिक साहस की जरूरत है. इस समय वह बंगाल में एक चमकते सितारे बन चुके थे- एक फिल्म स्टार जिसने बॉलीवुड में पैठ बना ली थी और जिसे बच्चन परिवार का समर्थन हासिल था. उन्होंने सार्वजनिक रूप से क्रॉसड्रेसिंग करके मेकअप लगाकर पगड़ी और खूबसूरत दुपट्टों का इस्तेमाल शुरू कर पूर्वाग्रहों को चुनौती दी. अपनी लैंगिकता को स्वीकार कर उन्हें एक अलग किस्म का प्रशंसक वर्ग मिला लेकिन उनके करीबी लोगों ने उनसे कुछ दूरी भी बना ली और उन्हें मिला एक अकेलापन जिसे उन्होंने दुखी मन से स्वीकार भी किया. उनके बारे में अप्रिय चुटकुले बनने लगे. हालाँकि शीर्ष अभिनेत्रियाँ राष्ट्रीय पुरस्कार की उम्मीद में उनके साथ काम करने के लिए उतावली थीं लेकिन फिल्म उद्योग में अंतर्निहित होमोफोबिया को समझते हुए वह इस बात को लेकर सतर्क थे कि वह मर्द कलाकारों के साथ कैसे बातचीत कर रहे हैं. उनकी हालिया फिल्म में उनकी लैंगिकता को अभिव्यक्ति मिली जिसमें उन्होंने अभिनय भी किया- अर एकती प्रीमर गोल्पो मैमोरिज़ इन मार्च और चित्रांगदा. ऋतुपर्णो ने स्त्री की तरह दिखने के लिए कुछ सर्जरियाँ करवाईं और हॉर्मोन थेरेपी का सहारा भी लिया. इन फिल्मों को बनाने और खुद को सबके निशाने पर रखने के पीछे उनकी राजनीतिक मंशा भी थी. उनका व्यक्तित्व फीका और सावधानीपूर्ण हो चुका था और वह पूरी तरह से स्वयं को अलग-थलग महसूस करने लगे थे लेकिन वह जानते थे कि वह अपने सेलेब्रिटी हैसियत का इस्तेमाल एलजीबीटी समुदाय के लिए कर सकते हैं. उन्होंने जो भी किया वह साहस की एक दास्तान बन गई. लेकिन एक फिल्म निर्माता के रूप में उनकी उत्कृष्ट प्रतिभा सौन्दर्य शास्त्र और साहित्य तथा मानवता को लेकर उनकी गहरी समझ को महज उनकी लैंगिक वरीयता से जोड़कर देखना दुखद है. एलजीबीटी समुदाय को अपने सबसे बड़े समर्थक के जाने का गम है जिन लोगों ने उनके साथ काम किया वे भी दुखी है. लेकिन ऋतुपर्णो जैसे निर्देशकों का जाना पूरे समाज की क्षति है- वह समाज जिसे उन्होंने अपनी फिल्मों में बेहद खूबसूरती और साहस के साथ दर्शाया. ऋतुपर्णो घोष केवल गे फिल्म निर्माता नहीं थे बल्कि लैंगिकता से परे वह एक महान फिल्म निर्माता और कलाकार थे. |
| DATE: 2013-06-02 |
| LABEL: entertainment |
| [1470] TITLE: जेल में पेपरबैग बनाएंगे अभिनेता संजय दत्त |
| CONTENT: 1993 में हुए बंबई बम धमाके से जुड़े एक मामले में पुणे की येरवडा जेल में सजा काट रहे अभिनेता संजय दत्त अब पेपर बैग बनाएंगे. जेल के एक अधिकारी ने कहा कि संजय दत्त को जेल में काग़ज़ के लिफ़ाफ़े बनाने का प्रशिक्षण दिया जाएगा. जेल में क़ैदियों से कुछ न कुछ काम लिया जाता है और इसके एवज़ में उन्हें उनके काम के आधार पर प्रति दिन मेहनताना भी दिया जाता है. इस बात को लेकर कयास लगाए जा रहे थे कि अभिनेता संजय दत्त से जेल प्रशासन क्या काम लेता है16 मई को सरेंडर के बाद संजय दत्त को पहले मुंबई की आर्थर रोड जेल में रखा गया था और फिर उन्हें पुणे की येरवडा जेल में शिफ्ट कर दिया गया था. सरेंडर के बाद से टाडा कोर्ट के आदेश के मुताबिक संजय के लिए खाना घर से ही आता है. लेकिन जेल अधिकारियों ने 28 मई को टाडा अदालत में ये कहते हुए आवेदन किया है कि ये जेल मैन्युअल का उल्लंघन है. जेल नियमावली के अनुसार क़ैदियों को जेल की रसोई में बना खाना ही परोसा जाता है. येरवडा जेल के आवेदन पर कोर्ट ने अभी कोई फैसला नहीं दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के बम धमाकों से जुड़े मामले में संजय दत्त को पाँच साल की सज़ा सुनाई है. संजय दत्त को अवैध रूप से हथियार रखने का दोषी पाया गया था. संजय दत्त डेढ़ साल की सज़ा पहले ही काट चुके हैं. उन्हें जेल में साढ़े तीन साल का समय और बिताना होगा. जेल में संजय दत्त की वर्तमान आय मात्र 25 रुपए प्रतिदिन है. प्रशिक्षण पूरा करने के बाद संजय कागज के लिफाफे बना कर 40 से 45 रुपए प्रतिदिन कमा सकेंगे. 53 वर्षीय संजय दत्त ने टाडा अदालत में समर्पण के बाद जज से अपील की थी कि उन्हें पंखा और इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट उपलब्ध कराई जाए. अदालत ने पंखे की मांग तो मान ली लेकिन इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट की मांग को ठुकरा दिया. ई-सिगरेट के लिए दत्त की गुजारिश पर जज ने उन्हें धूम्रपान छोड़ने की सलाह दी थी. |
| DATE: 2013-06-01 |
| LABEL: entertainment |
| [1471] TITLE: उम्र से लंबी होती टीवी धारावाहिकों की कहानियाँ |
| CONTENT: छलांग का कारण क्या होता है - कहानी की कमी या टीआरपी में गिरावटमनोरंजन चैनलों पर चलने वाले धारावाहिकों में आजकल जनेरेशन लीप या दूसरे शब्दों में कहें तो कहानी में कई बरसों की छलांग एक आम बात हो गई है. कल तक जो बाल कलाकार कहानी के केन्द्र में होते हैं वे अचानक एक दिन जवान हो जाते हैं. उनके रोमांस शुरु हो जाते हैं. दूसरी तरफ़ उनके माँ-बाप भले ही उनके बाल कभी सफ़ेद न हों बूढ़े हो जाते हैं. दादी सा परदादी सा हो जाती हैं. यह होती है लीप या छलांग. लेकिन इस छलांग का कारण क्या होता है कहानी की कमी या टीआरपी में गिरावटया दर्शक एक ही चेहरे को देख-देख कर ऊब जाते हैं इसलिए नए चेहरे दिखाने पड़ते हैं बालिका वधु के पटकथा लेखक राजेश दूबे मानते हैं लीप के रचनात्मक कारण भी होते हैं और कई बार प्रोडक्शन कारण भी होते हैं. एक निश्चित समय अवधि के बाद जब कोई धारावाहिक और उसके पात्र दर्शकों में लोकप्रिय हो जाते हैं लेकिन उसकी कहानी ख़त्म हो जाती है और रेटिंग भी रुक जाती है तब कलाकारों के नये सेटअप के साथ नई कहानी सोची जाती है. राजेश बताते हैं कई बार कलाकारों को उनकी लोकप्रियता के बाद नए-नए ऑफ़र आने लगते हैं और वे धारावाहिक छोड़ कर जाना चाहते हैं और कई बार कलाकार बूढ़े हो चुके किरदार को करने से मना कर देते हैं तब नए चेहरों के साथ नई कहानी सोचनी पड़ती है. कई बार दर्शकों की दिलचस्पी ख़त्म हो जाती है और कई बार नई कहानी से सीरियल लोकप्रिय हो जाते हैं. लेकिन ऐसा भी नहीं है इस लीप या छलांग से हर धारावाहिक कामयाबी के नये कीर्तिमान स्थापित कर ले. क्या हुआ तेरा वादा ऐसा ही एक धारावाहिक था जिसने छलांग लगाई और सभी बच्चे बड़े हो गए लेकिन दर्शकों के मोर्चे पर यह धारावाहिक गिर पड़ा. लेकिन कई बार इस छलांग से फ़ायदा भी हुआ है जैसे बालिका वधु जिसने जिसने 10-12 साल की लीप ली और हाल ही में 1000 एपीसोड भी पूरे कर लिए. इसमें आनन्दी और जगिया के बड़े होने पर भी इसके दर्शक कम नहीं हुए. एक अन्य धारावाहिक उतरन 10 साल की लीप की तपस्या और इच्छा जब बड़ी हुईं तब उनकी टीआरपी और बढ़ गई क्योंकि इस धारावाहिक का असली ड्रामा बच्चों के बड़े होने पर ही शुरु होता है. इस धारावाहिक ने एक और छलांग लगाई - 20 साल की - और अब तपस्या और इच्छा 2--20 साल के बच्चों की माँ बन गईं हैं. फिर भी दर्शकों की दिलचस्पी इस धारावाहिक के साथ आज भी बनी हुई है. लीप का सबसे बड़ा कारण टीआरपी टेलीविज़न रेटिंग पॉईंट की जंग है. इसे देखकर ही चैनलों को विज्ञापन भी मिलते हैं. इसलिए अगर टीआरपी के मोर्चे पर कोई धारावाहिक जैसे ही मुँह के बल गिरने को होता है तो पहले ही उसे लीप अर्थात छलांग लगवा दिया जाता है. इस मामले में पवित्र रिश्ता को यह सौभाग्य हासिल हुआ कि जब वो 18 साल आगे बढ़ा तो इसकी टीआरपी और बेहतर हो गई. ऐसा ही एक और धारावाहिक है न बोले तुम न मैंने कुछ कहा 2 जिसने बिग बॉस के पहले अपना पहला सीज़न ख़त्म किया और 12 साल की छलांग के साथ दोबारा अच्छी टीआरपी ले कर वापस आया. लेकिन इन दिनों जिस धारावाहिक के लीप की सबसे ज़्यादा चर्चा है वह है बड़े अच्छे लगते हैं. इस धारावाहिक में पहले भी छह साल के लीप के साथ नन्ही पीहू की एंट्री हुई थी जिसने राम और प्रिया से अलग अपनी एक पहचान बना ली है. लेकिन इस बार 20 साल के लीप की ख़बर गर्म है हालांकि सोनी टीवी की तरफ़ से इसकी अधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं की गई है. कई टीवी धारावाहिकों में क्रियेटिव हेड रह चुकी ऋचा सिंह गौतम बताती हैं कि कई बार कॉंसेप्ट में ही जनेरेशन लीप की गुंजाईश होती है. हालांकि कई बार ऐसा भी होता है कि धारावाहिकों के कलाकार और उनकी भूमिका दर्शकों को काफ़ी पसंद आती है लेकिन एक वक़्त के बाद उसकी कहानी ख़त्म हो जाती है. ऐसे में नई कहानी गढ़ी जाती है जिसका फ़ायदा यह होता है कि धारावाहिक छ महीने या साल भर और चल जाता है बुनियाद जैसे पुराने धारावाहिक में एक सहज विकास क्रम में कोई जवान व्यक्ति बूढ़ा होता था लेकिन आजकल छलांग लगाने का फैशन हो गया है. बहरहाल इसकी कोई भी वजह हो लेकिन टीवी चैनल अपनी टीआरपी देखता है और दर्शक कहानी में अपनी दिलचस्पी लीप हो चाहे न हो. |
| DATE: 2013-06-01 |
| LABEL: entertainment |
| [1472] TITLE: मैं पुलिस की नहीं सुनती: विद्या |
| CONTENT: पिछले दिनों विद्या बालन ने कान फिल्म समारोह में बतौर ज्यूरी हाज़िरी लगाई. उन्हें कई बेहतरीन फिल्में देखना का मौका मिला और वो भी स्टीवन स्पीलबर्ग और आंग ली जैसी हस्तियों के साथ. भारत के लिए विद्या का बतौर ज्यूरी बनकर कान में जाना एक गर्व की बात मानी गई लेकिन फैशन पुलिस ने तब भी उनका पीछा नहीं छोड़ा. फैशन पत्रिकाओं द्वारा कभी उनकी साड़ी की आलोचना की गई तो कभी उनके ब्लाउज़ निशाने पर रहे. पिछले दिनों जब विद्या अपनी फिल्म घनचक्कर के एक गीत के प्रमोशन पर पहुंची तो उनसे पूछा गया कि फैशन पुलिस उनके कपड़ों के पीछे क्यों पड़ी रहती हैं इस पर विद्या का जवाब था मैं चोर नहीं हूं इसलिए मैं पुलिस की बात सुनती भी नहीं हूं. मैंने कान में कुछ बहुत बेहतरीन लोगों के साथ खूबसूरत फिल्में देखी हैं. इससे ज्यादा ज़रुरी मेरे लिए कुछ भी नहीं है. घनचक्कर में विद्या एक मुंहफट और बिंदास पंजाबी महिला का किरदार निभा रही हैं जो बहुत ही भड़कीले कपड़े पहनती है. विद्या ने बताया फिल्म में मेरा किरदार खुद को बेस्ट समझता है. इस महिला को लगता है कि वो सबसे अच्छा खाना बनाती है सबसे फैशनेबल है और ज़िंदगी खुलकर जीती है. असल में भी हमें ऐसी ज़िंदादिल महिलाओं की ज़रुरत है. फिल्म में विद्या ने पंजाबी बोली है जिसके लिए उन्होंने थोड़ी बहुत ट्रेनिंग भी ली है. पंजाबी सीखने के अपने अनुभव के बारे में विद्या ने कहा मैंने कभी भी पंजाबी नहीं बोली है. सबसे पहले मैंने गालियां सीखी क्योंकि भाषा सीखने का ये सबसे आसान तरीका है. अपने मोहल्ले की बात करते हुए विद्या ने बताया चैंबूर में मेरी पड़ोसन पंजाबी थी और मैंने उनको काफी बार सुना था तो बस उसे ही याद करके मैंने पंजाबी बोली उम्मीद है सही बोली हो. इस फिल्म में विद्या के साथ इमरान हाश्मी नज़र आएंगे. द डर्टी पिक्चर के बाद विद्या और इमरान की ये दूसरी फिल्म है जो कि एक कॉमिक थ्रिलर है. इमरान से जब पूछा गया कि क्या इस फिल्म में भी किसिंग सीन होगे तो जवाब मिला इस फिल्म के लिए किस से जुड़े किसी भी सवाल का जवाब नहीं दूंगा क्योंकि फिल्म के निर्माता विद्या के पति सिद्धार्थ रॉय कपूर हैं. इस फिल्म में इमरान एक ठग का रोल निभा रहे हैं जिसे भूलने की बीमारी होती है. फिल्म के निर्देशक राजकुमार गुप्ता हैं जिन्होंने नो वन किल्ड जेसिका बनाई थी. फिल्म 28 जून को रिलीज़ होगी. |
| DATE: 2013-05-31 |
| LABEL: entertainment |
| [1473] TITLE: 'भारत में महिलाओं के प्रति पिछड़ी सोच' |
| CONTENT: बॉलीवुड और हॉलीवुड में काम कर रही अभिनेत्री मल्लिका सहरावत अक्सर विवादों में रहती हैं और इस बार उनका महिलाओं के बारे में दिया बयान खासा चर्चा में है. मल्लिका ने कान समारोह में एक इंटरव्यू के दौरान ये कहकर मीडिया का ध्यान बटोर लिया कि महिलाओं के लिए भारत एक बेहद ही पाखंडी और पिछड़ी सोच वाला देश है जहां औरतों को सबसे निचले दर्जे पर रखा जाता है. मल्लिका के इस बयान पर अलग-अलग प्रतिक्रिया हो रही है. जहां कल्कि जैसी अभिनेत्री ने इसका समर्थन किया है तो प्रियंका चोपड़ा ने इसका विरोध किया है. मल्लिका ने ये भी कहा कि अब जब कि वो अपना आधा वक्त अमरीका में गुज़ारती हैं जहां उन्हें बहुत स्वतंत्रता मिलती है ऐसे में भारत जैसे देश में लौटना जहां औरतों की आज़ादी पर पाबंदी लगाई जाती है काफी दुखद होता है. मल्लिका की इस टिप्पणी से अभिनेत्री कल्कि केकलां काफी हद तक सहमत हैं. कल्कि कहती हैं कि भारत वाकई में महिलाओं के लिए पिछड़ी सोच रखता है शायद तभी शोरूम में अंतर्वस्त्र पहने पुतलों पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया जा रहा है. वहीं इससे उलट अभिनत्री प्रियंका चोपड़ा का मानना है कि मल्लिका ने जो कहा वो काफी दुखद है और एक भारतीय महिला का अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने देश का इस तरह वर्णन करना बिल्कुल ठीक नहीं है. प्रियंका मानती हैं कि भारत में हर जगह हालात अच्छे नहीं हैं लेकिन स्थिति इतनी निराशाजनक भी नहीं है जितनी मल्लिका बता रही है. निर्देशक विक्रम भट्ट ने कहा हमें मल्लिका को सीरियसली नहीं लेना चाहिए वो क्या बोलती हैं उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. वहीं टिस्का चोपड़ा के मुताबिक हो सकता है कि मल्लिका ने ये सब अपने अनुभव के आधार पर कहा हो. मल्लिका का भारत को औरतों के लिहाज़ से एक पिछड़ा देश बताना कितना सही है इस पर आप भी अपनी राय दे सकते हैं. |
| DATE: 2013-05-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1474] TITLE: ऋतु दा, सेक्शुएलिटी और सिनेमा |
| CONTENT: 49 साल की उम्र में 12 राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले फिल्मकार कम ही होते हैं. ऋतुपर्णो घोष ऐसा ही एक नाम थे जिनकी अकस्मात मृत्यु से सिर्फ बंगाली नहीं भारतीय सिनेमा सदमे में है. ऋतुपर्णो की पहली फिल्म हीरेर आंग्टी हीरे की अंगूठी 1994 में आई थी. निर्देशक कल्पना लाजमी ने बीबीसी को बताया कि जया बच्चन शबाना आज़मी औऱ भूपेन हज़ारिका ने इस फिल्म को बनाने में आर्थिक मदद की थी. कल्पना बताती हैं जब ऋतु बहुत प्रसिद्ध नहीं हुआ था भूपेन और मैं तब से उनकी फिल्में देख रहे हैं. उसमें इतनी एनर्जी थी कि वो एक साल में 2-3 फिल्में बना लेता था. सत्यजीत रे के बाद उसी की फिल्में भारतीय सिनेमा का अच्छा प्रतिनिधित्व करती थीं. हीरेर आंग्टी की अभिनेत्री मुनमुन सेन ने बीबीसी को बताया ऋतु ने मुझे अपनी पहली फिल्म हीरेर की स्क्रिप्ट पढ़कर सुनाई थी. मेरा छोटा सा ही रोल था लेकिन फिल्म बहुत अच्छी थी. उसने मुझसे वायदा किया था कि रायमा को अपनी हर फिल्म में लेगा. ऋतु ने एक हद तक अपना वायदा निभाया भी क्योंकि चोखेर बाली से लेकर नौकाडूबी और खेला उनकी लगभग हर फिल्म में रायमा सेन ने अभिनय किया है. मुनमुन सेन कहती हैं रायमा और रिया को वो अपनी बेटी समझता था. रायमा का सबसे अच्छा अभिनय नौकाडूबी में ही था. सिर्फ रायमा ही नहीं हिंदी सिनेमा का जाना-माना नाम एश्वर्या राय बच्चन ने भी अपने करियर की श्रेष्ठतम फिल्में ऋतुपर्णो के साथ ही की हैं. एश्वर्या की खूबसूरती के बाद उनकी अभिनय क्षमता की बात चोखेर बाली के बाद ही की गई थी. ऋतुपर्णो खुद को समलैंगिक मानते थे और अपनी सेक्शुएलिटी को लेकर वो काफी सहज भी थे. राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म मेमरीज़ ऑफ मार्च में उन्होंने एक समलैंगिक की भूमिका भी निभाई थी. फैशन शो हो या फिर पुरस्कार समारोह ऋतु महिलाओं की पोशाक में नज़र आते थे जिसके लिए वो कई बार मीडिया में चर्चा का पात्र भी बन जाते थे. बावजूद इसके वो बिना किसी झिझक या शर्म के महिलाओं के कपड़े पहनते थे और समलैंगिकता पर अपने विचार खुलकर व्यक्त करते थे. इस फिल्म में उनकी सहकलाकार रही दीप्ति नवल ने बीबीसी को बताया अपनी सेक्शुएलिटी को लेकर इतना सहज मैंने किसी को नहीं देखा. उसने मुझे बताया था कि एक बार अभिषेक बच्चन ने उसे ऋतु दा नहीं ऋतु दी कहा और ये बताते हुए उसकी आंखों में चमक थी. दीप्ति के अनुसार ऋतु सिर्फ पुरुषों और महिलाओं के ही नहीं हर मुद्दे को इतनी गंभीरता और संजीदगी से प्रस्तुत करते थे कि मैं क्या कहूं. उनकी अकस्मात मृत्यु से मैं बहुत सदमे में हूं. संगीत समीक्षक पवन झा बताते हैं कि ऋतु की फिल्मों में संगीत बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता था. समाज द्वारा अनदेखे मुद्दों को अपनी फिल्मों में एक अच्छी और साधारण भाषा में दिखाना यही ऋतुपर्णो की फिल्मों को औरों से हटकर बनाती है. |
| DATE: 2013-05-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1475] TITLE: बहन ने किया संजय दत्त की फ़िल्म का प्रमोशन |
| CONTENT: संजय दत्त ने जेल जाने से पहले पुलिसगिरी फ़िल्म की शूटिंग पूरी की थी. हाल ही में इस फ़िल्म का फर्स्ट लुक लॉंच हुआ जिसमें संजय की बहन प्रिया दत्त और उनके बहनोई कुमार गौरव मौजूद थे. फ़िल्म के निर्माता राहुल अग्रवाल ने कहा संजय के परिवार वाले इस मौके पर आ गए ये ही बहुत बड़ी बात है. मुझे नहीं लगता कि आपके या मेरे परिवार में ऐसा कुछ होता तो हम इतनी हिम्मत कर पाते. राहुल ने कहा मैं बता नहीं सकता कि मैं संजू के परिवार का कितना आभारी हूं. इसके बाद मुझे नहीं लगता कि मैं किसी मूंह से उनके पास दोबारा जा सकता हूं. वो जिन हालातों से गुज़र रहे हैं ऐसे में उनको प्रमोशन में बुलाना सही नहीं था लेकिन वो आए उसका धन्यवाद. इस मौके पर संजय की पत्नी मान्यता दत्त नहीं आई थी. सूत्रों के मुताबिक मान्यता नहीं चाहती थी कि फ़िल्म के प्रमोशन के लिए संजय दत्त के नाम का इस्तेमाल किया जाए. हालांकि राहुल ने कहा कि इसका जवाब मान्यता ही सही तरीके से दे सकती है. इस मौके पर प्रिया दत्त और कुमार गौरव थोड़े से वक्त के लिए ही आए और पुलिसगिरी की टीम को शुभकामनाएं देकर जल्दी चले गए. संजय दत्त को मिल रही सहानूभूति से इस फ़िल्म के सफल होने के कितनी संभावनाएं हैं इस पर निर्माता ने कहा मैं ऐसे पत्ते खेलना नहीं चाहता कि लोगों को लगे कि मैं किसी भी सहानूभूति का फायदा उठाना चाहता हूं. जो हुआ बुरा हुआ और मैं इस पर किसी मुद्दे से किसी भी तरह की पब्लिसिटी नहीं करना चाहता. फ़िल्म के निर्माता ने बीबीसी से एक बातचीत में बताया था पुलिसगिरी की शूटिंग के 25 दिन बचे थे जब ये फैसला आया कि 1993 मुंबई बम धमाकों के एक मामले में संजय को वापस जेल जाना होगा. संजय ने फ़िल्म की शूटिंग 25 नहीं बल्कि 20 दिनों में ही पूरी कर डाली. संजय 4 की जगह 8 घंटे हमारे साथ शूट करते थे. इससे पहले पुलिसगिरी तमिल तेलुगू और बांग्ला में भी बन चुकी है और ये फ़िल्म तीनों ही भाषाओं में सुपरहिट रही है. पुलिसगिरी के निर्देशक के एस रविकुमार है. ये फ़िल्म 5 जुलाई को रिलीज़ हो रही है. फ़िल्म में संजय की हीरोइन हैं प्राची देसाई. पिछले हफ्ते संजय दत्त को आर्थर रोड जेल से पुणे की येरवडा जेल भेजा गया. 53 साल के बॉलीवुड अभिनेता को आर्थर रोड जेल में डाल दिया गया था जिससे वह खुश नहीं थे. उनका कहना था कि वो जेल काफी छोटी है. 1993 में हुए मुंबई बम धमाके से जुड़े एक मामले में संजय दत्त डेढ़ साल की सज़ा पहले ही काट चुके हैं. उन्हें जेल में साढ़े तीन साल का समय और बिताना होगा. |
| DATE: 2013-05-30 |
| LABEL: entertainment |
| [1476] TITLE: काश सिर्फ काम ही सब कुछ होता: अभय देओल |
| CONTENT: अपनी पहली ही फ़िल्म सोचा न था के साथ अभय देओल ने इस बात का अहसास दिला दिया था कि वो किस तरह के अभिनेता हैं. अभय की अभिनय क्षमता उनकी हर फ़िल्म से ज़ाहिर होती चली गई. ओए लकी लकी ओए से लेकर शांघाई तक सभी फ़िल्मों में उनकी सराहना हुई. जल्द ही अभय रांझना में नज़र आएंगे. इसी सिलसिले में वो इन दिनों मीडिया से मिल रहे हैं. बीबीसी से एक खास बातचीत में अभय ने दिल खोलकर बात की. बीबीसी ने अभय से पूछा कि एक्टर तो वो अच्छे हैं लेकिन स्टार की श्रेणी में उनका नाम शामिल नहीं होता. क्या उन्हें इस बात से परेशानी होती है इस सवाल का जवाब देते हुए अभय कहते हैं देखिए स्टार पैदा नहीं होते हैं बनाए जाते हैं. एक बड़े स्टार के पीछे पैडिंग होती है. बड़ी अभिनेत्रियां बड़े निर्देशक उनके साथ काम करते हैं. लेकिन टैलेंट टैलेंट होता है जो आप किसी में ज़बरदस्ती पैदा नहीं कर सकते. हां आप किसी को सितारा ज़रूर बना सकते हैं. अपनी बात को पूरा करते हुए अभय कहते हैं किसी भी बड़े स्टार के पीछे एक पीआर मशीनरी काम करती है. मेरे पास उस तरह का सपोर्ट नहीं है. बिना सपोर्ट के स्टार बनना तो बड़ा मुश्किल है. अभय आगे कहते हैं अगर कल मैं दो चार फ़िल्में किसी बड़े निर्देशक और किसी बड़ी अभिनेत्री के साथ कर लूं तो मैं भी स्टार बन जाऊंगा. पर घूम फिर के बात यही है कि बिना पैडिंग के टैलेंट ज्यादा दूर तक नहीं जा सकता. काश सिर्फ काम ही सब कुछ होता. लेकिन आज के ज़माने में सच कुछ और ही है. इतना ही नहीं अभय तो यहां तक कहते हैं कि अगर लोग सोचते हैं कि अभिनेत्रियां सिर्फ कहानी पढ़ कर फ़िल्में चुनती है तो ये एक गलत धारणा है. अगर ये गलत है तो सच क्या है अभयइस सवाल के जवाब में अभय कहते हैं कि अभिनेत्रियां सबसे पहले ये जानना चाहती हैं कि जो फ़िल्म वो कर रही हैं उस फ़िल्म का हीरो कौन है. अभय ये भी कहते हैं कि इसमें अभिनेत्रियों की कोई गलती नहीं है बल्कि आजकल माहौल ही ऐसा है. अभय कहते हैं जब वो इंडस्ट्री में नए थे तब उन्हें इन बातों के बारे में पता नहीं था. उन्हें लगता था कि सिर्फ अच्छा काम करना ही सब कुछ है. लेकिन समय के साथ उनकी सोच में भी बदलाव आया है. हाल ही में अभय ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी भी खोली है. तो इस कंपनी को खोलने की कोई खास वजहअभय कहते हैं मैंने ऐसी कुछ फ़िल्में की थी जो अच्छी फ़िल्में थी लोगों को भी पसंद आई लेकिन कहीं न कहीं उन फ़िल्मों को निर्माताओं ने मार्केटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन में मार दिया. तो मैंने सोचा इन सब बातों से बचने के लिए क्यों न अपना ही कुछ शुरू किया जाए. अभय की कंपनी के तले बनने वाली पहली फ़िल्म का नाम है वन बाय टू. फ़िल्म में अभय के साथ उनकी गर्लफ्रेंड प्रीती देसाई काम कर रही हैं. |
| DATE: 2013-05-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1477] TITLE: बहारो फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है. |
| CONTENT: हाल ही में भारतीय सिनेमा ने 100 साल पूरे किए हैं. इस मौके पर बीबीसी एशियन नेटवर्क ने ऑनलाइन 100 गानों की एक सूची जारी की और अपने पाठकों को सूची में से अपना पसंदीदा गाना चुनने को कहा. इस पोल के नतीजे घोषित कर दिए गए हैं. मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाए बहारो फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है को सूची में नंबर एक का स्थान मिला है. ये रोमांटिक गाना 1966 में आई फिल्म सूरज का है और राजेंद्र कुमार और वैजयंतीमाला पर फिल्माया गया है. दूसरे स्थान पर जगह मिली है राज कपूर की फिल्म आवारा के टाइटल ट्रैक आवारा हूं को. वहीं तीसरे स्थान पर कब्ज़ा किया शाहरुख़ खान और काजोल की फिल्म दिल वाले दुलहनियां ले जाएंगे के गाने तुझे देखा तो ये जाना सनम ने. चौथे स्थान पर लता मंगेशकर का गया गाना अजीब दास्तां है ये रहा और पांचवे पायदान पर अमिताभ बच्चन और राखी की फिल्म कभी कभी का टाइटल ट्रैक कभी कभी मेरे दिल में रहा. मुग़ल-ए-आज़म का गाना प्यार किया तो डरना क्या इस सूची में आठवें स्थान पर रहा. सौ गानों की इस सूची में 1940 से लेकर 2010 तक की फिल्मों के गाने शामिल थे. इस सूची को तैयार करने वालों में हिप-हॉप कलाकार हार्ड कौर के साथ-साथ फिल्म समीक्षक राजीव मसंद भी शामिल थे. |
| DATE: 2013-05-28 |
| LABEL: entertainment |
| [1478] TITLE: अपने पत्ते धीरे-धीरे खोलूंगी: ऋचा चड्ढा |
| CONTENT: 25 साल की ऋचा चड्ढा ने अनुराग कश्यप की फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर में एक अधेड़ उम्र महिला का किरदार निभाया है. इससे पहले वो दिबाकर बनर्जी की फिल्म ओए लकी लकी ओए में हीरोइन नीतू चंद्रा की बड़ी बहन का रोल निभा चुकी हैं. अब उनकी एक और लीक से हटकर फिल्म आने वाली है फुकरे. क्या उन्हें इस बात का डर नहीं है कि उन पर ऐसे ही रोल करने का ठप्पा ना लग जाए और वो कमर्शियल फिल्मों में अपनी उम्र के हिसाब से ही रोल ना कर पाएंइस सवाल के जवाब में ऋचा चड्ढा ने कहा एक कलाकार को तो हर तरह के रोल करने चाहिए. चिंता मत करिए मैं आने वाली कुछ फिल्मों में मुख्य हीरोइन का रोल कर रही हूं. धीरे-धीरे अपने पत्ते खोलूंगीं. ऋचा चड्ढा ने आगे कहा कि वो चरित्र यानी कैरेक्टर रोल नहीं निभाना चाहतीं क्योंकि ऐसे रोल करने से किसी भी कलाकार का करियर ज़्यादा नहीं खिंच पाता. गैंग्स ऑफ वासेपुर में लगभग उन्हीं की उम्र की अभिनेत्री हुमा क़ुरैशी भी थीं जिन्होंने फिल्म में ऋचा की बहू का किरदार निभाया. उसके बाद हुमा ने एक थी डायन और लव शव ते चिकन खुराना जैसी फिल्म में रोमांटिक किरदार निभाए. तो क्या ऋचा इस रेस में हुमा से पिछड़ती हुई लग रही हैं. इसके जवाब में ऋचा बोलीं मुझसे तो लोग हुमा और अनुराग के अफ़ेयर के बारे में ही पूछते रहते हैं. मैं उनसे बोलती भी हूं कि मुझसे क्यों पूछते हो हुमा से ही पूछो ना. और रही बात करियर की तो हुमा भी अच्छी अभिनेत्री हैं. और इस तरह से दो कलाकारों के बीच मुक़ाबले की बातें मीडिया में आना कोई नई बात नहीं है. हम दोनों अपना-अपना काम कर रहे हैं और ख़ुश हैं. ऋचा कहती हैं कि उनके रोल को संवारने में अनुराग कश्यप और दिबाकर बनर्जी जैसे फिल्मकारों का बड़ा हाथ रहा है. वो कहती हैं गैंग्स ऑफ वासेपुर के लिए जब मुझे कई अवॉर्ड्स मिले तो अनुराग ने मुझे समझाया कि स्टार किड्स को एक फिल्म करके ही जो हासिल हो जाता है उसे हासिल करने के लिए तुम्हें पांच फिल्में करनी पड़ेंगी. इसलिए ज़्यादा फैलो मत. ऋचा की आने वाली फिल्म है फ़ुकरे जिसके निर्माता फ़रहान अख़्तर हैं. फिल्म में वो भोली पंजाबन नाम की एक लड़की का किरदार निभा रही हैं जो थोड़ा नकारात्मक किस्म का था. |
| DATE: 2013-05-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1479] TITLE: क्या पापा ऋषि कपूर की बात मानेंगे रणबीर? |
| CONTENT: साल 1951 में रिलीज़ हुई थी राज कपूर की क्लासिक आवारा. एक बाप और बेटे के संघर्ष की कहानी. पिता का रोल किया था असल ज़िंदगी में राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर ने और पुत्र बने थे ख़ुद राज कपूर. फिल्म काफी सराही गई और राज कपूर फिल्म इंडस्ट्री में एक स्थापित नाम बन गए. अब सालों बाद इसके रीमेक की सुगबुगाहट शुरू हो गई है. राज कपूर के बेटे ऋषि कपूर ने कथित तौर पर इसके रीमेक में दिलचस्पी दिखाई है. दरअसल ऋषि कपूर अपने बेटे रणबीर कपूर के साथ अभिनव कश्यप की फिल्म बेशरम में काम कर रहे हैं. मीडिया में छपी ख़बरों के मुताबिक ऋषि कपूर ने कहा है कि बेशरम में अपने बेटे के साथ काम करना उनके लिए एक तरह से तैयारी थी कुछ बड़ा करने की. अब आवारा का रीमेक बनाना उनके दिमाग़ में है. इसे वो दिवंगत राज कपूर द्वारा स्थापित किए गए आर के बैनर के तले बनाना चाहते हैं. लेकिन दिलचस्प बात तो ये है कि ऋषि कपूर के बेटे रणबीर कपूर इसे लेकर ख़ास उत्साहित नहीं है. जब उनसे आवारा के रीमेक प्लान पर पूछा गया तो वो बोले पहली बात तो ये है कि पापा ने कभी इस बारे में मुझसे चर्चा नहीं की. और दूसरी बात ये कि कपूर ख़ानदान का होने के नाते से नहीं बल्कि बतौर एक्टर मुझे लगता है कि आवारा का रीमेक बनाना मुमकिन नहीं है. उन्होंने कहा राज जी पृथ्वीराज जी नरगिस जी संगीतकार शंकर-जयकिशन जी ये वो सारे लोग हैं जिनकी वजह से आवारा बन सकी. मुझे नहीं लगता कि इनके बिना हम इसे बना सकते हैं. हमारी औकात नहीं कि हम इस फिल्म को टच कर सकें. बेशरम ऐसी पहली फिल्म होगी जिसमें रणबीर अपने पिता ऋषि कपूर के साथ काम कर रहे हैं. साथ में इसमें रणबीर की मां नीतू सिंह कपूर भी हैं. |
| DATE: 2013-05-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1480] TITLE: लता मंगेशकर ने क्यों नहीं की शादी? |
| CONTENT: दरअसल घर के सभी सदस्यों की ज़िम्मेदारी मुझ पर थी. ऐसे में कई बार शादी का ख़्याल आता भी तो उस पर अमल नहीं कर सकती थी. बेहद कम उम्र में ही मैं काम करने लगी थी. बहुत ज़्यादा काम मेरे पास रहता था. सोचा कि पहले सभी छोटे भाई बहनों को व्यवस्थित कर दूं. फिर कुछ सोचा जाएगा. फिर बहन की शादी हो गई. बच्चे हो गए. तो उन्हें संभालने की ज़िम्मेदारी आ गई. और इस तरह से वक़्त निकलता चला गया. 40 के दशक में जब मैंने फिल्मों में गाना शुरू ही किया था. तब मैं अपने घर से लोकल पकड़कर मलाड जाती थी. वहां से उतरकर स्टूडियो बॉम्बे पैदल टॉकीज जाती. रास्ते में किशोर दा भी मिलते. लेकिन मैं उनको और वो मुझे नहीं पहचानते थे. किशोर दा मेरी तरफ देखते रहते. कभी हंसते. कभी अपने हाथ में पकड़ी छड़ी घुमाते रहते. मुझे उनकी हरकतें अजीब सी लगतीं. मैं उस वक़्त खेमचंद प्रकाश की एक फिल्म में गाना गा रही थी. एक दिन किशोर दा भी मेरे पीछे-पीछे स्टूडियो पहुंच गए. मैंने खेमचंद जी से शिकायत की. ये लड़का मेरा पीछा करता रहता है. मुझे देखकर हंसता है. तब उन्होंने कहा अरे ये तो अपने अशोक कुमार का छोटा भाई किशोर है. फिर उन्होंने मेरी और किशोर दा की मुलाक़ात करवाई. और हमने उस फिल्म में साथ में पहली बार गाना गाया. 60 के दशक में मैं अपनी फिल्मों में गाना गाने के लिए रॉयल्टी लेना शुरू कर चुकी थी. लेकिन मुझे लगता कि सभी गायकों को रॉयल्टी मिले तो अच्छा होगा. मैंने मुकेश भैया ने और तलत महमूद ने एसोसिएशन बनाई और रिकॉर्डिंग कंपनी एचएमवी और प्रोड्यूसर्स से मांग की कि गायकों को गानों के लिए रॉयल्टी मिलनी चाहिए. लेकिन हमारी मांग पर कोई सुनवाई नहीं हुई. तो हमने एचएमवी के लिए रिकॉर्ड करना ही बंद कर दिया. तब कुछ निर्माताओं और रिकॉर्डिंग कंपनी ने मोहम्मद रफ़ी को समझाया कि ये गायक क्यों झगड़े पर उतारू हैं. गाने के लिए जब पैसा मिलता है तो रॉयल्टी क्यों मांगी जा रही है. रफी भैया बड़े भोले थे. उन्होंने कहा मुझे रॉयल्टी नहीं चाहिए. उनके इस कदम से हम सभी गायकों की मुहिम को धक्का पहुंचा. मुकेश भैया ने मुझसे कहा लता दीदी. रफ़ी साहब को बुलाकर आज ही सारा मामला सुलझा लिया जाए. हम सबने रफी जी से मुलाक़ात की. सबने रफ़ी साहब को समझाया. तो वो गुस्से में आ गए. मेरी तरफ देखकर बोले मुझे क्या समझा रहे हो. ये जो महारानी बैठी है. इसी से बात करो. तो मैंने भी गुस्से में कह दिया आपने मुझे सही समझा. मैं महारानी ही हूं. तो उन्होंने मुझसे कहा मैं तुम्हारे साथ गाने ही नहीं गाऊंगा. मैंने भी पलट कर कह दिया आप ये तक़लीफ मत करिए. मैं ही नहीं गाऊंगी आपके साथ. फिर मैंने कई संगीतकारों को फोन करके कह दिया कि मैं आइंदा रफ़ी साहब के साथ गाने नहीं गाऊंगी. इस तरह से हमारा तीन साढ़े तीन साल तक झगड़ा चला. उस दौर की सभी अभिनेत्रियों से मेरी अच्छी दोस्ती थी. नरगिस दत्त मीना कुमारी वहीदा रहमान साधना सायरा बानो सभी से मेरी नज़दीकियां थीं. दिलीप साहब मुझे अपनी छोटी बहन मानते हैं. नई अभिनेत्रियों में मुझे काजोल और रानी मुखर्जी पसंद हैं. मज़रुह सुल्तानपुरी जी की पत्नी से मेरी काफी अच्छी दोस्ती थीं. मैं उनके घर अक्सर जाती रहती थी. वो बड़ा अच्छा खाना बनाती थीं. उन्होंने मुझे काफी चीज़ें बनाना सिखाईं. मैं उन्हें अपनी गुरू मानती हूं. हम लोगों ने जब काम शुरू किया तो काफी मुश्किल दौर था. एक जगह से दूसरी जगह रिकॉर्डिंग के लिए भागना. बारिश में भीगते हुए धूप में तपते हुए इधर उधर जाना. लेकिन जो काम करते थे उसमें बड़ी संतुष्टि मिलती थी. बहुत मेहनत के साथ जो गाने गाते थे उन्हें सुनकर बड़ा अच्छा लगता. मुकेश भैया जैसे लोग बड़े याद आते हैं. इतने सज्जन थे वो कि पूछिए मत. और किशोर दा वो तो कमाल थे. उनके किस्से सुनाने बैठूंगी तो आप हंसते हंसते पेट पकड़ लेंगे. सच में बड़ा याद आता है वो ज़माना. |
| DATE: 2013-05-23 |
| LABEL: entertainment |
| [1481] TITLE: किशोर दा पर फ़िल्म से मधुबाला की बहन चिंतित |
| CONTENT: मशहूर गायक किशोर कुमार के जीवन पर आधारित एक फिल्म बनाई जा रही है जिसे अनुराग बासु निर्देशित करने जा रहे हैं. फिल्म में किशोर कुमार का रोल रणबीर कूपर निभाएंगे. पिछले साल अनुराग और रणबीर की फिल्म बर्फी आई थी जिसने अवार्ड समारोहों में काफी तारीफ बटोरी. बहरहाल किशोर कुमार पर बनने वाली ये फिल्म शुरु होने से पहले ही अभिनेत्री मधुबाला की बहन मधुर भूषण के लिए चिंता का विषय बन गई है. किशोर कुमार की पत्नी रहीं मधुबाला की बहन मधुर भूषण ने कहा है कि ये फिल्म बनाने से पहले उन्हें लिखित गारंटी चाहिए कि फिल्मकार उनकी बहन के चरित्र को आपत्तिजनक तरीके से प्रस्तुत नहीं करेंगे. इससे पहले एक राष्ट्रीय अख़बार ने ये ख़बर छापी थी कि मधुर भूषण ने फ़िल्म की शूटिंग रुकवाने की धमकी दी है. बीबीसी से बातचीत में मधुर ने स्पष्ट किया कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं है और अख़बार ने उनके वक्तव्य को गलत तरीके से छापा. मधुर कहती है मैं सिर्फ रणबीर कपूर और अनुराग बासु से मिलना चाहती हूं और ये सुनिश्चित करना चाहती हूं कि मेरे बहन का चित्रण घटिया तरीके से न किया जाए. वहीं बीबीसी से बात करते हुए अनुराग बासु ने कहा मधुर को ऐसा क्यों लगता है कि उनकी इजाज़त के बगैर ये फिल्म बनाई जाएगी. हमने किशोर कुमार के परिवार से भी मंजूरी ली है. ये तो एक ज़रुरी प्रक्रिया है. अनुराग कहते हैं मधुर को ऐसा क्यों लग रहा है कि ये फिल्म किशोर और मधुबाला की कहानी है. मुझे तो ये भी नहीं पता कि उनके बीच में जो सीन लिखे गए हैं वो फिल्म में रहेंगे भी या नहीं. वहीं मुधर का ये मानना है कि मधुबाला के बिना ये फिल्म नहीं बन पाएगी क्योंकि किशोर कुमार की चार पत्नियों में से मधुबाला उन्हें सबसे प्रिय थीं. जब बीबीसी ने मधुर से उनके इस डर के बारे में जाना चाहा तो जवाब मिला बहुत सारे चैनल ने मधुबाला की पुण्यतिथि पर कार्यक्रम किए जिसमें उनका नाम किसी हाजी मस्तान और पता नहीं किस-किस से जोड़ा गया. मधुर कहती हैं यहां तक की दिलीप कुमार से मधुबाला के अलगाव और बाद में उनकी मौत का कारण अब्बू को बताया जाता है जिसे सुनकर बहुत बुरा लगा. हां वो दिलीप कुमार से प्यार करती थीं इसमें गलत क्या है. बहुत सारी लड़कियां उन पर मरती थीं. अपनी बहन के बारे में बात करते हुए मधुर ने कहा 47 साल हो गए मधुबाला को गुज़रे. मैं उनकी बेटी समान हूं. हम भाई-बहनों में वो पांचवे नंबर पर थी और मैं ग्याहरवें. उनके बारे में कुछ भी गलत नहीं सुन पाऊंगी. मधुर ने बताया कि एक टीवी चैनल ने भी मधुबाला के ऊपर एक सीरीज़ बनाई थी जिससे पहले उनसे लिखित अनुमति ली गई थी. किशोर कुमार और मधुबाला की शादी 10 साल चली. इस बीच उन दोनों के बीच अलगाव की ख़बरें भी आईं जिसके बारे में मधुर कहती हैं कि पति-पत्नी के बीच झगड़े होते ही हैं लेकिन इससे किसी के चरित्र पर आंच नहीं आनी चाहिए. 27 साल की मधुबाला के दिल में छेद पाया गया था और वो गंभीर रुप से बीमार पड़ने के बाद 35 साल की उम्र में मधुबाला का देहांत हो गया था. |
| DATE: 2013-05-23 |
| LABEL: entertainment |
| [1482] TITLE: 'बिना कंडोम के डबल पैसे ले लो' |
| CONTENT: मुंबई का कमाठीपुरा इलाका. यहां पिछले दिनों अभिनेत्री वीना मलिक ने अपनी पहली फिल्म ज़िदंगी 50-50 के प्रमोशन के लिए कंडोम बांटे. इस फिल्म में एक वेश्या का रोल निभा रही वीना ने कहा कि अपने किरदार को समझने के लिए उन्होंने कई बार इस जगह के चक्कर लगाए. रेड लाइट एरिया के रूप में मशहूर ऐसे कई इलाकों से निकले किरदारों को हिंदी फिल्मों में जगह मिली है. फिर वो गुरुदत्त की प्यासा में वहीदा रहमान द्वारा निभाया गया गुलाबो का रोल हो या फिर पिछले साल रिलीज़ हुई आमिर खान की फिल्म तलाश में करीना कपूर का रोज़ी नाम का किरदार. हिंदी सिनेमा में वेश्यावृत्ति के इर्द-गिर्द कई फिल्में बनाई गई हैं लेकिन वीना मलिक का दावा है कि वो पहली कलाकार है जो अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए मीडिया के सामने इस इलाके में पहुंची हैं. कुछ वक्त पहले आमिर ख़ान ने अपनी फिल्म तलाश के संगीत लॉंच के लिए भी एक रेड लाइट एरिया का चयन किया था लेकिन बाद में ये कार्यक्रम मुंबई के एक होटल में किया गया था जिसे लाल बत्ती इलाके का रूप दिया गया था. ये इलाका फिल्मों के प्रमोशन के लिए ख़ासा ध्यान बटोरता है लेकिन कौन सी फिल्में यहां रहने वालों का ध्यान बटोरती हैं फिल्म प्रमोशन के लिए बंटने वाले कंडोम इस इलाके में रहने वाले सेक्स वर्कर के लिए असल में कितनी अहमियत रखते हैं कमाठीपुरा में रहने वाली नंदिनी एक किन्नर हैं जो बताती हैं पहले लोग बोलते थे कि बिना कंडोम के बैठो और डबल पैसे ले लो. अब भी कई लोग ज्यादा पैसों के लिए बिना कंडोम के सेक्स करने को राज़ी हो जाते हैं. लेकिन हम किन्नर लोग ऐसा नहीं करते. हमको पेट के लिए कमाने के लिए जीना है भई. जहां तक फिल्मों की बात है तो नंदिनी हंसते हुए कहती हैं कि बेचने के लिए फिल्म वालों को सब कुछ दिखाना पड़ता है पर ठीक है चलता है ये तो उनकी रोज़ी रोटी है. पिछले पंद्रह सालों से पद्मा वेश्यावृत्ति में हैं और उनका इस काम से जुड़ना किसी फिल्मी कहानी जैसा ही है. पद्मा ने बताया कि वो आंध्रप्रदेश की रहने वाली हैं और उन्हें शादी का झांसा देकर इस लाइन में धोखे से लाया गया. पद्मा ने दो साल बतौर बार-डांसर भी काम किया. फिलहाल उनकी एक बेटी है जिसे वो इस काम से दूर रखना चाहती हैं. अपनी बेटी की अच्छी पढ़ाई के लिए पद्मा अब भी रेड लाइट एरिया में काम करती हैं. अजित मांजरेकर समलैंगिक सेक्स वर्कर हैं और उन्हें लगता है कि हिंदी फिल्मों में उनके जैसे लोगों का चित्रण कुछ सही तरीके से नहीं होता. हालांकि अजित को दोस्ताना फिल्म में अभिषेक बच्चन का रोल पसंद आया था लेकिन फिर भी वो मानते हैं कि फिल्मों में समलैंगिक विषय के बारे में लोग खुलकर बात करने में हिचकिचाते हैं. शकीला को कमाठीपुरा में रहते हुए बारह साल हो गए है. वो फिल्में देखना पसंद करती हैं. शकीला के पसंदीदा हीरो सलमान खान है और जूही चावला भी उन्हें पसंद है. शकीला के मुताबिक करीना कपूर और कटरीना कैफ की फिल्में परिवार के साथ बैठकर नहीं देखी जा सकती. वहीं प्रिया की शादी हो गई है और उनके पति चायनीज़ रेस्तराँ में कुक हैं. दो बच्चों की मां प्रिया अब भी वेश्यावृत्ति में हैं और मानती हैं कि फिल्मों में वेश्याओं का सही चित्रण होता है. प्रिया को तब्बू की फिल्म चांदनी बार का क्लाइमेक्स देखकर बहुत दुख हुआ था. चांदनी बार में तब्बू ने एक बार गर्ल का रोल निभाया था. प्रिया कहती हैं ऐसी फिल्मों को देखकर सोचती हूं कि हम ऐसी लाइन में क्यों आ गए लेकिन फिर हमारा नसीब ख़राब था इसलिए आ गए. इसलिए ज्यादा सोचने का नहीं. |
| DATE: 2013-05-22 |
| LABEL: entertainment |
| [1483] TITLE: एक गिटार, जो बिका सवा दो करोड़ में |
| CONTENT: मशहूर बैंड बीटल्स के जॉन लेनन और जार्ज हैरिसन ने जिस गिटार को बजाया था वह एक नीलामी में चार लाख आठ हज़ार डॉलर यानी क़रीब दो करोड़ 24 लाख रुपए में बिका. परंपरागत रूप से बनाए गए इस गिटार को 1966 में वीओएक्स कंपनी ने बनाया था. न्यूयॉर्क में हुई नीलामी में इसे जिस अमरीकी नागरिक ने ख़रीदा उसकी पहचान उजागर नहीं हुई है. साल 1967 में आयोजित मैजिकल मिस्ट्री टूर के दौरान हैरिसन ने इस गिटार पर आई एम द वॉलरस बजाया था. उसी साल लेनन ने इसका उपयोग हेलो गुड बाय नाम के गीत के वीडियो में भी किया था. नीलामी घर जुलिएन का कहना है कि इसकी अनुमानित क़ीमत दो से तीन लाख डॉलर के बीच थी. लेकिन यह अपने अनुमानित क़ीमत से अधिक पर बिकी. इस गिटार को बजाने के बाद लेनन ने 1960 में इसे बीटल्स के सदस्य एलेक्स मैजिक के नाम से मशहूर एलेक्स मरदास को उनके 25वें जन्मदिन पर उपहार के रूप में दे दिया था. इस गिटार के पीछे लिखा हुआ है मैजिक एलेक्स एलेक्सी के लिए दोस्त होने के लिए शुक्रिया दो मई 1967 जॉन. मरदास ने इस गिटार को 2004 में बेच दिया था. |
| DATE: 2013-05-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1484] TITLE: कैंसर के डर से एंजलीना ने हटवाए अपने स्तन |
| CONTENT: हॉलीवुड अभिनेत्री एंजलीना जोली ने स्तन कैंसर से बचने के लिए एक ऑपरेशन कराया है. उन्हें प्रिवेन्टिव डबल मासटेकटॉमी ऑपरेशन से गुजरना पड़ा है जिसमें कैंसर से बचने के लिए दोनों स्तनों को आंशिक या फिर पूरी तरह हटा दिया जाता है. 37 वर्षीय एंजलीना ने न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित अपने लेख में ये सर्जरी कराने की बात कही है और इसकी वजह भी बताई है. एंजलीना ने कहा कि उनके डॉक्टरों का अनुमान है कि उन्हें स्तन कैंसर होने का जोखिम 87 प्रतिशत और अंडाशय कैंसर होने का जोखिम 50 प्रतिशत है. उन्होंने कहा कि मासटेकटॉमी की प्रक्रिया फ़रवरी में शुरू हुई और अप्रैल के आखिर में पूरी हो गई. माई मेडिकल चॉइस शीर्षक से लिखे लेख में एंजलीना ने बताया कि उनकी मां लगभग एक दशक तक कैंसर से लड़ती रहीं और 56 वर्ष की उम्र में इसी बीमारी से उनकी मौत हुई. एंजलीना के अनुसार वो चाहती हैं कि ये बीमारी उनके बच्चों से उनकी मां को न छीन पाए लेकिन ये सच्चाई है कि मेरे शरीर में एक खराब जीन बीआरसीए1 है जो स्तन कैंसर या अंडाशय कैंसर के खतरे को बहुत बढ़ा देता है. उन्होंने कहा कि एक बार जब उन्हें अपनी सच्चाई के बारे में पता चला तो उन्होंने डबल मासटेकटॉमी की नौ हफ्तों तक चलने वाली प्रक्रिया से गुजरने का फैसला किया. एंजलीना के अनुसार डबल मासटेकटॉमी कराने के बाद उन्हें कैंसर होने का जोखिम 87 प्रतिशत से घट कर 5 प्रतिशत रह गया है. उन्होंने ने अपनी डबल मासटेकटॉमी के दौरान प्यार और समर्थन के लिए अपने पार्टनर ब्रैड पिट की तारीफ की. साथ ही उन्होंने ये विश्वास जताया है कि ऑपरेशन के बाद उनके बच्चों को किसी तरह की असहजता नहीं होगी. वो कहती हैं मैं खुद को मजबूत महसूस कर रही हूं कि मैंने ये फैसला लिया और इससे मेरे स्त्रीत्व में किसी तरह की कमी नहीं आई है. एंजलीना आगे लिखती हैं जो भी महिला इसे पढ़ेगी मुझे उम्मीद है कि उसे पता चलेगा कि उसके पास विकल्प हैं. उनके अनुसार मैं हर महिला को प्रोत्साहित करना चाहती हूं खास तौर से उन्हें जिनके परिवार में स्तन कैंसर का इतिहास रहा है. मैं चाहती हूं कि वो इस बारे में जागरुक बनें और चिकित्सा विशेषज्ञों से मिलें जो उनकी जिंदगी के इस पहलू पर मददगार साबित हो सकते हैं. इसके बाद वो अपनी पसंद से फैसला करें. |
| DATE: 2013-05-14 |
| LABEL: entertainment |
| [1485] TITLE: 'कान' से काम नहीं बनेगा: नील |
| CONTENT: अभिनेता नील नितिन मुकेश की फिल्म शॉर्टकट रोमियो को कान फिल्म महोत्सव के दौरान लगने वाले बाज़ार में ले जाया जाएगा ताकि उसे अंतर्राष्ट्रीय ग्राहक मिल सके. पिछले दिनों फिल्म की हीरोइन अमिषा पटेल ने कान में अपनी फिल्म ले जाने की खुशी ज़ाहिर की थी. वहीं बीबीसी से एक बातचीत में नील ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि कान फिल्म महोत्सव के इर्द-गिर्द लगने वाले इस बाज़ार से उनकी और अमिषा की इस फिल्म का कुछ फायदा हो सकेगा. हालांकि कान फिल्म महोत्सव में आधिकारिक तौर पर जाने वाली भारतीय फिल्मों के बारे में नील ने सवाल उठाया कि क्यों हमेशा बॉम्बे टॉकीज़ जैसी फिल्म ही महोत्सव का हिस्सा बनती है नील कहते हैं हम क्यों फिल्मों को लेकर एक नज़रिया पाल लेते हैं ऐसा क्यों है कि बॉम्बे टॉकीज़ में चार कहानियां हैं इसलिए उसे कान में जाना चाहिए फिल्म फिल्म है और उसे हक़ है कहीं पर भी शोकेस होने का. शॉर्टकट रोमियो भी भारत की ही कहानी है भई साथ ही इसमें थोड़ा दिमाग भी है. अपनी फिल्म शॉर्टकट रोमियो के लिए नितिन ने कहा इस फिल्म के दर्शक भारत में ही है. सिंगल थिएटर में आगे बैठने वाले सीटी बजाने वालों के लिए ये फिल्म बनाई गई है लेकिन ऐसा नहीं है कि ये फिल्म मल्टीप्लेक्स में नहीं चलेगी. बल्कि अगर वहां नहीं दिखाई गई तो ये चिंता वाली बात होगी. शॉर्टकट रोमियो में नील भले ही कुछ टेढ़े मेढ़े रास्ते अपनाने वाले किरदार बने हो लेकिन असल जीवन की बात करते हुए नील कहते हैं कि वो अभी भी संघर्ष कर रहे हैं. नील का कहना है मेरे कंधे पर बहुत ज़्यादा बोझ है और सीढ़ियां चढ़ रहा हूं एक एक करके. मैं अपने दादू का पोता हूं अपने पिता का बेटा हूं और उनका नाम ऊंचा रखने के लिए मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ रही है जो बहुत ज़रुरी है. अपने अभिनय से आलोचकों का ध्यान बटोरने वाले नील मानते हैं समीक्षकों की प्रशंसा की बदौलत छः साल तो चल गया हूं लेकिन अगर आम जनता भी मेरे अभिनय को पसंद करने लगे तो बात बन सकती है. अगर शॉर्टकट रोमियो चल गई तो काफी बोझ उतर जाएगा. नील और अमिषा अभिनीत फिल्म शॉर्टकट रोमियो 21 जून को रिलीज़ होगी. |
| DATE: 2013-05-14 |
| LABEL: entertainment |
| [1486] TITLE: क्या दादा साहेब फाल्के भारत रत्न के हक़दार हैं? |
| CONTENT: मैंने ऐसी एक चिट्ठी पढ़ी थी जो मेरे दादाजी यानी दादा साहेब फाल्के ने अपने बड़े बेटे को लिखी थी. उसमें फाल्केजी ने लिखा था कि बेटा थोड़े पैसे भेज दो अभी ज़हर खाने को भी हमारे पास पैसे नहीं है. ये पत्र पढ़कर मेरा मन बहुत दुखी हुआ था. अंतिम दिनों में दादा साहेब की ये स्थिति हो गई थी. सिनेमा के सौ साल पूरा होने पर उनका उचित सम्मान यही होगा कि दादा साहेब को भारत रत्न दिया जाए. ये दर्द और शिकायत है दादा साहेब फाल्के के पोते किरण फाल्के की. आज भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरा होने पर जश्न मनाया जा रहा है. उनके नाम पर रखा गया दादा साहेब सम्मान तीन मई को प्राण को दिया गया. लेकिन इतना भर करना क्या काफी है तीन मई 1913 में धुंडीराज गोविंद फाल्के यानी दादा साहेब फाल्के ने राजा हरिश्चंद्र नाम की पहली भारतीय फीचर फिल्म रिलीज़ कर इतिहास रचा था. लेकिन ख़ुद दादा साहेब फाल्के ने अपने अंतिम दिन बहुत बुरे हालात में गुज़ारे. अभी कुछ दिन पहले 30 अप्रैल को उनका जन्मदिन था लेकिन मीडिया की सुर्खियों से वे ग़ायब ही रहे जबकि आमिर खान के 25 साल पूरे होने पर दिन भर 29 अप्रैल को खलबली मचती रही. दादा साहेब फाल्के के परिवार की केवल एक सदस्य ऐसी बची हैं जो फाल्के के साथ रह चुकी हैं- उनकी बेटी की बेटी यानी नातिन उषा पाटनकर. पूर्व में हुई और कुछ दिन पहले हुई बातचीत में उषा ने पुरानी यादों को टटोलते हुए बताया अपने अंतिम दिनों में दादा साहेब काफी बीमार थे और बूढ़े हो गए थे उनकी याददाश्त करीब-करीब जा चुकी थी. लेकिन जब मैं उन्हें दवा देने आती तो वे मुझसे सिनेमा की ही बातें करते बताते कि वे कौन सी फिल्म बनाना चाहते हैं. पूरे हाव-भाव से बताते कि उनकी फिल्म का सीन कैसे फ़िल्माया जाए कि वो अच्छा लगे. आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी लेकिन दादा साहेब के दिमाग़ में सिनेमा प्रोजेक्टर की बातें चलती थीं. उषा ने बातचीत के दौरान बताया कि दादा साहेब की मौत के बाद सब परिवारजनों के मन में बहुत कड़वाहट थी कि अंतिम दिनों में किसी ने भी साथ नहीं दिया और परिवारवालों को तो सिनेमा से नफरत सी हो गई थी. दादा साहेब फाल्के ने जब फिल्में बनानी शुरु की थीं तो बहुत अच्छे दिन भी देखे. ऊषा पाटनकर बताती हैं दादा साहेब की पत्नी यानी मेरी नानी बताया करती थीं कि फिल्मों से इतनी कमाई होती थी कि पैसे की गड्डियाँ बैलगाड़ी में भर-भर के लाई जाती थीं. जब हालत ख़राब हुई तो नानी अपने गहने बर्तन सब बेच डालती. दादा साहेब फाल्के ने लंका दहन मोहिनी भस्मासुर जैसी पौराणिक फिल्में बनाई. कहा जाता है कि उस समय उपलब्ध तकनीक की सीमाओं के बावजूद उन्होंने कई नायाब प्रयोग किए और भारतीय सिनेमा को नया आधार दिया. लेकिन फिल्मों में जैसे-जैसे ध्वनि और पैसे का बोलबाला बढ़ने लगा दादा साहेब फाल्के का दबदबा घटने लगा. फाल्केजी के पोते किरण बताते हैं कि नासिक में दादा साहेब के बंगले को सहेजने की कोई ख़ास कोशिश नहीं की गई. वो बहुत जर्जर हालत में था और बाद में उस ढहाकर नई इमारत खड़ी कर दी गई. हालांकि बंगले से कई बेशकीमती चीज़ें मिली. पोते किरण फाल्के बताते हैं दादा साहेब फाल्के की मौत के बाद उनके बेटों की आर्थिक हालत बहुत दयनीय थी. किसी तरह उन्होंने गुज़ारा किया. इसिलए दादा साहेब की चीज़ों को सहेजकर रखने के बारे में भी उनके बेटे बहुत कुछ नहीं कर पाए और हम बच्चों से सिनेमा वगैरह की बात नहीं करते थे. दादा साहेब की कुछ फिल्में तो इतनी ख़राब हो चुकी थी कि मेरे सामने ही पिताजी ने उन्हें जला दिया था. उनके कैमरे वगैरह का क्या हुआ कभी पता नहीं चला लेकिन उनकी कार बरसों बाद नासिक के पुराने बाज़ार में मिली जिसे अब रिस्टोर किया जा रहा है. ऊषा पाटनकर कहती हैं कि उनके नाना यानी दादा साहेब फाल्के दूरदृष्टा थे और जानते थे कि वो जिस उद्योग को खड़ा कर रहे हैं वो आगे जाकर बहुत फलने फूलने वाला है. इतना ही नहीं वे बहुत अच्छा खाना भी बनाते थे. लेकिन ऊषा ये स्वीकार करने से भी नहीं हिचकिचाती कि दादा साहेब विरोधाभासी हस्ती थे जिनमें बहुत सी खा़मियाँ भी थीं. करीब दो साल पहले हुई बातचीत में ऊषा ने दिल की बात कुछ यूँ रखी थी बड़ी हस्तियों और उनके उनके बच्चों के साथ कई बार ऐसा होता है- चाहे वो गांधीजी हों या तिलक. परिवार की ओर दादा साहेब का कोई ध्यान नहीं रह पाता था सिनेमा ही सब कुछ था. अपने बच्चों से वो सर्वश्रेष्ठ की ही उम्मीद करते थे. मेरे सबसे छोटे मामा तो पढ़ लिख भी नहीं पाए थे आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब थी. यही वजह है कि फ़िल्मों के प्रति फाल्के परिवार के सदस्यों की रुचि नहीं हुई. दादा साहेब बेहतरीन फिल्मकार थे पर उनमें बिज़नेस सेंस नहीं थी जिस वजह से फिल्म कारोबार में उनकी ये हालत हुई. किरण फाल्के ने बताया कि दादा साहेब की पत्नी सरस्वती बाई का भी अहम योगदान था. वे उनकी फिल्मों का संपादन करती थीं फिल्म को दीए के प्रकाश में धोना सब कलाकारों के लिए खाना बनाना. सब काम वही किया करती थीं. फाल्के की बड़ी बेटी मंदाकिनी को पहली बालिका कलाकार माना जाता है जिन्होंने कालिया मर्दान में काम किया था. दादा साहेब की पहली फिल्म बनाने के संघर्ष पर कुछ साल पहले मराठी में फिल्म बनी थी हरीशचंद्राची फैक्ट्री जिसे भारत ने ऑस्कर के लिए भी नामांकित किया था. फिल्म के निर्देशक परेश मोकाशी ने दादा साहेब पर काफी अध्ययन किया था. वे कहते हैं फाल्केजी विचित्र मिश्रण वाले इंसान थे. उस एक व्यक्ति में बहुत बड़ा शास्त्री भी छिपा है कलाकार भी है लेकिन वे बहुत इसेंट्रिक भी थे. वो जानते थे कि अगर फिल्मों को उद्योग का दर्जा मिलता है तो ये कितना क्रांतिकारी कदम होगा. आज दादा साहेब फाल्के के परिवारवालों की बस इतनी सी ख़्वाहिश है कि जब सिनेमा के 100 साल का जश्न मनाया जा रहा है तो उन्हें भारत रत्न से नवाज़ा जाए. |
| DATE: 2013-05-06 |
| LABEL: entertainment |
| [1487] TITLE: वो 'माँ' और 'मौसी' जो 'विजय' और 'गब्बर' से कम ना निकले |
| CONTENT: भारतीय सिनेमा अपने 100 साल पूरे कर रहा है. अगर हिंदी फ़िल्मों की बात करें तो हर दौर में कई अभिनेता और अभिनेत्रियाँ ऐसी होती हैं जो उस समय लोगों के दिलों पर राज करती हैं. लेकिन इनके अलावा कुछ कलाकार ऐसे भी हैं जो अपने दौर की तकरीबन हर फ़िल्म में होते हैं- जो न हीरो होते हैं न विलेन न कॉमिडियन लेकिन इनके बगैर फ़िल्म अधूरी सी ही लगती है यानी कैरेक्टर आर्टिस्ट. सिनेमा के 100 साल के मौके पर आइए नज़र डालते हैं चुनिंदा चरित्र अभिनेताओं पर जिन्होंने हिंदी सिनेमा को कई बेशकीमती पल दिए हैं. हाशिए पर रहते हुए भी ये अपना काम करते रहे हैं. मेरे पास माँ है फ़िल्म दीवार का ये डायलॉग हिंदी सिनेमा के सबसे मशहूर संवादों में से एक है. अमिताभ बच्चन के सवाल में शशि कपूर ये संवाद अपनी फ़िल्मी माँ निरूप रॉय के लिए बोलते हैं. निरूपा रॉय हिंदी फ़िल्मों की सबसे मशहूर माँओं में से एक हैं. 70 और 80 के दशक में अकसर अमिताभ बच्चन की फ़िल्मों में वे दिखती थीं- अमर अकबर एंथनी मर्द आदि- ज़ुल्म सहती दुखियारी माँ. यहाँ तक कि 1999 में आई लाल बादशाह में भी वो अमिताभ की माँ बनी थीं. कहा जाता है कि 40 के दशक में निरूपा रॉय और उनकी पति एक विज्ञापन देखने के बाद फ़िल्म ऑडिशन में गए. पति को तो रोल नहीं मिला लेकिन निरूपा रॉय फ़िल्मकारों को भा गईं. 40 और 50 के दशक में उन्होंने कई धार्मिक फ़िल्मों में मुख्य रोल निभाए और बाद में वो माँ के रोल में दिखने लगीं. दो बीघा ज़मीन में उनका रोल यादगार रहा. वर्ष 2004 में उनका निधन हुआ. 60 70 या 80 की हिंदी फ़िल्मों में पुलिस अफ़सर के रोल की कल्पना करें तो आँख बंद करते ही अभिनेता इफ़्तिखार का चेहरा ज़हन में आता है. 30 के दशक में अपने करियर की शुरुआत करने वाले इफ़्तिखार ने पहले कई लीड किए लेकिन लोग उन्हें बाद के दौर में चरित्र भूमिकाओं से ही ज़्यादा जानते हैं मसलन डॉन का डीएसपी डि सिल्वा या जंज़ीर का पुलिस कमिश्नर. रौबदार आवाज़ हाथ में सिगार फ़िल्मी पर्दे पर उनका अलग ही अंदाज़ था. जब वो पुलिस की वर्दी में नहीं होते थे तो अकसर काला कोट पहने वकील या फिर जज की कुर्सी पर दिखते थे. कुछ फ़िल्मों में उन्होंने नेटेगिव रोल भी किए. बताया जाता है कि वो अच्छे पेंटर भी थे. नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है अगर आपको ये गाना याद है तो चरित्र अभिनेता डेविड अब्राहम को ज़रूर पहचान लेंगे. 1954 में आई फ़िल्म बूट पॉलिश में जॉन चाचा के किरदार के लिए उन्हें फ़िल्मफेयर मिला था और ये फ़िल्म कान में नामांकित हुई. हिंदी फ़िल्मों में काम करने वाले वे चंद यहूदी कलाकारों में शामिल हैं. चार दशक के अपने करियर में उन्होंने कई यादगार फ़िल्मों में चरित्र अभिनेता का काम किया. चाहे वो चुपके-चुपके में हरिपद भईया हो या गोलमाल का डॉक्टर केदार. फ़िल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे बताते हैं कि पहले फ़िल्मफेयर पुस्कार के होस्ट डेविड ही थे. और उसके बाद शायद ही कोई बड़ा कार्यक्रम ऐसा होता था जिसके होस्ट डेविड नहीं होते हों. उनकी हस्ती का एक पहलू और भी था. डेविड अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती के खेल में रेफरी भी थे. जयप्रकाश चौकसे के मुताबिक वे ओलंपिक में भी बतौर रेफरी गए हैं. उनका कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ था. आप शायद ही यकीन करें कि ललिता पवार मूक फ़िल्मों के दौर की लोकप्रिय हीरोइन थी. कहा जाता है कि 40 के दशक में एक फ़िल्म की शूटिंग में सह अभिनेता भगवान दादा ने उनके चेहरे पर इतनी ज़ोर से थप्पड़ मारा कि उनका चेहरा और आँख ख़राब हो गई. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और चरित्र भूमिकाएँ करने लगीं ख़ासकर खलनायिका की. अपने चेहरे और आँख की विकृति को भी वे अपने अभिनय का हिस्सा बना लेती थी. राजकपूर के साथ आई फ़िल्म अनाड़ी और श्री 420 में फ़िल्माए कुछ दृश्यों को उनके बेहतरीन दृश्यों में गिना जाता है. अनाड़ी के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेत्री का फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी मिला. प्रोफेसर में तो उनके लिए रोमांटिक ट्रैक भी था. बाद में टीवी पर मंथरा के रोल में तो उन्हें ख़ूब लोकप्रियता मिली. इतना सन्नाटा क्यों है भाई ये डायलॉग सुनते ही शोले के रहीम चाचा यानी अभिनेता एके हंगल का चेहरा उभर आता है. बूढ़े दयालु इंसान का रोल गाँव के स्कूल के मास्टरजी घर का वफादार नौकर का या मस्जिद के नर्मदिल इमाम. ये रोल जैसे एके हंगल के लिए ही बने थे. लोगों ने उन्हें हमेशा बुज़ुर्ग के रोल में ही देखा. क्यों कि अपना पहला रोल उन्होंने 50 साल की उम्र में किया. उससे पहले अवतार कृष्ण हंगल यानी एके हंगल आज़ादी की लड़ाई में लगे रहे शुरु में वे दर्जी का काम किया करते थे और फिर थिएटर में लगे रहे. 1966 में आई तीसरी कसम से वे पर्दे पर आए. उसके बाद उन्होंने कई फ़िल्मों में चरित्र भूमिकाएँ की. वे फ़िल्म लगान का भी हिस्सा थे. रोल कुछ वैसा ही शंभू काका. ओमप्रकाश ने 50 से लेकर 80 के दशक तक कई बेहतरीन चरित्र भूमिकाएँ निभाईं. वे अपनी कॉमिक टाइमिंग के लिए ख़ासतौर पर जाने जाते थे. ऋषिकेश मुखर्जी की चुपके-चुपके तो एक तरह से उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है जिसमें वो शर्मिला टैगोर के जीजाजी का रोल करते हैं. शराबी में मुंशी फूलचंद चमेली की शादी में मस्तराम पहलवान या शराब की खाली बोतल लेकर घूमता जंज़ीर का डिसिल्वा उनके यादगार रोल में से है. वे किसी न किसी रोल में लगभग हर दूसरी फ़िल्म में नज़र आया करते थे. उन्होंने राज कपूर और दिलीप कुमार जैसे दिग्गजों के साथ भी काम किया. लीला मिश्रा यानी शोले की मौसी को आखिर कौन भूल सकता है. उस एक रोल ने उन्हें लोगों के ज़हन में हमेशा ज़िंदा रखा है. हिंदी फ़िल्मों में मौसी काकी चाची दादी के रोल पर जैसे उनका हक़ था. 80 और 90 का दशक आते-आते अनुपम खेर चरित्र अभिनेता के तौर पर छा गए. हालांकि उनकी पहली फ़िल्म सारांश में वे ही मुख्य रोल में थे लेकिन बाद में कई फ़िल्मों में उन्होंने सहायक या चरित्र रोल किए. अपने दमदार अभिनय से उन्होंने कैरेक्टर रोल को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया. तेज़ाब परिंदा लम्हे चांदनी हम आपके हैं कौन दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे. एक से एक हिट फ़िल्मों का वो हिस्सा बनते रहे. चाहे डैडी का टूट चुका और शराब में डूबा पिता हो या डीडीएलजे का हंसमुख और ज़िंदादिल पिता या प्रॉपर्टी एजेंट के झाँसे में फँसा खोसला का घोंसला का कमल किशोर खोसला. उन्होंने हर रोल में अपना लोहा मनवाया है. अब तो वे हॉलीवुड तक पहुँच गए हैं. 90 के दशक में वो छोकरी के लिए जब परेश रावल ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता तो सबकी नज़रों में छा गए. गुजरात की पृष्टभूमि वाले परेश रावल ने शुरु में ज़्यादातर नेगेटिव रोल किए. 90 के दशक की सारी बड़ी फ़िल्मों में परेश रावल का नाम शामिल रहता था- हीरो नंबर वनचाची 420 बड़े मियाँ छोटे मियाँ तमन्ना. हेरा फेरी के बाबूराव का उनका किरदार बेहद मशहूर हुआ. नई सदी में भी उनका जलवा कम नहीं पड़ा है. ओ माई गॉड चीनी कम ओए लकी लकी ओए इसकी मिसाल है. उन्होंने सरदार जैसी फ़िल्में भी की हैं जो मुख्यत उन्हीं पर केंद्रित है. 21वीं सदी में अगर किसी हिंदी अभिनेता ने चरित्र भूमिकाओं पर राज किया है तो वो हैं बमन ईरानी. बमन पहले फ़ोटोग्राफ़र थे और बाद में थिएटर से जुड़े. 2003 में डॉक्टर अस्थाना के रोल से वे सुर्खियों में आए. उसके बाद मैं हूँ न लगे रहो मुन्नाभाई थ्री इडियट्स डॉन वेल डन अब्बा जैसी फ़िल्मों में दिख चुके हैं. कई लोग मानते हैं बमन ने बहुत देर से फ़िल्मों में एंट्री की. हालांकि वे ख़ुद ऐसा नहीं मानते. लंदन में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने मुझसे कहा था कि अगर वो बतौर हीरो आते तो सुपरफ्लॉप होते. |
| DATE: 2013-05-01 |
| LABEL: entertainment |
| [1488] TITLE: भारतीय अभिनेत्रियाँ महज़ एक 'सेक्स सिंबल'? |
| CONTENT: प्रकृति का नियम है जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है वैसे-वैसे चीज़ें ढलने लगती हैं. लेकिन बात अगर भारतीय सिनेमा की हो तो 100 साल का होने जा रहा ये सिनेमा दिन ब दिन जवान होता जा रहा है. सन 1913 में दादा साहेब फ़ाल्के की मूक फिल्म राजा हरिश्चन्द्र से अपनी शुरुआत करने वाले भारतीय सिनेमा की शतकीय पारी तीन मई 2013 को पूरी हो रही है. इन 100 सालों में सिनेमा ने एक नहीं कई बदलाव देखें हैं. लेकिन एक बात जो नहीं बदली वो है फिल्मों में अभिनेत्रियों की प्रस्तुति. शायद अभिनेत्रियों को मात्र एक खूबसूरत वस्तु की तरह प्रस्तुत करने की सोच की वजह से ही ज़्यादातर फिल्मों में उन्हें कम और उत्तेजक वस्त्रों में दिखाया गया और ये सिलसिला आज भी बरक़रार है. क्या आप जानते हैं कि फिल्मों में इस सिलसिले की शुरुआत हुई कहां सेबीडी गर्गा ने अपनी किताब सो मेनी सिनेमाज़- द मोशन पिक्चर इन इंडिया में लिखा है कि सन 1921 में आई फिल्म सती अनुसूया में पहली बार किसी भारतीय फ़िल्म में नग्न दृश्य दिखाया गया था. इस दृश्य में सकीनाबाई नाम की एक अभिनेत्री को पूर्ण नग्न दिखाया गया. इस किताब के मुताबिक ये सीन फिल्म में कुछ ही क्षणों के लिए था. हालांकि किताब में लिखे इस तथ्य को फिल्म शास्त्री और समीक्षक जय प्रकाश चोकसे सत्यापित नहीं करते. वो कहते हैं इसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है लेकिन ये संभव इसलिए है क्योंकि 1918 में जब ब्रितानी सरकार ने भारत में सेंसरशिप एक्ट लागू किया उस वक़्त इस एक्ट में सिर्फ एक धारा थी कि देश भक्ति का प्रचार करने वाली फिल्मों को रोक दिया जाए. नग्नता और चुंबन के खिलाफ इस एक्ट में कोई धारा नहीं थी. चोकसे की अगर मानें तो 1922 में आई फिल्म पति पत्नी में इटली की अभिनेत्री मिनैली ने कुछ बहुत ही बोल्ड दृश्य दिए थे. उसके बाद 1942 में बेगम पारा नाम की अभिनेत्री ने चांद फिल्म में कुछ बेहद उत्तेजक दृश्य किए. चोकसे कहते हैं बेगम पारा की एक बहुत ही बोल्ड तस्वीर 1943 में छपी लाइफ पत्रिका के कवर पर भी आई. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सैनिक अपने बंकरों में बेगम पारा की यही तस्वीर चिपका के रखते थे. कम या ज्यादा लेकिन फिल्मों में अंगप्रदर्शन करने वाली अभिनेत्रियों की सूची बहुत लम्बी है. इस सूची में आप बेगम पारा से लेकर नलिनी जयवंत नर्गिस वैयजंती माला शर्मीला टैगोर बिंदु ज़ीनत अमान डिंपल कपाडिया सिमी ग्रेवाल मन्दाकिनी से लेकर आज के दौर की कई अभिनेत्रियां जैसे नंदिता दास मल्लिका शेरावत ईशा गुप्ता विद्या बालन और बिपाशा बासु के नाम शामिल कर सकते हैं. इस सूची में प्रादेशिक सिनेमा की अभिनेत्रियों भी शामिल हैं. भारतीय सिनेमा में स्त्री को यूं कामुक रूप में या फिर नग्न या अर्धनग्न रूप में प्रस्तुत किए जाने की बात हो और महान् चित्रकार राजा रवि वर्मा का ज़िक्र न हो ये कैसे हो सकता है. जयप्रकाश चोकसे कहते हैं हिंदुस्तानी सिनेमा में आप जब भी नग्नता बोल्डनेस या फिर कामुकता की बात करें तो आपको राजा रवि वर्मा की तस्वीरों की बात करनी ही चाहिए क्योंकि उनकी चित्रकारी का भारतीय सिनेमा पर गहरा प्रभाव रहा है. अगर आपको राम तेरी गंगा मैली में मंदाकिनी का वो दृश्य याद है जिसमें वो झरने के नीचे सफ़ेद साड़ी में नहा रही हैं तो ठीक वैसी ही एक पेंटिंग राजा रवि वर्मा की भी है. ये सब तो ठीक है लेकिन फिर भी एक सवाल जो अकसर कई लोग उठाते हैं वो ये कि क्या फिल्मों में अभिनेत्रियों का यूं सेक्स सिंबल के तौर पर इस्तेमाल करना सही है इस बारे में क्या राय रखती हैं टीवी और फिल्म निर्माता एकता कपूर जिन्होंने रागिनी एमएमएस लव सेक्स और धोका और द डर्टी पिक्चर जैसी फिल्मों का निर्माण किया है. दिल्ली में सिनेमा के 100 सालों पर आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंची एकता कहती हैं जहां तक फिल्मों में नग्नता का सवाल है हम हमेशा से ये सुनते आ रहे हैं कि फिल्मों में औरतों को एक भोग विलास की वस्तु की तरह पेश मत करो हीरोइन को कम कपड़ों में मत दिखाओ. जो लोग ऐसी बातें करते हैं मैं उनसे ये पूछना चाहती हूं कि जब जॉन अब्राहम अपने कपड़े उतारते हैं तब किसी को कोई आपत्ति क्यों नहीं होतीअपनी फिल्म द डर्टी पिक्चर के बारे में बात करते हुए एकता कहती हैं जब हमने ये फिल्म बनाई सबने हमसे ये कहा कि आप कैसे एक औरत की कामुकता को इस तरह से दिखा सकते हैं. मुझे पता था कि इस फिल्म को बनाकर मुझे पैसों का भरी नुकसान झेलना पड़ सकता है लेकिन फिर भी मैंने ये फिल्म इसलिए बनाई क्योंकि मैं चाहती थी कि समाज एक स्त्री की शारीरिक ज़रूरतों के बारे में भी समझे और एक स्त्री के शरीर को सिर्फ अपने भोग की वस्तु न समझे. एकता जो कह रही हैं शायद वो अपनी जगह ठीक हो. लेकिन कुछ फिल्मकार ऐसे भी हैं जो इस बारे में ये दलील देते आए हैं कि वो तो अपनी फिल्मों में वही दिखाते हैं जो दर्शक देखना चाहते हैं. फिल्मों में स्त्री की अभिव्यक्ति कैसे हो इस बात पर बहस और मतभेद शायद हमेशा रहे. ये सवाल भी हमेशा उठे कि फिल्मों में अभिनेत्रियों को कामुक अंदाज़ में पेश करना ठीक है या नहीं. शायद फिल्मकार इसे अपनी कलात्मक स्वतंत्रता कहें. लेकिन ये सवाल शायद अब भी बरक़रार है कि क्या कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी करना या दिखाना ठीक है. इस सवाल का जवाब खोजने में अगले 100 तो नहीं पर हां एक लम्बा समय ज़रूर लग सकता है. |
| DATE: 2013-04-29 |
| LABEL: entertainment |
| [1489] TITLE: काश मैं इस दौर में हीरोइन होती: माला सिन्हा |
| CONTENT: प्यासा धूल का फूल दिल तेरा दीवाना गुमराह और हिमालय की गोद में जैसी चर्चित फिल्मों की अभिनेत्री माला सिन्हा मौजूदा दौर के सिनेमा से खासी प्रभावित हैं. मुंबई में दादा साहब फाल्के अकैडमी द्वारा आयोजित एक समारोह में पहुंची माला सिन्हा कहती हैं मैं मानती हूं कि सिनेमा में आया बदलाव अच्छा है. हमारे ज़माने में फिल्में खासी धीमी गति से बनती थीं. अब तो तकनीक काफी उन्नत हो गई है. काश मैं इस ज़माने में काम कर रही होती. उन्होंने आगे कहा हम आज के ज़माने में होते तो सच में खासा मज़ा आता. तकनीक की मदद से हमें काफी स्टंट्स करने को मिलते और हम इसका लुत्फ उठाते. माला सिन्हा ने 60 और 70 के दशक में कई फिल्मों में अपनी खूबसूरती और अभिनय से दर्शकों का दिल जीता. बीआर चोपड़ा की फिल्म गुमराह को वो अपनी पसंदीदा फिल्म मानती हैं. इसमें उनके साथ सुनील दत्त अशोक कुमार और निम्मी की मुख्य भूमिका थी. इस समारोह में निम्मी भी माला सिन्हा के साथ मौजूद थीं. माला सिन्हा फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा होने पर गर्व महसूस करती हैं. उन्होंने कहा फिल्म इंडस्ट्री ने कोलकाता से आई मेरे जैसी सामान्य लड़की को बुलंदियों पर पहुंचाया. इसी ने मेरे अंदर के टैलेंट को एक प्लेटफॉर्म दिया. भारतीय सिनेमा के पितामह कहे जाने वाले दादा साहब फाल्के का जन्मदिन 30 अप्रैल को है. उन्हें याद करते हुए माला सिन्हा कहती हैं दादा साहब की वजह से ही हम सभी कलाकारों की आज तक दाल रोटी चल रही है. वो ना होते तो हम में से कोई भी ना होता. इसी उपलक्ष्य में दादा साहब फाल्के अकादमी द्वारा आयोजित एक समारोह में आशा भोसले माला सिन्हा प्रेम चोपड़ा दिवंगत यश चोपड़ा और राजेश खन्ना जैसी हस्तियों को सम्मानित किया जाएगा. |
| DATE: 2013-04-27 |
| LABEL: entertainment |
| [1490] TITLE: 'कामसूत्र 3 डी' लेकर फ़्रांस जाएँगी शर्लिन |
| CONTENT: शर्लिन चोपड़ा की चर्चित फिल्म कामसूत्र 3 डी इस साल कान फिल्म समारोह में दिखाई जाएगी. माना जाता है कि कान फिल्म समारोह में दुनिया भर की उत्कृष्ट समझी जानी वाली फिल्में दिखाई जाती हैं. और इसे विश्व भर के उच्च गुणवत्ता वाले सिनेमा का जश्न माना जाता है. फिर शर्लिन की कामसूत्र भी क्या इसी नज़रिए से दिखाई जा रही है. जवाब दिया फिल्म के निर्देशक रुपेश पॉल ने. बीबीसी से खास बात करते हुए उन्होंने बताया दरअसल हम अपनी फिल्म के लिए खरीदार तलाशने कान जा रहे हैं. कान फिल्मों की बिक्री के लिए एक तरह से प्लेटफॉर्म का काम भी करता है. रुपेश ने कहा कि समारोह में फिल्म का अनकट संस्करण दिखाया जाएगा ताकि अंतरराष्ट्रीय मार्केट के लिए हम खरीदार खोज सकें. ये अनकट संस्कऱण भारत में रिलीज़ नहीं होगा. इसमें पूर्णत नग्न दृश्य होंगे. रुपेश के मुताबिक कान फिल्म समारोह फिल्मों के प्रमोशन के लिए काफी उपयुक्त जगह है. पहले इस फिल्म को टू डी में रिलीज़ किया जाएगा और बाद में थ्री डी में. शर्लिन से इस संबंध में संपर्क साधने की कोशिश की गई लेकिन वो केरल में एक टीवी शो की शूटिंग में व्यस्त हैं. कान फिल्म समारोह 15 मई से 26 मई तक चलेगा और इस बार इसकी जूरी में भारतीय अभिनेत्री विद्या बालन भी होंगी. शर्लिन चोपड़ा का नाम तब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उछला था जब मशहूर प्लेब्वॉय पत्रिका के लिए उन्होंने नग्न फोटोशूट कराया. हाल ही में पत्रिका का ये संस्करण बाज़ार में आया. इसके बाद उनके पास द वीक फैंटेसी जीआर 8 हेल्थ एंड न्यूट्रीशन मॉडल एंड ट्रेंड्स परफेक्ट वूमन एंड मैंस वर्ल्ड ई दूसरी पत्रिकाओं में फोटोशूट के ऑफर आने लगे. |
| DATE: 2013-04-26 |
| LABEL: entertainment |
| [1491] TITLE: गिनिथ पैल्ट्रो दुनिया की 'सबसे खूबसूरत' महिला |
| CONTENT: ऑस्कर विजेता हॉलीवुड अभिनेत्री गिनिथ पैल्ट्रो को मशहूर पीपुल मैग्ज़ीन ने अपने सर्वे में विश्व की सबसे खूबसूरत महिला करार दिया. इससे पहले पॉप सिंगर बेयॉन्से जूलिया रॉबर्ट्स और जेनिफर लोपेज़ को ये खिताब मिल चुका है. पैल्ट्रो 40 वर्ष की हैं और दो बच्चों की मां हैं. वो अपनी खूबसूरती का श्रेय अपने नियमित वर्कआउट और परिवार को देती हैं. वो कहती हैं मैं बहुत रोमांचित महसूस कर रही हूं. मैं अब कोई 20 साल की तो हूं नहीं इसलिए ये खिताब और भी अहम हो जाता है. मां होने का अहसास अपने आप में ही बहुत खूबसूरत है. हर नया दिन मेरे लिए एक तोहफे की तरह होता है. मेरा परिवार मुझे जवां महसूस कराने और मेरी खूबसूरती के लिए ज़िम्मेदार है. उन्होंने बताया कि जब वो शूटिंग नहीं कर रही होती तो मेकअप बिलकुल नहीं करतीं. पैल्ट्रो इन दिनों अपनी सुपरहीरो फिल्म आयरन मैन 3 को प्रमोट करने में व्यस्त हैं. जो कि भारत में शुक्रवार 26 अप्रैल को और अमरीका में अगले महीने रिलीज़ होगी. पैल्ट्रो अमरीकी गायक और अभिनेत्री हैं. उन्होंने 1991 में अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी. वो अपने अभिनय के लिए ऑस्कर गोल्डन ग्लोब और स्क्रीन गिल्ड अवॉर्ड्स जीत चुकी हैं. पैल्ट्रो के पति क्रिस मार्टिन हैं जो मशहूर अमरीकन बैंड कोल्डप्ले के सिंगर हैं. वो सेवन द टैलेंटेड मिस्टर रिप्ली कंटेजियन जैसी चर्चित फिल्में दे चुकी हैं. वो एक मशहूर म्यूज़िकल टीवी सीरियल ग्ली में भी छोटी सी भूमिका निभा चुकी हैं. |
| DATE: 2013-04-25 |
| LABEL: entertainment |
| [1492] TITLE: 'सुरों की मल्लिका' शमशाद बेगम नहीं रहीं |
| CONTENT: मेरे पिया गए रंगून जैसे कई लोकप्रिय गीतों की आवाज़ रहीं शमशाद बेगम का मुंबई में निधन हो गया है. हिंदी फिल्मों की शुरुआती पार्श्वगायिकाओं में से एक शमशाद बेगम मुंबई में अपनी बेटी और दामाद के साथ रहती थी. समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए शमशाद की बेटी उषा ने बताया पिछले कुछ महीनों से उनकी तबीयत ठीक नहीं थी. वो अस्पताल में भर्ती भी थी. कल रात उनका निधन हो गया. कुछ नज़दीकी दोस्तों की मौजूदगी में उनका अंतिम संस्कार किया गया. शमशाद बेगम का जन्म पंजाब के अमृतसर शहर में 14 अप्रैल 1919 को हुआ था. शुरुआती दिनों में उन्होंने पेशावर रेडियो में काम किया था. उसके बाद उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लिए भी गीत गाए. कहा जाता है कि रेडियो पर उनकी आवाज़ सुनकर ही कई संगीत निर्देशकों ने उनसे संपर्क किया. उनकी समकालीन गायिकाएं गीता दत्त और लता मंगेश्कर से शमशाद की आवाज़ ख़ासी जुदा थी. बीबीसी से बातचीत में संगीत समीक्षक पवन झा कहते हैं सबसे बड़ी बात थी शमशाद जी की आवाज़ में खनक थी और ऐसी गूंज थी जो आपको छोड़ती नहीं थी. पवन के अनुसार ओ पी नैयर ने ताउम्र लता मंगेश्कर की आवाज़ नहीं ली. उन्होंने शमशादजी को ही अपने गीतों के लिए चुना. वो एक बार कह भी चुके हैं कि मैं जो हूं वो शमशाद के कारण हूं. हिंदी फिल्मों के कई सुपरहिट गाने उनके नाम दर्ज हैं जिन्हें आज के दौर में रिमिक्स भी किया गया है. 40 और 50 के दशक में शमशाद बेग़म के गाए गाने रेडियो पर छाए रहते थे. जैसे सीआईडी फिल्म का लेके पहला पहला प्यार और कहीं पे निगाहें. इसके अलावा पतंगा का मेरे पिया रंगून तो आज भी कई मोबाइल फोन की प्लेलिस्ट में मिल जाएगा. बहार फिल्म से सैंया दिल में आना रे और किस्मत से कजरा मोहब्बत वाला जिसे उन्होंने हीरोइन बबीता के लिए नहीं बल्कि फिल्म के हीरो बिस्वजीत के लिए गाया था. 2009 में शमशाद बेगम को पद्म भूषण पुरस्कार से नवाज़ा गया था. |
| DATE: 2013-04-24 |
| LABEL: entertainment |
| [1493] TITLE: सिर्फ़ 24 घंटे में केस सुलझाएंगे अनिल कपूर |
| CONTENT: चरमपंथ से मुकाबले पर बने मशहूर अमरीकी टीवी सीरियल 24 के हिंदी संस्करण में हिंदी फ़िल्मों के जानेमाने अभिनेता अनिल कपूर मुख्य भूमिका निभाएंगे. पहले बने अंग्रेजी संस्करण में मुख्य किरदार का नाम जैक बार था जिसकी भूमिका कीफ़र सदरलैंड ने निभाई थी. सौ से ज़्यादा बॉलीवुड की फ़िल्मों में अभिनय कर चुके अनिल 24 के अंग्रेज़ी संस्करण में भी काम कर चुके हैं. उन्होंने एक एपिसोड में मध्य पूर्व के नेता उमर हसन का किरदार निभाया था. रॉयटर्स से बातचीत में अनिल कपूर ने कहा कि अब चाहे जो हो उन्होंने इस सीरियल के रीमेक का फ़ैसला कर लिया है. इस कार्यक्रम का निर्माण भी अनिल कपूर की कंपनी ही कर रही है. सीरियल के निर्देशक अभिनव देव कहते हैं हम उन्हें उनके चहेते सितारे दे रहे हैं. हम उन्हें ऐसा मसाला दे रहे हैं जो उनके आस-पास ही है. यह ग़लत हो ही नहीं सकता. सीरियल का मूल अंग्रेज़ी संस्करण 2001 में शुरू हुआ था और नौ साल तक इसके 192 एपिसोड दिखाए गए. सीरियल के निर्माताओं का कहना है कि आंतकवाद विरोधी यूनिट का मुख्य सेट अमरीकी सीरियल जैसा ही होगा. कलर्स चैनल पर यह सीरियल इस साल के अंत में दिखाया जाएगा. चैनल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राज नायक कहते हैं हमारे दर्शक हिंदी क्षेत्र के आम लोग हैं. उन्होंने अभी तक यह नहीं देखा है. उनके लिए यह नया और अनोखा होगा. |
| DATE: 2013-04-21 |
| LABEL: entertainment |
| [1494] TITLE: फिल्में, जहां असल नहीं डिजिटल एक्टर काम करते हैं. |
| CONTENT: हॉलीवुड की एक्शन फिल्में अपने हैरतअंगेज़ स्टंट के लिए जानी जाती है. इनमें से कुछ स्टंट काफी खतरनाक भी होते हैं. आप पर्दे जब अपने पसंदीदा अभिनेताओं को देखते हैं तो शायद आपको लगता होगा कि ये सभी सीन इन्होंने खुद किए हैं. दरअसल इनमें से कई किरदार दरअसल उस कलाकार के डिजिटल चेहरे होते हैं. ये थ्री डाइमेंशनल एनिमेशन कहलाता है. इसे एक ऐसी तकनीक से तैयार किया गया है जो फिल्में बनाने के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है. पॉल डबेविक यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया के ग्राफिक्स रिसर्च में काम करते हैं. वे कहते हैं हॉलीवुड में आजकल ये चलन बढ़ रहा है जहाँ असल कलाकारों की जगह उनका डिजिटल रूप इस्तेमाल किया जाता है खासकर स्टंट दृश्यों में जहाँ असल कलाकारों के साथ शूट करना बेहद महंगा या खतरनाक हो सकता है. दर्शकों ने द एवेंजर्स जैसी फिल्मों में डिजिटल मॉडल देखे हैं जो असल लगते हैं. लेकिन डिजिटल चेहरे दिखाना पेचीदा काम है. चेहरे की एक-एक चीज़ सही तरीके से दिखाने के लिए एनिमेटर्स को कलाकार की कई तस्वीरें चाहिए होती हैं. ये सारी तस्वीरें एक समय खींची होनी चाहिए. यहाँ से लाइट स्टेज तकनीक का काम शुरु होता है. दरअसल एक रिसर्च प्रयोगशाला में नौ फुट का स्फीयर रखा गया है जिसमें 6900 एलईडी लगी हैं. ये किसी भी दिशा से किसी भी रंग की रोशनी पैदा कर सकता है. इस प्रयोगशाला में आप किसी भी हॉलीवुड स्टार को खड़ा कर दीजिए. सात कैमरे कई तरह की रोशनी में तस्वीरें लेनी शुरु कर देते हैं. एक्टर के करीब 30 तरह के हाव-भाव रिकॉर्ड किए जाते हैं. एनिमेट्रर इन छवियों को कम्यूपयर में फीड करते हैं. इन सबको मिलकार एक डिजिटल मैप तैयार किया जाता है. ये मैप थ्री डी मॉडल का आधार बनता है. यही बारिकीयाँ डिजिटल मॉडल को असल कलाकार जैसा बनाती है. पॉल डबेविक बताते हैं एनिमेटर को चेहरे की शेप सही सही बनानी होती है त्वचा का टेक्चर भी सही होना चाहिए. हर बार जब आपके चेहरे पर नया भाव आता है ये चीज़ें बदल जाती हैं. इसलिए डिजिटल मॉडल तैयार करने के लिए असल व्यक्ति का इस्तेमाल करना पड़ता है. हॉलीवुड फिल्म द एवेंजर्स में इस तकनीक का बखूबी इस्तेमाल किया गया है. इस तकनीक का इस्तेमाल घरों में गेमिंग कन्सोल में भी किया जा रहा है. पर कैसेयूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया के पॉल डबेविक समझाते हैं अपने फोन से कुछ फोटो हमारे सिस्टम में अपलोड करें. हम आपका डिजिकल वर्जन तैयार कर देंगे जो हूबहू आपकी तरह होगा. फिर उसे आपके गेम कंसोल में डाउनलोड कर दिया जाता है. तो ये विशेष तकनीक फिल्मों और गेमिंग की दुनिया में नए प्रयोग करने में मदद कर रही है. यहाँ असल और नकली में फर्क बताना मुश्किल हो जाता है. |
| DATE: 2013-04-20 |
| LABEL: entertainment |
| [1495] TITLE: ऐसी कॉमेडी पर हंसे या रोएं |
| CONTENT: टेलीविज़न पर आने वाले कॉमेडी शो में एक तरफ हास्य कलाकार भारती अपने चुटकुलों से लोगों को हंसाती है तो दूसरी तरफ कुछ ऐसी महिला प्रतिभागी होती हैं जो मज़ाक करती हुई कम और मज़ाक का शिकार होती हुई ज़्यादा दिखाई पड़ती हैं. आलोचकों द्वारा ऐसे कार्यक्रमों पर महिलाओं को वस्तु की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया जाता है. कॉमेडी सर्कस की जज अर्चना पूरणसिंह के मुताबिक औरतों का ऐसा प्रस्तुतिकरण तो हर जगह होता है. विज्ञापनों में ज़्यादा होता है जहां कार के साथ लड़की को बेवजह दिखाया जाता है. अर्चना के मुताबिक हमारे यहां कॉमेडी को काफी पारंपरिक तरीके से दिखाया जाता है. हमसे कई लोग ऐसी शिकायत करते हैं कि दक्षिण भारतीय को काला क्यों दिखाते हैं या पंजाबी को लाउड क्यों दिखाते हो लेकिन जब तक आपको हंसी आ रही है तब तक सब कुछ माफ़ है. कॉमेडी सर्कस के एक स्टार कलाकार कपिल की बात करते हुए अर्चना कहती हैं जब शो में कपिल अपनी पत्नी श्वेता को कहता है कि मैं तुझे मारूंगा तो मुझे हंसी आती है. मैं मानती हूं कि घरेलू हिंसा होती है लेकिन इस सामाजिक सच्चाई को हम जब हास्य में दिखाते हैं तो वो हमें सिर्फ हंसाता है. वहीं हास्य कलाकार भारती मानती हैं कि कॉमेडी में औरतों का मज़ाक बनता है तो कभी कभी बहुत बुरा लगता है. भारती का कहना है सब कहते हैं कॉमेडी है तो द्विअर्थी चुटकुले तो चलते हैं औरतों के शरीर पर मज़ाक भी चलता है लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा वो लोग करते हैं जिनके पास करने को कुछ और नहीं होता. अपनी कॉमेडी से भारत में लोकप्रिय चेहरा बनने वाली भारती मानती हैं कि कॉमेडी हमारे आसपास ही है जो उसे नहीं ढूंढ पाते वो जीजा-साली के जोक मार लेते हैं सुहागरात के चुटकुले मार देते हैं तो लोग हंस पड़ते हैं. अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए भारती ने बीबीसी को बताया मर्द लोग तो डबल मीनिंग जोक मार लेते हैं लेकिन औरत होने के नाते तो मैं ऐसा कर नहीं सकती थी. इसलिए मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि किस तरह अलग और अच्छे अंदाज़ में लोगों का मनोरंजन करुं. लेकिन इन सबके बीच भारती ये भी मानती हैं कि ऐसे शो एक मिक्स फ्रूट प्लेट की तरह होते हैं जिसमें हर तरह की कॉमेडी दिखाई जाती हैं. जो फ्रूट पसंद है वही खाइए. |
| DATE: 2013-04-18 |
| LABEL: entertainment |
| [1496] TITLE: 'गंगनम स्टाइल' के बाद साई का नया वीडियो भी सुपरहिट |
| CONTENT: दक्षिण कोरिया के गंगनम स्टाइल स्टार साई के नए म्यूज़िक वीडियो ने यू ट्यूब पर एक दिन में सर्वाधिक हिट का नया रिकॉर्ड बनाया है. साई के इस डांस वीडियो जेंटलमेन को शनिवार शाम जारी किया गया और ये ख़बर लिखे जाने तक इसे यू ट्यूब पर पांच करोड़ हिट मिल चुके हैं. हालांकि इस वीडियो में साई महिलाओं और लड़कियों के साथ कुछ बेहद अजीबोगरीब हरकतें करते दिखाई दे रहे हैं. और यूट्यूब पर इस वीडियो को देखने वाले कई लोगों को ये बात नागवार भी गुज़र रही है. शायद इसी वजह से इस वीडियो को एक लाख से भी ज़्यादा लोगों ने नापसंद भी किया है. एक दृश्य में साइ लड़की को बैठने के लिए कुर्सी ऑफर करते हैं और वो जैसे ही बैठने वाली होती है वो कुर्सी हटा देते हैं और फिर लड़की के गिरने के बाद हंसने लगते हैं. वीडियो में उन्होंने कुछ और भी ऐसी हरकतें की हैं जिन्हें यहां बयान नहीं किया जा सकता. पहले 24 घंटों में इस वीडियो को लगभग दो करोड़ हिट मिले जो कि एक रिकॉर्ड है. इससे पहले ये रिकॉर्ड मई 2012 में आए कनाडा के जस्टिन बीबर के वीडियो ब्वॉयफ्रैंड के नाम था जिसे यू ट्यूब पर एक दिन में 80 लाख हिट मिले थे. जेंटलमेन के वीडियो में साई ने काला चश्मा पहन रखा है जो कि अब उनकी पहचान बन चुका है. वीडियो में दिखाया गया है कि साई दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में जगह-जगह घूमकर अपनी विशिष्ट शैली में डांस कर रहे हैं. ये सोमवार को फ्रांस कनाडा न्यूजीलैंड डेनमार्क और स्वीडन सहित कई देशों में आईट्यूंस स्टोर्स में टॉप टेन गीतों में शामिल हो चुका है. फिनलैंड में भी ये गीत टॉप पर है. इससे पहले आए साई के वीडियो गंगनम स्टाइल को यू ट्यूब पर अब तक 1-5 अरब से अधिक हिट मिल चुके हैं. उनके डांस को दुनियाभर में इतना पसंद किया गया था और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून भी ख़ुद को उनके स्टाइल में थिरकने से नहीं रोक पाए थे. |
| DATE: 2013-04-15 |
| LABEL: entertainment |
| [1497] TITLE: उम्र बताने का गुनाह, फिल्में मिलनी हुईं बंद |
| CONTENT: सिएटल की एक अदालत ने अमरीकी अभिनेत्री जूनिए होआंग की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने अमेजनडॉटकॉम की सहायक कंपनी इंटरनेट मूवी डाटाबेस पर उनकी उम्र को सार्वजनिक करने का आरोप लगाया था. होआंग जिनका असली नाम होंग होआंग है ने आरोप लगाया था कि डाटाबेस द्वारा उनकी उम्र सार्वजनिक करने के बाद उन्हें काम मिलना कम हो गया. आईएमडीएस की दलील थी कि उसे सही तिथि प्रकाशित करने का अधिकार है और 41 वर्षीय होआंग यह साबित नहीं कर सकीं हैं कि इसके कारण उन्हें काम गवांना पड़ा. वेबसाइट के मुताबिक उनकी फिल्मों में 2011 में प्रर्दशित जिंजरडेड मैन 3 सेटरडे नाइट क्लीवर शामिल है. इस वेबसाइट की शुरुआत साल 1990 में हुई थी जिसे 1998 में अमेजन ने खरीद लिया. होआंग के प्रोफाइल पेज पर उनकी जन्म तिथि यथावत है. साल 2011 में दायर मुकदमे में अमेजन और उसकी सहायक कंपनी पर समझौते को तोड़ने घोखाघड़ी निजता का उल्लंघन और उपभोक्ता संरक्षण कानून को तोड़ने का आरोप लगया गया. गुरुवार को सुनवाई के दौरान अमेजन ने प्रतिवादी के तौर पर सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया. डाटाबेस के इस रुख का 2011 में दो अभिनय संघ ने यह कहते हुए विरोध किया था कि साइट उम्र के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा दे रही है. सुनवाई के दौरान कंपनी के वकीलों ने कहा कि अभिनेत्री का प्रोफाइल पढ़कर लोग क्या कदम उठाते हैं उसके लिए वो जिम्मेदार नहीं है. होआंग ने 10 लाख अमरीकी डालर का मुआवजा मांगा था. इससे पहले उन्होंने साइट के अपनी गलत उम्र बतायी थी जो सही उम्र के मुकाबले सात साल कम थी. इसके बाद साइट ने उनकी सही उम्र का पता किया और उसकी आपत्तियों के बावजूद उसे प्रकाशित कर दिया. सुनवाई के बाद होआंग ने उम्मीद जताई कि डाटाबेस अपनी नीतियों में बदलाव लायेगा. उन्होंने समाचार एजेंसी एपी से कहा कि मुझे पता है कि यह केवल मेरी समस्या नहीं है बल्कि ऐसे प्रत्येक व्यक्ति से संबंधित है जिसके प्रोफाइल पर उसकी उम्र दी गई हैं. |
| DATE: 2013-04-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1498] TITLE: भक्ति गीतों में बॉलीवुड का तड़का: कितना सही? |
| CONTENT: यूं तो पूजा पाठ और भक्ति के लिए कोई एक समय निर्धारित नहीं है. जिसकी जब श्रद्धा हो वो किसी भी धार्मिक काम में लग सकता है. लेकिन अगर नवरात्र चल रहे हों तो बात ज़रा अलग हो जाती है. जहां देखो वहीं भजन-कीर्तन या फिर जगराते आयोजित किए जाते हैं. लेकिन क्या इन कार्यक्रमों में भी वही होता है जो आजकल ज़्यादातर हो रहा है कहने का मतलब ये है कि क्या आपको अपने यहां फ़िल्मी गानों की धुनों पर गाए जाने वाले भजन सुनाई देते हैं जैसे कि चोली के पीछे क्या है की धुन पर कोई भजन या फिर इमरान हाशमी की फिल्म जन्नत के गानों की धुन पर कोई भजन. सच बताइए कि जब आप बॉलीवुड के किसी गाने की धुन पर बने किसी भजन को सुनते हैं तो आपके दिमाग में पहली छवि किस की आती है माधुरी दीक्षित की या फिर माता की इन गानों को गाने वालों के बारे में आप क्या सोचते हैं अनूप जलोटा भक्ति संगीत में अपना नाम बना चुके बड़े गायकों में शुमार किए जाते हैं. बीबीसी ने उनसे भक्ति संगीत में आए इन बदलावों के बारे में पूछा. अनूप जलोटा कहते हैं ऐसा है कि जिस गायक की जिनती क्षमता होगी वो उतना ही तो करेगा. उसने तो सिर्फ फ़िल्मी गाने ही सुने हैं और गाने उसे आते नहीं तो वो तो मंदिर के पीछे क्या है मंदिर के पीछे ये ही गाएगा न. इनमें से ज़्यादातर लोगों ने संगीत की कोई तालीम नहीं ली होती. इनमें ऐसी काबिलियत ही नहीं है कि वो किसी अच्छे भजन को बना सकें इसलिए वो फ़िल्मी गानों का सहारा ले लेते हैं. अनूप तो ये भी कहते हैं कि ऐसे गायकों से नाराज़ होने से बेहतर है कि आप उन पर तरस खाएं. साथ ही वो एक हिदायत भी देना चाहते हैं. अनूप कहते हैं मैं तो ऐसे गायकों को यही सलाह दूंगा कि संगीत की शिक्षा ले लें ताकि खुद से कुछ अच्छा काम पर पाएं. सिर्फ जगराते ही क्यों बाज़ार में आपको ऐसे अनगिनत रिकॉर्ड मिल जाएंगे जिनमें फ़िल्मी गानों की धुनों पर आधारित भजन होंगे. भक्ति संगीत का एक और जाना माना नाम अनुराधा पौडवाल कहती हैं कि इस चलन के भी दो पहलू हैं. वो कहती हैं बड़ी कंपनी हो या फिर कोई छोटी कंपनी वो तो यही देखते हैं कि बाज़ार में क्या बिक रहा है. नया गाना बनाकर उसको प्रचलित करना इसमें बहुत पैसा लगता है और हर कोई कम से कम पैसे में काम कर लेना चाहता है. अनुराधा कहती हैं हम लोग किस्मत वाले थे कि हमें नए-नए भजन गाने को मिले. आज की तारीख में लाखों गायक हैं पर परेशानी इस बात की है कि इन लोगों को सही कम्पोज़र नहीं मिलते. तो ऐसे लोगों के पास बस एक ही तरीका बचता है कि किसी भी प्रचलित गाने की धुन पर कोई भजन लिखवा लेना और उसे गाना. साथ ही वो ये भी कहती हैं कि फ़िल्मी गानों पर आधारित भजन गाने की वजह ये भी होती है कि ऐसे गाने पहले से ही लोगों की ज़ुबान पर होते हैं और गायक के लिए लोगों के साथ ताल-मेल बिठाना आसान हो जाता है. लेकिन क्या ऐसे गानों को सुनकर अनुराधा जी को कोई आपत्ति नहीं होतीइसके जवाब में वो कहती हैं आपत्ति इस बात से होती है कि ज़्यादातर फ़िल्मी गानों का चित्रण बड़े ही अभद्र तरीके से किया जाता है. जब ऐसे गानों पर आधारित भजन हम सुनते हैं तो हमारे दिमाग में वही फ़िल्मी गाने आ जाते हैं. धुन से कोई समस्या नहीं है पर चित्रण की वजह से वो गाने अभद्र हो जाते हैं. अनुराधा पौडवाल ये भी कहती हैं कि चाहे फ़िल्मी गाने हो या फिर भजन बने तो सात सुरों से ही हैं. |
| DATE: 2013-04-13 |
| LABEL: entertainment |
| [1499] TITLE: प्राण को दादा साहब फाल्के सम्मान |
| CONTENT: सिनेमा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान देने के लिए प्रतिष्ठिति दादा साहब फाल्के पुरस्कार वरिष्ठ अभिनेता प्राण को देने की घोषणा की गई है. 93 वर्षीय प्राण को भारतीय सिनेमा में 50 सालों से भी ज़्यादा समय तक अपना अविस्मरणीय योगदान देने के लिए ये सम्मान देने का फैसला किया गया है. बीबीसी से बात करते हुए प्राण के बेटे सुनील सिकंद ने अपनी खुशी ज़ाहिर की और कहा कि ये पूरे परिवार के लिए बेहद रोमांच का क्षण है. क्या प्राण साहब को ये सम्मान मिलने में देरी हुई. इस बात का जवाब देते हुए सुनील सिकंद ने कहा हमें इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए. ये बहुत बड़ा सम्मान है और हम इस पल का पूरी तरह से लुत्फ उठाना चाहते हैं. वैसे भी प्राण साहब ने कभी सम्मान या अवॉर्ड के लिए अभिनय नहीं किया. ये तो उनका जुनून था. नशा था. प्राण पिछले कुछ समय से अस्वस्थ हैं और समय समय पर उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया जा रहा है. प्राण ने अपना फिल्मी करियर 40 के दशक में शुरू किया. शुरुआत की कुछ फिल्मों में उन्होंने बतौर हीरो काम किया. लेकिन उनकी असल पहचान बनी खलनायक के तौर पर. 1949 में रिलीज़ हुई फिल्म ज़िद्दी और बड़ी बहन से उनकी पहचान विलेन के तौर पर बननी शुरू हो गई. फिर तो उन्होंने उस समय के मशहूर हीरो जैसे राज कपूर देव आनंद और दिलीप कुमार की कई फिल्मों में बतौर खलनायक अविस्मरणीय भूमिकाएं कीं. आज़ाद मधुमती दिल दिया दर्द लिया राम और श्याम मुनीमजी जिस देश में गंगा बहती है और कश्मीर की कली जैसी फिल्मों में उनके खलनायक चरित्र को खासी वाहवाही मिली. लेकिन साल 1967 में मनोज कुमार की फिल्म उपकार में उनकी निभाई मलंग चाचा की चरित्र भूमिका ने उन्हें एक अलग ही पहचान दिला दी. फिर प्राण को चरित्र भूमिकाओं में लिया जाने लगा. 70 के दशक के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के साथ उन्होंने ज़ंजीर डॉन अमर अकबर एंथनी और शराबी जैसी यादगार फिल्में दीं. |
| DATE: 2013-04-12 |
| LABEL: entertainment |
| [1500] TITLE: भारत में मलाला पर फिल्म, किसे मिला रोल? |
| CONTENT: कुछ साल पहले तक पाकिस्तान की बच्ची मलाला यूसुफ़ज़ई एक छोटे से शहर में अपनी किताबों में डूबी किसी आम बच्ची की तरह थीं. लेकिन पिछले चंद महीनों की घटनाओं ने उसे दुनिया भर में बेहद चर्चित चेहरा बना दिया है. तालिबानी हमले का निशाना बनी मलाला अपने अनुभवों को एक किताब में उतारने का करार तो पहले ही कर चुकी हैं अब मलाला पर एक फिल्म भी बनने जा रही है. ये फिल्म भारत में बनेगी और इसके निर्देशक हैं अमजद खान जिन्होंने इससे पहले दो फिल्में बनाई हैं. अमजद खान ने मलाला पर फिल्म बनाने की पुष्टि करते हुए बीबीसी को बताया कि फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो चुकी है और प्री प्रोडक्शन काम चल रहा है. ज़ाहिर है सबसे पहले यही सवाल ज़हन में आता है कि मलाला का रोल कौन करेगा. अमजद खान कहते हैं कि ये एक संवेदनशील फिल्म है और कलाकारों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वे उस बच्ची की पहचान अभी गुप्त रखना चाहेंगे. लेकिन उन्होंने इतना ज़रूर बताया कि जो बच्ची काम करेगी वो भारतीय नहीं है पर दक्षिण एशियाई है पश्तो बोलती है और अंग्रेज़ी वैसे ही अंदाज़ में बोलती है जैसे मलाला बोलती है और हूबहू मलाला की कॉपी है. फिल्म में काम करने वाले भारतीय कलाकारों के बारे में भी अभी अजमद खुलकर नहीं बोलना चाहते. उनका कहना है कि संवेदनशील मु्द्दा होने के कारण सब कलाकार फिलहाल सामने नहीं आना चाहते. फिल्म में हॉलीवुड का तड़का भी हो सकता है. निर्देशक अमजद ने बताया है कि हॉलीवुड ऐक्टर मेल गिब्सन और इटली की अभिनेत्री मोनिका बेलूची के साथ बातचीत चल रही है लेकिन अभी कुछ फाइनल नहीं हुआ है. इस विषय पर फिल्म बनाने के पीछे सोच पर अमजद कहते हैं दरअसल मैं दिखाना चाहता हूँ कि तालिबान कैसे काम करता है पैसे कहाँ से आते हैं कैसे आंतक फैलाते हैं. क़ुरान को पता नहीं ये लोग किस तरीके से समझते हैं शिक्षा के खिलाफ हैं औरतों को घर से बाहर निकलना मना है क्योंकि औरत अगर पढ़ेगी तो पूरा परिवार पढ़ता है. ये लोग स्वात के बच्चों के गले में बम बाँध देते हैं और सिखाते हैं कि जन्नत मिलेगी. माहौल बहुत बुरा है. ये सब चरणबद्ध तरीके से फिल्म में दिखाऊँगा. तो क्या फिल्म का केंद्र बिंदु तालिबान ज़्यादा और मलाला कम है इस पर अमजद ने बताया कि फिल्म में तालिबान को दिखाने का आधार मलाला को बनाया गया है. उनका कहना है मलाला ने हिम्मत दिखाई और वो कर दिखाया जो बाकी कोई नहीं कर पाए. तालिबान का नकाब उतारना मुख्य मकसद है. क्या इस फिल्म को मलाला या उनके परिवारवालों की रज़ामंदी मिली हुई है इस पर अमजद खान का कहना है मैंने ऐसे तो कोई अनुमति नहीं ली है. मैं अपनी और साथियों की रिसर्च के आधार पर फिल्म बना रहा हूँ. तालिबान के बारे में सारी जानकारी इम्तियाज़ गुल की किताबों से ली है और वो मदद कर रहे हैं. मलाला के परिवार का इससे कोई लेना-देना नहीं है. हालांकि मैंने उनके रिश्तेदारों से बात की है और उन्हें कोई ऐतराज़ नहीं है. मैं मलाला से भी बात करने की कोशिश कर रहा हूँ. फिल्म की ज़्यादातर शूटिंग भारत में ही होगी क्योंकि पाकिस्तान में शूटिंग करना मुश्किल है. कुछ हिस्सा मध्य प्रदेश में भेड़ाघाट में शूट किया जाएगा जिसे स्वात शहर की तरह दिखाया जाएगा और कुछ हिस्सा राजस्थान और भुज में होगा. बाकी शूटिंग ईरान में होगी जिसे अफगानिस्तान के तौर पर दिखाया जाएगा. अमजद खान इससे पहले टूमॉरो फिल्म बना चुके हैं जो दाऊद और छोटा राजन समेत अंडरवर्लड पर आधारित है लेकिन उसे अब तक सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट नहीं मिल पाया है. अमजद कहते हैं कि इस फिल्म में उनकी मदद वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे ने की थी जिनकी 2011 में हत्या कर दी गई थी. उनकी पिछली फिल्म ले गया सद्दाम थी जो तलाक पर आधारित थी जिसके बाद उनके खिलाफ फतवा जारी हुआ था. तो क्या मलाला और तालिबान जैसे मुद्दे पर फिल्म बनाने पर उन्हें किसी विवाद या सुरक्षा को लेकर चिंता नहीं है. अमजद हँसते हुए कहते हैं मुझे मौत से डर नहीं लगता. ऊपर वाले ने तय किया है कब किसको मरना है. हाँ मैं ये नहीं चाहता कि मेरे किसी कलाकार को नुकसान पहुँचे. निर्देशक का कहना है कि फिल्म की पहले दिन की कमाई वो स्वात घाटी में मलाला के स्कूल को दे देंगे. |
| DATE: 2013-04-10 |
| LABEL: entertainment |